सूक्ष्मजीव (Microorganisms) ऐसे सूक्ष्म जीवित तत्व हैं जिन्हें सामान्यतः नंगी आंखों से नहीं देखा जा सकता, इन्हें देखने के लिए माइक्रोस्कोप की आवश्यकता होती है। ये प्रकृति के हर स्थान — मिट्टी, जल, वायु, भोजन व मानव शरीर — में पाए जाते हैं। सूक्ष्मजीव हमारे मित्र भी हैं और शत्रु भी — कुछ हमारे लिए अत्यंत लाभकारी होते हैं, जबकि कुछ हानिकारक।
| प्रकार | प्रमुख विशेषता |
|---|---|
| विषाणु (Virus) | सजीव व निर्जीव के बीच की 'योजक कड़ी'; कोशिका के बाहर निष्क्रिय, अंदर सक्रिय; TMV, इन्फ्लुएंजा वायरस |
| जीवाणु (Bacteria) | एककोशिकीय, प्रोकैरियोटिक; कोशिका भित्ति पेप्टिडोग्लाइकैन की; विखंडन (Binary Fission) से प्रजनन |
| कवक (Fungi) | यूकैरियोटिक, क्लोरोफिल-रहित; कोशिका भित्ति काइटिन की; धागेनुमा हाइफा से बना माइसीलियम |
| शैवाल (Algae) | क्लोरोफिल-युक्त, प्रकाश-संश्लेषी; शरीर थैलस प्रकार; पृथ्वी के कुल प्रकाश संश्लेषण का लगभग 50% योगदान |
| प्रोटोजोआ (Protozoa) | एककोशिकीय, यूकैरियोटिक, विषमपोषी; जंतुओं जैसे गुण; चलन अंग — कूटपाद/सीलिया/फ्लैजेला |
| माइकोप्लाज्मा (Mycoplasma) | सबसे छोटी स्वतंत्र जीवित प्रोकैरियोटिक कोशिकाएं; कोशिका भित्ति का अभाव; बहुरूपी (Pleomorphic) |
विषाणु में प्रोटीन आवरण (Capsid) के भीतर DNA या RNA सुरक्षित रहता है। जीवित कोशिका के बाहर ये निष्क्रिय, क्रिस्टल-सदृश 'विरियॉन' (Virion) रूप में रह सकते हैं — जो निर्जीव गुण है। परंतु जीवित कोशिका में प्रवेश करते ही ये वृद्धि व गुणन करने लगते हैं तथा उत्परिवर्तन (Mutation) भी दर्शाते हैं — जो सजीव गुण हैं। तंबाकू मोजेक वायरस (TMV) पौधों में तथा इन्फ्लुएंजा वायरस मनुष्यों में इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
1935 में वैज्ञानिक वेंडेल स्टेनली ने तंबाकू मोजेक वायरस को क्रिस्टल के रूप में शुद्ध किया — यह दिखाना कि कोई 'जीवित' वस्तु क्रिस्टल का रूप ले सकती है, विज्ञान जगत में एक क्रांतिकारी खोज थी, जिसने सजीव-निर्जीव की परिभाषा पर ही नए सिरे से विचार करने को मजबूर किया।
◆ सूक्ष्मजीव (Microorganisms) ◆ विषाणु (Virus) ◆ जीवाणु (Bacteria) ◆ कवक (Fungi) ◆ शैवाल (Algae) ◆ प्रोटोजोआ ◆ माइकोप्लाज्मा
जीवाणु (Bacteria) पृथ्वी पर सबसे अधिक संख्या में पाए जाने वाले जीव हैं — बर्फीली चोटियों से लेकर गर्म झरनों तक, हर वातावरण में इनका अनुकूलन देखा जाता है। इनकी कोई केंद्रक झिल्ली नहीं होती — इनका DNA कोशिकाद्रव्य में सीधे न्यूक्लियॉइड (Nucleoid) के रूप में तैरता रहता है। प्रतिकूल परिस्थितियों में ये एंडोस्पोर (Endospore) नामक कठोर सुरक्षा-आवरण बनाकर वर्षों तक निष्क्रिय रह सकते हैं।
🖼️ जीवाणुओं के प्रमुख आकार — कोकस, बैसिलस, स्पाइरिलम व अन्य आकृतियां

| प्रकार | आकृति | उदाहरण |
|---|---|---|
| कोकस (Coccus) | गोलाकार | स्टैफिलोकोकस |
| बैसिलस (Bacillus) | दंडाकार | Escherichia coli |
| स्पाइरिलम (Spirillum) | सर्पिलाकार | स्पाइरोकीट |
| विब्रियो (Vibrio) | कोमा (अल्पविराम) आकार | Vibrio cholerae (हैजा का कारक) |
पोषण की दृष्टि से जीवाणु दो प्रकार के होते हैं — स्वपोषी (Autotrophic, जो प्रकाश-संश्लेषण या रसायन-संश्लेषण द्वारा स्वयं भोजन बनाते हैं) व विषमपोषी (Heterotrophic, जो परजीवी या मृतोपजीवी होते हैं)। इनकी वृद्धि व प्रजनन विखंडन (Binary Fission) द्वारा इतनी तेज़ी से होता है कि अनुकूल परिस्थितियों में एक जीवाणु कुछ ही घंटों में लाखों में बदल सकता है।
बैक्टीरियोफेज (Bacteriophage) एक विशेष प्रकार का विषाणु है जो जीवाणुओं को ही संक्रमित करता है। इसकी संरचना अत्यंत जटिल व विशिष्ट होती है — सिर (Head) में आनुवंशिक पदार्थ सुरक्षित रहता है, जबकि पूंछ (Tail) व पाद-रेशे (Tail Fibres) की सहायता से यह जीवाणु कोशिका से चिपककर अपना DNA उसमें इंजेक्ट करता है।
