सोचो — बारिश के बाद आसमान में अचानक सात रंगों का इंद्रधनुष उभर आता है, रात में सड़क किनारे की छोटी परावर्तक पट्टियाँ दूर से जगमगाती दिखती हैं, और शीशे के गिलास में डूबा चम्मच अचानक टेढ़ा दिखने लगता है। यह सब कोई जादू नहीं — यह प्रकाश (Light) के परावर्तन, अपवर्तन व विक्षेपण के नियम हैं। इस अध्याय में हम प्रकाश के इन्हीं गुणों को, आँख की बनावट से लेकर दूरबीन व लेज़र तक, पूरी गहराई से समझेंगे।
प्रकाश एक विद्युत चुंबकीय तरंग (Electromagnetic Wave) है, जो मानव आँख को दृश्यमान होती है — अर्थात प्रकाश वास्तव में विद्युत क्षेत्र व चुंबकीय क्षेत्र के परस्पर लंबवत दोलन से बनी एक तरंग है, जिसे किसी माध्यम (हवा, पानी) की आवश्यकता नहीं होती, यह निर्वात में भी यात्रा कर सकती है — इसीलिए सूर्य का प्रकाश निर्वात से भरे अंतरिक्ष को पार करके पृथ्वी तक पहुँच पाता है। मानव आँख केवल एक संकीर्ण तरंगदैर्ध्य सीमा — लगभग 400 नैनोमीटर (nm) से 700 नैनोमीटर के बीच — को ही "देख" पाती है, इसी सीमा को दृश्य प्रकाश स्पेक्ट्रम (Visible Spectrum) कहा जाता है।
प्रकाश का वेग सभी माध्यमों में एक-समान नहीं रहता — निर्वात में यह अपने अधिकतम संभव मान 3×10⁸ मीटर/सेकंड (30 करोड़ मीटर प्रति सेकंड) पर यात्रा करता है, जो ब्रह्मांड की सबसे तेज़ गति मानी जाती है। जब प्रकाश किसी सघन माध्यम (जैसे पानी या काँच) में प्रवेश करता है, तो माध्यम के अणुओं से लगातार टकराने व पुनः उत्सर्जित होने के कारण उसका प्रभावी वेग घट जाता है — पानी में यह घटकर लगभग 2.25×10⁸ मीटर/सेकंड तथा काँच में लगभग 2×10⁸ मीटर/सेकंड रह जाता है। वेग में यही अंतर आगे अपवर्तन की परिघटना को जन्म देता है।
जो वस्तुएँ स्वयं प्रकाश उत्पन्न करती हैं (जैसे सूर्य, बल्ब, मोमबत्ती, जलता हुआ कोयला) उन्हें दीप्तिमान (Luminous) कहा जाता है, जबकि जो वस्तुएँ स्वयं प्रकाश उत्पन्न नहीं करतीं बल्कि किसी अन्य स्रोत के प्रकाश को परावर्तित करके ही दिखाई देती हैं (जैसे चंद्रमा, दर्पण, हमारे आस-पास की अधिकांश वस्तुएँ) उन्हें अदीप्तिमान (Non-Luminous) कहते हैं — चंद्रमा स्वयं में कोई प्रकाश उत्पन्न नहीं करता, वह केवल सूर्य के प्रकाश को परावर्तित करता है, इसीलिए अमावस्या पर जब चंद्रमा की परावर्तक सतह पृथ्वी की ओर नहीं होती, तो वह हमें दिखाई नहीं देता।
जब प्रकाश किसी चमकीली, पॉलिश की हुई सतह से टकराकर वापस उसी माध्यम में लौट आता है, तो इस घटना को परावर्तन कहा जाता है। परावर्तन दो सरल परंतु अत्यंत महत्वपूर्ण नियमों का पालन करता है, जो सभी प्रकार के दर्पणों (चाहे समतल हों या वक्र) पर समान रूप से लागू होते हैं।
1/v + 1/u = 1/f (v = प्रतिबिंब दूरी, u = वस्तु दूरी, f = फोकस दूरी)
आवर्धन: m = −v/u = h'/h (h' = प्रतिबिंब ऊँचाई, h = वस्तु ऊँचाई)
