जब आप एक निवाला रोटी मुँह में डालते हैं, उसी क्षण से लेकर उससे मिलने वाली ऊर्जा आपकी मांसपेशियों तक पहुँचने तक — एक लंबी, बेहद संगठित यात्रा शुरू हो जाती है। यह यात्रा तय होती है आपकी आहारनाल (Alimentary Canal) में, जो मुख से शुरू होकर मलद्वार तक जाने वाली एक निरंतर, पेशीय एवं दोनों सिरों पर खुली लगभग 8-10 मीटर लंबी नली है — यानी आपकी ऊँचाई से 5-6 गुना लंबी एक सुरंग, जो कुंडलित होकर आपके पेट में समा जाती है! पाचन तंत्र (Digestive System) का काम है भोजन के जटिल पोषक पदार्थों व बड़े अणुओं को विभिन्न रासायनिक क्रियाओं तथा एंजाइमों की सहायता से सरल, छोटे व घुलनशील पदार्थों में बदलना — इसी प्रक्रिया को पाचन (Digestion) कहते हैं।
पाचन तंत्र में दो प्रकार के अंग शामिल होते हैं — पहला, आहारनाल के अंग (मुख, ग्रसनी, ग्रासनली, आमाशय, छोटी आंत, बड़ी आंत, मलद्वार) जिनसे होकर भोजन सीधे गुजरता है; दूसरा, पाचन ग्रंथियाँ (लार ग्रंथि, यकृत, अग्न्याशय) जो नलिकाओं द्वारा आहारनाल में पाचक रस भेजती हैं। पाचन क्रिया मूलतः जलअपघटन (Hydrolysis) द्वारा होती है — जिसमें जल के H+ व OH– आयन जटिल अणुओं (जैसे स्टार्च, प्रोटीन, वसा) से जुड़कर उन्हें सरल अणुओं में तोड़ देते हैं; एंजाइम इस क्रिया में केवल उत्प्रेरक (catalyst) का काम करते हैं, स्वयं नष्ट नहीं होते।
आहारनाल कोई साधारण खोखली नली नहीं, बल्कि एक अत्यंत संगठित, बहुपरतीय संरचना है। भीतर से बाहर की ओर क्रमशः चार परतें पाई जाती हैं:
क्रमाकुंचन (Peristalsis) इतनी शक्तिशाली गति है कि यदि आप उल्टा लेटकर या सिर के बल खड़े होकर भी भोजन निगलें, तो भी भोजन गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध जाकर आमाशय तक पहुँच ही जाएगा — क्योंकि यह गुरुत्वाकर्षण पर नहीं, बल्कि पेशीय भित्ति की लहरदार गति पर निर्भर करता है।
◆ आहारनाल ◆ जलअपघटन (Hydrolysis) ◆ श्लेष्मिक स्तर ◆ पेशीय स्तर ◆ क्रमाकुंचन (Peristalsis) ◆ गॉब्लेट कोशिकाएं
🖼️ मानव पाचन तंत्र — मुख से मलद्वार तक आहारनाल एवं संलग्न ग्रंथियों की पूर्ण संरचना

पाचन तंत्र का प्रथम द्वार मुख है — एक कटोरेनुमा (Bowl-shaped) अंग, जिसके ऊपर कठोर तालु तथा नीचे कोमल तालु (Palate) पाया जाता है। जीभ (Tongue) फ्रेन्युलम लिंगुए (Frenulum Linguale) द्वारा मुख के आधार तल से जुड़ी रहती है। जीभ पर स्वाद कलिकाएं (Taste Buds) क्षेत्रवार व्यवस्थित हैं — जीभ का अग्र भाग मीठे स्वाद के प्रति, अग्र भाग के किनारे नमकीन के प्रति, मध्य भाग के किनारे खट्टे के प्रति, तथा पिछला भाग कड़वे स्वाद के प्रति सर्वाधिक संवेदनशील होता है।
दाँत (Teeth)
प्रत्येक जबड़े में दाँत मसूड़े के साँचे में स्थित होते हैं, जिसे गर्तदंती (Thecodont) व्यवस्था कहते हैं। मनुष्य में जीवनकाल में दो प्रकार के दाँत बनते हैं — इसीलिए इसे द्विबारदंती (Diphyodont) व्यवस्था कहा जाता है: पहले दुग्ध दाँत (कुल 20), फिर स्थायी दाँत (कुल 32)।
| प्रकार | संख्या (प्रति जबड़ा) | कार्य | निकलने की आयु |
|---|---|---|---|
| कृन्तक (Incisors) | 4 | कुतरना-काटना | 6–8 माह |
| रदनक (Canines) | 2 | चीरना-फाड़ना | 16–20 माह |
| अग्र-चर्वणक (Premolars) | 4 | चबाना | 10–11 वर्ष |
| चर्वणक (Molars) | 6 | पीसना-चबाना | 6-7 वर्ष, 12-13 वर्ष, 17-25 वर्ष (wisdom) |
दाँतों के ऊपर की परत इनेमल मानव शरीर का सबसे कठोर पदार्थ है — हड्डी से भी अधिक कठोर! यह मुख्यतः कैल्शियम फॉस्फेट (हाइड्रॉक्सीएपेटाइट) से बना है। फिर भी, अत्यधिक शक्कर व अम्ल इसे धीरे-धीरे गला सकते हैं — यही दाँतों की सड़न (Tooth Decay) का मूल कारण है।
मुख के पीछे स्थित एक कुप्पीनुमा (Flask-shaped) संरचना, जो श्वसन एवं पाचन दोनों तंत्रों का साझा मार्ग है। इसके तीन भाग हैं — नासाग्रसनी (Nasopharynx, केवल वायु मार्ग), मुखग्रसनी (Oropharynx, वायु व भोजन दोनों का मार्ग) तथा कंठग्रसनी (Laryngopharynx, वायु को स्वरयंत्र व भोजन को ग्रासनली तक पहुंचाने वाला भाग)।
लगभग 25 सेमी लंबी संकरी पेशीय नली, जो गर्दन व वक्षस्थल से होकर मध्यपट (Diaphragm) को पार कर उदरगुहा में प्रवेश करती है। इसकी श्लेष्मा ग्रंथियां मार्ग को चिकना व रसदार रखती हैं, जिससे भोजन का बोलस (Bolus) आसानी से क्रमाकुंचन गति द्वारा आमाशय तक पहुँच जाता है। निगलते समय एपिग्लॉटिस (Epiglottis — घांटी ढक्कन) श्वासनली के द्वार को क्षण भर के लिए बंद कर देता है, ताकि भोजन गलती से श्वास नली में न चला जाए — यही कारण है कि निगलते समय हमारी सांस पल भर के लिए रुक जाती है।
हर बार जब आप निगलते हैं, एपिग्लॉटिस नामक एक छोटा उपास्थि-फ्लैप स्वरयंत्र को ढक देता है ताकि भोजन 'गलत नली' में न चला जाए। यह प्रक्रिया दिनभर हज़ारों बार अनजाने में सही ढंग से होती रहती है — गलती से निगलना व सांस लेना एक साथ हो जाए तो हम 'चोक' (Choke) हो जाते हैं, जो दिखाता है कि यह स्विचिंग तंत्र कितनी बारीकी से डिज़ाइन किया गया है।
