🎭 अध्याय 31/34 — भारतीय राजव्यवस्था एवं शासन

भारतीय राजनीति में समकालीन बदलाव — दलीय व्यवस्था, क्षेत्रीयता एवं गठबंधन राजनीति

Contemporary Shifts — Party System, Regionalism & Coalition Politics | RAS Pre + Mains
📋 इस अध्याय में
  1. दलीय व्यवस्था — अर्थ एवं प्रकार
  2. कांग्रेस प्रणाली का युग (1952-1967) — राजनी कोठारी का सिद्धांत
  3. 1967 के बाद दलीय व्यवस्था में बिखराव
  4. आपातकाल एवं जनता पार्टी प्रयोग (1975-1980)
  5. 1980 का दशक — कांग्रेस की वापसी एवं क्षय
  6. क्षेत्रीय दलों का उदय — भाषाई पुनर्गठन एवं DMK मॉडल
  7. राष्ट्रीय दल बनाम राज्य दल — मान्यता के मापदंड
  8. क्षेत्रीय दलों की मुखरता (Assertive Regionalism)
  9. वामपंथी राजनीति का उत्थान एवं पतन — केरल, बंगाल एवं त्रिपुरा
  10. सरकारिया आयोग (1983) एवं पुंछी आयोग (2007)
  11. गठबंधन राजनीति का उदय — राष्ट्रीय मोर्चा 1989
  12. मंडल-कमंडल राजनीति — जातीय एवं धार्मिक ध्रुवीकरण का दशक (1990-92)
  13. संयुक्त मोर्चा (1996-98) — गठबंधन प्रयोगों की परीक्षा
  14. NDA का युग एवं गठबंधन धर्म (1998-2004)
  15. UPA का युग — साझा न्यूनतम कार्यक्रम (2004-2014)
  16. 2014 एवं 2019 — बहुमत की राजनीति की वापसी
  17. 2024 लोकसभा चुनाव — गठबंधन राजनीति की पुनर्वापसी (NDA 3.0)
  18. INDIA गठबंधन — विपक्षी एकता का नया प्रयोग
  19. दल-बदल विरोधी कानून — दसवीं अनुसूची का विस्तृत अध्ययन
  20. गठबंधन सरकारों की चुनौतियां एवं स्थिरता तंत्र
  21. वंशवादी राजनीति (Dynastic Politics) — भारतीय दलों की एक विशेषता
  22. राजस्थान के संदर्भ में क्षेत्रीय राजनीति — BAP एवं RLP
  23. समकालीन भारतीय राजनीति के उभरते प्रारूप
📖 🌟 कहानी से शुरुआत
4 जून 2024 की दोपहर। दिल्ली के शेयर बाज़ार में हलचल मची हुई थी — सेंसेक्स कुछ ही घंटों में हज़ारों अंक लुढ़क चुका था। टीवी स्क्रीनों पर नतीजे आ रहे थे, और देशभर में एक ही सवाल गूंज रहा था — क्या भारतीय जनता पार्टी, जो पिछले दो चुनावों (2014 और 2019) में अकेले अपने दम पर पूर्ण बहुमत लाई थी, इस बार भी वैसा ही कर पाएगी? शाम होते-होते जवाब साफ हो गया — नहीं। भाजपा अकेले 240 सीटों पर सिमट गई थी, जो 272 के जादुई आंकड़े से 32 सीटें कम थीं। और फिर अचानक, देश के दो ऐसे नेता सुर्खियों में छा गए, जिन्हें कुछ ही महीने पहले तक कई विश्लेषक 'हाशिये पर' मान बैठे थे — आंध्र प्रदेश के चंद्रबाबू नायडू और बिहार के नीतीश कुमार। इन दोनों क्षेत्रीय नेताओं की पार्टियों — तेलुगु देशम पार्टी (16 सीटें) और जनता दल (यूनाइटेड) (12 सीटें) — के बिना, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) सरकार नहीं बना सकता था। रातों-रात दो क्षेत्रीय क्षत्रप पूरे देश की सरकार बनाने-बिगाड़ने वाले 'किंगमेकर' बन गए। यह कोई अनोखी घटना नहीं थी — यह भारतीय राजनीति के एक बहुत पुराने, बार-बार दोहराए जाने वाले चक्र की एक और कड़ी थी। 1989 में भी ऐसा ही हुआ था, 1996 में भी, 2004 में भी। दरअसल, भारत की दलीय व्यवस्था एक ऐसी नदी की तरह रही है, जो कभी एक ही धारा में बहती दिखी (जब कांग्रेस अकेले राज करती थी), तो कभी सैकड़ों छोटी-छोटी धाराओं में बंट गई (जब क्षेत्रीय दल उभरे), और फिर इन धाराओं को आपस में जोड़ने के लिए 'गठबंधन' नाम के पुल बनाने पड़े। आइए, इसी नदी के 70 साल के सफर को, एक-एक मोड़ के साथ, विस्तार से समझते हैं।

1दलीय व्यवस्था (Party System) — अर्थ एवं प्रकार

किसी भी लोकतंत्र में राजनीतिक दल (Political Parties) वह पुल हैं जो जनता की इच्छाओं को सरकार तक पहुंचाते हैं। जब हम यह देखते हैं कि किसी देश में कितने दल हैं, वे कैसे एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा करते हैं, और सत्ता किस तरह इनके बीच बंटती या केंद्रित होती है — इसी पूरी बनावट को 'दलीय व्यवस्था (Party System)' कहा जाता है। भारत की दलीय व्यवस्था बीते 75 वर्षों में कई बड़े मोड़ों से गुज़री है — और यही इस अध्याय की मूल कहानी है।

1.1 दलीय व्यवस्था के प्रमुख प्रकार

1. एक-दलीय व्यवस्था (One-Party System) — जहां सिर्फ एक ही दल को चुनाव लड़ने या सत्ता में आने की अनुमति हो, जैसे चीन। भारत में औपचारिक रूप से यह कभी नहीं रहा।

2. एक-दलीय प्रभुत्व व्यवस्था (One-Party Dominant System) — यहां कई दल चुनाव लड़ते हैं, लेकिन एक ही दल लगातार जीतता और सत्ता में बना रहता है — भारत में 1952-1967 के दौरान कांग्रेस की स्थिति ठीक ऐसी ही थी।

3. द्विदलीय व्यवस्था (Two-Party System) — जहां मुख्यतः दो बड़े दल बारी-बारी से सत्ता में आते हैं, जैसे अमेरिका (डेमोक्रेट-रिपब्लिकन) या ब्रिटेन (लेबर-कंज़र्वेटिव)।

4. बहुदलीय व्यवस्था (Multi-Party System) — जहां कई दल होते हैं और अक्सर किसी एक दल को अकेले बहुमत नहीं मिलता, जिससे गठबंधन सरकारें बनती हैं — 1989 के बाद भारत की यही पहचान बनी।

📖 रोज़मर्रा से जुड़ा उदाहरण

इसे क्रिकेट टीम की तरह समझिए — 1950-60 के दशक में भारतीय राजनीति एक ऐसी 'टीम' (कांग्रेस) जैसी थी, जिसका कोई प्रतिद्वंद्वी उसके आसपास भी नहीं टिकता था। लेकिन धीरे-धीरे और टीमें (क्षेत्रीय दल) मैदान में मज़बूत होती गईं, और अब हालत यह है कि कोई एक टीम अकेले 'मैच' (चुनाव में बहुमत) नहीं जीत पाती — उसे बाकी टीमों से हाथ मिलाकर 'संयुक्त टीम' (गठबंधन) बनानी पड़ती है।

प्रकार (Type)उदाहरण
एक-दलीय व्यवस्थाचीन (Communist Party)
एक-दलीय प्रभुत्व व्यवस्थाभारत — 1952 से 1967 तक (कांग्रेस)
द्विदलीय व्यवस्थाअमेरिका, ब्रिटेन
बहुदलीय व्यवस्थाभारत — 1989 के बाद
🔑 मुख्य शब्द (Keywords)
दलीय व्यवस्थाएक-दलीय प्रभुत्वद्विदलीय व्यवस्थाबहुदलीय व्यवस्था

