न्यायिक पुनरावलोकन, न्यायिक सक्रियता एवं जनहित याचिका — ये तीनों अवधारणाएँ भारतीय लोकतंत्र में न्यायपालिका की सक्रिय एवं रचनात्मक भूमिका को परिभाषित करती हैं। संविधान की सर्वोच्चता, मूल अधिकारों की रक्षा और सामाजिक न्याय की प्राप्ति इन तीनों का साझा लक्ष्य है।
📗 भाग-1: न्यायिक पुनरावलोकन (Judicial Review)
न्यायिक पुनरावलोकन न्यायपालिका की वह शक्ति है जिसके द्वारा वह केंद्र व राज्य सरकारों के विधायी अधिनियमों एवं कार्यकारी आदेशों की संवैधानिकता की जाँच करती है। संविधान-विरुद्ध पाए जाने पर वे अवैध, असंवैधानिक एवं शून्य (Null and Void) घोषित किए जाते हैं।
"
Our constitution contains express provisions for judicial review of legislation as to its conformity with the constitution. This is especially true as regards the Fundamental Rights, to which the court has been assigned the role of sentinel on the qui vive. — मुख्य न्यायाधीश पतंजलि शास्त्री — State of Madras vs V.G. Row (1952)
"
As long as some Fundamental Rights exist and are a part of the Constitution, the power of judicial review has also to be exercised with a view to see that the guarantees afforded by these Rights are not contravened. — न्यायमूर्ति खन्ना — Kesavananda Bharati vs State of Kerala (1973)
"
It is the function of the Judges, nay their duty, to pronounce upon the validity of laws. If courts are totally deprived of that power, the Fundamental Rights conferred on the people will become a mere adornment because rights without remedies are as writ in water. — मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ — Minerva Mills vs Union of India (1980)
| अनुच्छेद | विषय | महत्व |
|---|---|---|
| अनुच्छेद 13 | मूल अधिकारों से असंगत कानून शून्य | सर्वाधिक महत्वपूर्ण — JR का आधार |
| अनुच्छेद 32 | मूल अधिकार प्रवर्तन हेतु SC में याचिका; रिट जारी करने की शक्ति | मूल अधिकारों की "आत्मा" |
| अनुच्छेद 131 | केंद्र-राज्य विवाद: SC का मूल क्षेत्राधिकार | संघीय JR का आधार |
| अनुच्छेद 132 | संवैधानिक मामलों में SC का अपीलीय क्षेत्राधिकार | संवैधानिक JR |
| अनुच्छेद 133 | दीवानी मामलों में SC का अपीलीय क्षेत्राधिकार | दीवानी JR |
| अनुच्छेद 134 | आपराधिक मामलों में SC का अपीलीय क्षेत्राधिकार | आपराधिक JR |
| अनुच्छेद 136 | Special Leave to Appeal (SLP) | व्यापक JR शक्ति |
| अनुच्छेद 143 | राष्ट्रपति SC से राय माँग सकता है | परामर्शदायी JR |
| अनुच्छेद 226 | HC द्वारा रिट जारी करने की शक्ति | HC स्तर पर JR |
| अनुच्छेद 227 | HC का अधीनस्थ न्यायालयों पर पर्यवेक्षण | प्रशासनिक JR |
| अनुच्छेद 245 | संसद/विधानमंडल की विधायी सीमा (क्षेत्रीय) | JR का दायरा तय |
| अनुच्छेद 246 | संघ सूची/राज्य सूची/समवर्ती सूची | JR का विधायी आधार |
