🔥 अध्याय 5/10 — भौतिक विज्ञान

ऊष्मा

Heat | RAS Pre + Mains
📋 इस अध्याय में
  1. ऊष्मा एवं तापमान — परिचय (Heat & Temperature)
  2. ऊष्मा स्थानांतरण की विधियाँ (Modes of Heat Transfer)
  3. विशिष्ट ऊष्मा धारिता (Specific Heat Capacity)
  4. अवस्था परिवर्तन (Change of State)
  5. ऊष्मागतिकी के नियम (Laws of Thermodynamics)
  6. तापीय प्रसार (Thermal Expansion)
  7. ग्रीनहाउस प्रभाव एवं ग्लोबल वार्मिंग (Greenhouse Effect & Global Warming)
  8. प्रमुख वैज्ञानिक एवं ऊष्मा में उनका योगदान
🌟 क्या आप जानते हैं?

सोचो — सर्दियों में समुद्र किनारे के शहर गर्मी की तुलना में हमेशा अपेक्षाकृत सुहाने रहते हैं, जबकि रेगिस्तान में दिन में झुलसती गर्मी और रात में कड़कड़ाती ठंड दोनों झेलनी पड़ती है। यह अंतर किसी संयोग का नहीं, बल्कि पानी की एक अद्भुत भौतिक विशेषता — उसकी उच्च विशिष्ट ऊष्मा धारिता — का परिणाम है। इस अध्याय में हम ऊष्मा (Heat) और तापमान (Temperature) के भेद से लेकर ऊष्मागतिकी के नियमों तक की पूरी यात्रा करेंगे, जो न केवल परीक्षा बल्कि प्रेशर कुकर से लेकर ग्लोबल वार्मिंग तक — रोज़मर्रा की हर घटना को समझाती है।

1ऊष्मा एवं तापमान — परिचय (Heat & Temperature)

रोज़मर्रा की भाषा में हम प्रायः "गर्मी" व "तापमान" को एक ही अर्थ में उपयोग कर लेते हैं, परंतु भौतिकी की दृष्टि से ये दोनों पूर्णतः भिन्न राशियाँ हैं। ऊष्मा (Heat) वह ऊर्जा है जो तापमान के अंतर के कारण एक वस्तु से दूसरी वस्तु में स्थानांतरित होती है — यह एक "ऊर्जा का प्रवाह" है, जिसका SI मात्रक जूल (Joule) है (पुराना मात्रक कैलोरी, 1 कैलोरी = 4.18 जूल)। दूसरी ओर, तापमान (Temperature) किसी वस्तु के कणों की औसत गतिज ऊर्जा का माप है — यह बताता है कि वस्तु "कितनी गर्म" है, इसका SI मात्रक केल्विन (Kelvin) है।

💡 1 किलोग्राम पानी बनाम 1 ग्राम पानी — कौन अधिक "गर्म"?

यदि 1 किलोग्राम पानी और 1 ग्राम पानी दोनों को समान तापमान (मान लीजिए 60°C) पर रखा जाए, तो दोनों का तापमान बराबर होगा — अर्थात दोनों में कणों की औसत गतिज ऊर्जा समान होगी। परंतु 1 किलोग्राम पानी में कहीं अधिक कण (अणु) होने के कारण उसमें संचित कुल ऊष्मा ऊर्जा 1 ग्राम पानी से 1000 गुना अधिक होगी — यही कारण है कि तापमान समान होते हुए भी दोनों को छूने पर अलग अनुभव नहीं होगा, लेकिन बड़ी मात्रा वाला पानी ठंडा होने में कहीं अधिक समय लेगा, क्योंकि उसमें ऊष्मा ऊर्जा कहीं अधिक संचित है।

1.1 तापमान के पैमाने (Temperature Scales)

पैमानाहिमांक / क्वथनांकविशेषता
सेल्सियस (Celsius, °C)0°C / 100°Cसर्वाधिक प्रचलित, दैनिक जीवन व विज्ञान में उपयोग
फारेनहाइट (Fahrenheit, °F)32°F / 212°Fमुख्यतः अमेरिका में प्रचलित
केल्विन (Kelvin, K)273.15K / 373.15KSI मात्रक, परम पैमाना — 0K = परम शून्य, ऋणात्मक केल्विन असंभव
📐 पैमाना परिवर्तन सूत्र — सूत्र