2कांग्रेस प्रणाली का युग (1952-1967) — राजनी कोठारी का सिद्धांत

आज़ादी के बाद हुए पहले तीन आम चुनावों (1952, 1957, 1962) में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को लोकसभा और लगभग सभी राज्य विधानसभाओं में भारी बहुमत मिला। प्रसिद्ध राजनीति-शास्त्री राजनी कोठारी (Rajni Kothari) ने 1964 में एक ऐतिहासिक लेख लिखा — 'द कांग्रेस सिस्टम इन इंडिया' — जिसमें उन्होंने तर्क दिया कि कांग्रेस सिर्फ एक सत्तारूढ़ दल नहीं थी, बल्कि खुद में एक पूरी 'व्यवस्था (System)' थी।

कोठारी के अनुसार, यह एक 'प्रतिस्पर्धी' व्यवस्था तो थी, लेकिन इसमें प्रतिस्पर्धा करने वाले दलों की भूमिकाएं अलग-अलग थीं — कांग्रेस के भीतर ही अलग-अलग विचारधाराओं के गुट (Factions) मौजूद थे, जो एक तरह से आंतरिक विपक्ष की भूमिका निभाते थे, जबकि बाहरी छोटे दल — जैसे स्वतंत्र पार्टी, जनसंघ, समाजवादी दल, कम्युनिस्ट पार्टी — 'दबाव समूह' या 'सुधारक' की भूमिका में थे, सत्ता की असली दावेदारी में नहीं। यह स्थिति खासतौर पर प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में सबसे मज़बूत रही।

⭐ महत्वपूर्ण तथ्य

ध्यान रहे — 'एक-दलीय प्रभुत्व' का मतलब यह नहीं था कि विपक्ष अस्तित्व में ही नहीं था। बल्कि विपक्षी दल राज्य स्तर पर या किसी खास क्षेत्र में मौजूद थे (जैसे केरल में कम्युनिस्ट पार्टी 1957 में सत्ता में भी आई), लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर कोई भी दल कांग्रेस को टक्कर देने की स्थिति में नहीं था।

🔑 मुख्य शब्द (Keywords)
राजनी कोठारीकांग्रेस प्रणाली 19641952-57-62 के चुनावआंतरिक गुट बनाम बाहरी दलनेहरू युग

31967 के बाद दलीय व्यवस्था में बिखराव

1964 में नेहरू के निधन के बाद कांग्रेस के भीतर उत्तराधिकार को लेकर खींचतान शुरू हुई। 1967 के आम चुनावों ने राजनी कोठारी की भविष्यवाणी को सच साबित कर दिया — कांग्रेस को 100 से ज़्यादा लोकसभा सीटों का नुकसान हुआ और उसका वोट प्रतिशत भी घटा। इससे भी बड़ा झटका राज्यों में लगा — बिहार, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, पंजाब, तमिलनाडु समेत कई राज्यों में पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकारें (Non-Congress Governments) बनीं, जिन्हें 'संविद सरकार (SVD — Samyukta Vidhayak Dal)' कहा गया।

1969 में कांग्रेस स्वयं दो हिस्सों में बंट गई — इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली 'कांग्रेस (आर)' और पुराने नेताओं वाली 'कांग्रेस (ओ)'। यह विभाजन दिखाता है कि एक-दलीय प्रभुत्व अब सिर्फ बाहरी चुनौतियों से नहीं, बल्कि खुद कांग्रेस के भीतर की टूट-फूट से भी कमज़ोर हो रहा था। हालांकि 1971 और 1972 के चुनावों में इंदिरा गांधी ने 'गरीबी हटाओ' के नारे पर शानदार वापसी की, लेकिन दलीय व्यवस्था अब पहले जैसी एकतरफा नहीं रह गई थी।

📖 असली उदाहरण

1967 के चुनावों को अक्सर 'महान उलटफेर (Great Upset)' कहा जाता है, ठीक वैसे ही जैसे किसी क्रिकेट मैच में मज़बूत मानी जा रही टीम को कमज़ोर समझी जाने वाली टीमों का गठबंधन हरा दे। यही वह पहला बड़ा संकेत था कि भारतीय मतदाता अब किसी एक दल को हमेशा के लिए 'वफादार' नहीं रहने वाला।

🔑 मुख्य शब्द (Keywords)
1967 का उलटफेरसंविद सरकारेंकांग्रेस विभाजन 1969कांग्रेस (आर) व कांग्रेस (ओ)गरीबी हटाओ 1971

4आपातकाल एवं जनता पार्टी प्रयोग (1975-1980)

1975 में लगे राष्ट्रीय आपातकाल (जिसकी विस्तृत चर्चा हम अध्याय 14 में कर चुके हैं) ने विपक्षी दलों को एक साझा दुश्मन दे दिया — इंदिरा गांधी सरकार का सत्तावादी रवैया। आपातकाल हटने के बाद 1977 के चुनावों में जनसंघ, भारतीय लोक दल, कांग्रेस (ओ), समाजवादी पार्टी जैसे कई गैर-कांग्रेसी दल आपस में मिलकर एक नया दल — 'जनता पार्टी' — बनाकर मैदान में उतरे। नतीजा ऐतिहासिक था — आज़ादी के बाद पहली बार केंद्र में एक गैर-कांग्रेसी सरकार बनी, मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने।

लेकिन यह प्रयोग ज़्यादा दिन नहीं चला। जनता पार्टी असल में अलग-अलग विचारधाराओं (समाजवादी, दक्षिणपंथी, किसान-आधारित) के दलों का एक जोड़-तोड़ था, कोई वैचारिक रूप से एकजुट पार्टी नहीं। आंतरिक कलह के चलते यह सरकार सिर्फ ढाई साल में गिर गई, और 1980 में हुए चुनावों में इंदिरा गांधी और कांग्रेस पूरे बहुमत के साथ वापस लौटीं।

जनता पार्टी प्रयोग की सफलता
  • पहली बार गैर-कांग्रेसी केंद्र सरकार
  • विपक्षी एकता का प्रथम प्रयोग
  • आपातकाल विरोधी जनमत को आवाज़
जनता पार्टी प्रयोग की विफलता
  • वैचारिक एकता का अभाव
  • आंतरिक गुटबाज़ी व कलह
  • सिर्फ ढाई साल में पतन (1977-79)
🔑 मुख्य शब्द (Keywords)
आपातकाल 1975जनता पार्टी 1977मोरारजी देसाईप्रथम गैर-कांग्रेसी सरकारइंदिरा की वापसी 1980

51980 का दशक — कांग्रेस की वापसी एवं क्षय

1980 में सत्ता में लौटने के बाद इंदिरा गांधी की हत्या (1984) के बाद हुए चुनावों में राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस को लोकसभा के इतिहास की सबसे बड़ी सीटें (414 सीटें, 542 में से) मिलीं — यह सहानुभूति लहर का असर था। लेकिन यह कांग्रेस की आख़िरी बड़ी जीत साबित हुई। बोफोर्स तोप सौदे में भ्रष्टाचार के आरोपों, पंजाब व असम में उग्रवाद, और शाहबानो प्रकरण जैसे विवादों ने राजीव सरकार की छवि को बड़ा नुकसान पहुंचाया।

इसी दशक में क्षेत्रीय दल तेज़ी से मज़बूत होते गए — आंध्र प्रदेश में एन.टी. रामाराव की तेलुगु देशम पार्टी (1982), पंजाब में अकाली दल की मज़बूती, असम में असम गण परिषद (1985) जैसे उदाहरण दिखाते हैं कि क्षेत्रीय पहचान अब राष्ट्रीय राजनीति में एक स्थायी ताकत बन चुकी थी। 1989 के चुनावों में कांग्रेस को बहुमत नहीं मिला — और यहीं से भारत के 'गठबंधन युग' की औपचारिक शुरुआत हुई, जिसे हम आगे विस्तार से देखेंगे।

🔑 मुख्य शब्द (Keywords)
राजीव गांधी 1984 — 414 सीटेंबोफोर्स मामलातेलुगु देशम 1982 — NTRअसम गण परिषद 19851989 — त्रिशंकु लोकसभा

