🩺 अध्याय 9/10 — भौतिक विज्ञान

चिकित्सा निदान में भौतिकी के अनुप्रयोग

Physics in Medical Diagnostics | RAS Pre + Mains
📋 इस अध्याय में
  1. परिचय — चिकित्सा भौतिकी एवं निदान तकनीकें
  2. X-किरण (X-Rays)
  3. CT स्कैन (Computed Tomography)
  4. MRI — चुंबकीय अनुनाद इमेजिंग (Magnetic Resonance Imaging)
  5. अल्ट्रासाउंड / सोनोग्राफी (Ultrasound Imaging)
  6. PET स्कैन एवं SPECT
  7. एंडोस्कोपी एवं लेज़र चिकित्सा
  8. ECG एवं EEG — विद्युत निदान
  9. विकिरण चिकित्सा (Radiotherapy)
  10. प्रमुख वैज्ञानिक एवं चिकित्सा भौतिकी में उनका योगदान
🌟 क्या आप जानते हैं?

सोचो — साल 1895 में जर्मन वैज्ञानिक विल्हेम रॉन्टजन अपनी प्रयोगशाला में एक कैथोड-किरण ट्यूब पर प्रयोग कर रहे थे, तभी उन्होंने देखा कि पास रखी एक स्क्रीन अपने आप चमकने लगी — मानो कोई अदृश्य किरण दीवार व मोटे कागज़ के आर-पार जा रही हो। अगले ही दिन उन्होंने अपनी पत्नी के हाथ की एक तस्वीर खींची, जिसमें हड्डियाँ व अंगूठी की अंगूठी साफ़ दिखाई दी, परंतु मांस पारदर्शी था — यह संसार की पहली मेडिकल इमेजिंग तस्वीर थी। इसी एक खोज ने चिकित्सा भौतिकी नामक एक पूर्ण नई शाखा को जन्म दिया, जो आज X-ray से लेकर MRI व लेज़र सर्जरी तक फैली है। इस अध्याय में हम इसी रोमांचक यात्रा को गहराई से समझेंगे।

1परिचय — चिकित्सा भौतिकी एवं निदान तकनीकें

चिकित्सा भौतिकी (Medical Physics) वह शाखा है जिसमें भौतिकी के मौलिक नियमों — विद्युत-चुंबकत्व, ध्वनि, प्रकाशिकी तथा परमाणु भौतिकी — का उपयोग रोगों के निदान (Diagnosis, अर्थात रोग की पहचान करना) व उपचार (Therapy, अर्थात रोग को ठीक करना) में किया जाता है। इस संपूर्ण आधुनिक क्षेत्र की नींव 1895 में विल्हेम कॉनरैड रॉन्टजन द्वारा एक्स-किरण की खोज से पड़ी।

विकिरण/तरंगतरंगदैर्ध्य / ऊर्जाचिकित्सा उपयोग
X-किरण0.01–10 nm | 100eV–100keVरेडियोग्राफी, CT स्कैन, फ्लोरोस्कोपी
γ-किरण<0.01 nm | >100keVPET स्कैन, SPECT, विकिरण चिकित्सा
रेडियो तरंगेंमीटर रेंज | MHzMRI (NMR सिद्धांत)
अल्ट्रासाउंड20kHz–20MHz (ध्वनि तरंग)सोनोग्राफी, डॉप्लर
दृश्य प्रकाश400–700 nmएंडोस्कोपी, लेज़र शल्य चिकित्सा

निदान तकनीकों को व्यापक रूप से चार वर्गों में बाँटा जा सकता है — इमेजिंग तकनीकें (X-ray, CT, MRI, अल्ट्रासाउंड, PET/SPECT, जो शरीर के भीतर की तस्वीर बनाती हैं), विद्युत तरंग तकनीकें (ECG हृदय के लिए, EEG मस्तिष्क के लिए, EMG मांसपेशी के लिए), एंडोस्कोपी (फाइबर ऑप्टिक्स द्वारा शरीर के भीतर सीधे देखना), तथा उपचार तकनीकें (रेडियोथेरेपी, लेज़र सर्जरी, अल्ट्रासाउंड थेरेपी)।

🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
चिकित्सा भौतिकीनिदानउपचाररॉन्टजनEM स्पेक्ट्रम
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2X-किरण (X-Rays)

