📋 इस अध्याय में
- अधीनस्थ न्यायालय — परिचय एवं अनुच्छेद 233–237 (भाग-6)
- जिला न्यायालय का ढाँचा — सिविल एवं फौजदारी न्यायालय
- ग्राम न्यायालय (Gram Nyayalaya) — अधिनियम 2008
- विशेष न्यायालय एवं न्यायाधिकरण — परिवार, मोबाइल, FTC एवं अन्य
- जनहित याचिका (Public Interest Litigation — PIL)
- लोक अदालत (Lok Adalat) — Art. 39(क) | NLSA | RLSA | ADR
1अधीनस्थ न्यायालय — परिचय एवं अनुच्छेद 233–237 (भाग-6)
भारत में उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों से नीचे के समस्त न्यायालयों को "अधीनस्थ न्यायालय (Subordinate Courts)" कहा जाता है। ये देश में न्याय-व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी हैं — जहाँ आम नागरिक का सीधा संपर्क होता है।
| अनुच्छेद | विषय | प्रमुख प्रावधान |
|---|
| 233 (1) | जिला न्यायाधीश की नियुक्ति | नियुक्ति — राज्यपाल करता है, उच्च न्यायालय से परामर्श करके। |
| 233 (2) | जिला न्यायाधीश की योग्यता | (i) भारत का नागरिक हो। (ii) कम से कम 7 वर्ष तक अधिवक्ता रहा हो। अथवा (iii) 7 वर्ष न्यायिक अधिकारी के रूप में कार्य किया हो। |
| 233 क | विधिमान्यकरण | कुछ जिला न्यायाधीशों की नियुक्तियों और निर्णयों का विधिमान्यकरण। |
| 234 | अन्य न्यायिक अधिकारियों की भर्ती | जिला जज के अतिरिक्त अन्य न्यायिक अधिकारी — राज्यपाल + RPSC + HC परामर्श से। |
| 235 | HC का अधीनस्थ न्यायालयों पर नियंत्रण | पदस्थापना, प्रोन्नति, छुट्टी, स्थानान्तरण, निलम्बन, दण्ड, अनिवार्य सेवानिवृत्ति — सभी में HC का नियंत्रण। |
| 236 | निर्वचन (Interpretation) | जिला न्यायाधीश पद में — अपर, संयुक्त, सहायक जिला जज, सत्र न्यायाधीश, मुख्य प्रेसीडेन्सी मजिस्ट्रेट, लघुवाद न्यायालय का CJ आदि शामिल। |
| 237 | मजिस्ट्रेटों पर प्रावधान लागू करना | राज्यपाल को अधिकार — अधीनस्थ न्यायालय प्रावधान किसी भी श्रेणी के मजिस्ट्रेटों पर लागू कर सके। |
◈ जिला न्यायाधीश — प्रमुख विशेषताएँ
| पहलू | विवरण |
|---|
| पूरा नाम | जिला एवं सत्र न्यायाधीश (District & Sessions Judge) |
| सिविल मामलों में | जिला न्यायाधीश |
| फौजदारी मामलों में | सत्र न्यायाधीश (Session Judge) |
| अधिकारिता (Jurisdiction) | सिविल व आपराधिक — दोनों में प्रारम्भिक (Original) + अपीलीय (Appellate) |
| मृत्युदण्ड की शक्ति | दाण्डिक मामलों में मृत्युदण्ड दे सकता है — परन्तु HC का अनुमोदन आवश्यक |
| शक्तियाँ | न्यायिक + प्रशासनिक दोनों |
| निरीक्षण | जिले के सभी अधीनस्थ न्यायालयों का |
| त्यागपत्र | राज्यपाल को देता है |
| हटाना | राज्यपाल द्वारा — HC के CJ से परामर्श (महाभियोग जैसी प्रक्रिया नहीं) |
| जिला न्यायालय की प्रकृति | ट्रायल कोर्ट (Trial Court)। मूल अधिकार रक्षा या संविधान व्याख्या इनके अधिकार में नहीं। |
📖 Art. 233 में उल्लेख:
"जिला प्रशासन" शब्द का संवैधानिक उल्लेख अनुच्छेद 233 में मिलता है। अधीनस्थ न्यायालयों के अंतर्गत — जिला न्यायालय, नगर सिविल न्यायालय, महानगर मजिस्ट्रेट और राज्य न्यायिक सेवा के सदस्य आते हैं।