वक्रता त्रिज्या: R = 2f
दर्पण मुख्यतः तीन प्रकार के होते हैं, और तीनों के परावर्तक तल की बनावट अलग होने से उनके द्वारा बनने वाले प्रतिबिंब की प्रकृति भी अलग-अलग होती है।
| दर्पण का प्रकार | प्रकृति एवं प्रतिबिंब | प्रमुख उपयोग |
|---|---|---|
| समतल दर्पण (Plane Mirror) | सपाट तल; प्रतिबिंब सदैव आभासी, सीधा, वस्तु के समान आकार का, तथा पार्श्व-परिवर्तित (बायाँ-दायाँ बदला हुआ) | दाढ़ी बनाना, दैनिक श्रृंगार, पेरिस्कोप में उपयोग |
| अवतल दर्पण (Concave Mirror) | भीतर की ओर धँसा हुआ, अभिसारी (प्रकाश किरणों को एक बिंदु पर केंद्रित करने वाला); वस्तु फोकस से दूर होने पर वास्तविक व उल्टा, तथा फोकस के भीतर होने पर आभासी व बड़ा प्रतिबिंब बनता है | सोलर कुकर/फर्नेस, वाहन की हेडलाइट, दाढ़ी बनाने का आवर्धक दर्पण, दंत चिकित्सकों का दर्पण |
| उत्तल दर्पण (Convex Mirror) | बाहर की ओर उभरा हुआ, अपसारी (प्रकाश किरणों को फैलाने वाला); प्रतिबिंब सदैव आभासी, सीधा तथा वस्तु से छोटा बनता है | वाहन का रियर-व्यू मिरर, सड़क के तीखे मोड़ पर सुरक्षा दर्पण |
उत्तल दर्पण अपनी उभरी हुई बनावट के कारण एक बहुत बड़े क्षेत्र (Wide Field of View) का प्रतिबिंब एक साथ दिखा सकता है, जबकि समतल दर्पण केवल सीमित क्षेत्र ही दिखा पाता है। भले ही उत्तल दर्पण में प्रतिबिंब वास्तविक आकार से छोटा दिखता है (इसीलिए वाहनों में प्रायः "वस्तुएँ आईने में दिखने से अधिक निकट हैं" जैसी चेतावनी लिखी होती है), परंतु चालक की सुरक्षा के लिए पीछे का व्यापक दृश्य देख पाना कहीं अधिक महत्वपूर्ण होता है, इसीलिए रियर-व्यू मिरर में सदैव उत्तल दर्पण का ही उपयोग होता है।
जब प्रकाश एक पारदर्शी माध्यम से दूसरे पारदर्शी माध्यम में तिरछा होकर प्रवेश करता है, तो उसकी दिशा में मोड़ आ जाता है — इसी घटना को अपवर्तन कहते हैं। इसका मूल कारण यह है कि प्रकाश का वेग हर माध्यम में भिन्न होता है — जब प्रकाश धीमे माध्यम (जैसे पानी) में प्रवेश करता है, तो वह अभिलंब की ओर मुड़ जाता है, और जब तेज़ माध्यम (जैसे पानी से हवा) में जाता है, तो अभिलंब से दूर मुड़ जाता है।
n₁ sin i = n₂ sin r (स्नेल का नियम)
अपवर्तनांक: n = sin i / sin r = c/v = λ₁/λ₂
(c = निर्वात में प्रकाश वेग, v = माध्यम में प्रकाश वेग)
| माध्यम | अपवर्तनांक (n) | विशेष तथ्य |
|---|---|---|
| निर्वात / वायु | 1.0 (≈1) | संदर्भ माध्यम — n=1 |
| पानी (Water) | 1.33 | तालाब में मछली उथली दिखाई देती है |
| काँच (Glass) | 1.5 | लेंस, चश्मा, प्रिज्म में प्रयुक्त |
| हीरा (Diamond) | 2.42 | TIR क्रांतिक कोण मात्र 24.4° → असाधारण चमक |
