🌿 अध्याय 3/15 — जीव विज्ञान

पादप पोषण एवं वृद्धि नियामक

कृषि एवं उद्यान विज्ञान के विशेष संदर्भ में — Plant Nutrition & Growth Regulators
Read in English
📋 इस अध्याय में
  1. पादप पोषण का परिचय — आवश्यक तत्वों की कसौटी
  2. वृहत् पोषक तत्व (Macronutrients)
  3. सूक्ष्म पोषक तत्व (Micronutrients) एवं कमी के लक्षण
  4. खनिज तत्वों का अवशोषण एवं मृदा कारक
  5. प्रकाश संश्लेषण — परिचय, वर्णक एवं संरचना
  6. प्रकाश संश्लेषण — प्रकाशिक अभिक्रिया (Light Reaction)
  7. प्रकाश संश्लेषण — अप्रकाशिक अभिक्रिया (C3, C4 एवं CAM चक्र)
  8. प्रकाश संश्लेषण की दर को प्रभावित करने वाले कारक
  9. श्वसन — ग्लाइकोलिसिस, क्रेब्स चक्र एवं इलेक्ट्रॉन परिवहन तंत्र
  10. किण्वन एवं श्वसन गुणांक
  11. वृद्धि एवं परिवर्धन — वृद्धि वक्र एवं मापन
  12. पादप वृद्धि नियामक — ऑक्सिन एवं जिबरेलिन
  13. पादप वृद्धि नियामक — साइटोकाइनिन, इथिलीन एवं एबसिसिक एसिड
  14. प्रकाशकालिता, पुष्पन एवं वसंतीकरण
  15. जीर्णता, विलगन एवं पादप प्रतिबल
  16. कृषि एवं उद्यान विज्ञान में वृद्धि नियामकों का अनुप्रयोग
📖 🌟 क्या आप जानते हैं?
1926 की बात है, जापान के चावल के खेतों में एक अजीब बीमारी फैली हुई थी, जिसे किसान 'बकाने रोग' (Bakanae, यानी 'मूर्ख पौधा रोग') कहते थे — इस रोग से ग्रस्त धान के पौधे बाकी पौधों से कहीं ज़्यादा लंबे, पतले और कमज़ोर होकर गिर जाते थे, और अंततः मर जाते थे। जापानी वैज्ञानिक इस रहस्य को सुलझाने में जुटे रहे, और अंततः पता चला कि यह किसी पोषक तत्व की कमी नहीं, बल्कि एक फफूंद — जिबरेला फ्यूजीकुरोई (Gibberella fujikuroi) — का कमाल था, जो पौधे में एक विशेष रसायन छोड़ती थी जो उसे असामान्य रूप से लंबा बना देता था। इसी फफूंद से आगे चलकर जिस रसायन को अलग किया गया, उसे वैज्ञानिकों ने नाम दिया — जिबरेलिन (Gibberellin) — जो आज दुनिया भर में पौधों की वृद्धि बढ़ाने, बौने पौधों को लंबा करने तथा बीजरहित फल बनाने में इस्तेमाल होता है। यानी जिस चीज़ को कभी 'बीमारी' समझा गया था, वही आज करोड़ों किसानों की खेती-बाड़ी में एक अनमोल औज़ार बन चुकी है! यह कहानी हमें सिखाती है कि पौधे केवल मिट्टी से पानी और खनिज सोखकर बड़े नहीं होते — उनके भीतर भी कुछ अत्यंत शक्तिशाली रासायनिक 'संदेशवाहक' काम करते रहते हैं, जो यह तय करते हैं कि पौधा कब, कितना और कैसे बढ़ेगा। आइए, पादप पोषण एवं इन्हीं वृद्धि नियामकों की रोचक दुनिया को कृषि एवं उद्यान विज्ञान के विशेष संदर्भ में विस्तार से समझते हैं।

1 पादप पोषण का परिचय — आवश्यक तत्वों की कसौटी

पोषण (Nutrition) वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा कोई सजीव भोजन ग्रहण करता है, उसका पाचन-अवशोषण करता है तथा शरीर की वृद्धि, ऊर्जा प्राप्ति एवं मरम्मत के लिए उसका उपयोग करता है। इस आधार पर सजीवों को दो वर्गों में बाँटा जाता है — स्वपोषी (Autotrophs), जो पर्णहरित की सहायता से स्वयं अपना भोजन बना लेते हैं (जैसे हरे पौधे), तथा परपोषी (Heterotrophs), जो अपना भोजन स्वयं नहीं बना सकते और दूसरों पर निर्भर रहते हैं (जैसे कवक, परजीवी एवं जंतु)।

पौधे मिट्टी से लगभग 60 खनिज तत्व सोख लेते हैं, किंतु इनमें से केवल 17 तत्व ही 'आवश्यक' (Essential) माने जाते हैं। किसी तत्व को आवश्यक मानने के लिए वैज्ञानिक आर्नन एवं स्टाउट (तथा बाद में एप्स्टीन, 1972) द्वारा दी गई कसौटी पर खरा उतरना ज़रूरी है:

जर्मन वैज्ञानिक जूलियस सैक्स (Julius von Sachs, 1860) ने सबसे पहले यह सिद्ध किया कि पौधों को मिट्टी की बिल्कुल भी आवश्यकता नहीं — यदि उचित पोषक तत्व घोल (Nutrient Solution) में उगाया जाए तो पौधा पूरी तरह स्वस्थ विकसित हो सकता है। इसी तकनीक को आज जलकृषि अथवा हाइड्रोपोनिक्स (Hydroponics) कहा जाता है, जिसका व्यावसायिक उपयोग आज बीजरहित खीरा, टमाटर एवं सलाद पत्ता जैसी फसलों में होता है। एक नई तकनीक एरोपोनिक्स (Aeroponics) में तो पौधे की जड़ों को हवा में लटकाकर, उन पर पोषक घोल का महीन फुहारा (Mist) छिड़का जाता है — इससे जड़ों का असाधारण रूप से अच्छा विकास होता है, तथा यह खट्टे फलों (Citrus) एवं जैतून जैसी फसलों में प्रयुक्त होती है।

जर्मन वैज्ञानिक लीबिग का न्यूनतम का नियम (Law of Minimum)

19वीं सदी के जर्मन वैज्ञानिक लीबिग ने बताया कि पौधा अपने पोषक तत्वों का उपयोग एक निश्चित अनुपात में करता है, तथा जो तत्व सबसे कम मात्रा में उपलब्ध हो, वही पौधे की कुल वृद्धि को सीमित कर देता है — चाहे बाकी सभी तत्व कितनी भी अधिक मात्रा में क्यों न हों। इसे एक मशहूर उपमा से समझा जा सकता है — किसी लकड़ी के पीपे (Barrel) की सबसे छोटी तख्ती (Plank) ही यह तय करती है कि पीपे में पानी कितना भरा जा सकता है, चाहे बाकी सभी तख्तियाँ कितनी भी ऊँची हों।

वर्गतत्वों की संख्याउदाहरण
अखनिज पोषक तत्व (हवा-पानी से)3कार्बन, हाइड्रोजन, ऑक्सीजन
वृहत् पोषक तत्व (Macronutrients)6नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटैशियम, कैल्शियम, मैग्नीशियम, सल्फर
सूक्ष्म पोषक तत्व (Micronutrients)8लोहा, मैंगनीज़, बोरॉन, जिंक, कॉपर, मॉलिब्डेनम, क्लोरीन, निकल
🔍 दिलचस्प तथ्य — 💡 रोचक तथ्य

