🧠 अध्याय 6/15 — जीव विज्ञान

मानव क्रिया विज्ञान भाग-2

जनन तंत्र एवं तंत्रिका तंत्र — Reproduction and Nervous System
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📋 इस अध्याय में
  1. मानव जनन तंत्र का परिचय — यौवनारंभ एवं लिंग हार्मोन
  2. पुरुष जनन तंत्र — प्राथमिक व द्वितीयक अंगों की संरचना
  3. स्त्री जनन तंत्र — प्राथमिक व द्वितीयक अंगों की संरचना
  4. मासिक चक्र (Menstrual Cycle) एवं अंडाशयी कोशिकाएं
  5. युग्मकजनन, निषेचन, भ्रूण रोपण एवं प्रसव
  6. तंत्रिका तंत्र का परिचय एवं वर्गीकरण
  7. न्यूरॉन — संरचना, प्रकार एवं सिनैप्स
  8. तंत्रिका आवेग संचरण — ध्रुवीकरण से साल्टेटरी संचरण तक
  9. मस्तिष्क भाग-1 — अग्रमस्तिष्क एवं मध्यमस्तिष्क
  10. मस्तिष्क भाग-2 — पश्चमस्तिष्क एवं मेरुरज्जु
  11. परिधीय तथा स्वायत्त तंत्रिका तंत्र — अनुकंपी बनाम परानुकंपी
  12. प्रतिवर्ती क्रिया (Reflex Action) एवं तंत्रिका तंत्र के विकार
📖 🌟 क्या आप जानते हैं?
हर मनुष्य के जीवन की शुरुआत एक अकेली, सूक्ष्म कोशिका से होती है — इतनी छोटी कि नंगी आंखों से दिखाई तक नहीं देती। फिर भी उसी एक कोशिका में इतनी जानकारी छिपी होती है कि नौ महीने में वह करोड़ों कोशिकाओं वाला, धड़कते दिल और सोचते दिमाग वाला एक पूरा इंसान बन जाती है — यह चमत्कार संभव बनाता है मानव जनन तंत्र (Reproductive System)। और जब वह बच्चा जन्म लेता है, उसी क्षण से एक दूसरा अदृश्य तंत्र संभाल लेता है कमान — जो पलक झपकते ही आंख बंद करा देता है, कांटा चुभते ही हाथ खींच लेता है, और बिना बताए दिल की धड़कन व सांस को चलाए रखता है — यह है तंत्रिका तंत्र (Nervous System), शरीर का सबसे तेज़ और सबसे जटिल संचार जाल। दिलचस्प बात यह है कि ये दोनों तंत्र एक-दूसरे से गहरे जुड़े हैं — क्योंकि जनन तंत्र की हर बड़ी घटना, यौवनारंभ से लेकर गर्भावस्था तक, हार्मोन व मस्तिष्क के इशारों पर ही चलती है। आइए, जीवन बनाने वाले और उसे नियंत्रित करने वाले — इन दोनों अद्भुत तंत्रों को विस्तार से समझते हैं।

1 मानव जनन तंत्र का परिचय — यौवनारंभ एवं लिंग हार्मोन

जनन (Reproduction) वह प्रक्रिया है जिसमें जीव अपने जैसी संतान उत्पन्न करता है। मनुष्यों में लैंगिक जनन (Sexual Reproduction) पाया जाता है, जो एक द्विलिंगी (Dioecious) व्यवस्था है — अर्थात नर व मादा अलग-अलग व्यक्तियों में पाए जाते हैं। इसमें नर युग्मक (शुक्राणु) एवं मादा युग्मक (अंडाणु) के निषेचन से युग्मनज (Zygote) बनता है, जो आगे चलकर एक नए जीव का निर्माण करता है।

यौवनारंभ (Puberty)

लैंगिक जनन हेतु उत्तरदायी जनन कोशिकाओं का विकास एक विशेष अवधि में होता है, जिसे यौवनारंभ कहा जाता है। इस अवस्था में लैंगिक विकास दृष्टिगोचर होने लगता है तथा जनन परिपक्वता आती है — लड़कियों में सामान्यतः 12-14 वर्ष की आयु में तथा लड़कों में 13-15 वर्ष की आयु में। लैंगिक परिपक्वता लगभग 18-19 वर्ष की उम्र में पूर्ण हो जाती है।

👦 लड़कों में यौवनारंभ के लक्षण👧 लड़कियों में यौवनारंभ के लक्षण
◆ आवाज़ का भारी होना ◆ दाढ़ी-मूंछ आना ◆ कांख व जननांग क्षेत्र में बालों का आना ◆ त्वचा का तैलीय होना◆ स्तनों का विकास व आकार में वृद्धि ◆ त्वचा का तैलीय होना ◆ जननांग क्षेत्र में बालों का आना ◆ रजोधर्म/मासिक धर्म (Menstruation) का शुरू होना

इन सभी परिवर्तनों के मूल में विभिन्न हार्मोन का स्राव है। मानव नर में टेस्टोस्टेरोन (Testosterone) तथा स्त्रियों में एस्ट्रोजन (Estrogen) व प्रोजेस्टेरोन (Progesterone) प्रमुख लिंग हार्मोन हैं। इस अवधि में मनुष्यों की संवेदनाओं तथा उनके बौद्धिक व मानसिक स्तर में भी उल्लेखनीय परिवर्तन आता है।

📌 महत्वपूर्ण — 💡 एक कोशिका से पूरा इंसान

याद रखें — हर मनुष्य के जीवन की शुरुआत एक अकेली सूक्ष्म कोशिका (युग्मनज) से होती है। यौवनारंभ के बाद शरीर में विकसित होने वाली जनन कोशिकाएं (शुक्राणु व अंडाणु) ही भविष्य में यह चमत्कार दोहराने में सक्षम बनती हैं — एक नई पीढ़ी को जन्म देने में।

📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)

◆ लैंगिक जनन ◆ द्विलिंगी (Dioecious) ◆ युग्मनज (Zygote) ◆ यौवनारंभ (Puberty) ◆ टेस्टोस्टेरोन ◆ एस्ट्रोजन व प्रोजेस्टेरोन

2 पुरुष जनन तंत्र — प्राथमिक व द्वितीयक अंगों की संरचना

📌 महत्वपूर्ण

🖼️ पुरुष जनन तंत्र — वृषण से मूत्रमार्ग तक की संरचना

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नर जनन अंगों को मुख्य रूप से दो भागों में विभेदित किया जाता है — प्राथमिक तथा द्वितीयक लैंगिक अंग।

प्राथमिक लैंगिक अंग (Primary Reproductive Organs)

वे अंग जो जनन कोशिकाओं या युग्मकों (शुक्राणु) का निर्माण करते हैं, प्राथमिक अंग कहलाते हैं — इन्हें जनद (Gonads) कहा जाता है।

वृषण (Testis) — मानव में एक जोड़ी वृषण पाए जाते हैं, जो उदरगुहा के बाहर वृषण कोष (Scrotum) में स्थित होते हैं। वृषण के दो प्रमुख कार्य हैं — लेडिग कोशिकाएं (Leydig Cells) टेस्टोस्टेरोन का स्राव करती हैं, तथा शुक्राणुजनी कोशिकाएं (Spermatogenic Cells) शुक्राणु बनाती हैं; सर्टोली कोशिकाएं (Sertoli Cells) शुक्राणुओं को सुरक्षा, सहारा व पोषण प्रदान करती हैं।

द्वितीयक लैंगिक अंग (Secondary Reproductive Organs)

वृषण के अलावा जो भी अंग जनन तंत्र में सहायता करते हैं, उन्हें द्वितीयक लैंगिक अंग कहा जाता है — इनका मुख्य कार्य शुक्राणुओं का परिवहन, पोषण व परिपक्वता सुनिश्चित करना है।

सहायक जनन ग्रंथिस्राववीर्य में योगदान
शुक्राशय (Seminal Vesicles)फ्रक्टोज़-युक्त गाढ़ा तरललगभग 60%
प्रोस्टेट ग्रंथि (Prostate)दूधिया, क्षारीय तरललगभग 30%
काउपर ग्रंथि (Cowper's Gland)मूत्र मार्ग को चिकना बनाने वाला स्रावअल्प मात्रा
📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)

◆ वृषण (Testis) ◆ लेडिग कोशिकाएं ◆ सर्टोली कोशिकाएं ◆ शुक्राशय ◆ प्रोस्टेट ग्रंथि ◆ वीर्य (Semen)

3 स्त्री जनन तंत्र — प्राथमिक व द्वितीयक अंगों की संरचना

📌 महत्वपूर्ण

🖼️ स्त्री जनन तंत्र — अंडाशय से योनि तक की संरचना

जीव विज्ञान चित्र

प्राथमिक जनन अंग (Primary Reproductive Organs)

मादाओं में प्राथमिक लैंगिक अंग के रूप में एक जोड़ी अंडाशय (Ovaries) पाए जाते हैं। अंडाशय के दो प्रमुख कार्य हैं — अंडाणु निर्माण (मादा जनन कोशिकाओं का निर्माण) तथा हार्मोन स्राव (एक अंतःस्रावी ग्रंथि के रूप में एस्ट्रोजन व प्रोजेस्टेरोन का निर्माण)। अंडाशय उदरगुहा में वृक्कों के नीचे श्रोणि भाग में गर्भाशय के दोनों ओर स्थित होते हैं। प्रत्येक अंडाशय में असंख्य अंडाशयी पुटिकाएं (Ovarian Follicles) पाई जाती हैं, जो अंडाणु निर्माण करती हैं।

द्वितीयक लैंगिक अंग (Secondary Reproductive Organs)

बाह्य जननांग — भग (Vulva) में मॉन्स प्यूबिस, लेबिया मेजोरा, लेबिया माइनोरा, क्लिटोरिस तथा बार्थोलिन ग्रंथियां (क्षारीय स्राव, लैंगिक क्रिया सुगम बनाने वाली) शामिल हैं।

स्तन (Breast)

स्तन ग्रंथियां अंगूर के गुच्छों के समान दुग्ध नलिकाओं से बनी होती हैं, जो नवजात को पोषण देने का कार्य करती हैं। स्तन ग्रंथियों की वृद्धि व कार्यों का नियंत्रण सोमेटोट्रोपिन, प्रोलैक्टिन (Prolactin), एस्ट्रोजन व प्रोजेस्टेरोन हार्मोन द्वारा होता है।

📌 महत्वपूर्ण

अम्लीय योनि — शरीर की प्राकृतिक सुरक्षा-प्रणाली: योनि में मौजूद लैक्टोबैसिलस बैक्टीरिया कोई हानिकारक जीव नहीं, बल्कि शरीर के अपने 'गार्ड' हैं — वे ग्लाइकोजन को लैक्टिक अम्ल में बदलकर योनि को अम्लीय बनाए रखते हैं, जिससे हानिकारक रोगाणु वहां पनप नहीं पाते। यह ठीक वैसे ही है जैसे आमाशय का अम्लीय वातावरण हानिकारक जीवाणुओं को रोकता है।

📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)

◆ अंडाशय (Ovary) ◆ फैलोपियन ट्यूब ◆ फिम्ब्री ◆ गर्भाशय (Uterus) ◆ योनि (Vagina) ◆ लैक्टोबैसिलस