| अनुच्छेद 251, 254 | केंद्रीय कानून बनाम राज्य कानून — टकराव में केंद्र प्रभावी | JR का संघीय पक्ष |
| अनुच्छेद 372 | पूर्व-संविधान कानूनों का अस्तित्व में बने रहना | पूर्व-कानूनों पर JR |
विधायी अधिनियम या कार्यकारी आदेश की संवैधानिक वैधता को निम्न 3 आधारों पर चुनौती दी जा सकती है:
Maneka Gandhi Case (1978): इस ऐतिहासिक निर्णय के बाद भारत में भी "Procedure Established by Law" का अर्थ विस्तृत हुआ — अब प्रक्रिया "just, fair and reasonable" होनी चाहिए। इससे भारत और अमेरिका के दृष्टिकोण में अंतर कम हुआ।
| वाद | वर्ष | मुख्य निर्णय |
|---|---|---|
| Kesavananda Bharati vs State of Kerala | 1973 | नवीं अनुसूची के अधिनियम मूल संरचना उल्लंघन के आधार पर चुनौती योग्य; 24 अप्रैल 1973 watershed तिथि |
| Waman Rao vs Union of India | 1980 | 24 अप्रैल 1973 के बाद नवीं अनुसूची में शामिल कानून वैध केवल यदि मूल संरचना को क्षति न पहुँचाएँ |
| I.R. Coelho vs State of Tamil Nadu | 2007 | नवीं अनुसूची को JR से पूर्ण छूट नहीं; JR स्वयं मूल संरचना का अंग; "Rights Test" + "Essence of Right Test" लागू |
| Indira Nehru Gandhi vs Raj Narain | 1975 | प्रत्येक नए संशोधन की वैधता उसके अपने गुणों पर आँकी जाएगी |
| M. Nagaraj vs Union of India | 2006 | "Essence of Right Test" — Nagaraj case में स्थापित |
24 अप्रैल 1973 — Watershed Date: Kesavananda Bharati निर्णय की तिथि। इसके बाद नवीं अनुसूची में शामिल अधिनियम अनुच्छेद 21 (अनुच्छेद 14 और 19 सहित पठित) की कसौटी पर जाँचे जाएँगे। पूर्व की 66 प्रविष्टियाँ (1-66) चुनौती से मुक्त; परंतु बाद की (67-282) चुनौती योग्य।
| संशोधन | वर्ष | शामिल प्रविष्टियाँ | 24 अप्रैल 1973 से |
|---|---|---|---|
| प्रथम | 1951 | 1-13 (13 कानून) | पूर्व — चुनौती से मुक्त |
| चतुर्थ | 1955 | 14-20 (7 कानून) | पूर्व — चुनौती से मुक्त |
| सातवाँ | 1964 | 21-64 (44 कानून) | पूर्व — चुनौती से मुक्त |
| उनतीसवाँ | 1972 | 65-66 (2 कानून) | पूर्व — चुनौती से मुक्त |
| चौंतीसवाँ | 1974 | 67-86 (20 कानून) | पश्चात — JR के अधीन |
| उनतालीसवाँ | 1975 | 87-124 (38 कानून) | पश्चात — JR के अधीन |
| चालीसवाँ | 1976 | 125-188 (64 कानून) | पश्चात — JR के अधीन |
| छियासठवाँ | 1990 | 203-257 (55 कानून) | पश्चात — JR के अधीन |
| अठहत्तरवाँ | 1995 | 258-284 (27 कानून) | पश्चात — JR के अधीन |
📗 भाग-2: न्यायिक सक्रियता (Judicial Activism)
► न्यायमूर्ति V.R. Krishna Iyer
► न्यायमूर्ति P.N. Bhagwati
► न्यायमूर्ति O. Chinnappa Reddy
► न्यायमूर्ति D.A. Desai
विभिन्न विद्वानों ने न्यायिक सक्रियता को निम्न प्रकार परिभाषित किया है:
| स्रोत | परिभाषा |
|---|---|
| Black's Law Dictionary | न्यायिक सक्रियता न्यायिक शक्ति के प्रयोग का वह तरीका है जो न्यायाधीशों को सामान्य न्यायिक नज़ीर से हटकर प्रगतिशील सामाजिक नीतियों की ओर प्रेरित करता है। |