ग्रासनली व ग्रहणी के मध्य स्थित एक पेशीय, J-आकार की संरचना, जो उदरगुहा के बाएँ भाग में मध्यपट के पीछे स्थित है। यह इतना लचीला अंग है कि 1 से 3 लीटर तक आहार धारण कर सकता है। आमाशय के तीन भाग हैं:
आमाशय की भित्ति में दो प्रकार की ग्रंथियां पाई जाती हैं — जठरीय ग्रंथि, जिसमें जाइमोजन कोशिकाएं (Chief Cells) पेप्सिनोजन तथा ऑक्सिन्टिक/पैराइटल कोशिकाएं (Oxyntic/Parietal Cells) हाइड्रोक्लोरिक अम्ल (HCl) स्रावित करती हैं; तथा जठरनिर्गामी ग्रंथि, जो श्लेष्मा स्रावित करती है। जठर रस (Gastric Juice) अत्यंत अम्लीय द्रव है (pH 1-2) जिसमें जल (98%), HCl (लगभग 0.5%), श्लेष्मिक म्यूसिन तथा दो एंजाइम — पेप्सिन व लाइपेज — होते हैं।
आमाशय का जठर रस इतना अम्लीय है (pH 1-2) कि वह धातु तक को गला सकता है — फिर भी वह खुद को नहीं पचाता, क्योंकि श्लेष्मा की एक सुरक्षा-परत उसे बचाती है। जिस दिन यह परत कमज़ोर हो जाए, उस स्थान पर अल्सर (Ulcer) बन जाता है।
आमाशय में दो अवरोधिनी पेशियां (Sphincters) होती हैं — ग्रासनलिका अवरोधिनी (Cardiac Sphincter), जो अम्लीय भोजन को वापस ग्रासनली में जाने से रोकती है; तथा जठरनिर्गमीय अवरोधिनी (Pyloric Sphincter), जो आमाशय व छोटी आंत को विभाजित करती है। सामान्यतः भोजन आमाशय में 3-4 घंटे तक रहता है, जहाँ पेप्सिन व HCl मिलकर प्रोटीन का आंशिक पाचन करते हैं।
◆ गर्तदंती (Thecodont) ◆ द्विबारदंती (Diphyodont) ◆ एपिग्लॉटिस ◆ जठर रस ◆ पेप्सिनोजन ◆ ऑक्सिन्टिक कोशिकाएं
आमाशय के पाइलोरिक भाग से शुरू होकर बड़ी आंत पर समाप्त होने वाली, लगभग 7 मीटर लंबी व 2.5 सेमी चौड़ी नली — यहीं सर्वाधिक पाचन व अवशोषण होता है। इसके तीन भाग हैं:
आंत्रीय भित्ति की सूक्ष्म संरचना
श्लेष्मिका व अधःश्लेष्मिका वलित होकर 'के' (Kerckring) रिंग बनाती हैं, जिन पर उंगली जैसे रसांकुर (Villi) पाए जाते हैं। विलाई के आधार पर लीबरकुन की गुहिकाएं (Crypts of Lieberkuhn) होती हैं, जिनमें गॉब्लेट कोशिकाएं (श्लेष्मा स्रावण), आंत्रीय कोशिकाएं (जल व एंजाइम स्रावण) तथा पेनेथ कोशिकाएं (Paneth Cells — जीवाणुनाशी लाइसोजाइम एंजाइम स्रावण) पाई जाती हैं। प्रत्येक विलस में एक केंद्रीय लसीका कोशिका (Lacteal) तथा रक्त केशिका जाल होता है। विलाई की एपिथीलियल कोशिकाओं पर सूक्ष्मांकुर (Microvilli) भी पाए जाते हैं, जो प्लाज्मा झिल्ली के प्रवर्ध हैं।
💡 छोटी आंत की टेक्सटाइल इंजीनियरिंग करामात: विलाई और उन पर भी सूक्ष्मांकुर होने से छोटी आंत की भीतरी अवशोषक सतह लगभग 1000 गुना बढ़ जाती है। यदि छोटी आंत की भीतरी सतह को समतल करके फैलाया जाए तो यह लगभग एक टेनिस कोर्ट जितने क्षेत्रफल के बराबर हो जाती है — यह शरीर की इंजीनियरिंग दक्षता का एक क्लासिक उदाहरण है।
क्षुद्रांत्र से जुड़ी, लगभग 1.5 मीटर लंबी नली, जहाँ विशेष जीवाणु किण्वन (Fermentation) द्वारा अपचित भोजन को सरलीकृत करने में सहायता करते हैं। मुख्य कार्य है जल व खनिज लवणों का अवशोषण तथा अपचित भोजन का उत्सर्जन। इसके तीन मुख्य भाग हैं:
मनुष्य में अपेंडिक्स एक बेकार/अवशेषी अंग है, पर खरगोश जैसे शाकाहारी जानवरों में यह सेल्युलोज पचाने का एक सक्रिय व महत्वपूर्ण अंग है। यह मानव शरीर में क्रमविकास (Evolution) के निशान का एक बेहतरीन उदाहरण है।
बहिष्कासन/मल त्याग (Egestion/Defaecation): अपचित भाग (पादप रेशे) व अनअवशोषित पचित पदार्थ मलाशय में अस्थायी रूप से संचित होते हैं, जहाँ अधिक जल अवशोषण से अर्धठोस मल बनता है। मल त्याग प्रतिवर्त (Defaecation Reflex) संवरणी पेशी को शिथिल कर मल को बाहर निकालता है — सामान्यतः 24 घंटे में एक या दो बार।
◆ ग्रहणी (Duodenum) ◆ विलाई (Villi) ◆ सूक्ष्मांकुर (Microvilli) ◆ लैक्टील (Lacteal) ◆ अपेंडिक्स ◆ मल त्याग प्रतिवर्त
लार एक सीरमी तरल (Serous Fluid) व चिपचिपे श्लेष्म (Mucus) का मिश्रण है — तरल भाग भोजन को गीला करता है, श्लेष्म भाग स्नेहक (Lubricant) का काम करता है। मनुष्य प्रतिदिन लगभग 1000 से 1200 मिलीलीटर लार स्रावित करता है — यानी लगभग एक पूरी वाटर बॉटल भर लार, हर दिन!
तीन जोड़ी लार ग्रंथियां होती हैं:
लार के कार्य: स्टार्च का आंशिक पाचन (एमाइलेज/टायलिन एंजाइम द्वारा माल्टोज में परिवर्तन), भोजन को चिकना व निगलने योग्य बनाना (बोलस निर्माण), दाँत-मुख-जीभ की सफाई, लाइसोजाइम द्वारा दाँत-क्षय कारक जीवाणुओं को नष्ट करना, तथा भोजन कणों को घोलकर स्वाद कलिकाओं को उद्दीपित करना।
यह एक रोचक प्रयोगसिद्ध तथ्य है — लार का स्राव सिर्फ भोजन के स्वाद से नहीं, बल्कि चबाने की यांत्रिक क्रिया मात्र से भी नियंत्रित होता है। भोजन देखना, सूँघना या उसके बारे में सोचना-बात करना भी मुँह में लार ला देता है — यह मस्तिष्क से आने वाली तंत्रिकाओं की उत्तेजना से होता है।
मानव शरीर की सबसे बड़ी एवं महत्वपूर्ण पाचक ग्रंथि, मध्यपट के नीचे उदर के ऊपरी दाएँ हिस्से में स्थित त्रिकोणाकार अंग। यह लगभग एक लाख (1,00,000) छोटी षट्कोणीय संरचनात्मक-कार्यात्मक इकाइयों — यकृत पालिकाओं (Liver Lobules) — से निर्मित है, यानी शरीर के भीतर एक लाख मिनी केमिकल प्लांट काम कर रहे हैं!
