मतदान व्यवहार (Voting Behaviour) राजनीति-विज्ञान की वह शाखा है जो यह अध्ययन करती है कि मतदाता अपने वोट का फैसला कैसे, क्यों और किन परिस्थितियों में लेते हैं। यह सिर्फ यह जानने तक सीमित नहीं कि 'किसने किसे वोट दिया', बल्कि यह समझने की कोशिश है कि वोट देने के पीछे मतदाता का मनोविज्ञान, सामाजिक पृष्ठभूमि, आर्थिक स्थिति और तात्कालिक परिस्थितियां किस तरह मिलकर काम करती हैं।
भारत जैसे विशाल, विविधतापूर्ण लोकतंत्र में मतदान व्यवहार को समझना विशेष रूप से जटिल है, क्योंकि यहां एक साथ कई कारक — जाति, धर्म, क्षेत्र, आर्थिक स्थिति, मीडिया, वैचारिक झुकाव और तात्कालिक मुद्दे — मिलकर मतदाता के फैसले को आकार देते हैं। राजनीति-शास्त्री आमतौर पर मतदान व्यवहार को समझने के लिए तीन प्रमुख सैद्धांतिक ढांचों का उपयोग करते हैं।
| सैद्धांतिक मॉडल | मुख्य तर्क |
|---|---|
| सामाजिक-मनोवैज्ञानिक मॉडल (Social-Psychological Model) | मतदाता का वोट उसकी पारिवारिक परंपरा, दल के प्रति दीर्घकालिक भावनात्मक जुड़ाव (Party Identification) पर आधारित होता है |
| सामाजिक निर्धारणवाद मॉडल (Sociological Model) | मतदाता की जाति, धर्म, वर्ग व क्षेत्र जैसी सामाजिक पहचान उसके वोट को तय करती है (देखें अध्याय 22) |
| तर्कसंगत चयन मॉडल (Rational Choice Model) | मतदाता अपने व्यक्तिगत लाभ-हानि का आकलन कर, सबसे फ़ायदेमंद विकल्प चुनता है — जैसे लाभार्थी राजनीति |
यह ऐसा है जैसे किसी परिवार में बाज़ार से सामान खरीदते समय कोई सदस्य हमेशा एक ही ब्रांड खरीदता है (पार्टी पहचान), कोई अपने समुदाय की दुकान से ही सामान लेना पसंद करता है (सामाजिक पहचान), और कोई हर बार कीमत-गुणवत्ता तुलना करके ही फैसला लेता है (तर्कसंगत चयन)। असल में ज़्यादातर मतदाता इन तीनों मॉडलों का कोई न कोई मिश्रण अपनाते हैं।
जैसा हमने अध्याय 22 में विस्तार से देखा, भारतीय मतदान व्यवहार में जाति, धर्म व क्षेत्र जैसी सामाजिक पहचान की एक लंबी और गहरी भूमिका रही है। यहां हम इन कारकों को संक्षेप में मतदान-व्यवहार के दृष्टिकोण से दोहराते हैं, ताकि पूरी तस्वीर स्पष्ट हो सके।
1. जाति (Caste) — विशेषकर उत्तर भारत में जाति-आधारित लामबंदी का मतदान पर गहरा असर रहा है — मंडल आयोग के बाद यह प्रवृत्ति और मज़बूत हुई (विस्तार से अध्याय 22, टॉपिक 2)।
2. धर्म (Religion) — धार्मिक पहचान भी कई क्षेत्रों में मतदान को प्रभावित करती है, विशेषकर बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक ध्रुवीकरण के समय।
3. क्षेत्र/भाषा (Region/Language) — क्षेत्रीय अस्मिता क्षेत्रीय दलों के मतदान आधार को मज़बूत बनाती है (विस्तार से अध्याय 21)।
4. लिंग (Gender) — जैसा अध्याय 22 में देखा, 'निर्वाचन क्षेत्र का नारीकरण' अब मतदान व्यवहार का एक स्वतंत्र, महत्वपूर्ण आयाम बन चुका है।
5. आयु (Age) — युवा मतदाता (18-35 वर्ष) अक्सर रोज़गार व डिजिटल अवसरों को प्राथमिकता देते हैं, जबकि वरिष्ठ मतदाता स्थिरता व परंपरागत मुद्दों को अधिक महत्व देते हैं।
परंपरागत सामाजिक कारकों के साथ-साथ, हाल के दशकों में कुछ नए, आधुनिक कारक भी मतदान व्यवहार को गहराई से प्रभावित करने लगे हैं।
मीडिया एवं सोशल मीडिया का प्रभाव
टेलीविज़न समाचार चैनल, और हाल के वर्षों में फेसबुक, यूट्यूब, व्हाट्सएप, एक्स (ट्विटर) जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, मतदाता की राय बनाने में केंद्रीय भूमिका निभा रहे हैं। जैसा हमने अध्याय 22 में विस्तार से देखा, अब AI-सक्षम माइक्रो-टारगेटिंग और डीपफेक जैसी तकनीकें भी इस प्रभाव को नया आयाम दे रही हैं।
कल्याणकारी योजनाएं एवं शासन-प्रदर्शन
जैसा अध्याय 22 के 'लाभार्थी राजनीति' खंड में देखा, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण जैसी पारदर्शी योजनाएं अब मतदान व्यवहार को सीधे प्रभावित करती हैं — मतदाता अक्सर उस सरकार को प्राथमिकता देते हैं जिसने उन्हें प्रत्यक्ष, मापने योग्य लाभ पहुंचाया हो।
चुनाव-पूर्व सर्वेक्षण (Opinion/Exit Polls) का प्रभाव
चुनाव-पूर्व सर्वेक्षण (Opinion Polls) और मतदान-पश्चात सर्वेक्षण (Exit Polls) भी मतदाता की धारणा को प्रभावित कर सकते हैं — इसे 'बैंडवैगन प्रभाव (Bandwagon Effect)' कहा जाता है, जहां मतदाता 'जीतने वाले' पक्ष के साथ जुड़ना पसंद करता है, या इसके विपरीत 'अंडरडॉग प्रभाव (Underdog Effect)' भी देखा जाता है, जहां सहानुभूति कमज़ोर दिख रहे पक्ष की ओर बढ़ती है। इसी कारण जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 126-क के तहत मतदान के अंतिम चरण की समाप्ति तक एग्ज़िट पोल प्रकाशित करने पर रोक है।
राजनीति-विश्लेषक अक्सर चेताते हैं कि चुनाव-पूर्व सर्वेक्षण हमेशा सटीक नहीं होते — नमूना-चयन (Sampling) में त्रुटि, 'मौन मतदाता (Silent Voter)' जैसी घटनाएं, और अंतिम समय में मतदाता के फैसले बदलने जैसी वजहों से एग्ज़िट पोल के अनुमान वास्तविक परिणामों से अक्सर भिन्न पाए जाते हैं।
भारत में स्वतंत्र, निष्पक्ष व पारदर्शी चुनाव कराना संविधान की एक बुनियादी प्रतिबद्धता है (देखें अध्याय 17 — निर्वाचन आयोग)। लेकिन समय के साथ चुनावी व्यवस्था में कई कमियां और चुनौतियां सामने आईं — बूथ कैप्चरिंग, फर्ज़ी मतदान, चुनाव में बेहिसाब धन व बाहुबल का इस्तेमाल, राजनीति का अपराधीकरण, तथा मतदाता सूचियों में गड़बड़ियां। इन्हीं समस्याओं को दूर करने के लिए समय-समय पर 'निर्वाचन सुधार (Electoral Reforms)' की मांग उठती रही है।
निर्वाचन सुधार का मूल उद्देश्य है — चुनावी प्रक्रिया को अधिक स्वतंत्र, निष्पक्ष, पारदर्शी, सहभागी (Participative) व जवाबदेह बनाना, ताकि लोकतंत्र की बुनियादी भावना — 'जनता का, जनता के लिए, जनता द्वारा शासन' — सही मायने में साकार हो सके।
