सोचो — साल 1820 में एक प्रोफेसर, हैंस क्रिश्चियन ओर्स्टेड, कक्षा में एक साधारण सा प्रयोग दिखा रहे थे। उन्होंने एक तार में धारा प्रवाहित की, और पास रखी कम्पास सुई अचानक हिलकर एक दिशा में घूम गई। यह एक साधारण संयोग नहीं था — यह उस क्षण था जब विद्युत व चुंबकत्व, जो सदियों से दो अलग-अलग रहस्य माने जाते थे, अचानक एक ही सिक्के के दो पहलू साबित हुए। इसी एक खोज से आगे चलकर विद्युत मोटर, जनरेटर, ट्रांसफार्मर तथा संपूर्ण आधुनिक विद्युत सभ्यता की नींव पड़ी। इस अध्याय में हम इसी विद्युत-चुंबकत्व की पूरी कहानी को गहराई से समझेंगे।
चुंबकत्व वह मूल भौतिक गुण है जिसके कारण कोई पदार्थ लोहे जैसी धातुओं को आकर्षित करने की क्षमता रखता है। प्राकृतिक चुंबक (जैसे लोडस्टोन, Fe₃O₄) प्रकृति में स्वतः पाए जाते हैं, जबकि कृत्रिम चुंबक (बार मैग्नेट, हॉर्सशू मैग्नेट, रिंग मैग्नेट, विद्युत चुंबक) मनुष्य द्वारा बनाए जाते हैं।
चुंबकीय क्षेत्र B — मात्रक: टेस्ला (T) = वेबर/मी² (Wb/m²) | 1 T = 10⁴ गॉस
निर्वात की चुंबकीय पारगम्यता: μ₀ = 4π×10⁻⁷ T·m/A
चुंबकीय फ्लक्स: ΦB = B·A·cosθ | मात्रक: वेबर (Wb)
चुंबकीय द्विध्रुव आघूर्ण: M = m × 2l
चुंबकीय बल रेखाएँ सदैव उत्तर ध्रुव से निकलकर दक्षिण ध्रुव में प्रवेश करती हैं, तथा चुंबक के भीतर से होकर पुनः उत्तर ध्रुव तक पहुँचकर एक बंद वक्र (Closed Loop) बनाती हैं। ये रेखाएँ कभी एक-दूसरे को नहीं काटतीं (क्योंकि किसी बिंदु पर क्षेत्र की दिशा एक ही हो सकती है), तथा जहाँ ये रेखाएँ सघन (पास-पास) होती हैं, वहाँ चुंबकीय क्षेत्र की तीव्रता अधिक होती है।
जब कोई विद्युत धारा किसी तार से प्रवाहित होती है, तो उसके चारों ओर एक चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है — इसी क्षेत्र की सटीक गणना के लिए दो प्रमुख नियम प्रयोग किए जाते हैं।
dB = μ₀/(4π) × (I·dl×r̂)/r²
अनंत सीधे तार से r दूरी पर: B = μ₀I/(2πr) | दिशा: दक्षिण-हस्त अंगूठा नियम
वृत्ताकार पाश के केंद्र पर: B = μ₀I/(2r) | N फेरों के लिए: B = μ₀NI/(2r)
ऐम्पियर के नियम के अनुसार, किसी भी बंद पथ के अनुदिश चुंबकीय क्षेत्र का रेखा-समाकल, उस पथ द्वारा घेरे गए कुल विद्युत धारा के μ₀ गुने के बराबर होता है — यह नियम विशेष रूप से परिनालिका (Solenoid) व टोरॉइड (Toroid) जैसी सममित संरचनाओं में चुंबकीय क्षेत्र ज्ञात करने में अत्यंत उपयोगी है।
∮B·dl = μ₀I
परिनालिका के भीतर: B = μ₀nI (n = प्रति मीटर फेरों की संख्या)
टोरॉइड के भीतर: B = μ₀nI | टोरॉइड के बाहर: B = 0
परिनालिका (तार की कसकर लपेटी गई बेलनाकार कुंडली) में प्रत्येक फेरे से उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्र एक-दूसरे को इस प्रकार प्रबल करते हैं कि भीतर एक सशक्त, एकसमान (Uniform) चुंबकीय क्षेत्र बन जाता है, जबकि बाहर यह क्षेत्र लगभग नगण्य रह जाता है — यही सिद्धांत विद्युत चुंबक (Electromagnet) बनाने में प्रयुक्त होता है, जहाँ नरम लोहे की क्रोड (Soft Iron Core) परिनालिका के भीतर रखकर क्षेत्र की तीव्रता को और भी अधिक बढ़ाया जाता है — क्रेन में भारी लोहे के टुकड़े उठाने से लेकर MRI मशीन व डोरबेल तक, इसी सिद्धांत का उपयोग होता है।
