☢️ अध्याय 10/10 — भौतिक विज्ञान

नाभिकीय विखंडन-संलयन एवं विकिरण सुरक्षा

Nuclear Fission-Fusion and Radiation Safety | RAS Pre + Mains
📋 इस अध्याय में
  1. परिचय — नाभिक, बंधन ऊर्जा एवं E=mc²
  2. रेडियोधर्मिता (Radioactivity)
  3. नाभिकीय विखंडन (Nuclear Fission)
  4. नाभिकीय संलयन (Nuclear Fusion)
  5. नाभिकीय रिएक्टर (Nuclear Reactor)
  6. विकिरण के प्रकार एवं गुण (Types & Properties of Radiation)
  7. विकिरण मापन की इकाइयाँ (Radiation Measurement Units)
  8. विकिरण के जैविक प्रभाव (Biological Effects of Radiation)
  9. विकिरण सुरक्षा (Radiation Safety)
  10. प्रमुख वैज्ञानिक एवं नाभिकीय भौतिकी में उनका योगदान
🌟 क्या आप जानते हैं?

6 अगस्त 1945 को जापान के हिरोशिमा शहर में एक ऐसा धमाका हुआ जिसने पूरी दुनिया को दिखा दिया कि परमाणु के भीतर छिपी ऊर्जा कितनी विशाल व कितनी शक्तिशाली हो सकती है। मात्र कुछ ग्राम पदार्थ के भीतर इतनी ऊर्जा छिपी हो सकती है, जो हज़ारों टन विस्फोटक के बराबर विनाश कर सकती है — यह तथ्य पहली बार आइंस्टीन के प्रसिद्ध समीकरण E=mc² को व्यावहारिक रूप से संसार के सामने लाया। परंतु यही परमाणु ऊर्जा, यदि नियंत्रित रूप से उपयोग की जाए, तो बिजलीघरों को चलाने से लेकर कैंसर के उपचार तक में मानवता की सबसे बड़ी सहायक भी बन सकती है। इस अंतिम अध्याय में हम नाभिकीय भौतिकी की इसी दोहरी प्रकृति — विनाशकारी व रचनात्मक दोनों — को गहराई से समझेंगे।

1परिचय — नाभिक, बंधन ऊर्जा एवं E=mc²

किसी भी परमाणु के केंद्र में एक अत्यंत सूक्ष्म परंतु सघन नाभिक (Nucleus) स्थित होता है, जो प्रोटॉन (धनावेशित) व न्यूट्रॉन (उदासीन) से मिलकर बना होता है — इन दोनों को सम्मिलित रूप से न्यूक्लिऑन कहा जाता है। किसी तत्व में प्रोटॉनों की संख्या को परमाणु क्रमांक (Z) तथा प्रोटॉन व न्यूट्रॉन की कुल संख्या को द्रव्यमान संख्या (A) कहते हैं।

1.1 नाभिकीय बल (Nuclear Force)

नाभिक के भीतर धनावेशित प्रोटॉन एक-दूसरे को कूलॉम बल द्वारा प्रबलता से प्रतिकर्षित करते हैं, तो फिर वे एक साथ इतने सघन रूप से कैसे बँधे रहते हैं? इसका उत्तर है नाभिकीय बल (Nuclear Force) — प्रकृति का सबसे प्रबल मूल बल, जो प्रोटॉन-प्रोटॉन, न्यूट्रॉन-न्यूट्रॉन तथा प्रोटॉन-न्यूट्रॉन के बीच समान रूप से कार्य करता है। यह बल अत्यंत अल्प-परास (केवल 2-3 फेम्टोमीटर तक) का है — अर्थात यह केवल अत्यंत निकट दूरी पर ही प्रभावी होता है, परंतु इस सीमित दूरी के भीतर यह कूलॉम प्रतिकर्षण बल से कहीं अधिक प्रबल होकर नाभिक को स्थिर बनाए रखता है।

