सोचो — एक सेब पेड़ से टूटकर सीधा नीचे ज़मीन पर गिरा, और एक युवा वैज्ञानिक के मन में एक साधारण-सा सवाल उठा — "सेब नीचे ही क्यों गिरा, ऊपर या बगल में क्यों नहीं?" यही सीधा-सादा सवाल आइज़क न्यूटन को दुनिया के सबसे बड़े और सबसे सार्वभौमिक नियमों में से एक — गुरुत्वाकर्षण के सार्वत्रिक नियम — तक ले गया, जो आज भी यह समझाता है कि चंद्रमा पृथ्वी की परिक्रमा क्यों करता है और उपग्रह अंतरिक्ष में क्यों नहीं गिरते। इस अध्याय में हम इसी नियम को, इसकी पूरी गहराई के साथ, कदम-दर-कदम समझेंगे।
गुरुत्वाकर्षण (Gravitation) ब्रह्मांड की प्रत्येक दो वस्तुओं के बीच कार्य करने वाला परस्पर आकर्षण बल है — चाहे वे दो कंकड़ हों, दो मनुष्य हों, या दो विशाल ग्रह हों। इसे सार्वत्रिक आकर्षण बल (Universal Force of Attraction) कहा जाता है, क्योंकि यह हर जगह, हर वस्तु के बीच बिना किसी अपवाद के कार्य करता है। इसके विपरीत गुरुत्व (Gravity) विशेष रूप से पृथ्वी द्वारा किसी वस्तु पर लगाया गया आकर्षण बल है — अर्थात गुरुत्वाकर्षण एक व्यापक (सार्वत्रिक) अवधारणा है, जबकि गुरुत्व उसका एक विशेष, पृथ्वी-केंद्रित रूप है।
कहानी के अनुसार, सन् 1665 में जब एक सेब न्यूटन के सामने पेड़ से गिरा, तो उन्हें यह जिज्ञासा हुई कि सेब सदैव सीधा नीचे ही क्यों गिरता है, कभी ऊपर या बगल में क्यों नहीं जाता। इस साधारण प्रश्न से आगे बढ़ते हुए न्यूटन ने यह विचार किया कि यदि पृथ्वी सेब को अपनी ओर खींच सकती है, तो क्या यही बल चंद्रमा को भी पृथ्वी के चारों ओर बाँधे रख सकता है? इसी विचार-प्रक्रिया ने अंततः उन्हें वर्ष 1687 में प्रकाशित अपनी पुस्तक "Principia Mathematica" में गुरुत्वाकर्षण के सार्वत्रिक नियम तक पहुँचाया — जो यह सिद्ध करता है कि आकाश में तारों-ग्रहों को बाँधे रखने वाला बल और धरती पर सेब को गिराने वाला बल, दोनों वास्तव में एक ही बल हैं।
न्यूटन के अनुसार, ब्रह्मांड में प्रत्येक दो कण एक-दूसरे को आकर्षित करते हैं। यह आकर्षण बल दोनों वस्तुओं के द्रव्यमानों के गुणनफल के समानुपाती तथा उनके बीच की दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होता है। इसका अर्थ यह है कि यदि किन्हीं दो वस्तुओं का द्रव्यमान दोगुना कर दिया जाए (दूरी वही रहे), तो उनके बीच का आकर्षण बल भी दोगुना हो जाएगा; परंतु यदि दोनों वस्तुओं के बीच की दूरी दोगुनी कर दी जाए (द्रव्यमान वही रहें), तो बल घटकर मूल बल का केवल एक-चौथाई (¼) रह जाएगा — क्योंकि दूरी का प्रभाव "वर्ग" के रूप में पड़ता है।
F = G × m₁ × m₂ / r²
G = 6.674 × 10⁻¹¹ N·m²/kg² (सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण स्थिरांक)
व्युत्क्रम वर्ग नियम (Inverse Square Law): F ∝ 1/r² — दूरी दोगुनी होने पर बल घटकर 1/4, तिगुनी होने पर 1/9 रह जाता है
G का मान सर्वप्रथम अंग्रेज़ वैज्ञानिक हेनरी कैवेंडिश (Henry Cavendish) ने वर्ष 1798 में, अर्थात न्यूटन के नियम प्रस्तुत करने के लगभग 111 वर्ष बाद, एक अत्यंत सूक्ष्म व संवेदनशील प्रयोग द्वारा मापा था। उन्होंने टॉर्शन बैलेंस (Torsion Balance) नामक उपकरण का उपयोग किया, जिसमें एक पतले तार से लटके हल्के डंडे के दोनों सिरों पर छोटी सीसे की गेंदें लगी थीं, तथा पास में बड़ी सीसे की गेंदें रखकर उनके बीच लगने वाले अत्यंत क्षीण आकर्षण बल से उत्पन्न हल्के मरोड़ (Twist) को मापा गया। इस प्रयोग को अक्सर "पृथ्वी को तौलने वाला प्रयोग" (Weighing the Earth) भी कहा जाता है, क्योंकि G का मान ज्ञात होते ही पृथ्वी के द्रव्यमान की गणना भी संभव हो गई।