जब हम गिलास में रखी चम्मच का वह भाग देखते हैं जो पानी में डूबा है, तो उससे आने वाला प्रकाश पानी से हवा में प्रवेश करते समय अपवर्तित होकर मुड़ जाता है। हमारी आँख व मस्तिष्क यह मानकर चलते हैं कि प्रकाश सदैव सीधी रेखा में चलता है, इसलिए वे किरण के वास्तविक मुड़े हुए पथ को नज़रअंदाज़ कर उसे पीछे की ओर सीधा बढ़ाकर एक भ्रामक (आभासी) स्थिति में चम्मच को "देखते" हैं — इसी कारण चम्मच अपनी वास्तविक स्थिति से हटी हुई, टेढ़ी प्रतीत होती है।
लेंस एक पारदर्शी माध्यम होता है जिसकी कम-से-कम एक सतह वक्र (Curved) होती है। लेंस मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं — उत्तल लेंस (Convex), जो बीच में मोटा व किनारों पर पतला होता है और प्रकाश किरणों को एक बिंदु पर एकत्रित (अभिसारी) करता है; तथा अवतल लेंस (Concave), जो बीच में पतला व किनारों पर मोटा होता है और प्रकाश किरणों को फैला (अपसारी) देता है।
1/v − 1/u = 1/f (लेंस सूत्र)
आवर्धन: m = v/u = h'/h
लेंस की शक्ति: P = 1/f(मीटर में) = 100/f(सेमी में) | मात्रक: डायोप्टर (D)
संयुक्त लेंस की शक्ति: P = P₁ + P₂ + P₃ ...
चिह्न परिपाटी (Sign Convention) के अनुसार उत्तल लेंस की फोकस दूरी व शक्ति सदैव धनात्मक (+ve) मानी जाती है (क्योंकि यह अभिसारी है), जबकि अवतल लेंस की फोकस दूरी व शक्ति सदैव ऋणात्मक (−ve) मानी जाती है (क्योंकि यह अपसारी है) — यही कारण है कि आँखों की जाँच के दौरान चश्मे के नंबर में "+" या "−" चिह्न लगाकर यह बताया जाता है कि किस प्रकार का लेंस चाहिए।
जब प्रकाश किसी सघन माध्यम (जैसे काँच या पानी) से किसी विरल माध्यम (जैसे हवा) की ओर जाता है, तो सामान्यतः वह अपवर्तित होकर आगे बढ़ जाता है। परंतु यदि आपतन कोण एक निश्चित सीमा — जिसे क्रांतिक कोण (Critical Angle) कहते हैं — से अधिक हो जाए, तो प्रकाश विरल माध्यम में प्रवेश ही नहीं कर पाता, बल्कि पूरी तरह वापस सघन माध्यम में ही परावर्तित हो जाता है। इस परिघटना के लिए दो शर्तें एक साथ पूरी होनी आवश्यक हैं — प्रकाश सघन से विरल माध्यम की ओर जा रहा हो, तथा आपतन कोण क्रांतिक कोण से अधिक हो।
sin C = 1/n (C = क्रांतिक कोण, n = सघन माध्यम का अपवर्तनांक)
काँच (n=1.5) → C ≈ 42° | हीरा (n=2.42) → C ≈ 24.4° | पानी (n=1.33) → C ≈ 48.8°
| अनुप्रयोग | TIR कैसे कार्य करता है | महत्व |
|---|---|---|
| ऑप्टिकल फाइबर | प्रकाश केंद्रीय क्रोड (सघन कोर) से बाहरी परत (विरल क्लैडिंग) की ओर बार-बार TIR से टकराते हुए आगे बढ़ता रहता है | इंटरनेट केबल, MRI मशीन, एंडोस्कोपी, दूरसंचार |
| हीरे की चमक | हीरे का क्रांतिक कोण केवल 24.4° होने से अधिकांश प्रकाश बार-बार TIR से परावर्तित होकर बाहर चमकता है | जौहरी हीरे को इस तरह तराशते हैं कि अधिकतम TIR हो सके |
| मृगमरीचिका | गर्म सड़क के पास हवा की परतों का घनत्व असमान होने से क्रमिक अपवर्तन होते-होते TIR जैसी स्थिति बनती है | रेगिस्तान व गर्म सड़क पर दूर से "पानी" का भ्रम |
