आनुवंशिक रूपांतरित जीव (Genetically Modified Organism — GMO) वह पौधा, जंतु या सूक्ष्मजीव है जिसके DNA को अनुवांशिक अभियांत्रिकी तकनीकों (देखें अध्याय-10) द्वारा प्रयोगशाला में जानबूझकर परिवर्तित किया गया हो — या तो किसी अन्य जीव का जीन जोड़कर, या किसी मौजूदा जीन को हटाकर/संपादित करके। यह ध्यान रखना जरूरी है कि मनुष्य हजारों वर्षों से पौधों-जंतुओं को अपनी इच्छानुसार 'बदलता' आया है — चयनात्मक प्रजनन (Selective Breeding) द्वारा। परंतु GMO तकनीक इस प्रक्रिया को कहीं अधिक तीव्र, सटीक एवं शक्तिशाली बना देती है — क्योंकि इसमें प्रजातियों की सीमा (जैसे जीवाणु का जीन पौधे में डालना) पार की जा सकती है, जो परंपरागत प्रजनन में असंभव है।
🖼️ परंपरागत प्रजनन बनाम ट्रांसजेनेसिस (भिन्न प्रजाति से जीन) बनाम सिसजेनेसिस (निकट संबंधी प्रजाति से जीन) — तीनों विधियों की तुलना

| 🌾 परंपरागत चयनात्मक प्रजनन | 🧬 आनुवंशिक अभियांत्रिकी (GMO) |
|---|---|
| ◆ एक ही या निकट-संबंधी प्रजातियों के बीच संकरण ◆ हजारों जीन एक साथ स्थानांतरित होते हैं (अवांछित सहित) ◆ परिणाम आने में कई पीढ़ियां व वर्षों लगते हैं ◆ प्रकृति में स्वाभाविक रूप से भी घटित हो सकता है | ◆ किसी भी प्रजाति से — यहां तक कि जीवाणु से पौधे तक — जीन स्थानांतरण संभव ◆ केवल एक या कुछ विशिष्ट, चयनित जीन ही स्थानांतरित होते हैं ◆ परिणाम अपेक्षाकृत तीव्र गति से प्राप्त होता है ◆ प्रकृति में स्वाभाविक रूप से घटित नहीं होता — पूर्णतः मानव-निर्मित |
💡 ट्रांसजेनेसिस बनाम सिसजेनेसिस — एक महीन अंतर: ट्रांसजेनेसिस (Transgenesis) में जीन किसी पूर्णतः असंबंधित जीव से लिया जाता है (जैसे जीवाणु का Bt जीन कपास में डालना)। सिसजेनेसिस (Cisgenesis) में जीन उसी प्रजाति के किसी जंगली/निकट-संबंधी पौधे से लिया जाता है — यानी सैद्धांतिक रूप से वह जीन परंपरागत प्रजनन से भी स्थानांतरित हो सकता था, बस प्रक्रिया तीव्र व सटीक बनाई गई। यही अंतर नैतिक बहस में महत्वपूर्ण माना जाता है — कुछ विशेषज्ञ सिसजेनिक फसलों को ट्रांसजेनिक फसलों की तुलना में कम विवादास्पद मानते हैं।
◆ GMO ◆ चयनात्मक प्रजनन ◆ ट्रांसजेनेसिस ◆ सिसजेनेसिस ◆ ट्रांसजीन ◆ प्रजाति सीमा पार करना
1994 में Flavr Savr टमाटर के बाजार में आने के बाद से GM फसलों की वैश्विक खेती लगातार बढ़ती गई है। 1996 में जहां विश्व में मात्र 17 लाख हेक्टेयर भूमि पर GM फसलें उगाई जाती थीं, वहीं आज यह आंकड़ा 19 करोड़ हेक्टेयर से अधिक हो चुका है — यानी लगभग तीन दशकों में सौ गुने से भी अधिक विस्तार।
🖼️ विश्व में GM फसलों की खेती करने वाले प्रमुख देश (गहरा रंग = बड़ा क्षेत्रफल) — अमेरिका, ब्राजील, अर्जेंटीना, कनाडा, भारत व चीन प्रमुख उत्पादक

प्रमुख GM उत्पादक देश एवं प्रमुख फसलें