1988 में वैज्ञानिकों (डेगन एवं साथी) ने निकल (Nickel) को 17वाँ आवश्यक पोषक तत्व घोषित किया — यह यूरिएज़ (Urease) एंजाइम का मुख्य घटक है, जो यूरिया को तोड़ता है। जौ (Barley) में निकल की कमी होने पर बीज अंकुरण-योग्य ही नहीं रह पाते — यह दर्शाता है कि पौधों की दुनिया में भी 'सूक्ष्मतम' तत्व कितना बड़ा फर्क डाल सकता है।

📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)

◆ स्वपोषी ◆ परपोषी ◆ आवश्यक तत्व ◆ हाइड्रोपोनिक्स ◆ एरोपोनिक्स ◆ न्यूनतम का नियम ◆ निकल

2 वृहत् पोषक तत्व (Macronutrients)

जो तत्व पौधे के शुष्क भार का कम-से-कम 1.0 मिलीग्राम/ग्राम अथवा उससे अधिक भाग बनाते हैं, उन्हें वृहत् पोषक तत्व कहते हैं। इनमें से नाइट्रोजन, फॉस्फोरस एवं पोटैशियम — इन तीनों को 'क्रांतिक तत्व' (Critical Elements) भी कहा जाता है, क्योंकि सामान्य मिट्टी में ये प्रायः सबसे पहले कम पड़ जाते हैं — इसीलिए बाज़ार में मिलने वाले लगभग सभी रासायनिक उर्वरकों (जैसे यूरिया, डीएपी, एनपीके) में यही तीन तत्व मुख्य रूप से होते हैं।

तत्वअवशोषित रूपमुख्य भूमिकाकमी के लक्षण
नाइट्रोजन (N)NO3⁻ / NH4⁺प्रोटीन, एंजाइम, न्यूक्लिइक अम्ल एवं पर्णहरित का निर्माणपत्तियों का पीला पड़ना (हरिमाहीनता/Chlorosis), वृद्धि रुकना
फॉस्फोरस (P)H2PO4⁻ / HPO4²⁻न्यूक्लिइक अम्ल, ATP, कोशिका झिल्ली, जड़ विकास एवं पुष्पनजड़ों का कमज़ोर विकास, फूल आने में देरी, बैंगनी-लाल पत्तियाँ
पोटैशियम (K)K⁺एंजाइम सक्रियण, रंध्र खुलना-बंद होना, रोग-प्रतिरोधकतापत्तियों के किनारे झुलसना, तना कमज़ोर होना
कैल्शियम (Ca)Ca²⁺मध्य पटलिका (कैल्शियम पेक्टेट) निर्माण, कोशिका विभाजननई पत्तियों की विकृति, वृद्धि बिंदुओं का मरना
मैग्नीशियम (Mg)Mg²⁺पर्णहरित अणु का केंद्रीय भाग, एंजाइम सक्रियणशिराओं के बीच का भाग पीला पड़ना (परंतु शिराएँ हरी रहना)
सल्फर (S)SO4²⁻अमीनो अम्ल (सिस्टीन, मेथियोनीन), कोएंजाइम-A का निर्माणपूरे पौधे का पीला पड़ना, जड़-ग्रंथिकाओं का कम बनना
🔗 सम्बन्ध — 💡 कृषि से जुड़ाव — याद रखने की तरकीब

किसान अक्सर कहते हैं — 'नाइट्रोजन पत्ती के लिए, फॉस्फोरस जड़-फूल के लिए, पोटैशियम फल-दाने की मज़बूती के लिए' — यह एक सरल किंतु काफी हद तक सटीक अंगूठा-नियम (Rule of Thumb) है, जो NPK उर्वरकों के अनुपात तय करने में उपयोगी है। यही कारण है कि अनाज वाली फसलों में नाइट्रोजन अधिक, जबकि फूल-फल वाली फसलों में फॉस्फोरस-पोटैशियम का अनुपात बढ़ाया जाता है।

📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)

◆ वृहत् पोषक तत्व ◆ क्रांतिक तत्व ◆ नाइट्रोजन ◆ फॉस्फोरस ◆ पोटैशियम ◆ कैल्शियम ◆ मैग्नीशियम ◆ सल्फर

3 सूक्ष्म पोषक तत्व (Micronutrients) एवं कमी के लक्षण

जो तत्व पौधे के शुष्क भार का 1.0 मिलीग्राम/ग्राम से भी कम भाग बनाते हैं, उन्हें सूक्ष्म पोषक तत्व अथवा ट्रेस एलिमेंट्स कहते हैं। मात्रा में बेहद कम होने के बावजूद इनकी कमी से पौधे को भारी नुकसान होता है — ठीक वैसे ही जैसे किसी मशीन में एक छोटा-सा पुर्ज़ा न होने से पूरी मशीन काम करना बंद कर सकती है।

तत्वमुख्य भूमिकाकमी के विशिष्ट लक्षण
लोहा/आयरन (Fe)पर्णहरित संश्लेषण में सहायक, साइटोक्रोम का घटकशिराओं के बीच हरिमाहीनता (नई पत्तियों में अधिक स्पष्ट)
मैंगनीज़ (Mn)प्रकाश संश्लेषण व श्वसन एंजाइमों को सक्रिय करनामटर में 'मार्श स्पॉट', चुकंदर में धब्बेदार पीलापन
बोरॉन (B)शर्करा स्थानांतरण, परागकण अंकुरण, विभज्योतक क्रियाशीलतावृद्धि बिंदु का मरना, चुकंदर में 'हार्ट रॉट', अंगूर में असमान गुच्छे
जिंक (Zn)ऑक्सिन (IAA) संश्लेषण, एंजाइम सक्रियणसेब में 'लिटिल लीफ' रोग, वृद्धि रुकना
कॉपर/ताँबा (Cu)साइटोक्रोम ऑक्सीडेज़ व प्लास्टोसायनिन का घटकखट्टे फलों में 'डाई-बैक' (नई शाखाओं का सूखना)
मॉलिब्डेनम (Mo)नाइट्रोजन स्थिरीकरण एवं नाइट्रेट रिडक्टेज़ एंजाइम हेतु आवश्यकप्रोटीन संश्लेषण बाधित, पत्तियाँ पीली पड़ना
क्लोरीन (Cl)प्रकाश संश्लेषण में जल-अपघटन (Photolysis) में सहायकवृद्धि रुकना, पत्तियाँ मुरझाना
निकल (Ni)यूरिएज़ एंजाइम का घटक (यूरिया अपघटन)बीजों का अंकुरण-अक्षम होना
📌 महत्वपूर्ण — पहचान की सरल कसौटी

यदि पीलापन (हरिमाहीनता) सबसे पहले पुरानी (नीचे की) पत्तियों में दिखे, तो सामान्यतः नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटैशियम अथवा मैग्नीशियम जैसे 'गतिशील' (Mobile) तत्वों की कमी होती है — क्योंकि पौधा इन्हें पुरानी पत्तियों से खींचकर नई वृद्धि की ओर भेज देता है। परंतु यदि पीलापन सबसे पहले नई (ऊपर की) पत्तियों में दिखे, तो सामान्यतः लोहा, कैल्शियम अथवा बोरॉन जैसे 'अगतिशील' (Immobile) तत्वों की कमी होती है, जो पुरानी पत्तियों से नई पत्तियों की ओर स्थानांतरित नहीं हो पाते। किसान एवं कृषि वैज्ञानिक इसी सरल कसौटी से खेत में खड़े-खड़े ही कमी का प्रारंभिक अनुमान लगा लेते हैं।

📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)

