📈 अध्याय 8क — अर्थव्यवस्था

सामाजिक क्षेत्र (भाग 1) — गरीबी, भूख एवं रोज़गार

भारतीय अर्थव्यवस्था | मानव विकास, गरीबी, भूख एवं रोज़गार

🌅 कहानी से शुरुआत

📖 कहानी 1 — बाड़मेर की सुगना का एक साल

बाड़मेर ज़िले की एक ढाणी में रहने वाली सुगना (काल्पनिक) के घर में कभी दोनों समय चूल्हा नहीं जलता था। पति खेतिहर मज़दूर थे — बरसात हुई तो काम, नहीं हुई तो बेकारी। तीन बच्चों में सबसे छोटा बार-बार बीमार पड़ता, पर अस्पताल चालीस किलोमीटर दूर था और इलाज का पैसा साहूकार से उधार लेना पड़ता।

फिर बदलाव धीरे-धीरे आया। गाँव में राशन की दुकान से हर महीने मुफ़्त अनाज मिलने लगा। आंगनवाड़ी दीदी छोटे बेटे का वज़न तौलती, पोषण-आहार देती और टीकाकरण की तारीख़ याद दिलाती। सरकारी योजना से कच्चे घर की जगह पक्का मकान बना, आँगन में नल आया, और शौचालय भी।

सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब सुगना गाँव के स्वयं सहायता समूह से जुड़ी। हर हफ़्ते ₹50 की बचत, फिर समूह से छोटा ऋण, और उससे तीन बकरियाँ। आज वह बकरी-पालन और सिलाई से सालाना एक लाख रुपये से ऊपर कमाती है — सरकार की भाषा में वह “लखपति दीदी” है। बेटी गाँव के स्कूल में दसवीं में है और डॉक्टर बनना चाहती है।

सुगना को “बहुआयामी गरीबी” या “मानव पूँजी” जैसे शब्द नहीं पता। पर उसके घर की कहानी में वे सब हैं — भोजन, स्वास्थ्य, शिक्षा, आवास, रोज़गार और आत्मविश्वास। गरीबी केवल पैसे की कमी नहीं, अवसरों की कमी है; और विकास केवल आय बढ़ना नहीं, विकल्प बढ़ना है।

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📖 कहानी 2 — डिग्री है, नौकरी नहीं

जयपुर की एक किराए की कोठरी में राहुल (काल्पनिक) सुबह छह बजे उठकर अख़बार के नौकरी वाले पन्ने पलटता है। उसके पास स्नातक की डिग्री है, कंप्यूटर का प्रमाणपत्र भी, पर तीन साल से स्थायी नौकरी नहीं मिली। कभी डिलीवरी ऐप पर काम करता है, कभी किसी दुकान पर हिसाब लिखता है। आँकड़ों में वह शायद “बेरोज़गार” नहीं गिना जाता — क्योंकि वह कुछ घंटे काम तो करता ही है।

राहुल की बहन ने बारहवीं के बाद पढ़ाई छोड़ दी, क्योंकि कॉलेज दूर था। माँ घर और खेत दोनों सँभालती हैं, पर उनकी मेहनत किसी आँकड़े में “काम” नहीं गिनी जाती। पिता के पास न पेंशन है, न बीमा। एक बीमारी पूरे घर की बचत ख़त्म कर सकती है।

एक दिन राहुल को पता चलता है कि उसके ज़िले के सरकारी आईटीआई में तीन महीने का इलेक्ट्रीशियन व सोलर-तकनीशियन कोर्स मुफ़्त है, और साथ में प्रशिक्षुता का वज़ीफ़ा भी। कोर्स के बाद एक सौर कंपनी में उसे पक्का काम मिलता है — भविष्य निधि और स्वास्थ्य बीमा के साथ। डिग्री ने उसे पढ़ना सिखाया था, पर कौशल ने उसे रोज़गार दिलाया।

यह एक घर की कहानी नहीं — करोड़ों युवाओं की है। देश के पास दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी है; अगर उसे सही कौशल, रोज़गार, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा मिले तो यही आबादी भारत को विकसित बना सकती है, और न मिले तो यही सबसे बड़ी चुनौती बन सकती है।

🎯 इस भाग (अध्याय 8क) में हम इन्हीं दोनों कहानियों को खोलेंगे — मानव पूँजी और मानव विकास क्या है; जनसंख्या का लाभांश कैसे मिले; गरीबी कैसे मापी जाती है और कैसे घटी; भूख और पोषण की स्थिति; बेरोज़गारी के प्रकार, आँकड़े और श्रम सुधार; कौशल, ग्रामीण रोज़गार (मनरेगा से नए क़ानून तक) और आजीविका — और राजस्थान की तस्वीर। स्वास्थ्य, शिक्षा, कमज़ोर वर्गों की योजनाएँ और सामाजिक सुरक्षा की कहानी अगले भाग — अध्याय 8ख — में आगे बढ़ेगी।

📋 इस अध्याय में
  1. सामाजिक क्षेत्र एवं मानव पूँजी (Social Sector & Human Capital)
  2. मानव विकास एवं अन्य सामाजिक सूचकांक (Human Development & Other Indices)
  3. जनसंख्या एवं जनसांख्यिकीय लाभांश (Population & Demographic Dividend)
  4. गरीबी — अर्थ, प्रकार एवं गरीबी रेखा (Poverty — Meaning, Types & Poverty Line)
  5. गरीबी मापन — समितियाँ एवं आँकड़े (Poverty Estimation — Committees & Data)
  6. बहुआयामी गरीबी एवं असमानता (Multidimensional Poverty & Inequality)
  7. गरीबी के कारण, परिणाम एवं निवारण (Causes, Consequences & Poverty Alleviation)
  8. भूख, पोषण एवं खाद्य सुरक्षा (Hunger, Nutrition & Food Security)
  9. बेरोज़गारी — अवधारणा, प्रकार एवं मापन (Unemployment — Concept, Types & Measurement)
  10. रोज़गार की वर्तमान स्थिति — आँकड़े, कारण एवं समाधान (Employment Situation — Data, Causes & Way Forward)
  11. महिला श्रम, असंगठित एवं गिग श्रमिक तथा श्रम संहिताएँ (Women Workforce, Unorganised & Gig Workers, Labour Codes)
  12. कौशल विकास एवं स्वरोज़गार (Skilling & Self-Employment)
  13. ग्रामीण रोज़गार — मनरेगा से वीबी-जी राम जी तक (Rural Employment — MGNREGA to VB-G RAM G)
  14. ग्रामीण विकास एवं आजीविका (Rural Development & Livelihoods)
  15. संतुलित मूल्यांकन (Balanced Assessment)
  16. राजस्थान से जुड़ाव (Rajasthan Linkages)
  17. प्रमुख व्यक्तित्व (Key Personalities)
  18. विस्तृत कालक्रम (Detailed Timeline)
  19. शब्दकोश — ज़रूरी शब्द (Glossary)
  20. अध्याय एक नज़र में (Chapter at a Glance)

1. सामाजिक क्षेत्र एवं मानव पूँजी (Social Sector & Human Capital)

दो गाँवों की कल्पना कीजिए। पहले गाँव में बड़ी-बड़ी सड़कें और कारख़ाने हैं, पर बच्चे कुपोषित हैं और स्कूल में शिक्षक नहीं आते। दूसरे गाँव में कारख़ाने कम हैं, पर हर बच्चा स्कूल जाता है, टीके लगे हैं और माताएँ स्वस्थ हैं। बीस साल बाद कौन-सा गाँव आगे होगा? लगभग हर अर्थशास्त्री कहेगा — दूसरा, क्योंकि उसने अपनी सबसे बड़ी पूँजी, यानी अपने लोगों, में निवेश किया है।

मशीनें, सड़कें और बिजलीघर तभी काम आते हैं जब उन्हें चलाने वाले लोग स्वस्थ, शिक्षित और कुशल हों। लोगों की इस क्षमता को बढ़ाने वाले सभी क्षेत्र मिलकर सामाजिक क्षेत्र (Social Sector) कहलाते हैं — इसमें शिक्षा-खेल-संस्कृति, स्वास्थ्य-परिवार कल्याण, पेयजल-स्वच्छता, आवास, कमज़ोर वर्ग कल्याण, श्रम-सामाजिक सुरक्षा तथा पोषण-आपदा राहत शामिल हैं।

क. सामाजिक क्षेत्र क्या है?

📘 आसान परिभाषा: सामाजिक क्षेत्र (Social Sector)

📚 परिभाषा: अर्थव्यवस्था का वह भाग जो शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, पेयजल-स्वच्छता, आवास, रोज़गार, सामाजिक सुरक्षा तथा कमज़ोर वर्गों के कल्याण से जुड़ी सेवाएँ उपलब्ध कराता है, ताकि नागरिकों का जीवन-स्तर और उनकी क्षमताएँ बढ़ें।

✅ आसान भाषा में: जो काम सीधे इंसान को बेहतर बनाते हैं — उसे पढ़ाना, इलाज करना, पेट भरना, सिर पर छत देना और बुढ़ापे में सहारा देना — वे सब सामाजिक क्षेत्र में आते हैं। 🏠 उदाहरण: जैसे — सरकारी स्कूल, आयुष्मान आरोग्य मंदिर, आंगनवाड़ी, नल से जल, प्रधानमंत्री आवास और वृद्धावस्था पेंशन — ये सभी सामाजिक क्षेत्र के अंग हैं।

राज्य के नीति निदेशक तत्व इस क्षेत्र की नींव हैं — अनुच्छेद 38 (सामाजिक-आर्थिक न्याय), 39 (आजीविका, बच्चों का स्वस्थ विकास), 41 (काम, शिक्षा, बेरोज़गारी-बुढ़ापे में सहायता) तथा 46 (कमज़ोर वर्गों के हित)। अधिकतर विषय राज्य/समवर्ती सूची में हैं, इसलिए सबसे अधिक ख़र्च राज्य सरकारें करती हैं।

🏏 क्रिकेट की भाषा में — मानव पूँजी का निवेश

किसी अकादमी में 12 साल का एक लड़का आता है। अकादमी उसे अच्छा खाना, फ़िटनेस ट्रेनर, कोच और मैच खेलने के मौक़े देती है — पहले पाँच-छह साल कोई "कमाई" नहीं होती, सिर्फ़ ख़र्च होता है। पर जब वही लड़का देश के लिए खेलता है, तो वह सालों तक रन बनाता है, नए खिलाड़ियों को प्रेरित करता है और पूरी अकादमी का नाम रोशन करता है। बल्ला (भौतिक पूँजी) दो सीज़न में टूट जाता है, पर खिलाड़ी का कौशल (मानव पूँजी) हर मैच के साथ और निखरता है।

ख. मानव पूँजी — लोग भी "पूँजी" हैं

📘 आसान परिभाषा: मानव पूँजी (Human Capital)

📚 परिभाषा: शिक्षा, प्रशिक्षण, स्वास्थ्य और अनुभव के माध्यम से किसी व्यक्ति या जनसंख्या में संचित ज्ञान, कौशल, क्षमता और उत्तम स्वास्थ्य का भंडार, जो उत्पादन और आर्थिक मूल्य-सृजन में प्रत्यक्ष योगदान देता है।

✅ आसान भाषा में: जैसे पैसे लगाकर मशीन ख़रीदी जाती है और वह सालों तक उत्पादन करती है, वैसे ही पढ़ाई, इलाज और प्रशिक्षण पर किया गया ख़र्च इंसान को सालों तक ज़्यादा उत्पादक बनाता है — इसलिए यह ख़र्च नहीं, निवेश है। 🏠 उदाहरण: जैसे — गाँव की एक बच्ची आंगनवाड़ी में पोषण और सरकारी स्कूल में अच्छी पढ़ाई पाकर नर्स बनती है; उसे अच्छी आय मिलती है (निजी लाभ) और पूरे गाँव को स्वास्थ्य सेवा (सामाजिक लाभ)।

"मानव पूँजी" शब्द को थियोडोर शुल्ज़ ने 1960 में लोकप्रिय बनाया (शिक्षा-स्वास्थ्य पर ख़र्च = "मनुष्य में निवेश") और गैरी बेकर ने 1964 में इसे सिद्धांत का रूप दिया; दोनों को नोबेल मिला (1979 व 1992)। इसके साधन हैं — शिक्षा, स्वास्थ्य, कार्य-स्थल प्रशिक्षण, प्रवास और सूचना।

🏗️ भौतिक पूँजी (Physical Capital)

🧠 मानव पूँजी (Human Capital)

◆ मूर्त (Tangible) — मशीन, भवन, सड़क; देखी-छुई जा सकती है

◆ मालिक से अलग की जा सकती है — बेची, ख़रीदी, हस्तांतरित की जा सकती है

◆ उपयोग से घिसती है — मूल्यह्रास (Depreciation) होता है

◆ लाभ मुख्यतः मालिक को (निजी लाभ)

◆ निर्णय अपेक्षित प्रतिफल और तकनीकी ज्ञान पर आधारित

◆ अमूर्त (Intangible) — ज्ञान, कौशल, स्वास्थ्य; व्यक्ति के भीतर रहती है

◆ व्यक्ति से अविभाज्य — केवल उसकी सेवाएँ बेची जा सकती हैं, स्वयं पूँजी नहीं

◆ उपयोग और अनुभव से और समृद्ध होती है

◆ निजी + सामाजिक दोनों लाभ — व्यक्ति की आय + देश का विकास

◆ शिक्षा-स्वास्थ्य में दीर्घकालिक निवेश से बनती है

ग. सामाजिक अवसंरचना (Social Infrastructure)

📘 आसान परिभाषा: सामाजिक अवसंरचना (Social Infrastructure)

📚 परिभाषा: वे भौतिक सुविधाएँ और संस्थाएँ जिनके माध्यम से सामाजिक सेवाएँ — शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, पेयजल, स्वच्छता — जनता तक पहुँचती हैं; यह मानव पूँजी निर्माण का आधार है।

✅ आसान भाषा में: सड़क-बिजली-बंदरगाह आर्थिक अवसंरचना हैं जो उत्पादन को सीधे सहारा देती हैं; स्कूल-अस्पताल-आंगनवाड़ी सामाजिक अवसंरचना हैं जो इंसान को तैयार करती हैं। 🏠 उदाहरण: जैसे — किसी गाँव में नया प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और आवासीय विद्यालय बनना सामाजिक अवसंरचना है, जबकि उसी गाँव तक पक्की सड़क बनना आर्थिक अवसंरचना है।

घ. अमर्त्य सेन का क्षमता दृष्टिकोण (Capability Approach)

मानव पूँजी इंसान को उत्पादन का साधन मानती है। अमर्त्य सेन ने पूछा — क्या शिक्षा-स्वास्थ्य का मूल्य केवल आय बढ़ाने में है? उनका उत्तर — नहीं; विकास का असली अर्थ है लोगों की वास्तविक स्वतंत्रता और विकल्पों का विस्तार, यानी व्यक्ति अपने संसाधनों से वास्तव में क्या कर या बन सकता है। इस दृष्टि में व्यक्ति साध्य है, साधन नहीं।

घटक

अर्थ

सरल उदाहरण

कार्यप्रणाली (Functionings)

व्यक्ति वास्तव में जो कर या बन पाता है

सुपोषित होना, पढ़-लिख पाना, स्वस्थ रहना, समाज में सम्मान पाना

क्षमताएँ (Capabilities)

इन कार्यप्रणालियों के विभिन्न संयोजनों में से चुनने की वास्तविक स्वतंत्रता

जिसके पास भोजन है पर वह व्रत रखता है, और जो भूखा है क्योंकि भोजन नहीं — दोनों भूखे हैं, पर पहले के पास विकल्प है

एजेंसी (Agency)

स्वयं अपने लक्ष्य तय करने और परिवर्तन का वाहक बनने का सामर्थ्य

स्वयं सहायता समूह की महिला जो पंचायत में अपने गाँव के लिए आवाज़ उठाती है

📖 पीछे की कहानी — अकाल जिसने एक अर्थशास्त्री गढ़ा

1943 में बंगाल में भीषण अकाल पड़ा, जिसमें लगभग 30 लाख लोग मारे गए। उस समय नौ वर्ष का एक बालक शांतिनिकेतन में भूख से तड़पते लोगों को अपनी आँखों से देख रहा था — वह बालक था अमर्त्य सेन। बड़े होकर उन्होंने पाया कि उस वर्ष बंगाल में अनाज की कुल उपलब्धता बहुत कम नहीं थी; लोग इसलिए मरे क्योंकि मज़दूरी गिरने और दाम बढ़ने से उनकी अनाज ख़रीदने की क्षमता (हक़दारी) छिन गई थी। इसी अनुभव से "हक़दारी" और "क्षमता" के विचार जन्मे, जिनके लिए सेन को 1998 में अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार मिला।

❝ "विकास को लोगों द्वारा भोगी जाने वाली वास्तविक स्वतंत्रताओं के विस्तार की प्रक्रिया के रूप में देखा जा सकता है।" (Development can be seen as a process of expanding the real freedoms that people enjoy.) (— अमर्त्य सेन (1999))

ङ. सामाजिक क्षेत्र क्यों ज़रूरी है?

कारण

व्याख्या

गरीबी का चक्र तोड़ना

अशिक्षित-अस्वस्थ माता-पिता के बच्चे भी पिछड़ जाते हैं; शिक्षा-स्वास्थ्य यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी चक्र तोड़ते हैं

उत्पादकता और संवृद्धि

स्वस्थ-कुशल श्रमिक अधिक उत्पादन करते हैं; नई तकनीक जल्दी अपनाते हैं

जनसांख्यिकीय लाभांश को साकार करना

युवा आबादी तभी "लाभांश" बनती है जब वह शिक्षित, स्वस्थ और कुशल हो

समावेशी विकास

महिलाओं, अनुसूचित जाति-जनजाति, ग्रामीण और दिव्यांगजनों को विकास की मुख्यधारा में लाना

बाज़ार विफलता की भरपाई

शिक्षा-स्वास्थ्य के लाभ पूरे समाज को मिलते हैं (सकारात्मक बाह्यता), इसलिए निजी बाज़ार इनमें पर्याप्त निवेश नहीं करता — सरकार को आगे आना पड़ता है

सामाजिक स्थिरता और लोकतंत्र

शिक्षित नागरिक बेहतर निर्णय लेते हैं; असमानता घटने से सामाजिक तनाव घटता है

च. सामाजिक क्षेत्र पर सरकारी व्यय — रुझान

केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर जो राशि सामाजिक सेवाओं पर ख़र्च करती हैं, उसे सामाजिक सेवा व्यय (Social Services Expenditure) कहते हैं। कोविड के बाद इसमें तेज़ बढ़ोतरी हुई है, पर जीडीपी के अनुपात में यह अब भी विकसित देशों से काफ़ी कम है।

📊 सामाजिक सेवा व्यय (केंद्र + राज्य) — नवीनतम आँकड़े

1. सामाजिक सेवा व्यय 2020-21 से 2024-25 के बीच लगभग 15% वार्षिक चक्रवृद्धि दर से बढ़कर 2024-25 (बजट अनुमान) में लगभग ₹25.7 लाख करोड़ पहुँचा।

2. कुल सरकारी व्यय में सामाजिक सेवाओं का हिस्सा बढ़कर लगभग एक-चौथाई (26%) हुआ।

3. 2022-23 (बजट अनुमान) में सामाजिक सेवा व्यय जीडीपी का लगभग 8.3% था — इसमें शिक्षा लगभग 2.9% और स्वास्थ्य लगभग 2.1%।

4. लक्ष्य — राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020: शिक्षा पर सार्वजनिक व्यय जीडीपी का 6%; राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017: स्वास्थ्य पर सार्वजनिक व्यय जीडीपी का 2.5% (2025 तक) — दोनों अभी दूर हैं।

विश्व बैंक का मानव पूँजी सूचकांक (Human Capital Index) बताता है कि आज जन्मा बच्चा 18 वर्ष की आयु तक कितनी उत्पादकता प्राप्त करेगा, यदि उसे पूरी शिक्षा और स्वास्थ्य मिले। 2020 के सूचकांक में भारत का मान 0.49 था — अर्थात भारत में आज जन्मा बच्चा अपनी पूर्ण क्षमता का केवल लगभग 49% ही उत्पादक बन पाएगा। यह आँकड़ा बताता है कि सामाजिक क्षेत्र में निवेश की कितनी गुंजाइश है।

🎯 याद रखें — इस खंड के मुख्य बिंदु

1. सामाजिक क्षेत्र = शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, पेयजल-स्वच्छता, आवास, रोज़गार, सामाजिक सुरक्षा व कमज़ोर वर्गों का कल्याण; अधिकतर विषय राज्य/समवर्ती सूची में।

2. मानव पूँजी — अमूर्त, व्यक्ति से अविभाज्य, उपयोग से बढ़ती है; शब्द को शुल्ज़ (1960) ने लोकप्रिय बनाया, बेकर (1964) ने सिद्धांत दिया।

3. सेन का क्षमता दृष्टिकोण — कार्यप्रणाली, क्षमताएँ, एजेंसी; व्यक्ति साध्य है, साधन नहीं; नोबेल 1998।

2. मानव विकास एवं अन्य सामाजिक सूचकांक (Human Development & Other Indices)

किसी देश की प्रगति केवल जीडीपी या आर्थिक संवृद्धि से नहीं आँकी जा सकती। तेल से समृद्ध किसी देश की प्रति व्यक्ति आय बहुत ऊँची हो सकती है, पर वहाँ महिलाएँ पढ़ न पाएँ और लोग अपनी बात न कह पाएँ, तो क्या वह "विकसित" है? इसी प्रश्न से मानव विकास दृष्टिकोण जन्मा, जो आय के स्थान पर मनुष्य और उसकी क्षमताओं को केंद्र में रखता है — स्वास्थ्य, शिक्षा, समानता, स्वतंत्रता और समग्र कल्याण।

📘 आसान परिभाषा: मानव विकास (Human Development)

📚 परिभाषा: लोगों के विकल्पों और क्षमताओं के विस्तार की प्रक्रिया, जिससे वे लंबा और स्वस्थ जीवन जी सकें, ज्ञान प्राप्त कर सकें और सम्मानजनक जीवन-स्तर पा सकें।

✅ आसान भाषा में: पैसा अपने आप में लक्ष्य नहीं, बल्कि अच्छा जीवन जीने का साधन है — मानव विकास यह देखता है कि लोग वास्तव में कैसा जीवन जी रहे हैं। 🏠 उदाहरण: जैसे — दो परिवारों की आय बराबर है, पर एक परिवार के बच्चे स्कूल जाते हैं और बीमार होने पर इलाज पाते हैं; उस परिवार का मानव विकास अधिक है।

क. मानव विकास सूचकांक — एक त्वरित पुनरावृत्ति

मानव विकास सूचकांक की अवधारणा डॉ. महबूब-उल-हक़ ने दी; पहली मानव विकास रिपोर्ट 1990 संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम ने जारी की। यह स्वास्थ्य (जीवन प्रत्याशा), शिक्षा (अपेक्षित + औसत वर्ष) और जीवन-स्तर (प्रति व्यक्ति आय) का ज्यामितीय माध्य है; श्रेणियाँ — अति उच्च, उच्च, मध्यम, निम्न। (सूत्र अध्याय 1 में।)

📖 पीछे की कहानी — "असभ्य" सूचकांक जिसने दुनिया बदली

1989 में महबूब-उल-हक़ ने अपने पुराने मित्र अमर्त्य सेन से एक ऐसा सरल सूचकांक बनाने में मदद माँगी जो जीडीपी को चुनौती दे सके। सेन को यह विचार पसंद नहीं आया — उनके अनुसार जीवन की जटिलता को एक संख्या में समेटना बहुत "भोंडा" (Vulgar) होगा। तब हक़ ने उत्तर दिया — "हमें जीडीपी जितना ही भोंडा एक माप चाहिए, बस वह लोगों के जीवन के प्रति अंधा न हो।" सेन मान गए, और 1990 में पहली मानव विकास रिपोर्ट आई। बाद में सेन ने स्वयं स्वीकार किया कि हक़ सही थे — एक सरल संख्या ने ही पूरी दुनिया का ध्यान स्वास्थ्य और शिक्षा की ओर मोड़ा।

ख. मानव विकास रिपोर्ट 2025 — भारत कहाँ है?

मई 2025 की मानव विकास रिपोर्ट (वर्ष 2023 के आँकड़े) का विषय है — "चुनाव का प्रश्न: कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में लोग और संभावनाएँ" (A matter of choice: People and possibilities in the age of AI)। संदेश — कृत्रिम बुद्धिमत्ता अपने आप विकास नहीं लाएगी; परिणाम इस पर निर्भर है कि समाज उसे किस दिशा में उपयोग करता है।

संकेतक

2022

2023 (रिपोर्ट 2025)

रैंक (193 देशों में)

133

130

मानव विकास सूचकांक मान

0.676

0.685

स्कूली शिक्षा के अपेक्षित वर्ष

12.96

12.95

श्रेणी

मध्यम मानव विकास

मध्यम मानव विकास (उच्च श्रेणी की सीमा 0.700 के निकट)

🔎 तालिका से क्या समझें: सुधार मुख्यतः जीवन प्रत्याशा और स्कूली शिक्षा के औसत वर्षों से आया। 1990 में भारत का मान 0.434 था — 33 वर्षों में 50% से अधिक वृद्धि। फिर भी भारत 0.700 की सीमा से थोड़ा नीचे है; शिक्षा की गुणवत्ता और महिलाओं की आर्थिक भागीदारी सबसे बड़ी कुंजी हैं।

स्थिति

देश (रैंक)

भारत से ऊपर

चीन (78), श्रीलंका (89), भूटान (125)

भारत के बराबर

बांग्लादेश (130)

भारत से नीचे

नेपाल (145), म्यांमार (150), पाकिस्तान (168)

विश्व में शीर्ष

आइसलैंड (0.972), नॉर्वे (0.970), स्विट्ज़रलैंड (0.970)

विश्व में सबसे नीचे

दक्षिण सूडान (0.388)

चित्र

चित्र 1: मानव विकास परिवार के सूचकांक — भारत के मान (मानव विकास रिपोर्ट 2025)

ग. मानव विकास सूचकांक के "परिवार" के अन्य सूचकांक

📘 आसान परिभाषा: असमानता-समायोजित मानव विकास सूचकांक (Inequality-adjusted HDI)

📚 परिभाषा: मानव विकास सूचकांक के तीनों आयामों में जनसंख्या के बीच असमानता के प्रभाव को घटाकर निकाला गया सूचकांक; यह बताता है कि असमानता के कारण मानव विकास का कितना हिस्सा "खो" गया।

✅ आसान भाषा में: औसत तो सबको अच्छा दिखा देता है — यह सूचकांक देखता है कि वह औसत सब तक बराबर पहुँचा या कुछ ही लोगों तक। 🏠 उदाहरण: जैसे — कक्षा का औसत 70 अंक है, पर आधे बच्चों के 95 और आधे के 45 हैं; असमानता हटाकर देखें तो कक्षा की "वास्तविक" स्थिति 70 से कम है।

मानव विकास रिपोर्ट 2025 में असमानता के कारण भारत के मानव विकास सूचकांक में लगभग 30.7% की हानि हुई — यह क्षेत्र में सबसे अधिक हानियों में से एक है। आय और लैंगिक असमानता इसके सबसे बड़े कारण हैं, जबकि स्वास्थ्य और शिक्षा में असमानता पहले से घटी है।

सूचकांक

क्या मापता है

आयाम / घटक

भारत (रिपोर्ट 2025)

लैंगिक असमानता सूचकांक (Gender Inequality Index) — 2010 से

लैंगिक असमानता से मानव विकास में होने वाली संभावित हानि

(1) प्रजनन स्वास्थ्य — मातृ मृत्यु अनुपात, किशोर जन्म दर; (2) सशक्तिकरण — संसद में महिलाओं की सीटें, 25+ आयु की कम-से-कम माध्यमिक शिक्षित महिलाओं का अनुपात; (3) श्रम बाज़ार — महिला श्रम बल भागीदारी

रैंक 102, मान 0.403; शीर्ष — डेनमार्क, नॉर्वे, स्वीडन

ग्रहीय दबाव-समायोजित मानव विकास सूचकांक (Planetary pressures-adjusted HDI)

विकास की पर्यावरणीय क़ीमत — क्या विकास धरती पर बोझ डालकर हुआ?