°F = (9/5)×°C + 32
°C = (5/9)×(°F − 32)
K = °C + 273

परम शून्य (Absolute Zero): 0 केल्विन (−273.15°C) वह सैद्धांतिक तापमान है जिस पर किसी पदार्थ के कणों की गतिज ऊर्जा पूर्णतः शून्य हो जाती है — अर्थात कण पूर्ण विराम में आ जाते हैं। यही कारण है कि केल्विन पैमाने पर इससे नीचे (ऋणात्मक) तापमान संभव ही नहीं है, जबकि सेल्सियस व फारेनहाइट पैमानों पर ऋणात्मक मान सामान्य हैं क्योंकि उनका शून्य-बिंदु मनमाना (जल के हिमांक पर आधारित) है, परम शून्य पर नहीं।
🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
ऊष्मातापमानजूलकेल्विनसेल्सियसफारेनहाइटपरम शून्य
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2ऊष्मा स्थानांतरण की विधियाँ (Modes of Heat Transfer)

ऊष्मा सदैव अधिक तापमान वाले क्षेत्र से कम तापमान वाले क्षेत्र की ओर प्रवाहित होती है, और यह स्थानांतरण तीन भिन्न-भिन्न विधियों से हो सकता है — चालन, संवहन तथा विकिरण। तीनों विधियों के कार्य करने का ढंग तथा उनकी शर्तें अलग-अलग हैं।

2.1 चालन (Conduction)

चालन ठोस पदार्थों में होने वाली ऊष्मा स्थानांतरण की विधि है, जिसमें कण अपने स्थान पर स्थिर रहते हुए केवल अधिक कंपन करने लगते हैं, और यह कंपन-ऊर्जा एक कण से सटे दूसरे कण में स्थानांतरित होती चली जाती है — अर्थात कणों का वास्तविक स्थानांतरण (बल्क मूवमेंट) नहीं होता, केवल ऊर्जा आगे बढ़ती है। धातुएँ सामान्यतः उत्तम चालक होती हैं (सोना > चाँदी > ताँबा > एल्युमिनियम > लोहा, चालकता के घटते क्रम में), जबकि लकड़ी, प्लास्टिक, रबर, अभ्रक (Asbestos), ऊन तथा काँच कुचालक (Insulators) माने जाते हैं।

📐 फूरियर का चालन नियम — सूत्र

Q/t = kA(ΔT/Δx) (k=तापीय चालकता, A=अनुप्रस्थ काट क्षेत्रफल, ΔT=तापांतर, Δx=मोटाई)

2.2 संवहन (Convection)

संवहन तरल पदार्थों (द्रव व गैस) में होने वाली ऊष्मा स्थानांतरण की विधि है, जिसमें गर्म कण वास्तव में अपने स्थान से हटकर ऊपर उठते हैं (क्योंकि गर्म होने पर घनत्व घट जाता है) तथा ठंडे व सघन कण नीचे आ जाते हैं — इस प्रकार कणों का वास्तविक बल्क-प्रवाह (Bulk Flow) होता है। प्राकृतिक संवहन के उदाहरण में सागर व स्थल समीर तथा वायुमंडलीय परिसंचरण शामिल हैं, जबकि पंखा, कूलर व रेडिएटर बलात् संवहन (Forced Convection) के उदाहरण हैं।

2.3 विकिरण (Radiation)

विकिरण वह एकमात्र ऊष्मा स्थानांतरण विधि है जिसे किसी माध्यम की आवश्यकता नहीं होती — यह विद्युत-चुंबकीय तरंगों (मुख्यतः अवरक्त तरंगों) के रूप में निर्वात में भी यात्रा कर सकती है। यही कारण है कि सूर्य की ऊष्मा, निर्वात से भरे अंतरिक्ष को पार करके, विकिरण द्वारा ही पृथ्वी तक पहुँचती है — न चालन से (क्योंकि बीच में कोई ठोस माध्यम नहीं) न संवहन से (क्योंकि बीच में कोई तरल/गैस माध्यम नहीं)। काली व खुरदरी सतहें (कृष्णिका/Black Body) ऊष्मा विकिरण को सबसे अधिक अवशोषित व उत्सर्जित करती हैं, जबकि सफ़ेद व चमकीली सतहें सबसे कम।

📐 विकिरण के नियम — सूत्र

स्टीफन-बोल्ट्ज़मान नियम: P = σAT⁴ (σ = 5.67×10⁻⁸ W/m²K⁴)
वीन का विस्थापन नियम: λmax × T = b (b = 2.898×10⁻³ मीटर-केल्विन)

