🌅 कहानी से शुरुआत 📖 कहानी 1 — मई 1991 : जब देश ने अपने गहने गिरवी रखे मई 1991 की एक गर्म रात। मुंबई हवाई अड्डे के एक कोने में भारी पहरे के बीच एक विमान खड़ा है। उसमें फलों या मशीनों की नहीं, भारत के सोने की पेटियाँ लादी जा रही हैं। अफ़सर चुप हैं, क्योंकि यह ख़बर बाहर आई तो देश में हड़कंप मच सकता है। सोना विदेशी बैंकों में गिरवी रखा जाना है — ठीक वैसे ही जैसे कोई परिवार बेटी की शादी या इलाज के लिए अपने गहने साहूकार के पास रखता है। नौबत यहाँ तक क्यों आई? देश के ख़ज़ाने में इतनी ही विदेशी मुद्रा बची थी कि मुश्किल से दो-तीन हफ़्ते का पेट्रोल, खाद और खाने का तेल आ सके। खाड़ी युद्ध ने तेल महँगा कर दिया था, विदेश में काम करने वाले भारतीयों की कमाई आनी घट गई थी, और दुनिया के बैंक भारत को उधार देने से मना कर रहे थे। कुछ ही महीनों में कुल लगभग 67 टन सोना गिरवी रखा गया। उस समय प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की अल्पमत सरकार थी और यह फ़ैसला गुप्त रखा गया था। पर जब ख़बर अख़बारों में छपी, तो देश भर में तूफ़ान उठ खड़ा हुआ — लोगों को लगा कि भारत की इज़्ज़त गिरवी रख दी गई है। जून 1991 में पी.वी. नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री बने और उन्होंने राजनीति से बाहर के एक अर्थशास्त्री — डॉ. मनमोहन सिंह — को वित्त मंत्री बनाकर सबको चौंका दिया। फिर आया 24 जुलाई 1991। संसद में नए वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह खड़े हुए और विक्टर ह्यूगो की पंक्ति दोहराई — "पृथ्वी की कोई भी शक्ति उस विचार को नहीं रोक सकती, जिसका समय आ गया हो।" उसी दिन लाइसेंस राज टूटा, दरवाज़े दुनिया के लिए खुले और "उदारीकरण, निजीकरण, वैश्वीकरण" का दौर शुरू हुआ। आज वही भारत 700 अरब डॉलर से अधिक विदेशी मुद्रा भंडार वाला देश है। ✦ ✦ ✦ 📖 कहानी 2 — एक स्कूटर, दो पीढ़ियाँ 1985 का जयपुर। रमेश जी एक सरकारी दफ़्तर में बाबू हैं। उन्होंने एक प्रसिद्ध कंपनी के स्कूटर के लिए बुकिंग कराई है — पैसे जमा, पर स्कूटर कब मिलेगा, कोई नहीं जानता। कई साल की "वेटिंग" आम बात है। कारण सीधा था — कंपनी जितने स्कूटर बना सकती थी, उससे ज़्यादा बनाने के लिए उसे सरकार से अलग लाइसेंस लेना पड़ता, और नई कंपनी को बाज़ार में आने की अनुमति ही मुश्किल से मिलती थी। टेलीफ़ोन कनेक्शन के लिए भी लोग सालों इंतज़ार करते थे। 2026 का जयपुर। रमेश जी की बेटी नेहा ने इंजीनियरिंग के बाद बिजली से चलने वाले स्कूटर बनाने का स्टार्टअप शुरू किया है। उसने मोबाइल से कुछ ही मिनटों में उद्यम पोर्टल पर निःशुल्क पंजीकरण किया, बिना गिरवी के बैंक से ऋण लिया, रीको के औद्योगिक क्षेत्र में तैयार भूखंड लिया, और बैटरी के पुर्ज़ों पर सरकार के उत्पादन प्रोत्साहन का लाभ उठाया। उसके स्कूटर ख़रीदने वाले को पीएम ई-ड्राइव की छूट भी मिलती है। रमेश जी हँसकर कहते हैं — "बेटी, हमारे ज़माने में स्कूटर ख़रीदने के लिए सालों रुकना पड़ता था, और तुम स्कूटर बनाने की फ़ैक्ट्री चला रही हो!" नेहा जवाब देती है — "पापा, फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि तब सरकार अनुमति देने वाली थी, अब सुविधा देने वाली है।" उस शाम नेहा पापा को अपनी फ़ैक्ट्री दिखाने ले गई, जहाँ आसपास के गाँवों की बीस युवतियाँ बैटरी जोड़ना और स्कूटर की जाँच करना सीख रही थीं। रमेश जी देर तक उन्हें काम करते देखते रहे — उन्हें लगा कि 1991 का बदलाव केवल बाज़ार खोलने का नहीं, लाखों युवाओं के लिए अवसर खोलने का भी था। 🎯 इस अध्याय में हम इन्हीं दोनों कहानियों के पीछे की पूरी यात्रा समझेंगे — योजनाकाल और लाइसेंस राज क्यों आया, 1991 का संकट और सुधार कैसे हुए, सरकारी कंपनियाँ क्यों बेची गईं, लघु उद्यम, मेक इन इंडिया और स्टार्टअप कैसे काम करते हैं, और राजस्थान इस बदलती औद्योगिक दुनिया में कहाँ खड़ा है। |
📘 आसान परिभाषा: उद्योग (Industry) |
📚 परिभाषा: उत्पादन के चारों साधनों — भूमि, श्रम, पूँजी और उद्यमशीलता — को संयोजित करके बाज़ार के लिए भौतिक वस्तुओं के निर्माण की व्यवस्थित प्रक्रिया को उद्योग कहते हैं। राष्ट्रीय आय लेखांकन में इसे द्वितीयक क्षेत्र कहा जाता है। |
✅ आसान भाषा में: कच्चे माल को मशीन और मेहनत से ऐसी चीज़ में बदलना जिसकी क़ीमत पहले से ज़्यादा हो — जैसे कपास से कपड़ा, लौह अयस्क से इस्पात। 🏠 उदाहरण: रसोई में आटा, पानी और आग मिलाकर रोटी बनती है — आटा "कच्चा माल" है, आप "श्रमिक" हैं, चूल्हा "मशीन" है और रोटी "तैयार माल"। पूरे देश के स्तर पर यही काम कारखाने करते हैं। |
उप-क्षेत्र | क्या शामिल है | उदाहरण |
1. विनिर्माण (Manufacturing) | कच्चे माल का रूपांतरण — औद्योगिक क्षेत्र का सबसे बड़ा हिस्सा | इस्पात, वस्त्र, मोबाइल, दवाएँ, वाहन |
2. निर्माण (Construction) | भवन, सड़क, पुल, बाँध आदि का निर्माण | आवास परियोजनाएँ, राजमार्ग |
3. खनन एवं उत्खनन (Mining & Quarrying) | भूमि से खनिज निकालना | कोयला, लौह अयस्क, संगमरमर, जस्ता |
4. विद्युत, गैस, जल आपूर्ति एवं अन्य उपयोगिता सेवाएँ | ऊर्जा व आधारभूत सेवाओं की आपूर्ति | बिजलीघर, नगर गैस वितरण, जलापूर्ति |
🔎 तालिका से क्या समझें: चारों उप-क्षेत्रों में सबसे बड़ा और सबसे अधिक रोज़गार देने वाला विनिर्माण है। जब अख़बार "औद्योगिक वृद्धि" लिखते हैं तो उसमें खनन, बिजली और निर्माण भी शामिल होते हैं; पर "विनिर्माण वृद्धि" केवल कारख़ानों के उत्पादन की बात करती है — दोनों को अलग समझना ज़रूरी है।
अर्थव्यवस्था की "रीढ़" माने जाने वाले आठ आधारभूत उद्योगों का सूचकांक आर्थिक सलाहकार कार्यालय (उद्योग संवर्धन एवं आंतरिक व्यापार विभाग — DPIIT) हर माह जारी करता है। इन्हें याद रखने का सूत्र है — "सी-सी-सी-फ़र्न्स" (CCC-FERNS)।
![]() चित्र 1: उद्योगों का वर्गीकरण — उप-क्षेत्र, स्वामित्व, आकार और कच्चा माल |
![]() चित्र 2: आठ कोर उद्योग — "सी-सी-सी-फ़र्न्स" |
क्रम | कोर उद्योग | महत्व |
1-3 | सीमेंट (Cement), कोयला (Coal), कच्चा तेल (Crude Oil) | निर्माण व ऊर्जा का आधार |
4-5 | विद्युत (Electricity), उर्वरक (Fertilizers) | उद्योग व कृषि दोनों के लिए अनिवार्य |
6-8 | प्राकृतिक गैस (Natural Gas), रिफ़ाइनरी उत्पाद (Refinery Products), इस्पात (Steel) | रिफ़ाइनरी उत्पादों का भार सर्वाधिक |
🔎 तालिका से क्या समझें: आठ कोर उद्योग बाकी सब उद्योगों के "कच्चे माल" हैं — बिजली, कोयला और इस्पात के बिना कोई कारख़ाना नहीं चलता। इसीलिए इनका सूचकांक हर महीने औद्योगिक उत्पादन सूचकांक से पहले आता है और आने वाले औद्योगिक रुझान का "संकेत" देता है। सबसे अधिक भार रिफ़ाइनरी उत्पादों का है।
📘 आसान परिभाषा: अग्रिम संकेतक (Leading Indicator) |
📚 परिभाषा: वह आर्थिक आँकड़ा जो पूरी अर्थव्यवस्था की दिशा बदलने से पहले ही बदल जाता है और इसलिए भविष्य के रुझान का अनुमान देता है। |
✅ आसान भाषा में: आने वाले मौसम की "पहली हवा", जो बताती है कि आगे क्या होने वाला है। 🏠 उदाहरण: बिजली और सीमेंट की माँग अचानक बढ़े, तो समझिए कुछ महीनों में कारख़ानों और निर्माण में तेज़ी आने वाली है। |
