🌸 अध्याय 4/15 — जीव विज्ञान

पादपों में जनन

लैंगिक एवं अलैंगिक जनन — Sexual and Asexual Reproduction in Plants
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📋 इस अध्याय में
  1. जनन का परिचय — अलैंगिक, कायिक एवं लैंगिक जनन में अंतर
  2. निम्न पादपों में जनन — क्लैमाइडोमोनास एवं स्पाइरोगायरा
  3. पुष्पीय पादपों में लघुबीजाणुजनन — परागकण निर्माण
  4. पुष्पीय पादपों में गुरुबीजाणुजनन — भ्रूणकोष निर्माण
  5. परागण (Pollination) — प्रकार एवं कारक
  6. निषेचन एवं द्विनिषेचन (Double Fertilization)
  7. बीज एवं फल का निर्माण तथा अंकुरण
  8. पादपों में प्राकृतिक कायिक प्रवर्धन
  9. कृत्रिम प्रवर्धन — कलम (कटिंग) एवं दाब कलम (लेयरिंग)
  10. ग्राफ्टिंग (कलम बाँधना)
  11. सूक्ष्मप्रवर्धन/ऊतक संवर्धन (Micropropagation)
  12. कायिक प्रवर्धन के लाभ एवं हानियाँ
📖 🌟 क्या आप जानते हैं?
1846 की एक सुबह, ऑस्ट्रेलिया के एक बगीचे में एक अंगूर की बेल पर बिना किसी बीज के अंगूर के गुच्छे लटके हुए थे — बागवानों को यह देखकर बड़ा अचरज हुआ, क्योंकि तब तक सभी जानते थे कि फल बनने के लिए बीज बनना ज़रूरी है, और बीज बनने के लिए निषेचन ज़रूरी है। पर यहाँ न कोई परागण हुआ, न निषेचन — फिर भी अंडाशय बढ़कर रसीला फल बन गया! वैज्ञानिकों ने इस अनोखी घटना को नाम दिया 'पार्थेनोकार्पी' यानी अनिषेकफलन। आज वही तरकीब जानबूझकर अपनाकर हम बीजरहित अंगूर, केला एवं तरबूज़ अपनी थाली तक पहुँचाते हैं। पर पौधों की दुनिया में और भी हैरान करने वाली बातें हैं — बगीचे में उगने वाला पत्थरचट्टा (Bryophyllum) का एक अकेला पत्ता, अगर टूटकर गीली मिट्टी पर गिर जाए, तो उसके किनारों पर लगी छोटी-छोटी कलियों से दर्जनों नन्हे पौधे उग आते हैं — बिना किसी फूल, बिना किसी बीज के! यानी पौधों ने खुद को आगे बढ़ाने के लिए एक नहीं, बल्कि कई-कई रास्ते खोज रखे हैं — कभी फूल खिलाकर, परागकण भेजकर, निषेचन करके; तो कभी सीधे अपनी जड़, तने या पत्ती के एक टुकड़े से ही नया जीवन रच देकर। आइए, पौधों की इसी अद्भुत जनन-यात्रा — अलैंगिक से लैंगिक तक, और प्रकृति से लेकर मनुष्य द्वारा बनाई गई कृत्रिम तकनीकों तक — को विस्तार से समझते हैं।

1 जनन का परिचय — अलैंगिक, कायिक एवं लैंगिक जनन में अंतर

जनन (Reproduction) वह जैविक प्रक्रिया है जिसके द्वारा सजीव अपनी ही तरह की संतति उत्पन्न करते हैं, जिससे प्रजाति की निरंतरता बनी रहती है। पौधों में जनन मुख्यतः तीन प्रकार से होता है — कायिक जनन, अलैंगिक जनन एवं लैंगिक जनन।

आधारकायिक/अलैंगिक जननलैंगिक जनन
जनक संख्याएक ही जनक (Parent) पर्याप्तसामान्यतः दो जनकों (नर व मादा) की आवश्यकता
युग्मक संलयननहीं होताहोता है (नर एवं मादा युग्मक का संलयन)
अर्धसूत्री विभाजनसामान्यतः नहीं होता (बीजाणु-जनन में अपवाद)होता है (युग्मक-निर्माण के दौरान)
संतति की प्रकृतिजनक की हूबहू प्रतिकृति/क्लोनआनुवंशिक रूप से भिन्न (नए गुण-संयोजन)
गतितीव्र, कम समय में अधिक संततिअपेक्षाकृत धीमी
उदाहरणआलू का कंद, गुलाब की कलमपुष्पीय पादपों में परागण-निषेचन द्वारा बीज बनना

कायिक/अलैंगिक जनन के उपप्रकार

🔍 दिलचस्प तथ्य — रोचक अपवाद — अपयुग्मन (Apomixis)

सिंहपर्णी (Dandelion) जैसे कुछ पौधों में एक असाधारण अलैंगिक प्रक्रिया पाई जाती है, जिसे अपयुग्मन कहते हैं — इसमें बिना परागण एवं बिना निषेचन के ही बीजांड की एक द्विगुणित कायिक कोशिका सीधे भ्रूण में बदल जाती है, और बीजांड सामान्य बीज की तरह ही परिपक्व होकर फैलता है। यानी यहाँ 'बीज' तो बनता है, पर उसके पीछे कोई लैंगिक प्रक्रिया नहीं होती — प्रकृति की यह तरकीब पौधे को अपनी हूबहू प्रतिकृति बीज के रूप में फैलाने देती है।

📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)

◆ जनन ◆ कायिक जनन ◆ खंडन ◆ विखंडन ◆ मुकुलन ◆ बीजाणु निर्माण ◆ विषमबीजाणुकी ◆ अपयुग्मन

2 निम्न पादपों में जनन — क्लैमाइडोमोनास एवं स्पाइरोगायरा

निम्न पादपों (शैवाल) में जनन की विविधता को समझने के लिए दो प्रसिद्ध उदाहरण लिए जाते हैं — एककोशिकीय क्लैमाइडोमोनास एवं तंतुरूपी स्पाइरोगायरा। दोनों ही अगुणित (Haploid) होते हैं, इसलिए इन्हें 'युग्मकोद्भिद' (Gametophyte) कहा जाता है।

क्लैमाइडोमोनास (Chlamydomonas)

यह एककोशिकीय, मीठे पानी में पाया जाने वाला नाशपाती के आकार का शैवाल है, जिसके संकरे सिरे पर दो कशाभिकाएँ (Flagella), एक प्रकाश-संवेदी नेत्रबिंदु (Eyespot) तथा प्याले के आकार का हरितलवक होता है।

इसमें अलैंगिक जनन जल की उपलब्धता के अनुसार तीन रूपों में होता है — पर्याप्त जल में चल बीजाणु (Zoospores) बनते हैं (जनक कोशिका के भीतर समसूत्री विभाजन से 2-16 संतति कोशिकाएँ बनती हैं, प्रत्येक में कशाभिका विकसित होकर जनक भित्ति फटने पर मुक्त होती है); पतली जलपरत में अचल बीजाणु (Aplanospores) बनते हैं (यह अवस्था 'पामेला अवस्था' कहलाती है); तथा जल सूखने पर स्थिरोढ़ बीजाणु (Hypnospores) बनते हैं, जिनकी मोटी काली-भूरी भित्ति प्रतिकूल समय में सुरक्षा देती है।

लैंगिक जनन तीन प्रकार का हो सकता है — समयुग्मकी (Isogamy, जहाँ दोनों संगमित युग्मक आकार में समान होते हैं), असमयुग्मकी (Anisogamy, जहाँ मादा युग्मक नर युग्मक से बड़ा होता है), तथा अंडयुग्मकी (Oogamy, जहाँ मादा कोशिका की पूरी सामग्री ही एक अचल अंड बन जाती है, जिससे कई गतिशील नर युग्मकों में से केवल एक निषेचन करता है)। संलयन से बनी द्विगुणित युग्मनज मोटी रंजित भित्ति (युग्मनजाणु) बनाकर सुप्त रहती है, तथा अनुकूल समय आने पर अर्धसूत्री विभाजन से चार अगुणित चल बीजाणु बनाती है, जो नए पौधे में विकसित होते हैं।

स्पाइरोगायरा (Spirogyra)

यह मीठे पानी में तैरने वाला तंतुरूपी (धागेनुमा) शैवाल है, जिसकी हर कोशिका में एक अथवा अधिक कुंडलित फीतेनुमा हरितलवक पाए जाते हैं। इसका कायिक जनन खंडन (Fragmentation) द्वारा होता है — तंतु टूटकर बने प्रत्येक टुकड़े से समसूत्री विभाजन द्वारा नया तंतु बन जाता है।

इसका लैंगिक जनन एक विशेष विधि — सर्पी संयुग्मन (Conjugation) — द्वारा होता है, जो दो प्रकार का होता है: सोपानी संयुग्मन (Scalariform Conjugation), जिसमें दो अलग-अलग तंतु पास-पास आकर सीढ़ीनुमा आकृति बनाते हैं तथा दोनों तंतुओं की सम्मुख कोशिकाओं के बीच एक संयोजी नलिका बनती है, जिससे एक तंतु (नर) की कोशिका-सामग्री दूसरे तंतु (मादा) की कोशिका में अमीबीय गति से पहुँचकर संलयित हो जाती है; तथा पार्श्व संयुग्मन (Lateral Conjugation), जिसमें एक ही तंतु में क्रमागत नर-मादा कोशिकाओं के बीच पार्श्व नलिका बनकर संलयन होता है। संलयन से बनी युग्मनज मोटी भित्ति बनाकर सुषुप्त रहती है, तथा अनुकूल परिस्थिति में अर्धसूत्री विभाजन से (जिसमें चार में से तीन केंद्रक नष्ट हो जाते हैं) एक नया अगुणित तंतु जन्म लेता है।

📌 महत्वपूर्ण — 💡 आसान भाषा में

क्लैमाइडोमोनास एवं स्पाइरोगायरा दोनों में जनन की एक ही अंतर्निहित कहानी दोहराई जाती है — 'अच्छे समय में तेज़ प्रजनन (अलैंगिक), बुरे समय में मज़बूत सुरक्षा-कवच के साथ जीवन का इंतज़ार (लैंगिक/सुप्त युग्मनज)' — यह रणनीति निम्न पादपों को अनिश्चित जलीय वातावरण में जीवित रहने में मदद करती है।

📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)

◆ क्लैमाइडोमोनास ◆ स्पाइरोगायरा ◆ चल बीजाणु ◆ समयुग्मकी ◆ असमयुग्मकी ◆ अंडयुग्मकी ◆ संयुग्मन ◆ युग्मनजाणु

