🔍 अध्याय 24/34 — भारतीय राजव्यवस्था एवं शासन

न्यायिक पुनरावलोकन, न्यायिक सक्रियता एवं जनहित याचिका

Judicial Review, Judicial Activism & PIL | RAS Pre + Mains
📋 इस अध्याय में

    न्यायिक पुनरावलोकन, न्यायिक सक्रियता एवं जनहित याचिका — ये तीनों अवधारणाएँ भारतीय लोकतंत्र में न्यायपालिका की सक्रिय एवं रचनात्मक भूमिका को परिभाषित करती हैं। संविधान की सर्वोच्चता, मूल अधिकारों की रक्षा और सामाजिक न्याय की प्राप्ति इन तीनों का साझा लक्ष्य है।

    📗 भाग-1: न्यायिक पुनरावलोकन (Judicial Review)

    1.1 उत्पत्ति एवं भारत में स्थिति

    1.2 अर्थ एवं परिभाषा

    न्यायिक पुनरावलोकन न्यायपालिका की वह शक्ति है जिसके द्वारा वह केंद्र व राज्य सरकारों के विधायी अधिनियमों एवं कार्यकारी आदेशों की संवैधानिकता की जाँच करती है। संविधान-विरुद्ध पाए जाने पर वे अवैध, असंवैधानिक एवं शून्य (Null and Void) घोषित किए जाते हैं।

    न्यायमूर्ति सैयद शाह मोहम्मद कादरी की 3 श्रेणियाँ

    1. संवैधानिक संशोधनों का न्यायिक पुनरावलोकन

    2. संसद एवं राज्य विधानमंडलों के विधानों तथा अधीनस्थ विधानों का न्यायिक पुनरावलोकन

    3. केंद्र, राज्य एवं अधिकारियों के प्रशासनिक कार्यों का न्यायिक पुनरावलोकन

    1.3 महत्व — SC के ऐतिहासिक कथन

    "

    Our constitution contains express provisions for judicial review of legislation as to its conformity with the constitution. This is especially true as regards the Fundamental Rights, to which the court has been assigned the role of sentinel on the qui vive. — मुख्य न्यायाधीश पतंजलि शास्त्री — State of Madras vs V.G. Row (1952)

    "

    As long as some Fundamental Rights exist and are a part of the Constitution, the power of judicial review has also to be exercised with a view to see that the guarantees afforded by these Rights are not contravened. — न्यायमूर्ति खन्ना — Kesavananda Bharati vs State of Kerala (1973)

    "

    It is the function of the Judges, nay their duty, to pronounce upon the validity of laws. If courts are totally deprived of that power, the Fundamental Rights conferred on the people will become a mere adornment because rights without remedies are as writ in water. — मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ — Minerva Mills vs Union of India (1980)

    1.4 न्यायिक पुनरावलोकन की आवश्यकता

    1.5 संवैधानिक प्रावधान (16 अनुच्छेद)

    अनुच्छेदविषयमहत्व
    अनुच्छेद 13मूल अधिकारों से असंगत कानून शून्यसर्वाधिक महत्वपूर्ण — JR का आधार
    अनुच्छेद 32मूल अधिकार प्रवर्तन हेतु SC में याचिका; रिट जारी करने की शक्तिमूल अधिकारों की "आत्मा"
    अनुच्छेद 131केंद्र-राज्य विवाद: SC का मूल क्षेत्राधिकारसंघीय JR का आधार
    अनुच्छेद 132संवैधानिक मामलों में SC का अपीलीय क्षेत्राधिकारसंवैधानिक JR
    अनुच्छेद 133दीवानी मामलों में SC का अपीलीय क्षेत्राधिकारदीवानी JR
    अनुच्छेद 134आपराधिक मामलों में SC का अपीलीय क्षेत्राधिकारआपराधिक JR
    अनुच्छेद 136Special Leave to Appeal (SLP)व्यापक JR शक्ति
    अनुच्छेद 143राष्ट्रपति SC से राय माँग सकता हैपरामर्शदायी JR
    अनुच्छेद 226HC द्वारा रिट जारी करने की शक्तिHC स्तर पर JR
    अनुच्छेद 227HC का अधीनस्थ न्यायालयों पर पर्यवेक्षणप्रशासनिक JR
    अनुच्छेद 245संसद/विधानमंडल की विधायी सीमा (क्षेत्रीय)JR का दायरा तय
    अनुच्छेद 246संघ सूची/राज्य सूची/समवर्ती सूचीJR का विधायी आधार
    अनुच्छेद 251, 254केंद्रीय कानून बनाम राज्य कानून — टकराव में केंद्र प्रभावीJR का संघीय पक्ष
    अनुच्छेद 372पूर्व-संविधान कानूनों का अस्तित्व में बने रहनापूर्व-कानूनों पर JR