◆ पुराने आधार वर्ष (2011-12) वाले औद्योगिक उत्पादन सूचकांक में आठ कोर उद्योगों का संयुक्त भार लगभग 40.27% था — इसीलिए इन्हें औद्योगिक गतिविधि का "अग्रिम संकेतक" माना जाता है।
📊 औद्योगिक क्षेत्र — नवीनतम आँकड़े 1. औद्योगिक क्षेत्र देश के कुल सकल मूल्य वर्धन में लगभग 28% योगदान देता है और लगभग 24% कार्यबल (लगभग 12 करोड़ लोग) को रोज़गार देता है। 2. वैश्विक विनिर्माण के सकल मूल्य वर्धन में भारत का हिस्सा लगभग 2.8-2.9% है। 3. संयुक्त राष्ट्र औद्योगिक विकास संगठन (UNIDO) के प्रतिस्पर्धी औद्योगिक प्रदर्शन सूचकांक (CIP Index) में भारत 2022 के 40वें स्थान से सुधरकर 2023 में 37वें स्थान पर पहुँचा। 4. भारतीय रिज़र्व बैंक त्रैमासिक व्यावसायिक प्रत्याशा सूचकांक (Business Expectations Index) जारी करता है — 100 से ऊपर का स्कोर विस्तार और 100 से नीचे का स्कोर संकुचन दर्शाता है। 5. वर्ष 2024-25 में उद्योगों को बैंक ऋण की वृद्धि घटकर 8.24% रही (2023-24 में 9.39%), क्योंकि कंपनियाँ वाणिज्यिक पत्र (Commercial Paper) व बॉन्ड जैसे बाज़ार-आधारित साधनों पर अधिक निर्भर हुईं — 2019-20 से 2024-25 के बीच गैर-बैंक वित्तीय प्रवाह लगभग 17.32% की वार्षिक चक्रवृद्धि दर से बढ़ा। |
✅ भारत की विशिष्ट ताक़त | ⚠️ प्रमुख चुनौतियाँ |
◆ विशाल घरेलू माँग — लगभग 140 करोड़ की जनसंख्या ◆ जनसांख्यिकीय लाभांश — लगभग 65% आबादी 35 वर्ष से कम आयु की ◆ कर सुधार — मौजूदा कंपनियों के लिए निगम कर 22%, नई विनिर्माण इकाइयों के लिए 15%; लाभांश वितरण कर समाप्त ◆ अपेक्षाकृत स्थिर क्षेत्र — सेवा क्षेत्र भी अपने विकास के लिए उद्योग पर निर्भर ◆ परखा हुआ रास्ता — 18वीं-19वीं सदी का यूरोप, 20वीं सदी में अमेरिका-जापान और 21वीं सदी में चीन — सबकी समृद्धि उद्योगों से आई ◆ निर्यात की संभावना — वैश्विक वस्तु निर्यात में भारत का हिस्सा अभी केवल लगभग 1.8% (चीन लगभग 14%); 2025 तक 3.5% का लक्ष्य रखा गया था | ◆ अवसंरचना का अभाव — विश्वसनीय बिजली, परिवहन व संचार की कमी ◆ पूँजी की कमी — लघु उद्यम आज भी साहूकारों पर निर्भर; बैंकों में अनर्जक परिसंपत्तियाँ (NPA) ◆ चार बैलेंस-शीट समस्या — बैंक, अवसंरचना कंपनियाँ, गैर-बैंकिंग वित्त कंपनियाँ व रियल एस्टेट कंपनियाँ एक साथ दबाव में ◆ भू-राजनीतिक संघर्ष — अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध, रूस-यूक्रेन युद्ध, "हॉट मनी" का पलायन ◆ नौकरशाही बाधाएँ — अनुपालन का बोझ, लालफ़ीताशाही ◆ "चक्रव्यूह चुनौती" — उद्योग लगाना आसान, पर असफल होने पर बाहर निकलना कठिन और महँगा; नई कंपनी शुरू करने में औसतन लगभग 18 दिन (न्यूज़ीलैंड में आधा दिन) ◆ कमज़ोर वित्तीय सेहत — असंतुलित ऋण-इक्विटी अनुपात, कमज़ोर ब्याज-कवरेज; अपरिपक्व पूँजी बाज़ार |
📘 आसान परिभाषा: जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend) |
📚 परिभाषा: वह अवधि जब किसी देश की कुल जनसंख्या में काम करने योग्य आयु (लगभग 15-64 वर्ष) के लोगों का अनुपात आश्रितों (बच्चे व बुज़ुर्ग) से काफ़ी अधिक होता है, जिससे उत्पादन, बचत और विकास तेज़ करने का अवसर मिलता है। |
✅ आसान भाषा में: घर में कमाने वाले ज़्यादा और खाने वाले कम हों — तो घर तेज़ी से आगे बढ़ सकता है, बशर्ते सबको काम मिले। 🏠 उदाहरण: किसी परिवार के छह सदस्यों में चार युवा नौकरी करें, तो बचत भी होती है और घर भी बनता है; पर अगर चारों बेरोज़गार हों, तो वही "लाभांश" बोझ बन जाता है। |
📘 आसान परिभाषा: अनर्जक परिसंपत्ति (Non-Performing Asset — NPA) |
📚 परिभाषा: बैंक का वह ऋण जिसकी किस्त या ब्याज 90 दिनों से अधिक समय से नहीं चुकाया गया हो। |
✅ आसान भाषा में: वह कर्ज़ जो "डूबने" के कगार पर है — बैंक को उससे कमाई नहीं हो रही। 🏠 उदाहरण: किसी कारख़ाने ने बैंक से ₹10 करोड़ लिए और तीन महीने से किस्त नहीं दी — अब यह ऋण बैंक की "बीमार" संपत्ति है; ऐसे ऋण बढ़ें तो बैंक नए उद्योगों को ऋण देने से डरते हैं। |
🔎 बॉक्स से क्या समझें: बाएँ कॉलम की ताक़तें — बड़ा बाज़ार और युवा आबादी — तभी काम आती हैं जब दाएँ कॉलम की बाधाएँ (अवसंरचना, पूँजी, नियमों का बोझ) दूर हों। "चार बैलेंस-शीट समस्या" का अर्थ है कि बैंक, कंपनियाँ, गैर-बैंक वित्त कंपनियाँ और रियल एस्टेट — चारों एक साथ कर्ज़ के दबाव में हों, तो निवेश का पूरा चक्र रुक जाता है।
🏏 क्रिकेट की भाषा में — अर्थव्यवस्था की टीम अगर अर्थव्यवस्था एक क्रिकेट टीम है तो कृषि "सलामी बल्लेबाज़" है जो आधी आबादी को सँभालती है, सेवा क्षेत्र "आक्रामक मध्यक्रम" है जो सबसे ज़्यादा रन बनाता है, और उद्योग वह "ऑलराउंडर" है जो बल्ले (उत्पादन) और गेंद (रोज़गार व निर्यात) दोनों से मैच जिताता है। बिना मज़बूत ऑलराउंडर के कोई टीम लंबे समय तक विश्व-विजेता नहीं रहती — यही कारण है कि भारत विनिर्माण की हिस्सेदारी बढ़ाने पर ज़ोर दे रहा है। |
🎯 याद रखें — इस खंड के मुख्य बिंदु 1. उद्योग (द्वितीयक क्षेत्र) के चार उप-क्षेत्र — विनिर्माण, निर्माण, खनन, बिजली-गैस-जल। 2. आठ कोर उद्योग — सीमेंट, कोयला, कच्चा तेल, बिजली, उर्वरक, प्राकृतिक गैस, रिफ़ाइनरी उत्पाद, इस्पात; सबसे अधिक भार रिफ़ाइनरी उत्पादों का। 3. उद्योग देश के कुल मूल्य वर्धन में लगभग 28%; विश्व विनिर्माण में भारत का हिस्सा लगभग 2.8-2.9%। |
स्वतंत्रता के समय भारत एक गरीब, गतिहीन और मुख्यतः कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था था — व्यापक निर्धनता, निरक्षरता, कम जीवन-प्रत्याशा और निम्न कृषि उत्पादकता इसकी पहचान थी। औपनिवेशिक शासन ने भारत को कच्चे माल का निर्यातक और तैयार माल का आयातक बना दिया था। इसलिए विकास को गति देने, आत्मनिर्भरता पाने और क्षेत्रीय-सामाजिक असमानता घटाने के लिए आर्थिक नियोजन अपनाया गया। जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में पूँजीवाद और समाजवाद के मेल वाली मिश्रित अर्थव्यवस्था (Mixed Economy) का मॉडल चुना गया — भारी उद्योग सार्वजनिक क्षेत्र में, उपभोक्ता उद्योग मुख्यतः निजी क्षेत्र में।
◆ स्वतंत्रता-पूर्व योजनाएँ: एम. विश्वेश्वरैया की "भारत के लिए नियोजित अर्थव्यवस्था" (1934), राष्ट्रीय योजना समिति (1938, अध्यक्ष — जवाहरलाल नेहरू), उद्योगपतियों की बॉम्बे योजना (1944), श्रीमन नारायण अग्रवाल की गांधीवादी योजना (1944), एम.एन. राय की जन योजना (1945) और जयप्रकाश नारायण की सर्वोदय योजना (1950)।
◆ योजना आयोग: सोवियत संघ की केंद्रीकृत नियोजन प्रणाली से प्रेरित होकर 15 मार्च 1950 को मंत्रिमंडल के प्रस्ताव से गठित; पहली पंचवर्षीय योजना 1951 में शुरू हुई।
योजना | अवधि | मॉडल / मुख्य विषय | औद्योगिक दृष्टि से प्रमुख बिंदु |
पहली | 1951-56 | हैरोड-डोमर मॉडल; कृषि, सिंचाई, बिजली | काफ़ी हद तक सफल; भाखड़ा-नांगल, हीराकुंड, दामोदर घाटी परियोजनाएँ; पहला भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (खड़गपुर, 1951) |