यकृत के प्रमुख कार्य:
यकृत में अत्यधिक पुनरुद्भवन क्षमता (Regeneration Capacity) होती है — यह अपने ऊतक का बड़ा भाग हटा दिए जाने पर भी पुनः विकसित हो सकता है। पित्त में कोई पाचन एंजाइम नहीं होता, फिर भी यह वसा पाचन के लिए अनिवार्य है — यह पीला-हरा, क्षारीय द्रव (pH लगभग 8) है, जिसके मुख्य घटक पित्त लवण (सोडियम ग्लाइकोकोलेट व सोडियम टॉरोकोलेट) तथा पित्त वर्णक — बिलीरुबिन व बिलीवर्डिन — हैं। पित्त पित्ताशय (Gallbladder) में संचित व सांद्रित होता है, तथा भोजन के अनुसार ग्रहणी में मुक्त होता है।
बिना एंजाइम वाला पदार्थ इतना ज़रूरी कैसे?: पित्त में कोई एंजाइम नहीं है, फिर भी वसा पाचन की जान है — क्योंकि यह पायसीकरण (Emulsification) के जरिए वसा की बड़ी गोलिकाओं को छोटी बूंदों में तोड़ता है, ठीक वैसे ही जैसे बर्तन धोने का साबुन तेल को तोड़ता है। इससे एंजाइमों के लिए सतह क्षेत्रफल बढ़ जाता है और वे तेज़ी से काम कर पाते हैं।
यह एक मिश्रित ग्रंथि (Mixed Gland) है — अंतःस्रावी (Endocrine) रूप से यह इंसुलिन व ग्लूकेगोन हार्मोन (आइलेट्स ऑफ लैंगरहैंस से) बनाकर रक्त शर्करा नियंत्रित करती है; बहिःस्रावी (Exocrine) रूप से यह अग्न्याशयी रस बनाती है जो आंतों में प्रोटीन, वसा व कार्बोहाइड्रेट के पाचन में मदद करता है। यह 6-8 इंच लंबी, U-आकार की ग्रंथि है, जो यकृत, ग्रहणी व प्लीहा से घिरी होती है। इसका स्राव अग्न्याशयी वाहिनी द्वारा ग्रहणी में पहुँचता है।
◆ पैरोटिड ग्रंथि ◆ टायलिन/एमाइलेज ◆ यकृत पालिकाएं ◆ पित्त लवण ◆ बिलीरुबिन ◆ आइलेट्स ऑफ लैंगरहैंस
भोजन के तीनों मुख्य पोषक तत्व — कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन व वसा — आहारनाल के अलग-अलग भागों में अलग-अलग एंजाइमों द्वारा चरणबद्ध रूप से तोड़े जाते हैं, जब तक कि वे अवशोषण योग्य सबसे सरल इकाइयों में न बदल जाएं। पूरी प्रक्रिया का सामान्य क्रम है: अंतर्ग्रहण (Ingestion) → पाचन (Digestion) → अवशोषण (Absorption) → स्वांगीकरण (Assimilation) → बहिष्कासन (Egestion)।
| स्थान | एंजाइम/स्रोत | क्रिया |
|---|---|---|
| मुख-गुहा | लार एमाइलेज (टायलिन) | पका स्टार्च → माल्टोज (मीठा-स्वाद डाइसैकराइड); कच्चा स्टार्च → डेक्स्ट्रिन |
| आमाशय | — | लार एमाइलेज HCl से माध्यम अम्लीय होने तक कार्य करता रहता है; मुख्य पाचन यहाँ नहीं होता |
| ग्रहणी | अग्न्याशयी एमाइलेज | स्टार्च, ग्लाइकोजन → माल्टोज + ऑलिगोसैकेराइड; समस्त स्टार्च को लगभग आधे घंटे में पचा देता है |
| छोटी आंत | माल्टेज, सुक्रेज, लैक्टेज | माल्टोज → 2 ग्लूकोज; सुक्रोज → ग्लूकोज+फ्रक्टोज; लैक्टोज → ग्लूकोज+गैलेक्टोज |
अंतिम अवशोषण योग्य रूप: मोनोसैकेराइड — ग्लूकोज, फ्रक्टोज, गैलेक्टोज।
| स्थान | एंजाइम | क्रिया |
|---|---|---|
| आमाशय | पेप्सिन (पेप्सिनोजन को HCl सक्रिय करता है) | प्रोटीन → प्रोटियोज, पेप्टोन, पॉलीपेप्टाइड्स |
| आमाशय (शिशु) | रेनिन | दुग्ध प्रोटीन कैसीन → पैराकैसीन (दही) |
| ग्रहणी | ट्रिप्सिन, काइमोट्रिप्सिन (एंटेरोकाइनेज द्वारा सक्रिय) | प्रोटियोज, पेप्टोन → छोटे पॉलीपेप्टाइड, ट्राइ/डाइपेप्टाइड |
| छोटी आंत | एरेप्सिन, अमीनो पेप्टीडेज, डाइपेप्टीडेज | पॉलीपेप्टाइड → डाइपेप्टाइड व अमीनो अम्ल |
अंतिम अवशोषण योग्य रूप: अमीनो अम्ल।
| स्थान | एंजाइम/पदार्थ | क्रिया |
|---|---|---|
| आमाशय | जठरीय लाइपेज (अल्प मात्रा) | बहुत कम वसा-पाचन होता है |
| ग्रहणी | पित्त लवण (कोई एंजाइम नहीं) | वसा → पायसीकृत वसा (पायसीकरण/Emulsification — बड़ी गोलिकाएं छोटी बूंदों में टूटती हैं) |
| ग्रहणी | अग्न्याशयी लाइपेज | पायसीकृत वसा (ट्राइग्लिसराइड) → वसा अम्ल + मोनोग्लिसराइड |
| छोटी आंत | आंत्रीय लाइपेज | शेष ट्राइग्लिसराइड → वसा अम्ल + ग्लिसरॉल |
अंतिम अवशोषण योग्य रूप: वसा अम्ल (Fatty Acids) व ग्लिसरॉल।
स्टार्च + n(H₂O) →(एमाइलेज)→ माल्टोज प्रोटीन + H₂O →(पेप्सिन/ट्रिप्सिन)→ अमीनो अम्ल वसा (ट्राइग्लिसराइड) + 3H₂O →(लाइपेज)→ वसा अम्ल + ग्लिसरॉल
◆ टायलिन ◆ पेप्सिनोजन ◆ ट्रिप्सिन ◆ पायसीकरण ◆ अग्न्याशयी लाइपेज ◆ मोनोसैकेराइड
मुख में जल, जल-घुलनशील विटामिन व साधारण शर्करा की न्यून मात्रा अवशोषित होती है। आमाशय में जल, ग्लूकोज, एल्कोहल, कुछ खनिज व दवाएं परासरण, विसरण व सक्रिय परिवहन द्वारा अवशोषित होती हैं। किंतु मुख्य अवशोषण स्थल छोटी आंत है — विलाई व सूक्ष्मांकुर के कारण यहां अवशोषक सतह क्षेत्रफल लगभग 1000 गुना बढ़ जाता है।
| 🩸 रक्त केशिकाओं द्वारा अवशोषित | 🌊 लसीका (लैक्टील) द्वारा अवशोषित |
|---|---|
| ◆ अमीनो अम्ल — सक्रिय अभिगमन द्वारा, सोडियम सह-अभिगमन से ◆ मोनोसैकेराइड (ग्लूकोज, फ्रक्टोज, गैलेक्टोज) ◆ विटामिन व लवण (सक्रिय/निष्क्रिय विधि से) ◆ जल — केवल विसरण द्वारा | ◆ वसा अम्ल व मोनोग्लिसराइड — विसरण द्वारा, माइसेल के रूप में ◆ आंत्र कोशिकाओं में काइलोमाइक्रोन बनकर लसीका में प्रवेश ◆ रक्त द्वारा अवशोषित पोषक तत्व शिराओं से यकृत जाते हैं ◆ लैक्टील से अवशोषित पोषक तत्व लसीका तंत्र में प्रवेश करते हैं |
बड़ी आंत में मुख्यतः जल का अवशोषण होता है (कोलन में सर्वाधिक), कुछ खनिज लवण भी सक्रिय परिवहन द्वारा अवशोषित होते हैं। स्वांगीकरण (Assimilation) में वसा अम्ल व ग्लिसरॉल पुनः वसा में बदलकर वसा ऊतक में संचित होते हैं, अतिरिक्त मोनोसैकेराइड ग्लाइकोजन में तथा अमीनो अम्ल शरीर-प्रोटीन में बदल जाते हैं।