| कैट्स आई | सड़क किनारे लगी प्रिज्माकार काँच की पट्टियाँ TIR से हेडलाइट का प्रकाश वापस चालक की ओर लौटाती हैं | रात में सड़क मार्गदर्शन |
| पेरिस्कोप | प्रिज्म के भीतर 45° कोण पर TIR — साधारण दर्पण से अधिक कुशल | पनडुब्बी, युद्धक्षेत्र में सुरक्षित रूप से दृश्य देखना |
श्वेत (सफ़ेद) प्रकाश वास्तव में सात रंगों का मिश्रण है, और जब यह किसी प्रिज्म से गुज़रता है, तो अलग-अलग रंगों में विभाजित हो जाता है — इसे वर्ण-विक्षेपण (Dispersion) कहते हैं। इसका कारण यह है कि श्वेत प्रकाश के भीतर मौजूद प्रत्येक रंग की तरंगदैर्ध्य भिन्न होती है, और चूँकि किसी माध्यम का अपवर्तनांक तरंगदैर्ध्य पर निर्भर करता है, इसलिए हर रंग अलग-अलग कोण पर मुड़ता है।
इंद्रधनुष वर्षा की छोटी-छोटी जल-बूँदों में प्रकाश के अपवर्तन, पूर्ण आंतरिक परावर्तन तथा पुनः अपवर्तन की संयुक्त प्रक्रिया से बनता है। सूर्य का प्रकाश जब किसी जल-बूँद में प्रवेश करता है, तो पहले वह अपवर्तित होकर रंगों में बँटता है, फिर बूँद की भीतरी सतह से एक बार पूर्ण आंतरिक परावर्तन द्वारा वापस लौटता है, और अंत में बूँद से बाहर निकलते समय पुनः अपवर्तित होता है। प्राथमिक इंद्रधनुष में केवल एक आंतरिक परावर्तन होता है, जिसमें लाल रंग सबसे ऊपर व बैंगनी सबसे नीचे दिखाई देता है; जबकि द्वितीयक इंद्रधनुष (जो कम स्पष्ट व कभी-कभी ही दिखता है) में दो आंतरिक परावर्तन होते हैं, जिससे रंगों का क्रम उल्टा हो जाता है — बैंगनी ऊपर व लाल नीचे। इंद्रधनुष देखने के लिए सदैव सूर्य को अपनी पीठ की ओर रखना आवश्यक होता है।
रेले के प्रकीर्णन नियम (Rayleigh's Law) के अनुसार, वायुमंडल के सूक्ष्म कणों से प्रकाश के प्रकीर्णन (बिखरने) की मात्रा तरंगदैर्ध्य के चतुर्थ घात के व्युत्क्रमानुपाती होती है (I ∝ 1/λ⁴) — अर्थात कम तरंगदैर्ध्य वाला प्रकाश कहीं अधिक तीव्रता से प्रकीर्णित होता है।
गहरे समुद्र का पानी भी सूक्ष्म कणों से प्रकाश के प्रकीर्णन के कारण नीला प्रतीत होता है (हालाँकि जल स्वयं भी नीले रंग को अवशोषित करने की तुलना में कम अवशोषित करता है, जिससे यह प्रभाव और प्रबल होता है), जबकि दूध में मौजूद असंख्य सूक्ष्म वसा कणों से सभी रंगों का प्रकाश लगभग समान रूप से प्रकीर्णित होता है, जिससे दूध सफ़ेद दिखाई देता है — इसी प्रकार धूल भरे कमरे में खिड़की से आती धूप की किरण में तैरते धूल-कणों पर पड़कर बनने वाली चमकीली पट्टियाँ भी प्रकीर्णन का ही उदाहरण हैं।
