🔬 अध्याय 1/15 — जीव विज्ञान

कोशिका

The Cell — जीवन की आधारभूत इकाई
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📋 इस अध्याय में
  1. कोशिका का परिचय, कोशिका सिद्धान्त एवं खोज का इतिहास
  2. कोशिका का आकार-आकृति एवं एककोशिकीय-बहुकोशिकीय जीव
  3. प्रोकैरियोटिक एवं यूकैरियोटिक कोशिका
  4. कोशिका भित्ति (Cell Wall)
  5. कोशिका झिल्ली (Cell Membrane) एवं तरल मोज़ेक मॉडल
  6. माइटोकॉन्ड्रिया — कोशिका का पावर हाउस
  7. प्लास्टिड अथवा लवक (Plastids)
  8. अंतर्द्रव्यी जालिका एवं गॉल्जीकाय
  9. राइबोसोम, तारककाय एवं सूक्ष्मनलिकाएँ
  10. पक्ष्माभिका, कशाभिका, रिक्तिका, सूक्ष्मकाय, लाइसोसोम एवं स्फीरोसोम
  11. केंद्रक (Nucleus)
  12. गुणसूत्र (Chromosomes)
  13. कोशिका चक्र एवं समसूत्री विभाजन (Mitosis)
  14. अर्धसूत्री विभाजन (Meiosis)
  15. पादप एवं जंतु कोशिका में अंतर
  16. कोशिका विज्ञान की प्रमुख खोजें
📖 🌟 क्या आप जानते हैं?
सन् 1665 की एक शांत दोपहर, लंदन की रॉयल सोसाइटी की प्रयोगशाला में एक जिज्ञासु वैज्ञानिक रॉबर्ट हुक अपने हाथ से बनाई गई एक कम्पाउंड माइक्रोस्कोप के सामने बैठे थे। उन्होंने बोतल का ढक्कन बनाने में काम आने वाली कॉर्क (Cork, बांज वृक्ष की छाल) की एक बेहद पतली slice काटी और उसे शीशे के नीचे रखा। जैसे ही उन्होंने माइक्रोस्कोप में झांका, उनकी आँखें फटी रह गईं — कॉर्क की सतह पर हज़ारों छोटे-छोटे, एक-दूसरे से सटे हुए खाली डिब्बे जैसी संरचनाएँ दिखाई दीं, बिल्कुल वैसे ही जैसे किसी मधुमक्खी के छत्ते में छोटे-छोटे कक्ष होते हैं या किसी बड़े छात्रावास में एक जैसे बहुत सारे कमरे होते हैं। हुक ने इन खाली कक्षों को लैटिन शब्द 'सेलुला' (Cellula) यानी 'छोटा कमरा' नाम दिया, जो आगे चलकर अंग्रेज़ी में 'Cell' बन गया। उन्होंने अपनी किताब 'माइक्रोग्राफिया' में इसका चित्र सहित पूरा वर्णन भी लिखा। दिलचस्प बात यह है कि हुक ने जो देखा वह वास्तव में मृत कोशिकाओं की केवल दीवार यानी कोशिका भित्ति थी, जीवित कोशिका नहीं — फिर भी उनकी इस खोज ने जीव विज्ञान की सबसे बड़ी क्रांति की नींव रख दी। आज हम जानते हैं कि हमारा पूरा शरीर — हड्डी, त्वचा, मांसपेशी, मस्तिष्क, सब कुछ — करोड़ों-अरबों ऐसे ही 'छोटे कमरों' से मिलकर बना है, जिन्हें आज हम कोशिका (Cell) कहते हैं। आइए, इसी सबसे छोटे कमरे की पूरी दुनिया को विस्तार से समझते हैं।

1 कोशिका का परिचय, कोशिका सिद्धान्त एवं खोज का इतिहास

जिस प्रकार एक बड़ी इमारत छोटी-छोटी ईंटों से मिलकर बनती है, ठीक उसी प्रकार हर सजीव — चाहे वह एक छोटा-सा जीवाणु हो या विशालकाय हाथी — छोटी-छोटी 'जैविक ईंटों' से मिलकर बना होता है। इन्हीं जैविक ईंटों को हम कोशिका (Cell) कहते हैं। कोशिका सजीव शरीर की सबसे छोटी, जननक्षम (स्वयं की नई कोशिका बना सकने वाली) तथा चयनात्मक झिल्ली से घिरी हुई संरचनात्मक एवं क्रियात्मक इकाई है। दूसरे शब्दों में कहें तो कोशिका के बिना जीवन की कल्पना करना वैसा ही है जैसे ईंट के बिना घर की कल्पना करना।

कोशिका के भीतर पाया जाने वाला जीवद्रव्य (Protoplasm) ही 'जीवन का भौतिक आधार' कहलाता है, क्योंकि इसी में जीवन की समस्त रासायनिक एवं भौतिक क्रियाएँ संपन्न होती हैं। कोशिका के भीतर ही आनुवंशिक गुणों का वाहक DNA (डिऑक्सीराइबो न्यूक्लिक अम्ल) स्थित होता है, जिसे जीवन का 'मास्टर मॉलिक्यूल' भी कहा जाता है क्योंकि यही अणु यह तय करता है कि कोई जीव कैसा दिखेगा और कैसे कार्य करेगा। कोशिका की संरचना, संगठन एवं कार्यप्रणाली के अध्ययन को कोशिका विज्ञान अथवा साइटोलॉजी (Cytology) कहा जाता है।

कोशिका की खोज का रोचक इतिहास

कोशिका की खोज कोई एक दिन की घटना नहीं थी, बल्कि यह लगभग दो सौ वर्षों तक चली एक लंबी वैज्ञानिक यात्रा का परिणाम है। आइए इस यात्रा को चरण-दर-चरण समझते हैं।

ध्यान रहे — आधुनिक कोशिका विज्ञान का जनक सी. पी. श्वानसन (C.P. Swanson) को कहा जाता है, जबकि ए. के. शर्मा (A.K. Sharma) को भारतीय कोशिका विज्ञान का जनक माना जाता है — RAS परीक्षा के दृष्टिकोण से यह तथ्य याद रखना उपयोगी है।

आधुनिक कोशिका सिद्धान्त (Modern Cell Theory)

समय के साथ वैज्ञानिकों ने श्लाइडेन-श्वान के मूल सिद्धान्त में विरचो के योगदान को जोड़कर आधुनिक कोशिका सिद्धान्त को पाँच बिंदुओं में प्रस्तुत किया, जो आज भी जीव विज्ञान की नींव माना जाता है:

💡 वास्तविक उपयोग

💡 रोज़मर्रा का उदाहरण — कोशिका सिद्धान्त को समझें आसान भाषा में: जैसे किसी बड़ी सोसाइटी में नए फ्लैट बनाने के लिए पुराने फ्लैट को तोड़कर नहीं, बल्कि उसी डिज़ाइन के आधार पर नया निर्माण किया जाता है — ठीक वैसे ही कोई भी नई कोशिका अचानक हवा से पैदा नहीं होती, बल्कि हमेशा किसी पुरानी, जीवित कोशिका के विभाजन से ही जन्म लेती है। यही विरचो के कथन 'Omnis Cellula e Cellula' का सार है।

विषाणु (वायरस) — कोशिका सिद्धान्त का अपवाद

विषाणु (Virus) की संरचना को कोशिका सिद्धान्त से नहीं समझाया जा सकता, इसलिए इन्हें कोशिका सिद्धान्त का अपवाद माना जाता है। इसके प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:

📌 महत्वपूर्ण — ध्यान दें

इसीलिए विषाणुओं को प्रायः 'सजीव एवं निर्जीव के बीच की कड़ी' कहा जाता है — परपोषी कोशिका के बाहर ये निर्जीव क्रिस्टल की तरह व्यवहार करते हैं, परंतु परपोषी कोशिका में प्रवेश करते ही सजीवों जैसा गुणन शुरू कर देते हैं।

वैज्ञानिक (वर्ष)प्रमुख योगदान
रॉबर्ट हुक (1665)कॉर्क में कोशिका भित्ति देखी, 'Cell' नाम दिया
ल्यूवेनहॉक (1674)सर्वप्रथम जीवित कोशिका को देखा
रॉबर्ट ब्राउन (1831)केंद्रक (Nucleus) की खोज
पुरकिंजे (1840)जीवद्रव्य (Protoplasm) नाम दिया
श्लाइडेन (1838)सभी पादपों का शरीर कोशिकाओं से बना — प्रतिपादित किया
श्वान (1839)सभी जंतुओं का शरीर कोशिकाओं से बना — प्रतिपादित किया
रुडोल्फ विरचो (1855)'Omnis Cellula e Cellula' — कोशिका सिद्धान्त में संशोधन
📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)

◆ कोशिका (Cell) ◆ कोशिका विज्ञान (Cytology) ◆ जीवद्रव्य (Protoplasm) ◆ कोशिका सिद्धान्त (Cell Theory) ◆ केंद्रक (Nucleus) ◆ विषाणु (Virus) ◆ सेलुला (Cellula)

2 कोशिका का आकार-आकृति एवं एककोशिकीय-बहुकोशिकीय जीव

क्या आपने कभी सोचा है कि दुनिया की सबसे छोटी कोशिका कितनी छोटी हो सकती है और सबसे बड़ी कोशिका कितनी बड़ी? कोशिकाओं का आकार एवं आकृति उनके द्वारा किए जाने वाले कार्य पर निर्भर करती है — ठीक वैसे ही जैसे किसी कारखाने में अलग-अलग काम के लिए अलग-अलग आकार के औज़ार बनाए जाते हैं। एककोशिकीय जीवों में कोशिकाएँ छड़ाकार, सर्पिल (Spiral), अल्पविराम (Comma) जैसी अथवा अन्य कई विविध आकृतियों की हो सकती हैं। सामान्यतः पादप कोशिकाओं का व्यास 15 से 100 माइक्रोमीटर (μm) के बीच होता है।