🔑 मुख्य शब्द (Keywords)
भाग-6Art. 233-237जिला एवं सत्र न्यायाधीश7 वर्षRPSC+HCमृत्युदण्ड + HC अनुमोदनट्रायल कोर्टराज्यपाल नियुक्ति
2जिला न्यायालय का ढाँचा — सिविल एवं फौजदारी न्यायालय
जिला एवं सत्र न्यायालय के अधीन दो समानांतर न्यायिक व्यवस्थाएँ हैं — (A) सिविल (दीवानी) और (B) फौजदारी (आपराधिक)। दोनों की अपनी श्रृंखला है।
◈ (A) दीवानी/सिविल न्यायालय (Civil Courts)
सम्पत्ति, ऋण, अनुबंध, उत्तराधिकार जैसे विवाद "दीवानी/सिविल विवाद" कहलाते हैं।
| न्यायालय | विवाद राशि | अपील कहाँ? | विशेष |
|---|
| कनिष्ठ सिविल न्यायालय(मुंसिफ / Junior Civil Judge) | ₹25,000 तक | वरिष्ठ सिविल न्यायालय | सबसे निचला दीवानी न्यायालय |
| वरिष्ठ सिविल न्यायालय(Senior Civil Judge) | ₹25,001 से ₹50,000 | जिला सिविल न्यायालय | मध्यम स्तर |
| जिला सिविल न्यायालय(District Civil Court) | ₹50,001 या अधिक | उच्च न्यायालय | जिले का सर्वोच्च दीवानी न्यायालय |
◈ (B) फौजदारी/आपराधिक न्यायालय (Criminal Courts)
चोरी, मारपीट, हत्या जैसे अपराध "फौजदारी/आपराधिक विवाद" कहलाते हैं।
| न्यायालय | मामलों का प्रकार | अपील कहाँ? | विशेष |
|---|
| न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम वर्ग(JM 1st Class) | मारपीट, चोरी, डकैती आदि साधारण अपराध | CJM के समक्ष | सबसे निचला फौजदारी न्यायालय |
| मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट(CJM) | गंभीर फौजदारी विवाद | जिला सत्र न्यायाधीश | मध्यम स्तर |
| जिला सत्र न्यायाधीश(Session Judge) | हत्या जैसे अत्यंत गंभीर मामले। मृत्युदण्ड की शक्ति। | उच्च न्यायालय | जिले का सर्वोच्च फौजदारी न्यायालय |
💡 महत्वपूर्ण:
जिला एवं सत्र न्यायालय वास्तव में एक ही न्यायालय है। एक ही जज — दीवानी में "जिला न्यायाधीश" और फौजदारी में "सत्र न्यायाधीश"। BNS/CrPC 2023 (Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita) अब पुरानी CrPC की जगह लागू।
🔑 मुख्य शब्द (Keywords)
मुंसिफSenior Civil₹25K/₹50KJM 1st ClassCJMSession Courtमृत्युदण्डHC अपील
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3ग्राम न्यायालय (Gram Nyayalaya) — अधिनियम 2008
ग्राम न्यायालय की स्थापना "ग्राम न्यायालय अधिनियम 2008" द्वारा 2 अक्टूबर 2009 से की गई। यह अवधारणा गाँधीजी के न्याय को जन-जन तक पहुँचाने के स्वप्न की आधुनिक परिणति है।
| विषय | ग्राम न्यायालय — विस्तृत विवरण |
|---|
| न्यायाधीश का पद | न्यायाधिकार (Nyayadhikari) — प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट के समकक्ष |
| नियुक्ति | राज्यपाल द्वारा, उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के परामर्श से |
| स्थान / स्तर | पंचायत के मध्य/खण्ड स्तर — पंचायत समिति (प्रत्येक मध्यवर्ती पंचायत पर एक) |
| अधिकारिता | दीवानी (सिविल) + फौजदारी (आपराधिक) — दोनों |
| प्रकृति | चलते-फिरते न्यायालय (Mobile Court) — पास के गाँवों में जाकर सुनवाई करते हैं |