भारत में निर्वाचन सुधार को लेकर पिछले पांच दशकों में कई महत्वपूर्ण समितियां व आयोग गठित हुए, जिनकी सिफारिशों ने आज की चुनावी व्यवस्था को आकार दिया।
| समिति/रिपोर्ट | वर्ष | प्रमुख सिफारिशें |
|---|---|---|
| तारकुंडे समिति | 1974-75 | राज्य द्वारा चुनाव फंडिंग (State Funding), आनुपातिक प्रतिनिधित्व का सुझाव |
| दिनेश गोस्वामी समिति | 1990 | चुनाव खर्च सीमा, मतदाता पहचान पत्र, सरकारी संसाधनों के दुरुपयोग पर रोक |
| इंद्रजीत गुप्ता समिति | 1998 | चुनावों की राज्य-वित्तपोषण की सिफारिश को दोहराया |
| विधि आयोग — 170वीं रिपोर्ट | 1999 | चुनावी कानूनों में व्यापक सुधार, राजनीतिक दलों के पंजीकरण-विनियमन |
| द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग | 2007 | शासन में नैतिकता रिपोर्ट में राजनीति के अपराधीकरण पर रोक हेतु सुझाव |
इन समितियों की कई सिफारिशें आज तक पूरी तरह लागू नहीं हो सकी हैं — विशेषकर चुनावों के राज्य-वित्तपोषण (State Funding of Elections) का प्रस्ताव, जिस पर तारकुंडे व इंद्रजीत गुप्ता, दोनों समितियों ने ज़ोर दिया, आज भी सिर्फ चर्चा का विषय बना हुआ है। हालांकि, मतदाता पहचान पत्र (Voter ID/EPIC), चुनाव खर्च सीमा, तथा EVM का इस्तेमाल जैसी कई सिफारिशें सफलतापूर्वक लागू हो चुकी हैं।
मतदाता सूची (Electoral Roll) किसी भी लोकतांत्रिक चुनाव की सबसे बुनियादी ईंट है — अगर किसी पात्र नागरिक का नाम इस सूची में नहीं है, तो वह वोट नहीं डाल सकता, चाहे वह कितना भी योग्य मतदाता क्यों न हो। भारत निर्वाचन आयोग अनुच्छेद 324 के तहत मिली शक्तियों तथा जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के प्रावधानों के अनुसार मतदाता सूचियों को तैयार व अद्यतन (Update) करने का ज़िम्मा उठाता है।
हर पात्र नागरिक (18 वर्ष या अधिक आयु का भारतीय नागरिक) को मतदाता पहचान पत्र (Elector's Photo Identity Card — EPIC) जारी किया जाता है, जो मतदाता की पहचान सत्यापित करने का मुख्य दस्तावेज़ है। मतदाता सूची को हर साल एक 'सारांश पुनरीक्षण (Summary Revision)' के ज़रिए अद्यतन किया जाता है — जिसमें नए मतदाताओं के नाम जोड़े जाते हैं, स्थानांतरित (Shifted) या मृत मतदाताओं के नाम हटाए जाते हैं, और गलतियां सुधारी जाती हैं।
सारांश पुनरीक्षण बनाम विशेष गहन पुनरीक्षण
सामान्य सारांश पुनरीक्षण एक नियमित, वार्षिक प्रक्रिया है। लेकिन कभी-कभी — जब मतदाता सूची में बहुत पुरानी, बड़े पैमाने की गड़बड़ियां जमा हो जाती हैं, जैसे भारी संख्या में मृत/स्थानांतरित मतदाताओं के नाम न हटना, या फर्ज़ी/दोहरी प्रविष्टियां — तब निर्वाचन आयोग एक ज़्यादा गहन, विस्तृत प्रक्रिया अपनाता है, जिसे 'विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision — SIR)' कहा जाता है। इसकी विस्तृत चर्चा आगे टॉपिक 8 में करेंगे।
मतदाता सूची की एक पुरानी समस्या रही है — 'बहु-पंजीकरण (Multiple Enrollment)' यानी एक ही व्यक्ति का नाम अलग-अलग जगहों (जैसे गृह-नगर व कार्य-स्थल, दोनों) पर मतदाता सूची में दर्ज होना। इस समस्या को दूर करने के लिए संसद ने 'निर्वाचन कानून (संशोधन) अधिनियम, 2021' पारित किया, जिसने जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 23 में संशोधन कर मतदाता सूची के डेटा को आधार (Aadhaar) प्रणाली से जोड़ने का कानूनी ढांचा तैयार किया।
स्वैच्छिक प्रावधान — निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी मौजूदा या संभावित मतदाता से आधार संख्या मांग सकते हैं, लेकिन यह पूर्णतः स्वैच्छिक (Voluntary) है — अनिवार्य नहीं फॉर्म 6-ख (Form 6B) — मतदाता को आधार-सत्यापन हेतु अपनी सहमति (Consent) फॉर्म 6-ख के ज़रिए देनी होती है डेटा संरक्षण — निर्वाचन आयोग आधार संख्या को अपने डेटाबेस में संग्रहीत नहीं करता — इसका इस्तेमाल सिर्फ सत्यापन (Authentication) हेतु होता है चार अर्हता तिथियां (Qualifying Dates) — पहले साल में सिर्फ 1 जनवरी को 18 वर्ष पूरे करने वालों को मतदाता सूची में जोड़ा जाता था; अब 1 जनवरी, 1 अप्रैल, 1 जुलाई व 1 अक्टूबर — चार तिथियां तय की गईं, ताकि युवा मतदाता जल्दी सूची में जुड़ सकें
इस कानून को लेकर विपक्ष व नागरिक समाज संगठनों ने गंभीर चिंताएं जताईं — उनका तर्क था कि भले ही यह 'स्वैच्छिक' कहा गया हो, व्यवहार में मतदाताओं पर आधार देने का अप्रत्यक्ष दबाव बन सकता है, और आधार-मतदाता सूची लिंकिंग से डेटा गोपनीयता (Privacy) व मतदाता-डेटा के दुरुपयोग/छेड़छाड़ का ख़तरा बढ़ सकता है — विशेषकर तब, जब निजता का अधिकार पहले ही के.एस. पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ (2017) मामले में मौलिक अधिकार घोषित हो चुका है (देखें अध्याय 4-5, 22)।
जैसा इस अध्याय की शुरुआती कहानी में देखा, 2025-26 में भारत निर्वाचन आयोग ने देशभर में मतदाता सूचियों का एक बड़े पैमाने का, अत्यंत विस्तृत पुनरीक्षण अभियान शुरू किया — जिसे 'विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision — SIR)' नाम दिया गया। आयोग के अनुसार, इसका उद्देश्य तेज़ी से बढ़ते शहरीकरण, बार-बार होने वाले प्रवासन (Migration), नए युवा मतदाताओं के जुड़ने, मृत्यु की गैर-रिपोर्टिंग, तथा अवैध विदेशी घुसपैठियों के नाम मतदाता सूची में शामिल होने जैसी दशकों पुरानी समस्याओं को दूर करना था।
चरण 1 — बिहार (2025)
SIR की शुरुआत जून 2025 में बिहार से हुई — यह राज्य विधानसभा चुनावों से ठीक पांच महीने पहले किया गया, जिसे लेकर विपक्षी दलों व नागरिक समाज संगठनों (जैसे एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स — ADR) ने तीखी आपत्ति जताई।
