भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में, जहां सैकड़ों भाषाएं, दर्जनों धर्म और हज़ारों जातियां-उपजातियां मौजूद हैं, वहां राजनीति का एक स्वाभाविक तरीका रहा है — मतदाताओं को उनकी सामाजिक पहचान (Social Identity) के आधार पर संगठित करना। इसे ही 'पहचान-आधारित राजनीति (Identity Politics)' कहा जाता है — यानी जाति, धर्म, भाषा या क्षेत्र के आधार पर राजनीतिक लामबंदी (Mobilization) करना, न कि सिर्फ विचारधारा या नीतिगत मुद्दों के आधार पर।
यह समझना ज़रूरी है कि पहचान-आधारित राजनीति भारत में कोई नई बात नहीं है — आज़ादी के तुरंत बाद से ही जाति और धर्म चुनावी गणित का हिस्सा रहे हैं। जैसा हमने अध्याय 21 में राजनीति-शास्त्री रजनी कोठारी (Rajni Kothari) के 'कांग्रेस प्रणाली (Congress System)' सिद्धांत के संदर्भ में देखा, कांग्रेस पार्टी ने शुरुआती दशकों में ही विभिन्न जातीय-धार्मिक समूहों को एक 'सर्वसमावेशी छतरी (Umbrella Party)' के भीतर समेटने की रणनीति अपनाई थी — यानी पहचान-आधारित राजनीति की जड़ें भारतीय लोकतंत्र के जन्म के साथ ही जुड़ी हैं।
रुडोल्फ दंपति का "वर्टिकल" बनाम "हॉरिजॉन्टल" लामबंदी सिद्धांत
प्रसिद्ध राजनीति-शास्त्री लॉयड और सुज़ैन रुडोल्फ (Lloyd & Susanne Rudolph) ने भारतीय जाति-राजनीति को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण सिद्धांत दिया — उनके अनुसार शुरुआती दौर में जाति-लामबंदी 'वर्टिकल (Vertical)' थी, यानी एक ही गांव या क्षेत्र की अलग-अलग जातियां (ऊंची-नीची सभी) मिलकर एक स्थानीय नेता या ज़मींदार के पीछे लामबंद होती थीं। लेकिन धीरे-धीरे यह लामबंदी 'हॉरिजॉन्टल (Horizontal)' होती गई — यानी पूरे राज्य या देश में फैली एक ही जाति (जैसे सभी यादव, या सभी जाट) एक साथ, एक राजनीतिक दल या नेता के पीछे लामबंद होने लगी। यही हॉरिजॉन्टल लामबंदी आगे चलकर बड़े जाति-आधारित राजनीतिक दलों और आंदोलनों की बुनियाद बनी।
इसे ऐसे समझिए जैसे किसी बड़े परिवार में जब कोई बड़ा फैसला लेना हो, तो अक्सर लोग अपने-अपने 'खेमे' (जैसे भाई की तरफ या बहन की तरफ) से जुड़कर राय बनाते हैं, न कि सिर्फ फैसले के गुण-दोष देखकर। पहचान-आधारित राजनीति भी कुछ ऐसी ही है — मतदाता अक्सर अपनी जाति, धर्म या भाषा 'समूह' के साथ जुड़ाव महसूस करते हुए वोट डालते हैं।
| आधार (Basis) | उदाहरण |
|---|---|
| जाति (Caste) | OBC, दलित, उच्च जाति आधारित लामबंदी — जैसे उत्तर प्रदेश-बिहार में यादव, कुर्मी वोट बैंक |
| धर्म (Religion) | हिंदू-मुस्लिम आधारित ध्रुवीकरण, धार्मिक अल्पसंख्यक लामबंदी |
| भाषा/क्षेत्र (Language/Region) | तमिल, तेलुगु, पंजाबी अस्मिता — क्षेत्रीय दलों का आधार (विस्तार से अध्याय 21) |
| जनजाति (Tribe) | आदिवासी पहचान — जैसे राजस्थान में भारत आदिवासी पार्टी (BAP) |
जाति-आधारित लामबंदी को समझने के लिए हमें इसकी संस्थागत यात्रा को शुरू से देखना होगा — यह यात्रा कई आयोगों, अदालती फैसलों और राजनीतिक आंदोलनों से होकर आज तक पहुंची है।
काका कालेलकर आयोग (1953) — पहला कदम
संविधान के अनुच्छेद 340 के तहत, पिछड़े वर्गों की पहचान के लिए भारत का पहला आयोग 1953 में काका कालेलकर की अध्यक्षता में गठित हुआ। इस आयोग ने 1955 में अपनी रिपोर्ट सौंपी, जिसमें लगभग 2,399 पिछड़ी जातियों को चिह्नित किया गया था। हालांकि, तत्कालीन सरकार ने इस रिपोर्ट को लागू नहीं किया — जिसकी एक बड़ी वजह यह मानी जाती है कि खुद आयोग के अध्यक्ष ने बाद में जाति के बजाय आर्थिक आधार पर आरक्षण की सिफारिश करते हुए एक असहमति नोट (Note of Dissent) भी लिखा था।
मंडल आयोग (1979/1990) — सबसे बड़ा मोड़
भारतीय राजनीति में जाति-आधारित लामबंदी का सबसे बड़ा मोड़ आया 1990 में, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह की सरकार ने मंडल आयोग (गठन 1979, अध्यक्ष बी.पी. मंडल) की सिफारिशों को लागू किया — यानी अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को केंद्र सरकार की नौकरियों में 27% आरक्षण। यह फैसला किसी साधारण नीतिगत बदलाव से कहीं ज़्यादा था — इसने उत्तर भारतीय राजनीति की पूरी दिशा बदल दी, और देशभर में भारी विरोध-प्रदर्शन तथा आत्मदाह की घटनाएं भी हुईं।
मंडल आयोग के बाद OBC-केंद्रित राजनीतिक दलों और नेताओं का तेज़ी से उदय हुआ — जैसे उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव (समाजवादी पार्टी) और बिहार में लालू प्रसाद यादव (राष्ट्रीय जनता दल)। इन नेताओं ने जाति को एक मज़बूत राजनीतिक पूंजी में बदल दिया, और लंबे समय तक अपने-अपने राज्यों की सत्ता पर काबिज़ रहे। इसी दौर में कांशीराम के मार्गदर्शन में उभरीं मायावती के नेतृत्व में बहुजन समाज पार्टी (BSP) ने दलित राजनीति को एक नई धार दी — 'बहुजन' यानी दलित-OBC-अल्पसंख्यक गठजोड़ का सामाजिक इंजीनियरिंग मॉडल।
इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ (1992) सुप्रीम कोर्ट की 9-सदस्यीय संविधान पीठ ने मंडल आयोग की सिफारिशों को संवैधानिक रूप से वैध ठहराया, लेकिन साथ ही कुछ महत्वपूर्ण सीमाएं भी तय कीं — कुल आरक्षण किसी भी हालत में 50% की सीमा को पार नहीं कर सकता (कुछ असाधारण परिस्थितियों को छोड़कर), OBC के भीतर की संपन्न परत — 'क्रीमी लेयर (Creamy Layer)' — को आरक्षण के लाभ से बाहर रखा जाना चाहिए, तथा पदोन्नति (Promotion) में आरक्षण नहीं दिया जा सकता। यह निर्णय आज भी भारत की पूरी आरक्षण व्यवस्था की बुनियाद है।
OBC उप-वर्गीकरण — रोहिणी आयोग (2017)