    1.6 न्यायिक पुनरावलोकन का दायरा (Scope)

    विधायी अधिनियम या कार्यकारी आदेश की संवैधानिक वैधता को निम्न 3 आधारों पर चुनौती दी जा सकती है:

    1. यह मूल अधिकारों (भाग-III) का उल्लंघन करता है

    2. यह उस प्राधिकरण की सक्षमता से बाहर है जिसने इसे बनाया

    3. यह संविधान के प्रावधानों के विरुद्ध है

    भारत में न्यायिक पुनरावलोकन
    • दायरा: संकीर्ण (Narrow)
    • "विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया" (Procedure Established by Law)
    • केवल पदार्थगत प्रश्न — क्या कानून संविधान के अंतर्गत है?
    • औचित्य/नीति की जाँच नहीं
    • संविधान में स्पष्ट प्रावधान
    • संसदीय सर्वोच्चता एवं न्यायिक सर्वोच्चता का समन्वय
    अमेरिका में न्यायिक पुनरावलोकन
    • दायरा: व्यापक (Wide)
    • "उचित प्रक्रिया" (Due Process of Law)
    • पदार्थगत + प्रक्रियागत प्रश्न — क्या कानून उचित है?
    • अनुचित कानून भी रद्द हो सकता है
    • संविधान में स्पष्ट उल्लेख नहीं — न्यायिक निर्णय से विकसित
    • "तृतीय सदन" जैसी भूमिका — super-legislature

    Maneka Gandhi Case (1978): इस ऐतिहासिक निर्णय के बाद भारत में भी "Procedure Established by Law" का अर्थ विस्तृत हुआ — अब प्रक्रिया "just, fair and reasonable" होनी चाहिए। इससे भारत और अमेरिका के दृष्टिकोण में अंतर कम हुआ।

    1.7 नवीं अनुसूची एवं न्यायिक पुनरावलोकन

    नवीं अनुसूची पर प्रमुख न्यायिक निर्णय

    वादवर्षमुख्य निर्णय
    Kesavananda Bharati vs State of Kerala1973नवीं अनुसूची के अधिनियम मूल संरचना उल्लंघन के आधार पर चुनौती योग्य; 24 अप्रैल 1973 watershed तिथि
    Waman Rao vs Union of India198024 अप्रैल 1973 के बाद नवीं अनुसूची में शामिल कानून वैध केवल यदि मूल संरचना को क्षति न पहुँचाएँ
    I.R. Coelho vs State of Tamil Nadu2007नवीं अनुसूची को JR से पूर्ण छूट नहीं; JR स्वयं मूल संरचना का अंग; "Rights Test" + "Essence of Right Test" लागू
    Indira Nehru Gandhi vs Raj Narain1975प्रत्येक नए संशोधन की वैधता उसके अपने गुणों पर आँकी जाएगी
    M. Nagaraj vs Union of India2006"Essence of Right Test" — Nagaraj case में स्थापित

    24 अप्रैल 1973 — Watershed Date: Kesavananda Bharati निर्णय की तिथि। इसके बाद नवीं अनुसूची में शामिल अधिनियम अनुच्छेद 21 (अनुच्छेद 14 और 19 सहित पठित) की कसौटी पर जाँचे जाएँगे। पूर्व की 66 प्रविष्टियाँ (1-66) चुनौती से मुक्त; परंतु बाद की (67-282) चुनौती योग्य।

    नवीं अनुसूची में प्रविष्टियाँ — प्रमुख संशोधन

    संशोधनवर्षशामिल प्रविष्टियाँ24 अप्रैल 1973 से
    प्रथम19511-13 (13 कानून)पूर्व — चुनौती से मुक्त
    चतुर्थ195514-20 (7 कानून)पूर्व — चुनौती से मुक्त
    सातवाँ196421-64 (44 कानून)पूर्व — चुनौती से मुक्त
    उनतीसवाँ197265-66 (2 कानून)पूर्व — चुनौती से मुक्त
    चौंतीसवाँ197467-86 (20 कानून)पश्चात — JR के अधीन
    उनतालीसवाँ197587-124 (38 कानून)पश्चात — JR के अधीन
    चालीसवाँ1976125-188 (64 कानून)पश्चात — JR के अधीन
    छियासठवाँ1990203-257 (55 कानून)पश्चात — JR के अधीन
    अठहत्तरवाँ1995258-284 (27 कानून)पश्चात — JR के अधीन