◆ सूक्ष्म पोषक तत्व ◆ लोहा ◆ मैंगनीज़ ◆ बोरॉन ◆ जिंक ◆ कॉपर ◆ मॉलिब्डेनम ◆ गतिशील तत्व ◆ अगतिशील तत्व

4 खनिज तत्वों का अवशोषण एवं मृदा कारक

जड़ें मिट्टी से खनिज तत्वों को दो चरणों में अवशोषित करती हैं। पहला चरण निष्क्रिय अवशोषण (Passive Absorption) है — यह तेज़, बिना ऊर्जा खर्च किए होता है, जिसमें आयन कोशिका भित्ति एवं अंतरकोशिकीय स्थानों (जिसे 'बाह्य आस्था/Apoplast' कहा जाता है) में स्वतः प्रवेश कर जाते हैं। दूसरा चरण सक्रिय अवशोषण (Active Absorption) है — यह धीमा, किंतु ऊर्जा (ATP) खर्च करके होता है, जिसमें आयन कोशिका झिल्ली को पार कर जीवद्रव्य (जिसे 'अंतः आस्था/Symplast' कहा जाता है) में प्रवेश करते हैं। भीतर जाने वाले प्रवाह को 'इनफ्लक्स' तथा बाहर जाने वाले को 'एफ्लक्स' कहते हैं। अवशोषित खनिज आगे जाइलम द्वारा पूरे पौधे में पहुँचाए जाते हैं।

मृदा कारक जो पोषक तत्वों की उपलब्धता को प्रभावित करते हैं

📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)

◆ निष्क्रिय अवशोषण ◆ सक्रिय अवशोषण ◆ बाह्य आस्था ◆ अंतः आस्था ◆ मृदा pH ◆ निक्षालन ◆ फसल चक्र

5 प्रकाश संश्लेषण — परिचय, वर्णक एवं संरचना

प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) वह उपचयी (Anabolic) प्रक्रिया है जिसके द्वारा हरे पौधे सूर्य के प्रकाश की ऊर्जा का उपयोग करके कार्बन डाइऑक्साइड एवं जल से कार्बोहाइड्रेट (भोजन) का निर्माण करते हैं, तथा उपोत्पाद के रूप में ऑक्सीजन मुक्त करते हैं। यह पृथ्वी पर जीवन की सबसे महत्वपूर्ण रासायनिक प्रक्रिया है — क्योंकि लगभग समस्त जीवजगत् (सीधे अथवा परोक्ष रूप से) भोजन एवं ऊर्जा के लिए इसी प्रक्रिया पर निर्भर है, तथा वायुमंडल में ऑक्सीजन की उपस्थिति भी इसी के कारण संभव हो पाई है।

📌 महत्वपूर्ण

📐 प्रकाश संश्लेषण का सामान्य समीकरण — सूत्र/प्रक्रिया: 6CO₂ + 12H₂O —(पर्णहरित, सूर्यप्रकाश)→ C₆H₁₂O₆ + 6H₂O + 6O₂ (मुक्त होने वाली ऑक्सीजन जल के अपघटन से आती है, CO₂ से नहीं)

📌 महत्वपूर्ण

🖼️ प्रकाश संश्लेषण — कच्चा माल (CO₂, जल, सूर्यप्रकाश) एवं उत्पाद (ग्लूकोज़, ऑक्सीजन)

जीव विज्ञान चित्र

ऐतिहासिक प्रयोग

प्रकाश संश्लेषक वर्णक (Photosynthetic Pigments)

हरितलवक की झिल्ली (थाइलेकॉइड) में दो प्रमुख वर्ग के वर्णक पाए जाते हैं — पर्णहरित (Chlorophyll) एवं कैरोटिनॉइड (Carotenoids)। पर्णहरित नीले-बैंगनी एवं लाल प्रकाश को सबसे अधिक अवशोषित करता है तथा हरे प्रकाश को परावर्तित कर देता है — इसीलिए पत्तियाँ हमें हरी दिखाई देती हैं। पर्णहरित-a मुख्य/अनिवार्य वर्णक है (अभिक्रिया केंद्र पर स्थित), जबकि पर्णहरित-b तथा कैरोटिनॉइड सहायक वर्णक (Accessory Pigments) हैं, जो अवशोषित ऊर्जा को पर्णहरित-a तक पहुँचाते हैं। कैरोटिनॉइड में कैरोटिन (नारंगी-पीला, जिससे विटामिन A बनता है) एवं जैंथोफिल (पीला) शामिल हैं।

ये वर्णक हरितलवक में लगभग 250-400 अणुओं के समूह में संगठित होकर 'प्रकाश तंत्र' (Photosystem) बनाते हैं — इनके दो प्रकार हैं: प्रकाश तंत्र-I (PS-I, अभिक्रिया केंद्र P700, यानी यह 700 नैनोमीटर तरंगदैर्ध्य पर सर्वाधिक प्रकाश अवशोषित करता है) तथा प्रकाश तंत्र-II (PS-II, अभिक्रिया केंद्र P680)। दोनों प्रकाश तंत्र मिलकर प्रकाशिक अभिक्रिया संपन्न करते हैं।

📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)

◆ प्रकाश संश्लेषण ◆ पर्णहरित-a ◆ पर्णहरित-b ◆ कैरोटिनॉइड ◆ हिल अभिक्रिया ◆ प्रकाश तंत्र-I ◆ प्रकाश तंत्र-II

6 प्रकाश संश्लेषण — प्रकाशिक अभिक्रिया (Light Reaction)

प्रकाशिक अभिक्रिया हरितलवक की थाइलेकॉइड झिल्ली में होती है, जहाँ प्रकाश ऊर्जा को रासायनिक ऊर्जा (ATP एवं NADPH) में बदला जाता है। जब PS-II का P680 अणु प्रकाश अवशोषित करता है, तो वह उत्तेजित होकर एक इलेक्ट्रॉन खो देता है। इस खोए हुए इलेक्ट्रॉन की भरपाई जल के अणु को तोड़कर की जाती है — इस प्रक्रिया को 'जल का प्रकाश-अपघटन' (Photolysis) कहते हैं, जिसमें ऑक्सीजन मुक्त होती है। PS-II से इलेक्ट्रॉन एक वाहक शृंखला (प्लास्टोक्विनोन, साइटोक्रोम, प्लास्टोसायनिन) से गुज़रता हुआ PS-I तक पहुँचता है, जहाँ यह पुनः प्रकाश से उत्तेजित होकर अंततः NADP को अपचयित करके NADPH बना देता है।

📌 महत्वपूर्ण

📐 जल का प्रकाश-अपघटन (Photolysis) — सूत्र/प्रक्रिया: 2H₂O → 4H⁺ + 4e⁻ + O₂

इलेक्ट्रॉन परिवहन के दौरान निकलने वाली ऊर्जा से ADP एवं फॉस्फेट मिलकर ATP बनाते हैं — इसे प्रकाश-फॉस्फोरिलीकरण (Photophosphorylation) कहते हैं। यह दो प्रकार का होता है — असंचक्रीय प्रकाश-फॉस्फोरिलीकरण (Non-cyclic), जिसमें इलेक्ट्रॉन जल से चलकर PS-II → PS-I → NADP तक एकदिशीय गति करते हैं, ऑक्सीजन मुक्त होती है, तथा ATP व NADPH दोनों बनते हैं (इसे 'Z-स्कीम' भी कहा जाता है); तथा संचक्रीय प्रकाश-फॉस्फोरिलीकरण (Cyclic), जिसमें केवल PS-I काम करता है, इलेक्ट्रॉन वापस उसी अणु में लौट आते हैं, न ऑक्सीजन मुक्त होती है न NADPH बनता है — केवल अतिरिक्त ATP बनता है।

📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)