मानव विकास सूचकांक को प्रति व्यक्ति कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन और प्रति व्यक्ति भौतिक संसाधन उपयोग (Material Footprint) से समायोजित

मान 0.656 (प्रति व्यक्ति उत्सर्जन 2.1 टन, संसाधन उपयोग 5.2 टन)

घ. विश्व प्रसन्नता रिपोर्ट (World Happiness Report)

यह रिपोर्ट ऑक्सफ़ोर्ड वेलबीइंग रिसर्च सेंटर, गैलप और सतत विकास समाधान नेटवर्क हर वर्ष 20 मार्च (अंतरराष्ट्रीय प्रसन्नता दिवस) के आसपास जारी करते हैं। लोग जीवन को 0 से 10 के पैमाने पर आँकते हैं, जिसे छह कारकों से समझाया जाता है — प्रति व्यक्ति जीडीपी, स्वस्थ जीवन प्रत्याशा, सामाजिक सहयोग, जीवन-निर्णयों की स्वतंत्रता, उदारता और भ्रष्टाचार की धारणा।

📊 विश्व प्रसन्नता रिपोर्ट 2026 — नवीनतम आँकड़े

1. भारत — 147 देशों में 116वाँ, मान 4.536 (2025 में 118वाँ — दो स्थान सुधार)।

2. शीर्ष तीन — फ़िनलैंड, आइसलैंड, डेनमार्क; सबसे नीचे — अफ़ग़ानिस्तान (147), सिएरा लियोन (146), मलावी (145)।

3. भारत से ऊपर — चीन (65), रूस (79), नेपाल (99), पाकिस्तान (104); भारत से नीचे — बांग्लादेश (127), श्रीलंका (134)।

💡 क्या आप जानते हैं? मानव विकास रिपोर्ट पहली बार 1990 में प्रकाशित हुई थी — इसकी परिकल्पना पाकिस्तानी अर्थशास्त्री महबूब उल हक़ ने अमर्त्य सेन के साथ मिलकर की थी।

ङ. भौतिक जीवन गुणवत्ता सूचकांक (Physical Quality of Life Index)

📘 आसान परिभाषा: भौतिक जीवन गुणवत्ता सूचकांक (Physical Quality of Life Index)

📚 परिभाषा: 1970 के दशक में अमेरिकी विद्वान मॉरिस डेविड मॉरिस (Morris David Morris) द्वारा विकसित सूचकांक, जो तीन संकेतकों — एक वर्ष की आयु पर जीवन प्रत्याशा, शिशु मृत्यु दर और बुनियादी साक्षरता दर — को समान भार देकर जीवन की गुणवत्ता को 0 से 100 के पैमाने पर मापता है।

✅ आसान भाषा में: इसमें आय शामिल ही नहीं है — यह सीधे देखता है कि लोग कितना जीते हैं, कितने बच्चे बचते हैं और कितने लोग पढ़-लिख सकते हैं। 🏠 उदाहरण: जैसे — कम प्रति व्यक्ति आय होते हुए भी केरल और श्रीलंका ने ऊँची साक्षरता व कम शिशु मृत्यु दर के कारण इस सूचकांक पर बहुत अच्छा प्रदर्शन किया।

च. एशिया शक्ति सूचकांक (Asia Power Index) 2025

ऑस्ट्रेलिया के सिडनी स्थित लोवी संस्थान (Lowy Institute) का यह सूचकांक एशिया-प्रशांत के देशों की शक्ति को दो हिस्सों में मापता है — संसाधन (Resources): आर्थिक क्षमता, सैन्य क्षमता, लचीलापन और भविष्य के संसाधन (जनसांख्यिकी सहित); तथा प्रभाव (Influence): आर्थिक संबंध, रक्षा नेटवर्क, कूटनीतिक और सांस्कृतिक प्रभाव।

पैमाना

भारत की स्थिति (2025)

अर्थ

समग्र शक्ति रैंक

तीसरा (अमेरिका और चीन के बाद)

भारत पहली बार "प्रमुख शक्ति (Major Power)" की श्रेणी में

आर्थिक संबंध रैंक

10वाँ

क्षेत्रीय व्यापार-निवेश जुड़ाव अपेक्षाकृत कमज़ोर

शक्ति अंतर (Power Gap)

ऋणात्मक (−4)

संसाधनों के अनुपात में प्रभाव कम — क्षमता का पूरा रूपांतरण प्रभाव में नहीं

🎯 याद रखें — इस खंड के मुख्य बिंदु

1. मानव विकास रिपोर्ट 2025 (विषय: कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में चुनाव) — भारत 130/193, मान 0.685, जीवन प्रत्याशा 72 वर्ष, मध्यम श्रेणी; शीर्ष आइसलैंड।

2. लैंगिक असमानता सूचकांक — भारत 102वाँ, 0.403 (कम मान बेहतर); ग्रहीय दबाव-समायोजित 0.656; असमानता से हानि लगभग 30.7%।

3. विश्व प्रसन्नता रिपोर्ट 2026 — भारत 116वाँ (4.536), शीर्ष फ़िनलैंड; छह कारक; 20 मार्च प्रसन्नता दिवस।

3. जनसंख्या एवं जनसांख्यिकीय लाभांश (Population & Demographic Dividend)

अप्रैल 2023 में संयुक्त राष्ट्र के अनुमानों में भारत चीन को पीछे छोड़कर विश्व का सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश बन गया। यह ख़बर डराने वाली भी है और उम्मीद जगाने वाली भी — डराने वाली इसलिए कि इतने लोगों के लिए भोजन, पानी, घर और नौकरी चाहिए; उम्मीद इसलिए कि भारत की आबादी युवा है। यदि इन युवाओं को सही शिक्षा, स्वास्थ्य और काम मिले, तो यही आबादी भारत की सबसे बड़ी ताक़त बन सकती है।

📊 भारत की जनसंख्या — एक नज़र में — नवीनतम आँकड़े

1. संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष की विश्व जनसंख्या स्थिति रिपोर्ट 2025 — भारत की जनसंख्या लगभग 146.4 करोड़; अगले लगभग 40 वर्षों में लगभग 170 करोड़ पर चरम, फिर गिरावट।

2. आयु संरचना (2025) — 0-14 वर्ष: 24%, 15-64 वर्ष (कार्यशील आयु): 68%, 65+ वर्ष: 7%।

3. जनगणना 2011 — जनसंख्या 121.09 करोड़, दशकीय वृद्धि 17.7%, घनत्व 382 प्रति वर्ग किमी, लिंगानुपात 943।

क. जनसांख्यिकीय संक्रमण (Demographic Transition)

📘 आसान परिभाषा: जनसांख्यिकीय संक्रमण (Demographic Transition)

📚 परिभाषा: आर्थिक-सामाजिक आधुनिकीकरण के साथ किसी समाज का उच्च जन्म दर व उच्च मृत्यु दर की स्थिति से निम्न जन्म दर व निम्न मृत्यु दर की स्थिति की ओर क्रमिक परिवर्तन; यह सिद्धांत वॉरेन थॉम्पसन (1929) और फ़्रैंक नोटेस्टीन (1945) के कार्यों से विकसित हुआ।

✅ आसान भाषा में: पहले बच्चे बहुत होते थे पर बहुत मरते भी थे; दवा-टीके आए तो मौतें घटीं; फिर पढ़ाई और शहरीकरण से परिवार भी छोटे होने लगे — यही "संक्रमण" है। 🏠 उदाहरण: जैसे — दादी के ज़माने में घर में 7-8 बच्चे होते थे, जिनमें से 2-3 बचपन में ही चल बसते थे; आज के परिवारों में प्रायः 1-2 बच्चे हैं और लगभग सभी स्वस्थ बड़े होते हैं।

चित्र

चित्र 2: जनसांख्यिकीय संक्रमण के चार चरण और भारत की वर्तमान स्थिति

चरण

जन्म दर

मृत्यु दर

जनसंख्या वृद्धि

उदाहरण

पहला — पूर्व-औद्योगिक

ऊँची

ऊँची (अकाल, महामारी)

बहुत धीमी, लगभग स्थिर

भारत 1921 से पहले

दूसरा — प्रारंभिक संक्रमण

ऊँची

तेज़ी से गिरती

जनसंख्या विस्फोट

भारत 1951-1981

तीसरा — उत्तर संक्रमण

गिरती

नीची

धीमी होती वृद्धि; कार्यशील आयु वर्ग सबसे बड़ा

भारत आज (अंतिम हिस्से में)

चौथा — निम्न स्थिर

नीची

नीची

लगभग स्थिर; वृद्ध आबादी बढ़ती

जापान, इटली, दक्षिण कोरिया

काल (जनगणना)

भारत की जनसंख्या वृद्धि की प्रकृति

1901-1921

स्थिर जनसंख्या — अकाल, प्लेग, 1918 का इन्फ़्लुएंज़ा; 1921 में जनसंख्या घटी, इसलिए 1921 को "महान विभाजक वर्ष" (Year of Great Divide) कहते हैं

1951-1981

तीव्र वृद्धि (जनसंख्या विस्फोट) — मृत्यु दर तेज़ी से गिरी, जन्म दर ऊँची रही; 1961-71 में दशकीय वृद्धि लगभग 24.8% (सर्वाधिक)

1981-2011

ऊँची पर धीमी होती वृद्धि — जन्म दर में स्पष्ट गिरावट; 2001-11 में दशकीय वृद्धि 17.7%

ख. माल्थस का जनसंख्या सिद्धांत (Malthusian Theory)

ब्रिटिश अर्थशास्त्री थॉमस रॉबर्ट माल्थस ने 1798 में अपने निबंध "जनसंख्या के सिद्धांत पर एक निबंध (An Essay on the Principle of Population)" में चेतावनी दी कि जनसंख्या गुणोत्तर (ज्यामितीय) श्रेणी में — 1, 2, 4, 8, 16, 32 — बढ़ती है, जबकि खाद्यान्न उत्पादन केवल समांतर श्रेणी में — 1, 2, 3, 4, 5, 6। एक बिंदु पर जनसंख्या की रेखा संसाधनों की रेखा को पार कर जाती है — इसे "माल्थसियन संकट" (Point of Crisis) कहते हैं।

⚠️ ध्यान दें — माल्थस की सीमा

माल्थस की भविष्यवाणी अब तक पूरी तरह सही नहीं निकली — हरित क्रांति, तकनीकी प्रगति और व्यापार ने खाद्यान्न उत्पादन को जनसंख्या से तेज़ बढ़ाया, और शिक्षा-शहरीकरण से जन्म दर अपने आप घटी। फिर भी जल, भूमि और पर्यावरण पर दबाव के रूप में उनकी चेतावनी आज भी प्रासंगिक मानी जाती है (इसीलिए आज के विचारकों को "नव-माल्थसवादी" कहा जाता है)।

ग. जनसांख्यिकीय लाभांश और उसके नए रूप

📘 आसान परिभाषा: जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend)

📚 परिभाषा: जनसंख्या की आयु संरचना में ऐसा परिवर्तन, जिसमें कार्यशील आयु (15-64 वर्ष) की जनसंख्या का अनुपात आश्रित जनसंख्या (बच्चे + बुज़ुर्ग) से अधिक हो जाता है, जिससे बचत, निवेश और आर्थिक संवृद्धि की संभावना बढ़ती है।

✅ आसान भाषा में: जब घर में कमाने वाले हाथ ज़्यादा और खाने वाले आश्रित कम हों, तो परिवार बचत कर पाता है, बच्चों को अच्छा पढ़ा पाता है — पूरे देश में ऐसा हो तो देश तेज़ी से आगे बढ़ता है। 🏠 उदाहरण: जैसे — 1970-2000 के बीच दक्षिण कोरिया, ताइवान और चीन ने अपनी युवा आबादी को शिक्षा और कारख़ानों से जोड़कर इसी लाभांश से तेज़ संवृद्धि हासिल की।

🧮 आश्रितता अनुपात (Dependency Ratio)

आश्रितता अनुपात = (0-14 वर्ष की जनसंख्या + 65+ वर्ष की जनसंख्या) ÷ (15-64 वर्ष की जनसंख्या) × 100

भारत (2025): (24 + 7) ÷ 68 × 100 ≈ 46 — अर्थात हर 100 कार्यशील लोगों पर लगभग 46 आश्रित

अनुपात घटना = लाभांश की खिड़की खुली; अनुपात बढ़ना = आबादी बूढ़ी हो रही

📘 आसान परिभाषा: कुल प्रजनन दर (Total Fertility Rate)

📚 परिभाषा: वर्तमान आयु-विशिष्ट प्रजनन दरों के आधार पर एक महिला अपने प्रजनन काल (15-49 वर्ष) में औसतन जितने बच्चों को जन्म देती है, वह संख्या।

✅ आसान भाषा में: औसतन एक माँ के कितने बच्चे — यदि यह 2.1 हो तो जनसंख्या लंबे समय में स्थिर रहती है; इसे प्रतिस्थापन स्तर (Replacement Level) कहते हैं (0.1 अतिरिक्त इसलिए कि कुछ बच्चे बड़े होने से पहले मर जाते हैं)। 🏠 उदाहरण: जैसे — भारत की कुल प्रजनन दर अब लगभग 1.9 है, यानी दीर्घकाल में जनसंख्या स्थिर होकर घटने की ओर जाएगी; पर अभी युवा माता-पिता की बड़ी संख्या के कारण कुछ दशक तक कुल जनसंख्या बढ़ती रहेगी।

लाभांश का प्रकार

अर्थ

भारत के लिए महत्व

जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend)

कार्यशील आयु का हिस्सा आश्रितों से अधिक

अवसर-खिड़की लगभग 2005-06 से 2055-56 तक; कार्यशील आयु का हिस्सा 2040 के दशक के आसपास चरम पर

रजत लाभांश (Silver Dividend)

60-69 वर्ष आयु वर्ग की अप्रयुक्त कार्यक्षमता (Untapped Work Capacity) से उत्पन्न आर्थिक अवसर

बूढ़ी होती आबादी बोझ नहीं, अनुभवी कार्यबल भी है; साथ ही बुज़ुर्गों की ज़रूरतों से रजत अर्थव्यवस्था (Silver Economy) — स्वास्थ्य, देखभाल, पर्यटन, वित्तीय उत्पाद

लैंगिक लाभांश (Gender Dividend)

महिलाओं की श्रम भागीदारी बढ़ने से अतिरिक्त संवृद्धि

महिला श्रम बल भागीदारी पुरुषों से लगभग आधी — सबसे बड़ा अप्रयुक्त संसाधन

भारत वृद्धावस्था रिपोर्ट 2023 के अनुसार 60+ आयु की जनसंख्या 2022 के 14.9 करोड़ (10.5%) से बढ़कर 2050 तक 34.7 करोड़ (20.8%) हो जाएगी — हर पाँचवाँ भारतीय बुज़ुर्ग। केरल, तमिलनाडु, हिमाचल पहले ही "बूढ़े" हो रहे हैं, जबकि बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान अभी युवा हैं — लाभांश राज्यों में अलग-अलग समय पर आएगा।

🐪 राजस्थान की भाषा में — जनसांख्यिकीय लाभांश

राजस्थान के किसी किसान परिवार की कल्पना कीजिए — दादा-दादी, माता-पिता और चार जवान बेटे-बेटियाँ। यदि चारों पढ़-लिखकर कोई नर्स बने, कोई सोलर प्लांट में तकनीशियन, कोई अपनी डेयरी चलाए — तो खेत की आय के साथ चार नई आमदनी जुड़ती हैं, पक्का घर बनता है और अगली पीढ़ी और अच्छे स्कूल जाती है। पर यदि वही चारों बिना हुनर के बेरोज़गार बैठे रहें, तो वही "चार जवान हाथ" परिवार पर बोझ बन जाते हैं। राजस्थान (जनगणना 2011 में 6.85 करोड़ आबादी, देश का 5.66%, 2001-11 में दशकीय वृद्धि 21.3% — राष्ट्रीय औसत से अधिक) के लिए यह अवसर सबसे बड़ा है, क्योंकि यहाँ की आबादी अभी अपेक्षाकृत युवा है।

घ. जनगणना 2027 (Census 2027)

भारत में जनगणना हर दस वर्ष पर होती आई है, पर 2021 की जनगणना कोविड-19 के कारण स्थगित हो गई। अब देश की 16वीं जनगणना (स्वतंत्रता के बाद 8वीं) जनगणना अधिनियम 1948 के अंतर्गत दो चरणों में हो रही है।

🏛️ जनगणना 2027 — मुख्य बातें

◆ पहला चरण — मकान सूचीकरण एवं आवास गणना (Houselisting & Housing Census): अप्रैल से सितंबर 2026 के बीच, हर राज्य/केंद्रशासित प्रदेश में अपनी सुविधा की 30 दिन की अवधि में।

◆ दूसरा चरण — जनसंख्या गणना (Population Enumeration): फ़रवरी 2027 में; संदर्भ तिथि 1 मार्च 2027 (रात 00:00 बजे)।

◆ पहली डिजिटल जनगणना — मोबाइल ऐप से आँकड़े संग्रह और नागरिकों के लिए स्व-गणना (Self-Enumeration) का विकल्प।

◆ जाति गणना भी शामिल — 1931 के बाद पहली बार सभी जातियों की व्यापक गणना।

📖 पीछे की कहानी — जब भारत ने दुनिया को रास्ता दिखाया

1952 में, जब स्वतंत्र भारत की पहली पंचवर्षीय योजना चल रही थी, भारत विश्व का पहला देश बना जिसने राष्ट्रीय परिवार नियोजन कार्यक्रम को सरकारी नीति के रूप में अपनाया। शुरुआत में ज़ोर केवल "संख्या घटाने" पर था, और 1975-77 के दौरान ज़बरन नसबंदी के कड़वे अनुभव से जनता का भरोसा भी डगमगाया। धीरे-धीरे समझ आया कि जनसंख्या "आदेश" से नहीं, शिक्षा, विशेषकर बालिका शिक्षा, स्वास्थ्य और विकल्पों से नियंत्रित होती है। इसी सोच पर राष्ट्रीय जनसंख्या नीति 2000 बनी, और आज भारत की कुल प्रजनन दर प्रतिस्थापन स्तर से नीचे आ चुकी है।

🔎 तालिका से क्या समझें: नीति 2000 के लक्ष्य — कुल प्रजनन दर 2010 तक 2.1 और 2045 तक स्थिर जनसंख्या। 2010 का लक्ष्य समय पर पूरा नहीं हुआ, पर राष्ट्रीय स्तर पर कुल प्रजनन दर 2020 के आसपास 2.0-2.1 पर आ गई और अब 1.9 है। अधिकांश दक्षिणी और पश्चिमी राज्य पहले ही प्रतिस्थापन स्तर से नीचे हैं, जबकि बिहार जैसे कुछ उत्तरी राज्यों में यह अब भी ऊँची है — इसलिए अब ध्यान "संख्या घटाने" से हटकर गुणवत्ता — स्वास्थ्य, शिक्षा, कौशल — पर है।

ङ. लाभांश को साकार करने की राह (Way Forward)

क्षेत्र

क्या करना होगा

गुणवत्तापूर्ण शिक्षा

केवल नामांकन नहीं, सीखने के परिणाम — आधारभूत साक्षरता-संख्यात्मकता, माध्यमिक स्तर से व्यावसायिक शिक्षा का एकीकरण

कौशल और पुनः-कौशल

उद्योग-शिक्षा जुड़ाव, जर्मनी जैसा दोहरा (कक्षा + कारख़ाना) प्रशिक्षण, कृत्रिम बुद्धिमत्ता-डेटा-हरित रोज़गार के लिए नए कौशल

स्वास्थ्य और पोषण

कुपोषण-एनीमिया घटाना — बौना बच्चा बड़ा होकर कम उत्पादक श्रमिक बनता है

महिलाओं की भागीदारी

सुरक्षित परिवहन, बाल-देखभाल केंद्र, लचीले कार्य-घंटे — "लैंगिक लाभांश" को खोलना

🎯 याद रखें — इस खंड के मुख्य बिंदु

1. जनसांख्यिकीय संक्रमण के 4 चरण; भारत तीसरे चरण के अंतिम हिस्से में; 1921 = महान विभाजक वर्ष।

2. भारत — ~146.4 करोड़, 68% कार्यशील आयु, माध्यिका आयु 28-29, कुल प्रजनन दर 1.9; आश्रितता अनुपात ~46; रजत लाभांश = 60-69 वर्ष की अप्रयुक्त क्षमता।

3. जनगणना 2027 — 16वीं (स्वतंत्रता के बाद 8वीं), संदर्भ तिथि 1 मार्च 2027, पहली डिजिटल जनगणना, जाति गणना शामिल; परिवार नियोजन कार्यक्रम 1952 (विश्व में पहला)।

4. गरीबी — अर्थ, प्रकार एवं गरीबी रेखा (Poverty — Meaning, Types & Poverty Line)

बाड़मेर के किसी गाँव में रहने वाले रामलाल के पास दो बीघा बारानी ज़मीन है। अच्छी बारिश के साल में परिवार पेट भर खाता है; पर जिस साल अकाल पड़ता है, उसे साहूकार से उधार लेना पड़ता है, बेटी की पढ़ाई छूट जाती है और माँ की दवा टल जाती है। क्या रामलाल गरीब है? किसी साल हाँ, किसी साल नहीं। यही बताता है कि गरीबी केवल "पैसे की कमी" नहीं, अवसरों, सुरक्षा और सम्मान की कमी भी है।

क. गरीबी क्या है?

📘 आसान परिभाषा: गरीबी (Poverty)

📚 परिभाषा: वह स्थिति जिसमें किसी व्यक्ति या परिवार के पास भोजन, वस्त्र, आवास, स्वास्थ्य, शिक्षा जैसी बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पर्याप्त आय या संसाधन नहीं होते; यह एक बहुआयामी अभाव है, जो आर्थिक के साथ-साथ स्वास्थ्य, शिक्षा, जीवन-स्तर और सामाजिक भागीदारी से भी जुड़ा है।

✅ आसान भाषा में: जब घर की कमाई इतनी न हो कि पेट भर खाना, दवा, बच्चों की पढ़ाई और सिर पर पक्की छत — ये सब एक साथ जुट सकें, तो वह परिवार गरीब है। 🏠 उदाहरण: जैसे — कोई परिवार दो वक़्त खाना तो खा लेता है, पर बीमारी में इलाज के लिए उसे ज़मीन गिरवी रखनी पड़ती है; वह भी गरीबी की ही एक तस्वीर है।

गरीबी को समझने के दो नज़रिये हैं — आय-आधारित (Income/Consumption Poverty), जिसमें देखा जाता है कि व्यक्ति कितना ख़र्च कर पाता है; और बहुआयामी (Multidimensional Poverty), जिसमें देखा जाता है कि वह किन बुनियादी सुविधाओं से वंचित है। पहला "जेब" देखता है, दूसरा "जीवन"। बहुआयामी गरीबी खंड 6 में है।

❝ "कहीं भी व्याप्त अत्यधिक गरीबी, हर जगह मानव सुरक्षा के लिए ख़तरा है।" (Extreme poverty anywhere is a threat to human security everywhere.) (— कोफ़ी अन्नान, संयुक्त राष्ट्र महासचिव)

📖 पीछे की कहानी — दादाभाई नौरोजी — गरीबी को पहली बार "गिनने" वाले

उन्नीसवीं सदी में अंग्रेज़ दावा करते थे कि उनके शासन में भारत समृद्ध हो रहा है। दादाभाई नौरोजी ने उत्तर आँकड़ों से दिया। 1867-68 के मूल्यों पर उन्होंने प्रति व्यक्ति आय लगभग ₹20 प्रति वर्ष आँकी और न्यूनतम निर्वाह के लिए ₹16 से ₹35 प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष की रेखा सुझाई — यह गरीबी रेखा का पहला वैज्ञानिक प्रयास माना जाता है। कारण उन्होंने बताया — भारत से इंग्लैंड की ओर धन का निष्कासन (Drain of Wealth); उनके लेख 1901 में "पॉवर्टी एंड अन-ब्रिटिश रूल इन इंडिया" (Poverty and Un-British Rule in India) नाम से संकलित हुए।

ख. गरीबी के प्रकार

📉 निरपेक्ष गरीबी (Absolute Poverty)

📊 सापेक्ष गरीबी (Relative Poverty)

◆ एक निश्चित न्यूनतम मानक (कैलोरी, उपभोग-टोकरी या आय) से नीचे जीवन

◆ मापदंड सबके लिए एक जैसा — जैसे विश्व बैंक की $3.00 प्रतिदिन की रेखा

◆ समय और देशों के बीच तुलना आसान

◆ विकासशील देशों में अधिक प्रासंगिक — भारत की आधिकारिक रेखाएँ इसी प्रकार की

◆ समाज के बाक़ी लोगों की तुलना में पिछड़ापन

◆ प्रायः माध्यिका आय के 50% या 60% से कम आय वाले सापेक्ष गरीब माने जाते हैं

◆ देश अमीर हो जाए तब भी सापेक्ष गरीबी बनी रह सकती है — यह असमानता का माप है

◆ विकसित देशों (यूरोप, आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन के देश) में अधिक प्रयुक्त

समय के आधार पर गरीबों को पाँच वर्गों में बाँटा जाता है — कुछ हमेशा गरीब रहते हैं, कुछ बार-बार गरीबी में गिरते-उठते हैं।

वर्ग

पहचान

उदाहरण

सदा गरीब (Always Poor)

हमेशा गरीबी रेखा से नीचे; बुनियादी ज़रूरतों के लिए लगातार संघर्ष

भूमिहीन, बेघर, निराश्रित वृद्ध

दीर्घकालिक गरीब (Usually Poor)

प्रायः गरीब, कभी-कभी थोड़ी अतिरिक्त आय

आकस्मिक दिहाड़ी मज़दूर

उतार-चढ़ाव वाले गरीब (Churning Poor)