    📗 भाग-2: न्यायिक सक्रियता (Judicial Activism)

    2.1 उत्पत्ति एवं भारत में परिचय

    ► न्यायमूर्ति V.R. Krishna Iyer

    ► न्यायमूर्ति P.N. Bhagwati

    ► न्यायमूर्ति O. Chinnappa Reddy

    ► न्यायमूर्ति D.A. Desai

    2.2 परिभाषाएँ

    विभिन्न विद्वानों ने न्यायिक सक्रियता को निम्न प्रकार परिभाषित किया है:

    स्रोतपरिभाषा
    Black's Law Dictionaryन्यायिक सक्रियता न्यायिक शक्ति के प्रयोग का वह तरीका है जो न्यायाधीशों को सामान्य न्यायिक नज़ीर से हटकर प्रगतिशील सामाजिक नीतियों की ओर प्रेरित करता है।
    Merriam Websterन्यायिक सक्रियता — स्थापित नज़ीर से अलग होकर व्यक्तिगत अधिकारों की रक्षा एवं विस्तार की न्यायपालिका की प्रवृत्ति।
    V.G. Palishikar (1998)न्यायिक सक्रियता न्यायाधीशों द्वारा कानून-निर्माण की प्रक्रिया है — मौजूदा विधान की सक्रिय व्याख्या, सामाजिक उन्नति के लिए।
    P.B. Sawantन्यायिक सक्रियता नए सिद्धांत, अवधारणाएँ, सूत्र एवं राहत विकसित करने की प्रक्रिया है — न्याय करने के लिए या याचिकाकर्ता की स्थिति विस्तृत करने के लिए।

    2.3 न्यायिक सक्रियता के दो प्रमुख पहलू

    1. PIL के रूप में — सरकारी प्राधिकरणों को नागरिकों के अधिकारों की रक्षा एवं जनहित पूर्ति के लिए निर्देश जारी करना

    2. मूल अधिकारों की व्याख्या — विशेषतः अनुच्छेद 14 (समानता), 19 (स्वतंत्रता) और 21 (प्राण एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता) की विस्तृत व्याख्या

    2.4 न्यायिक पुनरावलोकन बनाम न्यायिक सक्रियता

    न्यायिक पुनरावलोकन (Judicial Review)
    • संविधान की कसौटी पर कानून की वैधता जाँचना
    • संरक्षक भूमिका — रक्षात्मक
    • संविधान द्वारा प्रदत्त शक्ति
    • कानून को उचित/अनुचित नहीं — वैध/अवैध घोषित
    • पुरानी अवधारणा — 1803 से (Marbury vs Madison)
    • न्यायाधीश: संविधान के व्याख्याकर्ता
    न्यायिक सक्रियता (Judicial Activism)
    • बदलते सामाजिक-आर्थिक परिदृश्य के अनुसार कानून ढालना
    • सृजनशील भूमिका — आक्रामक
    • न्यायाधीशों की नीतिगत प्राथमिकताओं से प्रेरित
    • विधायी एवं कार्यकारी क्षेत्र में प्रवेश
    • अपेक्षाकृत नई अवधारणा — 1947 से (Schlesinger)
    • न्यायाधीश: सक्रिय नीति-निर्माता

    2.5 न्यायिक सक्रियता का औचित्य

    Dr. B.L. Wadehra के अनुसार 5 कारण

    1. जिम्मेदार सरकार का लगभग पतन — विधायिका और कार्यपालिका अपने दायित्व निभाने में विफल

    2. नागरिकों का न्यायपालिका पर आस्था — पीड़ित जन न्यायालय की ओर देखते हैं

    3. न्यायिक उत्साह — न्यायाधीश सामाजिक सुधारों में भागीदारी चाहते हैं; locus standi का उदारीकरण

    4. विधायी शून्यता (Legislative Vacuum) — कुछ क्षेत्रों में कानून नहीं; न्यायपालिका को हस्तक्षेप