GM फसलों का वैश्विक विस्तार मुख्यतः चार फसलों तक सीमित है — सोयाबीन, मक्का, कपास व कैनोला (सरसों परिवार) — जो कुल GM क्षेत्रफल का लगभग 99% भाग बनाती हैं। यानी दुनिया भर में उगाई जाने वाली हजारों खाद्य फसलों में से बहुत कम को ही व्यावसायिक GM स्वीकृति मिली है, जो दर्शाता है कि नियामक अनुमोदन कितना कठिन एवं लंबा है।
◆ वैश्विक GM क्षेत्रफल ◆ GM सोयाबीन ◆ GM मक्का ◆ GM कपास ◆ GM कैनोला ◆ यूरोपीय संघ प्रतिबंध
GMO समर्थकों का सबसे मजबूत तर्क यह है कि बढ़ती विश्व जनसंख्या (2050 तक अनुमानतः 970 करोड़) को खिलाने के लिए, सीमित कृषि भूमि व जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों के बीच, उत्पादकता बढ़ाने वाली तकनीकें अनिवार्य हैं। Bt कपास का उदाहरण (अध्याय-10 में विस्तृत) पहले ही दिखा चुका है कि कीट-प्रतिरोधी GM फसलें किस प्रकार उपज बढ़ाकर व कीटनाशक लागत घटाकर किसानों को प्रत्यक्ष लाभ पहुंचा सकती हैं।
| लाभ की श्रेणी | विवरण |
|---|---|
| उपज वृद्धि | कीट व रोग प्रतिरोधकता से फसल क्षति में कमी, प्रति हेक्टेयर उत्पादन में वृद्धि |
| कीटनाशक उपयोग में कमी | Bt फसलों में रासायनिक कीटनाशक छिड़काव की आवश्यकता काफी घट जाती है |
| जलवायु सहनशीलता | सूखा-सहनशील, बाढ़-सहनशील एवं लवणता-सहनशील GM किस्मों का विकास |
| खरपतवार नियंत्रण | हर्बिसाइड-सहनशील (Herbicide Tolerant) फसलों में खरपतवार प्रबंधन आसान |
| किसान आय | उत्पादन लागत में कमी व उपज वृद्धि से शुद्ध आय में सुधार (Bt कपास अध्ययनों में सिद्ध) |
💡 जलवायु-सहनशील फसलें — भविष्य की आवश्यकता: वैज्ञानिक ऐसी GM फसलें विकसित कर रहे हैं जो कम पानी में जीवित रह सकें (सूखा-सहनशील), अधिक नमक वाली मिट्टी में उग सकें (लवणता-सहनशील) या बाढ़ की स्थिति में भी बच सकें — जैसे बांग्लादेश व भारत के बाढ़-प्रवण क्षेत्रों के लिए विकसित 'सब-1' जीन युक्त बाढ़-सहनशील धान (यह जीन-मार्कर आधारित प्रजनन का उदाहरण है, न कि पूर्ण ट्रांसजेनिक)। जलवायु परिवर्तन के दौर में ऐसी तकनीकें खाद्य सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती हैं।
◆ उपज वृद्धि ◆ कीटनाशक उपयोग में कमी ◆ सूखा-सहनशील फसलें ◆ हर्बिसाइड-सहनशील फसलें ◆ खाद्य सुरक्षा
जैव-सुदृढ़ीकरण (Biofortification) एक ऐसी रणनीति है जिसमें फसलों में स्वाभाविक रूप से या अनुवांशिक अभियांत्रिकी द्वारा पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ाई जाती है, ताकि सामान्य आहार से ही कुपोषण (विशेषकर सूक्ष्म-पोषक तत्वों की कमी) दूर की जा सके — यह उन क्षेत्रों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है जहां आहार विविधता सीमित है।
🖼️ गोल्डन राइस (दाएं, पीले दाने) की तुलना सामान्य सफेद चावल (बाएं) से — बीटा-कैरोटीन के कारण सुनहरा रंग

