आंतरिक सुरक्षा (Internal Security) का अर्थ है — किसी देश के भीतर शांति, कानून-व्यवस्था तथा संवैधानिक ढांचे की सुरक्षा करना, ताकि नागरिकों का जीवन, संपत्ति व मौलिक अधिकार सुरक्षित रहें, तथा राज्य की संप्रभुता व अखंडता पर कोई आंतरिक ख़तरा न आए। यह बाह्य सुरक्षा (External Security) — यानी बाहरी देशों से सैन्य ख़तरों — से भिन्न है, हालांकि व्यवहार में दोनों अक्सर आपस में गहराई से जुड़े होते हैं, जैसा सीमापार आतंकवाद के उदाहरण में स्पष्ट है।
भारत जैसे विशाल, विविधतापूर्ण व सीमावर्ती देश के लिए आंतरिक सुरक्षा एक विशेष रूप से जटिल चुनौती है — यहां एक साथ कई तरह के खतरे मौजूद हैं, जिनकी प्रकृति, कारण व समाधान बिल्कुल अलग-अलग हैं। इसीलिए भारत सरकार आंतरिक सुरक्षा को आमतौर पर चार व्यापक श्रेणियों में बांटकर देखती है।
| खतरे की श्रेणी | उदाहरण |
|---|---|
| वामपंथी उग्रवाद (Left Wing Extremism) | नक्सलवाद/माओवाद — मुख्यतः मध्य व पूर्वी भारत के जंगली क्षेत्रों में |
| पूर्वोत्तर उग्रवाद (North-East Insurgency) | जातीय व अलगाववादी सशस्त्र आंदोलन — असम, नागालैंड, मणिपुर आदि |
| सीमापार आतंकवाद (Cross-Border Terrorism) | जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तान-प्रायोजित आतंकी गतिविधियां |
| सांप्रदायिक/जातीय हिंसा (Communal/Ethnic Violence) | धार्मिक-जातीय समुदायों के बीच तनाव व हिंसा — जैसे मणिपुर |
इन चार पारंपरिक श्रेणियों के अलावा, हाल के वर्षों में कुछ नई चुनौतियां भी उभरी हैं — संगठित अपराध व गैंगस्टर नेटवर्क, साइबर हमले, समुद्री मार्ग से घुसपैठ, तथा ड्रोन के ज़रिए हथियार व मादक पदार्थों की तस्करी। इस अध्याय में हम इन सभी पारंपरिक व समकालीन आयामों को विस्तार से समझेंगे।
आंतरिक सुरक्षा को ऐसे समझिए जैसे किसी बड़े घर की सुरक्षा — सिर्फ मुख्य दरवाज़े पर ताला लगाना काफी नहीं, बल्कि घर के अंदर भी हर कमरे में शांति व्यवस्था बनाए रखनी होती है, पड़ोसियों से भी अच्छे संबंध रखने होते हैं, और अगर घर के किसी हिस्से में आग लगे तो उसे तुरंत बुझाने की व्यवस्था भी होनी चाहिए — ठीक इसी तरह, राज्य को बाहरी सीमा के साथ-साथ अपने भीतर की शांति, सद्भाव व कानून-व्यवस्था का भी पूरा ध्यान रखना होता है।
भारत में आंतरिक सुरक्षा का मुख्य दायित्व केंद्रीय गृह मंत्रालय (Ministry of Home Affairs — MHA) पर है, जो पुलिस, केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों, आपदा प्रबंधन, सीमा प्रबंधन तथा आंतरिक सुरक्षा से जुड़ी सभी नीतियों का समन्वय करता है। हालांकि, ध्यान देने योग्य है कि 'पुलिस' व 'लोक व्यवस्था (Public Order)' संविधान की सातवीं अनुसूची में राज्य सूची (List II) के विषय हैं (देखें अध्याय 14) — इसलिए राज्य सरकारें भी आंतरिक सुरक्षा में बराबर की भागीदार होती हैं।
राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद (National Security Council — NSC)
1998 में गठित राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद, प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में, देश की समग्र सुरक्षा नीति (आंतरिक व बाह्य, दोनों) पर शीर्ष स्तर की सलाहकार संस्था है। इसमें रक्षा मंत्री, गृह मंत्री, विदेश मंत्री व वित्त मंत्री सहित प्रमुख मंत्री शामिल होते हैं।
राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (National Security Advisor — NSA)
राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार प्रधानमंत्री का प्रमुख सुरक्षा सलाहकार होता है, जो राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय (NSCS) का प्रमुख भी होता है। यह पद खुफिया एजेंसियों (IB, RAW), सामरिक नीति-निर्माण तथा संवेदनशील सुरक्षा वार्ताओं (जैसे सीमा विवाद पर विशेष प्रतिनिधि वार्ता) में केंद्रीय भूमिका निभाता है — जैसा ऑपरेशन सिंदूर जैसी घटनाओं में समन्वय के दौरान देखा गया।
वामपंथी उग्रवाद (Left Wing Extremism — LWE), जिसे आमतौर पर 'नक्सलवाद' या 'माओवाद' कहा जाता है, की शुरुआत 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी गांव में हुए एक किसान विद्रोह से हुई — यहीं से 'नक्सल' नाम पड़ा। यह आंदोलन माओ त्से तुंग की विचारधारा से प्रेरित था, जिसका मूल तर्क था कि सशस्त्र क्रांति के ज़रिए ही ज़मींदारों व राज्य-सत्ता से भूमिहीन किसानों व आदिवासियों को न्याय दिलाया जा सकता है।
2004 में दो प्रमुख नक्सली गुटों — पीपुल्स वॉर ग्रुप (PWG) व माओइस्ट कम्युनिस्ट सेंटर (MCC) — के विलय से 'भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) — CPI (Maoist)' का गठन हुआ, जो आज भी वामपंथी उग्रवाद का मुख्य संगठन है। इसका मुख्य आधार आदिवासी बहुल, वनाच्छादित व अविकसित क्षेत्रों (जैसे बस्तर, दंडकारण्य) में रहा है, जहां भूमि अधिकार, वन अधिकार व आर्थिक असमानता जैसे वास्तविक मुद्दे लंबे समय तक अनसुलझे रहे।
वामपंथी उग्रवाद अपने चरम पर देश के लगभग 17% भूभाग तथा 12 करोड़ जनसंख्या को प्रभावित करता था — इसे 'रेड कॉरिडोर (Red Corridor)' कहा जाता था, जो झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा, आंध्र प्रदेश-तेलंगाना, महाराष्ट्र व बिहार के बड़े हिस्से में फैला हुआ था।
सरकार का "नक्सल-मुक्त भारत" अभियान
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में स्पष्ट लक्ष्य घोषित किया है कि भारत को 31 मार्च 2026 तक पूरी तरह नक्सलवाद-मुक्त बना दिया जाएगा। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए 'ऑपरेशन कगार (Operation Kagar)' जैसे बड़े, समन्वित सुरक्षा अभियान चलाए गए, जिसने माओवादी नेतृत्व के ढांचे को गंभीर रूप से कमज़ोर किया।