नियमित रूप से गरीबी रेखा के अंदर-बाहर आते-जाते रहते हैं

छोटे किसान, मौसमी श्रमिक

कभी-कभार गरीब (Occasionally Poor)

सामान्यतः संपन्न, पर बीमारी, फ़सल-नुक़सान या आपदा से अस्थायी गरीबी

बाढ़ में दुकान बह जाने वाला व्यापारी

कभी गरीब नहीं (Never Poor)

हमेशा गरीबी रेखा से ऊपर

नियमित वेतनभोगी, बड़े किसान

🔎 तालिका से क्या समझें: पहले दो वर्ग दीर्घकालिक गरीबी (Chronic Poverty) बनाते हैं; तीसरा और चौथा अस्थायी गरीबी (Transient Poverty)। दीर्घकालिक गरीबों को परिसंपत्ति, कौशल और सामाजिक सुरक्षा चाहिए; अस्थायी गरीबों को बीमा, सस्ता ऋण और आपदा-राहत।

🐪 राजस्थान की भाषा में — अकाल वाला साल और "उतार-चढ़ाव वाला गरीब"

मारवाड़ के बारानी खेती वाले किसान की कमाई पूरी तरह बादलों पर टिकी है। अच्छे साल में बाजरा-ग्वार से घर भर जाता है, पर अकाल के साल वही परिवार गरीबी रेखा से नीचे फिसल जाता है और पशु बेचने पड़ते हैं। ऐसे परिवार को केवल अनाज नहीं, फ़सल बीमा, पशु बीमा, टाँका-खड़ीन जैसे जल-संरक्षण और रोज़गार गारंटी चाहिए, ताकि एक बुरा साल पूरी पीढ़ी को गरीब न बना दे।

ग. गरीबी रेखा (Poverty Line)

📘 आसान परिभाषा: गरीबी रेखा (Poverty Line)

📚 परिभाषा: आय या उपभोग-व्यय का वह न्यूनतम स्तर, जो किसी व्यक्ति की बुनियादी आवश्यकताओं (भोजन, वस्त्र, आवास, स्वास्थ्य, शिक्षा) को पूरा करने के लिए आवश्यक माना जाता है; इससे कम व्यय करने वाला व्यक्ति गरीबी रेखा से नीचे (Below Poverty Line) माना जाता है।

✅ आसान भाषा में: यह एक "कट-ऑफ़" लकीर है — इस लकीर से कम ख़र्च कर पाने वाला गरीब गिना जाता है, ऊपर वाला नहीं। 🏠 उदाहरण: जैसे — 2011-12 में गाँव में ₹816 प्रति व्यक्ति प्रति माह (लगभग ₹27 प्रतिदिन) से कम ख़र्च करने वाला व्यक्ति आधिकारिक रूप से गरीब माना गया।

गरीबी रेखा चार तरीक़ों से तय होती है — कैलोरी-आधारित (ग्रामीण 2400, शहरी 2100 कैलोरी की लागत; सरल पर स्वास्थ्य-शिक्षा की अनदेखी), उपभोग-टोकरी (भोजन, वस्त्र, ईंधन, किराया, शिक्षा, स्वास्थ्य की मानक टोकरी), आय-आधारित और डॉलर-आधारित (क्रय-शक्ति समता)। भारत उपभोग-व्यय मापता है, क्योंकि अनौपचारिक काम में आय अनियमित होती है पर ख़र्च अपेक्षाकृत स्थिर। आँकड़े राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय के सर्वेक्षणों से आते हैं और आकलन पहले योजना आयोग और अब नीति आयोग करता है।

घ. अंतरराष्ट्रीय गरीबी रेखा — विश्व बैंक

विश्व बैंक अत्यधिक गरीबी को साझा पैमाने पर मापता है। जून 2025 में 2021 की क्रय-शक्ति समता के आधार पर रेखा $2.15 से बढ़ाकर $3.00 प्रतिदिन कर दी गई।

वर्ष

अंतरराष्ट्रीय गरीबी रेखा (प्रतिदिन)

आधार

2015

$1.90

2011 की क्रय-शक्ति समता

2022

$2.15

2017 की क्रय-शक्ति समता

जून 2025

$3.00 (अत्यधिक गरीबी); साथ में $4.20 (निम्न-मध्यम आय) और $8.30 (उच्च-मध्यम आय)

2021 की क्रय-शक्ति समता

📊 भारत में अत्यधिक गरीबी (विश्व बैंक, जून 2025) — नवीनतम आँकड़े

1. $3.00 रेखा पर: अत्यधिक गरीबी 27.1% (2011-12) से घटकर 5.3% (2022-23); अत्यधिक गरीबों की संख्या लगभग 34.4 करोड़ से 7.5 करोड़ — यानी लगभग 26.9 करोड़ लोग बाहर निकले।

2. पुरानी $2.15 रेखा पर: 16.2% से 2.3%; $4.20 रेखा पर: 57.7% से 23.9% — लगभग हर चौथा भारतीय अब भी इससे नीचे।

⚠️ ध्यान दें — रेखा बदली, गरीबी नहीं

रेखा $2.15 से $3.00 होने पर भारत की दर 2.3% से 5.3% दिखने लगी — गरीबी बढ़ी नहीं, केवल मापदंड ऊँचा हुआ। दोनों आँकड़े 2022-23 के हैं।

🎯 याद रखें — इस खंड के मुख्य बिंदु

1. गरीबी रेखा का पहला वैज्ञानिक प्रयास — दादाभाई नौरोजी, ₹16-35 प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष; निरपेक्ष बनाम सापेक्ष गरीबी।

2. विश्व बैंक की नई रेखा $3.00/दिन (2021 क्रय-शक्ति समता, जून 2025); भारत में अत्यधिक गरीबी 27.1% (2011-12) से 5.3% (2022-23)।

3. पुरानी $2.15 रेखा पर भारत 2.3%; $4.20 रेखा पर 23.9%; सतत विकास लक्ष्य 1.2 — गरीबी आधी करना।

5. गरीबी मापन — समितियाँ एवं आँकड़े (Poverty Estimation — Committees & Data)

आज़ादी के बाद अनेक कार्य समूह, विशेषज्ञ समूह और समितियाँ बनीं। यात्रा की दिशा साफ़ है — केवल कैलोरी से पूरी उपभोग-टोकरी और फिर बहुआयामी अभाव की ओर।

📘 आसान परिभाषा: मासिक प्रति व्यक्ति उपभोग व्यय (Monthly Per Capita Consumption Expenditure)

📚 परिभाषा: किसी परिवार द्वारा एक माह में भोजन और गैर-खाद्य वस्तुओं-सेवाओं पर किए गए कुल उपभोग-व्यय को परिवार के सदस्यों की संख्या से भाग देकर प्राप्त औसत व्यय; भारत में गरीबी रेखा इसी के आधार पर तय की जाती रही है।

✅ आसान भाषा में: घर का महीने भर का कुल ख़र्च ÷ सदस्यों की संख्या = प्रति व्यक्ति ख़र्च। यह एक तय सीमा से कम हो तो व्यक्ति गरीब। 🏠 उदाहरण: जैसे — 5 सदस्यों वाला परिवार महीने में ₹4,000 ख़र्च करता है, तो उसका प्रति व्यक्ति उपभोग व्यय ₹800 है — 2011-12 की ग्रामीण रेखा (₹816) से कम, अतः गरीब।

क. समितियों की यात्रा

चित्र

चित्र 3: भारत में गरीबी मापन की समितियाँ — कैलोरी से बहुआयामी मापन तक

वर्ष

समिति / समूह

पद्धति एवं मुख्य निष्कर्ष

1962

योजना आयोग का कार्य समूह (Working Group)

पहली राष्ट्रीय गरीबी रेखा — ₹20 (ग्रामीण) व ₹25 (शहरी) प्रति व्यक्ति प्रति माह, 1960-61 मूल्यों पर

1971

वि. म. दांडेकर व नीलकंठ रथ (अकादमिक अध्ययन)

2250 कैलोरी प्रतिदिन को आधार बनाया; 1960-61 में लगभग 40% ग्रामीण और 50% शहरी आबादी गरीब आँकी

1979

वाई. के. अलघ कार्यदल (Task Force)

ग्रामीण 2400, शहरी 2100 कैलोरी; 1973-74 मूल्यों पर ₹49.09 (ग्रामीण) व ₹56.64 (शहरी) — एक अखिल भारतीय रेखा; राज्यों के मूल्य-अंतर की अनदेखी

1993

डी. टी. लकड़ावाला विशेषज्ञ समूह

अलघ के कैलोरी मानक यथावत, पर राज्यवार गरीबी रेखाएँ (कृषि/औद्योगिक श्रमिक उपभोक्ता मूल्य सूचकांक से समायोजन)

2009

सुरेश तेंदुलकर विशेषज्ञ समूह

केवल-कैलोरी व्यवस्था छोड़ी; शहरी गरीबी रेखा टोकरी ग्रामीण पर भी लागू; स्वास्थ्य-शिक्षा पर निजी व्यय शामिल

2009 / 2012

एन. सी. सक्सेना समिति; एस. आर. हाशिम समूह

क्रमशः ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में गरीब परिवारों की पहचान की पद्धति

2014

सी. रंगराजन विशेषज्ञ समूह

कैलोरी के साथ प्रोटीन व वसा मानक + आवश्यक गैर-खाद्य व्यय; 2011-12 में गरीबी 29.5%

🔎 तालिका से क्या समझें: रंगराजन रिपोर्ट को सरकार ने औपचारिक रूप से स्वीकार नहीं किया; इसलिए तेंदुलकर पद्धति के 2011-12 के आँकड़े ही अंतिम आधिकारिक गणना हैं।

📖 पीछे की कहानी — ₹32 प्रतिदिन वाला विवाद

सितंबर 2011 में योजना आयोग ने सर्वोच्च न्यायालय में शपथपत्र दिया कि तेंदुलकर पद्धति से शहर में लगभग ₹32 प्रतिदिन और गाँव में लगभग ₹26 प्रतिदिन से अधिक ख़र्च करने वाला व्यक्ति गरीब नहीं है। संसद से चाय की दुकानों तक बहस छिड़ गई — क्या ₹32 में कोई शहर में दिन भर जी सकता है? इसी दबाव में 2012 में रंगराजन विशेषज्ञ समूह बना, जिसने 2014 में रेखा बढ़ाकर लगभग ₹47 (शहरी) और ₹32 (ग्रामीण) प्रतिदिन की।

ख. तेंदुलकर बनाम रंगराजन — सबसे महत्त्वपूर्ण तुलना

आधार

तेंदुलकर (2009)

रंगराजन (2014)

मूल दृष्टि

कैलोरी छोड़ी; शहरी उपभोग टोकरी को मानक

पोषण पर लौटे — कैलोरी + प्रोटीन + वसा + गैर-खाद्य ज़रूरतें

पोषण मानक

प्रत्यक्ष मानक नहीं

कैलोरी — ग्रामीण 2155, शहरी 2090; प्रोटीन — 48 / 50 ग्राम; वसा — 26 / 28 ग्राम

2011-12 रेखा (प्रति व्यक्ति मासिक)

ग्रामीण ₹816, शहरी ₹1,000

ग्रामीण ₹972, शहरी ₹1,407

2011-12 गरीबी अनुपात

ग्रामीण 25.7%, शहरी 13.7%, कुल 21.9%

ग्रामीण 30.95%, शहरी 26.4%, कुल 29.5%

🔎 तालिका से क्या समझें: सबसे बड़ा अंतर शहरी गरीबी में है — 13.7% बनाम 26.4%। रंगराजन ने शहर के ऊँचे किराए, परिवहन और शिक्षा के ख़र्च को अलग से जोड़ा; यानी आँकड़ा इस पर निर्भर है कि "न्यूनतम जीवन" की टोकरी में क्या-क्या रखा गया।

⚠️ ध्यान दें — आँकड़ों की अदला-बदली

ग्रामीण 30.95% व शहरी 26.4% — ये रंगराजन के आँकड़े हैं, तेंदुलकर के नहीं; तेंदुलकर के 2011-12 के आँकड़े 25.7% / 13.7% / 21.9% हैं।

वर्ष

तेंदुलकर पद्धति — कुल

ग्रामीण

शहरी

1993-94

45.3%

50.1%

31.8%

2004-05

37.2%

41.8%

25.7%

2009-10

29.8%

33.8%

20.9%

2011-12

21.9%

25.7%

13.7%

🔎 रुझान से क्या समझें: 2004-05 से 2011-12 के सात वर्षों में गरीबी में 15 प्रतिशत अंक से अधिक गिरावट आई — पिछले ग्यारह वर्षों की गिरावट से लगभग दोगुनी तेज़। 2011-12 में राजस्थान की गरीबी 14.71% (ग्रामीण 16.05%, शहरी 10.69%) थी — राष्ट्रीय औसत से कम।

ग. गरीबों की गिनती बनाम पहचान — सामाजिक-आर्थिक जाति जनगणना 2011

गरीबी का अनुमान (कितने गरीब) और गरीबों की पहचान (कौन गरीब) दो अलग काम हैं। पहचान के लिए 2011 में सामाजिक-आर्थिक जाति जनगणना (Socio-Economic and Caste Census) हुई, जिसके ग्रामीण आँकड़े 2015 में जारी हुए। उद्देश्य — समावेशन त्रुटि (Inclusion Error) यानी अपात्र का शामिल होना और बहिष्करण त्रुटि (Exclusion Error) यानी पात्र का छूटना, दोनों घटाना।

चरण

मापदंड

परिणाम

1. स्वतः बहिष्करण (Automatic Exclusion) — 14 मापदंड

मोटरयुक्त वाहन या मछली-नाव; मशीनी कृषि उपकरण; ₹50,000+ सीमा का किसान क्रेडिट कार्ड; सरकारी नौकरी या ₹10,000 मासिक से अधिक आय; आयकर दाता; 3+ पक्के कमरे; फ्रिज, लैंडलाइन; अधिक सिंचित भूमि

ऐसा परिवार गरीब नहीं

2. स्वतः समावेशन (Automatic Inclusion) — 5 श्रेणियाँ

बेघर परिवार; निराश्रित व भिक्षा पर निर्भर; हाथ से मैला ढोने वाले; विशेष रूप से कमज़ोर जनजातीय समूह; विधिक रूप से मुक्त बंधुआ मज़दूर

ऐसा परिवार सीधे सूची में

3. वंचना सूचकांक (Deprivation Indicators) — 7 मापदंड

(D1) कच्ची दीवार-छत वाला एक कमरा; (D2) 16-59 वर्ष का कोई वयस्क सदस्य नहीं; (D3) महिला मुखिया, 16-59 वर्ष का कोई वयस्क पुरुष नहीं; (D4) दिव्यांग सदस्य व कोई सक्षम वयस्क नहीं; (D5) अनुसूचित जाति/जनजाति परिवार; (D6) 25 वर्ष से ऊपर का कोई साक्षर वयस्क नहीं; (D7) भूमिहीन, आय का मुख्य ज़रिया दिहाड़ी शारीरिक श्रम

जितने अधिक अभाव, उतनी ऊँची प्राथमिकता

🔎 तालिका से क्या समझें: इन आँकड़ों का उपयोग प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण, उज्ज्वला आदि में लाभार्थी चुनने में हुआ। ताक़त — यह आय पूछने के बजाय दिखने वाले अभावों पर टिका है, इसलिए झूठी जानकारी की गुंजाइश कम।

घ. घरेलू उपभोग व्यय सर्वेक्षण 2022-23 और 2023-24

सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय ने लगभग एक दशक बाद 2022-23 और 2023-24 के घरेलू उपभोग व्यय सर्वेक्षण किए; 2023-24 में लगभग 2.62 लाख परिवार शामिल थे। विश्व बैंक के नए गरीबी अनुमान इन्हीं पर आधारित हैं।

औसत मासिक प्रति व्यक्ति उपभोग व्यय

2011-12

2022-23

2023-24

ग्रामीण (मुफ़्त वस्तुओं के मूल्य के बिना)

₹1,430

₹3,773

₹4,122

शहरी (मुफ़्त वस्तुओं के मूल्य के बिना)

₹2,630

₹6,459

₹6,996

शहरी-ग्रामीण अंतर

लगभग 84%

71%

70%

🔎 तालिका से क्या समझें: गाँव-शहर के ख़र्च का अंतर 84% (2011-12) से घटकर 70% (2023-24) रह गया — ग्रामीण उपभोग तेज़ बढ़ा। गैर-खाद्य ख़र्च का हिस्सा ग्रामीण में लगभग 53% और शहरी में 60% है; भोजन का घटता हिस्सा (एंगेल का नियम) बढ़ती समृद्धि का संकेत है।

⚠️ ध्यान दें — तुलना में सावधानी

नया सर्वेक्षण पुरानी पद्धति से अलग है, इसलिए 2011-12 से सीधी तुलना पर मतभेद है और नई आधिकारिक गरीबी रेखा अभी घोषित नहीं हुई।

🎯 याद रखें — इस खंड के मुख्य बिंदु

1. 1962 (₹20/₹25); दांडेकर-रथ 1971; अलघ 1979 (2400/2100 कैलोरी); लकड़ावाला 1993 (राज्यवार रेखा); तेंदुलकर (2009) — 2011-12: 25.7% / 13.7% / 21.9%।

2. रंगराजन (2014) — 2011-12: 30.95% / 26.4% / 29.5% (₹972 / ₹1,407); औपचारिक रूप से स्वीकार नहीं।

3. सामाजिक-आर्थिक जाति जनगणना 2011 — 14 बहिष्करण, 5 समावेशन, 7 वंचना मापदंड; उपभोग व्यय 2023-24 — ग्रामीण ₹4,122, शहरी ₹6,996।

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6. बहुआयामी गरीबी एवं असमानता (Multidimensional Poverty & Inequality)

दो परिवारों की आय बराबर है। पहले के घर में बिजली, शौचालय, गैस-चूल्हा और नल का पानी है; दूसरा परिवार लकड़ी के धुएँ में खाना बनाता है, खुले में शौच जाता है और बच्चे स्कूल नहीं जाते। आय-आधारित गरीबी रेखा दोनों को एक जैसा मानेगी, पर क्या दोनों की ज़िंदगी एक जैसी है? इसी प्रश्न से बहुआयामी गरीबी का विचार आया।

क. बहुआयामी गरीबी सूचकांक

📘 आसान परिभाषा: बहुआयामी गरीबी सूचकांक (Multidimensional Poverty Index)

📚 परिभाषा: संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम और ऑक्सफ़ोर्ड गरीबी एवं मानव विकास पहल (Oxford Poverty and Human Development Initiative) द्वारा 2010 से जारी सूचकांक, जो स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन-स्तर के 10 संकेतकों में एक साथ होने वाले अभावों को मापकर गरीबी की व्यापकता और तीव्रता बताता है।

✅ आसान भाषा में: यह "जेब" नहीं, जीवन देखता है — घर में कितनी चीज़ों की कमी है: पोषण, स्कूल, बिजली, पानी, शौचालय, पक्की छत। 🏠 उदाहरण: जैसे — किसी व्यक्ति के घर में खाना पकाने का स्वच्छ ईंधन, शौचालय और बिजली नहीं है और बच्चा कुपोषित है; उसके भारित अभाव एक-तिहाई से अधिक होने पर वह बहुआयामी गरीब है, चाहे आय कुछ भी हो।

गणना अल्कायर-फ़ोस्टर पद्धति (Alkire-Foster Method) से होती है — पहले हर संकेतक पर वंचना तय होती है, फिर देखा जाता है कि कुल भारित अभाव एक-तिहाई (33.33%) से अधिक हैं या नहीं (दोहरा कट-ऑफ़)।

🧮 बहुआयामी गरीबी सूचकांक की गणना

सूचकांक = गरीबी अनुपात (H) × तीव्रता (A); तीव्रता = गरीबों के वंचना-अंकों का औसत

उदाहरण: अनुपात 0.20 × तीव्रता 0.50 = 0.10

🔎 सूत्र से क्या समझें: सूचकांक कितने लोग गरीब हैं और कितने गहरे अभाव में हैं — दोनों पकड़ता है; इसलिए यह सबसे वंचित तक पहुँचने को प्रोत्साहित करता है।

🏏 क्रिकेट की भाषा में — फ़ॉलो-ऑन का निशान

मान लीजिए फ़ॉलो-ऑन बचाने के लिए 200 रन चाहिए। व्यक्ति-गणना अनुपात केवल यह गिनता है कि कितनी टीमें 200 से नीचे रहीं — 199 पर आउट टीम और 50 पर आउट टीम दोनों बराबर। निर्धनता अंतराल पूछता है — 200 से कितने रन कम रह गए? और वर्गित अंतराल 50 पर आउट हुई टीम की हालत को सबसे गंभीर मानकर उसे सबसे ज़्यादा महत्व देता है। अच्छा कोच तीनों देखता है — इसी तरह अच्छी नीति भी।

चित्र

चित्र 4: बहुआयामी गरीबी सूचकांक — 3 आयाम, 10 संकेतक और उनके भार

ख. वैश्विक बहुआयामी गरीबी सूचकांक 2025

📊 वैश्विक बहुआयामी गरीबी सूचकांक 2025 (अक्टूबर 2025) — नवीनतम आँकड़े

1. विश्व में लगभग 110 करोड़ लोग (लगभग 18.3%) तीव्र बहुआयामी गरीबी में; इनमें आधे से अधिक बच्चे हैं।

2. भारत — सूचकांक मान 0.069, गरीबी अनुपात लगभग 16.4%, तीव्रता लगभग 42% (2019-21 के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 पर आधारित)।

3. भारत में बहुआयामी गरीबी 55.1% (2005-06) से 16.4% (2019-21) — लगभग 41.5 करोड़ लोग बाहर; फिर भी विश्व के सबसे अधिक बहुआयामी गरीब (लगभग 23 करोड़) भारत में।

ग. नीति आयोग का राष्ट्रीय बहुआयामी गरीबी सूचकांक

नीति आयोग ने 12 संकेतकों वाला राष्ट्रीय बहुआयामी गरीबी सूचकांक बनाया — वैश्विक 10 संकेतकों के साथ मातृ स्वास्थ्य और बैंक खाता जोड़े गए। आँकड़े राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण से लिए जाते हैं।

रिपोर्ट

अवधि

मुख्य निष्कर्ष

प्रगति समीक्षा 2023 (जुलाई 2023)

2015-16 से 2019-21

गरीबी 24.85% से 14.96%; लगभग 13.5 करोड़ लोग बाहर; ग्रामीण 32.59% से 19.28%, शहरी 8.65% से 5.27%

चर्चा-पत्र "2005-06 से भारत में बहुआयामी गरीबी" (जनवरी 2024)

2013-14 से 2022-23

गरीबी 29.17% से 11.28% (17.89 प्रतिशत अंक कमी); 24.82 करोड़ लोग बाहर

⚠️ ध्यान दें — दो रिपोर्टें, दो आँकड़े

24.82 करोड़ का आँकड़ा जनवरी 2024 के चर्चा-पत्र (2013-14 से 2022-23) का है; जबकि "प्रगति समीक्षा 2023" ने 13.5 करोड़ (2015-16 से 2019-21) बताया था। 2022-23 का 11.28% सर्वेक्षण नहीं, बल्कि पिछले रुझानों पर आधारित अनुमान (Projection) है।

राज्य

2015-16

2019-21

विशेष

बिहार

51.89%

33.76%

सर्वाधिक अनुपात; 2013-14 से 2022-23 में 3.77 करोड़ बाहर

राजस्थान

28.86%

15.31%

1.87 करोड़ बाहर (चौथा स्थान); गिरावट लगभग 13.5 प्रतिशत अंक

केरल

0.70%

0.55%

सबसे कम अनुपात

भारत

24.85%

14.96%

—

🔎 तालिका से क्या समझें: सबसे बड़ी गिरावट सबसे गरीब राज्यों — बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, ओडिशा, राजस्थान — में आई; सबसे तेज़ सुधार स्वच्छता, खाना पकाने के ईंधन, बिजली और बैंक खाते में। पोषण में सुधार सबसे धीमा है — यही सबसे बड़ी चुनौती।

घ. गरीबी के माप — कितने, कितने गहरे, कितने गंभीर?

गरीबी तीन प्रश्नों से मापी जाती है — व्यापकता (Incidence), गहराई (Depth) और गंभीरता (Severity)। साथ ही सेन निर्धनता सूचकांक (1976) तीनों को गिनी के साथ जोड़ता है और हूवर (रॉबिन हुड) सूचकांक बताता है कि पूर्ण समानता के लिए आय का कितना हिस्सा अमीरों से गरीबों को देना होगा।

सूचकांक

किस प्रश्न का उत्तर

क्या मापता है

व्यक्ति-गणना अनुपात (Headcount Ratio, P0)

कितने लोग गरीब?

गरीबी रेखा से नीचे की जनसंख्या का प्रतिशत — केवल व्यापकता; रेखा से कितना नीचे, इसकी अनदेखी

निर्धनता अंतराल सूचकांक (Poverty Gap Index, P1)

गरीब कितने गरीब हैं?

गरीबों की आय/व्यय की गरीबी रेखा से औसत दूरी — गहराई; गरीबी मिटाने के लिए कुल कितना धन चाहिए

वर्गित निर्धनता अंतराल (Squared Poverty Gap, P2)

गरीबी कितनी गंभीर है?