| Merriam Webster | न्यायिक सक्रियता — स्थापित नज़ीर से अलग होकर व्यक्तिगत अधिकारों की रक्षा एवं विस्तार की न्यायपालिका की प्रवृत्ति। |
| V.G. Palishikar (1998) | न्यायिक सक्रियता न्यायाधीशों द्वारा कानून-निर्माण की प्रक्रिया है — मौजूदा विधान की सक्रिय व्याख्या, सामाजिक उन्नति के लिए। |
| P.B. Sawant | न्यायिक सक्रियता नए सिद्धांत, अवधारणाएँ, सूत्र एवं राहत विकसित करने की प्रक्रिया है — न्याय करने के लिए या याचिकाकर्ता की स्थिति विस्तृत करने के लिए। |
प्रख्यात विधिशास्त्री उपेंद्र बाक्षी ने न्यायिक सक्रियता को प्रेरित करने वाले सामाजिक/मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की 15 श्रेणियाँ बताई हैं:
| क्र. | श्रेणी | मुख्य मुद्दे |
|---|---|---|
| 1 | नागरिक अधिकार कार्यकर्ता | नागरिक एवं राजनीतिक अधिकार |
| 2 | जन अधिकार कार्यकर्ता | सामाजिक-आर्थिक अधिकार; राज्य दमन विरोध |
| 3 | उपभोक्ता अधिकार समूह | उपभोक्ता सुरक्षा, राजनीतिक-आर्थिक जवाबदेही |
| 4 | बंधुआ मजदूर समूह | मजदूरी दासता का उन्मूलन |
| 5 | पर्यावरण कार्यकर्ता | प्रदूषण, पारिस्थितिकी असंतुलन |
| 6 | बड़ी सिंचाई परियोजना विरोधी | मेगा परियोजनाओं से विस्थापन |
| 7 | बाल अधिकार समूह | बाल श्रम, शिक्षा का अधिकार, जेल में किशोर |
| 8 | अभिरक्षा अधिकार समूह | कैदियों के अधिकार, निवारक निरोध |
| 9 | गरीबी अधिकार समूह | अकाल राहत, शहरी वंचित |
| 10 | स्वदेशी जन अधिकार समूह | वनवासी, 5वीं-6वीं अनुसूची के लोग |
| 11 | महिला अधिकार समूह | लैंगिक समानता, बलात्कार, दहेज हत्या |
| 12 | बार आधारित समूह | न्यायपालिका की स्वायत्तता एवं जवाबदेही |
| 13 | मीडिया स्वायत्तता समूह | प्रेस स्वतंत्रता, सरकारी मीडिया की जवाबदेही |
| 14 | वकील समूह | विविध कारण |
| 15 | व्यक्तिगत याचिकाकर्ता | स्वतंत्र कार्यकर्ता व्यक्ति |
| भय का प्रकार | विवरण |
|---|---|
| 1. वैचारिक भय (Ideological) | क्या वे विधायिका, कार्यपालिका या अन्य स्वायत्त संस्थाओं की शक्तियाँ हड़प रहे हैं? |
| 2. ज्ञान संबंधी भय (Epistemic) | क्या उनके पास आर्थिक, वैज्ञानिक मामलों में पर्याप्त विशेषज्ञता है? |
| 3. प्रबंधन भय (Management) | क्या PIL का बढ़ता बोझ पहले से भारी लंबित मामलों को और बढ़ाएगा? |
| 4. वैधता भय (Legitimation) | यदि कार्यपालिका SC के PIL आदेशों को नज़रअंदाज करे तो जनता का विश्वास घटेगा |
| 5. लोकतांत्रिक भय (Democratic) | क्या PIL की बाढ़ लोकतंत्र को पोषित करती है या कमजोर करती है? |
| 6. जीवनी भय (Biographic) | सेवानिवृत्ति के बाद प्रतिष्ठा की चिंता में न्यायाधीश PIL का अति प्रयोग न करे |
दिसंबर 2007 में सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक निर्णय में न्यायिक संयम का आह्वान किया:
"
Judicial activism must not become judicial adventurism. We are repeatedly coming across cases where judges are unjustifiably trying to perform executive or legislative functions. This is clearly unconstitutional. In the name of judicial activism, judges cannot cross their limits. — सर्वोच्च न्यायालय की पीठ — दिसंबर 2007