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स बनाम भारत निर्वाचन आयोग (2025) ADR, योगेंद्र यादव, मनोज झा व महुआ मोइत्रा सहित कई याचिकाकर्ताओं ने बिहार SIR को चुनौती देते हुए तर्क दिया कि सख्त दस्तावेज़ीकरण आवश्यकताओं और संकुचित समय-सीमा के कारण लाखों वास्तविक, पात्र मतदाता सूची से बाहर हो सकते हैं — जिससे संविधान द्वारा गारंटीकृत मताधिकार का उल्लंघन होगा। सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य न्यायाधीश की पीठ के ज़रिए अनुच्छेद 324 के तहत निर्वाचन आयोग की शक्तियों को बरकरार रखते हुए SIR की वैधता को सही ठहराया, हालांकि प्रक्रिया में पारदर्शिता व निष्पक्षता सुनिश्चित करने के निर्देश भी दिए।
चरण 2 — 12 राज्य/केंद्रशासित प्रदेश, राजस्थान सहित (2025-26)
बिहार के अनुभव के बाद, 27 अक्टूबर 2025 को मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने राष्ट्रव्यापी SIR की घोषणा की। इसके दूसरे चरण में उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, राजस्थान, छत्तीसगढ़, केरल, पुदुचेरी, अंडमान-निकोबार द्वीप समूह, लक्षद्वीप, गुजरात, मध्य प्रदेश व गोवा — कुल 12 राज्य/केंद्रशासित प्रदेश शामिल किए गए। यह चरण 4 नवंबर 2025 से शुरू होकर लगभग तीन महीने तक चला, और अंतिम मतदाता सूची 7 फरवरी 2026 को प्रकाशित हुई।
दूसरे चरण में कुल 12 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में लगभग 5.18 करोड़ नाम मतदाता सूची से हटाए गए — जिससे कुल मतदाता संख्या घटकर 45.81 करोड़ रह गई (लगभग 10.2% की कमी)। इनमें से 66.88 लाख नाम दिवंगत मतदाताओं के थे, जबकि 63.16 लाख नाम आपत्तियों व सुनवाई (Adjudication) के बाद हटाए गए। राजस्थान इसी दूसरे चरण का हिस्सा था, जहां राज्य के मतदाताओं को भी गणना फॉर्म भरकर अपनी पात्रता फिर से सत्यापित करानी पड़ी — जैसा इस अध्याय की शुरुआती कहानी में रामलाल के अनुभव से स्पष्ट है।
चरण 3 — शेष 17 राज्य व 5 केंद्रशासित प्रदेश
तीसरे व अंतिम चरण में शेष लगभग 40 करोड़ मतदाताओं को कवर किया जाना है, जिसमें हरियाणा, महाराष्ट्र, कर्नाटक, पंजाब, ओडिशा तथा राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली सहित 17 राज्य व 5 केंद्रशासित प्रदेश शामिल हैं।
| चरण | क्षेत्र | स्थिति |
|---|---|---|
| चरण 1 | बिहार | जून 2025 में पूर्ण, सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी व वैधता बरकरार |
| चरण 2 | 12 राज्य/UT — राजस्थान सहित | नवंबर 2025 - फरवरी 2026, 5.18 करोड़ नाम हटाए गए |
| चरण 3 | शेष 17 राज्य + 5 UT (दिल्ली सहित) | लगभग 40 करोड़ मतदाता, प्रक्रिया जारी |
SIR प्रक्रिया के तहत मतदाताओं को एक गणना फॉर्म भरना होता है, और यदि उनका नाम 2003 की मतदाता सूची में पहले से मौजूद नहीं है, तो उन्हें जन्म-तिथि, निवास व नागरिकता साबित करने वाले दस्तावेज़ (जैसे जन्म प्रमाण पत्र, पासपोर्ट) प्रस्तुत करने होते हैं। एक बड़ी बहस यह भी रही कि आधार कार्ड को इस प्रक्रिया में पहचान के दस्तावेज़ के रूप में तो स्वीकार किया गया, लेकिन इसे नागरिकता के प्रमाण के रूप में मान्य नहीं किया गया — आलोचकों का कहना है कि ग्रामीण, कम-साक्षर व प्रवासी मतदाताओं के लिए यह प्रक्रिया विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकती है, जबकि निर्वाचन आयोग का कहना है कि यह मतदाता सूची की शुद्धता के लिए ज़रूरी है।
परिसीमन (Delimitation) का अर्थ है — जनसंख्या में बदलाव के अनुसार लोकसभा व विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं तथा प्रत्येक राज्य को मिलने वाली सीटों की संख्या का पुनर्निर्धारण करना, ताकि हर निर्वाचन क्षेत्र में लगभग समान जनसंख्या हो और 'एक व्यक्ति, एक वोट, समान मूल्य (One Person, One Vote, One Value)' का सिद्धांत बना रहे। अनुच्छेद 82 के तहत, हर जनगणना (Census) के बाद संसद परिसीमन हेतु कानून बना सकती है।
42वें व 84वें संशोधन — सीटों की संख्या पर 'फ्रीज़' (Freeze)
1976 में 42वें संविधान संशोधन ने एक महत्वपूर्ण फैसला लिया — लोकसभा व विधानसभाओं में राज्यों की कुल सीट-संख्या को 1971 की जनगणना के आधार पर 'फ्रीज़' (यानी स्थिर) कर दिया गया। इसके पीछे तर्क था — जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण (Family Planning) में बेहतर काम किया, उन्हें सीटें घटाकर 'दंडित' नहीं किया जाना चाहिए। यह फ्रीज़ शुरू में 2000 के बाद पहली जनगणना तक के लिए था, लेकिन 2001 में 84वें संविधान संशोधन ने इसे बढ़ाकर 2026 के बाद पहली जनगणना तक के लिए कर दिया।
2026 के बाद परिसीमन — दक्षिणी राज्यों की चिंता
चूंकि यह फ्रीज़ '2026 के बाद पहली जनगणना' तक के लिए तय हुआ था, इसलिए अब यह सवाल गंभीर होता जा रहा है कि अगला परिसीमन कब और किस आधार पर होगा। दक्षिण भारत के राज्यों (जैसे तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना) ने जनसंख्या नियंत्रण में उत्तर भारत के कई राज्यों से बेहतर प्रदर्शन किया है — लेकिन अगर भावी परिसीमन शुद्ध रूप से मौजूदा जनसंख्या के आधार पर हो, तो इन राज्यों की लोकसभा सीटें अनुपातिक रूप से घट सकती हैं (या कम से कम, उत्तर भारत के तेज़ी से बढ़ती जनसंख्या वाले राज्यों की तुलना में उनका हिस्सा घट सकता है) — भले ही कुल सीटों की संख्या बढ़ाई जाए। इसी चिंता के चलते दक्षिणी राज्यों के मुख्यमंत्रियों की एक संयुक्त कार्य समिति (Joint Action Committee — JAC) ने केंद्र सरकार से 2026 के बाद भी सीटों के फ्रीज़ को अगले 25 वर्षों तक बढ़ाने की मांग की है।