🖼️ बैक्टीरियोफेज (T4 फेज) की संरचना — सिर, पूंछ व पाद-रेशे

कुछ जीवाणु इतने कठोर होते हैं कि वे अंटार्कटिका की बर्फ, गहरे समुद्र के ज्वालामुखीय छिद्रों (Hydrothermal Vents) व यहां तक कि अंतरिक्ष यान की सतह पर भी जीवित पाए गए हैं — इन्हें 'एक्सट्रीमोफाइल्स' (Extremophiles) कहा जाता है।
◆ जीवाणु संरचना ◆ न्यूक्लियॉइड ◆ एंडोस्पोर ◆ कोकस, बैसिलस, स्पाइरिलम, विब्रियो ◆ बैक्टीरियोफेज
हम प्रतिदिन दूध से दही, इडली-डोसा का घोल, ब्रेड जैसे कई खाद्य पदार्थों में सूक्ष्मजीवों या उनके उत्पादों का उपयोग करते हैं, जो मुख्यतः किण्वन (Fermentation) प्रक्रिया द्वारा तैयार होते हैं — किण्वन का विस्तृत विज्ञान इस अध्याय के विषय 9-11 में समझाया गया है।
दही बनाने में मुख्य कारक Lactobacillus तथा अन्य लैक्टिक अम्ल बैक्टीरिया (LAB) हैं। ये दूध में वृद्धि करके लैक्टिक अम्ल (Lactic Acid) उत्पन्न करते हैं, जिससे दूध के प्रोटीन का स्कंदन (Coagulation) होता है व दूध दही में बदल जाता है। पुराना दही/जावण ताज़े दूध में स्टार्टर/निवेश द्रव्य (Inoculum) के रूप में मिलाया जाता है। दही सेवन से विटामिन B₁₂ की मात्रा बढ़ती है तथा आंतों में हानिकारक रोगजनकों को रोकने में मदद मिलती है।
दाल-चावल से बना घोल हवा, पानी, बर्तन व कच्चे पदार्थों की सतह पर स्वाभाविक रूप से मौजूद बैक्टीरिया द्वारा किण्वित होता है। किण्वन के दौरान कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) गैस बनती है, जिससे घोल फूला हुआ व हल्का हो जाता है — यही प्रक्रिया इडली को मुलायम व स्पंजी बनाती है।
बेकर्स यीस्ट — Saccharomyces cerevisiae (एक प्रकार का कवक) — का उपयोग किया जाता है, जो शर्करा का किण्वन करके CO₂ गैस उत्पन्न करता है। यही गैस आटे में फंसकर उसे फुलाती है, जिससे ब्रेड नरम व स्पंजी बनती है।
अगली बार जब आप दही-चावल या इडली-सांभर खाएं, याद रखें — यह स्वाद व बनावट सूक्ष्मजीवों की मेहनत का ही परिणाम है। यही कारण है कि सूक्ष्मजीव विज्ञान (Microbiology) को कभी-कभी 'रसोई का छिपा हुआ विज्ञान' भी कहा जाता है।
◆ दही निर्माण ◆ Lactobacillus ◆ इडली-डोसा किण्वन ◆ Saccharomyces cerevisiae ◆ टोडी
'एंटी' का अर्थ है खिलाफ, 'बायोटिक' का अर्थ है जीवन — अर्थात एंटीबायोटिक (Antibiotic) वे पदार्थ हैं जो रोग पैदा करने वाले सूक्ष्मजीवों के विरुद्ध कार्य करते हैं। पहला एंटीबायोटिक पेनिसिलिन था, जिसकी खोज एलेक्जेंडर फ्लेमिंग ने Penicillium notatum नामक फफूंद (Mould) से की थी। बाद में अर्नेस्ट चेन व हावर्ड फ्लोरे ने इसे प्रभावी दवा के रूप में विकसित किया — तीनों वैज्ञानिकों को इसके लिए 1945 में नोबेल पुरस्कार मिला।
| एंटीबायोटिक | उत्पादक सूक्ष्मजीव | खोजकर्ता (वर्ष) |
|---|---|---|
| स्ट्रेप्टोमाइसिन | Streptomyces griseus | वैक्समैन (1943) |
| क्लोरोटेट्रासाइक्लिन | Streptomyces aureofaciens | डुग्गर (1947) |
| एरिथ्रोमाइसिन | Streptomyces erythreus | मैकल (1953) |
| अणु | स्रोत | उपयोग |
|---|---|---|
| स्ट्रेप्टोकाइनेज (Streptokinase) | Streptococcus जीवाणु | 'थक्का स्फोटन' (Clot Buster) — रक्त वाहिकाओं में जमे थक्के हटाने हेतु, हृदयाघात रोगियों के लिए |
| साइक्लोस्पोरिन-A | Trichoderma polysporum कवक | प्रतिरक्षा निरोधक — अंग प्रत्यारोपण में शरीर द्वारा अस्वीकृति रोकने हेतु |
| स्टैटिन (Statins) | Monascus purpureus यीस्ट | रक्त-कोलेस्ट्रॉल कम करना — कोलेस्ट्रॉल-निर्माण एंजाइम का स्पर्धी संदमन |
एंटीमाइक्रोबियल प्रतिरोध (AMR) आज विश्व स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर चुनौती है। भारत ने 18 नवंबर 2025 को राष्ट्रीय एंटीमाइक्रोबियल प्रतिरोध कार्य योजना 2.0 (NAP-AMR 2.0, 2025-2029) शुरू की है, जो 'वन हेल्थ' दृष्टिकोण अपनाते हुए मानव, पशु, कृषि व पर्यावरण — सभी क्षेत्रों में एंटीबायोटिक उपयोग की निगरानी करती है। WHO की 2024 प्राथमिकता रोगजनक सूची में दवा-प्रतिरोधी क्षय रोग (Mycobacterium tuberculosis) को भी शामिल किया गया है।