हर गरीब के अंतराल का वर्ग — सबसे गरीब को सबसे अधिक भार; गरीबों के बीच की असमानता भी पकड़ता है

💡 क्या आप जानते हैं? बहुआयामी गरीबी में किसी व्यक्ति के भारित अभाव 20% से 33.3% के बीच हों तो वह गरीब नहीं, पर गरीबी के प्रति सुभेद्य (Vulnerable) माना जाता है — यानी एक झटका उसे गरीबी में धकेल सकता है।

ङ. असमानता — लॉरेंज वक्र और गिनी गुणांक

📘 आसान परिभाषा: गिनी गुणांक (Gini Coefficient)

📚 परिभाषा: आय, उपभोग या संपत्ति के वितरण में असमानता का सांख्यिकीय माप, जो समानता रेखा और लॉरेंज वक्र के बीच के क्षेत्रफल को समानता रेखा के नीचे के कुल क्षेत्रफल से भाग देकर निकाला जाता है; इसका मान 0 (पूर्ण समानता) से 1 (पूर्ण असमानता) के बीच होता है।

✅ आसान भाषा में: मान जितना कम, समाज उतना बराबर। 0 = सबके पास बराबर; 1 = सारा धन एक ही व्यक्ति के पास। 🏠 उदाहरण: जैसे — 10 लोगों के बीच ₹100 हों और हर किसी के पास ₹10 हों तो गिनी 0 है; अगर पूरे ₹100 एक के पास हों तो गिनी लगभग 1।

📖 पीछे की कहानी — एक विद्यार्थी का वक्र और एक इतालवी का अंक

1905 में विस्कॉन्सिन विश्वविद्यालय के युवा विद्यार्थी मैक्स लॉरेंज ने असमानता को एक चित्र में दिखाया — जनसंख्या के संचयी प्रतिशत के सामने आय के संचयी प्रतिशत का ग्राफ़, यानी लॉरेंज वक्र। 1912 में इतालवी सांख्यिकीविद् कोराडो गिनी ने इसे एक संख्या — गिनी गुणांक — में बदल दिया। एक सदी बाद भी असमानता इन्हीं दो औज़ारों से नापी जाती है।

📊 भारत में असमानता — नवीनतम आँकड़े

1. उपभोग-आधारित गिनी (विश्व बैंक, 2025): 25.5 (2022-23), 2011-12 के 28.8 से कम — उपभोग समानता में भारत विश्व के सबसे समान देशों में (स्लोवाकिया, स्लोवेनिया, बेलारूस के बाद चौथा)।

2. आय व संपत्ति असमानता (विश्व असमानता प्रयोगशाला, 2024): 2022-23 में शीर्ष 1% के पास राष्ट्रीय आय का 22.6% और संपत्ति का 40.1%; शीर्ष 10% के पास आय का लगभग 57.7% — 1922 के बाद सबसे ऊँचा स्तर।

⚠️ ध्यान दें — उपभोग बनाम आय-संपत्ति

उपभोग की असमानता आय-संपत्ति से कम दिखती है, क्योंकि अमीर आय का बड़ा हिस्सा बचाते-निवेश करते हैं और सर्वेक्षणों में अति-धनी कम पकड़ में आते हैं। "चौथा सबसे समान देश" केवल उपभोग पर लागू है; आय-संपत्ति में भारत अधिक असमान देशों में है।

च. केरल — अत्यधिक गरीबी से मुक्त होने का दावा

1 नवंबर 2025 को केरल ने स्वयं को भारत का पहला "अत्यधिक गरीबी मुक्त" राज्य घोषित किया। 2021 में शुरू अत्यधिक गरीबी उन्मूलन परियोजना में स्थानीय निकायों ने घर-घर सर्वेक्षण से 64,006 परिवार चुने और हर एक के लिए सूक्ष्म-योजना (Micro-plan) बनाई — भोजन, स्वास्थ्य, सुरक्षित आश्रय और आय-सुरक्षा/दस्तावेज़ के चार आधारों पर; ₹1,000 करोड़ से अधिक ख़र्च हुए।

🔎 मूल्यांकन से क्या समझें: ताक़त — कुटुंबश्री (महिला स्वयं सहायता समूह नेटवर्क) और पंचायतों का अभिसरण तथा परिवार-विशिष्ट योजना। आलोचकों के अनुसार पहचान का दायरा संकरा था और कोई स्वतंत्र बहुआयामी मापन नहीं हुआ; फिर भी "हर परिवार, अलग योजना" तरीक़ा सीखने योग्य है।

💡 क्या आप जानते हैं? वैश्विक बहुआयामी गरीबी सूचकांक 2025 में पाया गया कि दुनिया के लगभग 79% बहुआयामी गरीब (करीब 88.7 करोड़) भीषण गर्मी, सूखा, बाढ़ या वायु प्रदूषण जैसे कम-से-कम एक जलवायु ख़तरे के सीधे संपर्क में हैं।

🎯 याद रखें — इस खंड के मुख्य बिंदु

1. वैश्विक बहुआयामी सूचकांक — 2010 से, 3 आयाम, 10 संकेतक; गरीब = भारित अभाव ≥ एक-तिहाई; सूचकांक = अनुपात × तीव्रता; भारत 0.069, अनुपात 16.4%।

2. राष्ट्रीय सूचकांक (नीति आयोग) — 12 संकेतक; 29.17% (2013-14) से 11.28% (2022-23), 24.82 करोड़ बाहर; सर्वाधिक — बिहार 33.76%, न्यूनतम — केरल 0.55%; राजस्थान 28.86% से 15.31%।

3. गिनी = (A) ÷ (A + B); भारत उपभोग गिनी 25.5; केरल 1 नवंबर 2025 को अत्यधिक गरीबी मुक्त घोषित (64,006 परिवार)।

7. गरीबी के कारण, परिणाम एवं निवारण (Causes, Consequences & Poverty Alleviation)

क. गरीबी का दुष्चक्र (Vicious Circle of Poverty)

अर्थशास्त्री रैगनर नर्क्से (1953) ने बताया कि "एक देश गरीब है, क्योंकि वह गरीब है" — गरीब परिवार बच्चों को शिक्षा-पोषण नहीं दे पाता, कम कौशल से आय कम रहती है और अगली पीढ़ी फिर वही चक्र दोहराती है। देश के स्तर पर चक्र दो तरफ़ से चलता है।

🔁 आपूर्ति पक्ष (Supply Side)

🔁 माँग पक्ष (Demand Side)

◆ कम आय

◆ इसलिए कम बचत

◆ इसलिए कम पूँजी-निवेश

◆ इसलिए कम उत्पादकता

◆ और फिर कम आय

◆ कम आय

◆ इसलिए कम क्रय-शक्ति (बाज़ार छोटा)

◆ इसलिए निवेश की प्रेरणा कम

◆ इसलिए कम उत्पादकता

◆ और फिर कम आय

ख. गरीबी के कारण

कारण का प्रकार

मुख्य बिंदु

ऐतिहासिक

औपनिवेशिक शासन में धन का निष्कासन, हस्तशिल्प-उद्योगों का विनाश, ज़मींदारी व्यवस्था; विभाजन से बड़ी आबादी का विस्थापन

आर्थिक

कृषि पर अत्यधिक निर्भरता और कम उत्पादकता; प्रच्छन्न बेरोज़गारी; भूमि-पूँजी-कौशल का असमान वितरण; संस्थागत ऋण तक कम पहुँच; मुद्रास्फीति से क्रय-शक्ति में गिरावट

सामाजिक

शिक्षा-स्वास्थ्य-कौशल तक कम पहुँच; जाति व्यवस्था से अवसरों से वंचना; विवाह, मृत्यु-भोज जैसे रीति-रिवाजों पर आय का बड़ा हिस्सा; लैंगिक भेदभाव

प्रशासनिक

भ्रष्टाचार और रिसाव (Leakage); योजनाओं का कमज़ोर क्रियान्वयन; बड़ी परियोजनाओं (बाँध, खनन) से विस्थापन

पर्यावरणीय-भौगोलिक

सूखा, बाढ़, चक्रवात; जलवायु परिवर्तन; दुर्गम, मरुस्थलीय और पहाड़ी क्षेत्रों में सीमित अवसर

❝ "गरीबी पर विजय पाना दान का कार्य नहीं, न्याय का कार्य है।" (Overcoming poverty is not a task of charity, it is an act of justice.) (— नेल्सन मंडेला (2005))

📘 आसान परिभाषा: गरीबी की संस्कृति (Culture of Poverty)

📚 परिभाषा: अमेरिकी मानवशास्त्री ऑस्कर लुईस (1959) द्वारा प्रतिपादित अवधारणा — लंबे समय तक गरीबी में रहने वाले समुदायों में भाग्यवाद, निराशा, तात्कालिक संतुष्टि और कम आकांक्षाओं जैसे मूल्य विकसित हो जाते हैं, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलकर गरीबी को बनाए रखते हैं।

✅ आसान भाषा में: जब इंसान बार-बार हारता है तो सोचने लगता है — "हमारी क़िस्मत में यही है"। यही सोच उसे मौक़ा मिलने पर भी आगे बढ़ने से रोकती है। 🏠 उदाहरण: जैसे — गाँव में छात्रवृत्ति योजना होने पर भी कोई परिवार यह मानकर बेटी का आवेदन नहीं करता कि "पढ़कर क्या होगा", तो गरीबी अगली पीढ़ी तक पहुँच जाती है।

ग. गरीबी के परिणाम

क्षेत्र

परिणाम

स्वास्थ्य

कुपोषण, एनीमिया, ऊँची शिशु व मातृ मृत्यु दर, बीमारियों का अधिक बोझ

शिक्षा

बच्चों का स्कूल छोड़ना, बाल श्रम, कम कौशल — अगली पीढ़ी की गरीबी

अर्थव्यवस्था

कम उत्पादकता, कम माँग, छोटा बाज़ार; राज्य पर सब्सिडी-कल्याण का बोझ और राजकोषीय दबाव

समाज

असमानता, सामाजिक तनाव, अपराध और असंतोष; महिलाओं-बच्चों पर सर्वाधिक असर

घ. गरीबी निवारण के दृष्टिकोण

दृष्टिकोण

मूल विचार

उदाहरण

1. संवृद्धि-आधारित / रिसाव (Trickle-down)

तेज़ संवृद्धि से रोज़गार-आय बढ़ेगी और लाभ नीचे तक रिसकर पहुँचेगा (जगदीश भगवती)

आरंभिक पंचवर्षीय योजनाएँ, 1991 के सुधार

2. प्रत्यक्ष गरीबी-निवारण (Direct Attack)

गरीबों के लिए सीधे रोज़गार, परिसंपत्ति और खाद्य कार्यक्रम

काम के बदले अनाज, रोज़गार गारंटी, आजीविका मिशन

3. बुनियादी ज़रूरतें व क्षमता (Basic Needs & Capability)

शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, आवास में निवेश से क्षमता बढ़ाना (सेन)

न्यूनतम आवश्यकता कार्यक्रम (1974), समग्र शिक्षा

4. अधिकार-आधारित (Rights-based)

कल्याण को "दया" नहीं, क़ानूनी अधिकार बनाना — न मिले तो न्यायालय जा सकें

रोज़गार गारंटी 2005, शिक्षा का अधिकार 2009, खाद्य सुरक्षा 2013

🔎 तुलना से क्या समझें: संवृद्धि "पाई" को बड़ा करती है; प्रत्यक्ष कार्यक्रम सुनिश्चित करते हैं कि टुकड़ा सबसे कमज़ोर तक पहुँचे। केवल संवृद्धि की सीमाएँ — रोज़गार-विहीन संवृद्धि, बढ़ती असमानता और पीछे छूटे वर्ग — इसलिए सुरक्षा-जाल अनिवार्य।

ङ. गरीबी-निवारण कार्यक्रमों का विकास

📖 पीछे की कहानी — महाराष्ट्र का सूखा और रोज़गार गारंटी का जन्म

1960 के दशक में वि. स. पागे ने सांगली में विचार रखा कि जो भी काम माँगे, सरकार उसे काम दे। 1970-73 के भीषण सूखे में महाराष्ट्र ने इसे रोज़गार गारंटी योजना के रूप में पूरे राज्य में लागू किया, धन के लिए शहरी वेतनभोगियों पर विशेष कर लगाया; 1977 में इसे क़ानूनी रूप मिला। यही प्रयोग 2005 के राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी क़ानून का आधार बना।

वर्ष

कार्यक्रम

मुख्य उद्देश्य / आगे क्या हुआ

1971 / 1974-79

"गरीबी हटाओ" नारा; पाँचवीं पंचवर्षीय योजना

गरीबी उन्मूलन व आत्मनिर्भरता मुख्य लक्ष्य; न्यूनतम आवश्यकता कार्यक्रम; 20 सूत्री कार्यक्रम (1975)

1977

काम के बदले अनाज कार्यक्रम

मज़दूरी के बदले अनाज; 1980 में राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार कार्यक्रम में बदला

1978-80

एकीकृत ग्रामीण विकास कार्यक्रम (Integrated Rural Development Programme)

गरीब परिवारों को ऋण-अनुदान से परिसंपत्ति (पशु, औज़ार); 2 अक्टूबर 1980 से पूरे देश में; 1999 में स्वरोज़गार योजना में विलय

1985

इंदिरा आवास योजना

ग्रामीण गरीबों के लिए आवास; 2016 में प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण बनी

1997 / 1999

स्वर्ण जयंती शहरी रोज़गार योजना; स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोज़गार योजना

स्वयं सहायता समूहों से स्वरोज़गार — क्रमशः 2013 में शहरी आजीविका मिशन और 2011 में ग्रामीण आजीविका मिशन में रूपांतरित

2000

अंत्योदय अन्न योजना; प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना

सबसे गरीब परिवारों को सस्ता अनाज; गाँवों तक सड़क

2005

राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम

2 फ़रवरी 2006 से लागू; 2009 में महात्मा गांधी का नाम जुड़ा; हर ग्रामीण परिवार को 100 दिन काम का क़ानूनी अधिकार

2011 / 2013

राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन; राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन

2016 से दीनदयाल अंत्योदय योजना के अंतर्गत; "गरीबों का, गरीबों के लिए, गरीबों के द्वारा"

2025-26

विकसित भारत — रोज़गार एवं आजीविका गारंटी मिशन (ग्रामीण) अधिनियम, 2025

1 जुलाई 2026 से ग्रामीण रोज़गार गारंटी का स्थान; 125 दिन काम (विस्तार अगले खंडों में)

🔎 विकास-क्रम से क्या समझें: तीन बड़े बदलाव — (1) अनुदान से अधिकार (योजना से क़ानून); (2) व्यक्ति से समूह (व्यक्तिगत ऋण से स्वयं सहायता समूह); (3) बिखरे कार्यक्रमों से विलय और मिशन-मोड।

च. अधिकार-आधारित दृष्टिकोण और प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण

अधिकार

क़ानून

गरीबी से संबंध

सूचना का अधिकार

2005

राशन, मज़दूरी, पेंशन में गड़बड़ी पूछने की ताक़त — भ्रष्टाचार पर अंकुश

काम का अधिकार

ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम, 2005

माँगने पर 15 दिन में काम, नहीं तो बेरोज़गारी भत्ता

वन अधिकार

वन अधिकार अधिनियम, 2006

जनजातियों को भूमि और वन-उपज पर अधिकार — आजीविका सुरक्षा

पिछले दशक का सबसे बड़ा बदलाव जन धन-आधार-मोबाइल (JAM) पर टिका प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (Direct Benefit Transfer) रहा — पैसा सीधे खाते में, फ़र्ज़ी लाभार्थी हटे, रिसाव घटा; सामाजिक अंकेक्षण ने गाँव की सभा को जाँच का अधिकार दिया। 103वें संविधान संशोधन (2019) से आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग को 10% तक आरक्षण मिला — पहली बार आधार आर्थिक स्थिति बनी।

💡 क्या आप जानते हैं? ब्राज़ील की बोल्सा फ़ैमिलिया (2003) सशर्त नकद हस्तांतरण का प्रसिद्ध उदाहरण है — बच्चों की स्कूल-उपस्थिति और टीकाकरण की शर्त पर माताओं को नकद सहायता दी जाती है।

💡 क्या आप जानते हैं? बांग्लादेश के मुहम्मद यूनुस और ग्रामीण बैंक को गरीबों, विशेषकर महिलाओं को बिना गारंटी के सूक्ष्म ऋण देने के मॉडल के लिए 2006 का नोबेल शांति पुरस्कार मिला।

छ. सार्वभौमिक बुनियादी आय — एक बहस

📘 आसान परिभाषा: सार्वभौमिक बुनियादी आय (Universal Basic Income)

📚 परिभाषा: एक ऐसी व्यवस्था जिसमें राज्य सभी नागरिकों को उनकी आय, संपत्ति या रोज़गार की स्थिति देखे बिना नियमित रूप से एक निश्चित, बिना शर्त नकद राशि देता है; इसके तीन घटक हैं — सार्वभौमिकता (Universality), बिना शर्त (Unconditionality) और नकद हस्तांतरण (Cash Transfer)।

✅ आसान भाषा में: सरकार हर महीने हर नागरिक के खाते में एक तय रक़म डाले — न फ़ॉर्म, न शर्त, न "गरीब होने" का प्रमाण। 🏠 उदाहरण: जैसे — हर वयस्क के खाते में हर महीने ₹600-700 आएँ, जिनसे वह अपनी ज़रूरत के हिसाब से बीज, दवा या बच्चों की फ़ीस पर ख़र्च करे।

आर्थिक समीक्षा 2016-17 ने अनुमान लगाया कि सबसे गरीब 75% आबादी को लगभग ₹7,620 प्रति वर्ष देने पर सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 4.9% ख़र्च होगा। 2011-13 में मध्य प्रदेश के इंदौर ज़िले के गाँवों में स्व-रोज़गार महिला संघ ने यूनिसेफ़ के सहयोग से पायलट किया — पोषण, स्कूल-उपस्थिति और छोटे उद्यमों में सुधार दिखा।

🌟 पक्ष में तर्क

⚠️ विपक्ष में तर्क

◆ सैकड़ों योजनाओं की जगह एक सरल व्यवस्था — प्रशासनिक लागत और रिसाव कम

◆ लाभार्थी चुनने की समावेशन-बहिष्करण त्रुटियाँ ख़त्म

◆ गरीब को अपनी ज़रूरत तय करने की स्वतंत्रता और सम्मान

◆ बहुत बड़ा राजकोषीय बोझ — अमीरों को भी पैसा क्यों?

◆ काम करने की प्रेरणा घटने (नैतिक जोखिम) और नशे-फ़िज़ूलख़र्ची पर ख़र्च की आशंका

◆ नकद से स्वास्थ्य-शिक्षा जैसी सार्वजनिक सेवाओं का स्थान नहीं भरा जा सकता

🔎 भारत का रास्ता से क्या समझें: भारत ने लक्षित नकद हस्तांतरण का रास्ता चुना है — किसानों को आय सहायता, महिलाओं को मासिक सहायता और पेंशन; यह "आंशिक बुनियादी आय" जैसा है, जिसमें राजकोषीय बोझ सीमित रहता है।

ज. राजस्थान से जुड़ाव

🏛️ राजस्थान — गरीबी निवारण की प्रमुख पहलें

◆ आकांक्षी ज़िले (2018): राजस्थान के 5 ज़िले — धौलपुर, जैसलमेर, करौली, बारां, सिरोही; 2023 से आकांक्षी ब्लॉक कार्यक्रम भी।

◆ इंदिरा गांधी शहरी रोज़गार गारंटी योजना (2022): ग्रामीण रोज़गार गारंटी की तर्ज़ पर शहरी परिवारों को रोज़गार — देश के शुरुआती शहरी रोज़गार गारंटी प्रयोगों में से एक।

◆ राजस्थान न्यूनतम गारंटीड आय अधिनियम, 2023: ग्रामीण-शहरी परिवारों को रोज़गार और बुज़ुर्ग-विधवा-दिव्यांगों को न्यूनतम पेंशन की क़ानूनी गारंटी, पेंशन में हर वर्ष 15% वृद्धि का प्रावधान।

झ. आगे की राह (Way Forward)

क्षेत्र

क्या करना होगा

नई आधिकारिक गरीबी रेखा

2022-23 और 2023-24 के उपभोग सर्वेक्षणों पर नियमित, पारदर्शी गरीबी आकलन; आय और बहुआयामी दोनों माप साथ-साथ

रोज़गार-प्रधान संवृद्धि

वस्त्र, खाद्य प्रसंस्करण, पर्यटन, निर्माण जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्र; लघु उद्यमों को सस्ता ऋण

पोषण पर मिशन-मोड

नाटापन-दुर्बलता-एनीमिया में धीमा सुधार ही बहुआयामी गरीबी की सबसे कमज़ोर कड़ी

फिर से गरीबी में फिसलने से बचाव

रेखा से ठीक ऊपर के परिवारों के लिए स्वास्थ्य बीमा, फ़सल बीमा, आपदा-राहत — इलाज का जेब-ख़र्च घटाना

🎯 याद रखें — इस खंड के मुख्य बिंदु

1. गरीबी का दुष्चक्र — रैगनर नर्क्से (1953); गरीबी की संस्कृति — ऑस्कर लुईस (1959)।

2. काम के बदले अनाज 1977, एकीकृत ग्रामीण विकास 1980, रोज़गार गारंटी 2005, ग्रामीण आजीविका मिशन 2011; नया ग्रामीण रोज़गार क़ानून 1 जुलाई 2026 से।

3. सार्वभौमिक बुनियादी आय — 3 घटक; आर्थिक समीक्षा 2016-17; मध्य प्रदेश पायलट 2011-13; राजस्थान न्यूनतम गारंटीड आय अधिनियम 2023।

8. भूख, पोषण एवं खाद्य सुरक्षा (Hunger, Nutrition & Food Security)

भारत दुनिया के सबसे बड़े अनाज उत्पादकों में है और करोड़ों लोगों को मुफ़्त अनाज मिलता है, फिर भी हर तीसरा छोटा बच्चा नाटा है और आधी से अधिक महिलाओं में ख़ून की कमी है। यानी पेट भरना और पोषण मिलना दो अलग बातें हैं।

क. भूख और कुपोषण की शब्दावली

शब्द

मापदंड

क्या बताता है

भुखमरी / भूख (Hunger)

पर्याप्त कैलोरी न मिलना

तात्कालिक शारीरिक संकट — पेट ही नहीं भरता

अल्पपोषण (Undernourishment)

जनसंख्या का वह % जिसका नियमित कैलोरी उपभोग न्यूनतम आवश्यकता से कम

पूरी आबादी में भोजन की कमी

नाटापन / बौनापन (Stunting)

आयु के अनुपात में कद कम

दीर्घकालिक (Chronic) कुपोषण — लंबे समय से कम पोषण

दुबलापन / क्षीणता (Wasting)

कद के अनुपात में वज़न बहुत कम

तीव्र (Acute) कुपोषण — हाल का भोजन-संकट या बीमारी

छिपी भूख (Hidden Hunger)

कैलोरी पर्याप्त, पर विटामिन-खनिज (लोहा, आयोडीन, ज़िंक, विटामिन A) की कमी

बाहर से स्वस्थ दिखने वाला व्यक्ति भी भीतर से कमज़ोर

📘 आसान परिभाषा: कुपोषण (Malnutrition)

📚 परिभाषा: शरीर को आवश्यक ऊर्जा, प्रोटीन, विटामिन और खनिजों की कमी, अधिकता या असंतुलन की स्थिति; इसमें अल्पपोषण (Undernutrition), सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी और अधिक वज़न-मोटापा तीनों शामिल हैं।

✅ आसान भाषा में: कुपोषण का अर्थ सिर्फ़ "कम खाना" नहीं, बल्कि ग़लत या असंतुलित खाना भी है — दुबला बच्चा भी कुपोषित है और ज़रूरत से ज़्यादा मोटा बच्चा भी। 🏠 उदाहरण: जैसे — एक बच्चा रोज़ भरपेट चावल खाता है पर दाल, सब्ज़ी, दूध नहीं — उसका पेट भरा है, पर शरीर को लोहा और प्रोटीन नहीं मिल रहे।

❝ "दुनिया में ऐसे भी भूखे लोग हैं जिनके सामने भगवान रोटी के सिवा किसी और रूप में प्रकट ही नहीं हो सकता।" (There are people in the world so hungry, that God cannot appear to them except in the form of bread.) (— महात्मा गांधी (1931))

📘 आसान परिभाषा: एनीमिया / रक्ताल्पता (Anaemia)

📚 परिभाषा: रक्त में लाल रक्त कोशिकाओं (Red Blood Cells) या हीमोग्लोबिन की मात्रा सामान्य से कम होना, जिससे शरीर के अंगों तक ऑक्सीजन पहुँचाने की क्षमता घट जाती है; भारत में इसका सबसे बड़ा कारण लोहे (आयरन) की कमी है।

✅ आसान भाषा में: ख़ून में "ऑक्सीजन ढोने वाली गाड़ियाँ" कम हो जाती हैं — इसलिए थकान, चक्कर, पढ़ाई और काम में ध्यान की कमी होती है; गर्भवती महिला में यह माँ और बच्चे दोनों के लिए ख़तरा है। 🏠 उदाहरण: जैसे — दिन भर खेत में काम करने वाली महिला जल्दी थक जाती है, बार-बार बीमार पड़ती है और उसका बच्चा कम वज़न के साथ पैदा होता है।

जब एक ही देश-घर में कुपोषित बच्चा और मोटापे से ग्रस्त वयस्क साथ दिखें, तो यह कुपोषण का दोहरा बोझ (Double Burden of Malnutrition) है; छिपी भूख जोड़ने पर तिहरा बोझ — भारत आज इसी स्थिति में है।

ख. वैश्विक भुखमरी सूचकांक (Global Hunger Index)

यह सूचकांक हर वर्ष आयरलैंड की कंसर्न वर्ल्डवाइड (Concern Worldwide) और जर्मनी की वेल्टहंगरहिल्फ़ (Welthungerhilfe) जारी करती हैं। स्कोर 0 से 100; जितना कम, उतना अच्छा। चार संकेतक — अल्पपोषण (1/3), बाल मृत्यु दर (1/3), बाल नाटापन (1/6), बाल दुबलापन (1/6)। भारत 2025: अल्पपोषण 12.0%, नाटापन 32.9%, दुबलापन 18.7% (रिपोर्ट में दूसरा सबसे ऊँचा), बाल मृत्यु 2.8%।

📊 वैश्विक भुखमरी सूचकांक — भारत — नवीनतम आँकड़े

1. 2025 संस्करण (20वाँ): स्कोर 25.8, 123 देशों में 102वाँ स्थान, श्रेणी — "गंभीर" (Serious)।

2. 2024 संस्करण: स्कोर 27.3, 127 देशों में 105वाँ; वर्ष 2000 में स्कोर 38.1 ("चिंताजनक") था — सबसे बड़ा सुधार बाल मृत्यु दर में।

3. श्रेणियाँ — 10 से कम निम्न, 10-19.9 मध्यम, 20-34.9 गंभीर, 35-49.9 चिंताजनक, 50+ अत्यधिक चिंताजनक।

⚠️ ध्यान दें — सूचकांक पर बहस

भारत सरकार पद्धति पर आपत्ति जताती रही है — चार में से तीन संकेतक केवल बच्चों से जुड़े हैं और बाल मृत्यु दर स्वच्छता-स्वास्थ्य से भी तय होती है। फिर भी बच्चों में ऊँचा दुबलापन वास्तविक चुनौती है।

ग. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण — पोषण की तस्वीर

पोषण का सबसे विश्वसनीय घरेलू पैमाना राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (National Family Health Survey) है, जो अंतर्राष्ट्रीय जनसंख्या विज्ञान संस्थान, मुंबई के माध्यम से होता है। छठा दौर (2023-24) मई 2026 के अंत में जारी हुआ।

पोषण संकेतक (5 वर्ष से कम आयु के बच्चे)

पाँचवाँ दौर (2019-21)

छठा दौर (2023-24)

दिशा

नाटापन (Stunting)

35.5%

29.3%

उल्लेखनीय गिरावट (6.2 अंक)

दुबलापन (Wasting)

19.3%

लगभग 19%

लगभग स्थिर

गंभीर दुबलापन (Severe Wasting)

7.7%

5.2%

सुधार

अल्प-वज़न (Underweight)

32.1%

31.8%

बहुत मामूली सुधार

🔎 तालिका से क्या समझें: नाटापन तेज़ी से घटा है, पर दुबलापन लगभग वहीं है — यानी गर्भावस्था में माँ का पोषण, जन्म के समय कम वज़न और शुरुआती देखभाल अब भी कमज़ोर कड़ी है।

एनीमिया (पाँचवाँ दौर, 2019-21)