4 मासिक चक्र (Menstrual Cycle) एवं अंडाशयी कोशिकाएं

यौवनारंभ के बाद, स्त्री के शरीर में प्रत्येक माह एक चक्रीय प्रक्रिया होती है, जिसका उद्देश्य संभावित गर्भावस्था के लिए शरीर को तैयार करना है — इसे मासिक चक्र (Menstrual Cycle) कहते हैं। यह सामान्यतः 28 दिनों का चक्र है, जिसे चार चरणों में बांटा जाता है:

चरणअवधिप्रमुख हार्मोन
रजःस्राव (Menstrual Phase)1–5 दिनएस्ट्रोजन में गिरावट
कूपिकीय चरण (Follicular Phase)6–13 दिनएस्ट्रोजन में वृद्धि
अंडोत्सर्जन (Ovulation)लगभग 14वां दिनLH हार्मोन में अचानक वृद्धि (LH Surge)
ल्यूटियल चरण (Luteal Phase)15–28 दिनप्रोजेस्टेरोन

रजःस्राव (Menstruation) में गर्भाशय की भीतरी परत (एंडोमेट्रियम), जो संभावित निषेचित अंडे को स्वीकार करने हेतु मोटी हुई थी, यदि निषेचन न हो तो रक्त व ऊतक के रूप में बाहर निकल जाती है। लगभग 14वें दिन अंडोत्सर्जन होता है — अंडाशय से एक परिपक्व अंडाणु मुक्त होकर फैलोपियन ट्यूब में प्रवेश करता है। यदि इस दौरान निषेचन नहीं होता, तो चक्र पुनः रजःस्राव से शुरू होता है।

अंडाशय की मुख्य कोशिकाएं एवं उनके कार्य

कोशिका का नामस्थानमुख्य कार्य
ओओजेनिक कोशिकाएंकूप (Follicle) के अंदरअंडाणु (Ovum) का निर्माण
ग्रेनुलोसा कोशिकाएंविकसित हो रहे कूप के चारों ओरअंडाणु को पोषण, एस्ट्रोजन हार्मोन निर्माण में सहायता
थीका कोशिकाएंकूप की बाहरी परत मेंएण्ड्रोजन हार्मोन निर्माण (जो आगे एस्ट्रोजन में बदलता है)
कॉर्पस ल्यूटियम कोशिकाएंअंडोत्सर्जन के बाद बने भाग मेंप्रोजेस्टेरोन स्राव — गर्भाधारण बनाए रखने में सहायक
📌 महत्वपूर्ण — 💡 शरीर की महीने भर की तैयारी

मासिक चक्र को एक महीने भर चलने वाली 'तैयारी प्रक्रिया' की तरह समझा जा सकता है — शरीर हर महीने संभावित गर्भावस्था के लिए गर्भाशय को तैयार करता है, और यदि निषेचन न हो, तो वह तैयारी पुनः शुरू करने के लिए खुद को रीसेट कर लेता है। यह चक्र सामान्यतः रजोदर्शन (पहला मासिक धर्म, लगभग 12-14 वर्ष की आयु में) से रजोनिवृत्ति (Menopause, सामान्यतः 45-50 वर्ष की आयु के आसपास) तक चलता रहता है।

📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)

◆ मासिक चक्र ◆ रजःस्राव ◆ अंडोत्सर्जन (Ovulation) ◆ कॉर्पस ल्यूटियम ◆ रजोदर्शन ◆ रजोनिवृत्ति

5 युग्मकजनन, निषेचन, भ्रूण रोपण एवं प्रसव

मनुष्य में प्रजनन की प्रक्रिया मुख्य रूप से निम्नलिखित अवस्थाओं में संपन्न होती है:

(a) युग्मकजनन (Gametogenesis)

वृषण तथा अंडाशय में अगुणित युग्मकों (Haploid Gametes) के निर्माण की विधि को युग्मकजनन कहा जाता है — नर के वृषण में शुक्राणुओं के निर्माण की क्रिया शुक्रजनन (Spermatogenesis) तथा मादा के अंडाशय में अंडाणु के निर्माण की क्रिया अंडजनन (Oogenesis) कहलाती है।

(b) निषेचन (Fertilization)

मैथुन के दौरान नर द्वारा छोड़े गए शुक्राणु जब मादा के अंडाणु के संपर्क में आते हैं, तो उनके संयुग्मन (Fusion) से युग्मनज (Zygote) का निर्माण होता है — यह प्रक्रिया निषेचन कहलाती है, जो सामान्यतः फैलोपियन ट्यूब में संपन्न होती है।

(c) विदलन तथा भ्रूण का रोपण (Cleavage and Embryo Implantation)

निषेचन के पश्चात युग्मनज में समसूत्री विभाजन (Mitosis) शुरू होता है, जिसे विदलन कहते हैं। इससे एक बहुकोशिकीय संरचना बनती है जिसे कोरक (Blastula/Blastocyst) कहा जाता है। तत्पश्चात यह कोरक गर्भाशय के अंतःस्तर (Endometrium) में जाकर स्थापित हो जाता है — इस प्रक्रिया को भ्रूण का रोपण कहते हैं।

(d) प्रसव (Parturition/Delivery)

रोपण के पश्चात भ्रूण विभिन्न विकासशील अवस्थाओं (जैसे गैस्ट्रुलेशन) से गुजरता है। गर्भस्थ शिशु का पूर्ण विकास (लगभग 9 माह) होने पर शिशु का जन्म होता है — शिशु जन्म की इस प्रक्रिया को प्रसव कहा जाता है।