1895 में विल्हेम कॉनरैड रॉन्टजन ने एक अज्ञात, अत्यंत भेदक विकिरण की खोज की, जिसे उन्होंने इसकी अज्ञात प्रकृति के कारण "X" (अज्ञात के लिए गणितीय प्रतीक) किरण नाम दिया — इसी खोज के लिए उन्हें भौतिकी का प्रथम नोबेल पुरस्कार (1901) प्रदान किया गया। X-किरणें वास्तव में अत्यंत उच्च-ऊर्जा वाली विद्युत-चुंबकीय तरंगें हैं, जो पदार्थ में गहराई तक प्रवेश करने, आयनन करने तथा फोटोग्राफिक प्लेट को प्रभावित करने की क्षमता रखती हैं।

2.1 Coolidge Tube — X-किरण उत्पादन सिद्धांत

X-किरण उत्पन्न करने के लिए एक विशेष निर्वात नली (Coolidge Tube) उपयोग की जाती है, जिसमें एक टंगस्टन फिलामेंट कैथोड (इलेक्ट्रॉन स्रोत) से इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित होते हैं तथा 30-150 kV के उच्च वोल्टेज द्वारा अत्यंत तीव्र गति से त्वरित किए जाते हैं। जब ये तीव्र-गति इलेक्ट्रॉन टंगस्टन धातु के लक्ष्य (एनोड) से टकराते हैं, तो उनकी गतिज ऊर्जा का एक छोटा भाग (लगभग 1%) X-किरणों में परिवर्तित हो जाता है, जबकि शेष 99% ऊर्जा केवल ऊष्मा के रूप में नष्ट हो जाती है — यही कारण है कि X-ray मशीन के एनोड को निरंतर घुमाया व ठंडा किया जाता है, ताकि वह पिघल न जाए।

📐 X-किरण के सूत्र — सूत्र

न्यूनतम तरंगदैर्ध्य: λ_min = hc/eV = 12400/V(वोल्ट में) Å
ऊर्जा: E = hν = hc/λ
मोज़ले का नियम: √ν ∝ (Z−b) (Z=परमाणु क्रमांक)

टंगस्टन को ही लक्ष्य धातु के रूप में इसलिए चुना जाता है क्योंकि इसका गलनांक (3422°C) अत्यंत उच्च है — निरंतर बमबारी में उत्पन्न भारी ऊष्मा को यह बिना पिघले सहन कर सकता है, तथा इसका उच्च परमाणु क्रमांक (Z=74) अधिक प्रभावी ढंग से X-किरणें उत्पन्न करने में सहायक है।

2.2 चिकित्सा उपयोग

तकनीकउपयोग
रेडियोग्राफी (Radiography)हड्डी की चोट व फ्रैक्चर का निदान — हड्डी सघन होने से X-किरण अधिक अवशोषित करती है, जिससे फिल्म पर स्पष्ट सफ़ेद छाया बनती है
फ्लोरोस्कोपी (Fluoroscopy)रीयल-टाइम गतिशील X-ray इमेजिंग — पाचन तंत्र व हृदय कैथेटर की जाँच में उपयोगी
मैमोग्राफी (Mammography)स्तन कैंसर की प्रारंभिक पहचान — कम ऊर्जा वाली विशेष X-किरणों का उपयोग
डेंटल X-rayदाँत की जड़ व कैविटी (गुहा) की जाँच
X-किरण का खतरा — सीमित उपयोग अनिवार्य: X-किरणें आयनकारी विकिरण (Ionizing Radiation) की श्रेणी में आती हैं — अर्थात ये परमाणुओं से इलेक्ट्रॉन को बाहर निकाल सकती हैं, जिससे DNA क्षति व कैंसर का खतरा बढ़ सकता है। इसीलिए चिकित्सक हमेशा "जितना कम हो उतना बेहतर" (ALARA — As Low As Reasonably Achievable) सिद्धांत का पालन करते हैं, तथा गर्भवती महिलाओं में इसका उपयोग विशेष सावधानी के साथ ही किया जाता है।
🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
रॉन्टजनCoolidge Tubeमोज़ले का नियमरेडियोग्राफीफ्लोरोस्कोपीमैमोग्राफी
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3CT स्कैन (Computed Tomography)