| हार्मोन | स्रोत | प्रभाव |
|---|---|---|
| गैस्ट्रिन (Gastrin) | आमाशय भित्ति | जठर रस स्राव को उत्तेजित करता है |
| सेक्रेटिन (Secretin) | ग्रहणी उपकला | बाइकार्बोनेट-समृद्ध अग्न्याशयी रस प्रवाह उत्तेजित करता है |
| कोलिसिस्टोकाइनिन (CCK) | ग्रहणी उपकला | पित्ताशय से पित्त प्रवाह उत्तेजित करता है |
| एंटेरोगैस्ट्रोन | ग्रहणी उपकला | जठर रस स्राव को रोकता है |
सिर्फ चीनी-नमक-पानी का मिश्रण, फिर भी WHO इसे 20वीं सदी की सबसे बड़ी चिकित्सा खोजों में गिनता है क्योंकि इसने डायरिया से होने वाले निर्जलीकरण को रोककर लाखों बच्चों की जान बचाई है। रोकथाम हेतु भोजन से पहले हाथ धोना, फल-सब्जियां धोकर खाना, भोजन ढककर रखना तथा स्वच्छ जल पीना आवश्यक है।
◆ काइलोमाइक्रोन ◆ गैस्ट्रिन ◆ सेक्रेटिन ◆ कोलिसिस्टोकाइनिन ◆ गैस्ट्रोएंटेराइटिस ◆ ORS
जिस प्रकार पाचन तंत्र भोजन से ऊर्जा निकालता है, उसी प्रकार श्वसन तंत्र (Respiratory System) वायुमंडल से ऑक्सीजन खींचकर शरीर की हर कोशिका तक पहुंचाता है तथा कोशिकीय क्रियाओं से बनी कार्बन डाइऑक्साइड को बाहर निकालता है। श्वसन तंत्र को तीन भागों में बांटा गया है — ऊपरी श्वसन तंत्र, निचला श्वसन तंत्र तथा श्वसन मांसपेशियां।
💡 नाक — शरीर का प्राकृतिक एयर-प्यूरीफायर: मुँह से ली गई हवा नाक से ली गई हवा जितनी शुद्ध कभी नहीं होती — क्योंकि नाक के बाल, सिलिया व श्लेष्मा एक प्राकृतिक फिल्टर की तरह काम करते हैं, जो धूल, पराग व फफूंद तक छानकर बाहर कर देते हैं। इसीलिए मुँह से सांस लेने की आदत श्वसन तंत्र के लिए कम स्वास्थ्यकर मानी जाती है।
करोड़ों सूक्ष्म कूपिकाएं मिलकर फेफड़ों के अंदर गैस-विनिमय के लिए एक विशाल सतह बनाती हैं — मानो शरीर के अंदर एक छिपा हुआ खेल का मैदान मुड़-तुड़कर छाती में समा गया हो। यही विशाल सतह ही है जो हर सांस में इतनी तेज़ी से O₂-CO₂ का आदान-प्रदान संभव बनाती है।
◆ नासिका पट ◆ एपिग्लॉटिस ◆ स्वर-रज्जु ◆ श्वासनली ◆ ब्रोंकाई ◆ कूपिकाएं (Alveoli)
🖼️ मानव श्वसन तंत्र — नासिका से लेकर फेफड़ों व कूपिकाओं तक की पूर्ण संरचना

फेफड़े (Lungs/फुफ्फुस) लचीले, कोमल व हल्के गुलाबी रंग के अंग हैं, जो वक्षस्थल में मध्यपट (Diaphragm) के ठीक ऊपर एक जोड़े के रूप में स्थित होते हैं। दिलचस्प बात यह है कि दायां फेफड़ा बाएं से थोड़ा छोटा पर अधिक चौड़ा होता है — क्योंकि बायां फेफड़ा दो खंडों (Lobes) में जबकि दायां फेफड़ा तीन खंडों में विभक्त होता है (हृदय के लिए जगह छोड़ने हेतु बायां फेफड़ा छोटा रहता है)।
फेफड़े एक दोहरी झिल्ली — फुफ्फुस आवरण/प्लूरा (Pleural Membrane) — से घिरे रहते हैं, जिसके भीतर फुफ्फुस द्रव (Pleural Fluid) भरा रहता है। यह द्रव फेफड़ों की गति के समय घर्षण को कम करता है, ठीक वैसे ही जैसे मशीन के पुर्जों में तेल घर्षण कम करता है।
फेफड़ों की कार्यक्षमता मापने के लिए विभिन्न आयतन व क्षमताएं परिभाषित की गई हैं, जिन्हें स्पाइरोमीटर (Spirometer) यंत्र से मापा जाता है:
| आयतन/क्षमता | परिभाषा | औसत मान |
|---|---|---|
| ज्वारीय आयतन (Tidal Volume) | सामान्य श्वसन में एक बार में आने-जाने वाली वायु | ≈ 500 mL |
| निःश्वसन आरक्षित आयतन (IRV) | सामान्य श्वसन के बाद अतिरिक्त ली जा सकने वाली वायु | 2000–3000 mL |
| उच्छ्वसन आरक्षित आयतन (ERV) | सामान्य उच्छ्वसन के बाद बलपूर्वक निकाली जाने वाली वायु | 1000–1100 mL |
| अवशिष्ट आयतन (RV) | अधिकतम उच्छ्वसन पर भी फेफड़ों में शेष वायु | 1000–1500 mL |
| जैव क्षमता (Vital Capacity) | अधिकतम भरी व अधिकतम निकाली गई वायु (IRV+TV+ERV) | 3400–4800 mL |
| कुल फुफ्फुस क्षमता (TLC) | अधिकतम वायु जो फेफड़े धारण कर सकते हैं (VC+RV) | 5500–6000 mL |
धूम्रपान बनाम एथलीट — फेफड़ों की क्षमता का सच: धूम्रपान करने वालों व तपेदिक (TB) रोगियों में फेफड़ों की जैव क्षमता (Vital Capacity) काफी घट जाती है, जबकि एथलीट्स व गायकों में यह अपेक्षाकृत अधिक होती है — यानी फेफड़े भी मांसपेशियों की तरह 'उपयोग के अनुसार ढलते' हैं।
◆ फुफ्फुस/प्लूरा (Pleura) ◆ फुफ्फुस द्रव ◆ ज्वारीय आयतन ◆ जैव क्षमता (Vital Capacity) ◆ स्पाइरोमीटर
श्वसन (Breathing) की क्रिया तीन चरणों में पूर्ण होती है — फुफ्फुसीय संवातन (निःश्वसन/उच्छ्वसन), कूपिकाओं व ऊतकों के बीच गैसों का विनिमय, तथा रुधिर द्वारा O₂ व CO₂ का परिवहन। आइए, सांस लेने-छोड़ने की यांत्रिकी को समझते हैं।
यह एक सक्रिय (Active) प्रक्रिया है, जो मध्यपट (Diaphragm) एवं बाह्य अंतरापर्शुक पेशियों (External Intercostal Muscles) के संकुचन से प्रारंभ होती है। जब मध्यपट संकुचित होता है, तो वह चपटा होकर नीचे जाता है; साथ ही बाह्य अंतरापर्शुक पेशियों के संकुचन से पसलियां ऊपर-बाहर की ओर खिंचती हैं। इन दोनों क्रियाओं से वक्षगुहा का आयतन बढ़ जाता है — जिससे फेफड़ों में वायुदाब वायुमंडलीय दाब से कम हो जाता है, और वायु तेज़ी से कूपिकाओं में भर जाती है।
विश्राम अवस्था में यह एक निष्क्रिय (Passive) प्रक्रिया है। मध्यपट व बाह्य अंतरापर्शुक पेशियां शिथिल होती हैं — पसलियां अपने भार से नीचे आ जाती हैं तथा मध्यपट पुनः गुंबदाकार होकर ऊपर उठ जाता है। इससे वक्षगुहा का आयतन घट जाता है, वायुदाब वायुमंडलीय दाब से अधिक हो जाता है, और वायु कूपिकाओं से बाहर निकल जाती है। बलपूर्वक श्वसन (Forced Breathing) में अतिरिक्त अंतरापर्शुक व उदरीय पेशियां भी सक्रिय भूमिका निभाती हैं।