💡 वास्तविक उपयोग — 💡 आकार के चौंकाने वाले उदाहरण

सबसे छोटी कोशिका मानी जाती है माइकोप्लाज्मा या PPLO (Pleuro Pneumonia Like Organism) — जिसका व्यास मात्र लगभग 0.1 माइक्रोमीटर होता है, यानी यह इतनी छोटी है कि साधारण माइक्रोस्कोप से भी मुश्किल से दिखाई देती है। इसके विपरीत सबसे बड़ी कोशिका है शुतुरमुर्ग के अंडे की कोशिका, जिसका व्यास लगभग 15 सेंटीमीटर तक होता है — यानी आप एक ही आँख से एक पूरी कोशिका को अपनी हथेली पर रख सकते हैं! सबसे लंबी एककोशिकीय पादप कोशिका ऐसीटैबुलेरिया (Acetabularia) नामक शैवाल की होती है, जो लगभग 10 सेंटीमीटर लंबी होती है, जबकि बहुकोशिकीय पादपों में सबसे लंबे तंतु बोहमेरिया निविया (Boehmeria nivea) पौधे में पाए जाते हैं, जिनकी लंबाई 22 से 55 सेंटीमीटर तक हो सकती है। मानव शरीर की तंत्रिका कोशिका (Neuron) भी एक मीटर तक लंबी हो सकती है — जैसे रीढ़ की हड्डी से पैर के अंगूठे तक जाने वाली तंत्रिका कोशिका।

एककोशिकीय एवं बहुकोशिकीय जीव

संरचना की जटिलता के आधार पर सजीवों को दो वर्गों में बाँटा जाता है — एककोशिकीय जीव (Unicellular Organisms), जिनका पूरा शरीर केवल एक ही कोशिका से बना होता है, जैसे अमीबा, पैरामीशियम और जीवाणु; तथा बहुकोशिकीय जीव (Multicellular Organisms), जिनका शरीर अनेक कोशिकाओं से मिलकर बनता है, जैसे मनुष्य, पशु-पक्षी और पेड़-पौधे। एककोशिकीय जीव में वह एक कोशिका ही भोजन ग्रहण करने, श्वसन करने, उत्सर्जन करने तथा जनन करने जैसे सभी कार्य अकेले करती है, जबकि बहुकोशिकीय जीव में अलग-अलग कोशिकाएँ अलग-अलग विशिष्ट कार्य के लिए बँट जाती हैं — इसे ही 'कार्य-विभाजन' (Division of Labour) कहा जाता है।

आधारएककोशिकीय जीवबहुकोशिकीय जीव
कोशिकाओं की संख्याकेवल एक कोशिकाअनेक कोशिकाएँ
संरचनासरल (Simple)जटिल (Complex)
कार्य-विभाजननहीं होता, एक ही कोशिका सभी कार्य करती हैस्पष्ट कार्य-विभाजन होता है
आकारसामान्यतः सूक्ष्म (Microscopic)सामान्यतः बड़े (Macroscopic)
ऊतक एवं अंगअनुपस्थितउपस्थित (ऊतक, अंग, अंग-प्रणाली)
निर्भरताएक कोशिका स्वतंत्र रूप से जीवित रहती हैकोशिकाएँ एक-दूसरे पर निर्भर रहती हैं
वृद्धिकोशिका के आकार में वृद्धिकोशिकाओं की संख्या में वृद्धि
उदाहरणअमीबा, पैरामीशियम, जीवाणुमनुष्य, पशु, पेड़-पौधे
🔵 एककोशिकीय जीवों के उदाहरण🔴 बहुकोशिकीय जीवों के उदाहरण
◆ अमीबा (Amoeba) ◆ पैरामीशियम (Paramecium) ◆ क्लोरेला (Chlorella) — एककोशिकीय शैवाल ◆ जीवाणु (Bacteria) ◆ यूग्लीना (Euglena)◆ मनुष्य एवं समस्त स्तनधारी ◆ वृक्ष एवं पुष्पीय पादप ◆ सरीसृप एवं पक्षी ◆ जलीय जीव जैसे मछली ◆ कवक (बहुकोशिकीय प्रकार)
📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)

◆ एककोशिकीय जीव ◆ बहुकोशिकीय जीव ◆ माइक्रोमीटर (μm) ◆ माइकोप्लाज्मा (PPLO) ◆ कार्य-विभाजन

3 प्रोकैरियोटिक एवं यूकैरियोटिक कोशिका

केंद्रक (Nucleus) के विकास एवं संगठन के आधार पर संसार की समस्त कोशिकाओं को दो बड़े वर्गों में बाँटा गया है — प्रोकैरियोटिक कोशिका (Prokaryotic Cell) एवं यूकैरियोटिक कोशिका (Eukaryotic Cell)। यह वर्गीकरण जीव विज्ञान का सबसे मौलिक (Fundamental) वर्गीकरण माना जाता है, क्योंकि यह तय करता है कि किसी जीव की आंतरिक संरचना कितनी सरल या कितनी जटिल है।

प्रोकैरियोटिक कोशिका (Prokaryotic Cell)

शब्द 'Prokaryotic' ग्रीक भाषा के दो शब्दों से मिलकर बना है — Pro (जिसका अर्थ है आदिम/Primitive) तथा Karyon (जिसका अर्थ है केंद्रक/Nucleus)। इस प्रकार की कोशिकाओं में झिल्ली-युक्त सुसंगठित केंद्रक (True Nucleus) का अभाव होता है।

नीलहरित शैवाल (Blue-Green Algae/Cyanobacteria), जीवाणु (Bacteria) एवं माइकोप्लाज्मा जैसे जीवों की कोशिकाओं में झिल्ली-युक्त सुसंगठित केंद्रक तथा द्विस्तरीय झिल्ली-युक्त कोशिकांगों (जैसे माइटोकॉन्ड्रिया, गॉल्जीकाय) का पूर्ण अभाव होता है। ऐसी कोशिका में केंद्रक-समतुल्य क्षेत्र को 'प्रोकैरियॉन' या 'केंद्रकाभ' (Nucleoid) कहा जाता है, जहाँ आनुवंशिक पदार्थ गुणसूत्र के रूप में नहीं, बल्कि एक नग्न, गोलाकार, कुंडलित न्यूक्लिइक अम्ल (DNA) के रूप में स्वतंत्र रूप से पड़ा रहता है। इनमें हिस्टोन प्रोटीन का भी अभाव होता है तथा सूत्री विभाजन (Mitosis) नहीं पाया जाता — इसके बजाय ये द्विविभाजन (Binary Fission) द्वारा प्रजनन करती हैं।

उदाहरण — मोनेरा (Monera) जगत के सदस्य जैसे सत्य जीवाणु (True Bacteria), सायनोजीवाणु (नीलहरित शैवाल), आर्कीजीवाणु (Archaebacteria), माइकोप्लाज़्मा तथा एक्टिनोमाइसिट्स। जैसे — Escherichia coli (हमारी बड़ी आंत में पाया जाने वाला सामान्य जीवाणु)।

यूकैरियोटिक कोशिका (Eukaryotic Cell)

'Eu' का अर्थ है भली-भाँति/Well तथा 'Karyon' का अर्थ है केंद्रक। इस प्रकार की कोशिकाओं में सुसंगठित, झिल्ली-युक्त सुस्पष्ट केंद्रक पाया जाता है, जिस कारण इन्हें ससीमकेंद्रकी कोशिकाएँ भी कहा जाता है।

यूकैरियोटिक कोशिका में द्विस्तरीय झिल्ली-युक्त अनेक कोशिकांग जैसे माइटोकॉन्ड्रिया, हरितलवक (क्लोरोप्लास्ट), गॉल्जीकाय एवं अंतर्द्रव्यी जालिका पाए जाते हैं। केंद्रक में एक या एक से अधिक केंद्रिकाएँ (Nucleolus) मौजूद होती हैं। इनका आनुवंशिक पदार्थ गुणसूत्रों (Chromosomes) के रूप में संगठित होता है, जो हिस्टोन तथा नॉन-हिस्टोन प्रोटीन से मिलकर बनते हैं। इनमें समसूत्री (Mitosis) तथा अर्धसूत्री (Meiosis) — दोनों प्रकार के कोशिका विभाजन पाए जाते हैं। अधिकांश जंतु एवं वनस्पति कोशिकाएँ इसी वर्ग में आती हैं, जैसे मनुष्य, अमीबा (कुछ अपवाद प्रोटिस्टा को छोड़कर वास्तव में अमीबा भी यूकैरियोटिक है), कवक तथा सभी पौधों की कोशिकाएँ।

📌 महत्वपूर्ण

🖼️ एक विशिष्ट प्रोकैरियोटिक कोशिका (जीवाणु कोशिका) की आंतरिक संरचना

जीव विज्ञान चित्र
तुलना का आधारप्रोकैरियोटिक कोशिकायूकैरियोटिक कोशिका
आकार एवं विकासछोटी एवं आद्य (Primitive)बड़ी एवं विकसित
सुसंगठित केंद्रकअनुपस्थित (केवल न्यूक्लियॉइड)उपस्थित, केंद्रक झिल्ली से घिरा
आनुवंशिक पदार्थनग्न, गोलाकार DNA (हिस्टोन रहित)गुणसूत्रों के रूप में (हिस्टोन सहित)
श्वसन स्थलमीजोसोम (कोशिका झिल्ली की वलन)माइटोकॉन्ड्रिया
झिल्लीयुक्त कोशिकांग (ER, गॉल्जीकाय, लाइसोसोम)अनुपस्थितउपस्थित
राइबोसोमकेवल 70S प्रकार के70S (माइटोकॉन्ड्रिया/हरितलवक में) एवं 80S दोनों
सूक्ष्मनलिकाएँ एवं सूक्ष्मतंतुअनुपस्थितउपस्थित
तारककाय (सेंट्रोसोम)अनुपस्थितअधिकांश जंतु व कुछ पादप कोशिकाओं में उपस्थित
कोशिका विभाजनसरल द्विविभाजन (Binary Fission)समसूत्री (Mitosis) एवं अर्धसूत्री (Meiosis)
कोशिका भित्ति संघटनम्यूकोपेप्टाइड/पेप्टिडोग्लाइकैन की बनीपादपों में सेल्यूलोज़ की, जंतुओं में अनुपस्थित
उदाहरणजीवाणु, नीलहरित शैवाल, माइकोप्लाज्मापादप, जंतु, कवक, प्रोटिस्टा
📌 महत्वपूर्ण — 💡 आसान भाषा में समझें