साधारण X-ray केवल एक ही दिशा से ली गई एक 2D (द्विआयामी) छवि प्रदान करता है, जिसमें शरीर के भीतरी अंग एक-दूसरे के ऊपर अध्यारोपित (Overlap) होकर उलझ जाते हैं। इसी सीमा को दूर करने के लिए गॉडफ्रे हाउंसफील्ड व एलन कॉर्मैक ने 1972 में CT (Computed Tomography, पूर्वनाम CAT Scan) तकनीक विकसित की, जिसके लिए उन्हें 1979 का नोबेल पुरस्कार मिला।

CT स्कैन में X-ray ट्यूब रोगी के चारों ओर 360° घूमती है तथा सैकड़ों अलग-अलग कोणों से X-ray चित्र लेती है — इसके बाद एक शक्तिशाली कंप्यूटर एल्गोरिद्म (Radon Transform नामक गणितीय सिद्धांत पर आधारित) इन सभी 2D स्लाइस को जोड़कर एक अत्यंत सटीक 3D छवि पुनर्निर्मित करता है। आधुनिक स्पाइरल/हेलिकल CT में रोगी धीरे-धीरे आगे बढ़ता रहता है जबकि ट्यूब निरंतर घूमती रहती है, जिससे स्कैनिंग गति व सटीकता दोनों बढ़ जाती हैं।

3.1 Hounsfield Units (HU)

CT स्कैन की एक विशेष उपलब्धि यह है कि यह विभिन्न ऊतकों को उनकी X-ray क्षीणन (Attenuation) क्षमता के आधार पर मापता है, जिसे Hounsfield Units (HU) में व्यक्त किया जाता है — प्रत्येक ऊतक का एक विशिष्ट, पहचान योग्य HU मान होता है।

ऊतकHU रेंज
वायु (Air)−1000 (सबसे कम घनत्व)
वसा (Fat)−100 से −50
जल (Water)0 (मानक संदर्भ बिंदु)
मृदु ऊतक (Soft Tissue)+20 से +80
हड्डी (Bone)+400 से +1000 (उच्चतम)
💡 CT एंजियोग्राफी — रक्त वाहिकाओं की 3D जाँच

सामान्य CT स्कैन में रक्त वाहिकाएँ आसपास के मृदु ऊतक से HU मान में बहुत भिन्न नहीं होतीं, इसलिए इन्हें स्पष्ट रूप से अलग पहचानना कठिन होता है। इस समस्या को हल करने के लिए रोगी की शिरा में एक "कंट्रास्ट डाई" (आयोडीन-आधारित द्रव) इंजेक्ट किया जाता है, जो रक्त वाहिकाओं में प्रवाहित होकर उनका HU मान कृत्रिम रूप से बढ़ा देता है — इससे स्कैन में रक्त वाहिकाएँ चमकीली सफ़ेद दिखाई देने लगती हैं, जिससे हृदय की धमनियों में रुकावट या मस्तिष्क की रक्त वाहिकाओं में एन्यूरिज्म जैसी समस्याओं का सटीक निदान संभव हो पाता है।

🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
CT स्कैनहाउंसफील्ड यूनिटRadon Transformस्पाइरल CTCT एंजियोग्राफी
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4MRI — चुंबकीय अनुनाद इमेजिंग (Magnetic Resonance Imaging)

MRI की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह किसी भी प्रकार के आयनकारी विकिरण (जैसे X-ray) का उपयोग नहीं करती, इसीलिए इसे अपेक्षाकृत सुरक्षित तकनीक माना जाता है। इसका सिद्धांत नाभिकीय चुंबकीय अनुनाद (Nuclear Magnetic Resonance - NMR) पर आधारित है — मानव शरीर में प्रचुर मात्रा में उपस्थित हाइड्रोजन (¹H) परमाणुओं के नाभिक (प्रोटॉन) स्वयं एक छोटे चुंबक की भाँति व्यवहार करते हैं।

📐 Larmor आवृत्ति — सूत्र

ω₀ = γ·B₀ (γ हाइड्रोजन के लिए = 42.58 MHz/T)