F = q(v × B) = qvB sinθ
जब v ∥ B (θ=0°): F = 0 | जब v ⊥ B (θ=90°): F = qvB (अधिकतम)
साइक्लोट्रॉन में वृत्ताकार पथ की त्रिज्या: r = mv/(qB)
जब किसी विद्युत धारावाही चालक को बाहरी चुंबकीय क्षेत्र में रखा जाता है, तो उस चालक पर एक यांत्रिक बल कार्य करता है — यही सिद्धांत विद्युत मोटर के कार्य करने का आधार है।
F = BIL sinθ
अधिकतम बल (θ=90°, B⊥L): F = BIL | शून्य बल (θ=0°, B∥L): F = 0
अंग्रेज़ वैज्ञानिक जॉन एम्ब्रोस फ्लेमिंग ने दो सरल हस्त-नियम प्रस्तुत किए, जिनकी सहायता से चुंबकीय बल की दिशा तुरंत ज्ञात की जा सकती है — एक मोटर के लिए, दूसरा जनरेटर के लिए।
| विशेषता | वाम हस्त नियम (Motor) | दक्षिण हस्त नियम (Generator) |
|---|---|---|
| हाथ | बायाँ हाथ | दायाँ हाथ |
| तर्जनी (Index) | चुंबकीय क्षेत्र B की दिशा | चुंबकीय क्षेत्र B की दिशा |
| मध्यमा (Middle) | धारा I की दिशा | प्रेरित धारा/EMF की दिशा |
| अंगूठा (Thumb) | बल/गति F की दिशा | चालक की गति v की दिशा |
| ऊर्जा रूपांतरण | विद्युत → यांत्रिक | यांत्रिक → विद्युत |
विद्युत मोटर के भीतर एक धारावाही कुंडली को स्थायी चुंबक के दो ध्रुवों के बीच रखा जाता है। जब कुंडली में धारा प्रवाहित होती है, तो फ्लेमिंग के वाम हस्त नियम के अनुसार कुंडली की दोनों भुजाओं पर विपरीत दिशा में बल लगते हैं, जिससे कुंडली पर एक बल-आघूर्ण (Torque) उत्पन्न होता है और वह घूमने लगती है — इस प्रकार विद्युत ऊर्जा सीधे यांत्रिक गति (घूर्णन) में परिवर्तित हो जाती है। पंखा, वाशिंग मशीन, पानी का पंप तथा इलेक्ट्रिक वाहन (EV) — सभी इसी मूल सिद्धांत पर आधारित हैं, केवल आकार व शक्ति में भिन्नता होती है।
अब तक हमने देखा कि विद्युत धारा चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न कर सकती है (ओर्स्टेड की खोज), परंतु माइकल फैराडे ने 1831 में इसका ठीक विपरीत भी सिद्ध किया — कि बदलता हुआ चुंबकीय क्षेत्र भी विद्युत धारा उत्पन्न कर सकता है। यही खोज आज संपूर्ण विश्व की विद्युत जनरेटर तकनीक की नींव है।
प्रथम नियम: जब भी किसी बंद परिपथ से गुज़रने वाला चुंबकीय फ्लक्स बदलता है, तो उसमें प्रेरित EMF उत्पन्न होता है
द्वितीय नियम: प्रेरित EMF का परिमाण चुंबकीय फ्लक्स के परिवर्तन की दर के बराबर होता है
ε = −N·dΦ/dt (N = कुंडली के फेरों की संख्या)
सूत्र में मौजूद ऋण चिह्न (−) केवल एक गणितीय संकेत नहीं, बल्कि प्रकृति के एक गहरे सिद्धांत को दर्शाता है — जिसे लेंज़ का नियम कहते हैं। इसके अनुसार, प्रेरित धारा की दिशा सदैव ऐसी होती है कि वह उस कारण का ही विरोध करे जिससे वह स्वयं उत्पन्न हुई है। उदाहरण के लिए, यदि किसी कुंडली की ओर चुंबक का उत्तर ध्रुव लाया जाए, तो कुंडली में ऐसी प्रेरित धारा बहती है जो अपने निकट सिरे पर भी उत्तर ध्रुव बना ले — ताकि आते हुए चुंबक को प्रतिकर्षित (विरोध) कर सके।