1.2 बंधन ऊर्जा एवं द्रव्यमान-ऊर्जा तुल्यता

दिलचस्प बात यह है कि किसी नाभिक का वास्तविक द्रव्यमान, उसके भीतर मौजूद सभी प्रोटॉन व न्यूट्रॉन के अलग-अलग द्रव्यमान के योग से थोड़ा कम होता है — इस अंतर को द्रव्यमान क्षति (Mass Defect) कहते हैं। यह "खोया हुआ" द्रव्यमान वास्तव में कहीं गायब नहीं होता, बल्कि आइंस्टीन के ऐतिहासिक समीकरण E=mc² के अनुसार ऊर्जा में परिवर्तित होकर बंधन ऊर्जा (Binding Energy) के रूप में नाभिक को एक साथ बाँधे रखता है।

📐 द्रव्यमान-ऊर्जा तुल्यता एवं बंधन ऊर्जा — सूत्र

द्रव्यमान क्षति: Δm = [Zmp + (A−Z)mn] − M_nucleus
बंधन ऊर्जा: BE = Δm × c² = Δm × 931.5 MeV
आइंस्टीन का सूत्र: E = mc² (1 amu = 931.5 MeV, 1kg द्रव्यमान ≈ 9×10¹⁶ जूल ऊर्जा)

💡 आयरन-56 (Fe-56) — सबसे स्थायी नाभिक क्यों?

जब प्रति न्यूक्लिऑन बंधन ऊर्जा (BE/A) को विभिन्न तत्वों के लिए आलेखित किया जाता है, तो यह वक्र आयरन-56 (Fe-56) पर अपने शिखर (लगभग 8.8 MeV प्रति न्यूक्लिऑन) पर पहुँचता है — अर्थात Fe-56 सभी तत्वों में सबसे अधिक स्थायी नाभिक है। यही कारण है कि इससे हल्के तत्व (जैसे हाइड्रोजन, हीलियम) आपस में जुड़कर (संलयन) ऊर्जा मुक्त करते हैं, जबकि इससे भारी तत्व (जैसे यूरेनियम) टूटकर (विखंडन) ऊर्जा मुक्त करते हैं — दोनों ही प्रक्रियाएँ नाभिक को Fe-56 जैसी अधिक स्थायी अवस्था की ओर धकेलती हैं, और इसी सिद्धांत पर सूर्य से लेकर परमाणु ऊर्जा संयंत्रों तक सब कुछ आधारित है।

कुछ तत्वों के नाभिक ऐसे भी होते हैं जिनमें प्रोटॉनों की संख्या (Z) समान होती है परंतु न्यूट्रॉनों की संख्या भिन्न होती है — इन्हें आइसोटोप (समस्थानिक) कहा जाता है, जैसे हाइड्रोजन के तीन समस्थानिक ¹H, ²H (ड्यूटेरियम) व ³H (ट्रिटियम)। इसके विपरीत, यदि दो नाभिकों की द्रव्यमान संख्या (A) समान हो परंतु परमाणु क्रमांक (Z) भिन्न हो, तो उन्हें आइसोबार (समभारिक) कहते हैं।

🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
नाभिकनाभिकीय बलद्रव्यमान क्षतिबंधन ऊर्जाE=mc²आइसोटोपआइसोबारFe-56
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2रेडियोधर्मिता (Radioactivity)

रेडियोधर्मिता वह प्राकृतिक परिघटना है जिसमें कुछ अस्थायी (भारी या असंतुलित) नाभिक स्वतः विकिरण उत्सर्जित करते हुए एक अधिक स्थायी अवस्था की ओर क्षय होते हैं। इसकी खोज हेनरी बेकरल ने 1896 में संयोगवश की, जब उन्होंने पाया कि यूरेनियम युक्त एक चट्टान का नमूना, बिना किसी बाहरी प्रकाश-स्रोत के भी, एक फोटोग्राफिक प्लेट को प्रभावित कर रहा था। इसके तुरंत बाद मैरी क्यूरी ने पोलोनियम व रेडियम जैसे नए रेडियोधर्मी तत्वों की खोज की, जिसके लिए उन्हें भौतिकी (1903) व रसायन विज्ञान (1911) — दोनों क्षेत्रों में नोबेल पुरस्कार मिला, जो आज तक एक दुर्लभ उपलब्धि है।