बिना डॉक्टर की सलाह के एंटीबायोटिक लेना या इलाज बीच में छोड़ देना — दोनों ही जीवाणुओं को प्रतिरोधी बना सकते हैं, जिससे भविष्य में वही दवा बेअसर हो जाती है। यह ठीक वैसा ही खतरा है जैसा अध्याय 8 में MDR-TB के संदर्भ में बताया गया था।
◆ एंटीबायोटिक (Antibiotic) ◆ पेनिसिलिन ◆ एलेक्जेंडर फ्लेमिंग ◆ स्ट्रेप्टोकाइनेज ◆ साइक्लोस्पोरिन-A ◆ स्टैटिन ◆ एंटीमाइक्रोबियल प्रतिरोध (AMR)
वायुमंडल में नाइट्रोजन गैस (N₂) की भरमार है (लगभग 78%), पर पौधे इसे सीधे उपयोग नहीं कर सकते। कुछ विशेष सूक्ष्मजीव वायुमंडलीय नाइट्रोजन को पौधों के लिए उपयोगी यौगिकों में बदलते हैं — इसे जैविक नाइट्रोजन स्थिरीकरण (Biological Nitrogen Fixation) कहा जाता है, जो रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने का सबसे प्राकृतिक तरीका है।
🖼️ फलीदार पौधों (Fabaceae) में जड़ ग्रंथिकाओं द्वारा जैविक नाइट्रोजन स्थिरीकरण

| सूक्ष्मजीव | प्रकार | संबंध |
|---|---|---|
| राइजोबियम (Rhizobium) | जीवाणु | दलहनी पौधों (मूंग, मोठ, चना, मटर) की जड़ ग्रंथिकाओं में सहजीवी |
| एजोस्पाइरिलम (Azospirillum) | जीवाणु | घास व अनाज फसलों (गेहूं, मक्का) के साथ सहचारी संबंध |
| एजोटोबैक्टर (Azotobacter) | जीवाणु | मृदा में मुक्त रूप से रहकर; कपास व सब्जी फसलों में उपयोगी |
| ग्लोमस (Glomus) | कवक (माइकोराइजा) | जड़ों के साथ संबंध बनाकर फास्फोरस अवशोषण में सहायक |
| ऐनाबीना, नॉस्टॉक (सायनोबैक्टीरिया) | शैवाल-सदृश जीवाणु | धान के खेतों में जैव उर्वरक |
धान की खेती में Anabaena-Azolla संबंध मृदा उर्वरता बढ़ाने के लिए प्रसिद्ध है — यहां एजोला नामक जलीय फर्न अपने पत्तों में ऐनाबीना नामक सायनोबैक्टीरिया को आश्रय देती है, और बदले में ऐनाबीना नाइट्रोजन स्थिर करके एजोला व आसपास के धान को पोषण देती है। यह प्रकृति की एक उत्कृष्ट पारस्परिक साझेदारी (Symbiosis) का उदाहरण है।
भारत सरकार ने प्राकृतिक व जैविक खेती को बढ़ावा देने हेतु कई योजनाएं शुरू की हैं — परंपरागत कृषि विकास योजना (PKVY, 2015 से), भारतीय प्राकृतिक कृषि पद्धति (BPKP, 2020-21 से) व 25 नवंबर 2024 को शुरू की गई राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन (NMNF, कुल बजट ₹2,481 करोड़)। इन योजनाओं का लक्ष्य किसानों को रसायन-मुक्त खेती की ओर प्रोत्साहित करना है, जिसमें Rhizobium, Azotobacter जैसे जैव उर्वरक सूक्ष्मजीव केंद्रीय भूमिका निभाते हैं।
◆ जैविक नाइट्रोजन स्थिरीकरण ◆ राइजोबियम (Rhizobium) ◆ एजोटोबैक्टर (Azotobacter) ◆ माइकोराइजा ◆ सायनोबैक्टीरिया ◆ Anabaena-Azolla संबंध
जैव नियंत्रण (Biological Control) ऐसी विधि है जिसमें रासायनिक कीटनाशकों के स्थान पर जीवित जीवों या सूक्ष्मजीवों का उपयोग कर पीड़क व रोगजनकों को नियंत्रित किया जाता है। यह पर्यावरण-अनुकूल व टिकाऊ कृषि पद्धति मानी जाती है — रासायनिक कीटनाशकों के विपरीत, ये केवल लक्ष्य कीट को प्रभावित करते हैं, लाभकारी कीटों व मनुष्यों को नहीं।
Bt यानी Bacillus thuringiensis एक जीवाणु है जिसका उपयोग तितली की सूंडी (Caterpillar) जैसे कीटों के नियंत्रण में होता है। इसके शुष्क बीजाणु पानी में मिलाकर फसलों पर छिड़के जाते हैं — जब लार्वा इसे खाता है, तो उसकी पाचननली में एक विशेष टॉक्सिन बनता है जिससे केवल वह लक्ष्य कीट मरता है, बाकी कीट सुरक्षित रहते हैं। इस Bt टॉक्सिन के जीन को सीधे पौधों में स्थानांतरित कर Bt-कॉटन जैसे कीट-प्रतिरोधी पौधे विकसित किए गए हैं, जो कपास की खेती में बॉलवर्म कीट के विरुद्ध व्यापक रूप से प्रयुक्त होते हैं।
यह एक मुक्तजीवी कवक है, जो पौधों की जड़ों के आसपास के पारिस्थितिकी तंत्र में पाया जाता है तथा कई पादप रोगजनकों के विरुद्ध प्रभावी जैव नियंत्रण कारक की भूमिका निभाता है।