विशेषताचालनसंवहनविकिरण
माध्यम आवश्यक?हाँ (ठोस)हाँ (द्रव/गैस)नहीं
कण गतिकेवल कंपनवास्तविक प्रवाहकोई कण गति नहीं (तरंग)
गतिधीमीमध्यमप्रकाश के वेग के समान
निर्वात में संभव?नहींनहींहाँ
🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
चालनसंवहनविकिरणफूरियर नियमकृष्णिकास्टीफन-बोल्ट्ज़मान नियमवीन का नियम
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3विशिष्ट ऊष्मा धारिता (Specific Heat Capacity)

विशिष्ट ऊष्मा धारिता वह ऊष्मा मात्रा है जो किसी पदार्थ के 1 किलोग्राम द्रव्यमान का तापमान 1 केल्विन (या 1°C) बढ़ाने के लिए आवश्यक होती है, इसका मात्रक जूल प्रति किलोग्राम-केल्विन (J/(kg·K)) है। यह किसी पदार्थ की एक आंतरिक विशेषता है — भिन्न-भिन्न पदार्थों की विशिष्ट ऊष्मा धारिता बहुत भिन्न होती है, जो यह बताती है कि वह पदार्थ ऊष्मा ग्रहण करने पर कितनी "आसानी" या "कठिनाई" से गर्म होता है।

📐 विशिष्ट ऊष्मा एवं ऊष्मा धारिता — सूत्र

Q = mcΔT (m=द्रव्यमान, c=विशिष्ट ऊष्मा, ΔT=तापांतर)
ऊष्मा धारिता: C = mc | मात्रक: J/K

पदार्थविशिष्ट ऊष्मा (J/(kg·K))
पानी (Water)4200 — सर्वाधिक सामान्य पदार्थों में
बर्फ (Ice)2100
भाप (Steam)2010
एल्युमिनियम900
लोहा/स्टील490
ताँबा385
सोना129
काँच840
💡 पानी की उच्च विशिष्ट ऊष्मा — तटीय जलवायु का रहस्य

पानी की विशिष्ट ऊष्मा (4200 J/(kg·K)) लगभग सभी सामान्य पदार्थों से कहीं अधिक है — इसका अर्थ है कि पानी को गर्म होने या ठंडा होने में असाधारण रूप से अधिक ऊष्मा ऊर्जा ग्रहण या त्यागनी पड़ती है। यही कारण है कि समुद्र किनारे बसे शहरों की जलवायु समशीतोष्ण (न बहुत गर्म, न बहुत ठंडी) रहती है — दिन में समुद्र धीरे-धीरे गर्म होकर स्थल की अतिरिक्त गर्मी सोख लेता है, तथा रात/सर्दी में धीरे-धीरे ठंडा होकर संचित ऊष्मा वापस छोड़ता है। इसी गुण के कारण पानी (या जल-आधारित तरल) वाहनों के रेडिएटर में शीतलक (Coolant) के रूप में भी उपयोग होता है।

3.1 ऊष्मामिति (Calorimetry)

ऊष्मामिति का मूल सिद्धांत ऊर्जा-संरक्षण के नियम पर आधारित है — जब एक गर्म वस्तु को एक ठंडी वस्तु के संपर्क में लाया जाता है (और कोई ऊष्मा-हानि बाहर न हो), तो गर्म वस्तु द्वारा त्यागी गई ऊष्मा ठीक उतनी ही मात्रा में ठंडी वस्तु द्वारा ग्रहण की जाती है, जब तक दोनों एक उभयनिष्ठ (सामान्य) तापमान पर संतुलन (Thermal Equilibrium) प्राप्त न कर लें।

📐 ऊष्मामिति सिद्धांत — सूत्र

गर्म वस्तु द्वारा त्यागी ऊष्मा = ठंडी वस्तु द्वारा ग्रहण की ऊष्मा
m₁c₁(T₁−T) = m₂c₂(T−T₂)

🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
विशिष्ट ऊष्मा धारिताऊष्मा धारिताऊष्मामितिऊष्मीय संतुलन
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4अवस्था परिवर्तन (Change of State)

पदार्थ सामान्यतः तीन अवस्थाओं — ठोस, द्रव व गैस — में पाया जाता है, तथा ऊष्मा देने या निकालने पर यह एक अवस्था से दूसरी अवस्था में परिवर्तित हो सकता है। इस परिवर्तन के दौरान एक दिलचस्प घटना घटती है — अवस्था परिवर्तन के समय तापमान स्थिर रहता है, भले ही ऊष्मा लगातार दी या ली जा रही हो।