4.1 T1 एवं T2 रिलैक्सेशन

विभिन्न ऊतकों में हाइड्रोजन प्रोटॉन के "वापस लौटने" (रिलैक्सेशन) की गति भिन्न-भिन्न होती है, तथा यही अंतर MRI को विभिन्न ऊतकों में भेद करने में सक्षम बनाता है — T1 (Spin-Lattice) चुंबकीय संरेखण के वापस आने का समय मापता है, जबकि T2 (Spin-Spin) अनुप्रस्थ चुंबकत्व के क्षय होने का समय मापता है। उदाहरण के लिए, वसा का T1 समय छोटा होता है, जबकि मस्तिष्क-मेरु द्रव (CSF) का T1 समय बड़ा होता है — इसी अंतर के आधार पर रेडियोलॉजिस्ट विभिन्न ऊतकों की पहचान करते हैं।

MRI के लाभ
  • मृदु ऊतक (मस्तिष्क, मेरुरज्जु, उपास्थि) की श्रेष्ठ छवि
  • कोई आयनकारी विकिरण नहीं — सुरक्षित
  • बहु-तलीय (axial/sagittal/coronal) इमेजिंग संभव
  • fMRI (BOLD प्रभाव) से मस्तिष्क की सक्रियता भी मापी जा सकती है
MRI की सीमाएँ
  • लंबा समय (30-60 मिनट) लगता है
  • क्लॉस्ट्रोफोबिया (बंद स्थान का भय) की समस्या
  • धातु प्रत्यारोपण वाले रोगियों में वर्जित
  • अत्यंत महँगी तकनीक; हड्डी की जाँच में CT से कमतर
🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
NMRLarmor आवृत्तिT1 रिलैक्सेशनT2 रिलैक्सेशनfMRIBOLD प्रभाव
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5अल्ट्रासाउंड / सोनोग्राफी (Ultrasound Imaging)

अल्ट्रासाउंड इमेजिंग 20,000 Hz से अधिक आवृत्ति की पराश्रव्य ध्वनि तरंगों पर आधारित है (चिकित्सा में सामान्यतः 1-20 MHz की आवृत्ति उपयोग होती है)। इन तरंगों को उत्पन्न करने के लिए पीज़ोइलेक्ट्रिक प्रभाव का उपयोग किया जाता है — लेड ज़िर्कोनेट टाइटेनेट (PZT) जैसे विशेष क्रिस्टल पर विद्युत दाब लगाने से वे तीव्र गति से यांत्रिक कंपन करने लगते हैं, जो पराश्रव्य तरंगों के रूप में शरीर में प्रवेश करते हैं।

📐 Pulse-Echo सिद्धांत — सूत्र

d = v·t/2 (v = 1540 मीटर/सेकंड, मानव शरीर में ध्वनि वेग; t = यात्रा का कुल समय)

जब ये तरंगें शरीर के भीतर दो भिन्न घनत्व वाले ऊतकों की सीमा से गुज़रती हैं (जिसे ध्वनिक प्रतिबाधा बेमेल या Impedance Mismatch कहते हैं), तो उनका कुछ भाग परावर्तित होकर वापस लौट आता है — इसी परावर्तित तरंग के लौटने में लगे समय से ऊतक की गहराई की सटीक गणना की जाती है, और इसी सिद्धांत को Pulse-Echo Principle कहा जाता है।

5.1 अल्ट्रासाउंड के मोड

मोडपूरा नामउपयोग
A-ModeAmplitude Modeनेत्र रोग, ट्यूमर की गहराई मापना
B-ModeBrightness Mode (2D)गर्भावस्था जाँच, पेट के अंग — सर्वाधिक प्रचलित मोड
M-ModeMotion Modeहृदय की गति (इकोकार्डियोग्राफी)
Doppler ModeDoppler Effectरक्त प्रवाह की गति एवं दिशा मापना
3D/4D ModeVolume Imagingभ्रूण की त्रि-आयामी जाँच
📐 डॉप्लर अल्ट्रासाउंड — सूत्र

Δf = 2f₀·v·cosθ/c (v=रक्त वेग, θ=कोण, c=ध्वनि वेग)

💡 गर्भावस्था में अल्ट्रासाउंड को ही क्यों प्राथमिकता दी जाती है?

