शरीर एक मशीन की तरह है, और हर मशीन को चलने के लिए ईंधन चाहिए। हमारे शरीर का ईंधन है भोजन (Food) — पर सिर्फ पेट भरना काफी नहीं, भोजन में सही मात्रा में सही चीज़ें होनी चाहिए। इसी को कहते हैं पोषण (Nutrition) — वह प्रक्रिया जिसके द्वारा जीव भोजन ग्रहण करता है और उसे शरीर की वृद्धि, ऊर्जा उत्पादन, मरम्मत व रोग-प्रतिरोध के लिए उपयोग करता है। जो भोजन शरीर को ये सब कार्य करने में मदद करता है, उसमें मौजूद उपयोगी तत्वों को पोषक तत्व (Nutrients) कहते हैं।
पोषक तत्वों को मुख्यतः दो वर्गों में बांटा जाता है — जो तत्व शरीर को अधिक मात्रा में चाहिए उन्हें वृहत् पोषक तत्व (Macronutrients) कहते हैं, और जो बहुत कम मात्रा में चाहिए पर फिर भी अनिवार्य हैं उन्हें सूक्ष्म पोषक तत्व (Micronutrients) कहते हैं।
| 🍚 वृहत् पोषक तत्व (Macronutrients) | 💊 सूक्ष्म पोषक तत्व (Micronutrients) |
|---|---|
| ◆ कार्बोहाइड्रेट (Carbohydrates) — मुख्य ऊर्जा स्रोत ◆ प्रोटीन (Proteins) — वृद्धि व मरम्मत ◆ वसा (Fats/Lipids) — संचित ऊर्जा व सुरक्षा ◆ जल (Water) — सभी क्रियाओं का माध्यम | ◆ विटामिन (Vitamins) — A, B-समूह, C, D, E, K ◆ खनिज तत्व (Minerals) — कैल्शियम, लौह, आयोडीन आदि ◆ फाइबर/रेशा (Dietary Fibre) — पाचन सहायक ◆ (इनकी कमी से भी गंभीर रोग होते हैं, मात्रा भले कम हो) |
संतुलित आहार वह आहार है जिसमें सभी पोषक तत्व — कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, वसा, विटामिन, खनिज, जल एवं फाइबर — सही अनुपात में तथा व्यक्ति की आयु, लिंग, शारीरिक श्रम व स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार पर्याप्त मात्रा में मौजूद हों। एक सामान्य वयस्क के लिए अनुमानित ऊर्जा-अनुपात कुछ इस प्रकार रखा जाता है — कुल ऊर्जा का लगभग 55-60% कार्बोहाइड्रेट से, 10-15% प्रोटीन से तथा 20-30% वसा से प्राप्त होना चाहिए।
💡 राजस्थान की परंपरागत थाली — विज्ञान की कसौटी पर खरी: राजस्थान की पारंपरिक थाली — बाजरे की रोटी, दाल, छाछ, गुड़ व मौसमी सब्जी — वास्तव में एक संतुलित आहार का बेहतरीन उदाहरण है। बाजरा कॉम्प्लेक्स कार्बोहाइड्रेट व फाइबर देता है, दाल प्रोटीन देती है, छाछ कैल्शियम व प्रोबायोटिक्स देती है, और गुड़ आयरन का प्राकृतिक स्रोत है। यही कारण है कि पुराने समय में मरुस्थलीय कठिन परिस्थितियों में भी राजस्थान के लोग शारीरिक रूप से मज़बूत रहे।
◆ पोषण (Nutrition) ◆ पोषक तत्व (Nutrients) ◆ वृहत् पोषक तत्व (Macronutrients) ◆ सूक्ष्म पोषक तत्व (Micronutrients) ◆ संतुलित आहार (Balanced Diet)
कल्पना कीजिए कि शरीर एक गाड़ी है — तो कार्बोहाइड्रेट (Carbohydrates) उसका पेट्रोल है। यह शरीर को सबसे तेज़ी से उपलब्ध होने वाली ऊर्जा का स्रोत है। रासायनिक रूप से कार्बोहाइड्रेट कार्बन (C), हाइड्रोजन (H) व ऑक्सीजन (O) से बने यौगिक हैं, जिनमें हाइड्रोजन व ऑक्सीजन का अनुपात सामान्यतः जल के समान 2:1 होता है।
| स्रोत | मुख्य कार्बोहाइड्रेट प्रकार |
|---|---|
| गेहूं, चावल, बाजरा, मक्का, जौ | जटिल स्टार्च — धीरे पचता है, स्थायी ऊर्जा |
| गन्ना, शहद, फल | सरल शर्करा — तुरंत ऊर्जा |
| दूध व दुग्ध उत्पाद | लैक्टोज |
| सब्जियां, फलों के छिलके, साबुत अनाज | सेल्युलोज/फाइबर — पाचन सहायक |
कार्बोहाइड्रेट का मुख्य कार्य ऊर्जा प्रदान करना है — 1 ग्राम कार्बोहाइड्रेट से लगभग 4 किलोकैलोरी ऊर्जा प्राप्त होती है। मस्तिष्क व लाल रक्त कोशिकाएं ऊर्जा हेतु मुख्यतः ग्लूकोज पर ही निर्भर करती हैं। अतिरिक्त ग्लूकोज यकृत व पेशियों में ग्लाइकोजन के रूप में संचित होता है, तथा उससे भी अधिक होने पर वसा में परिवर्तित होकर संचित होता है। सेल्युलोज जैसे अपाच्य रेशे आंतों की गति (Peristalsis) को सुचारू रखकर कब्ज़ जैसी समस्याओं से बचाते हैं।
💡 ग्लाइसेमिक इंडेक्स — रोज़मर्रा का ज्ञान: सफेद चावल व मैदा जैसे परिष्कृत (Refined) कार्बोहाइड्रेट रक्त शर्करा को तेज़ी से बढ़ाते हैं (उच्च ग्लाइसेमिक इंडेक्स), जबकि बाजरा, ज्वार व साबुत अनाज धीरे-धीरे शर्करा छोड़ते हैं (निम्न ग्लाइसेमिक इंडेक्स) — इसीलिए मधुमेह (Diabetes) के रोगियों को मोटे अनाज (मिलेट्स) खाने की सलाह दी जाती है।
◆ कार्बोहाइड्रेट (Carbohydrates) ◆ मोनोसैकेराइड ◆ डाइसैकेराइड ◆ पॉलिसैकेराइड ◆ ग्लाइकोजन ◆ सेल्युलोज