प्रतिशत

चौथे दौर (2015-16) से तुलना

6-59 माह के बच्चे

67.1%

58.6% से बढ़ा

15-49 वर्ष की महिलाएँ

57.0%

53.1% से बढ़ा

गर्भवती महिलाएँ

52.2%

50.4% से बढ़ा

छठे दौर के तथ्य-पत्रक में एनीमिया का आँकड़ा शामिल नहीं है (रक्त-जाँच पद्धति पर बहस), इसलिए एनीमिया के लिए पाँचवें दौर के आँकड़े ही नवीनतम आधार हैं।

💡 क्या आप जानते हैं? भारत की पहल पर संयुक्त राष्ट्र ने 2023 को अंतर्राष्ट्रीय मोटा अनाज वर्ष (International Year of Millets) घोषित किया; देश में मोटे अनाजों को अब श्री अन्न कहा जाता है।

घ. पोषण के लिए प्रमुख कार्यक्रम

📘 आसान परिभाषा: एकीकृत बाल विकास सेवाएँ (Integrated Child Development Services)

📚 परिभाषा: महिला एवं बाल विकास मंत्रालय का प्रमुख कार्यक्रम, जो 2 अक्टूबर 1975 को आरंभ हुआ; यह आंगनवाड़ी केंद्रों के माध्यम से 0-6 वर्ष के बच्चों, गर्भवती व धात्री महिलाओं और किशोरियों को पोषण, स्वास्थ्य और स्कूल-पूर्व शिक्षा की समेकित सेवाएँ देता है।

✅ आसान भाषा में: गाँव-मोहल्ले की आंगनवाड़ी एक छोटा-सा केंद्र है जहाँ बच्चे को खाना, खेल-खेल में पढ़ाई, वज़न की जाँच और टीका — सब एक ही छत के नीचे मिलता है। 🏠 उदाहरण: जैसे — आंगनवाड़ी दीदी हर महीने बच्चे का वज़न तौलकर पोषण ट्रैकर ऐप पर दर्ज करती है; वज़न कम हो तो माँ को अतिरिक्त पोषाहार और सलाह मिलती है।

🏛️ पोषण अभियान से "सक्षम आंगनवाड़ी एवं पोषण 2.0" तक

◆ पोषण अभियान (प्रधानमंत्री समग्र पोषण योजना) — 8 मार्च 2018 (अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस) को झुंझुनूं, राजस्थान से आरंभ।

◆ मूल लक्ष्य — नाटापन, अल्पपोषण और जन्म के समय कम वज़न में हर वर्ष 2% तथा बच्चों, किशोरियों व महिलाओं में एनीमिया में हर वर्ष 3% की कमी।

◆ सक्षम आंगनवाड़ी एवं पोषण 2.0 — बजट 2021-22 की छतरी योजना; पूरक पोषण, पोषण अभियान और किशोरियों की योजना इसमें मिलीं; 2 लाख आंगनवाड़ियाँ "सक्षम" बनाना।

📘 आसान परिभाषा: एनीमिया मुक्त भारत (Anaemia Mukt Bharat)

📚 परिभाषा: पोषण अभियान के अंतर्गत 2018 में आरंभ रणनीति, जो "6×6×6" ढाँचे — 6 लक्षित समूह, 6 हस्तक्षेप और 6 संस्थागत तंत्र — से जीवन-चक्र के हर चरण में एनीमिया को हर वर्ष 3 प्रतिशत अंक घटाने का लक्ष्य रखती है।

✅ आसान भाषा में: छोटे बच्चे से लेकर गर्भवती महिला तक — हर उम्र के लिए अलग ख़ुराक की आयरन-फ़ोलिक एसिड गोली या सिरप, पेट के कीड़ों की दवा और जाँच-इलाज। 🏠 उदाहरण: जैसे — स्कूल में हर सोमवार किशोर-किशोरियों को नीली आयरन गोली दी जाती है और साल में दो बार कृमि-नाशक दवा खिलाई जाती है।

योजना

मुख्य बातें

प्रधानमंत्री पोषण शक्ति निर्माण (PM POSHAN)

पुरानी मध्याह्न भोजन योजना का नया रूप (2021-22 से 2025-26); बालवाटिका से कक्षा 8 तक गर्म पका भोजन — प्राथमिक 450 कैलोरी + 12 ग्राम प्रोटीन, उच्च प्राथमिक 700 कैलोरी + 20 ग्राम प्रोटीन; तिथि भोजन और स्कूल पोषण वाटिकाएँ

प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना

पहले बच्चे पर ₹5,000 (दो किस्तों में) और दूसरी संतान बालिका होने पर ₹6,000 — प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण से; उद्देश्य — गर्भावस्था में मज़दूरी-हानि की भरपाई और बेहतर पोषण

📖 पीछे की कहानी — जब एक मुख्यमंत्री ने भूखे बच्चे की बात सुनी

मद्रास राज्य (आज का तमिलनाडु) के मुख्यमंत्री के. कामराज ने एक दौरे में मवेशी चराते लड़के से पूछा कि वह स्कूल क्यों नहीं जाता। उत्तर मिला — "स्कूल जाऊँगा तो खाना कौन देगा?" इसने उन्हें झकझोर दिया। 1956 के आसपास उन्होंने स्कूलों में भोजन पूरे राज्य में फैलाया, नामांकन बढ़ा, और यही मॉडल 1995 में राष्ट्रीय मध्याह्न भोजन कार्यक्रम बना। 2001 में सर्वोच्च न्यायालय ने सभी सरकारी स्कूलों में पका हुआ भोजन अनिवार्य किया — आज की प्रधानमंत्री पोषण योजना।

ङ. खाद्य सुरक्षा — एक त्वरित पुनरावृत्ति

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 ग्रामीण 75% और शहरी 50% आबादी को सस्ता अनाज पाने का कानूनी अधिकार देता है — प्राथमिकता परिवारों को 5 किलो प्रति व्यक्ति प्रति माह, अंत्योदय को 35 किलो प्रति परिवार। 1 जनवरी 2024 से यह अनाज पाँच वर्षों के लिए पूरी तरह मुफ़्त है (लगभग 81 करोड़ लाभार्थी)। अनाज से पेट भरता है, पोषण के लिए दाल, दूध, अंडा, सब्ज़ी और मोटे अनाज की विविधता चाहिए — विस्तृत चर्चा कृषि अध्याय में है।

🐪 राजस्थान की भाषा में — पोषण बनाम पेट भरना

दादी कहती हैं — "बाजरे की रोटी, छाछ, कैर-सांगरी और घी — यही असली ताक़त है।" बाजरा लोहे और रेशे से भरपूर है, छाछ प्रोटीन-कैल्शियम देती है। पर जब परिवार सिर्फ़ चावल और पैकेट वाले नमकीन-बिस्कुट पर आ जाता है, तो पेट भरता है पर बच्चे में छिपी भूख पनपती है। इसीलिए मोटे अनाज (श्री अन्न) को आंगनवाड़ी-स्कूल भोजन में लौटाया जा रहा है — राजस्थान देश का सबसे बड़ा बाजरा उत्पादक राज्य है।

🎯 याद रखें — इस खंड के मुख्य बिंदु

1. भुखमरी सूचकांक 2025 — भारत 123 देशों में 102वाँ, स्कोर 25.8 ("गंभीर"); छठे परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण में नाटापन 35.5% से 29.3%।

2. पोषण अभियान 8 मार्च 2018, झुंझुनूं से; एकीकृत बाल विकास सेवाएँ 2 अक्टूबर 1975; एनीमिया मुक्त भारत 6×6×6।

3. नाटापन = दीर्घकालिक, दुबलापन = तीव्र कुपोषण; छिपी भूख = सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी।

9. बेरोज़गारी — अवधारणा, प्रकार एवं मापन (Unemployment — Concept, Types & Measurement)

गृहिणी घर सँभालती है, छात्र पढ़ रहा है, और एक युवक तीन महीने से नौकरी खोज रहा है। अर्थशास्त्र में केवल तीसरा बेरोज़गार है — क्योंकि बेरोज़गार वही है जो काम को तैयार, सक्षम और सक्रिय रूप से खोज रहा है, फिर भी काम नहीं पाता।

📘 आसान परिभाषा: बेरोज़गारी (Unemployment)

📚 परिभाषा: वह स्थिति जिसमें कार्यशील आयु (सामान्यतः 15 वर्ष और अधिक) का कोई व्यक्ति प्रचलित मज़दूरी दर पर काम करने का इच्छुक और सक्षम हो तथा सक्रिय रूप से काम खोज रहा हो, फिर भी उसे लाभकारी रोज़गार न मिले; इसे अनैच्छिक निष्क्रियता (Involuntary Idleness) भी कहते हैं।

✅ आसान भाषा में: बेरोज़गार होने की तीन शर्तें — (1) काम चाहता है, (2) काम कर सकता है, (3) काम ढूँढ रहा है — फिर भी काम नहीं। जो काम ढूँढ ही नहीं रहा, वह बेरोज़गार नहीं, श्रम बल से बाहर है। 🏠 उदाहरण: जैसे — नौकरी के लिए इंटरव्यू दे रहा स्नातक बेरोज़गार है; पर पढ़ाई कर रहा छात्र, घर सँभालती गृहिणी या पेंशन पर रह रहे बुज़ुर्ग बेरोज़गार नहीं गिने जाते।

क. श्रम बल की बुनियादी अवधारणाएँ

कार्यशील आयु की पूरी आबादी को तीन हिस्सों में बाँटा जाता है — (क) कार्यरत (Employed), (ख) बेरोज़गार (Unemployed) — काम खोज रहे पर पा न सके, और (ग) श्रम बल से बाहर (Out of Labour Force) — छात्र, गृहिणियाँ, बुज़ुर्ग, दिव्यांग आदि। पहले दो को मिलाकर श्रम बल (Labour Force) बनता है।

🧮 श्रम बाज़ार के तीन मुख्य सूचक

श्रम बल = कार्यरत + बेरोज़गार

श्रम बल भागीदारी दर (LFPR) = (श्रम बल ÷ कुल जनसंख्या) × 100

श्रमिक जनसंख्या अनुपात (WPR) = (कार्यरत व्यक्ति ÷ कुल जनसंख्या) × 100

बेरोज़गारी दर (UR) = (बेरोज़गार ÷ श्रम बल) × 100

🔎 तालिका से क्या समझें: बेरोज़गारी दर का हर श्रम बल होता है, कुल जनसंख्या नहीं। निराश लोग काम खोजना छोड़ दें तो श्रम बल सिकुड़ता है और दर कम दिखने लगती है, इसलिए श्रमिक जनसंख्या अनुपात भी देखा जाता है।

अन्य उपयोगी शब्द

अर्थ

अनौपचारिक श्रमिक (Informal Worker)

असंगठित क्षेत्र के सभी श्रमिक + संगठित क्षेत्र के वे श्रमिक जिनके पास लिखित अनुबंध, सवेतन छुट्टी या सामाजिक सुरक्षा नहीं

मुख्य एवं सीमांत श्रमिक (Main & Marginal Worker)

जनगणना में — वर्ष में 183 दिन (6 माह) या अधिक काम करने वाला मुख्य श्रमिक; उससे कम काम करने वाला सीमांत श्रमिक

ख. बेरोज़गारी के प्रकार

चित्र

चित्र 5: बेरोज़गारी के प्रकार — ग्रामीण, शहरी और संरचनात्मक बदलाव से जुड़े रूप

प्रकार

मुख्य लक्षण

भारतीय उदाहरण

खुली (Open)

काम करने को तैयार, सक्षम और खोज रहा, पर कोई काम नहीं — साफ़ दिखाई देती है

गाँव से शहर आया मज़दूर जो रोज़ चौराहे पर खड़ा रहता है पर काम नहीं मिलता

प्रच्छन्न / छिपी (Disguised)

व्यक्ति काम पर दिखता है, पर उसकी सीमांत उत्पादकता शून्य — हटा दें तो उत्पादन नहीं घटेगा

जिस छोटे खेत पर 3 लोगों की ज़रूरत है, वहाँ परिवार के 6 सदस्य लगे हैं — 3 प्रच्छन्न बेरोज़गार

मौसमी (Seasonal)

वर्ष के कुछ महीनों में ही काम

बुवाई-कटाई के बीच खाली किसान; बरसात में बंद ईंट-भट्ठे; नमक के खेत, चीनी मिलें, पर्यटन, शादी-ब्याह का कैटरिंग

चक्रीय (Cyclical)

व्यापार चक्र की मंदी में माँग घटने से छँटनी; तेज़ी में अपने आप घटती है

वैश्विक सुस्ती में आईटी, वाहन और निर्यात इकाइयों में छँटनी

संरचनात्मक (Structural)

अर्थव्यवस्था की संरचना बदलने से कौशल और नौकरियों का दीर्घकालिक बेमेल

बैंकों के डिजिटलीकरण से टाइपिस्ट और हाथ से बहीखाता लिखने वालों का काम ख़त्म

घर्षणात्मक (Frictional)

एक नौकरी छोड़ने और दूसरी पाने के बीच का अस्थायी अंतराल; सूचना की कमी से

नौकरी बदल रहा सॉफ़्टवेयर इंजीनियर दो महीने ख़ाली

अल्प-रोज़गार (Underemployment)

योग्यता, कौशल या इच्छित घंटों से कम काम

स्नातकोत्तर युवक का चपरासी या डिलीवरी एजेंट का काम करना

🔎 तालिका से क्या समझें: गाँवों में प्रच्छन्न और मौसमी बेरोज़गारी प्रमुख है, इसलिए खुली दर कम दिखती है; शहरों में खुली, शिक्षित और संरचनात्मक बेरोज़गारी प्रमुख है — इसी से भारत दोहरी अर्थव्यवस्था कहलाता है।

📘 आसान परिभाषा: बेरोज़गारी की प्राकृतिक दर (Natural Rate of Unemployment)

📚 परिभाषा: बेरोज़गारी का वह न्यूनतम स्तर जो अर्थव्यवस्था के पूर्ण रोज़गार की अवस्था में भी बना रहता है; यह घर्षणात्मक + संरचनात्मक बेरोज़गारी का योग है और इस पर मुद्रास्फीति स्थिर रहती है।

✅ आसान भाषा में: अर्थव्यवस्था कितनी भी अच्छी चले, कुछ लोग नौकरी बदल रहे होंगे और कुछ नया कौशल सीख रहे होंगे — इसलिए बेरोज़गारी कभी शून्य नहीं होती। "पूर्ण रोज़गार" का अर्थ है केवल चक्रीय बेरोज़गारी का न होना। 🏠 उदाहरण: जैसे — किसी अर्थव्यवस्था में प्राकृतिक दर 4% है; यदि बेरोज़गारी 4% है तो उसे पूर्ण रोज़गार की स्थिति माना जाएगा।

⚠️ ध्यान दें — वर्गीकरण की बारीकी

प्रच्छन्न बेरोज़गारी में व्यक्ति "कार्यरत" गिना जाता है, इसलिए सर्वेक्षण की बेरोज़गारी दर में दिखाई नहीं देती। घर्षणात्मक बेरोज़गारी अस्थायी है और पूर्ण रोज़गार में भी रहती है।

ग. बेरोज़गारी का मापन — कौन, कैसे, कब?

रोज़गार के आँकड़े दो दिशाओं से आते हैं — आपूर्ति पक्ष (परिवारों से पूछना) और माँग पक्ष (प्रतिष्ठानों से पूछना)।

सर्वेक्षण

पक्ष

संस्था

मुख्य बातें

आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (Periodic Labour Force Survey)

आपूर्ति

राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय, सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय

2017 से; पुराने पंचवर्षीय रोज़गार-बेरोज़गारी सर्वेक्षण की जगह; जनवरी 2025 से नया रूप — मासिक (ग्रामीण + शहरी, चालू साप्ताहिक स्थिति), त्रैमासिक और कैलेंडर-वर्ष आधारित वार्षिक रिपोर्ट

त्रैमासिक रोज़गार सर्वेक्षण (Quarterly Employment Survey)

माँग

श्रम ब्यूरो, श्रम एवं रोज़गार मंत्रालय

10 या अधिक श्रमिकों वाले प्रतिष्ठान; 9 क्षेत्र — विनिर्माण, निर्माण, व्यापार, परिवहन, शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास एवं रेस्तरां, आईटी-बीपीओ, वित्तीय सेवाएँ

मापन का आधार

संदर्भ अवधि

कब "कार्यरत" माना जाएगा

क्या पकड़ता है

सामान्य स्थिति — मुख्य (Usual Principal Status)

पिछले 365 दिन

वर्ष के अधिकांश समय (183+ दिन) काम किया

दीर्घकालिक, "पक्की" बेरोज़गारी

सामान्य स्थिति — सहायक (Subsidiary Status)

पिछले 365 दिन

मुख्य रूप से काम न करने पर भी कम से कम 30 दिन कोई आर्थिक गतिविधि

मुख्य + सहायक मिलाकर वार्षिक आँकड़ा बनता है

चालू साप्ताहिक स्थिति (Current Weekly Status)

पिछले 7 दिन

सप्ताह के किसी भी दिन कम से कम 1 घंटा काम

अल्पकालिक व मौसमी उतार-चढ़ाव

🔎 तालिका से क्या समझें: संदर्भ अवधि जितनी छोटी, पकड़ उतनी बारीक। इसलिए चालू साप्ताहिक स्थिति वाली बेरोज़गारी दर (मासिक बुलेटिन में लगभग 5%) सामान्य स्थिति वाली दर (वार्षिक रिपोर्ट में लगभग 3%) से हमेशा अधिक आती है — दोनों की सीधी तुलना करना ग़लत है।

घ. फ़िलिप्स वक्र — बेरोज़गारी और महँगाई का रिश्ता

📘 आसान परिभाषा: फ़िलिप्स वक्र (Phillips Curve)

📚 परिभाषा: वह वक्र जो अल्पकाल में मुद्रास्फीति (या मज़दूरी वृद्धि) और बेरोज़गारी दर के बीच व्युत्क्रम संबंध दर्शाता है — बेरोज़गारी घटाने की क़ीमत अधिक मुद्रास्फीति के रूप में चुकानी पड़ती है, और इसका उलटा भी।

✅ आसान भाषा में: जब काम ज़्यादा और मज़दूर कम हों तो मालिक ऊँची मज़दूरी देते हैं, जिससे वस्तुओं के दाम बढ़ते हैं; मंदी में बेरोज़गारी बढ़ती है पर दाम ठहर जाते हैं। 🏠 उदाहरण: जैसे — सरकार और केंद्रीय बैंक मुद्रास्फीति को लगभग 4% पर रखने का प्रयास करते हैं ताकि महँगाई भी काबू में रहे और विकास-रोज़गार भी न रुके।

मिल्टन फ़्रीडमैन और एडमंड फ़ेल्प्स ने 1960 के दशक के अंत में दिखाया कि दीर्घकाल में वक्र प्राकृतिक दर पर लंबवत हो जाता है — ऊँची महँगाई देकर भी बेरोज़गारी को स्थायी रूप से प्राकृतिक दर से नीचे नहीं रखा जा सकता। 1970 के दशक की मुद्रास्फीतिजनित मंदी (Stagflation) ने इसे सही सिद्ध किया।

📖 पीछे की कहानी — पानी से चलने वाला "कंप्यूटर" बनाने वाला अर्थशास्त्री

न्यूज़ीलैंड के ए. डब्ल्यू. "बिल" फ़िलिप्स पहले विद्युत इंजीनियर थे। 1949 में उन्होंने मोनियाक (MONIAC) मशीन बनाई — पारदर्शी टैंकों-नलियों में बहता रंगीन पानी अर्थव्यवस्था में आय, कर, बचत और निवेश का प्रवाह दिखाता था! फिर 1958 में ब्रिटेन के लगभग सौ वर्षों (1861-1957) के आँकड़ों से उन्होंने दिखाया कि बेरोज़गारी कम होने पर मज़दूरी तेज़ी से बढ़ती है — यही "फ़िलिप्स वक्र" कहलाया।

🏏 क्रिकेट की भाषा में — बेरोज़गारी के प्रकार

किसी टीम के 25 खिलाड़ियों में से हर मैच में केवल 11 खेलते हैं। जो खिलाड़ी चोट से उबरकर अगली सीरीज़ का इंतज़ार कर रहा है — वह घर्षणात्मक है। जो सिर्फ़ टेस्ट का विशेषज्ञ है जबकि अब ज़्यादातर मैच टी-20 के होते हैं — वह संरचनात्मक है। बरसात के मौसम में जब मैच ही नहीं होते — वह मौसमी है। और जब मैदान पर 11 की जगह 15 खिलाड़ी उतार दिए जाएँ पर रन उतने ही बनें — तो बाक़ी 4 प्रच्छन्न बेरोज़गार हैं!

🎯 याद रखें — इस खंड के मुख्य बिंदु

1. बेरोज़गारी दर = बेरोज़गार ÷ श्रम बल × 100; भागीदारी दर और श्रमिक जनसंख्या अनुपात का हर कुल जनसंख्या।

2. प्राकृतिक दर = घर्षणात्मक + संरचनात्मक; सामान्य स्थिति = 365 दिन, चालू साप्ताहिक स्थिति = 7 दिन, 1 घंटा; आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण 2017 से।

3. फ़िलिप्स वक्र (1958) — अल्पकाल में व्युत्क्रम, दीर्घकाल में लंबवत।

10. रोज़गार की वर्तमान स्थिति — आँकड़े, कारण एवं समाधान (Employment Situation — Data, Causes & Way Forward)

भारत की बेरोज़गारी दर कागज़ पर कई विकसित देशों से कम है, फिर भी हर भर्ती में लाखों आवेदन आते हैं — असली चुनौती "अच्छे, नियमित, उत्पादक काम का न होना" है।

क. वार्षिक तस्वीर — कैलेंडर वर्ष 2025

27 मार्च 2026 को जारी आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण की पहली कैलेंडर-वर्ष वार्षिक रिपोर्ट (जनवरी-दिसंबर 2025) के मुख्य आँकड़े (15 वर्ष और अधिक, सामान्य स्थिति) —

सूचक

कुल

पुरुष

महिला

ग्रामीण

शहरी

श्रम बल भागीदारी दर

59.3%

79.1%

40.0%

62.8%

52.2%

श्रमिक जनसंख्या अनुपात

57.4%

76.6%

38.8%

61.2%

49.7%

बेरोज़गारी दर

3.1%

3.1%

3.1%

2.4%

4.8%

युवा (15-29) बेरोज़गारी दर

9.9% (2024 में 10.3%)

—

—

8.3%

13.6%

🔎 तालिका से क्या समझें: समग्र दर केवल 3.1% है, पर शहरी युवाओं में 13.6% — बेरोज़गारी एक "युवा, शहरी और शिक्षित" समस्या है; ग्रामीण दर कम होने के पीछे प्रच्छन्न बेरोज़गारी छिपी है।

कार्य की प्रकृति (2025)

हिस्सा

क्षेत्रवार कार्यबल (2025)

हिस्सा

स्व-नियोजित (अपना काम + अवैतनिक पारिवारिक सहायक)

56.2%

कृषि

43.0% (2024 में 44.8%)

नियमित वेतनभोगी

23.6% (2024 में 22.4%)

विनिर्माण

12.1%

आकस्मिक मज़दूर

20.2%

निर्माण (Construction)

12.0%

ख. मासिक नब्ज़ — 2026 के बुलेटिन

📊 मासिक बुलेटिन, अगस्त 2026 (चालू साप्ताहिक स्थिति, 15+) — नवीनतम आँकड़े

1. बेरोज़गारी दर 5.0% (जुलाई में 5.1%) — ग्रामीण 4.1% (जनवरी 2026 के बाद सबसे कम), शहरी 6.8%; पुरुष 4.9%, महिला 5.1%।

2. श्रम बल भागीदारी दर 55.6% (जुलाई में 55.4%) — ग्रामीण 58.2%, शहरी 50.4%।

3. महिला श्रम बल भागीदारी दर 34.8% — ग्रामीण महिला 39.4%, शहरी महिला केवल 25.4%।

ग. युवा और शिक्षित बेरोज़गारी

पहलू

स्थिति

शिक्षित बेरोज़गारी

शिक्षित व्यक्तियों (माध्यमिक और ऊपर) में बेरोज़गारी 2024 के 7.0% से घटकर 2025 में 6.5% — फिर भी अशिक्षितों से कई गुना अधिक

बेरोज़गारों में युवाओं का हिस्सा

अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन और मानव विकास संस्थान की भारत रोज़गार रिपोर्ट 2024 — कुल बेरोज़गारों में लगभग 83% युवा; बेरोज़गारों में शिक्षित युवाओं का हिस्सा 2000 के 54.2% से बढ़कर 2022 में 65.7%

न शिक्षा, न रोज़गार, न प्रशिक्षण (NEET)

लगभग हर चार में से एक युवा इस श्रेणी में — इनमें बड़ी संख्या युवतियों की, जो घरेलू ज़िम्मेदारियों के कारण बाहर हैं

💡 आज की भाषा में — रोज़गार की असली तस्वीर

मोहल्ले के तीन लड़के — पहला बी.ए. करके भर्ती की तैयारी कर रहा है (शिक्षित बेरोज़गार); दूसरा इंजीनियरिंग के बाद डिलीवरी ऐप पर बाइक चलाता है (अल्प-रोज़गार); तीसरा पिता की दुकान पर बैठता है पर ज़रूरत नहीं (प्रच्छन्न)। सर्वेक्षण में केवल पहला "बेरोज़गार" गिना जाएगा — इसलिए 3.1% की दर पूरी कहानी नहीं कहती।

📘 आसान परिभाषा: रोज़गार-योग्यता अंतराल (Employability Gap)

📚 परिभाषा: शिक्षा प्रणाली से निकलने वाले युवाओं के पास उपलब्ध ज्ञान-कौशल और उद्योग द्वारा अपेक्षित कौशल के बीच का अंतर, जिसके कारण डिग्रीधारी होते हुए भी व्यक्ति नौकरी के योग्य नहीं माना जाता।

✅ आसान भाषा में: डिग्री हाथ में है, पर कंपनी जो काम चाहती है — संवाद, कंप्यूटर, समस्या-समाधान, व्यावहारिक तकनीकी कौशल — वह नहीं आता। नौकरियाँ ख़ाली रहती हैं और युवा बेरोज़गार। 🏠 उदाहरण: जैसे — इंडिया स्किल्स रिपोर्ट 2026 में भारत के लगभग 56% युवा ही रोज़गार-योग्य पाए गए।

घ. बेरोज़गारी के प्रमुख कारण

कारण

व्याख्या

धीमा संरचनात्मक परिवर्तन

श्रमिक खेती से सीधे सेवा क्षेत्र में गए, बीच की सीढ़ी — श्रम-प्रधान विनिर्माण — कमज़ोर रही; विनिर्माण का रोज़गार में हिस्सा लगभग 12% पर अटका

रोज़गार-विहीन संवृद्धि

उच्च संवृद्धि वाले क्षेत्र (आईटी, वित्त, दूरसंचार) पूँजी- और कौशल-प्रधान हैं — उत्पादन ज़्यादा, नौकरियाँ कम

