सोचो — एक क्रिकेट मैच में तेज़ गेंदबाज़ दौड़ते हुए गेंद फेंकता है, बल्लेबाज़ बल्ला घुमाकर उसे सीमा-रेखा के पार भेज देता है, और स्टेडियम में बैठे हज़ारों दर्शक तालियाँ बजा उठते हैं। इस एक पल में गति, बल, संवेग, कार्य, शक्ति और ऊर्जा — भौतिकी के लगभग सारे मूल सिद्धांत एक साथ काम कर रहे होते हैं, भले ही किसी दर्शक को इसका एहसास तक न हो। इस अध्याय में हम इन्हीं सिद्धांतों को इतनी गहराई और सरलता से समझेंगे कि कोई भी अवधारणा अधूरी या अस्पष्ट न रह जाए।
जब कोई वस्तु समय के साथ अपनी स्थिति (Position) बदलती है, तो उसे गति कहा जाता है। गति सदैव सापेक्ष (Relative) होती है — अर्थात किसी वस्तु की गति का वर्णन सदैव किसी संदर्भ बिंदु (Reference Point) के सापेक्ष ही किया जाता है, स्वयं में गति जैसी कोई पूर्ण (Absolute) अवस्था नहीं होती। उदाहरण के लिए, चलती ट्रेन में बैठा यात्री अपने बगल में बैठे सह-यात्री के सापेक्ष पूर्णतः स्थिर है, परंतु प्लेटफॉर्म पर खड़े व्यक्ति के सापेक्ष वह तेज़ी से गतिमान है — दोनों बातें एक साथ, एक ही समय पर सत्य हैं, क्योंकि संदर्भ बिंदु अलग-अलग हैं।
दैनिक जीवन में हमें अनेक प्रकार की गति देखने को मिलती है, और यह जानना ज़रूरी है कि कोई गति किस श्रेणी में आती है, क्योंकि हर प्रकार की गति का गणितीय विश्लेषण अलग ढंग से किया जाता है। इन्हें मुख्यतः सात वर्गों में बाँटा जाता है।
| गति का प्रकार | विस्तृत व्याख्या | उदाहरण |
|---|---|---|
| एकसमान गति (Uniform) | जब कोई वस्तु बराबर समय-अंतरालों में बिल्कुल बराबर दूरी तय करे, तो उसका त्वरण शून्य होता है — अर्थात वेग में कोई परिवर्तन नहीं होता | सीधी, खाली सड़क पर क्रूज़ कंट्रोल पर चलती कार |
| असमान गति (Non-Uniform) | जब बराबर समय-अंतरालों में तय की गई दूरी असमान हो, तो वस्तु का त्वरण शून्य नहीं होता — वेग या तो बढ़ रहा है या घट रहा है | स्टेशन से रफ़्तार पकड़ती ट्रेन, ऊँचाई से गिरता पत्थर |
| रेखीय गति (Linear/Rectilinear) | जब वस्तु एक ही सीधी रेखा में आगे बढ़े, बिना किसी मोड़ के | फेंकी गई गोली (शुरुआती पथ में), लिफ्ट की सीधी ऊपर-नीचे गति |
| वृत्तीय गति (Circular) | जब वस्तु एक निश्चित त्रिज्या के वृत्ताकार पथ पर घूमे — इसके लिए केंद्र की ओर एक अभिकेंद्री बल (Centripetal Force) निरंतर आवश्यक होता है | पृथ्वी का सूर्य के चारों ओर परिक्रमण, पंखे की ब्लेड की नोक |
| दोलन गति (Oscillatory) | जब वस्तु एक निश्चित केंद्रीय बिंदु या स्थिति के इर्द-गिर्द बार-बार आगे-पीछे गति करे | झूला, घड़ी का पेंडुलम, गिटार के तार का कंपन, हृदय की धड़कन |
| आवर्त गति (Periodic) | जब कोई गति नियमित एवं निश्चित समय-अंतराल के बाद स्वयं को बिल्कुल दोहराए | पृथ्वी का अपनी धुरी पर घूर्णन (प्रतिदिन), घड़ी की सुइयों की गति |
| प्रक्षेप्य गति (Projectile) | जब किसी वस्तु को एक कोण पर फेंका जाए, तो वह एक साथ क्षैतिज (स्थिर वेग से) तथा ऊर्ध्वाधर (गुरुत्व द्वारा त्वरित) गति करती है, जिससे उसका समग्र पथ परवलयाकार (Parabolic) बनता है | क्रिकेट में उछाला गया कैच, तोप का गोला, फव्वारे का पानी |