ये विशेष रूप से कीटों व संधिपादों (Arthropods) को संक्रमित करने वाले विषाणु हैं। इनमें से न्यूक्लियोपॉलीहीड्रोसिस वायरस (NPV) जैव नियंत्रण में विशेष रूप से उपयोगी है — यह संकीर्ण-स्पेक्ट्रम कीटनाशक है, अर्थात केवल लक्ष्य कीटों को प्रभावित करता है तथा पौधों, स्तनधारियों, पक्षियों, मछलियों व लाभकारी कीटों के लिए पूर्णतः सुरक्षित है।
| 🌿 जैव कीटनाशक के लाभ | ⚗️ रासायनिक कीटनाशक की सीमाएं |
|---|---|
| ◆ पर्यावरण-अनुकूल, कोई रासायनिक अवशेष नहीं ◆ केवल लक्ष्य कीट प्रभावित, लाभकारी कीट सुरक्षित ◆ मृदा व जल प्रदूषण नहीं ◆ दीर्घकालिक टिकाऊ कृषि को बढ़ावा | ◆ सभी प्रकार के कीट (लाभकारी सहित) प्रभावित ◆ मृदा-जल में विषैले अवशेष ◆ कीटों में प्रतिरोध क्षमता विकसित होना ◆ मानव स्वास्थ्य पर दीर्घकालिक दुष्प्रभाव |
Bt-कॉटन के आने से पहले भारतीय कपास किसानों को बॉलवर्म कीट से बचाव हेतु बार-बार महंगे रासायनिक कीटनाशकों का छिड़काव करना पड़ता था। Bt-कॉटन की शुरुआत ने न केवल कीटनाशक खर्च घटाया, बल्कि किसानों के स्वास्थ्य जोखिम को भी काफी हद तक कम किया।
◆ जैव नियंत्रण (Biological Control) ◆ Bacillus thuringiensis (Bt) ◆ Bt-कॉटन ◆ ट्राइकोडर्मा ◆ बैक्यूलोवायरस ◆ NPV
सूक्ष्मजीवों का दूसरा पहलू भी है — कुछ सूक्ष्मजीव मनुष्यों, पशुओं व पौधों में रोग फैलाते हैं, भोजन को दूषित करते हैं, तथा बहुमूल्य वस्तुओं (कपड़े, कागज, लकड़ी, चमड़ा) को नष्ट कर देते हैं।
| रोग | कारक जीवाणु |
|---|---|
| क्षय रोग (TB) | Mycobacterium tuberculosis |
| कुष्ठ रोग | Mycobacterium leprae |
| हैजा | Vibrio cholerae |
| प्लेग | Pasteurella pestis |
| डिप्थीरिया | Corynebacterium diphtheriae |
| टिटनेस | Clostridium tetani |
| कुकर खांसी | Bordetella pertussis |
| एंथ्रेक्स | Bacillus anthracis |
कुछ जीवाणु भोजन में विषैले पदार्थों का स्रवण करते हैं और खाद्य विषाक्तता उत्पन्न करते हैं — जैसे Staphylococcus, Salmonella typhimurium व Clostridium botulinum (जो बोटुलिज़्म नामक अत्यंत गंभीर विषाक्तता उत्पन्न करता है)। भोजन को खराब करने में मुकर (Mucor), यीस्ट व एस्परजिलस जैसे कवक भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
| रोग | कारक सूक्ष्मजीव |
|---|---|
| नींबू का सिट्रस कैंकर | Xanthomonas citri (जीवाणु) |
| गेहूं की रस्ट/किट्ट | पक्सीनिया (कवक) |
| गेहूं का लूज स्मट | अस्टिलैगो (कवक) |
| भिंडी का पीत शिरा मोजेक | विषाणु जनित |
जहां एक ओर Rhizobium जैसे जीवाणु नाइट्रोजन स्थिर करते हैं, वहीं कुछ जीवाणु — जैसे Bacillus denitrificans व Thiobacillus denitrificans — मिट्टी में उपस्थित नाइट्रेट को वापस मुक्त नाइट्रोजन/अमोनिया में बदलकर मृदा की उर्वरता घटा देते हैं। इसे विनाइट्रीकरण (Denitrification) कहते हैं — यह जैविक नाइट्रोजन चक्र का दूसरा, विपरीत पक्ष है।
अधिकांश जीवाणु व कवक जनित हानियों को स्वच्छता, उचित भंडारण तापमान, पाश्चुरीकरण व समय पर टीकाकरण से रोका जा सकता है — यही सिद्धांत अध्याय 8 में सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों की नींव भी है।
◆ मानव रोग जनक जीवाणु ◆ खाद्य विषाक्तता (Food Poisoning) ◆ बोटुलिज़्म ◆ पादप रोगजनक ◆ विनाइट्रीकरण (Denitrification)
| ✅ लाभदायक उपयोग | ❌ हानिकारक प्रभाव |
|---|---|
| ◆ खाद्य पदार्थ — मशरूम (Agaricus), यीस्ट (प्रोटीन-कार्बोहाइड्रेट प्रचुर) ◆ पनीर उद्योग — Penicillium प्रजातियां ◆ बेकरी उद्योग — Saccharomyces cerevisiae ◆ एंजाइम उत्पादन — यीस्ट से 'जाइमेज' (Zymase) एंजाइम, जो किण्वन में उपयोगी ◆ अपशिष्ट पदार्थ नष्ट करना — मेरूलियस, कीटोमियम | ◆ फसल रोग — सफेद रस्ट, गेहूं की रस्ट व लूज स्मट ◆ मनुष्यों में चर्म रोग, माइकोसिस, एस्परजिलोसिस ◆ कपड़े-चमड़ा-कागज को नष्ट करना ◆ खाद्य पदार्थों का नाश — म्यूकर, यीस्ट, एस्परजिलस |