दूसरी | 1956-61 | महालनोबिस मॉडल — तीव्र औद्योगीकरण, भारी व बुनियादी उद्योग | कांग्रेस के अवाडी अधिवेशन (1955) का "समाजवादी ढाँचा"; भिलाई, दुर्गापुर, राउरकेला इस्पात संयंत्र; तेल एवं प्राकृतिक गैस आयोग, भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स, इंडियन ऑयल, राष्ट्रीय कोयला विकास निगम; विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, अमेरिका व सोवियत संघ से सहायता; सीमित सफलता |
तीसरी | 1961-66 | गाडगिल योजना; आत्मनिर्भरता, कृषि-अनाज को प्राथमिकता | रक्षा उत्पादन व कृषि यंत्रों पर ध्यान; हरित क्रांति की अवधारणा; सूखे व युद्धों (1962, 1965) के कारण विफल; भारतीय खाद्य निगम, राष्ट्रीय बीज निगम, भारतीय औद्योगिक विकास बैंक, हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स, हिंदुस्तान ज़िंक, सांभर साल्ट्स |
योजना अवकाश | 1966-69 | तीन वार्षिक योजनाएँ (तीसरी योजना की विफलता के कारण) | हरित क्रांति लागू |
चौथी | 1969-74 | स्थिरता के साथ विकास; आत्मनिर्भरता | गरीबी उन्मूलन पर ध्यान; 14 बड़े बैंकों का राष्ट्रीयकरण (1969); एकाधिकार अधिनियम (1969) व विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम (1973) से निजी पूँजी के संकेंद्रण पर रोक; बांग्लादेश युद्ध, शरणार्थी समस्या व सूखे से विफल |
पाँचवीं | 1974-78 | डी.पी. धर मॉडल; "गरीबी हटाओ" | आंशिक सफल; "गरीबी हटाओ" व आत्मनिर्भरता; कोर क्षेत्र (कोयला, तेल, बिजली) का विस्तार; समेकित बाल विकास सेवाएँ (1975); समय से एक वर्ष पहले समाप्त |
अनवरत योजना | 1978-80 | जनता सरकार (मोरारजी देसाई) की लचीली "रोलिंग प्लान" | कुटीर व लघु उद्योगों पर बल |
छठी | 1980-85 | आधुनिकीकरण, गरीबी में कमी | सफल; पहली बार तकनीकी उन्नयन व आयात नियंत्रण में ढील; एकीकृत ग्रामीण विकास कार्यक्रम, राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार कार्यक्रम, न्यूनतम आवश्यकता कार्यक्रम, ग्रामीण युवाओं का स्वरोज़गार प्रशिक्षण (ट्राइसेम); नाबार्ड (1982) |
सातवीं | 1985-90 | प्रणब मुखर्जी मॉडल; रोज़गार व उत्पादकता | सीमित सफल; "ब्रॉड-बैंडिंग", इलेक्ट्रॉनिक्स व दूरसंचार जैसे "उदीयमान" क्षेत्र; निजी क्षेत्र को प्राथमिकता; जवाहर रोज़गार योजना |
वार्षिक योजनाएँ | 1990-92 | राजनीतिक अस्थिरता व भुगतान संतुलन संकट | आर्थिक सुधारों की शुरुआत |
आठवीं | 1992-97 | जॉन मिलर मॉडल; उदारीकरण | सफल; नई आर्थिक नीति का क्रियान्वयन; मानव विकास पर ध्यान |
नौवीं | 1997-2002 | सामाजिक न्याय व समानता के साथ विकास | एशियाई वित्तीय संकट से प्रभावित; असफल; स्वर्णजयंती ग्राम स्वरोज़गार योजना |
दसवीं | 2002-07 | विकास दर लक्ष्य 8%; गरीबी में कमी | विकास दर लक्ष्य से थोड़ा पीछे; 10 वर्षों में प्रति व्यक्ति आय दोगुनी करने व गरीबी को 15% तक लाने का लक्ष्य; मनरेगा (2005-06) |
ग्यारहवीं | 2007-12 | तीव्र व अधिक समावेशी विकास (लक्ष्य 9%) | वैश्विक सबप्राइम संकट से प्रभावित |
बारहवीं | 2012-17 | तीव्र, अधिक समावेशी व सतत विकास | आंशिक सफल; गरीबी में 10 प्रतिशत-अंक कमी का लक्ष्य; अंतिम पंचवर्षीय योजना |
📘 आसान परिभाषा: मिश्रित अर्थव्यवस्था (Mixed Economy) |
📚 परिभाषा: ऐसी आर्थिक व्यवस्था जिसमें सरकारी (सार्वजनिक) और निजी दोनों क्षेत्र साथ-साथ काम करते हैं — बुनियादी और रणनीतिक क्षेत्र सरकार के पास, बाकी में निजी उद्यम की स्वतंत्रता, पर सरकारी नियमन के साथ। |
✅ आसान भाषा में: न पूरी तरह बाज़ार के भरोसे (पूँजीवाद), न पूरी तरह सरकार के भरोसे (समाजवाद) — दोनों का मेल। 🏠 उदाहरण: इस्पात संयंत्र, रेलवे, बिजलीघर सरकार ने बनाए; साबुन, कपड़ा, साइकिल निजी कंपनियाँ बनाती रहीं। |
🔎 तालिका से क्या समझें: योजनाओं की तालिका को तीन दौर में पढ़ें — (1) पहली-दूसरी योजना: बाँध, इस्पात संयंत्र और भारी उद्योग की नींव; (2) तीसरी से सातवीं: युद्ध, सूखे और संकटों के बीच आत्मनिर्भरता, गरीबी हटाओ और धीरे-धीरे आधुनिकीकरण; (3) आठवीं से बारहवीं: उदारीकरण के बाद बाज़ार-आधारित विकास, फिर समावेशी और सतत विकास। तीसरी योजना की विफलता के बाद तीन वर्ष "योजना अवकाश" रहा।
📖 पीछे की कहानी — बॉम्बे योजना (1944) — जब उद्योगपतियों ने सरकारी योजना माँगी आज़ादी से पहले, जनवरी 1944 में जे.आर.डी. टाटा, जी.डी. बिड़ला, पुरुषोत्तमदास ठाकुरदास समेत आठ बड़े उद्योगपतियों ने "भारत के आर्थिक विकास की योजना" बनाई, जिसे "बॉम्बे योजना" कहा गया। हैरानी की बात यह थी कि निजी उद्योगपति ख़ुद कह रहे थे कि सरकार भारी उद्योग, बिजली और परिवहन में बड़ा निवेश करे, क्योंकि इतनी पूँजी कोई निजी कंपनी नहीं जुटा सकती। 15 वर्षों में राष्ट्रीय आय तीन गुना करने का लक्ष्य रखा गया। आज़ाद भारत की "मिश्रित अर्थव्यवस्था" और भारी उद्योगों में सरकारी भूमिका के विचार पर इस योजना की साफ़ छाप है। |
◆ लक्ष्य से चूकने वाली योजनाएँ: तीसरी, चौथी, नौवीं, दसवीं व ग्यारहवीं योजनाएँ निर्धारित विकास दर हासिल नहीं कर सकीं।
◆ क्षेत्र-विशेष कार्यक्रम: जनजातीय क्षेत्र विकास कार्यक्रम / जनजातीय उप-योजना, पर्वतीय क्षेत्र विकास कार्यक्रम व मरुस्थल विकास कार्यक्रम (पाँचवीं योजना); संशोधित क्षेत्र विकास दृष्टिकोण (छठी योजना); सीमावर्ती क्षेत्र विकास कार्यक्रम (सातवीं योजना, 1986-87); आगे चलकर गृह मंत्रालय का वाइब्रेंट विलेजेज़ कार्यक्रम (2023)।
◆ "हिंदू संवृद्धि दर" (Hindu Rate of Growth): 1950 से 1980 के दशक की शुरुआत तक भारत की लगभग 3.5% वार्षिक विकास दर के लिए अर्थशास्त्री राज कृष्णा द्वारा (1978) गढ़ा गया शब्द — इसका किसी धर्म से कोई संबंध नहीं, यह धीमी स्थिर वृद्धि का व्यंग्यात्मक नाम है।
❝ "ये बाँध आधुनिक भारत के मंदिर हैं।" (These dams are the temples of modern India.) (— जवाहरलाल नेहरू (भाखड़ा-नांगल बाँध के संदर्भ में)) |
संस्थान / परियोजना | वर्ष | स्थान / विशेषता |
भाखड़ा-नांगल बाँध | 1948 (निर्माण आरंभ) | हिमाचल प्रदेश-पंजाब; सतलुज नदी पर |
तुंगभद्रा बाँध | 1953 | होसपेट, बल्लारी (कर्नाटक); कृष्णा की सहायक तुंगभद्रा पर; मुख्य अभियंता — तिरुमल अयंगर |
गांधी सागर बाँध | 7 मार्च 1954 (शिलान्यास — नेहरू) | मंदसौर-नीमच (मध्य प्रदेश); चंबल नदी पर |
राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला | 21 जनवरी 1950 (उद्घाटन — सरदार पटेल) | नई दिल्ली |
राष्ट्रीय रासायनिक प्रयोगशाला / राष्ट्रीय धातुकर्म प्रयोगशाला | 1950 | पुणे / जमशेदपुर |
केंद्रीय चर्म अनुसंधान संस्थान / केंद्रीय खाद्य प्रौद्योगिकी अनुसंधान संस्थान | 1948 / 1950 | चेन्नई / मैसूर |
केंद्रीय औषधि अनुसंधान संस्थान / केंद्रीय काँच एवं सिरेमिक अनुसंधान संस्थान | 17 फ़रवरी 1951 / 1950 | लखनऊ / कोलकाता |
केंद्रीय विद्युत-रसायन अनुसंधान संस्थान | 1953 | कराईकुडी (तमिलनाडु) |
भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड / हिंदुस्तान शिपयार्ड | 1954 / 1941 | बेंगलुरु / विशाखापत्तनम |