सामान्य विश्राम अवस्था में श्वसन दर लगभग 12–16 (कुछ स्रोतों में 16–20) बार प्रति मिनट होती है, तथा प्रति मिनट लगभग 600–800 mL वायु का आदान-प्रदान होता है। यह पूरी क्रियाविधि दाब प्रवणता (Pressure Gradient) पर आधारित है — जहां अधिक दाब वाली वायु (वायुमंडल) कम दाब वाले क्षेत्र (फेफड़े) की ओर स्वतः प्रवाहित होती है, ठीक वैसे ही जैसे पानी ऊंचाई से नीचे की ओर बहता है।
| 🫁 निःश्वसन (Inspiration) | 💨 उच्छ्वसन (Expiration) |
|---|---|
| ◆ सक्रिय (Active) प्रक्रिया ◆ मध्यपट व बाह्य अंतरापर्शुक पेशियां संकुचित ◆ वक्षगुहा का आयतन बढ़ता है ◆ फेफड़ों में वायुदाब घटता है ◆ वायु अंदर प्रवेश करती है | ◆ निष्क्रिय (Passive) प्रक्रिया ◆ पेशियां शिथिल, पसलियां नीचे आती हैं ◆ वक्षगुहा का आयतन घटता है ◆ फेफड़ों में वायुदाब बढ़ता है ◆ वायु बाहर निकलती है |
◆ मध्यपट (Diaphragm) ◆ बाह्य अंतरापर्शुक पेशियां ◆ निःश्वसन ◆ उच्छ्वसन ◆ दाब प्रवणता
गैसों का आदान-प्रदान आंशिक दाब (Partial Pressure) के अंतर के कारण विसरण (Diffusion) द्वारा होता है। कूपिका में O₂ का आंशिक दाब (Po₂) लगभग 105 mm Hg तथा CO₂ का (Pco₂) लगभग 40 mm Hg होता है, जबकि रक्त (शिराओं से आने वाला) में Po₂ लगभग 40 mm Hg तथा Pco₂ लगभग 46 mm Hg होता है। इस दाब अंतर के कारण O₂ कूपिका से रक्त की ओर तथा CO₂ रक्त से कूपिका की ओर विसरित होती है — यह बाह्य श्वसन (External Respiration) कहलाता है। ऊतकों में इसके विपरीत विनिमय होता है, जिसे आंतरिक श्वसन (Internal Respiration) कहते हैं।
लगभग 97% O₂ हीमोग्लोबिन के साथ संयुग्मित होकर ऑक्सीहीमोग्लोबिन (Hb₄(O₂)₄) के रूप में परिवहित होता है, तथा मात्र 3% प्लाज्मा में घुलित अवस्था में। जितना अधिक Po₂, हीमोग्लोबिन का संतृप्तिकरण (Saturation) उतना ही अधिक होता है — इस संबंध को दर्शाने वाला वक्र S-आकार (Sigmoid) का होता है।
हीमोग्लोबिन जहां ज़्यादा O₂ हो (फेफड़ों में) वहां उसे पकड़ लेता है, और जहां कम O₂/ज़्यादा CO₂ हो (मेहनत कर रही मांसपेशियों में) वहां उसे छोड़ देता है (बोर प्रभाव/Bohr Effect) — यह बिना किसी केंद्रीय आदेश के शरीर की स्थानीय मांग के अनुसार आपूर्ति समायोजित करने वाला एक स्मार्ट तंत्र है।
CO₂ का परिवहन तीन रूपों में होता है:
क्लोराइड विस्थापन (Chloride Shift): जब HCO₃⁻ रक्ताणु से बाहर प्लाज्मा में जाता है, तो संतुलन हेतु प्लाज्मा से Cl⁻ आयन रक्ताणु में प्रवेश करते हैं। हैल्डेन प्रभाव (Haldane Effect): फेफड़ों में O₂-Hb संयोजन से अधिक CO₂ का रक्त से निष्कासन होता है।
| गैस | परिवहन का रूप | प्रतिशत |
|---|---|---|
| O₂ | हीमोग्लोबिन के साथ (ऑक्सीहीमोग्लोबिन) | 97% |
| O₂ | प्लाज्मा में घुलित | 3% |
| CO₂ | बाइकार्बोनेट (HCO₃⁻) के रूप में | 70–75% |
| CO₂ | कार्बामीनो-हीमोग्लोबिन के रूप में | 20–23% |
| CO₂ | प्लाज्मा में घुलित | 5–7% |
◆ आंशिक दाब ◆ ऑक्सीहीमोग्लोबिन ◆ बोर प्रभाव ◆ बाइकार्बोनेट ◆ कार्बोनिक एनहाइड्रेस ◆ क्लोराइड विस्थापन
श्वसन एक अनैच्छिक (Involuntary) क्रिया है, जिसका नियंत्रण मेडुला ऑब्लांगाटा व पॉन्स में स्थित श्वसन केंद्रों (Respiratory Centres) द्वारा होता है — पृष्ठीय श्वसन केंद्र (निःश्वसन नियंत्रित करता है), न्यूमोटैक्सिक केंद्र (उच्छ्वसन को नियंत्रित व निःश्वसन की सीमा तय करता है), तथा उदर श्वसन केंद्र (बलपूर्वक श्वसन में सहायक)। रक्त में CO₂ व H⁺ आयनों की वृद्धि से श्वसन दर बढ़ जाती है।
आप चाहे कितनी भी कोशिश कर लें, अपनी सांस को बहुत देर तक नहीं रोक सकते — क्योंकि मेडुला ऑब्लांगाटा रक्त में CO₂ का स्तर एक सीमा पार करते ही स्वतः 'ऑटो-रीस्टार्ट' कर देता है। यह दिखाता है कि शरीर की सबसे बुनियादी जीवन-प्रक्रिया भी स्वैच्छिक नियंत्रण से परे, एक स्वचालित सुरक्षा-तंत्र के अधीन है।
| रोग | कारण | लक्षण/रोकथाम |
|---|---|---|
| श्वसनी दमा (Asthma) | बाहरी एलर्जी पदार्थों से एलर्जिक प्रतिक्रिया | श्वास में कठिनाई, अधिक श्लेष्मा से ब्रोंकिओल्स संकरे होना; एलर्जी पदार्थों से बचाव ही सर्वोत्तम रोकथाम |
| श्वसनी शोथ (Bronchitis) | संक्रमण, धूम्रपान, वायु प्रदूषण | नियमित खांसी के साथ हरा-नीला बलगम; धुएं-धूल से बचाव |
| निमोनिया (Pneumonia) | कूपिकाओं में जीवाणु संक्रमण | बुखार, दर्द, तीव्र खांसी; भीड़भाड़ से बचाव |
| क्षय रोग/तपेदिक (TB) | जीवाणु संक्रमण, बूंदों से फैलता है | वजन घटना, खांसी, बुखार; BCG वैक्सीन व पौष्टिक आहार से रोकथाम |
| वातस्फीति (Emphysema) | अत्यधिक धूम्रपान, क्रोनिक ब्रोंकाइटिस | कूपिकाओं की लोच स्थायी रूप से नष्ट; धूम्रपान छोड़ना ही एकमात्र बचाव |
धूम्रपान से गंध-स्वाद की क्षीण अनुभूति, स्मोकर्स कफ, गैस्ट्रिक अल्सर, हृदय गति व रक्तचाप में वृद्धि, समय-पूर्व झुर्रियां, हृदय रोग व स्ट्रोक होते हैं — तथा मुख, स्वरयंत्र, ग्रसनी, ग्रासनली, फेफड़े, अग्न्याशय व मूत्राशय तक का कैंसर हो सकता है। यह दिखाता है कि धूम्रपान का असर केवल फेफड़ों तक सीमित नहीं, बल्कि शरीर के दर्जनों अंगों तक फैलता है।
◆ श्वसन केंद्र ◆ मेडुला ऑब्लांगाटा ◆ न्यूमोटैक्सिक केंद्र ◆ दमा ◆ वातस्फीति ◆ BCG वैक्सीन