मान लीजिए दो सामान्य वयस्क व्यक्ति एक-दूसरे से 1 मीटर दूर खड़े हैं। यद्यपि उनके बीच भी गुरुत्वाकर्षण बल अवश्य कार्य कर रहा होता है, परंतु G का मान अत्यंत छोटा होने तथा मानव शरीर का द्रव्यमान पृथ्वी की तुलना में नगण्य होने के कारण, यह बल इतना क्षीण (लगभग माइक्रोन्यूटन के स्तर का) होता है कि उसे महसूस करना पूर्णतः असंभव है। इसके विपरीत, पृथ्वी का द्रव्यमान लगभग 6×10²⁴ किलोग्राम होने के कारण, उसका गुरुत्वाकर्षण बल हर वस्तु पर इतना स्पष्ट रूप से अनुभव होता है कि हम इसे प्रतिदिन "भार" के रूप में महसूस करते हैं।
जब कोई वस्तु पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण बल के प्रभाव में गिरती है, तो उसमें जो त्वरण उत्पन्न होता है उसे गुरुत्वीय त्वरण (g) कहते हैं। पृथ्वी की सतह पर इसका मानक मान लगभग 9.8 m/s² होता है — अर्थात स्वतंत्र रूप से गिरती कोई भी वस्तु प्रति सेकंड अपने वेग में लगभग 9.8 मीटर/सेकंड की वृद्धि करती जाती है।
इस सूत्र (g=GM/R²) को न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण नियम (F=Gm₁m₂/r²) से ही व्युत्पन्न किया जा सकता है — यदि किसी वस्तु (द्रव्यमान m) पर पृथ्वी (द्रव्यमान M, त्रिज्या R) द्वारा लगने वाला बल F=GMm/R² है, तथा न्यूटन के द्वितीय नियम के अनुसार यही बल F=ma के बराबर भी है, तो इन दोनों को बराबर करने पर वस्तु का द्रव्यमान (m) दोनों तरफ से कट जाता है, और शेष बचता है a=GM/R² — यही गुरुत्वीय त्वरण है। यहाँ यह ध्यान देने योग्य अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य है कि अंतिम सूत्र में गिरने वाली वस्तु का अपना द्रव्यमान (m) सिरे से गायब हो जाता है — इसीलिए g वस्तु के द्रव्यमान पर बिल्कुल निर्भर नहीं करता, चाहे वस्तु 1 ग्राम की हो या 1000 किलोग्राम की, दोनों समान त्वरण से गिरेंगी (वायु प्रतिरोध की उपेक्षा करने पर)।
g = G × M / R² (M = पृथ्वी का द्रव्यमान, R = पृथ्वी की त्रिज्या)
पृथ्वी की सतह पर मानक मान: g = 9.8 m/s²
भार (Weight): W = m × g
गुरुत्वीय त्वरण g का मान सभी स्थानों पर बिल्कुल एक-समान नहीं रहता — यह ऊँचाई, गहराई तथा अक्षांश (Latitude) के अनुसार थोड़ा-थोड़ा बदलता रहता है, और इस परिवर्तन के पीछे स्पष्ट वैज्ञानिक कारण हैं।
| परिस्थिति | प्रभाव | कारण |
|---|---|---|
| ऊँचाई पर (h बढ़ने पर) | g घटता है | g=GM/(R+h)² के अनुसार पृथ्वी के केंद्र से दूरी बढ़ने पर हर के मान में वृद्धि से g घटता है |
| गहराई पर (d बढ़ने पर) | g घटता है | गहराई में जाने पर वस्तु के ऊपर की परत का द्रव्यमान अब आकर्षण में योगदान नहीं करता, इसलिए प्रभावी M घट जाता है |
| भूमध्य रेखा पर | g न्यूनतम (≈ 9.78 m/s²) | पृथ्वी ध्रुवों पर चपटी व भूमध्य रेखा पर उभरी है (त्रिज्या R अधिक) + घूर्णन से उत्पन्न अपकेंद्री प्रभाव भी g घटाता है |
| ध्रुवों पर | g अधिकतम (≈ 9.83 m/s²) | त्रिज्या न्यूनतम होने तथा घूर्णन-अक्ष पर स्थित होने से अपकेंद्री प्रभाव नगण्य रहता है |
| पृथ्वी के केंद्र पर | g = शून्य | केंद्र पर चारों दिशाओं से द्रव्यमान का आकर्षण बराबर होकर एक-दूसरे को निरस्त कर देता है |