प्रक्रियाअवस्था परिवर्तन
गलन (Melting/Fusion)ठोस → द्रव
वाष्पीकरण (Vaporisation)द्रव → गैस
उर्ध्वपातन (Sublimation)ठोस → गैस (सीधे, द्रव अवस्था के बिना)
निक्षेपण (Deposition)गैस → ठोस (सीधे)
हिमीकरण (Freezing)द्रव → ठोस
संघनन (Condensation)गैस → द्रव
📐 गुप्त ऊष्मा (Latent Heat) — सूत्र

Q = mL (अवस्था परिवर्तन के दौरान तापमान अपरिवर्तित रहता है)
जल की गुप्त ऊष्मा (गलन): Lf = 3.36×10⁵ J/kg (80 cal/g)
जल की गुप्त ऊष्मा (वाष्पीकरण): Lv = 22.6×10⁵ J/kg (540 cal/g)

💡 भाप से जलना, उबलते पानी से जलने से अधिक खतरनाक क्यों?

जल की वाष्पीकरण गुप्त ऊष्मा (Lv=540 cal/g) उसकी गलन गुप्त ऊष्मा (Lf=80 cal/g) से लगभग 7 गुना अधिक है — अर्थात 100°C भाप में 100°C पानी की तुलना में कहीं अधिक अतिरिक्त ऊर्जा (गुप्त ऊष्मा के रूप में) संचित होती है। जब यह भाप त्वचा के संपर्क में आकर द्रव में संघनित होती है, तो यह विशाल अतिरिक्त ऊर्जा त्वचा को हस्तांतरित हो जाती है, जिससे भाप से जलना उतने ही तापमान के उबलते पानी से जलने की तुलना में कहीं अधिक गंभीर होता है।

उर्ध्वपातन (Sublimation) के सामान्य उदाहरणों में कपूर (Camphor), नैफ्थलीन की गोलियाँ, शुष्क बर्फ (Dry Ice, ठोस CO₂ जो −78.5°C पर सीधे गैस बन जाती है) तथा आयोडीन (जो गर्म करने पर सीधे बैंगनी रंग की वाष्प बनाता है) शामिल हैं।

4.1 वाष्पीकरण बनाम क्वथन (Evaporation vs Boiling)

वाष्पीकरण (Evaporation)
  • किसी भी तापमान पर होता है
  • केवल द्रव की सतह पर होता है
  • ठंडक उत्पन्न करता है (जैसे पसीना सूखने पर ठंडक)
क्वथन (Boiling)
  • केवल एक निश्चित (क्वथनांक) तापमान पर होता है
  • पूरे द्रव में होता है (बुलबुले बनते हैं)
  • दाब बढ़ने पर क्वथनांक बढ़ जाता है (प्रेशर कुकर का सिद्धांत)
🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
गलनवाष्पीकरणउर्ध्वपातनसंघननगुप्त ऊष्मावाष्पीकरण बनाम क्वथन
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5ऊष्मागतिकी के नियम (Laws of Thermodynamics)

ऊष्मागतिकी वह शाखा है जो ऊष्मा, कार्य व ऊर्जा के परस्पर रूपांतरण को नियंत्रित करने वाले मौलिक नियमों का अध्ययन करती है। इसके चार नियम हैं — प्रत्येक एक अलग व मौलिक भौतिक सत्य को स्थापित करता है।

📐 कार्नो इंजन एवं दक्षता — सूत्र

कार्नो दक्षता: η = 1 − T₂/T₁ (T₁,T₂ केल्विन में — स्रोत व सिंक तापमान)
रेफ्रिजरेटर का COP: COP = Q₂/W = T₂/(T₁−T₂)

💡 रेफ्रिजरेटर — उलटा ऊष्मा इंजन

रेफ्रिजरेटर वास्तव में ऊष्मा इंजन का विपरीत कार्य करता है — यह बाहरी विद्युत ऊर्जा (कार्य W) खर्च करके ठंडे फ्रिज के भीतरी भाग से ऊष्मा खींचकर बाहरी गर्म वातावरण में फेंकता है, जो द्वितीय नियम के अनुसार स्वतः कभी नहीं हो सकता (ठंडे से गर्म की ओर बिना बाहरी कार्य के ऊष्मा प्रवाह असंभव है) — इसीलिए फ्रिज को निरंतर बिजली की आवश्यकता होती है, और फ्रिज के पीछे का रेडिएटर छूने पर गर्म प्रतीत होता है, क्योंकि वहीं से भीतर की ऊष्मा बाहर निकल रही होती है।

🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
शून्यवाँ नियमप्रथम नियमद्वितीय नियमतृतीय नियमएन्ट्रॉपीकार्नो इंजनरेफ्रिजरेटर
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6तापीय प्रसार (Thermal Expansion)

जब किसी पदार्थ को गर्म किया जाता है, तो उसके कणों की गतिज ऊर्जा बढ़ जाती है, जिससे वे अधिक तीव्रता से कंपन करने लगते हैं और आपस में अधिक दूरी बना लेते हैं — इसी कारण पदार्थ का आकार बढ़ जाता है, जिसे तापीय प्रसार कहते हैं। ठोस पदार्थों में यह प्रसार तीन प्रकार से मापा जा सकता है — रैखिक (लंबाई में), क्षेत्रीय (क्षेत्रफल में) तथा आयतन (आयतन में) प्रसार।

📐 तापीय प्रसार गुणांक — सूत्र

रैखिक प्रसार: ΔL = L₀αΔT
क्षेत्रीय प्रसार: ΔA = A₀βΔT (β = 2α)
आयतन प्रसार: ΔV = V₀γΔT (γ = 3α)
अनुपात: α : β : γ = 1 : 2 : 3

जल का असंगत प्रसार (Anomalous Expansion of Water): सामान्यतः पदार्थ गर्म होने पर फैलते हैं और ठंडा होने पर सिकुड़ते हैं, परंतु पानी इस नियम का एक असाधारण अपवाद है — जब पानी को 0°C से गर्म किया जाता है, तो 4°C तक पहुँचने तक यह वास्तव में सिकुड़ता (संकुचित होता) है, तथा 4°C पर इसका घनत्व अधिकतम (1000 kg/m³) होता है; इसके बाद 4°C से आगे गर्म करने पर यह सामान्य पदार्थों की तरह फैलने लगता है। इसी असंगत गुण के कारण सर्दियों में तालाब की सतह जमकर बर्फ बन जाती है, परंतु तली में पानी 4°C पर बना रहता है (क्योंकि यह सबसे सघन है और नीचे बैठ जाता है) — यही जलीय जीवन को बर्फीली सर्दियों में भी जीवित रहने में सक्षम बनाता है।
💡 रेल पटरियों में जोड़ों पर खाली जगह क्यों छोड़ी जाती है?

गर्मियों में तेज़ धूप से रेल की पटरियाँ गर्म होकर रैखिक रूप से फैलती हैं। यदि पटरियों को बिना किसी अंतराल के लगातार जोड़ दिया जाए, तो प्रसार के कारण उत्पन्न विशाल आंतरिक बल पटरियों को मोड़ या टेढ़ा कर सकता है, जिससे रेल दुर्घटना का खतरा बढ़ जाता है — इसीलिए पटरियों के जोड़ों पर जान-बूझकर एक छोटा सा अंतराल (Expansion Gap) छोड़ा जाता है, ताकि गर्मी में फैलते समय पटरी को समायोजित होने की जगह मिल सके। इसी सिद्धांत का उपयोग सेतुओं व कंक्रीट सड़कों में एक्सपेंशन जॉइंट्स में तथा थर्मोस्टेट में द्विधात्विक पट्टी (Bimetallic Strip) में भी होता है।

🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
तापीय प्रसाररैखिक प्रसारक्षेत्रीय प्रसारआयतन प्रसारजल का असंगत प्रसारअधिकतम घनत्व 4°C
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7ग्रीनहाउस प्रभाव एवं ग्लोबल वार्मिंग (Greenhouse Effect & Global Warming)

ग्रीनहाउस प्रभाव एक प्राकृतिक व आवश्यक परिघटना है, जिसके बिना पृथ्वी का औसत तापमान लगभग −18°C होता (अत्यंत ठंडा व जीवन के लिए असंभव), परंतु वायुमंडल में उपस्थित कुछ गैसें सूर्य से आने वाली लघु-तरंगदैर्ध्य विकिरण को तो आने देती हैं, परंतु पृथ्वी की सतह से परावर्तित दीर्घ-तरंगदैर्ध्य (अवरक्त) विकिरण को अवशोषित कर वापस पृथ्वी की ओर भेज देती हैं — इस प्राकृतिक "कंबल प्रभाव" के कारण ही पृथ्वी का औसत तापमान लगभग 15°C बना रहता है, जो जीवन के अनुकूल है।