समय के साथ यह मुद्दा उठा कि OBC सूची में शामिल कुछ प्रभावशाली जातियां आरक्षण का अधिकांश लाभ ले जाती हैं, जबकि अन्य कमज़ोर OBC जातियां पिछड़ी ही रह जाती हैं। इस असमानता को दूर करने के लिए 2017 में न्यायमूर्ति जी. रोहिणी की अध्यक्षता में एक आयोग गठित किया गया, जिसका काम था केंद्रीय OBC सूची की लगभग 2,600+ जातियों को उप-श्रेणियों में बांटकर आरक्षण के 27% कोटे को उनके बीच अधिक समान रूप से बांटने का सुझाव देना। आयोग ने 2023 में अपनी रिपोर्ट सौंपी — यह विषय आज भी नीतिगत क्रियान्वयन की प्रक्रिया में है।
आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग (EWS) आरक्षण — 103वां संविधान संशोधन (2019)
2019 में एक और महत्वपूर्ण कदम उठाया गया — संविधान (103वां संशोधन) अधिनियम, 2019 ने सामान्य वर्ग (जो पहले से किसी आरक्षण श्रेणी में नहीं आते) के आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्गों (Economically Weaker Sections — EWS) के लिए शिक्षा एवं सरकारी नौकरियों में 10% अलग आरक्षण की व्यवस्था की — यह पहली बार था जब आरक्षण का आधार सिर्फ जाति नहीं, बल्कि आर्थिक स्थिति भी बना।
जनहित अभियान बनाम भारत संघ (2022) सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने बहुमत (3:2) से EWS आरक्षण को संवैधानिक रूप से वैध ठहराया, और यह भी स्पष्ट किया कि यह आरक्षण इंद्रा साहनी मामले में तय 50% की सीमा का उल्लंघन नहीं करता, क्योंकि यह एक बिल्कुल अलग श्रेणी (आर्थिक आधार) के लिए है, न कि सामाजिक-शैक्षणिक पिछड़ेपन के आधार पर दिए जाने वाले पारंपरिक आरक्षण जैसा। यह फैसला दिखाता है कि भारत की आरक्षण-राजनीति अब सिर्फ जाति तक सीमित नहीं, आर्थिक आयाम भी इसमें जुड़ चुका है।
राजनीति-शास्त्री क्रिस्टोफ जाफरलो (Christophe Jaffrelot) के अनुसार, 2014 और 2019 के आम चुनावों में एक दिलचस्प बदलाव देखा गया — जाति के भीतर 'वर्ग (Class)' का तत्व ज़्यादा महत्वपूर्ण होता गया, और सिर्फ जाति-आधारित आरक्षण के वादों का चुनावी असर पहले जितना मज़बूत नहीं रहा। यानी जाति अब भी मायने रखती है, लेकिन उतनी 'निर्णायक' नहीं जितनी 1990 के दशक में थी।
| आयोग/घटना | वर्ष | प्रमुख योगदान |
|---|---|---|
| काका कालेलकर आयोग | 1953-55 | पहला पिछड़ा वर्ग आयोग, लागू नहीं हुआ |
| मंडल आयोग गठन/रिपोर्ट | 1979 | 3,743 पिछड़ी जातियां चिह्नित, 27% आरक्षण सुझाव |
| मंडल सिफारिशें लागू | 1990 | वी.पी. सिंह सरकार द्वारा केंद्रीय नौकरियों में लागू |
| इंद्रा साहनी निर्णय | 1992 | 50% सीमा एवं क्रीमी लेयर व्यवस्था तय |
| 103वां संशोधन — EWS | 2019 | सामान्य वर्ग के गरीबों को 10% आरक्षण |
| रोहिणी आयोग रिपोर्ट | 2023 | OBC उप-वर्गीकरण की सिफारिश |
जाति के साथ-साथ धर्म भी भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण पहचान-आधार रहा है। आज़ादी के समय हुए विभाजन के गहरे ज़ख्मों के बावजूद, भारत ने धर्मनिरपेक्षता (Secularism) को अपने संविधान का मूल सिद्धांत बनाया (जैसा हमने अध्याय 2 में प्रस्तावना की चर्चा में देखा)। फिर भी, समय-समय पर धार्मिक पहचान चुनावी लामबंदी का एक बड़ा औज़ार बनती रही है — चाहे वह अल्पसंख्यक समुदायों की सुरक्षा को लेकर हो, या बहुसंख्यक समुदाय की सांस्कृतिक-धार्मिक पहचान को लेकर।
मोहम्मद अहमद खान बनाम शाह बानो बेगम (1985) सुप्रीम कोर्ट ने एक तलाकशुदा मुस्लिम महिला, शाह बानो, को धर्मनिरपेक्ष आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत भरण-पोषण (Maintenance) का अधिकार दिया। इस फैसले पर कुछ मुस्लिम धार्मिक संगठनों ने विरोध जताया, और राजनीतिक दबाव में तत्कालीन सरकार ने मुस्लिम महिला (तलाक अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 1986 पारित कर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के प्रभाव को सीमित कर दिया। इस पूरे प्रकरण को अक्सर 'तुष्टिकरण की राजनीति (Politics of Appeasement)' की बहस के एक बड़े उदाहरण के रूप में देखा जाता है, और इसने आगे चलकर सांप्रदायिक राजनीति को नई हवा दी।
1980 के दशक के अंत और 1990 के दशक में राम जन्मभूमि आंदोलन ने धार्मिक पहचान को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला दिया। लालकृष्ण आडवाणी की 1990 की रथ यात्रा और 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में विवादित ढांचे के विध्वंस ने भारतीय राजनीति की दिशा में एक स्थायी बदलाव ला दिया, और भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय स्तर पर उभार में इसकी बड़ी भूमिका मानी जाती है — जैसा हमने अध्याय 21 में विस्तार से देखा।
सच्चर समिति (2006) — अल्पसंख्यक राजनीति का एक नया आयाम
2005 में तत्कालीन प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में गठित उच्च-स्तरीय समिति, जिसकी अध्यक्षता न्यायमूर्ति राजिंदर सच्चर ने की, ने 2006 में एक रिपोर्ट पेश की जिसमें भारत में मुस्लिम समुदाय की सामाजिक, आर्थिक व शैक्षणिक स्थिति का गहन अध्ययन किया गया। रिपोर्ट में पाया गया कि शिक्षा, सरकारी नौकरियों व आर्थिक भागीदारी के कई पैमानों पर मुस्लिम समुदाय अनुसूचित जाति/जनजाति के औसत से भी पीछे था। इस रिपोर्ट ने अल्पसंख्यक-केंद्रित कल्याणकारी नीतियों (जैसे बहु-क्षेत्रीय विकास कार्यक्रम) को जन्म दिया, लेकिन साथ ही यह भी बहस का विषय बना कि क्या धर्म-आधारित कल्याण योजनाएं संविधान की धर्मनिरपेक्षता की भावना के अनुकूल हैं।