| न्यायिक संयम के सिद्धांत (SC 2007) | |
|---|---|
| न्यायाधीशों को अपनी सीमाएँ जाननी चाहिए; सरकार चलाने की कोशिश नहीं | शक्ति पृथक्करण सिद्धांत |
| न्यायिक सक्रियता → न्यायिक साहसिकता नहीं बनना चाहिए | संयम की आवश्यकता |
| प्रशासनिक प्राधिकरणों को परेशान नहीं करना — उन्हें प्रशासन का अनुभव है | विशेषज्ञता का सम्मान |
| यदि विधायिका/कार्यपालिका ठीक से काम नहीं कर रहीं, तो जनता को चुनाव में ठीक करना चाहिए | लोकतांत्रिक उपाय |
| न्यायपालिका के पास विधायी/कार्यकारी कार्यों की विशेषज्ञता या संसाधन नहीं | व्यावहारिक सीमा |
📗 भाग-3: जनहित याचिका (Public Interest Litigation — PIL)
पारंपरिक नियम: केवल वही व्यक्ति न्यायालय जा सकता है जिसके अधिकार का उल्लंघन हुआ हो। PIL इस नियम का अपवाद है।
SC की परिभाषा: PIL — "न्यायालय में आरंभ की गई वह कानूनी कार्यवाही जो जनहित या सामान्य हित के प्रवर्तन के लिए हो, जिसमें जनता या समुदाय के एक वर्ग का वित्तीय हित या कोई ऐसा हित हो जिससे उनके विधिक अधिकार या दायित्व प्रभावित हों।"
| क्र. | विशेषता |
|---|---|
| 1 | PIL विधिक सहायता आंदोलन का रणनीतिक अस्त्र — गरीब वर्गों तक न्याय |
| 2 | PIL पारंपरिक मुकदमेबाजी से भिन्न — पारंपरिक विवाद में दो पक्ष होते हैं |
| 3 | PIL एक व्यक्ति के विरुद्ध अधिकार प्रवर्तन नहीं — सार्वजनिक हित का संवर्धन |
| 4 | PIL में बड़ी संख्या में गरीब, अज्ञ, वंचित लोगों के संवैधानिक/कानूनी अधिकार उल्लंघन को रेखांकित किया जाता है |
| 5 | PIL याचिकाकर्ता, राज्य और न्यायालय का सहकारी प्रयास है |
| 6 | PIL में सार्वजनिक क्षति, सार्वजनिक कर्तव्य, सामूहिक अधिकारों का निवारण |
| 7 | PIL में न्यायालय की भूमिका पारंपरिक से अधिक मुखर — रचनात्मक, सक्रिय |
| 8 | PIL में प्रक्रियागत लचीलापन — परंतु न्यायिक तंत्र की विशेषताएँ बनी रहती हैं |
| 9 | PIL में व्यक्तिगत अधिकारों का अधिनिर्णय नहीं — सामूहिक हित |
1988 में SC ने PIL हेतु दिशा-निर्देश बनाए (1993 एवं 2003 में संशोधित)। इन श्रेणियों में याचिकाएँ PIL के रूप में स्वीकार्य:
| क्र. | PIL के रूप में स्वीकार्य श्रेणियाँ |
|---|---|
| 1 | बंधुआ मजदूर मामले |
| 2 | उपेक्षित बच्चे |
| 3 | श्रमिकों को न्यूनतम मजदूरी न देना; श्रम कानून उल्लंघन (व्यक्तिगत मामले छोड़कर) |
| 4 | जेलों से — उत्पीड़न, असमय रिहाई, मृत्यु, स्थानांतरण, त्वरित सुनवाई हेतु |
| 5 | पुलिस द्वारा मामला दर्ज न करना, उत्पीड़न, हिरासत में मृत्यु |
| 6 | महिलाओं पर अत्याचार — बहू उत्पीड़न, जलाना, बलात्कार, हत्या, अपहरण |
| 7 | SC/ST एवं आर्थिक रूप से पिछड़ों पर उत्पीड़न |
| 8 | पर्यावरण प्रदूषण, पारिस्थितिकी असंतुलन, नशीले पदार्थ, मिलावट, विरासत, वन एवं वन्यजीव |
| 9 | दंगा पीड़ित |
| 10 | पारिवारिक पेंशन |
निम्नलिखित श्रेणियों में PIL स्वीकार नहीं होगी:
| क्र. | PIL के रूप में अस्वीकार्य श्रेणियाँ |