दोषपूर्ण शिक्षा प्रणाली

रटंत, सैद्धांतिक पाठ्यक्रम; व्यावसायिक शिक्षा को "दोयम दर्जा"; उद्योग से जुड़ाव कम

कम निवेश

सकल स्थिर पूँजी निर्माण भारत में सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 30%, जबकि चीन में 40% से अधिक; कम बुनियादी ढाँचा = कम रोज़गार

📘 आसान परिभाषा: नियामक कोलेस्ट्रॉल (Regulatory Cholesterol)

📚 परिभाषा: समय के साथ जमा होते गए जटिल, आपस में टकराते, पुराने और अनावश्यक नियमों-प्रक्रियाओं का ऐसा संचय जो अनुपालन लागत बढ़ाकर उद्यमों के विस्तार, निवेश और रोज़गार-सृजन को रोकता है।

✅ आसान भाषा में: जैसे धमनियों में जमा कोलेस्ट्रॉल ख़ून का बहाव रोक देता है, वैसे ही अनगिनत नियम अर्थव्यवस्था में निवेश और रोज़गार का बहाव रोक देते हैं। 🏠 उदाहरण: जैसे — कोई कारख़ानेदार 300 कर्मचारियों तक बढ़ने से पहले ही रुक जाता था, क्योंकि उससे ऊपर छँटनी के लिए सरकारी अनुमति, अधिक निरीक्षण और अनुपालन का डर था; इसलिए वह मशीनें बढ़ाता था, कर्मचारी नहीं।

📖 पीछे की कहानी — दो क्षेत्रों का मॉडल जिसने नोबेल दिलाया

कैरिबियन द्वीप सेंट लूसिया में जन्मे डब्ल्यू. आर्थर लुईस ने 1954 में बताया कि गरीब देशों में एक पारंपरिक कृषि क्षेत्र है जहाँ ज़रूरत से ज़्यादा लोग लगे हैं (प्रच्छन्न बेरोज़गारी) और दूसरा आधुनिक औद्योगिक क्षेत्र। उद्योग बढ़ते हैं तो खेती के "अतिरिक्त" लोगों को खींच लेते हैं — खेती का उत्पादन नहीं घटता, उद्योग का बढ़ता है। जापान, दक्षिण कोरिया और चीन ने यही किया। इस विचार पर लुईस को 1979 का नोबेल मिला; भारत में यह "स्थानांतरण" अभी अधूरा है।

ङ. भविष्य के रोज़गार — वैश्विक संकेत

📊 विश्व आर्थिक मंच — भविष्य के रोज़गार रिपोर्ट 2025 (Future of Jobs Report) — नवीनतम आँकड़े

1. 2030 तक दुनिया में लगभग 17 करोड़ नए रोज़गार बनेंगे और 9.2 करोड़ विस्थापित होंगे — शुद्ध लाभ लगभग 7.8 करोड़।

2. 2030 तक दुनिया के 39% और भारत के लगभग 38% श्रमिकों के मूल कौशल बदल जाएँगे — इसलिए पुनः-कौशल (Reskilling) अनिवार्य।

3. सबसे तेज़ बढ़ती भूमिकाएँ — बिग डेटा विशेषज्ञ, फ़िनटेक इंजीनियर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता विशेषज्ञ; संख्या में सबसे अधिक वृद्धि — खेतिहर श्रमिक, डिलीवरी चालक, निर्माण श्रमिक।

च. आगे की राह (Way Forward)

🏭 रोज़गार की माँग बढ़ाना

🎓 श्रम की गुणवत्ता बढ़ाना

◆ श्रम-प्रधान विनिर्माण — वस्त्र, जूते-चमड़ा, खिलौने, खाद्य प्रसंस्करण, इलेक्ट्रॉनिक्स असेंबली

◆ विनियमन-मुक्ति और श्रम संहिताओं का प्रभावी क्रियान्वयन

◆ प्रधानमंत्री विकसित भारत रोज़गार योजना — 1 अगस्त 2025 से, ₹99,446 करोड़; दो वर्षों में 3.5 करोड़ नौकरियाँ; पहली नौकरी वालों को एक माह का वेतन (अधिकतम ₹15,000), नियोक्ताओं को प्रति नए कर्मचारी ₹3,000 मासिक तक

◆ स्कूल स्तर से व्यावसायिक शिक्षा और प्रशिक्षुता (Apprenticeship)

◆ कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डेटा, हरित ऊर्जा के लिए पुनः-कौशल

◆ रोज़गार आँकड़ों को राष्ट्रीय करियर सेवा, ई-श्रम और कौशल पोर्टलों से जोड़कर नौकरी-मिलान

🎯 याद रखें — इस खंड के मुख्य बिंदु

1. कैलेंडर वर्ष 2025 (सामान्य स्थिति) — बेरोज़गारी 3.1%, श्रम बल भागीदारी 59.3%, युवा बेरोज़गारी 9.9% (शहरी युवा 13.6%); अगस्त 2026 मासिक (चालू साप्ताहिक) — बेरोज़गारी 5.0%।

2. कार्यबल — कृषि 43%, स्व-नियोजित 56.2%, नियमित वेतनभोगी 23.6%।

3. भविष्य के रोज़गार 2025 — 2030 तक 17 करोड़ नए, 9.2 करोड़ विस्थापित; भारत के 38% कौशल बदलेंगे।

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11. महिला श्रम, असंगठित एवं गिग श्रमिक तथा श्रम संहिताएँ (Women Workforce, Unorganised & Gig Workers, Labour Codes)

भारत की आधी आबादी महिलाएँ हैं, पर लंबे समय तक श्रम बल में उनकी भागीदारी दुनिया में सबसे कम देशों में रही। साथ ही भारत के 90% से अधिक श्रमिक असंगठित-अनौपचारिक क्षेत्र में हैं, जहाँ न लिखित अनुबंध है, न पेंशन। इस खंड में इन दोनों चुनौतियों और उनके उत्तर के रूप में लाई गई चार श्रम संहिताओं को समझेंगे।

❝ "जब तक स्त्रियों की दशा नहीं सुधरती, तब तक विश्व के कल्याण की कोई संभावना नहीं; पक्षी के लिए एक पंख से उड़ना संभव नहीं।" (There is no chance for the welfare of the world unless the condition of women is improved. It is not possible for a bird to fly on only one wing.) (— स्वामी विवेकानंद)

💡 क्या आप जानते हैं? भारत में पहला मई दिवस (श्रमिक दिवस) 1 मई 1923 को मद्रास (चेन्नई) में सिंगारवेलु चेट्टियार ने मनाया था।

💡 क्या आप जानते हैं? भारत का पहला संगठित ट्रेड यूनियन मद्रास लेबर यूनियन (1918) था; अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस (1920) के पहले अध्यक्ष लाला लाजपत राय थे।

क. महिला श्रम बल भागीदारी — गिरावट, उछाल और बहस

चित्र

चित्र 6: महिला श्रम बल भागीदारी दर (15+, सामान्य स्थिति) — 2017-18 के निचले स्तर से तेज़ वृद्धि

🔎 चित्र से क्या समझें: महिला भागीदारी 2017-18 के 23.3% से बढ़कर 2023-24 में 41.7% हुई; कैलेंडर वर्ष 2025 में 40.0% (ग्रामीण 45.9%, शहरी केवल 27.7%) — उछाल मुख्यतः गाँवों से आया है।

✅ वृद्धि के प्रेरक

⚠️ आलोचना और सीमाएँ

◆ ग्रामीण स्वरोज़गार — पशुपालन, खेती, गैर-कृषि लघु उद्यम

◆ स्वयं सहायता समूह, लखपति दीदी, आजीविका मिशन

◆ उज्ज्वला, नल-जल, शौचालय से घरेलू काम का समय बचा

◆ बड़ा हिस्सा अवैतनिक पारिवारिक सहायक (कोड 21) — आय नहीं

◆ कम उत्पादकता वाला स्वरोज़गार; संकट-जनित (Distress) भागीदारी की आशंका

◆ शहरी महिला भागीदारी में धीमी वृद्धि

📘 आसान परिभाषा: संवर्धित महिला श्रम बल भागीदारी दर (Augmented Female LFPR)

📚 परिभाषा: आधिकारिक महिला श्रम बल भागीदारी दर में उन महिलाओं को भी जोड़कर बनाई गई दर जो गतिविधि कोड 93 में आती हैं — यानी घरेलू कार्य के साथ घर के उपयोग के लिए चारा, जलावन, पानी, सब्ज़ी जुटाना, सिलाई-बुनाई जैसे उत्पादक कार्य करती हैं।

✅ आसान भाषा में: बहुत-सी महिलाएँ "उत्पादक" काम करती हैं पर उसे बाज़ार में नहीं बेचतीं, इसलिए आधिकारिक आँकड़ों में "बेकार" गिनी जाती हैं; यह दर उनके छिपे काम को दिखाती है — इसलिए यह सदैव आधिकारिक दर से अधिक होती है। 🏠 उदाहरण: जैसे — राजस्थान के गाँव में रोज़ दो कोस से पानी और पशुओं का चारा लाने वाली महिला आधिकारिक रूप से "श्रम बल से बाहर" है, पर संवर्धित दर में वह गिनी जाएगी।

समय उपयोग सर्वेक्षण 2024 — 15-59 वर्ष की महिलाएँ रोज़ लगभग 289 मिनट अवैतनिक घरेलू सेवाओं में लगाती हैं, पुरुष केवल 88 मिनट।

📘 आसान परिभाषा: गोल्डिन का यू-वक्र (Goldin's U-Curve)

📚 परिभाषा: आर्थिक विकास के साथ महिला श्रम बल भागीदारी पहले घटती है और फिर बढ़ती है, जिससे अंग्रेज़ी अक्षर "यू" जैसा वक्र बनता है — गरीब कृषि अर्थव्यवस्था में ऊँची, औद्योगीकरण के आरंभ में कम, और शिक्षा व सेवा क्षेत्र के विस्तार के साथ फिर ऊँची।

✅ आसान भाषा में: गरीब घर की महिला मजबूरी में खेत में काम करती है; परिवार की आय बढ़ने पर वह (आय-प्रभाव और कारख़ाने के काम से जुड़े सामाजिक कलंक के कारण) घर बैठ जाती है; फिर पढ़-लिखकर दफ़्तर-स्कूल-अस्पताल जैसे "सम्मानजनक" काम मिलने पर लौट आती है। 🏠 उदाहरण: जैसे — भारत में 2004-05 से 2017-18 तक की गिरावट "निचली भुजा" थी; उसके बाद की वृद्धि "ऊपर उठती भुजा" की शुरुआत मानी जा रही है।

📖 पीछे की कहानी — अकेले नोबेल जीतने वाली पहली महिला

हार्वर्ड की अर्थशास्त्री क्लॉडिया गोल्डिन 2023 में अर्थशास्त्र का नोबेल अकेले जीतने वाली पहली महिला बनीं। उन्होंने अमेरिका के 200 से अधिक वर्षों के अभिलेख खँगालकर दिखाया कि महिलाओं की भागीदारी यू-आकार में बदलती है, और आज वेतन-अंतर का बड़ा कारण "मातृत्व दंड" और लंबे-अनिश्चित घंटों वाली "लालची नौकरियाँ" हैं।

🏛️ महिला श्रम भागीदारी बढ़ाने के उपाय

◆ सखी निवास (कामकाजी महिला छात्रावास) — मिशन शक्ति के "सामर्थ्य" घटक में सुरक्षित, सस्ता आवास व डे-केयर।

◆ पालना (क्रेच) तथा श्रम संहिता में 50+ कर्मचारियों वाले प्रतिष्ठानों में क्रेच अनिवार्य; सवेतन मातृत्व अवकाश 26 सप्ताह, घर से काम का विकल्प; सहमति-सुरक्षा के साथ रात्रि पाली।

◆ राज्य मॉडल — तमिलनाडु का थोझी छात्रावास, केरल का कुडुम्बश्री, तेलंगाना का वी-हब, महाराष्ट्र का माविम।

ख. असंगठित क्षेत्र और गिग श्रमिक

📘 आसान परिभाषा: असंगठित श्रमिक (Unorganised Worker)

📚 परिभाषा: सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 में — असंगठित क्षेत्र का घर-आधारित, स्व-नियोजित या वेतनभोगी श्रमिक, तथा संगठित क्षेत्र का वह श्रमिक जो कर्मचारी भविष्य निधि या कर्मचारी राज्य बीमा जैसे औपचारिक सामाजिक सुरक्षा कानूनों के दायरे में नहीं आता।

✅ आसान भाषा में: जिसका काम "कागज़ पर" दर्ज नहीं — न नियुक्ति पत्र, न पेंशन, न बीमा, न सवेतन छुट्टी। 🏠 उदाहरण: जैसे — रेहड़ी-पटरी वाले, घरेलू कामगार, खेतिहर मज़दूर, निर्माण श्रमिक, ईंट-भट्ठा मज़दूर, और कारख़ाने में बिना अनुबंध रखा गया दिहाड़ी मज़दूर।

पहलू

स्थिति

ई-श्रम पोर्टल

26 अगस्त 2021 को आरंभ; जनवरी 2026 तक 31 करोड़ से अधिक पंजीकरण, आधे से अधिक महिलाएँ; आधार से जुड़ी सार्वभौमिक खाता संख्या; पात्रता — कर्मचारी भविष्य निधि या कर्मचारी राज्य बीमा का सदस्य न हो

गिग श्रमिक संख्या

नीति आयोग (2022) — 2020-21 में 77 लाख, 2029-30 तक 2.35 करोड़ होने का अनुमान; 2024-25 तक लगभग 1.2 करोड़

गिग श्रमिक (सामाजिक सुरक्षा संहिता, धारा 2(35)) — पारंपरिक नियोक्ता-कर्मचारी संबंध के बाहर काम से आय कमाने वाला व्यक्ति; प्लेटफ़ॉर्म श्रमिक ऑनलाइन ऐप-मंच से काम पाता है। मूल अवधारणा सेवा क्षेत्र के अध्याय में आ चुकी है; यहाँ केवल नई व्यवस्था —

गिग-प्लेटफ़ॉर्म श्रमिकों के लिए नई व्यवस्था

विवरण

एग्रीगेटर का अंशदान

कंपनियाँ अपने वार्षिक कारोबार का 1-2%, किंतु गिग श्रमिकों को दी गई कुल राशि के अधिकतम 5% तक, सामाजिक सुरक्षा कोष में देंगी

लाभ

जीवन व दिव्यांगता बीमा, स्वास्थ्य-मातृत्व लाभ, वृद्धावस्था सुरक्षा; राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा बोर्ड की देखरेख

🔎 तालिका से क्या समझें: गिग काम लचीलापन देता है, पर आय की अनिश्चितता, एल्गोरिदम का नियंत्रण और सुरक्षा का अभाव भी लाता है (लगभग 40% की मासिक आय ₹15,000 से कम); संहिता "लचीलेपन + सुरक्षा" का संतुलन बनाती है।

ग. चार श्रम संहिताएँ (Four Labour Codes)

श्रम समवर्ती सूची का विषय है। 29 केंद्रीय श्रम क़ानूनों को चार संहिताओं में समेटा गया; संसद ने 2019-2020 में पारित किया, पर ये 21 नवंबर 2025 से लागू हुईं और अंतिम केंद्रीय नियम 8 मई 2026 को अधिसूचित हुए। लक्ष्य — श्रमिक कल्याण और व्यापार सुगमता।

संहिता

समाहित क़ानून

प्रमुख प्रावधान

वेतन संहिता, 2019 (Code on Wages)

4

न्यूनतम मज़दूरी सभी श्रमिकों पर; केंद्र की राष्ट्रीय तल मज़दूरी से कम कोई राज्य नहीं रख सकता; लैंगिक भेदभाव निषिद्ध; मज़दूरी की एकसमान परिभाषा

औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 (Industrial Relations Code)

3

छँटनी-तालाबंदी के लिए अनुमति की सीमा 100 से 300 श्रमिक; हड़ताल से पहले नोटिस अनिवार्य; निश्चित अवधि रोज़गार को मान्यता; छँटनी पर 15 दिन की मज़दूरी का पुनः-कौशल कोष; 51%+ समर्थन वाला एकल वार्ताकार संघ

सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 (Code on Social Security)

9

गिग-प्लेटफ़ॉर्म श्रमिकों की परिभाषा व कोष; निश्चित अवधि कर्मचारियों को 1 वर्ष पर ग्रेच्युटी; कर्मचारी राज्य बीमा का पूरे देश में दायरा

व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य-दशा संहिता, 2020 (OSH Code)

13

सभी श्रमिकों को नियुक्ति पत्र; 40 वर्ष से अधिक आयु पर निःशुल्क वार्षिक स्वास्थ्य जाँच; महिलाओं को रात्रि पाली (सहमति-सुरक्षा के साथ); "कारख़ाना" सीमा बिजली सहित 20, बिना बिजली 40 श्रमिक; प्रवासी श्रमिकों को यात्रा भत्ता

🔎 तालिका से क्या समझें: समाहित क़ानून 4 + 3 + 9 + 13 = 29। ग्रेच्युटी औद्योगिक संबंध संहिता में नहीं, सामाजिक सुरक्षा संहिता में है; औद्योगिक संबंध संहिता केवल निश्चित अवधि रोज़गार को मान्यता देती है।

🌟 पक्ष में तर्क

⚠️ चिंताएँ

◆ 29 क़ानूनों की जगह 4 — सरलता, एक पंजीकरण, एक लाइसेंस, एक रिटर्न

◆ गिग-प्लेटफ़ॉर्म और प्रवासी श्रमिकों को पहली बार पहचान

◆ 300 की सीमा से उद्यमों को बड़ा होने का प्रोत्साहन — अधिक औपचारिक रोज़गार

◆ ट्रेड यूनियनों का आरोप — छँटनी आसान होने से नौकरी की सुरक्षा घटेगी

◆ हड़ताल पर कड़ी शर्तें — सामूहिक सौदेबाज़ी कमज़ोर

◆ गिग श्रमिक "कर्मचारी" नहीं माने गए — न्यूनतम मज़दूरी का पूरा लाभ नहीं

🐪 राजस्थान की भाषा में — श्रम संहिताएँ

जयपुर के सीतापुरा औद्योगिक क्षेत्र के वस्त्र कारख़ाने में 250 कर्मचारी हैं और भीलवाड़ा से बड़ा ऑर्डर आया है। पहले मालिक 100 से ऊपर लोग रखने से डरता था, क्योंकि मंदी में छँटनी के लिए सरकारी अनुमति लेनी पड़ती। अब सीमा 300 है, तो वह और लोग रख सकता है; बदले में हर कर्मचारी को नियुक्ति पत्र, 40 पार वालों की मुफ़्त स्वास्थ्य जाँच और रात की पाली वाली महिलाओं को सुरक्षित परिवहन देना होगा। मालिक को लचीलापन, मज़दूर को सुरक्षा — यही संतुलन है।

🎯 याद रखें — इस खंड के मुख्य बिंदु

1. महिला श्रम बल भागीदारी — 23.3% (2017-18), 41.7% (2023-24), 40.0% (2025); गोल्डिन का यू-वक्र, नोबेल 2023; संवर्धित दर में गतिविधि कोड 93।

2. चार संहिताएँ 21 नवंबर 2025 से लागू, केंद्रीय नियम 8 मई 2026; 29 क़ानून (4+3+9+13); छँटनी सीमा 300।

3. निश्चित अवधि कर्मचारी को 1 वर्ष पर ग्रेच्युटी (सामाजिक सुरक्षा संहिता); एग्रीगेटर अंशदान कारोबार का 1-2% (अधिकतम 5%); ई-श्रम 31 करोड़+।

12. कौशल विकास एवं स्वरोज़गार (Skilling & Self-Employment)

एक गाँव में दो भाई हैं। बड़े भाई के पास स्नातक की डिग्री है, पर वह तीन साल से नौकरी ढूँढ रहा है। छोटे भाई ने आईटीआई (ITI) से बिजली-मिस्त्री का कोर्स किया, एक कंपनी में प्रशिक्षु रहा और आज अपनी दुकान चलाता है। फ़र्क़ डिग्री का नहीं, हुनर (Skill) का है।

क. कौशल-अंतराल — समस्या कितनी बड़ी है?

📘 आसान परिभाषा: कौशल-अंतराल (Skill Gap)

📚 परिभाषा: उद्योग और सेवाओं को जिन कौशलों वाले श्रमिकों की आवश्यकता है तथा श्रम बल के पास वास्तव में उपलब्ध कौशलों के बीच का अंतर; इसमें कौशल की कमी (Shortage) और कौशल का बेमेल (Mismatch) दोनों शामिल हैं।

✅ आसान भाषा में: कंपनी को वेल्डर, नर्स या कोडिंग जानने वाला चाहिए, पर बाज़ार में उपलब्ध युवा के पास या तो कोई हुनर नहीं, या कोई ऐसा हुनर है जिसकी माँग ही नहीं — यही दूरी कौशल-अंतराल है। 🏠 उदाहरण: जैसे — एक ओर कारख़ाने कुशल मशीन-चालक न मिलने की शिकायत करते हैं, दूसरी ओर लाखों स्नातक बेरोज़गार बैठे हैं।

📊 भारत में कौशल की स्थिति — नवीनतम आँकड़े

1. आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण 2023-24 (PLFS) — 15-59 आयु वर्ग में केवल 4.1% लोगों ने औपचारिक व्यावसायिक/तकनीकी प्रशिक्षण लिया है।

2. लगभग 30% ने अनौपचारिक तरीक़ों (वंशानुगत, स्व-शिक्षण, कार्य करते-करते सीखना) से हुनर पाया; लगभग 65% के पास कोई व्यावसायिक प्रशिक्षण नहीं।

3. आर्थिक समीक्षा 2024-25 (Economic Survey) — कार्यबल का लगभग 88% निम्न-दक्षता (Low-competency) वाले कामों में लगा है।

4. भारत कौशल रिपोर्ट 2025 (India Skills Report) — केवल लगभग 55% स्नातक ही रोज़गार-योग्य (Employable) पाए गए (2019 में लगभग 48%)।

देश

कार्यबल में औपचारिक रूप से कुशल श्रमिकों का अनुमानित हिस्सा

विशेष मॉडल

दक्षिण कोरिया

लगभग 96%

स्कूल स्तर से ही व्यावसायिक धारा, उद्योग-संचालित प्रशिक्षण

जर्मनी

लगभग 75%

दोहरी प्रणाली (Dual System) — कक्षा + कारख़ाना साथ-साथ

भारत

केवल 4-5%

आईटीआई, अल्पकालिक पाठ्यक्रम; अधिकांश हुनर अनौपचारिक

🔎 तालिका से क्या समझें: विकसित देशों में हर दो में से एक से अधिक श्रमिक प्रमाणित कुशल है, भारत में बीस में से एक भी नहीं। भारतीय श्रमिक "अकुशल" नहीं हैं — करोड़ों के पास पारिवारिक या कार्यस्थल पर सीखा हुनर है, पर उसका प्रमाणन (Certification) नहीं, इसलिए बेहतर वेतन व औपचारिक नौकरी नहीं मिलती।

🔍 कौशल-अंतराल के कारण

🛠️ आगे की राह

◆ सैद्धांतिक पाठ्यक्रम — डिग्री में व्यावहारिक प्रशिक्षण कम

◆ प्रशिक्षण केंद्रों में उपकरण व योग्य प्रशिक्षकों की कमी

◆ उद्योग 4.0 (कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्वचालन) से पुराने हुनर का तेज़ी से अप्रचलन

◆ लगभग 90% कार्यबल अनौपचारिक क्षेत्र में — प्रमाणन का अभाव

◆ जर्मनी जैसी दोहरी प्रणाली — उद्योग-अकादमिक साझेदारी

◆ कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डेटा, हरित रोज़गार (Green Jobs) हेतु पुनः-कौशल (Reskilling)

◆ सूक्ष्म-लघु उद्यमों में कार्यस्थल पर प्रशिक्षण (OJT) व प्रशिक्षुता का विस्तार

ख. कौशल भारत मिशन (Skill India Mission) — ढाँचा

9 नवंबर 2014 को कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय (MSDE) बना और 15 जुलाई 2015 को कौशल भारत मिशन शुरू हुआ — उद्देश्य कौशल, पुनः-कौशल, उन्नत-कौशल।

📘 आसान परिभाषा: राष्ट्रीय कौशल योग्यता ढाँचा (National Skills Qualification Framework)

📚 परिभाषा: ज्ञान, कौशल और अभिक्षमता के आधार पर योग्यताओं को स्तरों (Levels) में व्यवस्थित करने वाला योग्यता-आधारित राष्ट्रीय ढाँचा (2013 में अधिसूचित), जो व्यावसायिक और सामान्य शिक्षा के बीच आने-जाने तथा पूर्व अधिगम की मान्यता को संभव बनाता है; अब यह राष्ट्रीय क्रेडिट ढाँचे (NCrF) से जुड़ा है।

✅ आसान भाषा में: यह एक सीढ़ी है — हर पायदान बताता है कि उस स्तर का प्रमाणपत्र रखने वाला क्या-क्या कर सकता है, ताकि आईटीआई का प्रमाणपत्र और कॉलेज की डिग्री एक ही पैमाने पर तौले जा सकें। 🏠 उदाहरण: जैसे — किसी ने कौशल केंद्र से बिजली-मिस्त्री का स्तर-आधारित प्रमाणपत्र लिया हो, तो वह आगे डिप्लोमा में उसी स्तर के क्रेडिट के साथ प्रवेश ले सकता है।

कौशल भारत मिशन के घटक

क्या करता है

मुख्य तथ्य

जन शिक्षण संस्थान (JSS)

निरक्षर, नव-साक्षर व पढ़ाई छोड़ चुके लोगों को घर के पास हुनर

स्वयंसेवी संस्थाओं को वार्षिक अनुदान; लक्षित आयु 15-45 वर्ष

शिल्पकार प्रशिक्षण योजना (Craftsmen Training Scheme)

आईटीआई के माध्यम से दीर्घकालिक प्रशिक्षण

लगभग 15,000 आईटीआई; अवधि 6 माह से 2 वर्ष; 160 से अधिक व्यवसाय

📖 पीछे की कहानी — मुंबई का श्रमिक विद्यापीठ

1967 में मुंबई के वर्ली में मिल-मज़दूरों के लिए श्रमिक विद्यापीठ खुला — जो मज़दूर स्कूल नहीं जा पाए, उन्हें उनकी बस्ती में ही पढ़ना-लिखना और नया हुनर सिखाया जाए, ताकि छँटनी के बाद भी वे कमा सकें। प्रयोग सफल रहा; 2000 में नाम बदलकर जन शिक्षण संस्थान हुआ और 2018 में इन्हें कौशल विकास मंत्रालय को सौंपा गया। आज ये सिलाई, ब्यूटीशियन, मोबाइल मरम्मत जैसे हुनर ज़्यादातर महिलाओं को उनके गाँव में सिखाते हैं।