📌 महत्वपूर्ण

📐 प्रजनन की चार अवस्थाएं — क्रम — सूत्र/प्रक्रिया: युग्मकजनन (शुक्राणु + अंडाणु निर्माण) → निषेचन (Fertilization) — युग्मनज निर्माण → विदलन व भ्रूण रोपण (Cleavage & Implantation) — कोरक/ब्लास्टोसिस्ट → प्रसव (Parturition) — लगभग 9 माह बाद

📌 महत्वपूर्ण

💡 एक कोशिका से करोड़ों कोशिकाओं तक की यात्रा: युग्मनज एक अकेली कोशिका है, फिर भी विदलन (Cleavage) के दौरान यह बार-बार समसूत्री विभाजन कर 9 महीने में करोड़ों विशिष्ट कोशिकाओं (त्वचा, हड्डी, मस्तिष्क, हृदय आदि) में बदल जाती है — यह जीव विज्ञान की सबसे अद्भुत प्रक्रियाओं में से एक है, जहां एक जैसी दिखने वाली कोशिकाएं समय के साथ बिल्कुल अलग-अलग काम करने वाले ऊतकों में विकसित हो जाती हैं।

📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)

◆ युग्मकजनन ◆ शुक्रजनन ◆ अंडजनन ◆ निषेचन ◆ विदलन (Cleavage) ◆ भ्रूण रोपण ◆ प्रसव

6 तंत्रिका तंत्र का परिचय एवं वर्गीकरण

मनुष्य के विभिन्न अंग आपस में एक-दूसरे के सहयोग तथा समन्वय के साथ कार्य करते हैं। अंगों के मध्य इस सामंजस्य को स्थापित करने हेतु शरीर में दो मुख्य तंत्र कार्य करते हैं — तंत्रिका तंत्र (Nervous System) तथा अंतःस्रावी तंत्र (Endocrine System)। चूंकि तंत्रिका तंत्र सभी कोशिकाओं के कार्यों का सीधा नियंत्रण नहीं कर सकता, इसलिए अंतःस्रावी तंत्र की नलिकाविहीन ग्रंथियां (Ductless Glands) हार्मोन स्रावित कर संदेशवाहक का कार्य करती हैं।

तंत्रिका तंत्र के कार्य

मानव तंत्रिका तंत्र का वर्गीकरण

मानव तंत्रिका तंत्र को मुख्य रूप से दो भागों में विभाजित किया गया है:

मूल शब्दावली: उद्दीपन (Stimulus) — बाह्य या आंतरिक वातावरण में अचानक परिवर्तन; आवेग (Impulse) — तंत्रिका कोशिका में चलने वाली विद्युत विक्षोभ की तरंग; अनुक्रिया (Response) — उद्दीपन के कारण जीव की क्रिया में परिवर्तन; ग्राही (Receptors) — उद्दीपन प्राप्त कर CNS की ओर संकेत भेजने वाली कोशिकाएं; प्रभावक (Effectors) — पेशियां या ग्रंथियां जो आवेग पाकर संकुचन या स्राव करती हैं।

📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)

◆ केंद्रीय तंत्रिका तंत्र (CNS) ◆ परिधीय तंत्रिका तंत्र (PNS) ◆ उद्दीपन ◆ आवेग (Impulse) ◆ ग्राही व प्रभावक ◆ अंतःस्रावी तंत्र

7 न्यूरॉन — संरचना, प्रकार एवं सिनैप्स

📌 महत्वपूर्ण

🖼️ न्यूरॉन की संरचना — कोशिका काय, डेंड्राइट, एक्सॉन एवं माइलिन आच्छद

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न्यूरॉन (Neuron) तंत्रिका तंत्र की संरचनात्मक एवं क्रियात्मक इकाई है। तंत्रिका ऊतक में दो प्रकार की कोशिकाएं होती हैं — न्यूरॉन (सूचना संचरण करने वाली) तथा न्यूरोग्लिया कोशिकाएं (सहायक कोशिकाएं)।

न्यूरॉन की संरचना

सिनैप्स (Synapse)

एक तंत्रिका कोशिका और दूसरी तंत्रिका कोशिका के बीच, या तंत्रिका कोशिका और पेशी के बीच संचार का बिंदु सिनैप्स कहलाता है। डेंड्राइट से एक्सॉन तक आवेग पहुंचते-पहुंचते जब सिनैप्टिक स्थल पर पहुंचता है, तो वहां एसिटाइलकोलीन (Acetylcholine) का स्रावण होता है — यह एक न्यूरोट्रांसमीटर (रासायनिक संदेशवाहक) का काम करता है, जो आवेग को अगले न्यूरॉन तक पहुंचाता है।

न्यूरॉन के प्रकार (संरचना के आधार पर)

📌 महत्वपूर्ण — 💡 200 दोस्तों वाला न्यूरॉन

एक न्यूरॉन के 200 तक डेंड्राइट्स हो सकते हैं, यानी एक ही तंत्रिका कोशिका 200 अलग-अलग स्रोतों से एक साथ 'सुन' सकती है। यही कारण है कि मस्तिष्क में अरबों न्यूरॉन्स मिलकर इतना जटिल व शक्तिशाली सूचना-नेटवर्क बना पाते हैं — किसी भी आधुनिक कंप्यूटर नेटवर्क से भी अधिक जटिल!

📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)

◆ साइटोन/सोमा ◆ निस्सल कण ◆ डेंड्राइट्स ◆ एक्सॉन ◆ माइलिन आच्छद ◆ सिनैप्स ◆ एसिटाइलकोलीन

8 तंत्रिका आवेग संचरण — ध्रुवीकरण से साल्टेटरी संचरण तक

तंत्रिका आवेग का न्यूरॉन्स में संवहन एक विद्युत-रासायनिक घटना है — आवेग तंतुओं में विद्युत-रासायनिक तरंगों के रूप में संचारित होता है। यह केवल तार में इलेक्ट्रॉन के प्रवाह जैसा नहीं, बल्कि विध्रुवण की एक स्व-प्रसारित तरंग (Self-Propagating Wave) है।

विश्रांति काल (Resting Potential)

तंत्रिका ध्रुवित अवस्था (Polarized State) में होती है — बाहरी सतह पर Na+ की अधिकता के कारण अक्षतंतु (Axon) बाहर से धनावेशित व भीतर से ऋणावेशित रहता है। यह अवस्था सोडियम-पोटैशियम पंप (Sodium-Potassium Pump) द्वारा बनी रहती है, जो सक्रिय अभिगमन (Active Transport) द्वारा ATP ऊर्जा खर्च कर लगातार Na+ आयनों को बाहर धकेलता रहता है — एक बैटरी को लगातार चार्ज करते रहने जैसा तंत्र।

विध्रुवित अवस्था (Depolarization) — Action Potential

जब उद्दीपन आता है, उस स्थान पर झिल्ली Na+ के लिए अधिक पारगम्य हो जाती है। Na+ का अंतःप्रवाह K+ के बहिःप्रवाह से अधिक हो जाता है, जिससे न्यूरॉन बाहर की ओर ऋणावेशित व अंदर धनावेशित हो जाता है — इस दौरान उत्पन्न विभव को सक्रिय विभव (Action Potential) कहते हैं। यह विभव अन्य भागों के लिए उद्दीपन का कार्य करता है, जिससे तरंग आगे बढ़ती जाती है।

पुनर्ध्रुवण (Repolarization)

जैसे ही विध्रुवण तरंग न्यूरॉन पर आगे की तरफ बढ़ती है, पिछले भागों में उद्दीपन का प्रभाव समाप्त होकर न्यूरॉन पुनः विश्रांति अवस्था में लौट आता है — इस क्रिया में K+ बाहर आते हैं तथा Na+ पुनः बाहर भेजे जाते हैं, इसे पुनर्ध्रुवण कहते हैं।

📌 महत्वपूर्ण

📐 तंत्रिका आवेग संचरण का क्रम — सूत्र/प्रक्रिया: ध्रुवीकरण (Polarization) → विध्रुवीकरण (Depolarization) → पुनर्ध्रुवीकरण (Repolarization)

सामान्य परिस्थिति में तंत्रिकीय आवेग का संचरण लगभग 45 मीटर/सेकंड की गति से होता है; माइलिन आच्छद युक्त तंतुओं में यह गति बहुत तेज़ हो जाती है, क्योंकि आवेग एक पर्वसंधि (Node of Ranvier) से दूसरी पर्वसंधि पर 'छलांग लगाते हुए' संचरित होता है — इसे साल्टेटरी संचरण (Saltatory Conduction) कहते हैं।

🔍 दिलचस्प तथ्य — 💡 सोडियम पंप — शरीर का सतत चालू पंप

हर पल, बिना रुके, सोडियम-पोटैशियम पंप ATP ऊर्जा खर्च करके Na+ आयनों को बाहर धकेलता रहता है ताकि तंत्रिका तंतु अगले सिग्नल के लिए तैयार रहे — यह ठीक वैसे ही है जैसे कोई बैटरी बिना रुके लगातार चार्ज होती रहे। साल्टेटरी संचरण भी उतना ही दिलचस्प है — आवेग तार में सीधे बहने के बजाय पर्वसंधि से पर्वसंधि तक 'छलांग' लगाता है, जिससे संचरण की गति कई गुना बढ़ जाती है।

📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)

◆ विश्रांति काल ◆ सोडियम-पोटैशियम पंप ◆ विध्रुवण ◆ पुनर्ध्रुवण ◆ साल्टेटरी संचरण ◆ रैनवियर की पर्वसंधि

9 मस्तिष्क भाग-1 — अग्रमस्तिष्क एवं मध्यमस्तिष्क

📌 महत्वपूर्ण

🖼️ मानव मस्तिष्क की अनुलंब काट — अग्रमस्तिष्क, मध्यमस्तिष्क एवं पश्चमस्तिष्क

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मस्तिष्क (Brain) कपाल (Cranium) में स्थित एक अत्यंत नाजुक अंग है, जो तीन आवरणों (Meninges) से सुरक्षित रहता है — बाहरी सख्त ड्यूरामेटर (Duramater), मध्य पतली जालीदार अरैक्नॉइड (Arachnoid), तथा सबसे भीतरी रक्तवाहिनी-युक्त पायामेटर (Piamater)। इन झिल्लियों के बीच मस्तिष्क-मेरु द्रव (Cerebrospinal Fluid — CSF) भरा रहता है, जो मस्तिष्क को झटकों से सुरक्षा देता है। मस्तिष्क के तीन मुख्य भाग हैं — अग्रमस्तिष्क, मध्यमस्तिष्क तथा पश्चमस्तिष्क।

अग्रमस्तिष्क (Forebrain)

(i) प्रमस्तिष्क/सेरेब्रम (Cerebrum)

मस्तिष्क का सबसे बड़ा भाग, दो सेरेब्रल गोलार्धों (Cerebral Hemispheres) में बंटा होता है। प्रत्येक गोलार्ध चार पालियों (Lobes) में विभक्त है — अग्र-ललाट पालि (Frontal Lobe), पैराइटल लोब, टेम्पोरल लोब तथा ऑक्सिपिटल लोब। सेरेब्रम का बाहरी भाग ग्रे मैटर (सेरेब्रल कॉर्टेक्स) तथा आंतरिक भाग श्वेत द्रव्य (सेरेब्रल मेड्युला) से बना है।