| मध्यस्थ | स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं को मध्यस्थ/सुलहकर्ता के रूप में मान्यता |
| अधिकतम सजा | 2 वर्ष (जुर्माना सहित या रहित) |
| अपील | 30 दिन के भीतर — जिला एवं सत्र न्यायालय में। सत्र न्यायालय — 6 माह में निर्णय देगा। |
| अपवाद | आदिवासी क्षेत्रों में स्थापित नहीं होते |
| भारत में वर्तमान स्थिति | 209 ग्राम न्यायालय (लक्ष्य था 5,000) |
| सर्वाधिक ग्राम न्यायालय | मध्यप्रदेश — 89 |
| राज्य | प्रथम ग्राम न्यायालय का स्थान | तिथि | विशेष |
|---|
| मध्यप्रदेश (भारत में प्रथम) | बरैसिया (भोपाल) | 2 अक्टूबर 2009 | देश का प्रथम ग्राम न्यायालय |
| राजस्थान (प्रथम) | बस्सी (जयपुर ग्रामीण) | 27 नवम्बर 2010 | राजस्थान का प्रथम ग्राम न्यायालय |
| राजस्थान (वर्तमान) | कुल 45 ग्राम न्यायालय | — | लक्ष्य — 145 ग्राम न्यायालय |
🔑 मुख्य शब्द (Keywords)
Gram Nyayalaya Act 20082 Oct 2009न्यायाधिकारखण्ड स्तरMobile Court2 वर्ष30 दिन अपीलMP 89Rajasthan 45बस्सी 27 Nov 2010
4विशेष न्यायालय एवं न्यायाधिकरण — परिवार, मोबाइल, FTC एवं अन्य
◈ (A) परिवार अदालत (Family Court)
| पहलू | विवरण |
|---|
| स्थापना | पारिवारिक न्यायालय अधिनियम, 1984 द्वारा |
| अनिवार्य | 10 लाख+ जनसंख्या वाले शहरों में अनिवार्य। अन्य शहरों में भी संसद द्वारा। |
| राज्यों में | राज्य सरकार द्वारा — उच्च न्यायालय की सलाह से स्थापना |
| संरचना | 1 मुख्य न्यायाधीश + 1 अतिरिक्त न्यायाधीश |
| प्रकृति | जिला न्यायालय के समान। अपील — HC में; Art. 136 (विशेष इजाजत) से SC में भी। |
| विषय | पति-पत्नी के विवाह विवाद, तलाक, गुजारा भत्ता, बाल अभिरक्षा आदि |
| Rajasthan में 7 FC | (1) बालोतरा (बाड़मेर), (2) धौलपुर, (3) जैसलमेर, (4) जालौर, (5) करौली, (6) प्रतापगढ़, (7) सिरोही |
◈ (B) मोबाइल अदालत (Mobile Court)
- मोबाइल कोर्ट अवधारणा के जनक — भूतपूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम।
- "पहियों पर न्याय (Justice on Wheels)" — एक बस के भीतर अदालत।
- उद्देश्य — अदालत स्वयं जनता के पास पहुँचे; समय व धन की बचत।
- भारत में प्रथम मोबाइल अदालत — 2007 में हरियाणा के मेवात जिले में।
◈ (C) फास्ट ट्रैक कोर्ट (Fast Track Court — FTC)
- जिला अदालतों के समान — आपराधिक मामलों का त्वरित निपटारा।
- 11वें वित्त आयोग की सिफारिश पर स्थापित।
- उद्देश्य — 5 वर्ष से अधिक समय से अंडर ट्रायल (Under Trial) जेल में रह रहे अपराधियों के मामले।
- प्रत्येक जिले में 5 FTC के गठन का प्रावधान।
- POCSO विशेष FTC — नाबालिग बच्चों से यौन अपराध के मामले (POCSO Act 2012 के तहत)।
◈ (D) अन्य विशेष न्यायाधिकरण (Special Tribunals)
| न्यायाधिकरण | स्थापना / आधार | कार्यक्षेत्र |
|---|
| MACT (Motor Accident Claims Tribunal) | Motor Vehicles Act 1988 | मोटर दुर्घटना मुआवजा। |
| DRT (Debt Recovery Tribunal) | Recovery of Debts Act 1993 | बैंकों के बड़े ऋण वसूली मामले। |