|---|---|
| 1 | मकान मालिक-किराएदार विवाद |
| 2 | सेवा संबंधी मामले और पेंशन/ग्रेच्युटी |
| 3 | केंद्र/राज्य सरकार विभागों/स्थानीय निकायों के विरुद्ध शिकायत (जब तक उपरोक्त 1-10 श्रेणी में न हो) |
| 4 | चिकित्सा एवं शिक्षण संस्थाओं में प्रवेश |
| 5 | HC/अधीनस्थ न्यायालयों में लंबित मामलों की शीघ्र सुनवाई हेतु |
| क्र. | सिद्धांत (संक्षेप) |
|---|---|
| 1 | अनुच्छेद 32/226 के तहत न्यायालय वंचित वर्गों की ओर से याचिका सुन सकता है |
| 2 | सार्वजनिक महत्व के मामले में पत्र/तार को भी PIL माना जा सकता है; प्रक्रियागत शिथिलता |
| 3 | बड़ी संख्या में अन्याय पर न्यायालय अनुच्छेद 14 एवं 21 सहित अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार कन्वेंशन लागू करेगा |
| 4 | Locus standi शिथिल — वंचित, निरक्षर, दिव्यांग की ओर से PIL सुनी जाएगी |
| 5 | वंचित वर्ग के संवैधानिक अधिकार उल्लंघन पर सरकार याचिका की ग्राह्यता पर प्रश्न नहीं उठा सकती |
| 6 | Res Judicata का सिद्धांत: मामले की प्रकृति एवं परिस्थितियों पर निर्भर |
| 7 | दो निजी पक्षों का विशुद्ध निजी कानूनी विवाद PIL नहीं |
| 8 | कभी-कभी व्यक्तिगत हित से आरंभ याचिका भी जनहित में बदल सकती है |
| 9 | न्यायालय आयोग/निकाय नियुक्त कर जाँच करा सकता है |
| 10 | न्यायालय सामान्यतः नीति-निर्माण में नहीं घुसेगा; JR की ज्ञात सीमाओं से बाहर नहीं जाएगा |
| 11 | न्यायालय सार्वजनिक संस्था का प्रबंधन आयोग को सौंप सकता है |
| 12 | HC सामान्यतः विधि/नियम की संवैधानिकता पर PIL में नहीं जाएगा |
SC ने चेताया: PIL "Publicity Interest Litigation" / "Politics Interest Litigation" / "Private Interest Litigation" / "Paisa Interest Litigation" / "Middle-class Interest Litigation (MIL)" नहीं बनना चाहिए।
| PIL वाद | विषय | महत्व |
|---|---|---|
| Hussainara Khatoon vs State of Bihar (1979) | बिहार जेलों में विचाराधीन कैदियों की दशा | पहला PIL — त्वरित सुनवाई का अधिकार |
| Vishaka vs State of Rajasthan (1997) | कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न | Vishaka Guidelines जारी; बाद में POSH Act 2013 |
| M.C. Mehta vs Union of India (1986+) | गंगा प्रदूषण, ताज महल प्रदूषण, CNG बसें | पर्यावरण PIL का युग |
| PUCL vs Union of India (2001) | भूख से मृत्यु — मध्याह्न भोजन अधिकार | मध्याह्न भोजन योजना लागू |
| Vineet Narain vs Union of India (1997) | CBI की स्वायत्तता | CBI हस्तक्षेप से मुक्त — "Caged Parrot" |
| Aruna Shanbaug case (2011) | Passive Euthanasia | नैतिक जीवन-मृत्यु प्रश्न पर SC का निर्देश |
| Electoral Bonds PIL (2024) | चुनावी बॉन्ड की संवैधानिकता | SC ने असंवैधानिक घोषित; RTI प्रभावी |
| Suo Motu PIL — COVID-19 (2021) | ऑक्सीजन, वैक्सीन वितरण | महामारी में न्यायपालिका की सक्रिय भूमिका |
🎯 Mains विश्लेषण