अल्ट्रासाउंड X-ray या CT के विपरीत कोई आयनकारी विकिरण उपयोग नहीं करता — यह पूर्णतः यांत्रिक ध्वनि तरंगों पर आधारित है, जिससे विकासशील भ्रूण को कोई DNA-क्षति का खतरा नहीं होता। साथ ही यह रीयल-टाइम गतिशील छवि प्रदान करता है (जिससे शिशु की धड़कन व गति सीधे देखी जा सकती है) तथा तुलनात्मक रूप से सस्ती व सुविधाजनक तकनीक है — इन्हीं कारणों से यह गर्भावस्था की निगरानी के लिए सर्वाधिक पसंदीदा व सुरक्षित विकल्प है। हालाँकि इसकी एक सीमा यह है कि यह हड्डी या वायु से भरे अंगों (जैसे फेफड़े) के आर-पार स्पष्ट नहीं देख पाता, तथा परिणाम काफी हद तक ऑपरेटर के कौशल पर निर्भर करते हैं।

🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
पीज़ोइलेक्ट्रिक प्रभावPulse-Echo सिद्धांतB-ModeM-Modeडॉप्लर अल्ट्रासाउंड
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6PET स्कैन एवं SPECT

PET (Positron Emission Tomography) एक ऐसी अनूठी इमेजिंग तकनीक है जो शरीर की संरचना (Structure) के बजाय उसके चयापचय (Metabolism, अर्थात कोशिकाएँ किस दर से ऊर्जा का उपयोग कर रही हैं) को दर्शाती है। इसके लिए रोगी को ¹⁸F-FDG (फ्लूरोडिऑक्सीग्लूकोज़ — ग्लूकोज़ का एक रेडियोधर्मी रूप) इंजेक्ट किया जाता है।

PET-CT हाइब्रिड इमेजिंग: आधुनिक अस्पतालों में प्रायः PET व CT स्कैनर को एक ही मशीन में संयुक्त किया जाता है — CT शरीर की सटीक शारीरिक संरचना (Anatomy) दर्शाता है, जबकि PET उसी क्षेत्र में चयापचय गतिविधि (कैंसर हॉट-स्पॉट) दिखाता है। दोनों छवियों को एक साथ अध्यारोपित करने पर चिकित्सक ट्यूमर के ठीक स्थान व आकार का अत्यंत सटीक निर्धारण कर पाते हैं, जो केवल एक तकनीक से संभव नहीं था।

SPECT (Single Photon Emission Computed Tomography) एक समान सिद्धांत पर कार्य करता है, परंतु इसमें टेक्नीशियम-99m (⁹⁹ᵐTc, अर्ध-आयु केवल 6 घंटे) जैसे पदार्थ का उपयोग होता है, जो सीधे एकल गामा किरण (140 keV) उत्सर्जित करता है, जिसे एक घूमता हुआ गामा कैमरा पकड़ता है। PET SPECT की तुलना में अधिक संवेदनशील है, जबकि SPECT तुलनात्मक रूप से कम खर्चीली तकनीक है — दोनों ही परमाणु चिकित्सा (Nuclear Medicine) की श्रेणी में आती हैं, तथा हृदय परफ्यूज़न, हड्डी स्कैन व थायरॉइड जाँच में उपयोग होती हैं।

🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
PET स्कैनFDGएनाइहिलेशन विकिरणSPECTटेक्नीशियम-99mPET-CT
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7एंडोस्कोपी एवं लेज़र चिकित्सा

एंडोस्कोप एक पतली, लचीली नली है जिसके भीतर फाइबर ऑप्टिक केबल होती है, जो चिकित्सकों को शरीर के भीतरी अंगों को बिना किसी बड़े चीरे के प्रत्यक्ष रूप से देखने में सक्षम बनाती है। इसका कार्य-सिद्धांत हम पहले ही "प्रकाश एवं इसके गुणधर्म" अध्याय में विस्तार से पढ़ चुके पूर्ण आंतरिक परावर्तन (TIR) पर आधारित है — फाइबर की सघन क्रोड (Core) व अपेक्षाकृत विरल आवरण (Cladding) के बीच बार-बार TIR होते रहने से प्रकाश तंतु के भीतर ही बंद रहकर बिना क्षय हुए लंबी दूरी तय कर सकता है।

