🧑‍⚖️ अध्याय 23/34 — भारतीय राजव्यवस्था एवं शासन

अधीनस्थ न्यायालय एवं न्यायिक व्यवस्था

Subordinate Courts & Judicial System | RAS Pre + Mains
📋 इस अध्याय में
  1. अधीनस्थ न्यायालय — परिचय एवं अनुच्छेद 233–237 (भाग-6)
  2. जिला न्यायालय का ढाँचा — सिविल एवं फौजदारी न्यायालय
  3. ग्राम न्यायालय (Gram Nyayalaya) — अधिनियम 2008
  4. विशेष न्यायालय एवं न्यायाधिकरण — परिवार, मोबाइल, FTC एवं अन्य
  5. जनहित याचिका (Public Interest Litigation — PIL)
  6. लोक अदालत (Lok Adalat) — Art. 39(क) | NLSA | RLSA | ADR

1अधीनस्थ न्यायालय — परिचय एवं अनुच्छेद 233–237 (भाग-6)

भारत में उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों से नीचे के समस्त न्यायालयों को "अधीनस्थ न्यायालय (Subordinate Courts)" कहा जाता है। ये देश में न्याय-व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी हैं — जहाँ आम नागरिक का सीधा संपर्क होता है।

अनुच्छेदविषयप्रमुख प्रावधान
233 (1)जिला न्यायाधीश की नियुक्तिनियुक्ति — राज्यपाल करता है, उच्च न्यायालय से परामर्श करके।
233 (2)जिला न्यायाधीश की योग्यता(i) भारत का नागरिक हो। (ii) कम से कम 7 वर्ष तक अधिवक्ता रहा हो। अथवा (iii) 7 वर्ष न्यायिक अधिकारी के रूप में कार्य किया हो।
233 कविधिमान्यकरणकुछ जिला न्यायाधीशों की नियुक्तियों और निर्णयों का विधिमान्यकरण।
234अन्य न्यायिक अधिकारियों की भर्तीजिला जज के अतिरिक्त अन्य न्यायिक अधिकारी — राज्यपाल + RPSC + HC परामर्श से।
235HC का अधीनस्थ न्यायालयों पर नियंत्रणपदस्थापना, प्रोन्नति, छुट्टी, स्थानान्तरण, निलम्बन, दण्ड, अनिवार्य सेवानिवृत्ति — सभी में HC का नियंत्रण।
236निर्वचन (Interpretation)जिला न्यायाधीश पद में — अपर, संयुक्त, सहायक जिला जज, सत्र न्यायाधीश, मुख्य प्रेसीडेन्सी मजिस्ट्रेट, लघुवाद न्यायालय का CJ आदि शामिल।
237मजिस्ट्रेटों पर प्रावधान लागू करनाराज्यपाल को अधिकार — अधीनस्थ न्यायालय प्रावधान किसी भी श्रेणी के मजिस्ट्रेटों पर लागू कर सके।

◈ जिला न्यायाधीश — प्रमुख विशेषताएँ

पहलूविवरण
पूरा नामजिला एवं सत्र न्यायाधीश (District & Sessions Judge)
सिविल मामलों मेंजिला न्यायाधीश
फौजदारी मामलों मेंसत्र न्यायाधीश (Session Judge)
अधिकारिता (Jurisdiction)सिविल व आपराधिक — दोनों में प्रारम्भिक (Original) + अपीलीय (Appellate)
मृत्युदण्ड की शक्तिदाण्डिक मामलों में मृत्युदण्ड दे सकता है — परन्तु HC का अनुमोदन आवश्यक
शक्तियाँन्यायिक + प्रशासनिक दोनों
निरीक्षणजिले के सभी अधीनस्थ न्यायालयों का
त्यागपत्रराज्यपाल को देता है
हटानाराज्यपाल द्वारा — HC के CJ से परामर्श (महाभियोग जैसी प्रक्रिया नहीं)
जिला न्यायालय की प्रकृतिट्रायल कोर्ट (Trial Court)। मूल अधिकार रक्षा या संविधान व्याख्या इनके अधिकार में नहीं।
📖 Art. 233 में उल्लेख:

"जिला प्रशासन" शब्द का संवैधानिक उल्लेख अनुच्छेद 233 में मिलता है। अधीनस्थ न्यायालयों के अंतर्गत — जिला न्यायालय, नगर सिविल न्यायालय, महानगर मजिस्ट्रेट और राज्य न्यायिक सेवा के सदस्य आते हैं।