माउंट एवरेस्ट जैसी ऊँची पर्वत चोटी पर पृथ्वी के केंद्र से दूरी मैदानी क्षेत्र की तुलना में लगभग 8-9 किलोमीटर अधिक हो जाती है। चूँकि g=GM/(R+h)² के अनुसार दूरी बढ़ने पर g का मान घटता है, इसलिए पर्वत की चोटी पर g थोड़ा (यद्यपि अत्यंत सूक्ष्म मात्रा में) कम हो जाता है। चूँकि भार W=mg होता है और द्रव्यमान (m) कहीं भी नहीं बदलता (द्रव्यमान वस्तु का मौलिक गुण है), इसलिए पर्वत की चोटी पर वस्तु का भार मैदानी क्षेत्र की तुलना में थोड़ा कम हो जाता है — यह अंतर इतना सूक्ष्म होता है कि सामान्य तराजू से पकड़ में नहीं आता, परंतु अत्यंत संवेदनशील वैज्ञानिक उपकरणों से मापा जा सकता है।
रोज़मर्रा की भाषा में "भार" और "द्रव्यमान" शब्दों का प्रयोग प्रायः एक-दूसरे के स्थान पर कर दिया जाता है — जैसे जब हम कहते हैं "मेरा वज़न 60 किलो है", तो तकनीकी रूप से हम द्रव्यमान की बात कर रहे होते हैं, भार की नहीं। परंतु भौतिकी की दृष्टि से दोनों पूर्णतः भिन्न राशियाँ हैं, और इनके बीच का अंतर समझना अत्यंत महत्वपूर्ण है।
द्रव्यमान किसी वस्तु में उपस्थित पदार्थ की कुल मात्रा है — यह वस्तु का एक मौलिक (Intrinsic) गुण है, जो सदैव नियत रहता है, चाहे वस्तु पृथ्वी पर हो, चंद्रमा पर हो, या पूर्णतः निर्भार अंतरिक्ष में हो। द्रव्यमान एक अदिश राशि है, जिसका SI मात्रक किलोग्राम (kg) है, तथा इसे सामान्य तुला (Beam Balance) से मापा जाता है, जो वास्तव में दो वस्तुओं के द्रव्यमान की आपस में तुलना करती है।
भार वह गुरुत्वाकर्षण बल है जो पृथ्वी (या कोई अन्य खगोलीय पिंड) किसी वस्तु पर लगाता है, और यह उस विशेष स्थान के गुरुत्वीय त्वरण (g) पर पूर्णतः निर्भर करता है। चूँकि भार वास्तव में एक बल है, इसलिए यह एक सदिश राशि है (सदैव पृथ्वी के केंद्र की दिशा में कार्य करता है), जिसका SI मात्रक न्यूटन (N) है, तथा इसे स्प्रिंग तुला (Spring Balance) से मापा जाता है, जो वस्तु पर गुरुत्वाकर्षण द्वारा डाले गए वास्तविक बल को मापती है।
चंद्रमा का द्रव्यमान पृथ्वी की तुलना में बहुत कम (लगभग 1/81 भाग) होने के कारण, तथा उसकी त्रिज्या भी पृथ्वी से छोटी होने के कारण, चंद्रमा की सतह पर गुरुत्वीय त्वरण पृथ्वी के मान का लगभग छठा भाग ही रह जाता है (g_चंद्रमा ≈ 1.63 m/s²)। चूँकि किसी अंतरिक्ष यात्री का द्रव्यमान चंद्रमा पर भी उतना ही रहता है जितना पृथ्वी पर था (द्रव्यमान कभी नहीं बदलता), परंतु g का मान घट जाने से उसका भार (W=mg के सूत्र के अनुसार) पृथ्वी पर भार का केवल 1/6 भाग रह जाता है — यही कारण है कि अंतरिक्ष यात्री चंद्रमा की सतह पर बहुत ऊँची-ऊँची व धीमी छलाँगें लगाते हुए चल पाते हैं, मानो वे बहुत हल्के हो गए हों, जबकि वास्तव में उनका द्रव्यमान वही है जो पृथ्वी पर था।
जब कोई वस्तु केवल पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण बल के प्रभाव में (वायु प्रतिरोध की उपेक्षा करते हुए, अर्थात आदर्श स्थिति में) गिरती है, तो इस गति को मुक्त पतन कहा जाता है। मुक्त पतन की सबसे रोचक विशेषता यह है कि इसमें वस्तु का त्वरण सदैव g (= 9.8 m/s²) के बराबर होता है, चाहे वस्तु का द्रव्यमान कितना भी क्यों न हो — यह हमने विषय 2.1 में सिद्ध किया था कि g की व्युत्पत्ति में वस्तु का द्रव्यमान स्वतः कट जाता है।
v = g × t (t समय बाद वेग)
h = ½ g t² (t समय में तय ऊँचाई)
v² = 2 g h (वेग एवं ऊँचाई का संबंध)