घूमता हुआ सीलिंग पंखा एक ही समय में कई प्रकार की गति का उदाहरण प्रस्तुत करता है — इसकी ब्लेड की नोक वृत्तीय गति (Circular Motion) करती है, हर एक चक्कर अपने आप में आवर्त गति (Periodic Motion) है (क्योंकि निश्चित समय बाद वही स्थिति दोहराई जाती है), तथा जब आप स्विच से पंखे की गति धीमी-तेज़ करते हैं, तो वह असमान गति (Non-uniform) दर्शाता है — इससे स्पष्ट है कि गति के ये वर्गीकरण आपस में एक-दूसरे को काटते नहीं, बल्कि एक ही वस्तु में एक साथ उपस्थित हो सकते हैं।
जब कोई वस्तु एक स्थान से दूसरे स्थान तक गति करती है, तो उसकी गति को मापने के दो अलग-अलग तरीके हैं। दूरी वह कुल पथ है जो वस्तु ने अपनी गति के दौरान वास्तव में तय किया — चाहे वह पथ कितना भी घुमावदार, टेढ़ा-मेढ़ा क्यों न हो; यह केवल परिमाण (Scalar) रखती है, कभी ऋणात्मक नहीं हो सकती। दूसरी ओर विस्थापन वस्तु की आरंभिक स्थिति से अंतिम स्थिति तक की न्यूनतम, सीधी-रेखा दूरी है, जिसकी एक निश्चित दिशा भी होती है (Vector राशि) — इसलिए विस्थापन धनात्मक, ऋणात्मक या शून्य भी हो सकता है।
इन दोनों में बुनियादी संबंध यह है कि किसी भी गति में दूरी सदैव विस्थापन से अधिक या उसके बराबर होती है, कभी कम नहीं हो सकती — क्योंकि सीधी रेखा हमेशा सबसे छोटा रास्ता होती है। यह दोनों केवल तभी बराबर होते हैं जब वस्तु बिल्कुल सीधी रेखा में, बिना पीछे मुड़े, एक ही दिशा में गति करे।
| आधार | दूरी (Distance) | विस्थापन (Displacement) |
|---|---|---|
| राशि का प्रकार | अदिश (केवल परिमाण) | सदिश (परिमाण + दिशा) |
| मान | सदैव धनात्मक | धनात्मक, ऋणात्मक या शून्य हो सकता है |
| संबंध | दूरी ≥ विस्थापन (सदैव) | दूरी = विस्थापन केवल सीधे पथ पर |
| उदाहरण | 500 मीटर के गोलाकार ट्रैक का एक पूरा चक्कर लगाने पर तय दूरी = 500 मीटर | उसी एक पूरे चक्कर में विस्थापन = शून्य, क्योंकि प्रारंभ व अंत बिंदु एक ही है |
चाल किसी वस्तु द्वारा प्रति इकाई समय में तय की गई दूरी को दर्शाती है, जबकि वेग प्रति इकाई समय में हुए विस्थापन को दर्शाता है। चाल एक अदिश राशि है (केवल यह बताती है कि वस्तु "कितनी तेज़" चल रही है), जबकि वेग एक सदिश राशि है, जो यह भी बताता है कि वस्तु "किस दिशा में" चल रही है। यही कारण है कि यदि कोई वाहन एक वृत्ताकार पथ पर स्थिर चाल से चल रहा हो, तो उसका वेग लगातार बदलता रहता है, क्योंकि दिशा हर क्षण बदल रही होती है — भले ही चाल का मान स्थिर हो।
चाल (Speed) = दूरी / समय
वेग (Velocity) = विस्थापन / समय
SI मात्रक दोनों का: मीटर/सेकंड (m/s)
जब हम कहते हैं कि किसी कार ने 100 किमी की दूरी 2 घंटे में तय की, तो हम उसकी औसत चाल (Average Speed = 50 किमी/घंटा) की बात कर रहे हैं — परंतु वास्तव में यात्रा के दौरान कार कभी तेज़ (जैसे हाईवे पर 80 किमी/घंटा) तो कभी धीमी (जैसे शहर में ट्रैफ़िक में 20 किमी/घंटा) चली होगी। किसी एक क्षण विशेष पर कार की चाल को तात्क्षणिक चाल (Instantaneous Speed) कहते हैं, और यही वह चाल है जो कार का स्पीडोमीटर हर पल दिखाता रहता है।
जब किसी वस्तु का वेग समय के साथ बदलता है — चाहे परिमाण में या दिशा में — तो इस परिवर्तन की दर को त्वरण (Acceleration) कहते हैं। यदि वेग बढ़ रहा हो तो त्वरण धनात्मक होता है (जैसे गाड़ी का एक्सीलरेटर दबाने पर), और यदि वेग घट रहा हो तो त्वरण को ऋणात्मक या मंदन (Retardation/Deceleration) कहा जाता है (जैसे ब्रेक लगाने पर)। एकसमान त्वरण (Uniform Acceleration) की स्थिति में — अर्थात जब त्वरण का मान स्वयं समय के साथ नहीं बदलता — गति के तीन समीकरण किसी भी वस्तु की गति का पूर्ण गणितीय विवरण दे देते हैं।