प्रोकैरियोटिक कोशिका की तुलना ऐसे एक कमरे के मकान से की जा सकती है, जिसमें रसोई, बेडरूम, स्टडी — सब कुछ एक ही खुले कमरे में हो, बिना किसी दीवार या पार्टिशन के। इसके विपरीत यूकैरियोटिक कोशिका एक बड़े, सुव्यवस्थित बंगले जैसी है जिसमें हर काम के लिए अलग-अलग दीवारों से घिरे हुए अलग-अलग कमरे (कोशिकांग) बने हों — जैसे रसोई (माइटोकॉन्ड्रिया, जहाँ ऊर्जा 'पकती' है), स्टोररूम (रिक्तिका), और मुख्य नियंत्रण कक्ष (केंद्रक)।

📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)

◆ प्रोकैरियोटिक कोशिका ◆ यूकैरियोटिक कोशिका ◆ न्यूक्लियॉइड ◆ मीजोसोम ◆ 70S राइबोसोम ◆ 80S राइबोसोम ◆ द्विविभाजन

4 कोशिका भित्ति (Cell Wall)

पादप कोशिकाओं को अपना निश्चित आकार बनाए रखने तथा बाहरी आघातों से सुरक्षा प्रदान करने के लिए एक दृढ़ बाहरी आवरण की आवश्यकता होती है — इसी को कोशिका भित्ति (Cell Wall) कहते हैं। यह कोशिका झिल्ली के ठीक बाहर पाई जाने वाली एक मज़बूत, निर्जीव परत है। ध्यान रहे — जंतु कोशिकाओं में कोशिका भित्ति नहीं पाई जाती, केवल पौधों, कवकों तथा जीवाणुओं में ही यह संरचना मिलती है, और इन तीनों में इसका रासायनिक संगठन भी अलग-अलग होता है।

उदाहरण के लिए — कवकों (Fungi) में कोशिका भित्ति पॉलिसैकेराइड काइटिन अथवा कवक-सेल्यूलोज़ से बनी होती है, जबकि शैवाल (Algae) में यह सेल्यूलोज़ एवं पेक्टिन से मिलकर बनती है। जीवाणुओं (Bacteria) में यह पेप्टिडोग्लाइकैन (म्यूकोपेप्टाइड) से बनी होती है — यही कारण है कि पेनिसिलिन जैसी एंटीबायोटिक दवाएँ जीवाणुओं की इसी भित्ति को नष्ट करके उन्हें मार देती हैं।

कोशिका भित्ति का संगठन (चार परतें)

A. मध्य पटलिका (Middle Lamella) — कैल्शियम पेक्टेट की बनी यह सबसे पहली, सबसे बाहरी परत है जो दो पास-पास स्थित कोशिकाओं को आपस में जोड़े रखती है।

B. प्राथमिक भित्ति (Primary Wall) — यह पतली एवं लचीली परत होती है, जो कोशिका के बढ़ने के साथ स्वयं भी फैलती रहती है।

C. द्वितीयक भित्ति (Secondary Wall) — यह मोटी एवं दृढ़ परत तब बनती है जब कोशिका की वृद्धि रुक जाती है, यह कोशिका को अतिरिक्त मज़बूती देती है।

D. तृतीयक भित्ति (Tertiary Wall) — कुछ विशेष कोशिकाओं (जैसे काष्ठीय कोशिकाओं) में पाई जाने वाली सबसे भीतरी, अतिरिक्त सुदृढ़ परत।

कोशिका विभाजन के अंतिम चरण (टीलोफेज़) में गॉल्जीकाय, अंतर्द्रव्यी जालिका एवं वेसीकल्स आपस में मिलकर एक संरचना बनाते हैं जिसे कोशिका पट्ट अथवा फ्रेग्मोप्लास्ट (Phragmoplast) कहते हैं — यही आगे चलकर मध्य पटलिका का निर्माण करता है, जिस पर क्रमशः प्राथमिक, द्वितीयक एवं तृतीयक भित्ति परतें जमा होकर पूरी कोशिका भित्ति तैयार होती है।

कोशिका भित्ति की वृद्धि एवं रासायनिक परिवर्तन

कोशिका भित्ति के प्रमुख कार्य

💡 वास्तविक उपयोग — 💡 रोज़मर्रा से जुड़ा उदाहरण

जब आप प्याज़ के छिलके को माइक्रोस्कोप में देखते हैं (जो कि स्कूल की प्रयोगशाला का सबसे लोकप्रिय प्रयोग है), तो जो साफ़-साफ़ ईंट जैसी सीमा-रेखाएँ दिखाई देती हैं, वह असल में सेल्यूलोज़ से बनी कोशिका भित्ति ही होती है, जो लगभग 1 माइक्रोमीटर मोटी होती है — ठीक हुक द्वारा देखी गई कॉर्क कोशिका भित्ति जैसी।

📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)

◆ कोशिका भित्ति (Cell Wall) ◆ मध्य पटलिका ◆ सेल्यूलोज़ ◆ लिग्निन ◆ क्यूटिन ◆ सुबेरिन ◆ फ्रेग्मोप्लास्ट

5 कोशिका झिल्ली (Cell Membrane) एवं तरल मोज़ेक मॉडल

यदि कोशिका भित्ति को हम किसी घर की बाहरी चारदीवारी मानें, तो कोशिका झिल्ली उस घर के मुख्य दरवाज़े और खिड़कियों की तरह है — जो तय करती है कि घर में क्या अंदर आएगा और क्या बाहर जाएगा। सभी कोशिकाओं (चाहे पादप हों या जंतु) में जीवद्रव्य के चारों ओर एक विभेदी पारगम्य (Selectively Permeable), विद्युत आवेशित एवं चयनात्मक झिल्ली पाई जाती है, जो मुख्यतः वसा (लिपिड) एवं प्रोटीन से बनी होती है। इसे जीवद्रव्य कला, प्लाज्मा मेम्ब्रेन अथवा प्लाज्मालेमा भी कहा जाता है।

कोशिका झिल्ली की संरचना को समझने के तीन ऐतिहासिक मॉडल

📌 महत्वपूर्ण

📐 तरल मोज़ेक मॉडल की मोटाई — सूत्र/प्रक्रिया: कुल झिल्ली की मोटाई ≈ 75 Å फॉस्फोलिपिड द्विस्तर की मोटाई ≈ 45 Å 1 Å (एंगस्ट्रॉम) = 10⁻¹⁰ मीटर

फॉस्फोलिपिड अणु के दो भाग होते हैं — जलस्नेही (Hydrophilic) सिर, जो पानी की ओर आकर्षित होता है, और जलविरागी (Hydrophobic) पूँछ, जो पानी से दूर भागती है। इसी कारण फॉस्फोलिपिड की दोहरी परत में सभी सिर बाहर की ओर (पानी के संपर्क में) तथा सभी पूँछें भीतर की ओर (एक-दूसरे के सामने) व्यवस्थित रहती हैं। इसमें दो प्रकार के प्रोटीन चिपके रहते हैं — बाह्य अथवा परिधीय प्रोटीन (Extrinsic/Peripheral Proteins), जो झिल्ली की सतह पर टिके रहते हैं, तथा आंतरिक अथवा समाकल प्रोटीन (Intrinsic/Integral Proteins), जो वसीय परत के आर-पार धँसे रहते हैं और छिद्रयुक्त चैनल बनाकर पदार्थों के आवागमन को नियंत्रित करते हैं। इसके अतिरिक्त झिल्ली में कोलेस्ट्रॉल के अणु भी बिखरे रहते हैं, जो झिल्ली की तरलता (Fluidity) को नियंत्रित करते हैं, तथा ग्लाइकोप्रोटीन व ग्लाइकोलिपिड अणु कोशिका की सतह पर मौजूद रहकर कोशिका को अपनी 'पहचान' (Cell Recognition) बनाने में मदद करते हैं — जैसे हमारे रक्त का समूह (Blood Group A, B, AB, O) भी इन्हीं सतही अणुओं से तय होता है।

📌 महत्वपूर्ण

🖼️ तरल मोज़ेक मॉडल — फॉस्फोलिपिड द्विस्तर एवं प्रोटीन अणुओं की व्यवस्था

जीव विज्ञान चित्र

कोशिका झिल्ली से पदार्थों का आवागमन

कोशिका झिल्ली एक चयनात्मक झिल्ली (Selective Membrane) की तरह कार्य करती है — यह हर पदार्थ को अंदर-बाहर नहीं जाने देती, बल्कि छाँटकर ही अनुमति देती है। पदार्थों का यह आवागमन मुख्यतः दो विधियों से होता है:

🟢 निष्क्रिय परिवहन (Passive Transport)🔴 सक्रिय परिवहन (Active Transport)
◆ पदार्थ अपनी अधिक सांद्रता से कम सांद्रता की ओर गति करते हैं ◆ अतिरिक्त बाहरी ऊर्जा (ATP) की आवश्यकता नहीं होती ◆ उदाहरण — विसरण (Diffusion) एवं परासरण (Osmosis) ◆ जैसे — चाय में चीनी का घुलकर फैलना◆ पदार्थ अपनी कम सांद्रता से अधिक सांद्रता की ओर गति करते हैं ◆ अतिरिक्त ऊर्जा ATP के रूप में खर्च होती है ◆ वाहक प्रोटीन (Permease) की सहायता से होता है ◆ जैसे — तंत्रिका कोशिका में सोडियम-पोटैशियम पंप
💡 वास्तविक उपयोग — चिकित्सा में उपयोग