गोल्डन राइस (Golden Rice) में मक्का व मृदा-जीवाणु Erwinia uredovora के जीन डालकर चावल के दानों में बीटा-कैरोटीन (Beta-carotene, विटामिन-A का पूर्ववर्ती) का संश्लेषण कराया गया है। दक्षिण-पूर्व एशिया में जहां सफेद चावल मुख्य आहार है और विटामिन-A की कमी से प्रतिवर्ष लाखों बच्चे अंधेपन के शिकार होते हैं, वहां गोल्डन राइस एक संभावित समाधान के रूप में विकसित किया गया।
◆ जैव-सुदृढ़ीकरण (Biofortification) ◆ गोल्डन राइस ◆ बीटा-कैरोटीन ◆ विटामिन-A न्यूनता ◆ मालुसोग राइस ◆ फिलीपींस अदालत निर्णय 2024
जैव सुरक्षा (Biosafety) का अर्थ है GMO के पर्यावरण एवं जैव-विविधता पर पड़ने वाले संभावित नकारात्मक प्रभावों का आकलन एवं प्रबंधन। किसी भी GM फसल को व्यावसायिक अनुमति देने से पहले वैज्ञानिकों को यह सुनिश्चित करना होता है कि वह प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र को हानि न पहुंचाए।
प्रमुख जैव सुरक्षा चिंताएं
💡 सावधानी बनाम प्रमाण — प्रीकॉशनरी सिद्धांत: जैव सुरक्षा नीति में अक्सर 'प्रीकॉशनरी सिद्धांत' (Precautionary Principle) अपनाया जाता है — यानी जब तक किसी नई तकनीक की पूर्ण सुरक्षा वैज्ञानिक रूप से सिद्ध न हो जाए, तब तक सावधानी बरतते हुए उसे सीमित/नियंत्रित रूप से ही अपनाया जाए। यूरोपीय संघ की GMO नीति इसी सिद्धांत पर आधारित है, जबकि अमेरिका जैसे देश 'ठोस वैज्ञानिक प्रमाण मिलने तक अनुमति' के अधिक उदार दृष्टिकोण को अपनाते हैं — यही अंतर वैश्विक GMO नीति बहस के केंद्र में है।
◆ जैव सुरक्षा ◆ जीन प्रवाह ◆ सुपर-वीड ◆ गैर-लक्षित जीव ◆ जैव-विविधता हानि ◆ प्रीकॉशनरी सिद्धांत
जब भी कोई नया GM खाद्य उत्पाद बाजार में आने की तैयारी में होता है, उपभोक्ताओं के मन में सबसे पहला प्रश्न यही उठता है — 'क्या यह खाने के लिए सुरक्षित है?' यह पूर्णतः स्वाभाविक व वैध चिंता है, और वैज्ञानिक समुदाय ने इसका गहन अध्ययन किया है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO), अमेरिकी राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी (National Academy of Sciences), यूरोपीय खाद्य सुरक्षा प्राधिकरण (EFSA) सहित विश्व की प्रमुख वैज्ञानिक संस्थाओं ने सैकड़ों अध्ययनों की समीक्षा के बाद यह निष्कर्ष दिया है कि वर्तमान में बाजार में उपलब्ध अनुमोदित GM खाद्य पदार्थ, गैर-GM खाद्य पदार्थों जितने ही सुरक्षित हैं — इनके सेवन से किसी विशेष स्वास्थ्य जोखिम का कोई ठोस वैज्ञानिक प्रमाण नहीं मिला है।
फिर भी बनी रहने वाली चिंताएं
किसी भी GM फसल को व्यावसायिक अनुमति मिलने से पहले उसे विष-विज्ञान परीक्षण (Toxicology Testing), एलर्जी-क्षमता मूल्यांकन (Allergenicity Assessment), पोषक तत्व तुलना (Substantial Equivalence — यानी GM उत्पाद की पोषण संरचना गैर-GM संस्करण से तुलना) एवं पशु-आहार अध्ययनों से गुजरना पड़ता है। भारत में यह जिम्मेदारी GEAC व संबंधित वैज्ञानिक समितियों की होती है (टॉपिक-11 में विस्तार से)।