| क्षेत्र | उपयोग |
|---|---|
| भोजन | स्पाइरुलीना (सम्पूर्ण आहार — दूध जितना कैल्शियम, गाजर से अधिक विटामिन-A), क्लोरेला (प्रोटीन-विटामिन) |
| उद्योग | जेलिडियम, ग्रेसिलेरिया से अगर-अगर (Agar-agar) — जेली, आइसक्रीम व प्रयोगशाला संवर्धन माध्यम में उपयोग |
| औषधि | क्लोरेला से क्लोरेलिन (Chlorellin) नामक एंटीबायोटिक |
| कृषि | एनाबीना, नॉस्टॉक — नाइट्रोजन स्थिरीकरण; फ्यूकस, सरगैसम — खाद के रूप में |
| खनिज स्रोत | लैमिनेरिया, फ्यूकस — आयोडीन व ब्रोमीन का प्राकृतिक स्रोत |
नॉस्टॉक, ऐनाबीना जैसे सायनोबैक्टीरिया (नील-हरित शैवाल) एक ओर नाइट्रोजन स्थिरीकरण के लिए अत्यंत उपयोगी हैं (विषय 5 में विस्तृत), तो दूसरी ओर जब ये तालाबों-झीलों में अत्यधिक बढ़ जाते हैं, तो 'जल प्रस्फुटन' (Water Bloom/Algal Bloom) की स्थिति पैदा होती है — जिसमें पानी में ऑक्सीजन की भारी कमी हो जाती है, दुर्गंध फैलती है, तथा मछलियों व अन्य जलीय जीवों की सामूहिक मृत्यु हो सकती है। कुछ सायनोबैक्टीरिया (जैसे माइक्रोसिस्टिस) विषैले पदार्थ भी छोड़ते हैं जो पशुओं के लिए घातक हो सकते हैं।
स्पाइरुलीना को कभी-कभी 'भविष्य का भोजन' कहा जाता है, क्योंकि यह अत्यंत कम भूमि व जल में उगाया जा सकता है, फिर भी प्रोटीन, विटामिन व खनिजों से भरपूर होता है। अंतरिक्ष यात्रा हेतु भी इसे संभावित पोषण स्रोत के रूप में शोध किया जा रहा है।
◆ कवक का आर्थिक महत्व ◆ शैवाल का आर्थिक महत्व ◆ अगर-अगर ◆ स्पाइरुलीना ◆ जल प्रस्फुटन (Algal Bloom)
इस अध्याय की शुरुआत में जिस कहानी का ज़िक्र हुआ — फ्रांस के शराब कारखाने में लुई पास्चर की खोज — वहीं से किण्वन विज्ञान (Zymology) की औपचारिक शुरुआत मानी जाती है। पास्चर ने ही सबसे पहले वैज्ञानिक रूप से सिद्ध किया कि किण्वन सूक्ष्मजीवों की जैविक क्रिया से होता है, न कि किसी रहस्यमयी रासायनिक प्रक्रिया से। उनका प्रसिद्ध कथन आज भी उद्धृत किया जाता है — 'किण्वन ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में जीवन है' (Fermentation is life without oxygen)।
किण्वन (Fermentation) एक अवायवीय जैव-रासायनिक प्रक्रिया है, जिसमें सूक्ष्मजीव (जैसे यीस्ट व जीवाणु) ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में शर्करा या स्टार्च जैसे कार्बोहाइड्रेट को एल्कोहल, अम्ल या गैसों में परिवर्तित करते हैं। सामान्य समीकरण इस प्रकार समझा जा सकता है:
ग्लूकोस → (यीस्ट + एंजाइम) → एथिल एल्कोहॉल + कार्बन डाइऑक्साइड + ऊर्जा (ATP)
🖼️ यीस्ट कोशिका में श्वसन बनाम किण्वन — ऑक्सीजन की उपस्थिति व अनुपस्थिति में अंतर

💡 किण्वन — प्रोकैरियोट्स व यूकैरियोट्स दोनों में: किण्वन एक अत्यंत प्राचीन चयापचयिक प्रक्रिया है, जो प्रोकैरियोट्स (जीवाणु) व यूकैरियोट्स (यीस्ट, मानव मांसपेशी कोशिकाएं) — दोनों में पाई जाती है। यहां तक कि तीव्र व्यायाम के दौरान जब मांसपेशियों को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिलती, तब मानव शरीर भी अस्थायी रूप से लैक्टिक अम्ल किण्वन का सहारा लेता है — यही कारण है कि अत्यधिक कसरत के बाद मांसपेशियों में अकड़न महसूस होती है।
◆ किण्वन (Fermentation) ◆ लुई पास्चर ◆ ज़ाइमोलॉजी (Zymology) ◆ ग्लाइकोलाइसिस ◆ NADH व NAD⁺
इसमें शर्करा (ग्लूकोज, फ्रक्टोज या सुक्रोज) का यीस्ट अथवा कुछ जीवाणुओं द्वारा अवायवीय परिस्थितियों में अपघटन होकर इथेनॉल व कार्बन डाइऑक्साइड बनता है।
C₆H₁₂O₆ → 2C₂H₅OH + 2CO₂ + ऊर्जा
प्रमुख सूक्ष्मजीव यीस्ट Saccharomyces cerevisiae है। बीयर निर्माण में यह माल्टेड जौ की शर्करा को इथेनॉल व CO₂ में बदलता है, जिससे CO₂ झाग बनाती है व अल्कोहल स्वाद देता है। वाइन निर्माण में अंगूर की प्राकृतिक शर्करा किण्वित होती है, जिसमें तापमान व समय के नियंत्रण से विभिन्न प्रकार की वाइन प्राप्त होती हैं। मक्का, गन्ना या सेल्युलोसिक बायोमास से बड़े पैमाने पर बायो-एथेनॉल का उत्पादन भी इसी सिद्धांत पर होता है (विस्तार विषय 13 में)।