परासरण (Osmosis) के इसी सिद्धान्त पर किडनी डायलिसिस मशीन काम करती है — जब गुर्दे (Kidney) खराब हो जाते हैं, तो डायलिसिस मशीन एक कृत्रिम अर्ध-पारगम्य झिल्ली का उपयोग करके रक्त से अपशिष्ट पदार्थों को छानकर बाहर निकालती है, ठीक वैसे ही जैसे कोशिका झिल्ली प्राकृतिक रूप से करती है।

अंतर्ग्रहण एवं बहिष्करण (Endocytosis एवं Exocytosis)

जंतु कोशिका झिल्ली के विशेष रूपांतरण

📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)

◆ कोशिका झिल्ली ◆ प्लाज्मालेमा ◆ तरल मोज़ेक मॉडल ◆ फॉस्फोलिपिड द्विस्तर ◆ विसरण ◆ परासरण ◆ सक्रिय परिवहन ◆ एंडोसाइटोसिस ◆ एक्सोसाइटोसिस

6 माइटोकॉन्ड्रिया (Mitochondria) — कोशिका का पावर हाउस

शब्द 'Mitochondria' ग्रीक भाषा के Mitos (धागा) एवं Chondrion (कण) से मिलकर बना है। इसकी खोज सबसे पहले कोलिकर (1880) ने की थी, फ्लेमिंग (1882) ने इसे 'फाइला' नाम दिया तथा अल्टमान (1894) ने इसे 'बायोप्लास्ट' कहा। अंततः सी. बेंडा (1897) ने इसे 'माइटोकॉन्ड्रिया' नाम दिया, जो आज तक प्रचलित है।

माइटोकॉन्ड्रिया की संरचना

माइटोकॉन्ड्रिया एक दोहरी झिल्ली से घिरा हुआ कोशिकांग है। इसकी बाह्य झिल्ली सपाट होती है, जबकि आंतरिक झिल्ली में अनेक अंगुलीनुमा उभार पाए जाते हैं जिन्हें क्रिस्टी (Cristae) कहते हैं — यही उभार आंतरिक झिल्ली की सतह का क्षेत्रफल कई गुना बढ़ा देते हैं ताकि अधिक-से-अधिक ऊर्जा उत्पन्न हो सके। दोनों झिल्लियों के बीच के स्थान को पेरीमाइटोकॉन्ड्रियल स्पेस कहते हैं, जिसमें विभिन्न श्वसन एंजाइम पाए जाते हैं, जबकि सबसे भीतरी भाग में एक जेली जैसा, प्रोटीन-युक्त, समांगी पदार्थ भरा रहता है जिसे मैट्रिक्स (Matrix) कहते हैं। क्रिस्टी की सतह पर छोटे-छोटे कण होते हैं जिन्हें प्रारंभिक कण, ऑक्सीसोम अथवा F₁ कण कहा जाता है — यहीं ATP सिंथेटेज़ एंजाइम पाया जाता है जो ऑक्सीकरण एवं फॉस्फोरिलीकरण की क्रिया संपन्न करता है।

माइटोकॉन्ड्रिया के कार्य

माइटोकॉन्ड्रिया को कोशिका का 'पावर हाउस' अथवा 'ऊर्जा घर' कहा जाता है, क्योंकि यहीं ऑक्सीय श्वसन (Aerobic Respiration) की क्रिया संपन्न होती है, जिसमें भोजन (ग्लूकोज़) के ऑक्सीकरण से निकलने वाली ऊर्जा एडिनोसीन ट्राईफॉस्फेट (ATP) के रूप में संचित हो जाती है। जब कोशिका को किसी भी जैविक क्रिया के लिए ऊर्जा चाहिए होती है, तो ATP टूटकर ADP, फॉस्फेट अणु एवं ऊर्जा में बदल जाता है — एक ATP अणु के टूटने से लगभग 7.3 किलोकैलोरी ऊर्जा निकलती है। ग्लाइकोलाइसिस के बाद ग्लूकोज़ अणु दो पाइरूविक अम्ल अणुओं में टूटता है, जिनका ऑक्सीकरण एक चक्रीय पथ के रूप में मैट्रिक्स में उपस्थित विभिन्न श्वसन एंजाइमों द्वारा होता है — इसे क्रेब्स चक्र (Krebs Cycle) कहते हैं। इस पूरी प्रक्रिया के अंतिम चरण को ऑक्सी-फॉस्फोरिलीकरण (Oxidative Phosphorylation) कहते हैं, जो क्रिस्टी पर स्थित ऑक्सीसोम कणों में होता है।

माइटोकॉन्ड्रिया का अपना गोलाकार, नग्न DNA होता है, जिसके कारण इसमें स्वतः जनन (Self-replication) की क्षमता पाई जाती है — किंतु यह क्षमता कोशिकाद्रव्य के भीतर रहकर ही कार्य करती है, स्वतंत्र रूप से नहीं। इसीलिए माइटोकॉन्ड्रिया को 'सेमी-ऑटोनॉमस' (अर्ध-स्वायत्त) कोशिकांग कहा जाता है। रासायनिक संगठन की दृष्टि से इसमें लगभग 65-70% प्रोटीन, 25% फॉस्फोलिपिड तथा थोड़ी मात्रा में DNA व RNA (लगभग 0.5%) पाया जाता है।

📌 महत्वपूर्ण

🖼️ माइटोकॉन्ड्रिया की आंतरिक संरचना — बाह्य झिल्ली, क्रिस्टी एवं मैट्रिक्स

जीव विज्ञान चित्र
💡 वास्तविक उपयोग — 💡 रोज़मर्रा से जुड़ा उदाहरण

जिस प्रकार किसी शहर में बिजलीघर (Power House) पूरे शहर को बिजली सप्लाई करता है, ठीक उसी प्रकार माइटोकॉन्ड्रिया कोशिका के हर हिस्से को ATP के रूप में 'ऊर्जा की सप्लाई' देता है। यही कारण है कि मांसपेशी कोशिकाओं व हृदय कोशिकाओं में, जिन्हें सबसे अधिक ऊर्जा चाहिए, वहाँ माइटोकॉन्ड्रिया की संख्या सैकड़ों-हज़ारों तक हो सकती है, जबकि कुछ शैवाल जैसे माइक्रोमोनास में केवल एक ही माइटोकॉन्ड्रिया पाया जाता है।

📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)

◆ माइटोकॉन्ड्रिया ◆ क्रिस्टी (Cristae) ◆ मैट्रिक्स ◆ ATP ◆ क्रेब्स चक्र ◆ ऑक्सी-फॉस्फोरिलीकरण ◆ सेमी-ऑटोनॉमस कोशिकांग

7 प्लास्टिड अथवा लवक (Plastids)

लवक अथवा प्लास्टिड की खोज हेकेल (1865) ने की थी, तथा शिम्पर (1885) ने प्रकाश संश्लेषण की क्रिया में भाग लेने वाले इन कोशिकांगों को 'प्लास्टिड' नाम दिया। ये यूकैरियोटिक कोशिकाओं (विशेषकर पादप कोशिकाओं) में पाए जाने वाले दोहरी झिल्ली से घिरे कोशिकांग हैं, जिनमें विशेष भोजन अथवा वर्णक पदार्थ संश्लेषित होकर एकत्रित होते हैं। रंग के आधार पर लवक तीन प्रकार के होते हैं:

हरितलवक का आकार भी विविध होता है — शैवाल स्पाइरोगायरा (Spirogyra) में यह रिबन के समान होता है, जबकि क्लैमाइडोमोनास (Chlamydomonas) में यह कप के समान होता है।

लवकों के कार्य

🔍 दिलचस्प तथ्य — रोचक तथ्य

माइटोकॉन्ड्रिया एवं हरितलवक — दोनों को 'सेमी-ऑटोनॉमस कोशिकांग' कहा जाता है क्योंकि दोनों का अपना DNA, RNA एवं राइबोसोम होता है और दोनों स्वयं की प्रतिकृति बना सकते हैं। दिलचस्प बात यह है कि इन दोनों के कार्य एक-दूसरे के बिल्कुल विपरीत हैं — हरितलवक सौर ऊर्जा को 'पकड़ता' (Traps) है (प्रकाश संश्लेषण), जबकि माइटोकॉन्ड्रिया उसी संचित ऊर्जा को 'मुक्त' (Releases) करता है (श्वसन)।

📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)

◆ प्लास्टिड/लवक ◆ अवर्णीलवक ◆ वर्णीलवक ◆ हरितलवक ◆ स्ट्रोमा ◆ ग्रेनम ◆ प्लास्टोम ◆ प्रकाश-श्वसन

8 अंतर्द्रव्यी जालिका एवं गॉल्जीकाय

अंतर्द्रव्यी जालिका (Endoplasmic Reticulum)

कोशिका झिल्ली एवं केंद्रक के मध्य एक पतली जालिका, अनियमित किंतु परस्पर जुड़ी नलिकाओं के रूप में फैली रहती है, जिसे अंतर्द्रव्यी जालिका (Endoplasmic Reticulum, संक्षेप में ER) कहते हैं। इसका नाम सर्वप्रथम कीथ पोर्टर (1953) ने दिया था। यह तीन प्रकार की संरचनाओं से मिलकर बनी होती है — लंबी, पतली, शाखाहीन नलिकाकार रचनाएँ जिन्हें 'सिस्टर्नी' कहते हैं; गोल-अंडाकार थैली समान पुटिकाएँ जिन्हें 'वेसीकल्स' कहते हैं; तथा छोटी, चिकनी भित्ति वाली शाखित नलिकाएँ जिन्हें 'ट्यूबल्स' कहते हैं।