◆ प्रकाशिक अभिक्रिया ◆ थाइलेकॉइड ◆ फोटोलिसिस ◆ प्रकाश-फॉस्फोरिलीकरण ◆ असंचक्रीय फॉस्फोरिलीकरण ◆ संचक्रीय फॉस्फोरिलीकरण

7 प्रकाश संश्लेषण — अप्रकाशिक अभिक्रिया (C3, C4 एवं CAM चक्र)

अप्रकाशिक अभिक्रिया हरितलवक के स्ट्रोमा में होती है, जहाँ प्रकाशिक अभिक्रिया से प्राप्त ATP एवं NADPH का उपयोग करके CO₂ को स्थिर (Fix) करके कार्बोहाइड्रेट बनाया जाता है। इसे 'अंधकार अभिक्रिया' कहा तो जाता है, किंतु वास्तव में इसके लिए सीधे प्रकाश की आवश्यकता नहीं होती — यह केवल प्रकाशिक अभिक्रिया के उत्पादों (ATP, NADPH) पर निर्भर करती है।

C3 चक्र (केल्विन-बेन्सन चक्र)

अधिकांश पौधों में CO₂ ग्राही एक पाँच-कार्बन यौगिक RuBP (राइबुलोज़ बिस्फॉस्फेट) होता है, जो एंजाइम रूबिस्को (RuBisCO) — जिसे पृथ्वी पर सबसे प्रचुर प्रोटीन भी कहा जाता है — की सहायता से CO₂ से जुड़कर टूटकर दो अणु 3-कार्बन PGA (फॉस्फोग्लिसरिक अम्ल) बनाता है। चूँकि पहला स्थायी उत्पाद 3-कार्बन का होता है, इसीलिए इसे C3 चक्र कहते हैं। आगे PGA, ATP एवं NADPH की सहायता से शर्करा में बदल जाता है, तथा RuBP का पुनर्जनन होकर चक्र चलता रहता है — यह प्रक्रिया मेल्विन केल्विन के नाम पर 'केल्विन चक्र' कहलाती है।

📌 महत्वपूर्ण

🖼️ केल्विन चक्र (C3 चक्र) — कार्बोक्सिलीकरण, अपचयन एवं पुनर्जनन के तीन चरण

जीव विज्ञान चित्र

C4 चक्र (हैच-स्लैक चक्र)

गन्ना, मक्का एवं ज्वार जैसे गर्म-शुष्क क्षेत्रों के पौधों में एक विशेष अनुकूलन पाया जाता है — इनकी पत्तियों में संवहन बंडलों के चारों ओर मालानुमा (पुष्पमाला के आकार की) कोशिकाओं की परत होती है, जिसे 'क्रांज़ शारीरिकी' (Kranz Anatomy, जर्मन शब्द 'Kranz' का अर्थ 'माला') कहते हैं। इनमें CO₂ पहले पर्णमध्योतक कोशिकाओं में 3-कार्बन PEP (फॉस्फोइनॉलपाइरूविक अम्ल) से जुड़कर एक 4-कार्बन यौगिक ऑक्सैलोएसिटिक अम्ल बनाती है (इसीलिए इसे C4 चक्र कहते हैं) — यह मैलिक अम्ल में बदलकर बंडल आच्छद कोशिकाओं में पहुँचता है, जहाँ यह टूटकर CO₂ मुक्त करता है, जिसका उपयोग वहाँ सामान्य C3/केल्विन चक्र में होता है। इस दोहरी व्यवस्था के कारण C4 पौधों में CO₂ की सांद्रता बंडल आच्छद कोशिकाओं में बहुत अधिक हो जाती है, जिससे प्रकाश-श्वसन (Photorespiration) नगण्य हो जाता है तथा उत्पादकता C3 पौधों से लगभग 3-4 गुना अधिक हो जाती है।

📌 महत्वपूर्ण

🖼️ C4 पौधे की पत्ती की क्रांज़ शारीरिकी — पर्णमध्योतक एवं बंडल आच्छद कोशिकाएँ

जीव विज्ञान चित्र

CAM चक्र (कैक्टस-कुल का विशेष अनुकूलन)

नागफनी जैसे रसीले मरुद्भिद पौधों में जल-हानि रोकने के लिए एक अनोखी रणनीति पाई जाती है, जिसे CAM (Crassulacean Acid Metabolism) कहते हैं — इनके रंध्र रात में खुलते हैं (जब गर्मी कम होती है, इसलिए वाष्पोत्सर्जन कम होता है) तथा CO₂ को कार्बनिक अम्लों के रूप में संचित कर लेते हैं; दिन में रंध्र बंद रहते हैं (जल बचाने हेतु) परंतु संचित अम्ल टूटकर CO₂ मुक्त करते हैं, जिसका सामान्य केल्विन चक्र में उपयोग हो जाता है।

आधारC3 पौधेC4 पौधे
उदाहरणगेहूँ, चावल, अधिकांश पेड़-पौधेगन्ना, मक्का, ज्वार, बाजरा
क्रांज़ शारीरिकीअनुपस्थितउपस्थित
CO₂ ग्राहीRuBPPEP
पहला स्थायी उत्पाद3-कार्बन PGA4-कार्बन ऑक्सैलोएसिटिक अम्ल
प्रकाश-श्वसनअधिकबहुत कम/नगण्य
उत्पादकताकमअधिक (लगभग 3-4 गुना)
उपयुक्त तापमान10-25°C30-40°C
📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)

◆ केल्विन चक्र ◆ रूबिस्को ◆ क्रांज़ शारीरिकी ◆ हैच-स्लैक चक्र ◆ CAM चक्र ◆ प्रकाश-श्वसन

8 प्रकाश संश्लेषण की दर को प्रभावित करने वाले कारक

ब्लैकमैन के 'सीमाकारी कारकों के नियम' (Law of Limiting Factors, 1905) के अनुसार, जब कोई प्रक्रिया अनेक कारकों पर निर्भर हो, तो उसकी दर सबसे कम उपलब्ध (सीमाकारी) कारक द्वारा ही निर्धारित होती है — चाहे बाकी सभी कारक कितने भी अनुकूल क्यों न हों।

बाह्य कारक

🔍 दिलचस्प तथ्य — रोचक तथ्य

एमर्सन प्रभाव (Emerson Enhancement Effect) — जब पौधों को दो अलग-अलग तरंगदैर्ध्य के प्रकाश (जैसे लाल एवं दूर-लाल) एक साथ दिए जाएँ, तो प्रकाश संश्लेषण की दर दोनों को अलग-अलग देने पर मिलने वाली दरों के योग से भी अधिक हो जाती है — इसी अवलोकन से वैज्ञानिकों को दो अलग-अलग प्रकाश तंत्रों (PS-I एवं PS-II) के अस्तित्व का पहला संकेत मिला था।

📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)

◆ सीमाकारी कारकों का नियम ◆ क्षतिपूर्ति बिंदु ◆ एमर्सन प्रभाव

9 श्वसन (Respiration) — ग्लाइकोलिसिस, क्रेब्स चक्र एवं इलेक्ट्रॉन परिवहन तंत्र

श्वसन एक अपचयी (Catabolic) प्रक्रिया है, जिसमें संचित भोजन (ग्लूकोज़) का चरणबद्ध ऑक्सीकरण करके ऊर्जा को ATP के रूप में मुक्त किया जाता है। जहाँ प्रकाश संश्लेषण केवल सूर्यप्रकाश में, केवल हरे भागों में होता है, वहीं श्वसन सभी सजीव कोशिकाओं में, दिन-रात लगातार चलता रहता है।