6क्षेत्रीय दलों का उदय — भाषाई पुनर्गठन एवं DMK मॉडल

क्षेत्रीय दलों (Regional Parties) की जड़ें दरअसल 1956 में हुए राज्यों के भाषायी पुनर्गठन (Linguistic Reorganisation of States) में मिलती हैं। जब राज्यों की सीमाएं भाषा के आधार पर खींची गईं, तो हर राज्य को एक अलग भाषाई-सांस्कृतिक पहचान मिली — और यही पहचान आगे चलकर एक राजनीतिक संसाधन (Political Resource) बन गई, जिसके इर्द-गिर्द नए क्षेत्रीय दल संगठित हुए।

इसका सबसे बेहतरीन उदाहरण है तमिलनाडु का द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK)। हिंदी थोपे जाने के विरोध, तमिल पहचान और मज़बूत संघवाद (Federalism) की मांग को आधार बनाकर DMK ने 1967 के चुनावों में तमिलनाडु से कांग्रेस को पूरी तरह उखाड़ फेंका — और तब से आज तक तमिलनाडु में किसी राष्ट्रीय दल की अपने दम पर सरकार नहीं बनी। यही 'DMK मॉडल' आगे चलकर पूरे देश में कई अन्य क्षेत्रीय दलों के लिए एक खाका बना — भाषा, संस्कृति या क्षेत्रीय अस्मिता को राजनीतिक ताकत में बदलना।

📌 तमिलनाडु में कांग्रेस का सफाया

DMK की कहानी — क्षेत्रीय राजनीति का सबसे बड़ा सबक (1967) 1967 के विधानसभा चुनावों में DMK ने तमिलनाडु में कांग्रेस को बुरी तरह हराया। इसकी बुनियाद थी हिंदी विरोधी आंदोलन (Anti-Hindi Agitation) — जब केंद्र सरकार ने हिंदी को एकमात्र राजभाषा बनाने की कोशिश की, तो तमिलनाडु में भारी विरोध हुआ (जिसकी चर्चा हम अध्याय 1 में मुंशी-अयंगर फॉर्मूले के संदर्भ में कर चुके हैं)। इसी विरोध ने द्रविड़ आंदोलन को एक मज़बूत राजनीतिक चेहरा दिया, और तब से आज तक DMK और उसकी प्रतिद्वंद्वी AIADMK के बीच ही तमिलनाडु की सत्ता घूमती रही है।

🔑 मुख्य शब्द (Keywords)
भाषायी पुनर्गठन 1956DMK मॉडलहिंदी विरोधी आंदोलनतमिलनाडु 1967क्षेत्रीय अस्मिता

7राष्ट्रीय दल बनाम राज्य दल — मान्यता के मापदंड

जब हम 'क्षेत्रीय दल' कहते हैं, तो असल में निर्वाचन आयोग की भाषा में इसे 'राज्य दल (State Party)' कहा जाता है — यह एक कानूनी/चुनावी वर्गीकरण है, न कि सिर्फ बोलचाल का शब्द। यह वर्गीकरण भारत निर्वाचन आयोग द्वारा 'चुनाव चिन्ह (आरक्षण एवं आवंटन) आदेश, 1968' के तहत तय किया जाता है, जिसकी विस्तृत चर्चा हम अध्याय 23 में कर चुके हैं — यहां हम इसे दलीय-व्यवस्था के व्यापक संदर्भ में समझेंगे।

किसी दल को 'राष्ट्रीय दल (National Party)' का दर्जा पाने के लिए उसे कम से कम 4 राज्यों में 'राज्य दल' की मान्यता प्राप्त होनी चाहिए, अथवा लोकसभा की कुल सीटों का 2% (कम से कम 3 राज्यों से) जीतना चाहिए, अथवा 4 या अधिक राज्यों में लोकसभा/विधानसभा चुनाव में कुल वैध मतों का 6% प्राप्त करना चाहिए। इसके विपरीत, 'राज्य दल' का दर्जा किसी एक राज्य में एक निश्चित प्रतिशत वोट या सीटें जीतने पर मिलता है।

राष्ट्रीय दल (National Party)
  • 4+ राज्यों में राज्य-दल मान्यता, या
  • लोकसभा की 2% सीटें (3+ राज्यों से), या
  • 4+ राज्यों में 6% वैध मत
  • पूरे देश में एक समान चुनाव चिन्ह आरक्षित
  • उदाहरण — भाजपा, कांग्रेस, बसपा, माकपा, भाकपा, AAP, NPP
राज्य दल (State Party)
  • किसी एक राज्य में विधानसभा/लोकसभा चुनाव में 6% वैध मत + 2 सीटें, या
  • राज्य विधानसभा की कुल सीटों का 3% अथवा 3 सीटें (जो अधिक हो)
  • सिर्फ संबंधित राज्य में चिन्ह आरक्षित
  • उदाहरण — DMK, TDP, JD-U, RLD, RLP, BAP
⭐ महत्वपूर्ण तथ्य

मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय/राज्य दलों को कुछ विशेष सुविधाएं मिलती हैं — जैसे आरक्षित/स्थायी चुनाव चिन्ह, दूरदर्शन/आकाशवाणी पर मुफ्त प्रसारण समय, तथा नामांकन के लिए कम प्रस्तावकों की आवश्यकता। समय-समय पर निर्वाचन आयोग इन मापदंडों की समीक्षा कर दलों की मान्यता को अद्यतन (Update) करता रहता है — कई बार पुराने राष्ट्रीय दल (जैसे भाकपा) अपनी घटती ताकत के कारण यह दर्जा खो भी चुके हैं।

🔑 मुख्य शब्द (Keywords)
चुनाव चिन्ह आदेश 1968राष्ट्रीय दल मापदंड — 4 राज्य/2% लोकसभा/6% मतराज्य दल मापदंडआरक्षित चिन्ह की सुविधा

8क्षेत्रीय दलों की मुखरता (Assertive Regionalism)

1970 के दशक से क्षेत्रीय दल सिर्फ अपने राज्य की सरकार बनाने तक सीमित नहीं रहे — वे और ज़्यादा मुखर (Assertive) होकर केंद्र से राज्यों को अधिक स्वायत्तता (Autonomy) देने की मांग करने लगे। इनकी मुख्य शिकायत थी — शक्तियों का अत्यधिक केंद्रीकरण (Over-Centralisation)।

8.1 मुखर क्षेत्रवाद की प्रमुख अभिव्यक्तियां

1. अधिक वित्तीय एवं प्रशासनिक स्वायत्तता की मांग — राज्यों का तर्क था कि केंद्र बहुत ज़्यादा राजस्व और शक्तियां अपने पास रखता है।

2. राज्यपाल की भूमिका पर सवाल — विपक्षी शासित राज्यों में राज्यपाल के दुरुपयोग (जैसे बार-बार अनुच्छेद 356 का प्रयोग) पर तीखी आपत्ति।

3. भाषा एवं सांस्कृतिक पहचान की रक्षा — जैसे तमिलनाडु में हिंदी विरोध, पंजाब में आनंदपुर साहिब प्रस्ताव (1973) जिसमें राज्यों के लिए अधिक स्वायत्तता की मांग थी।

4. अंतर-राज्यीय जल एवं सीमा विवाद — क्षेत्रीय दल अक्सर अपने राज्य के हितों (जैसे नदी जल बंटवारा) को लेकर केंद्र व पड़ोसी राज्यों दोनों से टकराव में आते हैं।

🎯 वर्तमान महत्व

आज भी जब कोई क्षेत्रीय दल GST क्षतिपूर्ति (Compensation), विशेष राज्य का दर्जा, या केंद्रीय करों में राज्यों के हिस्से (जैसे वित्त आयोग की सिफारिशें) को लेकर आवाज़ उठाता है, तो यह उसी 'मुखर क्षेत्रवाद' की आधुनिक अभिव्यक्ति है, जो 1970 के दशक में शुरू हुई थी।

🔑 मुख्य शब्द (Keywords)
मुखर क्षेत्रवादकेंद्रीकरण की शिकायतआनंदपुर साहिब प्रस्ताव 1973राज्यपाल की भूमिकाGST क्षतिपूर्ति

9वामपंथी राजनीति का उत्थान एवं पतन — केरल, बंगाल एवं त्रिपुरा

क्षेत्रीय-भाषाई दलों (जैसे DMK) के अलावा, भारतीय दलीय व्यवस्था में एक और अनूठी प्रवृत्ति रही है — वामपंथी दलों (भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी — CPI, तथा भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी-मार्क्सवादी — CPI-M) का कुछ खास राज्यों में लंबे समय तक टिका रहना, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर उनका प्रभाव बहुत सीमित रहा है।