गैलीलियो गैलिली ने (कहा जाता है कि पीसा की झुकी मीनार से) यह प्रदर्शित किया कि यदि वायु प्रतिरोध को नगण्य मान लिया जाए, तो एक भारी लोहे की गेंद और एक हल्की पत्थर की गेंद दोनों समान ऊँचाई से एक साथ छोड़ने पर ज़मीन पर बिल्कुल एक साथ ही पहुँचती हैं — क्योंकि मुक्त पतन में त्वरण (g) वस्तु के द्रव्यमान पर निर्भर नहीं करता। इस सिद्धांत को अंतरिक्ष यात्रियों ने वास्तविकता में भी सिद्ध कर दिखाया — चंद्रमा पर (जहाँ वायुमंडल नहीं है, इसलिए वायु प्रतिरोध शून्य है) अपोलो-15 मिशन के दौरान एक अंतरिक्ष यात्री ने एक हथौड़े व एक पंख को एक साथ छोड़ा, और दोनों बिल्कुल एक साथ चंद्र-सतह पर पहुँचे — यह गैलीलियो के सिद्धांत का प्रत्यक्ष व दृश्य प्रमाण बना, जबकि पृथ्वी पर वायु प्रतिरोध के कारण पंख हमेशा धीरे गिरता दिखता है।
जब कोई वस्तु किसी द्रव (जल या वायु) में पूर्ण या आंशिक रूप से डुबोई जाती है, तो द्रव उस वस्तु पर एक ऊपर की दिशा में बल लगाता है, जिसे उत्प्लावन बल (Buoyant Force) कहते हैं। आर्किमिडीज़ के सिद्धांत के अनुसार यह बल वस्तु द्वारा हटाए गए द्रव के भार के बराबर होता है। इसे इस प्रकार समझा जा सकता है: वस्तु के डूबने से पहले उस स्थान पर द्रव मौजूद था, जो अपने आसपास के द्रव के दाब से संतुलित था; जब वस्तु उस स्थान को घेर लेती है, तो द्रव उतने ही दाब से वस्तु को भी ऊपर धकेलता है, जितने दाब से वह पहले वहाँ मौजूद द्रव को सहारा दे रहा था।
यदि वस्तु का अपना भार इस उत्प्लावन बल से कम हो, तो शुद्ध बल ऊपर की ओर होगा और वस्तु तैरेगी; यदि भार अधिक हो, तो शुद्ध बल नीचे की ओर होगा और वस्तु डूब जाएगी; तथा यदि दोनों बल बिल्कुल बराबर हों, तो वस्तु द्रव के भीतर कहीं भी (न ऊपर, न नीचे) स्थिर रूप से तैरती रह सकती है — जैसे पनडुब्बी पानी के भीतर किसी निश्चित गहराई पर स्थिर रह सकती है।
उत्प्लावन बल = ρ × V × g
(ρ = द्रव का घनत्व, V = डूबे भाग का आयतन, g = गुरुत्वीय त्वरण)
| उदाहरण | व्याख्या |
|---|---|
| लोहे का विशाल जहाज़ तैरता है | जहाज़ के खोखले ढाँचे के कारण हटाए गए पानी का भार जहाज़ के कुल भार से अधिक होता है |
| मछली पानी में तैरती है | वायुकोष (Swim Bladder) से अपने शरीर का घनत्व नियंत्रित करती है |
| पनडुब्बी गहराई नियंत्रित करती है | बैलेस्ट टैंक में पानी भरकर या निकालकर घनत्व बदलती है |
| गुब्बारा हवा में ऊपर उठता है | हीलियम/गर्म हवा का घनत्व आसपास की वायु से कम होता है |
| लोहे की कील डूब जाती है, पर जहाज़ नहीं | आकार व वस्तु के प्रभावी घनत्व में अंतर के कारण |
हाइड्रोमीटर आर्किमिडीज़ के सिद्धांत पर आधारित एक उपकरण है, जो द्रव में डूबने की गहराई मापकर उसका घनत्व बताता है — अधिक घनत्व वाले द्रव में हाइड्रोमीटर कम डूबेगा, तथा कम घनत्व वाले द्रव में अधिक डूबेगा। दूध में पानी मिलाने पर उसका घनत्व घट जाता है (क्योंकि पानी दूध से कम घना होता है), जिसे हाइड्रोमीटर द्वारा आसानी से जाँचा जा सकता है — इसी सिद्धांत का उपयोग पेट्रोल की शुद्धता जाँचने में भी किया जाता है। ध्यान रहे कि द्रव में किसी वस्तु के गिरने की अधिकतम स्थिर गति (Terminal Velocity) श्यानता व स्टोक्स नियम (जिसे हमने पिछले अध्याय में पढ़ा) से भी जुड़ी होती है — उत्प्लावन बल व श्यान बल दोनों मिलकर किसी गिरती वस्तु की अंतिम स्थिर गति तय करते हैं।