समस्या तब उत्पन्न होती है जब मानवीय गतिविधियों (जीवाश्म ईंधन दहन, वनोन्मूलन, औद्योगीकरण) के कारण इन ग्रीनहाउस गैसों की वायुमंडलीय मात्रा असामान्य रूप से बढ़ जाती है, जिससे यह प्राकृतिक कंबल-प्रभाव अत्यधिक तीव्र हो जाता है और पृथ्वी के औसत तापमान में निरंतर वृद्धि होने लगती है — इसे ही ग्लोबल वार्मिंग कहा जाता है।

ग्रीनहाउस गैससापेक्ष योगदान/प्रभाव
जलवाष्प (Water Vapour)सबसे प्रचुर प्राकृतिक ग्रीनहाउस गैस
कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂)मानवजनित उत्सर्जन में सबसे बड़ा योगदान (लगभग 72%)
मीथेन (CH₄)CO₂ से लगभग 25 गुना अधिक ऊष्मा-रोधी प्रभाव
नाइट्रस ऑक्साइड (N₂O)CO₂ से लगभग 298 गुना अधिक प्रभावी
क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFC)CO₂ से 4000 से 12000 गुना तक अधिक प्रभावी

ग्लोबल वार्मिंग के परिणामस्वरूप ध्रुवीय बर्फ का पिघलना, समुद्र-तल में वृद्धि, मौसम-चक्र में अनियमितता तथा जैव-विविधता की क्षति जैसी गंभीर समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं। इस संकट से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रियो पृथ्वी सम्मेलन (1992), क्योटो प्रोटोकॉल (1997) तथा पेरिस समझौता (2015) जैसे प्रयास किए गए हैं — भारत ने पेरिस समझौते के तहत वर्ष 2030 तक 500 गीगावाट अक्षय ऊर्जा क्षमता स्थापित करने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है।

समाधान के उपाय
  • अक्षय ऊर्जा (सौर, पवन) को बढ़ावा
  • वनरोपण एवं वन-संरक्षण
  • विद्युत वाहनों (EV) को प्रोत्साहन
  • कार्बन पृथक्करण (Carbon Sequestration) तकनीक
प्रमुख प्रभाव
  • ध्रुवीय बर्फ का पिघलना
  • समुद्र-तल में वृद्धि
  • चरम मौसम घटनाएँ
  • जैव-विविधता की क्षति
🔑 महत्वपूर्ण शब्द (Keywords)
ग्रीनहाउस प्रभावग्लोबल वार्मिंगकार्बन डाइऑक्साइडमीथेनपेरिस समझौताक्योटो प्रोटोकॉल
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8प्रमुख वैज्ञानिक एवं ऊष्मा में उनका योगदान

वैज्ञानिक (देश/काल)ऊष्मा में योगदान
डेनियल फारेनहाइट (जर्मनी, 1686–1736)पारा थर्मामीटर (1714), फारेनहाइट पैमाना
एंडर्स सेल्सियस (स्वीडन, 1701–1744)सेल्सियस पैमाना (1742)
लॉर्ड केल्विन (इंग्लैंड, 1824–1907)केल्विन पैमाना/परम पैमाना, ऊष्मागतिकी के नियमों में योगदान
जेम्स प्रेस्कॉट जूल (इंग्लैंड, 1818–1889)ऊर्जा संरक्षण नियम, 1 cal = 4.18 J
सादी कार्नो (फ्रांस, 1796–1832)कार्नो इंजन (1824), कार्नो प्रमेय
रुडोल्फ क्लॉसियस (जर्मनी, 1822–1888)एन्ट्रॉपी अवधारणा, प्रथम व द्वितीय नियमों का औपचारिकीकरण
जोसेफ स्टीफन (ऑस्ट्रिया, 1835–1893)स्टीफन-बोल्ट्ज़मान नियम E=σT⁴
विल्हेम वीन (जर्मनी, 1864–1928)वीन का विस्थापन नियम λmax×T=b

📌 अध्याय सारांश (Chapter Summary)

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← अध्याय 4: प्रकाश एवं इसके गुणधर्म अध्याय 6: स्थिर वैद्युतिकी एवं धारा विद्युत →