अगर कार्बोहाइड्रेट शरीर का पेट्रोल है, तो प्रोटीन (Protein) शरीर की निर्माण-सामग्री है — जैसे किसी इमारत में ईंट-सीमेंट। शरीर की हर कोशिका, हर मांसपेशी, हर एंजाइम व अधिकांश हार्मोन प्रोटीन से बने हैं। प्रोटीन शब्द ग्रीक शब्द 'प्रोटियोस' से बना है जिसका अर्थ है 'सर्वप्रथम महत्वपूर्ण' — और यह नाम सार्थक भी है।
प्रोटीन अमीनो अम्लों की लंबी श्रृंखलाओं (Polypeptide Chains) से बने होते हैं। मानव शरीर में प्रोटीन-निर्माण हेतु कुल 20 प्रकार के अमीनो अम्ल प्रयुक्त होते हैं, जिनमें से 9 अमीनो अम्ल शरीर स्वयं नहीं बना सकता — इन्हें आवश्यक अमीनो अम्ल (Essential Amino Acids) कहते हैं, जो भोजन से ही प्राप्त करने होते हैं। शेष अमीनो अम्ल शरीर स्वयं संश्लेषित कर लेता है, इन्हें अनावश्यक अमीनो अम्ल (Non-essential Amino Acids) कहते हैं।
| प्रोटीन स्रोत | विशेषता |
|---|---|
| दूध, अंडा, मांस, मछली | पूर्ण प्रोटीन (Complete Protein) — सभी आवश्यक अमीनो अम्ल मौजूद |
| दालें, राजमा, सोयाबीन, चना | अपूर्ण प्रोटीन — कुछ अमीनो अम्ल की कमी, पर अनाज के साथ मिलाकर पूर्ण बनती है |
| सोयाबीन | पादप स्रोतों में सर्वाधिक प्रोटीन (लगभग 40%), शाकाहारियों हेतु उत्तम |
| मूंगफली, बादाम, तिल | अच्छी मात्रा में वनस्पति प्रोटीन व स्वस्थ वसा |
जब आहार में लंबे समय तक प्रोटीन व/या कुल ऊर्जा की गंभीर कमी बनी रहती है, तो विशेषकर छोटे बच्चों में प्रोटीन-ऊर्जा कुपोषण (PEM) होता है। इसके दो प्रमुख गंभीर रूप हैं — क्वाशियोरकोर (Kwashiorkor) और मैरास्मस (Marasmus) — जो आज भी भारत सहित विकासशील देशों में बाल-कुपोषण का प्रमुख कारण हैं।
| 🟠 क्वाशियोरकोर (Kwashiorkor) | 🔴 मैरास्मस (Marasmus) |
|---|---|
| ◆ कारण — गंभीर प्रोटीन की कमी (ऊर्जा भले पर्याप्त हो) ◆ लक्षण — शरीर में सूजन (Oedema), विशेषकर पेट व पैरों में फूलापन ◆ पेट का फूलना (Pot Belly) — यकृत में वसा जमाव के कारण ◆ बालों का रंग बदलना (लाल-भूरा), बालों का पतला व कमज़ोर होना ◆ त्वचा का छिलना, चिड़चिड़ापन, भूख में कमी ◆ आमतौर पर 1-3 वर्ष की आयु में, दूध छुड़ाने के बाद जब आहार में प्रोटीन कम हो जाता है | ◆ कारण — कुल ऊर्जा व प्रोटीन दोनों की गंभीर व दीर्घकालिक कमी ◆ लक्षण — अत्यधिक कमज़ोरी व वजन में भारी कमी ◆ शरीर 'हड्डी-चमड़ी' जैसा दिखना, मांसपेशियों व वसा का लगभग पूर्ण क्षय ◆ चेहरा बूढ़े व्यक्ति जैसा दिखना ('Old Man Face') ◆ सूजन (Oedema) सामान्यतः नहीं होती ◆ सामान्यतः 1 वर्ष से कम आयु के शिशुओं में, जब स्तनपान जल्दी बंद हो जाए |
PEM से ग्रस्त बच्चों में शारीरिक वृद्धि रुक जाती है, प्रतिरक्षा तंत्र कमज़ोर पड़ जाता है जिससे बार-बार संक्रमण होता है, तथा मस्तिष्क विकास पर भी दीर्घकालिक प्रभाव पड़ सकता है। समय पर पौष्टिक आहार व चिकित्सकीय हस्तक्षेप से इसे रोका व सुधारा जा सकता है।
राजस्थान के मरुस्थलीय व आदिवासी क्षेत्रों (जैसे डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़) में कुपोषण की चुनौती ऐतिहासिक रूप से अधिक रही है, जिसे देखते हुए राज्य सरकार ने मुख्यमंत्री सुपोषण न्यूट्री किट योजना जैसी विशेष पहल शुरू की है, जिसका उल्लेख आगे विषय 9 में विस्तार से किया गया है।
◆ प्रोटीन (Protein) ◆ अमीनो अम्ल (Amino Acids) ◆ आवश्यक अमीनो अम्ल ◆ प्रोटीन-ऊर्जा कुपोषण (PEM) ◆ क्वाशियोरकोर (Kwashiorkor) ◆ मैरास्मस (Marasmus)
वसा (Fats/Lipids) को अक्सर बुरा समझा जाता है, पर सच यह है कि वसा शरीर के लिए उतनी ही आवश्यक है जितनी कार्बोहाइड्रेट व प्रोटीन — बस मात्रा व प्रकार का संतुलन ज़रूरी है। वसा शरीर की सबसे संकेंद्रित ऊर्जा-भंडार (Energy Reserve) है — 1 ग्राम वसा से लगभग 9 किलोकैलोरी ऊर्जा मिलती है, जो कार्बोहाइड्रेट व प्रोटीन से दोगुनी से भी अधिक है।
| ✅ संतृप्त वसा (Saturated Fat) | 💚 असंतृप्त वसा (Unsaturated Fat) |
|---|---|
| ◆ कमरे के तापमान पर ठोस (जैसे घी, मक्खन, नारियल तेल) ◆ पशु-स्रोतों में अधिक — मांस, पनीर, मक्खन ◆ अधिक मात्रा में सेवन से रक्त कोलेस्ट्रॉल बढ़ने व हृदय रोग का जोखिम | ◆ कमरे के तापमान पर तरल (जैसे सरसों तेल, जैतून तेल, तिल तेल) ◆ मछली (ओमेगा-3), मेवे, बीज में प्रचुर ◆ हृदय स्वास्थ्य हेतु लाभकारी — 'अच्छी वसा' मानी जाती है |