    5. संविधान के प्रावधान स्वयं न्यायपालिका को सक्रिय भूमिका का अवसर देते हैं

    सुभाष कश्यप के अनुसार — कब न्यायपालिका को हस्तक्षेप करना पड़ सकता है

    2.6 सक्रियकर्ता वर्ग — Upendra Baxi की टाइपोलॉजी (15 श्रेणियाँ)

    प्रख्यात विधिशास्त्री उपेंद्र बाक्षी ने न्यायिक सक्रियता को प्रेरित करने वाले सामाजिक/मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की 15 श्रेणियाँ बताई हैं:

    क्र.श्रेणीमुख्य मुद्दे
    1नागरिक अधिकार कार्यकर्तानागरिक एवं राजनीतिक अधिकार
    2जन अधिकार कार्यकर्तासामाजिक-आर्थिक अधिकार; राज्य दमन विरोध
    3उपभोक्ता अधिकार समूहउपभोक्ता सुरक्षा, राजनीतिक-आर्थिक जवाबदेही
    4बंधुआ मजदूर समूहमजदूरी दासता का उन्मूलन
    5पर्यावरण कार्यकर्ताप्रदूषण, पारिस्थितिकी असंतुलन
    6बड़ी सिंचाई परियोजना विरोधीमेगा परियोजनाओं से विस्थापन
    7बाल अधिकार समूहबाल श्रम, शिक्षा का अधिकार, जेल में किशोर
    8अभिरक्षा अधिकार समूहकैदियों के अधिकार, निवारक निरोध
    9गरीबी अधिकार समूहअकाल राहत, शहरी वंचित
    10स्वदेशी जन अधिकार समूहवनवासी, 5वीं-6वीं अनुसूची के लोग
    11महिला अधिकार समूहलैंगिक समानता, बलात्कार, दहेज हत्या
    12बार आधारित समूहन्यायपालिका की स्वायत्तता एवं जवाबदेही
    13मीडिया स्वायत्तता समूहप्रेस स्वतंत्रता, सरकारी मीडिया की जवाबदेही
    14वकील समूहविविध कारण
    15व्यक्तिगत याचिकाकर्तास्वतंत्र कार्यकर्ता व्यक्ति

    2.7 न्यायिक सक्रियता की आशंकाएँ — Upendra Baxi के 6 भय

    भय का प्रकारविवरण
    1. वैचारिक भय (Ideological)क्या वे विधायिका, कार्यपालिका या अन्य स्वायत्त संस्थाओं की शक्तियाँ हड़प रहे हैं?
    2. ज्ञान संबंधी भय (Epistemic)क्या उनके पास आर्थिक, वैज्ञानिक मामलों में पर्याप्त विशेषज्ञता है?
    3. प्रबंधन भय (Management)क्या PIL का बढ़ता बोझ पहले से भारी लंबित मामलों को और बढ़ाएगा?
    4. वैधता भय (Legitimation)यदि कार्यपालिका SC के PIL आदेशों को नज़रअंदाज करे तो जनता का विश्वास घटेगा
    5. लोकतांत्रिक भय (Democratic)क्या PIL की बाढ़ लोकतंत्र को पोषित करती है या कमजोर करती है?
    6. जीवनी भय (Biographic)सेवानिवृत्ति के बाद प्रतिष्ठा की चिंता में न्यायाधीश PIL का अति प्रयोग न करे

    2.8 न्यायिक सक्रियता बनाम न्यायिक संयम

    दिसंबर 2007 में सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक निर्णय में न्यायिक संयम का आह्वान किया:

    "

    Judicial activism must not become judicial adventurism. We are repeatedly coming across cases where judges are unjustifiably trying to perform executive or legislative functions. This is clearly unconstitutional. In the name of judicial activism, judges cannot cross their limits. — सर्वोच्च न्यायालय की पीठ — दिसंबर 2007

    न्यायिक संयम के सिद्धांत (SC 2007)
    न्यायाधीशों को अपनी सीमाएँ जाननी चाहिए; सरकार चलाने की कोशिश नहींशक्ति पृथक्करण सिद्धांत
    न्यायिक सक्रियता → न्यायिक साहसिकता नहीं बनना चाहिएसंयम की आवश्यकता
    प्रशासनिक प्राधिकरणों को परेशान नहीं करना — उन्हें प्रशासन का अनुभव हैविशेषज्ञता का सम्मान
    यदि विधायिका/कार्यपालिका ठीक से काम नहीं कर रहीं, तो जनता को चुनाव में ठीक करना चाहिएलोकतांत्रिक उपाय
    न्यायपालिका के पास विधायी/कार्यकारी कार्यों की विशेषज्ञता या संसाधन नहींव्यावहारिक सीमा