यह पूरा विवाद एक दिलचस्प विडंबना को उजागर करता है — जिन राज्यों ने परिवार नियोजन कार्यक्रमों, शिक्षा व स्वास्थ्य में भारी निवेश कर जनसंख्या वृद्धि दर को नियंत्रित किया, वे अब राजनीतिक प्रतिनिधित्व के मामले में नुकसान में दिख रहे हैं, जबकि जिन राज्यों में जनसंख्या तेज़ी से बढ़ी, उन्हें अधिक सीटें मिलने की संभावना बन रही है। यह बहस केंद्र-राज्य संबंधों (देखें अध्याय 14-15) तथा संघवाद की भावना के लिए एक बड़ी परीक्षा मानी जा रही है — 2026 का 'परिसीमन विधेयक' इसी संदर्भ में संसद के समक्ष विचाराधीन है।
राजस्थान, उत्तर भारत का एक बड़ा राज्य होने के नाते, भावी परिसीमन में लोकसभा सीटों की संख्या के मामले में लाभ की स्थिति में माना जा रहा है, क्योंकि राज्य की जनसंख्या वृद्धि दर राष्ट्रीय औसत के आसपास रही है। हालांकि, राज्य के भीतर भी शहरी-ग्रामीण जनसंख्या वितरण में हुए बदलावों के अनुसार जयपुर, जोधपुर जैसे तेज़ी से बढ़ते शहरी क्षेत्रों में निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं में बदलाव की संभावना जताई जा रही है।
आदर्श आचार संहिता (Model Code of Conduct — MCC) दिशा-निर्देशों का वह समूह है जो चुनाव के दौरान राजनीतिक दलों, उम्मीदवारों व सत्तारूढ़ सरकार के आचरण को नियंत्रित करता है, ताकि सभी को समान अवसर (Level Playing Field) मिल सके।
इसकी शुरुआत 1960 में केरल विधानसभा चुनावों के दौरान राज्य प्रशासन द्वारा तैयार एक 'आचार संहिता' से हुई, जिसे 1962 के लोकसभा चुनावों में निर्वाचन आयोग ने सभी मान्यता-प्राप्त राजनीतिक दलों तक प्रसारित किया। 1974 में आयोग ने इसे औपचारिक रूप दिया, और 12 सितंबर 1979 को एक व्यापक सम्मेलन में सत्तारूढ़ दल के आचरण को भी इसके दायरे में लाया गया — ताकि सत्तारूढ़ दल अपनी सरकारी स्थिति का चुनावी लाभ न उठा सके।
प्रमुख प्रावधान
1. कोई भी दल/उम्मीदवार ऐसी कोई गतिविधि न करे जिससे मौजूदा मतभेद बढ़ें या जाति-समुदाय-धार्मिक-भाषाई तनाव पैदा हो।
2. अन्य राजनीतिक दलों की आलोचना सिर्फ उनकी नीतियों-कार्यक्रमों तक सीमित रहे, व्यक्तिगत आरोपों तक नहीं।
3. सत्तारूढ़ सरकार चुनाव प्रचार के लिए सरकारी मशीनरी, वाहन या कर्मचारियों का इस्तेमाल न करे।
4. आचार संहिता लागू होने के दौरान कोई नई योजना/परियोजना घोषित न की जाए, न ही शिलान्यास/उद्घाटन किए जाएं।
आदर्श आचार संहिता चुनाव कार्यक्रम की घोषणा के साथ ही तुरंत प्रभावी हो जाती है और पूरी चुनावी प्रक्रिया समाप्त होने तक लागू रहती है — लोकसभा चुनाव में यह पूरे देश में, जबकि विधानसभा चुनाव में संबंधित राज्य में लागू होती है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि MCC कोई कानूनी दस्तावेज़ नहीं है — इसका कोई सीधा वैधानिक आधार (Statutory Backing) नहीं है, और यह मुख्यतः राजनीतिक दलों की सहमति व निर्वाचन आयोग के अनुच्छेद 324 के तहत निहित शक्तियों पर आधारित है।
आदर्श आचार संहिता के प्रभावी क्रियान्वयन तथा चुनावी प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी व नागरिक-सहभागी बनाने के लिए, निर्वाचन आयोग ने पिछले कुछ वर्षों में कई डिजिटल मोबाइल एप्लिकेशन (Mobile Apps) विकसित किए हैं।
| ऐप/पोर्टल | लॉन्च वर्ष | उद्देश्य |
|---|---|---|
| cVIGIL (सी-विजिल) | 2018 | नागरिक फोटो/वीडियो के ज़रिए MCC उल्लंघन की शिकायत कर सकते हैं — 100 मिनट में निपटारे का लक्ष्य |
| वोटर हेल्पलाइन (Voter Helpline) | 2019 | मतदाता सूची में नाम खोजना, ऑनलाइन फॉर्म भरना, शिकायत दर्ज कराना |
| Know Your Candidate (KYC) | 2019 | उम्मीदवारों के आपराधिक इतिहास की जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराना |
| सुविधा पोर्टल (Suvidha) | 2019 | उम्मीदवारों को रैली/सभा हेतु ऑनलाइन अनुमति (Permission) की सुविधा |
2024 के लोकसभा चुनाव में cVIGIL ऐप के ज़रिए 79,000 से अधिक शिकायतें दर्ज हुईं, जिनमें से 99% से अधिक का निपटारा किया गया, और लगभग 89% शिकायतों का निपटारा 100 मिनट के भीतर हो गया। इनमें सबसे ज़्यादा (लगभग 73%) शिकायतें अवैध होर्डिंग व बैनरों को लेकर थीं। ऐप में जियो-टैगिंग (Geo-Tagging) की सुविधा है, जिससे उड़नदस्ता (Flying Squad) तुरंत मौके पर पहुंच सकता है, और वीडियो/फोटो को अदालत में सबूत के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकता है।
चुनाव में धन-बल के बढ़ते प्रभाव को नियंत्रित करने के लिए, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के तहत उम्मीदवारों के चुनाव-खर्च की एक सीमा तय की गई है। यह सीमा समय-समय पर बढ़ती महंगाई व चुनावी ज़रूरतों के अनुसार संशोधित होती रहती है।
| चुनाव | बड़े राज्य | छोटे राज्य |
|---|---|---|
| लोकसभा (प्रति उम्मीदवार) | ₹95 लाख | ₹75 लाख |
| विधानसभा (प्रति उम्मीदवार) | ₹40 लाख | ₹28 लाख |
हालांकि, यह सीमा सिर्फ 'उम्मीदवार' के व्यक्तिगत खर्च पर लागू होती है — राजनीतिक दल द्वारा किए गए खर्च (जैसे राष्ट्रीय स्तर के विज्ञापन, स्टार प्रचारकों की रैलियां) पर कोई सीमा नहीं है, जब तक कि वह किसी विशिष्ट उम्मीदवार के प्रचार पर सीधे खर्च न हो। यह खामी अक्सर आलोचना का विषय बनती है, क्योंकि इसके ज़रिए वास्तविक चुनावी खर्च तय सीमा से कहीं अधिक हो सकता है — चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार, 2024 के लोकसभा चुनाव में विजयी उम्मीदवारों ने औसतन लगभग ₹57 लाख प्रति उम्मीदवार खर्च किया।
राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे में पारदर्शिता लाने के लिए 2018 में केंद्र सरकार ने 'चुनावी बॉन्ड योजना (Electoral Bonds Scheme)' शुरू की — इसके तहत कोई भी व्यक्ति या कंपनी भारतीय स्टेट बैंक (SBI) से ब्याज-मुक्त बॉन्ड खरीदकर, अपनी पसंद के किसी राजनीतिक दल को गुमनाम रूप से दान (Donation) दे सकता था।