समीकरण 1: v = u + at (वेग–समय संबंध)
समीकरण 2: s = ut + ½at² (स्थिति–समय संबंध)
समीकरण 3: v² = u² + 2as (वेग–स्थिति संबंध)
यहाँ u = आरंभिक वेग, v = अंतिम वेग, a = त्वरण, t = समय, s = तय दूरी
इन तीनों समीकरणों को ग्राफ़ के माध्यम से भी समझा जा सकता है, जो परीक्षा की दृष्टि से भी अत्यंत उपयोगी है।
जब कोई वस्तु ऊँचाई से बिना प्रारंभिक वेग (u = 0) के गिरती है, तो पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के कारण उसका त्वरण a = g = 9.8 m/s² होता है (नीचे की दिशा में)। इस विशेष स्थिति में सामान्य समीकरण सरल होकर बन जाते हैं: v = gt (t समय बाद वेग), h = ½gt² (t समय में तय ऊँचाई), तथा v² = 2gh — इन्हीं सरलीकृत समीकरणों से यह स्पष्ट होता है कि ऊँचाई से गिरती वस्तु की गति समय के साथ लगातार तेज़ होती जाती है, और इसीलिए ज़्यादा ऊँचाई से गिरने पर चोट भी अधिक गंभीर लगती है।
सन् 1687 में सर आइज़क न्यूटन ने अपनी पुस्तक "Principia Mathematica" में गति के तीन मौलिक नियम प्रस्तुत किए, जो आज भी संपूर्ण यांत्रिकी (Mechanics) की नींव माने जाते हैं। इन नियमों की खास बात यह है कि इन्हें समझने के लिए किसी जटिल गणित की आवश्यकता नहीं, बल्कि रोज़मर्रा के अनुभवों से ही इन्हें सहजता से समझा जा सकता है। ये तीनों नियम मिलकर यह बताते हैं कि वस्तुएँ बल के अभाव या उपस्थिति में किस प्रकार व्यवहार करती हैं।
इस नियम के अनुसार, यदि कोई वस्तु विराम अवस्था में है या एकसमान वेग से सीधी रेखा में गतिमान है, तो वह तब तक उसी अवस्था में बनी रहेगी जब तक उस पर कोई असंतुलित (Unbalanced) बाहरी बल न लगाया जाए। इस नियम को कभी-कभी "जड़त्व का नियम" भी कहा जाता है, क्योंकि यह वस्तु की उस स्वाभाविक प्रवृत्ति को परिभाषित करता है जिसे जड़त्व (Inertia) कहते हैं — अर्थात वस्तु स्वयं अपनी अवस्था (चाहे विराम हो या गति) बदलने का विरोध करती है। द्रव्यमान वास्तव में जड़त्व का ही मात्रात्मक माप है — जितना अधिक द्रव्यमान, उतना ही अधिक जड़त्व, और वस्तु की अवस्था बदलना उतना ही कठिन।
जड़त्व मुख्यतः दो प्रकार का होता है — विराम का जड़त्व (Inertia of Rest), जिसमें वस्तु विराम अवस्था में बने रहना चाहती है, तथा गति का जड़त्व (Inertia of Motion), जिसमें गतिमान वस्तु अपनी गति जारी रखना चाहती है। दोनों प्रकार के जड़त्व के उदाहरण हमारे आसपास प्रचुर मात्रा में मिलते हैं।
इस नियम के अनुसार, किसी वस्तु पर लगाया गया शुद्ध (Net) बाहरी बल उसके संवेग-परिवर्तन की दर के समानुपाती होता है, तथा यह संवेग-परिवर्तन उसी दिशा में होता है जिस दिशा में बल लगाया गया है। सरल शब्दों में, यह नियम बताता है कि किसी वस्तु को गति देने या उसकी गति बदलने के लिए कितना बल चाहिए — और यही वह नियम है जिससे प्रसिद्ध समीकरण F = ma प्राप्त होता है। इस समीकरण का सीधा अर्थ है: समान बल से हल्की वस्तु में भारी वस्तु की तुलना में कहीं अधिक त्वरण उत्पन्न होगा।
F = m × a (बल = द्रव्यमान × त्वरण)
1 न्यूटन (N) = 1 kg × 1 m/s²
F = Δp/Δt (Δp = संवेग में परिवर्तन)
इसी नियम से आवेग (Impulse) की अवधारणा भी निकलती है — जब कोई बल किसी वस्तु पर एक निश्चित समय के लिए कार्य करता है, तो उससे उत्पन्न संवेग-परिवर्तन को आवेग कहते हैं। यह अवधारणा आगे "संवेग" खंड में तथा पिछले अध्याय में सीट बेल्ट व एयरबैग की व्याख्या में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