2025 में सुरक्षा बलों ने अनुमानतः 210-220 नक्सलियों को निष्क्रिय (Neutralise) किया। छत्तीसगढ़ के बीजापुर ज़िले के इंद्रावती राष्ट्रीय उद्यान में 9 फरवरी 2025 को हुए अभियान में 31 नक्सली मारे गए, तथा 21 मई 2025 को नारायणपुर में हुए अभियान में शीर्ष माओवादी नेता नामबाला केशव राव सहित 27 नक्सली मारे गए। परिणामस्वरूप, आज देश में सिर्फ बस्तर क्षेत्र (छत्तीसगढ़) के 4 ज़िलों को छोड़कर, शेष पूरे देश में नक्सलवाद प्रभावी रूप से समाप्त हो चुका है — जो कभी लगातार सक्रिय 'रेड कॉरिडोर' अब एक निरंतर संचालित क्षेत्र (Continuous Operational Zone) के रूप में अस्तित्व में नहीं है।
यह उपलब्धि सिर्फ सैन्य कार्रवाई से नहीं मिली — इसके साथ-साथ सरकार ने प्रभावित क्षेत्रों में सड़क, मोबाइल कनेक्टिविटी, शिक्षा व स्वास्थ्य सुविधाओं का भी बड़े पैमाने पर विस्तार किया, ताकि स्थानीय आदिवासी समुदाय का राज्य-व्यवस्था पर भरोसा बढ़े और नक्सली संगठनों को मिलने वाला स्थानीय समर्थन कम हो — यह रणनीति 'सुरक्षा बल + विकास' के दोहरे मॉडल पर आधारित रही है।
भारत का पूर्वोत्तर क्षेत्र — जो सिर्फ एक संकरे 'चिकन नेक (सिलीगुड़ी कॉरिडोर)' के ज़रिए शेष भारत से जुड़ा है — दशकों से जातीय पहचान, स्वायत्तता व अलगाववाद से जुड़े कई सशस्त्र आंदोलनों से जूझता रहा है। इसके पीछे कई कारण रहे हैं — भौगोलिक दूरी व अलगाव, अनूठी जातीय-सांस्कृतिक पहचान, आर्थिक पिछड़ापन, तथा पड़ोसी देशों (म्यांमार, बांग्लादेश, चीन) से मिलने वाला बाहरी समर्थन/शरण।
| राज्य | प्रमुख उग्रवादी संगठन |
|---|---|
| नागालैंड | नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नागालैंड (NSCN) — इसाक-मुइवा व खापलांग गुट |
| असम | यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम (ULFA), नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड (NDFB) |
| मणिपुर | यूनाइटेड नेशनल लिबरेशन फ्रंट (UNLF), पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) |
| त्रिपुरा | नेशनल लिबरेशन फ्रंट ऑफ त्रिपुरा (NLFT) |
पिछले कुछ वर्षों में केंद्र सरकार ने पूर्वोत्तर के कई प्रमुख उग्रवादी संगठनों के साथ ऐतिहासिक शांति समझौते किए हैं, जिनसे क्षेत्र में हिंसा में उल्लेखनीय कमी आई है।
| समझौता | वर्ष | मुख्य बिंदु |
|---|---|---|
| NLFT समझौता | 2019 | त्रिपुरा में NLFT-SD गुट के साथ, ₹100 करोड़ का जनजातीय विकास पैकेज |
| बोडो शांति समझौता | 2020 | 4,881 कैडरों ने हथियार छोड़े, ₹1,500 करोड़ का विकास पैकेज |
| दिमासा समझौता | 2023 | असम के दिमासा उग्रवादी संगठन DNLA/DPSC के साथ |
| UNLF समझौता | 2023 | मणिपुर के सबसे पुराने उग्रवादी संगठन के साथ ऐतिहासिक समझौता |
| ULFA शांति समझौता | 2023 | 29 दिसंबर 2023 को हस्ताक्षरित — असम के सबसे बड़े उग्रवादी संगठन के साथ |
इन शांति समझौतों के परिणामस्वरूप अब तक 9,000 से अधिक उग्रवादी कैडरों ने आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा में वापसी की है, और असम के लगभग 85% क्षेत्र से सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम (AFSPA) हटाया जा चुका है — जो दिखाता है कि क्षेत्र में शांति प्रक्रिया ठोस परिणाम दे रही है।
जम्मू-कश्मीर में सीमापार आतंकवाद (Cross-Border Terrorism) का इतिहास 1989-90 के दशक से जुड़ा है, जब पाकिस्तान-समर्थित आतंकी संगठनों ने घाटी में सशस्त्र अलगाववादी आंदोलन को बढ़ावा देना शुरू किया। लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद जैसे संगठन दशकों से नियंत्रण रेखा (Line of Control — LoC) के पार से प्रशिक्षित आतंकवादियों की घुसपैठ कराते रहे हैं।
अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी करने तथा जम्मू-कश्मीर को दो केंद्रशासित प्रदेशों (जम्मू-कश्मीर व लद्दाख) में पुनर्गठित करने के बाद (देखें अध्याय 14), सुरक्षा हालात में महत्वपूर्ण बदलाव आया — बड़े पैमाने की सशस्त्र घुसपैठ व सार्वजनिक हिंसा की घटनाओं में उल्लेखनीय कमी आई, स्थानीय चुनाव प्रक्रिया फिर से शुरू हुई, तथा पर्यटन में भी वृद्धि दर्ज हुई। हालांकि, जैसा पहलगाम हमले (2025) से स्पष्ट हुआ, प्रॉक्सी संगठनों के ज़रिए संचालित लक्षित हमलों (Targeted Attacks) का ख़तरा अब भी बना हुआ है, विशेषकर पर्यटकों व गैर-स्थानीय नागरिकों के विरुद्ध।
जैसा इस अध्याय की शुरुआती कहानी में विस्तार से देखा, 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम स्थित बैसरन घाटी में हुए आतंकी हमले में 26 नागरिक मारे गए — यह 2008 के मुंबई हमलों के बाद भारत में नागरिकों पर सबसे घातक हमला था। हमलावर मुख्यतः हिंदू पर्यटकों को निशाना बना रहे थे, हालांकि इसमें एक ईसाई पर्यटक व एक स्थानीय मुस्लिम घोड़ा-संचालक की भी जान गई।
पहलगाम आतंकी हमला (2025) 'द रेज़िस्टेंस फ्रंट (TRF)', जो लश्कर-ए-तैयबा से जुड़ा एक प्रॉक्सी संगठन है, ने शुरुआत में इस हमले की ज़िम्मेदारी ली। जांच में सामने आया कि इसका मकसद अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद घाटी में हो रहे जनसांख्यिकीय (Demographic) बदलावों को रोकना था। इस हमले ने भारत सरकार की सुरक्षा नीति में एक निर्णायक मोड़ ला दिया।
ऑपरेशन सिंदूर — भारत की निर्णायक प्रतिक्रिया
सुरक्षा मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (Cabinet Committee on Security — CCS) ने पाकिस्तान द्वारा सीमापार आतंकवाद को दिए जा रहे निरंतर समर्थन के विरुद्ध सख्त कदम उठाने को मंज़ूरी दी। इसके तहत 'ऑपरेशन सिंदूर' चलाया गया, जिसमें बहु-एजेंसी खुफिया जानकारी के आधार पर, बहावलपुर व मुरीदके सहित पाकिस्तान व पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में स्थित 9 प्रमुख आतंकी शिविरों को समन्वित हवाई व ज़मीनी कार्रवाई के ज़रिए नष्ट किया गया — यह कार्रवाई आतंकी ढांचे को नष्ट करने तथा हमले के दोषियों को दंडित करने के दोहरे उद्देश्य से की गई।