इस योजना को लेकर शुरू से ही यह आलोचना होती रही कि यह नागरिकों के 'जानने के अधिकार' के विपरीत है — क्योंकि आम नागरिक यह नहीं जान सकता था कि किस कंपनी/व्यक्ति ने किस दल को कितना पैसा दिया।
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स बनाम भारत संघ (2024) 15 फरवरी 2024 को, मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली 5-सदस्यीय संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से चुनावी बॉन्ड योजना को असंवैधानिक घोषित कर दिया। कोर्ट ने कहा कि यह योजना अनुच्छेद 19(1)(क) के तहत नागरिकों के सूचना के अधिकार का उल्लंघन करती है — क्योंकि मतदाताओं को यह जानने का अधिकार है कि राजनीतिक दलों को कौन धन दे रहा है, ताकि वे नीति-निर्माण पर संभावित प्रभाव को समझ सकें। कोर्ट ने SBI को तुरंत बॉन्ड जारी करना बंद करने तथा अब तक की सभी खरीद-बिक्री का पूरा विवरण निर्वाचन आयोग को सौंपने का निर्देश दिया, जिसे बाद में सार्वजनिक किया गया।
इस फैसले के बाद अब राजनीतिक दलों की फंडिंग में पारदर्शिता की दिशा में एक नई बहस शुरू हुई है — कुछ विशेषज्ञ तारकुंडे व इंद्रजीत गुप्ता समितियों की पुरानी सिफारिश, यानी चुनावों के राज्य-वित्तपोषण (State Funding), को फिर से लागू करने की वकालत कर रहे हैं, ताकि निजी दान पर निर्भरता कम हो और पारदर्शिता भी बनी रहे।
भारत में कोई भी राजनीतिक दल चुनाव लड़ने से पहले जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29-क के तहत भारत निर्वाचन आयोग के पास स्वयं को पंजीकृत (Register) कराना होता है। पंजीकरण के बाद, दल को 'चुनाव चिन्ह (आरक्षण एवं आवंटन) आदेश, 1968 (Election Symbols Order, 1968)' के तहत निर्वाचन आयोग की मान्यता (Recognition) व चुनाव चिन्ह (Symbol) मिल सकता है।
राष्ट्रीय दल बनाम राज्य दल — मान्यता के मापदंड
निर्वाचन आयोग किसी दल को 'राष्ट्रीय दल (National Party)' या 'राज्य दल (State Party)' के रूप में मान्यता देता है, जो उसे कुछ विशेष अधिकार (जैसे पूरे देश/राज्य में एक ही आरक्षित चुनाव चिन्ह, दूरदर्शन-आकाशवाणी पर मुफ्त प्रसारण समय) दिलाती है।
| मान्यता श्रेणी | मुख्य मापदंड |
|---|---|
| राष्ट्रीय दल | कम से कम 4 राज्यों में लोकसभा/विधानसभा चुनाव में 6% वोट, तथा लोकसभा में कम से कम 4 सीटें |
| राज्य दल | किसी राज्य विधानसभा चुनाव में 6% वोट व 2 सीटें, या राज्य की कुल सीटों का 3% (जो भी अधिक हो) |
यह ध्यान देने योग्य है कि निर्वाचन आयोग किसी दल की मान्यता को वापस (De-register/De-recognize) भी ले सकता है, यदि वह लगातार चुनावों में तय मापदंडों को पूरा नहीं कर पाता। पार्टी चुनाव चिन्ह से जुड़े विवाद — जैसे किसी दल में विभाजन (Split) होने पर 'असली' पार्टी व चुनाव चिन्ह किसे मिलेगा — भी निर्वाचन आयोग द्वारा ही सुलझाए जाते हैं, और यह अक्सर एक बड़ा राजनीतिक-कानूनी विवाद बनता है, जैसा हाल के वर्षों में कुछ क्षेत्रीय दलों के विभाजन के दौरान देखा गया।
भारतीय चुनावी लोकतंत्र की सबसे गंभीर चुनौतियों में से एक है 'राजनीति का अपराधीकरण' — यानी आपराधिक मामलों वाले व्यक्तियों का बड़ी संख्या में चुनाव लड़ना और जीतना। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) जैसी नागरिक संस्थाएं, उम्मीदवारों के हलफनामों (Affidavits) के आधार पर, हर चुनाव के बाद इसका विस्तृत विश्लेषण प्रकाशित करती हैं।
2024 में निर्वाचित कुल 543 सांसदों में से 251 (लगभग 46%) ने अपने चुनावी हलफनामे में स्वयं के विरुद्ध आपराधिक मामले घोषित किए — जिनमें से 170 (लगभग 31%) पर गंभीर आपराधिक आरोप (जैसे हत्या, हत्या के प्रयास, अपहरण, महिलाओं के विरुद्ध अपराध) हैं। यह 2009 के बाद से आपराधिक मामलों वाले सांसदों की संख्या में लगभग 55% की वृद्धि दर्शाता है। दिलचस्प बात यह भी है कि आपराधिक मामलों वाले उम्मीदवारों की जीत दर (15.3%) बिना आपराधिक मामलों वाले उम्मीदवारों (4.4%) से कहीं ज़्यादा रही — जो दिखाता है कि मतदाता अक्सर ऐसे उम्मीदवारों को भी बड़ी संख्या में वोट देते हैं।
पब्लिक इंटरेस्ट फाउंडेशन बनाम भारत संघ (2018) सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने निर्देश दिया कि हर उम्मीदवार को अपने आपराधिक इतिहास की जानकारी नामांकन के समय, तथा चुनाव प्रचार के दौरान कम से कम तीन बार, समाचार-पत्रों व टीवी चैनलों के माध्यम से सार्वजनिक रूप से प्रकाशित करनी होगी। साथ ही राजनीतिक दलों को भी अपनी वेबसाइट पर ऐसे उम्मीदवारों की जानकारी व उन्हें टिकट देने का कारण बताना अनिवार्य किया गया। हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उम्मीदवारी पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का अधिकार अदालत के बजाय संसद के पास है।
'इनमें से कोई नहीं (None of the Above — NOTA)' विकल्प EVM पर वह बटन है जो मतदाता को यह अधिकार देता है कि वह अपनी गोपनीयता बनाए रखते हुए यह दर्ज करा सके कि उसे चुनाव में खड़े किसी भी उम्मीदवार पर भरोसा नहीं है।
पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज़ बनाम भारत संघ (2013) 27 सितंबर 2013 को सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि मतदाताओं को 'किसी को वोट न देने' का अधिकार होना चाहिए, और यह गोपनीय तरीके से किया जा सकना चाहिए — जिससे भारत में NOTA विकल्प की शुरुआत हुई। कोर्ट ने कहा कि यह अनुच्छेद 19(1)(क) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का ही एक हिस्सा है — मतदाता को अस्वीकृति व्यक्त करने का भी उतना ही अधिकार है जितना स्वीकृति व्यक्त करने का।