स्व-प्रेरण: ε = −L·dI/dt | L = स्व-प्रेरकत्व, मात्रक: हेनरी (H)
अन्योन्य-प्रेरण: ε₂ = −M·dI₁/dt | M = अन्योन्य-प्रेरकत्व
स्व-प्रेरण (Self Induction) तब होता है जब किसी कुंडली में स्वयं धारा बदलने से उसी कुंडली में एक विरोधी EMF प्रेरित हो जाता है, जबकि अन्योन्य-प्रेरण (Mutual Induction) में एक कुंडली की बदलती धारा दूसरी (निकट स्थित, विद्युत रूप से असंबद्ध) कुंडली में EMF प्रेरित करती है — यही अन्योन्य-प्रेरण का सिद्धांत ट्रांसफॉर्मर के कार्य करने का मूल आधार है।
जब किसी बड़े ठोस धात्विक पिंड से गुज़रने वाला चुंबकीय क्षेत्र बदलता है, तो उस पिंड के भीतर भी फैराडे के नियम के अनुसार धाराएँ प्रेरित होती हैं, जो भँवर (Vortex) के आकार में प्रवाहित होती हैं — इन्हें भँवर धाराएँ (Eddy Currents) या फूको धाराएँ कहते हैं। यह घटना कहीं हानिकारक तो कहीं अत्यंत उपयोगी सिद्ध होती है।
प्रत्यावर्ती धारा (AC) वह धारा है जिसका परिमाण व दिशा समय के साथ नियमित रूप से बदलती रहती है — भारत में घरेलू आपूर्ति 220V (rms मान) तथा 50 Hz आवृत्ति पर होती है, अर्थात दिशा 1 सेकंड में 50 बार बदलती है।
I = I₀ sin(ωt)
rms मान: I_rms = I₀/√2 ≈ 0.707 I₀ | शिखर मान: V₀ = V_rms × √2 ≈ 220×1.414 ≈ 311 V
प्रतिघात: X_L = ωL (प्रेरकीय) | X_C = 1/(ωC) (धारितीय)
प्रतिबाधा: Z = √(R² + (X_L−X_C)²)
शक्ति गुणांक: cosφ = R/Z
अनुनाद (जब X_L=X_C, Z न्यूनतम=R): f₀ = 1/(2π√LC)
जब हम रेडियो पर किसी विशेष स्टेशन की फ्रीक्वेंसी सेट करते हैं, तो वास्तव में हम रेडियो के भीतरी LCR परिपथ के L या C का मान समायोजित कर रहे होते हैं, ताकि उस परिपथ की अनुनाद आवृत्ति ठीक उसी स्टेशन की प्रसारण आवृत्ति के बराबर हो जाए — अनुनाद की स्थिति में ही उस विशेष आवृत्ति का सिग्नल सबसे प्रबल रूप से ग्रहण होता है, जबकि अन्य सभी आवृत्तियों के सिग्नल दब जाते हैं, इसीलिए हमें एक साफ, स्पष्ट स्टेशन सुनाई देता है।
ट्रांसफॉर्मर अन्योन्य-प्रेरण के सिद्धांत पर कार्य करता है — यह प्राथमिक कुंडली में प्रवाहित बदलती AC धारा से उत्पन्न चुंबकीय फ्लक्स को द्वितीयक कुंडली से जोड़कर, द्वितीयक कुंडली में एक नया वोल्टेज प्रेरित करता है, जिसका परिमाण दोनों कुंडलियों के फेरों की संख्या के अनुपात पर निर्भर करता है।
V₁/V₂ = N₁/N₂ = I₂/I₁
| प्रकार | फेरों का अनुपात | उपयोग |
|---|---|---|
| स्टेप-अप ट्रांसफॉर्मर | N₂ > N₁ → V₂ > V₁, I₂ < I₁ | बिजलीघर से पावर ग्रिड में 11 kV → 220 kV भेजना |
| स्टेप-डाउन ट्रांसफॉर्मर | N₂ < N₁ → V₂ < V₁, I₂ > I₁ | 220 kV → 33 kV → 11 kV → 220V (घर तक पहुँचाना) |