ओमेगा-3 (Omega-3) व ओमेगा-6 (Omega-6) वसा अम्ल आवश्यक वसा अम्ल कहलाते हैं क्योंकि शरीर इन्हें स्वयं नहीं बना सकता। ओमेगा-3 मुख्यतः मछली (जैसे सैल्मन), अलसी के बीज (Flaxseeds) व अखरोट में पाया जाता है, तथा मस्तिष्क विकास व हृदय स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण है।
कोलेस्ट्रॉल एक वसा-सदृश पदार्थ है जो कोशिका झिल्ली, विटामिन D व कुछ हार्मोन (जैसे टेस्टोस्टेरोन, एस्ट्रोजन) के निर्माण हेतु आवश्यक है। शरीर यकृत में स्वयं कोलेस्ट्रॉल बनाता है, इसलिए भोजन से अतिरिक्त कोलेस्ट्रॉल लेने की आवश्यकता सीमित होती है। इसे दो भागों में समझा जाता है — LDL (Low-Density Lipoprotein, जिसे 'खराब कोलेस्ट्रॉल' कहा जाता है, वाहिकाओं में जमकर अवरोध पैदा कर सकता है) तथा HDL (High-Density Lipoprotein, जिसे 'अच्छा कोलेस्ट्रॉल' कहा जाता है, यह अतिरिक्त कोलेस्ट्रॉल को यकृत तक वापस ले जाता है)।
बेकरी उत्पादों, तली-भुनी वस्तुओं व पैक्ड स्नैक्स में मौजूद ट्रांस वसा (Trans Fat) — जो वनस्पति तेल के हाइड्रोजनीकरण (Hydrogenation) से बनती है — सबसे अधिक हानिकारक मानी जाती है, क्योंकि यह LDL बढ़ाती है और HDL घटाती है। भारत सरकार व FSSAI ने पैक्ड खाद्य पदार्थों में ट्रांस वसा की मात्रा सीमित करने हेतु नियम लागू किए हैं।
◆ वसा/लिपिड (Fats/Lipids) ◆ संतृप्त वसा ◆ असंतृप्त वसा ◆ ओमेगा-3 ◆ कोलेस्ट्रॉल ◆ LDL व HDL ◆ ट्रांस वसा
विटामिन (Vitamins) ऐसे कार्बनिक यौगिक हैं जिनकी शरीर को बहुत ही सूक्ष्म मात्रा में आवश्यकता होती है, पर इनके बिना शरीर की अनेक महत्वपूर्ण जैव-रासायनिक क्रियाएं ठप्प पड़ जाती हैं। इन्हें उनकी घुलनशीलता के आधार पर दो वर्गों में बांटा जाता है — वसा-घुलनशील (Fat-soluble: A, D, E, K) व जल-घुलनशील (Water-soluble: B-समूह व C)। वसा-घुलनशील विटामिन शरीर में यकृत व वसा-ऊतक में संचित हो सकते हैं, इसलिए इनकी अधिकता (Overdose) भी हानिकारक हो सकती है।
| विटामिन | स्रोत | कार्य | कमी से रोग |
|---|---|---|---|
| विटामिन A (रेटिनॉल) | गाजर, पपीता, आम, हरी पत्तेदार सब्जियां, दूध, अंडा, यकृत | दृष्टि (विशेषकर रात्रि-दृष्टि), त्वचा व रोग-प्रतिरोधक क्षमता हेतु आवश्यक | रतौंधी (Night Blindness), जीरोफ्थैल्मिया (Xerophthalmia) |
| विटामिन D (कैल्सिफेरॉल) | सूर्य का प्रकाश (त्वचा में संश्लेषण), मछली का तेल, अंडे की जर्दी, दूध | कैल्शियम व फॉस्फोरस के अवशोषण व हड्डियों की मज़बूती हेतु आवश्यक | रिकेट्स (Rickets - बच्चों में), ऑस्टियोमलेशिया (Osteomalacia - वयस्कों में) |
| विटामिन E (टोकोफेरॉल) | वनस्पति तेल, मेवे, बीज, हरी पत्तेदार सब्जियां | प्रतिऑक्सीकारक (Antioxidant) — कोशिकाओं को क्षति से बचाता है | बांझपन संबंधी समस्याएं, तंत्रिका संबंधी विकार (दुर्लभ) |
| विटामिन K | हरी पत्तेदार सब्जियां (पालक, ब्रोकली), आंत के बैक्टीरिया द्वारा भी निर्मित | रक्त का थक्का जमने (Blood Clotting) की प्रक्रिया हेतु आवश्यक | रक्तस्राव रुकने में कठिनाई |
🖼️ विटामिन D की कमी से रिकेट्स (Rickets) — टेढ़ी टांगें व कमज़ोर हड्डियां

दिलचस्प बात यह है कि भारत जैसे धूप-प्रचुर देश में भी विटामिन D की कमी बहुत आम पाई जाती है, क्योंकि अधिकांश लोग दिन में पर्याप्त समय धूप में नहीं बिताते, तथा त्वचा को पूरी तरह ढककर रखने की आदत भी इसका एक कारण है। रिकेट्स (Rickets) में बच्चों की हड्डियां नरम व कमज़ोर होकर टेढ़ी हो जाती हैं (विशेषकर टांगें धनुषाकार हो जाती हैं), जबकि वयस्कों में यही कमी ऑस्टियोमलेशिया कहलाती है, जिसमें हड्डियां कमज़ोर व दर्दनाक हो जाती हैं।
सुबह की धूप में 15-20 मिनट बिताना शरीर में पर्याप्त विटामिन D बनाने के लिए काफी है। यही कारण है कि पुराने समय में सुबह की सैर व धूप सेंकना स्वास्थ्य परंपरा का हिस्सा रहा है।
◆ वसा-घुलनशील विटामिन ◆ विटामिन A — रतौंधी ◆ विटामिन D — रिकेट्स ◆ विटामिन E — प्रतिऑक्सीकारक ◆ विटामिन K — रक्त स्कंदन
जल-घुलनशील विटामिन (Water-soluble Vitamins) शरीर में संचित नहीं होते — अतिरिक्त मात्रा मूत्र के माध्यम से बाहर निकल जाती है। इसीलिए इनकी आवश्यकता प्रतिदिन आहार से पूरी करनी होती है। इस वर्ग में विटामिन B-समूह (आठ प्रकार) व विटामिन C शामिल हैं।