हालांकि, वर्तमान व्यवस्था में NOTA सिर्फ एक 'सांकेतिक (Symbolic)' विकल्प है — भले ही किसी निर्वाचन क्षेत्र में NOTA को सबसे ज़्यादा वोट मिलें, फिर भी दूसरे सबसे ज़्यादा वोट पाने वाला उम्मीदवार ही विजयी घोषित होता है। इसीलिए एक बड़ी मांग उठती रही है कि NOTA को 'अस्वीकार का अधिकार (Right to Reject)' में बदला जाए — यानी अगर NOTA सबसे ज़्यादा वोट पाए, तो चुनाव रद्द कर दोबारा कराया जाए, और उन उम्मीदवारों को दोबारा खड़े होने से रोका जाए।
| वर्ष | NOTA वोट प्रतिशत | महत्वपूर्ण तथ्य |
|---|---|---|
| 2014 | 1.08% | पहला लोकसभा चुनाव जिसमें NOTA लागू हुआ |
| 2019 | 1.06% | बिहार में सर्वाधिक NOTA प्रतिशत दर्ज |
| 2024 | 0.99% | 63,47,509 वोट — अब तक का सबसे कम प्रतिशत, इंदौर में रिकॉर्ड 2.18 लाख NOTA वोट |
इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (Electronic Voting Machine — EVM) ने भारतीय चुनावों में बैलेट पेपर की जगह ली — इससे न सिर्फ मतगणना तेज़ हुई, बल्कि बूथ कैप्चरिंग व फर्ज़ी मतदान जैसी समस्याएं भी काफी हद तक कम हुईं। मतदाता के भरोसे को और मज़बूत करने के लिए, EVM के साथ 'मतदाता सत्यापन योग्य पेपर ऑडिट ट्रेल (Voter Verified Paper Audit Trail — VVPAT)' मशीन भी जोड़ी गई — जो हर वोट डालने के बाद 7 सेकंड के लिए एक पर्ची दिखाती है, जिस पर मतदाता अपने वोट की पुष्टि कर सकता है।
इसके बावजूद, समय-समय पर EVM की विश्वसनीयता को लेकर राजनीतिक व नागरिक समाज के स्तर पर सवाल उठते रहे हैं — विशेषकर चुनाव हारने वाले दलों की ओर से। इसी संदर्भ में ADR ने 2023 में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर मांग की कि सभी EVM वोटों का VVPAT पर्चियों से 100% मिलान किया जाए।
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स बनाम भारत निर्वाचन आयोग (2024) 26 अप्रैल 2024 को न्यायमूर्ति संजीव खन्ना व न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता की पीठ ने 100% VVPAT सत्यापन, बैलेट पेपर व्यवस्था में वापसी, तथा मतदाता द्वारा स्वयं VVPAT पर्ची सत्यापन जैसी तीनों मांगों को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि मौजूदा व्यवस्था के तहत हर विधानसभा क्षेत्र में यादृच्छिक रूप से चुनी गई 5 EVM की VVPAT पर्चियों का मिलान पहले से ही किया जाता है, और यह व्यवस्था पर्याप्त है। निर्वाचन आयोग ने भी कोर्ट में तर्क दिया कि 100% VVPAT गिनती व्यावहारिक रूप से पुरानी बैलेट-पेपर व्यवस्था में वापसी जैसा होगा, जिसमें कहीं अधिक समय व मानवीय त्रुटि की संभावना होगी।
भारत में लोकसभा व विधानसभा चुनाव 'प्रथम-अतीत-पोस्ट प्रणाली (First-Past-The-Post System — FPTP)' के तहत होते हैं — यानी किसी निर्वाचन क्षेत्र में जिस उम्मीदवार को सबसे ज़्यादा वोट मिलते हैं, वह जीत जाता है, भले ही उसे कुल वोटों का 50% से कम हिस्सा ही क्यों न मिला हो।
FPTP की आलोचना एवं आनुपातिक प्रतिनिधित्व का विकल्प
आलोचकों का तर्क है कि FPTP प्रणाली में किसी दल को मिले वोट-प्रतिशत और उसे मिली सीटों की संख्या के बीच अक्सर बड़ा असंतुलन होता है — यानी एक दल 30-35% वोट पाकर भी बहुमत की सीटें जीत सकता है, जबकि कई छोटे दल मिलकर 40-50% वोट पाने के बावजूद बहुत कम सीटें पाते हैं। इसके विपरीत, 'आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली (Proportional Representation — PR)' — जो जर्मनी, न्यूज़ीलैंड जैसे कई देशों में प्रचलित है — में सीटें दल को मिले वोट-प्रतिशत के अनुपात में बांटी जाती हैं। तारकुंडे समिति (1975) ने भी आंशिक रूप से आनुपातिक प्रतिनिधित्व अपनाने का सुझाव दिया था, लेकिन भारत की विशाल भौगोलिक विविधता व स्थानीय प्रतिनिधित्व की परंपरा को देखते हुए यह सुझाव अब तक स्वीकार नहीं किया गया।
अनिवार्य मतदान (Compulsory Voting) की बहस
एक अन्य बहस यह है कि क्या भारत में ऑस्ट्रेलिया व बेल्जियम जैसे कुछ देशों की तरह मतदान को कानूनी रूप से अनिवार्य (Compulsory) बना दिया जाए, ताकि मतदान प्रतिशत बढ़े और चुने गए प्रतिनिधि सही मायने में बहुसंख्यक जनमत का प्रतिनिधित्व करें। गुजरात राज्य ने 2009 में स्थानीय निकाय चुनावों के लिए एक कानून बनाकर अनिवार्य मतदान की कोशिश भी की थी, हालांकि इसे व्यवहार में प्रभावी ढंग से लागू नहीं किया जा सका। आलोचकों का तर्क है कि मतदान करना नागरिक का अधिकार होना चाहिए, कर्तव्य के रूप में थोपा गया दायित्व नहीं — तथा इसे लागू कराना व्यावहारिक रूप से भी अत्यंत कठिन है।
'एक राष्ट्र-एक चुनाव (One Nation One Election — ONOE)' का विचार है — लोकसभा तथा सभी राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ, एक ही समय पर कराना, ताकि बार-बार होने वाले चुनावों से बचा जा सके। ध्यान देने योग्य है कि भारत में 1967 तक लोकसभा व अधिकांश विधानसभाओं के चुनाव पहले से ही एक साथ होते थे — यह क्रम कुछ राज्य सरकारों के समय से पहले भंग (Premature Dissolution) होने के कारण टूट गया।
कोविंद समिति (2023-24)
2 सितंबर 2023 को पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में एक उच्च-स्तरीय समिति गठित की गई, जिसने 14 मार्च 2024 को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को अपनी रिपोर्ट सौंपी। समिति ने सिफारिश की कि पहले चरण में लोकसभा व सभी विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराए जाएं, और उसके 100 दिनों के भीतर, दूसरे चरण में स्थानीय निकायों (नगरपालिका व पंचायत) के चुनाव भी करा लिए जाएं।
विधेयक एवं संयुक्त संसदीय समिति (JPC)
18 सितंबर 2024 को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने समिति की सिफारिशों को स्वीकार किया, और 17 दिसंबर 2024 को लोकसभा में दो विधेयक — संविधान (129वां संशोधन) विधेयक तथा केंद्रशासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक — पेश किए गए। इन्हें विस्तृत जांच हेतु सांसद पी.पी. चौधरी की अध्यक्षता वाली 41-सदस्यीय संयुक्त संसदीय समिति (Joint Parliamentary Committee — JPC) को भेजा गया।