क्षय प्रकारकण/विकिरणआवेशविशेषता
अल्फा क्षय (α)हीलियम नाभिक (⁴₂He)+24-9 MeV ऊर्जा; कम भेदन परंतु अधिक आयनन क्षमता
बीटा-ऋण क्षय (β⁻)इलेक्ट्रॉन−1न्यूट्रॉन का प्रोटॉन में बदलना; मध्यम भेदन क्षमता
बीटा-धन क्षय (β⁺)पॉज़िट्रॉन+1प्रोटॉन का न्यूट्रॉन में बदलना; PET स्कैन में उपयोगी
गामा क्षय (γ)फोटॉन (EM)0उत्तेजित नाभिक का ऊर्जा त्याग; सर्वाधिक भेदन क्षमता

2.1 अर्ध-आयु एवं क्षय नियम (Half-Life)

अर्ध-आयु (Half-Life, T½) वह समय है जिसमें किसी रेडियोधर्मी पदार्थ की मूल मात्रा का ठीक आधा भाग क्षय हो जाता है। यह प्रत्येक रेडियोधर्मी तत्व का एक अद्वितीय व अपरिवर्तनीय गुण है — न तो तापमान, न दाब, न ही कोई रासायनिक प्रक्रिया इसे बदल सकती है।

📐 रेडियोधर्मी क्षय नियम — सूत्र

N = N₀ × (1/2)^(t/T½) = N₀ × e^(−λt)
क्षय स्थिरांक: λ = 0.693/T½
उदाहरण: C-14 (5730 वर्ष) | Co-60 (5.27 वर्ष) | U-238 (4.5 अरब वर्ष) | I-131 (8 दिन)

💡 कार्बन-14 तिथि-निर्धारण (Carbon Dating)

वायुमंडल में कार्बन-14 (¹⁴C) व सामान्य कार्बन-12 (¹²C) का अनुपात लगभग स्थिर रहता है, और जीवित पौधे व जीव श्वसन-प्रक्रिया द्वारा इसी अनुपात में कार्बन ग्रहण करते रहते हैं। परंतु किसी जीव की मृत्यु होते ही कार्बन ग्रहण करना बंद हो जाता है, और उसके शरीर में मौजूद ¹⁴C अपनी 5730 वर्ष की अर्ध-आयु के अनुसार धीरे-धीरे क्षय होने लगता है। पुरातत्वविद अवशेषों में बचे ¹⁴C की मात्रा मापकर यह गणना कर सकते हैं कि कितनी अर्ध-आयुएँ बीत चुकी हैं, और इस प्रकार लगभग 50,000 वर्ष तक पुरानी वस्तुओं की सटीक आयु ज्ञात की जा सकती है — इसी महत्वपूर्ण खोज के लिए विलार्ड लिब्बी को 1960 का रसायन विज्ञान नोबेल पुरस्कार मिला। इसी सिद्धांत के एक विस्तार, यूरेनियम-लेड डेटिंग (U-238 की 4.5 अरब वर्ष अर्ध-आयु का उपयोग करके) से ही वैज्ञानिकों ने पृथ्वी की आयु लगभग 4.54 अरब वर्ष निर्धारित की है।

🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
रेडियोधर्मिताबेकरलमैरी क्यूरीअल्फा क्षयबीटा क्षयगामा क्षयअर्ध-आयुकार्बन डेटिंग
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3नाभिकीय विखंडन (Nuclear Fission)

नाभिकीय विखंडन वह प्रक्रिया है जिसमें एक भारी नाभिक (जैसे यूरेनियम-235) किसी धीमी गति के न्यूट्रॉन से टकराने पर दो छोटे नाभिकों में विभाजित हो जाता है, तथा भारी मात्रा में ऊर्जा मुक्त करता है। इसकी खोज ऑटो हान व फ्रिट्ज़ स्ट्रासमान ने 1938 में की, जबकि इसकी सैद्धांतिक व्याख्या लीज़े माइटनर ने प्रस्तुत की।