वहीं दूसरी ओर, कई क्षेत्रीय व राष्ट्रीय दलों ने अल्पसंख्यक समुदायों (विशेषकर मुस्लिम मतदाताओं) को अपने पक्ष में लामबंद करने की रणनीति अपनाई। यह प्रवृत्ति आज भी भारतीय चुनावी राजनीति के विश्लेषण में एक महत्वपूर्ण पहलू बनी हुई है — और अक्सर दोनों पक्षों (बहुसंख्यक-लामबंदी बनाम अल्पसंख्यक-लामबंदी) पर एक-दूसरे को 'वोट बैंक की राजनीति' का आरोप लगाते देखा जाता है।
पहचान-आधारित राजनीति का तीसरा बड़ा स्तंभ है क्षेत्रीय और भाषाई अस्मिता। जैसा हमने पिछले अध्याय (21) में तमिलनाडु के DMK मॉडल के ज़रिए विस्तार से देखा, 1956 के भाषायी पुनर्गठन ने हर राज्य को एक अलग सांस्कृतिक-राजनीतिक पहचान दी, जो आगे चलकर क्षेत्रीय दलों की बुनियाद बनी। यही पहचान आज भी पंजाब, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश जैसे कई राज्यों की राजनीति को गहराई से प्रभावित करती है।
राजस्थान के संदर्भ में भी यह प्रवृत्ति दिख रही है — जैसा हमने पिछले अध्याय में देखा, दक्षिणी राजस्थान (वागड़ क्षेत्र) में भारत आदिवासी पार्टी (BAP) का उदय एक जनजातीय-क्षेत्रीय पहचान की राजनीति का ही उदाहरण है, जबकि नागौर क्षेत्र में राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (RLP) एक जाति-क्षेत्र आधारित राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरी है। इसी तरह हरियाणा में जाट-आंदोलन, महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण आंदोलन, और गुजरात में पाटीदार आंदोलन (2015) भी क्षेत्र-विशिष्ट सामाजिक-राजनीतिक पहचान की लामबंदी के उदाहरण हैं, जो दिखाते हैं कि यह प्रवृत्ति देश के लगभग हर हिस्से में किसी न किसी रूप में मौजूद है।
पहचान-आधारित राजनीति की एक सकारात्मक भूमिका ज़रूर रही है — इसने वंचित और हाशिए पर पड़े समुदायों (जैसे दलित, आदिवासी, OBC) को राजनीतिक आवाज़ और प्रतिनिधित्व दिलाया, जो अन्यथा शायद नहीं मिल पाता, और भारतीय लोकतंत्र को सामाजिक न्याय की दिशा में आगे बढ़ाया। लेकिन इसकी कुछ गंभीर सीमाएं भी हैं, जिन्हें समझना ज़रूरी है।
| सीमा/आलोचना | विवरण |
|---|---|
| सामाजिक ध्रुवीकरण (Polarisation) | पहचान-आधारित लामबंदी कई बार समुदायों के बीच दूरियां व तनाव बढ़ा सकती है |
| शासन-प्रदर्शन पर कम ध्यान | नेता/दल सिर्फ पहचान के सहारे वोट पाने की कोशिश करते हैं, वास्तविक विकास कार्यों पर कम ज़ोर |
| उप-समूहों की उपेक्षा | एक बड़े समुदाय के भीतर के कमज़ोर उप-समूहों (जैसे किसी जाति के भीतर की सबसे वंचित उप-जाति) की अनदेखी |
| राजनीतिक अस्थिरता | जाति/धर्म आधारित छोटे-छोटे दलों के बढ़ने से गठबंधन राजनीति और जटिल हो जाती है (देखें अध्याय 21) |
| पहचान का राजनीतिकरण | कई बार यह देखा गया है कि चुनावी लाभ के लिए पहचान को कृत्रिम रूप से और उभारा जाता है |
अर्थशास्त्री एवं राजनीति-विश्लेषक अक्सर यह तर्क देते हैं कि पहचान-आधारित राजनीति का सबसे बड़ा नुकसान यह होता है कि नीति-निर्माण (Policy-Making) की चर्चा 'क्या किया जाए' से हटकर 'किसने किया, किसके लिए किया' पर केंद्रित हो जाती है — जिससे दीर्घकालिक विकास योजनाओं पर असर पड़ता है। यही कारण है कि पिछले दशक में मुद्दा-आधारित राजनीति की मांग बढ़ी है, जिसे अगले भाग में विस्तार से समझेंगे।
पिछले एक-डेढ़ दशक में भारतीय राजनीति में एक धीमा लेकिन स्पष्ट बदलाव देखा जा रहा है — मतदाता अब सिर्फ 'मैं किस जाति/धर्म का हूं' यह नहीं, बल्कि 'मुझे क्या मिला — सड़क, बिजली, पानी, रोज़गार, स्वास्थ्य सुविधा' यह भी पूछने लगे हैं। इसे 'मुद्दा-आधारित राजनीति (Issue-Based Politics)' या 'शासन-केंद्रित राजनीति (Governance-Centric Politics)' कहा जाता है।
इस बदलाव के पीछे कई कारण हैं — शहरीकरण की तेज़ रफ्तार, शिक्षा का प्रसार, सोशल मीडिया व 24x7 समाचार चैनलों के ज़रिए बढ़ती जागरूकता, और सबसे महत्वपूर्ण — सरकारी योजनाओं का सीधा, पारदर्शी लाभ नागरिकों तक पहुंचना (जैसा हमने अध्याय 20 में प्रत्यक्ष लाभ अंतरण और जन सूचना पोर्टल के संदर्भ में देखा)। जब नागरिक को सीधे अपने बैंक खाते में पैसा या राशन मिलता दिखता है, तो वह इसका श्रेय किसी खास योजना और सरकार को देता है — न कि सिर्फ अपनी जाति या धर्म को।
"विकास" राजनीति का उदय — गुजरात व बिहार मॉडल
2000 के दशक के मध्य से भारतीय राजनीति में 'विकास (Development)' एक स्वतंत्र चुनावी नारे के रूप में उभरा — जैसे गुजरात में सड़क-बिजली-पानी और औद्योगिक निवेश पर केंद्रित 'गुजरात मॉडल', या बिहार में सड़क निर्माण, कानून-व्यवस्था सुधार व महिला-केंद्रित नीतियों (जैसे साइकिल योजना) पर आधारित 'बिहार मॉडल' — दोनों ही उदाहरण दिखाते हैं कि कैसे शासन-प्रदर्शन खुद एक बड़ा चुनावी मुद्दा बन सकता है, चाहे राज्य की सामाजिक संरचना जाति-प्रधान ही क्यों न हो।
यह ठीक वैसा ही है जैसे कोई ग्राहक किसी दुकान पर सिर्फ इसलिए नहीं जाता कि दुकानदार उसकी बिरादरी का है, बल्कि यह देखकर जाता है कि किस दुकान पर सामान अच्छा और सस्ता मिलता है। धीरे-धीरे भारतीय मतदाता भी 'सेवा वितरण (Service Delivery)' के प्रदर्शन के आधार पर वोट देने लगे हैं — चाहे वह पानी की योजना हो, सड़क हो, या मुफ्त राशन।
मुद्दा-आधारित राजनीति को समझने के लिए सबसे बेहतरीन समकालीन उदाहरण है आम आदमी पार्टी (Aam Aadmi Party — AAP) का उदय। 2011 में अन्ना हज़ारे के नेतृत्व में भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन (जन लोकपाल आंदोलन) से निकलकर, 2012 में अरविंद केजरीवाल ने एक नई राजनीतिक पार्टी बनाई — जो किसी परंपरागत जाति, धर्म या क्षेत्रीय पहचान पर आधारित नहीं थी, बल्कि पूरी तरह भ्रष्टाचार-विरोध, बिजली-पानी, शिक्षा व स्वास्थ्य जैसे 'रोज़मर्रा के मुद्दों' पर केंद्रित थी।