◆ वैज्ञानिक सहमति ◆ WHO ◆ EFSA ◆ एलर्जी परीक्षण ◆ एंटीबायोटिक प्रतिरोधी मार्कर जीन ◆ सब्सटेंशियल इक्विवेलेंस ◆ विष-विज्ञान परीक्षण
GMO बहस का एक महत्वपूर्ण आयाम विशुद्ध विज्ञान से आगे बढ़कर अर्थशास्त्र व सामाजिक न्याय से जुड़ता है — विशेषकर छोटे व सीमांत किसानों के परिप्रेक्ष्य से। अधिकांश व्यावसायिक GM बीज कुछ बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा पेटेंट-संरक्षित होते हैं, जो किसानों की पारंपरिक बीज-स्वतंत्रता को प्रभावित कर सकते हैं।
प्रमुख सामाजिक-आर्थिक चिंताएं
🖼️ GMO बीज कंपनियों के विरुद्ध एक सार्वजनिक प्रदर्शन (स्टॉकहोम, स्वीडन) — बीज संप्रभुता व कॉर्पोरेट नियंत्रण को लेकर वैश्विक चिंता

◆ बीज संप्रभुता ◆ पेटेंट-संरक्षित बीज ◆ बीज निर्भरता ◆ टर्मिनेटर तकनीक ◆ बाजार एकाधिकार
GMO पर बहस केवल विज्ञान या अर्थशास्त्र तक सीमित नहीं है — इसमें गहरे नैतिक व दार्शनिक प्रश्न भी जुड़े हैं, जिनका कोई एक 'सही' वैज्ञानिक उत्तर नहीं होता, बल्कि यह समाज के मूल्यों व मान्यताओं पर निर्भर करता है।
नैतिक बहस के प्रमुख पक्ष
| ✅ GMO समर्थकों का तर्क | ⚠️ GMO आलोचकों का तर्क |
|---|---|
| ◆ मानवता ने हमेशा प्रकृति को अपनी आवश्यकतानुसार ढाला है (कृषि की शुरुआत से ही) ◆ भूख व कुपोषण से निपटना भी एक नैतिक दायित्व है ◆ कठोर वैज्ञानिक परीक्षण के बाद ही अनुमति मिलती है | ◆ गति व सटीकता के कारण जोखिम आकलन कठिन ◆ कॉर्पोरेट नियंत्रण व असमानता बढ़ने की आशंका ◆ 'प्राकृतिक' भोजन के अधिकार व सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा जरूरी |
◆ नैतिक बहस ◆ प्रकृति में हस्तक्षेप ◆ धार्मिक-सांस्कृतिक दृष्टिकोण ◆ अंतर-पीढ़ीगत न्याय ◆ सूचित सहमति
यदि किसी उत्पाद में GM सामग्री हो, तो क्या उसके पैकेट पर यह स्पष्ट रूप से लिखा होना चाहिए? यह प्रश्न विश्व भर में नीति-निर्माताओं के लिए एक बड़ी चुनौती रहा है — क्योंकि इसमें उपभोक्ता के 'जानने के अधिकार' एवं उद्योग की 'अनावश्यक भय न फैलाने' की चिंता के बीच संतुलन बनाना पड़ता है।
| देश/क्षेत्र | GMO लेबलिंग नीति |
|---|---|
| यूरोपीय संघ | अनिवार्य लेबलिंग — किसी भी उत्पाद में 0.9% से अधिक GM सामग्री होने पर स्पष्ट लेबल जरूरी |
| भारत (FSSAI) | आयातित GM खाद्य में 1% सीमा निर्धारित; GM खाद्य विनियमन हेतु मसौदा नियम प्रक्रियाधीन |
| अमेरिका | राष्ट्रीय जैव-इंजीनियर्ड खाद्य प्रकटीकरण मानक (National Bioengineered Food Disclosure Standard) — QR कोड/टेक्स्ट लेबल विकल्प |
| चीन | अनिवार्य लेबलिंग — सूचीबद्ध GM उत्पादों हेतु स्पष्ट अंकन आवश्यक |