मानव नेत्र प्रकृति का सबसे उत्कृष्ट प्रकाशीय उपकरण है, जो एक उत्तल लेंस की तरह कार्य करते हुए बाहरी दुनिया का प्रतिबिंब हमारे मस्तिष्क तक पहुँचाता है। नेत्र की कार्यविधि को समझने के लिए इसके प्रत्येक भाग की भूमिका जानना आवश्यक है — प्रकाश पहले कॉर्निया से होकर गुज़रता है, फिर पुतली (जिसका आकार आइरिस नियंत्रित करती है) से होकर भीतर प्रवेश करता है, फिर लेंस द्वारा मोड़ा जाकर रेटिना पर एक वास्तविक व उल्टा प्रतिबिंब बनाता है, और अंततः ऑप्टिक नर्व द्वारा यह संकेत मस्तिष्क तक पहुँचता है, जहाँ मस्तिष्क इस उल्टे प्रतिबिंब को सीधा करके व्याख्यायित करता है।
| भाग | कार्य |
|---|---|
| कॉर्निया (Cornea) | पारदर्शी बाहरी परत — प्रकाश को मोड़कर नेत्र में प्रवेश कराती है (नेत्र के कुल अपवर्तन का लगभग 70% भाग यहीं होता है) |
| आइरिस (Iris) | रंगीन पर्दा — पुतली के आकार को नियंत्रित कर नेत्र में प्रवेश करने वाले प्रकाश की मात्रा नियंत्रित करता है |
| पुतली (Pupil) | आइरिस के केंद्र का छिद्र — प्रकाश प्रवेश द्वार; अंधेरे में बड़ी व तेज़ रोशनी में छोटी हो जाती है |
| क्रिस्टलीय लेंस (Lens) | उत्तल लेंस — सिलियरी मांसपेशियों की सहायता से आकृति बदलकर निकट व दूर दोनों को फोकस करने की क्षमता (समंजन) रखता है |
| रेटिना (Retina) | प्रकाश-संवेदनशील परदा — रॉड व कोन कोशिकाओं से युक्त, जहाँ वास्तविक व उल्टा प्रतिबिंब बनता है |
| ऑप्टिक नर्व (Optic Nerve) | रेटिना से मस्तिष्क तक तंत्रिका संकेत ले जाने वाली नस; जिस बिंदु पर यह जुड़ती है वहाँ कोई दृष्टि-संवेदन नहीं होता (Blind Spot) |
स्वस्थ नेत्र की समंजन क्षमता (Power of Accommodation) के कारण वह निकट बिंदु (सामान्यतः लगभग 25 सेंटीमीटर, जिसे "न्यूनतम स्पष्ट दृष्टि दूरी" कहते हैं) से लेकर दूर बिंदु (अनंत) तक की वस्तुओं को स्पष्ट देख सकता है — सिलियरी मांसपेशियाँ निकट की वस्तु देखते समय लेंस को मोटा (अधिक वक्र) तथा दूर की वस्तु देखते समय पतला बना देती हैं।
| दोष | कारण | सुधार |
|---|---|---|
| निकटदृष्टि दोष (Myopia) | नेत्र-गोला लंबा या लेंस अधिक मोटा होने से प्रतिबिंब रेटिना से पहले ही बन जाता है — दूर की वस्तु धुँधली दिखती है | अवतल लेंस (Concave) — ऋणात्मक शक्ति (−D), जो प्रतिबिंब को पीछे रेटिना तक धकेलता है |
| दूरदृष्टि दोष (Hypermetropia) | नेत्र-गोला छोटा या लेंस पतला होने से प्रतिबिंब रेटिना के पीछे बनता प्रतीत होता है — निकट की वस्तु धुँधली दिखती है | उत्तल लेंस (Convex) — धनात्मक शक्ति (+D), जो प्रतिबिंब को आगे खींचकर रेटिना पर लाता है |
| जरादूरदृष्टि (Presbyopia) | आयु बढ़ने के साथ सिलियरी मांसपेशियों के कमज़ोर होने व लेंस के कम लचीला होने से समंजन क्षमता घट जाती है | द्विफोकसी लेंस (Bifocal) — ऊपरी भाग अवतल (दूर देखने हेतु), निचला भाग उत्तल (निकट देखने हेतु) |
| दृष्टिवैषम्य (Astigmatism) | कॉर्निया की असमान वक्रता के कारण क्षैतिज व ऊर्ध्वाधर दिशा में फोकस अलग-अलग बिंदुओं पर बनता है | बेलनाकार लेंस (Cylindrical Lens) |
