🌱 अध्याय 2/15 — जीव विज्ञान

पादप के भाग

कार्य एवं उपयोग — Plant Parts, their Functions and Uses
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📋 इस अध्याय में
  1. जड़ (Root) — प्रकार, क्षेत्र, रूपांतरण एवं कार्य
  2. जड़ की आंतरिक संरचना — द्विबीजपत्री एवं एकबीजपत्री जड़
  3. तना (Stem) — विशेषताएँ, प्रकार एवं रूपांतरण
  4. तने की आंतरिक संरचना, द्वितीयक वृद्धि एवं वार्षिक वलय
  5. पत्ती (Leaf) — भाग, शिराविन्यास, प्रकार एवं पर्णविन्यास
  6. पत्ती की आंतरिक संरचना एवं रूपांतरण
  7. पुष्प (Flower) — संरचना एवं भाग
  8. पुष्पक्रम (Inflorescence) — प्रकार
  9. फल (Fruit) — प्रकार एवं संरचना
  10. बीज (Seed) — संरचना एवं अंकुरण
📖 🌟 क्या आप जानते हैं?
कल्पना कीजिए कि आप एक विशाल बरगद (वटवृक्ष) के पेड़ के नीचे खड़े हैं — कोलकाता के पास स्थित 'द ग्रेट बनयान ट्री' नामक 200 वर्ष से भी पुराना यह पेड़ इतना विशाल है कि इसकी छतरी (Canopy) का घेरा 400 मीटर से भी अधिक है, और इसे सहारा देने के लिए इसकी शाखाओं से लगभग 1600 जड़ें ज़मीन में उतरकर मोटे-मोटे स्तंभों जैसी बन गई हैं — इतनी अधिक कि दूर से देखने पर यह एक अकेला पेड़ नहीं, बल्कि पूरा जंगल जैसा दिखाई देता है! यही वह जड़ें हैं जिन्हें वैज्ञानिक भाषा में 'स्तंभ जड़ें' (Prop Roots) कहते हैं — यानी सामान्य जड़ें, जो अपना सामान्य काम (पानी सोखना) छोड़कर सहारा देने का बिल्कुल नया काम करने लगीं। ठीक ऐसे ही, आपकी रसोई में पड़ा आलू असल में कोई जड़ नहीं, बल्कि एक तना है, जो ज़मीन के नीचे भोजन जमा करने के लिए फूल गया है, और अदरक भी तना ही है, जड़ नहीं! यानी पौधे का हर भाग — जड़, तना, पत्ती, फूल, फल — ज़रूरत पड़ने पर अपना रूप और काम दोनों बदल सकता है, बिल्कुल किसी कुशल कारीगर की तरह जो एक ही औज़ार को अलग-अलग परिस्थिति में अलग-अलग तरीके से इस्तेमाल कर लेता है। आइए, पौधे के इन सभी भागों — जड़, तना, पत्ती तथा पुष्प-फल-बीज — की बनावट, कार्य एवं उपयोग को विस्तार से समझते हैं।

1 जड़ (Root) — प्रकार, क्षेत्र, रूपांतरण एवं कार्य

जब कोई बीज अंकुरित होता है, तो सबसे पहले उसमें से जो अंग बाहर निकलता है उसे मूलांकुर (Radicle) कहते हैं — यही आगे चलकर बढ़कर जड़ (Root) बनता है। जड़ पौधे का वह भूमिगत भाग है जो सामान्यतः हरा नहीं होता (क्योंकि इसमें पर्णहरित नहीं होता), जिसमें पर्व-पर्वसंधि (Node-Internode), पत्तियाँ अथवा कलिकाएँ नहीं पाई जातीं। जड़ में तीन विशेष प्रवृत्तियाँ पाई जाती हैं — यह गुरुत्वानुवर्तनी (Positively Geotropic) होती है यानी गुरुत्वाकर्षण की दिशा में नीचे की ओर बढ़ती है, जलानुवर्तनी (Positively Hydrotropic) होती है यानी पानी की ओर बढ़ती है, तथा प्रकाशविरोधी (Negatively Phototropic) होती है यानी प्रकाश से दूर भागती है। यही तीन गुण किसी भी अंग को 'जड़' के रूप में पहचानने की सबसे पक्की कसौटी हैं।

जड़ तंत्र के प्रकार (Types of Root Systems)

अपस्थानिक जड़ें (Adventitious Roots) वे जड़ें हैं जो मूलांकुर के अतिरिक्त पौधे के किसी भी अन्य भाग से विकसित होती हैं — जैसे मनी प्लांट एवं बांस में पर्वसंधि (Node) से, गुलाब की कलम (कटिंग) से तने के आधार से, तथा बरगद में शाखा से।

जड़ के विभिन्न क्षेत्र (Regions of Root)

जड़ के अगले सिरे का अनुदैर्ध्य काट (Longitudinal Section) लेकर देखा जाए तो जड़ में चार स्पष्ट क्षेत्र दिखाई देते हैं — जो शिखर से आधार की ओर इस क्रम में होते हैं:

🔍 दिलचस्प तथ्य — रोचक खोज

सन् 1958 में वैज्ञानिक क्लोवीज़ (Clowes) ने मक्का की जड़ की नोक में मूल गोप एवं सक्रिय विभज्योतक के बीच निष्क्रिय कोशिकाओं का एक कटोरेनुमा भंडार खोजा, जिसे 'शांत केंद्र' (Quiescent Centre) कहा जाता है — यह सामान्यतः निष्क्रिय रहता है, परंतु यदि मुख्य विभज्योतक क्षतिग्रस्त हो जाए, तो यह सक्रिय होकर उसकी भरपाई कर देता है — यानी यह जड़ की एक 'आपातकालीन बैकअप प्रणाली' की तरह काम करता है।

📌 महत्वपूर्ण

🖼️ मूसला जड़ तंत्र (बाएँ) एवं झकड़ा/अपस्थानिक जड़ तंत्र (दाएँ)

जीव विज्ञान चित्र

जड़ के रूपांतरण (Modifications of Roots)

जड़ें केवल पानी सोखने तक सीमित नहीं रहतीं — आवश्यकतानुसार ये अपना आकार एवं कार्य पूरी तरह बदल लेती हैं। इन्हें दो बड़े वर्गों में बाँटा जाता है — मूसला जड़ों के रूपांतरण एवं अपस्थानिक जड़ों के रूपांतरण।