इस नियम के अनुसार प्रत्येक क्रिया (Action) के बराबर परिमाण की, परंतु ठीक विपरीत दिशा में, एक प्रतिक्रिया (Reaction) होती है — "To every action, there is an equal and opposite reaction"। यह ध्यान रखना अत्यंत महत्वपूर्ण है कि क्रिया व प्रतिक्रिया बल सदैव दो अलग-अलग वस्तुओं पर लगते हैं (एक ही वस्तु पर नहीं), इसलिए यद्यपि परिमाण में बराबर होने पर भी वे एक-दूसरे को निरस्त (Cancel) नहीं करते — यदि वे एक ही वस्तु पर लगते तो कोई भी वस्तु कभी गति ही नहीं कर पाती।
साइकिल चलाने की सरल-सी क्रिया में भी न्यूटन के तीनों नियम एक साथ काम करते हैं। पैडल मारने से पहले साइकिल विराम अवस्था में स्थिर रहती है, जो प्रथम नियम (जड़त्व) का पालन दर्शाता है। जब सवार पैडल पर बल लगाता है, तो साइकिल में उत्पन्न त्वरण उस बल तथा साइकिल व सवार के कुल द्रव्यमान पर निर्भर करता है, जो द्वितीय नियम (F=ma) को दर्शाता है। और अंत में, साइकिल के पहिए ज़मीन को पीछे की ओर धकेलते हैं, जिसकी प्रतिक्रिया में ज़मीन साइकिल को आगे की ओर धकेलती है — यह तृतीय नियम (क्रिया-प्रतिक्रिया) का उदाहरण है। इस प्रकार एक साधारण-सी सवारी में भी भौतिकी के तीनों मौलिक नियम निरंतर एक साथ कार्यरत रहते हैं।
| नियम | कथन (संक्षेप में) | मुख्य सूत्र |
|---|---|---|
| प्रथम नियम (जड़त्व) | बाहरी असंतुलित बल के बिना वस्तु अपनी विराम या एकसमान गति की अवस्था नहीं बदलती | — |
| द्वितीय नियम (संवेग) | वस्तु पर लगा शुद्ध बल उसके संवेग-परिवर्तन की दर के समानुपाती होता है | F = ma = Δp/Δt |
| तृतीय नियम (क्रिया-प्रतिक्रिया) | हर क्रिया की बराबर परिमाण व विपरीत दिशा में प्रतिक्रिया होती है, दो अलग वस्तुओं पर | F₁₂ = −F₂₁ |
संवेग किसी वस्तु के द्रव्यमान और वेग के गुणनफल के बराबर होता है, और सरल भाषा में यह "किसी वस्तु में समाहित गति की कुल मात्रा" को दर्शाता है। यह एक सदिश राशि है, जिसकी दिशा सदैव वेग की दिशा के समान होती है। यह समझना महत्वपूर्ण है कि किसी वस्तु को रोकना कितना कठिन होगा, यह केवल उसके वेग पर नहीं बल्कि उसके संवेग (द्रव्यमान व वेग दोनों) पर निर्भर करता है — इसीलिए धीमी गति से आती एक भारी ट्रक भी तेज़ गति से आती एक छोटी गेंद से रोकना कहीं अधिक कठिन हो सकता है, क्योंकि ट्रक का संवेग कहीं अधिक होता है।
संवेग p = m × v (द्रव्यमान × वेग)
संवेग संरक्षण का नियम: m₁u₁ + m₂u₂ = m₁v₁ + m₂v₂
आवेग (Impulse) J = F × t = Δp
इस अत्यंत महत्वपूर्ण नियम के अनुसार, यदि किसी निकाय (System - अर्थात परस्पर क्रिया करने वाली वस्तुओं के समूह) पर कोई बाहरी बल कार्य न कर रहा हो, तो उस निकाय का कुल संवेग सदैव नियत (स्थिर) रहता है — चाहे निकाय के अंदर की वस्तुएँ आपस में कितनी भी बार टकराएँ, फटें, या अलग हों। यह नियम वास्तव में न्यूटन के तृतीय नियम का ही एक गणितीय परिणाम है — क्योंकि जब दो वस्तुएँ टकराती हैं, तो एक-दूसरे पर बराबर व विपरीत बल लगाती हैं (क्रिया-प्रतिक्रिया), जिससे निकाय का कुल संवेग-परिवर्तन शून्य हो जाता है।