चूँकि पौधों में फेफड़े नहीं होते, इसलिए गैसीय विनिमय सरल विसरण द्वारा होता है — तने-जड़ों की सामान्य सतह से, वल्कुट के वातरंध्र (Lenticels) से, तथा पत्तियों के रंध्रों (Stomata) से। पौधों को जंतुओं की तुलना में कम ऑक्सीजन चाहिए तथा उनकी सतह क्षेत्रफल भी (पत्तियों के कारण) बहुत अधिक होता है, इसलिए उन्हें रक्त जैसे किसी विशेष वाहक तंत्र की आवश्यकता नहीं पड़ती।

ग्लाइकोलिसिस (Glycolysis)

यह श्वसन का पहला चरण है, जो कोशिकाद्रव्य में होता है तथा वायवीय (Aerobic) एवं अवायवीय (Anaerobic) — दोनों प्रकार के श्वसन में समान रूप से होता है। इसमें 6-कार्बन ग्लूकोज़ अणु टूटकर दो अणु 3-कार्बन पाइरूविक अम्ल में बदल जाता है, जिसमें शुद्ध रूप से 2 ATP तथा 2 NADH बनते हैं।

क्रेब्स चक्र (Krebs Cycle) — सर हैंस क्रेब्स, 1930 के दशक

वायवीय श्वसन में पाइरूविक अम्ल माइटोकॉन्ड्रिया में प्रवेश करके पहले एसिटाइल-CoA में बदलता है (यह एक CO₂ मुक्त करके होता है), जो फिर ऑक्सैलोएसिटेट से जुड़कर साइट्रेट (साइट्रिक अम्ल) बनाता है — इसी कारण इसे 'साइट्रिक अम्ल चक्र' भी कहा जाता है। इस चक्रीय पथ में दो बार डीकार्बोक्सिलीकरण (CO₂ मुक्ति) तथा चार बार डीहाइड्रोजनीकरण (H परमाणुओं का NAD/FAD को स्थानांतरण) होता है, तथा प्रति चक्र 1 ATP सीधे बनता है। एक ग्लूकोज़ अणु से बने दोनों पाइरूविक अम्ल अणुओं के लिए यह चक्र दो बार चलता है।

इलेक्ट्रॉन परिवहन तंत्र (Electron Transport Chain) — ऑक्सी-फॉस्फोरिलीकरण

ग्लाइकोलिसिस एवं क्रेब्स चक्र में बने NADH एवं FADH₂ अपने हाइड्रोजन/इलेक्ट्रॉन माइटोकॉन्ड्रिया की भीतरी झिल्ली (क्रिस्टी) पर स्थित वाहकों (साइटोक्रोम आदि) की एक शृंखला को सौंप देते हैं। यह इलेक्ट्रॉन शृंखला से गुज़रते हुए क्रमशः ऊर्जा मुक्त करते हैं, जिससे ATP बनता है, तथा अंत में ऑक्सीजन से मिलकर जल बनाते हैं। प्रत्येक NADH से लगभग 3 ATP तथा प्रत्येक FADH₂ से लगभग 2 ATP प्राप्त होता है।

📌 महत्वपूर्ण

🖼️ क्रेब्स चक्र/साइट्रिक अम्ल चक्र — माइटोकॉन्ड्रिया के मैट्रिक्स में संपन्न होने वाला चक्रीय पथ

जीव विज्ञान चित्र
📌 महत्वपूर्ण

📐 एक ग्लूकोज़ अणु से कुल ऊर्जा लेखा (वायवीय श्वसन) — सूत्र/प्रक्रिया: ग्लाइकोलिसिस: 2 ATP + 2 NADH क्रेब्स चक्र (2 चक्र): 2 ATP + 6 NADH + 2 FADH₂ कुल = लगभग 36-38 ATP प्रति ग्लूकोज़ अणु

आधारप्रकाश संश्लेषणश्वसन
प्रकारउपचयी (रचनात्मक)अपचयी (विनाशात्मक)
समयकेवल सूर्यप्रकाश मेंदिन-रात, निरंतर
स्थलहरितलवकमाइटोकॉन्ड्रिया एवं कोशिकाद्रव्य
गैस विनिमयCO₂ ग्रहण, O₂ मुक्तO₂ ग्रहण, CO₂ मुक्त
शुष्क भार पर प्रभावबढ़ाता हैघटाता है
होता कहाँ हैकेवल हरे पौधों-शैवाल मेंसभी सजीव कोशिकाओं में
📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)

◆ ग्लाइकोलिसिस ◆ क्रेब्स चक्र ◆ इलेक्ट्रॉन परिवहन तंत्र ◆ ऑक्सी-फॉस्फोरिलीकरण ◆ एसिटाइल-CoA

10 किण्वन (Fermentation) एवं श्वसन गुणांक

जब ऑक्सीजन उपलब्ध न हो, तो कुछ जीव (जैसे यीस्ट) एवं कुछ ऊतक अवायवीय श्वसन अपनाते हैं, जिसे किण्वन कहा जाता है। इसमें ग्लाइकोलिसिस के बाद बना पाइरूविक अम्ल पूर्ण रूप से ऑक्सीकृत नहीं होता, बल्कि अपूर्ण रूप से टूटकर एथेनॉल एवं CO₂ (यीस्ट में) अथवा लैक्टिक अम्ल (मांसपेशी कोशिकाओं में, अत्यधिक व्यायाम के दौरान) बनाता है — इसमें केवल ग्लाइकोलिसिस जितनी ही (2 ATP) ऊर्जा प्राप्त होती है।

किण्वन के व्यावहारिक/औद्योगिक उपयोग

श्वसन गुणांक (Respiratory Quotient, RQ)

📌 महत्वपूर्ण

📐 श्वसन गुणांक का सूत्र — सूत्र/प्रक्रिया: RQ = मुक्त हुई CO₂ का आयतन ÷ ग्रहण की गई O₂ का आयतन

भोजन के प्रकार के अनुसार RQ का मान बदलता है — कार्बोहाइड्रेट के पूर्ण ऑक्सीकरण में RQ = 1 होता है (जैसे तने-जड़ों के श्वसन में); प्रोटीन-प्रधान बीजों (जैसे दालों) में RQ 1 से कम होता है; जबकि वसा-तेल प्रधान बीजों (जैसे सरसों) में RQ 1 से अधिक होता है, क्योंकि वसा के एक अणु के पूर्ण ऑक्सीकरण के लिए ग्लूकोज़ से अधिक ऑक्सीजन चाहिए होती है।

📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)

◆ किण्वन ◆ एथेनॉल किण्वन ◆ लैक्टिक अम्ल किण्वन ◆ श्वसन गुणांक (RQ)

11 वृद्धि एवं परिवर्धन (Growth and Development) — वृद्धि वक्र एवं मापन

वृद्धि (Growth) किसी कोशिका, अंग अथवा पूरे जीव की संख्या एवं आकार में होने वाली अपरिवर्तनीय (Irreversible) वृद्धि है। परिवर्धन (Development) इससे व्यापक शब्द है, जिसमें वृद्धि के साथ-साथ विभेदन (Differentiation, अर्थात् कोशिकाओं का विशिष्ट कार्य हेतु रूपांतरित होना) एवं परिपक्वन भी शामिल है। इसके विपरीत जब कोई पहले से विभेदित कोशिका (जैसे मृदूतक) पुनः विभाजन-क्षमता प्राप्त कर लेती है, तो उसे विऱ्विभेदन (Dedifferentiation) कहते हैं — जैसे अंतरापूलीय एधा एवं कॉर्क एधा का बनना।