कार्य: संवेदन कार्य (दृष्टि — ऑक्सिपिटल लोब में, श्रवण — टेम्पोरल लोब में, स्पर्श-ताप-दर्द — पैराइटल लोब में), प्रेरक कार्य (फ्रंटल लोब के केंद्रीय विदर के पास स्थित प्रेरक केंद्र सभी ऐच्छिक पेशियों की गति नियमित करता है), तथा समन्वय कार्य (बुद्धिमत्ता, स्मरण शक्ति, चेतना, तर्क शक्ति व वाणी जैसे उच्च मानसिक कार्यों के केंद्र यहीं स्थित हैं)।

📌 महत्वपूर्ण

क्रॉस्ड कंट्रोल — मस्तिष्क का उल्टा नियंत्रण: मस्तिष्क का बायां गोलार्ध शरीर के दाएं हिस्से को नियंत्रित करता है, और दायां गोलार्ध बाएं हिस्से को — यह 'उल्टा नियंत्रण' (Crossed Control) छात्रों को हमेशा आश्चर्यचकित करता है। दोनों गोलार्ध कॉर्पस कैलोसम (Corpus Callosum) नामक तंत्रिका तंतुओं की चादर द्वारा आपस में जुड़े रहते हैं।

(ii) डाइएनसेफेलॉन (Diencephalon)

इसके तीन भाग हैं — एपीथैलेमस (पीनियल ग्रंथि यहीं स्थित है), थैलेमस (दृष्टि, स्वाद, श्रवण, स्पर्श, ताप, दाब जैसी संवेदी सूचनाओं का प्रसारण व व्याख्या केंद्र), तथा हाइपोथैलेमस (तंत्रिका तंत्र व अंतःस्रावी तंत्र के बीच सेतु; भूख-प्यास-नींद-क्रोध-प्यार जैसी स्वायत्त क्रियाओं का उच्च केंद्र; शरीर के ताप का नियंत्रण; पीयूष ग्रंथि की स्रवण क्रिया को नियंत्रित करता है; वेसोप्रेसिन व ऑक्सिटोसिन का स्रावण भी करता है)।

मध्यमस्तिष्क (Midbrain)

मस्तिष्क का सबसे छोटा भाग, दो भागों में बंटा — प्रमस्तिष्क वृंतक (Cerebral Peduncles) तथा कॉर्पोरा क्वाड्रिजेमिना (पिंड चतुष्टि — दो पिंड दृष्टि-संबंधी प्रतिवर्त हेतु, दो पिंड श्रवण-संबंधी प्रतिवर्त केंद्र की तरह कार्य करते हैं)। यह भाग प्रतिवर्ती क्रियाओं का संचालन-नियमन करता है तथा मस्तिष्क के आने-जाने वाले आवेगों को पथ प्रदान करता है।

📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)

◆ सेरेब्रम ◆ सेरेब्रल कॉर्टेक्स ◆ कॉर्पस कैलोसम ◆ थैलेमस ◆ हाइपोथैलेमस ◆ मध्यमस्तिष्क

10 मस्तिष्क भाग-2 — पश्चमस्तिष्क एवं मेरुरज्जु

पश्चमस्तिष्क (Hindbrain)

भागस्थिति/संरचनामुख्य कार्य
अनुमस्तिष्क (Cerebellum)पश्चमस्तिष्क का प्रमुख भागऐच्छिक पेशियों में समन्वय, चलने-फिरने-लिखने जैसी क्रियाओं को सुगम बनाना, शरीर के संतुलन व सामायावस्था का नियमन
पोन्स (Pons)श्वेत द्रव्य से निर्मित, मस्तिष्क के भागों को जोड़ता हैलार, अश्रु, नेत्र गतिशीलता व चवर्ण क्रिया का मध्यवर्ती नियंत्रक; न्यूमोटैक्सिक केंद्र (श्वसन संवातन नियमन)
मेडुला ऑब्लांगेटामस्तिष्क का सबसे निचला अंतिम भागअनैच्छिक क्रियाएं — श्वसन केंद्र, कार्डियक केंद्र, वेसोमोटर केंद्र; निगलना, वमन, छींकना, खांसना जैसी क्रियाओं का केंद्र

अनुमस्तिष्क (Cerebellum) क्षति की स्थिति में व्यक्ति का संतुलन व समन्वय बिगड़ जाता है — चलना, लिखना व सामान्य गति करना कठिन हो जाता है, यह दर्शाता है कि यह भाग कितना महत्वपूर्ण है। मेडुला ऑब्लांगेटा मस्तिष्क का वह भाग है, जो सीधे जीवन बनाए रखने वाली अनैच्छिक क्रियाओं (श्वसन, हृदय स्पंदन) को नियंत्रित करता है — इसीलिए इस भाग की गंभीर क्षति जानलेवा हो सकती है।

मेरुरज्जु (Spinal Cord)

मेरुरज्जु मेडुला से शुरू होकर लगभग रीढ़ की पूरी लंबाई तक फैला रहता है। यह भी मस्तिष्क की तरह तीन आवरणों में लिपटा रहता है, जिनके बीच CSF भरा रहता है। एक महत्वपूर्ण अंतर यह है कि मेरुरज्जु में ग्रे मैटर व श्वेत द्रव्य की व्यवस्था उलटी होती है — यहां श्वेत द्रव्य बाहर तथा ग्रे मैटर अंदर होता है (जबकि मस्तिष्क में इसका उल्टा है)।

मेरुरज्जु के प्रमुख कार्य: गर्दन से नीचे की प्रतिवर्ती क्रियाएं (Reflexes) संपन्न करना, त्वचा व पेशियों से संवेदी आवेगों को मस्तिष्क तक पहुंचाना, तथा मस्तिष्क से प्रेरक अनुक्रियाओं को धड़ व अंगों तक पहुंचाना।