(अ) मूसला जड़ के रूपांतरण — भोजन संग्रह हेतु

प्रकारविशेषताउदाहरण
शंकु रूप (Conical)आधार चौड़ा, धीरे-धीरे पतला होता हुआगाजर
तर्कु रूप (Fusiform)मध्य भाग फूला हुआ, दोनों सिरों पर पतलामूली
कुम्भी रूप (Napiform)आधार गोलाकार, सिरा एकदम पतलाशलजम
कंदिल रूप (Tuberous)मोटी-मांसल, कोई निश्चित आकार नहींगुल-अब्बास (4 O'Clock Plant)

(ब) अपस्थानिक जड़ के रूपांतरण

जड़ों के कार्य

🔍 दिलचस्प तथ्य — 💡 रोचक तथ्य

कोलकाता के पास स्थित 'द ग्रेट बनयान ट्री' 200 वर्ष से भी अधिक पुराना है, इसकी छतरी का घेरा 400 मीटर से अधिक है, तथा इसे सहारा देने वाली स्तंभ जड़ों (Prop Roots) की संख्या लगभग 1600 है — यह वृक्ष जड़ों के 'सहारा देने' वाले रूपांतरित कार्य का सबसे बड़ा जीवंत उदाहरण है।

📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)

◆ मूलांकुर (Radicle) ◆ मूसला जड़ तंत्र ◆ झकड़ा जड़ तंत्र ◆ मूल गोप ◆ मूलरोम ◆ शांत केंद्र ◆ वेलामेन ◆ न्यूमैटोफोर ◆ हास्टोरिया ◆ स्तंभ मूल

2 जड़ की आंतरिक संरचना — द्विबीजपत्री एवं एकबीजपत्री जड़

यदि जड़ का अनुप्रस्थ काट (Transverse Section) लेकर सूक्ष्मदर्शी से देखा जाए, तो बाहर से भीतर की ओर परतों में सजी हुई एक बहुत ही सुव्यवस्थित संरचना दिखाई देती है — बिल्कुल किसी प्याज़ की परतों की तरह, जिसमें हर परत का अपना विशेष काम होता है।

द्विबीजपत्री जड़ की प्राथमिक संरचना (जैसे चना)

एकबीजपत्री जड़ की प्राथमिक संरचना (जैसे मक्का)

एकबीजपत्री जड़ में भी एपिब्लेमा, वल्कुट एवं अंतस्त्वचा (कैस्पेरियन पट्टी व पैसेज कोशिकाओं सहित) लगभग द्विबीजपत्री जड़ जैसी ही होती हैं, किंतु तीन बड़े अंतर होते हैं — परिरंभ से केवल पार्श्व जड़ों की उत्पत्ति होती है, एधा (कैंबियम) बिल्कुल नहीं बनता; संवहन बंडल संख्या में बहुत अधिक तथा बहुरंभी (Polyarch) होते हैं; तथा मज्जा बड़ी एवं भली-भाँति विकसित होती है, जो भोजन संग्रह का कार्य करती है।

आधारद्विबीजपत्री जड़एकबीजपत्री जड़
संवहन बंडलों की संख्यासीमित (2-6, द्विरंभी से षट्रंभी)अनेक (बहुरंभी)
परिरंभ की भूमिकापार्श्व जड़ें + संवहन एधा + कॉर्क एधाकेवल पार्श्व जड़ें
एधा (कैंबियम)उपस्थितअनुपस्थित
द्वितीयक वृद्धिहोती हैनहीं होती
मज्जा (Pith)बहुत छोटी अथवा अनुपस्थितबड़ी एवं भली-भाँति विकसित

पार्श्व जड़ों की उत्पत्ति

पार्श्व जड़ें अंतर्जात (Endogenous) होती हैं, अर्थात् ये जड़ की गहरी परत — परिरंभ — से उत्पन्न होती हैं (न कि बाहरी परत से, जैसा तने की शाखाओं में होता है)। प्रोटोजाइलम के सामने स्थित परिरंभ कोशिकाएँ विभाजित होकर एक उभार बनाती हैं, जो अंतस्त्वचा एवं वल्कुट को भेदते हुए बाहर निकल आता है और अपना डर्मेटोजन-पेरिब्लेम-प्लेरोम विभेदित करके अंततः एक स्वतंत्र पार्श्व जड़ के रूप में प्रकट होता है। पार्श्व जड़ों की संख्या जाइलम पट्टिकाओं की संख्या से मेल खाती है — जैसे चतुष्‍रंभी (Tetrarch) जड़ में चार दिशाओं से पार्श्व जड़ें निकलती हैं।

द्विबीजपत्री जड़ में द्वितीयक वृद्धि

यह केवल द्विबीजपत्री जड़ों में ही होती है, संवहन एधा एवं कॉर्क एधा (दोनों परिरंभ से उत्पन्न) की सहायता से। परिरंभ की कोशिकाएँ प्रोटोजाइलम के ठीक बाहर एक एधा पट्टी बनाती हैं, तथा फ्लोएम के भीतर की ओर संयोजी ऊतक में एक और पट्टी बनती है — ये दोनों पट्टियाँ मिलकर एक पूर्ण वलय बना लेती हैं, जो शुरू में लहरदार होकर बाद में गोलाकार हो जाती है। यह एधा भीतर की ओर द्वितीयक जाइलम तथा बाहर की ओर द्वितीयक फ्लोएम बनाती रहती है। परिरंभ में ही कॉर्क एधा (फीलोजन) भी बनता है, जो बाहर की ओर कॉर्क (फीलम) तथा भीतर की ओर द्वितीयक वल्कुट (फीलोडर्म) बनाता है — इन तीनों को मिलाकर पेरिडर्म कहा जाता है, जो जड़ की नई सुरक्षा-परत बन जाती है, और तब तक की सभी बाहरी परतें (एपिब्लेमा, वल्कुट, अंतस्त्वचा) झड़ जाती हैं।

📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)

◆ एपिब्लेमा ◆ वल्कुट (कॉर्टेक्स) ◆ कैस्पेरियन पट्टी ◆ परिरंभ ◆ बहिर्रंभी जाइलम ◆ अंतर्जात उत्पत्ति ◆ पेरिडर्म