2013 और 2015 के दिल्ली विधानसभा चुनावों में AAP की जीत ने यह साबित किया कि शुद्ध रूप से मुद्दा-आधारित, शासन-केंद्रित राजनीति भी बड़ी चुनावी सफलता दिला सकती है — मुफ्त बिजली-पानी की सीमा, सरकारी स्कूलों व मोहल्ला क्लीनिकों में सुधार जैसे ठोस, मापने योग्य वादों के आधार पर पार्टी ने लगातार जीत हासिल की। यह मॉडल आगे चलकर पंजाब (2022) में भी दोहराया गया, जहां AAP ने पारंपरिक जाति-आधारित दलों (कांग्रेस, अकाली दल) को हराकर सत्ता हासिल की।
आलोचक यह भी बताते हैं कि लंबे समय में शुद्ध मुद्दा-आधारित राजनीति को भी स्थानीय जाति-समीकरणों और गठबंधनों की ज़रूरत पड़ती है — जैसे पंजाब व दिल्ली, दोनों जगह AAP ने भी उम्मीदवार चयन में जातीय-सामाजिक संतुलन का ध्यान रखा। इसलिए विशेषज्ञ मानते हैं कि आज की भारतीय राजनीति में पहचान और मुद्दे, दोनों साथ-साथ काम करते हैं — एक पूरी तरह दूसरे की जगह नहीं लेता, बल्कि दोनों मिलकर मतदाता के फैसले को आकार देते हैं।
मुद्दा-आधारित राजनीति के इस दौर में एक नई राजनीतिक शब्दावली उभरी है — 'लाभार्थी राजनीति (Beneficiary Politics)'। इसका मतलब है — सरकार किसी कल्याणकारी योजना (जैसे मुफ्त राशन, सीधा नकद हस्तांतरण, आवास योजना) का लाभ सीधे नागरिक के बैंक खाते या घर तक पहुंचाती है, और नागरिक इस मदद को याद रखकर उसी सरकार को दोबारा वोट देता है — बिचौलियों (जैसे स्थानीय नेता या पार्टी कार्यकर्ता) की भूमिका के बिना।
प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (Direct Benefit Transfer — DBT) व्यवस्था ने इस राजनीति को और मज़बूत किया है। उदाहरण के लिए, 'पीएम किसान सम्मान निधि' योजना, जो हर साल किसानों को ₹6,000 सीधे उनके खाते में देती है, 2019 के आम चुनावों से ठीक कुछ हफ्ते पहले शुरू हुई थी, और पहली किस्त मतदान से कुछ दिन पहले ही जारी की गई। शोधकर्ताओं ने पाया है कि जिन निर्वाचन क्षेत्रों में महिलाओं ने विशेष रूप से ज़्यादा मतदान किया, उनमें से अधिकांश में सत्तारूढ़ गठबंधन को जीत मिली — जो दिखाता है कि कल्याणकारी योजनाएं और महिला मतदान के बीच एक गहरा संबंध बनता जा रहा है।
| योजना | स्तर | लाभ |
|---|---|---|
| पीएम किसान सम्मान निधि | केंद्र | ₹6,000/वर्ष सीधे किसानों के खाते में |
| आयुष्मान भारत योजना | केंद्र | ₹5 लाख तक मुफ्त स्वास्थ्य बीमा |
| प्रधानमंत्री आवास योजना | केंद्र | पक्के मकान हेतु आर्थिक सहायता |
| उज्ज्वला योजना | केंद्र | मुफ्त LPG गैस कनेक्शन |
| मुख्यमंत्री चिरंजीवी स्वास्थ्य बीमा योजना | राजस्थान | ₹25 लाख तक कैशलेस इलाज |
| इंदिरा गांधी शहरी/ग्रामीण रोज़गार गारंटी | राजस्थान | शहरी क्षेत्रों में रोज़गार गारंटी |
'लाभार्थी राजनीति' को लेकर एक बड़ी बहस भी चलती है — कुछ विश्लेषक इसे 'मुफ्त उपहार (Freebies)' की राजनीति कहकर आलोचना करते हैं, यह तर्क देते हुए कि यह राज्यों के खजाने पर बोझ डालती है, जबकि अन्य इसे ज़रूरी सामाजिक सुरक्षा और वास्तविक कल्याण मानते हैं। सुप्रीम कोर्ट में भी चुनाव-पूर्व मुफ्त सुविधाओं की घोषणाओं को विनियमित करने से जुड़ी याचिकाएं और बहसें चल चुकी हैं, तथा भारत निर्वाचन आयोग व नीति आयोग जैसी संस्थाएं भी इस पर राय दे चुकी हैं।
मुद्दा-आधारित राजनीति की ओर बदलाव को कुछ और सामाजिक बदलाव भी गति दे रहे हैं। तेज़ी से बढ़ता शहरीकरण (Urbanisation) एक बड़ा कारक है — शहरों में परंपरागत जाति-आधारित सामाजिक ढांचा गांवों जितना मज़बूत नहीं रहता, इसलिए शहरी मतदाता अक्सर रोज़गार, यातायात, प्रदूषण जैसे मुद्दों पर ज़्यादा ध्यान देते हैं। इसी तरह बढ़ता मध्यम वर्ग (Middle Class) कर-नीति, महंगाई और आर्थिक अवसरों को लेकर ज़्यादा मुखर होता जा रहा है।
भारत की युवा जनसंख्या (जिसे अक्सर 'जनसांख्यिकीय लाभांश — Demographic Dividend' कहा जाता है) भी राजनीति में एक नया आयाम जोड़ रही है — रोज़गार, कौशल विकास (Skill Development), डिजिटल अवसर जैसे मुद्दे युवा मतदाताओं के लिए पहचान-आधारित सवालों से ज़्यादा महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं। भारत निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के अनुसार, हर आम चुनाव में 1.5 से 2 करोड़ नए युवा मतदाता (18-19 वर्ष आयु वर्ग) पहली बार वोट डालते हैं — यह विशाल संख्या राजनीतिक दलों को युवा-केंद्रित नीतियां (जैसे रोज़गार मेले, स्टार्टअप सहायता, मुफ्त कौशल प्रशिक्षण) बनाने के लिए प्रेरित करती है। यह प्रवृत्ति आगे चलकर भारतीय राजनीति की दिशा तय करने में एक निर्णायक भूमिका निभा सकती है।
अब बात करते हैं इस अध्याय के दूसरे बड़े स्तंभ की — लैंगिक भागीदारी (Gender Participation)। जैसा हमने अध्याय 1 में देखा, संविधान सभा में ही 15 महिला सदस्य थीं, जिन्होंने प्रस्तावना और मौलिक अधिकारों की बहसों में सक्रिय भूमिका निभाई। संविधान ने शुरू से ही महिलाओं को पुरुषों के बराबर वोट देने और चुनाव लड़ने का अधिकार दिया — यह उपलब्धि कई पश्चिमी लोकतंत्रों से भी पहले हासिल हुई।
फिर भी, दशकों तक भारतीय संसद और विधानसभाओं में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बेहद कम रहा — आज़ादी के बाद के शुरुआती दशकों में लोकसभा में महिला सांसदों की संख्या 5% के आसपास ही थी। यह असंतुलन — यानी महिलाओं को वोट का अधिकार तो शुरू से मिला, पर सत्ता के गलियारों में उनकी मौजूदगी बहुत धीमी गति से बढ़ी — आगे चलकर महिला आरक्षण की मांग की बुनियाद बना।
महिला आरक्षण विधेयक — तीन दशक का लंबा इंतज़ार