    📗 भाग-3: जनहित याचिका (Public Interest Litigation — PIL)

    3.1 उत्पत्ति एवं भारत में परिचय

    3.2 अर्थ एवं परिभाषा

    पारंपरिक नियम: केवल वही व्यक्ति न्यायालय जा सकता है जिसके अधिकार का उल्लंघन हुआ हो। PIL इस नियम का अपवाद है।

    SC की परिभाषा: PIL — "न्यायालय में आरंभ की गई वह कानूनी कार्यवाही जो जनहित या सामान्य हित के प्रवर्तन के लिए हो, जिसमें जनता या समुदाय के एक वर्ग का वित्तीय हित या कोई ऐसा हित हो जिससे उनके विधिक अधिकार या दायित्व प्रभावित हों।"

    3.3 PIL के वास्तविक उद्देश्य

    1. कानून के शासन की पुष्टि (Vindication of Rule of Law)

    2. समाज के कमजोर वर्गों के लिए न्याय तक प्रभावी पहुँच

    3. मूल अधिकारों की सार्थक प्राप्ति

    3.4 PIL की 9 विशेषताएँ

    क्र.विशेषता
    1PIL विधिक सहायता आंदोलन का रणनीतिक अस्त्र — गरीब वर्गों तक न्याय
    2PIL पारंपरिक मुकदमेबाजी से भिन्न — पारंपरिक विवाद में दो पक्ष होते हैं
    3PIL एक व्यक्ति के विरुद्ध अधिकार प्रवर्तन नहीं — सार्वजनिक हित का संवर्धन
    4PIL में बड़ी संख्या में गरीब, अज्ञ, वंचित लोगों के संवैधानिक/कानूनी अधिकार उल्लंघन को रेखांकित किया जाता है
    5PIL याचिकाकर्ता, राज्य और न्यायालय का सहकारी प्रयास है
    6PIL में सार्वजनिक क्षति, सार्वजनिक कर्तव्य, सामूहिक अधिकारों का निवारण
    7PIL में न्यायालय की भूमिका पारंपरिक से अधिक मुखर — रचनात्मक, सक्रिय
    8PIL में प्रक्रियागत लचीलापन — परंतु न्यायिक तंत्र की विशेषताएँ बनी रहती हैं
    9PIL में व्यक्तिगत अधिकारों का अधिनिर्णय नहीं — सामूहिक हित

    3.5 PIL का दायरा — क्या स्वीकार्य, क्या नहीं

    1988 में SC ने PIL हेतु दिशा-निर्देश बनाए (1993 एवं 2003 में संशोधित)। इन श्रेणियों में याचिकाएँ PIL के रूप में स्वीकार्य:

    क्र.PIL के रूप में स्वीकार्य श्रेणियाँ
    1बंधुआ मजदूर मामले
    2उपेक्षित बच्चे
    3श्रमिकों को न्यूनतम मजदूरी न देना; श्रम कानून उल्लंघन (व्यक्तिगत मामले छोड़कर)
    4जेलों से — उत्पीड़न, असमय रिहाई, मृत्यु, स्थानांतरण, त्वरित सुनवाई हेतु
    5पुलिस द्वारा मामला दर्ज न करना, उत्पीड़न, हिरासत में मृत्यु
    6महिलाओं पर अत्याचार — बहू उत्पीड़न, जलाना, बलात्कार, हत्या, अपहरण
    7SC/ST एवं आर्थिक रूप से पिछड़ों पर उत्पीड़न
    8पर्यावरण प्रदूषण, पारिस्थितिकी असंतुलन, नशीले पदार्थ, मिलावट, विरासत, वन एवं वन्यजीव
    9दंगा पीड़ित
    10पारिवारिक पेंशन

    निम्नलिखित श्रेणियों में PIL स्वीकार नहीं होगी:

    क्र.PIL के रूप में अस्वीकार्य श्रेणियाँ
    1मकान मालिक-किराएदार विवाद
    2सेवा संबंधी मामले और पेंशन/ग्रेच्युटी
    3केंद्र/राज्य सरकार विभागों/स्थानीय निकायों के विरुद्ध शिकायत (जब तक उपरोक्त 1-10 श्रेणी में न हो)
    4चिकित्सा एवं शिक्षण संस्थाओं में प्रवेश
    5HC/अधीनस्थ न्यायालयों में लंबित मामलों की शीघ्र सुनवाई हेतु

    3.6 PIL के 12 सिद्धांत (SC द्वारा Guruvayur Devaswom case 2003 में)

    क्र.सिद्धांत (संक्षेप)
    1अनुच्छेद 32/226 के तहत न्यायालय वंचित वर्गों की ओर से याचिका सुन सकता है
    2सार्वजनिक महत्व के मामले में पत्र/तार को भी PIL माना जा सकता है; प्रक्रियागत शिथिलता
    3बड़ी संख्या में अन्याय पर न्यायालय अनुच्छेद 14 एवं 21 सहित अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार कन्वेंशन लागू करेगा
    4Locus standi शिथिल — वंचित, निरक्षर, दिव्यांग की ओर से PIL सुनी जाएगी
    5वंचित वर्ग के संवैधानिक अधिकार उल्लंघन पर सरकार याचिका की ग्राह्यता पर प्रश्न नहीं उठा सकती
    6Res Judicata का सिद्धांत: मामले की प्रकृति एवं परिस्थितियों पर निर्भर
    7दो निजी पक्षों का विशुद्ध निजी कानूनी विवाद PIL नहीं
    8कभी-कभी व्यक्तिगत हित से आरंभ याचिका भी जनहित में बदल सकती है
    9न्यायालय आयोग/निकाय नियुक्त कर जाँच करा सकता है
    10न्यायालय सामान्यतः नीति-निर्माण में नहीं घुसेगा; JR की ज्ञात सीमाओं से बाहर नहीं जाएगा
    11न्यायालय सार्वजनिक संस्था का प्रबंधन आयोग को सौंप सकता है
    12HC सामान्यतः विधि/नियम की संवैधानिकता पर PIL में नहीं जाएगा

    3.7 PIL के दिशा-निर्देश — दुरुपयोग रोकने के लिए (SC)

    SC ने चेताया: PIL "Publicity Interest Litigation" / "Politics Interest Litigation" / "Private Interest Litigation" / "Paisa Interest Litigation" / "Middle-class Interest Litigation (MIL)" नहीं बनना चाहिए।

    3.8 ऐतिहासिक PIL वाद (भारत)

    PIL वादविषयमहत्व
    Hussainara Khatoon vs State of Bihar (1979)बिहार जेलों में विचाराधीन कैदियों की दशापहला PIL — त्वरित सुनवाई का अधिकार
    Vishaka vs State of Rajasthan (1997)कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़नVishaka Guidelines जारी; बाद में POSH Act 2013
    M.C. Mehta vs Union of India (1986+)गंगा प्रदूषण, ताज महल प्रदूषण, CNG बसेंपर्यावरण PIL का युग
    PUCL vs Union of India (2001)भूख से मृत्यु — मध्याह्न भोजन अधिकारमध्याह्न भोजन योजना लागू
    Vineet Narain vs Union of India (1997)CBI की स्वायत्तताCBI हस्तक्षेप से मुक्त — "Caged Parrot"
    Aruna Shanbaug case (2011)Passive Euthanasiaनैतिक जीवन-मृत्यु प्रश्न पर SC का निर्देश
    Electoral Bonds PIL (2024)चुनावी बॉन्ड की संवैधानिकताSC ने असंवैधानिक घोषित; RTI प्रभावी
    Suo Motu PIL — COVID-19 (2021)ऑक्सीजन, वैक्सीन वितरणमहामारी में न्यायपालिका की सक्रिय भूमिका

    3.9 समसामयिक परिदृश्य — PIL एवं न्यायिक सक्रियता 2023-25

    🎯 Mains विश्लेषण

    🎯 न्यायिक पुनरावलोकन — संसदीय सर्वोच्चता का नियंत्रण या लोकतंत्र का रक्षक? (Mains विश्लेषण)
    🎯 न्यायिक सक्रियता बनाम न्यायिक संयम — भारतीय लोकतंत्र के लिए क्या उचित? (Mains विश्लेषण)
    🎯 PIL — न्याय का लोकतंत्रीकरण या "Publicity Interest Litigation"? (Mains विश्लेषण)
    🎯 नवीं अनुसूची — सुरक्षा कवच या असंवैधानिकता की ढाल? (Mains विश्लेषण)