नांगल उर्वरक संयंत्र (आगे नेशनल फ़र्टिलाइज़र्स लिमिटेड) | 1960 का दशक | नांगल (पंजाब) — हरित क्रांति के लिए उर्वरक |
🔎 तालिका से क्या समझें: यह तालिका "नए भारत के मंदिरों" की सूची है — बाँध (बिजली और सिंचाई), प्रयोगशालाएँ (विज्ञान) और सार्वजनिक कंपनियाँ (इलेक्ट्रॉनिक्स, जहाज़)। विचार यह था कि पहले बुनियादी ढाँचा और ज्ञान बने, उसी पर बाद में निजी उद्योग खड़ा होगा।
बिंदु | योजना आयोग | नीति आयोग (NITI Aayog) |
स्थापना | 15 मार्च 1950 | 1 जनवरी 2015 |
वैधानिक स्थिति | न संवैधानिक, न सांविधिक | न संवैधानिक, न सांविधिक |
शीर्ष परिषद | राष्ट्रीय विकास परिषद (अब समाप्त) | शासी परिषद — प्रधानमंत्री, सभी राज्यों व विधानसभा वाले केंद्रशासित प्रदेशों के मुख्यमंत्री, अन्य केंद्रशासित प्रदेशों के उप-राज्यपाल |
राज्यों को धन | केंद्र से राज्यों को योजना-अनुदान तय करता था | कोई धन-आवंटन भूमिका नहीं — यह काम वित्त आयोग का |
दृष्टिकोण | ऊपर से नीचे, केंद्रीकृत | "थिंक टैंक", सहकारी व प्रतिस्पर्धी संघवाद |
🔎 तालिका से क्या समझें: सबसे बड़ा अंतर पैसे का है — योजना आयोग राज्यों को योजना-अनुदान बाँटता था, इसलिए राज्य उसके आगे "माँगने वाले" बनते थे; नीति आयोग के पास कोई धन-आवंटन की शक्ति नहीं, वह केवल सलाह देता है और राज्यों को आपस में प्रतिस्पर्धा (रैंकिंग) व सहयोग के लिए प्रेरित करता है।
📘 आसान परिभाषा: सहकारी और प्रतिस्पर्धी संघवाद (Cooperative & Competitive Federalism) |
📚 परिभाषा: सहकारी संघवाद में केंद्र और राज्य साझा लक्ष्यों के लिए मिलकर काम करते हैं; प्रतिस्पर्धी संघवाद में राज्य निवेश, विकास और सुशासन में एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ करते हैं। |
✅ आसान भाषा में: मिलकर खेलना भी, और एक-दूसरे से बेहतर खेलने की होड़ भी। 🏠 उदाहरण: नीति आयोग की बैठक में सब मुख्यमंत्री मिलकर योजना बनाते हैं (सहकार), और "व्यापार सुगमता" की रैंकिंग में राजस्थान, गुजरात से आगे निकलने की कोशिश करता है (प्रतिस्पर्धा)। |
◆ नेतृत्व (2026): अध्यक्ष — प्रधानमंत्री; 24 अप्रैल 2026 को अर्थशास्त्री अशोक कुमार लाहिड़ी उपाध्यक्ष नियुक्त; मुख्य कार्यकारी अधिकारी — अनुराग जैन; प्रधानमंत्री अधिकतम चार केंद्रीय मंत्रियों को पदेन सदस्य मनोनीत करते हैं — अमित शाह, राजनाथ सिंह, निर्मला सीतारमण व शिवराज सिंह चौहान।
◆ नीति आयोग की पहलें: तीन-वर्षीय कार्य एजेंडा, सात-वर्षीय रणनीति व पंद्रह-वर्षीय विज़न दस्तावेज़; आकांक्षी ज़िला कार्यक्रम (जनवरी 2018 — नागरिकों के जीवन-स्तर में सुधार व समावेशी विकास; 28 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों के 112 ज़िले; 5 विषयों — स्वास्थ्य-पोषण, शिक्षा, कृषि-जल संसाधन, वित्तीय समावेशन-कौशल विकास, आधारभूत अवसंरचना — के 49 संकेतक; "3C" रणनीति — अभिसरण, सहयोग, प्रतिस्पर्धा (मासिक "डेल्टा रैंकिंग"); राजस्थान के धौलपुर, जैसलमेर, करौली, बारां, सिरोही); अटल नवाचार मिशन; निर्यात तैयारी सूचकांक; सतत विकास लक्ष्य भारत सूचकांक; बहुआयामी गरीबी सूचकांक; विद्यालयी शिक्षा गुणवत्ता सूचकांक; दर्पण पोर्टल (स्वयंसेवी संगठन); पोषण अभियान; संपूर्णता अभियान; कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर राष्ट्रीय कार्यक्रम; परिणाम-निगरानी ढाँचा; राज्य सहायता मिशन — सहकारी संघवाद, राज्यों की संस्थागत क्षमता व दीर्घकालिक नियोजन हेतु राज्य परिवर्तन संस्थान (जैसे गुजरात का "ग्रिट", महाराष्ट्र का "मित्र")।
✅ उपलब्धियाँ | ❌ आलोचनाएँ |
◆ सकल घरेलू उत्पाद में उद्योग का हिस्सा 1950-51 के 13% से बढ़कर 1990-91 में 24.6% — लगभग दोगुना ◆ संरचनात्मक परिवर्तन — अर्थव्यवस्था कृषि से उद्योग की ओर बढ़ी ◆ औद्योगिक आधार का विविधीकरण — कपड़ा, जूट, चीनी से आगे बढ़कर भारी मशीनरी, रसायन, उर्वरक, पेट्रो-रसायन, दवाएँ, इलेक्ट्रॉनिक्स व वाहन ◆ सार्वजनिक निवेश से ऊर्जा व परिवहन का आधार तैयार — सहायक व लघु उद्योगों को नए अवसर | ◆ लाइसेंस-परमिट-कोटा राज — लालफ़ीताशाही, भ्रष्टाचार, नवाचार पर रोक ◆ सार्वजनिक उपक्रमों की अकुशलता — अधिक कर्मचारी, राजनीतिक हस्तक्षेप; कई "सफ़ेद हाथी" बने ◆ विदेशी प्रतिस्पर्धा के अभाव में ऊँची लागत, घटिया गुणवत्ता — एम्बेसडर-प्रीमियर पद्मिनी जैसे गिने-चुने मॉडल ◆ पूँजी-गहन भारी उद्योगों पर ज़ोर — श्रम-गहन उपभोक्ता उद्योग व रोज़गार उपेक्षित ◆ क्षेत्रीय विषमता — उद्योग कुछ राज्यों व शहरों तक सीमित ◆ आयात प्रतिस्थापन व राजकोषीय घाटे ने अंततः 1991 के संकट को जन्म दिया |
🔎 बॉक्स से क्या समझें: लेखा-जोखा दिखाता है कि 1951-91 में भारत ने औद्योगिक आधार तो बना लिया — उद्योग का हिस्सा लगभग दोगुना हुआ — पर दक्षता नहीं बन पाई। प्रतिस्पर्धा न होने से कंपनियों को सुधार की ज़रूरत ही नहीं लगी; और यही जमा कमज़ोरियाँ 1991 में संकट बनकर फूटीं।
🎯 याद रखें — इस खंड के मुख्य बिंदु 1. योजना आयोग — 15 मार्च 1950; नीति आयोग — 1 जनवरी 2015 (दोनों न संवैधानिक, न सांविधिक)। 2. पहली योजना — हैरोड-डोमर (कृषि); दूसरी — महालनोबिस (भारी उद्योग; भिलाई, दुर्गापुर, राउरकेला)। 3. हिंदू संवृद्धि दर — राज कृष्णा (1978), लगभग 3.5% वृद्धि। 4. बॉम्बे योजना (1944) — उद्योगपतियों की योजना; बारहवीं (2012-17) अंतिम पंचवर्षीय योजना। |
औद्योगिक नीतियों के उद्देश्य रहे हैं — सतत विकास व रोज़गार सृजन, जनसांख्यिकीय लाभांश का उपयोग, घरेलू माँग की पूर्ति, क्षेत्रीय असंतुलन में कमी, निर्यात-उन्मुख विकास और अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धात्मकता। 1948, 1956, 1977, 1980 और 1991 की नीतियाँ भारत की औद्योगिक यात्रा के प्रमुख पड़ाव हैं।
![]() चित्र 3: भारत की औद्योगिक नीतियों की समय-रेखा (1948-2025) |
6 अप्रैल 1948 को उद्योग मंत्री श्यामा प्रसाद मुखर्जी द्वारा प्रस्तुत इस नीति ने मिश्रित अर्थव्यवस्था की नींव रखी और उद्योगों को चार श्रेणियों में बाँटा:
श्रेणी | स्वामित्व | उदाहरण |
1. रणनीतिक उद्योग | केवल केंद्र सरकार का एकाधिकार | अस्त्र-शस्त्र, परमाणु ऊर्जा, रेल परिवहन |
2. बुनियादी / प्रमुख उद्योग | नई इकाइयाँ केवल सरकार लगाएगी; मौजूदा निजी इकाइयाँ 10 वर्ष तक चलती रहेंगी | कोयला, लोहा-इस्पात, विमान निर्माण, जहाज़ निर्माण, खनिज तेल |
3. महत्वपूर्ण उद्योग (नियंत्रित निजी क्षेत्र) | निजी स्वामित्व, पर सरकारी नियंत्रण व विनियमन | सीमेंट, कागज़, नमक, चीनी, भारी रसायन (18 उद्योग) |
4. अन्य उद्योग | निजी व सहकारी क्षेत्र के लिए खुले | शेष सभी उद्योग |
🔎 तालिका से क्या समझें: चार श्रेणियाँ "नियंत्रण की सीढ़ी" हैं — ऊपर की श्रेणी में सरकार का पूरा एकाधिकार, नीचे जाते-जाते निजी क्षेत्र की आज़ादी बढ़ती है। 1948 की नीति ने रास्ता दिखाया, पर लाइसेंस की असली क़ानूनी ताक़त 1951 के अधिनियम से आई।