भारत में खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने GM खाद्य पदार्थों के लिए अलग विनियमन प्रस्तावित किए हैं, जिनके अंतर्गत आयातित खाद्य पदार्थों में GM सामग्री की एक सीमा (1%) निर्धारित की गई है। हालांकि, भारत में उगाई जाने वाली एकमात्र स्वीकृत GM फसल (Bt कपास) एक गैर-खाद्य (रेशा) फसल है, इसलिए वर्तमान में घरेलू GM खाद्य लेबलिंग का मुद्दा सीमित दायरे में है — परंतु आयातित प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों (जैसे सोया व मक्का से बने उत्पाद) के लिए यह विशेष रूप से प्रासंगिक है।
◆ GMO लेबलिंग ◆ जानने का अधिकार ◆ FSSAI ◆ राष्ट्रीय जैव-इंजीनियर्ड खाद्य प्रकटीकरण मानक
चूंकि GM फसलों व बीजों का व्यापार अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं के पार होता है, इसलिए वैश्विक स्तर पर समन्वित नियमों की आवश्यकता महसूस हुई। इस दिशा में दो प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय ढांचे विकसित किए गए हैं।
जैविक विविधता पर कन्वेंशन (Convention on Biological Diversity — CBD) के अंतर्गत 2000 में अपनाया गया एवं 2003 में लागू हुआ यह प्रोटोकॉल, जीवित रूपांतरित जीवों (Living Modified Organisms — LMOs) के सीमा-पार सुरक्षित संचरण, प्रबंधन एवं उपयोग को नियंत्रित करता है। इसका मूल सिद्धांत है 'अग्रिम सूचित सहमति' (Advance Informed Agreement) — अर्थात कोई भी देश किसी अन्य देश को LMO निर्यात करने से पहले आयातक देश की स्पष्ट सहमति प्राप्त करने के लिए बाध्य है। भारत इस प्रोटोकॉल का एक हस्ताक्षरकर्ता एवं अनुसमर्थक (ratifying) सदस्य है।
कोडेक्स एलिमेंटेरियस (Codex Alimentarius)
यह खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) व विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा संयुक्त रूप से स्थापित एक अंतर्राष्ट्रीय खाद्य मानक संहिता है, जो GM खाद्य पदार्थों की सुरक्षा जांच व जोखिम मूल्यांकन हेतु वैज्ञानिक दिशा-निर्देश प्रदान करती है। यह विश्व व्यापार संगठन (WTO) के खाद्य सुरक्षा विवादों में भी एक संदर्भ-बिंदु के रूप में कार्य करती है।
💡 अग्रिम सूचित सहमति सिद्धांत — व्यावहारिक उदाहरण: यदि कोई देश दूसरे देश को GM मक्का का बीज निर्यात करना चाहता है, तो कार्टाजेना प्रोटोकॉल के अंतर्गत निर्यातक देश को पहले आयातक देश को उस GM उत्पाद की पूरी जानकारी (जोखिम आकलन सहित) देनी होगी एवं आयातक देश की स्पष्ट लिखित सहमति प्राप्त करनी होगी — तभी आयात वैध माना जाएगा। यह सिद्धांत विकासशील देशों के हितों की रक्षा हेतु विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है।
◆ कार्टाजेना प्रोटोकॉल ◆ जैविक विविधता कन्वेंशन (CBD) ◆ LMO ◆ अग्रिम सूचित सहमति ◆ कोडेक्स एलिमेंटेरियस ◆ FAO-WHO
भारत में GMO के अनुसंधान, परीक्षण एवं व्यावसायिक अनुमोदन हेतु पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के अंतर्गत एक बहु-स्तरीय (Multi-tier) नियामक व्यवस्था स्थापित की गई है। यह व्यवस्था प्रयोगशाला स्तर से लेकर राष्ट्रीय अनुमोदन स्तर तक चरणबद्ध निगरानी सुनिश्चित करती है।