संसद व विधानसभाओं में महिला आरक्षण का विधेयक सबसे पहले 1996 में एच.डी. देवगौड़ा सरकार के दौरान लोकसभा में पेश हुआ था, लेकिन आम सहमति न बन पाने के कारण यह पारित नहीं हो सका। इसके बाद 1998, 1999 और 2008 में भी अलग-अलग सरकारों ने इसे फिर से पेश करने की कोशिश की — 2010 में यह विधेयक राज्यसभा में पारित भी हुआ, लेकिन लोकसभा में पेश नहीं किया जा सका और अंततः लोकसभा भंग होने के साथ यह विधेयक निष्प्रभावी (Lapse) हो गया। लगभग 27 वर्षों के इस लंबे इंतज़ार के बाद, आख़िरकार सितंबर 2023 में यह सपना नारी शक्ति वंदन अधिनियम के रूप में साकार हुआ — जिसकी विस्तृत चर्चा हम आगे टॉपिक 12 में करेंगे।
इस बीच, भारतीय राजनीति में कई प्रभावशाली महिला नेताओं ने शीर्ष पदों पर पहुंचकर एक मिसाल कायम की — इंदिरा गांधी देश की पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं, प्रतिभा पाटिल देश की पहली महिला राष्ट्रपति बनीं, और द्रौपदी मुर्मू ने 2022 में देश की पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति बनकर एक और ऐतिहासिक कदम रखा। इसके अलावा सुचेता कृपलानी, जे. जयललिता, ममता बनर्जी, वसुंधरा राजे (राजस्थान की पहली महिला मुख्यमंत्री) जैसी नेताओं ने राज्यों की मुख्यमंत्री के रूप में भी महिला नेतृत्व को मज़बूत किया।
महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने की दिशा में भारत का सबसे बड़ा और सबसे सफल कदम था 73वां व 74वां संविधान संशोधन (1992) — जिसने पंचायती राज संस्थाओं (ग्रामीण) और नगरीय स्थानीय निकायों, दोनों में महिलाओं के लिए कम से कम 33% सीटें आरक्षित कीं (जिसकी विस्तृत चर्चा हम अध्याय 16 में कर चुके हैं)। समय के साथ कई राज्यों ने इसे बढ़ाकर 50% कर दिया — बिहार पहला राज्य था जिसने 2006 में यह कदम उठाया, और आज देश के 20 राज्य — जिसमें राजस्थान भी शामिल है — पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं को 50% आरक्षण देते हैं।
यह प्रयोग इतना सफल रहा कि आज भारत की पंचायती राज संस्थाओं में लगभग 14 लाख से अधिक निर्वाचित महिला प्रतिनिधि हैं — जो दुनिया में स्थानीय स्तर पर महिला प्रतिनिधित्व का सबसे बड़ा उदाहरण है। राजस्थान में भी हज़ारों महिलाएं सरपंच, वार्ड पंच और ज़िला परिषद सदस्य के रूप में स्थानीय शासन का नेतृत्व कर रही हैं — यह अनुभव आगे चलकर संसद व विधानसभाओं में महिला आरक्षण की मांग को और मज़बूती देता गया।
स्थानीय स्वशासन में महिला आरक्षण की एक बड़ी व्यावहारिक चुनौती यह रही है कि कई मामलों में निर्वाचित महिला प्रतिनिधि की जगह वास्तविक निर्णय उसके पति, ससुर या परिवार के किसी पुरुष सदस्य द्वारा लिए जाते हैं — जिसे 'सरपंच पति' या 'प्रधान पति' की समस्या कहा जाता है। यह प्रतिनिधिक लोकतंत्र (Representative Democracy) की भावना के विपरीत है, और महिला सशक्तिकरण के असली उद्देश्य को कमज़ोर करता है। राजस्थान सहित कई राज्यों में महिला सरपंचों के प्रशिक्षण (Capacity Building) कार्यक्रम इसी चुनौती से निपटने के लिए चलाए जा रहे हैं, ताकि निर्वाचित महिलाएं वास्तव में स्वतंत्र रूप से निर्णय ले सकें।
राजस्थान पंचायती राज अधिनियम के तहत राज्य में महिलाओं को पंचायती राज संस्थाओं में 50% आरक्षण मिलता है — यानी आधी सरपंच सीटें और आधी वार्ड पंच सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं। यह स्थानीय स्तर पर मिला अनुभव और आत्मविश्वास आज कई महिलाओं को विधानसभा व लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए भी प्रेरित कर रहा है, हालांकि 'सरपंच पति' जैसी चुनौतियों से निपटना अभी भी बाकी है।
स्थानीय स्तर पर मिली सफलता के दशकों बाद, आख़िरकार संसद और राज्य विधानसभाओं में भी महिलाओं के लिए आरक्षण का सपना साकार हुआ। 19 सितंबर 2023 को, नई संसद भवन में आयोजित संसद के विशेष सत्र में, 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' लोकसभा में पेश किया गया — जिसे बाद में संविधान (106वां संशोधन) अधिनियम, 2023 के रूप में पारित किया गया। इसने संविधान में दो नए अनुच्छेद जोड़े — अनुच्छेद 330-क (लोकसभा में महिला आरक्षण) और अनुच्छेद 332-क (राज्य विधानसभाओं में महिला आरक्षण)।
आरक्षण का प्रतिशत — लोकसभा, सभी राज्य विधानसभाओं तथा दिल्ली विधानसभा में महिलाओं के लिए 33% सीटें आरक्षित SC/ST उप-कोटा — अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति के लिए पहले से आरक्षित सीटों के भीतर भी महिलाओं के लिए 33% उप-आरक्षण रोटेशन प्रणाली — आरक्षित सीटें हर परिसीमन (Delimitation) के बाद बदलती (Rotate) रहेंगी, ताकि एक ही सीट हमेशा आरक्षित न रहे राज्यसभा व विधान परिषद — इन दोनों सदनों को इस आरक्षण के दायरे से बाहर रखा गया है प्रभावी तिथि की शर्त — यह आरक्षण तभी लागू होगा जब अधिनियम के बाद होने वाली जनगणना पूरी हो और उसके आधार पर परिसीमन (Delimitation) किया जाए
यह अंतिम शर्त — जनगणना और परिसीमन पूरा होना — ही सबसे बड़ी चुनौती बनी। चूंकि अगली जनगणना और उसके बाद परिसीमन में समय लगता है, इसलिए शुरुआत में यह अनुमान था कि यह आरक्षण शायद 2029 के लोकसभा चुनाव तक भी लागू न हो पाए। इस देरी को दूर करने के लिए सरकार अब अनुच्छेद 334-क में संशोधन कर 2011 की जनगणना के आधार पर ही परिसीमन कर, 2029 के चुनावों तक इसे लागू करने का प्रयास कर रही है — यह विषय आज भी (2026 में) राजनीतिक व संसदीय चर्चा का एक सक्रिय मुद्दा बना हुआ है।
विधेयक पर उठी बहस एवं आलोचनाएं