◆ उद्योग (विकास एवं विनियमन) अधिनियम, 1951 (IDRA): इसी अधिनियम ने औद्योगिक लाइसेंस प्रणाली को विधिक आधार दिया — उद्देश्य था नया उद्योग लगाने, उत्पादन बढ़ाने या उत्पाद बदलने पर नियंत्रण रखकर क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखना और उत्पादन को राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के अनुरूप नियंत्रित करना; यहीं से "लाइसेंस राज" शुरू हुआ।
30 अप्रैल 1956 को घोषित यह नीति संसद द्वारा दिसंबर 1954 में स्वीकृत "समाजवादी ढाँचे वाले समाज" (Socialistic Pattern of Society) के लक्ष्य और दूसरी योजना के महालनोबिस मॉडल पर आधारित थी। इसने सार्वजनिक क्षेत्र को अर्थव्यवस्था की "शीर्ष ऊँचाइयों" (Commanding Heights) पर बिठाया। इसे "आर्थिक संविधान" और आलोचक "राज्य पूँजीवाद की बाइबिल" भी कहते हैं।
अनुसूची | स्वरूप | उदाहरण |
अनुसूची-क (17 उद्योग) | पूर्णतः राज्य का अनन्य दायित्व व स्वामित्व | परमाणु ऊर्जा, रेलवे, रक्षा उपकरण, लौह-इस्पात, भारी मशीनरी, कोयला, खनिज तेल, विमान व हवाई परिवहन |
अनुसूची-ख (12 उद्योग) | राज्य उत्तरोत्तर नई इकाइयाँ लगाएगा; निजी क्षेत्र पूरक भूमिका में | उर्वरक, एल्युमीनियम, अन्य खनिज, मशीन टूल्स, दवाएँ |
अनुसूची-ग (शेष सभी) | निजी क्षेत्र के लिए खुले, पर 1951 के अधिनियम के तहत लाइसेंस से नियंत्रित; राज्य भी उत्पादन कर सकता था | उपभोक्ता वस्तुएँ, कपड़ा, चीनी |
📘 आसान परिभाषा: शीर्ष ऊँचाइयाँ (Commanding Heights) |
📚 परिभाषा: अर्थव्यवस्था के वे बुनियादी और रणनीतिक क्षेत्र — जैसे इस्पात, बिजली, खनिज, परिवहन, बैंकिंग — जिन पर नियंत्रण होने से पूरी अर्थव्यवस्था की दिशा तय की जा सकती है। |
✅ आसान भाषा में: अर्थव्यवस्था की "ऊँची चोटियाँ" — जो इन पर बैठा है, वही पूरे मैदान को देख और चला सकता है। 🏠 उदाहरण: जिसके हाथ में बिजली और इस्पात है, वह तय करता है कि कौन-सा कारख़ाना कितना बढ़ेगा — 1956 की नीति ने ये चोटियाँ सरकार को सौंपीं। |
🔎 तालिका से क्या समझें: तीन अनुसूचियों को ऐसे याद रखें — क = केवल सरकार, ख = सरकार आगे, निजी साथ, ग = निजी, पर लाइसेंस के साथ। 1991 में अनुसूची-क की 17 वस्तुएँ घटकर 8 हुईं और आज केवल 2 (परमाणु ऊर्जा और रेलवे परिचालन) बची हैं — यह "सरकार से बाज़ार" की यात्रा का सबसे साफ़ पैमाना है।
◆ "आर्थिक संविधान" क्यों? (1) समाजवादी समाज के लक्ष्य को मूर्त रूप दिया; (2) सार्वजनिक क्षेत्र की सर्वोच्चता स्थापित की; (3) 1956 से 1991 तक लगभग साढ़े तीन दशक औद्योगिक नीति का मार्गदर्शन किया; (4) संतुलित क्षेत्रीय विकास, लघु-कुटीर उद्योगों का संरक्षण, विदेशी पूँजी का विनियमन व श्रमिक कल्याण जैसे व्यापक लक्ष्य समाहित किए।
◆ निजी उद्योगों में स्वामित्व और प्रबंधन को अलग रखने और निजी एकाधिकार को रोकने पर बल दिया गया; कुटीर व लघु उद्योगों पर विशेष ध्यान।
योजना आयोग ने 1955 में डी.जी. कार्वे की अध्यक्षता में "ग्राम एवं लघु उद्योग समिति" गठित की। इसकी प्रमुख सिफ़ारिशें थीं — (1) ग्रामीण क्षेत्रों में श्रम-गहन कुटीर व लघु उद्योगों से रोज़गार; (2) औद्योगीकरण का गाँवों व पिछड़े क्षेत्रों तक विकेंद्रीकरण; (3) कुछ वस्तुओं का उत्पादन केवल लघु उद्योगों के लिए आरक्षित करना; (4) सस्ता ऋण, कच्चा माल, विपणन सुविधा, कर लाभ। इन सिफ़ारिशों को दूसरी योजना और 1956 की नीति में आधार बनाया गया — यहीं से आज के लघु उद्यम क्षेत्र की नींव पड़ी।
नीति | सरकार | मुख्य बिंदु |
औद्योगिक नीति वक्तव्य, 1977 | जनता पार्टी (उद्योग मंत्री — जॉर्ज फ़र्नांडीस) | कुटीर व लघु उद्योगों पर सर्वाधिक बल; ज़िला उद्योग केंद्र (1978); लघु क्षेत्र के लिए आरक्षित वस्तुओं की संख्या 180 से बढ़ाकर 500 से अधिक; श्रमिकों को "शॉप फ़्लोर" से निदेशक मंडल तक निर्णय में भागीदारी |
औद्योगिक नीति वक्तव्य, 1980 | इंदिरा गांधी | क्रमिक उदारीकरण; उत्पादकता व प्रतिस्पर्धा बढ़ाना; क्षमता का अधिकतम उपयोग; पिछड़े क्षेत्रों का विकास; सार्वजनिक क्षेत्र का प्रबंधन सुधारना |
🔎 तालिका से क्या समझें: 1977 की नीति "छोटा सुंदर है" के विचार पर चली — ज़िला उद्योग केंद्र और लघु क्षेत्र के लिए 500 से अधिक वस्तुओं का आरक्षण। 1980 की नीति ने पहली बार उत्पादकता और प्रतिस्पर्धा की भाषा बोली — यहीं से धीमा उदारीकरण शुरू हुआ, जो 1991 में पूरी तरह खुला।
📘 आसान परिभाषा: लाइसेंस-परमिट राज (License-Permit Raj) |
📚 परिभाषा: स्वतंत्रता से 1991 तक चली वह व्यवस्था जिसमें नया उद्योग लगाने, क्षमता बढ़ाने, उत्पादन की मात्रा तय करने या नया उत्पाद बनाने के लिए सरकार से पूर्व-अनुमति (लाइसेंस) अनिवार्य थी; कच्चे माल, विदेशी मुद्रा व आयात के लिए अलग-अलग परमिट और कोटा तय थे। इसका विधिक आधार 1951 का उद्योग (विकास एवं विनियमन) अधिनियम था। |
✅ आसान भाषा में: सरकार हर बड़े व्यावसायिक फ़ैसले पर पहले "हाँ" कहती थी, तभी काम शुरू हो सकता था। 🏠 उदाहरण: जैसे घर में हर चीज़ के लिए पिताजी से अनुमति लेनी पड़े — दूध ज़्यादा लाना हो, नया बर्तन ख़रीदना हो या दुकान बदलनी हो — तो घर का काम धीमा पड़ जाता है। 1980 के दशक में एक सॉफ़्टवेयर कंपनी के संस्थापक को कंप्यूटर आयात की अनुमति में तीन वर्ष और टेलीफ़ोन कनेक्शन में एक वर्ष से अधिक लगा था। |
◆ अन्य विशेषताएँ: कच्चे माल, विदेशी मुद्रा व आयात के लिए अलग परमिट-कोटा; अनेक आवश्यक वस्तुओं के मूल्य एवं वितरण पर प्रत्यक्ष सरकारी नियंत्रण। दुष्परिणाम: लालफ़ीताशाही व भ्रष्टाचार; प्रतिस्पर्धा का अभाव; निम्न गुणवत्ता; नवाचार अवरुद्ध; औद्योगीकरण धीमा — इसे "हिंदू संवृद्धि दर" से जोड़ा गया।
💡 आज की भाषा में — लाइसेंस राज को समझें 1970 के दशक में अगर कोई उद्योगपति साबुन की फ़ैक्ट्री का उत्पादन दोगुना करना चाहता, तो भी उसे अलग लाइसेंस लेना पड़ता था। आज एक युवा उद्यमी मोबाइल ऐप से उद्यम पंजीकरण कुछ ही मिनटों में निःशुल्क कर लेता है — यही अंतर है "अनुमति-आधारित" और "सुविधा-आधारित" अर्थव्यवस्था का। |
पहलू | विवरण |
पृष्ठभूमि | महालनोबिस समिति (आय वितरण, 1960), एकाधिकार जाँच आयोग (के.सी. दासगुप्ता, 1964), दत्त समिति (औद्योगिक लाइसेंस जाँच, 1967) व हज़ारी रिपोर्ट की सिफ़ारिशों पर पारित; 1 जून 1970 से लागू |
उद्देश्य | कुछ हाथों में आर्थिक शक्ति के संकेंद्रण को रोकना; एकाधिकार पर नियंत्रण; अनुचित व प्रतिबंधात्मक व्यापार व्यवहारों पर रोक |
प्रावधान | एक सीमा से अधिक परिसंपत्ति वाली कंपनियाँ "एकाधिकार कंपनियाँ" — सीमा आरंभ में ₹20 करोड़, 1985 में बढ़ाकर ₹100 करोड़; इनके विलय, अधिग्रहण या विस्तार के लिए विशेष अनुमति अनिवार्य |
सीमा | बड़े उद्यमों का विस्तार व पैमाने की मितव्ययिता बाधित — भारतीय कंपनियाँ वैश्विक स्तर पर अप्रतिस्पर्धी |
1991 के बाद | परिसंपत्ति-सीमा हटाई गई; विस्तार के लिए पूर्व-अनुमति समाप्त |
प्रतिस्थापन | प्रतिस्पर्धा अधिनियम, 2002 (राघवन समिति, 2000 की सिफ़ारिश); भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) 14 अक्टूबर 2003 को गठित; एकाधिकार अधिनियम 1 सितंबर 2009 से औपचारिक रूप से निरस्त |