जर्मन खगोलशास्त्री योहानेस केप्लर (1571–1630) ने अपने गुरु टाइको ब्राहे द्वारा लगभग 20 वर्षों तक बिना दूरबीन के, केवल आँखों व सरल यंत्रों से किए गए ग्रहों की स्थिति के अत्यंत सटीक प्रेक्षणों के विशाल आँकड़ों का गहन विश्लेषण करके वर्ष 1609 से 1619 के बीच तीन महत्वपूर्ण नियम प्रतिपादित किए। सबसे रोचक बात यह है कि ये नियम न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण नियम से भी लगभग 70 वर्ष पहले खोजे गए थे, अर्थात केप्लर ने बिना यह जाने कि "क्यों" ग्रह इस तरह चलते हैं, केवल आँकड़ों के आधार पर यह बता दिया था कि वे "कैसे" चलते हैं। बाद में न्यूटन ने अपने ही गुरुत्वाकर्षण नियम की सहायता से यह गणितीय रूप से सिद्ध कर दिखाया कि केप्लर के तीनों अनुभव-सिद्ध नियम वास्तव में गुरुत्वाकर्षण के नियम का ही स्वाभाविक परिणाम हैं।
प्रत्येक ग्रह सूर्य के चारों ओर एक पूर्ण वृत्त में नहीं, बल्कि दीर्घवृत्त (Ellipse, अर्थात कुछ चपटा हुआ वृत्त) आकार की कक्षा में परिक्रमा करता है, जिसमें सूर्य दीर्घवृत्त के दो केंद्र-बिंदुओं में से एक नाभि (Focus) पर स्थित होता है — केंद्र (Centre) पर नहीं। इसका अर्थ यह भी है कि किसी ग्रह की सूर्य से दूरी उसकी कक्षा के दौरान लगातार थोड़ी-थोड़ी बदलती रहती है — कभी वह सूर्य के अपेक्षाकृत निकट होता है (जिसे "पेरिहेलियन" कहते हैं) तो कभी अपेक्षाकृत दूर (जिसे "एफेलियन" कहते हैं)।
सूर्य को ग्रह से जोड़ने वाली काल्पनिक रेखा (त्रिज्य रेखा या Radius Vector) समान समय-अंतराल में समान क्षेत्रफल तय करती है। इसका सीधा व अत्यंत रोचक परिणाम यह है कि जब ग्रह सूर्य के निकट (पेरिहेलियन के पास) होता है तो उसे समान क्षेत्रफल तय करने के लिए कक्षा में कम दूरी तय करनी होती है, इसलिए वह तेज़ी से गति करता है; जबकि जब ग्रह सूर्य से दूर (एफेलियन के पास) होता है, तो समान क्षेत्रफल तय करने के लिए उसे अधिक दूरी तय करनी पड़ती है, इसलिए उसका वेग धीमा हो जाता है। यह नियम वास्तव में कोणीय संवेग संरक्षण के नियम का ही एक विशेष रूप है — जैसे कोई फिगर स्केटर अपनी भुजाओं को शरीर के निकट खींचकर तेज़ी से घूमने लगता है, ठीक वैसे ही ग्रह सूर्य के निकट आने पर तेज़ी से तथा दूर जाने पर धीमी गति से चलते हैं।
किसी ग्रह के परिक्रमण काल (T, अर्थात सूर्य की एक पूरी परिक्रमा में लगने वाला समय) का वर्ग उसकी सूर्य से औसत दूरी (अर्ध-दीर्घ अक्ष, r) के घन के समानुपाती होता है। यह नियम इतना सटीक व सार्वभौमिक है कि यह अनुपात (T²/r³) सौरमंडल के सभी ग्रहों — चाहे वह छोटा बुध हो या विशाल बृहस्पति — के लिए बिल्कुल एक ही नियतांक (Constant) देता है।
T² ∝ r³ अर्थात T²/r³ = नियतांक (सभी ग्रहों के लिए समान)
विस्तृत रूप: T² = (4π²/GM) × r³
हमारे सौरमंडल में बुध ग्रह सूर्य के सबसे निकट स्थित होने के कारण (अर्थात r छोटा होने से) सबसे कम समय, केवल लगभग 88 दिनों में अपनी परिक्रमा पूरी करता है, जबकि सबसे दूर स्थित नेप्च्यून ग्रह को (अर्थात r बहुत बड़ा होने से) परिक्रमा पूरी करने में लगभग 165 पृथ्वी-वर्ष जितना लंबा समय लग जाता है — यही केप्लर के तृतीय नियम (T²∝r³) का प्रत्यक्ष व स्पष्ट प्रमाण है। इसी नियम से यह भी स्पष्ट होता है कि पृथ्वी की कक्षा में भी सूर्य से न्यूनतम दूरी (Perihelion, जनवरी माह में) तथा अधिकतम दूरी (Aphelion, जुलाई माह में) होती है, यद्यपि पृथ्वी की कक्षा वृत्त के काफी निकट है, इसलिए इस अंतर का हमारे मौसम पर सीधा बड़ा प्रभाव नहीं पड़ता (मौसम मुख्यतः पृथ्वी की धुरी के झुकाव से निर्धारित होता है)।