JPC ने गोवा, महाराष्ट्र, उत्तराखंड, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, कर्नाटक व गुजरात सहित कई राज्यों में जाकर लगभग 16 बैठकें कीं। 11 जुलाई 2026 को समिति ने कहा कि यह प्रस्ताव संविधान के अनुरूप है — जो इस पूरी प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर माना जा रहा है। समिति के अध्यक्ष ने 10 जुलाई 2026 को संकेत दिया कि यह व्यवस्था 2029 के आम चुनाव तक पूरी तरह लागू हो सकती है।
समिति द्वारा परामर्श किए गए अर्थशास्त्रियों के अनुमान के अनुसार, चुनावों को एक साथ कराने (Synchronised Elections) से बार-बार होने वाले चुनावी व्यवधानों में कमी आएगी और शासकीय निरंतरता बेहतर होगी, जिससे अर्थव्यवस्था को लगभग ₹7 लाख करोड़ तक का लाभ हो सकता है। हालांकि आलोचक यह भी तर्क देते हैं कि इससे संघीय ढांचे व क्षेत्रीय दलों की स्वायत्तता पर असर पड़ सकता है, क्योंकि राष्ट्रीय मुद्दे राज्य-स्तरीय मुद्दों पर हावी हो सकते हैं।
भारत में एक बड़ी संख्या घरेलू प्रवासी मतदाताओं (Domestic Migrants) की है — जो रोज़गार या अन्य कारणों से अपने मूल निर्वाचन क्षेत्र से दूर रहते हैं, और चुनाव के दिन अपने गृह-क्षेत्र न पहुंच पाने के कारण वोट नहीं डाल पाते। निर्वाचन आयोग के अनुसार, लगभग 30 करोड़ मतदाता किसी न किसी चुनाव में अपने मताधिकार का इस्तेमाल नहीं कर पाते, जिसका एक बड़ा कारण प्रवासन भी है।
इस समस्या के समाधान हेतु निर्वाचन आयोग ने इलेक्ट्रॉनिक्स कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (ECIL) के सहयोग से एक 'बहु-निर्वाचन क्षेत्र रिमोट वोटिंग मशीन (Multi-Constituency Remote Voting Machine — RVM)' का प्रोटोटाइप विकसित किया है — जो एक साथ 72 अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों के मतदान को एक ही दूरस्थ मतदान केंद्र से संभाल सकती है। यह मशीन पूरी तरह स्टैंडअलोन है, यानी यह इंटरनेट से जुड़ी नहीं होती।
कांग्रेस सहित राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल (यूनाइटेड), शिवसेना (उद्धव गुट), भाकपा (मार्क्सवादी), भाकपा व नेशनल कॉन्फ्रेंस जैसे कई विपक्षी दलों ने RVM के प्रस्ताव का विरोध किया है — उनका तर्क है कि 'प्रवासी मतदाता' की स्पष्ट परिभाषा तय नहीं है, प्रवासियों की सही संख्या अस्पष्ट है, तथा गोपनीयता व दुरुपयोग को लेकर पर्याप्त सुरक्षा उपाय नहीं हैं। इसी विरोध के चलते निर्वाचन आयोग ने प्रस्तावित प्रदर्शन (Demonstration) को फिलहाल टाल दिया, और यह विषय अभी बातचीत के चरण में ही है।
रिमोट वोटिंग मशीन के प्रस्ताव से पहले भी, भारतीय चुनावी व्यवस्था में कुछ विशेष श्रेणी के मतदाताओं के लिए 'डाक मतपत्र (Postal Ballot)' की सुविधा दशकों से उपलब्ध है, जिसे जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 व चुनाव संचालन नियम, 1961 के तहत विनियमित किया जाता है।
| श्रेणी | विवरण |
|---|---|
| सेवा मतदाता (Service Voters) | सशस्त्र सेना, अर्ध-सैनिक बल व विदेश में तैनात सरकारी कर्मचारी — इलेक्ट्रॉनिकली ट्रांसमिटेड पोस्टल बैलट सिस्टम (ETPBS) के ज़रिए वोट डालते हैं |
| चुनाव ड्यूटी अधिकारी | मतदान अधिकारी, सुरक्षाकर्मी व अन्य कर्मचारी, जो चुनाव के दिन अपने गृह-क्षेत्र में मतदान नहीं कर सकते |
| निर्वासित मतदाता (Preventive Detention) | निवारक निरोध में रखे गए व्यक्ति, जो जेल में हैं पर दोषसिद्ध नहीं |
| 85+ आयु व दिव्यांग मतदाता | होम वोटिंग सुविधा (विस्तार से टॉपिक 23 में) |
सेवा मतदाताओं के लिए ETPBS प्रणाली विशेष रूप से उपयोगी साबित हुई है — इसके तहत मतपत्र इलेक्ट्रॉनिक रूप से मतदाता तक भेजा जाता है, जिसे वह भरकर डाक के ज़रिए वापस भेजता है। इससे सीमा पर तैनात जवानों व विदेश में कार्यरत राजनयिकों जैसे मतदाताओं को भी अपने मताधिकार का प्रयोग करने का अवसर मिलता है, भले ही वे चुनाव के समय अपने मूल निर्वाचन क्षेत्र से हज़ारों किलोमीटर दूर क्यों न हों।
2024 का लोकसभा चुनाव भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में मतदाता भागीदारी के लिहाज़ से एक ऐतिहासिक घटना रही। निर्वाचन आयोग के अनुसार, कुल 65.79% मतदान हुआ, जिसमें लगभग 64.2 करोड़ मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया — जो दुनिया के किसी भी लोकतांत्रिक चुनाव में डाले गए वोटों की सबसे बड़ी संख्या है। तत्कालीन मुख्य निर्वाचन आयुक्त राजीव कुमार ने इसे '64.2 करोड़ गौरवशाली भारतीय मतदाताओं का विश्व-रिकॉर्ड' बताया।
इस चुनाव में पुरुष मतदान 68.80% तथा महिला मतदान 65.78% दर्ज हुआ — जैसा हमने अध्याय 22 में 'निर्वाचन क्षेत्र के नारीकरण' के संदर्भ में विस्तार से देखा। यह ध्यान देने योग्य है कि यह आंकड़ा डाक मतपत्रों (Postal Ballots) को शामिल किए बिना है — अंतिम सकल मतदान प्रतिशत (Gross Voter Turnout), डाक मतपत्रों को जोड़कर, आमतौर पर इससे थोड़ा अधिक होता है।
निर्वाचन आयोग हर चुनाव को अधिक समावेशी (Inclusive) व सुगम (Accessible) बनाने के लिए लगातार नई पहलें करता रहा है, ताकि कोई भी पात्र नागरिक — चाहे वह उम्र या शारीरिक स्थिति के कारण मतदान केंद्र तक न पहुंच सके — अपने मताधिकार से वंचित न रह जाए।
होम वोटिंग (Home Voting) — 2024 में पहली बार पूरे देश में