3 तना (Stem) — विशेषताएँ, प्रकार एवं रूपांतरण

जिस प्रकार जड़ मूलांकुर से बनती है, उसी प्रकार तना प्रांकुर (Plumule) से विकसित होता है। यह प्रकाशानुवर्तनी (Positively Phototropic) होता है यानी प्रकाश की ओर बढ़ता है, तथा गुरुत्वविरोधी (Negatively Geotropic) होता है यानी गुरुत्वाकर्षण के विपरीत ऊपर की ओर बढ़ता है — बिल्कुल जड़ के व्यवहार के उलट। तना पर्व (Node, जहाँ से पत्ती जुड़ती है) एवं पर्वसंधि/मध्यपर्व (Internode, दो पर्वों के बीच का भाग) में बँटा होता है, तथा इस पर शीर्षस्थ कलिका (Terminal Bud, तने के अगले सिरे पर) एवं कक्षस्थ कलिका (Axillary Bud, पत्ती की कक्ष में) पाई जाती हैं — ये कलिकाएँ आगे चलकर पत्ती, शाखा अथवा पुष्प बन सकती हैं।

आधारतना (Stem)जड़ (Root)
उत्पत्तिप्रांकुर (Plumule) सेमूलांकुर (Radicle) से
रंगयुवा तना हरासामान्यतः हरा नहीं
पर्व-पर्वसंधिउपस्थितअनुपस्थित
पत्ती एवं कलिकाउपस्थितअनुपस्थित
अनुवर्तनप्रकाशानुवर्तनी, गुरुत्वविरोधीगुरुत्वानुवर्तनी, प्रकाशविरोधी
पार्श्व शाखाओं की उत्पत्तिबहिर्जात (Exogenous)अंतर्जात (Endogenous)

शीर्षस्थ विभज्योतक (Shoot Apex)

तने के अगले सिरे पर एक गुंबदाकार विभज्योतक होता है, जो दो भागों में बँटा होता है — ट्यूनिका (बाहरी, 1-3 परतें, केवल अपनतलीय दिशा में विभाजित होकर एपिडर्मिस एवं सतही वृद्धि बनाती है) एवं कॉर्पस (भीतरी, बहुस्तरीय, सभी दिशाओं में विभाजित होकर प्राक्केंबियम व आधारी विभज्योतक बनाता है, जो आगे चलकर संवहन ऊतक एवं पत्ती के आद्यक (Leaf Primordia) का निर्माण करते हैं)। कक्षस्थ कलिका से पार्श्व शाखा का विकास बहिर्जात (Exogenous) रूप से होता है — यानी बाहरी परतों से — जो इसे जड़ की अंतर्जात पार्श्व-जड़ उत्पत्ति से बिल्कुल अलग बनाता है।

तने के प्रकार

तने के रूपांतरण

भूमिगत तने को जड़ से अलग पहचानने के तीन पक्के प्रमाण हैं — इन पर पर्व-पर्वसंधि पाई जाती है, शल्क पत्र (Scaly, बिना हरे रंग के पत्ते) होते हैं, तथा कलिकाएँ होती हैं। इनका मुख्य कार्य होता है शीतनिष्क्रियता (Perennation — प्रतिकूल मौसम में सुप्त रहकर अगले मौसम में फिर उगना) एवं भोजन संग्रह।

भूमिगत रूपांतरणविशेषताउदाहरण
प्रकंद (Rhizome)मोटा, मांसल, मिट्टी की सतह के पास क्षैतिज बढ़ता हैअदरक, हल्दी
घनकंद (Corm)मांसल, गोलाकार-चपटा आधार, ऊर्ध्वाधर वृद्धिकेसर, जिमीकंद, ग्लैडियोलस
शल्क कंद (Bulb)चपटा तश्तरीनुमा तना, गुच्छित पर्व, मांसल शल्क पत्रप्याज़
ग्रंथिल कंद (Tuber)भूमिगत शाखाओं के फूले हुए सिरे, स्टार्च संग्रह, 'आँखें' (नेत्र) होती हैंआलू
अर्ध-हवाई रूपांतरणविशेषताउदाहरण
उपरिभूस्तारी (Runner)लंबा, कमज़ोर, लंबे पर्व, मिट्टी पर क्षैतिज फैलता हैघास, ऑक्ज़ैलिस
भूस्तारी (Stolon)पहले ऊपर बढ़ता है, फिर झुककर मिट्टी में जड़ें जमाता हैपुदीना, चमेली
अंतस्थ शाखा (Offset)रनर जैसा किंतु मोटा-छोटा, जलीय पौधों मेंजलकुम्भी
चूषक (Sucker)भूमिगत रनर, तिरछा निकलकर सतह पर आता हैगुलदाउदी

ये सभी अर्ध-हवाई रूपांतरण मुख्यतः वर्धी प्रवर्धन (Vegetative Propagation) यानी बिना बीज के नए पौधे बनाने के काम आते हैं — इसीलिए ये सभी पौधे प्रायः विसर्पी (Creeper) प्रकृति के होते हैं।

हवाई रूपांतरणविशेषताउदाहरण
तना प्रतान (Stem Tendril)धागेनुमा, कुंडलित, पत्तीरहित, चढ़ने में सहायकअंगूर की बेल
कंटक (Thorns)सीधा, नुकीला, कठोर; कक्षस्थ अथवा शीर्षस्थ कलिका से रूपांतरित; सुरक्षा हेतुनींबू, दुरंता, करौंदा
पर्णाभ स्तंभ (Phylloclade)हरा, चपटा/बेलनाकार, मांसल तना, पर्व-पर्वसंधि सहित, काँटे (रूपांतरित पत्तियाँ) धारण करता हैनागफनी (ओपन्शिया)
क्लैडोड (Cladode)सीमित वृद्धि वाला पर्णाभ स्तंभ (केवल 1-2 पर्वसंधि)शतावरी (Asparagus)
💡 वास्तविक उपयोग — 💡 रोज़मर्रा से जुड़ा उदाहरण

नागफनी (कैक्टस) के रेगिस्तानी पौधे में असली पत्तियाँ पूरी तरह काँटों में बदल जाती हैं ताकि पानी की हानि (वाष्पोत्सर्जन) कम से कम हो — और प्रकाश संश्लेषण का पूरा काम हरे, मांसल तने (पर्णाभ स्तंभ) को ही करना पड़ता है। यानी नागफनी में जो 'पत्ती जैसा' मोटा हरा भाग दिखता है, वह असल में पत्ती नहीं बल्कि तना है!