केरल में 1957 में हुई विधानसभा चुनाव में कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार बनी — यह विश्व में लोकतांत्रिक ढंग से चुनी गई पहली कम्युनिस्ट सरकार मानी जाती है (ई.एम.एस. नंबूदरीपाद मुख्यमंत्री बने)। इसके बाद केरल में वामपंथी लोकतांत्रिक मोर्चा (LDF) व कांग्रेस-नेतृत्व वाले संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (UDF) के बीच सत्ता झूलती रही है — यह भारत के सबसे स्थिर द्विध्रुवीय राज्य-राजनीतिक ढांचों में से एक है।

पश्चिम बंगाल में CPI-M के नेतृत्व वाला वाम मोर्चा (Left Front) 1977 से 2011 तक लगातार 34 वर्षों तक सत्ता में रहा — यह विश्व में किसी भी लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार का सबसे लंबा निर्बाध कार्यकाल माना जाता है। भूमि सुधार (ऑपरेशन बर्गा) व पंचायती राज को मज़बूत करने में इसकी बड़ी भूमिका रही। परंतु 2011 में ममता बెనర్జీ की तृणमूल कांग्रेस के हाथों वाम मोर्चे की करारी हार हुई, जिसके पीछे सिंगूर व नंदीग्राम भूमि अधिग्रहण विवाद प्रमुख कारण माने जाते हैं।

त्रिपुरा में भी वाम मोर्चा दशकों तक सत्ता में रहा, परंतु 2018 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने वहां भी वाम मोर्चे को हराकर सरकार बनाई — जिससे पूर्वोत्तर में वामपंथी दलों का अंतिम गढ़ भी समाप्त हो गया। आज राष्ट्रीय स्तर पर वामपंथी दलों की लोकसभा में सीटें बेहद कम रह गई हैं, परंतु केरल में LDF आज भी एक मज़बूत शक्ति बना हुआ है।

राज्यवामपंथी सत्ता का कालखंडवर्तमान स्थिति
केरल1957 (प्रथम) से लेकर आज तक LDF-UDF द्विध्रुवीय सत्ता-परिवर्तनLDF आज भी मज़बूत सत्तारूढ़ शक्ति
पश्चिम बंगाल1977-2011 (लगातार 34 वर्ष)2011 में TMC के हाथों पराजय, अब सीमित प्रभाव
त्रिपुरादशकों तक वाम मोर्चा सत्ता में2018 में भाजपा के हाथों पराजय
🔑 मुख्य शब्द (Keywords)
केरल 1957 — प्रथम निर्वाचित कम्युनिस्ट सरकारपं. बंगाल — 34 वर्ष वाम मोर्चा (1977-2011)सिंगूर-नंदीग्राम विवादत्रिपुरा 2018 — भाजपा की जीत

10सरकारिया आयोग (1983) एवं पुंछी आयोग (2007)

जब क्षेत्रीय दलों की मुखरता और केंद्र-राज्य तनाव बढ़ने लगा, तो केंद्र सरकार ने 1983 में न्यायमूर्ति रणजीत सिंह सरकारिया की अध्यक्षता में एक तीन-सदस्यीय आयोग — 'सरकारिया आयोग' — गठित किया, ताकि केंद्र-राज्य संबंधों की समीक्षा हो और उन्हें बेहतर बनाने के सुझाव मिलें। आयोग ने 1988 में अपनी विस्तृत (1600 से अधिक पन्नों की) रिपोर्ट सौंपी, जिसमें कुल 247 सिफारिशें थीं। (इसकी विस्तृत चर्चा अध्याय 14 में भी है — यहां हम इसे दलीय राजनीति के नज़रिए से समझेंगे।)

सरकारिया आयोग की सबसे अहम सिफारिशों में से एक थी — अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन) का प्रयोग बहुत ही दुर्लभ परिस्थितियों में, आख़िरी उपाय के तौर पर होना चाहिए — क्योंकि 1970-80 के दशक में केंद्र सरकारों ने विपक्षी शासित राज्यों में बार-बार इसका राजनीतिक इस्तेमाल किया था, जिससे क्षेत्रीय दलों में गहरा आक्रोश था। आयोग ने अनुच्छेद 263 के तहत एक स्थायी अंतर-राज्य परिषद (Inter-State Council) बनाने का सुझाव भी दिया।

2007 में, बदलते राजनीतिक और आर्थिक हालात (जैसे उदारीकरण, गठबंधन राजनीति का उदय) को देखते हुए, न्यायमूर्ति मदन मोहन पुंछी की अध्यक्षता में एक नया आयोग — 'पुंछी आयोग' — बनाया गया, जिसने 2010 में अपनी रिपोर्ट सौंपी। यह सरकारिया से भी आगे बढ़कर संवैधानिक संशोधनों तक की सिफारिश करने से नहीं हिचकिचाया।

विषयसरकारिया आयोग (1983-88)पुंछी आयोग (2007-10)
अध्यक्षन्यायमूर्ति रणजीत सिंह सरकारियान्यायमूर्ति मदन मोहन पुंछी
सिफारिशें247 सिफारिशेंलगभग 310 सिफारिशें
अनुच्छेद 356अत्यंत दुर्लभ रूप से प्रयोग हो"स्थानीयकृत आपातकाल" — पूरे राज्य की जगह किसी ज़िले/क्षेत्र तक सीमित हो
राज्यपालविशेष सुझाव नहीं"प्रसादपर्यंत सिद्धांत" हटे; राज्यपाल को विधानसभा द्वारा महाभियोग की व्यवस्था
🔑 मुख्य शब्द (Keywords)
सरकारिया आयोग 1983पुंछी आयोग 2007अनुच्छेद 356 पर सिफारिशेंअंतर-राज्य परिषद — अनुच्छेद 263राज्यपाल की भूमिका

11गठबंधन राजनीति का उदय — राष्ट्रीय मोर्चा 1989

1989 के आम चुनावों में किसी भी दल को अकेले बहुमत नहीं मिला — यह आज़ाद भारत में पहली बार हुआ कि लोकसभा 'त्रिशंकु (Hung)' रही। जनता दल के नेतृत्व में कई क्षेत्रीय व राष्ट्रीय दल मिलकर 'राष्ट्रीय मोर्चा (National Front)' नाम का गठबंधन बना, जिसमें एन.टी. रामाराव जैसे क्षेत्रीय नेता भी शामिल थे। इस गठबंधन को बाहर से भारतीय जनता पार्टी और वामपंथी दलों — दोनों का समर्थन मिला, जो अपने आप में एक असाधारण राजनीतिक समीकरण था, क्योंकि यह दोनों दल एक-दूसरे के धुर विरोधी थे।

वी.पी. सिंह प्रधानमंत्री बने। शुरुआती दौर में यह गठबंधन काफी उम्मीदों के साथ शुरू हुआ, परंतु जल्द ही यह भारतीय राजनीति के सबसे उथल-पुथल भरे दौर — मंडल-कमंडल राजनीति — में उलझ गया, जिसे हम अगले टॉपिक में विस्तार से समझेंगे।

🔑 मुख्य शब्द (Keywords)
1989 — त्रिशंकु लोकसभाराष्ट्रीय मोर्चावी.पी. सिंहभाजपा व वामदलों का बाहरी समर्थन

12मंडल-कमंडल राजनीति — जातीय एवं धार्मिक ध्रुवीकरण का दशक (1990-92)

भारतीय दलीय व्यवस्था के इतिहास में 1990-92 का दौर सबसे निर्णायक मोड़ों में से एक माना जाता है — इसी दौर में दो समानांतर, परस्पर-विरोधी राजनीतिक लामबंदियां हुईं, जिन्हें लोकप्रिय भाषा में 'मंडल' और 'कमंडल' राजनीति कहा जाता है — यह शब्द-युग्म आज भी भारतीय राजनीति-शास्त्र में जाति-आधारित बनाम धर्म-आधारित लामबंदी को समझाने के लिए इस्तेमाल होता है।