1. न्यायिक पुनरावलोकन की उत्पत्ति: USA — Marbury vs Madison (1803) — Chief Justice John Marshall 2. भारत में JR संविधान प्रदत्त है; SC ने इसे "मूल संरचना" का अंग घोषित किया — संशोधन से भी समाप्त नहीं 3. JR की 3 श्रेणियाँ: (1) संवैधानिक संशोधन; (2) संसद/विधानमंडल के विधान; (3) प्रशासनिक कार्य 4. JR के 3 आधार: (1) मूल अधिकार उल्लंघन; (2) सक्षमता से बाहर; (3) संविधान-विरुद्ध 5. भारत: "Procedure Established by Law"; अमेरिका: "Due Process of Law" — Maneka Gandhi (1978) के बाद भारत का दायरा बढ़ा 6. JR के 16 संवैधानिक प्रावधान: अनुच्छेद 13, 32, 131-136, 143, 226, 227, 245, 246, 251, 254, 372 7. नवीं अनुसूची: अनुच्छेद 31B; 1st संशोधन 1951 द्वारा; मूल 13 प्रविष्टियाँ; वर्तमान 282 8. 24 अप्रैल 1973 = Kesavananda Bharati निर्णय तिथि — नवीं अनुसूची का Watershed 9. I.R. Coelho (2007): नवीं अनुसूची को JR से पूर्ण छूट नहीं; "Rights Test" + "Essence of Right Test" 10. "न्यायिक सक्रियता" शब्द: Arthur Schlesinger Jr. ने 1947 में "Fortune" पत्रिका में गढ़ा 11. भारत में न्यायिक सक्रियता के प्रणेता: VR Krishna Iyer, PN Bhagwati, O. Chinnappa Reddy, DA Desai (1970s) 12. न्यायिक सक्रियता = "Judicial Dynamism"; विलोम = "Judicial Restraint" 13. Upendra Baxi: सक्रियकर्ताओं की 15 श्रेणियाँ + 6 प्रकार के भय 14. SC 2007: "Judicial activism must not become judicial adventurism" 15. PIL की उत्पत्ति: USA 1960s; भारत में 1980s; प्रणेता: VR Krishna Iyer, PN Bhagwati 16. PIL के अन्य नाम: SAL (Social Action Litigation), SIL, CAL 17. PIL = Locus Standi का उदारीकरण; पारंपरिक नियम: केवल पीड़ित ही न्यायालय जा सकता था 18. SC PIL दिशा-निर्देश: 1988 में बनाए, 1993 एवं 2003 में संशोधित 19. पहली PIL: Hussainara Khatoon vs State of Bihar (1979) — विचाराधीन कैदी 20. Electoral Bonds PIL (2024): SC ने असंवैधानिक घोषित — PIL की शक्ति का समकालीन उदाहरण 21. SUPACE: SC का AI-सहायक शोध पोर्टल; Livestreaming — न्यायपालिका का लोकतंत्रीकरण 22. PIL दुरुपयोग रोकने हेतु SC: अनुकरणीय जुर्माना + याचिकाकर्ता की विश्वसनीयता जाँच
Q1. न्यायिक पुनरावलोकन की अवधारणा किस देश से ली गई है और किस प्रसिद्ध वाद में इसे प्रतिपादित किया गया? — अमेरिका; Marbury vs Madison (1803), John Marshall Q2. न्यायिक पुनरावलोकन किसका अंग है? — मूल संरचना (Basic Structure) का Q3. नवीं अनुसूची कब जोड़ी गई? — प्रथम संशोधन 1951 द्वारा Q4. I.R. Coelho वाद (2007) किससे संबंधित है? — नवीं अनुसूची की न्यायिक समीक्षा Q5. "न्यायिक सक्रियता" शब्द किसने और कब गढ़ा? — Arthur Schlesinger Jr., 1947 (Fortune पत्रिका) Q6. भारत में न्यायिक सक्रियता के प्रणेता न्यायाधीशों के नाम बताइए — VR Krishna Iyer, PN Bhagwati, O. Chinnappa Reddy, DA Desai Q7. जनहित याचिका (PIL) भारत में कब प्रारंभ हुई? — 1980 के दशक के प्रारंभ में Q8. PIL में Locus Standi के नियम में क्या परिवर्तन