📐 U-235 विखंडन अभिक्रिया — सूत्र

₉₂U²³⁵ + ₀n¹ → ₅₆Ba¹⁴¹ + ₃₆Kr⁹² + 3₀n¹ + 200 MeV ऊर्जा
1 ग्राम U-235 के पूर्ण विखंडन से लगभग 2700 किलोग्राम कोयले के बराबर ऊर्जा प्राप्त होती है

3.1 श्रृंखला अभिक्रिया (Chain Reaction)

U-235 के प्रत्येक विखंडन से औसतन 3 नए न्यूट्रॉन मुक्त होते हैं, जो आगे 3 और विखंडन प्रतिक्रियाओं को जन्म दे सकते हैं — यदि इसे अनियंत्रित छोड़ दिया जाए, तो यह संख्या 3→9→27→... की दर से तेज़ी से बढ़ती जाती है, जिसे श्रृंखला अभिक्रिया कहते हैं। इस प्रक्रिया की दिशा गुणन गुणांक (k) से निर्धारित होती है।

गुणन गुणांक (k)स्थितिपरिणाम
k < 1अधीनचालित (Sub-critical)प्रतिक्रिया अपने आप रुक जाती है
k = 1क्रांतिक (Critical)नियंत्रित, स्थायी प्रतिक्रिया — नाभिकीय रिएक्टर की स्थिति
k > 1अतिचालित (Super-critical)अनियंत्रित, तीव्र विस्फोटक वृद्धि
क्रांतिक द्रव्यमान (Critical Mass): किसी विखंडनीय पदार्थ की वह न्यूनतम मात्रा जिस पर एक स्थायी श्रृंखला अभिक्रिया (k=1) बनी रह सकती है, क्रांतिक द्रव्यमान कहलाती है — बिना किसी परावर्तक के U-235 के लिए यह लगभग 52 किलोग्राम तथा Pu-239 के लिए लगभग 10 किलोग्राम मानी जाती है। 1938 की इस खोज ने आगे चलकर द्वितीय विश्वयुद्ध के अंत में परमाणु बमों (6 अगस्त 1945 हिरोशिमा तथा 9 अगस्त 1945 नागासाकी) के निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया — यह मानव इतिहास की एक ऐसी घटना है जिसने विज्ञान की शक्ति और उसकी नैतिक ज़िम्मेदारी, दोनों को एक साथ संसार के सामने रखा। भारत ने भी पोखरण-I (1974) व पोखरण-II (1998) परमाणु परीक्षणों के माध्यम से इसी नाभिकीय विखंडन तकनीक में अपनी वैज्ञानिक क्षमता प्रदर्शित की।
🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
नाभिकीय विखंडनहान-स्ट्रासमानश्रृंखला अभिक्रियागुणन गुणांकक्रांतिक द्रव्यमानपोखरण
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4नाभिकीय संलयन (Nuclear Fusion)

नाभिकीय संलयन विखंडन की ठीक विपरीत प्रक्रिया है — इसमें दो हल्के नाभिक अत्यधिक उच्च ताप (करोड़ों डिग्री) व दाब पर मिलकर एक भारी नाभिक बनाते हैं, तथा इस प्रक्रिया में विखंडन से भी कहीं अधिक ऊर्जा प्रति न्यूक्लिऑन मुक्त होती है। इतना उच्च ताप इसलिए आवश्यक है ताकि दोनों नाभिकों के बीच के प्रबल कूलॉम प्रतिकर्षण बल (दोनों धनावेशित होने से) को पार किया जा सके — यही कारण है कि प्राकृतिक रूप से संलयन केवल तारों के केंद्र में ही सतत रूप से घटित होता है।

📐 संलयन अभिक्रियाएँ — सूत्र

D + T → ⁴He + n + 17.6 MeV (ड्यूटेरियम-ट्रिटियम संलयन — सर्वाधिक ऊर्जा-कुशल)
4¹H → ⁴He + 2e⁺ + 2ν + 26.7 MeV (प्रोटॉन-प्रोटॉन शृंखला — सूर्य में)