1. OBC उप-कोटे की मांग — कुछ विपक्षी दलों ने मांग की कि जिस तरह SC/ST महिलाओं के लिए उप-आरक्षण दिया गया, उसी तरह OBC महिलाओं के लिए भी अलग उप-कोटा होना चाहिए — यह मांग अभी तक अधिनियम में शामिल नहीं की गई है।
2. कार्यान्वयन में देरी की आलोचना — कई महिला अधिकार कार्यकर्ताओं ने सवाल उठाया कि जनगणना-परिसीमन की शर्त जोड़कर आरक्षण को अनिश्चित काल के लिए टाला जा रहा है।
3. रोटेशन प्रणाली पर चिंता — कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि हर परिसीमन के बाद सीटें बदलने से निर्वाचित महिला प्रतिनिधि अपने क्षेत्र में दीर्घकालिक जुड़ाव नहीं बना पाएंगी।
जहां एक तरफ संसद-विधानसभाओं में महिलाओं के प्रतिनिधित्व की लड़ाई अभी जारी है, वहीं दूसरी तरफ मतदाता के रूप में महिलाओं की भूमिका पहले ही एक बड़ी क्रांति से गुज़र चुकी है। राजनीति-शास्त्री इसे 'निर्वाचन क्षेत्र का नारीकरण (Feminisation of the Electorate)' कहते हैं — यानी चुनावी राजनीति में महिला मतदाताओं का दबदबा लगातार बढ़ना।
आंकड़े इसे साफ दिखाते हैं — 1957 में महिला मतदान प्रतिशत सिर्फ 38.8% था, जो 2024 के आम चुनाव में बढ़कर 65.8% हो गया। और सबसे उल्लेखनीय बात — 2019 के आम चुनाव में पहली बार, और 2024 में लगातार दूसरी बार, महिलाओं का मतदान प्रतिशत पुरुषों से भी ज़्यादा रहा। बिहार, झारखंड, हिमाचल प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश जैसे कई राज्यों में यह अंतर विशेष रूप से बड़ा देखा गया।
शोध बताते हैं कि जिन 130 से अधिक निर्वाचन क्षेत्रों में महिलाओं ने पुरुषों से ज़्यादा मतदान किया, उनमें से अधिकांश में सत्तारूढ़ गठबंधन को जीत मिली। इसका मतलब है कि राजनीतिक दल अब महिलाओं को एक अलग, स्वतंत्र और निर्णायक 'वोट बैंक' के रूप में देखने लगे हैं — और इसीलिए हाल के वर्षों में लगभग हर राज्य में महिला-केंद्रित कल्याणकारी योजनाएं (जैसे नकद सहायता, मुफ्त बस यात्रा, गैस सिलेंडर सब्सिडी) बड़ी संख्या में शुरू हुई हैं।
| वर्ष | महिला मतदान प्रतिशत | महत्वपूर्ण तथ्य |
|---|---|---|
| 1957 | 38.8% | शुरुआती दशकों में महिला मतदान काफी कम था |
| 2019 | 67.2% | पहली बार महिला मतदान पुरुषों से आगे निकला |
| 2024 | 65.8% | लगातार दूसरी बार महिला मतदान पुरुषों से अधिक |
यह प्रवृत्ति राजस्थान में भी स्पष्ट है — राज्य में हाल के विधानसभा व लोकसभा चुनावों में महिला मतदाताओं की भागीदारी लगातार बढ़ी है, और राज्य सरकार की महिला-केंद्रित योजनाएं (जैसे लाडो प्रोत्साहन योजना, चिरंजीवी योजना का महिला-स्वास्थ्य पर विशेष फोकस) इसी बदलते राजनीतिक समीकरण को ध्यान में रखकर बनाई जाती हैं।
जैसा हमने इस अध्याय की शुरुआती कहानी में देखा, 2024 का आम चुनाव भारतीय राजनीतिक इतिहास में पहला ऐसा बड़ा चुनाव था जिसमें कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर हुआ। AI-सक्षम राजनीतिक लामबंदी (AI-Enabled Political Mobilization) का मतलब है — मतदाताओं तक संदेश पहुंचाने, उन्हें प्रभावित करने या उनसे जुड़ने के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित तकनीकों (जैसे वीडियो/ऑडियो जनरेशन, चैटबॉट, डेटा एनालिटिक्स) का इस्तेमाल।
यह बदलाव इतना बड़ा और तेज़ था कि एक डेमो में सिर्फ 4 मिनट में 20 व्यक्तिगत वीडियो संदेश तैयार किए जा सके, और कुछ टीमों ने दावा किया कि वे एक दिन में 10,000 तक व्यक्तिगत वीडियो बना सकती थीं — यह पैमाना पारंपरिक चुनाव प्रचार (पोस्टर, रैली, पर्चे) से कहीं ज़्यादा तेज़ और व्यक्तिगत (Personalised) है।
AI का इस्तेमाल सिर्फ नकारात्मक नहीं रहा — इसके कई रचनात्मक और लोकतंत्र को मज़बूत करने वाले उपयोग भी सामने आए। सबसे उल्लेखनीय है 'भाषिणी (Bhashini)' — भारत सरकार का AI-आधारित भाषा अनुवाद मंच, जिसकी मदद से 2024 के चुनाव प्रचार के दौरान नेताओं के भाषण तुरंत कन्नड़, बंगाली, तेलुगु, ओड़िया, मलयालम जैसी कई भाषाओं में अनुवादित होकर, गैर-हिंदी भाषी क्षेत्रों के मतदाताओं तक पहुंचे — बिना किसी मानव अनुवादक की मदद के।
इसी तरह 'माइक्रो-टारगेटिंग (Micro-Targeting)' — यानी हर मतदाता को उसकी भाषा, ज़रूरत और स्थानीय मुद्दों के अनुसार अलग-अलग व्यक्तिगत संदेश भेजना — भी एक बड़ा उपयोग रहा। राजस्थान में ही भाजपा कार्यकर्ताओं को ऐसे निजीकृत व्हाट्सएप वीडियो भेजे गए, जिनमें पार्टी नेता का AI-क्लोन किया गया स्वर (Voice Clone) कार्यकर्ता का नाम लेकर बोलता था — ठीक जैसा इस अध्याय की शुरुआती कहानी में बताया गया। AI चैटबॉट का इस्तेमाल भी बढ़ा — जहां मतदाता व्हाट्सएप पर योजनाओं, उम्मीदवारों या मतदान केंद्र की जानकारी के लिए स्वचालित (Automated) सवाल-जवाब कर सकते थे।
तमिलनाडु में दिवंगत नेता एम. करुणानिधि (निधन 2018) और जयललिता (निधन 2016) के 'डिजिटल अवतार' AI तकनीक से फिर से चुनावी मंचों पर 'प्रकट' हुए, अपने समर्थकों को संबोधित करते हुए। केरल में कांग्रेस नेता शशि थरूर एक साहित्य उत्सव में अपने ही AI अवतार के साथ मंच पर नज़र आए। ये उदाहरण दिखाते हैं कि AI राजनीतिक संवाद के तरीके को पूरी तरह बदल रहा है — मतदाताओं से जुड़ने का एक बिल्कुल नया रूप गढ़ रहा है।
जहां AI के कई सकारात्मक उपयोग हुए, वहीं इसका सबसे बड़ा ख़तरा भी उभरकर सामने आया — 'डीपफेक (Deepfake)', यानी किसी व्यक्ति की ऐसी नकली तस्वीर, आवाज़ या वीडियो बनाना जो असली जैसी दिखे, लेकिन हो पूरी तरह फर्ज़ी। 2024 के चुनाव प्रचार में ऐसे कई मामले सामने आए — जैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक फर्ज़ी वीडियो जिसमें उन्हें बॉलीवुड गाने पर नाचते दिखाया गया, या एक दिवंगत नेता का AI-जनित वीडियो जिसमें वे किसी अन्य नेता के समर्थन की अपील करते दिख रहे थे — जबकि उनका वास्तविक निधन पहले ही हो चुका था।