इसमें पाइरुवेट एंजाइम लैक्टेट डीहाइड्रोजनेज की सहायता से लैक्टिक अम्ल में परिवर्तित हो जाता है, तथा NADH से NAD⁺ पुनः निर्मित होता है। यह प्रक्रिया मांसपेशियों तथा Lactobacillus जैसे बैक्टीरिया में पाई जाती है।
पाइरुविक अम्ल (C₃H₄O₃) → लैक्टिक अम्ल (C₃H₆O₃)
| उत्पाद | प्रयुक्त सूक्ष्मजीव | विशेषता |
|---|---|---|
| दही (Curd) | लैक्टिक अम्ल बैक्टीरिया | लैक्टोज को लैक्टिक अम्ल में बदलना, खट्टा स्वाद व गाढ़ी बनावट |
| सॉकरक्राउट | Leuconostoc, Lactobacillus, Pediococcus | पत्तागोभी की शर्करा से; प्राकृतिक प्रोबायोटिक |
| केफिर (Kefir) | बैक्टीरिया + यीस्ट (सह-किण्वन) | किण्वित दुग्ध पेय, हल्का खट्टा व प्रोबायोटिक |
जब हम तेज़ दौड़ते हैं या भारी वज़न उठाते हैं, तो मांसपेशियों को ऑक्सीजन जल्दी नहीं मिल पाता। ऐसे में मांसपेशी कोशिकाएं अस्थायी रूप से लैक्टिक अम्ल किण्वन का सहारा लेती हैं — जमा हुआ लैक्टिक अम्ल ही मांसपेशियों में जलन व अकड़न का कारण बनता है, जो कुछ घंटों बाद स्वतः ठीक हो जाता है।
◆ एल्कोहलिक किण्वन ◆ Saccharomyces cerevisiae ◆ लैक्टिक अम्ल किण्वन ◆ दही ◆ सॉकरक्राउट ◆ केफिर
यह एक दो-चरणीय प्रक्रिया है — पहले शर्करा से इथेनॉल बनता है, फिर एसिटिक अम्ल बैक्टीरिया (Acetic Acid Bacteria - AAB) की सहायता से इथेनॉल का ऑक्सीकरण होकर एसिटिक अम्ल बनता है। ध्यान दें कि पहले पढ़े गए किण्वन के विपरीत, इसके लिए ऑक्सीजन की उपस्थिति आवश्यक है।
C₂H₅OH + O₂ → CH₃COOH + H₂O
इसका सबसे प्रमुख व्यावसायिक उपयोग सिरका (Vinegar) निर्माण में होता है, जो खाद्य संरक्षण व स्वाद बढ़ाने के लिए उपयोग होता है। कोम्बुचा (Kombucha) — एक किण्वित चाय पेय — में SCOBY (Symbiotic Culture of Bacteria and Yeast, यानी बैक्टीरिया व यीस्ट का सहजीवी समूह) उपस्थित होता है, जिसमें द्वितीयक किण्वन के दौरान एसिटिक अम्ल बनने से विशिष्ट खट्टा स्वाद विकसित होता है।
इसमें कार्बोहाइड्रेट का ब्यूटिरिक अम्ल बैक्टीरिया द्वारा अवायवीय परिस्थितियों में विघटन होकर ब्यूटिरिक अम्ल, CO₂ व हाइड्रोजन (H₂) बनते हैं। यह किण्वन जुगाली करने वाले पशुओं (Ruminants) के पाचन तंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, तथा मक्खन-पनीर में विशिष्ट गंध व स्वाद के विकास का कारण भी है।
इसमें Escherichia coli जैसे जीवाणु पाइरुवेट को विभिन्न अम्लों व गैसों में परिवर्तित करते हैं — लैक्टिक, एसिटिक, सक्सिनिक व फॉर्मिक अम्ल के साथ-साथ इथेनॉल, हाइड्रोजन व CO₂ भी बनते हैं। यह सूक्ष्मजीव पारिस्थितिकी व औद्योगिक सूक्ष्मजीव विज्ञान दोनों में महत्वपूर्ण है — औद्योगिक विलायकों (जैसे एसीटोन) के उत्पादन में भी इसका उपयोग होता है।
| किण्वन प्रकार | प्रमुख सूक्ष्मजीव | अंतिम उत्पाद |
|---|---|---|
| एल्कोहलिक | Saccharomyces cerevisiae | इथेनॉल + CO₂ |
| लैक्टिक अम्ल | Lactobacillus आदि | लैक्टिक अम्ल |
| एसिटिक अम्ल | Acetic Acid Bacteria | एसिटिक अम्ल |
| ब्यूटिरिक अम्ल | ब्यूटिरिक अम्ल बैक्टीरिया | ब्यूटिरिक अम्ल + CO₂ + H₂ |
| मिश्रित अम्ल | E. coli | लैक्टिक, एसिटिक, सक्सिनिक, फॉर्मिक अम्ल + इथेनॉल |
पुराने ज़माने से घरों में सेब या गन्ने के रस को खुला रखकर प्राकृतिक सिरका बनाया जाता रहा है — पहले हवा में मौजूद यीस्ट शर्करा को अल्कोहल में बदलता है (एल्कोहलिक किण्वन), फिर हवा में मौजूद एसिटिक अम्ल बैक्टीरिया उस अल्कोहल को सिरके में बदल देते हैं (एसिटिक अम्ल किण्वन) — यह दो-चरणीय प्रक्रिया का जीता-जागता घरेलू उदाहरण है।
◆ एसिटिक अम्ल किण्वन ◆ सिरका (Vinegar) ◆ कोम्बुचा ◆ ब्यूटिरिक अम्ल किण्वन ◆ मिश्रित अम्ल किण्वन