संलयन के विखंडन की तुलना में दो बड़े लाभ हैं — यह प्रति न्यूक्लिऑन कहीं अधिक ऊर्जा उत्पन्न करता है, तथा इसमें विखंडन जैसा दीर्घकालिक रेडियोधर्मी अपशिष्ट उत्पन्न नहीं होता। इसी कारण वैज्ञानिक विश्वभर में नियंत्रित संलयन (Controlled Fusion) को भविष्य की स्वच्छ व असीमित ऊर्जा का सबसे बड़ा स्रोत मानते हैं।

💡 ITER — मानवता का सबसे बड़ा वैज्ञानिक सहयोग प्रयास

फ्रांस में निर्माणाधीन ITER (International Thermonuclear Experimental Reactor) परियोजना में 35 देश (भारत सहित) मिलकर एक ऐसा टोकामक रिएक्टर बना रहे हैं, जो चुंबकीय क्षेत्र की सहायता से अत्यंत उच्च-ताप प्लाज़्मा को नियंत्रित (Magnetic Confinement Fusion) रखकर संलयन को स्थायी रूप से संभव बनाने का प्रयास करेगा — इसके 2035 तक प्रथम प्लाज़्मा उत्पन्न करने का लक्ष्य है। इसके समानांतर, अमेरिका की NIF (National Ignition Facility) ने 2022 में लेज़र-आधारित जड़त्वीय संलयन (Laser Inertial Confinement) तकनीक से "इग्निशन" (अर्थात संलयन से निवेश से अधिक ऊर्जा प्राप्त करना) की ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की — यह नियंत्रित संलयन को व्यावहारिक ऊर्जा स्रोत बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जाता है, क्योंकि इसका ईंधन (समुद्री जल में उपलब्ध ड्यूटेरियम) लगभग असीमित है तथा इससे कोई कार्बन उत्सर्जन नहीं होता।

🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
नाभिकीय संलयनप्रोटॉन-प्रोटॉन शृंखलाड्यूटेरियम-ट्रिटियमITERटोकामकNIF
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5नाभिकीय रिएक्टर (Nuclear Reactor)

नाभिकीय रिएक्टर एक ऐसी युक्ति है जो नियंत्रित श्रृंखला अभिक्रिया (k=1) के माध्यम से नाभिकीय ऊर्जा को उपयोगी विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करती है — विखंडन से उत्पन्न ऊष्मा जल को भाप में बदलती है, जो टरबाइन घुमाकर जनरेटर से विद्युत उत्पन्न करती है (ठीक वैसे ही जैसे किसी परंपरागत ताप-विद्युत संयंत्र में होता है, केवल ऊष्मा-स्रोत भिन्न है)।

घटककार्य
ईंधन (Fuel)U-235 (समृद्ध), U-238, Pu-239 या Th-232 — फ्यूल रॉड्स में भरा जाता है
मंदक (Moderator)तीव्र-गति न्यूट्रॉन को धीमा करना, ताकि वे विखंडन में अधिक प्रभावी हों — भारी जल (D₂O), ग्रेफाइट या हल्का जल
नियंत्रण छड़ (Control Rods)बोरॉन या कैडमियम की छड़ें, जो अतिरिक्त न्यूट्रॉन अवशोषित कर श्रृंखला अभिक्रिया की दर नियंत्रित करती हैं
शीतलक (Coolant)उत्पन्न ऊष्मा को बाहर ले जाना — भारी जल, CO₂, हीलियम या तरल सोडियम
परिरक्षण (Shielding)विकिरण को रिएक्टर के बाहर जाने से रोकना — सीसा (Lead) व कंक्रीट

विश्वभर में विभिन्न प्रकार के रिएक्टर डिज़ाइन प्रचलित हैं — दाबित जल रिएक्टर (PWR, संवर्धित यूरेनियम व हल्के जल पर आधारित, सर्वाधिक प्रचलित), क्वथन जल रिएक्टर (BWR), दाबित भारी जल रिएक्टर (PHWR, प्राकृतिक यूरेनियम व भारी जल पर आधारित — भारत का प्रमुख डिज़ाइन), तथा तीव्र प्रजनक रिएक्टर (FBR, जो Pu-239 ईंधन का उपयोग करते हुए स्वयं और अधिक ईंधन "प्रजनित" भी करता है)।