ग. अन्य प्रमुख कौशल योजनाएँ व मंच

योजना / मंच

शुरुआत व मंत्रालय

उद्देश्य एवं मुख्य प्रावधान

असीम पोर्टल (ASEEM) — आत्मनिर्भर कुशल कर्मचारी-नियोक्ता मानचित्रण

10 जुलाई 2020; कौशल विकास मंत्रालय

कुशल श्रमिकों और नियोक्ताओं को जोड़ने वाला कृत्रिम बुद्धिमत्ता-आधारित मंच; कोविड में लौटे प्रवासी श्रमिकों का कौशल-मानचित्रण

उन्नति परियोजना (Project UNNATI)

2019; ग्रामीण विकास मंत्रालय

रोज़गार गारंटी में 100 दिन काम पूरा करने वाले परिवार के एक युवा (18-35 वर्ष) को कौशल देकर मज़दूरी से आजीविका की ओर ले जाना

राष्ट्रीय प्रशिक्षुता प्रोत्साहन योजना 2.0 (NAPS 2.0)

कौशल विकास मंत्रालय; प्रत्यक्ष लाभ अंतरण 11 अगस्त 2023 से

सरकार निर्धारित वृत्तिका (Stipend) का 25%, अधिकतम ₹1,500 प्रति माह, सीधे प्रशिक्षु के खाते में भेजती है

प्रधानमंत्री दक्षता और कुशलता संपन्न हितग्राही (PM-DAKSH)

2020-21; सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय

अनुसूचित जाति, पिछड़ा वर्ग, आर्थिक रूप से कमज़ोर, विमुक्त जनजातियाँ, सफ़ाई कर्मचारी व कचरा बीनने वालों को निःशुल्क कौशल, पुनः-कौशल

दीनदयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल्य योजना (DDU-GKY)

25 सितंबर 2014; ग्रामीण विकास मंत्रालय

गरीब ग्रामीण युवाओं (15-35 वर्ष; विशेष वर्गों हेतु 45 वर्ष) को नियोजन से जुड़ा प्रशिक्षण

राष्ट्रीय करियर सेवा पोर्टल (NCS)

20 जुलाई 2015; श्रम एवं रोज़गार मंत्रालय

नौकरी चाहने वाले, नियोक्ता, प्रशिक्षण संस्थान व करियर परामर्शदाता — सबके लिए एक मंच; करोड़ों पंजीकृत; ई-श्रम व कौशल पोर्टल से जुड़ा

📘 आसान परिभाषा: प्रशिक्षुता (Apprenticeship)

📚 परिभाषा: किसी प्रतिष्ठान में वास्तविक कार्य-परिवेश में, निर्धारित अवधि तक, वृत्तिका पाते हुए व्यवस्थित प्रशिक्षण प्राप्त करना, जिसकी शर्तें प्रशिक्षु अधिनियम 1961 से नियंत्रित होती हैं।

✅ आसान भाषा में: "कमाते हुए सीखो" — कक्षा की बजाय असली कारख़ाने या दफ़्तर में, अनुभवी कारीगर के साथ काम करते हुए हुनर सीखना और साथ में मासिक वृत्तिका पाना। 🏠 उदाहरण: जैसे — आईटीआई से निकला युवा एक साल तक किसी मोटर कंपनी की कार्यशाला में प्रशिक्षु रहकर गाड़ी की असली मरम्मत सीखता है और हर महीने वृत्तिका पाता है।

🏏 क्रिकेट की भाषा में — नेट प्रैक्टिस बनाम असली मैच

कोई बल्लेबाज़ सालों तक केवल नेट में मशीन की गेंदें खेले, तो पहले असली मैच में तेज़ गेंदबाज़ के सामने घबरा जाएगा। इसीलिए खिलाड़ी को घरेलू क्रिकेट में असली मैच खेलने भेजा जाता है। कक्षा का प्रशिक्षण "नेट प्रैक्टिस" है और प्रशिक्षुता "घरेलू मैच" — दोनों मिलें तभी खिलाड़ी (श्रमिक) तैयार होता है। जर्मनी की दोहरी प्रणाली यही करती है।

घ. स्वरोज़गार — हुनर से अपना काम

(i) प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना (PM Vishwakarma)

17 सितंबर 2023 को शुरू यह केंद्रीय क्षेत्र योजना (सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय; 2023-24 से 2027-28; परिव्यय ₹13,000 करोड़) 18 पारंपरिक व्यवसायों के कारीगरों — बढ़ई (सुथार), लोहार, सुनार, कुम्हार, मूर्तिकार, मोची, राजमिस्त्री, नाई, धोबी, दर्जी आदि — के लिए है। तीन लक्ष्य "3डी" — प्रतिष्ठा (Dignity), डिजिटल सशक्तीकरण (Digital) और लोकतांत्रिकरण (Democratization)।

लाभ

विवरण

कौशल उन्नयन

बुनियादी प्रशिक्षण 5-7 दिन, उन्नत प्रशिक्षण 15 दिन या अधिक; प्रशिक्षण के दौरान ₹500 प्रतिदिन वृत्तिका

आधुनिक औज़ार

₹15,000 तक का टूलकिट प्रोत्साहन (ई-वाउचर)

बिना गारंटी ऋण

पहली किस्त ₹1 लाख (18 माह में वापसी), दूसरी किस्त ₹2 लाख (30 माह); कारीगर के लिए 5% रियायती ब्याज, बाक़ी ब्याज-सहायता और ऋण-गारंटी शुल्क सरकार वहन करती है

📊 प्रधानमंत्री विश्वकर्मा — तीन वर्ष (सितंबर 2026) — नवीनतम आँकड़े

1. पंजीकृत लाभार्थी — लगभग 30 लाख; कौशल प्रशिक्षण पूर्ण — 24.5 लाख।

2. लगभग 6.2 लाख कारीगरों को ₹5,297 करोड़ का रियायती ऋण।

(ii) प्रधानमंत्री स्ट्रीट वेंडर आत्मनिर्भर निधि (PM SVANidhi) — 2025 का पुनर्गठन

लॉकडाउन में सबसे पहले उजड़ने वाले रेहड़ी-पटरी वाले थे। उन्हें साहूकार से बचाने हेतु 1 जून 2020 को आवासन एवं शहरी कार्य मंत्रालय ने यह केंद्रीय क्षेत्र योजना शुरू की — बिना गारंटी कार्यशील पूँजी ऋण। 27 अगस्त 2025 को इसका पुनर्गठन कर इसे 31 मार्च 2030 तक बढ़ाया गया; "स्वनिधि से समृद्धि" से विक्रेता-परिवार अन्य कल्याण योजनाओं से भी जुड़ते हैं।

प्रावधान

मूल योजना (2020)

पुनर्गठित योजना (2025-2030)

पहली किस्त

₹10,000

₹15,000

दूसरी किस्त

₹20,000

₹25,000

तीसरी किस्त

₹50,000

₹50,000 (अपरिवर्तित)

नया लाभ

—

दूसरी किस्त समय पर चुकाने वालों को यूपीआई से जुड़ा रुपे क्रेडिट कार्ड

परिव्यय व लक्ष्य

—

₹7,332 करोड़; कुल 1.15 करोड़ लाभार्थी (इनमें 50 लाख नए)

(iii) स्वरोज़गार की अन्य योजनाएँ — एक नज़र

स्वरोज़गार की अन्य योजनाएँ — प्रधानमंत्री रोज़गार सृजन कार्यक्रम (PMEGP, 2008) में खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग के माध्यम से नए सूक्ष्म उद्यम पर 15-35% मार्जिन मनी सब्सिडी मिलती है (अधिकतम परियोजना लागत विनिर्माण ₹50 लाख, सेवा ₹20 लाख)।

🎯 याद रखें — इस खंड के मुख्य बिंदु

1. भारत में 15-59 आयु के केवल 4.1% लोगों ने औपचारिक व्यावसायिक प्रशिक्षण लिया है; दक्षिण कोरिया में लगभग 96%।

2. कौशल मंत्रालय 9 नवंबर 2014; कौशल भारत मिशन 15 जुलाई 2015; विश्वकर्मा — 18 व्यवसाय, ₹15,000 टूलकिट, 5% ब्याज पर ऋण।

3. स्वनिधि (2025 पुनर्गठन) — किस्तें ₹15,000 / ₹25,000 / ₹50,000, मार्च 2030 तक, यूपीआई से जुड़ा रुपे क्रेडिट कार्ड।

💡 क्या आप जानते हैं? भारत में आईटीआई के माध्यम से दीर्घकालिक प्रशिक्षण देने वाली शिल्पकार प्रशिक्षण योजना की शुरुआत 1950 में हुई थी — यह देश का सबसे पुराना संगठित कौशल कार्यक्रम है।

13. ग्रामीण रोज़गार — मनरेगा से वीबी-जी राम जी तक (Rural Employment — MGNREGA to VB-G RAM G)

मई का महीना, राजस्थान का कोई सूखा गाँव। खेत ख़ाली हैं, कुएँ सूखे हैं। बीस साल पहले ऐसे समय में मज़दूर शहर की ओर चल पड़ता था। फिर एक कानून आया — "काम माँगो, तो सरकार को काम देना ही होगा।" यह था मनरेगा; 2025 में इसकी जगह नया कानून आया, जो काम के दिन बढ़ाता है पर ढाँचा बदल देता है।

📖 पीछे की कहानी — महाराष्ट्र का प्रयोग जिसने देश को राह दिखाई

1960 के दशक में महाराष्ट्र के विधायक विट्ठल सखाराम पागे ने सरल विचार रखा — गाँव में जो काम माँगे, सरकार उसे काम दे, ख़र्च शहरी पेशेवरों पर विशेष कर से उठे। 1972-73 के भीषण अकाल ने इसे राज्यव्यापी बना दिया और 1977 में यह महाराष्ट्र रोज़गार गारंटी अधिनियम बना — भारत में काम के अधिकार का पहला कानून। तीस साल बाद राष्ट्रीय कानून इसी मॉडल पर बना।

क. मनरेगा — एक कानून, एक अधिकार

📘 आसान परिभाषा: रोज़गार गारंटी (Employment Guarantee)

📚 परिभाषा: कानून द्वारा दिया गया ऐसा अधिकार जिसमें निर्धारित अवधि के भीतर काम माँगने वाले प्रत्येक पात्र व्यक्ति को सरकार सार्वजनिक कार्यों में मज़दूरी रोज़गार देने के लिए बाध्य है, और काम न देने पर बेरोज़गारी भत्ता देना होता है।

✅ आसान भाषा में: यह कोई "मेहरबानी" नहीं, अधिकार है — अगर आपने लिखकर काम माँगा और सरकार 15 दिन में काम न दे सकी, तो उसे घर बैठे भत्ता देना पड़ेगा। 🏠 उदाहरण: जैसे — सूखे के मौसम में गाँव के मज़दूर ने ग्राम पंचायत में आवेदन दिया और उसे गाँव के तालाब की खुदाई में काम मिल गया।

वर्ष

घटना

अगस्त-सितंबर 2005

संसद से पारित; 7 सितंबर 2005 को अधिसूचित

2006-2008

2 फ़रवरी 2006 को 200 पिछड़े ज़िलों में, 2007 में 130 और ज़िले, 1 अप्रैल 2008 से सभी ग्रामीण ज़िलों में

2 अक्टूबर 2009

नाम में "महात्मा गांधी" जोड़ा गया — मनरेगा (MGNREGA)

ख. मनरेगा की प्रमुख विशेषताएँ

पहलू

प्रावधान

पात्रता

हर ग्रामीण परिवार के वे वयस्क सदस्य जो अकुशल शारीरिक श्रम करना चाहें

गारंटी

प्रति परिवार प्रति वर्ष 100 दिन; सूखा/आपदा-प्रभावित क्षेत्रों में 50 अतिरिक्त दिन (कुल 150)

काम देने की समय-सीमा

काम माँगने के 15 दिन के भीतर; अन्यथा बेरोज़गारी भत्ता — पहले 30 दिन मज़दूरी का एक-चौथाई, उसके बाद आधा (राज्य देता है)

महिलाएँ

कम-से-कम एक-तिहाई लाभार्थी महिलाएँ; पुरुष-महिला को समान मज़दूरी

मज़दूरी : सामग्री

ग्राम पंचायत स्तर पर कम-से-कम 60 : 40; ठेकेदार व मशीन पर रोक

वित्त-पोषण

अकुशल मज़दूरी 100% केंद्र; सामग्री व कुशल-अर्धकुशल मज़दूरी 75 : 25; प्रशासनिक व्यय (कुल का 6%) केंद्र

📘 आसान परिभाषा: सामाजिक अंकेक्षण (Social Audit)

📚 परिभाषा: किसी सार्वजनिक योजना के क्रियान्वयन, व्यय और परिणामों की जाँच उसके लाभार्थियों व ग्राम समुदाय द्वारा, सार्वजनिक सभा में अभिलेखों के मिलान के माध्यम से करना।

✅ आसान भाषा में: सरकारी बाबू नहीं, गाँव के लोग ख़ुद हिसाब जाँचते हैं — मस्टर रोल पढ़कर सुनाया जाता है और लोग बताते हैं कि किसका नाम झूठा है या किसे पैसा नहीं मिला। 🏠 उदाहरण: जैसे — ग्राम सभा में पढ़ा गया कि "रामलाल ने 30 दिन काम किया", और रामलाल खड़े होकर बोले कि वे तो उस महीने शहर में थे — फ़र्ज़ीवाड़ा पकड़ा गया।

🐪 राजस्थान की भाषा में — जन-सुनवाई की धरती

सामाजिक अंकेक्षण का विचार राजस्थान की मिट्टी से निकला। 1990 के दशक में मज़दूर किसान शक्ति संगठन (अरुणा रॉय, निखिल डे, शंकर सिंह) ने राजसमंद-भीलवाड़ा-अजमेर के गाँवों में जन-सुनवाई शुरू की — पंचायत के बिल और मस्टर रोल गाँव वालों के सामने पढ़े गए। "हमारा पैसा, हमारा हिसाब" का यही नारा सूचना का अधिकार और सामाजिक अंकेक्षण की नींव बना।

ग. मनरेगा — उपलब्धियाँ और कमियाँ

🌟 उपलब्धियाँ

⚠️ कमियाँ

◆ ग्रामीण गरीबों के लिए सुरक्षा-जाल — सूखा, बाढ़ और कोविड में सहारा

◆ संकटकालीन पलायन में कमी; ग्रामीण मज़दूरी दरों में वृद्धि

◆ महिलाओं की भागीदारी 55-58% — कानूनी न्यूनतम (एक-तिहाई) से कहीं अधिक; अपनी कमाई, अपना खाता

◆ सीधे खाते में भुगतान से वित्तीय समावेशन; सामाजिक अंकेक्षण से पारदर्शिता की संस्कृति

◆ औसतन प्रति परिवार केवल लगभग 48-50 दिन काम; 10% से भी कम परिवार 100 दिन पूरे कर पाते

◆ मज़दूरी भुगतान में देरी; कई राज्यों में मनरेगा मज़दूरी राज्य की न्यूनतम मज़दूरी से भी कम

◆ बेरोज़गारी भत्ता लगभग नहीं मिलता — 2025-26 में देय भत्ते का केवल 2% दिया गया

◆ फ़र्ज़ी जॉब कार्ड, मस्टर रोल में हेरफेर; बजट ख़त्म होने पर माँग को दबाना

घ. नया कानून — विकसित भारत-रोज़गार एवं आजीविका गारंटी मिशन (ग्रामीण) अधिनियम, 2025

पूरा नाम "विकसित भारत-रोज़गार एवं आजीविका गारंटी मिशन (ग्रामीण) अधिनियम, 2025" (Viksit Bharat – Guarantee for Rozgar and Ajeevika Mission (Gramin) Act), संक्षेप में वीबी-जी राम जी (VB-G RAM G)। 21 दिसंबर 2025 को राष्ट्रपति की स्वीकृति मिली, इसने मनरेगा का स्थान लिया और 1 जुलाई 2026 से लागू है; राज्यों को 6 माह में अपनी योजनाएँ अधिसूचित करनी हैं।

📘 आसान परिभाषा: मानक-आधारित आवंटन (Normative Allocation)

📚 परिभाषा: केंद्र द्वारा तय वस्तुनिष्ठ मानकों के आधार पर प्रत्येक राज्य के लिए पहले से निश्चित वार्षिक संसाधन-सीमा तय करना; इस सीमा से अधिक व्यय का भार राज्य स्वयं उठाता है। यह माँग-आधारित (Demand-driven) व्यवस्था से भिन्न है, जिसमें जितनी माँग हो उतना धन देना होता है।

✅ आसान भाषा में: पहले "जितने लोग काम माँगें, उतना पैसा केंद्र देगा"; अब "केंद्र साल की शुरुआत में बता देगा कि आपके राज्य को इतना मिलेगा — ज़्यादा ख़र्च हुआ तो राज्य जाने"। 🏠 उदाहरण: जैसे — घर का मासिक बजट पहले से तय कर देना, बजाय इसके कि जितना ख़र्च हो उतना पैसा माँग लिया जाए।

पहलू

मनरेगा (2005)

वीबी-जी राम जी अधिनियम (2025)

गारंटीशुदा रोज़गार

100 दिन प्रति ग्रामीण परिवार

125 दिन प्रति ग्रामीण परिवार प्रति वित्त वर्ष

कृषि मौसम का ध्यान

कोई वैधानिक प्रावधान नहीं

बुवाई-कटाई के चरम मौसम में राज्य वर्ष में कुल 60 दिन तक कार्य-विराम अधिसूचित कर सकते हैं — ताकि खेतों को मज़दूर मिलें

वित्त-पोषण

अकुशल मज़दूरी 100% केंद्र

केंद्र-राज्य 60 : 40; पूर्वोत्तर व हिमालयी राज्य 90 : 10; बिना विधानसभा वाले केंद्रशासित प्रदेश 100% केंद्र

संसाधन आवंटन

माँग-आधारित

मानक-आधारित — राज्यवार सीमा; अतिरिक्त व्यय राज्य का

कार्य-क्षेत्र

विविध व बिखरी श्रेणियाँ

4 प्राथमिक क्षेत्र — जल सुरक्षा, मूल ग्रामीण अवसंरचना, आजीविका-संबंधी अवसंरचना, चरम मौसम से बचाव के कार्य

प्रशासनिक व्यय सीमा

6%

9%

बेरोज़गारी भत्ता

था, पर कई "अपात्रता" शर्तों से सीमित

जारी; अपात्र बनाने वाली शर्तें हटाकर अधिकार मज़बूत करने का दावा; भत्ता व भुगतान-देरी का मुआवज़ा राज्य देगा

निगरानी व पारदर्शिता

मस्टर रोल, बायोमेट्रिक, सीमित भू-स्थानिक निगरानी

बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण, भू-स्थानिक मानचित्रण, मोबाइल डैशबोर्ड, साप्ताहिक सार्वजनिक प्रकटीकरण; कम-से-कम हर 6 माह सामाजिक अंकेक्षण; गंभीर अनियमितता पर केंद्र धन रोक सकता है

चित्र

चित्र 7: मनरेगा और वीबी-जी राम जी — मुख्य अंतर एक नज़र में

🏛️ नए कानून के अन्य मुख्य प्रावधान

◆ मज़दूरी का आधार — 1 जुलाई 2026 से अधिसूचित दरों में कोई भी दर ₹300 प्रतिदिन से कम नहीं; राष्ट्रीय औसत मज़दूरी लगभग ₹299 से बढ़कर ₹327 प्रतिदिन।

◆ ग्रामीण रोज़गार गारंटी कार्ड — मज़दूर का नया पहचान-पत्र; संक्रमण काल में ई-केवाईसी से सत्यापित पुराने जॉब कार्ड मान्य।

⚠️ ध्यान दें — नाम और स्थिति

कई जगह इस कानून को "प्रस्तावित योजना" या ग़लत नाम से लिखा मिलता है। सही स्थिति — यह अधिनियम है, 21 दिसंबर 2025 को स्वीकृत और 1 जुलाई 2026 से लागू।

ङ. विश्लेषण — बदलाव कितना सही?

मुद्दा

नए कानून का तर्क

चिंता

परिसंपत्ति (Assets)

चार क्षेत्रों पर ध्यान से टिकाऊ, जलवायु-अनुकूल परिसंपत्तियाँ — जल संरचनाएँ, गोदाम, कृषि-प्रसंस्करण, संपर्क मार्ग

अधिक सामग्री और तकनीक वाले काम में ठेकेदारी और मशीन का दबाव बढ़ सकता है; श्रम-प्रधानता घट सकती है

अभिसरण (Convergence)

अन्य योजनाओं के साथ अनिवार्य जुड़ाव से दोहराव कम, एक ही गाँव-योजना

ऊपर से तय प्राथमिकताओं से ग्राम सभा की स्वायत्तता कमज़ोर पड़ने का डर

राज्यों पर बोझ

राज्यों की भागीदारी और जवाबदेही बढ़ेगी, फ़िज़ूलख़र्ची घटेगी

40% हिस्सा, बेरोज़गारी भत्ता व देरी का मुआवज़ा — गरीब राज्यों पर कई गुना राजकोषीय दबाव; जहाँ ज़रूरत सबसे ज़्यादा, वहीं क्षमता सबसे कम

60 दिन का विराम

बुवाई-कटाई में खेतों को मज़दूर, कृषि मज़दूरी में स्थिरता

भूमिहीन मज़दूर के लिए उन दिनों विकल्प सीमित; विराम की अवधि राज्य कैसे तय करें, यह अहम

🔎 तालिका से क्या समझें: हर पंक्ति में एक ही तनाव है — "अधिकार बनाम परिणाम"। मनरेगा का ज़ोर था कि जो माँगे, उसे काम मिले; नया कानून चाहता है कि काम टिकाऊ हो और योजना के मुताबिक़ हो। सफलता इस पर निर्भर है कि राज्यों को समय पर पर्याप्त धन मिले और ग्राम सभा की आवाज़ बनी रहे।

च. बजट 2026-27 — ग्रामीण रोज़गार पर ख़र्च

मद

संशोधित अनुमान 2025-26

बजट अनुमान 2026-27

वीबी-जी राम जी (नया कानून)

—

₹95,692 करोड़

मनरेगा (संक्रमण काल व पुरानी देनदारियाँ)

₹88,000 करोड़

₹30,000 करोड़

दोनों का योग

₹88,000 करोड़

लगभग ₹1.26 लाख करोड़ (लगभग 43% अधिक)

🎯 याद रखें — इस खंड के मुख्य बिंदु

1. मनरेगा — अधिनियम 2005, लागू 2 फ़रवरी 2006 (200 ज़िले), नाम में गांधी 2 अक्टूबर 2009; 100 दिन, धारा 17 में सामाजिक अंकेक्षण।

2. नया कानून — विकसित भारत-रोज़गार एवं आजीविका गारंटी मिशन (ग्रामीण) अधिनियम, 2025; स्वीकृति 21 दिसंबर 2025, लागू 1 जुलाई 2026।

3. नए कानून में 125 दिन, 60 : 40 (पूर्वोत्तर-हिमालयी 90 : 10), 60 दिन कृषि-विराम, मानक-आधारित आवंटन; बजट 2026-27 — ₹95,692 करोड़ (मनरेगा ₹30,000 करोड़)।

14. ग्रामीण विकास एवं आजीविका (Rural Development & Livelihoods)

भारत की लगभग दो-तिहाई आबादी 6.4 लाख से अधिक गाँवों में रहती है। गाँव का विकास चार स्तंभों पर टिका है — आजीविका, बुनियादी सुविधाएँ (मकान, सड़क, पानी), संपत्ति का अधिकार और मज़बूत पंचायत।

❝ "भारत अपने गाँवों में बसता है।" (India lives in her villages.) (— महात्मा गांधी)

क. स्वयं सहायता समूह आंदोलन

📘 आसान परिभाषा: स्वयं सहायता समूह (Self-Help Group)

📚 परिभाषा: समान सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि के 10-20 लोगों (प्रायः महिलाओं) का स्वैच्छिक, अनौपचारिक समूह, जो नियमित बचत करता है, उस बचत से सदस्यों को आपस में ऋण देता है और समूह के रूप में बिना संपार्श्विक (Collateral) बैंक ऋण प्राप्त करता है।

✅ आसान भाषा में: गाँव की 10-12 महिलाएँ हर हफ़्ते ₹50-100 जमा करती हैं; ज़रूरत पड़ने पर उसी पोटली से एक-दूसरे को उधार देती हैं; जब हिसाब साफ़ दिखता है तो बैंक भी पूरे समूह को बिना गारंटी कर्ज़ देता है — "एक के लिए सब, सब के लिए एक"। 🏠 उदाहरण: जैसे — बिहार की "जीविका" दीदियाँ, केरल की "कुडुम्बश्री" और राजस्थान की "राजीविका" के समूह।

📖 पीछे की कहानी — दस रुपये से बना बैंक

अहमदाबाद के कपड़ा मज़दूर संघ में काम करने वाली इला भट्ट ने देखा कि सिर पर बोझ ढोने वाली, सब्ज़ी बेचने वाली महिलाएँ किसी संगठन में नहीं गिनी जातीं। 1972 में उन्होंने उनका संगठन बनाया — सेवा (SEWA)। बैंक इन महिलाओं को खाता तक नहीं खोलने देते थे, तो 1974 में लगभग 4,000 महिलाओं ने दस-दस रुपये जोड़कर अपना ही बैंक खड़ा कर दिया — सेवा बैंक। यहीं से महिला सामूहिक बचत और ऋण की आधुनिक यात्रा शुरू हुई।

वर्ष

पड़ाव

1972

अहमदाबाद में सेवा की स्थापना — स्वयं सहायता समूह आंदोलन का मूल

1992

नाबार्ड का स्वयं सहायता समूह-बैंक लिंकेज कार्यक्रम (SHG-BLP) — समूहों को सीधे बैंक ऋण, दुनिया का सबसे बड़ा सूक्ष्म-वित्त कार्यक्रम बना

3 जून 2011

राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन ("आजीविका") — राजस्थान के बांसवाड़ा से शुरू; बाद में नाम दीनदयाल अंत्योदय योजना-राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन

पंचसूत्र — नियमित बैठक, नियमित बचत, नियमित आंतरिक ऋण, समय पर वापसी और अद्यतन खाते-बही; इन पाँचों पर बैंक ऋण मिलता है, बिना संपार्श्विक। 2020 में महिला समूहों की बिना गारंटी ऋण-सीमा ₹10 लाख से ₹20 लाख हुई; आजीविका मिशन के समूहों में NPA केवल लगभग 1.7% है।

ख. दीनदयाल अंत्योदय योजना-राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (DAY-NRLM)

यह ग्रामीण विकास मंत्रालय का सबसे बड़ा गरीबी-उन्मूलन कार्यक्रम है — हर गरीब ग्रामीण परिवार की कम-से-कम एक महिला को समूह से जोड़ना, समूहों को गाँव व संकुल स्तर के संघों में पिरोना और बैंक ऋण, आजीविका व बाज़ार तक पहुँचाना। पहचान सामाजिक-आर्थिक एवं जाति जनगणना 2011 व ग्राम सभा सत्यापन से होती है।