अब तक हमने देखा कि भोजन कैसे पचता है और ऑक्सीजन कैसे शरीर में प्रवेश करती है — पर इन दोनों पोषक तत्वों को शरीर के हर कोने तक कौन पहुंचाता है? यह जिम्मेदारी निभाता है परिसंचरण तंत्र (Circulatory System), जिसका केंद्रीय पंप है हृदय, और जिसका वाहक द्रव है रक्त (Blood)।
रक्त एक लाल रंग का, गाढ़ा, हल्का क्षारीय तरल संयोजी ऊतक (Fluid Connective Tissue) है, जो दो भागों से मिलकर बनता है — प्लाज्मा (55%) व गठित कोशिकाएं (45%)।
प्लाज्मा (Plasma) — हल्के पीले रंग का तरल भाग; जल (~90%), प्रोटीन (एल्ब्युमिन, ग्लोब्युलिन, फाइब्रिनोजेन) व लवण से बना। इसके कार्य हैं — पाचन उत्पादों व हार्मोनों का परिवहन, अपशिष्ट पदार्थों को उत्सर्जी अंगों तक पहुंचाना, शरीर में ताप का समान वितरण, तथा रक्त स्कंदन व प्रतिरक्षा में सहयोग।
| आधार | RBC (एरिथ्रोसाइट) | WBC (ल्यूकोसाइट) | Platelets (पट्टिकाणु) |
|---|---|---|---|
| केंद्रक | अनुपस्थित | उपस्थित | अनुपस्थित |
| संख्या/mm³ | 45–55 लाख | 4000–11000 | 1.5–4 लाख |
| निर्माण स्थान | लाल अस्थि मज्जा | अस्थि मज्जा व लसीका ऊतक | अस्थि मज्जा (मेगाकैरियोसाइट) |
| आकृति | उभयावतल (Biconcave) | अनियमित | छोटी प्लेटनुमा |
| औसत आयु | ~120 दिन | कुछ दिन | 7–10 दिन |
| मुख्य कार्य | O₂ व CO₂ का परिवहन (हीमोग्लोबिन) | प्रतिरक्षा, रोगाणु नाश | रक्त स्कंदन |
RBC लाल अस्थि मज्जा में बनती है तथा ~120 दिन का जीवनकाल पूरा करने के बाद प्लीहा (Spleen) व यकृत में नष्ट होती है — इसीलिए प्लीहा को 'RBC का कब्रिस्तान' भी कहा जाता है। WBC दो प्रकार की होती हैं — ग्रैन्युलोसाइट्स (न्यूट्रोफिल, इओसिनोफिल, बेसोफिल) तथा एग्रैन्युलोसाइट्स (लिम्फोसाइट, मोनोसाइट); ये शरीर की प्रतिरक्षा सेना का काम करती हैं।
RBC झिल्ली पर एंटीजन (A, B, दोनों, या कोई नहीं) तथा प्लाज्मा में एंटीबॉडी की उपस्थिति के आधार पर चार रक्त समूह होते हैं — A, B, AB व O।
| प्राप्तकर्ता समूह | सुरक्षित दाता समूह |
|---|---|
| O | केवल O (सार्वत्रिक दाता) |
| A | O, A |
| B | O, B |
| AB | O, A, B, AB (सार्वत्रिक प्राप्तकर्ता) |
O समूह = सार्वत्रिक दाता (Universal Donor, कोई एंटीजन नहीं); AB समूह = सार्वत्रिक प्राप्तकर्ता (Universal Recipient, कोई एंटीबॉडी नहीं)। इसके अतिरिक्त Rh कारक (Rh Factor) भी महत्वपूर्ण है — Rh+ या Rh– निर्धारित करता है; गर्भवती Rh– माता व Rh+ भ्रूण के मध्य असंगति गंभीर जटिलताएं उत्पन्न कर सकती है।
प्लेटलेट्स क्षति स्थल पर → थ्रॉम्बोप्लास्टिन मुक्त थ्रॉम्बोप्लास्टिन + प्रोथ्रॉम्बिन --Ca²⁺--> थ्रॉम्बिन थ्रॉम्बिन + फाइब्रिनोजेन → फाइब्रिन (अघुलनशील तंतु) फाइब्रिन + RBC → रक्त थक्का (Clot)
हीमोफीलिया (Haemophilia) — एक आनुवंशिक रोग, मुख्यतः पुरुषों में, जिसमें स्कंदन कारकों की कमी से रक्त का थक्का नहीं बन पाता और रक्तस्राव जारी रहता है।
◆ प्लाज्मा ◆ RBC/WBC/Platelets ◆ रक्त समूह (ABO) ◆ सार्वत्रिक दाता ◆ फाइब्रिनोजेन ◆ हीमोफीलिया
🖼️ मानव हृदय की आंतरिक संरचना — चारों कक्ष, कपाट एवं प्रमुख रक्त वाहिकाएं

हृदय पेशीय ऊतकों से बना एक मांसल, खोखला, लाल रंग का अंग है — आकार लगभग बंद मुट्ठी के समान। यह हृदयावरण (Pericardium) नामक दोहरी झिल्लीमय थैली से घिरा रहता है, जिसके भीतर हृदयावरणी द्रव (Pericardial Fluid) हृदय को बाहरी आघातों से सुरक्षा देता है व घर्षण कम करता है।
हृदय के ऊपरी भाग में दो अलिंद (Atria — रक्त प्राप्त करने वाले, छोटे कक्ष) तथा निचले भाग में दो निलय (Ventricles — रक्त पंप करने वाले, बड़े व शक्तिशाली कक्ष) होते हैं। अंतर-अलिंद पट व अंतर-निलय पट दाएं व बाएं भाग को पूर्णतः पृथक रखते हैं — दायां भाग अशुद्ध रुधिर तथा बायां भाग शुद्ध रुधिर वहन करता है।
कपाट (Valves) रुधिर को केवल एक दिशा में प्रवाहित होने देते हैं — द्विवलन कपाट/मिट्रल वाल्व (बायां अलिंद-निलय), त्रिवलन कपाट (दायां अलिंद-निलय), तथा अर्धचंद्राकार कपाट (Aortic व Pulmonary Valve, निलय-धमनी मुहानों पर)। कपाट बंद होने से 'लब्ब-डब्ब' (Lubb-Dubb) ध्वनि उत्पन्न होती है, जिसे स्टेथोस्कोप से सुना जाता है।
एक हृदय चक्र लगभग 0.8 सेकंड में पूर्ण होता है, जिसमें डायस्टोल (शिथिलीकरण) व सिस्टोल (संकुचन) अवस्थाएं शामिल हैं। सामान्य वयस्क में हृदय दर लगभग 72 धड़कन/मिनट होती है, तथा प्रत्येक धड़कन में हृदय लगभग 70 mL रक्त पंप करता है (स्ट्रोक आयतन)। इस प्रकार कार्डियक आउटपुट (एक मिनट में कुल पंप रक्त) = 72 × 70 ≈ 5000 mL यानी लगभग 5 लीटर प्रति मिनट होता है।
हृदय की धड़कन का क्रम निर्धारित करता है एक विशेष विद्युत-चालक तंत्र:
यदि SA नोड दोषपूर्ण हो जाए तो कृत्रिम पेसमेकर (Artificial Pacemaker) सीने में प्रत्यारोपित किया जाता है। ECG (Electro Cardiogram) हृदय स्पंदन के संचालन को रिकॉर्ड करने वाला यंत्र है, जो हृदय संबंधी विकारों का पता लगाने में सहायक है।
◆ अलिंद व निलय ◆ द्विवलन कपाट ◆ त्रिवलन कपाट ◆ लब्ब-डब्ब ◆ SA नोड (पेसमेकर) ◆ कार्डियक आउटपुट
| आधार | धमनी (Arteries) | शिरा (Veins) | केशिका (Capillaries) |
|---|---|---|---|
| दिशा | हृदय से दूर | हृदय की ओर | धमनी-शिरा को जोड़ती हैं |
| भित्ति | मोटी, मांसल, लचीली | पतली, कम मांसल | एक कोशिकीय परत |
| रक्त प्रकार | O₂ युक्त (अपवाद: फुफ्फुसीय धमनी) | CO₂ युक्त (अपवाद: फुफ्फुसीय शिरा) | विनिमय के कारण मिश्रित |
| कपाट | अनुपस्थित (हृदय के पास छोड़कर) | उपस्थित (backflow रोकते हैं) | अनुपस्थित |