| NGT (National Green Tribunal) | NGT Act 2010 | पर्यावरण विवाद। |
| NCLT (National Company Law Tribunal) | Companies Act 2013 | कम्पनी विवाद। |
| DCDRC (District Consumer Disputes) | Consumer Protection Act 2019 | उपभोक्ता विवाद (₹1 करोड़ तक)। |
| Juvenile Justice Board | JJ Act 2015 | 18 वर्ष से कम आयु के बाल अपराध। |
| विशेष न्यायालय | प्रारम्भ | आधार | राजस्थान विशेष |
|---|
| परिवार अदालत | 1984 | Family Courts Act | Rajasthan में 7 |
| मोबाइल कोर्ट | 2007 Mewat | APJ Abdul Kalam | — |
| FTC | 11वाँ Finance Comm. | Criminal cases | 5 per district |
| ग्राम न्यायालय | 2 Oct 2009 | Gram Nyayalaya Act 2008 | 45 in Rajasthan |
🔑 मुख्य शब्द (Keywords)
परिवार अदालत 198410 लाख+7 FC RajasthanAPJ Abdul Kalamपहियों पर न्यायMewat 2007FTC 11वाँ FinanceMACTNGT 2010DCDRC
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5जनहित याचिका (Public Interest Litigation — PIL)
जनहित याचिका (PIL) वह न्यायिक साधन है जिसके द्वारा समाज का कोई भी व्यक्ति, NGO या संगठन जनसाधारण के हित में न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकता है। यह भारतीय न्याय व्यवस्था की सबसे प्रगतिशील अवधारणा है।
◈ PIL — इतिहास एवं जनक
| तथ्य | विवरण |
|---|
| उत्पत्ति | 1960 के दशक में अमेरिका से। भारत में 1980 के दशक में। |
| CJI (16वें) — जब PIL शुरू | वाई.वी. चन्द्रचूड़ (Y.V. Chandrachud)। |
| प्रथम PIL की सुनवाई | सर्वोच्च न्यायालय के 17वें CJI — पी.एन. भगवती (P.N. Bhagwati)। |
| PIL के जनक | पी.एन. भगवती + वी.एस. कृष्णअय्यर (दोनों को संयुक्त जनक माना जाता है)। |
| PIL की माता | पुष्पा कपिला हिंगौरानी (Pushpa Kapila Hingourani) — हुसैन आरा खातून केस में पहली PIL की सुनवाई। |
| प्रथम PIL | हुसैन आरा खातून केस (बिहार की विचाराधीन कैदियों की समस्या)। |
| PIL दायर कहाँ | सर्वोच्च न्यायालय (Art. 32) + उच्च न्यायालय (Art. 226) — दोनों में। |
| PIL दायर कर सकता है | पीड़ित स्वयं, उसके रिश्तेदार, या कोई NGO। |
| मुख्य उद्देश्य | विधि के शासन की रक्षा, कमजोर वर्गों को न्याय, मूल अधिकारों की सार्थक प्राप्ति। |
◈ PIL किन मामलों में — क्या शामिल, क्या नहीं
✅ PIL दायर की जा सकती है
- पर्यावरणीय मामलों में
- दंगा पीड़ित मामलों में
- बंधुआ मजदूरी संबंधी
- बाल शोषण संबंधी मामलों में
- बच्चों, महिलाओं व कैदियों से जुड़े
- पुलिस उत्पीड़न, हिरासत में मृत्यु
- पारिवारिक पेंशन संबंधी मामले
- सार्वजनिक स्वास्थ्य एवं खाद्य सुरक्षा
❌ PIL दायर नहीं होती
- मकान मालिक-किरायेदार के मामले
- सेवा संबंधी मामले
- पेंशन व ग्रेच्यूटी से संबंधित
- मेडिकल/शैक्षिक संस्थान नामांकन
- शीघ्र सुनवाई हेतु HC में दाखिल
- व्यक्तिगत हित के मामले
- सम्पत्ति विवाद (Personal Property)
◈ PIL के ऐतिहासिक निर्णय — भारत का बदलाव
| PIL का मामला | निर्णय का प्रभाव |
|---|