2024 के लोकसभा चुनाव में पहली बार, पूरे देश में, 85 वर्ष से अधिक आयु के वरिष्ठ नागरिकों तथा 40% या अधिक बेंचमार्क दिव्यांगता (Benchmark Disability) वाले मतदाताओं के लिए 'घर से मतदान (Home Voting)' की सुविधा शुरू की गई। इसके लिए पात्र मतदाता को चुनाव अधिसूचना के 5 दिनों के भीतर फॉर्म 12-घ (Form 12D) भरकर रिटर्निंग अधिकारी को देना होता है। इसके बाद दो मतदान अधिकारी, एक वीडियोग्राफर तथा एक सुरक्षाकर्मी मतदाता के घर जाकर, डाक मतपत्र (Postal Ballot) के ज़रिए उसका वोट दर्ज कराते हैं — पूरी प्रक्रिया की वीडियोग्राफी होती है ताकि पारदर्शिता बनी रहे।
देशभर में 81 लाख से अधिक 85+ आयु के मतदाता तथा 90 लाख से अधिक दिव्यांग मतदाता पंजीकृत हैं — यह विशाल संख्या दिखाती है कि यह सुविधा कितने बड़े पैमाने पर नागरिकों को लाभान्वित कर सकती है।
यह सुविधा खासतौर पर राजस्थान जैसे राज्यों में उपयोगी साबित हुई है, जहां दूरदराज़ के ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले बुज़ुर्ग व दिव्यांग मतदाताओं के लिए मतदान केंद्र तक की दूरी तय करना मुश्किल होता है — होम वोटिंग सुविधा ने उनके लिए मताधिकार का प्रयोग करना कहीं अधिक सुगम बना दिया है।
इस अध्याय में हमने भारतीय चुनावी लोकतंत्र के तीन बड़े आयामों की गहराई से पड़ताल की — मतदाता अपना फैसला कैसे लेता है, चुनावी व्यवस्था को साफ-सुथरा बनाने के लिए क्या सुधार हुए, और मतदाता सूची से लेकर मतगणना तक चुनाव वास्तव में कैसे काम करता है। ये तीनों आयाम मिलकर यह तय करते हैं कि भारत का लोकतंत्र कितना स्वस्थ, समावेशी व विश्वसनीय है।
1. पारदर्शिता की ओर बढ़ते कदम — चुनावी बॉन्ड योजना का अंत, आपराधिक हलफनामों का अनिवार्य प्रकटीकरण, तथा SIR जैसी प्रक्रियाएं — सभी पारदर्शिता व शुद्धता बढ़ाने की दिशा में उठाए गए कदम हैं, भले ही इनके क्रियान्वयन के तरीकों पर बहस जारी हो।
2. तकनीक का दोहरा असर — जहां EVM-VVPAT, cVIGIL व होम वोटिंग जैसी तकनीकें चुनाव को तेज़, सुगम व विश्वसनीय बना रही हैं, वहीं आधार-लिंकिंग व AI-सक्षम लामबंदी (देखें अध्याय 22) जैसी तकनीकें गोपनीयता व निष्पक्षता की नई चुनौतियां भी खड़ी कर रही हैं।
3. संरचनात्मक सुधार अभी अधूरे — चुनावों का राज्य-वित्तपोषण, राजनीति के अपराधीकरण पर ठोस रोक, तथा NOTA को 'अस्वीकार के अधिकार' में बदलना — ये सभी विषय दशकों से चर्चा में हैं, पर अभी तक ठोस रूप नहीं ले सके हैं।
4. बड़े संरचनात्मक बदलावों की दहलीज़ पर — एक राष्ट्र-एक चुनाव तथा 2026 का परिसीमन — दोनों ही, यदि लागू होते हैं, तो भारत की चुनावी व संघीय संरचना को गहराई से बदल सकते हैं — जिसके लिए संतुलित बहस व व्यापक सहमति ज़रूरी होगी।
5. चुनाव प्रणाली पर मूलभूत सवाल — FPTP बनाम आनुपातिक प्रतिनिधित्व जैसी बहसें दिखाती हैं कि भारत की चुनावी व्यवस्था अभी भी विकासशील (Evolving) है, और भविष्य में और बड़े बदलावों की गुंजाइश बनी हुई है।
एक जागरूक नागरिक और भावी प्रशासक के तौर पर, यह समझना ज़रूरी है कि चुनावी लोकतंत्र एक स्थिर व्यवस्था नहीं, बल्कि एक सतत विकसित होती प्रक्रिया है। SIR की प्रगति, परिसीमन 2026 पर होने वाला फैसला, एक राष्ट्र-एक चुनाव की दिशा में JPC की सिफारिशें, तथा AI-नियमन जैसे विषयों पर आने वाले वर्षों में जो फैसले लिए जाएंगे, वे भारत के लोकतांत्रिक भविष्य की दिशा तय करेंगे।
1. मतदान व्यवहार को समझने के तीन प्रमुख सैद्धांतिक मॉडल हैं — सामाजिक-मनोवैज्ञानिक, सामाजिक निर्धारणवाद व तर्कसंगत चयन; भारत में जाति-धर्म-क्षेत्र से लेकर मीडिया-AI-कल्याणकारी योजनाओं तक, सभी कारक मिलकर मतदाता के फैसले को आकार देते हैं। 2. निर्वाचन सुधार की यात्रा तारकुंडे समिति (1975) से दिनेश गोस्वामी (1990), इंद्रजीत गुप्ता (1998) व विधि आयोग की 170वीं रिपोर्ट (1999) से होते हुए आज तक जारी है — राज्य-वित्तपोषण जैसी कई सिफारिशें अभी भी अधूरी हैं। 3. निर्वाचन कानून (संशोधन) अधिनियम 2021 ने मतदाता सूची को आधार से जोड़ने का स्वैच्छिक ढांचा दिया, पर गोपनीयता को लेकर चिंताएं बनी हुई हैं। 4. 2025-26 का विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) — बिहार से शुरू होकर राजस्थान सहित 12 राज्यों (चरण 2) से गुज़रता हुआ शेष 17 राज्यों (चरण 3) तक पहुंच रहा है — सुप्रीम कोर्ट ने इसकी संवैधानिक वैधता बरकरार रखी है। 5. परिसीमन (Delimitation) — 42वें व 84वें संशोधन से 2026 तक फ्रीज़ रही सीट-संख्या अब एक बड़ी चुनौती बन गई है, जहां दक्षिणी राज्य अपने राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर चिंतित हैं। 6. आदर्श आचार संहिता (1960 से विकसित) व cVIGIL जैसी डिजिटल पहलें (2024 में 79,000+ शिकायतें) चुनावी निष्पक्षता के प्रमुख औज़ार हैं। 7. चुनाव खर्च सीमा (लोकसभा ₹95/75 लाख) व चुनावी बॉन्ड योजना का फरवरी 2024 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा असंवैधानिक घोषित होना — दोनों राजनीतिक फंडिंग में पारदर्शिता की दिशा में अहम मोड़ हैं। 8. राजनीतिक दलों का पंजीकरण व मान्यता चुनाव चिन्ह आदेश 1968 के तहत होती है; 2024 में 46% निर्वाचित सांसदों पर आपराधिक मामले थे — राजनीति के अपराधीकरण पर ठोस रोक अभी बाकी है। 9. NOTA (2013 से) आज भी सिर्फ सांकेतिक है (2024 — 0.99%), जबकि EVM-VVPAT को सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल 2024 में विश्वसनीय ठहराया। 10. FPTP बनाम आनुपातिक प्रतिनिधित्व की बहस, एक राष्ट्र-एक चुनाव (2029 लक्ष्य), रिमोट वोटिंग व सेवा मतदाताओं की व्यवस्था — सभी दिखाते हैं कि भारत की चुनावी प्रणाली निरंतर विकसित हो रही है। 11. 2024 में विश्व-रिकॉर्ड 65.79% मतदान (64.2 करोड़ मतदाता) हुआ, तथा 85+ आयु व दिव्यांग मतदाताओं के लिए पहली बार देशव्यापी होम वोटिंग सुविधा शुरू की गई — भारतीय लोकतंत्र लगातार अधिक समावेशी बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।