ऑपरेशन सिंदूर को भारत की आतंकवाद-विरोधी नीति में एक बड़े बदलाव के रूप में देखा जाता है — 'सामरिक संयम (Strategic Restraint)' के बजाय अब भारत ने सीमापार आतंकी ढांचों पर सीधी, चिह्नित (Targeted) व सटीक कार्रवाई की नीति अपनाई है। इस कार्रवाई को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी व्यापक समर्थन मिला, हालांकि कुछ अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद-रोधी अभियानों के दौरान मानवाधिकारों के सम्मान को लेकर चिंता भी जताई।
सांप्रदायिक हिंसा (Communal Violence) — यानी धार्मिक समुदायों के बीच हिंसक टकराव — भारत की आंतरिक सुरक्षा की एक पुरानी व संवेदनशील चुनौती रही है, जैसा हमने अध्याय 22 में धर्म-आधारित राजनीति के संदर्भ में भी देखा। इसके पीछे कई कारण होते हैं — ऐतिहासिक शिकायतें, राजनीतिक उकसावा, अफ़वाहें (विशेषकर सोशल मीडिया के ज़रिए तेज़ी से फैलने वाली), तथा स्थानीय आर्थिक-सामाजिक तनाव।
सांप्रदायिक हिंसा की रोकथाम के लिए प्रशासनिक व कानूनी, दोनों स्तर पर तंत्र मौजूद हैं — ज़िला प्रशासन व पुलिस द्वारा संवेदनशील (Communally Sensitive) क्षेत्रों की पहचान व निगरानी, त्योहारों के दौरान शांति समितियां (Peace Committees) गठित करना, तथा भड़काऊ भाषण व अफ़वाह फैलाने पर भारतीय न्याय संहिता (पूर्व में भारतीय दंड संहिता) की संबंधित धाराओं के तहत कार्रवाई। राष्ट्रीय एकता परिषद (National Integration Council) जैसी संस्थाएं भी सामाजिक सद्भाव बनाए रखने की दिशा में सलाहकार भूमिका निभाती हैं।
मई 2023 में मणिपुर में मैतेई (Meitei) व कुकी (Kuki) समुदायों के बीच गंभीर जातीय हिंसा भड़क उठी — इसका तात्कालिक कारण एक अदालती सुझाव था, जिसमें कुकी समुदाय को मिल रहे आर्थिक लाभ व नौकरी आरक्षण को मैतेई समुदाय तक भी विस्तारित करने की बात कही गई थी, जिसे लेकर दोनों समुदायों के बीच गहरा असंतोष व अविश्वास फैल गया।
मई 2023 से अब तक इस हिंसा में 260 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है, तथा 60,000 से अधिक लोग विस्थापित हुए हैं — जिनमें से लगभग 58,000 लोग आज भी राज्यभर के 281 राहत शिविरों में रह रहे हैं। फरवरी 2025 में मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह के इस्तीफे के बाद राज्य में राष्ट्रपति शासन (देखें अध्याय 14) लागू किया गया, जिसे संसद ने अगस्त 2025 में और छह महीने के लिए बढ़ाया। फरवरी 2026 में केंद्र ने राष्ट्रपति शासन हटाकर युमनाम खेमचंद सिंह के नेतृत्व में नई राज्य सरकार स्थापित की।
मणिपुर की यह घटना दिखाती है कि आंतरिक सुरक्षा सिर्फ आतंकवाद या उग्रवाद तक सीमित नहीं — जातीय पहचान, आर्थिक संसाधनों के बंटवारे व ऐतिहासिक शिकायतों से उपजी हिंसा भी उतनी ही गंभीर चुनौती हो सकती है, तथा इसका समाधान सिर्फ सुरक्षा बलों की तैनाती से नहीं, बल्कि राजनीतिक संवाद, पुनर्वास (Rehabilitation) व दीर्घकालिक मेल-मिलाप (Reconciliation) प्रक्रिया से ही संभव है।
पारंपरिक उग्रवाद व आतंकवाद के अलावा, हाल के वर्षों में एक नई तरह की आंतरिक सुरक्षा चुनौती तेज़ी से उभरी है — संगठित अपराध (Organised Crime) व अंतर-राज्यीय, यहां तक कि अंतरराष्ट्रीय गैंगस्टर नेटवर्क। ये नेटवर्क जबरन वसूली (Extortion), लक्षित हत्याएं (Targeted Killings), हथियार व मादक पदार्थ तस्करी जैसी गतिविधियों में जेल के भीतर से भी सक्रिय रहकर संलिप्त रहते हैं, तथा सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर अपना प्रभाव व भय फैलाते हैं।
लॉरेंस बिश्नोई सिंडिकेट (2024-25) पंजाब से जुड़े गैंगस्टर लॉरेंस बिश्नोई का नेटवर्क आज भारत के सबसे बड़े संगठित अपराध सिंडिकेट्स में गिना जाता है — जांच एजेंसियों के अनुसार, जेल में बंद रहते हुए भी वह भारत के कई राज्यों में फैले लगभग 700 सदस्यों के नेटवर्क का संचालन करता है, तथा कनाडा, इटली, ऑस्ट्रेलिया व खाड़ी देशों तक इसका प्रभाव फैला हुआ है। राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने इस नेटवर्क पर हत्या, जबरन वसूली व आतंकी गतिविधियों से जुड़े कई गंभीर आरोप लगाए हैं। सितंबर 2025 में कनाडा सरकार ने भी इस सिंडिकेट को 'आतंकी इकाई (Terrorist Entity)' घोषित किया — जो दिखाता है कि आधुनिक संगठित अपराध नेटवर्क अब राष्ट्रीय सीमाओं से परे, वैश्विक स्तर पर सुरक्षा चुनौती बन चुके हैं।
राज्यों के विशेष संगठित अपराध-रोधी कानून
संगठित अपराध से निपटने के लिए महाराष्ट्र ने सबसे पहले 1999 में 'महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम (MCOCA)' बनाया, जो जांच एजेंसियों को विशेष शक्तियां (जैसे लंबी हिरासत अवधि, ढीले साक्ष्य-मानक तथा संपत्ति ज़ब्ती) देता है। इसी मॉडल पर, राजस्थान विधानसभा ने भी 2023 में 'राजस्थान संगठित अपराध नियंत्रण विधेयक' पेश किया, जो पूरी तरह MCOCA के ढांचे पर आधारित है — यह दिखाता है कि राजस्थान भी बढ़ते संगठित अपराध नेटवर्क को गंभीरता से ले रहा है तथा एक सशक्त, विशेष कानूनी ढांचा तैयार करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
मानव तस्करी (Human Trafficking) — यानी जबरन श्रम, यौन शोषण, बाल-श्रम या भीख मंगवाने जैसे उद्देश्यों के लिए व्यक्तियों (विशेषकर महिलाओं व बच्चों) की अवैध खरीद-फरोख्त — भारत की आंतरिक सुरक्षा व मानवाधिकार, दोनों दृष्टि से एक गंभीर चुनौती है। भारत मानव तस्करी के मामले में 'स्रोत (Source)', 'पारगमन (Transit)' तथा 'गंतव्य (Destination)' — तीनों ही तरह का देश माना जाता है, जो इस समस्या की जटिलता को दर्शाता है।
जैसा हमने टॉपिक 14 में देखेंगे, 2019 के संशोधन ने मानव तस्करी को राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) के अधिकार-क्षेत्र में भी शामिल किया। इसके अलावा गृह मंत्रालय व संयुक्त राष्ट्र दफ़्तर (UNODC) के संयुक्त प्रयासों से 2006 से देशभर में 'एकीकृत मानव तस्करी-रोधी इकाइयां (Anti-Human Trafficking Units — AHTU)' स्थापित की जा रही हैं, जो विशेष रूप से स्रोत-पारगमन-गंतव्य क्षेत्रों में ज़िला स्तर पर काम करती हैं — जैसा शुरुआत में महाराष्ट्र, गोवा, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश व बिहार में किया गया था।