रेटिना पर दो प्रकार की प्रकाश-संवेदी कोशिकाएँ होती हैं — रॉड कोशिकाएँ (Rod Cells), जो मंद प्रकाश में भी सक्रिय होकर केवल काले-सफ़ेद (प्रकाश-अंधकार) का बोध कराती हैं, तथा कोन कोशिकाएँ (Cone Cells), जो तेज़ प्रकाश में सक्रिय होकर रंगों की पहचान कराती हैं। रॉड कोशिकाओं में "रोडोप्सिन" नामक प्रकाश-संवेदी वर्णक होता है, जिसके निर्माण के लिए विटामिन-A आवश्यक होता है — इसीलिए विटामिन-A की कमी से रोडोप्सिन कम बनता है और रतौंधी (Night Blindness) की समस्या हो जाती है, जिसमें व्यक्ति को कम रोशनी में देखने में कठिनाई होती है।
मानव नेत्र की अपनी सीमाएँ हैं — यह अत्यंत सूक्ष्म वस्तुओं (जैसे जीवाणु) या अत्यंत दूर की वस्तुओं (जैसे तारे) को स्पष्ट नहीं देख सकता। इन्हीं सीमाओं को पार करने के लिए मनुष्य ने लेंस व दर्पणों के सुनियोजित संयोजन से विभिन्न प्रकाशीय उपकरण विकसित किए हैं।
| उपकरण | सिद्धांत / लेंस संयोजन | उपयोग |
|---|---|---|
| सरल सूक्ष्मदर्शी (Simple Microscope) | एक उत्तल लेंस; वस्तु फोकस के भीतर रखने पर आभासी व बड़ा प्रतिबिंब बनता है | जौहरी, घड़ीसाज़, चर्म-निरीक्षण |
| यौगिक सूक्ष्मदर्शी (Compound Microscope) | दो उत्तल लेंस (अभिदृश्यक + नेत्रिका) — कहीं अधिक आवर्धन | जीवाणु, ऊतक, रक्त-कोशिका अध्ययन |
| खगोलीय दूरदर्शी (Astronomical Telescope) | दो उत्तल लेंस; अंतिम प्रतिबिंब उल्टा बनता है | तारे व ग्रह देखना |
| परावर्तक दूरदर्शी (Reflecting Telescope) | अवतल दर्पण + उत्तल लेंस | बड़ी वेधशालाओं के दूरदर्शी (जैसे हबल स्पेस टेलीस्कोप) |
| पेरिस्कोप (Periscope) | दो समतल दर्पण 45° पर, या TIR प्रिज्म | पनडुब्बी, किलों में सुरक्षित निगरानी |
| प्रोजेक्टर (Projector) | उत्तल लेंस — वास्तविक व बड़ा प्रतिबिंब पर्दे पर डालता है | सिनेमा, प्रस्तुतियाँ |
| कैमरा (Camera) | उत्तल लेंस + प्रकाश-संवेदी सेंसर/फिल्म | छायाचित्र लेना |
प्रकाश की वास्तविक प्रकृति को लेकर विज्ञान के इतिहास में लंबे समय तक बहस चली — क्या प्रकाश एक तरंग है, या सूक्ष्म कणों की धारा? दिलचस्प बात यह है कि आधुनिक भौतिकी के अनुसार दोनों ही दृष्टिकोण आंशिक रूप से सही हैं, और प्रकाश परिस्थिति के अनुसार कभी तरंग तो कभी कण जैसा व्यवहार करता है — इसे ही द्वैत प्रकृति (Wave-Particle Duality) कहा जाता है।
प्रकाश-विद्युत प्रभाव (Photoelectric Effect) — अल्बर्ट आइंस्टीन (1905): जब पर्याप्त उच्च आवृत्ति का प्रकाश किसी धातु की सतह पर पड़ता है, तो धातु से इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित होने लगते हैं। आइंस्टीन ने बताया कि यह तभी होता है जब आपतित प्रकाश की आवृत्ति एक निश्चित न्यूनतम मान (देहली आवृत्ति) से अधिक हो — प्रकाश की तीव्रता बढ़ाने से नहीं, बल्कि सही आवृत्ति होने से ही यह प्रभाव उत्पन्न होता है, जो इस बात का प्रमाण है कि प्रकाश असतत ऊर्जा-पैकेटों (फोटॉन, E=hν) के रूप में यात्रा करता है। इसी खोज के लिए आइंस्टीन को वर्ष 1921 का भौतिकी नोबेल पुरस्कार मिला (सापेक्षता सिद्धांत के लिए नहीं, जैसा अक्सर ग़लती से माना जाता है)।