| विटामिन | स्रोत | कमी से रोग |
|---|---|---|
| विटामिन B1 (थायमिन) | साबुत अनाज, दालें, मेवे | बेरी-बेरी (Beri-beri) — तंत्रिका व हृदय संबंधी विकार |
| विटामिन B2 (राइबोफ्लेविन) | दूध, अंडा, हरी सब्जियां | मुंह व होंठों के कोनों का फटना (Angular Stomatitis) |
| विटामिन B3 (नियासिन) | मूंगफली, साबुत अनाज, मांस | पेलाग्रा (Pellagra) — त्वचा, पाचन व मानसिक विकार |
| विटामिन B9 (फोलिक अम्ल) | हरी पत्तेदार सब्जियां, दालें, खट्टे फल | गर्भावस्था में भ्रूण की तंत्रिका नली दोष (Neural Tube Defects), एनीमिया |
| विटामिन B12 (कोबालामिन) | मांस, अंडा, दूध (मुख्यतः पशु-स्रोत) | परनिशिया एनीमिया (Pernicious Anaemia), तंत्रिका क्षति |
| विटामिन C (एस्कॉर्बिक अम्ल) | आंवला, नींबू, संतरा, अमरूद, टमाटर | स्कर्वी (Scurvy) — मसूड़ों से खून आना, घाव देर से भरना |
विटामिन C न केवल स्कर्वी से बचाता है, बल्कि यह एक शक्तिशाली प्रतिऑक्सीकारक (Antioxidant) भी है तथा आयरन के अवशोषण को बढ़ाने व घाव भरने में सहायक होता है। साथ ही यह श्वेत रक्त कोशिकाओं की कार्यक्षमता बढ़ाकर प्रतिरक्षा तंत्र को भी मज़बूत करता है — इसीलिए सर्दी-जुकाम में आंवला व नींबू खाने की सलाह दी जाती है।
भारतीय आंवला (Phyllanthus emblica) को विटामिन C का सबसे समृद्ध प्राकृतिक स्रोतों में गिना जाता है — यह संतरे से भी कई गुना अधिक विटामिन C प्रदान करता है।
गर्भावस्था के प्रारंभिक चरण में फोलिक अम्ल (Folic Acid) की पर्याप्त मात्रा अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि इसकी कमी से शिशु में तंत्रिका नली दोष (जैसे स्पाइना बिफिडा) हो सकता है। इसीलिए भारत के जननी सुरक्षा योजना जैसे कार्यक्रमों में गर्भवती महिलाओं को आयरन-फोलिक एसिड (IFA) गोलियां नियमित रूप से दी जाती हैं।
◆ जल-घुलनशील विटामिन ◆ विटामिन B1 — बेरी-बेरी ◆ विटामिन B9 — फोलिक अम्ल ◆ विटामिन B12 ◆ विटामिन C — स्कर्वी
खनिज तत्व (Minerals) अकार्बनिक पोषक तत्व हैं जो शरीर की हड्डियों से लेकर तंत्रिका तंत्र तक अनेक कार्यों में भूमिका निभाते हैं। इन्हें दो उप-वर्गों में बांटा जाता है — वृहत् खनिज (Macrominerals, जैसे कैल्शियम, फॉस्फोरस, जिनकी अधिक मात्रा चाहिए) व सूक्ष्म खनिज/ट्रेस तत्व (Trace Elements, जैसे लौह, आयोडीन, जिंक, जिनकी बहुत कम मात्रा चाहिए)।
| खनिज तत्व | स्रोत | कार्य | कमी से रोग |
|---|---|---|---|
| कैल्शियम (Calcium) | दूध-दही, तिल, रागी, हरी पत्तेदार सब्जियां | हड्डी-दांत निर्माण, मांसपेशी संकुचन, रक्त स्कंदन | ऑस्टियोपोरोसिस, हड्डियों का कमज़ोर होना |
| लौह/आयरन (Iron) | गुड़, पालक, चुकंदर, अनार, मांस, दालें | हीमोग्लोबिन निर्माण — ऑक्सीजन परिवहन | एनीमिया (रक्ताल्पता) — थकान, कमज़ोरी |
| आयोडीन (Iodine) | आयोडीनयुक्त नमक, समुद्री भोजन | थायरॉइड हार्मोन (थायरॉक्सिन) निर्माण | घेंघा रोग (Goitre), बच्चों में मानसिक विकास बाधित (क्रेटिनिज़्म) |
| जिंक (Zinc) | मांस, दालें, कद्दू के बीज, साबुत अनाज | प्रतिरक्षा तंत्र, घाव भरना, वृद्धि व विकास | बढ़त रुकना, बार-बार संक्रमण, घाव देर से भरना |
| सोडियम व पोटैशियम | नमक, केला, आलू, नारियल पानी | तंत्रिका आवेग संचरण, द्रव-संतुलन, रक्तचाप नियमन | मांसपेशी ऐंठन, कमज़ोरी (असंतुलन की स्थिति में) |
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) के अनुसार भारत में महिलाओं व बच्चों में आयरन की कमी से होने वाला एनीमिया एक व्यापक समस्या है। इससे निपटने हेतु भारत सरकार ने एनीमिया मुक्त भारत (Anemia Mukt Bharat) अभियान चलाया है, जिसके अंतर्गत बच्चों, किशोरियों, गर्भवती व धात्री महिलाओं को आयरन-फोलिक एसिड (IFA) की खुराक नियमित रूप से दी जाती है।
पहाड़ी क्षेत्रों में जहां मिट्टी व जल में आयोडीन की स्वाभाविक कमी होती है, वहां पहले घेंघा रोग (गर्दन में सूजन) बहुत आम था। भारत सरकार द्वारा आयोडीनयुक्त नमक (Iodised Salt) को अनिवार्य व सुलभ बनाए जाने के बाद इस रोग में भारी कमी आई है — यह सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति की एक बड़ी सफलता मानी जाती है।
◆ खनिज तत्व (Minerals) ◆ कैल्शियम ◆ लौह/आयरन — एनीमिया ◆ आयोडीन — घेंघा रोग ◆ जिंक