जब दो वस्तुएँ आपस में टकराती हैं, तो टक्कर के दौरान संवेग सदैव संरक्षित रहता है (जब तक कोई बाहरी बल न हो) — यह एक सार्वभौमिक नियम है, जिसका कोई अपवाद नहीं। परंतु गतिज ऊर्जा का संरक्षण होना या न होना इस बात पर निर्भर करता है कि टक्कर किस प्रकार की है, और इसी आधार पर टक्करों को दो व्यापक श्रेणियों में बाँटा जाता है।
वास्तविक जीवन में अधिकांश टक्करें पूर्णतः प्रत्यास्थ नहीं होतीं — क्योंकि टक्कर के दौरान सदैव कुछ-न-कुछ ऊर्जा ध्वनि (टकराने की आवाज़) या ऊष्मा (हल्का तापमान बढ़ना) या वस्तु के हल्के विरूपण (Deformation) में खर्च हो ही जाती है। इसीलिए वाहन दुर्घटनाओं में गाड़ी का अगला हिस्सा मुड़ जाता है (क्रम्पल ज़ोन, जिसे हमने पिछले अध्याय में पढ़ा) — यह ऊर्जा हानि को दर्शाता है, अर्थात यह एक अप्रत्यास्थ टक्कर का उदाहरण है।
फील्डर जब तेज़ गति से आती गेंद को पकड़ते समय हाथ को गेंद की दिशा में थोड़ा पीछे खींचता है, तो वह गेंद के रुकने में लगने वाले समय (Δt) को जान-बूझकर बढ़ा देता है। आवेग-संवेग संबंध (F = Δp/Δt) के अनुसार, यदि संवेग-परिवर्तन (Δp) उतना ही रहे परंतु समय (Δt) बढ़ जाए, तो हाथ पर लगने वाला बल (F) कम हो जाता है, जिससे चोट लगने की संभावना काफी घट जाती है — यह ठीक वही सिद्धांत है जो पिछले अध्याय में सीट बेल्ट व एयरबैग की व्याख्या में प्रयुक्त हुआ था।
रोज़मर्रा की भाषा में हम किसी भी शारीरिक या मानसिक प्रयास को "कार्य" कह देते हैं — जैसे परीक्षा की तैयारी करना या घंटों बैठकर सोचना। परंतु भौतिकी में कार्य की परिभाषा कहीं अधिक सटीक व सीमित है। भौतिकी में कार्य तभी माना जाता है जब किसी वस्तु पर बल लगाकर उसे वास्तव में विस्थापित (Displace) किया जाए। यदि बल लगाने के बावजूद वस्तु बिल्कुल भी विस्थापित न हो (जैसे किसी दीवार को जोर से धकेलना, पर दीवार का टस-से-मस न होना), तो भौतिकी की दृष्टि से कोई कार्य नहीं हुआ माना जाता — भले ही सामान्य बोलचाल में हमें ऐसा प्रतीत हो कि "बहुत मेहनत" लगी।
W = F × d × cosθ (θ = बल एवं विस्थापन के बीच का कोण)
SI मात्रक: जूल (J) = N·m | CGS मात्रक: अर्ग (erg), 1 J = 10⁷ अर्ग
कार्य-ऊर्जा प्रमेय: W_net = ΔKE = ½mv² − ½mu²
बल तथा विस्थापन के बीच के कोण (θ) के आधार पर कार्य तीन प्रकार का हो सकता है, और इस वर्गीकरण को समझने के लिए cosθ के मान को ध्यान में रखना उपयोगी है — क्योंकि कार्य का सूत्र (W=Fdcosθ) में cosθ ही यह तय करता है कि कार्य धनात्मक होगा, ऋणात्मक, या शून्य।
| कार्य का प्रकार | शर्त (कोण) | उदाहरण |
|---|---|---|
| धनात्मक कार्य (Positive Work) | θ < 90° (बल व विस्थापन लगभग एक ही दिशा में — cosθ धनात्मक) | किसी वस्तु को धक्का देकर आगे की ओर बढ़ाना |
| ऋणात्मक कार्य (Negative Work) | θ > 90° (बल विस्थापन के विपरीत दिशा में कार्य करे — cosθ ऋणात्मक) | घर्षण बल द्वारा गतिमान वस्तु पर लगाया गया कार्य, ब्रेक लगाकर रुकती कार पर घर्षण का कार्य |
| शून्य कार्य (Zero Work) | θ = 90° (बल व विस्थापन बिल्कुल लंबवत — cosθ = 0) | सिर पर बोझ उठाकर सीधे रास्ते पर चलना; वृत्तीय गति में अभिकेंद्री बल |
जब कुली सिर पर बोझ उठाकर बिल्कुल सीधे, समतल रास्ते पर चलता है, तो उसके द्वारा बोझ पर लगाया गया बल ऊपर की दिशा में (गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध, बोझ को सहारा देने के लिए) होता है, जबकि उसका वास्तविक विस्थापन क्षैतिज (आगे की दिशा में) होता है। चूँकि बल व विस्थापन के बीच का कोण ठीक 90° होता है, तथा cos 90° = 0, इसलिए भौतिकी की सटीक परिभाषा के अनुसार यह कार्य शून्य माना जाता है — भले ही कुली को स्पष्ट रूप से थकान महसूस हो रही हो और उसकी माँसपेशियाँ लगातार ऊर्जा खर्च कर रही हों (जो जैविक रूप से कार्य है, परंतु भौतिकी की परिभाषा में नहीं)।