🔍 दिलचस्प तथ्य — ग्रे मैटर व श्वेत द्रव्य की अदला-बदली

मस्तिष्क में ग्रे मैटर बाहर तथा श्वेत द्रव्य अंदर होता है, जबकि मेरुरज्जु में बिल्कुल उल्टा — यह शरीर की एक दिलचस्प 'मिरर डिज़ाइन' है, जिसे याद रखने के लिए एक सरल ट्रिक बन सकती है: 'मस्तिष्क में बाहर सोच (ग्रे मैटर), मेरुरज्जु में बाहर तार (श्वेत तंतु)'।

📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)

◆ अनुमस्तिष्क (Cerebellum) ◆ पोन्स ◆ मेडुला ऑब्लांगेटा ◆ मेरुरज्जु ◆ ग्रे मैटर व श्वेत द्रव्य

11 परिधीय तथा स्वायत्त तंत्रिका तंत्र

परिधीय तंत्रिका तंत्र (PNS) दो प्रकार की तंत्रिकाओं से मिलकर बना है — संवेदी/अभिवाही तंत्रिकाएं (Sensory Nerves, जो उद्दीपनों को अंगों से CNS तक लाती हैं) तथा प्रेरक/अपवाही तंत्रिकाएं (Motor Nerves, जो CNS से नियामक उद्दीपनों को संबंधित अंगों तक पहुंचाती हैं)। मस्तिष्क से 12 जोड़ी कपालीय तंत्रिकाएं तथा मेरुरज्जु से 31 जोड़ी मेरु तंत्रिकाएं (ग्रीवा 8, वक्षीय 12, कटि 5, त्रिक 5, पुच्छीय 1) निकलती हैं।

कायिक बनाम स्वायत्त तंत्रिका तंत्र

🦵 कायिक तंत्रिका तंत्र (Somatic)❤️ स्वायत्त तंत्रिका तंत्र (Autonomic)
◆ इच्छानुसार होने वाली क्रियाओं को नियंत्रित करता है ◆ उदाहरण — हाथ हिलाना, चलना, लिखना ◆ पूर्णतः ऐच्छिक नियंत्रण में◆ अनैच्छिक कार्यों का संपादन करता है ◆ उदाहरण — हृदय धड़कन, पाचन, श्वसन ◆ दो भाग — अनुकंपी व परानुकंपी

स्वायत्त तंत्रिका तंत्र (ANS) शरीर के आंतरिक वातावरण को अखंड बनाए रखता है तथा शरीर की कठिन क्रियाओं का नियमन करता है। यह दो भागों में बंटा है — अनुकंपी (Sympathetic — कष्ट, क्रोध, भय, तनाव के समय सक्रिय) तथा परानुकंपी (Parasympathetic — सुख, प्रसन्नता, संतुष्टि के समय सक्रिय)।

अनुकंपी बनाम परानुकंपी तंत्र का प्रभाव

अंगअनुकंपी (Sympathetic) प्रभावपरानुकंपी (Parasympathetic) प्रभाव
नेत्र (पुतली)पुतली फैलाता हैपुतली सिकुड़ती है
हृदयहृदय गति बढ़ाता हैहृदय गति घटाता है
फेफड़े/श्वासनलियांश्वासनलियां फैलाता हैश्वासनलियां संकुचित करता है
आहार नालक्रमाकुंचन व स्राव घटाता हैपाचन क्रिया व क्रमाकुंचन बढ़ाता है
लार ग्रंथियांलार स्राव कम करता हैलार स्राव बढ़ाता है
स्वेद ग्रंथियांपसीना बढ़ाता हैपसीना कम करता है
मूत्राशयमूत्राशय शिथिल, मूत्र रोकता हैमूत्राशय संकुचित, मूत्र त्याग कराता है
📌 महत्वपूर्ण

💡 एक्सीलरेटर और ब्रेक — शरीर की इमरजेंसी व्यवस्था: अनुकंपी व परानुकंपी तंत्र को गाड़ी के एक्सीलरेटर व ब्रेक की तरह समझा जा सकता है — अनुकंपी तंत्र शरीर को खतरे या आपातकाल के लिए तैयार करता है (पुतली फैलाना, दिल तेज़ धड़काना, श्वासनली फैलाना), जबकि परानुकंपी तंत्र आपातकाल समाप्त होने पर शरीर को वापस सामान्य, शांत अवस्था में लाता है। यही कारण है कि डर लगने पर दिल तेज़ धड़कता है और शांत होने पर अपने आप सामान्य हो जाता है।

📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)

◆ कपालीय तंत्रिकाएं (12 जोड़ी) ◆ मेरु तंत्रिकाएं (31 जोड़ी) ◆ कायिक तंत्रिका तंत्र ◆ स्वायत्त तंत्रिका तंत्र ◆ अनुकंपी ◆ परानुकंपी

12 प्रतिवर्ती क्रिया (Reflex Action) एवं तंत्रिका तंत्र के विकार

संवेदी अंगों द्वारा ग्रहण उद्दीपनों को संवेदी तंत्रिकाओं द्वारा मेरुरज्जु तक ले जाना तथा तुरंत ही उसका प्रत्युत्तर चालक तंत्रिकाओं द्वारा पेशियों, ऊतकों या अंगों में भेजकर उन्हें उत्तेजित करने की क्रिया को प्रतिवर्ती क्रिया (Reflex Action) कहते हैं। उद्दीपन या बाह्य वातावरण में अचानक परिवर्तन के प्रति जन्मजात या बिना सोचे-समझे होने वाली अनुक्रिया को सरल प्रतिवर्त (Simple Reflex) कहते हैं।