🔑 मुख्य शब्द (Keywords)
भाग-6Art. 233-237जिला एवं सत्र न्यायाधीश7 वर्षRPSC+HCमृत्युदण्ड + HC अनुमोदनट्रायल कोर्टराज्यपाल नियुक्ति

2जिला न्यायालय का ढाँचा — सिविल एवं फौजदारी न्यायालय

जिला एवं सत्र न्यायालय के अधीन दो समानांतर न्यायिक व्यवस्थाएँ हैं — (A) सिविल (दीवानी) और (B) फौजदारी (आपराधिक)। दोनों की अपनी श्रृंखला है।

◈ (A) दीवानी/सिविल न्यायालय (Civil Courts)

सम्पत्ति, ऋण, अनुबंध, उत्तराधिकार जैसे विवाद "दीवानी/सिविल विवाद" कहलाते हैं।

न्यायालयविवाद राशिअपील कहाँ?विशेष
कनिष्ठ सिविल न्यायालय(मुंसिफ / Junior Civil Judge)₹25,000 तकवरिष्ठ सिविल न्यायालयसबसे निचला दीवानी न्यायालय
वरिष्ठ सिविल न्यायालय(Senior Civil Judge)₹25,001 से ₹50,000जिला सिविल न्यायालयमध्यम स्तर
जिला सिविल न्यायालय(District Civil Court)₹50,001 या अधिकउच्च न्यायालयजिले का सर्वोच्च दीवानी न्यायालय

◈ (B) फौजदारी/आपराधिक न्यायालय (Criminal Courts)

चोरी, मारपीट, हत्या जैसे अपराध "फौजदारी/आपराधिक विवाद" कहलाते हैं।

न्यायालयमामलों का प्रकारअपील कहाँ?विशेष
न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम वर्ग(JM 1st Class)मारपीट, चोरी, डकैती आदि साधारण अपराधCJM के समक्षसबसे निचला फौजदारी न्यायालय
मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट(CJM)गंभीर फौजदारी विवादजिला सत्र न्यायाधीशमध्यम स्तर
जिला सत्र न्यायाधीश(Session Judge)हत्या जैसे अत्यंत गंभीर मामले। मृत्युदण्ड की शक्ति।उच्च न्यायालयजिले का सर्वोच्च फौजदारी न्यायालय
💡 महत्वपूर्ण:

जिला एवं सत्र न्यायालय वास्तव में एक ही न्यायालय है। एक ही जज — दीवानी में "जिला न्यायाधीश" और फौजदारी में "सत्र न्यायाधीश"। BNS/CrPC 2023 (Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita) अब पुरानी CrPC की जगह लागू।

🔑 मुख्य शब्द (Keywords)
मुंसिफSenior Civil₹25K/₹50KJM 1st ClassCJMSession Courtमृत्युदण्डHC अपील
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3ग्राम न्यायालय (Gram Nyayalaya) — अधिनियम 2008

ग्राम न्यायालय की स्थापना "ग्राम न्यायालय अधिनियम 2008" द्वारा 2 अक्टूबर 2009 से की गई। यह अवधारणा गाँधीजी के न्याय को जन-जन तक पहुँचाने के स्वप्न की आधुनिक परिणति है।

विषयग्राम न्यायालय — विस्तृत विवरण
न्यायाधीश का पदन्यायाधिकार (Nyayadhikari) — प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट के समकक्ष
नियुक्तिराज्यपाल द्वारा, उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के परामर्श से
स्थान / स्तरपंचायत के मध्य/खण्ड स्तर — पंचायत समिति (प्रत्येक मध्यवर्ती पंचायत पर एक)
अधिकारितादीवानी (सिविल) + फौजदारी (आपराधिक) — दोनों
प्रकृतिचलते-फिरते न्यायालय (Mobile Court) — पास के गाँवों में जाकर सुनवाई करते हैं
मध्यस्थस्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं को मध्यस्थ/सुलहकर्ता के रूप में मान्यता
अधिकतम सजा2 वर्ष (जुर्माना सहित या रहित)
अपील30 दिन के भीतर — जिला एवं सत्र न्यायालय में। सत्र न्यायालय — 6 माह में निर्णय देगा।
अपवादआदिवासी क्षेत्रों में स्थापित नहीं होते
भारत में वर्तमान स्थिति209 ग्राम न्यायालय (लक्ष्य था 5,000)
सर्वाधिक ग्राम न्यायालयमध्यप्रदेश — 89
राज्यप्रथम ग्राम न्यायालय का स्थानतिथिविशेष
मध्यप्रदेश (भारत में प्रथम)बरैसिया (भोपाल)2 अक्टूबर 2009देश का प्रथम ग्राम न्यायालय
राजस्थान (प्रथम)बस्सी (जयपुर ग्रामीण)27 नवम्बर 2010राजस्थान का प्रथम ग्राम न्यायालय
राजस्थान (वर्तमान)कुल 45 ग्राम न्यायालयलक्ष्य — 145 ग्राम न्यायालय
🔑 मुख्य शब्द (Keywords)
Gram Nyayalaya Act 20082 Oct 2009न्यायाधिकारखण्ड स्तरMobile Court2 वर्ष30 दिन अपीलMP 89Rajasthan 45बस्सी 27 Nov 2010