3 पुष्पीय पादपों में लघुबीजाणुजनन — परागकण निर्माण

जैसा हमने पादप के भाग वाले अध्याय में पढ़ा था, पुष्प का पुमंग (Androecium) पुंकेसरों से बना होता है, तथा प्रत्येक पुंकेसर के परागकोश (Anther) में चार परागकोष्ठ (Pollen Sacs/Microsporangia) होते हैं। इन्हीं परागकोष्ठों में लघुबीजाणुजनन की पूरी प्रक्रिया संपन्न होती है।

परागकोश की भित्ति संरचना

परिपक्व परागकोश की भित्ति तीन परतों से बनी होती है — बाह्यत्वचा (Epidermis, सबसे बाहरी, सुरक्षात्मक), मध्य परत (Middle Layer, पतली भित्ति वाली कोशिकाएँ), तथा टेपेटम (Tapetum, सबसे भीतरी परत, बड़ी कोशिकाओं से बनी) — टेपेटम विकसित हो रहे परागकणों को पोषण प्रदान करने का महत्वपूर्ण कार्य करता है, इसीलिए इसे परागकण की 'नर्सरी' भी कहा जा सकता है।

परागकण का निर्माण

प्रत्येक परागकोष्ठ में बड़ी, सघन कोशिकाद्रव्य वाली बीजाणुजन कोशिकाएँ (लघुबीजाणु मातृ कोशिकाएँ) पाई जाती हैं। ये कोशिकाएँ अर्धसूत्री विभाजन से गुज़रती हैं, जिससे प्रत्येक मातृ कोशिका से चार अगुणित लघुबीजाणु बनते हैं, जो एक चतुष्क (Tetrad) में व्यवस्थित रहते हैं — प्रत्येक लघुबीजाणु ही आगे चलकर परागकण (पराग-कण/Pollen Grain) अर्थात् नर युग्मकोद्भिद की पहली कोशिका बनता है।

परागकण की संरचना

परागकण की भित्ति दो परतों से बनी होती है — बाह्यचोल (Exine), जो अत्यंत टिकाऊ पदार्थ स्पोरोपॉलेनिन (Sporopollenin) से बना होता है, इसमें कुछ पतले स्थान होते हैं जिन्हें जनन-छिद्र (Germ Pores) कहते हैं, जहाँ से आगे परागनलिका बाहर निकलती है; तथा अंतश्चोल (Intine), जो पतली एवं सेल्यूलोज़ से बनी भीतरी परत है। परागकण का केंद्रक परिधि की ओर खिसककर विभाजित हो जाता है, जिससे एक बड़ी कायिक कोशिका (Vegetative Cell) एवं एक छोटी जनन कोशिका (Generative Cell) बनती है। ध्यान रहे — परागकण स्वयं नर युग्मक नहीं है, बल्कि नर युग्मक बनाने वाली संरचना अर्थात् नर युग्मकोद्भिद (Male Gametophyte) है।

💡 वास्तविक उपयोग — आर्थिक/वैज्ञानिक महत्व

स्पोरोपॉलेनिन इतना टिकाऊ पदार्थ है कि यह अम्ल, क्षार एवं उच्च तापमान तक झेल सकता है — इसीलिए हज़ारों-लाखों वर्ष पुराने परागकण भी जीवाश्मों में सुरक्षित मिल जाते हैं। पुरा-वनस्पति वैज्ञानिक (Palaeobotanists) इन्हीं प्राचीन परागकणों के अध्ययन (जिसे परागाणु विज्ञान/Palynology कहते हैं) से हज़ारों वर्ष पहले की जलवायु एवं वनस्पति का पुनर्निर्माण करते हैं — शहद की गुणवत्ता जाँचने में भी परागाणु विज्ञान का उपयोग होता है।

📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)

◆ परागकोश ◆ टेपेटम ◆ लघुबीजाणु मातृ कोशिका ◆ परागकण ◆ बाह्यचोल ◆ अंतश्चोल ◆ स्पोरोपॉलेनिन ◆ जनन-छिद्र ◆ नर युग्मकोद्भिद

4 पुष्पीय पादपों में गुरुबीजाणुजनन — भ्रूणकोष निर्माण

जायांग (Gynoecium) के अंडाशय के भीतर बीजांड (Ovule) पाए जाते हैं, जो वास्तव में एकीकृत गुरुबीजाणुधानी (Integumented Megasporangium) हैं — यहीं मादा युग्मकोद्भिद अर्थात् भ्रूणकोष (Embryo Sac) का निर्माण होता है।

बीजांड की संरचना

बीजांड में केंद्रीय भाग को बीजांडकाय (Nucellus) कहते हैं, जो एक अथवा दो आवरणों — अध्यावरण (Integuments) — से घिरा रहता है, जिसमें एक छोटा-सा छिद्र छूटा रहता है जिसे बीजांडद्वार (Micropyle) कहते हैं — यही वह द्वार है जहाँ से परागनलिका भीतर प्रवेश करती है। बीजांड एक डंठल — बीजांडवृंत (Funiculus) — द्वारा अंडाशय की भित्ति (बीजांडासन) से जुड़ा रहता है, तथा बीजांडद्वार के ठीक विपरीत सिरे को निभाग (Chalaza) कहते हैं।