किण्वन तकनीक का सबसे बड़ा दैनिक-जीवन उपयोग डेयरी व बेकरी उद्योगों में होता है, जहां सूक्ष्मजीवों की सटीक प्रजातियों व नियंत्रित परिस्थितियों से बड़े पैमाने पर सुरक्षित व स्वादिष्ट उत्पाद बनाए जाते हैं।
| उत्पाद | किण्वक सूक्ष्मजीव | प्रक्रिया |
|---|---|---|
| दही (Yogurt) | Streptococcus thermophilus, Lactobacillus bulgaricus | दूध में लैक्टिक अम्ल बनाकर स्कंदन |
| मक्खन (Butter) | Lactococcus lactis | मलाई को इच्छित अम्लता तक इनक्यूबेट करना, फिर मथना-धोना-नमक मिलाना |
| पनीर व छाछ | विभिन्न लैक्टिक अम्ल बैक्टीरिया व ब्यूटिरिक अम्ल बैक्टीरिया | विशिष्ट गंध व स्वाद हेतु ब्यूटिरिक अम्ल किण्वन की भूमिका (विषय 11 देखें) |
ब्रेड निर्माण में यीस्ट Saccharomyces cerevisiae आटे में मौजूद शर्करा का किण्वन कर इथेनॉल व CO₂ बनाता है। CO₂ गैस के छोटे-छोटे बुलबुले आटे में फंसकर उसे फुलाते हैं (Proofing/प्रूफिंग कहलाती है), जिससे बेक होने के बाद ब्रेड हल्की, मुलायम व स्पंजी बनती है। यही यीस्ट बीयर व वाइन उद्योग में भी प्रयुक्त होता है (विषय 10 देखें) — यह दर्शाता है कि एक ही सूक्ष्मजीव कितने विविध उद्योगों की नींव है।
किण्वित खाद्य पदार्थ केवल स्वाद ही नहीं बदलते — ये पाचन क्रिया बेहतर बनाते हैं, आंतों के लाभकारी बैक्टीरिया (Gut Microbiota) को बढ़ावा देते हैं, लैक्टोज असहिष्णुता को कम करने में मदद करते हैं तथा प्रतिरोधक क्षमता में सुधार लाते हैं — यही कारण है कि दही, छाछ जैसे किण्वित खाद्य भारतीय आहार परंपरा का अभिन्न हिस्सा रहे हैं (देखें अध्याय 7)।
◆ डेयरी किण्वन ◆ Streptococcus thermophilus ◆ Lactococcus lactis ◆ बेकरी किण्वन ◆ प्रूफिंग (Proofing)
गन्ना, मक्का व सेल्युलोसिक बायोमास से किण्वन द्वारा बड़े पैमाने पर बायो-एथेनॉल का उत्पादन आज भारत की ऊर्जा नीति का केंद्र बिंदु है। भारत के एथनॉल मिश्रण कार्यक्रम (Ethanol Blending Programme - EBP) के अंतर्गत E20 (पेट्रोल में 20% एथनॉल मिश्रण) का लक्ष्य मूल रूप से 2030 के लिए रखा गया था, जिसे आगे बढ़ाकर 2025-26 कर दिया गया — और यह लक्ष्य निर्धारित समय से पहले ही प्राप्त कर लिया गया। 1 अप्रैल 2026 से देशभर के सभी राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों में E20 ईंधन अनिवार्य कर दिया गया है।
| वर्ष | एथनॉल मिश्रण प्रतिशत |
|---|---|
| 2013-14 | 1.5% से कम |
| 2022-23 | 12.06% |
| 2023-24 | 14.60% |
| 2024-25 (फरवरी तक) | 17.98% |
| 2025-26 | 20% (E20 लक्ष्य प्राप्त) |
यह उपलब्धि दिखाती है कि किण्वन प्रौद्योगिकी अब केवल भोजन तक सीमित नहीं — यह भारत की ऊर्जा सुरक्षा व कार्बन उत्सर्जन घटाने की रणनीति का भी मूल आधार बन चुकी है।
| कारक | प्रभाव |
|---|---|
| तापमान (Temperature) | एंजाइम सक्रियता व सूक्ष्मजीव वृद्धि नियंत्रित करता है; अत्यधिक तापमान पर एंजाइम निष्क्रिय हो जाते हैं |
| pH | एंजाइम गतिविधि व कोशिका झिल्ली की स्थिति प्रभावित करता है; बफर सिस्टम से नियंत्रित किया जाता है |
| घुलित ऑक्सीजन | वायवीय किण्वन (जैसे एसिटिक अम्ल किण्वन) हेतु आवश्यक; निरंतर वातन/स्टिरिंग से बनाए रखा जाता है |
| पोषक तत्वों की सांद्रता | कार्बन-नाइट्रोजन अनुपात, लवण व विटामिन वृद्धि व उत्पाद निर्माण को प्रभावित करते हैं |
औद्योगिक स्तर पर बड़ी मात्रा में किण्वन हेतु विशेष बड़े पात्र — फर्मेंटर/किण्वक (Fermenter) — का उपयोग होता है, जिनमें तापमान, pH व ऑक्सीजन स्तर को कंप्यूटर-नियंत्रित प्रणाली से लगातार मॉनिटर किया जाता है, ताकि सूक्ष्मजीव अधिकतम दक्षता से काम कर सकें।
◆ बायोएथेनॉल ◆ एथनॉल मिश्रण कार्यक्रम (EBP) ◆ E20 ◆ बायोगैस ◆ फर्मेंटर (Fermenter) ◆ किण्वन को प्रभावित करने वाले कारक
राजस्थान न केवल भारत का सबसे बड़ा भौगोलिक क्षेत्रफल वाला राज्य है, बल्कि दूध उत्पादन में भी देश के अग्रणी राज्यों में शामिल है — यह सीधे इस अध्याय के डेयरी-किण्वन विषयों (12) से जुड़ता है।