जल को अक्सर पोषक तत्वों की सूची में भुला दिया जाता है, जबकि मानव शरीर का लगभग 60-70% भाग जल से बना है। यह पाचन, पोषक तत्वों के परिवहन, शरीर के तापमान नियमन व उत्सर्जन जैसी हर महत्वपूर्ण क्रिया में भाग लेता है। एक सामान्य वयस्क को प्रतिदिन लगभग 2.5-3 लीटर जल की आवश्यकता होती है।
फाइबर वह पादप-भाग है जिसे मानव पाचन एंजाइम पचा नहीं पाते, फिर भी यह पाचन तंत्र के स्वास्थ्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह आंतों की गति को नियमित रखता है, कब्ज़ से बचाता है, रक्त शर्करा व कोलेस्ट्रॉल के स्तर को नियंत्रित करने में मदद करता है, तथा पेट भरा होने का एहसास देकर वजन नियंत्रण में भी सहायक है। साबुत अनाज, सब्जियां, फल व दालें फाइबर के मुख्य स्रोत हैं।
🖼️ खाद्य पिरामिड (Food Pyramid) — संतुलित आहार में विभिन्न खाद्य समूहों का अनुपात

बाजरा, ज्वार, रागी (मंडुआ), कोदो जैसे मोटे अनाज — जिन्हें कभी 'गरीबों का अनाज' समझा जाता था — अब अपने पोषण-गुणों के कारण वैश्विक स्तर पर सम्मान पा रहे हैं। भारत के प्रस्ताव पर संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2023 को अंतर्राष्ट्रीय मिलेट्स वर्ष (International Year of Millets) घोषित किया था। मिलेट्स में फाइबर अधिक, ग्लाइसेमिक इंडेक्स कम तथा आयरन व कैल्शियम जैसे खनिज प्रचुर मात्रा में होते हैं — जो इन्हें मधुमेह व हृदय रोगियों के लिए विशेष रूप से उपयुक्त बनाता है। राजस्थान में बाजरा पारंपरिक रूप से सबसे प्रमुख खाद्यान्न रहा है, विशेषकर मरुस्थलीय क्षेत्रों में जहां यह कम पानी में भी अच्छी उपज देता है।
प्रोबायोटिक्स जीवित लाभकारी सूक्ष्मजीव हैं (मुख्यतः बैक्टीरिया) जो पर्याप्त मात्रा में सेवन करने पर आंत के स्वास्थ्य को बेहतर बनाते हैं। दही, छाछ, इडली-डोसा का घोल (किण्वित खाद्य) प्रोबायोटिक्स के प्राकृतिक स्रोत हैं। ये आंत में उपयोगी बैक्टीरिया की संख्या बढ़ाकर पाचन सुधारते हैं तथा अप्रत्यक्ष रूप से प्रतिरक्षा तंत्र को भी सहयोग देते हैं, क्योंकि आंत में शरीर की लगभग 70% प्रतिरक्षा कोशिकाएं मौजूद होती हैं।
💡 दही — रोज़ की थाली में प्राकृतिक प्रोबायोटिक: छाछ व दही राजस्थान व समूचे भारत के पारंपरिक भोजन का हिस्सा रहे हैं — गर्मी में शरीर को ठंडक देने के साथ-साथ ये पाचन तंत्र के लाभकारी बैक्टीरिया (जैसे लैक्टोबैसिलस) की आपूर्ति भी करते हैं।
◆ जल (Water) ◆ आहार-रेशा (Dietary Fibre) ◆ खाद्य पिरामिड (Food Pyramid) ◆ मिलेट्स/मोटे अनाज ◆ प्रोबायोटिक्स (Probiotics)
कुपोषण (Malnutrition) का अर्थ केवल कम खाना नहीं है — इसके दो विपरीत रूप हैं। अल्पपोषण (Undernutrition) में शरीर को पर्याप्त पोषक तत्व नहीं मिलते (जैसे PEM, एनीमिया, विटामिन की कमी), जबकि अतिपोषण (Overnutrition) में आवश्यकता से अधिक कैलोरी लेने से मोटापा (Obesity) व जीवनशैली जनित रोग होते हैं। आज भारत को दोनों प्रकार के कुपोषण की 'दोहरी चुनौती' (Double Burden) का सामना करना पड़ रहा है — एक ओर ग्रामीण-आदिवासी क्षेत्रों में बच्चों में अल्पपोषण, तो दूसरी ओर शहरी क्षेत्रों में बढ़ता मोटापा।
राजस्थान सरकार ने राज्य की भौगोलिक चुनौतियों (मरुस्थल, आदिवासी दूरस्थ क्षेत्र) को देखते हुए कई विशेष योजनाएं शुरू की हैं:
| योजना | उद्देश्य एवं विशेषता |
|---|---|
| मुख्यमंत्री सुपोषण न्यूट्री किट योजना | कुपोषित बच्चों व गर्भवती-धात्री महिलाओं को पौष्टिक 'न्यूट्री किट' (मल्टी-मिक्स आटा, तेल, दालें आदि) का नियमित वितरण, विशेषकर आदिवासी व दूरस्थ जिलों में |
| इंदिरा रसोई योजना / श्री अन्नपूर्णा रसोई योजना | शहरी व ग्रामीण गरीब वर्ग को अत्यंत रियायती दर पर पौष्टिक व स्वच्छ भोजन उपलब्ध कराना, ताकि कोई भी भूखा न सोए |
| मुख्यमंत्री पन्नाधाय बाल गोपाल योजना | सरकारी विद्यालयों के विद्यार्थियों को सप्ताह में निर्धारित दिनों पौष्टिक गर्म दूध का वितरण, ताकि बच्चों में कैल्शियम व प्रोटीन की कमी दूर हो व कुपोषण घटे |
| राजश्री योजना व जननी सुरक्षा योजना | गर्भवती महिलाओं व नवजात बालिकाओं के पोषण व स्वास्थ्य सुधार हेतु आर्थिक सहायता व चिकित्सकीय देखभाल |