⚠️ ध्यान दें प्रतिस्पर्धा अधिनियम 2002 में पारित हुआ, पर पुराना एकाधिकार अधिनियम तुरंत समाप्त नहीं हुआ — इसे 1 सितंबर 2009 से निरस्त किया गया और लंबित मामले प्रतिस्पर्धा अपीलीय न्यायाधिकरण को सौंपे गए। पुराने अधिनियम का दर्शन "बड़े होने पर रोक" था, जबकि नए अधिनियम का दर्शन "प्रतिस्पर्धा-विरोधी आचरण पर रोक" है — आकार अपने आप में अपराध नहीं। |
🔎 तालिका से क्या समझें: एकाधिकार अधिनियम का डर था कि कुछ औद्योगिक घराने पूरी अर्थव्यवस्था पर क़ब्ज़ा न कर लें; पर इसका नतीजा यह हुआ कि भारतीय कंपनियाँ बड़ी ही नहीं हो पाईं और दुनिया की कंपनियों से मुक़ाबला न कर सकीं। 2002 के प्रतिस्पर्धा अधिनियम ने सोच बदली — अब "बड़ा होना" अपराध नहीं, "ग़लत तरीक़े से प्रतिस्पर्धा रोकना" अपराध है।
स्वतंत्रता के बाद भारत ने अंतर्मुखी व्यापार रणनीति अपनाई — जिन वस्तुओं का आयात होता था, उन्हें देश में ही बनाना। इसे "शिशु उद्योग तर्क" (Infant Industry Argument) से उचित ठहराया गया।
आयाम | विवरण |
उद्देश्य | आत्मनिर्भरता; नवजात घरेलू उद्योगों का संरक्षण; दुर्लभ विदेशी मुद्रा की बचत व भुगतान संतुलन; भारी उद्योगों का विकास |
उपाय — प्रशुल्क (Tariff) | आयातित वस्तुओं पर भारी सीमा शुल्क — विदेशी सामान महँगा, घरेलू माल की माँग बढ़ी |
उपाय — कोटा (Quota) | आयात की अधिकतम मात्रा तय — उससे अधिक आयात की अनुमति नहीं |
दुष्परिणाम | प्रतिस्पर्धा का अभाव, निम्न उत्पादकता, ऊँची लागत, घटिया गुणवत्ता; निर्यात कमज़ोर |
1980 के दशक के मध्य का बदलाव | कारण — विदेशी मुद्रा की कमी व भुगतान संतुलन का बढ़ता दबाव; उपाय — लाइसेंस प्रक्रियाओं का सरलीकरण, आयात प्रतिबंधों में ढील, पूँजीगत वस्तुओं व उन्नत तकनीक का आयात आसान; "आयात घटाओ" से आगे बढ़कर "निर्यात बढ़ाकर विदेशी मुद्रा कमाओ" — निर्यात-प्रोत्साहन पर बल |
💡 क्या आप जानते हैं? ज़िला उद्योग केंद्र 1978 में शुरू हुए — हर ज़िले में छोटे उद्यमियों को एक ही जगह मार्गदर्शन, ऋण और मंज़ूरी दिलाने के लिए। |
📘 आसान परिभाषा: शिशु उद्योग तर्क (Infant Industry Argument) |
📚 परिभाषा: वह आर्थिक तर्क कि किसी देश के नए, कमज़ोर उद्योगों को शुरुआती वर्षों में आयात शुल्क या कोटा जैसे संरक्षण की ज़रूरत होती है, ताकि वे अनुभव और पैमाना हासिल कर विदेशी प्रतिस्पर्धा के लायक बन सकें। |
✅ आसान भाषा में: नए पौधे को शुरू में बाड़ लगाकर बचाओ, ताकि बड़ा होकर तूफ़ान झेल सके। 🏠 उदाहरण: नई क्रिकेट अकादमी के बच्चों को सीधे विश्व-कप टीम के सामने नहीं उतारते; पहले घरेलू मैचों में तैयार करते हैं — पर अगर बाड़ कभी न हटे, तो पौधा कभी मज़बूत नहीं होता। |
🔎 तालिका से क्या समझें: आयात प्रतिस्थापन की सबसे बड़ी समस्या यह थी कि "शिशु" कभी बड़ा नहीं हुआ — संरक्षण दशकों तक चलता रहा। इसलिए 1980 के दशक के मध्य से "आयात घटाओ" की जगह "निर्यात बढ़ाओ" की सोच आई।
🎯 याद रखें — इस खंड के मुख्य बिंदु 1. पहली औद्योगिक नीति — 6 अप्रैल 1948 (श्यामा प्रसाद मुखर्जी), 4 श्रेणियाँ। 2. उद्योग (विकास एवं विनियमन) अधिनियम, 1951 — लाइसेंस राज का विधिक आधार। 3. 1956 की नीति — "आर्थिक संविधान"; अनुसूची क (17), ख (12), ग (शेष)। 4. एकाधिकार अधिनियम 1969 → प्रतिस्पर्धा अधिनियम 2002; 1977 की नीति — ज़िला उद्योग केंद्र (जॉर्ज फ़र्नांडीस)। |
वर्ष 1991 में भारत स्वतंत्रता के बाद के सबसे गंभीर भुगतान संतुलन संकट में था। यह संकट अचानक नहीं आया — यह 1980 के दशक के बढ़ते सरकारी ख़र्च, उधार पर आधारित विकास और बंद अर्थव्यवस्था की संरचनात्मक कमज़ोरियों का परिणाम था। जब किसी अर्थव्यवस्था में ऊँचा राजकोषीय घाटा और ऊँचा चालू खाता घाटा एक साथ हों, तो इसे "जुड़वाँ घाटा" (Twin Deficit) कहते हैं — 1991 का भारत इसका उदाहरण था।
![]() चित्र 4: 1991 का आर्थिक संकट — कारण, संकट और परिणाम |
कारण | विवरण |
1. राजकोषीय घाटा | 1980 के दशक में सब्सिडी, रक्षा व ब्याज भुगतान जैसे गैर-विकासात्मक व्यय में भारी वृद्धि; 1990-91 में केंद्र का सकल राजकोषीय घाटा जीडीपी का लगभग 8.4% |
2. चालू खाता घाटा | बढ़ते आयात, सुस्त निर्यात — चालू खाता घाटा जीडीपी का लगभग 3% |
3. विदेशी मुद्रा भंडार | जून 1991 तक घटकर लगभग 1.1-1.2 अरब डॉलर — केवल लगभग 2-3 सप्ताह के अनिवार्य आयात (पेट्रोलियम, उर्वरक, खाद्य तेल) लायक |
4. बाह्य ऋण | बाह्य ऋण-जीडीपी अनुपात 1990-91 में लगभग 28.7% (आज लगभग 19-20%); अल्पकालिक ऋण का बोझ |
5. खाड़ी युद्ध (1990-91) | इराक-कुवैत युद्ध से कच्चा तेल महँगा; खाड़ी देशों से भारतीय कामगारों के धन-प्रेषण में गिरावट; प्रवासी भारतीयों ने अपनी जमा राशियाँ निकालीं |
6. मुद्रास्फीति | घाटे के मुद्रीकरण व आपूर्ति की कमी से लगभग 13-14% (दोहरे अंक) |
7. राजनीतिक अस्थिरता | लगभग डेढ़ वर्ष में तीन प्रधानमंत्री — वी.पी. सिंह, चंद्रशेखर, पी.वी. नरसिम्हा राव; साख-निर्धारण एजेंसियों ने भारत की रेटिंग घटाई, वाणिज्यिक उधार बंद |
8. सार्वजनिक उपक्रमों का घाटा | अधिक कर्मचारी, पुरानी तकनीक, राजनीतिक हस्तक्षेप; हिंदुस्तान मशीन टूल्स (HMT) जैसे उपक्रम घाटे में |
9क. बंद अर्थव्यवस्था | चालू व पूँजी खाते पर सीमित परिवर्तनीयता; प्रत्यक्ष व पोर्टफ़ोलियो विदेशी निवेश पर प्रतिबंध; "लाइसेंस-कोटा-इंस्पेक्टर राज" — प्रतिस्पर्धा कम, नवाचार कम, निर्यात कमज़ोर, भंडार घटा |
9. ऊँचे कर व शुल्क | 1970 के दशक में आयकर की शीर्ष सीमांत दर 97.75% तक; ऊँचे आयात शुल्क — कर चोरी को बढ़ावा |
10. वैश्विक परिवेश | सोवियत संघ का पतन (1991) — मुक्त बाज़ार की ओर वैश्विक झुकाव; पड़ोसी चीन ने 1978 में देंग शियाओपिंग के नेतृत्व में बाज़ार सुधार अपनाए |
📘 आसान परिभाषा: भुगतान संतुलन (Balance of Payments) |
📚 परिभाषा: किसी देश और शेष विश्व के बीच एक वर्ष में हुए सभी आर्थिक लेन-देन — वस्तुओं-सेवाओं का व्यापार, आय, धन-प्रेषण, निवेश और ऋण — का व्यवस्थित लेखा; इसके दो मुख्य भाग हैं — चालू खाता और पूँजी खाता। |
✅ आसान भाषा में: देश की "विदेशी कमाई और विदेशी ख़र्च" की बही। 🏠 उदाहरण: जैसे घर की बही में एक तरफ़ आमदनी (वेतन, किराया) और दूसरी तरफ़ ख़र्च (राशन, फ़ीस, किस्तें) लिखी जाती हैं — देश की बही में निर्यात-आयात, विदेशी निवेश और कर्ज़ लिखे जाते हैं। |
📘 आसान परिभाषा: चालू खाता घाटा (Current Account Deficit) |
📚 परिभाषा: जब किसी देश के वस्तु व सेवा आयात तथा विदेशों को किए गए आय-भुगतान, उसके निर्यात और विदेशों से प्राप्त आय (धन-प्रेषण सहित) से अधिक हो जाते हैं। |
✅ आसान भाषा में: विदेश से जितना कमाया, उससे ज़्यादा विदेश को चुकाया। 🏠 उदाहरण: 1990-91 में तेल महँगा हुआ और खाड़ी से भारतीयों की कमाई आनी घटी — आयात का बिल बढ़ा, कमाई घटी, घाटा जीडीपी का लगभग 3% हो गया। |
🔎 तालिका से क्या समझें: दस कारणों को तीन समूहों में देखें — अंदर की कमज़ोरी (राजकोषीय घाटा, घाटे वाले सरकारी उपक्रम, ऊँचे कर, बंद अर्थव्यवस्था), बाहर का झटका (खाड़ी युद्ध, सोवियत संघ का पतन) और भरोसे का संकट (राजनीतिक अस्थिरता, साख-रेटिंग में गिरावट)। जब तीनों एक साथ आए, तो भंडार कुछ ही हफ़्तों के आयात लायक बचा।