    ★ परीक्षा में अवश्य पूछे जाने वाले तथ्य ★

    1. न्यायिक पुनरावलोकन की उत्पत्ति: USA — Marbury vs Madison (1803) — Chief Justice John Marshall 2. भारत में JR संविधान प्रदत्त है; SC ने इसे "मूल संरचना" का अंग घोषित किया — संशोधन से भी समाप्त नहीं 3. JR की 3 श्रेणियाँ: (1) संवैधानिक संशोधन; (2) संसद/विधानमंडल के विधान; (3) प्रशासनिक कार्य 4. JR के 3 आधार: (1) मूल अधिकार उल्लंघन; (2) सक्षमता से बाहर; (3) संविधान-विरुद्ध 5. भारत: "Procedure Established by Law"; अमेरिका: "Due Process of Law" — Maneka Gandhi (1978) के बाद भारत का दायरा बढ़ा 6. JR के 16 संवैधानिक प्रावधान: अनुच्छेद 13, 32, 131-136, 143, 226, 227, 245, 246, 251, 254, 372 7. नवीं अनुसूची: अनुच्छेद 31B; 1st संशोधन 1951 द्वारा; मूल 13 प्रविष्टियाँ; वर्तमान 282 8. 24 अप्रैल 1973 = Kesavananda Bharati निर्णय तिथि — नवीं अनुसूची का Watershed 9. I.R. Coelho (2007): नवीं अनुसूची को JR से पूर्ण छूट नहीं; "Rights Test" + "Essence of Right Test" 10. "न्यायिक सक्रियता" शब्द: Arthur Schlesinger Jr. ने 1947 में "Fortune" पत्रिका में गढ़ा 11. भारत में न्यायिक सक्रियता के प्रणेता: VR Krishna Iyer, PN Bhagwati, O. Chinnappa Reddy, DA Desai (1970s) 12. न्यायिक सक्रियता = "Judicial Dynamism"; विलोम = "Judicial Restraint" 13. Upendra Baxi: सक्रियकर्ताओं की 15 श्रेणियाँ + 6 प्रकार के भय 14. SC 2007: "Judicial activism must not become judicial adventurism" 15. PIL की उत्पत्ति: USA 1960s; भारत में 1980s; प्रणेता: VR Krishna Iyer, PN Bhagwati 16. PIL के अन्य नाम: SAL (Social Action Litigation), SIL, CAL 17. PIL = Locus Standi का उदारीकरण; पारंपरिक नियम: केवल पीड़ित ही न्यायालय जा सकता था 18. SC PIL दिशा-निर्देश: 1988 में बनाए, 1993 एवं 2003 में संशोधित 19. पहली PIL: Hussainara Khatoon vs State of Bihar (1979) — विचाराधीन कैदी 20. Electoral Bonds PIL (2024): SC ने असंवैधानिक घोषित — PIL की शक्ति का समकालीन उदाहरण 21. SUPACE: SC का AI-सहायक शोध पोर्टल; Livestreaming — न्यायपालिका का लोकतंत्रीकरण 22. PIL दुरुपयोग रोकने हेतु SC: अनुकरणीय जुर्माना + याचिकाकर्ता की विश्वसनीयता जाँच