भारत विश्व का सबसे बड़ा दूध उत्पादक व उपभोक्ता देश है — वर्ष 2024-25 में कुल उत्पादन लगभग 248-250 मिलियन टन रहा। राज्यवार आंकड़ों में उत्तर प्रदेश (38.8 मिलियन टन) प्रथम स्थान पर है, जबकि राजस्थान (36.7 मिलियन टन) दूसरे स्थान पर है — तथा प्रति व्यक्ति दूध उपलब्धता में भी राजस्थान देश में दूसरे स्थान पर है।
राजस्थान सहकारी डेयरी संघ (RCDF) राज्य के डेयरी उद्योग की रीढ़ है, जिसका ब्रांड 'सरस' (Saras) राजस्थान के हर घर में जाना-पहचाना नाम है। जयपुर, बीकानेर व अलवर के प्रसंस्करण संयंत्र मिलकर प्रतिदिन 20 लाख लीटर से अधिक दूध प्रसंस्कृत करते हैं, तथा उदयपुर व कोटा में नई इकाइयां 2026 तक स्थापित होने की योजना है। राज्य सरकार ने सरस को क्षेत्रीय से राष्ट्रीय ब्रांड बनाने हेतु ₹1,500 करोड़ की वित्तीय सहायता स्वीकृत की है। वर्तमान में RCDF के सहकारी नेटवर्क में 15,000 से अधिक दुग्ध सहकारी समितियां हैं, जो लगभग 8 लाख दुग्ध उत्पादकों को जोड़ती हैं।
सरस डेयरी द्वारा उत्पादित दूध का एक बड़ा हिस्सा दही, छाछ, पनीर व मक्खन जैसे किण्वित उत्पादों में बदला जाता है — यही वह प्रक्रिया है जिसे इस अध्याय के विषय 3 व 12 में विस्तार से समझाया गया है। यानी राजस्थान की रसोई में रोज़ इस्तेमाल होने वाला दही-छाछ, वास्तव में सूक्ष्मजीव विज्ञान का ही प्रत्यक्ष परिणाम है।
मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना का राष्ट्रीय शुभारंभ राजस्थान के सूरतगढ़ से हुआ था — यह तथ्य अक्सर RAS परीक्षा में पूछा जाता है, अतः इसे विशेष रूप से याद रखें।
◆ राजस्थान दूध उत्पादन (दूसरा स्थान) ◆ RCDF व सरस ब्रांड ◆ मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना — सूरतगढ़ ◆ गोवर्धन जैविक उर्वरक योजना ◆ वर्मी-कम्पोस्ट
• सूक्ष्मजीव छह प्रमुख प्रकार के होते हैं — विषाणु, जीवाणु, कवक, शैवाल, प्रोटोजोआ व माइकोप्लाज्मा — जिनमें विषाणु को सजीव-निर्जीव के बीच की 'योजक कड़ी' माना जाता है। • लाभदायक सूक्ष्मजीव दही, ब्रेड, इडली-डोसा जैसे खाद्य पदार्थों के निर्माण से लेकर पेनिसिलिन जैसे जीवनरक्षक एंटीबायोटिक व स्टैटिन-साइक्लोस्पोरिन जैसी आधुनिक औषधियों तक में केंद्रीय भूमिका निभाते हैं। • राइजोबियम, एजोटोबैक्टर व सायनोबैक्टीरिया जैसे सूक्ष्मजीव जैविक नाइट्रोजन स्थिरीकरण द्वारा मृदा उर्वरता बढ़ाते हैं, जबकि Bt, ट्राइकोडर्मा व बैक्यूलोवायरस जैसे जैव कीटनाशक रासायनिक कीटनाशकों का पर्यावरण-अनुकूल विकल्प हैं। • हानिकारक सूक्ष्मजीव मानव रोग, खाद्य विषाक्तता व पादप रोगों का कारण बनते हैं — स्वच्छता, टीकाकरण व उचित भंडारण इनसे बचाव के प्रमुख उपाय हैं। • कवक व शैवाल का आर्थिक महत्व विशाल है — स्पाइरुलीना जैसे 'सम्पूर्ण आहार' से लेकर अगर-अगर जैसे औद्योगिक उत्पाद तक, यद्यपि अत्यधिक वृद्धि से 'जल प्रस्फुटन' जैसी हानि भी हो सकती है। • किण्वन (Fermentation) — लुई पास्चर द्वारा वैज्ञानिक रूप से स्थापित एक अवायवीय जैव-रासायनिक प्रक्रिया — के पांच प्रमुख प्रकार हैं: एल्कोहलिक, लैक्टिक अम्ल, एसिटिक अम्ल, ब्यूटिरिक अम्ल व मिश्रित अम्ल किण्वन। • डेयरी उद्योग (दही, मक्खन, पनीर) व बेकरी उद्योग (ब्रेड) किण्वन प्रौद्योगिकी के सबसे व्यापक दैनिक-जीवन उपयोग हैं, जो पाचन-स्वास्थ्य में भी लाभकारी हैं। • किण्वन प्रौद्योगिकी आज भारत की हरित ऊर्जा नीति का आधार भी है — एथनॉल मिश्रण कार्यक्रम के तहत E20 लक्ष्य 2025-26 में समय से पहले प्राप्त किया गया। • राजस्थान दूध उत्पादन में देश में दूसरे स्थान पर है (RCDF/सरस ब्रांड), तथा मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना (राष्ट्रीय शुभारंभ सूरतगढ़ से) व गोवर्धन जैविक उर्वरक योजना जैसी पहलों से राज्य में जैव उर्वरक उपयोग को बढ़ावा दिया जा रहा है।