मानव तस्करी की रोकथाम अध्याय 18 में चर्चित राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) व राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) के कार्यक्षेत्र से भी सीधे जुड़ती है — यह दिखाता है कि आंतरिक सुरक्षा तंत्र व सामाजिक-कल्याण संस्थाएं अक्सर एक-दूसरे के साथ मिलकर काम करती हैं, विशेषकर वंचित व कमज़ोर वर्गों की सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर।
डिजिटल भारत के तेज़ विस्तार के साथ, साइबर अपराध (Cybercrime) व साइबर आतंकवाद (Cyber-Terrorism) भी आंतरिक सुरक्षा की एक तेज़ी से बढ़ती चुनौती बनकर उभरे हैं — जिसमें वित्तीय धोखाधड़ी, फ़िशिंग (Phishing), पहचान की चोरी (Identity Theft), रैनसमवेयर (Ransomware) हमले, तथा जैसा हमने अध्याय 22 में देखा, चुनावी लोकतंत्र को प्रभावित करने वाले AI-आधारित दुष्प्रचार भी शामिल हैं।
2018 में गृह मंत्रालय ने 'भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (Indian Cyber Crime Coordination Centre — I4C)' की स्थापना की, जिसे 1 जुलाई 2024 से गृह मंत्रालय के एक संलग्न कार्यालय (Attached Office) का दर्जा दिया गया। I4C का काम है — विभिन्न कानून प्रवर्तन एजेंसियों के बीच समन्वय बेहतर बनाना, नागरिकों में साइबर-जागरूकता फैलाना, तथा एनालिटिक्स के ज़रिए साइबर खतरों का पता लगाना, निगरानी करना व पूर्वानुमान लगाना।
I4C के तहत संचालित नेशनल साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल तथा हेल्पलाइन नंबर 1930 नागरिकों को वित्तीय साइबर धोखाधड़ी की तुरंत रिपोर्ट करने व पैसा फ्रीज़ कराने की सुविधा देते हैं। सरकार 2026 में एक नई 'राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा रणनीति' लाने की योजना बना रही है, जिसमें 5G व इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) से जुड़े नए जोखिमों को भी शामिल किया जाएगा।
साइबर सुरक्षा के भीतर एक विशेष रूप से संवेदनशील क्षेत्र है — 'महत्वपूर्ण सूचना अवसंरचना (Critical Information Infrastructure — CII)' की सुरक्षा, यानी वे कंप्यूटर संसाधन जिनके निष्क्रिय होने या नष्ट होने से राष्ट्रीय सुरक्षा, अर्थव्यवस्था, सार्वजनिक स्वास्थ्य या सुरक्षा को गंभीर क्षति पहुंच सकती है — जैसे बिजली ग्रिड, बैंकिंग प्रणाली, परमाणु संयंत्र, हवाई यातायात नियंत्रण व दूरसंचार नेटवर्क।
विधिक आधार — सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 70-क (जो 2008 के संशोधन से जोड़ी गई) के तहत गठित स्थापना — 16 जनवरी 2014 को राजपत्र अधिसूचना के ज़रिए स्थापित, नई दिल्ली में मुख्यालय प्रशासनिक नियंत्रण — राष्ट्रीय तकनीकी अनुसंधान संगठन (National Technical Research Organisation — NTRO) के अधीन कार्यरत कार्य — महत्वपूर्ण अवसंरचना क्षेत्रों की पहचान करना, उन्हें साइबर हमलों से बचाने हेतु दिशा-निर्देश जारी करना, तथा 24x7 निगरानी करना
किसी भी आतंकी या उग्रवादी संगठन के संचालन के लिए धन (Funds) की निरंतर आपूर्ति ज़रूरी होती है — इसलिए 'आतंकी वित्तपोषण (Terror Financing)' को रोकना आंतरिक सुरक्षा की एक महत्वपूर्ण रणनीति है। भारत में धन-शोधन निवारण अधिनियम, 2002 (Prevention of Money Laundering Act — PMLA) तथा UAPA के प्रावधानों के तहत प्रवर्तन निदेशालय (Enforcement Directorate — ED) व NIA जैसी एजेंसियां आतंकी फंडिंग नेटवर्क की जांच करती हैं।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, वित्तीय कार्रवाई कार्यबल (Financial Action Task Force — FATF) एक अंतर-सरकारी संस्था है, जो देशों को आतंकी वित्तपोषण व धन-शोधन रोकने के मानकों के पालन के आधार पर आंकती है — किसी देश को FATF की 'ग्रे लिस्ट' या 'ब्लैक लिस्ट' में डाला जाना उसकी अंतरराष्ट्रीय वित्तीय साख को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है, इसीलिए भारत भी FATF मानकों के अनुपालन पर विशेष ध्यान देता है।
केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (Central Armed Police Forces — CAPF) गृह मंत्रालय के अधीन काम करने वाले 7 प्रमुख बलों का सामूहिक नाम है — 2011 से पहले इन्हें 'केंद्रीय अर्धसैनिक बल (Central Para-Military Forces)' कहा जाता था। ये बल मिलकर लगभग 10 लाख कर्मियों की विशाल शक्ति बनाते हैं, जो आंतरिक सुरक्षा, सीमा सुरक्षा, नक्सल-रोधी अभियानों, आपदा प्रतिक्रिया व महत्वपूर्ण अवसंरचना (Critical Infrastructure) की सुरक्षा में तैनात रहते हैं।
| बल (संक्षिप्त नाम) | स्थापना | प्रमुख भूमिका |
|---|---|---|
| सीमा सुरक्षा बल (BSF) | 1965 | भारत-पाकिस्तान व भारत-बांग्लादेश सीमा की रक्षा |
| केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल (CRPF) | 1939/1949 | आंतरिक सुरक्षा, कानून-व्यवस्था, नक्सल-रोधी अभियानों का मुख्य बल |
| भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) | 1962 | भारत-चीन सीमा — लद्दाख से अरुणाचल तक, पर्वतारोहण विशेषज्ञ बल |
| केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF) | 1969 | हवाई अड्डों, परमाणु संयंत्रों व औद्योगिक प्रतिष्ठानों की सुरक्षा |
| सशस्त्र सीमा बल (SSB) | 1963 | भारत-नेपाल व भारत-भूटान सीमा की सुरक्षा, तस्करी-रोधी अभियान |
| राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (NSG) | 1984 | विशिष्ट आतंकवाद-रोधी व एंटी-हाईजैकिंग बल |
| असम राइफल्स | 1835 | पूर्वोत्तर में शांति स्थापना, सेना के साथ नक्सल/उग्रवाद-रोधी अभियान |