कार्य-ऊर्जा प्रमेय (Work-Energy Theorem) एक अत्यंत उपयोगी नियम है, जो कहता है कि किसी वस्तु पर किया गया कुल (शुद्ध) कार्य उसकी गतिज ऊर्जा में हुए परिवर्तन के ठीक बराबर होता है। इसका सीधा व्यावहारिक अर्थ यह है कि यदि किसी वस्तु की गति बढ़ानी हो, तो उस पर धनात्मक कार्य करना होगा, और यदि गति घटानी (रोकनी) हो, तो उस पर ऋणात्मक कार्य करना होगा — जैसे गाड़ी को रोकने के लिए घर्षण बल द्वारा ऋणात्मक कार्य किया जाता है, जो उसकी गतिज ऊर्जा को क्रमशः शून्य तक घटा देता है।
शक्ति प्रति इकाई समय में किए गए कार्य की दर है — यह इस बात का माप है कि कोई कार्य "कितनी तेज़ी से" पूरा किया गया, न कि केवल "कितना" कार्य हुआ। यह समझना महत्वपूर्ण है कि दो अलग-अलग व्यक्ति बिल्कुल समान मात्रा में कार्य कर सकते हैं (जैसे दोनों एक जैसा भारी बक्सा समान ऊँचाई तक उठाएँ), परंतु जो व्यक्ति उसे कम समय में पूरा करता है, भौतिकी की दृष्टि से उसकी शक्ति अधिक मानी जाएगी।
P = W / t (कार्य / समय)
P = F × v (बल × वेग)
SI मात्रक: वाट (W) = जूल/सेकंड (J/s)
किसी मशीन की दक्षता यह दर्शाती है कि उसे दी गई कुल ऊर्जा में से कितना अनुपात वास्तव में उपयोगी कार्य में परिवर्तित होता है, तथा कितना भाग अनुपयोगी रूपों (जैसे घर्षण से उत्पन्न ऊष्मा, ध्वनि) में व्यर्थ चला जाता है। आदर्श स्थिति में किसी मशीन की दक्षता 100% होनी चाहिए (अर्थात दी गई पूरी ऊर्जा उपयोगी कार्य में बदल जाए), परंतु व्यवहार में यह कभी संभव नहीं होता, क्योंकि घर्षण व अन्य ऊर्जा-हानियों से पूर्णतः बचा नहीं जा सकता।
η = (उपयोगी ऊर्जा निर्गत / कुल ऊर्जा निवेश) × 100%
विश्राम की अवस्था में मानव शरीर लगभग 80 वाट शक्ति उत्पन्न करता है (यह मात्र शरीर के बुनियादी कार्यों — साँस लेना, रक्त-प्रवाह, पाचन — को चलाए रखने के लिए है), सामान्य दैनिक कार्य करते समय यह लगभग 150 वाट तक पहुँच जाती है, तथा अधिकतम शारीरिक प्रयास (जैसे तेज़ दौड़ना या भारी वज़न उठाना) के समय यह थोड़ी देर के लिए लगभग 2000 वाट तक भी जा सकती है। एक घंटे में मानव शरीर सामान्यतः औसतन लगभग 100 कैलोरी ऊर्जा उत्पन्न व खर्च करता है — यही कारण है कि पोषण विशेषज्ञ किसी व्यक्ति की दैनिक कैलोरी आवश्यकता की गणना करते समय उसकी शारीरिक गतिविधि के स्तर को ध्यान में रखते हैं।
ऊर्जा किसी वस्तु या निकाय की कार्य करने की क्षमता है — यदि किसी वस्तु में ऊर्जा है, तो उसमें किसी-न-किसी रूप में कार्य करने की क्षमता निहित है, भले ही वह अभी कार्य कर ही न रही हो। ऊर्जा अनेक रूपों में पाई जाती है — गतिज, स्थितिज, ऊष्मीय, रासायनिक, विद्युत, नाभिकीय, प्रकाश एवं ध्वनि ऊर्जा — और इनकी सबसे रोचक बात यह है कि ये एक रूप से दूसरे रूप में निरंतर रूपांतरित होती रहती हैं, कभी स्थिर नहीं रहतीं।
