मानव इंसुलिन की कहानी बताती है कि जैव-प्रौद्योगिकी (Biotechnology) असल में क्या है — जीवित जीवों, उनकी कोशिकाओं या उनके भागों (जैसे एंजाइम, प्रोटीन) का उपयोग करके ऐसे उत्पाद या प्रक्रियाएं विकसित करना जो मानव जीवन के लिए उपयोगी हों। यूरोपियन फेडरेशन ऑफ बायोटेक्नोलॉजी (European Federation of Biotechnology) के अनुसार, 'जैव-प्रौद्योगिकी सूक्ष्मजीवों, कोशिका एवं ऊतक संवर्धन तकनीकों तथा जैव-प्रक्रियाओं के अभियांत्रिकी एवं तकनीकी अनुप्रयोगों का समन्वित उपयोग है, ताकि वस्तुओं एवं सेवाओं के उत्पादन में विज्ञान की क्षमताओं का पूर्ण उपयोग किया जा सके।' सरल शब्दों में कहें तो — प्रकृति ने जीवों को जो जैविक क्षमताएं दी हैं (जैसे किण्वन करना, प्रोटीन बनाना, नाइट्रोजन स्थिर करना), जैव-प्रौद्योगिकी उन्हीं क्षमताओं को मानव कल्याण के लिए नियंत्रित ढंग से उपयोग करने की कला एवं विज्ञान है।
| 🏺 पारंपरिक जैव-प्रौद्योगिकी | 🧬 आधुनिक जैव-प्रौद्योगिकी |
|---|---|
| ◆ हजारों वर्षों से चली आ रही — बिना जीन के स्तर पर छेड़छाड़ के ◆ दही, पनीर, ब्रेड, शराब, सिरका बनाना ◆ पौधों-जंतुओं का पारंपरिक चयनात्मक प्रजनन (Selective Breeding) ◆ खाद (कम्पोस्ट) एवं जैविक खाद बनाना ◆ उदाहरण: मिस्र में 6000 वर्ष पूर्व शराब व ब्रेड बनाना | ◆ 20वीं सदी के उत्तरार्ध से — सीधे DNA/जीन स्तर पर काम ◆ रीकॉम्बिनेंट DNA (rDNA) तकनीक — जीन काटना-जोड़ना ◆ जीन एडिटिंग (CRISPR), टिशू कल्चर, स्टेम सेल तकनीक ◆ मोनोक्लोनल एंटीबॉडी, PCR, DNA फिंगरप्रिंटिंग ◆ उदाहरण: मानव इंसुलिन, Bt कपास, कोविड mRNA टीके |
| वर्ष | वैज्ञानिक/घटना | योगदान |
|---|---|---|
| 1857 | लुई पास्चर | सिद्ध किया कि किण्वन सूक्ष्मजीवों की क्रिया से होता है |
| 1928 | अलेक्जेंडर फ्लेमिंग | पेनिसिलिन (प्रथम एंटीबायोटिक) की आकस्मिक खोज |
| 1943 | सेलमन वक्समैन | स्ट्रेप्टोमाइसिन की खोज; 'एंटीबायोटिक' शब्द गढ़ा |
| 1953 | जेम्स वाटसन व फ्रांसिस क्रिक | DNA की द्वि-कुंडलिनी (Double Helix) संरचना का प्रतिपादन |
| 1972 | पॉल बर्ग | पहला कृत्रिम रीकॉम्बिनेंट DNA अणु तैयार किया |
| 1973 | स्टेनली कोहेन व हर्बर्ट बॉयर | पहला सफल जीन क्लोनिंग प्रयोग — rDNA तकनीक की नींव |
| 1978 | जेनेंटेक कंपनी (अमेरिका) | मानव इंसुलिन जीन को ई-कोलाई जीवाणु में क्लोन किया |
| 1982 | ह्यूमुलिन (Humulin) | पहली रीकॉम्बिनेंट DNA आधारित दवा बाजार में आई |
| 1990 | मानव जीनोम परियोजना | संपूर्ण मानव DNA अनुक्रम पढ़ने हेतु वैश्विक परियोजना शुरू |
| 1994 | फ्लेवर सेवर टमाटर | पहला व्यावसायिक जीन-रूपांतरित (GM) खाद्य उत्पाद |
| 1996 | डॉली भेड़ | वयस्क कोशिका से क्लोन किया गया पहला स्तनधारी जंतु |
| 2003 | मानव जीनोम परियोजना पूर्ण | मानव के लगभग सभी 20,000-25,000 जीनों का मानचित्रण |
| 2012 | CRISPR-Cas9 तकनीक | जेनिफर डाउडना व एमानुएल शारपेंटियर — सटीक जीन-संपादन क्रांति |
| 2025 | जीनोम इंडिया परियोजना पूर्ण | भारत के 10,000 व्यक्तियों के जीनोम अनुक्रमित |
💡 मानव इंसुलिन — जैव-प्रौद्योगिकी की पहली बड़ी सफलता: 1978 से पहले मधुमेह रोगियों को सुअर व गाय के अग्न्याशय से निकाला गया इंसुलिन लगाना पड़ता था — यह महंगा भी था और कुछ रोगियों के शरीर में एलर्जी भी पैदा करता था। 1978 में मानव इंसुलिन जीन को ई-कोलाई जीवाणु के DNA में जोड़कर वैज्ञानिकों ने जीवाणु को ही 'इंसुलिन फैक्ट्री' बना दिया। 1982 में यह दुनिया की पहली रीकॉम्बिनेंट DNA दवा के रूप में बाजार में आई और आज विश्व भर के करोड़ों मधुमेह रोगियों की जीवन-रेखा है।
जैव-प्रौद्योगिकी की प्रमुख शाखाएं (रंग-आधारित वर्गीकरण)
◆ जैव-प्रौद्योगिकी ◆ पारंपरिक बनाम आधुनिक जैव-प्रौद्योगिकी ◆ लुई पास्चर ◆ पेनिसिलिन ◆ DNA द्वि-कुंडलिनी ◆ रीकॉम्बिनेंट DNA ◆ मानव इंसुलिन ◆ ह्यूमुलिन ◆ CRISPR-Cas9 ◆ लाल/हरित/श्वेत/नीली जैव-प्रौद्योगिकी