2008 के मुंबई आतंकी हमलों के बाद, आतंकवाद से जुड़े मामलों की जांच के लिए एक समर्पित, राष्ट्रीय स्तर की एजेंसी की ज़रूरत महसूस हुई — इसी के परिणामस्वरूप राष्ट्रीय जांच एजेंसी अधिनियम, 2008 के तहत 'राष्ट्रीय जांच एजेंसी (National Investigation Agency — NIA)' का गठन हुआ। NIA आतंकवाद, संगठित अपराध व राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े गंभीर मामलों की जांच करती है, तथा इसके लिए विशेष अदालतें (Special Courts) भी गठित की जा सकती हैं।
भारत के बाहर की जांच — अब NIA भारतीय नागरिकों या भारतीय हितों के विरुद्ध विदेश में हुए अपराधों की भी जांच कर सकती है (अंतरराष्ट्रीय संधियों के अधीन) नए अनुसूचित अपराध — मानव तस्करी, साइबर-आतंकवाद, विस्फोटक पदार्थ अधिनियम व प्रतिबंधित हथियारों से जुड़े अपराध जोड़े गए नई दिल्ली की विशेष अदालत — विदेश में हुए अपराधों के मामलों की सुनवाई हेतु नई दिल्ली में विशेष क्षेत्राधिकार वाली अदालत स्थापित की गई जांच अधिकार का विस्तार — निरीक्षक (Inspector) या उच्च रैंक के NIA अधिकारी भी अब मामलों की जांच कर सकते हैं
भारत की दो प्रमुख खुफिया एजेंसियां — आसूचना ब्यूरो (Intelligence Bureau — IB) व अनुसंधान एवं विश्लेषण विंग (Research and Analysis Wing — RAW) — देश की सुरक्षा तंत्र की 'आंख और कान' मानी जाती हैं, हालांकि दोनों के कार्यक्षेत्र में एक बुनियादी अंतर है।
यह ध्यान देने योग्य है कि IB व RAW, दोनों ही किसी संसदीय कानून से नहीं, बल्कि कार्यकारी आदेश (Executive Order) से स्थापित व संचालित होती हैं — इसलिए ये संसदीय जवाबदेही (जैसे RTI अधिनियम) के दायरे से काफी हद तक बाहर रहती हैं। यह पारदर्शिता बनाम राष्ट्रीय सुरक्षा की एक स्थायी बहस का विषय रहा है।
राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (National Security Guard — NSG) की स्थापना 1984 में, ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद, NSG अधिनियम, 1986 के तहत एक विशिष्ट आतंकवाद-रोधी बल (Counter-Terrorism Force) के रूप में हुई थी। इसे 'ब्लैक कैट कमांडो' के नाम से भी जाना जाता है, और यह विशेष रूप से आतंकी हमलों, बंधक-संकट (Hostage Crisis) व विमान अपहरण (Hijacking) जैसी स्थितियों से निपटने में प्रशिक्षित है — जैसा 2008 के मुंबई हमलों के दौरान इसकी भूमिका में देखा गया।
इसके अतिरिक्त, बहु-एजेंसी केंद्र (Multi Agency Centre — MAC) — जो IB के नेतृत्व में विभिन्न खुफिया व सुरक्षा एजेंसियों के बीच रीयल-टाइम सूचना साझा करने का मंच है — तथा NATGRID (National Intelligence Grid) — जो विभिन्न डेटाबेस को जोड़कर आतंकवाद-रोधी खुफिया तंत्र को मज़बूत करने की परियोजना है — भी भारत के समन्वित सुरक्षा ढांचे के महत्वपूर्ण हिस्से हैं।
भारत की स्थल सीमा लगभग 15,106 किलोमीटर लंबी है, जो 7 देशों (पाकिस्तान, चीन, बांग्लादेश, नेपाल, म्यांमार, भूटान व अफगानिस्तान) से लगती है — इतनी विशाल व विविध सीमा का प्रबंधन भारत की आंतरिक सुरक्षा की एक स्थायी चुनौती है, क्योंकि हर सीमा की भौगोलिक प्रकृति, चुनौतियां व संबंधित देश के साथ संबंध अलग-अलग हैं।
| सीमा | लंबाई (लगभग) | रक्षक बल एवं प्रमुख चुनौती |
|---|---|---|
| भारत-पाकिस्तान | 3,323 किमी | BSF — घुसपैठ, तस्करी, ड्रोन से हथियार आपूर्ति |
| भारत-चीन (LAC) | 3,488 किमी | ITBP व सेना — सीमा विवाद, अतिक्रमण की आशंका |
| भारत-बांग्लादेश | 4,096 किमी | BSF — अवैध घुसपैठ, मवेशी व मादक पदार्थ तस्करी |
| भारत-नेपाल/भूटान | 1,751/699 किमी | SSB — खुली सीमा, आवाजाही पर सीमित नियंत्रण |
| भारत-म्यांमार | 1,643 किमी | असम राइफल्स — उग्रवादी घुसपैठ, ड्रग तस्करी |
सीमा सुरक्षा को मज़बूत करने के लिए भारत ने कई सीमाओं पर बाड़बंदी (Fencing), इलेक्ट्रॉनिक निगरानी प्रणाली (जैसे व्यापक एकीकृत सीमा प्रबंधन प्रणाली — CIBMS), तथा ड्रोन-रोधी तकनीक जैसी आधुनिक व्यवस्थाएं भी लागू की हैं, विशेषकर पंजाब व राजस्थान सीमा पर हाल के वर्षों में ड्रोन के ज़रिए हथियार व मादक पदार्थ भेजे जाने की बढ़ती घटनाओं को देखते हुए — जिसकी विस्तृत चर्चा हम अगले टॉपिक में राजस्थान के विशेष संदर्भ में करेंगे।
पिछले कुछ वर्षों में भारत-पाकिस्तान सीमा पर एक बिल्कुल नई तरह की सुरक्षा चुनौती उभरी है — 'नारको-आतंकवाद (Narco-Terrorism)', यानी आतंकी व तस्करी नेटवर्क द्वारा ड्रोन (Drone) तकनीक का इस्तेमाल कर सीमा पार से मादक पदार्थ (विशेषकर हेरोइन) व हथियार भारतीय क्षेत्र में गिराना। सुरक्षा विश्लेषकों के अनुसार, इन तस्करी गतिविधियों को अक्सर पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI का अप्रत्यक्ष समर्थन प्राप्त होता है, तथा इससे प्राप्त धन आगे आतंकी गतिविधियों के वित्तपोषण में भी इस्तेमाल होने की आशंका जताई जाती है — इसीलिए इसे सिर्फ 'तस्करी' नहीं, बल्कि एक व्यापक सुरक्षा ख़तरे के रूप में देखा जाता है।
राजस्थान — एक विशेष रूप से संवेदनशील सीमावर्ती राज्य
राजस्थान, भारत-पाकिस्तान सीमा पर सबसे लंबी राज्य-सीमा (लगभग 1,070 किलोमीटर) साझा करता है — जिसे 'रैडक्लिफ रेखा' भी कहा जाता है। यह सीमा श्रीगंगानगर (हिंदूमलकोट से शुरू) से लेकर बाड़मेर (शाहगढ़/बाखासर पर समाप्त) तक फैली है, तथा चार प्रमुख सीमावर्ती ज़िलों से होकर गुज़रती है — श्रीगंगानगर (लगभग 210 किमी), बीकानेर (लगभग 168 किमी), जैसलमेर (लगभग 464 किमी, राज्य की सबसे लंबी सीमा वाला ज़िला) तथा बाड़मेर (लगभग 228 किमी)।
पिछले कुछ वर्षों में राजस्थान की सीमा पर BSF ने कई ड्रोन-आधारित तस्करी प्रयासों को विफल किया है। श्रीगंगानगर के रायसिंहनगर व गजसिंहपुर सेक्टर में कई बार पाकिस्तान से आने वाले ड्रोन मार गिराए गए, जिनसे करोड़ों रुपये मूल्य की हेरोइन बरामद हुई। बीकानेर के खाजूवाला थाना क्षेत्र में एक चीनी ड्रोन को मार गिराने पर उसमें 5 पिस्तौल व 325 कारतूस मिले — यह पहला मौका था जब इस क्षेत्र में ड्रोन के ज़रिए हथियार (सिर्फ मादक पदार्थ नहीं) भेजे जाने का मामला सामने आया। ये घटनाएं दिखाती हैं कि राजस्थान की मरुस्थलीय सीमा — जो पहले अपनी दुर्गमता के कारण अपेक्षाकृत सुरक्षित मानी जाती थी — अब ड्रोन तकनीक के दौर में एक नई तरह की चुनौती का सामना कर रही है।