किसी वस्तु में उसकी गति के कारण जो ऊर्जा उपस्थित होती है, उसे गतिज ऊर्जा कहते हैं — अर्थात कोई भी गतिमान वस्तु (चाहे वह कितनी ही छोटी या धीमी क्यों न हो) कुछ-न-कुछ गतिज ऊर्जा अवश्य रखती है, जबकि विराम अवस्था में उसकी गतिज ऊर्जा शून्य होती है। यह ऊर्जा वस्तु के द्रव्यमान तथा वेग के वर्ग दोनों पर निर्भर करती है — विशेष रूप से ध्यान देने योग्य बात यह है कि वेग का प्रभाव "वर्ग" के रूप में पड़ता है, अर्थात यदि वेग को दोगुना कर दिया जाए (द्रव्यमान वही रहे), तो गतिज ऊर्जा दोगुनी नहीं बल्कि चार गुनी हो जाती है — यही कारण है कि तेज़ गति से चलने वाले वाहनों की टक्कर धीमी गति की टक्करों से कहीं अधिक विनाशकारी होती है।
गतिज ऊर्जा (KE) = ½ m v²
स्थितिज ऊर्जा (PE) = m g h
यांत्रिक ऊर्जा (ME) = KE + PE = नियत (संरक्षित, जब केवल गुरुत्व कार्य करे)
किसी वस्तु में उसकी स्थिति (Position) या आकार (Configuration) के कारण जो ऊर्जा संचित रहती है, उसे स्थितिज ऊर्जा कहते हैं — यह ऊर्जा वस्तु के भीतर "छिपी" रहती है और उपयुक्त परिस्थिति मिलते ही गतिज ऊर्जा में बदल सकती है। ऊँचाई पर रखी वस्तु में गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा (Gravitational PE) होती है, जो उसकी ऊँचाई के सीधे समानुपाती होती है — जितनी अधिक ऊँचाई, उतनी अधिक संचित ऊर्जा। इसी प्रकार खिंचे हुए धनुष, दबाई गई स्प्रिंग, या खींचे गए रबर-बैंड में प्रत्यास्थ स्थितिज ऊर्जा (Elastic PE) संचित रहती है, जो छोड़ते ही तीव्र गतिज ऊर्जा में बदल जाती है — जैसे तीरंदाज़ द्वारा धनुष छोड़ने पर तीर तेज़ी से आगे की ओर छूटता है।
इस मौलिक नियम के अनुसार ऊर्जा को न तो उत्पन्न किया जा सकता है और न ही नष्ट — यह केवल एक रूप से दूसरे रूप में रूपांतरित होती रहती है, तथा ब्रह्मांड की कुल ऊर्जा सदैव नियत (स्थिर) रहती है। यह भौतिकी के सबसे मौलिक व सार्वभौमिक नियमों में से एक है, और आज तक हुए किसी भी प्रयोग में इस नियम का उल्लंघन नहीं पाया गया है।
| ऊर्जा का रूप | उदाहरण |
|---|---|
| गतिज ऊर्जा | दौड़ती कार, बहता पानी, उड़ता पक्षी |
| स्थितिज ऊर्जा | बाँध का जल, खिंचा हुआ धनुष, ऊपर उठा हथौड़ा |
| यांत्रिक ऊर्जा | KE व PE का योग — झूला, लोलक, जलप्रपात |
| ऊष्मीय ऊर्जा | आग, इंजन, भाप |
| रासायनिक ऊर्जा | भोजन, पेट्रोल, बैटरी, LPG |
| विद्युत ऊर्जा | पंखा, बल्ब, AC, मोटर |
| नाभिकीय ऊर्जा | परमाणु रिएक्टर, सूर्य |
| प्रकाश ऊर्जा | सौर ऊर्जा, प्रकाश-संश्लेषण |
| ध्वनि ऊर्जा | स्पीकर, माइक्रोफोन |
दैनिक जीवन में हम लगातार एक ऊर्जा-रूप को दूसरे में बदलते हुए देखते हैं — बैटरी में संचित रासायनिक ऊर्जा टॉर्च में विद्युत ऊर्जा से होकर प्रकाश व ऊष्मा ऊर्जा में बदलती है; बल्ब में विद्युत ऊर्जा प्रकाश तथा कुछ अंश ऊष्मा में बदलती है; कार के इंजन में पेट्रोल की रासायनिक ऊर्जा दहन (Combustion) के द्वारा यांत्रिक (गतिज) ऊर्जा में बदलकर पहियों को घुमाती है; सौर पैनल सूर्य के प्रकाश को सीधे विद्युत ऊर्जा में बदल देते हैं; तथा गिटार के तार को छेड़ने पर यांत्रिक ऊर्जा ध्वनि ऊर्जा में बदल जाती है। इन हर एक उदाहरण में ध्यान दें कि ऊर्जा गायब नहीं होती, केवल अपना रूप बदल लेती है।
E = mc² (आइंस्टीन का समीकरण, m = द्रव्यमान, c = प्रकाश का वेग ≈ 3×10⁸ m/s)