📊 आजीविका मिशन — नवीनतम आँकड़े

1. लगभग 10 करोड़ ग्रामीण परिवार, लगभग 91-92 लाख स्वयं सहायता समूहों में संगठित।

2. समूहों को अब तक कुल ₹11 लाख करोड़ से अधिक बैंक ऋण; 2025-26 में ही 44 लाख समूहों को लगभग ₹1.2 लाख करोड़ का ऋण।

उप-घटक

क्या करता है

परिक्रामी निधि व सामुदायिक निवेश निधि

प्रति समूह ₹20,000-30,000 परिक्रामी निधि; ग्राम संगठन के माध्यम से लगभग ₹2.5 लाख तक सामुदायिक निवेश निधि

ब्याज छूट (Interest Subvention)

₹3 लाख तक के समूह ऋण पर प्रभावी ब्याज 7%; पिछड़े ज़िलों में समय पर वापसी पर अतिरिक्त 3% छूट

सामुदायिक संसाधन व्यक्ति

कृषि सखी, पशु सखी, बैंक सखी, बीमा सखी — गाँव की ही प्रशिक्षित महिलाएँ

कौशल व स्वरोज़गार संस्थान

ग्रामीण युवाओं के लिए नियोजन-आधारित प्रशिक्षण व बैंक-प्रायोजित ग्रामीण स्वरोज़गार प्रशिक्षण संस्थान (RSETI)

चित्र

चित्र 8: आजीविका मिशन का तीन-स्तरीय सामुदायिक ढाँचा और सहायता की सीढ़ी

लखपति दीदी (Lakhpati Didi)

📘 आसान परिभाषा: लखपति दीदी (Lakhpati Didi)

📚 परिभाषा: स्वयं सहायता समूह की वह सदस्य जिसकी पारिवारिक वार्षिक आय कम-से-कम चार कृषि मौसमों या व्यवसाय-चक्रों तक लगातार ₹1 लाख या अधिक (औसतन लगभग ₹10,000 प्रति माह) बनी रहे।

✅ आसान भाषा में: केवल एक बार ₹1 लाख कमा लेना काफ़ी नहीं — कमाई लगातार इतनी रहनी चाहिए, यानी आजीविका टिकाऊ हो। 🏠 उदाहरण: जैसे — डेयरी और सिलाई का काम साथ चलाकर सालाना ₹1.2 लाख कमाने वाली गाँव की समूह-सदस्य।

📊 लखपति दीदी — नवीनतम आँकड़े

1. पहल 2023 में; 3 करोड़ का लक्ष्य 2026 की शुरुआत में ही (समय से लगभग एक वर्ष पहले) पूरा; 15 अगस्त 2026 को नया लक्ष्य 6 करोड़ लखपति दीदी।

🛒 शी-मार्ट (SHE-Marts) — बजट 2026-27

समूह-आधारित सामुदायिक स्वामित्व वाली खुदरा दुकानें, जिन्हें संकुल संघ चलाएँगे — ताकि दीदियों के उत्पाद को स्थायी बाज़ार मिले और वे "ऋण-आधारित आजीविका" से आगे बढ़कर उद्यम की मालिक बनें।

नमो ड्रोन दीदी (Namo Drone Didi)

29 नवंबर 2023 को स्वीकृत इस केंद्रीय क्षेत्र योजना में 15,000 महिला समूहों को ड्रोन देने का लक्ष्य (परिव्यय ₹1,261 करोड़) है। लागत का 80% (अधिकतम ₹8 लाख) केंद्र देता है, शेष कृषि अवसंरचना कोष से 3% ब्याज-छूट वाले ऋण से; 15 दिन का प्रशिक्षण (ड्रोन पायलट सहित) मिलता है और समूह खाद-कीटनाशक छिड़काव किराये पर देकर कमाता है।

🌟 आजीविका मिशन की सफलताएँ

⚠️ चुनौतियाँ

◆ महिलाओं की घरेलू निर्णयों में भूमिका बढ़ी; साहूकार पर निर्भरता घटी

◆ बेहद कम ऋण-चूक; बैंकों के लिए भरोसेमंद ग्राहक

◆ अधिकांश उद्यम छोटे, कम-उत्पादकता वाले; बाज़ार व ब्रांडिंग कमज़ोर

◆ "लखपति" गिनती में स्व-घोषित आय पर निर्भरता; टिकाऊपन की जाँच कठिन

🐪 राजस्थान की भाषा में — राजीविका की दीदियाँ

राजस्थान में मिशन "राजीविका" नाम से चलता है — और राष्ट्रीय मिशन की शुरुआत भी बांसवाड़ा से हुई थी। मेवाड़-वागड़ में दीदियाँ बकरी-पालन, दाल-मसाला प्रसंस्करण और हस्तशिल्प से, तो पश्चिमी राजस्थान में कसीदाकारी व पट्टू-बुनाई से कमा रही हैं। जिस "घूँघट वाली बहू" को पंचायत में बोलने नहीं दिया जाता था, वही आज बैंक सखी बनकर गाँव के खाते खुलवा रही है।

ग. ग्रामीण बुनियादी ढाँचा — मकान, सड़क, पानी

(i) प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण (PMAY-G)

पहलू

प्रावधान

लक्ष्य

पहले चरण में 2.95 करोड़ पक्के मकान; अगस्त 2024 में 2 करोड़ अतिरिक्त (2024-25 से 2028-29) — कुल लगभग 4.95 करोड़

सहायता राशि

मैदानी क्षेत्र ₹1.20 लाख; पहाड़ी, दुर्गम व पूर्वोत्तर क्षेत्र ₹1.30 लाख; न्यूनतम आकार 25 वर्ग मीटर

स्वामित्व

मकान महिला के नाम या संयुक्त नाम पर — महिला सशक्तीकरण

प्रगति

दिसंबर 2025 तक लगभग 2.9 करोड़ मकान पूर्ण; बजट 2026-27 में ₹54,917 करोड़ (2025-26 संशोधित ₹32,500 करोड़)

(ii) प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY) — चरणों में

चरण

शुरुआत

उद्देश्य

पहला चरण

25 दिसंबर 2000

बिना सड़क वाली बस्तियों को बारहमासी सड़क — मैदानी क्षेत्र में 500+, पहाड़ी/पूर्वोत्तर/रेगिस्तानी में 250+ आबादी

चौथा चरण

सितंबर 2024 (2024-25 से 2028-29)

₹70,125 करोड़; जनगणना 2011 आधार पर नई पात्र 25,000 बस्तियों को 62,500 किमी बारहमासी सड़कें

वित्त-पोषण 60 : 40 (पूर्वोत्तर-हिमालयी 90 : 10); स्वीकृत लगभग 8.36 लाख किमी में से 7.87 लाख किमी (94%) बन चुकी है; बजट 2026-27 में ₹19,000 करोड़। चुनौती अब रखरखाव और गुणवत्ता की है।

(iii) जल जीवन मिशन (Jal Jeevan Mission) — हर घर जल

📊 जल जीवन मिशन — नवीनतम आँकड़े

1. शुरुआत 15 अगस्त 2019; जल शक्ति मंत्रालय; लक्ष्य — हर ग्रामीण घर को कार्यात्मक घरेलू नल कनेक्शन से प्रति व्यक्ति प्रतिदिन 55 लीटर सुरक्षित पेयजल।

2. 2019 में केवल 3.23 करोड़ (17%) ग्रामीण घरों में नल-जल था; 2025 के अंत तक 15.7 करोड़ से अधिक (81%+) घर जुड़े।

3. बजट 2025-26 में मिशन 2028 तक बढ़ाया गया — अब ज़ोर गुणवत्ता, संचालन-रखरखाव और जन-भागीदारी पर।

इसके पूरक के रूप में मिशन अमृत सरोवर (24 अप्रैल 2022) में हर ज़िले में 75 जल-निकायों के निर्माण/पुनरुद्धार का लक्ष्य रखा गया; 68,000 से अधिक सरोवर बने, जिनमें 3,000 से अधिक राजस्थान में हैं।

घ. संपत्ति का अधिकार और डिजिटल पंचायत

📘 आसान परिभाषा: स्वामित्व योजना (SVAMITVA)

📚 परिभाषा: गाँवों के आबादी (बसावट) क्षेत्र का ड्रोन और सतत संचालन संदर्भ स्टेशन (CORS) तकनीक से सर्वेक्षण कर प्रत्येक भवन-स्वामी को कानूनी संपत्ति कार्ड देने की पंचायती राज मंत्रालय की केंद्रीय योजना (24 अप्रैल 2020 से)।

✅ आसान भाषा में: गाँव में जिस घर में आप पीढ़ियों से रहते हैं, उसका अब तक कोई काग़ज़ नहीं था — ड्रोन से नाप-जोख कर सरकार अब घर का पक्का काग़ज़ दे रही है। 🏠 उदाहरण: जैसे — संपत्ति कार्ड मिलने के बाद गाँव का दुकानदार अपने घर को गिरवी रखकर बैंक से ऋण ले सकता है और पड़ोसी से सीमा-विवाद भी नहीं रहता।

📊 स्वामित्व योजना (जुलाई 2026) — नवीनतम आँकड़े

1. 1.97 लाख गाँवों में लगभग 3.24 करोड़ संपत्ति कार्ड तैयार; सबसे आगे उत्तर प्रदेश (लगभग 1.2 करोड़ कार्ड)।

पहल

मुख्य बात

विशिष्ट भूमि पार्सल पहचान संख्या (ULPIN) — "भू-आधार"

हर भूखंड की 14 अंकों की अक्षरांकीय (Alphanumeric) पहचान, भूखंड के अक्षांश-देशांतर पर आधारित

ई-ग्राम स्वराज पोर्टल (e-GramSwaraj)

24 अप्रैल 2020; पंचायतों की योजना, लेखा, भुगतान व प्रगति की निगरानी हेतु एकल खिड़की; भाषिणी से 22 अनुसूचित भाषाओं में

राष्ट्रीय ग्राम स्वराज अभियान (RGSA)

24 अप्रैल 2018; केंद्र प्रायोजित; पंचायत प्रतिनिधियों का क्षमता-निर्माण; संशोधित अभियान 2022-23 से 2025-26 — गाँव स्तर पर सतत विकास लक्ष्यों का स्थानीयकरण

ङ. शहरी आजीविका — संक्षेप में

दीनदयाल अंत्योदय योजना-राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन (DAY-NULM) 2013 में स्वर्णजयंती शहरी रोज़गार योजना (1997) की जगह आया — शहरी गरीब महिलाओं के स्वयं सहायता समूह, कौशल व नियोजन, ब्याज-छूट वाला ऋण, बेघरों के लिए आश्रय और रेहड़ी-पटरी विक्रेताओं को सहायता। गाँव और शहर के दोनों मिशन मिलकर "दीनदयाल अंत्योदय योजना" के दो पहिये हैं।

💡 क्या आप जानते हैं? गोवा देश का पहला "हर घर जल" प्रमाणित राज्य बना, जहाँ हर ग्रामीण घर तक नल से पानी पहुँचा।

💡 क्या आप जानते हैं? हर वर्ष 24 अप्रैल को राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस मनाया जाता है — इसी दिन 1993 में 73वाँ संविधान संशोधन लागू हुआ था, जिसने पंचायतों को संवैधानिक दर्जा दिया।

🎯 याद रखें — इस खंड के मुख्य बिंदु

1. सेवा 1972 (इला भट्ट), समूह-बैंक लिंकेज 1992 (नाबार्ड), आजीविका मिशन 3 जून 2011 (बांसवाड़ा); पंचसूत्र — बैठक, बचत, आंतरिक ऋण, समय पर वापसी, खाते।

2. आजीविका मिशन — लगभग 10 करोड़ परिवार, 91-92 लाख समूह; 3 करोड़ लखपति दीदी पूरे, नया लक्ष्य 6 करोड़; ड्रोन दीदी — 15,000 ड्रोन, 80% (अधिकतम ₹8 लाख) सहायता।

3. ग्रामीण आवास — ₹1.20 / ₹1.30 लाख, लक्ष्य 4.95 करोड़; ग्राम सड़क चौथा चरण — 62,500 किमी; जल जीवन मिशन 2028 तक, 55 लीटर; स्वामित्व — 3.24 करोड़ कार्ड।

15. संतुलित मूल्यांकन (Balanced Assessment)

पिछले दो दशकों में भारत के सामाजिक क्षेत्र ने ऐतिहासिक प्रगति की है, पर हर उपलब्धि के साथ एक "लेकिन" भी जुड़ा है। नीचे गरीबी और रोज़गार का दो-तरफ़ा मूल्यांकन है; स्वास्थ्य और शिक्षा का मूल्यांकन अध्याय 8ख में है।

क. गरीबी

✅ उपलब्धियाँ

⚠️ चिंताएँ

◆ 2005-06 से 2019-21 के बीच लगभग 41.5 करोड़ लोग बहुआयामी गरीबी से बाहर

◆ राष्ट्रीय बहुआयामी गरीबी 24.85% से 14.96% (2015-16 से 2019-21)

◆ सबसे गरीब राज्यों (बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान) में सबसे तेज़ गिरावट

◆ 2011-12 के बाद कोई आधिकारिक गरीबी रेखा नहीं — नीति अनुमानों पर निर्भर

◆ गरीबी से निकले बहुत से परिवार रेखा के ठीक ऊपर — एक बीमारी या सूखा उन्हें वापस धकेल सकता है

◆ पोषण संकेतक में सुधार सबसे धीमा

ख. रोज़गार

✅ उपलब्धियाँ

⚠️ चिंताएँ

◆ बेरोज़गारी दर कई वर्षों के निचले स्तर पर

◆ महिला श्रम बल भागीदारी 2017-18 के लगभग 23% से 40% के पार

◆ श्रम संहिताओं से गिग-प्लेटफ़ॉर्म श्रमिकों को पहली बार सामाजिक सुरक्षा की क़ानूनी पहचान

◆ 90% से अधिक कार्यबल अनौपचारिक; नियमित वेतन वाले काम का हिस्सा कम

◆ शिक्षित युवाओं में बेरोज़गारी ऊँची; कौशल-अंतराल

◆ महिला रोज़गार का बड़ा हिस्सा अवैतनिक पारिवारिक सहायक का

निष्कर्ष: "संख्या" की लड़ाई काफ़ी हद तक जीती गई; अब चुनौती रेखा के ठीक ऊपर खड़े परिवारों को टिकाऊ आजीविका और गरिमापूर्ण रोज़गार तक पहुँचाने की है।

🎯 याद रखें — इस खंड के मुख्य बिंदु

1. बहुआयामी गरीबी से 41.5 करोड़ बाहर (2005-06 से 2019-21); राष्ट्रीय दर 24.85% से 14.96%।

2. चिंता — 90%+ अनौपचारिक कार्यबल, पोषण में सबसे धीमा सुधार; उपलब्धि — महिला श्रम भागीदारी 23% से 40% के पार।

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16. राजस्थान से जुड़ाव (Rajasthan Linkages)

राजस्थान — क्षेत्रफल में देश का सबसे बड़ा राज्य, जहाँ मरुस्थल, जनजातीय अंचल और बिखरी बसावट सामाजिक सेवाओं को महँगा और कठिन बनाते हैं। फिर भी पिछले दशक में राज्य ने गरीबी घटाने और रोज़गार-आजीविका के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रयोग किए हैं; स्वास्थ्य-सुरक्षा व शिक्षा की योजनाएँ अध्याय 8ख में हैं।

क. सामाजिक संकेतक — राजस्थान बनाम भारत

संकेतक

राजस्थान

भारत / टिप्पणी

बहुआयामी गरीबी (2015-16 से 2019-21)

28.86% से 15.31%; लगभग 1.87 करोड़ लोग बाहर

24.85% से 14.96%; लोगों की संख्या में राजस्थान चौथा

युवा बेरोज़गारी दर (15-29 वर्ष, सामान्य स्थिति, 2023-24)

12.4% (2020-21 में 13.4%)

राष्ट्रीय 10.2% — राजस्थान राष्ट्रीय औसत से ऊपर

साक्षरता (जनगणना 2011)

66.1%; महिला 52.1% — राज्यों में सबसे कम

राष्ट्रीय 74.0%; पुरुष-महिला साक्षरता का अंतर सबसे बड़ा

बच्चों में नाटापन / एनीमिया (वही सर्वेक्षण)

31.8% / 71.5%

नाटापन राष्ट्रीय (35.5%) से कम, पर बच्चों में एनीमिया राष्ट्रीय (67.1%) से अधिक

🔎 तालिका से क्या समझें: राजस्थान की तस्वीर मिश्रित है — संस्थागत प्रसव और गरीबी घटाने में यह राष्ट्रीय औसत के बराबर या आगे निकल गया है, पर महिला साक्षरता, शिशु लिंगानुपात, बच्चों में एनीमिया और युवा बेरोज़गारी में अब भी पीछे है। यानी राज्य की सबसे बड़ी चुनौती लैंगिक है — बेटियों की पढ़ाई, पोषण और रोज़गार।

17. प्रमुख व्यक्तित्व (Key Personalities)

व्यक्तित्व

योगदान

दादाभाई नौरोजी (1825-1917)

"भारत में गरीबी और अ-ब्रिटिश शासन" (1901); धन-निष्कासन सिद्धांत; 1867-68 के लिए प्रति व्यक्ति आय का अनुमान व निर्वाह-लागत आधारित गरीबी रेखा का पहला विचार

वी.एम. दांडेकर व नीलकंठ रथ

"भारत में गरीबी" (1971) — 2,250 कैलोरी प्रतिदिन के आधार पर पहला व्यवस्थित गरीबी आकलन

सुरेश तेंदुलकर

विशेषज्ञ समूह (2009) — कैलोरी के स्थान पर उपभोग टोकरी; 2011-12 में गरीबी 21.9%

सी. रंगराजन

विशेषज्ञ समूह (2014) — 2011-12 में गरीबी 29.5%; ग्रामीण ₹32, शहरी ₹47 प्रतिदिन

सबीना अलकायर

जेम्स फ़ॉस्टर के साथ अलकायर-फ़ॉस्टर पद्धति — 2010 से वैश्विक बहुआयामी गरीबी सूचकांक (ऑक्सफ़ोर्ड गरीबी एवं मानव विकास पहल)

अभिजीत बनर्जी व एस्थर डुफ़्लो

(माइकल क्रेमर के साथ) वैश्विक गरीबी घटाने के लिए यादृच्छिक नियंत्रित परीक्षण आधारित प्रयोगात्मक पद्धति; नोबेल 2019

क्लॉडिया गोल्डिन

महिला श्रम बाज़ार के इतिहास पर शोध — महिला श्रम भागीदारी का "यू"-आकार वक्र; नोबेल 2023

18. विस्तृत कालक्रम (Detailed Timeline)

वर्ष

घटना

महत्व

1798

माल्थस का जनसंख्या सिद्धांत

जनसंख्या-संसाधन बहस की शुरुआत

1901

दादाभाई नौरोजी की कृति "भारत में गरीबी और अ-ब्रिटिश शासन"

गरीबी और धन-निष्कासन पर पहला व्यवस्थित विमर्श

1971

दांडेकर-रथ अध्ययन; "गरीबी हटाओ" का नारा

गरीबी राजनीति व नीति के केंद्र में

1979

अलघ कार्यबल

कैलोरी-आधारित पहली आधिकारिक गरीबी रेखा

1990

पहली मानव विकास रिपोर्ट

विकास का नया पैमाना — मानव विकास सूचकांक

1 अप्रैल 1999

स्वर्णजयंती ग्राम स्वरोज़गार योजना

समन्वित ग्रामीण विकास कार्यक्रम सहित छह योजनाओं का विलय; स्वयं सहायता समूह आधारित

2005

राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (12 अप्रैल); जननी सुरक्षा योजना; राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम (सितंबर)

स्वास्थ्य व काम — अधिकार की ओर

2 फ़रवरी 2006

रोज़गार गारंटी 200 ज़िलों में लागू (अनंतपुर, आंध्र प्रदेश से)

100 दिन काम का क़ानूनी अधिकार

2009

तेंदुलकर समिति; शिक्षा का अधिकार अधिनियम (लागू 1 अप्रैल 2010); रोज़गार गारंटी को "महात्मा गांधी" नाम (2 अक्टूबर)

नई गरीबी पद्धति; शिक्षा अधिकार

2011

राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (3 जून, बांसवाड़ा); सामाजिक-आर्थिक एवं जाति जनगणना

स्वयं सहायता समूह आंदोलन; लाभार्थी पहचान

2021 / 2023

नीति आयोग का राष्ट्रीय बहुआयामी गरीबी सूचकांक — आधार रिपोर्ट / प्रगति समीक्षा; राजस्थान स्वास्थ्य का अधिकार अधिनियम (2023)

राष्ट्रीय स्तर पर बहुआयामी मापन

2025

केरल — अत्यधिक गरीबी मुक्त घोषणा (1 नवंबर); श्रम संहिताएँ लागू (21 नवंबर); नया ग्रामीण रोज़गार क़ानून (स्वीकृति 21 दिसंबर)

श्रम व ग्रामीण रोज़गार ढाँचे में ऐतिहासिक बदलाव

2026

मकान सूचीकरण चरण (अप्रैल-सितंबर); श्रम संहिताओं के केंद्रीय नियम (8 मई); राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6 जारी (मई के अंत में); नया ग्रामीण रोज़गार क़ानून लागू (1 जुलाई); सतत विकास रिपोर्ट में भारत 94वाँ

नई गणना, नया आँकड़ा-आधार

1 मार्च 2027

जनगणना 2027 की संदर्भ तिथि — पहली डिजिटल जनगणना, जाति गणना सहित

आगामी सामाजिक नीतियों का आधार

2030 / 2047

सतत विकास लक्ष्यों की समय-सीमा / विकसित भारत

शून्य गरीबी, सार्वभौमिक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा-स्वास्थ्य

19. शब्दकोश — ज़रूरी शब्द (Glossary)

अध्याय पढ़ने के बाद दोहराने (रिवीज़न) के लिए — हर ज़रूरी शब्द एक पंक्ति में। विस्तृत परिभाषा और उदाहरण अध्याय के संबंधित खंड में दिए गए हैं।

क. मानव विकास एवं जनसंख्या

शब्द

एक पंक्ति में अर्थ

मानव पूँजी (Human Capital)

शिक्षा, स्वास्थ्य व कौशल के रूप में लोगों में किया गया निवेश।

क्षमता दृष्टिकोण (Capability Approach)

विकास = लोगों की वास्तविक स्वतंत्रताओं व विकल्पों का विस्तार (अमर्त्य सेन)।

मानव विकास सूचकांक (HDI)

दीर्घ-स्वस्थ जीवन, ज्ञान और जीवन-स्तर का संयुक्त माप।

लैंगिक असमानता सूचकांक (GII)

प्रजनन स्वास्थ्य, सशक्तीकरण व श्रम बाज़ार में स्त्री-पुरुष अंतर का माप।

जनसांख्यिकीय संक्रमण (Demographic Transition)

ऊँची जन्म-मृत्यु दर से नीची जन्म-मृत्यु दर तक की यात्रा।

जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend)

कार्यशील आयु की अधिक आबादी से मिलने वाला वृद्धि का अवसर।

आश्रितता अनुपात (Dependency Ratio)

बच्चे व बुज़ुर्ग ÷ कार्यशील आयु की आबादी।

कुल प्रजनन दर (TFR)

एक महिला से जीवनकाल में औसतन जन्मे बच्चे; 2.1 = प्रतिस्थापन स्तर।

ख. गरीबी एवं असमानता

शब्द

एक पंक्ति में अर्थ

निरपेक्ष गरीबी (Absolute Poverty)

न्यूनतम आवश्यकताएँ भी पूरी न कर पाना — गरीबी रेखा से नीचे।

सापेक्ष गरीबी (Relative Poverty)

समाज के औसत की तुलना में पिछड़ापन।

गरीबी रेखा (Poverty Line)

न्यूनतम जीवन-स्तर के लिए आवश्यक व्यय/आय की सीमा।

बहुआयामी गरीबी सूचकांक (MPI)

स्वास्थ्य, शिक्षा, जीवन-स्तर के कई अभावों से मापी गई गरीबी।

निर्धनता अनुपात (Headcount Ratio)

गरीबी रेखा से नीचे लोगों का प्रतिशत।

गरीबी अंतराल (Poverty Gap)

गरीब लोग गरीबी रेखा से औसतन कितने नीचे हैं।

गिनी गुणांक (Gini Coefficient)

0 (पूर्ण समानता) से 1 (पूर्ण असमानता) तक का असमानता माप।

लॉरेंज़ वक्र (Lorenz Curve)

जनसंख्या व आय के संचयी हिस्से का वक्र — असमानता का चित्र।

गरीबी का दुष्चक्र (Vicious Circle of Poverty)

कम आय → कम बचत → कम निवेश → कम आय का चक्र।

सार्वभौमिक बुनियादी आय (UBI)

हर नागरिक को बिना शर्त निश्चित नक़द आय का विचार।

ग. भूख, रोज़गार एवं श्रम

शब्द

एक पंक्ति में अर्थ

बौनापन / दुबलापन (Stunting / Wasting)

आयु के अनुपात में कम लंबाई / लंबाई के अनुपात में कम वज़न।

छिपी भूख (Hidden Hunger)

पेट भरा, पर विटामिन-खनिजों की कमी।

श्रम बल भागीदारी दर (LFPR)

काम कर रहे + काम ढूँढ रहे लोग ÷ कुल जनसंख्या।

श्रमिक जनसंख्या अनुपात (WPR)

काम कर रहे लोग ÷ कुल जनसंख्या।

बेरोज़गारी दर (Unemployment Rate)

बेरोज़गार ÷ श्रम बल।

प्रच्छन्न बेरोज़गारी (Disguised Unemployment)

काम पर लगे दिखें, पर हटाने से उत्पादन न घटे।

घर्षणात्मक / संरचनात्मक बेरोज़गारी

नौकरी बदलने के बीच की / कौशल-माँग बेमेल से पैदा बेरोज़गारी।

प्राकृतिक बेरोज़गारी दर (Natural Rate)

पूर्ण रोज़गार में भी बनी रहने वाली घर्षणात्मक + संरचनात्मक बेरोज़गारी।

सामान्य स्थिति / चालू साप्ताहिक स्थिति

पिछले 365 दिन / पिछले 7 दिन के आधार पर रोज़गार का माप।

गिग श्रमिक (Gig Worker)

पारंपरिक नियोक्ता-संबंध से बाहर, काम-आधारित भुगतान वाला श्रमिक।

20. अध्याय एक नज़र में (Chapter at a Glance)

पूरे अध्याय को एक पेज पर देखिए — पढ़ाई के बाद दोहराने का सबसे तेज़ तरीका। हर डिब्बा अध्याय के एक बड़े हिस्से को तीन मुख्य बिंदुओं में समेटता है।

चित्र

चित्र 9: सामाजिक क्षेत्र (भाग 1) — अध्याय 8क का नक्शा

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सामाजिक क्षेत्र (भाग 1) — गरीबी, भूख एवं रोज़गार — 56 पेज · बिल्कुल मुफ़्त · मोबाइल/प्रिंट के लिए
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