कब | क्या हुआ | परिणाम |
मई 1991 | भारतीय स्टेट बैंक ने लगभग 20 टन सोना (पुनर्खरीद की शर्त पर) यूनियन बैंक ऑफ़ स्विट्ज़रलैंड के माध्यम से गिरवी रखा | लगभग 20 करोड़ डॉलर |
जुलाई 1991 | भारतीय रिज़र्व बैंक ने लगभग 47 टन सोना बैंक ऑफ़ इंग्लैंड व बैंक ऑफ़ जापान के पास गिरवी रखा (सोना विमान से लंदन भेजा गया) | लगभग 40 करोड़ डॉलर |
कुल | लगभग 67 टन सोना | लगभग 60 करोड़ डॉलर का आपातकालीन ऋण — संप्रभु चूक टली |
📘 आसान परिभाषा: संप्रभु चूक (Sovereign Default) |
📚 परिभाषा: जब कोई देश की सरकार अपने विदेशी या घरेलू ऋण की किस्त या ब्याज समय पर चुकाने में विफल हो जाती है। |
✅ आसान भाषा में: पूरे देश का "कर्ज़ न चुका पाना" — इसके बाद कोई उसे उधार नहीं देता। 🏠 उदाहरण: 2022 में श्रीलंका विदेशी कर्ज़ नहीं चुका सका; ईंधन, दवाइयों और खाने तक की कमी हो गई। 1991 में भारत सोना गिरवी रखकर इसी स्थिति से बचा। |
◆ अंतर्राष्ट्रीय सहायता: भारत ने अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष व विश्व बैंक से कुल लगभग 7 अरब डॉलर की सहायता माँगी, जिसमें अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष का लगभग 2.2 अरब डॉलर का ऋण प्रमुख था। मुद्रा कोष की लगभग 25 शर्तों में अर्थव्यवस्था का उदारीकरण, राजकोषीय अनुशासन व संरचनात्मक सुधार शामिल थे।
💡 आज की भाषा में — घर के गहने गिरवी सोचिए, घर में इतना ही पैसा बचा हो कि सिर्फ़ दो हफ़्ते का राशन आ सके और कोई उधार देने को तैयार न हो — तब परिवार अपने गहने गिरवी रखकर पैसे जुटाता है। 1991 में पूरे देश की यही हालत थी। आज वही भारत लगभग 700 अरब डॉलर से अधिक विदेशी मुद्रा भंडार वाला देश है — यह अंतर सुधारों की कहानी कहता है। |
⚡ स्थिरीकरण उपाय (अल्पकालिक) | 🏗️ संरचनात्मक सुधार (दीर्घकालिक) |
◆ भुगतान संतुलन संकट पर तत्काल नियंत्रण ◆ मुद्रास्फीति पर लगाम ◆ राजकोषीय घाटे में कटौती ◆ रुपये का अवमूल्यन — 1 व 3 जुलाई 1991 को दो चरणों में लगभग 18-19% | ◆ आर्थिक दक्षता व उत्पादकता में सुधार ◆ वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाना ◆ औद्योगिक लाइसेंस व्यवस्था का उन्मूलन ◆ व्यापार, वित्त, कर व सार्वजनिक क्षेत्र के सुधार |
📘 आसान परिभाषा: अवमूल्यन (Devaluation) |
📚 परिभाषा: स्थिर या प्रबंधित विनिमय दर वाली व्यवस्था में सरकार या केंद्रीय बैंक द्वारा अपनी मुद्रा का मूल्य विदेशी मुद्राओं के मुक़ाबले जानबूझकर घटाना। |
✅ आसान भाषा में: रुपये को "सस्ता" करना, ताकि भारत का सामान विदेशियों को सस्ता लगे और विदेशी सामान भारतीयों को महँगा। 🏠 उदाहरण: जुलाई 1991 में दो चरणों में रुपया लगभग 18-19% घटाया गया — पहले $1 के लिए लगभग ₹21 देने पड़ते थे, अब लगभग ₹26 — भारतीय कपड़ा विदेश में सस्ता हुआ और निर्यात बढ़ा। |
🔎 बॉक्स से क्या समझें: स्थिरीकरण उपाय "आग बुझाने" जैसे थे — तुरंत भंडार बचाना, महँगाई रोकना, घाटा घटाना। संरचनात्मक सुधार "घर की वायरिंग बदलने" जैसे थे — ताकि आग दोबारा न लगे। 1991 का बजट दोनों को एक साथ लेकर आया।
प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव के नेतृत्व और वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की अगुआई में 24 जुलाई 1991 को नई औद्योगिक नीति संसद में रखी गई और उसी दिन ऐतिहासिक बजट पेश हुआ। इसके तीन स्तंभ थे — उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण (Liberalisation, Privatisation, Globalisation), जिन्हें संक्षेप में "एलपीजी सुधार" कहा जाता है।
❝ "पृथ्वी की कोई भी शक्ति उस विचार को नहीं रोक सकती, जिसका समय आ गया हो।" (No power on earth can stop an idea whose time has come.) (— डॉ. मनमोहन सिंह, बजट भाषण, 24 जुलाई 1991 (विक्टर ह्यूगो को उद्धृत करते हुए)) |
🎯 याद रखें — इस खंड के मुख्य बिंदु 1. 1991 — जुड़वाँ घाटा; विदेशी मुद्रा भंडार केवल लगभग 2-3 सप्ताह के आयात लायक। 2. लगभग 67 टन सोना गिरवी (भारतीय स्टेट बैंक ~20 टन, रिज़र्व बैंक ~47 टन)। 3. कारण — राजकोषीय घाटा (~8.4%), खाड़ी युद्ध, राजनीतिक अस्थिरता, बंद अर्थव्यवस्था। 4. रुपये का अवमूल्यन — 1 और 3 जुलाई 1991। |
![]() चित्र 5: नई आर्थिक नीति 1991 के तीन स्तंभ — उदारीकरण, निजीकरण, वैश्वीकरण |
💡 क्या आप जानते हैं? राष्ट्रीय शेयर बाज़ार (एनएसई) ने 1994 में भारत में पूरी तरह इलेक्ट्रॉनिक (स्क्रीन-आधारित) शेयर-व्यापार शुरू किया। |
📘 आसान परिभाषा: उदारीकरण (Liberalisation) |
📚 परिभाषा: आर्थिक गतिविधियों पर लगे अनावश्यक सरकारी नियंत्रण, लाइसेंस, कोटा व प्रतिबंधात्मक नियमों को हटाना या शिथिल करना, ताकि बाज़ार की शक्तियाँ (माँग और आपूर्ति) स्वतंत्र रूप से काम करें और प्रतिस्पर्धा बढ़े। इसमें राज्य "नियंत्रक" (Controller) से "सुविधा-प्रदाता" (Facilitator) व "नियामक" (Regulator) बन जाता है। |
✅ आसान भाषा में: सरकार का "हर काम में दख़ल" छोड़कर बाज़ार को ख़ुद फ़ैसले लेने देना। 🏠 उदाहरण: जैसे बच्चा बड़ा होने पर माता-पिता उसे अपने फ़ैसले ख़ुद लेने देते हैं और केवल ज़रूरत पड़ने पर मार्गदर्शन करते हैं। |
प्रावधान | 1991 में क्या हुआ | आज की स्थिति |
औद्योगिक लाइसेंस का उन्मूलन | सुरक्षा, सामरिक, सामाजिक व पर्यावरणीय कारणों वाले 18 उद्योगों को छोड़कर शेष सभी से अनिवार्य लाइसेंस हटाया गया | अब केवल 5 उद्योगों में लाइसेंस अनिवार्य (नीचे सूची) |
सार्वजनिक क्षेत्र का अनारक्षण | 1956 के 17 आरक्षित उद्योग घटाकर 8 किए गए | अब केवल 2 — परमाणु ऊर्जा व रेलवे परिचालन |
एकाधिकार अधिनियम में संशोधन | परिसंपत्ति-सीमा हटाई; विस्तार, विलय व अधिग्रहण के लिए पूर्व-अनुमति समाप्त | प्रतिस्पर्धा अधिनियम, 2002 व भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग |
विदेशी निवेश | 34 उच्च-प्राथमिकता उद्योगों में 51% तक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को स्वचालित अनुमति; विदेशी निवेश संवर्धन बोर्ड का गठन | अधिकांश क्षेत्रों में स्वचालित मार्ग से 100% तक; संवर्धन बोर्ड 2017 में समाप्त |
विदेशी तकनीक समझौते | उच्च-प्राथमिकता उद्योगों में स्वचालित अनुमति | उदार व्यवस्था |
चरणबद्ध विनिर्माण कार्यक्रम | घरेलू पुर्ज़े अनिवार्य करने वाला कार्यक्रम समाप्त | — |
🔎 तालिका से क्या समझें: 1991 की नीति ने चार दीवारें गिराईं — लाइसेंस, सरकारी आरक्षण, एकाधिकार अधिनियम की सीमा और विदेशी निवेश पर रोक। तालिका का दायाँ कॉलम दिखाता है कि ये बदलाव आज कितने आगे बढ़ चुके हैं — लाइसेंस वाले उद्योग 18 से घटकर 5 और सरकारी आरक्षण 17 से घटकर 2।
📘 आसान परिभाषा: स्वचालित मार्ग बनाम सरकारी मार्ग (Automatic vs Government Route) |
📚 परिभाषा: स्वचालित मार्ग में विदेशी निवेशक को भारत सरकार से पूर्व-अनुमति नहीं लेनी पड़ती, केवल निवेश के बाद रिज़र्व बैंक को सूचना देनी होती है; सरकारी मार्ग में संबंधित मंत्रालय की पूर्व-स्वीकृति अनिवार्य है। |