💡 पन्नाधाय बाल गोपाल योजना — दूध का महत्व: मुख्यमंत्री पन्नाधाय बाल गोपाल योजना के अंतर्गत राजस्थान के सरकारी स्कूलों में बच्चों को गर्म दूध दिया जाता है, क्योंकि दूध कैल्शियम व प्रोटीन का उत्कृष्ट स्रोत है — जो बढ़ती उम्र में हड्डियों व मांसपेशियों के विकास हेतु सीधे इसी अध्याय के विषय 1 व 3 से जुड़ता है।
◆ कुपोषण (Malnutrition) ◆ बौनापन (Stunting) ◆ दुर्बलता (Wasting) ◆ पोषण अभियान ◆ मुख्यमंत्री सुपोषण न्यूट्री किट योजना ◆ श्री अन्नपूर्णा रसोई योजना ◆ पन्नाधाय बाल गोपाल योजना
जब कोई कांटा शरीर में चुभता है और घाव के आसपास सूजन आ जाती है, या जब जुकाम होने पर बुखार चढ़ता है, तब असल में शरीर के अंदर एक अदृश्य सेना सक्रिय हो जाती है — यही है हमारा प्रतिरक्षा तंत्र (Immune System)। यह कोशिकाओं, ऊतकों व अंगों का एक जटिल नेटवर्क है जो शरीर को बाहरी हानिकारक तत्वों — बैक्टीरिया, वायरस, फंगस, परजीवी (सामूहिक रूप से रोगजनक/Pathogens कहलाते हैं) — तथा शरीर की अपनी असामान्य कोशिकाओं (जैसे कैंसर कोशिकाएं) से बचाता है।
प्रतिरक्षा तंत्र को दो व्यापक श्रेणियों में बांटा जाता है — जन्मजात प्रतिरक्षा (Innate Immunity), जो जन्म से ही मौजूद होती है व सामान्य/अविशिष्ट (Non-specific) होती है; तथा उपार्जित प्रतिरक्षा (Acquired/Adaptive Immunity), जो जीवनकाल में किसी विशेष रोगजनक के संपर्क में आने के बाद विकसित होती है व विशिष्ट (Specific) होती है। ये दोनों तंत्र मिलकर काम करते हैं — जन्मजात प्रतिरक्षा पहली रक्षा-पंक्ति है, जबकि उपार्जित प्रतिरक्षा एक अधिक लक्षित व स्मरणशील दूसरी पंक्ति है।
जब शरीर का तापमान संक्रमण के दौरान बढ़ता है (बुखार/Fever), तो यह कोई खराबी नहीं बल्कि प्रतिरक्षा तंत्र की एक जानबूझकर की गई रणनीति है — अधिकांश रोगाणु उच्च तापमान पर ठीक से बढ़ नहीं पाते, जबकि शरीर की प्रतिरक्षा कोशिकाएं अधिक सक्रिय हो जाती हैं।
◆ प्रतिरक्षा तंत्र (Immune System) ◆ रोगजनक (Pathogens) ◆ जन्मजात प्रतिरक्षा (Innate Immunity) ◆ भक्षकाणुक्रिया (Phagocytosis) ◆ प्राकृतिक हत्यारी कोशिकाएं ◆ सूजनकारी अनुक्रिया
जबकि जन्मजात प्रतिरक्षा हर रोगजनक पर एक जैसी प्रतिक्रिया देती है, उपार्जित प्रतिरक्षा (Acquired/Adaptive Immunity) एक बुद्धिमान सेना की तरह कार्य करती है — यह हर रोगजनक को पहचानकर उसके लिए विशेष 'हथियार' तैयार करती है, और सबसे महत्वपूर्ण बात, इसकी एक स्मृति (Memory) होती है, जिससे भविष्य में वही रोगजनक दोबारा हमला करे तो शरीर बहुत तेज़ी से प्रतिक्रिया दे पाता है।
श्वेत रक्त कोशिकाओं के एक विशेष वर्ग, लिम्फोसाइट, उपार्जित प्रतिरक्षा के केंद्र में हैं। ये दो मुख्य प्रकार की होती हैं — B-लिम्फोसाइट (B-कोशिका) व T-लिम्फोसाइट (T-कोशिका) — दोनों ही अस्थि मज्जा (Bone Marrow) में स्टेम कोशिकाओं से बनती हैं, परंतु T-कोशिकाएं परिपक्व होने हेतु थाइमस (Thymus) ग्रंथि में जाती हैं (इसीलिए नाम T-कोशिका, जबकि B-कोशिका बोन मैरो/Bursa से नाम पाती है)।
| 🅱️ B-कोशिका (हास्य प्रतिरक्षा — Humoral Immunity) | 🅃 T-कोशिका (कोशिका-मध्यस्थ प्रतिरक्षा — Cell-mediated Immunity) |
|---|---|
| ◆ रोगजनक को पहचानकर प्लाज़्मा कोशिका (Plasma Cell) में बदल जाती है ◆ प्लाज़्मा कोशिकाएं एंटीबॉडी (Antibodies) का बड़ी मात्रा में स्राव करती हैं ◆ एंटीबॉडी रक्त व शरीर-द्रव में घूमकर रोगजनकों को निष्क्रिय करती हैं ◆ कुछ B-कोशिकाएं स्मृति कोशिका (Memory Cell) बनकर वर्षों तक बनी रहती हैं | ◆ सहायक T-कोशिका (Helper T Cell) — पूरी प्रतिरक्षा अनुक्रिया का 'सेनापति', B-कोशिका व अन्य कोशिकाओं को सक्रिय करती है ◆ सहायक T-कोशिका (Cytotoxic/Killer T Cell) — संक्रमित व कैंसर कोशिकाओं को सीधे नष्ट करती है ◆ नियामक T-कोशिका (Regulatory T Cell) — अनुक्रिया समाप्त होने पर तंत्र को शांत करती है ◆ स्मृति T-कोशिका भी दीर्घकालिक सुरक्षा देती है |
🖼️ प्रतिरक्षा तंत्र की परतें — सहायक T-कोशिका, B-कोशिका, प्लाज़्मा कोशिका व एंटीबॉडी की कार्यप्रणाली

जब शरीर पहली बार किसी रोगजनक के संपर्क में आता है, तो प्राथमिक अनुक्रिया (Primary Response) धीमी होती है व एंटीबॉडी बनने में कुछ दिन लग जाते हैं — इसी दौरान व्यक्ति बीमार महसूस करता है। परंतु इस दौरान बनी स्मृति कोशिकाएं (Memory Cells) शरीर में वर्षों तक बनी रहती हैं। यदि वही रोगजनक भविष्य में दोबारा हमला करे, तो द्वितीयक अनुक्रिया (Secondary Response) बहुत तेज़ व शक्तिशाली होती है, जिससे रोगजनक को लक्षण दिखने से पहले ही निष्क्रिय कर दिया जाता है — इसी सिद्धांत पर टीकाकरण कार्य करता है (विषय 13 में विस्तार से)।