4विशेष न्यायालय एवं न्यायाधिकरण — परिवार, मोबाइल, FTC एवं अन्य

◈ (A) परिवार अदालत (Family Court)

पहलूविवरण
स्थापनापारिवारिक न्यायालय अधिनियम, 1984 द्वारा
अनिवार्य10 लाख+ जनसंख्या वाले शहरों में अनिवार्य। अन्य शहरों में भी संसद द्वारा।
राज्यों मेंराज्य सरकार द्वारा — उच्च न्यायालय की सलाह से स्थापना
संरचना1 मुख्य न्यायाधीश + 1 अतिरिक्त न्यायाधीश
प्रकृतिजिला न्यायालय के समान। अपील — HC में; Art. 136 (विशेष इजाजत) से SC में भी।
विषयपति-पत्नी के विवाह विवाद, तलाक, गुजारा भत्ता, बाल अभिरक्षा आदि
Rajasthan में 7 FC(1) बालोतरा (बाड़मेर), (2) धौलपुर, (3) जैसलमेर, (4) जालौर, (5) करौली, (6) प्रतापगढ़, (7) सिरोही

◈ (B) मोबाइल अदालत (Mobile Court)

◈ (C) फास्ट ट्रैक कोर्ट (Fast Track Court — FTC)

◈ (D) अन्य विशेष न्यायाधिकरण (Special Tribunals)

न्यायाधिकरणस्थापना / आधारकार्यक्षेत्र
MACT (Motor Accident Claims Tribunal)Motor Vehicles Act 1988मोटर दुर्घटना मुआवजा।
DRT (Debt Recovery Tribunal)Recovery of Debts Act 1993बैंकों के बड़े ऋण वसूली मामले।
NGT (National Green Tribunal)NGT Act 2010पर्यावरण विवाद।
NCLT (National Company Law Tribunal)Companies Act 2013कम्पनी विवाद।
DCDRC (District Consumer Disputes)Consumer Protection Act 2019उपभोक्ता विवाद (₹1 करोड़ तक)।
Juvenile Justice BoardJJ Act 201518 वर्ष से कम आयु के बाल अपराध।
विशेष न्यायालयप्रारम्भआधारराजस्थान विशेष
परिवार अदालत1984Family Courts ActRajasthan में 7
मोबाइल कोर्ट2007 MewatAPJ Abdul Kalam
FTC11वाँ Finance Comm.Criminal cases5 per district
ग्राम न्यायालय2 Oct 2009Gram Nyayalaya Act 200845 in Rajasthan
🔑 मुख्य शब्द (Keywords)
परिवार अदालत 198410 लाख+7 FC RajasthanAPJ Abdul Kalamपहियों पर न्यायMewat 2007FTC 11वाँ FinanceMACTNGT 2010DCDRC
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5जनहित याचिका (Public Interest Litigation — PIL)

जनहित याचिका (PIL) वह न्यायिक साधन है जिसके द्वारा समाज का कोई भी व्यक्ति, NGO या संगठन जनसाधारण के हित में न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकता है। यह भारतीय न्याय व्यवस्था की सबसे प्रगतिशील अवधारणा है।