12.1 मंडल — जातीय लामबंदी

1979 में बी.पी. मंडल की अध्यक्षता में बना 'द्वितीय पिछड़ा वर्ग आयोग (मंडल आयोग)' दशक भर तक ठंडे बस्ते में पड़ा रहा। परंतु 7 अगस्त 1990 को, राष्ट्रीय मोर्चा सरकार के प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह ने अचानक घोषणा की कि केंद्र सरकार की नौकरियों में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए 27% आरक्षण लागू किया जाएगा। यह फैसला राजनीतिक रूप से बेहद साहसिक था — इसने देश की सामाजिक-राजनीतिक बनावट में जाति-आधारित लामबंदी को स्थायी रूप से केंद्र में ला दिया, तथा पिछड़ी जातियों को एक शक्तिशाली, एकजुट वोट-बैंक के रूप में उभरने का मौका दिया।

12.2 कमंडल — धार्मिक लामबंदी

मंडल की घोषणा से भाजपा को आशंका हुई कि इससे उसका हिंदू वोट-बैंक जाति-रेखाओं में बंट जाएगा। इसके जवाब में भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने सितंबर-अक्टूबर 1990 में सोमनाथ (गुजरात) से अयोध्या तक एक विशाल 'राम रथ यात्रा' निकाली, जिसका उद्देश्य अयोध्या में राम मंदिर निर्माण की मांग को लेकर हिंदू मतदाताओं को जाति से ऊपर उठाकर एकजुट करना था। 23 अक्टूबर 1990 को बिहार के समस्तीपुर में तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने आडवाणी को गिरफ्तार करवा दिया।

इस गिरफ्तारी के विरोध में भाजपा ने वी.पी. सिंह सरकार से समर्थन वापस ले लिया, जिससे राष्ट्रीय मोर्चा सरकार गिर गई — यानी मंडल और कमंडल, दोनों राजनीतिक लामबंदियों ने मिलकर एक ऐसी सरकार को गिरा दिया, जिसने खुद मंडल की घोषणा की थी।

📌 भारतीय दलीय व्यवस्था का स्थायी पुनर्गठन

मंडल बनाम कमंडल — दीर्घकालिक असर (1990-96) इन दोनों लामबंदियों ने भारतीय राजनीति को स्थायी रूप से बदल दिया। मंडल की राजनीति ने समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल (यूनाइटेड) जैसे कई पिछड़ा-वर्ग आधारित क्षेत्रीय दलों को जन्म दिया, जबकि कमंडल की राजनीति ने भाजपा को 1989 में सिर्फ 85 लोकसभा सीटों से 1991 में 120 और 1996 में 161 सीटों तक पहुंचा दिया — जो भाजपा के राष्ट्रीय स्तर पर एक प्रमुख शक्ति बनने की नींव बनी। दिसंबर 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस ने इस राजनीतिक ध्रुवीकरण को और गहरा कर दिया।

🔑 मुख्य शब्द (Keywords)
मंडल आयोग — 27% OBC आरक्षण, अगस्त 1990राम रथ यात्रा — आडवाणी, सितंबर-अक्टूबर 1990आडवाणी गिरफ्तारी — समस्तीपुर, 23 अक्टूबर 1990भाजपा — 85→120→161 सीटें (1989-91-96)बाबरी विध्वंस — दिसंबर 1992

13संयुक्त मोर्चा (1996-98) — गठबंधन प्रयोगों की परीक्षा

1991 में कांग्रेस पी.वी. नरसिंह राव के नेतृत्व में अल्पमत सरकार चला पाई (जिसने आर्थिक उदारीकरण जैसे बड़े सुधार भी किए), लेकिन 1996 के चुनावों में उसे भारी नुकसान हुआ। इस बार 13 गैर-कांग्रेसी, गैर-भाजपा दलों ने मिलकर 'संयुक्त मोर्चा (United Front)' नाम का गठबंधन बनाया — जिसके संयोजक तेलुगु देशम पार्टी के एन. चंद्रबाबू नायडू थे, और कांग्रेस ने इसे बाहर से समर्थन दिया।

इस गठबंधन ने दो प्रधानमंत्री दिए — पहले एच.डी. देवगौड़ा, फिर आई.के. गुजराल। लेकिन बाहरी समर्थन पर टिकी यह सरकार भी ज़्यादा टिकाऊ साबित नहीं हुई और 1998 में गिर गई। इन दोनों प्रयोगों (राष्ट्रीय मोर्चा और संयुक्त मोर्चा) से भारतीय राजनीति ने एक बड़ा सबक सीखा — गठबंधन सरकार को टिकाऊ बनाने के लिए सिर्फ 'साझा दुश्मन' के खिलाफ एकजुट होना काफी नहीं, एक ठोस साझा न्यूनतम कार्यक्रम (Common Minimum Programme) और स्थिर नेतृत्व ज़रूरी है — यही सबक आगे चलकर NDA और UPA दोनों ने अपनाया।

गठबंधनकालखंडप्रधानमंत्रीपतन का कारण
राष्ट्रीय मोर्चा1989-90वी.पी. सिंहभाजपा व वामदलों का समर्थन वापस लेना (कमंडल विवाद)
(चंद्रशेखर सरकार)1990-91चंद्रशेखरकांग्रेस का बाहरी समर्थन वापस लेना
संयुक्त मोर्चा1996-98एच.डी. देवगौड़ा → आई.के. गुजरालकांग्रेस का बाहरी समर्थन वापस लेना
🔑 मुख्य शब्द (Keywords)
संयुक्त मोर्चाचंद्रबाबू नायडू संयोजकदेवगौड़ा व गुजरालसाझा न्यूनतम कार्यक्रमअस्थिर गठबंधन का सबक

14NDA का युग एवं गठबंधन धर्म (1998-2004)

1998 और 1999 के चुनावों के बाद भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में बना 'राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (National Democratic Alliance — NDA)' गठबंधन राजनीति की सबसे बड़ी सफलता-कहानी बना। अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में NDA में 20 से अधिक क्षेत्रीय दल शामिल थे — तेलुगु देशम, शिवसेना, अकाली दल, DMK (बाद में AIADMK), समता पार्टी जैसे विविध और कई बार आपस में विरोधी विचारधारा वाले दल भी इसका हिस्सा थे।

वाजपेयी सरकार की सफलता के पीछे एक नया राजनीतिक सिद्धांत काम कर रहा था, जिसे खुद वाजपेयी ने नाम दिया — 'गठबंधन धर्म (Coalition Dharma)'। इसका मतलब था कि प्रमुख दल (भाजपा) को अपने वैचारिक एजेंडे के कुछ विवादास्पद हिस्सों (जैसे राम मंदिर, अनुच्छेद 370, समान नागरिक संहिता) को फिलहाल टाल कर, सहयोगी दलों की चिंताओं का सम्मान करना होगा, ताकि गठबंधन बना रहे। NDA सरकार ने पूरे 5 साल (1999-2004) का कार्यकाल पूरा किया — जो 1989 के बाद पहली बार किसी गैर-कांग्रेसी सरकार के लिए एक बड़ी उपलब्धि थी।

📌 एक नए राजनीतिक सिद्धांत का जन्म

गठबंधन धर्म — अटल बिहारी वाजपेयी (1998-2004) 'गठबंधन धर्म' शब्द ने भारतीय राजनीति की शब्दावली में स्थायी जगह बना ली। इसका सार था — बड़े दल को छोटे सहयोगियों पर अपनी मर्ज़ी थोपने की बजाय, समायोजन (Accommodation) और आम सहमति (Consensus) से चलना। यही सिद्धांत आगे चलकर UPA सरकार ने भी अपनाया, और आज भी NDA 3.0 (2024 के बाद) में यह सिद्धांत उतना ही प्रासंगिक है, जितना 1998 में था।

🔑 मुख्य शब्द (Keywords)
NDA 1998अटल बिहारी वाजपेयीगठबंधन धर्म20+ सहयोगी दल5 साल का कार्यकाल पूरा

15UPA का युग — साझा न्यूनतम कार्यक्रम (2004-2014)