'क्लोन' (Clone) शब्द ग्रीक भाषा के 'klon' से बना है जिसका अर्थ है 'टहनी' या 'शाखा' — यानी मूल पौधे से निकली हुई, बिल्कुल मूल जैसी ही एक नई शाखा। जीव विज्ञान में क्लोन का अर्थ है ऐसी संतति जो अपने जनक (Parent) के समान अनुवांशिक रूप से बिल्कुल हूबहू (identical) हो। जीन क्लोनिंग (Gene Cloning) का अर्थ है किसी एक विशेष जीन (DNA के एक टुकड़े) की अनेक हूबहू प्रतियां (copies) प्रयोगशाला में तैयार करना, ताकि उस जीन का अध्ययन किया जा सके या उसे किसी अन्य जीव में स्थानांतरित करके उपयोगी उत्पाद बनाया जा सके। ध्यान रहे — जीन क्लोनिंग और 'जीव क्लोनिंग' (जैसे डॉली भेड़) दो अलग चीजें हैं।
| 🧬 जीन क्लोनिंग (Gene Cloning) | 🐑 जीव क्लोनिंग (Reproductive Cloning) |
|---|---|
| ◆ किसी एक जीन/DNA खंड की अनेक प्रतियां बनाना ◆ जीवाणु या कोशिका को 'कॉपी मशीन' के रूप में उपयोग ◆ उद्देश्य: प्रोटीन उत्पादन, अनुसंधान, निदान ◆ उदाहरण: इंसुलिन जीन की क्लोनिंग | ◆ संपूर्ण जीव की हूबहू अनुवांशिक प्रतिकृति बनाना ◆ किसी वयस्क कोशिका के केंद्रक को अनिषेचित अंडाणु में प्रत्यारोपित करना ◆ उद्देश्य: संकटग्रस्त प्रजाति संरक्षण, अनुसंधान ◆ उदाहरण: डॉली भेड़ (1996, स्कॉटलैंड) — वयस्क स्तन कोशिका से क्लोन पहला स्तनधारी |
जीन बैंक एक ऐसी सुविधा है जहां विभिन्न जीवों (मुख्यतः पौधों की किस्मों एवं जंगली संबंधियों) के बीज, ऊतक, DNA या आनुवंशिक पदार्थ को अत्यंत कम तापमान (सामान्यतः -18°C या उससे कम) पर दीर्घकाल तक संरक्षित किया जाता है, ताकि भविष्य में जैव-विविधता, प्रजनन कार्यक्रमों एवं खाद्य सुरक्षा के लिए इनका उपयोग किया जा सके। यह एक प्रकार का 'आनुवंशिक बीमा' है — जलवायु परिवर्तन, रोग-प्रकोप या प्राकृतिक आपदा में किसी फसल किस्म के विलुप्त होने पर भी उसका आनुवंशिक स्रोत सुरक्षित रहता है।
🖼️ जीन क्लोनिंग के मुख्य चरण — जीन का चयन, प्रतिबंधन एंजाइम से कर्तन, प्लाज्मिड में प्रवेशन, बैक्टीरियल कोशिका में स्थानांतरण एवं चयन

💡 डॉली भेड़ — जीव क्लोनिंग का ऐतिहासिक उदाहरण: 1996 में स्कॉटलैंड के रोज़लिन इंस्टीट्यूट में इयान विल्मुट के नेतृत्व में वैज्ञानिकों ने एक वयस्क भेड़ की स्तन ग्रंथि कोशिका का केंद्रक निकालकर एक दूसरी भेड़ के अनिषेचित अंडाणु (जिसका अपना केंद्रक हटा दिया गया था) में प्रत्यारोपित किया। इस तकनीक को 'सोमैटिक सेल न्यूक्लियर ट्रांसफर' (Somatic Cell Nuclear Transfer) कहा गया। परिणामस्वरूप जन्मी भेड़ 'डॉली' अपनी मूल दाता भेड़ की अनुवांशिक हूबहू प्रति थी — यह सिद्ध हुआ कि किसी वयस्क, विशिष्ट कोशिका को भी पुनः 'भ्रूण जैसी' अवस्था में लाया जा सकता है।
◆ जीन क्लोनिंग ◆ जीव/प्रजनन क्लोनिंग ◆ सोमैटिक सेल न्यूक्लियर ट्रांसफर ◆ डॉली भेड़ ◆ जीन बैंक ◆ NBPGR ◆ स्वालबार्ड सीड वॉल्ट ◆ आनुवंशिक बीमा
कल्पना कीजिए कि DNA एक बहुत लंबा धागा है, जिसमें हजारों उपयोगी 'शब्द' (जीन) एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। अनुवांशिक अभियांत्रिकी (Genetic Engineering) के लिए वैज्ञानिकों को इस धागे में से एक विशेष शब्द को सही जगह से काटना, उसे किसी दूसरे धागे में सही जगह जोड़ना, और फिर उस जुड़ाव को स्थायी रूप से मजबूत करना होता है। इसके लिए तीन मुख्य 'औजारों' की आवश्यकता होती है — 'आणविक कैंची' (प्रतिबंधन एंजाइम), एक 'वाहन' जो जीन को नई कोशिका तक पहुंचाए (वेक्टर), और 'आणविक गोंद' (DNA लाइगेज) जो जोड़ को स्थायी बनाए।
प्रतिबंधन एंजाइम (Restriction Endonuclease) वे विशेष एंजाइम हैं जो DNA अणु को एक निश्चित, पूर्व-निर्धारित अनुक्रम (sequence) पर पहचानकर काटते हैं — जैसे कोई सिलाई मशीन कपड़े को सिर्फ एक निशान की गई रेखा पर ही काटे। ये मूल रूप से जीवाणुओं में पाए जाते हैं, जहां ये जीवाणु को वायरस के आक्रमण से बचाने का काम करते हैं (वायरस के DNA को काटकर नष्ट करके)। सबसे प्रसिद्ध प्रतिबंधन एंजाइम EcoRI है, जो ई-कोलाई (Escherichia coli) जीवाणु से प्राप्त होता है और DNA अनुक्रम GAATTC को पहचानकर काटता है।
(B) वाहक/वेक्टर (Vectors)
वेक्टर वह 'वाहन' है जो कटे हुए जीन (गोंद से जुड़े हुए) को होस्ट कोशिका (जैसे जीवाणु) के अंदर तक ले जाता है और वहां उसे स्थिर रूप से बनाए रखता है, जिससे वह कोशिका के विभाजन के साथ-साथ अपनी प्रतिकृति भी बनाता रहे।
| वेक्टर का प्रकार | विशेषता |
|---|---|
| प्लाज्मिड (Plasmid) | जीवाणु कोशिका में पाया जाने वाला छोटा, वृत्ताकार, स्वतः-प्रतिकृत DNA अणु; सबसे सामान्य वेक्टर; उदाहरण pBR322 |