हुआ? — शिथिल हुआ — कोई भी लोकहित भावना से याचिका दायर कर सकता है] Q9. Vishaka Guidelines किस PIL से निकले? — Vishaka vs State of Rajasthan (1997) Q10. PIL के लिए SC ने दिशा-निर्देश कब जारी किए? — 1988 में (1993 एवं 2003 में संशोधित) Q11. "Procedure Established by Law" (भारत) एवं "Due Process of Law" (अमेरिका) में अंतर बताइए — भारत में केवल पदार्थगत जाँच; अमेरिका में प्रक्रियागत भी; Maneka Gandhi (1978) ने भारत का दायरा बढ़ाया Q12. PIL को "Publicity Interest Litigation" बनने से रोकने के लिए SC ने क्या किया? — अनुकरणीय जुर्माना, याचिकाकर्ता की विश्वसनीयता जाँच, स्पष्ट दिशा-निर्देश
| वर्ष/वाद | विषय |
|---|---|
| 1803 | Marbury vs Madison — USA; John Marshall; JR की उत्पत्ति |
| 1947 | Arthur Schlesinger Jr. — "Judicial Activism" शब्द गढ़ा (Fortune पत्रिका) |
| 1951 | प्रथम संशोधन — अनुच्छेद 31B + नवीं अनुसूची (13 प्रविष्टियाँ) |
| 1967 | Golaknath vs State of Punjab — संसद मूल अधिकार नहीं बदल सकती (बाद में पलटा) |
| 1970 | Bank Nationalisation + Privy Purses — JR के प्रमुख उदाहरण |
| 1973 (24 अप्रैल) | Kesavananda Bharati — मूल संरचना; नवीं अनुसूची का Watershed Date |
| 1975 | Indira Gandhi vs Raj Narain — चुनाव भ्रष्टाचार; 39वें संशोधन पर JR |
| 1978 | Maneka Gandhi — Art 21 का विस्तार; "Just, Fair and Reasonable Procedure" |
| 1979 | Hussainara Khatoon — पहली PIL (बिहार जेल, त्वरित सुनवाई) |
| 1980 | Minerva Mills — मूल संरचना का विस्तार; JR को कमजोर करने वाला संशोधन रद्द |
| 1980 | Waman Rao — नवीं अनुसूची; 24 अप्रैल 1973 के बाद की प्रविष्टियाँ JR के अधीन |
| 1986 | M.C. Mehta PIL — पर्यावरण संरक्षण; गंगा, ताज महल |
| 1988 | SC ने PIL हेतु प्रथम दिशा-निर्देश जारी किए (1993, 2003 में संशोधित) |
| 1993 (संशोधन) | PIL दिशा-निर्देश संशोधित |
| 1997 | Vishaka Guidelines (कार्यस्थल उत्पीड़न) + Vineet Narain (CBI स्वायत्तता) |
| 2001 | PUCL PIL — मध्याह्न भोजन योजना लागू |
| 2003 (संशोधन) | PIL दिशा-निर्देश पुनः संशोधित; Guruvayur Devaswom PIL — 12 सिद्धांत |
| 2007 | I.R. Coelho — नवीं अनुसूची; "Rights Test" + "Essence of Right Test" |
| दिसंबर 2007 | SC: "Judicial activism must not become judicial adventurism" — न्यायिक संयम का आह्वान |
| 2013 | POSH Act — Vishaka PIL का विधायी परिणाम |
| 2015 | SC ने NJAC (99वाँ संशोधन) असंवैधानिक घोषित — JR की शक्ति का आधुनिक उदाहरण |
| 2024 | Electoral Bonds PIL — SC ने असंवैधानिक घोषित; समसामयिक PIL |
| 2024-25 | Bulldozer Justice PIL — अनुच्छेद 21 का रक्षक |
| अनुच्छेद 13 | मूल अधिकारों से असंगत कानून शून्य — JR का मूल आधार |
| अनुच्छेद 32 | रिट याचिका — SC में सीधे; "संविधान की आत्मा" |
| अनुच्छेद 226 | HC — रिट शक्ति (SC से व्यापक) |
| अनुच्छेद 31B | नवीं अनुसूची को संरक्षण |