लंबी दूरी तक बिजली भेजने में तारों में जूल-तापन (I²R) के कारण ऊर्जा-हानि होती है। यदि समान शक्ति (P=VI) को उच्च वोल्टेज (V) पर भेजा जाए, तो धारा (I) उसी अनुपात में घट जाती है, और चूँकि हानि I² के अनुक्रमानुपाती होती है (न कि I के), इसलिए धारा को घटाकर हानि को नाटकीय रूप से कम किया जा सकता है। इसीलिए बिजलीघर से पहले स्टेप-अप ट्रांसफॉर्मर द्वारा वोल्टेज को हज़ारों वोल्ट तक बढ़ाया जाता है, और घर तक पहुँचने से पहले स्टेप-डाउन ट्रांसफॉर्मर द्वारा इसे वापस सुरक्षित 220V तक घटाया जाता है।
पृथ्वी स्वयं एक विशाल चुंबक की भाँति व्यवहार करती है — दिलचस्प बात यह है कि पृथ्वी का भौगोलिक उत्तरी ध्रुव वास्तव में चुंबकीय रूप से दक्षिण ध्रुव जैसा व्यवहार करता है (इसीलिए कम्पास की सुई का उत्तरी सिरा उसकी ओर आकर्षित होकर उत्तर दिशा दिखाता है)। इस चुंबकत्व का मुख्य कारण डायनेमो सिद्धांत (Dynamo Theory) माना जाता है — पृथ्वी के तरल बाह्य क्रोड में पिघले लोहे-निकल के संवहन तथा पृथ्वी के घूर्णन से यह विशाल चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न होता है। पृथ्वी के चुंबकीय ध्रुव भौगोलिक ध्रुवों से लगभग 11.5° झुके हुए हैं।
| चुंबकीय तत्व | परिभाषा |
|---|---|
| दिक्पात (Declination) | किसी स्थान पर चुंबकीय याम्योत्तर व भौगोलिक याम्योत्तर के बीच का कोण — नौवहन (Navigation) में उपयोगी |
| नमन/नति (Dip/Inclination) | चुंबकीय क्षेत्र B का क्षैतिज तल के साथ बनने वाला कोण — चुंबकीय ध्रुव पर 90°, विषुवत रेखा पर 0° |
| क्षैतिज घटक (H) | B का क्षैतिज तल में घटक — H = B cos I |
| ऊर्ध्वाधर घटक (V) | B का ऊर्ध्वाधर तल में घटक — V = B sin I |
सभी पदार्थ बाहरी चुंबकीय क्षेत्र के प्रति एक-समान प्रतिक्रिया नहीं देते — उनके भीतर इलेक्ट्रॉनों की चुंबकीय व्यवस्था के आधार पर पदार्थों को तीन मुख्य वर्गों में बाँटा गया है।
| गुण | प्रतिचुंबकीय (Diamagnetic) | अनुचुंबकीय (Paramagnetic) | लौह-चुंबकीय (Ferromagnetic) |
|---|---|---|---|
| क्षेत्र से व्यवहार | दुर्बल प्रतिकर्षित | दुर्बल आकर्षित | प्रबल आकर्षित |
| ताप का प्रभाव | नगण्य | χ∝1/T (क्यूरी नियम) | Tc पर अनुचुंबकीय बन जाता है |
| उदाहरण | Cu, Ag, Au, जल | Al, Na, O₂ | Fe, Co, Ni |
χ = C/T (χ=चुंबकीय प्रवृत्ति, C=क्यूरी स्थिरांक, T=परम ताप)
क्यूरी ताप (Tc): लोहा 1043 K | निकेल 631 K | कोबाल्ट 1388 K
जब किसी लौह-चुंबकीय पदार्थ को बार-बार चुंबकीय चक्र (चुंबकित करना, फिर विचुंबकित करना) से गुज़ारा जाता है, तो कुछ ऊर्जा प्रत्येक चक्र में अनिवार्य रूप से नष्ट होती है — इसे हिस्टेरिसिस हानि कहते हैं। इससे जुड़े दो महत्वपूर्ण गुण हैं — धारणशीलता (Retentivity: बाहरी क्षेत्र हटाने के बाद भी शेष रह जाने वाला चुंबकत्व) तथा निग्राहिता (Coercivity: चुंबकत्व को पूर्णतः शून्य करने के लिए आवश्यक विपरीत क्षेत्र)।