📐 भारत की बहु-स्तरीय GMO नियामक संरचना — सूत्र/प्रक्रिया: स्तर 1: संस्थागत जैव सुरक्षा समिति (IBSC) — प्रत्येक अनुसंधान संस्थान/विश्वविद्यालय स्तर पर स्तर 2: आनुवंशिक हेर-फेर समीक्षा समिति (RCGM) — जैव-प्रौद्योगिकी विभाग (DBT) के अंतर्गत स्तर 3: आनुवंशिक अभियांत्रिकी मूल्यांकन समिति (GEAC) — पर्यावरण मंत्रालय (MoEFCC) के अंतर्गत — अंतिम अनुमोदन प्राधिकरण
| नियामक संस्था | जिम्मेदारी |
|---|---|
| IBSC (Institutional Biosafety Committee) | संस्थान स्तर पर सभी GMO अनुसंधान गतिविधियों की प्रारंभिक निगरानी एवं राष्ट्रीय दिशा-निर्देशों का अनुपालन सुनिश्चित करना |
| RCGM (Review Committee on Genetic Manipulation) | DBT के अंतर्गत — अनुसंधान प्रस्तावों, प्रयोगशाला एवं सीमित क्षेत्र परीक्षणों (सीमित फील्ड ट्रायल) की समीक्षा एवं निगरानी |
| GEAC (Genetic Engineering Appraisal Committee) | MoEFCC के अंतर्गत — बड़े पैमाने पर फील्ड ट्रायल, पर्यावरणीय मुक्ति (Environmental Release) एवं व्यावसायिक खेती हेतु अंतिम स्वीकृति की सर्वोच्च संस्था |
प्रयोगों की श्रेणियां
GEAC का निर्णय अंतिम नहीं माना जाता — पर्यावरण मंत्री के पास GEAC की अनुशंसा को स्वीकार या अस्वीकार करने का अधिकार है, जैसा कि 2010 में Bt बैंगन के मामले में हुआ था (अगले टॉपिक में विस्तार से)। इसके अतिरिक्त, राज्य सरकारों को भी अपने क्षेत्र में GM फसल परीक्षण की अनुमति देने या न देने का अधिकार प्राप्त है।
◆ पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 ◆ IBSC ◆ RCGM ◆ GEAC ◆ MoEFCC ◆ श्रेणी I/II/III प्रयोग
अक्टूबर 2009 में GEAC ने Bt बैंगन की व्यावसायिक खेती को स्वीकृति प्रदान की थी — यह भारत की पहली GM खाद्य फसल होती। परंतु किसान संगठनों, पर्यावरण कार्यकर्ताओं एवं कुछ वैज्ञानिकों के तीव्र विरोध, सार्वजनिक परामर्श एवं वैज्ञानिक असहमति को देखते हुए, तत्कालीन पर्यावरण मंत्री श्री जयराम रमेश ने फरवरी 2010 में GEAC के निर्णय को पलटते हुए Bt बैंगन पर अनिश्चितकालीन मोरेटोरियम (रोक) लगा दिया — जो आज (2025) तक प्रभावी है। यह मोरेटोरियम तब तक लागू रहेगा जब तक स्वतंत्र वैज्ञानिक अध्ययनों से जनता व वैज्ञानिक समुदाय की संतुष्टि हेतु इसकी सुरक्षा सिद्ध न हो जाए।
GM सरसों (DMH-11) विवाद
धारा सरसों संकर-11 (Dhara Mustard Hybrid-11 — DMH-11) दिल्ली विश्वविद्यालय के आनुवंशिक हेर-फेर केंद्र (CGMCP), राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (NDDB) एवं DBT द्वारा संयुक्त रूप से विकसित एक स्वदेशी हर्बिसाइड-सहनशील (barnase-barstar तकनीक आधारित) ट्रांसजेनिक सरसों संकर है, जिसका उद्देश्य भारत के खाद्य तेल आयात पर निर्भरता कम करना है — भारत अपनी खाद्य तेल आवश्यकता का लगभग 55-60% आयात करता है, जिसमें सरसों उत्पादन बढ़ाना एक रणनीतिक प्राथमिकता है।