अंतर्द्रव्यी जालिका दो प्रकार की होती है — खुरदरी अंतर्द्रव्यी जालिका (Rough Endoplasmic Reticulum, RER), जिसकी सतह पर राइबोसोम जुड़े होने के कारण यह खुरदरी दिखाई देती है, तथा चिकनी अंतर्द्रव्यी जालिका (Smooth Endoplasmic Reticulum, SER), जिस पर राइबोसोम नहीं पाए जाते और जो मुख्यतः लिपिड (वसा) संश्लेषण का कार्य करती है।

अंतर्द्रव्यी जालिका के कार्य

गॉल्जीकाय (Golgi Body)

गॉल्जीकाय एक झिल्लीयुक्त कोशिकांग है जो एक-दूसरे से सटी हुई, सपाट थैली समान सिस्टर्नी से बनी होती है — एक गॉल्जीकाय में 3 से 12 तक सिस्टर्नी हो सकती हैं। इसकी खोज कैमिलो गॉल्जी (1898) ने उल्लू की तंत्रिका कोशिकाओं में की थी। पादप कोशिकाओं में इन्हें डिक्टियोसोम भी कहा जाता है। इसका आकार परिवर्तनशील होता है, इसीलिए इसे 'पॉलिमॉर्फिक' (बहुरूपी) कोशिकांग कहा जाता है।

गॉल्जीकाय के कार्य

📌 महत्वपूर्ण — 💡 गॉल्जीकाय को समझने का सरल तरीका

गॉल्जीकाय को किसी 'पैकेजिंग एवं डिस्पैच विभाग' (Packaging & Dispatch Department) की तरह समझा जा सकता है — RER में बना कच्चा प्रोटीन गॉल्जीकाय में आता है, जहाँ उसे संशोधित, पैक (वेसीकल में बंद) एवं लेबल किया जाता है, और फिर सही पते पर भेज दिया जाता है — चाहे वह कोशिका के भीतर कहीं हो या कोशिका के बाहर स्रावित करना हो।

📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)

◆ अंतर्द्रव्यी जालिका (ER) ◆ RER ◆ SER ◆ सिस्टर्नी ◆ गॉल्जीकाय ◆ डिक्टियोसोम ◆ एक्रोसोम

9 राइबोसोम, तारककाय एवं सूक्ष्मनलिकाएँ

राइबोसोम (Ribosome)

राइबोसोम झिल्ली-रहित, गोलाकार, RNA से निर्मित सूक्ष्म कोशिकीय कण होते हैं, जो यूकैरियोटिक कोशिका में खुरदरी अंतर्द्रव्यी जालिका पर, कोशिकाद्रव्य में, माइटोकॉन्ड्रिया, केंद्रक एवं लवक में पाए जाते हैं। इनका व्यास लगभग 150-250 Å होता है। रॉबिन्सन एवं ब्राउन (1953) ने पौधों की जड़ों की कोशिकाओं में तथा पैलाडे (1955) ने जंतु कोशिकाओं में राइबोसोम को देखा था।

राइबोसोम के आकार को अवसादन गुणांक (Sedimentation Coefficient) के आधार पर मापा जाता है, जिसकी इकाई को 'स्वेडबर्ग यूनिट' (S) कहते हैं — यह इकाई बताती है कि अपकेंद्रण मशीन (Ultracentrifuge) में यह कण कितनी तेज़ी से नीचे बैठता है। इसी आधार पर राइबोसोम दो प्रकार के होते हैं — 70S राइबोसोम (50S व 30S उपइकाइयों से मिलकर बना, प्रोकैरियोटिक कोशिका तथा यूकैरियोटिक कोशिका के हरितलवक एवं माइटोकॉन्ड्रिया में पाया जाता है) तथा 80S राइबोसोम (60S व 40S उपइकाइयों से मिलकर बना, सभी यूकैरियोटिक कोशिकाओं के कोशिकाद्रव्य, ER एवं केंद्रक में पाया जाता है)।

राइबोसोम के कार्य

तारककाय (Centrosome) एवं सूक्ष्मनलिकाएँ

टी. बावेरी (1888) ने सर्वप्रथम 'सेंट्रोसोम' शब्द का प्रयोग किया था। जंतु कोशिका, कुछ शैवाल एवं कवकों में केंद्रक के समीप एक सघन कोशिकाद्रव्य क्षेत्र पाया जाता है, जिसे तारककाय कहते हैं। इसमें दो सघन बिंदु होते हैं जिन्हें तारककेंद्र अथवा सेंट्रीयोल कहते हैं, और चारों ओर के रंगहीन भाग को सेंट्रोस्फीयर कहते हैं। इसकी आंतरिक संरचना में नौ समूहों में परिधीय सूक्ष्मनलिकाएँ तिरछी लगी रहती हैं, जिससे एक पहिए (कार्टव्हील) जैसी रचना बनती है — इसे '9+0 संरचना' कहते हैं। ध्यान रहे कि तारककाय अमीबा तथा सभी पादप कोशिकाओं में अनुपस्थित होता है।

तारककाय के कार्य

यूकैरियोटिक कोशिका के जीवद्रव्य में गोल, नलिकाकार, अशाखित, बेलनाकार, खोखली सूक्ष्म संरचनाएँ पाई जाती हैं जिन्हें सूक्ष्मनलिकाएँ (Microtubules) कहते हैं। ये कोशिका की संरचना बनाए रखने, अंतःकोशिकीय संवहन, कोशिका विभाजन तथा कोशिकांगों के संचलन में सहायक होती हैं।

📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)

◆ राइबोसोम ◆ 70S ◆ 80S ◆ स्वेडबर्ग यूनिट ◆ तारककाय/सेंट्रोसोम ◆ सेंट्रीयोल ◆ सूक्ष्मनलिकाएँ ◆ स्पिंडल तंतु

10 पक्ष्माभिका, कशाभिका, रिक्तिका, सूक्ष्मकाय, लाइसोसोम एवं स्फीरोसोम

पक्ष्माभिका (Cilia) एवं कशाभिका (Flagella)

शैवाल, कवक, ब्रायोफाइट, फर्न एवं कुछ एककोशिकीय जंतुओं में गति के लिए एक या अधिक कोमल तंतुमय रचनाएँ पाई जाती हैं, जिन्हें पक्ष्माभिका (यदि छोटी एवं संख्या में अधिक हों) अथवा कशाभिका (यदि लंबी एवं संख्या में कम हों) कहते हैं। दोनों की आंतरिक संरचना लगभग समान होती है और तीन भागों से बनी होती है — शाफ्ट (जिसे एक्सोनीमा भी कहते हैं, जो सूक्ष्मनलिकाओं के 9 जोड़ों से बना होता है जो दो केंद्रीय नलिकाओं को घेरे रहते हैं — इसे '9+2 व्यवस्था' कहते हैं), आधारी अंग (Basal Body) तथा मूलिका (Rootlet)।

कार्य

रिक्तिका (Vacuole)

पादप कोशिकाओं में एक या अधिक, छोटी या बड़ी, गोलाकार, इकहरी झिल्ली से घिरी रिक्तिकाएँ पाई जाती हैं। रिक्तिका को घेरने वाली झिल्ली को टोनोप्लास्ट तथा इसमें भरे तरल को कोशिका रस (Cell Sap) कहते हैं। युवा कोशिकाओं में रिक्तिकाएँ छोटी होती हैं, किंतु जैसे-जैसे कोशिका बड़ी होती है, रिक्तिका भी बड़ी होती जाती है — परिपक्व पादप कोशिका में यह कोशिका के लगभग 90% आयतन तक घेर सकती है।

सूक्ष्मकाय (Microbodies)

ये एकल झिल्ली से घिरे छोटे कोशिकांग हैं, जिनमें विभिन्न ऑक्सीडेटिव एंजाइम पाए जाते हैं। इनके दो प्रमुख प्रकार हैं — परऑक्सीसोम (Peroxisome), जिसकी खोज डी ड्यूवे (1969) ने की थी, जो विषैले हाइड्रोजन पेरॉक्साइड (H₂O₂) का अपघटन करता है तथा प्रकाश-श्वसन में भाग लेता है; तथा ग्लाइऑक्सीसोम (Glyoxysome), जिसकी खोज बीवर्स (1961) ने की थी, जो तिलहन बीजों में संचित वसा को कार्बोहाइड्रेट में परिवर्तित करने में सहायक होता है — यह अंकुरण के समय ऊर्जा उपलब्ध कराने में बहुत महत्वपूर्ण है।

लाइसोसोम (Lysosome)

'Lyso' का अर्थ है पाचक तथा 'Soma' का अर्थ है शरीर। लाइसोसोम की खोज डी. ड्यूवे (1955) ने की थी। इनमें उपस्थित लगभग 40-50 पाचक एंजाइमों (हाइड्रोलेज़ वर्ग) के कारण इन्हें लाइसोसोम कहा जाता है। इनका निर्माण गॉल्जीकाय की पुटिकाओं के मुकुलन (Budding) द्वारा होता है। ये गोलाकार, एकल झिल्ली से घिरी थैली समान संरचनाएँ हैं, जो जंतु कोशिकाओं में यकृत, वृक्क, अग्न्याशयी कोशिकाओं एवं श्वेत रक्त कणिकाओं में प्रचुर मात्रा में पाई जाती हैं।

लाइसोसोम के कार्य

🔍 दिलचस्प तथ्य — रोचक तथ्य

लाइसोसोम को 'आत्मघाती थैलियाँ' (Suicidal Bags) भी कहा जाता है — क्योंकि जब किसी कारणवश इसके पाचक एंजाइम बाहर निकल जाते हैं, तो वे उसी कोशिका के कोशिकांगों को पचाकर पूरी कोशिका को नष्ट कर देते हैं।