भ्रूणकोष का विकास

बीजांडकाय की एक अधश्चर्मीय (Hypodermal) कोशिका बड़ी होकर गुरुबीजाणु मातृ कोशिका बनती है, जो अर्धसूत्री विभाजन द्वारा चार अगुणित गुरुबीजाणु बनाती है — इनमें से तीन नष्ट हो जाते हैं, केवल एक क्रियाशील गुरुबीजाणु बचता है। यह क्रियाशील गुरुबीजाणु आकार में बड़ा होकर तीन क्रमागत समसूत्री विभाजनों से गुज़रता है, जिससे कुल आठ अगुणित केंद्रक बनते हैं — यही युवा भ्रूणकोष है।

ये आठ केंद्रक तीन समूहों में व्यवस्थित हो जाते हैं — तीन बीजांडद्वार सिरे पर, तीन निभाज सिरे पर, तथा दो केंद्र में। केंद्रीय दो को छोड़कर बाकी सभी केंद्रकों के चारों ओर कोशिका भित्ति बन जाती है — इस प्रकार अंतिम परिपक्व भ्रूणकोष में 8 केंद्रक किंतु केवल 7 कोशिकाएँ होती हैं, जो इस प्रकार व्यवस्थित होती हैं:

📌 महत्वपूर्ण

🖼️ पुष्प की अनुदैर्ध्य काट — बीजांड एवं भ्रूणकोष की स्थिति समझने हेतु संदर्भ चित्र

जीव विज्ञान चित्र
📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)

◆ बीजांडकाय ◆ अध्यावरण ◆ बीजांडद्वार ◆ बीजांडवृंत ◆ निभाग ◆ गुरुबीजाणु मातृ कोशिका ◆ भ्रूणकोष ◆ अंड उपकरण ◆ सहायक कोशिका ◆ प्रतिमुख कोशिका ◆ ध्रुवीय केंद्रक

5 परागण (Pollination) — प्रकार एवं कारक

परागकोश से परागकणों का वर्तिकाग्र (Stigma) तक स्थानांतरित होना परागण कहलाता है। यह दो प्रकार का होता है — स्वपरागण (Self-pollination), जिसमें परागकण उसी पुष्प अथवा उसी पौधे के किसी अन्य पुष्प के वर्तिकाग्र पर पहुँचते हैं (जैसे मटर, चना — फलीदार कुल के पौधों में सामान्य); तथा पर-परागण (Cross-pollination), जिसमें परागकण एक पौधे से उसी प्रजाति के किसी दूसरे पौधे के पुष्प तक पहुँचते हैं (जैसे ताड़, मक्का)।

परागण का महत्व

पर-परागण के कारक (Agents) एवं पुष्पीय अनुकूलन

कारकपुष्पीय अनुकूलनउदाहरण
वायु (Anemophily)पुष्प छोटे, फीके रंग के, गंधहीन; भारी मात्रा में हल्के परागकण; वर्तिकाग्र बड़ा व रोमयुक्तघास, मक्का
कीट (Entomophily)पुष्प बड़े, रंगीन, आकर्षक; मकरंद (नेक्टर) स्रावितगुड़हल, सरसों, साल्विया (मधुमक्खी परागित)
जल (Hydrophily)भारी संख्या में परागकण जल की सतह पर तैरकर मादा पुष्प तक पहुँचते हैंहाइड्रिला, वैलिसनेरिया
पक्षी/जंतु (Ornithophily/Zoophily)चमकीले रंग, बड़े आकार व सुगंध से आकर्षणसूर्यपक्षी द्वारा केना/ग्लैडियोलस, गिलहरी द्वारा सेमल

पर-परागण को बढ़ावा देने वाले पुष्पीय अनुकूलन

स्वपरागण सुनिश्चित करने वाले उपाय

📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)

◆ परागण ◆ स्वपरागण ◆ पर-परागण ◆ एनीमोफिली ◆ एंटोमोफिली ◆ हाइड्रोफिली ◆ द्विपक्वता ◆ स्व-वंध्यता ◆ क्लिस्टोगैमी

6 निषेचन एवं द्विनिषेचन (Double Fertilization)

सही वर्तिकाग्र पर पहुँचने के बाद अनुकूल परिस्थिति में परागकण अंकुरित होकर एक परागनलिका (Pollen Tube) बाहर निकालता है, जो जनन-छिद्र से निकलकर वर्तिकाग्र एवं वर्तिका के ऊतकों को भेदते हुए बीजांडद्वार से होकर भ्रूणकोष में प्रवेश करती है। इस दौरान कायिक कोशिका का केंद्रक (नलिका केंद्रक) नलिका के अग्र सिरे पर रहकर मार्गदर्शन करता है और अंततः नष्ट हो जाता है, जबकि जनन कोशिका विभाजित होकर दो नर युग्मक बनाती है, जो नलिका के अग्र सिरे पर पहुँच जाते हैं। परागनलिका एक सहायक कोशिका (Synergid) को भेदकर फटती है, तथा दोनों नर युग्मक भ्रूणकोष में मुक्त हो जाते हैं।

द्विनिषेचन — पुष्पीय पादपों की अनूठी विशेषता

पुष्पीय पादपों (आवृतबीजी) में निषेचन एक अनोखी घटना है, जिसमें दो पृथक संलयन एक साथ होते हैं — इसीलिए इसे 'द्विनिषेचन' कहा जाता है:

📌 महत्वपूर्ण — 📐 द्विनिषेचन का सार — सूत्र/प्रक्रिया

नर युग्मक-1 (n) + अंड कोशिका (n) → युग्मनज (2n) → भ्रूण नर युग्मक-2 (n) + द्वितीयक केंद्रक (2n) → प्राथमिक भ्रूणपोष केंद्रक (3n) → भ्रूणपोष

निषेचन का महत्व दोहरा है — पहला, यह अंडाशय को फल में विकसित होने के लिए प्रेरित करता है; दूसरा, युग्मनज में दोनों जनकों के गुणों का नया संयोजन बनता है, जो संतति में विविधता लाता है। यह द्विनिषेचन की प्रक्रिया केवल आवृतबीजी (फूल वाले) पौधों में ही पाई जाती है — यही कारण है कि इन्हें जीव-विकास की दृष्टि से सबसे उन्नत पादप समूह माना जाता है।

📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)

◆ परागनलिका ◆ द्विनिषेचन ◆ युग्मक संलयन ◆ त्रि-संलयन ◆ युग्मनज ◆ प्राथमिक भ्रूणपोष केंद्रक

7 बीज एवं फल का निर्माण तथा अंकुरण

बीज एवं फल की बाहरी संरचना (बीजावरण, भ्रूण, पेरिकार्प आदि) का विस्तृत वर्णन हम 'पादप के भाग' अध्याय में कर चुके हैं। यहाँ हम निषेचन के तुरंत बाद होने वाले आंतरिक विकास-क्रम को समझेंगे, ताकि द्विनिषेचन से बीज बनने तक की पूरी कड़ी जुड़ सके।

भ्रूणपोष का विकास

त्रिगुणित प्राथमिक भ्रूणपोष केंद्रक बार-बार समसूत्री विभाजन करके भ्रूणपोष बनाता है, जो विकासशील भ्रूण को पोषण देता है। यह विकास तीन प्रकार से हो सकता है — केंद्रकीय प्रकार (Nuclear Type, सबसे सामान्य — मक्का, गेहूँ, चावल में — जिसमें पहले बार-बार केंद्रक-विभाजन होता है, कोशिका भित्ति बाद में परिधि से केंद्र की ओर बनती है), कोशिकीय प्रकार (Cellular Type, हर विभाजन के तुरंत बाद कोशिका भित्ति बन जाती है), तथा हीलोबियल प्रकार (मध्यवर्ती रूप)। मटर-चने जैसे द्विबीजपत्री पौधों में भ्रूणपोष बीज पकने से पहले ही बीजपत्रों द्वारा सोख लिया जाता है, जबकि अनाजों एवं नारियल में यह परिपक्व बीज तक बना रहता है।

भ्रूण का विकास

युग्मनज पहले विभाजित होकर एक ऊपरी भ्रूणी कोशिका एवं एक निचली निलंबक कोशिका बनाता है। निचली कोशिका विभाजित होकर एक निलंबक (Suspensor) बनाती है, जो विकासशील भ्रूण को भ्रूणपोष के भीतर धकेलकर पोषण तक उसकी पहुँच आसान बनाता है। ऊपरी भ्रूणी कोशिका बार-बार विभाजित होकर क्रमशः मूलांकुर, प्रांकुर एवं बीजपत्र(पत्रों) में विभेदित हो जाती है — इस प्रकार द्विबीजपत्री बीज (जैसे मटर) में दो बीजपत्र तथा एकबीजपत्री बीज (जैसे गेहूँ) में एक ही बीजपत्र (जिसे स्कुटेलम कहते हैं) बनता है।

📌 महत्वपूर्ण — बहुभ्रूणता (Polyembryony)

कभी-कभी एक ही बीजांड में एक से अधिक भ्रूण बन जाते हैं, जिसे बहुभ्रूणता कहते हैं — यह दो तरह से हो सकती है: अपस्थानिक बहुभ्रूणता (जब भ्रूणकोष की अन्य कोशिकाओं, जैसे सहायक अथवा प्रतिमुख कोशिकाओं से भी अतिरिक्त भ्रूण बन जाएँ) तथा विदलन बहुभ्रूणता (जब युग्मनज स्वयं विभाजित होकर एक से अधिक स्वतंत्र भ्रूण बना दे)। खट्टे फलों (नींबू, संतरा) में यह घटना विशेष रूप से देखी जाती है।

बीज का अंकुरण

अनुकूल नमी, तापमान एवं ऑक्सीजन मिलने पर बीज जल सोखता (Imbibition) है, फूलता है, संचित भोजन एंजाइमों द्वारा घुलनशील रूप (शर्करा, अमीनो अम्ल) में बदलता है, बीजावरण फटता है, तथा पहले मूलांकुर (जड़) एवं फिर प्रांकुर (प्ररोह) बाहर निकलता है। यह दो प्रकार से हो सकता है — अधिभूमिक अंकुरण (Epigeal, जिसमें बीजपत्र मिट्टी से बाहर आ जाते हैं — सेम, अरंडी, नीम) एवं अधोभूमिक अंकुरण (Hypogeal, जिसमें बीजपत्र मिट्टी के भीतर ही रह जाते हैं — मटर, मक्का, चावल), जैसा हमने 'पादप के भाग' अध्याय में भी संक्षेप में देखा था।

📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)