इस नई चुनौती से निपटने के लिए BSF ने राजस्थान सीमा पर एंटी-ड्रोन तकनीक, रडार-आधारित निगरानी प्रणाली तथा रात्रि-दृष्टि उपकरणों (Night Vision Devices) की तैनाती बढ़ाई है, तथा सीमावर्ती ग्रामीणों को भी संदिग्ध गतिविधियों की तुरंत सूचना देने हेतु जागरूक किया जा रहा है — जो दिखाता है कि आधुनिक सीमा-सुरक्षा में तकनीक व स्थानीय जन-भागीदारी, दोनों की भूमिका अनिवार्य होती जा रही है।
भारत की लगभग 7,516 किलोमीटर लंबी तटरेखा (Coastline) भी आंतरिक सुरक्षा का एक महत्वपूर्ण, संवेदनशील आयाम है। 26 नवंबर 2008 को हुए मुंबई आतंकी हमलों ने यह भयावह रूप से उजागर किया कि आतंकवादी समुद्री मार्ग से भी घुसपैठ कर सकते हैं — हमलावर एक अपहृत मछली पकड़ने वाली नाव के ज़रिए समुद्र के रास्ते मुंबई पहुंचे थे, और उस समय मौजूद तटीय सुरक्षा ढांचा इस घुसपैठ को रोकने में असफल रहा।
26/11 के बाद हुए बड़े सुधार
1. सागर प्रहरी बल (Sagar Prahari Bal) का गठन — भारतीय नौसेना ने तटीय गश्त व सुरक्षा हेतु एक विशेष बल गठित किया, जिसे 80 तेज़ गश्ती नौकाओं (Fast Interceptor Crafts) व 1,000 से अधिक कर्मियों से सुसज्जित किया गया।
2. संयुक्त परिचालन केंद्र (Joint Operations Centre — JOC) — मुंबई, कोच्चि, विशाखापत्तनम व पोर्ट ब्लेयर में स्थापित, जो 15 से अधिक केंद्रीय व तटवर्ती राज्य एजेंसियों के बीच समन्वय सुनिश्चित करते हैं।
3. त्रि-स्तरीय सुरक्षा ढांचा — भारतीय नौसेना (गहरे समुद्र की सुरक्षा), भारतीय तटरक्षक बल (Indian Coast Guard, तटवर्ती जल क्षेत्र) तथा राज्य समुद्री/तटीय पुलिस (निकटवर्ती तटीय क्षेत्र) — तीन स्तरों पर ज़िम्मेदारी बांटी गई।
4. राष्ट्रीय समिति व राज्य/ज़िला समितियां — 2009 में तटीय व समुद्री सुरक्षा सुदृढ़ीकरण हेतु राष्ट्रीय समिति (NCSMCS), तथा 2016 में राज्य व ज़िला स्तरीय तटीय सुरक्षा समितियां गठित की गईं।
26/11 के बाद से भारतीय तटरक्षक बल ने 300 से अधिक खोज-बचाव व सुरक्षा अभ्यास आयोजित किए हैं, तथा मछुआरों की पहचान हेतु बायोमेट्रिक पहचान पत्र व नौकाओं के लिए ट्रांसपोंडर (Automatic Identification System) जैसी तकनीकें भी लागू की गई हैं, ताकि समुद्री यातायात पर बेहतर निगरानी रखी जा सके।
गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम — UAPA, 1967
गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1967 (Unlawful Activities Prevention Act — UAPA) भारत का मुख्य आतंकवाद-रोधी कानून है, जो व्यक्तियों व संगठनों को 'गैरकानूनी' या 'आतंकवादी' घोषित करने, संपत्ति ज़ब्त करने तथा आतंकी वित्तपोषण पर रोक लगाने की शक्ति देता है।
व्यक्ति को आतंकवादी घोषित करने की शक्ति — अब केंद्र सरकार किसी संगठन के साथ-साथ किसी व्यक्ति को भी बिना औपचारिक न्यायिक प्रक्रिया के आतंकवादी घोषित कर सकती है साइबर-आतंकवाद व संपत्ति ज़ब्ती — साइबर-आतंकवाद को शामिल किया गया, तथा NIA के महानिदेशक को आतंकवाद से अर्जित संपत्ति ज़ब्त करने की शक्ति दी गई जांच अधिकार का विस्तार — निरीक्षक (Inspector) या उच्च रैंक के NIA अधिकारी भी अब मामलों की जांच कर सकते हैं
UAPA के 2019 संशोधन की संयुक्त राष्ट्र के विशेष प्रतिवेदकों (Special Rapporteurs) सहित कई मानवाधिकार संगठनों ने आलोचना की है — उनका तर्क है कि बिना औपचारिक न्यायिक सुनवाई के किसी व्यक्ति को 'आतंकवादी' घोषित करने की शक्ति नागरिक स्वतंत्रता व निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार के विपरीत जा सकती है। सरकार का पक्ष है कि यह प्रावधान गंभीर व संगठित आतंकी नेटवर्क से निपटने के लिए ज़रूरी है।
राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम — NSA, 1980
राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम, 1980 अनुच्छेद 22 के तहत मिली निवारक निरोध (Preventive Detention) की संवैधानिक अनुमति पर आधारित है — इसके तहत केंद्र/राज्य सरकार, ज़िला मजिस्ट्रेट या अधिकृत पुलिस आयुक्त किसी व्यक्ति को, बिना मुकदमा चलाए, देश की रक्षा, विदेश संबंध, सुरक्षा या लोक-व्यवस्था के लिए ख़तरा मानते हुए हिरासत में रख सकते हैं — शुरू में 3 महीने तक बिना किसी सलाहकार बोर्ड (Advisory Board) की स्वीकृति के, तथा अधिकतम 12 महीने तक।
1 जुलाई 2024 से भारत में तीन नए आपराधिक कानून प्रभावी हुए — भारतीय न्याय संहिता, 2023 (Bharatiya Nyaya Sanhita — BNS, जिसने भारतीय दंड संहिता 1860 की जगह ली), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita — BNSS, जिसने दंड प्रक्रिया संहिता 1973 की जगह ली), तथा भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 (Bharatiya Sakshya Adhiniyam — BSA, जिसने भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 की जगह ली)।
आंतरिक सुरक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण बदलाव
1. आतंकवाद की परिभाषा — भारतीय न्याय संहिता में पहली बार 'आतंकवादी कृत्य (Terrorist Act)' को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है — पहले यह सिर्फ UAPA जैसे विशेष कानूनों में ही परिभाषित था।
2. संगठित अपराध — संगठित अपराध (Organised Crime) व छोटे संगठित अपराध (Petty Organised Crime) को भी पहली बार मुख्यधारा के आपराधिक कानून में शामिल किया गया है — जो टॉपिक 11 में चर्चित गैंगस्टर नेटवर्क जैसी चुनौतियों से निपटने में मददगार होगा।
3. इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य — भारतीय साक्ष्य अधिनियम ने इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड (जैसे CCTV फुटेज, डिजिटल दस्तावेज़) को प्राथमिक साक्ष्य (Primary Evidence) के रूप में स्पष्ट मान्यता दी है — जो साइबर व डिजिटल अपराधों की जांच में मददगार है।