तने के कार्य

📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)

◆ प्रांकुर (Plumule) ◆ पर्व-पर्वसंधि ◆ शीर्षस्थ कलिका ◆ कक्षस्थ कलिका ◆ प्रकंद ◆ घनकंद ◆ शल्क कंद ◆ ग्रंथिल कंद ◆ पर्णाभ स्तंभ

4 तने की आंतरिक संरचना, द्वितीयक वृद्धि एवं वार्षिक वलय

द्विबीजपत्री तने की प्राथमिक संरचना (जैसे सूरजमुखी)

एकबीजपत्री तने की प्राथमिक संरचना (जैसे मक्का)

एपिडर्मिस पर रोम नहीं होते। भूमि ऊतक (Ground Tissue) एक अविभेदित मृदूतक पुंज होता है, जिसकी परिधि पर दृढ़ोतक की अधोत्वचा होती है। संवहन बंडल संख्या में बहुत अधिक, बिखरे हुए (Scattered), प्रत्येक दृढ़ोतकी बंडल-आच्छद से घिरा होता है; ये संपार्श्विक किंतु बंद (Closed) होते हैं यानी इनमें एधा नहीं होता। जाइलम की आकृति अंग्रेज़ी के 'Y' अक्षर जैसी होती है, तथा भीतरी प्रोटोजाइलम नष्ट होकर एक जल-गुहा (Water Cavity) बना देता है।

आधारद्विबीजपत्री तनाएकबीजपत्री तना
संवहन बंडलसीमित संख्या, एक वलय में, समान आकारअनेक, बिखरे हुए, आकार में भिन्न-भिन्न
बंडल आच्छदअनुपस्थितउपस्थित (दृढ़ोतकी)
एधा (कैंबियम)उपस्थित (खुला बंडल)अनुपस्थित (बंद बंडल)
जल गुहाअनुपस्थितउपस्थित
द्वितीयक वृद्धिहोती है (प्रायः)सामान्यतः नहीं होती

द्वितीयक वृद्धि (केवल द्विबीजपत्री तने में)

संवहन बंडल के भीतर की एधा पट्टी (पूलीय एधा) तथा मज्जा-रश्मि कोशिकाओं से बनने वाली एधा (अंतरापूलीय एधा) आपस में जुड़कर एक सतत् वलय बना लेती हैं। यह एधा भीतर की ओर अधिक मात्रा में द्वितीयक जाइलम तथा बाहर की ओर कम मात्रा में द्वितीयक फ्लोएम बनाती रहती है। इसी दौरान वल्कुट में कॉर्क एधा (फीलोजन) भी विकसित होता है, जो भीतर की ओर फीलोडर्म (द्वितीयक वल्कुट) तथा बाहर की ओर फीलम (कॉर्क) बनाता है। कॉर्क कोशिकाएँ मृत, संहत एवं सुबेरिनयुक्त होती हैं, केवल वातरंध्र (Lenticels) नामक स्थानों पर ढीली, बिना सुबेरिन वाली कोशिकाएँ होती हैं जो गैसों के आदान-प्रदान की अनुमति देती हैं। फीलोजन+फीलम+फीलोडर्म मिलकर पेरिडर्म बनाते हैं, जो पुराने तने में एपिडर्मिस का स्थान ले लेता है। सक्रिय फीलोजन के बाहर की सभी मृत परतें मिलकर 'छाल' (Bark) कहलाती हैं।

🔍 दिलचस्प तथ्य — 💡 रोचक तथ्य

भोजपत्र वृक्ष की छाल कागज़ की तरह पतली परतों में उतरती है, और प्राचीन काल में इसी पर पांडुलिपियाँ (हस्तलिखित ग्रंथ) लिखी जाती थीं। वहीं कॉर्क ओक वृक्ष की मोटी कॉर्क छाल का व्यावसायिक उपयोग बोतल के ढक्कन, इंसुलेशन तथा जूतों के तलवे बनाने में होता है — यही वह कॉर्क है जिसे हमने कोशिका के अध्याय में रॉबर्ट हुक की कहानी में भी देखा था।

काष्ठ (Wood), वार्षिक वलय एवं डेंड्रोक्रोनोलॉजी

संवहन एधा की क्रियाशीलता से बना द्वितीयक जाइलम ही 'काष्ठ' अथवा लकड़ी कहलाता है। शीतोष्ण जलवायु में एधा की मौसमी क्रियाशीलता के कारण वसंत/बसंत काष्ठ (चौड़ी वाहिकाओं वाली, अधिक सक्रिय अवधि में बनी) एवं शरद काष्ठ (संकरी वाहिकाओं वाली, कम सक्रिय अवधि में बनी) की एकांतर परतें बनती हैं, जो संकेंद्रीय वलयों के रूप में दिखाई देती हैं — इन्हें वार्षिक वलय (Annual Rings) कहा जाता है। इन वलयों को गिनकर पेड़ की आयु का पता लगाया जा सकता है — इस विधि को वृक्ष-वलय कालक्रम विज्ञान अथवा डेंड्रोक्रोनोलॉजी (Dendrochronology) कहते हैं।

🟢 रस काष्ठ (Sap Wood)🟤 अंतःकाष्ठ (Heart Wood)
◆ बाहरी, क्रियाशील, हाल में बनी ◆ हल्के रंग की, वाहिकाएँ खुली (जल संवहन करती हैं) ◆ कम टिकाऊ, कम मूल्यवान◆ भीतरी, अक्रियाशील, गोंद-रेज़िन-टैनिन के जमाव से गहरे रंग की ◆ वाहिकाएँ टाइलोसिस से अवरुद्ध (जल संवहन नहीं करतीं) ◆ अधिक भारी, अधिक टिकाऊ, व्यावसायिक रूप से अधिक मूल्यवान (जैसे सागवान का फर्नीचर)
📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)

◆ स्टार्च आच्छद ◆ पूलीय एधा ◆ अंतरापूलीय एधा ◆ फीलोजन ◆ वातरंध्र (Lenticel) ◆ पेरिडर्म ◆ छाल ◆ वार्षिक वलय ◆ डेंड्रोक्रोनोलॉजी ◆ रस काष्ठ ◆ अंतःकाष्ठ

5 पत्ती (Leaf) — भाग, शिराविन्यास, प्रकार एवं पर्णविन्यास

पत्ती तने अथवा शाखा का चपटा, फैला हुआ, पार्श्विक उपांग है, जो पर्व से निकलती है तथा पर्ण-आद्यक (Leaf Primordium) से विकसित होती है। इसकी कक्ष में एक कक्षस्थ कलिका होती है। पत्ती ही वह मुख्य स्थान है जहाँ प्रकाश संश्लेषण, वाष्पोत्सर्जन एवं श्वसन जैसी महत्वपूर्ण क्रियाएँ संपन्न होती हैं — इसीलिए इसे पौधे का 'रसोईघर' भी कहा जा सकता है।