| बैक्टीरियोफेज (Bacteriophage) | जीवाणुओं को संक्रमित करने वाला विषाणु; बड़े DNA खंड (~20 kb तक) वहन कर सकता है |
| कॉस्मिड (Cosmid) | प्लाज्मिड व फेज के गुणों का संयोजन; और भी बड़े DNA खंड ले जाने में सक्षम |
| कृत्रिम गुणसूत्र (BAC/YAC) | जीवाणु/यीस्ट कृत्रिम गुणसूत्र; बहुत बड़े DNA खंड (सैकड़ों kb) वहन क्षमता — मानव जीनोम परियोजना में उपयोग |
(C) DNA लाइगेज — आणविक गोंद (DNA Ligase)
DNA लाइगेज एक एंजाइम है जो कटे हुए DNA टुकड़ों के सिरों के बीच फॉस्फोडाइएस्टर बंध (phosphodiester bond) बनाकर उन्हें स्थायी रूप से जोड़ देता है — ठीक वैसे ही जैसे टूटे हुए धागे के दो सिरों को गांठ लगाकर स्थायी रूप से जोड़ दिया जाए। सबसे सामान्य रूप से प्रयुक्त लाइगेज T4 DNA ligase है, जो T4 बैक्टीरियोफेज से प्राप्त होता है।
💡 रोजमर्रा की उपमा — कैंची, गोंद और डाकिया: अनुवांशिक अभियांत्रिकी को समझने का सबसे आसान तरीका है — प्रतिबंधन एंजाइम को 'कैंची' समझिए जो सही जगह से जीन काटती है, DNA लाइगेज को 'गोंद' समझिए जो कटे हुए टुकड़े को नई जगह चिपकाती है, और वेक्टर को 'डाकिया' समझिए जो इस जुड़े हुए पैकेट (रीकॉम्बिनेंट DNA) को होस्ट कोशिका के दरवाजे तक पहुंचाता है।
◆ प्रतिबंधन एंजाइम ◆ EcoRI ◆ स्टिकी एंड्स ◆ ब्लंट एंड्स ◆ वेक्टर ◆ प्लाज्मिड ◆ बैक्टीरियोफेज ◆ कॉस्मिड ◆ BAC/YAC ◆ DNA लाइगेज ◆ T4 DNA ligase
रीकॉम्बिनेंट DNA (Recombinant DNA / rDNA) वह DNA अणु है जो दो अलग-अलग स्रोतों (जैसे मानव व जीवाणु) के DNA खंडों को प्रयोगशाला में कृत्रिम रूप से जोड़कर बनाया जाता है — यानी यह प्रकृति में स्वाभाविक रूप से नहीं बनता, बल्कि वैज्ञानिक इसे 'डिज़ाइन' करते हैं। पिछले टॉपिक में सीखे गए तीनों औजारों (प्रतिबंधन एंजाइम, वेक्टर, DNA लाइगेज) का उपयोग करके पूरी प्रक्रिया निम्नलिखित सुव्यवस्थित चरणों में होती है।
📐 रीकॉम्बिनेंट DNA तकनीक — सूत्र/प्रक्रिया: चरण 1: वांछित जीन (Gene of Interest) की पहचान एवं DNA निष्कर्षण चरण 2: प्रतिबंधन एंजाइम द्वारा वांछित जीन एवं वाहक (प्लाज्मिड) दोनों को समान स्थल पर काटना चरण 3: कटे हुए जीन को वाहक (वेक्टर) में प्रवेशित करना (Insertion) चरण 4: DNA लाइगेज द्वारा जोड़ को स्थायी करना → रीकॉम्बिनेंट DNA का निर्माण चरण 5: होस्ट कोशिका (जैसे ई-कोलाई) में रीकॉम्बिनेंट DNA का स्थानांतरण (Transformation) चरण 6: चयन एवं स्क्रीनिंग — किन कोशिकाओं ने रीकॉम्बिनेंट DNA सफलतापूर्वक ग्रहण किया, यह पहचानना चरण 7: क्लोनिंग एवं बड़े पैमाने पर उत्पादन (Multiplication एवं Protein Expression)
प्रतिबंधन एंजाइम एवं DNA लाइगेज दोनों को कभी-कभी सम्मिलित रूप से 'आणविक कैंची व सिलाई मशीन' कहा जाता है — यही जोड़ी रीकॉम्बिनेंट DNA तकनीक की पूरी नींव है। इसी सिद्धांत के लिए वर्नर आर्बर, डेनियल नाथन्स एवं हैमिल्टन स्मिथ को 1978 में चिकित्सा का नोबेल पुरस्कार मिला था।
◆ रीकॉम्बिनेंट DNA ◆ ट्रांसफॉर्मेशन ◆ कैल्शियम क्लोराइड विधि ◆ हीट-शॉक ◆ चयन/स्क्रीनिंग ◆ एंटीबायोटिक प्रतिरोधी मार्कर जीन ◆ बायोरिएक्टर
1983 में अमेरिकी वैज्ञानिक केरी मुलिस (Kary Mullis) रात में गाड़ी चला रहे थे, तभी उनके दिमाग में एक विचार कौंधा — क्या DNA के किसी छोटे से टुकड़े को टेस्ट-ट्यूब में ही बार-बार दोगुना करके करोड़ों प्रतियां बनाई जा सकती हैं, बिना किसी जीवित कोशिका की मदद के? यही विचार आगे चलकर पॉलिमरेज़ चेन रिएक्शन (Polymerase Chain Reaction — PCR) के रूप में विकसित हुआ, जिसके लिए मुलिस को 1993 में रसायन विज्ञान का नोबेल पुरस्कार मिला। आज PCR के बिना आधुनिक जीव विज्ञान की कल्पना भी नहीं की जा सकती — कोविड-19 जांच से लेकर अपराध जांच तक, हर जगह इसका उपयोग होता है।
PCR एक 'आणविक फोटोकॉपी मशीन' की तरह काम करता है, जो DNA के एक विशिष्ट खंड को हर चक्र (cycle) में दोगुना करती जाती है। एक विशेष ताप-सहनशील एंजाइम टैक पॉलिमरेज़ (Taq polymerase, जो गर्म पानी के झरनों में रहने वाले जीवाणु Thermus aquaticus से प्राप्त होता है) का उपयोग होता है, जो उच्च तापमान पर भी नष्ट नहीं होता।
यह चक्र 20-35 बार दोहराया जाता है — प्रत्येक चक्र में DNA की मात्रा दोगुनी होती जाती है, जिससे मात्र कुछ घंटों में एक खंड की करोड़ों (2ⁿ) प्रतियां बन जाती हैं।