| हुसैन आरा खातून केस | बिहार की जेलों में विचाराधीन कैदियों की रिहाई — शीघ्र सुनवाई का अधिकार। |
| Vishaka v. State of Rajasthan (1997) | कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न के विरुद्ध "विशाखा दिशा-निर्देश" (Vishaka Guidelines)। |
| MC Mehta v. Union of India | यमुना व गंगा प्रदूषण पर ऐतिहासिक आदेश। Delhi में CNG अनिवार्य। |
| PUCL v. Union of India (2001) | "भोजन का अधिकार" — मिड-डे मील योजना का आधार। |
| Sheela Barse Case | जेल सुधार + महिला कैदियों के अधिकार। |
◈ न्यायिक सक्रियता (Judicial Activism)
- PIL के कारण न्यायिक सक्रियता बढ़ी।
- न्यायिक सक्रियता = न्यायपालिका द्वारा कार्यपालिका एवं विधायिका के कार्यों में हस्तक्षेप।
- उत्पत्ति — अमेरिका में। शब्दावली सर्वप्रथम 1947 में आर्थर शेल्सिंगर जूनियर (अमेरिकी इतिहासकार) द्वारा।
- भारत में — 1970 के दशक के मध्य में। नींव — पी.एन. भगवती, वी.आर. कृष्णअय्यर, ओ. चिनप्पा रेड्डी, डी.ए. देसाई।
- न्यायिक सक्रियता व न्यायिक पुनरावलोकन (Judicial Review) — दोनों अमेरिका से लिए।
- आलोचना — "न्यायिक अतिक्रमण (Judicial Overreach)" का खतरा — न्यायपालिका की विधायी भूमिका में दखल।
🧠 PIL के अन्य नाम:
लोकहित याचिका | सामाजिक क्रिया याचिका | सामाजिक हित याचिका | वर्गीय क्रिया याचिका।
🔑 मुख्य शब्द (Keywords)
PILPN Bhagwati 17th CJIVS Krishna IyerPushpa Kapila HingouraniHussain Ara KhatoonArt. 32+2261980s IndiaVishaka GuidelinesJudicial Activismआर्थर शेल्सिंगर 1947
6लोक अदालत (Lok Adalat) — Art. 39(क) | NLSA | RLSA | ADR
लोक अदालत भारतीय न्याय व्यवस्था का एक अनूठा वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR — Alternative Dispute Resolution) तंत्र है। यह जनता को निःशुल्क, शीघ्र और अनौपचारिक न्याय प्रदान करती है।
◈ संवैधानिक आधार एवं मूल प्रावधान
| पहलू | विवरण |
|---|
| संवैधानिक आधार | भाग-4 (DPSP), अनुच्छेद 39(क) — 42वें संशोधन 1976 द्वारा जोड़ा। राज्य का कर्तव्य — निःशुल्क व त्वरित न्याय। |
| विधिक आधार | विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम 1987। |
| आयोजन | SC, HC, जिला न्यायालय द्वारा — विधिक सेवा प्राधिकरण के माध्यम से। |
| संरचना (3 सदस्य) | (1) सेवानिवृत्त/वर्तमान SC या HC का न्यायाधीश + (2) प्रसिद्ध वकील + (3) सामाजिक कार्यकर्ता। |
| शुल्क | शून्य — कोई शुल्क नहीं। |
| वकील की आवश्यकता | नहीं — स्वयं पैरवी कर सकते हैं। |
| अधिकारिता | सिविल + फौजदारी — दोनों प्रकार। |
| निर्णय की प्रकृति | दोनों पक्षों की सहमति से। निर्णय अन्तिम (Final)। कहीं अपील नहीं। |
| स्तर | ग्राम पंचायत स्तर तक लोक अदालत आयोजित हो सकती है। |
◈ NLSA एवं RLSA — तुलना
| संस्था | स्थापना | कार्य प्रारम्भ | मुख्य तथ्य |
|---|
| NLSA
(National Legal
Service Authority) | 1987 | 9 नवम्बर 1995 | राष्ट्रीय स्तर पर लोक अदालतें। SC का CJI — अध्यक्ष। |
| RLSA