पत्ती के भाग

शिराविन्यास (Venation)

पत्ती में शिराओं एवं शिरिकाओं की व्यवस्था को शिराविन्यास कहते हैं। यह दो मुख्य प्रकार का होता है — जालिकावत् शिराविन्यास (Reticulate), जिसमें शिराएँ जाल जैसी संरचना बनाती हैं (यह द्विबीजपत्री पौधों की पहचान है), तथा समानांतर शिराविन्यास (Parallel), जिसमें शिराएँ आधार से अग्र तक समानांतर पंक्तियों में चलती हैं (यह एकबीजपत्री पौधों की पहचान है)। इन दोनों के भी दो-दो उपप्रकार होते हैं — एकशिरीय/यूनिकॉस्टेट (एक मुख्य मध्यशिरा से पंखनुमा शिराएँ निकलती हैं — पीपल में जालिकावत्, केना में समानांतर) तथा बहुशिरीय/मल्टीकॉस्टेट (हथेली की उँगलियों की तरह कई शिराएँ एक ही बिंदु से निकलती हैं — अंगूर की बेल में जालिकावत्, ताड़ में समानांतर)।

पत्तियों के प्रकार — सरल एवं संयुक्त

यदि पर्णफलक में कटाव मध्यशिरा तक न पहुँचे, तो उसे सरल पत्ती (Simple Leaf) कहते हैं। यदि कटाव मध्यशिरा तक पहुँचकर फलक को पूरी तरह अलग-अलग पर्णकों (Leaflets) में बाँट दे, तो उसे संयुक्त पत्ती (Compound Leaf) कहते हैं। दोनों में फ़र्क पहचानने की सबसे पक्की कसौटी यह है — पूरी पत्ती (अथवा संयुक्त पत्ती) की कक्ष में कक्षस्थ कलिका होती है, परंतु किसी एक पर्णक की कक्ष में कभी कलिका नहीं होती।

🟢 पिच्छाकार संयुक्त पत्ती (Pinnately Compound)🔴 हस्ताकार संयुक्त पत्ती (Palmately Compound)
◆ पर्णक एक अक्ष (रेकिस/Rachis) के दोनों ओर कतार में लगे होते हैं ◆ आगे उपविभाजित हो सकती है — एकपिच्छाकार, द्विपिच्छाकार, त्रिपिच्छाकार ◆ उदाहरण — नीम, इमली, गुलमोहर◆ सभी पर्णक वृंत के एक ही बिंदु से हथेली की तरह निकलते हैं ◆ पर्णकों की संख्या अनुसार — द्विपर्णी, त्रिपर्णी, चतुष्पर्णी, बहुपर्णी ◆ उदाहरण — सेमल, कपास

पर्णविन्यास (Phyllotaxy)

तने अथवा शाखा पर पत्तियों की व्यवस्थित सजावट को पर्णविन्यास कहते हैं, जो हर पत्ती को अधिकतम सूर्यप्रकाश मिलने देने के लिए प्रकृति की एक चतुर व्यवस्था है। इसके तीन प्रकार हैं — एकांतर (Alternate, प्रत्येक पर्व पर एक ही पत्ती — जैसे गुड़हल, आम), सम्मुख (Opposite, प्रत्येक पर्व पर दो पत्तियाँ आमने-सामने — यह आगे दो उपप्रकारों में बँटता है: क्रॉसित/Decussate जिसमें क्रमागत जोड़े समकोण पर होते हैं जैसे तुलसी-आकड़ा, तथा अध्यारोपित/Superposed जिसमें क्रमागत जोड़े एक ही तल में होते हैं जैसे अमरूद), तथा चक्रिक (Whorled, दो से अधिक पत्तियाँ एक ही पर्व पर वृत्ताकार क्रम में — जैसे कनेर)।

📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)

◆ पर्णाधार ◆ पर्णवृंत ◆ लैमिना ◆ मध्यशिरा ◆ जालिकावत् शिराविन्यास ◆ समानांतर शिराविन्यास ◆ सरल पत्ती ◆ संयुक्त पत्ती ◆ एकांतर पर्णविन्यास

6 पत्ती की आंतरिक संरचना एवं रूपांतरण

पत्ती की आंतरिक संरचना मुख्यतः तीन भागों से मिलकर बनी होती है — एपिडर्मिस, पर्णमध्योतक (Mesophyll) एवं संवहन तंत्र। द्विबीजपत्री पत्तियाँ पृष्ठाधारी (Dorsiventral — क्षैतिज अभिविन्यास, ऊपरी व निचली सतह अलग-अलग) होती हैं, जबकि एकबीजपत्री पत्तियाँ समद्विपार्श्विक (Isobilateral — ऊर्ध्वाधर अभिविन्यास, दोनों सतहें लगभग समान) होती हैं।

एपिडर्मिस एवं रंध्र (Stomata)

पत्ती की ऊपरी एवं निचली दोनों सतहों पर एपिडर्मिस होती है, जिसकी कुछ कोशिकाएँ रक्षक कोशिकाओं (Guard Cells) में बदलकर रंध्र (Stomata) बनाती हैं — यही रंध्र गैसों के आदान-प्रदान एवं वाष्पोत्सर्जन का मुख्य द्वार हैं। द्विबीजपत्री पत्तियों में रक्षक कोशिकाएँ वृक्काकार (Reniform) होती हैं तथा सामान्यतः केवल निचली सतह पर पाई जाती हैं, जबकि एकबीजपत्री पत्तियों (जैसे मक्का) में ये डम्बल के आकार की होती हैं तथा दोनों सतहों पर पाई जाती हैं।

पौधे का प्रकाररंध्रों की स्थितिविशेष टिप्पणी
सामान्य द्विबीजपत्री (आम, नीम)मुख्यतः निचली सतह परअर्धचंद्राकार/वृक्काकार रक्षक कोशिकाएँ
सामान्य एकबीजपत्री (मक्का)दोनों सतहों परडम्बल आकार की रक्षक कोशिकाएँ
मरुद्भिद (कनेर)केवल निचली सतह, प्रायः धँसे हुएवाष्पोत्सर्जन कम करने हेतु
तैरती पत्ती वाले जलोद्भिद (कमल)केवल ऊपरी सतहनीचे पानी होने से निचली सतह पर बेकार
डूबी पत्ती वाले जलोद्भिद (हाइड्रिला)अनुपस्थितसीधे जल से गैस विनिमय होता है