🖼️ PCR की चक्रीय प्रक्रिया — विकृतीकरण, एनीलिंग एवं विस्तार, हर चक्र में DNA की मात्रा दोगुनी

PCR के अनुप्रयोग
जिस प्रकार हर व्यक्ति के हाथ की उंगलियों के निशान (fingerprint) अद्वितीय होते हैं, उसी प्रकार हर व्यक्ति के DNA में कुछ ऐसे क्षेत्र होते हैं जिनकी बनावट (दोहराव पैटर्न) प्रत्येक व्यक्ति में भिन्न होती है — इन्हें VNTR (Variable Number Tandem Repeats) कहते हैं। DNA फिंगरप्रिंटिंग तकनीक इन्हीं भिन्नताओं का उपयोग करके किसी व्यक्ति की अनूठी पहचान स्थापित करती है। इस तकनीक का आविष्कार 1984 में ब्रिटिश आनुवंशिकीविद् एलेक जेफ्रीज (Alec Jeffreys) ने किया था।
🖼️ DNA फिंगरप्रिंटिंग में जेल इलेक्ट्रोफोरेसिस से प्राप्त अद्वितीय बैंड-पैटर्न (बारकोड जैसा)

💡 DNA फिंगरप्रिंटिंग का व्यावहारिक उपयोग: भारत में केंद्रीय फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशालाएं (CFSL) एवं हैदराबाद स्थित CDFD (Centre for DNA Fingerprinting and Diagnostics) अपराध जांच, आपदा में अज्ञात शवों की पहचान, बलात्कार/हत्या के मामलों में साक्ष्य एवं पितृत्व विवादों के निपटारे में नियमित रूप से DNA फिंगरप्रिंटिंग का उपयोग करते हैं। DNA साक्ष्य की विश्वसनीयता इतनी अधिक होती है कि इसे अक्सर न्यायालयों में निर्णायक प्रमाण माना जाता है।
◆ PCR ◆ केरी मुलिस ◆ टैक पॉलिमरेज़ ◆ विकृतीकरण ◆ एनीलिंग ◆ विस्तार ◆ प्राइमर ◆ DNA फिंगरप्रिंटिंग ◆ एलेक जेफ्रीज ◆ VNTR ◆ जेल इलेक्ट्रोफोरेसिस ◆ CDFD हैदराबाद
रीकॉम्बिनेंट DNA तकनीक ने चिकित्सा जगत में क्रांति ला दी है। पहले जो प्रोटीन/हार्मोन मनुष्यों या जंतुओं के ऊतकों से बड़ी कठिनाई, अधिक लागत एवं संक्रमण के जोखिम के साथ निकाले जाते थे, अब उन्हें जीवाणु या पशु कोशिकाओं द्वारा प्रयोगशाला में सुरक्षित, शुद्ध एवं असीमित मात्रा में बनाया जा सकता है।
| रीकॉम्बिनेंट प्रोटीन/दवा | उपयोग |
|---|---|
| मानव इंसुलिन (Humulin, 1982) | टाइप-1 मधुमेह के उपचार में |
| मानव वृद्धि हार्मोन (hGH) | बौनेपन (Dwarfism) एवं वृद्धि संबंधी विकारों में |
| एरिथ्रोपोइटिन (Erythropoietin) | किडनी रोगियों में रक्ताल्पता (एनीमिया) के उपचार में |
| इंटरफेरॉन (Interferons) | कुछ प्रकार के कैंसर एवं वायरल संक्रमण (हेपेटाइटिस) में |
| इंटरल्यूकिन-2 | कैंसर इम्यूनोथेरेपी में प्रतिरक्षा तंत्र को सक्रिय करने हेतु |
| थक्का-रोधी कारक VIII व IX | हीमोफीलिया (रक्त का न जमना) के उपचार में |
| ऊतक प्लाज्मिनोजन एक्टिवेटर (tPA) | हृदयाघात एवं मस्तिष्काघात में रक्त के थक्के घोलने हेतु |
| मोनोक्लोनल एंटीबॉडी | लक्षित कैंसर चिकित्सा एवं निदान परीक्षणों में |
| हिपेटाइटिस-B टीका | पहला रीकॉम्बिनेंट DNA आधारित टीका |
विशेष महत्व — हीमोफीलिया चिकित्सा में सुरक्षा-क्रांति: 1980 के दशक में हीमोफीलिया रोगियों को मानव रक्त से निकाले गए थक्का-रोधी कारक (Factor VIII) चढ़ाए जाते थे, जिससे कई रोगी एड्स (HIV) व हेपेटाइटिस से संक्रमित हो गए। अब CHO कोशिकाओं (Chinese Hamster Ovary cells) में मानव Factor VIII जीन डालकर इसे प्रयोगशाला में बनाया जाता है — इससे रक्त-जनित संक्रमण का खतरा पूर्णतः समाप्त हो गया है।
◆ मानव इंसुलिन ◆ वृद्धि हार्मोन ◆ एरिथ्रोपोइटिन ◆ इंटरफेरॉन ◆ थक्का-रोधी कारक VIII/IX ◆ tPA ◆ मोनोक्लोनल एंटीबॉडी ◆ CHO कोशिकाएं ◆ हिपेटाइटिस-B टीका
मिट्टी में एक साधारण जीवाणु पाया जाता है — Bacillus thuringiensis (संक्षेप में Bt)। यह जीवाणु एक विशेष प्रकार का प्रोटीन क्रिस्टल (Cry प्रोटीन) बनाता है, जो कुछ विशेष कीटों (जैसे बॉलवर्म) की आंत में पहुंचकर उसे नष्ट कर देता है, परंतु मनुष्यों एवं अन्य जीवों के लिए पूर्णतः सुरक्षित है। वैज्ञानिकों ने इसी cry जीन को पौधों के DNA में स्थानांतरित करना शुरू किया — जिससे पौधा स्वयं अपने अंदर वह कीटनाशक प्रोटीन बनाने लगे। इसी सिद्धांत पर आधारित हैं आज की Bt फसलें।