कोशिकीय वृद्धि के तीन चरण

वृद्धि वक्र (Growth Curve) — S-आकार/सिग्मॉइड वक्र

यदि समय के साथ पौधे की वृद्धि दर को आलेखित किया जाए, तो एक विशिष्ट अंग्रेज़ी के 'S' अक्षर जैसा वक्र प्राप्त होता है, जिसे सिग्मॉइड वक्र कहते हैं। इसके तीन चरण होते हैं — विलंब प्रावस्था (Lag Phase, प्रारंभिक धीमी वृद्धि), चरघातांकी/लॉग प्रावस्था (Log Phase, तीव्रतम वृद्धि — इसे 'वृद्धि का स्वर्णिम काल' भी कहा जाता है), तथा स्थिर प्रावस्था (Stationary Phase, वृद्धि दर घटते-घटते रुक जाना)।

📌 महत्वपूर्ण

🖼️ पादप वृद्धि का सिग्मॉइड (S-आकार) वक्र — विलंब, लॉग एवं स्थिर प्रावस्था

जीव विज्ञान चित्र

वृद्धि मापने की विधियाँ

वृद्धि को प्रभावित करने वाले बाह्य कारक

प्रकाश (अंधेरे में उगे पौधे लंबे, पीले एवं कमज़ोर हो जाते हैं, तथा उनकी पत्तियाँ बहुत छोटी रह जाती हैं), तापमान (सामान्यतः 28-30°C इष्टतम, 4-45°C के बीच सहनीय), जल (कमी एवं अधिकता — दोनों ही वृद्धि को बाधित करते हैं) तथा खनिज पोषक तत्व — इन चारों बाह्य कारकों के अतिरिक्त पौधे के भीतर बनने वाले रसायन — फाइटोहार्मोन — वृद्धि के सबसे महत्वपूर्ण आंतरिक नियंत्रक हैं, जिन्हें हम अगले भाग में विस्तार से समझेंगे।

📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)

◆ वृद्धि ◆ परिवर्धन ◆ विभेदन ◆ विऱ्विभेदन ◆ सिग्मॉइड वक्र ◆ ऑक्सैनोमीटर

12 पादप वृद्धि नियामक — ऑक्सिन एवं जिबरेलिन

फाइटोहार्मोन (Phytohormones) वे कार्बनिक पदार्थ हैं जो पौधे के किसी एक भाग में बहुत कम मात्रा में बनते हैं तथा दूसरे भाग में जाकर वहाँ की वृद्धि को प्रभावित करते हैं। इनके पाँच प्रमुख प्राकृतिक वर्ग हैं — ऑक्सिन, जिबरेलिन, साइटोकाइनिन (ये तीनों 'वृद्धि प्रवर्धक' कहलाते हैं), तथा इथिलीन एवं एबसिसिक एसिड (जो मुख्यतः 'वृद्धि निरोधक' का काम करते हैं)। इनके अतिरिक्त कुछ कृत्रिम रसायन भी हार्मोन जैसा प्रभाव दिखाते हैं, जिन्हें 'वृद्धि नियामक' (Growth Regulators) कहते हैं।

ऑक्सिन (Auxin)

ग्रीक शब्द 'Auxein' का अर्थ है 'बढ़ना'। प्राकृतिक ऑक्सिन को इंडोल-3-एसीटिक अम्ल (IAA) कहते हैं, जो तने एवं जड़ के वर्धनशील शीर्ष में बनता है। कृत्रिम ऑक्सिन में IBA (इंडोल-3-ब्यूटिरिक अम्ल), NAA (नैफ्थलीन एसीटिक अम्ल) तथा 2,4-D (2,4-डाइक्लोरोफिनॉक्सी एसीटिक अम्ल) शामिल हैं।

📌 महत्वपूर्ण

ऐतिहासिक प्रयोग — फ्रिट्ज़ वेंट (Fritz Went): जई (Oat) के कोलिओप्टाइल (प्रारंभिक अंकुर) की नोक को काटकर हटा दिया गया, तो उसकी वृद्धि रुक गई। कटी हुई नोक को लगभग एक घंटे के लिए अगार (शैवाल से प्राप्त जेलीनुमा पदार्थ) के एक टुकड़े पर रखा गया, तथा फिर इस अगार टुकड़े को कटे हुए कोलिओप्टाइल के ऊपर रख दिया गया — आश्चर्यजनक रूप से वृद्धि फिर से शुरू हो गई! इससे सिद्ध हुआ कि नोक से कोई रासायनिक पदार्थ अगार में स्थानांतरित हुआ, जिसने वृद्धि को पुनः चालू किया — इसी पदार्थ को 'ऑक्सिन' नाम दिया गया।

ऑक्सिन के प्रमुख प्रभाव एवं कृषि-उपयोग

जिबरेलिन (Gibberellin, GA)

सबसे पहले फफूंद जिबरेला फ्यूजीकुरोई से पृथक किया गया था (जैसा हमारी हुक कहानी में बताया गया)। यह पौधे के भ्रूण, जड़ों एवं युवा पत्तियों में बनता है। यह अम्लीय प्रकृति का होता है, इसीलिए इसे जिबरेलिक अम्ल (GA₃) भी कहते हैं।

जिबरेलिन के प्रमुख प्रभाव एवं कृषि-उपयोग

📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)

◆ फाइटोहार्मोन ◆ ऑक्सिन (IAA) ◆ शीर्ष प्रभाविता ◆ 2,4-D ◆ जिबरेलिन (GA) ◆ वसंतीकरण ◆ बोल्टिंग

13 पादप वृद्धि नियामक — साइटोकाइनिन, इथिलीन एवं एबसिसिक एसिड

साइटोकाइनिन (Cytokinin)

यह नाम एफ. स्कूग एवं कार्लोस मिलर ने दिया था, क्योंकि यह विशेष रूप से कोशिकाद्रव्य विभाजन (Cytokinesis) को प्रेरित करता है। सबसे पहला ज्ञात साइटोकाइनिन 'काइनेटिन' तंबाकू के ऊतक-संवर्धन में मिला था, जबकि 'ज़िएटिन' मक्के के भ्रूण एवं नारियल पानी से पृथक किया गया — इसीलिए पादप ऊतक संवर्धन (Tissue Culture) के प्रयोगों में आज भी नारियल पानी एक प्राकृतिक साइटोकाइनिन स्रोत के रूप में उपयोग किया जाता है। यह मुख्यतः जड़ शीर्ष, विकासशील प्ररोह कलिकाओं एवं युवा फलों में — यानी जहाँ भी तीव्र कोशिका विभाजन हो रहा हो — वहाँ बनता है।

साइटोकाइनिन के प्रमुख प्रभाव

इथिलीन (Ethylene)

यह एकमात्र गैसीय पादप हार्मोन है, जो मुख्यतः पकते हुए फलों, जीर्ण होती पत्तियों एवं मुरझाते फूलों में प्रचुर मात्रा में बनता है। कृषि उपयोग हेतु 'इथेफॉन' (Ethephon) नामक रसायन का उपयोग किया जाता है, जो घोल में पौधे द्वारा सरलता से अवशोषित होकर धीरे-धीरे इथिलीन गैस मुक्त करता है — यह कृषि क्षेत्र में सबसे व्यापक रूप से उपयोग किया जाने वाला वृद्धि नियामक है।

इथिलीन के प्रमुख प्रभाव एवं कृषि-उपयोग

एबसिसिक एसिड (Abscisic Acid, ABA)

इसकी खोज फ्रेडरिक एडिकॉट एवं फिलिप वेरिंग (1965) ने की थी। यह मुख्य रूप से पत्तियों में बनता है तथा इसे 'तनाव हार्मोन' (Stress Hormone) कहा जाता है, क्योंकि प्रतिकूल परिस्थितियों (सूखा, लवणता, ठंड) में इसकी मात्रा तेज़ी से बढ़ जाती है।