(Rajasthan LSA) | 1987 | 7 जुलाई 1998 | HQ — जयपुर। मुख्य संरक्षक — HC का CJ। कार्यकारी अध्यक्ष — HC का सेवानिवृत्त न्यायाधीश (राज्यपाल नामित — HC CJ परामर्श से)। |
◈ ऐतिहासिक तथ्य
- भारत में प्रथम लोक अदालत — 6 अक्टूबर 1985, नई दिल्ली में, SC के CJI पी.एन. भगवती की अध्यक्षता में।
- राजस्थान में प्रथम लोक अदालत — कोटा में।
◈ लोक अदालत में दायर होने वाले मामले
| क्र. | मामलों का प्रकार | क्र. | मामलों का प्रकार |
|---|
| 1 | पारिवारिक विवाद (तलाक, दहेज) | 2 | मोटर वाहन दुर्घटना व बीमा |
| 3 | चेक बाउन्स (Cheque Bounce) | 4 | भूमि संबंधी विवाद |
| 5 | किरायेदार संबंधी मामले | 6 | श्रम विवाद |
| 7 | बिजली-पानी बिल विवाद | 8 | बैंक ऋण विवाद |
◈ स्थायी लोक अदालत एवं राष्ट्रीय लोक अदालत
- स्थायी लोक अदालत (Permanent Lok Adalat) : 2002 में NLSA Act में Chapter VI-A जोड़कर स्थापित। यह सार्वजनिक उपयोगिता सेवाओं (बिजली, जल, परिवहन) के विवादों का निपटारा करती है।
- राष्ट्रीय लोक अदालत (National Lok Adalat) : पूरे भारत में एक ही दिन एक साथ आयोजित। वर्ष में 4 बार। करोड़ों मामले एक ही दिन निपटते हैं।
- e-Lok Adalat : डिजिटल माध्यम से आयोजन। COVID-19 के बाद प्रचलित।
💡 लोक अदालत vs PIL:
PIL — न्यायालय में दायर (Adversarial) + judicial decision। लोक अदालत — ADR तंत्र + mutual consent + no appeal। PIL में वकील जरूरी, लोक अदालत में वकील की जरूरत नहीं।
🔑 मुख्य शब्द (Keywords)
लोक अदालतArt. 39(क)42वाँ संशोधन 1976NLSA 9 Nov 1995RLSA 7 Jul 1998 Jaipur6 Oct 1985 Delhiकोटा (Rajasthan)Permanent Lok AdalatADRe-Lok Adalatअपील नहीं
📋 अध्याय सारांश (Quick Revision)
1. अधीनस्थ न्यायालय — भाग-6, Art. 233-237। जिला जज नियुक्ति — राज्यपाल + HC परामर्श। 2. जिला जज योग्यता — 7 वर्ष अधिवक्ता/न्यायिक अधिकारी। मृत्युदण्ड की शक्ति — HC अनुमोदन आवश्यक। 3. Art. 234 — अन्य न्यायिक अधिकारी : राज्यपाल + RPSC + HC। Art. 235 — HC का नियंत्रण। 4. सिविल : मुंसिफ (₹25K) → Senior (₹50K) → District Civil (₹50K+) → HC। 5. फौजदारी : JM 1st Class → CJM → Session Court (हत्या/Death) → HC। 6. ग्राम न्यायालय — 2 Oct 2009 (Act 2008)। खण्ड स्तर पर। अधिकतम 2 वर्ष। Mobile Court। India में 209 (MP 89 सर्वाधिक)। 7. Rajasthan प्रथम ग्राम न्यायालय — बस्सी (27 Nov 2010)। Rajasthan लक्ष्य 145। 8. परिवार अदालत 1984 — 10 लाख+। Rajasthan में 7। मोबाइल कोर्ट — APJ Kalam, Mewat 2007। 9. FTC — 11वें Finance Commission। प्रति जिला 5। PIL जनक — PN Bhagwati + VS Krishna Iyer। 10. PIL की माता — पुष्पा कपिला हिंगौरानी। प्रथम PIL — हुसैन आरा खातून। Judicial Activism नींव — 1970s। 11. लोक अदालत — Art. 39(क) (42वाँ संशोधन 1976)। 3 सदस्य। निःशुल्क। निर्णय अन्तिम — अपील नहीं। 12. NLSA 9 Nov 1995। RLSA 7 Jul 1998 (Jaipur HQ)। प्रथम लोक अदालत — 6 Oct 1985 Delhi (PN Bhagwati)।
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