| ✅ GM सरसों समर्थकों का तर्क | ⚠️ GM सरसों आलोचकों का तर्क |
|---|---|
| ◆ खाद्य तेल आयात निर्भरता घटाने की रणनीतिक आवश्यकता ◆ स्वदेशी तकनीक — विदेशी कंपनी पर निर्भरता नहीं ◆ उपज वृद्धि से किसान आय में संभावित सुधार | ◆ मधुमक्खी व परागणकों पर हर्बिसाइड-सहनशीलता के प्रभाव की चिंता ◆ स्वतंत्र दीर्घकालिक अध्ययनों की अपर्याप्तता का आरोप ◆ सार्वजनिक आंकड़ों की पारदर्शिता की मांग |
◆ Bt बैंगन मोरेटोरियम ◆ जयराम रमेश ◆ DMH-11 ◆ CGMCP ◆ NDDB ◆ barnase-barstar तकनीक ◆ सर्वोच्च न्यायालय विभाजित निर्णय ◆ राजस्थान सरसों उत्पादन
बौद्धिक संपदा अधिकार (Intellectual Property Rights — IPR) GMO बहस का एक अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी आयाम है — क्योंकि GM बीज विकसित करने में वर्षों का शोध व भारी पूंजी निवेश होता है, कंपनियां अपने निवेश की सुरक्षा हेतु पेटेंट का सहारा लेती हैं, परंतु इससे किसानों की परंपरागत स्वतंत्रता को लेकर गंभीर प्रश्न उठते हैं।
भारत का पादप किस्म एवं कृषक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 2001
भारत ने अंतर्राष्ट्रीय व्यापार संगठन (WTO) के TRIPS समझौते के अंतर्गत अपने दायित्वों को पूरा करते हुए, विश्व का एक अनूठा कानून बनाया — पादप किस्म एवं कृषक अधिकार संरक्षण अधिनियम (Protection of Plant Varieties and Farmers' Rights Act), 2001। यह कानून एक साथ दो उद्देश्य पूरा करता है — पौध प्रजनकों (Breeders) के नवाचार को संरक्षण देना, तथा साथ ही किसानों के परंपरागत अधिकार की रक्षा करना।
विश्व के कई हिस्सों में बहुराष्ट्रीय बीज कंपनियों व किसानों के बीच पेटेंट उल्लंघन को लेकर लंबे कानूनी विवाद चले हैं — जिनमें किसानों पर बिना अनुमति पेटेंट-संरक्षित बीज उपयोग करने का आरोप लगाया गया, जबकि किसानों का तर्क था कि परागण के कारण अनजाने में उनकी फसल में वह जीन पहुंच गया। ऐसे मामलों ने वैश्विक स्तर पर यह बहस तेज की कि जीवित, स्व-प्रजनन करने वाले जीवों (जैसे बीज) पर पेटेंट कानून का अनुप्रयोग कितना उचित है — क्योंकि पौधे परंपरागत औद्योगिक उत्पादों (जैसे मशीन) से बिल्कुल भिन्न प्रकृति के हैं।
◆ बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR) ◆ TRIPS समझौता ◆ पादप किस्म एवं कृषक अधिकार संरक्षण अधिनियम 2001 ◆ कृषक अधिकार ◆ प्रजनक अधिकार ◆ बीज पेटेंट विवाद
इस अध्याय में हमने देखा कि GMO कोई सीधा-सादा 'अच्छा बनाम बुरा' मुद्दा नहीं है — यह विज्ञान, अर्थशास्त्र, नैतिकता, कानून व संस्कृति के जटिल प्रतिच्छेदन (intersection) पर खड़ा है। एक जिम्मेदार नागरिक व भावी प्रशासक के रूप में, संतुलित दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है — न तो अंधाधुंध विरोध, न ही बिना सावधानी के अंधाधुंध स्वीकृति।