स्फीरोसोम (Spherosome)

यह केवल पादप कोशिकाओं में पाया जाने वाला सूक्ष्म, गोलाकार कोशिकांग है, जिसकी उत्पत्ति चिकनी अंतर्द्रव्यी जालिका (SER) से होती है। यह एकल झिल्ली से घिरा होता है तथा इसमें मुख्यतः वसा (लिपिड) का संचय होता है, इसलिए इसे 'लिपिड भंडार' भी कहा जाता है। इसमें लाइपेज़ जैसे एंजाइम पाए जाते हैं, जो वसा के पाचन एवं चयापचय में सहायता करते हैं तथा बीजों में संचित तेल के अंकुरण के समय ऊर्जा उपलब्ध कराने में सहायक होते हैं।

📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)

◆ पक्ष्माभिका ◆ कशाभिका ◆ रिक्तिका ◆ टोनोप्लास्ट ◆ सूक्ष्मकाय ◆ परऑक्सीसोम ◆ ग्लाइऑक्सीसोम ◆ लाइसोसोम ◆ स्फीरोसोम

11 केंद्रक (Nucleus)

केंद्रक कोशिका का नियंत्रण केंद्र (Controlling Centre) है, जो कोशिका की समस्त जैविक क्रियाओं को नियंत्रित करता है — ठीक वैसे ही जैसे किसी कंपनी में मुख्य कार्यालय (Head Office) पूरी कंपनी के कामकाज को दिशा देता है। इसकी खोज रॉबर्ट ब्राउन ने 1831 में ऑर्किड की कोशिकाओं में की थी, जैसा हमने पहले भी पढ़ा। केंद्रक के अध्ययन को कैरियोलॉजी (Karyology) कहते हैं। यह स्तनधारियों की परिपक्व लाल रक्त कणिका (RBC) एवं परिपक्व चालनी वाहिनिका (Sieve Tube) को छोड़कर लगभग सभी कोशिकाओं में पाया जाता है। ध्यान रहे — प्रोकैरियोटिक कोशिकाओं में वास्तविक केंद्रक नहीं होता, वहाँ DNA न्यूक्लियॉइड के रूप में बिखरा रहता है।

आकृति एवं संख्या की दृष्टि से केंद्रक सामान्यतः गोलाकार अथवा अंडाकार होता है, जिसका आकार 5 से 20 माइक्रोमीटर तक होता है। प्रायः एक कोशिका में एक ही केंद्रक होता है, किंतु पैरामीशियम एवं उपास्थि (Cartilage) कोशिकाओं में दो केंद्रक तथा वाउचेरिया एवं रेखित (कंकाली) पेशियों में अनेक केंद्रक पाए जाते हैं।

यूकैरियोटिक कोशिका के केंद्रक के चार प्रमुख भाग

क्रोमैटिन को भी दो भागों में बाँटा जाता है — विषमक्रोमैटिन (Heterochromatin), जो गहरे रंग का, कसकर कुंडलित तथा आनुवंशिक रूप से कम सक्रिय होता है, तथा सुकेंद्री क्रोमैटिन (Euchromatin), जो हल्के रंग का, ढीला कुंडलित तथा आनुवंशिक रूप से अधिक सक्रिय होता है — यह अंतर आगे आनुवंशिकी (Genetics) के अध्ययन में बहुत महत्वपूर्ण होता है।

केंद्रक के कार्य

📌 महत्वपूर्ण — 💡 आसान भाषा में

केंद्रक की तुलना किसी बड़े पुस्तकालय (Library) के 'मास्टर कॉपी रूम' से की जा सकती है, जहाँ हर किताब (जीन) की मूल प्रति सुरक्षित रखी जाती है और ज़रूरत पड़ने पर उसकी नकल (RNA) बनाकर बाकी कोशिका (कारखाने) में भेजी जाती है, जहाँ उस नकल के आधार पर असली उत्पाद (प्रोटीन) तैयार होता है।

📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)

◆ केंद्रक (Nucleus) ◆ कैरियोलॉजी ◆ केंद्रक झिल्ली ◆ केंद्रिका (Nucleolus) ◆ केंद्रकद्रव्य ◆ क्रोमैटिन ◆ विषमक्रोमैटिन ◆ सुकेंद्री क्रोमैटिन

12 गुणसूत्र (Chromosomes)

कोशिका विभाजन की अंतरावस्था (Interphase) में क्रोमैटिन पदार्थ से बनने वाली धागेनुमा संरचनाओं को ही गुणसूत्र कहते हैं। स्ट्रासबर्गर (1875) ने गुणसूत्रों का पता लगाया तथा वाल्डेयर (1888) ने इन्हें 'क्रोमोसोम' नाम दिया।

गुणसूत्रों की संख्या

जंतुओं तथा उच्च वर्ग के पौधों की कायिक कोशिकाओं (Somatic Cells) में गुणसूत्र संख्या द्विगुणित (Diploid, 2n) होती है, जबकि युग्मकों (Gametes) में यह संख्या अगुणित (Haploid, n) होती है। अगुणित गुणसूत्र संख्या को जीनोम (Genome) कहते हैं।

जीवगुणसूत्र संख्या (2n)
मनुष्य46
प्याज़ (Onion)16
आलू (Potato)48
घोड़ा (Horse)64
मक्का (Maize)20

गुणसूत्र में पाए जाने वाले प्रमुख भाग

🔍 दिलचस्प तथ्य — रोचक शोध

अमेरिकी वैज्ञानिक डॉ. रिचर्ड कॉलन एवं उनके साथियों ने 2002-2003 में खोज की कि मनुष्य में आयु बढ़ने के साथ-साथ कोशिकाओं में गुणसूत्र के टेलोमियर छोटे होने लगते हैं, जिससे कोशिका वृद्ध होने लगती है और शरीर वृद्धावस्था की ओर अग्रसर होता है — यदि टेलोमियर एंजाइम समय रहते मिल जाए, तो टेलोमियर यथावत रह सकते हैं। यह शोध आज भी वृद्धावस्था-रोधी (Anti-Ageing) चिकित्सा अनुसंधान का आधार बना हुआ है।

गुणसूत्र की आकृति एवं प्रकार (सेंट्रोमीयर की स्थिति के आधार पर)

गुणसूत्र की आकृतिसेंट्रोमीयर की स्थितिगुणसूत्र का प्रकार
V आकारबिल्कुल मध्य मेंमध्यकेंद्री (Metacentric)
J अथवा L आकारमध्य से कुछ हटकरउपमध्यकेंद्री (Submetacentric)
छड़ (Rod)एक सिरे से कुछ नीचेउपांतकेंद्री (Acrocentric)
छड़ (Rod)बिल्कुल सिरे परअंतकेंद्री (Telocentric)

रासायनिक संगठन एवं न्यूक्लियोसोम मॉडल

गुणसूत्र में मुख्य रूप से न्यूक्लिइक अम्ल (DNA एवं RNA), प्रोटीन (क्षारीय प्रोटीन/हिस्टोन तथा अम्लीय प्रोटीन/नॉन-हिस्टोन) एवं खनिज लवण (Ca++, Mg++, Na+ आदि) पाए जाते हैं। गुणसूत्र का मुख्य भाग (90-92%) DNA एवं हिस्टोन से बनता है। गुणसूत्र में DNA एवं हिस्टोन प्रोटीन मिलकर विशिष्ट इकाइयाँ बनाते हैं जिन्हें न्यूक्लियोसोम कहते हैं — इस संरचना को कॉर्नबर्ग एवं थॉमस (1974) ने बताया। न्यूक्लियोसोम मनकों की माला की तरह दिखाई देते हैं, जो आगे कुंडलित होकर सोलेनॉइड संरचना बनाते हैं, जिसका अध्ययन फिंच एवं क्लुग (1977) ने किया, जिसके लिए उन्हें 1982 में नोबेल पुरस्कार मिला।

गुणसूत्रों के प्रकार

🟢 अलिंगी गुणसूत्र (Autosomes)🔴 लिंग गुणसूत्र (Sex Chromosomes)
◆ लिंग लक्षणों को छोड़कर शरीर के अन्य सभी लक्षणों का निर्धारण करते हैं ◆ मनुष्य में 22 जोड़े (44) अलिंगी गुणसूत्र होते हैं◆ खोज मैक्क्लंग (McClung) ने की ◆ सामान्यतः X एवं Y प्रकार के होते हैं ◆ मनुष्य में 1 जोड़ा (XX/XY) होता है

गुणसूत्रों के कार्य

📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)

◆ गुणसूत्र (Chromosome) ◆ सेंट्रोमीयर ◆ अर्धगुणसूत्र ◆ टेलोमियर ◆ हिस्टोन प्रोटीन ◆ न्यूक्लियोसोम ◆ अलिंगी गुणसूत्र ◆ लिंग गुणसूत्र

13 कोशिका चक्र एवं समसूत्री विभाजन (Mitosis)

कोशिका विभाजन (Cell Division) वह जैविक प्रक्रिया है जिसके द्वारा एक पैतृक कोशिका विभाजित होकर संतति कोशिकाओं का निर्माण करती है। यह न केवल जीवन की निरंतरता सुनिश्चित करता है, बल्कि आनुवंशिक गुणों के पीढ़ी-दर-पीढ़ी संचरण का आधार भी है। प्रत्येक सजीव का अस्तित्व एक एकल कोशिका — युग्मनज (Zygote) — से प्रारंभ होता है, जो अनगिनत विभाजनों के माध्यम से एक जटिल बहुकोशिकीय संरचना का रूप लेती है।