रोलर कोस्टर जब सबसे ऊँचे बिंदु पर होता है, तब उसकी स्थितिज ऊर्जा अधिकतम होती है और वेग लगभग नगण्य होता है। जैसे ही वह नीचे की ओर तेज़ी से उतरता है, यह संचित स्थितिज ऊर्जा तेज़ी से गतिज ऊर्जा में बदलने लगती है — यही कारण है कि रोलर कोस्टर नीचे की ओर सबसे तेज़ गति प्राप्त करता है, तथा उसी गति के बल पर वह अगली छोटी पहाड़ी को भी पार कर पाता है। पूरी सवारी के दौरान कुल यांत्रिक ऊर्जा (KE + PE) लगभग नियत रहती है, केवल एक छोटा-सा भाग पटरी व हवा के घर्षण के कारण ऊष्मा व ध्वनि में बदलकर हानि होता है — इसी वजह से रोलर कोस्टर को गति बनाए रखने के लिए शुरुआत में एक मोटर द्वारा सबसे ऊँचे बिंदु तक खींचा जाता है, ताकि आरंभिक स्थितिज ऊर्जा पर्याप्त हो सके।
घर्षण वह बल है जो दो सतहों के बीच सापेक्ष गति (या गति करने के प्रयास) का विरोध करता है। यह बल दोनों सतहों के सूक्ष्म स्तर पर मौजूद खुरदुरेपन (Microscopic Roughness) के आपस में उलझने के कारण उत्पन्न होता है — चाहे सतह ऊपर से देखने पर कितनी भी चिकनी क्यों न लगे, सूक्ष्म स्तर पर उसमें असंख्य छोटे-छोटे उभार व गड्ढे होते हैं। घर्षण न केवल गति को रोकता है बल्कि चलने, लिखने या ब्रेक लगाने जैसी अनेक आवश्यक क्रियाओं को भी संभव बनाता है — इसीलिए इसे "मित्र भी, शत्रु भी" कहा जाता है।
वस्तु की गति की अवस्था के अनुसार घर्षण को चार प्रकारों में बाँटा जाता है, और इनके परिमाण में एक निश्चित क्रम होता है, जिसे परीक्षा की दृष्टि से याद रखना उपयोगी है: स्थैतिक घर्षण > गतिज घर्षण > लोटनिक घर्षण।
| घर्षण का प्रकार | विशेषता एवं व्याख्या |
|---|---|
| स्थैतिक घर्षण (Static) | वस्तु के गतिमान होने से पहले, विराम अवस्था में कार्य करता है — सबसे अधिक परिमाण का होता है, क्योंकि स्थिर सतहों के बीच उभार पूरी तरह एक-दूसरे में धँसे होते हैं |
| गतिज घर्षण (Kinetic/Sliding) | जब वस्तु एक बार गति में आ जाए और फिसलती रहे, तब कार्य करता है — यह स्थैतिक घर्षण से थोड़ा कम होता है |
| लोटनिक घर्षण (Rolling) | जब वस्तु लुढ़कती (Roll करती) है, जैसे पहिया — यह सबसे न्यूनतम होता है, क्योंकि लुढ़कने में सतहों के बीच फिसलन (Sliding) की बजाय संपर्क-बिंदु लगातार बदलता रहता है |
| तरल घर्षण (Fluid Friction/Drag) | जब कोई वस्तु द्रव या गैस के भीतर से गुज़रती है, तो द्रव के अणुओं द्वारा उत्पन्न प्रतिरोध — जैसे हवा में उड़ते विमान या पानी में तैरती मछली पर लगने वाला प्रतिरोध |
f = μN (μ = घर्षण गुणांक — दोनों सतहों की प्रकृति पर निर्भर, N = अभिलंब प्रतिक्रिया बल)
घर्षण के बिना हमारा दैनिक जीवन लगभग असंभव हो जाता — बर्फ जैसी घर्षण-रहित सतह पर चलने का प्रयास करने वाला कोई भी व्यक्ति यह तुरंत समझ सकता है। परंतु यही घर्षण कई जगहों पर हानिकारक भी सिद्ध होता है।
घर्षण को नियंत्रित करने के लिए कई तरीके अपनाए जाते हैं — स्नेहक (Lubricant जैसे तेल-ग्रीस) पदार्थ की दो सतहों के बीच एक पतली फिसलन-भरी परत बना देते हैं, जिससे सीधा संपर्क कम हो जाता है; वाहनों व विमानों को हवाई-प्रवाह के अनुकूल आकार (Streamlining) दिया जाता है ताकि तरल घर्षण कम हो; तथा वस्तुओं की सतह को पॉलिश करके उसकी सूक्ष्म खुरदुरापन घटाया जाता है। परंतु सबसे रोचक उपाय है बॉल बियरिंग — साइकिल या मशीन के घूमते पहियों की धुरी में छोटी-छोटी धातु की गोलियाँ (Balls) लगाई जाती हैं, जिससे धुरी व पहिये के बीच सीधा फिसलन-घर्षण (जो अधिक होता) होने के बजाय गोलियों का लोटनिक घर्षण (जो सबसे कम होता है) कार्य करता है — इसी वजह से बॉल बियरिंग वाला पहिया हल्के से धक्के से भी काफी देर तक आसानी से घूमता रहता है।