उपग्रह वे पिंड हैं जो किसी बड़े पिंड (जैसे ग्रह) के चारों ओर एक निश्चित कक्षा में निरंतर परिक्रमा करते हैं। ये प्राकृतिक (जैसे चंद्रमा) या कृत्रिम (जैसे INSAT, GPS उपग्रह) हो सकते हैं। किसी उपग्रह को पृथ्वी की सतह के निकट किसी वृत्ताकार कक्षा में स्थिर बनाए रखने के लिए एक निश्चित न्यूनतम वेग की आवश्यकता होती है, जिसे कक्षीय वेग (Orbital Velocity) कहा जाता है — इस वेग को समझने के लिए यह कल्पना करें कि उपग्रह पर दो प्रभाव संतुलन में हैं: गुरुत्वाकर्षण उसे लगातार पृथ्वी की ओर खींच रहा है (जिससे वह वक्र पथ पर मुड़ता है), जबकि उसका आगे का वेग उसे सीधी रेखा में भाग जाने के लिए बाध्य करता है — जब ये दोनों प्रभाव ठीक संतुलित हों, तो उपग्रह न तो पृथ्वी पर गिरता है, न ही अंतरिक्ष में दूर भाग जाता है, बल्कि एक स्थिर वृत्ताकार कक्षा में परिक्रमा करता रहता है।
कक्षीय वेग: v₀ = √(GM/r)
पृथ्वी की सतह के निकट: v₀ = √(gR) ≈ 7.9 km/s (लगभग 8 किमी/सेकंड)
आवर्त काल: T = 2π √(r³/GM)
भू-स्थिर उपग्रह वह विशेष उपग्रह है जो पृथ्वी के घूर्णन के साथ बिल्कुल समान गति से, समान दिशा (पश्चिम से पूर्व) में, भूमध्य रेखा के ठीक ऊपर परिक्रमा करता है — इसका परिणाम यह होता है कि पृथ्वी की सतह से देखने पर यह उपग्रह सदैव एक ही स्थान पर स्थिर प्रतीत होता है, मानो वह आकाश में टँगा हो। इसके लिए आवश्यक है कि उपग्रह का आवर्त काल ठीक 24 घंटे (पृथ्वी के घूर्णन काल के बराबर) हो, और केप्लर के तृतीय नियम की गणना से यह पता चलता है कि इस आवर्त काल के लिए उपग्रह को भूमध्य रेखा से लगभग 35,786 किलोमीटर (लगभग 36,000 किमी) की ऊँचाई पर स्थापित करना आवश्यक है। भारत की INSAT श्रृंखला इसी प्रकार के भू-स्थिर उपग्रहों का उदाहरण है, जिनका उपयोग दूरसंचार, टीवी प्रसारण एवं मौसम पूर्वानुमान में होता है — क्योंकि यह हमेशा एक ही जगह "दिखता" है, इसलिए ज़मीन पर स्थित डिश एंटीना को बार-बार घुमाने की ज़रूरत नहीं पड़ती।
| उपग्रह / मिशन | प्रकार / ऊँचाई | उपयोग एवं विशेष तथ्य |
|---|---|---|
| स्पुतनिक-1 (Sputnik-1) | निम्न पृथ्वी कक्षा (LEO) / ≈577 km | विश्व का प्रथम कृत्रिम उपग्रह (1957) — तत्कालीन USSR द्वारा प्रक्षेपित, अंतरिक्ष युग का आरंभ |
| INSAT श्रृंखला | भू-स्थिर (GEO) / ≈36,000 km | दूरसंचार, TV प्रसारण, मौसम पूर्वानुमान — भारत |
| NAVIC (भारत) | GEO+GSO / ≈36,000 km | भारतीय नौवहन प्रणाली — 7 उपग्रह, रक्षा व नागरिक उपयोग |
| GPS (अमेरिका) | MEO / ≈20,200 km | 25 उपग्रह — वैश्विक नेविगेशन प्रणाली |
| अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) | LEO / ≈408 km, आवर्त काल ≈92 मिनट | 16 देशों की भागीदारी वाला अनुसंधान केंद्र |
| मंगलयान (Mars Orbiter Mission) | मंगल कक्षा | भारत का प्रथम मंगल मिशन (2013) — ISRO; अत्यंत कम लागत में सफलता के लिए विश्वविख्यात |
| चंद्रयान-3 | चंद्र कक्षा | चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर सफल सॉफ्ट लैंडिंग (2023) — ISRO |
| NISAR (भारत-अमेरिका संयुक्त मिशन) | LEO / ध्रुवीय कक्षा | जुलाई 2025 में प्रक्षेपित — विश्व का पहला दोहरी-आवृत्ति (L व S बैंड) रडार इमेजिंग उपग्रह, भूकंप-भूस्खलन-हिमनद निगरानी |