◆ भ्रूणपोष ◆ निलंबक ◆ बहुभ्रूणता ◆ अधिभूमिक अंकुरण ◆ अधोभूमिक अंकुरण

8 पादपों में प्राकृतिक कायिक प्रवर्धन

कायिक प्रवर्धन (Vegetative Propagation) में पौधे के किसी कायिक भाग — जड़, तना अथवा पत्ती — से सीधे नया पौधा बन जाता है, जो जनक की हूबहू आनुवंशिक प्रतिकृति (क्लोन) होता है। हम इसके अधिकांश तने-संबंधी रूपांतरण (प्रकंद, घनकंद, शल्क कंद, ग्रंथिल कंद, उपरिभूस्तारी आदि) 'पादप के भाग' अध्याय में विस्तार से पढ़ चुके हैं — यहाँ हम इन्हें जनन की दृष्टि से एक साथ समेटते हैं तथा पत्ती द्वारा होने वाले प्रवर्धन को नए सिरे से समझेंगे।

भागविधिउदाहरण
जड़ग्रंथिल जड़ों पर अपस्थानिक कलिकाएँशतावरी, शकरकंद
तना (भूमिगत)प्रकंद, घनकंद, शल्क कंद, ग्रंथिल कंदअदरक, अरबी, प्याज़, आलू
तना (अर्ध-हवाई)उपरिभूस्तारी, चूषकघास, गुलदाउदी
पत्तीपर्ण-किनारों पर अपस्थानिक कलिकाएँपत्थरचट्टा (Bryophyllum), Kalanchoe
विशेष भागबल्बिल (पुष्प-कलिका से बना छोटा कायिक अंग)एगेव, ऑक्ज़ैलिस, अनानास

पत्ती द्वारा प्रवर्धन — पत्थरचट्टा का अनोखा उदाहरण

पत्थरचट्टा (Bryophyllum) एवं कैलेंकोई (Kalanchoe) की पत्तियों के किनारों पर छोटे-छोटे खाँचों में अपस्थानिक कलिकाएँ बनती हैं, जो धीरे-धीरे छोटे-छोटे नन्हे पौधों में विकसित हो जाती हैं — जब पत्ती टूटकर गीली मिट्टी पर गिरती है (जैसा हमारी हुक कहानी में बताया गया), तो ये नन्हे पौधे अलग होकर स्वतंत्र रूप से जड़ पकड़ लेते हैं।

📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)

◆ कायिक प्रवर्धन ◆ क्लोन ◆ अपस्थानिक कलिका ◆ बल्बिल ◆ पत्थरचट्टा

9 कृत्रिम प्रवर्धन — कलम (कटिंग) एवं दाब कलम (लेयरिंग)

प्राकृतिक विधियों के अतिरिक्त मनुष्य ने कृषि एवं उद्यान विज्ञान में पौधों को बड़े पैमाने पर, तेज़ी से एवं मनचाहे गुणों सहित बढ़ाने के लिए कई कृत्रिम प्रवर्धन तकनीकें विकसित की हैं।

कलम (Cutting)

पौधे के तने के एक टुकड़े (जिसमें कम-से-कम एक कलिका हो) को काटकर सीधे मिट्टी अथवा पानी में लगा दिया जाता है, जहाँ वह अपस्थानिक जड़ें एवं कलिकाएँ विकसित कर एक स्वतंत्र पौधा बन जाता है। यह गुलाब, बोगेनविलिया, क्रोटन, कोलियस, मनी प्लांट एवं गन्ने जैसे पौधों के व्यावसायिक प्रवर्धन की सबसे सरल, सस्ती एवं तेज़ विधि है — नर्सरी उद्योग में इसका बहुत व्यापक उपयोग होता है।

दाब कलम (Layering)

इस विधि में पौधे की एक निचली, लचीली शाखा को बिना जनक पौधे से अलग किए हुए ही ज़मीन की ओर झुकाकर, उस भाग की छाल की एक वलय हटाकर, नम मिट्टी से ढक दिया जाता है, तथा शाखा का अगला सिरा मिट्टी के बाहर खुला छोड़ दिया जाता है। कुछ सप्ताह में दबे हुए भाग में पर्याप्त अपस्थानिक जड़ें बन जाती हैं, जिसके बाद उसे जनक पौधे से काटकर स्वतंत्र पौधे के रूप में रोप दिया जाता है — चमेली, स्ट्रॉबेरी, अंगूर एवं बोगेनविलिया में यह विधि लोकप्रिय है।

गूटी/हवाई दाब कलम (Air Layering/Gootee)

जब पौधे की शाखा को ज़मीन तक झुकाना संभव न हो (जैसे लंबे, काष्ठीय तनों में), तो चुनी गई शाखा पर ऊँचाई पर ही छाल की एक वलय हटाकर, उस घाव को नम काई (Moss) से ढककर पॉलिथीन शीट से लपेट दिया जाता है। कुछ समय बाद जब उस स्थान पर जड़ें दिखाई देने लगती हैं, तो शाखा को जड़ों के ठीक नीचे से काटकर अलग गमले अथवा ज़मीन में रोप दिया जाता है — यह विधि विशेष रूप से लीची, अमरूद एवं सजावटी पौधों में प्रयुक्त होती है।

📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)

◆ कलम (Cutting) ◆ दाब कलम (Layering) ◆ गूटी ◆ अपस्थानिक जड़ें

10 ग्राफ्टिंग (कलम बाँधना)