जिन व्यक्तियों को बचपन में चेचक (Chickenpox) हो चुकी होती है, वे सामान्यतः जीवन-भर दोबारा उससे संक्रमित नहीं होते — इसका कारण है शरीर में बनी स्मृति B व T कोशिकाएं, जो उस विशेष वायरस को पहचानकर तुरंत तेज़ द्वितीयक अनुक्रिया देने के लिए तैयार रहती हैं।
◆ उपार्जित प्रतिरक्षा (Acquired Immunity) ◆ लिम्फोसाइट ◆ B-कोशिका ◆ T-कोशिका ◆ सहायक T-कोशिका (Helper T Cell) ◆ स्मृति कोशिका (Memory Cell) ◆ प्राथमिक व द्वितीयक अनुक्रिया
एंटीबॉडी (Antibody), जिसे इम्युनोग्लोबुलिन (Immunoglobulin - Ig) भी कहते हैं, एक विशेष प्रकार का प्रोटीन है जिसे प्लाज़्मा कोशिकाएं (B-कोशिकाओं से बनी) रोगजनकों के विरुद्ध प्रतिक्रिया में बनाती हैं। इसे अक्सर 'ताला-चाबी' (Lock-and-Key) सिद्धांत से समझाया जाता है — हर एंटीबॉडी की संरचना किसी विशेष रोगजनक की सतह पर मौजूद प्रतिजन (Antigen) के अनुरूप बिल्कुल सटीक ढंग से फिट होती है।
एक विशिष्ट एंटीबॉडी अंग्रेज़ी अक्षर 'Y' के आकार की होती है, जो चार पॉलिपेप्टाइड श्रृंखलाओं से बनी होती है — दो भारी श्रृंखला (Heavy Chain) व दो हल्की श्रृंखला (Light Chain), जो आपस में डाइसल्फाइड बंध (Disulfide Bonds) से जुड़ी रहती हैं। इसके दो मुख्य भाग होते हैं — Fab क्षेत्र (Fragment antigen-binding), जो 'Y' के दोनों ऊपरी सिरों पर स्थित होता है व सीधे प्रतिजन से जुड़ता है; तथा Fc क्षेत्र (Fragment crystallizable), जो 'Y' का तना है व अन्य प्रतिरक्षा कोशिकाओं को संकेत भेजने का कार्य करता है।
🖼️ एंटीबॉडी की मूल संरचना — भारी व हल्की श्रृंखलाएं, Fab व Fc क्षेत्र

| प्रकार | प्रमुख विशेषता |
|---|---|
| IgG | रक्त में सर्वाधिक प्रचुर (लगभग 75-80%), गर्भ में प्लेसेंटा पार कर भ्रूण को सुरक्षा देता है, द्वितीयक अनुक्रिया में प्रमुख |
| IgM | संक्रमण के बाद सबसे पहले बनने वाला एंटीबॉडी, प्राथमिक अनुक्रिया का संकेतक |
| IgA | श्लेष्मा स्राव (लार, आंसू, मां के दूध) में पाया जाता है, शिशु को मां के दूध से प्राकृतिक प्रतिरक्षा देता है |
| IgE | एलर्जी व परजीवी संक्रमण में सक्रिय होता है |
| IgD | B-कोशिका की सतह पर पाया जाता है, B-कोशिका सक्रियण में भूमिका |
नवजात शिशु का प्रतिरक्षा तंत्र जन्म के समय अपरिपक्व होता है। मां के पहले दूध, कोलोस्ट्रम (Colostrum), में IgA एंटीबॉडी की भारी मात्रा होती है, जो शिशु को जीवन के पहले महीनों में संक्रमणों से बचाती है — इसीलिए जन्म के तुरंत बाद स्तनपान अत्यंत आवश्यक माना जाता है।
◆ एंटीबॉडी (Antibody) ◆ इम्युनोग्लोबुलिन (Immunoglobulin) ◆ प्रतिजन (Antigen) ◆ Fab व Fc क्षेत्र ◆ IgG, IgM, IgA, IgE, IgD
टीकाकरण का मूल सिद्धांत बहुत सरल है — शरीर को असली रोगजनक से बीमार किए बिना ही उसकी 'पहचान' करवा देना, ताकि स्मृति कोशिकाएं पहले से तैयार हो जाएं। इतिहास में सबसे पहला टीका 1796 में एडवर्ड जेनर (Edward Jenner) ने चेचक (Smallpox) के विरुद्ध बनाया था, जब उन्होंने देखा कि गोपालक जिन्हें काउपॉक्स (Cowpox) हो चुका था, वे चेचक से सुरक्षित रहते थे।
भारत सरकार का UIP विश्व के सबसे बड़े टीकाकरण कार्यक्रमों में से एक है, जो प्रतिवर्ष करोड़ों बच्चों व गर्भवती महिलाओं को निःशुल्क टीके उपलब्ध कराता है — जिसमें BCG, पोलियो (OPV/IPV), DPT (डिप्थीरिया-काली खांसी-टिटनेस), खसरा-रूबेला (MR), हेपेटाइटिस B, रोटावायरस व न्यूमोकोकल टीके शामिल हैं। मिशन इंद्रधनुष (Mission Indradhanush) जैसे विशेष अभियान उन बच्चों तक टीके पहुंचाने पर केंद्रित हैं जो नियमित टीकाकरण से छूट गए हों।
जब किसी समुदाय की पर्याप्त बड़ी आबादी (सामान्यतः 70-95%, रोग की संक्रामकता के अनुसार) किसी रोग के विरुद्ध टीकाकृत हो जाती है, तो रोगजनक के फैलने की श्रृंखला टूट जाती है, जिससे वे लोग भी अप्रत्यक्ष रूप से सुरक्षित हो जाते हैं जो किसी कारणवश टीका नहीं लगवा सकते (जैसे नवजात शिशु या गंभीर रूप से बीमार व्यक्ति) — इसे झुंड प्रतिरक्षा कहते हैं।
◆ टीकाकरण (Vaccination) ◆ एडवर्ड जेनर ◆ निष्क्रिय टीका ◆ क्षीणित जीवित टीका ◆ mRNA टीका ◆ UIP ◆ झुंड प्रतिरक्षा (Herd Immunity)