5.1 भारत का त्रि-चरणीय परमाणु कार्यक्रम

भारत के परमाणु कार्यक्रम के जनक डॉ. होमी जहाँगीर भाभा ने 1954 में भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC), मुंबई की स्थापना की, तथा भारत की सीमित यूरेनियम परंतु विशाल थोरियम संपदा (विश्व के कुल थोरियम भंडार का लगभग 25%) को ध्यान में रखते हुए एक दूरदर्शी त्रि-चरणीय कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार की।

भारत के प्रमुख परमाणु ऊर्जा संयंत्रों में तारापुर (महाराष्ट्र), रावतभाटा (राजस्थान) तथा कुडनकुलम (तमिलनाडु, रूस के सहयोग से निर्मित, भारत का सबसे बड़ा परमाणु ऊर्जा परिसर) उल्लेखनीय हैं।

🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
नाभिकीय रिएक्टरमंदकनियंत्रण छड़शीतलकPHWRहोमी भाभाBARCत्रि-चरणीय कार्यक्रमथोरियम
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6विकिरण के प्रकार एवं गुण (Types & Properties of Radiation)

विभिन्न प्रकार के आयनकारी विकिरण अपनी भेदन क्षमता (Penetration Power) व आयनन क्षमता (Ionizing Power) में एक-दूसरे से बहुत भिन्न होते हैं — दिलचस्प बात यह है कि ये दोनों गुण एक-दूसरे के विपरीत अनुपात में होते हैं।

विकिरणआवेशभेदन क्षमताआयनन क्षमताअवरोधक (रोकने हेतु)
अल्फा (α)+2न्यूनतम (कागज़ या त्वचा से रुक जाता है)सर्वाधिककागज़ / त्वचा
बीटा (β)±1मध्यम (लगभग 1m वायु में)मध्यमएल्युमिनियम पत्र (3-5mm)
गामा (γ)0सर्वाधिक (लगभग अनंत)न्यूनतमसीसा (कई सेमी) / मोटा कंक्रीट
न्यूट्रॉन0अत्यधिकपानी / पॉलीएथिलीन
💡 अल्फा विकिरण त्वचा से नहीं भेदता, फिर भी सबसे खतरनाक क्यों माना जाता है?

अल्फा कण का आकार व द्रव्यमान बाकी सभी विकिरणों से बहुत अधिक होने के कारण यह मात्र एक कागज़ की शीट या त्वचा की ऊपरी परत से ही रुक जाता है, इसीलिए बाहरी संपर्क में यह अपेक्षाकृत कम खतरनाक होता है। परंतु यदि अल्फा-उत्सर्जक पदार्थ किसी तरह निगल लिया जाए या साँस के साथ फेफड़ों में चला जाए, तो स्थिति पूर्णतः बदल जाती है — शरीर के भीतर यह अपनी अत्यंत उच्च आयनन क्षमता के कारण आसपास की कोशिकाओं को बेहद तीव्रता से क्षतिग्रस्त करता है, बिना किसी सुरक्षात्मक त्वचा-परत की बाधा के। यही कारण है कि पोलोनियम-210 जैसे अल्फा-उत्सर्जक पदार्थ ऐतिहासिक रूप से घातक विषाक्तीकरण के मामलों में उपयोग किए गए हैं।

🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
अल्फा विकिरणबीटा विकिरणगामा विकिरणभेदन क्षमताआयनन क्षमतान्यूट्रॉन विकिरण
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7विकिरण मापन की इकाइयाँ (Radiation Measurement Units)

विकिरण को विभिन्न पहलुओं से मापने के लिए अलग-अलग इकाइयों का उपयोग किया जाता है — कुछ स्रोत की सक्रियता मापती हैं, तो कुछ शरीर द्वारा अवशोषित वास्तविक खुराक।