एंडोस्कोपी प्रकारउपयोग
गैस्ट्रोस्कोपीआमाशय (Stomach) की जाँच
कोलोनोस्कोपीबृहदान्त्र (Colon) की जाँच
ब्रोंकोस्कोपीफेफड़ों की जाँच
कैप्सूल एंडोस्कोपीनिगलने योग्य लघु कैमरा — छोटी आंत की जाँच
लैप्रोस्कोपीपेट में छोटे छेद से ऑपरेशन — "कीहोल सर्जरी"

7.1 लेज़र चिकित्सा (Laser Therapy)

लेज़र (Light Amplification by Stimulated Emission of Radiation) की तीन विशेष गुणों — मोनोक्रोमैटिक, कोहरेंट व कोलिमेटेड — के कारण यह चिकित्सा में अत्यंत सटीक व नियंत्रित ऊर्जा वितरण संभव बनाता है, जिसका सिद्धांत हम "प्रकाश एवं इसके गुणधर्म" अध्याय में पढ़ चुके हैं। विभिन्न तरंगदैर्ध्य के लेज़र भिन्न-भिन्न चिकित्सा प्रयोजनों के लिए उपयोग होते हैं।

लेज़र प्रकारतरंगदैर्ध्यचिकित्सा उपयोग
CO₂ लेज़र10,600 nm (अवरक्त)त्वचा शल्य चिकित्सा, ट्यूमर हटाना
Nd:YAG लेज़र1064 nm (अवरक्त)गहरी सर्जरी, ट्यूमर, नेत्र चिकित्सा
आर्गन लेज़र488/514 nm (हरा)रेटिना उपचार, त्वचा रोग
एक्साइमर लेज़र193/248 nm (UV)LASIK (नेत्र), कॉर्निया सर्जरी
डायोड लेज़र630–980 nm (लाल/अवरक्त)फोटोथेरेपी, दंत चिकित्सा
💡 LASIK — चश्मे से मुक्ति दिलाने वाली तकनीक

LASIK (Laser-Assisted In Situ Keratomileusis) में एक्साइमर लेज़र का उपयोग करके कॉर्निया (आँख की सबसे बाहरी पारदर्शी परत) के आकार को अत्यंत सटीकता से पुनः आकार दिया जाता है, जिससे प्रकाश अब सही ढंग से रेटिना पर केंद्रित हो सके — यह ठीक उसी सिद्धांत पर कार्य करता है जो हम मायोपिया व हाइपरमेट्रोपिया के सुधार में चश्मे के लेंस के लिए पढ़ चुके हैं, परंतु यहाँ लेंस बदलने के बजाय स्वयं आँख की प्राकृतिक लेंस-प्रणाली (कॉर्निया) को स्थायी रूप से सही आकार दे दिया जाता है। इसके अतिरिक्त, फोटो-डायनामिक थेरेपी (PDT) में एक विशेष प्रकाश-संवेदी दवा को शरीर में देकर, फिर उसे विशिष्ट तरंगदैर्ध्य के लेज़र से सक्रिय कर कैंसर कोशिकाओं को चुनिंदा रूप से नष्ट किया जाता है।

🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
फाइबर ऑप्टिक्सTIRएंडोस्कोपीलैप्रोस्कोपीLASIKएक्साइमर लेज़रफोटो-डायनामिक थेरेपी
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8ECG एवं EEG — विद्युत निदान

हृदय व मस्तिष्क सहित शरीर के अनेक अंग अपनी सामान्य कार्यप्रणाली के भाग के रूप में स्वयं सूक्ष्म विद्युत संकेत उत्पन्न करते हैं — इन्हीं संकेतों को रिकॉर्ड कर उनके ग्राफ से रोगों का निदान किया जा सकता है।

8.1 ECG — इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम

विलेम आइंथोवेन ने 1902 में ECG का आविष्कार किया (नोबेल पुरस्कार 1924) — जब हृदय की मांसपेशी (मायोकार्डियम) सिकुड़ती है, तो वह एक सूक्ष्म विद्युत संकेत उत्पन्न करती है, जिसे शरीर की सतह पर लगे इलेक्ट्रोड द्वारा पकड़कर एक ग्राफ के रूप में दर्शाया जाता है — आधुनिक 12-लीड ECG हृदय को विभिन्न कोणों से एक साथ देखने में सक्षम बनाता है।