| रक्त प्रवाह | तेज़ व स्पंदित | धीमा व निरंतर | अत्यंत धीमा (विनिमय हेतु) |
फुफ्फुसीय धमनी (Pulmonary Artery) एकमात्र धमनी है जो अशुद्ध रक्त ले जाती है — फिर भी 'धमनी' कहलाती है क्योंकि यह हृदय से रक्त ले जाती है। इसी तरह फुफ्फुसीय शिरा एकमात्र शिरा है जो शुद्ध रक्त ले जाती है, पर 'शिरा' कहलाती है क्योंकि यह हृदय में रक्त लाती है — यानी धमनी व शिरा के नाम रक्त की शुद्धता से नहीं, बल्कि प्रवाह की दिशा (हृदय से/हृदय को) से तय होते हैं।
मनुष्य में रक्त हृदय में से दो बार गुजरता है, इसलिए इसे द्विक परिसंचरण (Double Circulation) कहते हैं — पहले शरीर-हृदय (दैहिक) तथा फिर हृदय-फेफड़े-हृदय (फुफ्फुसीय) चक्र से। यह दोहरी व्यवस्था सुनिश्चित करती है कि शुद्ध व अशुद्ध रक्त कभी आपस में न मिलें, जिससे ऑक्सीजन वितरण अत्यंत कुशल बना रहता है — ठीक वैसे ही जैसे किसी शहर में पीने के पानी व गंदे पानी की अलग-अलग पाइपलाइन होती है।
◆ धमनी बनाम शिरा ◆ फुफ्फुसीय धमनी ◆ दैहिक परिपथ ◆ कोरोनरी परिसंचरण ◆ यकृत निवाहिका तंत्र ◆ द्विक परिसंचरण
निलय संकुचन (सिस्टोल) के समय रक्त धमनियों की भित्ति पर जो दाब डालता है, उसे रक्तचाप कहते हैं — प्रकुंचन दाब (Systolic, उच्चतर) व अनुशिथिलन दाब (Diastolic, निम्नतर)। स्वस्थ वयस्क का सामान्य पाठ्यांक 120/80 mm Hg होता है, जिसे स्फिग्मोमैनोमीटर (Sphygmomanometer) से मापा जाता है। जब प्रकुंचन दाब ≥140 व अनुशिथिलन दाब ≥90 mm Hg निरंतर बना रहे, तो इसे उच्च रक्तचाप (Hypertension) कहते हैं — यह हृदय, मस्तिष्क व वृक्क तीनों पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है।
लसीका तंत्र रक्त परिसंचरण तंत्र का पूरक (Complementary) तंत्र है। इसमें लसीका (Lymph — रंगहीन तरल, प्लाज्मा व WBC युक्त पर RBC-रहित), लसीका वाहिकाएं, लसीका ग्रंथियां (Lymph Nodes) व लसीकाभ अंग (प्लीहा, थाइमस, अस्थि मज्जा) शामिल हैं। लसीका तंत्र के मुख्य कार्य हैं — ऊतकों से अतिरिक्त द्रव एकत्र कर रक्त में वापस पहुंचाना, वसा के अवशोषण में सहायता (लैक्टील द्वारा), प्रतिरक्षा प्रदान करना, तथा संक्रमण के प्रसार को रोकना।
लसीका केवल एक दिशा में बहती है — अंगों से हृदय की ओर, कभी विपरीत नहीं — और इसमें कोई पंपिंग तंत्र नहीं होता; यह मांसपेशियों की गति द्वारा आगे धकेली जाती है।
आर्टेरियोस्क्लेरोसिस — पिछले अध्याय से जुड़ाव: याद कीजिए — पिछले अध्याय में हमने पढ़ा था कि उच्च वसा व कोलेस्ट्रॉल युक्त आहार धमनियों में प्लाक जमा कर सकता है। यही प्रक्रिया आगे चलकर धमनी कठिन्य व हृदयाघात का कारण बनती है — यानी 'आहार एवं पोषण' का सीधा संबंध परिसंचरण तंत्र के स्वास्थ्य से है।
◆ रक्तचाप (120/80) ◆ स्फिग्मोमैनोमीटर ◆ लसीका तंत्र ◆ धमनी कठिन्य ◆ हृदयाघात ◆ एनीमिया
पाचन, श्वसन व परिसंचरण तंत्र मिलकर शरीर को पोषण व ऊर्जा देते हैं — पर इस पूरी प्रक्रिया में उत्पन्न होने वाला कचरा कौन साफ करता है? यह जिम्मेदारी है उत्सर्जन तंत्र (Excretory System) की, जो शरीर की कोशिकाओं द्वारा उत्पन्न अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालकर शरीर में जल व लवणों का संतुलन (Homeostasis) बनाए रखता है।
| प्रकार | विषाक्तता | उदाहरण जीव |
|---|---|---|
| अमोनिया (Ammoniotelic) | सबसे अधिक विषैला, अत्यधिक जल चाहिए | अधिकांश मछलियां, जलीय कीट, अमीबा |
| यूरिया (Ureotelic) | मध्यम विषैला; यकृत अमोनिया को यूरिया में बदलता है | मनुष्य व अन्य स्तनधारी |
| यूरिक अम्ल (Uricotelic) | सबसे कम विषैला, पेस्ट/छर्रे के रूप में | पक्षी, सरीसृप, कीट |
💡 पक्षी अंडे के भीतर जहर-मुक्त कैसे रहते हैं?: पक्षी uricotelic हैं, इसलिए भ्रूण अंडे के बंद वातावरण में विकसित होते हुए भी यूरिक अम्ल (कम विषैला, ठोस) के रूप में नाइट्रोजनी अपशिष्ट जमा कर सकते हैं बिना खुद को नुकसान पहुंचाए — जबकि अधिक विषैला अमोनिया जमा होने पर भ्रूण की मृत्यु हो जाती। यह प्रकृति की एक शानदार अनुकूलन रणनीति है।
दो वृक्क (Kidneys — मुख्य अंग, रक्त छानकर मूत्र बनाते हैं), दो मूत्रवाहिनियां (Ureters — मूत्र को मूत्राशय तक पहुंचाती हैं), एक मूत्राशय (Urinary Bladder — मूत्र का अस्थायी भंडारण) तथा एक मूत्रमार्ग (Urethra — मूत्र शरीर से बाहर निकलने का मार्ग)।
🖼️ नेफ्रॉन की संरचना — मूत्र निर्माण की क्रियात्मक इकाई

वृक्क सेम के बीज समान आकार का, लाल रंग का अंग है — लंबाई 10-12 सेमी, चौड़ाई 6 सेमी, मोटाई 3-4 सेमी। यह उदरगुहा में डायफ्राम के नीचे, कशेरुक दंड के दोनों ओर स्थित होता है। वृक्क की मध्य सतह पर एक खांच — हाइलम (Hilum) — होती है, जिससे मूत्रनलिका, तंत्रिकाएं व रक्त वाहिनियां प्रवेश करती हैं।
वृक्क के अनुलंब खंड में दो भाग स्पष्ट दिखते हैं — वल्कुट/कॉर्टेक्स (Cortex, बाहरी भाग, मैल्पीगी कणिकाओं के कारण कणिकामय दिखता है) तथा मध्यांश/मेडुला (Medulla, भीतरी भाग, त्रिभुजाकार पिरामिडों में विभक्त, जिनके बीच बर्टिनी के वृक्कीय स्तंभ धंसे रहते हैं)।
◆ अमोनियोत्सर्गी ◆ यूरियोत्सर्गी ◆ यूरिकोत्सर्गी ◆ हाइलम ◆ वृक्क वल्कुट (Cortex) ◆ वृक्क मेडुला
प्रत्येक वृक्क में 10-12 लाख महीन, लंबी व कुंडलित नलिकाएं होती हैं जिन्हें नेफ्रॉन (Nephron) कहते हैं — यह वृक्क की संरचनात्मक व क्रियात्मक इकाई (Structural & Functional Unit) है।