2004 के चुनावों में एक और उलटफेर हुआ — NDA की उम्मीद के विपरीत, कांग्रेस के नेतृत्व में 'संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (United Progressive Alliance — UPA)' सत्ता में आया। सोनिया गांधी ने खुद प्रधानमंत्री पद न लेकर डॉ. मनमोहन सिंह को यह ज़िम्मेदारी सौंपी — एक अभूतपूर्व राजनीतिक फैसला। UPA को वामपंथी दलों का बाहरी समर्थन भी मिला (2004-2008 के दौरान)।

UPA सरकार ने संयुक्त मोर्चा और NDA दोनों के अनुभवों से सीखते हुए एक औपचारिक 'साझा न्यूनतम कार्यक्रम (Common Minimum Programme — CMP)' तैयार किया — यानी गठबंधन के सभी दलों ने मिलकर पहले से एक लिखित दस्तावेज़ बनाया कि सरकार किन-किन नीतियों पर काम करेगी, ताकि बाद में मतभेद कम हों। UPA ने भी दो कार्यकाल (2004-2009, 2009-2014) पूरे किए — मनरेगा (2005), सूचना का अधिकार अधिनियम (2005), शिक्षा का अधिकार (2009) जैसे बड़े कानून इसी दौर में बने।

🔑 मुख्य शब्द (Keywords)
UPA 2004मनमोहन सिंहसोनिया गांधी का फैसलासाझा न्यूनतम कार्यक्रम (CMP)मनरेगा व RTI

162014 एवं 2019 — बहुमत की राजनीति की वापसी

2014 के आम चुनावों ने एक और बड़ा मोड़ लिया। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने अकेले अपने दम पर 282 सीटें जीतीं — 1984 के बाद यह पहली बार था कि किसी एक दल को स्वतंत्र पूर्ण बहुमत मिला। 2019 में यह प्रदर्शन और बेहतर हुआ — भाजपा को अकेले 303 सीटें मिलीं। इन दोनों चुनावों ने कुछ राजनीति-शास्त्रियों को यह कहने पर मजबूर किया कि भारत एक बार फिर 'एक-दलीय प्रभुत्व व्यवस्था' की ओर लौट रहा है — बस इस बार दल कांग्रेस नहीं, भाजपा है।

हालांकि यहां एक महीन फर्क समझना ज़रूरी है — भाजपा को भले ही लोकसभा में अकेले बहुमत मिला, लेकिन उसने फिर भी NDA गठबंधन को बनाए रखा (शिवसेना, अकाली दल, JD-U जैसे सहयोगियों के साथ, हालांकि कुछ दल बाद में अलग भी हुए)। साथ ही, राज्य स्तर पर क्षेत्रीय दल — जैसे पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस, ओडिशा में बीजू जनता दल, तमिलनाडु में DMK/AIADMK, आंध्र में TDP/YSRCP — अब भी बेहद मज़बूत बने रहे। यानी राष्ट्रीय स्तर पर भले ही एक दल का प्रभुत्व दिखे, राज्य स्तर पर बहुदलीय व क्षेत्रीय व्यवस्था पूरी तरह जीवित रही — इसे विद्वान 'बहुस्तरीय दलीय व्यवस्था (Multi-Level Party System)' कहते हैं।

चुनाव वर्षभाजपा की सीटें (अकेले)बहुमत का आंकड़ास्थिति
2014282272पूर्ण स्वतंत्र बहुमत — 1984 के बाद पहली बार
2019303272बहुमत और मज़बूत
2024240272बहुमत से 32 सीट कम — गठबंधन पर निर्भरता
🔑 मुख्य शब्द (Keywords)
2014 — 282 सीटें2019 — 303 सीटेंनरेंद्र मोदीबहुस्तरीय दलीय व्यवस्थाराज्य स्तर पर क्षेत्रीय दल मज़बूत

172024 लोकसभा चुनाव — गठबंधन राजनीति की पुनर्वापसी (NDA 3.0)

जैसा हमने इस अध्याय की शुरुआती कहानी में देखा, 2024 के आम चुनावों ने भारतीय राजनीति को एक बार फिर गठबंधन युग की याद दिला दी। भाजपा अकेले 240 सीटों पर सिमट गई — 272 के बहुमत के आंकड़े से 32 सीट कम। पूरे NDA गठबंधन ने मिलकर 293 सीटें हासिल कीं और सरकार बनाई, लेकिन इस बार सरकार की स्थिरता दो क्षेत्रीय दलों — चंद्रबाबू नायडू की तेलुगु देशम पार्टी (16 सीटें) और नीतीश कुमार की जनता दल (यूनाइटेड) (12 सीटें) — पर टिकी थी।

नरेंद्र मोदी ने लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली (मोदी 3.0), लेकिन इस बार सरकार की प्रकृति 2014 और 2019 से अलग थी — अब यह एक 'सच्चा गठबंधन' था, जहां सहयोगी दलों के पास सरकार को अस्थिर करने की वास्तविक ताकत थी। इससे 'गठबंधन धर्म' का सिद्धांत — जो 1998 में वाजपेयी ने अपनाया था — एक बार फिर राजनीतिक चर्चा के केंद्र में आ गया।

📖 असली उदाहरण

2024 के बाद बजट और नीतिगत फैसलों में आंध्र प्रदेश (TDP के प्रभाव क्षेत्र) और बिहार (JD-U के प्रभाव क्षेत्र) के लिए विशेष वित्तीय सहायता और परियोजनाओं की घोषणाएं देखी गईं — यह ठीक वैसा ही उदाहरण है जैसा 1990 के दशक के गठबंधन युग में भी देखा गया था, जब क्षेत्रीय सहयोगी दल अपने राज्य के लिए विशेष रियायतें हासिल करते थे।

🔑 मुख्य शब्द (Keywords)
NDA 3.0 — 2024293 सीटें NDATDP — चंद्रबाबू नायडूJD-U — नीतीश कुमारमोदी 3.0गठबंधन धर्म की वापसी

18INDIA गठबंधन — विपक्षी एकता का नया प्रयोग

जिस तरह सत्ताधारी पक्ष में गठबंधन बनते रहे हैं, विपक्ष में भी एकता के प्रयोग होते रहे हैं। 2023 में, 2024 के चुनावों से पहले, कांग्रेस समेत लगभग 26 विपक्षी दलों ने मिलकर एक नया गठबंधन बनाया, जिसे बड़ी सोच-समझकर एक नाम दिया गया — 'INDIA' (Indian National Developmental Inclusive Alliance)। इसकी शुरुआत जून 2023 में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा बुलाई गई एक बैठक से हुई, और औपचारिक ऐलान जुलाई 2023 में बेंगलुरु में हुई दूसरी बैठक में हुआ।

इस गठबंधन में कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK), झारखंड मुक्ति मोर्चा, वामपंथी दल जैसे विविध दल शामिल हुए। दिलचस्प बात यह है कि गठबंधन बनाने वाले नीतीश कुमार खुद बाद में इससे अलग होकर वापस NDA में चले गए — जो दिखाता है कि भारतीय गठबंधन राजनीति में दल-बदल और गठबंधन-परिवर्तन (Realignment) कितना सामान्य हो चुका है।

🔑 मुख्य शब्द (Keywords)
INDIA गठबंधनजुलाई 2023 — बेंगलुरु26 विपक्षी दलनीतीश कुमार की भूमिकागठबंधन-परिवर्तन (Realignment)

19दल-बदल विरोधी कानून — दसवीं अनुसूची का विस्तृत अध्ययन

गठबंधन युग की जिन चुनौतियों की चर्चा हम आगे टॉपिक 20 में करेंगे, उनमें सबसे बड़ी है — सांसदों/विधायकों की खरीद-फरोख्त एवं दल-बदल (Defection)। इसे रोकने के लिए संसद ने 52वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1985 के ज़रिए संविधान में एक नई दसवीं अनुसूची (Tenth Schedule) जोड़ी — जिसे 'दल-बदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law)' कहा जाता है।

19.1 अयोग्यता के आधार

1. स्वेच्छा से सदस्यता त्यागना — यदि कोई सदस्य स्वेच्छा से अपने मूल दल की सदस्यता छोड़ देता है।

2. व्हिप के विरुद्ध मतदान — यदि कोई सदस्य पार्टी के निर्देश (व्हिप) के विरुद्ध सदन में मतदान करता है या मतदान से अनुपस्थित रहता है, तथा 15 दिन के भीतर इसके लिए दल से माफी/अनुमोदन नहीं मिलता।