4. संपत्ति ज़ब्ती व ज़मानत प्रावधान — भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता ने संपत्ति ज़ब्ती के दायरे को विस्तृत किया है, तथा पुलिस व मजिस्ट्रेट की शक्तियों में भी कुछ बदलाव किए हैं।
सशस्त्र बल (विशेष अधिकार) अधिनियम, 1958 (Armed Forces Special Powers Act — AFSPA) उन क्षेत्रों में लागू होता है, जिन्हें सरकार द्वारा 'अशांत क्षेत्र (Disturbed Area)' घोषित किया गया हो — मुख्यतः जम्मू-कश्मीर व पूर्वोत्तर के कुछ हिस्सों में। यह कानून सशस्त्र बलों को कुछ विशेष शक्तियां देता है — जैसे बिना वारंट तलाशी व गिरफ्तारी, तथा लोक-व्यवस्था बनाए रखने के लिए बल प्रयोग (यहां तक कि मृत्यु कारित करने की सीमा तक)।
इस कानून के तहत सशस्त्र बल के किसी कर्मी पर केंद्र सरकार की पूर्व स्वीकृति (Sanction) के बिना मुकदमा नहीं चलाया जा सकता — यह प्रावधान लंबे समय से मानवाधिकार संगठनों व स्थानीय समुदायों की आलोचना का केंद्र रहा है। मणिपुर में 2004 के थंगजम मनोरमा देवी हिरासत-हत्या मामले ने बड़े पैमाने पर विरोध-प्रदर्शन को जन्म दिया, तथा इरोम शर्मिला ने AFSPA के विरुद्ध 16 वर्षों तक अनशन किया — जो भारत के सबसे लंबे शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शनों में से एक माना जाता है।
AFSPA की समीक्षा के लिए गठित न्यायमूर्ति बी.पी. जीवन रेड्डी समिति ने 2005 में सिफारिश की थी कि इस कानून को पूरी तरह निरस्त कर, इसके ज़रूरी प्रावधानों को गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम में शामिल कर दिया जाए — ताकि सुरक्षा बलों को आवश्यक शक्तियां भी मिलें, और मानवाधिकार सुरक्षा भी बनी रहे। हालांकि यह सिफारिश आज तक पूर्ण रूप से लागू नहीं हुई है। सकारात्मक बात यह है कि पिछले कुछ वर्षों में शांति समझौतों व घटती हिंसा के बाद, नागालैंड, असम, मणिपुर व अरुणाचल प्रदेश के कई हिस्सों से AFSPA को धीरे-धीरे हटाया गया है (जैसा टॉपिक 6 में देखा)।
यद्यपि प्राकृतिक आपदाएं (जैसे बाढ़, भूकंप, चक्रवात) पारंपरिक अर्थों में 'सुरक्षा खतरा' नहीं मानी जातीं, फिर भी बड़े पैमाने की आपदाएं कानून-व्यवस्था, सामाजिक स्थिरता व राज्य की प्रतिक्रिया-क्षमता के लिए गंभीर चुनौती बन सकती हैं — इसलिए आपदा प्रबंधन को भी आंतरिक सुरक्षा ढांचे का एक अभिन्न हिस्सा माना जाता है। आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के तहत गठित राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (National Disaster Response Force — NDRF) प्राकृतिक व मानव-निर्मित, दोनों तरह की आपदाओं (जैसे रासायनिक, जैविक, रेडियोलॉजिकल व परमाणु — CBRN — आपात स्थितियां) में तुरंत बचाव व राहत कार्य के लिए विशेष रूप से प्रशिक्षित बल है।
आंतरिक सुरक्षा की पहली पंक्ति राज्य पुलिस बल होते हैं, इसलिए उनकी संरचनात्मक स्वायत्तता, जवाबदेही व व्यावसायिकता (Professionalism) भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। दशकों से यह मांग उठती रही कि पुलिस बल को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त कर एक स्वायत्त, जवाबदेह संस्था बनाया जाए।
प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ (2006) पूर्व पुलिस महानिदेशक प्रकाश सिंह द्वारा दायर एक जनहित याचिका पर, सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों को पुलिस सुधार हेतु 7 निर्देश जारी किए — जिनमें राज्य सुरक्षा आयोग (State Security Commission) का गठन, पुलिस महानिदेशक (DGP) व अन्य वरिष्ठ अधिकारियों का न्यूनतम निश्चित कार्यकाल (Fixed Tenure), जांच (Investigation) व कानून-व्यवस्था (Law & Order) कार्यों को अलग-अलग करना, तथा पुलिस शिकायत प्राधिकरण (Police Complaints Authority) का गठन प्रमुख हैं।
इस ऐतिहासिक निर्णय के लगभग दो दशक बाद भी, अधिकांश राज्यों ने इन निर्देशों को पूर्ण रूप से लागू नहीं किया है — DGP के तबादले अक्सर राजनीतिक कारणों से होते रहते हैं, और अलग जांच विंग बनाने जैसी सिफारिशें भी सीमित रूप से ही अपनाई गई हैं। यह दिखाता है कि कानूनी निर्देश और उनका वास्तविक ज़मीनी क्रियान्वयन, दोनों के बीच अक्सर एक बड़ा अंतर रह जाता है।
इस अध्याय में अब तक हमने जिन खतरों की चर्चा की — सीमापार आतंकवाद, साइबर हमले, ड्रोन तस्करी, संगठित अपराध व AI-जनित दुष्प्रचार (देखें अध्याय 22) — अब अक्सर अलग-अलग नहीं, बल्कि एक साथ, समन्वित रूप में इस्तेमाल किए जाते हैं। इसी प्रवृत्ति को 'हाइब्रिड युद्ध (Hybrid Warfare)' या 'ग्रे-ज़ोन युद्ध (Grey-Zone Warfare)' कहा जाता है — यानी पारंपरिक सैन्य टकराव के बजाय, सूचना-युद्ध (Information Warfare), साइबर हमले, आर्थिक दबाव, प्रॉक्सी संगठनों व दुष्प्रचार का मिला-जुला इस्तेमाल कर किसी देश को अस्थिर करने की कोशिश।
उदाहरण के लिए, पहलगाम जैसे भौतिक आतंकी हमलों के साथ-साथ, अक्सर सोशल मीडिया पर संगठित दुष्प्रचार अभियान, सीमा पर ड्रोन-आधारित तस्करी, तथा साइबर हमलों का समन्वित इस्तेमाल भी देखा जाता है — जिससे सुरक्षा एजेंसियों के लिए खतरे के स्रोत की स्पष्ट पहचान करना और भी चुनौतीपूर्ण हो जाता है। भारत जैसे देश के लिए, जो एक साथ कई मोर्चों (सीमा, साइबर, सूचना-तंत्र, आर्थिक व्यवस्था) पर चुनौतियों का सामना करता है, हाइब्रिड युद्ध की यह अवधारणा आने वाले वर्षों की सुरक्षा नीति की केंद्रीय चिंता बनती जा रही है।
रक्षा व सुरक्षा विशेषज्ञ अक्सर इस बात पर ज़ोर देते हैं कि भारत को हाइब्रिड युद्ध से निपटने के लिए एक 'समग्र सुरक्षा दृष्टिकोण (Comprehensive Security Approach)' अपनाना होगा — जिसमें सैन्य, कूटनीतिक, आर्थिक, साइबर व सूचना-क्षेत्र, सभी की एक साथ, समन्वित तैयारी शामिल हो। कुछ विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि भारत को एक औपचारिक, सार्वजनिक 'राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति (National Security Strategy)' दस्तावेज़ प्रकाशित करना चाहिए — जैसा अमेरिका, ब्रिटेन व कई अन्य बड़े लोकतंत्र करते हैं — ताकि सभी एजेंसियों व राज्यों के बीच एक स्पष्ट, समन्वित रणनीतिक दिशा तय हो सके।