प्रत्येक वृक्क प्रतिदिन लगभग 180 लीटर द्रव फिल्टर करता है — यानी दोनों वृक्क मिलाकर एक छोटे स्विमिंग पूल जितना द्रव रोज़ छानते हैं — परंतु अंतिम मूत्र मात्र 1-2 लीटर ही बनता है, क्योंकि 99% से अधिक पानी शरीर वापस खींच लेता है। यह दर्शाता है कि वृक्क कितने कुशल 'रीसाइक्लिंग प्लांट' हैं।
वृक्कीय देहली मान (Renal Threshold Value): किसी पदार्थ की रक्त में वह अधिकतम सांद्रता, जिस तक वह पूर्णतः ग्लोमेरुलर निस्पंद से पुनः अवशोषित हो जाता है। ग्लूकोज जैसे उच्च देहली पदार्थ सामान्यतः पूर्णतः अवशोषित होते हैं — इसीलिए स्वस्थ व्यक्ति के मूत्र में ग्लूकोज नहीं पाया जाता; डायबिटीज में रक्त शर्करा इतनी बढ़ जाती है कि देहली मान पार हो जाता है और मूत्र में ग्लूकोज दिखने लगता है।
मूत्र की संरचना: रंग हल्का पीला (यूरोक्रोम वर्णक के कारण), मात्रा 1-2 लीटर प्रतिदिन, pH हल्का अम्लीय (लगभग 6), जल 96%, यूरिया लगभग 2%, तथा अन्य कार्बनिक व अकार्बनिक लवण।
◆ मैल्पीगी काय ◆ ग्लोमेरुलस ◆ पोडोसाइट्स ◆ परानिस्पंदन ◆ चयनात्मक पुनरावशोषण ◆ नलिकीय स्रावण
वृक्क की कार्यप्रणाली मुख्यतः दो हार्मोनों द्वारा नियंत्रित होती है:
जब वृक्क समुचित कार्य नहीं करते, रक्त में यूरिया बढ़ जाता है (यूरेमिया)। कृत्रिम वृक्क (Artificial Kidney) द्वारा रक्त से यूरिया अलग करने की प्रक्रिया हीमोडायलिसिस कहलाती है — रोगी का रक्त सेलोफेन झिल्ली से बनी नलिकाओं से गुज़ारा जाता है, जो छोटे अणुओं (यूरिया, यूरिक अम्ल) को पार जाने देती है पर बड़े प्रोटीन अणुओं को रोक लेती है — सांद्रता प्रवणता द्वारा हानिकारक पदार्थ रक्त से अपोहनी द्रव में चले जाते हैं, फिर शुद्ध रक्त रोगी की शिरा में वापस भेज दिया जाता है।
💡 सेलोफेन झिल्ली — शरीर की नकल करने वाली तकनीक: डायलिसिस मशीन की सेलोफेन झिल्ली ठीक वैसे ही काम करती है जैसे असली वृक्क का ग्लोमेरुलस/पोडोसाइट्स करते हैं — छोटे अणुओं को जाने देना पर बड़े प्रोटीन अणुओं को रोकना। यह दिखाता है कि आधुनिक चिकित्सा तकनीक अक्सर प्रकृति के अपने 'फिल्टर डिज़ाइन' की नकल करके बनाई जाती है।
| रोग | कारण/लक्षण |
|---|---|
| यूरेमिया (Uraemia) | रक्त में यूरिया की अधिकता; गंभीर स्थिति में जानलेवा |
| गाउट (Gout) | रक्त में यूरिक अम्ल की अधिकता संधियों में जमा होना |
| वृक्क पथरी (Kidney Stones) | कैल्शियम ऑक्सेलेट, फॉस्फेट व यूरिक अम्ल क्रिस्टल जमाव |
| नेफ्राइटिस (Nephritis) | ग्लोमेरुलस में जीवाणु संक्रमण से सूजन, मूत्र में रक्त/प्रोटीन आना |
| ग्लाइकोसूरिया | मूत्र में ग्लूकोज — डायबिटीज मेलिटस का संकेत |
| डायबिटीज इन्सिपिडस | ADH की कमी से अत्यधिक मात्रा में तनु मूत्र बनना |
चूंकि एक वृक्क भी शरीर की ज़रूरतें पूरी कर सकता है (यही कारण है कि जीवित दाता एक वृक्क दान कर सकते हैं), वृक्क रोग अक्सर तब तक लक्षणहीन रहते हैं जब तक 70-80% क्षमता नष्ट न हो जाए — इसीलिए नियमित स्वास्थ्य जांच व पर्याप्त जल-सेवन वृक्क स्वास्थ्य के लिए अत्यंत आवश्यक है।
◆ एल्डोस्टेरॉन ◆ ADH/वेसोप्रेसिन ◆ हीमोडायलिसिस ◆ यूरेमिया ◆ गाउट ◆ नेफ्राइटिस
• पाचन तंत्र में आहारनाल (मुख से मलद्वार तक, 8-10 मीटर लंबी) तथा तीन पाचन ग्रंथियां (लार ग्रंथि, यकृत, अग्न्याशय) शामिल हैं; कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन व वसा क्रमशः एमाइलेज, पेप्सिन-ट्रिप्सिन तथा लाइपेज-पित्त लवण द्वारा चरणबद्ध रूप से सरल अवशोषण-योग्य इकाइयों में टूटते हैं। • छोटी आंत की विलाई व सूक्ष्मांकुर अवशोषक सतह को 1000 गुना बढ़ा देते हैं; ग्लूकोज-अमीनो अम्ल रक्त केशिकाओं में तथा वसा अम्ल लसीका लैक्टील में अवशोषित होते हैं; गैस्ट्रिन-सेक्रेटिन-CCK जैसे हार्मोन पाचन रसों के स्राव को नियमित करते हैं। • श्वसन तंत्र नासिका से कूपिकाओं तक वायु पहुंचाता है; निःश्वसन (मध्यपट संकुचन, सक्रिय) व उच्छ्वसन (शिथिलीकरण, निष्क्रिय) दाब प्रवणता के सिद्धांत पर काम करते हैं; O₂ 97% हीमोग्लोबिन से तथा CO₂ मुख्यतः (70-75%) बाइकार्बोनेट रूप में परिवहित होती है। • श्वसन का नियमन मेडुला ऑब्लांगाटा के श्वसन केंद्रों द्वारा रक्त CO₂ स्तर के आधार पर अनैच्छिक रूप से होता है; दमा, ब्रोंकाइटिस, निमोनिया व TB जैसे रोगों से बचाव हेतु स्वच्छ वायु व टीकाकरण आवश्यक है। • परिसंचरण तंत्र में रक्त (प्लाज्मा + RBC/WBC/Platelets), हृदय (चार कक्ष, कपाट, SA नोड पेसमेकर) तथा रक्त वाहिकाएं (धमनी-शिरा-केशिका) शामिल हैं; हृदय चक्र ~0.8 सेकंड में तथा कार्डियक आउटपुट ~5 लीटर/मिनट होता है। • मनुष्य में द्विक परिसंचरण (दैहिक + फुफ्फुसीय) रक्त को हृदय से दो बार गुजारता है; रक्तचाप सामान्यतः 120/80 mm Hg होता है; लसीका तंत्र अतिरिक्त ऊतक द्रव व वसा अवशोषण में सहायक है; धमनी कठिन्य व हृदयाघात कोलेस्ट्रॉल-जनित प्रमुख रोग हैं। • उत्सर्जन तंत्र नाइट्रोजनी अपशिष्ट (मनुष्य में मुख्यतः यूरिया) को वृक्क द्वारा बाहर निकालता है; नेफ्रॉन (10-12 लाख प्रति वृक्क) परानिस्पंदन, चयनात्मक पुनरावशोषण व नलिकीय स्रावण की त्रि-चरण प्रक्रिया द्वारा प्रतिदिन 180 लीटर द्रव को मात्र 1-2 लीटर मूत्र में बदल देते हैं। • ADH व एल्डोस्टेरॉन हार्मोन जल-लवण संतुलन नियंत्रित करते हैं; वृक्क विफलता में डायलिसिस या प्रत्यारोपण आवश्यक होता है; चारों तंत्र — पाचन, श्वसन, परिसंचरण व उत्सर्जन — मिलकर शरीर का सामंजस्यपूर्ण, स्वचालित जीवन-चक्र चलाते हैं।