Bt कपास (Bt Cotton) भारत में 2002 में व्यावसायिक रूप से अनुमोदित हुई और आज देश के कुल कपास क्षेत्र के लगभग 95% से अधिक भाग में उगाई जाती है। इसमें cry1Ac व cry2Ab जीन डाले जाते हैं, जो कपास की सबसे बड़ी शत्रु — गुलाबी बॉलवर्म (Pink Bollworm) व अमेरिकन बॉलवर्म जैसे कीटों के विरुद्ध प्रतिरोधक क्षमता प्रदान करते हैं। इससे कीटनाशक छिड़काव में भारी कमी आई है और किसानों की उपज व आय में वृद्धि हुई है।
Bt कपास से जुड़ी वैज्ञानिकों की चिंताएं
जब बॉलवर्म का लार्वा Bt कपास की पत्ती खाता है, तो Cry प्रोटीन उसकी आंत में पहुंचकर वहां के क्षारीय वातावरण में सक्रिय हो जाता है और आंत की भित्ति की कोशिकाओं से जुड़कर उनमें छिद्र बना देता है। इससे कीट की आंत की कार्यक्षमता समाप्त हो जाती है और वह भोजन करना बंद कर कुछ ही दिनों में मर जाता है। मनुष्यों की आंत का वातावरण अम्लीय होता है एवं हमारी कोशिकाओं में Cry प्रोटीन के लिए कोई ग्राही (receptor) नहीं होता, इसलिए यह मनुष्यों के लिए हानिरहित है।
◆ Bacillus thuringiensis ◆ Cry प्रोटीन ◆ Bt कपास ◆ गुलाबी बॉलवर्म ◆ GEAC ◆ Bt बैंगन ◆ रिफ्यूजिया रणनीति ◆ गैर-लक्षित जीव
ट्रांसजेनिक जीव (Transgenic Organism) वह पौधा या जंतु है जिसके DNA में किसी अन्य जीव (यहां तक कि पूर्णतः भिन्न स्पीशीज़) का एक या अधिक जीन कृत्रिम रूप से स्थानांतरित करके स्थायी रूप से जोड़ दिया गया हो। ऐसे नए जोड़े गए जीन को 'ट्रांसजीन' (Transgene) कहते हैं। पौधों में जीन स्थानांतरण के लिए प्रकृति का ही एक 'आनुवंशिक अभियंता' उपयोग किया जाता है — मृदा जीवाणु Agrobacterium tumefaciens।
Agrobacterium tumefaciens एक मृदा जीवाणु है, जो प्राकृतिक रूप से पौधों को संक्रमित करके उनमें 'क्राउन गॉल' (Crown Gall) नामक रोग (एक प्रकार की गांठ/ट्यूमर) उत्पन्न करता है। इसके अंदर एक विशेष प्लाज्मिड होता है — Ti प्लाज्मिड (Tumour-inducing Plasmid) — जो प्राकृतिक रूप से ही अपने एक भाग (T-DNA) को पौधे की कोशिका के गुणसूत्र में स्थानांतरित कर देता है। वैज्ञानिकों ने इसी प्राकृतिक क्षमता का उपयोग करते हुए Ti प्लाज्मिड के रोगकारी भाग को हटाकर उसकी जगह वांछित जीन (जैसे Bt जीन) जोड़ दिया — इस प्रकार Agrobacterium अब एक 'प्राकृतिक जीन-वाहक' के रूप में काम करता है, जो वांछित जीन को स्वयं ही पौधे की कोशिका में पहुंचा देता है।
🖼️ Agrobacterium tumefaciens द्वारा पौधे की कोशिका में T-DNA का स्थानांतरण — प्राकृतिक जीन-वाहक तंत्र

(B) ट्रांसजेनिक जंतु
जंतुओं में जीन स्थानांतरण अधिक चुनौतीपूर्ण होता है, इसके लिए मुख्यतः दो विधियां प्रयुक्त होती हैं — सूक्ष्म-अंतःक्षेपण (Microinjection), जिसमें बहुत महीन सुई द्वारा निषेचित अंडाणु के केंद्रक में सीधे वांछित जीन इंजेक्ट किया जाता है; तथा रेट्रोवायरल वेक्टर विधि, जिसमें रेट्रोवायरस को वाहक बनाकर जीन को कोशिका में प्रवेश कराया जाता है।
💡 CHO कोशिकाएं — जंतु कोशिका आधारित प्रोटीन उत्पादन: चाइनीज़ हैम्स्टर ओवरी (CHO) कोशिकाएं प्रयोगशाला में सबसे व्यापक रूप से उपयोग होने वाली स्तनधारी कोशिका-रेखा हैं, जिनमें मानव जीन डालकर जटिल प्रोटीन (जैसे मानव थक्का-रोधी कारक VIII, मोनोक्लोनल एंटीबॉडी) बनाए जाते हैं। जीवाणु कोशिकाओं के विपरीत, स्तनधारी CHO कोशिकाएं जटिल मानव प्रोटीन को उसकी सही त्रि-आयामी संरचना एवं शर्करा-श्रृंखलाओं (glycosylation) सहित बना सकती हैं — इसलिए जटिल चिकित्सीय प्रोटीन के लिए ये अपरिहार्य हैं।
◆ ट्रांसजेनिक जीव ◆ ट्रांसजीन ◆ Agrobacterium tumefaciens ◆ Ti प्लाज्मिड ◆ T-DNA ◆ क्राउन गॉल रोग ◆ सूक्ष्म-अंतःक्षेपण ◆ फार्मिंग (Pharming) ◆ सुपरमाउस ◆ CHO कोशिकाएं
जब किसी व्यक्ति में जन्म से ही कोई जीन दोषपूर्ण (defective) या अनुपस्थित होता है, तो उससे उत्पन्न होने वाले रोग को पारंपरिक दवाओं से पूरी तरह ठीक करना असंभव होता है — क्योंकि समस्या शरीर के मूल 'सॉफ्टवेयर' (DNA) में ही है। जीन थेरेपी (Gene Therapy) एक ऐसी अत्याधुनिक चिकित्सा पद्धति है जिसमें रोगी की कोशिकाओं में स्वस्थ जीन की एक कार्यशील प्रति डालकर दोषपूर्ण जीन के प्रभाव को ठीक करने का प्रयास किया जाता है — यानी बीमारी के लक्षणों का इलाज करने के बजाय, बीमारी की जड़ (DNA-स्तर की खराबी) को ही ठीक करना।