इस तकनीक का सबसे बड़ा ख़तरा है — गलत सूचना (Misinformation) और दुष्प्रचार (Disinformation) का इतनी तेज़ी और इतने बड़े पैमाने पर फैलना कि सच्चाई की पुष्टि करना मुश्किल हो जाए। इससे मतदाताओं का चुनावी प्रक्रिया और सूचना-तंत्र पर भरोसा कमज़ोर पड़ने का ख़तरा रहता है — जो किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र के लिए एक गंभीर चुनौती है।
AI से "पुनर्जीवित" दिवंगत नेता (2024) 2024 के चुनाव प्रचार में कई राजनीतिक दलों ने दिवंगत नेताओं के AI-निर्मित वीडियो या ऑडियो का इस्तेमाल किया, जिसमें वे मौजूदा उम्मीदवारों का समर्थन करते दिख रहे थे। भले ही इसका मकसद सिर्फ भावनात्मक जुड़ाव बनाना हो, लेकिन यह एक गंभीर नैतिक सवाल खड़ा करता है — क्या किसी दिवंगत व्यक्ति की सहमति के बिना उसकी "आवाज़" और "छवि" का राजनीतिक इस्तेमाल उचित है? यह सवाल आज दुनियाभर के लोकतंत्रों में बहस का विषय है।
डीपफेक जैसी प्रत्यक्ष समस्याओं से आगे बढ़कर, AI-सक्षम राजनीतिक लामबंदी के कुछ गहरे, दीर्घकालिक सामाजिक-राजनीतिक प्रभाव भी हैं, जिन्हें समझना ज़रूरी है — क्योंकि ये भारतीय लोकतंत्र की गुणवत्ता (Quality of Democracy) को धीरे-धीरे, पर गहराई से प्रभावित कर रहे हैं।
"वॉट्सऐप विश्वविद्यालय" एवं इको-चैंबर की समस्या
भारत में इंटरनेट-सुलभता और सस्ते डेटा के कारण, राजनीतिक सूचना का सबसे बड़ा माध्यम अब व्हाट्सएप, फेसबुक और यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म बन चुके हैं — जिसे कई बार व्यंग्यात्मक रूप से 'वॉट्सऐप विश्वविद्यालय (WhatsApp University)' कहा जाता है। AI-आधारित एल्गोरिद्म मतदाता को वही सामग्री बार-बार दिखाते हैं जिससे वह पहले से सहमत है — इसे 'फ़िल्टर बबल (Filter Bubble)' या 'इको-चैंबर (Echo Chamber)' कहा जाता है। इसका असर यह होता है कि मतदाता धीरे-धीरे सिर्फ अपनी विचारधारा से मिलती-जुलती जानकारी ही देखता-सुनता है, और विरोधी विचारों से उसका संपर्क कम होता जाता है — जिससे समाज में राजनीतिक ध्रुवीकरण और बढ़ सकता है।
माइक्रो-टारगेटिंग का दोहरा पक्ष — व्यक्तिगत प्रचार बनाम गोपनीयता
जहां माइक्रो-टारगेटिंग (जैसा टॉपिक 15 में देखा) मतदाताओं तक प्रासंगिक जानकारी पहुंचाने में मददगार है, वहीं इसकी दूसरी तरफ एक गंभीर चिंता भी है — इसके लिए राजनीतिक दलों को नागरिकों का बड़ी मात्रा में निजी डेटा (Personal Data) चाहिए होता है, जो अक्सर बिना पूर्ण सहमति के जुटाया जाता है। इससे नागरिकों की निजता (Privacy) — जिसे सुप्रीम कोर्ट ने के.एस. पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ (2017) मामले में मौलिक अधिकार घोषित किया था (देखें अध्याय 4-5) — के उल्लंघन का ख़तरा बना रहता है।
डिजिटल विभाजन (Digital Divide) की नई चुनौती
AI-सक्षम राजनीति का एक और सामाजिक प्रभाव यह है कि जो मतदाता डिजिटल रूप से कम सक्षम हैं — जैसे ग्रामीण, बुज़ुर्ग या कम शिक्षित नागरिक — वे अक्सर इस नई सूचना-व्यवस्था से पीछे छूट जाते हैं, या फिर गलत सूचना की चपेट में आसानी से आ जाते हैं, क्योंकि उनके पास सूचना की सत्यता जांचने के डिजिटल कौशल की कमी होती है। यह 'डिजिटल विभाजन' भारत जैसे विविधतापूर्ण समाज में सूचना-समानता की एक नई चुनौती खड़ी करता है।
राजनीति-विश्लेषकों का मानना है कि AI सिर्फ चुनाव प्रचार की तकनीक नहीं बदल रहा, बल्कि धीरे-धीरे मतदाता और राजनीतिक दल के बीच के संबंध की प्रकृति को भी बदल रहा है — पारंपरिक रैली-आधारित जनसंपर्क की जगह अब डेटा-आधारित, एक-से-एक (One-to-One) डिजिटल संवाद ले रहा है। यह बदलाव आने वाले वर्षों में भारतीय लोकतंत्र के लिए अवसर और चुनौती, दोनों बनकर सामने आएगा।
इन ख़तरों को देखते हुए भारत निर्वाचन आयोग (Election Commission of India — ECI) ने 2024 के आम चुनावों के दौरान राजनीतिक दलों को कुछ दिशा-निर्देश जारी किए। इनमें साफ कहा गया कि दलों को अपने सोशल मीडिया हैंडल से किसी भी तरह के डीपफेक ऑडियो/वीडियो का प्रकाशन या प्रसार नहीं करना चाहिए। साथ ही, अगर कोई डीपफेक कंटेंट सामने आता है, तो उसे 3 घंटे के भीतर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से हटाने और संबंधित ज़िम्मेदार व्यक्ति को चिह्नित कर चेतावनी देने का निर्देश दिया गया।
हालांकि, 2024 के चुनाव के अनुभव ने यह भी दिखाया कि सिर्फ पत्र या सलाह-निर्देश काफी नहीं — कई मामलों में इन दिशा-निर्देशों का पालन बहुत सीमित रहा। इसीलिए 2025 में, दिल्ली विधानसभा चुनावों के दौरान, चुनाव आयोग ने अपने रुख को और सख्त करते हुए एक नया आदेश जारी किया — अब किसी भी AI-जनित या डिजिटल रूप से संशोधित सामग्री (चाहे तस्वीर हो, वीडियो हो या ऑडियो) पर स्पष्ट रूप से 'AI-जनित (AI-Generated)', 'डिजिटल रूप से संवर्धित (Digitally Enhanced)' या 'सिंथेटिक सामग्री (Synthetic Content)' जैसा लेबल लगाना अनिवार्य कर दिया गया।
मौजूदा कानूनी ढांचा — सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम एवं IT नियम
भारत में अभी तक AI को सीधे नियंत्रित करने वाला कोई समर्पित (Dedicated) कानून नहीं है। मौजूदा नियंत्रण मुख्यतः सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (IT Act) तथा सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशा-निर्देश एवं डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 (IT Rules 2021) के प्रावधानों के सहारे किया जा रहा है — जिसके तहत सोशल मीडिया मध्यवर्ती (Intermediaries) को आपत्तिजनक/भ्रामक सामग्री हटाने के लिए बाध्य किया जा सकता है। इसके साथ ही प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB) की तथ्य-जांच इकाई (Fact Check Unit) भी सरकार से जुड़ी गलत सूचना की पहचान में भूमिका निभाती है।