पलायन वेग वह न्यूनतम वेग है जिससे कोई वस्तु किसी खगोलीय पिंड के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र को सदैव के लिए पार करके अनंत तक जा सके, अर्थात वापस कभी न लौटे। इसे ऊर्जा-संरक्षण के सिद्धांत से इस प्रकार समझा जा सकता है — यदि किसी वस्तु को इतनी गतिज ऊर्जा दे दी जाए कि वह पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण की स्थितिज ऊर्जा को ठीक-ठीक पार कर सके (अर्थात अनंत दूरी पर पहुँचते-पहुँचते उसका वेग ठीक शून्य हो जाए, न कि ऋणात्मक), तो वही न्यूनतम वेग पलायन वेग कहलाएगा।
vₑ = √(2GM/R) = √(2gR)
पृथ्वी के लिए: vₑ ≈ 11.2 किमी/सेकंड
कक्षीय वेग व पलायन वेग में संबंध: vₑ = √2 × v₀ ≈ 1.414 × v₀
यही सिद्धांत यह भी समझाता है कि किसी ग्रह या उपग्रह पर वायुमंडल क्यों बचा रहता है या क्यों नहीं — किसी गैस के अणु सदैव एक औसत वेग से गतिशील रहते हैं (ताप जितना अधिक होगा, यह वेग उतना ही अधिक होगा); यदि किसी खगोलीय पिंड का पलायन वेग गैस-अणुओं के इस औसत वेग से अधिक हो, तो अणु पिंड के गुरुत्वाकर्षण में बँधे रह जाते हैं (वायुमंडल बना रहता है); परंतु यदि पलायन वेग गैस-अणुओं के वेग से कम हो, तो अणु धीरे-धीरे अंतरिक्ष में लगातार भागते रहते हैं, जब तक कि पूरा वायुमंडल ही उड़ न जाए।
| खगोलीय पिंड | पलायन वेग | विशेष तथ्य |
|---|---|---|
| पृथ्वी | 11.2 किमी/सेकंड | वायुमंडल स्थिर है — N₂, O₂, CO₂ टिके रहते हैं |
| चंद्रमा | 2.4 किमी/सेकंड | वायुमंडल नहीं है — सभी गैसें अंतरिक्ष में उड़ गईं |
| मंगल | 5.0 किमी/सेकंड | पतला वायुमंडल — मुख्यतः CO₂ |
| बृहस्पति | 59.5 किमी/सेकंड | सघन वायुमंडल — हल्की गैसें H₂ व He भी रोक लेता है |
| ब्लैक होल | प्रकाश वेग से भी अधिक | इतना सघन कि प्रकाश भी बाहर नहीं निकल पाता |
परिक्रमा करते किसी उपग्रह में अंतरिक्ष यात्री हवा में तैरते हुए क्यों दिखाई देते हैं? इसका सीधा उत्तर यह है कि उपग्रह व यात्री दोनों ही वास्तव में लगातार पृथ्वी की ओर "गिर" रहे होते हैं — परंतु चूँकि उनका आगे का वेग इतना अधिक होता है कि पृथ्वी की सतह भी उसी दर से "मुड़ती" जाती है (पृथ्वी गोल है), इसलिए वे कभी वास्तव में सतह से नहीं टकराते, बल्कि निरंतर पृथ्वी के चारों ओर गिरते हुए परिक्रमा करते रहते हैं। चूँकि यात्री व उपग्रह दोनों समान अभिकेंद्री त्वरण (लगभग g के बराबर) से एक साथ गिर रहे होते हैं, इसलिए यात्री द्वारा उपग्रह के फर्श पर लगाया गया प्रतिक्रिया बल शून्य हो जाता है — इसी अवस्था को भारहीनता कहा जाता है।
यह समझना अत्यंत महत्वपूर्ण है कि भारहीनता का अर्थ यह कदापि नहीं है कि वहाँ गुरुत्वाकर्षण मौजूद ही नहीं है। अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) जो पृथ्वी से मात्र लगभग 408 किलोमीटर की ऊँचाई पर परिक्रमा करता है, वहाँ गुरुत्वीय त्वरण अब भी लगभग 8.7 m/s² होता है — जो पृथ्वी की सतह के 9.8 m/s² से बहुत अधिक कम नहीं है। फिर भी वहाँ यात्रियों को भारहीनता महसूस होती है, क्योंकि वे व उनका अंतरिक्ष यान दोनों एक साथ, समान दर से, निरंतर "मुक्त पतन" (Free Fall) की अवस्था में परिक्रमा कर रहे होते हैं — गुरुत्व वहाँ मौजूद है, केवल भार का अनुभव शून्य है।