भारत में प्रतिवर्ष अनुमानतः 21,000 से अधिक बच्चे किसी न किसी एकल-जीन दोष (Single Gene Disorder) के साथ जन्म लेते हैं — जिनमें थैलेसीमिया, सिकल सेल एनीमिया, हीमोफीलिया व गंभीर संयुक्त प्रतिरक्षा-न्यूनता (SCID) प्रमुख हैं। जीन थेरेपी इन रोगों के स्थायी उपचार की दिशा में सबसे आशाजनक तकनीक मानी जाती है।
| ✅ सोमैटिक जीन थेरेपी (वर्तमान में प्रचलित) | ⚠️ जर्मलाइन जीन थेरेपी (वर्तमान में निषिद्ध) |
|---|---|
| ◆ शरीर की सामान्य (गैर-प्रजनन) कोशिकाओं में जीन सुधार ◆ प्रभाव केवल उस व्यक्ति तक सीमित रहता है ◆ अगली पीढ़ी को स्थानांतरित नहीं होता ◆ वर्तमान में चिकित्सकीय रूप से स्वीकृत एवं प्रचलित | ◆ जनन कोशिकाओं (अंडाणु/शुक्राणु/भ्रूण) में जीन सुधार ◆ परिवर्तन अगली पीढ़ियों तक स्थानांतरित होता है ◆ गंभीर नैतिक एवं सुरक्षा संबंधी चिंताएं ◆ अधिकांश देशों में मानव भ्रूण पर वर्तमान में प्रतिबंधित/निषिद्ध |
जीन थेरेपी के प्रमुख उप-प्रकार
A. एक्स-विवो जीन थेरेपी (Ex-vivo): रोगी की कोशिकाएं (जैसे अस्थि मज्जा स्टेम कोशिकाएं) शरीर से बाहर निकालकर, प्रयोगशाला में रेट्रोवायरल वेक्टर द्वारा स्वस्थ जीन डालकर, पुनः शरीर में प्रत्यारोपित की जाती हैं। उपयोग: SCID, सिकल सेल एनीमिया, थैलेसीमिया, कुछ रक्त कैंसर।
B. इन-विवो जीन थेरेपी (In-vivo): स्वस्थ जीन को सीधे रोगी के शरीर के अंदर, प्रभावित अंग/ऊतक में एडेनोवायरस वेक्टर द्वारा इंजेक्ट किया जाता है। उपयोग: कुछ कैंसर, अल्जाइमर, पार्किंसन रोग हेतु प्रायोगिक चिकित्सा।
C. एंटीसेंस थेरेपी (Antisense Therapy): किसी हानिकारक जीन की अभिव्यक्ति (expression) को ही अवरुद्ध कर देना — जैसे कुछ मस्तिष्क ट्यूमर (मैलिग्नेंट ग्लायोमा) के उपचार में प्रायोगिक उपयोग।
| एकल-जीन दोष रोग | जीन थेरेपी का दृष्टिकोण |
|---|---|
| गंभीर संयुक्त प्रतिरक्षा-न्यूनता (SCID) | अस्थि मज्जा स्टेम कोशिकाओं में एक्स-विवो जीन सुधार — पहली सफल जीन थेरेपी (1990) इसी रोग हेतु थी |
| हीमोफीलिया | थक्का-रोधी कारक VIII/IX जीन को यकृत कोशिकाओं में डालना |
| सिकल सेल एनीमिया | हीमोग्लोबिन जीन सुधार हेतु एक्स-विवो स्टेम कोशिका चिकित्सा |
| फेनिलकीटोन्यूरिया (PKU) | फेनिलएलेनिन को तोड़ने वाले एंजाइम जीन का सुधार |
💡 Flavr Savr टमाटर — एंटीसेंस तकनीक का व्यावसायिक उदाहरण: 1994 में बाजार में आया Flavr Savr टमाटर पहला व्यावसायिक जीन-रूपांतरित खाद्य उत्पाद था, जिसमें एंटीसेंस तकनीक का उपयोग करके उस जीन की अभिव्यक्ति को धीमा किया गया जो टमाटर को जल्दी नरम व सड़ने योग्य बनाता है — इससे टमाटर की शेल्फ-लाइफ (भंडारण अवधि) काफी बढ़ गई।
◆ जीन थेरेपी ◆ सोमैटिक जीन थेरेपी ◆ जर्मलाइन जीन थेरेपी ◆ एक्स-विवो ◆ इन-विवो ◆ एंटीसेंस थेरेपी ◆ SCID ◆ हीमोफीलिया ◆ सिकल सेल एनीमिया ◆ Flavr Savr टमाटर
जैव उपचार (Bioremediation) एक ऐसी तकनीक है जिसमें सूक्ष्मजीवों (जीवाणु, कवक) या पौधों की प्राकृतिक क्षमता का उपयोग करके प्रदूषित मिट्टी, जल या वायु से हानिकारक प्रदूषकों (जैसे तेल-रिसाव, भारी धातु, कीटनाशक अवशेष) को हटाया या कम-विषैला बनाया जाता है — यानी 'प्रदूषण को साफ करने के लिए प्रकृति की ही मदद लेना'।
जैव कीटनाशक (जैसे Bt आधारित कीटनाशक, ट्राइकोडर्मा, बैक्यूलोवायरस) एवं जैविक नाइट्रोजन स्थिरीकरण का विस्तृत विवरण अध्याय-09 (लाभदायक एवं हानिकारक सूक्ष्मजीव) में दिया जा चुका है — यहां केवल यह उल्लेखनीय है कि Bt का जीन-स्तर पर पौधों में सीधे स्थानांतरण (देखें टॉपिक-7) आधुनिक जैव-प्रौद्योगिकी का ही विस्तार है, जबकि सूक्ष्मजीव-आधारित छिड़काव पारंपरिक जैव नियंत्रण है।
◆ जैव उपचार (Bioremediation) ◆ पारा-प्रतिरोधी जीवाणु ◆ Pseudomonas ◆ फाइटोरेमेडिएशन ◆ भारी धातु अवशोषण
औद्योगिक जैव-प्रौद्योगिकी (Industrial Biotechnology / श्वेत जैव-प्रौद्योगिकी) में सूक्ष्मजीवों एवं उनके एंजाइमों का उपयोग बड़े पैमाने पर औद्योगिक उत्पाद बनाने के लिए किया जाता है — यह पारंपरिक रासायनिक प्रक्रियाओं की तुलना में अधिक ऊर्जा-कुशल एवं पर्यावरण-अनुकूल मानी जाती है।
| एंजाइम/उत्पाद | औद्योगिक उपयोग |
|---|---|
| प्रोटिएज (Proteases) | डिटर्जेंट उद्योग में दाग-धब्बे हटाने हेतु, चमड़ा उद्योग में |
| एमाइलेज (Amylases) | कपड़ा उद्योग, बेकरी, ब्रुइंग (शराब उद्योग) में स्टार्च तोड़ने हेतु |