संतुलित नीति के आवश्यक स्तंभ
GMO का ELSI (नैतिक-कानूनी-सामाजिक मुद्दे) पहलू परीक्षा में प्रायः 'सतत विकास एवं पर्यावरण नीति' या 'विज्ञान-प्रौद्योगिकी एवं समाज' जैसे व्यापक विषयों से जोड़कर पूछा जाता है — उत्तर लिखते समय दोनों पक्षों (लाभ एवं चिंताएं) का संतुलित प्रस्तुतीकरण करना तथा भारत के ठोस उदाहरणों (Bt कपास, Bt बैंगन मोरेटोरियम, GM सरसों) का उल्लेख करना उत्तर की गुणवत्ता बढ़ाता है।
◆ संतुलित दृष्टिकोण ◆ प्रकरण-दर-प्रकरण मूल्यांकन ◆ किसान-केंद्रित नीति ◆ उपभोक्ता स्वायत्तता ◆ मार्कर-सहायक चयन
• GMO वह जीव है जिसके DNA को अनुवांशिक अभियांत्रिकी द्वारा जानबूझकर परिवर्तित किया गया हो — यह परंपरागत चयनात्मक प्रजनन से अधिक तीव्र व सटीक, परंतु प्रजाति-सीमा पार करने के कारण अधिक विवादास्पद तकनीक है। • वैश्विक GM फसल क्षेत्रफल 19 करोड़ हेक्टेयर से अधिक हो चुका है, परंतु यह मुख्यतः चार फसलों (सोयाबीन, मक्का, कपास, कैनोला) तक सीमित है। • GMO के लाभों में उपज वृद्धि, कीटनाशक उपयोग में कमी, जलवायु सहनशीलता एवं गोल्डन राइस जैसी जैव-सुदृढ़ीकरण तकनीकें शामिल हैं — जो कुपोषण से लड़ने में सहायक हो सकती हैं। • जैव सुरक्षा चिंताओं में जीन प्रवाह, गैर-लक्षित जीवों पर प्रभाव व जैव-विविधता हानि शामिल हैं; वैज्ञानिक सहमति के अनुसार अनुमोदित GM खाद्य गैर-GM जितने ही सुरक्षित हैं, फिर भी दीर्घकालिक अध्ययन की मांग बनी रहती है। • सामाजिक-आर्थिक मुद्दों में बीज संप्रभुता, पेटेंट-निर्भरता व बाजार एकाधिकार की चिंताएं प्रमुख हैं; नैतिक बहस में प्रकृति-हस्तक्षेप, सांस्कृतिक मूल्य व अंतर-पीढ़ीगत न्याय के प्रश्न शामिल हैं। • कार्टाजेना प्रोटोकॉल (2000) LMO के सीमा-पार संचरण को 'अग्रिम सूचित सहमति' सिद्धांत से नियंत्रित करता है; कोडेक्स एलिमेंटेरियस वैश्विक खाद्य सुरक्षा मानक प्रदान करता है। • भारत में तीन-स्तरीय नियामक ढांचा (IBSC → RCGM → GEAC) पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 के अंतर्गत कार्य करता है; GEAC की अनुशंसा को पर्यावरण मंत्री पलट सकते हैं। • Bt बैंगन पर 2010 से अनिश्चितकालीन मोरेटोरियम लागू है; GM सरसों (DMH-11) का मामला वर्तमान में सर्वोच्च न्यायालय की बड़ी पीठ में विचाराधीन है — दोनों भारत के सबसे बड़े GMO विवाद हैं। • भारत का पादप किस्म एवं कृषक अधिकार संरक्षण अधिनियम 2001 किसानों के बीज-बचाने के अधिकार व प्रजनकों के व्यावसायिक अधिकार, दोनों को संतुलित करने वाला अनूठा कानून है। • GMO नीति में संतुलित दृष्टिकोण आवश्यक है — प्रकरण-दर-प्रकरण मूल्यांकन, स्वतंत्र वैज्ञानिक निगरानी, किसान-केंद्रित नीति एवं उपभोक्ता स्वायत्तता के स्तंभों पर आधारित।