3. मनोनीत सदस्य — यदि कोई मनोनीत सदस्य सदन में शामिल होने के 6 महीने बाद किसी दल की सदस्यता ग्रहण करता है।

4. निर्दलीय सदस्य — यदि कोई निर्दलीय निर्वाचित सदस्य बाद में किसी दल में शामिल हो जाता है।

19.2 अपवाद (Exceptions)

मूल कानून में 'विभाजन (Split)' का अपवाद था — यदि किसी दल के एक-तिहाई सदस्य अलग हो जाएं, तो उन्हें अयोग्य नहीं माना जाता था। परंतु इस प्रावधान का भारी दुरुपयोग होने लगा (सांसदों/विधायकों की खुलेआम 'खरीद-फरोख्त' के आरोप), इसलिए 91वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 ने 'विभाजन' के अपवाद को पूरी तरह हटा दिया। अब केवल 'विलय (Merger)' का अपवाद बचा है — यदि किसी दल के कम से कम दो-तिहाई सदस्य किसी अन्य दल में विलय के लिए सहमत हों, तो उन्हें अयोग्यता से छूट मिलती है।

अयोग्यता से जुड़े प्रश्न पर निर्णय लेने का अधिकार सदन के अध्यक्ष/सभापति (Speaker/Chairman) के पास होता है — जो कि उच्चतम न्यायालय की न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के अधीन है, जैसा किहोतो होलोहन बनाम ज़च्चिल्हू (1992) मामले में स्पष्ट किया गया।

📌 दल-बदल कानून की आधुनिक परीक्षा

महाराष्ट्र शिवसेना-NCP विभाजन (2022-24) जून 2022 में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में शिवसेना के एक बड़े गुट ने पार्टी छोड़कर भाजपा के साथ नई सरकार बनाई, जिससे उद्धव ठाकरे की महाविकास आघाड़ी सरकार गिर गई। जुलाई 2023 में इसी तरह अजित पवार के नेतृत्व में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) का एक बड़ा हिस्सा भी अलग होकर सत्तारूढ़ गठबंधन में शामिल हो गया। दोनों मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र विधानसभा अध्यक्ष को दिसंबर 2023 (शिवसेना) व जनवरी 2024 (NCP) तक अयोग्यता याचिकाओं पर फैसला देने का निर्देश दिया। 10 जनवरी 2024 को अध्यक्ष राहुल नार्वेकर ने शिंदे गुट को 'असली शिवसेना' मानते हुए सभी विधायकों को अयोग्य ठहराने से इनकार कर दिया — इस निर्णय ने दल-बदल कानून की व्याख्या व क्रियान्वयन को लेकर एक नई राष्ट्रीय बहस छेड़ दी, विशेषकर अध्यक्ष के फैसलों में होने वाली देरी व राजनीतिक पक्षपात की आशंका को लेकर।

🔑 मुख्य शब्द (Keywords)
52वां संशोधन 1985 — 10वीं अनुसूची91वां संशोधन 2003 — विभाजन अपवाद हटाविलय अपवाद — 2/3 बहुमतकिहोतो होलोहन केस 1992शिवसेना-NCP विभाजन 2022-24

20गठबंधन सरकारों की चुनौतियां एवं स्थिरता तंत्र

भारत के गठबंधन युग के अनुभव से कुछ स्पष्ट चुनौतियां और सबक सामने आए हैं, जो परीक्षा की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण हैं।

1. नीतिगत अस्थिरता — छोटे सहयोगी दल अक्सर बड़े, विवादास्पद सुधारों (जैसे श्रम कानून, भूमि अधिग्रहण) पर अड़चन डाल सकते हैं, क्योंकि उन्हें अपने राज्य में इसका राजनीतिक नुकसान होने का डर रहता है।

2. दल-बदल का खतरा — जैसा टॉपिक 19 में विस्तार से देखा, गठबंधन सरकारों में सांसदों/विधायकों की खरीद-फरोख्त या दल-बदल का जोखिम ज़्यादा रहता है।

3. क्षेत्रीय हितों का राष्ट्रीय एजेंडे पर हावी होना — कई बार राष्ट्रीय महत्व के फैसले सिर्फ इसलिए टलते हैं क्योंकि किसी सहयोगी दल के राज्य पर उसका सीधा असर पड़ता है।

4. बार-बार का सरकार परिवर्तन — जैसा 1989-1998 के दौर में देखा गया, कमज़ोर गठबंधन जल्दी-जल्दी गिर सकते हैं, जिससे प्रशासनिक निरंतरता प्रभावित होती है।

20.1 स्थिरता के लिए अपनाए गए तंत्र

🔑 मुख्य शब्द (Keywords)
नीतिगत अस्थिरतादल-बदल विरोधी कानूनसाझा न्यूनतम कार्यक्रमगठबंधन समन्वय समिति

21वंशवादी राजनीति (Dynastic Politics) — भारतीय दलों की एक विशेषता

भारतीय दलीय व्यवस्था की एक और उल्लेखनीय विशेषता है — अधिकांश राजनीतिक दलों (राष्ट्रीय व क्षेत्रीय, दोनों) में नेतृत्व का किसी एक परिवार के भीतर ही पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरण, जिसे 'वंशवादी राजनीति (Dynastic Politics)' कहा जाता है। यह प्रवृत्ति सिर्फ किसी एक दल तक सीमित नहीं, बल्कि विचारधारा और क्षेत्र से परे लगभग सभी बड़े दलों में किसी न किसी रूप में मौजूद है।

दलवंशवादी उदाहरण
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेसनेहरू-गांधी परिवार — जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी, राहुल गांधी
समाजवादी पार्टीमुलायम सिंह यादव से अखिलेश यादव तक
राष्ट्रीय जनता दललालू प्रसाद यादव से तेजस्वी यादव व तेज प्रताप यादव तक
द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK)एम. करुणानिधि से एम.के. स्टालिन तक
शिवसेनाबाल ठाकरे से उद्धव ठाकरे तक
राष्ट्रीय लोक दल (राजस्थान/उ.प्र. संदर्भ)चौधरी चरण सिंह की विरासत — कई पीढ़ियों तक
📌 महत्वपूर्ण विश्लेषण

राजनीति-शास्त्री इसे 'पार्टी संस्थागतकरण की कमी (Lack of Institutionalisation)' का लक्षण मानते हैं — यानी दल किसी विचारधारा या संगठनात्मक ढांचे की बजाय किसी एक करिश्माई परिवार के इर्द-गिर्द टिके रहते हैं। हालांकि आलोचकों का यह भी तर्क है कि लोकतंत्र में अंततः मतदाता ही निर्णायक होता है — यदि वंशवादी नेतृत्व जनता की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरता, तो मतदाता उसे अस्वीकार भी कर सकते हैं, जैसा कई राज्यों में देखा गया है।

🔑 मुख्य शब्द (Keywords)
वंशवादी राजनीतिनेहरू-गांधी परिवारयादव, करुणानिधि, ठाकरे परिवारसंस्थागतकरण की कमी

22राजस्थान के संदर्भ में क्षेत्रीय राजनीति — BAP एवं RLP

राजस्थान की राजनीति परंपरागत रूप से मुख्यतः दो राष्ट्रीय दलों — कांग्रेस और भाजपा — के बीच द्विध्रुवीय (Bipolar) रही है, दक्षिण या पूर्वी भारत जैसे मज़बूत क्षेत्रीय दलों का यहां वर्चस्व नहीं रहा। लेकिन हाल के वर्षों में राजस्थान में भी क्षेत्रीय व सामाजिक-पहचान आधारित राजनीति के नए बीज मुखर होते दिख रहे हैं, जो 'समकालीन बदलाव' के इस अध्याय के लिए एक बेहतरीन राज्य-स्तरीय उदाहरण हैं।