| ग्लूकोआइसोमरेज़ (Glucoisomerase) | हाई-फ्रक्टोज कॉर्न सिरप (मिठास बढ़ाने वाला) उत्पादन में |
| लाइपेज (Lipases) | डिटर्जेंट, पनीर उत्पादन एवं वसा-प्रक्रमण में |
| पेक्टिनेज (Pectinase) | फलों के रस को स्पष्ट (clarify) करने में |
एंटीबायोटिक उत्पादन में भी सूक्ष्मजीवों (मुख्यतः कवक व एक्टिनोमाइसिटीज़) का औद्योगिक स्तर पर किण्वन कराया जाता है — पेनिसिलिन की खोज (1928) के बाद से अब तक 6000 से अधिक प्राकृतिक एंटीबायोटिक यौगिक विभिन्न सूक्ष्मजीवों से पृथक किए जा चुके हैं (एंटीबायोटिक की तकनीकी प्रक्रिया एवं वर्गीकरण अध्याय-08 में विस्तार से देखें)। इसी प्रकार विटामिन B12 एवं राइबोफ्लेविन (विटामिन B2) जैसे कई विटामिन भी आज सूक्ष्मजीवीय किण्वन द्वारा औद्योगिक स्तर पर बनाए जाते हैं, जो रासायनिक संश्लेषण की तुलना में अधिक सस्ते व शुद्ध होते हैं (किण्वन प्रौद्योगिकी की गहराई हेतु अध्याय-09 देखें)।
◆ प्रोटिएज ◆ एमाइलेज ◆ ग्लूकोआइसोमरेज़ ◆ लाइपेज ◆ पेक्टिनेज ◆ विटामिन B12 किण्वन ◆ एक्टिनोमाइसिटीज़
भारत आज विश्व की शीर्ष 12 बायोटेक अर्थव्यवस्थाओं में गिना जाता है, और एशिया-प्रशांत क्षेत्र में तीसरे स्थान पर है। भारत सरकार का जैव-प्रौद्योगिकी विभाग (Department of Biotechnology — DBT), जो विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अंतर्गत कार्य करता है, देश में जैव-प्रौद्योगिकी अनुसंधान, नीति-निर्माण एवं औद्योगिक विकास हेतु नोडल संस्था है।
| सूचक | आंकड़ा/लक्ष्य |
|---|---|
| वर्तमान बायो-इकॉनॉमी आकार | लगभग 165.7 बिलियन अमेरिकी डॉलर (2024 अनुमान) |
| 2030 तक लक्ष्य | लगभग 300 बिलियन अमेरिकी डॉलर |
| DBT का वार्षिक बजट (2025-26) | लगभग ₹3,446 करोड़ |
| BIRAC द्वारा समर्थित स्टार्टअप | 3,000 से अधिक बायोटेक स्टार्टअप |
| BioNEST इन्क्यूबेशन केंद्र | देशभर में 75 से अधिक केंद्र |
प्रमुख नीतियां एवं परियोजनाएं
अब तक अधिकांश मानव जीनोम अनुसंधान पश्चिमी (यूरोपीय) जनसंख्या पर आधारित रहा है, जबकि भारत की जनसंख्या आनुवंशिक रूप से अत्यंत विविध है। जीनोम इंडिया परियोजना ने भारतीय जनसंख्या का अपना 'रेफरेंस जीनोम डेटाबेस' तैयार किया है, जिससे भविष्य में भारतीयों के लिए विशेष रूप से प्रभावी दवाएं, रोग-जोखिम पूर्वानुमान एवं व्यक्तिगत चिकित्सा (Personalized Medicine) विकसित करना संभव होगा।
◆ जैव-प्रौद्योगिकी विभाग (DBT) ◆ BIRAC ◆ BioNEST ◆ बायो-इकॉनॉमी ◆ जीनोम इंडिया परियोजना ◆ BioE3 नीति ◆ बायो-राइड योजना ◆ परिशुद्ध चिकित्सा
स्टेम सेल (Stem Cells) शरीर की वे विशेष कोशिकाएं हैं जिनमें दो अनूठी क्षमताएं होती हैं — स्वयं की अनेक प्रतियां बनाना (Self-renewal) एवं शरीर की विभिन्न विशिष्ट कोशिकाओं (जैसे तंत्रिका कोशिका, रक्त कोशिका, हृदय कोशिका) में रूपांतरित होना (Differentiation)। इसी दोहरी क्षमता के कारण स्टेम सेल को क्षतिग्रस्त ऊतकों की मरम्मत, अपक्षयी रोगों (Degenerative Diseases) के उपचार एवं पुनर्योजी चिकित्सा (Regenerative Medicine) के लिए अत्यंत आशाजनक माना जाता है।
| 🌱 भ्रूणीय स्टेम कोशिका (Embryonic) | 🩸 वयस्क/प्रौढ़ स्टेम कोशिका (Adult) |
|---|---|
| ◆ प्रारंभिक भ्रूण से प्राप्त ◆ बहु-सक्षम (Pluripotent) — लगभग किसी भी प्रकार की कोशिका बन सकती है ◆ नैतिक चिंताओं से घिरी हुई (भ्रूण नष्ट होता है) ◆ भारत सहित कई देशों में शोध पर कड़े नियम | ◆ अस्थि मज्जा, गर्भनाल रक्त आदि से प्राप्त ◆ बहु-शक्ति (Multipotent) — सीमित प्रकार की कोशिकाएं बन सकती हैं ◆ अपेक्षाकृत कम नैतिक विवाद ◆ वर्तमान में अधिकांश स्वीकृत चिकित्सा उपयोग (जैसे बोन मैरो प्रत्यारोपण) इसी प्रकार से |
भारत में कुछ निजी क्लीनिकों द्वारा बिना वैज्ञानिक प्रमाण एवं विनियामक अनुमोदन के 'स्टेम सेल थेरेपी' के नाम पर महंगे व असत्यापित उपचार बेचे जाने की शिकायतें मिलती रही हैं। ICMR-DBT के 2025 दिशा-निर्देशों का मुख्य उद्देश्य ऐसी अनियंत्रित एवं असुरक्षित प्रैक्टिस पर रोक लगाना तथा केवल वैज्ञानिक रूप से सिद्ध उपचारों को ही बढ़ावा देना है।
◆ स्टेम सेल ◆ भ्रूणीय स्टेम कोशिका ◆ वयस्क स्टेम कोशिका ◆ पुनर्योजी चिकित्सा ◆ राष्ट्रीय दिशा-निर्देश 2025 ◆ NAC-SCRT ◆ CDSCO ◆ बहु-सक्षम/बहु-शक्ति कोशिका