सी.वी. रमन ने वर्ष 1928 में यह खोजा कि जब प्रकाश किसी पारदर्शी पदार्थ के अणुओं से टकराकर प्रकीर्णित होता है, तो प्रकीर्णित प्रकाश का कुछ भाग अपनी मूल तरंगदैर्ध्य बदल लेता है — यह तरंगदैर्ध्य-परिवर्तन अणु की आंतरिक संरचना पर निर्भर करता है, इसीलिए "रमन प्रभाव" पदार्थों की आणविक संरचना जानने का एक शक्तिशाली उपकरण बन गया, जिसका आज भी रसायन विज्ञान व औषधि-जाँच में व्यापक उपयोग होता है।
LASER शब्द वास्तव में एक संक्षिप्त रूप (Acronym) है — Light Amplification by Stimulated Emission of Radiation, अर्थात "उद्दीपित उत्सर्जन द्वारा प्रकाश का प्रवर्धन"। सामान्य प्रकाश स्रोत (जैसे बल्ब) में प्रकाश की तरंगें अनेक भिन्न-भिन्न तरंगदैर्ध्य व दिशाओं में अव्यवस्थित रूप से निकलती हैं, जबकि लेज़र में एक विशेष प्रक्रिया — जनसंख्या प्रतिलोमन (Population Inversion) व उद्दीपित उत्सर्जन (Stimulated Emission) — के द्वारा प्रकाश की सभी तरंगें एक ही तरंगदैर्ध्य, एक ही दिशा व एक ही कला (Phase) में उत्पन्न की जाती हैं।
लेज़र की इन्हीं विशेष गुणों (एक तरंगदैर्ध्य, संकेंद्रित ऊर्जा) के कारण इसका उपयोग बारकोड स्कैनर, CD/DVD प्लेयर, दूरी-मापन यंत्रों, औद्योगिक कटाई व वेल्डिंग, तथा चिकित्सा क्षेत्र (जैसे आँखों की LASIK सर्जरी, त्वचा व ट्यूमर की सर्जरी) में बड़े पैमाने पर होता है — चिकित्सा में लेज़र के विस्तृत अनुप्रयोगों का अध्ययन हम आगे "चिकित्सा निदान में भौतिकी" नामक अध्याय में करेंगे।
| वैज्ञानिक (देश/काल) | प्रकाश में योगदान |
|---|---|
| विलेब्रॉर्ड स्नेल (नीदरलैंड, 1580–1626) | अपवर्तन का नियम — Snell's Law (1621) |
| आइज़क न्यूटन (इंग्लैंड, 1643–1727) | प्रकाश का कण सिद्धांत; प्रिज्म से VIBGYOR विक्षेपण |
| क्रिश्चियन हाइगेंस (नीदरलैंड, 1629–1695) | प्रकाश का तरंग सिद्धांत — Huygens' Principle |
| थॉमस यंग (इंग्लैंड, 1773–1829) | प्रकाश का व्यतिकरण — Double Slit Experiment (1801) |
| जेम्स क्लर्क मैक्सवेल (स्कॉटलैंड, 1831–1879) | विद्युत-चुंबकीय तरंग सिद्धांत — प्रकाश एक EM तरंग है |
| अल्बर्ट आइंस्टीन (जर्मनी, 1879–1955) | प्रकाश-विद्युत प्रभाव — फोटॉन अवधारणा, नोबेल 1921 |
| सी.वी. रमन (भारत, 1888–1970) | रमन प्रभाव (1928) — प्रकाश का आणविक प्रकीर्णन, नोबेल 1930 |
| मैक्स प्लांक (जर्मनी, 1858–1947) | क्वांटम सिद्धांत — E=hν, h=6.63×10⁻³⁴ जूल-सेकंड |