🔗 सम्बन्ध — सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ाव

कोशिका चक्र का अनियंत्रित होना ही 'कैंसर' (Cancer) का मूल कारण है — जब कोशिका विभाजन को रोकने वाले नियंत्रण तंत्र काम करना बंद कर देते हैं, तो कोशिकाएँ अनियंत्रित रूप से बढ़ती चली जाती हैं। भारत के 'राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन' एवं 'कैंसर निवारण कार्यक्रम' (NPCDCS) के अंतर्गत इसी अनियंत्रित कोशिका विभाजन को रोकने पर विशेष ध्यान दिया जाता है।

कोशिका चक्र की प्रावस्थाएँ (Phases of Cell Cycle)

कोशिका चक्र उन घटनाओं का एक समन्वित अनुक्रम है, जिसमें कोशिका अपने जीनोम का द्विगुणन करती है और अंततः दो संतति कोशिकाओं में विभाजित हो जाती है। मानव कोशिका के चक्र में औसतन 24 घंटे लगते हैं, जबकि यीस्ट में यह प्रक्रिया मात्र 90 मिनट में पूर्ण हो जाती है — अर्थात् कोशिका चक्र की अवधि विभिन्न जीवों में भिन्न-भिन्न होती है।

प्रावस्थाप्रमुख घटनाएँ
G1 प्रावस्था (Gap 1)कोशिका निरंतर वृद्धि करती है और चयापचयी रूप से सक्रिय रहती है — यह M एवं S प्रावस्था के बीच का अंतराल है
S प्रावस्था (Synthesis)DNA प्रतिकृतिकरण होता है — DNA की मात्रा दोगुनी (2C से 4C) हो जाती है, परंतु गुणसूत्रों की संख्या (2n) समान रहती है; साथ ही तारककेंद्र का भी द्विगुणन होता है
G2 प्रावस्था (Gap 2)समसूत्री विभाजन हेतु आवश्यक प्रोटीन का संश्लेषण होता है और कोशिका वृद्धि जारी रहती है
G0 प्रावस्था (शांत अवस्था)प्रौढ़ जीवों की कुछ कोशिकाएँ (जैसे हृदय कोशिकाएँ) G1 से निकलकर एक निष्क्रिय अवस्था में प्रवेश करती हैं — ये चयापचयी रूप से सक्रिय रहती हैं किंतु आवश्यकता पड़ने तक विभाजित नहीं होतीं

कोशिका चक्र की तैयारी (अंतरावस्था/Interphase) कुल अवधि का लगभग 95% से अधिक हिस्सा लेती है, इसीलिए इसे 'विश्राम प्रावस्था' कहा जाता है — यद्यपि कोशिका इस दौरान चयापचयी रूप से सर्वाधिक सक्रिय रहती है। इसके बाद वास्तविक विभाजन की प्रक्रिया 'M-प्रावस्था' में प्रवेश करती है।

समसूत्री विभाजन (Mitosis) — समान विभाजन

समसूत्री विभाजन को 'समान विभाजन' (Equational Division) कहा जाता है, क्योंकि इसमें संतति कोशिकाओं में गुणसूत्रों की संख्या पैतृक कोशिका के समान (2n से 2n) बनी रहती है। यह मुख्यतः द्विगुणित कोशिकाओं में होता है, परंतु अपवादस्वरूप नर मधुमक्खियों जैसे कुछ अगुणित जीवों में भी यह विभाजन पाया जाता है। समसूत्री विभाजन के दो भाग होते हैं — केंद्रक विभाजन (Karyokinesis) एवं कोशिकाद्रव्य विभाजन (Cytokinesis)।

केंद्रक विभाजन (Karyokinesis) के चार चरण

कोशिकाद्रव्य विभाजन (Cytokinesis)

🟢 जंतु कोशिका🔴 पादप कोशिका
◆ कोशिका झिल्ली में बाहर से अंदर की ओर एक खाँच (Furrow) बनती है ◆ यह क्रिया अभिनतोदर (Centripetal) दिशा में होती है — बाहर से भीतर की ओर◆ दृढ़ कोशिका भित्ति के कारण केंद्र से बाहर की ओर 'कोशिका पट्टिका' (Cell Plate) का निर्माण होता है ◆ यह क्रिया अपकेंद्री (Centrifugal) दिशा में होती है — भीतर से बाहर की ओर, वेसीकल्स के जुड़ने से
💡 वास्तविक उपयोग — विशेष उदाहरण

यदि केंद्रक विभाजन के बाद कोशिकाद्रव्य विभाजन न हो, तो बहुकेंद्रकी अवस्था उत्पन्न होती है, जिसे संकोशिका (Syncytium) कहते हैं — इसका उत्तम उदाहरण है नारियल का तरल भ्रूणपोष (नारियल पानी), जिसमें अनेक केंद्रक एक साथ एक ही कोशिकाद्रव्य में तैरते रहते हैं।

📌 महत्वपूर्ण

🖼️ समसूत्री विभाजन (माइटोसिस) के विभिन्न चरण — पूर्वावस्था से अंत्यावस्था तक

जीव विज्ञान चित्र

समसूत्री विभाजन का महत्व

📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)

◆ कोशिका चक्र ◆ अंतरावस्था ◆ समसूत्री विभाजन (Mitosis) ◆ केंद्रक विभाजन ◆ कोशिकाद्रव्य विभाजन ◆ कोशिका पट्ट ◆ संकोशिका

14 अर्धसूत्री विभाजन (Meiosis)

अर्धसूत्री विभाजन एक 'न्यूनकारी विभाजन' (Reductional Division) है, जो लैंगिक जनन के दौरान गुणसूत्रों की संख्या को आधा (2n से n) कर देता है। यह प्रजाति की विशिष्ट गुणसूत्र संख्या को पीढ़ी-दर-पीढ़ी स्थिर बनाए रखने के लिए अनिवार्य है — यदि युग्मक (शुक्राणु व अंडाणु) भी द्विगुणित होते, तो निषेचन के बाद हर पीढ़ी में गुणसूत्र संख्या दोगुनी होती चली जाती, जो असंभव है। अर्धसूत्री विभाजन जनन (Germ) कोशिकाओं में होता है तथा इसमें कोशिका दो बार विभाजित होती है, जबकि DNA का द्विगुणन केवल एक बार (प्रथम विभाजन से पहले) होता है।

अर्धसूत्री विभाजन-I — पूर्वावस्था-I की जटिलता (पाँच उपचरण)

अर्धसूत्री विभाजन की पूर्वावस्था-I (Prophase-I) अत्यंत लंबी एवं जटिल होती है, जिसे पाँच चरणों में विभाजित किया गया है:

अर्धसूत्री विभाजन-II

यह अनिवार्यतः समसूत्री विभाजन के समान ही है, जो अर्धसूत्री-I के बाद प्राप्त अगुणित कोशिकाओं को चार अगुणित संतति कोशिकाओं में परिवर्तित करता है। इस प्रकार एक द्विगुणित (2n) जनन-मातृ कोशिका से अंततः चार अगुणित (n) युग्मक बनते हैं।

📌 महत्वपूर्ण

📐 अर्धसूत्री विभाजन में DNA मात्रा का परिवर्तन — सूत्र/प्रक्रिया: जनन-मातृ कोशिका (2n) → S-प्रावस्था के बाद DNA द्विगुणन (4n के तुल्य) अर्धसूत्री-I के अंत में प्रत्येक ध्रुव पर → n (गुणसूत्र संख्या आधी) अर्धसूत्री-II के अंत में चार संतति कोशिकाएँ → प्रत्येक में n गुणसूत्र

📌 महत्वपूर्ण

🖼️ अर्धसूत्री विभाजन (मीयोसिस) की प्रमुख अवस्थाएँ — एक द्विगुणित कोशिका से चार अगुणित युग्मक बनने तक

जीव विज्ञान चित्र

समसूत्री बनाम अर्धसूत्री विभाजन

क्रमांकसमसूत्री विभाजन (Mitosis)अर्धसूत्री विभाजन (Meiosis)
1कोशिका एक बार विभाजित होती हैकोशिका दो बार विभाजित होती है
2कायिक (Somatic) कोशिकाओं में होता हैजनन (Germ) कोशिकाओं में होता है
3अलैंगिक व लैंगिक दोनों जनन में पाया जाता हैकेवल लैंगिक जनन में होता है
4DNA का द्विगुणन अंतरावस्था में एक बार होता हैDNA का द्विगुणन केवल प्रथम अंतरावस्था में, द्वितीय में नहीं
5पूर्वावस्था छोटी अवधि की, सरल होती हैपूर्वावस्था-I सबसे लंबी एवं जटिल अवस्था होती है
6क्रॉसिंग ओवर नहीं होता, काएज़्मा नहीं बनताक्रॉसिंग ओवर होता है, काएज़्मा बनता है
7संतति कोशिकाओं में गुणसूत्र संख्या पैतृक के समान (2n)संतति कोशिकाओं में गुणसूत्र संख्या आधी (n)
📌 महत्वपूर्ण — 💡 महत्व — विविधता का आधार

मध्यावस्था-I में मातृ एवं पितृ गुणसूत्र यादृच्छिक रूप से (Randomly) किसी भी ध्रुव की ओर अलग होते हैं, तथा पैकीटीन अवस्था में क्रॉसिंग ओवर होता है — इन्हीं दो कारणों से हर संतान (भाई-बहन भी) अपने माता-पिता से एवं आपस में भी थोड़ा अलग दिखाई देती है। यही जैव-विविधता (Biological Variation) एवं विकास (Evolution) की नींव है।

📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)

◆ अर्धसूत्री विभाजन (Meiosis) ◆ न्यूनकारी विभाजन ◆ सिनैप्टोनीमल कॉम्प्लेक्स ◆ बाइवैलेंट ◆ क्रॉसिंग ओवर ◆ काएज़्मेटा ◆ युग्मक

15 पादप एवं जंतु कोशिका में अंतर

अब तक हमने कोशिका के हर कोशिकांग को अलग-अलग विस्तार से समझा। अब इन सभी बातों को एक साथ जोड़कर देखें तो पादप एवं जंतु कोशिका के बीच का पूरा अंतर बहुत स्पष्ट हो जाता है — यह विषय RAS/IAS परीक्षा में तुलनात्मक प्रश्नों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।