राजस्थान, अपनी विशिष्ट कृषि-जलवायु परिस्थितियों (शुष्क व अर्ध-शुष्क क्षेत्र) के कारण, जैव-प्रौद्योगिकी को सूखा-सहनशील फसलों, जल-संरक्षण एवं ग्रामीण जैव-उद्यमिता के विकास हेतु एक महत्वपूर्ण औजार के रूप में अपना रहा है। राज्य सरकार ने इस दिशा में कई ठोस कदम उठाए हैं।
राजस्थान बायोटेक्नोलॉजी नीति 2015 के अंतर्गत राज्य में जैव-प्रौद्योगिकी अनुसंधान, उद्योग एवं स्टार्टअप्स को बढ़ावा देने हेतु तीन प्रमुख बायोटेक पार्क स्थापित किए गए हैं:
| बायोटेक पार्क | स्थान |
|---|---|
| सीतापुरा बायोटेक पार्क | जयपुर |
| बोरानाडा बायोटेक पार्क | जोधपुर |
| सोतांला बायोटेक पार्क | अलवर |
राजस्थान में Bt कपास
राजस्थान में Bt कपास की खेती 2005 से शुरू हुई और आज राज्य के कपास उत्पादक क्षेत्रों (मुख्यतः श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़ क्षेत्र) में इसकी अपनाने की दर 95% से अधिक है। 2005 से 2015 के दशक में Bt कपास अपनाने से किसानों की उपज में लगभग 60% तक वृद्धि दर्ज की गई, साथ ही कीटनाशक छिड़काव की आवश्यकता में उल्लेखनीय कमी आई — जिससे उत्पादन लागत घटी एवं किसानों की शुद्ध आय बढ़ी।
💡 अबू सौंफ-440 — राजस्थान का सामुदायिक जैव-प्रौद्योगिकी मॉडल (2025): सिरोही जिले के किसान इशाक अली ने स्थानीय सौंफ (Fennel) की परंपरागत किस्मों में से प्राकृतिक चयन द्वारा 'अबू सौंफ-440' नामक एक सूखा-सहनशील किस्म विकसित की, जो कम पानी में भी अच्छी उपज देती है। यह किस्म अब सिरोही क्षेत्र के लगभग 9,000 हेक्टेयर क्षेत्रफल में उगाई जा रही है। स्थानीय किसानों द्वारा इस किस्म के बीजों को संरक्षित करने हेतु एक सामुदायिक जीन बैंक (Community Seed/Gene Bank) भी स्थापित किया गया है, जो परंपरागत ज्ञान एवं आधुनिक फसल-सुधार सिद्धांतों के संगम का एक प्रेरणादायक उदाहरण है — यह दिखाता है कि जैव-प्रौद्योगिकी केवल बड़ी प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं, बल्कि किसानों के खेत में भी जीवंत है।
◆ राजस्थान बायोटेक्नोलॉजी नीति 2015 ◆ सीतापुरा बायोटेक पार्क ◆ बोरानाडा बायोटेक पार्क ◆ सोतांला बायोटेक पार्क ◆ राजस्थान में Bt कपास ◆ अबू सौंफ-440 ◆ सामुदायिक जीन बैंक
• जैव-प्रौद्योगिकी जीवित जीवों/उनके भागों का उपयोग करके उपयोगी उत्पाद व प्रक्रियाएं विकसित करने का विज्ञान है — 1978 में मानव इंसुलिन जीन की क्लोनिंग एक बड़ा मोड़ थी। • जीन क्लोनिंग (एक जीन की प्रतियां बनाना) जीव क्लोनिंग (संपूर्ण जीव की प्रतिकृति, जैसे डॉली भेड़) से भिन्न है; जीन बैंक आनुवंशिक संसाधनों का दीर्घकालिक संरक्षण करते हैं। • अनुवांशिक अभियांत्रिकी के तीन मुख्य उपकरण हैं — प्रतिबंधन एंजाइम (आणविक कैंची), वेक्टर/प्लाज्मिड (वाहक) एवं DNA लाइगेज (आणविक गोंद)। • रीकॉम्बिनेंट DNA तकनीक में जीन कर्तन, प्रवेशन, लाइगेशन, ट्रांसफॉर्मेशन, चयन एवं क्लोनिंग के सुव्यवस्थित चरण शामिल हैं। • PCR (केरी मुलिस, 1983) DNA के एक खंड को प्रयोगशाला में ही करोड़ों गुना बढ़ाने की तकनीक है; DNA फिंगरप्रिंटिंग (एलेक जेफ्रीज, 1984) व्यक्ति की अनूठी आनुवंशिक पहचान स्थापित करती है। • रीकॉम्बिनेंट DNA तकनीक से इंसुलिन, वृद्धि हार्मोन, थक्का-रोधी कारक, मोनोक्लोनल एंटीबॉडी जैसी अनेक जीवनरक्षक दवाएं बनाई जा रही हैं। • Bt कपास (Bacillus thuringiensis के cry जीन पर आधारित) भारत की सबसे व्यापक GM फसल है; Agrobacterium tumefaciens का Ti प्लाज्मिड ट्रांसजेनिक पौधे बनाने का प्राकृतिक वाहक है। • जीन थेरेपी (सोमैटिक — एक्स-विवो/इन-विवो/एंटीसेंस) दोषपूर्ण जीन को ठीक करके SCID, हीमोफीलिया, सिकल सेल एनीमिया जैसे एकल-जीन रोगों का उपचार करती है; जर्मलाइन जीन थेरेपी वर्तमान में निषिद्ध है। • भारत की बायो-इकॉनॉमी लगभग 165.7 बिलियन डॉलर की है, जिसे 2030 तक 300 बिलियन डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य है — जीनोम इंडिया परियोजना, BioE3 नीति एवं Bio-RIDE योजना इस दिशा में प्रमुख कदम हैं। • राजस्थान में तीन बायोटेक पार्क (सीतापुरा-जयपुर, बोरानाडा-जोधपुर, सोतांला-अलवर) एवं अबू सौंफ-440 जैसे किसान-नेतृत्व वाले नवाचार जैव-प्रौद्योगिकी को जमीनी स्तर तक ले जा रहे हैं।