ग्राफ्टिंग एक ऐसी तकनीक है जिसमें दो अलग-अलग पौधों के भागों को इस प्रकार जोड़ा जाता है कि वे आपस में जुड़कर एक ही पौधे की तरह वृद्धि करने लगें। इसमें दो भाग होते हैं — स्कन्ध/मूलवृंत (Stock), जो पहले से जड़ जमाए हुए, रोगप्रतिरोधी एवं शारीरिक रूप से मज़बूत पौधा होता है; तथा वृंतकलम/सायन (Scion), जो वांछित गुणों (स्वादिष्ट फल, सुंदर फूल) वाले पौधे से लिया गया तने का एक छोटा टुकड़ा होता है।

ग्राफ्टिंग की विधि

सायन के निचले सिरे को पच्चरनुमा (कील के आकार का) तिरछा काटा जाता है। स्कन्ध के तने को काटकर उसमें ऊर्ध्वाधर दरार बनाई जाती है, जिसमें सायन को फिट करके डाला जाता है, ताकि दोनों की संवहन ऊतक-परतें (कैंबियम) यथासंभव एक-दूसरे के संपर्क में आ जाएँ। इसके बाद जोड़ को टेप अथवा रबर बैंड से कसकर बाँध दिया जाता है, जब तक कि दोनों भागों के ऊतक आपस में जुड़कर सतत संवहन तंत्र स्थापित न कर लें।

📌 महत्वपूर्ण

🖼️ ग्राफ्टिंग की विभिन्न पारंपरिक विधियाँ — स्कन्ध एवं सायन को जोड़ने के तरीके

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ग्राफ्टिंग मुख्यतः द्विबीजपत्री पौधों में सफल होती है, तथा फूलों एवं फलों की उन्नत किस्मों को व्यावसायिक रूप से बढ़ाने में इसका बहुत महत्व है — विशेष रूप से उन पौधों में जो बीज से उगाने पर मूल किस्म जैसे गुण न दें (जैसे बीजरहित किस्में)।

फसलग्राफ्टिंग का उपयोग
आमउन्नत स्वाद-गुणवत्ता वाली किस्मों (जैसे दशहरी, लंगड़ा) का बड़े पैमाने पर उत्पादन
सेबरोग-प्रतिरोधी जड़ पर उन्नत फल किस्म आरोपित करना
खट्टे फल (Citrus)नींबू-संतरे की किस्मों में एकरूपता एवं शीघ्र फलन
गुलाब, बोगेनविलियाएक ही पौधे पर विभिन्न रंगों के फूल खिलाना (बहुरंगी ग्राफ्टेड पौधे)
📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)

◆ ग्राफ्टिंग ◆ स्कन्ध/मूलवृंत ◆ सायन ◆ कैंबियम संपर्क

11 सूक्ष्मप्रवर्धन/ऊतक संवर्धन (Micropropagation/Tissue Culture)

यह आधुनिक जैव-प्रौद्योगिकी पर आधारित सबसे उन्नत कृत्रिम प्रवर्धन तकनीक है, जिसमें पौधे के एक बेहद छोटे ऊतक-टुकड़े, अंग अथवा यहाँ तक कि एक अकेली कोशिका (जिसे 'एक्सप्लांट/Explant' कहते हैं) से हज़ारों समरूप पौधे तैयार किए जा सकते हैं।

सूक्ष्मप्रवर्धन की प्रक्रिया

📌 महत्वपूर्ण

🖼️ सूक्ष्मप्रवर्धन/ऊतक संवर्धन की प्रक्रिया — एक्सप्लांट से कैलस तथा कैलस से पौधकों तक

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इस तकनीक का सबसे बड़ा लाभ यह है कि जनक पौधे की बेहद कम मात्रा में उपलब्ध ऊतक से भी असीमित संख्या में आनुवंशिक रूप से समरूप (रोगमुक्त) पौधे तैयार किए जा सकते हैं। भारत में ऑर्किड, कारनेशन, गुलदाउदी एवं शतावरी जैसे पौधों के व्यावसायिक उत्पादन में सूक्ष्मप्रवर्धन का सफलतापूर्वक उपयोग किया जा रहा है — इसके अतिरिक्त केला, आलू एवं गन्ने जैसी फसलों में भी रोगमुक्त पौध तैयार करने के लिए यह तकनीक आज कृषि उद्योग की रीढ़ बन चुकी है।

📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)

◆ सूक्ष्मप्रवर्धन ◆ एक्सप्लांट ◆ बाँझ परिस्थितियाँ ◆ कैलस ◆ पौधक (Plantlet)

12 कायिक प्रवर्धन के लाभ एवं हानियाँ

प्राकृतिक हो अथवा कृत्रिम, कायिक प्रवर्धन की तकनीकों के अपने विशिष्ट लाभ एवं सीमाएँ हैं, जिन्हें समझना कृषि-नीति एवं फसल प्रबंधन के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है।