पर्णमध्योतक (Mesophyll)

यह पर्णहरित युक्त हरितोतक (Chlorenchyma) है, जो प्रकाश संश्लेषण का मुख्य स्थल है। द्विबीजपत्री पत्तियों में यह दो भागों में विभेदित होता है — स्तंभाकार ऊतक (Palisade, ऊपरी एपिडर्मिस के नीचे, लंबी-सीधी, सघन कोशिकाएँ, प्रचुर पर्णहरितलवक) एवं स्पंजी ऊतक (Spongy, इसके नीचे, अनियमित एवं ढीली कोशिकाएँ, कम पर्णहरितलवक, गैस भंडारण हेतु अंतरकोशिकीय स्थान अधिक)। एकबीजपत्री पत्तियों में मात्र स्पंजी ऊतक होता है, स्तंभाकार ऊतक अनुपस्थित रहता है।

विशेष संरचनाएँ

📌 महत्वपूर्ण

🖼️ पत्ती की आंतरिक संरचना — एपिडर्मिस, पर्णमध्योतक एवं संवहन बंडल

जीव विज्ञान चित्र

पत्ती के रूपांतरण

📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)

◆ पर्णमध्योतक ◆ स्तंभाकार ऊतक ◆ स्पंजी ऊतक ◆ रंध्र (Stomata) ◆ बुलीफॉर्म कोशिकाएँ ◆ जलरंध्र ◆ बिंदु स्रवण ◆ पर्ण प्रतान ◆ घटपर्णी

7 पुष्प (Flower) — संरचना एवं भाग

पुष्प वास्तव में एक रूपांतरित प्ररोह (Modified Shoot) है, जिसमें पर्व इतने पास-पास सिकुड़ जाते हैं कि पर्णिल संरचनाएँ (पुष्प के चक्र) क्रमवार एक-दूसरे से सटी दिखाई देती हैं। यह पौधे में लैंगिक जनन का केंद्र है, जो निषेचन के बाद फल एवं बीज बनाता है।

पुष्प के भाग

पुष्प एक डंठल — पुष्पवृंत (Pedicel) — पर लगा होता है, जिसका फूला हुआ सिरा पुष्पासन (Thalamus/Receptacle) कहलाता है, जिस पर चार चक्र क्रमवार लगे होते हैं:

📌 महत्वपूर्ण

🖼️ एक विशिष्ट द्विलिंगी पुष्प की संरचना — बाह्यदलपुंज, दलपुंज, पुमंग एवं जायांग

जीव विज्ञान चित्र

पुष्प में विविधताएँ

पुष्पासन पर चक्रों की स्थिति एवं अंडाशय की स्थिति

प्रकारपुष्पासन का आकारअंडाशय की स्थितिउदाहरण
अधोजायांगी (Hypogynous)शंक्वाकार, अंडाशय सबसे ऊपरऊर्ध्ववर्ती (Superior)गुड़हल, सरसों
परिजायांगी (Perigynous)तश्तरीनुमा, अंडाशय मध्य मेंअर्ध-अधोवर्ती (Half-inferior)आड़ू, बेर
अधिजायांगी (Epigynous)प्यालेनुमा, अंडाशय को घेरेअधोवर्ती (Inferior)सूरजमुखी, खीरा

बीजांडन्यास (Placentation)

अंडाशय के भीतर बीजांड जिस स्थान से जुड़े रहते हैं उसे बीजांडासन (Placenta) कहते हैं, तथा उसकी व्यवस्था को बीजांडन्यास कहा जाता है। मुख्य प्रकार हैं — सीमांत (Marginal, एक अंडप, एक कोष्ठक, किनारों पर बीजांड — मटर), स्तंभीय (Axile, अनेक जुड़े अंडप, अनेक कोष्ठक, केंद्रीय अक्ष पर बीजांड — गुड़हल, टमाटर), भित्तीय (Parietal, अनेक जुड़े अंडप, एक कोष्ठक, भीतरी दीवार पर बीजांड — सरसों, खीरा), तथा आधारीय (Basal, अंडाशय के आधार पर एकल बीजांड — सूरजमुखी)।

📌 महत्वपूर्ण — 💡 आसान भाषा में

पुष्प के चार चक्रों को याद रखने के लिए बाहर से भीतर क्रम याद रखें — पहले 'सुरक्षा गार्ड' (हरी बाह्यदल), फिर 'स्वागत बैनर' (रंगीन दल जो कीड़ों को बुलाता है), फिर 'नर टीम' (पुंकेसर, जो परागकण बनाती है), और सबसे अंदर 'मुख्यालय' (जायांग, जहाँ बीज बनते हैं)।

📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)

◆ पुष्पासन ◆ बाह्यदलपुंज ◆ दलपुंज ◆ पुमंग ◆ जायांग ◆ परागकोश ◆ अंडाशय ◆ वर्तिकाग्र ◆ अधोजायांगी ◆ बीजांडन्यास

8 पुष्पक्रम (Inflorescence) — प्रकार

पुष्प-अक्ष (जिसे पुष्पवृंताक्ष/Peduncle कहते हैं) पर पुष्पों के लगने की व्यवस्था को पुष्पक्रम कहते हैं। इसके दो प्रमुख वर्ग हैं — एकाक्षीय/असीमाक्षी (Racemose), जिसमें मुख्य अक्ष की वृद्धि असीमित रहती है (यह किसी पुष्प पर समाप्त नहीं होती) एवं पुष्प अग्रविन्यासी (Acropetal) क्रम में खिलते हैं (सबसे पुराना पुष्प सबसे नीचे, सबसे नया सबसे ऊपर); तथा ससीमाक्षी (Cymose), जिसमें मुख्य अक्ष सीमित वृद्धि वाली होकर स्वयं एक पुष्प पर समाप्त हो जाती है, तथा पुष्प तलविन्यासी (Basipetal) क्रम में खिलते हैं (सबसे ऊपर वाला अंतस्थ पुष्प ही सबसे पुराना होता है)।