ECG तरंग/अंतरालप्रतिनिधित्व
P तरंगआलिंद (Atria) विध्रुवण — SA नोड से शुरू होकर
QRS कॉम्प्लेक्सनिलय (Ventricle) विध्रुवण — सबसे बड़ी तरंग (0.06–0.10 सेकंड)
T तरंगनिलय पुनर्ध्रुवण (Repolarization)
PR अंतराल0.12–0.20 सेकंड — SA नोड से निलय तक संकेत यात्रा का समय

सामान्य हृदय गति 60-100 धड़कन प्रति मिनट (bpm) मानी जाती है — इससे कम को ब्रैडीकार्डिया (Bradycardia) तथा इससे अधिक को टैकीकार्डिया (Tachycardia) कहते हैं। ECG की सहायता से हृदयाघात (Myocardial Infarction), अतालता (Arrhythmia) व हृदय-अवरोध (Heart Block) जैसी गंभीर स्थितियों का शीघ्र निदान किया जा सकता है।

8.2 EEG — इलेक्ट्रोएन्सेफैलोग्राम

हांस बर्गर ने 1924 में EEG का आविष्कार किया, जो मस्तिष्क की विद्युत गतिविधि को रिकॉर्ड करता है। मस्तिष्क तरंगों को उनकी आवृत्ति के आधार पर पाँच वर्गों में बाँटा जाता है, तथा प्रत्येक वर्ग मस्तिष्क की एक विशिष्ट अवस्था से जुड़ा होता है।

तरंगआवृत्तिअवस्था
डेल्टा (δ)0.5–4 Hzगहरी नींद, शिशु अवस्था
थीटा (θ)4–8 Hzध्यान, तंद्रावस्था, बच्चे
अल्फा (α)8–13 Hzशांत जाग्रत अवस्था, आँखें बंद
बीटा (β)13–30 Hzसक्रिय विचार, एकाग्रता
गामा (γ)30–100 Hzउच्च संज्ञानात्मक प्रक्रिया
💡 मिर्गी के निदान में EEG की भूमिका

मिर्गी (Epilepsy) के रोगियों के मस्तिष्क में असामान्य, अनियमित विद्युत गतिविधि का अचानक विस्फोट होता है, जो EEG ग्राफ में स्पष्ट रूप से असामान्य, तीव्र स्पाइक-पैटर्न के रूप में दिखाई देता है — यही कारण है कि EEG मिर्गी, नींद-विकार, मस्तिष्क ट्यूमर व कोमा जैसी अवस्थाओं के निदान में एक अनिवार्य उपकरण माना जाता है। इसी सिद्धांत का एक विस्तार EMG (इलेक्ट्रोमायोग्राम) है, जो मांसपेशियों की विद्युत गतिविधि रिकॉर्ड कर तंत्रिका-पेशी संबंधी रोगों का निदान करता है।

🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
ECGआइंथोवेनP-QRS-T तरंगEEGहांस बर्गरअल्फा तरंगडेल्टा तरंग
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9विकिरण चिकित्सा (Radiotherapy)

विकिरण चिकित्सा में उच्च-ऊर्जा आयनकारी विकिरण का उपयोग करके कैंसर कोशिकाओं के DNA में दोहरी-स्ट्रैंड विदर (Double-Strand Break) उत्पन्न की जाती है, जिससे वे कोशिकाएँ विभाजित होने में असमर्थ होकर नष्ट हो जाती हैं। खुराक को ग्रे (Gray, Gy = 1 जूल/किलोग्राम) इकाई में मापा जाता है।

चूँकि विकिरण स्वस्थ ऊतकों को भी कुछ हद तक नुकसान पहुँचा सकता है, इसलिए कुल आवश्यक खुराक को एक साथ न देकर अनेक छोटी-छोटी खुराकों (Fractionation) में विभाजित करके, कई सत्रों में दिया जाता है — इससे स्वस्थ ऊतकों को प्रत्येक सत्र के बीच स्वयं की मरम्मत करने का पर्याप्त समय मिल जाता है, जबकि कैंसर कोशिकाएँ (जिनकी मरम्मत क्षमता कमज़ोर होती है) संचयी रूप से नष्ट होती चली जाती हैं।