चंद्रमा के असमान गुरुत्वाकर्षण खिंचाव के कारण पृथ्वी के महासागरों में जल-स्तर का उभार उत्पन्न होता है, जिसे ज्वार-भाटा कहते हैं। "असमान" खिंचाव का अर्थ यह है कि पृथ्वी के जिस भाग की सतह चंद्रमा के सबसे निकट है, वहाँ चंद्रमा का आकर्षण सबसे अधिक होता है (इसलिए वहाँ जल का उभार बनता है), जबकि पृथ्वी के केंद्र पर तथा उससे भी दूर के भाग पर आकर्षण क्रमशः कम होता जाता है — इस असमानता के कारण ही पृथ्वी की विपरीत दिशा में भी एक दूसरा उभार बन जाता है, जिससे प्रतिदिन दो बार ज्वार आते हैं।
यह एक बेहद रोचक व अक्सर पूछा जाने वाला प्रश्न है। सामान्य गुरुत्वाकर्षण बल दूरी के वर्ग (r²) के व्युत्क्रमानुपाती होता है, परंतु ज्वार उत्पन्न करने वाला बल (Tidal Force) वास्तव में दूरी के घन (r³) के व्युत्क्रमानुपाती होता है, क्योंकि यह पृथ्वी के निकट व दूर वाले हिस्सों के बीच के आकर्षण के "अंतर" पर निर्भर करता है, न कि केवल कुल आकर्षण पर। चूँकि चंद्रमा पृथ्वी के बेहद निकट है (सूर्य की तुलना में दूरी बहुत कम), इसलिए r³ में यह निकटता का प्रभाव सूर्य के बड़े द्रव्यमान के प्रभाव पर हावी हो जाता है — परिणामस्वरूप ज्वार-भाटा उत्पन्न करने में चंद्रमा का प्रभाव सूर्य से लगभग 2.2 गुना अधिक होता है, यद्यपि सूर्य का वास्तविक द्रव्यमान चंद्रमा से करोड़ों गुना अधिक है।
| प्रकार | स्थिति | विशेषता |
|---|---|---|
| दीर्घज्वार (Spring Tide) | अमावस्या/पूर्णिमा — सूर्य-चंद्र-पृथ्वी एक रेखा में | ऊँचाई अधिकतम — सूर्य व चंद्रमा दोनों के बल संयुक्त होकर कार्य करते हैं |
| लघुज्वार (Neap Tide) | अष्टमी — सूर्य व चंद्रमा समकोण पर | ऊँचाई न्यूनतम — दोनों के बल एक-दूसरे को आंशिक रूप से निष्प्रभावी करते हैं |
गुजरात का कांडला बंदरगाह भारत में सर्वाधिक ज्वार-भाटा (लगभग 12 मीटर तक की ऊँचाई) वाला क्षेत्र है, जिसके कारण वहाँ जलयानों के आवागमन का समय ज्वार की स्थिति के अनुसार सावधानीपूर्वक निर्धारित करना पड़ता है। मुंबई में भी नियमित ज्वार-भाटा मछुआरों व बंदरगाह संचालन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसके अतिरिक्त, ज्वार के दौरान समुद्री जल की भारी मात्रा में गति से उत्पन्न ऊर्जा को "ज्वारीय ऊर्जा" (Tidal Energy) के रूप में पकड़कर एक स्वच्छ, नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत के रूप में भी विकसित किया जा रहा है।
गुरुत्वाकर्षण की समझ किसी एक व्यक्ति की खोज नहीं, बल्कि सदियों तक चले अवलोकन, प्रयोग व गणितीय विश्लेषण की एक सतत श्रृंखला का परिणाम है। नीचे दी गई तालिका इसी वैज्ञानिक यात्रा के प्रमुख पड़ावों को दर्शाती है।
| वैज्ञानिक (देश/काल) | गुरुत्वाकर्षण में योगदान |
|---|---|
| निकोलस कोपरनिकस (पोलैंड, 1473–1543) | सूर्यकेंद्री मॉडल — सूर्य ब्रह्मांड के केंद्र में (Heliocentric) |
| टाइको ब्राहे (डेनमार्क, 1546–1601) | 20 वर्षों तक ग्रहों की स्थिति का सटीक माप — केप्लर के आधार |
| योहानेस केप्लर (जर्मनी, 1571–1630) | ग्रहीय गति के तीन नियम — T²∝r³, दीर्घवृत्तीय कक्षा |
| गैलीलियो गैलिली (इटली, 1564–1642) | स्वतंत्र पतन — सभी वस्तुएँ समान त्वरण से गिरती हैं |
| आइज़क न्यूटन (इंग्लैंड, 1643–1727) | गुरुत्वाकर्षण का सार्वत्रिक नियम F=Gm₁m₂/r² (1687) |
| हेनरी कैवेंडिश (इंग्लैंड, 1731–1810) | G का प्रयोगशाला में प्रथम माप — टॉर्शन बैलेंस (1798) |
| अल्बर्ट आइंस्टीन (जर्मनी, 1879–1955) | सामान्य सापेक्षता सिद्धांत — गुरुत्व = स्पेस-टाइम वक्रता |
| एस. चंद्रशेखर (भारत, 1910–1995) | चंद्रशेखर सीमा — तारों की मृत्यु का सिद्धांत, नोबेल 1983 |