एबसिसिक एसिड के प्रमुख प्रभाव

📌 महत्वपूर्ण — 💡 पाँचों हार्मोन एक नज़र में

वृद्धि बढ़ाने वाले तीन 'दोस्त' — ऑक्सिन (लंबाई), जिबरेलिन (ऊँचाई), साइटोकाइनिन (कोशिका विभाजन); तथा वृद्धि रोकने/नियंत्रित करने वाले दो 'चौकीदार' — एबसिसिक एसिड (तनाव के समय ब्रेक लगाना) एवं इथिलीन (पकने-झड़ने का संकेत देना)। किसी भी पौधे का व्यवहार वास्तव में इन पाँचों के बीच के नाज़ुक संतुलन से तय होता है।

📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)

◆ साइटोकाइनिन ◆ काइनेटिन ◆ ज़िएटिन ◆ इथिलीन ◆ इथेफॉन ◆ क्लाइमेक्टेरिक श्वसन ◆ एबसिसिक एसिड ◆ तनाव हार्मोन

14 प्रकाशकालिता, पुष्पन एवं वसंतीकरण

प्रकाशकालिता (Photoperiodism) पौधों की वह क्षमता है जिससे वे दिन की लंबाई (प्रकाश अवधि) के अनुसार अपने पुष्पन, कलिका-प्रसुप्ति एवं कंद-निर्माण जैसी क्रियाओं को नियंत्रित करते हैं। इस आधार पर पौधों को तीन वर्गों में बाँटा जाता है — लघु-दिवस पौधे (Short Day Plants), जो तभी फूलते हैं जब दिन की लंबाई एक निश्चित सीमा से कम हो (जैसे गुलदाउदी, कोस्मस, डहेलिया, सोयाबीन); दीर्घ-दिवस पौधे (Long Day Plants), जो तभी फूलते हैं जब दिन की लंबाई एक निश्चित सीमा से अधिक हो (जैसे गुलमोहर, मूली, पालक); तथा दिवस-निरपेक्ष पौधे (Day Neutral Plants), जिनके पुष्पन पर दिन की लंबाई का कोई प्रभाव नहीं पड़ता (जैसे खीरा, टमाटर, सूरजमुखी)।

फ्लोरिजन एवं फाइटोक्रोम

फ्लोरिजन (Florigen) एक काल्पनिक 'पुष्पन-प्रेरक हार्मोन' है, जिसे पत्तियों में अनुकूल प्रकाशकाल मिलने पर संश्लेषित माना जाता है, जो फिर तने के शीर्ष तक पहुँचकर वहाँ पुष्पन को प्रेरित करता है। इस पूरी प्रक्रिया में फाइटोक्रोम (Phytochrome) नामक एक प्रकाश-संवेदी वर्णक की मुख्य भूमिका होती है, जो दो परस्पर-परिवर्तनशील रूपों में पाया जाता है — Pr (लाल प्रकाश अवशोषित करने वाला रूप) एवं Pfr (दूर-लाल प्रकाश अवशोषित करने वाला रूप); लाल प्रकाश में Pr, Pfr में बदल जाता है तथा दूर-लाल प्रकाश में यह प्रक्रिया उलट जाती है — यही तंत्र पौधे को यह 'भान' कराता है कि अभी दिन है या रात, और कितनी देर से है।

वसंतीकरण (Vernalisation)

कुछ द्विवर्षीय (Biennial) पौधे — जो सामान्यतः दो मौसम-चक्रों में अपना जीवनचक्र पूरा करते हैं (पहले मौसम में केवल कायिक वृद्धि, दूसरे में पुष्पन) — यदि बीज अथवा पौध को कुछ समय के लिए निम्न तापमान (लगभग 1-10°C) का उपचार दिया जाए, तो वे पुष्पन क्षमता बहुत पहले ही प्राप्त कर लेते हैं, जिससे उनकी पूरी जीवन-प्रक्रिया मात्र एक ही मौसम में सिमट जाती है। इस प्रक्रिया को वसंतीकरण कहते हैं — गेहूँ, जौ एवं राई की शीतकालीन किस्मों में इसका व्यापक कृषि उपयोग होता है, जिससे किसान द्विवर्षीय फसल को व्यावहारिक रूप से वार्षिक फसल जैसा उगा-काट सकते हैं तथा विभिन्न जलवायु क्षेत्रों में समय से पहले फसल प्राप्त कर सकते हैं।

📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)

◆ प्रकाशकालिता ◆ लघु-दिवस पौधे ◆ दीर्घ-दिवस पौधे ◆ फ्लोरिजन ◆ फाइटोक्रोम ◆ वसंतीकरण

15 जीर्णता, विलगन एवं पादप प्रतिबल

जीर्णता (Senescence) वह अपक्षयी प्रक्रिया है जिसमें किसी अंग अथवा पूरे पौधे का संगठन एवं कार्य-क्षमता धीरे-धीरे पूर्णतः समाप्त हो जाती है। वार्षिक पौधों (जैसे गेहूँ, चावल, टमाटर) में पूरा पौधा ही पुष्पन-बीजन के बाद जीर्ण होकर मर जाता है, जबकि बहुवर्षीय पौधों में केवल हवाई भाग (पत्तियाँ) प्रतिवर्ष जीर्ण होते हैं, भूमिगत भाग (जड़ें) जीवित रहते हैं। हार्मोनल दृष्टि से एबसिसिक एसिड एवं इथिलीन जीर्णता को बढ़ावा देते हैं, जबकि साइटोकाइनिन इसमें देरी करता है।

विलगन (Abscission)

पुरानी पत्तियों, फूलों एवं फलों का पौधे से अलग होकर गिर जाना विलगन कहलाता है। यह पर्णवृंत के आधार पर बने एक विशेष 'विलगन क्षेत्र' (Abscission Zone) पर होता है, जहाँ मध्य पटलिका एवं कोशिका भित्ति के कमज़ोर पड़ने से कोशिकाएँ ढीली हो जाती हैं, तथा हवा अथवा वर्षा के हल्के झोंके से भी वे भाग अलग हो जाते हैं। ऑक्सिन विलगन को रोकता है (इसीलिए समय से पहले फल गिरने से रोकने के लिए NAA का छिड़काव किया जाता है), जबकि एबसिसिक एसिड एवं इथिलीन इसे बढ़ावा देते हैं।

पादप प्रतिबल (Stress)

जब पर्यावरण में कोई प्रतिकूल परिवर्तन पौधे की वृद्धि एवं विकास को नकारात्मक रूप से प्रभावित करे, तो उसे प्रतिबल कहते हैं। जल-प्रतिबल के दो रूप होते हैं — अत्यधिक जल (जलभराव, जिससे जड़ें-टहनियाँ काली पड़ जाती हैं) एवं जल की कमी (सूखा, जिससे पत्तियाँ पीली पड़कर मुरझा जाती हैं, प्रकाश संश्लेषण-श्वसन दोनों घट जाते हैं)। लवण-प्रतिबल में मिट्टी में अत्यधिक कैल्शियम-सोडियम लवण होने से कोशिकाओं का जलअपघटन (निर्जलीकरण) होकर वृद्धि रुक जाती है — राजस्थान जैसे शुष्क एवं अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में जल-प्रतिबल एवं मृदा-लवणता दोनों ही किसानों के सामने आने वाली प्रमुख चुनौतियाँ हैं, जिनके समाधान हेतु सूक्ष्म सिंचाई (ड्रिप इरिगेशन) एवं प्रतिबल-सहिष्णु फसल किस्मों को बढ़ावा दिया जा रहा है।

📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)

◆ जीर्णता ◆ विलगन क्षेत्र ◆ जल-प्रतिबल ◆ लवण-प्रतिबल ◆ द्विवर्षीय पौधे

16 कृषि एवं उद्यान विज्ञान में वृद्धि नियामकों का अनुप्रयोग

अब तक हमने हर हार्मोन का अलग-अलग कृषि-उपयोग देखा। आइए अब इन सभी को एक साथ जोड़कर देखें — यह विषय RAS मुख्य परीक्षा के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसी में 'कृषि एवं उद्यान विज्ञान के विशेष संदर्भ' का मूल भाव समाहित है।

फसल/उपयोग क्षेत्रप्रयुक्त वृद्धि नियामकउद्देश्य
आमNAAसमय से पूर्व फल गिरना रोकना
अंगूरजिबरेलिक अम्ल (GA₃)दानों (बेरी) का आकार बढ़ाना
केलाइथिलीन/इथेफॉनएकसमान पकाव
अनानासइथेफॉनसमकालिक पुष्पन
टमाटरऑक्सिन + जिबरेलिनबीजरहित फल उत्पादन
गन्नाIBAजड़ विकास एवं तना वृद्धि
सेबNAA / जिबरेलिनफल गिरना रोकना, शेल्फ-लाइफ बढ़ाना
संतराजिबरेलिक अम्लफल गुणवत्ता सुधारना
गेहूँ-चावल के खेत2,4-Dद्विबीजपत्री खरपतवार नियंत्रण

दस प्रमुख अनुप्रयोग क्षेत्र

वृद्धि नियामकों के लाभ एवं जोखिम

🟢 लाभ🔴 जोखिम/हानि
◆ वृद्धि नियमन एवं उपज वृद्धि ◆ सूखा-लवणता-गर्मी जैसे प्रतिबलों के प्रति सहनशीलता ◆ फल-गिरने पर नियंत्रण, बीजरहित फल उत्पादन ◆ पकाव का नियमन, अत्यंत कम मात्रा में भी प्रभावी◆ अधिक सांद्रता से वृद्धि रुकना अथवा असामान्य विकास ◆ फल के आकार-स्वाद-सुगंध में गड़बड़ी ◆ समय-पूर्व पकाव से शेल्फ-लाइफ घटना ◆ मृदा सूक्ष्मजीवों एवं पारिस्थितिकीय संतुलन पर प्रभाव, रासायनिक अवशेषों से स्वास्थ्य जोखिम
💡 वास्तविक उपयोग — संतुलित दृष्टिकोण

वृद्धि नियामकों का उपयोग आधुनिक कृषि एवं उद्यान विज्ञान की एक शक्तिशाली तकनीक है, परंतु इसका उपयोग सदैव अनुशंसित मात्रा एवं वैज्ञानिक मार्गदर्शन में ही किया जाना चाहिए — अत्यधिक अथवा असंतुलित उपयोग फसल की गुणवत्ता, उपभोक्ता स्वास्थ्य एवं पर्यावरण — तीनों को हानि पहुँचा सकता है।

📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)

◆ वृद्धि नियामक ◆ बीजरहित फल ◆ फल-सेट ◆ ऊतक संवर्धन ◆ खरपतवारनाशी

💡 वास्तविक उपयोग — 📌 अध्याय सारांश (Chapter Summary)

• पौधे मिट्टी से लगभग 60 खनिज तत्व सोखते हैं, किंतु केवल 17 आवश्यक हैं — 6 वृहत् पोषक तत्व (N, P, K, Ca, Mg, S) एवं 8 सूक्ष्म पोषक तत्व (Fe, Mn, B, Zn, Cu, Mo, Cl, Ni); लीबिग के 'न्यूनतम के नियम' के अनुसार सबसे कम उपलब्ध तत्व ही वृद्धि को सीमित करता है। • प्रकाश संश्लेषण हरितलवक में होता है — प्रकाशिक अभिक्रिया (थाइलेकॉइड, जल का फोटोलिसिस, ATP-NADPH निर्माण) एवं अप्रकाशिक अभिक्रिया (स्ट्रोमा, CO₂ स्थिरीकरण); पौधे C3 (केल्विन चक्र), C4 (क्रांज़ शारीरिकी, हैच-स्लैक चक्र) अथवा CAM (रात्रिकालीन CO₂ ग्रहण) मार्ग अपनाते हैं। • श्वसन माइटोकॉन्ड्रिया में होता है — ग्लाइकोलिसिस (कोशिकाद्रव्य), क्रेब्स चक्र एवं इलेक्ट्रॉन परिवहन तंत्र (माइटोकॉन्ड्रिया), जिससे एक ग्लूकोज़ अणु से लगभग 36-38 ATP प्राप्त होता है; ऑक्सीजन के अभाव में किण्वन होता है, जिसके बेकरी-मदिरा जैसे कई औद्योगिक उपयोग हैं। • वृद्धि का सिग्मॉइड वक्र तीन प्रावस्थाओं (विलंब, लॉग, स्थिर) में बँटा होता है; बाह्य कारक (प्रकाश, तापमान, जल, पोषक तत्व) एवं आंतरिक कारक (फाइटोहार्मोन) दोनों वृद्धि को नियंत्रित करते हैं। • पाँच प्रमुख पादप हार्मोन — ऑक्सिन (कोशिका दीर्घीकरण, शीर्ष प्रभाविता, खरपतवारनाशी 2,4-D), जिबरेलिन (बौनेपन को दूर करना, प्रसुप्ति तोड़ना, माल्टिंग), साइटोकाइनिन (कोशिका विभाजन, जीर्णता में देरी, ऊतक संवर्धन), इथिलीन (फल पकाव, विलगन, क्लाइमेक्टेरिक श्वसन), तथा एबसिसिक एसिड (तनाव हार्मोन, रंध्र बंद करना, प्रसुप्ति बनाए रखना)। • प्रकाशकालिता (लघु-दिवस/दीर्घ-दिवस/दिवस-निरपेक्ष पौधे), फाइटोक्रोम (Pr-Pfr) एवं वसंतीकरण (द्विवर्षीय पौधों को व्यावहारिक रूप से वार्षिक बनाना) पुष्पन के समय को नियंत्रित करते हैं। • जीर्णता एवं विलगन अंततः एबसिसिक एसिड-इथिलीन द्वारा बढ़ावा तथा साइटोकाइनिन-ऑक्सिन द्वारा विलंबित होते हैं; जल एवं लवण प्रतिबल राजस्थान जैसे शुष्क क्षेत्रों की प्रमुख कृषि-चुनौतियाँ हैं। • वृद्धि नियामकों का कृषि-उद्यान में व्यापक उपयोग है — बीज अंकुरण, जड़ निर्माण, फलन-उपज वृद्धि, बीजरहित फल, पुष्पन-नियंत्रण, खरपतवार नियंत्रण, फल-पकाव, जीर्णता-विलंब, प्रतिबल-सहनशीलता एवं ऊतक संवर्धन — किंतु इनका उपयोग सदैव वैज्ञानिक मात्रा में ही होना चाहिए।

📢 विज्ञापन
🔥 सबसे लोकप्रिय
📘

RAS Foundation Course 2026 🕉️

Multiple ValidityTests
₹4,999₹25,000
Join Now →
📢 विज्ञापन
📦

ALL IN ONE Subscription

Multiple ValidityTests
₹899₹4,999
Join Now →
← मुख्य पृष्ठ पर वापस अध्याय 4: पादपों में जनन →