◈ PIL — इतिहास एवं जनक

तथ्यविवरण
उत्पत्ति1960 के दशक में अमेरिका से। भारत में 1980 के दशक में।
CJI (16वें) — जब PIL शुरूवाई.वी. चन्द्रचूड़ (Y.V. Chandrachud)।
प्रथम PIL की सुनवाईसर्वोच्च न्यायालय के 17वें CJI — पी.एन. भगवती (P.N. Bhagwati)।
PIL के जनकपी.एन. भगवती + वी.एस. कृष्णअय्यर (दोनों को संयुक्त जनक माना जाता है)।
PIL की मातापुष्पा कपिला हिंगौरानी (Pushpa Kapila Hingourani) — हुसैन आरा खातून केस में पहली PIL की सुनवाई।
प्रथम PILहुसैन आरा खातून केस (बिहार की विचाराधीन कैदियों की समस्या)।
PIL दायर कहाँसर्वोच्च न्यायालय (Art. 32) + उच्च न्यायालय (Art. 226) — दोनों में।
PIL दायर कर सकता हैपीड़ित स्वयं, उसके रिश्तेदार, या कोई NGO।
मुख्य उद्देश्यविधि के शासन की रक्षा, कमजोर वर्गों को न्याय, मूल अधिकारों की सार्थक प्राप्ति।

◈ PIL किन मामलों में — क्या शामिल, क्या नहीं

✅ PIL दायर की जा सकती है
  • पर्यावरणीय मामलों में
  • दंगा पीड़ित मामलों में
  • बंधुआ मजदूरी संबंधी
  • बाल शोषण संबंधी मामलों में
  • बच्चों, महिलाओं व कैदियों से जुड़े
  • पुलिस उत्पीड़न, हिरासत में मृत्यु
  • पारिवारिक पेंशन संबंधी मामले
  • सार्वजनिक स्वास्थ्य एवं खाद्य सुरक्षा
❌ PIL दायर नहीं होती
  • मकान मालिक-किरायेदार के मामले
  • सेवा संबंधी मामले
  • पेंशन व ग्रेच्यूटी से संबंधित
  • मेडिकल/शैक्षिक संस्थान नामांकन
  • शीघ्र सुनवाई हेतु HC में दाखिल
  • व्यक्तिगत हित के मामले
  • सम्पत्ति विवाद (Personal Property)

◈ PIL के ऐतिहासिक निर्णय — भारत का बदलाव

PIL का मामलानिर्णय का प्रभाव
हुसैन आरा खातून केसबिहार की जेलों में विचाराधीन कैदियों की रिहाई — शीघ्र सुनवाई का अधिकार।
Vishaka v. State of Rajasthan (1997)कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न के विरुद्ध "विशाखा दिशा-निर्देश" (Vishaka Guidelines)।
MC Mehta v. Union of Indiaयमुना व गंगा प्रदूषण पर ऐतिहासिक आदेश। Delhi में CNG अनिवार्य।
PUCL v. Union of India (2001)"भोजन का अधिकार" — मिड-डे मील योजना का आधार।
Sheela Barse Caseजेल सुधार + महिला कैदियों के अधिकार।

◈ न्यायिक सक्रियता (Judicial Activism)

🧠 PIL के अन्य नाम:

लोकहित याचिका | सामाजिक क्रिया याचिका | सामाजिक हित याचिका | वर्गीय क्रिया याचिका।

🔑 मुख्य शब्द (Keywords)
PILPN Bhagwati 17th CJIVS Krishna IyerPushpa Kapila HingouraniHussain Ara KhatoonArt. 32+2261980s IndiaVishaka GuidelinesJudicial Activismआर्थर शेल्सिंगर 1947

6लोक अदालत (Lok Adalat) — Art. 39(क) | NLSA | RLSA | ADR

लोक अदालत भारतीय न्याय व्यवस्था का एक अनूठा वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR — Alternative Dispute Resolution) तंत्र है। यह जनता को निःशुल्क, शीघ्र और अनौपचारिक न्याय प्रदान करती है।