असीमाक्षी (Racemose) पुष्पक्रम के प्रकार

प्रकारविशेषताउदाहरण
असीमाक्ष/रेसीम (Raceme)लंबा अक्ष, वृंतयुक्त पुष्पसरसों
स्पाइक (Spike)रेसीम जैसा, किंतु पुष्प अवृंतअचिरैंथीज़ (लटजीरा)
स्पाइकलेट (Spikelet)शल्कों सहित छोटे पुष्पकों का गुच्छागेहूँ
कैटकिन (Catkin)स्पाइक जैसा, लटकता अक्ष, एकलिंगी पुष्पशहतूत
स्पैडिक्स (Spadix)मांसल अक्ष, दिखावटी आवरण-पत्र (स्पेथ) से ढकाकेला, अरबी
कोरिंब (Corymb)छोटा अक्ष, सभी पुष्प लगभग एक ही तल परकैंडीटफ्ट
छत्रक/अंबेल (Umbel)एक ही बिंदु से समान लंबाई के वृंत निकलते हैंधनिया
मुंडक/कैपिटुलम (Head)चपटा उभरा पुष्पासन, अवृंत पुष्पक केंद्राभिसारी क्रम मेंसूरजमुखी

ससीमाक्षी (Cymose) पुष्पक्रम के प्रकार

विशेष प्रकार के पुष्पक्रम

📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)

◆ पुष्पक्रम ◆ पुष्पवृंताक्ष ◆ असीमाक्षी ◆ ससीमाक्षी ◆ अग्रविन्यासी क्रम ◆ तलविन्यासी क्रम ◆ स्पैडिक्स ◆ कैपिटुलम ◆ हाइपैंथोडियम

9 फल (Fruit) — प्रकार एवं संरचना

निषेचन के बाद अंडाशय के परिपक्व होने से जो संरचना बनती है, उसे सच्चा फल (True Fruit) कहते हैं। इस दौरान बीजांड बीज में बदल जाते हैं तथा अंडाशय की भित्ति फल-भित्ति अथवा पेरिकार्प (Pericarp) में बदल जाती है। यदि अंडाशय के अतिरिक्त पुष्प के अन्य भाग (जैसे पुष्पासन) भी फल निर्माण में भाग लें, तो उसे कूट फल (False Fruit) कहते हैं — जैसे सेब एवं नाशपाती (जिसमें फूला हुआ पुष्पासन ही खाने योग्य भाग है) तथा अंजीर (जिसमें पुष्पासन ही फल जैसा दिखता है)।

बिना निषेचन के भी कभी-कभी फल बन जाता है, जिसे अनिषेकफलन (Parthenocarpy) कहते हैं — ऐसे फल में बीज नहीं बनते अथवा अविकसित रहते हैं, जैसे केला एवं कुछ किस्मों के अंगूर। बागवानी विशेषज्ञ इसे कृत्रिम रूप से भी विकसित करते हैं ताकि बीजरहित (Seedless) फल बाज़ार में उपलब्ध हो सकें।

फल-भित्ति (पेरिकार्प) की तीन परतें

मांसल फलों में पेरिकार्प तीन स्पष्ट परतों में विभेदित होती है — बाह्यफलभित्ति/एपिकार्प (Epicarp, सबसे बाहरी छिलका), मध्यफलभित्ति/मीज़ोकार्प (Mesocarp, मध्य का मांसल-रसीला भाग, जो प्रायः खाने योग्य होता है) एवं अंतःफलभित्ति/एंडोकार्प (Endocarp, सबसे भीतरी परत, जो आम-नारियल जैसे फलों में सख्त/काष्ठीय होती है, जबकि संतरे में पतली-झिल्लीदार होती है)। शुष्क फलों में पेरिकार्प पतली-कागज़ जैसी अथवा मोटी-काष्ठीय होती है, किंतु इन तीन परतों में स्पष्ट रूप से विभेदित नहीं होती।

फलों के तीन मूल प्रकार

वर्गउपप्रकारउदाहरण
सरल — शुष्क, स्वतः फटने वालेलेग्यूम, सिलिका, फॉलिकल, कैप्सूलमटर, सरसों, आक, भिंडी
सरल — शुष्क, न फटने वालेकैरियोप्सिस, नट, साइप्सेला, समारागेहूँ-चावल, बादाम-काजू, सूरजमुखी, यम
सरल — मांसलड्रूप, बेरी, पीपो, हेस्पेरिडियम, पोमआम-नारियल, टमाटर-केला, खरबूजा, नींबू-संतरा, सेब-नाशपाती
संग्रथितड्रूपलेट-गुच्छ, एकीन-गुच्छ, बेरी-गुच्छरसभरी, स्ट्रॉबेरी, सीताफल
संयुक्त/पुंजसोरोसिस, साइकोनसअनानास-शहतूत-कटहल, अंजीर-पीपल
🔍 दिलचस्प तथ्य — 💡 रोचक तथ्य — केले का खाने योग्य भाग

क्या आप जानते हैं कि जब आप केला खाते हैं, तो वास्तव में आप उसकी मध्यफलभित्ति (मीज़ोकार्प) एवं अंतःफलभित्ति (एंडोकार्प) खा रहे होते हैं? इसी तरह सेब में खाने योग्य भाग असल में फूला हुआ पुष्पासन (Thalamus) होता है — असली अंडाशय तो सेब के बीचोंबीच का सख्त, बीज वाला हिस्सा है। अनानास एक संयुक्त फल है, जो पूरे-के-पूरे पुष्पक्रम से मिलकर बनता है — इसीलिए उस पर दिखने वाला हर 'आँख जैसा' निशान असल में एक अलग पुष्प का अवशेष है!

📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)

◆ पेरिकार्प ◆ एपिकार्प ◆ मीज़ोकार्प ◆ एंडोकार्प ◆ कूट फल ◆ अनिषेकफलन ◆ सरल फल ◆ संग्रथित फल ◆ संयुक्त फल

10 बीज (Seed) — संरचना एवं अंकुरण

निषेचन के बाद बीजांड परिपक्व होकर बीज बनाता है — यह पौधे की अगली पीढ़ी का 'सुरक्षा-कैप्सूल' है, जिसके भीतर एक नन्हा पौधा (भ्रूण) सुप्त अवस्था में बंद रहता है, जब तक कि अंकुरण के लिए उचित परिस्थितियाँ (पानी, तापमान, ऑक्सीजन) न मिल जाएँ।

बीज के प्रमुख भाग

📌 महत्वपूर्ण

🖼️ द्विबीजपत्री बीज (जैसे सेम) की आंतरिक संरचना

जीव विज्ञान चित्र

द्विबीजपत्री बनाम एकबीजपत्री बीज

🟢 द्विबीजपत्री बीज (जैसे चना, सेम)🔴 एकबीजपत्री बीज (जैसे मक्का, गेहूँ)
◆ दो बीजपत्र होते हैं ◆ प्रायः अभ्रूणपोषी (भोजन बीजपत्रों में संचित) ◆ शिराविन्यास जालिकावत् वाले पौधों के बीज ◆ अंकुरण प्रायः एपिजियल (बीजपत्र मिट्टी से बाहर आते हैं)◆ एक ही बीजपत्र (जिसे स्कुटेलम कहते हैं) होता है ◆ प्रायः भ्रूणपोषी (भोजन अलग भ्रूणपोष में संचित) ◆ समानांतर शिराविन्यास वाले पौधों के बीज ◆ अंकुरण प्रायः हाइपोजियल (बीजपत्र मिट्टी के भीतर ही रहता है)

अंकुरण (Germination)

उपयुक्त जल, तापमान एवं ऑक्सीजन मिलने पर बीज सुप्तावस्था तोड़कर अंकुरित होने लगता है। अंकुरण दो प्रकार का होता है — एपिजियल अंकुरण (Epigeal), जिसमें बीजपत्र मूलहाइपोकोटिल की वृद्धि के कारण मिट्टी से बाहर, सतह के ऊपर आ जाते हैं तथा हरे होकर कुछ समय के लिए प्रकाश संश्लेषण भी करते हैं (जैसे सेम, कद्दू), तथा भूमिगत अंकुरण (Hypogeal), जिसमें बीजपत्र मिट्टी के भीतर ही रह जाते हैं, तथा एपिकोटिल की वृद्धि से केवल प्ररोह ऊपर आता है (जैसे मटर, मक्का)।

🔗 सम्बन्ध — कृषि से जुड़ाव

बीज की गुणवत्ता एवं शुद्धता किसी भी अच्छी फसल की पहली शर्त है — इसीलिए भारत सरकार एवं राजस्थान कृषि विभाग किसानों को प्रमाणित बीज (Certified Seeds) एवं उन्नत किस्मों (High Yielding Varieties/HYV) के उपयोग हेतु प्रोत्साहित करते हैं, ताकि उपज एवं गुणवत्ता दोनों बेहतर हो सकें।

📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)

◆ बीजावरण ◆ टेस्टा ◆ टेगमेन ◆ भ्रूण ◆ बीजपत्र ◆ भ्रूणपोष ◆ एपिजियल अंकुरण ◆ हाइपोजियल अंकुरण

📌 महत्वपूर्ण — 📌 अध्याय सारांश (Chapter Summary)

• जड़ मूलांकुर से बनती है, गुरुत्वानुवर्तनी एवं जलानुवर्तनी होती है, तथा मूसला (द्विबीजपत्री) एवं झकड़ा (एकबीजपत्री) — दो प्रकार की होती है; इसके चार क्षेत्र होते हैं — मूल गोप, विभज्योतकी क्षेत्र, दीर्घीकरण क्षेत्र एवं परिपक्वन क्षेत्र। • जड़ें भोजन संग्रह, प्रकाश संश्लेषण, नमी अवशोषण, परजीवी पोषण, गैसीय विनिमय एवं मज़बूत आलंबन जैसे कार्यों हेतु रूपांतरित हो जाती हैं — जैसे गाजर (शंकु रूप), बरगद (स्तंभ मूल) एवं अमरबेल (हास्टोरिया)। • तना प्रांकुर से बनता है, प्रकाशानुवर्तनी होता है, पर्व-पर्वसंधि व कलिकाओं सहित; यह भूमिगत (आलू, अदरक, प्याज़), अर्ध-हवाई (रनर, स्टोलन) एवं हवाई (तना प्रतान, कंटक, नागफनी का पर्णाभ स्तंभ) रूप में रूपांतरित होता है। • द्विबीजपत्री तने में द्वितीयक वृद्धि (एधा द्वारा) होती है, जिससे वार्षिक वलय बनते हैं, जिनकी गिनती से पेड़ की आयु (डेंड्रोक्रोनोलॉजी) पता चलती है; एकबीजपत्री तने में सामान्यतः द्वितीयक वृद्धि नहीं होती। • पत्ती पर्णाधार, पर्णवृंत एवं लैमिना से बनी होती है; शिराविन्यास जालिकावत् (द्विबीजपत्री) अथवा समानांतर (एकबीजपत्री) होता है; यह प्रकाश संश्लेषण, वाष्पोत्सर्जन एवं गैसीय विनिमय का मुख्य स्थल है, तथा प्रतान, शूल एवं कीटाहारी घट जैसी संरचनाओं में रूपांतरित हो सकती है। • पुष्प एक रूपांतरित प्ररोह है जिसमें चार चक्र — बाह्यदलपुंज, दलपुंज, पुमंग एवं जायांग — क्रमवार लगे होते हैं; अंडाशय की स्थिति के आधार पर यह अधोजायांगी, परिजायांगी अथवा अधिजायांगी हो सकता है। • पुष्पक्रम असीमाक्षी (अग्रविन्यासी क्रम, जैसे सरसों की रेसीम) अथवा ससीमाक्षी (तलविन्यासी क्रम, जैसे कपास का मोनोकेज़ियल साइम) हो सकता है। • निषेचित अंडाशय परिपक्व होकर सच्चा फल बनाता है, जिसकी पेरिकार्प एपिकार्प-मीज़ोकार्प-एंडोकार्प में बँट सकती है; फल सरल (मटर), संग्रथित (सीताफल) अथवा संयुक्त (अनानास) हो सकता है। • बीज में बीजावरण (टेस्टा-टेगमेन), भ्रूण (मूलांकुर-प्रांकुर-बीजपत्र) एवं भ्रूणपोष होता है; अंकुरण एपिजियल (बीजपत्र ऊपर आएँ, जैसे सेम) अथवा हाइपोजियल (बीजपत्र भीतर रहें, जैसे मटर) हो सकता है। • पौधे के हर भाग — जड़ से लेकर बीज तक — केवल अपने मूल कार्य तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पर्यावरण की चुनौतियों के अनुसार अपना रूप बदलकर नए-नए कार्य करने की अद्भुत क्षमता रखता है, जो प्रकृति की सबसे बड़ी अनुकूलन-कुशलता (Adaptability) को दर्शाता है।

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