इकाईक्या मापती हैविवरण
बेकरल (Bq)रेडियोधर्मी क्षय दर (SI)1 Bq = 1 क्षय/सेकंड
क्यूरी (Ci)रेडियोधर्मी क्षय दर (पुरानी)1 Ci = 3.7×10¹⁰ Bq
ग्रे (Gy)अवशोषित खुराक (SI)1 Gy = 1 जूल/किलोग्राम
रैड (Rad)अवशोषित खुराक (पुरानी)1 rad = 0.01 Gy
सीवर्ट (Sv)प्रभावी खुराक (SI)1 Sv = 100 rem | H = D × WR
रेम (Rem)प्रभावी खुराक (पुरानी)1 rem = 0.01 Sv
वार्षिक विकिरण खुराक सीमा (ICRP मानक): अंतरराष्ट्रीय विकिरण सुरक्षा आयोग (ICRP) के अनुसार सामान्य जनता के लिए वार्षिक सुरक्षित सीमा 1 मिलीसीवर्ट (mSv) प्रति वर्ष तथा विकिरण-कर्मियों (जैसे अस्पताल में X-ray तकनीशियन या परमाणु संयंत्र कर्मी) के लिए यह सीमा 20 mSv प्रति वर्ष (5 वर्षों के औसत के रूप में) निर्धारित की गई है। तुलनात्मक रूप से, भारत में प्राकृतिक पृष्ठभूमि विकिरण स्वयं ही लगभग 1-3 mSv प्रति वर्ष होता है — अर्थात हम सभी पहले से ही प्राकृतिक रूप से कुछ मात्रा में विकिरण के संपर्क में रहते हैं।
🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
बेकरलक्यूरीग्रेसीवर्टICRPवार्षिक खुराक सीमा
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8विकिरण के जैविक प्रभाव (Biological Effects of Radiation)

आयनकारी विकिरण शरीर की कोशिकाओं के DNA को सीधे तोड़ सकता है, या मुक्त मूलक (Free Radicals) उत्पन्न कर परोक्ष रूप से क्षति पहुँचा सकता है — इसके प्रभाव खुराक व समयावधि के आधार पर दो व्यापक वर्गों में बाँटे जाते हैं।

तीव्र प्रभाव (Acute — कम समय में उच्च खुराक)
  • तीव्र विकिरण सिंड्रोम (ARS)
  • मतली → बाल झड़ना → अस्थि-मज्जा क्षति → प्रतिरक्षा कमज़ोर
  • 4-5 Sv पर लगभग 50% मृत्यु दर (30 दिनों में)
  • 10 Sv से अधिक पर मृत्यु लगभग निश्चित
दीर्घकालिक प्रभाव (Chronic/Stochastic)
  • कैंसर — ल्यूकेमिया सबसे पहले (2-5 वर्ष में)
  • आनुवंशिक प्रभाव — जनन कोशिकाओं में उत्परिवर्तन
  • मोतियाबिंद (0.5 Gy से ऊपर)
  • LNT मॉडल — कोई भी खुराक पूर्णतः सुरक्षित नहीं मानी जाती

इतिहास में कुछ गंभीर नाभिकीय दुर्घटनाओं ने विकिरण के इन जैविक प्रभावों को दुखद रूप से प्रदर्शित किया है — चेर्नोबिल (1986, यूक्रेन) व फुकुशिमा दाइची (2011, जापान) दोनों को अंतरराष्ट्रीय नाभिकीय घटना पैमाने (INES) पर सर्वोच्च स्तर 7 (Major Accident) पर वर्गीकृत किया गया, जबकि थ्री माइल आइलैंड (1979, अमेरिका) की घटना स्तर 5 पर आंशिक कोर-पिघलाव के रूप में दर्ज हुई, जिसमें कोई प्रत्यक्ष मृत्यु नहीं हुई।

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तीव्र विकिरण सिंड्रोमLNT मॉडलल्यूकेमियाचेर्नोबिलफुकुशिमाINES पैमाना
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9विकिरण सुरक्षा (Radiation Safety)