प्रतिरक्षा तंत्र शरीर की रक्षा करता है, पर कभी-कभी यह स्वयं ही समस्या का कारण बन जाता है — या तो अति-सक्रिय होकर, या कमज़ोर पड़कर, या फिर भ्रमित होकर अपने ही शरीर पर हमला करके।
जब प्रतिरक्षा तंत्र किसी सामान्यतः हानिरहित पदार्थ (जैसे पराग कण, धूल, कुछ खाद्य पदार्थ) को खतरा समझकर अति-प्रतिक्रिया करता है, तो इसे एलर्जी कहते हैं। इसमें IgE एंटीबॉडी प्रमुख भूमिका निभाती है, जो मास्ट कोशिकाओं (Mast Cells) से हिस्टामिन (Histamine) रसायन निकलवाती है, जिससे छींक, खुजली, सूजन जैसे लक्षण होते हैं।
जब प्रतिरक्षा तंत्र भ्रमवश शरीर की अपनी स्वस्थ कोशिकाओं को ही 'बाहरी शत्रु' समझकर उन पर हमला कर देता है, तो इसे स्वप्रतिरक्षी रोग कहते हैं। उदाहरण के लिए टाइप-1 मधुमेह (शरीर स्वयं इंसुलिन बनाने वाली अग्न्याशय कोशिकाओं को नष्ट करता है), रुमेटॉइड अर्थराइटिस (जोड़ों पर हमला) व सोरायसिस (त्वचा पर हमला)।
जब प्रतिरक्षा तंत्र सामान्य से कमज़ोर हो जाता है, जिससे व्यक्ति बार-बार व गंभीर संक्रमणों का शिकार होता है, तो इसे इम्यूनोडेफिशियेंसी कहते हैं। यह जन्मजात (Primary, आनुवंशिक कारणों से) या उपार्जित (Secondary) हो सकती है। HIV/AIDS इसका एक प्रमुख उदाहरण है, जिसमें ह्यूमन इम्युनोडेफिशियेंसी वायरस सीधे सहायक T-कोशिकाओं (CD4+ Cells) पर हमला करके प्रतिरक्षा तंत्र को धीरे-धीरे नष्ट करता है, जिससे शरीर सामान्य संक्रमणों से भी लड़ने में असमर्थ हो जाता है।
किसी भी असामान्य प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया (गंभीर एलर्जी/एनाफाइलेक्सिस, बार-बार संक्रमण, अस्पष्ट सूजन-दर्द) की स्थिति में तुरंत योग्य चिकित्सक से परामर्श लेना चाहिए — स्व-निदान या घरेलू उपचार पर निर्भर नहीं रहना चाहिए।
प्रतिरक्षा तंत्र का आदर्श कार्य 'न बहुत कम, न बहुत ज़्यादा' है — बहुत कमज़ोर होने पर संक्रमण हावी होते हैं, जबकि बहुत अधिक सक्रिय होने पर एलर्जी व स्वप्रतिरक्षी रोग होते हैं। संतुलित आहार, पर्याप्त नींद, नियमित व्यायाम व तनाव-प्रबंधन प्रतिरक्षा तंत्र को स्वस्थ संतुलन में बनाए रखने के प्राकृतिक उपाय हैं — जो इस अध्याय के पोषण संबंधी विषयों (1 से 9) से सीधे जुड़ते हैं।
◆ एलर्जी (Allergy) ◆ हिस्टामिन (Histamine) ◆ स्वप्रतिरक्षी रोग (Autoimmune Disease) ◆ इम्यूनोडेफिशियेंसी ◆ HIV/AIDS ◆ CD4+ कोशिका
• संतुलित आहार में कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, वसा (वृहत् पोषक तत्व) तथा विटामिन व खनिज (सूक्ष्म पोषक तत्व) सही अनुपात में आवश्यक हैं — जल व फाइबर भी अनिवार्य हैं। • कार्बोहाइड्रेट मुख्य ऊर्जा स्रोत है (मोनो-, डाइ-, पॉलिसैकेराइड); प्रोटीन शरीर की निर्माण-सामग्री है — इसकी गंभीर कमी से क्वाशियोरकोर व मैरास्मस जैसी प्रोटीन-ऊर्जा कुपोषण की स्थितियां होती हैं। • वसा संकेंद्रित ऊर्जा-स्रोत है — असंतृप्त वसा (ओमेगा-3) हितकर है जबकि ट्रांस वसा सबसे हानिकारक मानी जाती है। • वसा-घुलनशील विटामिन (A, D, E, K) शरीर में संचित होते हैं; जल-घुलनशील विटामिन (B-समूह, C) प्रतिदिन आहार से लेने आवश्यक हैं — प्रत्येक की कमी से विशिष्ट रोग (रतौंधी, रिकेट्स, स्कर्वी आदि) होते हैं। • खनिज तत्व (कैल्शियम, लौह, आयोडीन, जिंक) हड्डी, रक्त, थायरॉइड व प्रतिरक्षा से जुड़े कार्यों में भूमिका निभाते हैं — भारत में एनीमिया सबसे व्यापक पोषण चुनौती है। • भारत व राजस्थान की पोषण योजनाएं (ICDS, POSHAN अभियान, मुख्यमंत्री सुपोषण न्यूट्री किट, श्री अन्नपूर्णा रसोई, पन्नाधाय बाल गोपाल) कुपोषण की दोहरी चुनौती से निपटने हेतु सक्रिय हैं। • प्रतिरक्षा तंत्र में जन्मजात प्रतिरक्षा (अविशिष्ट, तुरंत सक्रिय) व उपार्जित प्रतिरक्षा (विशिष्ट, स्मृति-आधारित — B-कोशिका व T-कोशिका) मिलकर शरीर की रक्षा करते हैं। • एंटीबॉडी (इम्युनोग्लोबुलिन — IgG, IgM, IgA, IgE, IgD) प्रतिजनों को निष्क्रिय करते हैं; टीकाकरण इसी स्मृति-सिद्धांत पर आधारित है, जिसमें भारत का UIP विश्व के सबसे बड़े कार्यक्रमों में शामिल है। • एलर्जी, स्वप्रतिरक्षी रोग व इम्यूनोडेफिशियेंसी (जैसे HIV/AIDS) प्रतिरक्षा तंत्र के असंतुलन के उदाहरण हैं — संतुलित आहार व स्वस्थ जीवनशैली प्रतिरक्षा को मज़बूत रखने की कुंजी है।