📌 महत्वपूर्ण

🖼️ पादप कोशिका एवं जंतु कोशिका की तुलनात्मक संरचना

जीव विज्ञान चित्र
संरचनापादप कोशिकाजंतु कोशिका
कोशिका भित्तिउपस्थित (सेल्यूलोज़ की बनी)अनुपस्थित
कोशिका आकारसामान्यतः बड़ी एवं निश्चित आकार कीअपेक्षाकृत छोटी एवं अनियमित आकार की
रिक्तिका (Vacuole)एक बड़ी केंद्रीय रिक्तिका पाई जाती हैरिक्तिकाएँ छोटी-छोटी अथवा अनुपस्थित
पोषणस्वपोषी — प्रकाश संश्लेषण द्वारा स्वयं भोजन बनाती है (कवक अपवाद)परपोषी — प्रकाश संश्लेषण नहीं होता (यूग्लीना अपवाद)
केंद्रक की स्थितिसामान्यतः कोशिका के किनारे की ओरसामान्यतः कोशिका के मध्य में
हरितलवक (Chloroplast)उपस्थितअनुपस्थित
लाइसोसोमबहुत कम अथवा दुर्लभसामान्यतः प्रचुर मात्रा में उपस्थित
तारककाय (Centriole)सामान्यतः अनुपस्थित (कुछ शैवाल-कवक में)उपस्थित
तर्कु तंतु निर्माणजीवद्रव्य में उपस्थित प्रोटीन से बनते हैंतारककेंद्र से बनते हैं
प्लाज्मोडेस्मेटाउपस्थितअनुपस्थित
स्फीरोसोमउपस्थितअनुपस्थित
संचित भोजनस्टार्च के रूप मेंग्लाइकोजन एवं वसा के रूप में
कोशिकाद्रव्य विभाजनकोशिका पट्ट द्वारा केंद्र से किनारों की ओरखाँच बनकर किनारों से केंद्र की ओर
📌 महत्वपूर्ण — 💡 याद रखने की सरल तरकीब

पादप कोशिका को उस 'घर' के रूप में याद रखें जिसकी अपनी मज़बूत चारदीवारी (कोशिका भित्ति), बड़ा पानी की टंकी वाला स्टोररूम (केंद्रीय रिक्तिका) और अपनी सोलर पैनल जैसी छत (हरितलवक) हो — यह घर अपना भोजन खुद बना सकता है (स्वपोषी)। जंतु कोशिका को उस 'फ्लैट' के रूप में याद रखें जिसकी कोई चारदीवारी नहीं, कोई सोलर पैनल नहीं — इसलिए इसे बाज़ार से भोजन मंगवाना पड़ता है (परपोषी)।

📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)

◆ पादप कोशिका ◆ जंतु कोशिका ◆ स्वपोषी ◆ परपोषी ◆ केंद्रीय रिक्तिका

16 कोशिका विज्ञान की प्रमुख खोजें

इस पूरे अध्याय में हमने जिन-जिन वैज्ञानिकों एवं उनकी खोजों के बारे में पढ़ा, उन सभी को अब एक ही जगह क्रमबद्ध रूप में देख लेते हैं — यह तालिका पूरे अध्याय का त्वरित पुनरावलोकन (Quick Revision) करने में बहुत सहायक सिद्ध होगी।

वैज्ञानिक (वर्ष)खोज/योगदान
रॉबर्ट हुक (1665)सर्वप्रथम कॉर्क में कोशिका (कोशिका भित्ति) देखी, 'माइक्रोग्राफिया' में वर्णन
एंटोनी वॉन ल्यूवेनहॉक (1674)सर्वप्रथम जीवित कोशिका को देखा
रॉबर्ट ब्राउन (1831)केंद्रक (Nucleus) की खोज
पुरकिंजे (1840)जीवद्रव्य (Protoplasm) नाम दिया
वॉन मोल (1846)जीवद्रव्य के महत्व को प्रतिपादित किया
रुडोल्फ विरचो (1855/1858)'नई कोशिकाएँ पूर्ववर्ती कोशिकाओं के विभाजन से बनती हैं'
हेकेल (1865)'प्लास्टिड' शब्द का प्रयोग
मिशर (1868)न्यूक्लिइक अम्ल की खोज
डब्ल्यू. फ्लेमिंग (1879/1882)समसूत्री विभाजन एवं 'क्रोमैटिन' शब्द का प्रयोग; माइटोकॉन्ड्रिया को 'फाइला' नाम
स्ट्रासबर्गर (1879)कोशिकाद्रव्य एवं केंद्रकद्रव्य में अंतर, पौधों में कोशिका विभाजन
शिम्पर (1883)हरितलवक (क्लोरोप्लास्ट) का अध्ययन
अल्टमान (1886/1894)माइटोकॉन्ड्रिया की खोज, 'बायोप्लास्ट' नाम
वाल्डेयर (1888)गुणसूत्र (क्रोमोसोम) नाम दिया
टी. बावेरी (1888)सेंट्रोसोम (तारककाय) नाम दिया
सी. बेंडा (1897)'माइटोकॉन्ड्रिया' नाम दिया
कैमिलो गॉल्जी (1898)गॉल्जीकाय की खोज
सटन एवं बावेरी (1902)गुणसूत्र सिद्धान्त प्रतिपादित किया
फार्मर एवं मूरे (1905)अर्धसूत्री विभाजन (Meiosis) का वर्णन
नॉल एवं रूस्का (1932)इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी का आविष्कार
क्लॉडे (1941)राइबोसोम को सर्वप्रथम देखा
कीथ पोर्टर (1945/1953)अंतर्द्रव्यी जालिका (ER) नाम दिया
डी. ड्यूवे (1955)लाइसोसोम की खोज
सिंगर एवं निकोल्सन (1972)तरल मोज़ेक मॉडल (Fluid Mosaic Model) प्रस्तुत किया
📌 महत्वपूर्ण — 🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)

◆ कोशिका विज्ञान ◆ माइक्रोग्राफिया ◆ फ्लुइड मोज़ेक मॉडल ◆ इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी

📌 महत्वपूर्ण — 📌 अध्याय सारांश (Chapter Summary)

• कोशिका सजीव शरीर की सबसे छोटी संरचनात्मक एवं क्रियात्मक इकाई है; इसकी खोज रॉबर्ट हुक (1665) ने की तथा श्लाइडेन-श्वान (1838-39) ने कोशिका सिद्धान्त प्रतिपादित किया, जिसमें विरचो (1855) ने 'Omnis Cellula e Cellula' जोड़ा। • विषाणु कोशिका सिद्धान्त का अपवाद है क्योंकि उनमें स्वतंत्र विभाजन क्षमता तथा पूर्ण कोशिकीय अवयव नहीं होते। • केंद्रक के संगठन के आधार पर कोशिकाएँ प्रोकैरियोटिक (सुसंगठित केंद्रक रहित, जैसे जीवाणु) एवं यूकैरियोटिक (सुसंगठित केंद्रक सहित, जैसे पादप-जंतु) — दो प्रकार की होती हैं। • कोशिका भित्ति (केवल पादप, कवक, जीवाणु में) कोशिका को आकार एवं मज़बूती देती है, जबकि कोशिका झिल्ली (सभी कोशिकाओं में) तरल मोज़ेक मॉडल के अनुसार फॉस्फोलिपिड द्विस्तर व प्रोटीन से बनी चयनात्मक झिल्ली है, जो निष्क्रिय एवं सक्रिय परिवहन द्वारा पदार्थों का आवागमन नियंत्रित करती है। • माइटोकॉन्ड्रिया कोशिका का 'पावर हाउस' है जहाँ ऑक्सी-श्वसन द्वारा ATP बनता है; हरितलवक/प्लास्टिड प्रकाश संश्लेषण करता है — दोनों सेमी-ऑटोनॉमस कोशिकांग हैं। • अंतर्द्रव्यी जालिका (प्रोटीन/वसा संश्लेषण), गॉल्जीकाय (पैकेजिंग-स्रावण), राइबोसोम (प्रोटीन निर्माण), तारककाय (स्पिंडल तंतु निर्माण), लाइसोसोम ('आत्मघाती थैलियाँ' — अंतःकोशिकीय पाचन) — ये सभी कोशिकांग मिलकर कोशिका को एक सुव्यवस्थित 'कारखाने' की तरह चलाते हैं। • केंद्रक कोशिका का नियंत्रण केंद्र है, जिसमें क्रोमैटिन पदार्थ कोशिका विभाजन के समय संघनित होकर गुणसूत्रों में बदल जाता है — मनुष्य में 46 (23 जोड़े) गुणसूत्र होते हैं। • समसूत्री विभाजन (Mitosis) से शरीर की वृद्धि व मरम्मत होती है तथा संतति कोशिकाओं में गुणसूत्र संख्या पैतृक कोशिका के समान रहती है; जबकि अर्धसूत्री विभाजन (Meiosis) लैंगिक जनन हेतु युग्मक बनाता है, जिसमें गुणसूत्र संख्या आधी हो जाती है और क्रॉसिंग ओवर से आनुवंशिक विविधता उत्पन्न होती है। • पादप कोशिका में कोशिका भित्ति, बड़ी रिक्तिका, हरितलवक तथा स्वपोषी पोषण पाया जाता है, जबकि जंतु कोशिका में इनका अभाव होता है और वह परपोषी होती है। • कोशिका जीव विज्ञान की यह पूरी यात्रा — हुक की कॉर्क से लेकर सिंगर-निकोल्सन के तरल मोज़ेक मॉडल तक — यह दर्शाती है कि जीवन के सबसे बड़े रहस्य भी सबसे छोटी इकाई — कोशिका — के भीतर ही छिपे हैं।

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