यह ध्यान रहे कि भारत में अभी तक AI और डीपफेक को सीधे नियंत्रित करने वाला कोई समर्पित कानून नहीं है — चुनाव आयोग की सलाह और IT Act/IT Rules के मौजूदा प्रावधानों के सहारे ही इसे नियंत्रित करने की कोशिश हो रही है। यह भारतीय लोकतंत्र के सामने एक उभरती हुई, बड़ी चुनौती है, जिस पर आगे ठोस, समर्पित कानून बनने की उम्मीद जताई जा रही है — जैसा कई विकसित लोकतंत्रों (जैसे यूरोपीय संघ के AI Act) में पहले ही किया जा चुका है।
इस अध्याय में हमने भारतीय राजनीति के तीन बड़े, आपस में गुंथे हुए बदलावों को देखा — पहचान से मुद्दों की ओर खिसकता जनमत, राजनीति में महिलाओं की बढ़ती और निर्णायक भूमिका, और तकनीक (विशेषकर AI) का लोकतांत्रिक प्रक्रिया में गहरा हस्तक्षेप। ये तीनों बदलाव अलग-अलग नहीं, बल्कि एक-दूसरे को प्रभावित भी करते हैं — जैसे AI-आधारित माइक्रो-टारगेटिंग अब खासतौर पर महिला मतदाताओं और लाभार्थियों को ध्यान में रखकर डिज़ाइन की जाती है।
1. बहुआयामी मतदाता — आज का भारतीय मतदाता एक साथ कई पहचान रखता है — जाति भी, लाभार्थी भी, महिला भी, डिजिटल उपयोगकर्ता भी — और राजनीतिक दल अब इन सभी आयामों को ध्यान में रखकर रणनीति बनाते हैं।
2. डेटा-चालित राजनीति — चुनाव अभियान अब पारंपरिक जनसभाओं से ज़्यादा डेटा एनालिटिक्स, सोशल मीडिया और AI उपकरणों पर निर्भर होते जा रहे हैं।
3. विनियमन की चुनौती — तकनीक जितनी तेज़ी से बदल रही है, कानून व चुनाव आयोग के नियम उतनी तेज़ी से नहीं बन पा रहे — यह अंतर (Regulatory Lag) आने वाले वर्षों में एक बड़ी चुनौती बना रहेगा।
4. समावेशिता की दिशा में प्रगति, पर अधूरी — महिला आरक्षण जैसे कदम एक बड़ी उपलब्धि हैं, लेकिन उनका पूर्ण क्रियान्वयन (जैसे नारी शक्ति वंदन अधिनियम का जनगणना-परिसीमन पर निर्भर होना) दिखाता है कि रास्ता अभी पूरा नहीं हुआ है।
5. पहचान और मुद्दे का सह-अस्तित्व — जैसा AAP के उदाहरण में देखा, मुद्दा-आधारित राजनीति पहचान-आधारित राजनीति की जगह पूरी तरह नहीं लेती, बल्कि दोनों मिलकर आज के जटिल भारतीय राजनीतिक परिदृश्य को आकार देते हैं।
आने वाले वर्षों में भारतीय राजनीति में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या 2029 तक महिला आरक्षण वाकई लागू हो पाता है, क्या AI-नियमन के लिए कोई ठोस, समर्पित कानून बनता है, और क्या मुद्दा-आधारित राजनीति, पहचान-आधारित राजनीति की जगह पूरी तरह ले पाती है — या दोनों साथ-साथ, एक नए, जटिल रूप में, भारतीय लोकतंत्र को आकार देती रहेंगी। एक जागरूक नागरिक और भावी प्रशासक के तौर पर, इन बदलावों पर पैनी नज़र रखना बेहद ज़रूरी है।
1. पहचान-आधारित राजनीति — जाति, धर्म, भाषा व क्षेत्र के आधार पर लामबंदी — भारतीय राजनीति का पुराना आधार रही है; रुडोल्फ दंपति के अनुसार यह "वर्टिकल" से "हॉरिजॉन्टल" लामबंदी में बदली। 2. जाति-राजनीति की यात्रा — काका कालेलकर आयोग (1953) से मंडल आयोग (1990), इंद्रा साहनी निर्णय (1992 — 50% सीमा व क्रीमी लेयर), EWS आरक्षण (2019) से होते हुए रोहिणी आयोग (2023 — OBC उप-वर्गीकरण) तक पहुंची है। 3. धर्म-आधारित राजनीति में शाह बानो केस (1985), राम जन्मभूमि आंदोलन (1990-92) व सच्चर समिति (2006) जैसे मोड़ों ने बहुसंख्यक व अल्पसंख्यक, दोनों तरह की लामबंदी को आकार दिया। 4. हाल के वर्षों में मुद्दा-आधारित/शासन-केंद्रित राजनीति उभरी है — गुजरात व बिहार "विकास मॉडल" तथा आम आदमी पार्टी जैसे उदाहरण दिखाते हैं कि शासन-प्रदर्शन खुद एक चुनावी मुद्दा बन सकता है। 5. "लाभार्थी राजनीति" — कल्याणकारी योजनाओं (पीएम किसान, आयुष्मान भारत, चिरंजीवी योजना आदि) का सीधा, राजनीतिक लाभ — आज चुनावी रणनीति का केंद्रीय हिस्सा बन चुकी है, हालांकि "फ्रीबीज़" बहस भी साथ चलती है। 6. 73वें/74वें संशोधन (1992) ने स्थानीय स्वशासन में महिलाओं को 33% (राजस्थान सहित 20 राज्यों में 50%) आरक्षण दिया — 14 लाख+ निर्वाचित महिला प्रतिनिधि, हालांकि "सरपंच पति" जैसी व्यावहारिक चुनौतियां बनी हुई हैं। 7. महिला आरक्षण विधेयक की 27 वर्षों (1996-2023) की लंबी यात्रा के बाद, नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023 (106वां संशोधन) ने 33% महिला आरक्षण तय किया, पर यह जनगणना-परिसीमन पूरा होने पर निर्भर है; लक्ष्य 2029 चुनाव है। 8. "निर्वाचन क्षेत्र का नारीकरण" — महिला मतदान 1957 के 38.8% से बढ़कर 2024 में 65.8% हुआ, और अब लगातार पुरुषों से आगे है। 9. 2024 का आम चुनाव भारत में AI-सक्षम राजनीतिक लामबंदी का पहला बड़ा उदाहरण बना — भाषिणी जैसे सकारात्मक उपयोग से लेकर डीपफेक जैसे गंभीर ख़तरों तक, तथा फ़िल्टर बबल व डिजिटल विभाजन जैसे गहरे सामाजिक-राजनीतिक प्रभावों तक। 10. चुनाव आयोग ने 2024 में डीपफेक-विरोधी दिशा-निर्देश और 2025 में अनिवार्य AI-लेबलिंग व्यवस्था लागू की, लेकिन भारत में अभी भी समर्पित AI/डीपफेक कानून का अभाव है — IT Act व IT Rules 2021 के सहारे ही नियंत्रण हो रहा है। 11. भारतीय राजनीति अब एक बहुआयामी, डेटा-चालित दौर में प्रवेश कर चुकी है, जहां पहचान, मुद्दे, लिंग और तकनीक — चारों मिलकर मतदाता व्यवहार को आकार दे रहे हैं, और दोनों (पहचान व मुद्दे) साथ-साथ काम करते रहेंगे।