    📝 पिछले वर्षों के प्रश्न (PYQs) 📝

    Q1. न्यायिक पुनरावलोकन की अवधारणा किस देश से ली गई है और किस प्रसिद्ध वाद में इसे प्रतिपादित किया गया? — अमेरिका; Marbury vs Madison (1803), John Marshall Q2. न्यायिक पुनरावलोकन किसका अंग है? — मूल संरचना (Basic Structure) का Q3. नवीं अनुसूची कब जोड़ी गई? — प्रथम संशोधन 1951 द्वारा Q4. I.R. Coelho वाद (2007) किससे संबंधित है? — नवीं अनुसूची की न्यायिक समीक्षा Q5. "न्यायिक सक्रियता" शब्द किसने और कब गढ़ा? — Arthur Schlesinger Jr., 1947 (Fortune पत्रिका) Q6. भारत में न्यायिक सक्रियता के प्रणेता न्यायाधीशों के नाम बताइए — VR Krishna Iyer, PN Bhagwati, O. Chinnappa Reddy, DA Desai Q7. जनहित याचिका (PIL) भारत में कब प्रारंभ हुई? — 1980 के दशक के प्रारंभ में Q8. PIL में Locus Standi के नियम में क्या परिवर्तन हुआ? — शिथिल हुआ — कोई भी लोकहित भावना से याचिका दायर कर सकता है] Q9. Vishaka Guidelines किस PIL से निकले? — Vishaka vs State of Rajasthan (1997) Q10. PIL के लिए SC ने दिशा-निर्देश कब जारी किए? — 1988 में (1993 एवं 2003 में संशोधित) Q11. "Procedure Established by Law" (भारत) एवं "Due Process of Law" (अमेरिका) में अंतर बताइए — भारत में केवल पदार्थगत जाँच; अमेरिका में प्रक्रियागत भी; Maneka Gandhi (1978) ने भारत का दायरा बढ़ाया Q12. PIL को "Publicity Interest Litigation" बनने से रोकने के लिए SC ने क्या किया? — अनुकरणीय जुर्माना, याचिकाकर्ता की विश्वसनीयता जाँच, स्पष्ट दिशा-निर्देश

    📅 कालरेखा — न्यायिक पुनरावलोकन, सक्रियता एवं PIL

    वर्ष/वादविषय
    1803Marbury vs Madison — USA; John Marshall; JR की उत्पत्ति
    1947Arthur Schlesinger Jr. — "Judicial Activism" शब्द गढ़ा (Fortune पत्रिका)
    1951प्रथम संशोधन — अनुच्छेद 31B + नवीं अनुसूची (13 प्रविष्टियाँ)
    1967Golaknath vs State of Punjab — संसद मूल अधिकार नहीं बदल सकती (बाद में पलटा)
    1970Bank Nationalisation + Privy Purses — JR के प्रमुख उदाहरण
    1973 (24 अप्रैल)Kesavananda Bharati — मूल संरचना; नवीं अनुसूची का Watershed Date
    1975Indira Gandhi vs Raj Narain — चुनाव भ्रष्टाचार; 39वें संशोधन पर JR
    1978Maneka Gandhi — Art 21 का विस्तार; "Just, Fair and Reasonable Procedure"
    1979Hussainara Khatoon — पहली PIL (बिहार जेल, त्वरित सुनवाई)
    1980Minerva Mills — मूल संरचना का विस्तार; JR को कमजोर करने वाला संशोधन रद्द
    1980Waman Rao — नवीं अनुसूची; 24 अप्रैल 1973 के बाद की प्रविष्टियाँ JR के अधीन
    1986M.C. Mehta PIL — पर्यावरण संरक्षण; गंगा, ताज महल
    1988SC ने PIL हेतु प्रथम दिशा-निर्देश जारी किए (1993, 2003 में संशोधित)
    1993 (संशोधन)PIL दिशा-निर्देश संशोधित
    1997Vishaka Guidelines (कार्यस्थल उत्पीड़न) + Vineet Narain (CBI स्वायत्तता)
    2001PUCL PIL — मध्याह्न भोजन योजना लागू
    2003 (संशोधन)PIL दिशा-निर्देश पुनः संशोधित; Guruvayur Devaswom PIL — 12 सिद्धांत
    2007I.R. Coelho — नवीं अनुसूची; "Rights Test" + "Essence of Right Test"
    दिसंबर 2007SC: "Judicial activism must not become judicial adventurism" — न्यायिक संयम का आह्वान
    2013POSH Act — Vishaka PIL का विधायी परिणाम
    2015SC ने NJAC (99वाँ संशोधन) असंवैधानिक घोषित — JR की शक्ति का आधुनिक उदाहरण
    2024Electoral Bonds PIL — SC ने असंवैधानिक घोषित; समसामयिक PIL
    2024-25Bulldozer Justice PIL — अनुच्छेद 21 का रक्षक
    अनुच्छेद 13मूल अधिकारों से असंगत कानून शून्य — JR का मूल आधार
    अनुच्छेद 32रिट याचिका — SC में सीधे; "संविधान की आत्मा"
    अनुच्छेद 226HC — रिट शक्ति (SC से व्यापक)
    अनुच्छेद 31Bनवीं अनुसूची को संरक्षण
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