◈ संवैधानिक आधार एवं मूल प्रावधान

पहलूविवरण
संवैधानिक आधारभाग-4 (DPSP), अनुच्छेद 39(क) — 42वें संशोधन 1976 द्वारा जोड़ा। राज्य का कर्तव्य — निःशुल्क व त्वरित न्याय।
विधिक आधारविधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम 1987।
आयोजनSC, HC, जिला न्यायालय द्वारा — विधिक सेवा प्राधिकरण के माध्यम से।
संरचना (3 सदस्य)(1) सेवानिवृत्त/वर्तमान SC या HC का न्यायाधीश + (2) प्रसिद्ध वकील + (3) सामाजिक कार्यकर्ता।
शुल्कशून्य — कोई शुल्क नहीं।
वकील की आवश्यकतानहीं — स्वयं पैरवी कर सकते हैं।
अधिकारितासिविल + फौजदारी — दोनों प्रकार।
निर्णय की प्रकृतिदोनों पक्षों की सहमति से। निर्णय अन्तिम (Final)। कहीं अपील नहीं।
स्तरग्राम पंचायत स्तर तक लोक अदालत आयोजित हो सकती है।

◈ NLSA एवं RLSA — तुलना

संस्थास्थापनाकार्य प्रारम्भमुख्य तथ्य
NLSA (National Legal Service Authority)19879 नवम्बर 1995राष्ट्रीय स्तर पर लोक अदालतें। SC का CJI — अध्यक्ष।
RLSA (Rajasthan LSA)19877 जुलाई 1998HQ — जयपुर। मुख्य संरक्षक — HC का CJ। कार्यकारी अध्यक्ष — HC का सेवानिवृत्त न्यायाधीश (राज्यपाल नामित — HC CJ परामर्श से)।

◈ ऐतिहासिक तथ्य

◈ लोक अदालत में दायर होने वाले मामले

क्र.मामलों का प्रकारक्र.मामलों का प्रकार
1पारिवारिक विवाद (तलाक, दहेज)2मोटर वाहन दुर्घटना व बीमा
3चेक बाउन्स (Cheque Bounce)4भूमि संबंधी विवाद
5किरायेदार संबंधी मामले6श्रम विवाद
7बिजली-पानी बिल विवाद8बैंक ऋण विवाद

◈ स्थायी लोक अदालत एवं राष्ट्रीय लोक अदालत

💡 लोक अदालत vs PIL:

PIL — न्यायालय में दायर (Adversarial) + judicial decision। लोक अदालत — ADR तंत्र + mutual consent + no appeal। PIL में वकील जरूरी, लोक अदालत में वकील की जरूरत नहीं।

🔑 मुख्य शब्द (Keywords)
लोक अदालतArt. 39(क)42वाँ संशोधन 1976NLSA 9 Nov 1995RLSA 7 Jul 1998 Jaipur6 Oct 1985 Delhiकोटा (Rajasthan)Permanent Lok AdalatADRe-Lok Adalatअपील नहीं

📋 अध्याय सारांश (Quick Revision)

1. अधीनस्थ न्यायालय — भाग-6, Art. 233-237। जिला जज नियुक्ति — राज्यपाल + HC परामर्श। 2. जिला जज योग्यता — 7 वर्ष अधिवक्ता/न्यायिक अधिकारी। मृत्युदण्ड की शक्ति — HC अनुमोदन आवश्यक। 3. Art. 234 — अन्य न्यायिक अधिकारी : राज्यपाल + RPSC + HC। Art. 235 — HC का नियंत्रण। 4. सिविल : मुंसिफ (₹25K) → Senior (₹50K) → District Civil (₹50K+) → HC। 5. फौजदारी : JM 1st Class → CJM → Session Court (हत्या/Death) → HC। 6. ग्राम न्यायालय — 2 Oct 2009 (Act 2008)। खण्ड स्तर पर। अधिकतम 2 वर्ष। Mobile Court। India में 209 (MP 89 सर्वाधिक)। 7. Rajasthan प्रथम ग्राम न्यायालय — बस्सी (27 Nov 2010)। Rajasthan लक्ष्य 145। 8. परिवार अदालत 1984 — 10 लाख+। Rajasthan में 7। मोबाइल कोर्ट — APJ Kalam, Mewat 2007। 9. FTC — 11वें Finance Commission। प्रति जिला 5। PIL जनक — PN Bhagwati + VS Krishna Iyer। 10. PIL की माता — पुष्पा कपिला हिंगौरानी। प्रथम PIL — हुसैन आरा खातून। Judicial Activism नींव — 1970s। 11. लोक अदालत — Art. 39(क) (42वाँ संशोधन 1976)। 3 सदस्य। निःशुल्क। निर्णय अन्तिम — अपील नहीं। 12. NLSA 9 Nov 1995। RLSA 7 Jul 1998 (Jaipur HQ)। प्रथम लोक अदालत — 6 Oct 1985 Delhi (PN Bhagwati)।

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