प्रतिवर्त क्रियाओं के उदाहरण

प्रतिवर्त क्रियाओं के प्रकार

📌 महत्वपूर्ण

💡 प्रतिवर्ती क्रिया — सोचने से भी तेज़ प्रतिक्रिया: जब हाथ गर्म वस्तु को छूता है, तो हाथ खींचने का आदेश मस्तिष्क तक जाकर वापस आने का इंतज़ार नहीं करता — यह निर्णय सीधे मेरुरज्जु में ले लिया जाता है, इसीलिए यह इतनी तेज़ होती है। यही कारण है कि हम गर्म चीज़ को छूते ही, सोचने से पहले ही हाथ खींच लेते हैं — यह शरीर की एक बेहतरीन सुरक्षा-व्यवस्था है, जो मस्तिष्क तक सूचना पहुंचने के इंतज़ार में कीमती समय बर्बाद नहीं करती।

तंत्रिका तंत्र के प्रमुख विकार

विकारविवरण
पक्षाघात (Paralysis)तंत्रिका क्षति के कारण किसी अंग की गति व संवेदन क्षमता का समाप्त होना
मिर्गी (Epilepsy)मस्तिष्क में असामान्य विद्युत गतिविधि के कारण दौरे पड़ना
अल्जाइमर रोग (Alzheimer's)स्मृति व संज्ञानात्मक क्षमता का क्रमिक ह्रास, मुख्यतः वृद्धावस्था में
पार्किंसन रोग (Parkinson's)मस्तिष्क में डोपामिन की कमी से कंपन व गति-नियंत्रण में कठिनाई
🔗 सम्बन्ध

तंत्रिका तंत्र व जनन तंत्र का आपसी जुड़ाव: इस अध्याय में हमने देखा कि हाइपोथैलेमस पीयूष ग्रंथि को नियंत्रित करता है, जो आगे टेस्टोस्टेरोन व एस्ट्रोजन जैसे लिंग हार्मोन के स्राव को प्रभावित करती है — यानी यौवनारंभ, मासिक चक्र व प्रजनन जैसी जनन तंत्र की हर बड़ी घटना असल में तंत्रिका तंत्र (मस्तिष्क) के इशारों पर ही नियंत्रित होती है। यही है शरीर के विभिन्न तंत्रों के बीच अद्भुत आपसी समन्वय।

📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)

◆ प्रतिवर्ती क्रिया ◆ अननुबंधित प्रतिवर्त ◆ प्रतिबंधित प्रतिवर्त ◆ पावलोव का प्रयोग ◆ पक्षाघात ◆ अल्जाइमर रोग

📌 महत्वपूर्ण — 📌 अध्याय सारांश (Chapter Summary)

• मानव जनन तंत्र में यौवनारंभ (लड़कियों में 12-14 वर्ष, लड़कों में 13-15 वर्ष) के बाद टेस्टोस्टेरोन तथा एस्ट्रोजन-प्रोजेस्टेरोन हार्मोन के प्रभाव से लैंगिक परिपक्वता आती है। • पुरुष जनन तंत्र में वृषण (शुक्राणु व टेस्टोस्टेरोन निर्माण) प्राथमिक अंग है, जबकि शुक्राशय, प्रोस्टेट ग्रंथि व शिश्न द्वितीयक अंग हैं जो वीर्य निर्माण व परिवहन में सहायक हैं। • स्त्री जनन तंत्र में अंडाशय (अंडाणु व हार्मोन निर्माण) प्राथमिक अंग है; फैलोपियन ट्यूब, गर्भाशय व योनि द्वितीयक अंग हैं; 28-दिवसीय मासिक चक्र चार चरणों (रजःस्राव, कूपिकीय, अंडोत्सर्जन, ल्यूटियल) में संपन्न होता है। • युग्मकजनन (शुक्रजनन/अंडजनन) के बाद निषेचन से युग्मनज बनता है, जो विदलन द्वारा कोरक में बदलकर गर्भाशय में रोपित होता है तथा लगभग 9 माह बाद प्रसव द्वारा शिशु जन्म लेता है। • तंत्रिका तंत्र दो भागों में बंटा है — CNS (मस्तिष्क+मेरुरज्जु) व PNS (कपालीय+मेरु तंत्रिकाएं); न्यूरॉन (कोशिका काय, डेंड्राइट, एक्सॉन, माइलिन आच्छद) तंत्रिका तंत्र की मूल इकाई है, जो विध्रुवण-पुनर्ध्रुवण चक्र व साल्टेटरी संचरण द्वारा आवेग भेजती है। • मस्तिष्क तीन भागों में बंटा है — अग्रमस्तिष्क (सेरेब्रम — सोच-तर्क; थैलेमस-हाइपोथैलेमस), मध्यमस्तिष्क (प्रतिवर्ती नियमन) तथा पश्चमस्तिष्क (अनुमस्तिष्क — संतुलन; मेडुला — श्वसन-हृदय नियंत्रण); मेरुरज्जु में ग्रे-श्वेत द्रव्य की व्यवस्था मस्तिष्क से उलटी होती है। • स्वायत्त तंत्रिका तंत्र अनुकंपी (आपातकाल हेतु सक्रिय) व परानुकंपी (सामान्य अवस्था बहाल करने वाला) में बंटा है; प्रतिवर्ती क्रिया मेरुरज्जु द्वारा तुरंत, बिना मस्तिष्क की प्रतीक्षा किए संपन्न होने वाली सुरक्षा-क्रिया है, जो अननुबंधित (जन्मजात) व प्रतिबंधित (सीखी हुई) दो प्रकार की होती है।

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