प्रकारस्रोत/तकनीकउपयोग
External Beam (EBRT)कोबाल्ट-60 या LINAC (6-18 MV X-ray)स्तन, फेफड़े, प्रोस्टेट कैंसर
ब्रैकीथेरेपी (Brachytherapy)I-125, Ir-192 को सीधे ट्यूमर में रखनागर्भाशय, प्रोस्टेट, त्वचा कैंसर
IMRTतीव्रता-मॉड्युलेटेड विकिरणट्यूमर के जटिल आकार के अनुसार
प्रोटॉन थेरेपीप्रोटॉन बीम (Bragg Peak सिद्धांत)मस्तिष्क, रीढ़, नेत्र ट्यूमर
गामा नाइफ (Gamma Knife)कोबाल्ट-60 के 201 संकेंद्रित बीममस्तिष्क ट्यूमर, AVM
Bragg Peak — प्रोटॉन थेरेपी की सबसे बड़ी विशेषता: जब कोई प्रोटॉन बीम शरीर के ऊतक में प्रवेश करती है, तो एक साधारण X-ray के विपरीत (जो प्रवेश-बिंदु पर ही अधिकतम ऊर्जा जमा कर आगे बढ़ने पर धीरे-धीरे क्षीण होती जाती है), प्रोटॉन बीम अपनी अधिकांश ऊर्जा एक अत्यंत सटीक, पूर्वनिर्धारित गहराई पर छोड़ती है — जिसे Bragg Peak कहते हैं — और इसके ठीक बाद ऊर्जा तुरंत लगभग शून्य हो जाती है। इस असाधारण गुण के कारण चिकित्सक ट्यूमर पर ही अधिकतम विकिरण-खुराक केंद्रित कर सकते हैं, जबकि ट्यूमर के ठीक पीछे स्थित स्वस्थ ऊतक (जैसे मस्तिष्क या रीढ़ की नाज़ुक संरचनाएँ) लगभग पूर्णतः सुरक्षित रहते हैं — यही कारण है कि प्रोटॉन थेरेपी बच्चों व मस्तिष्क-निकट ट्यूमर के उपचार में विशेष रूप से पसंद की जाती है।

कोबाल्ट-60 (अर्ध-आयु 5.27 वर्ष), जो 1.17 व 1.33 MeV ऊर्जा की गामा किरणें उत्सर्जित करता है, दशकों से टेलीथेरेपी (बाहरी विकिरण चिकित्सा) में एक विश्वसनीय स्रोत रहा है, जबकि हाइपरथर्मिया तकनीक में ट्यूमर को 40-45°C तक गर्म कर उसे विकिरण के प्रति अधिक संवेदनशील बना दिया जाता है, जिससे विकिरण चिकित्सा की प्रभावशीलता और बढ़ जाती है।

🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
विकिरण चिकित्साग्रे (Gy)FractionationEBRTब्रैकीथेरेपीBragg Peakगामा नाइफकोबाल्ट-60
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10प्रमुख वैज्ञानिक एवं चिकित्सा भौतिकी में उनका योगदान

वैज्ञानिक (देश/काल)चिकित्सा भौतिकी में योगदान
विल्हेम कॉनरैड रॉन्टजन (जर्मनी, 1845–1923)X-किरणों की खोज (1895) — प्रथम नोबेल पुरस्कार (भौतिकी, 1901)
गॉडफ्रे हाउंसफील्ड व एलन कॉर्मैकCT स्कैन तकनीक का विकास (1972) — नोबेल पुरस्कार (चिकित्सा, 1979)
विलेम आइंथोवेन (नीदरलैंड, 1860–1927)ECG का आविष्कार (1902) — नोबेल पुरस्कार (चिकित्सा, 1924)
हांस बर्गर (जर्मनी, 1873–1941)EEG का आविष्कार (1924) — मानव मस्तिष्क तरंगों की प्रथम रिकॉर्डिंग
पॉल लॉटरबर व पीटर मैंसफील्डMRI तकनीक का विकास — नोबेल पुरस्कार (चिकित्सा, 2003)
मैरी क्यूरी (पोलैंड/फ्रांस, 1867–1934)रेडियोधर्मिता पर मौलिक शोध — विकिरण चिकित्सा की वैज्ञानिक नींव

📌 अध्याय सारांश (Chapter Summary)

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