नागौर क्षेत्र के जाट-बहुल इलाकों में हनुमान बेनीवाल के नेतृत्व वाली 'राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (RLP)' ने खुद को एक क्षेत्रीय-जातीय राजनीतिक ताकत के रूप में स्थापित किया — 2019 के लोकसभा चुनाव में RLP ने भाजपा के साथ गठबंधन कर नागौर सीट जीती, जो दिखाता है कि छोटे क्षेत्रीय दल भी राष्ट्रीय गठबंधनों में सौदेबाज़ी की ताकत रखते हैं। इससे भी ज़्यादा उल्लेखनीय है 2023 के विधानसभा चुनावों में 'भारत आदिवासी पार्टी (BAP)' का उदय — दक्षिणी राजस्थान (वागड़ क्षेत्र) के आदिवासी-बहुल इलाकों में भारतीय ट्राइबल पार्टी (BTP) से अलग होकर बनी इस नई पार्टी ने डूंगरपुर-बांसवाड़ा क्षेत्र की डूंगरपुर, आसपुर और चौरासी सीटें जीतीं।

🏜️ राजस्थान कनेक्शन — गर्व की बात

भारत आदिवासी पार्टी (BAP) का उदय दिखाता है कि क्षेत्रीय अस्मिता-आधारित राजनीति (जो हमने DMK के उदाहरण में तमिलनाडु के संदर्भ में देखी थी) अब राजस्थान के आदिवासी क्षेत्रों में भी जड़ें जमा रही है। यह भारतीय राजनीति की उसी बड़ी प्रवृत्ति का हिस्सा है, जहां स्थानीय पहचान (भाषा, जाति, जनजाति) राष्ट्रीय दलों के परंपरागत वर्चस्व को चुनौती देती है — ठीक वैसे ही जैसे 1967 में तमिलनाडु में हुआ था।

🔑 मुख्य शब्द (Keywords)
RLP — हनुमान बेनीवालनागौर 2019BAP — भारत आदिवासी पार्टी 2023डूंगरपुर-बांसवाड़ा (वागड़)राजस्थान का द्विध्रुवीय दलीय ढांचा

23समकालीन भारतीय राजनीति के उभरते प्रारूप

इस अध्याय के अंत में, आइए उन बड़े रुझानों (Trends) को समेटें जो आज की भारतीय राजनीति को आकार दे रहे हैं।

1. राष्ट्रीय बनाम क्षेत्रीय ध्रुवीकरण — राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा-कांग्रेस के बीच मुख्य मुकाबला, लेकिन राज्य स्तर पर मज़बूत क्षेत्रीय दलों की मौजूदगी — यानी 'बहुस्तरीय दलीय व्यवस्था' अब भारत की स्थायी पहचान बन चुकी है।

2. पहचान-आधारित राजनीति से मुद्दा-आधारित राजनीति की ओर संक्रमण — जाति व धर्म आधारित लामबंदी के साथ-साथ अब रोज़गार, महंगाई, कल्याणकारी योजनाओं जैसे मुद्दे भी चुनावी विमर्श में बड़ी जगह ले रहे हैं (विस्तृत चर्चा अध्याय 22 में)।

3. डिजिटल व सोशल मीडिया का बढ़ता प्रभाव — चुनाव प्रचार, जनमत निर्माण और यहां तक कि राजनीतिक लामबंदी में सोशल मीडिया व डेटा-एनालिटिक्स की भूमिका तेज़ी से बढ़ रही है।

4. गठबंधन राजनीति का चक्रीय स्वरूप — जैसा हमने देखा, भारत बहुमत और गठबंधन के बीच बार-बार झूलता रहा है — 1989-98 (गठबंधन) → 1999-2004 (स्थिर गठबंधन) → 2014-2019 (एकल बहुमत) → 2024 (गठबंधन की वापसी) — यह दिखाता है कि कोई भी एक प्रवृत्ति स्थायी नहीं।

5. महिलाओं व नए सामाजिक समूहों की बढ़ती राजनीतिक भागीदारी — जैसे नारी शक्ति वंदन अधिनियम (महिला आरक्षण कानून, 2023) — इसकी विस्तृत चर्चा भी अध्याय 22 में है।

6. दल-बदल व गठबंधन-परिवर्तन का सामान्यीकरण — जैसा शिवसेना-NCP विभाजन (टॉपिक 19) व नीतीश कुमार के बार-बार गठबंधन बदलने (टॉपिक 18) से स्पष्ट है, आज दल-परिवर्तन राजनीतिक रणनीति का एक सामान्य व स्वीकृत हिस्सा बनता जा रहा है।

📌 परीक्षा के लिए ज़रूरी दृष्टिकोण

भारतीय दलीय व्यवस्था का यह पूरा सफर याद रखने के लिए एक साधारण समयरेखा बना लें — 'एकाधिकार (1952-67) → बिखराव (1967-89) → मंडल-कमंडल ध्रुवीकरण (1990-92) → गठबंधन प्रयोग (1989-98) → स्थिर गठबंधन-NDA/UPA (1998-2014) → एकल बहुमत (2014-19) → गठबंधन की वापसी (2024)'। यह चक्र दिखाता है कि भारतीय लोकतंत्र में कोई भी व्यवस्था स्थायी नहीं — यह लगातार मतदाताओं की बदलती आकांक्षाओं के अनुसार खुद को ढालती रहती है।

🔑 मुख्य शब्द (Keywords)
बहुस्तरीय दलीय व्यवस्थापहचान से मुद्दा-आधारित राजनीतिडिजिटल राजनीतिगठबंधन का चक्रीय स्वरूपमहिला आरक्षण 2023

📋 अध्याय सारांश (Quick Revision)

1. राजनी कोठारी ने 1952-1967 के दौर को "कांग्रेस प्रणाली" या एक-दलीय प्रभुत्व व्यवस्था कहा — जहां कांग्रेस के भीतर के गुट ही असली प्रतिस्पर्धा थे; 1967 के "महान उलटफेर" व 1969 के कांग्रेस विभाजन ने इसे तोड़ा। 2. 1975 का आपातकाल एवं 1977 की जनता पार्टी — पहली गैर-कांग्रेसी केंद्र सरकार, पर वैचारिक एकता के अभाव में ढाई साल में गिर गई। 3. 1956 के भाषायी पुनर्गठन से क्षेत्रीय अस्मिता को राजनीतिक ताकत मिली — DMK मॉडल (तमिलनाडु, 1967) सबसे बड़ा उदाहरण; निर्वाचन आयोग राष्ट्रीय/राज्य दल का दर्जा तय मापदंडों से देता है। 4. केरल (1957 से), पश्चिम बंगाल (1977-2011, 34 वर्ष) व त्रिपुरा में वामपंथी दलों का लंबा शासन रहा, परंतु 2011 (बंगाल) व 2018 (त्रिपुरा) में उनका पतन हुआ — केरल में LDF आज भी मज़बूत है। 5. सरकारिया आयोग (1983, 247 सिफारिशें) व पुंछी आयोग (2007, ~310 सिफारिशें) ने केंद्र-राज्य संबंधों व अनुच्छेद 356 के दुरुपयोग पर सुधार सुझाए। 6. 1990-92 की मंडल-कमंडल राजनीति (27% OBC आरक्षण बनाम राम रथ यात्रा) ने भारतीय दलीय व्यवस्था को स्थायी रूप से पुनर्गठित किया — भाजपा 85 से 161 सीटों तक पहुंची। 7. NDA (1998, वाजपेयी) ने "गठबंधन धर्म" अपनाकर पहली बार 5 साल पूरे किए; UPA (2004, मनमोहन सिंह) ने "साझा न्यूनतम कार्यक्रम" अपनाया; 2024 में NDA 3.0 फिर TDP-JDU पर निर्भर हुआ। 8. दल-बदल विरोधी कानून (52वां संशोधन 1985, 10वीं अनुसूची) — 91वें संशोधन (2003) ने विभाजन का अपवाद हटाया; महाराष्ट्र शिवसेना-NCP विभाजन (2022-24) इसकी आधुनिक परीक्षा बना। 9. जुलाई 2023 में 26 विपक्षी दलों ने "INDIA" गठबंधन बनाया; वंशवादी राजनीति (नेहरू-गांधी, यादव, करुणानिधि, ठाकरे परिवार) भारतीय दलों की एक व्यापक विशेषता बनी हुई है। 10. राजस्थान में भी RLP (हनुमान बेनीवाल) व BAP (भारत आदिवासी पार्टी, 2023) जैसे क्षेत्रीय-पहचान आधारित दलों का उदय — परंपरागत द्विध्रुवीय राजनीति में नया आयाम जुड़ा है।

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