स्कॉटिश भौतिकशास्त्री जेम्स क्लर्क मैक्सवेल ने 1860 के दशक में एक क्रांतिकारी सिद्धांत प्रस्तुत किया — उन्होंने गणितीय रूप से सिद्ध किया कि एक परिवर्तनशील विद्युत क्षेत्र अपने चारों ओर एक चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न करता है, और एक परिवर्तनशील चुंबकीय क्षेत्र भी अपने चारों ओर विद्युत क्षेत्र उत्पन्न करता है — यह परस्पर उत्पादन एक स्वतः-सतत तरंग बना देता है, जो बिना किसी माध्यम के भी अंतरिक्ष में यात्रा कर सकती है। इसी को विद्युत-चुंबकीय तरंग कहा जाता है, जिसमें विद्युत क्षेत्र (E) व चुंबकीय क्षेत्र (B) परस्पर लंबवत तथा तरंग की गति की दिशा से भी लंबवत दोलन करते हैं।
c = 1/√(μ₀ε₀) = 3×10⁸ मीटर/सेकंड
c = f × λ
मैक्सवेल का एक अन्य महत्वपूर्ण योगदान विस्थापन धारा (Displacement Current) की अवधारणा है, जिसने ऐम्पियर के मूल नियम में एक आवश्यक सुधार जोड़ा — यह उन परिस्थितियों की व्याख्या करने में सक्षम बना जहाँ संधारित्र जैसे उपकरणों में कोई वास्तविक चालन-धारा नहीं होती, फिर भी क्षेत्र में परिवर्तन होता रहता है।
| तरंग | तरंगदैर्ध्य | मुख्य उपयोग |
|---|---|---|
| रेडियो तरंगें | > 0.1 मीटर | AM/FM रेडियो, TV प्रसारण, रडार |
| सूक्ष्म तरंगें (Microwave) | 1mm–0.1m | माइक्रोवेव ओवन, सैटेलाइट संचार, रडार |
| अवरक्त (Infrared) | 700nm–1mm | थर्मल इमेजिंग, TV रिमोट, नाइट विज़न |
| दृश्य प्रकाश | 400–700 nm | मानव नेत्र, फोटोग्राफी, सोलर सेल |
| पराबैंगनी (UV) | 10–400 nm | ओज़ोन परत अवशोषण, स्टेरिलाइज़ेशन |
| X-किरणें | 0.01–10 nm | चिकित्सा इमेजिंग, विमानतल सुरक्षा जाँच |
| गामा किरणें | < 0.01 nm | नाभिकीय क्षय, कैंसर उपचार, स्टेरिलाइज़ेशन |
तरंगदैर्ध्य के घटते क्रम में (अर्थात आवृत्ति के बढ़ते क्रम में) EM स्पेक्ट्रम का क्रम है — रेडियो, सूक्ष्म तरंग, अवरक्त, दृश्य प्रकाश, पराबैंगनी, X-किरण, गामा किरण। ध्यान रहे कि तरंगदैर्ध्य जितनी कम होगी, ऊर्जा (E=hf, जहाँ f=c/λ) उतनी ही अधिक होगी — इसीलिए गामा किरणें सबसे अधिक ऊर्जावान व हानिकारक (आयनकारी) होती हैं, जबकि रेडियो तरंगें सबसे कम ऊर्जावान व सुरक्षित होती हैं।
| वैज्ञानिक (देश/काल) | विद्युत-चुंबकत्व में योगदान |
|---|---|
| हैंस क्रिश्चियन ओर्स्टेड (डेनमार्क, 1777–1851) | 1820: धारावाही तार के निकट चुंबकीय क्षेत्र की खोज — विद्युत-चुंबकत्व का प्रथम प्रमाण |
| आंद्रे-मैरी एम्पीयर (फ्रांस, 1775–1836) | ऐम्पियर का परिपथीय नियम, परिनालिका का सिद्धांत |
| माइकल फैराडे (इंग्लैंड, 1791–1867) | विद्युत-चुंबकीय प्रेरण के नियम (1831), फैराडे केज |
| हाइनरिष लेंज़ (रूस/जर्मनी, 1804–1865) | लेंज़ का नियम (1834) — प्रेरित धारा की दिशा व ऊर्जा-संरक्षण |
| जेम्स क्लर्क मैक्सवेल (स्कॉटलैंड, 1831–1879) | EM तरंगों की भविष्यवाणी, 4 मैक्सवेल समीकरण, विस्थापन धारा |
| जॉन एम्ब्रोस फ्लेमिंग (इंग्लैंड, 1849–1945) | फ्लेमिंग के वाम व दक्षिण हस्त नियम |
| निकोला टेस्ला (सर्बिया/अमेरिका, 1856–1943) | AC मोटर व जनरेटर, प्रत्यावर्ती धारा प्रणाली |
| हाइनरिष हर्ट्ज़ (जर्मनी, 1857–1894) | EM तरंगों का प्रायोगिक प्रदर्शन (1887); हर्ट्ज़ (Hz) मात्रक इन्हीं के नाम पर |