विकिरण के जोखिम को न्यूनतम करने के लिए तीन मूल सिद्धांतों का पालन किया जाता है, जिन्हें सरलता से "समय-दूरी-परिरक्षण" (Time-Distance-Shielding, संक्षेप में TDS) के रूप में याद रखा जा सकता है।

📐 व्युत्क्रम वर्ग नियम — सूत्र

I ∝ 1/r² (दूरी 2 गुनी → तीव्रता 4 गुना कम)

ALARA सिद्धांत: ALARA (As Low As Reasonably Achievable) का अर्थ है — विकिरण की खुराक को व्यावहारिक रूप से जितना संभव हो उतना न्यूनतम रखना, भले ही वह निर्धारित सुरक्षा सीमा से काफी नीचे क्यों न हो। भारत में परमाणु सुरक्षा नियामक बोर्ड (AERB) तथा वैश्विक स्तर पर ICRP इसी सिद्धांत के अनुपालन को सुनिश्चित करने वाली प्रमुख संस्थाएँ हैं। विकिरण-कर्मी अपने संपर्क की निगरानी के लिए थर्मोल्यूमिनेसेंट डोसीमीटर (TLD Badge) पहनते हैं, जबकि गीगर-म्यूलर काउंटर विकिरण का पता लगाने व मापने का सर्वाधिक सामान्य उपकरण है।

विकिरण का उपयोग केवल विनाशकारी ही नहीं, अपितु अत्यंत लाभकारी भी है — चिकित्सा क्षेत्र में X-ray, CT, PET स्कैन व गामा नाइफ सर्जरी (जिनका विस्तृत अध्ययन हम पिछले अध्याय में कर चुके हैं), खाद्य संरक्षण (गामा विकिरण से रोगाणु नष्ट करना, WHO द्वारा स्वीकृत), चिकित्सा उपकरणों की रासायनिक-मुक्त नसबंदी, परमाणु कृषि (उत्परिवर्तन प्रजनन से उच्च उत्पादन वाली फसलें विकसित करना) तथा औद्योगिक क्षेत्र में अनाशक परीक्षण (NDT) व धुआँ संसूचक (Smoke Detector) जैसे अनुप्रयोगों में विकिरण मानवता की सेवा करता है।

🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
TDS सिद्धांतव्युत्क्रम वर्ग नियमALARAAERBTLD बैजगीगर-म्यूलर काउंटर
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10प्रमुख वैज्ञानिक एवं नाभिकीय भौतिकी में उनका योगदान

वैज्ञानिक (देश/काल)नाभिकीय भौतिकी में योगदान
हेनरी बेकरल (फ्रांस, 1852–1908)रेडियोधर्मिता की खोज (1896) — नोबेल पुरस्कार (भौतिकी, 1903)
मैरी क्यूरी (पोलैंड/फ्रांस, 1867–1934)पोलोनियम व रेडियम की खोज — नोबेल पुरस्कार भौतिकी (1903) व रसायन (1911), दोनों में
अल्बर्ट आइंस्टीन (जर्मनी, 1879–1955)E=mc² समीकरण (1905) — द्रव्यमान-ऊर्जा तुल्यता का सिद्धांत
ऑटो हान, फ्रिट्ज़ स्ट्रासमान व लीज़े माइटनरनाभिकीय विखंडन की खोज एवं सैद्धांतिक व्याख्या (1938)
एनरिको फर्मी (इटली/अमेरिका, 1901–1954)प्रथम नियंत्रित श्रृंखला अभिक्रिया (1942, शिकागो पाइल-1)
विलार्ड लिब्बी (अमेरिका, 1908–1980)कार्बन-14 डेटिंग तकनीक — नोबेल पुरस्कार (रसायन, 1960)
डॉ. होमी जहाँगीर भाभा (भारत, 1909–1966)भारतीय परमाणु कार्यक्रम के जनक — BARC व TIFR के संस्थापक (1954)

📌 अध्याय सारांश (Chapter Summary)

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