🟢 लाभ🔴 हानियाँ
◆ जनन की तीव्र एवं सरल विधि — बीज-अंकुरण के इंतज़ार के बिना ही तेज़ी से फैलाव ◆ संतति जनक की हूबहू प्रतिकृति होती है, जिससे मनचाहे गुण (स्वाद, रंग, उपज) सुरक्षित रहते हैं ◆ भोजन-संग्रह अंगों (कंद, प्रकंद) के माध्यम से पौधा प्रतिकूल मौसम में जीवित रह पाता है ◆ सजावटी एवं फलदार पौधों की उन्नत किस्मों को आसानी से गुणित किया जा सकता है ◆ बीज-प्रवर्धन की तुलना में तेज़, सरल एवं कम खर्चीली विधि◆ समय के साथ भीड़भाड़ एवं स्थान-प्रतिस्पर्धा — कृत्रिम रूप से अलग न किया जाए तो अतिवृद्धि ◆ उत्परिवर्तन (Mutation) को छोड़कर इस विधि से नई किस्में उत्पन्न नहीं होतीं — आनुवंशिक विविधता सीमित रहती है ◆ प्रजाति-विशिष्ट रोग बहुत तेज़ी से फैल सकते हैं, क्योंकि सभी संतति आनुवंशिक रूप से समरूप होती हैं — एक रोग पूरी फसल को प्रभावित कर सकता है
🔗 सम्बन्ध — कृषि नीति से जुड़ाव

यही कारण है कि आधुनिक कृषि वैज्ञानिक कायिक प्रवर्धन (उन्नत किस्म बनाए रखने के लिए) एवं लैंगिक जनन/संकरण (नई, रोग-प्रतिरोधी किस्में विकसित करने के लिए) — दोनों विधियों का संतुलित उपयोग करने की सलाह देते हैं। उदाहरण के लिए, केले की खेती पूरी तरह कायिक प्रवर्धन (सकर/ऊतक संवर्धन) पर निर्भर है, इसीलिए विश्व भर में केले की एक बड़ी आबादी आनुवंशिक रूप से लगभग समरूप है — यही कारण है कि 'पनामा रोग' जैसी फफूंद बीमारियाँ केले की फसलों को इतनी तेज़ी से तबाह कर पाती हैं, जो कृषि वैज्ञानिकों के लिए आज भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।

📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)

◆ कायिक प्रवर्धन के लाभ ◆ उत्परिवर्तन ◆ रोग-प्रसार जोखिम ◆ पनामा रोग

💡 वास्तविक उपयोग — 📌 अध्याय सारांश (Chapter Summary)

• पादपों में जनन तीन प्रकार से होता है — कायिक जनन (जड़-तना-पत्ती से सीधे नया पौधा, जैसे आलू-अदरक-पत्थरचट्टा), अलैंगिक जनन (खंडन, विखंडन, मुकुलन, बीजाणु-निर्माण) एवं लैंगिक जनन (नर-मादा युग्मकों का संलयन); सिंहपर्णी जैसे कुछ पौधों में बिना निषेचन के ही बीज बनने की अनोखी प्रक्रिया अपयुग्मन कहलाती है। • क्लैमाइडोमोनास एवं स्पाइरोगायरा जैसे निम्न शैवालों में अलैंगिक जनन (बीजाणु/खंडन द्वारा) एवं लैंगिक जनन (समयुग्मकी-असमयुग्मकी-अंडयुग्मकी अथवा संयुग्मन द्वारा) दोनों देखे जाते हैं। • पुष्पीय पादपों में परागकोश के भीतर अर्धसूत्री विभाजन से लघुबीजाणु (परागकण/नर युग्मकोद्भिद) बनते हैं, जबकि बीजांड के भीतर गुरुबीजाणु मातृ कोशिका से भ्रूणकोष (7-कोशिकीय, 8-केंद्रकीय मादा युग्मकोद्भिद) बनता है। • परागण (स्व अथवा पर-परागण) वायु, कीट, जल एवं पक्षी-जंतु जैसे कारकों द्वारा होता है; निषेचन में परागनलिका द्वारा भ्रूणकोष तक पहुँचे दो नर युग्मक द्विनिषेचन (युग्मक संलयन से युग्मनज तथा त्रि-संलयन से त्रिगुणित भ्रूणपोष केंद्रक) संपन्न करते हैं — यह विशेषता केवल आवृतबीजी पौधों में पाई जाती है। • निषेचन के बाद बीजांड बीज में तथा अंडाशय फल में विकसित होता है; भ्रूण मूलांकुर-प्रांकुर-बीजपत्र में विभेदित होकर अधिभूमिक अथवा अधोभूमिक विधि से अंकुरित होता है। • प्राकृतिक कायिक प्रवर्धन जड़-तना-पत्ती के रूपांतरणों (प्रकंद, कंद, बल्बिल, पत्थरचट्टा की पत्ती) द्वारा होता है, जबकि कृत्रिम प्रवर्धन में कलम, दाब कलम, गूटी, ग्राफ्टिंग (स्कन्ध-सायन) एवं सूक्ष्मप्रवर्धन/ऊतक संवर्धन (एक्सप्लांट-कैलस-पौधक) जैसी तकनीकें कृषि-उद्यान विज्ञान में उन्नत किस्मों के तीव्र, रोगमुक्त एवं बड़े पैमाने पर उत्पादन हेतु उपयोग होती हैं। • कायिक प्रवर्धन तेज़ एवं गुण-सुरक्षित विधि है, किंतु इससे नई किस्में नहीं बनतीं तथा रोग तेज़ी से फैलने का खतरा रहता है — इसीलिए आधुनिक कृषि में कायिक प्रवर्धन एवं लैंगिक संकरण दोनों का संतुलित उपयोग किया जाता है।

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