1. केंद्र-राज्य समन्वय — पुलिस व लोक-व्यवस्था राज्य सूची का विषय होने के कारण, केंद्रीय एजेंसियों व राज्य पुलिस के बीच समन्वय की चुनौती अक्सर बनी रहती है (देखें अध्याय 14-15)।
2. संसाधनों व प्रशिक्षण की कमी — कई राज्यों में पुलिस बल आधुनिक हथियार, फोरेंसिक क्षमता व साइबर-प्रशिक्षण के मामले में अभी भी पीछे हैं।
3. मानवाधिकार बनाम सुरक्षा का संतुलन — AFSPA व UAPA जैसे कानूनों के तहत की गई कार्रवाइयों में मानवाधिकार सुरक्षा व राष्ट्रीय सुरक्षा, दोनों के बीच संतुलन बनाना एक स्थायी चुनौती है।
4. नई तकनीकी चुनौतियां — ड्रोन से हथियार/मादक पदार्थ तस्करी, साइबर-आतंकवाद, तथा जैसा अध्याय 22 में देखा, AI-जनित दुष्प्रचार व हाइब्रिड युद्ध — ये सभी सुरक्षा तंत्र के लिए नई, तेज़ी से बदलती चुनौतियां हैं।
5. जातीय व सामाजिक सुलह — मणिपुर जैसी घटनाएं दिखाती हैं कि दीर्घकालिक शांति के लिए सिर्फ बल-प्रयोग नहीं, बल्कि गहरा राजनीतिक-सामाजिक संवाद व मेल-मिलाप भी उतना ही ज़रूरी है।
6. संगठित अपराध का बढ़ता वैश्विक जाल — लॉरेंस बिश्नोई जैसे नेटवर्क दिखाते हैं कि घरेलू अपराधी गिरोह अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सक्रिय हो सकते हैं, जिससे जांच व प्रत्यर्पण (Extradition) में नई जटिलताएं पैदा होती हैं।
इस अध्याय में हमने भारत की आंतरिक सुरक्षा के विशाल व बहुआयामी परिदृश्य को देखा — वामपंथी उग्रवाद के लगभग समाप्त होते जंगल-युद्ध से लेकर, पूर्वोत्तर में शांति की ओर बढ़ते कदम, जम्मू-कश्मीर में सीमापार आतंकवाद की निरंतर चुनौती, मणिपुर जैसी जातीय हिंसा, संगठित अपराध व मानव तस्करी के फैलते नेटवर्क, तटीय व साइबर सुरक्षा की नई सीमाहीन चुनौतियां, तथा हाइब्रिड युद्ध जैसी उभरती अवधारणाएं — यह सब मिलकर दिखाते हैं कि आंतरिक सुरक्षा एक स्थिर लक्ष्य नहीं, बल्कि निरंतर अनुकूलन (Continuous Adaptation) की मांग करने वाली प्रक्रिया है।
पहलगाम हमले व ऑपरेशन सिंदूर ने यह भी दिखाया कि भारत अब आतंकवाद के प्रति अधिक निर्णायक (Decisive) प्रतिक्रिया की नीति अपना रहा है, जबकि नक्सल-मुक्त भारत का लक्ष्य दिखाता है कि दशकों पुरानी चुनौतियों पर भी निरंतर, समन्वित प्रयासों से काबू पाया जा सकता है। साथ ही, नए आपराधिक कानून (BNS/BNSS/BSA), UAPA व AFSPA जैसे विधिक ढांचे, तथा CAPF-NIA-IB-RAW जैसी संस्थाएं मिलकर एक व्यापक सुरक्षा-तंत्र बनाती हैं — जिसकी सफलता आगे भी केंद्र-राज्य समन्वय, तकनीकी आधुनिकीकरण व मानवाधिकार-सुरक्षा के संतुलन पर निर्भर करेगी।
एक जागरूक नागरिक और भावी प्रशासक के तौर पर, यह समझना ज़रूरी है कि आंतरिक सुरक्षा सिर्फ सैन्य/पुलिस बल की ज़िम्मेदारी नहीं — विकास, सामाजिक न्याय, शिक्षा व संवाद भी उतने ही महत्वपूर्ण औज़ार हैं। नक्सलवाद के लगभग खात्मे से लेकर पूर्वोत्तर की शांति-यात्रा तक, भारत का अनुभव दिखाता है कि 'सुरक्षा + विकास + संवाद' का संतुलित मॉडल ही दीर्घकालिक स्थिरता ला सकता है — तथा राजस्थान जैसे सीमावर्ती राज्यों के लिए, आधुनिक तकनीक व स्थानीय जन-भागीदारी का संतुलन भी उतना ही महत्वपूर्ण रहेगा।
1. आंतरिक सुरक्षा के चार पारंपरिक आयाम हैं — वामपंथी उग्रवाद, पूर्वोत्तर उग्रवाद, सीमापार आतंकवाद व सांप्रदायिक/जातीय हिंसा — जिनके साथ अब संगठित अपराध, साइबर हमले व हाइब्रिड युद्ध जैसी नई चुनौतियां भी जुड़ चुकी हैं। 2. नक्सलवाद 1967 के नक्सलबाड़ी विद्रोह से शुरू होकर, अपने चरम पर 17% भूभाग तक फैला था; अब सरकार का लक्ष्य 31 मार्च 2026 तक "नक्सल-मुक्त भारत" है, और आज सिर्फ बस्तर के 4 ज़िले शेष रह गए हैं। 3. पूर्वोत्तर में बोडो (2020), NLFT (2019) व ULFA (दिसंबर 2023) जैसे ऐतिहासिक शांति समझौतों से 9,000+ कैडरों ने आत्मसमर्पण किया है, और असम के 85% क्षेत्र से AFSPA हटाया जा चुका है। 4. जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाए जाने (2019) के बाद स्थिति बेहतर हुई, लेकिन पहलगाम हमला (अप्रैल 2025) दिखाता है कि सीमापार आतंकवाद अब भी सक्रिय है — भारत ने "ऑपरेशन सिंदूर" से निर्णायक जवाब दिया। 5. मणिपुर में मैतेई-कुकी जातीय हिंसा (मई 2023 से) में 260+ मृत्यु व 60,000+ विस्थापन हुआ; राष्ट्रपति शासन (फरवरी 2025-फरवरी 2026) के बाद नई सरकार बनी, पर स्थायी शांति अभी अधूरी है। 6. लॉरेंस बिश्नोई जैसे संगठित अपराध नेटवर्क अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय हैं; राजस्थान सहित कई राज्यों ने MCOCA मॉडल पर विशेष संगठित अपराध-रोधी कानून बनाए हैं, तथा मानव तस्करी-रोधी इकाइयां (AHTU) भी सक्रिय हैं। 7. साइबर सुरक्षा (I4C, हेल्पलाइन 1930), महत्वपूर्ण अवसंरचना सुरक्षा (NCIIPC) व आतंकी वित्तपोषण-रोधी तंत्र (PMLA, FATF) आधुनिक आंतरिक सुरक्षा के तेज़ी से बढ़ते आयाम हैं। 8. CAPF के 7 बल (लगभग 10 लाख कर्मी), NIA (2008/2019), IB (1887) व RAW (1968) मिलकर जांच, खुफिया व सुरक्षा तंत्र का केंद्रीय ढांचा बनाते हैं। 9. राजस्थान की 1,070 किमी पाकिस्तान सीमा (श्रीगंगानगर, बीकानेर, जैसलमेर, बाड़मेर) ड्रोन-आधारित नारको-आतंकवाद की नई चुनौती झेल रही है; वहीं 26/11 के बाद तटीय सुरक्षा (सागर प्रहरी बल, त्रि-स्तरीय ढांचा) को भी मज़बूत किया गया है। 10. UAPA, NSA 1980, नए आपराधिक कानून (BNS/BNSS/BSA) तथा AFSPA व प्रकाश सिंह पुलिस-सुधार निर्देश (2006) दिखाते हैं कि सुरक्षा शक्तियों व जवाबदेही के बीच संतुलन आज भी एक अधूरी यात्रा है — तथा हाइब्रिड युद्ध जैसी उभरती चुनौतियां भारत को एक समग्र, समन्वित राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति अपनाने के लिए प्रेरित कर रही हैं।