✅ आसान भाषा में: एक रास्ते में "सीधे प्रवेश", दूसरे में "पहले अनुमति-पत्र"। 🏠 उदाहरण: कोई विदेशी कंपनी भारत में जूते की फ़ैक्ट्री लगाए तो सीधे निवेश कर सकती है; पर रक्षा या प्रसारण जैसे संवेदनशील क्षेत्र में तय सीमा से ऊपर निवेश के लिए सरकार की मंज़ूरी चाहिए। |
वर्तमान में अनिवार्य औद्योगिक लाइसेंस वाले 5 उद्योग | कारण |
1. इलेक्ट्रॉनिक एयरोस्पेस व रक्षा उपकरण | राष्ट्रीय सुरक्षा |
2. निर्दिष्ट ख़तरनाक रसायन | सार्वजनिक सुरक्षा व पर्यावरण |
3. औद्योगिक विस्फोटक (डेटोनेटिंग फ़्यूज़, सेफ़्टी फ़्यूज़, बारूद, नाइट्रोसेल्यूलोज़, दियासलाई सहित) | सुरक्षा |
4. तंबाकू से बने सिगार, सिगरेट व अन्य विनिर्मित तंबाकू उत्पाद | जन-स्वास्थ्य |
5. मादक पेय पदार्थों का आसवन व किण्वन | जन-स्वास्थ्य व सामाजिक कारण |
🔎 तालिका से क्या समझें: बचे हुए पाँच लाइसेंस वाले उद्योगों में एक साझा बात है — या तो सुरक्षा (रक्षा, विस्फोटक, ख़तरनाक रसायन) या जन-स्वास्थ्य (तंबाकू, शराब)। यानी आज लाइसेंस "आर्थिक नियंत्रण" के लिए नहीं, "जोखिम नियंत्रण" के लिए है।
सुधार क्षेत्र | 1991 से पहले | 1991 के बाद |
औद्योगिक विनियमन | भारी विनियमन, सीमित निजी भागीदारी | अधिकांश लाइसेंस समाप्त; बाज़ार-आधारित मूल्य निर्धारण |
वित्तीय क्षेत्र | रिज़र्व बैंक मुख्यतः कठोर नियंत्रक; ऊँचे वैधानिक अनुपात (वैधानिक तरलता अनुपात 38.5%, नकद आरक्षित अनुपात 15%) | नरसिम्हम समिति (1991) — अनुपातों में कटौती, ब्याज दरों का विनियमन-मुक्त होना, निजी व विदेशी बैंकों का प्रवेश (1993); रिज़र्व बैंक "सुविधा-प्रदाता" की भूमिका में; भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड को वैधानिक दर्जा (1992); विदेशी निवेश सीमाएँ बढ़ीं, विदेशी संस्थागत निवेशकों को अनुमति |
प्रत्यक्ष कर | ऊँची दरें (आयकर की शीर्ष दर 1970 के दशक में 97.75%), कर चोरी | राजा चेलैया समिति (1991) — दरें घटाईं, आधार बढ़ाया; 2019 में निगम कर 22% (नई विनिर्माण इकाइयों के लिए 15%) |
अप्रत्यक्ष कर | जटिल बहु-स्तरीय कर | केंद्रीय मूल्यवर्धित कर (MODVAT/CENVAT), राज्यों में मूल्यवर्धित कर (2005) और अंततः वस्तु एवं सेवा कर — 1 जुलाई 2017 |
विदेशी मुद्रा | स्थिर विनिमय दर, कड़े प्रतिबंध; विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम (FERA, 1973) | रुपये का अवमूल्यन (जुलाई 1991); उदारीकृत विनिमय दर प्रबंधन प्रणाली (मार्च 1992 — दोहरी दर); बाज़ार-निर्धारित एकीकृत दर (मार्च 1993); चालू खाते पर पूर्ण परिवर्तनीयता (अगस्त 1994); विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (FEMA, 1999) |
व्यापार | ऊँचे आयात शुल्क, आयात लाइसेंस, मात्रात्मक प्रतिबंध | आयात शुल्क में भारी कटौती; आयात लाइसेंस व निर्यात शुल्क समाप्त; सभी मात्रात्मक प्रतिबंध 1 अप्रैल 2001 तक हटे |
📘 आसान परिभाषा: वैधानिक तरलता अनुपात और नकद आरक्षित अनुपात (SLR & CRR) |
📚 परिभाषा: नकद आरक्षित अनुपात — बैंक की कुल जमा का वह हिस्सा जो उसे रिज़र्व बैंक के पास नकद रखना होता है; वैधानिक तरलता अनुपात — जमा का वह हिस्सा जो बैंक को स्वयं सोना, नकद या सरकारी प्रतिभूतियों में रखना होता है। |
✅ आसान भाषा में: बैंक में जमा आपके ₹100 में से कितने रुपये बैंक "ऋण नहीं दे सकता" — यह इन दोनों से तय होता है। 🏠 उदाहरण: 1991 में दोनों मिलाकर जमा का लगभग आधा (38.5% + 15%) बंधा रहता था, उद्योगों को ऋण के लिए बहुत कम बचता था; आज ये क्रमशः लगभग 18% और 3% हैं। |
🔎 तालिका से क्या समझें: तालिका की हर पंक्ति एक ही दिशा दिखाती है — "नियंत्रण से बाज़ार की ओर"। बैंक ब्याज दर ख़ुद तय करने लगे, कर दरें घटीं, रुपये की दर बाज़ार तय करने लगा और आयात पर मात्रा की सीमाएँ हटीं। इसीलिए 1991 को केवल "औद्योगिक" नहीं, पूरी अर्थव्यवस्था का सुधार कहा जाता है।
📖 पीछे की कहानी — हर्षद मेहता घोटाला (1992) — सुधारों की पहली कसौटी जैसा झटका उदारीकरण के ठीक बाद 1991-92 में शेयर बाज़ार का सूचकांक कुछ ही महीनों में तीन गुना से अधिक हो गया। बाद में पता चला कि शेयर दलाल हर्षद मेहता बैंकों के बीच सरकारी प्रतिभूतियों के लेन-देन की खामियों का फ़ायदा उठाकर बैंकों का पैसा शेयर बाज़ार में लगा रहा था। अप्रैल 1992 में घोटाला खुलते ही बाज़ार धड़ाम से गिरा। इस घटना ने सिखाया कि खुला बाज़ार तभी सुरक्षित है जब उस पर मज़बूत नियामक हो — इसी वर्ष सेबी को वैधानिक शक्तियाँ मिलीं और आगे चलकर पूरी तरह इलेक्ट्रॉनिक शेयर-व्यापार (राष्ट्रीय शेयर बाज़ार, 1994) शुरू हुआ। |
विदेशी मुद्रा की तीव्र कमी के दौर में बना विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम, 1973 (FERA) विदेशी मुद्रा के संरक्षण व कड़े नियंत्रण पर केंद्रित था। उदारीकृत अर्थव्यवस्था के अनुकूल इसकी जगह विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम, 1999 (FEMA) लाया गया, जो 1 जून 2000 से प्रभावी हुआ। इसका उद्देश्य बाह्य व्यापार व भुगतानों को सुगम बनाना और विदेशी मुद्रा बाज़ार का व्यवस्थित विकास करना है।
आधार | विनियमन अधिनियम, 1973 | प्रबंधन अधिनियम, 1999 |
उल्लंघन की प्रकृति | आपराधिक (Criminal) अपराध | दीवानी (Civil) अपराध |
दंड | कठोर कारावास, गैर-ज़मानती प्रावधान, गिरफ़्तारी की शक्ति | मुख्यतः आर्थिक जुर्माना; कारावास केवल जुर्माना न चुकाने पर |
सबूत का भार | आरोपी को स्वयं निर्दोष सिद्ध करना होता था | दोष सिद्ध करने का भार जाँच एजेंसी पर |
राज्य की भूमिका | कठोर "नियंत्रक" | "प्रबंधक एवं सुविधा-प्रदाता" |
प्रभाव | निवेश व व्यापार हतोत्साहित | विदेशी निवेश में तेज़ वृद्धि; व्यापार सुगमता; चालू खाता परिवर्तनीयता को बल |
📘 आसान परिभाषा: चालू खाता परिवर्तनीयता (Current Account Convertibility) |
📚 परिभाषा: वस्तुओं-सेवाओं के व्यापार, यात्रा, शिक्षा, इलाज, धन-प्रेषण और ब्याज-लाभांश जैसे चालू लेन-देन के लिए घरेलू मुद्रा को बिना विशेष अनुमति के विदेशी मुद्रा में बदलने की स्वतंत्रता; भारत ने अगस्त 1994 में इसे अपनाया। |
✅ आसान भाषा में: रोज़मर्रा के विदेशी लेन-देन के लिए रुपये को डॉलर में बदलना आसान — कोई अलग अनुमति नहीं। 🏠 उदाहरण: विदेश पढ़ने जा रहा छात्र बैंक से फ़ीस के लिए डॉलर ले सकता है; पर विदेश में ज़मीन ख़रीदने (पूँजी लेन-देन) पर अब भी सीमाएँ हैं — इसे पूँजी खाता परिवर्तनीयता कहते हैं, जो भारत में आंशिक ही है। |
🔎 तालिका से क्या समझें: विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम "डर" पर चलता था — उल्लंघन आपराधिक अपराध था और आरोपी को ख़ुद निर्दोष साबित करना पड़ता था। प्रबंधन अधिनियम "भरोसे" पर चलता है — उल्लंघन दीवानी अपराध है और साबित करने का भार जाँच एजेंसी पर। यह बदलाव ही बताता है कि राज्य "नियंत्रक" से "प्रबंधक" बना।
◆ चालू खाता परिवर्तनीयता: अगस्त 1994 में लागू हुई; 1999 के प्रबंधन अधिनियम ने इसे विधिक रूप से सुदृढ़ किया — चालू खाते के लेन-देन अब सामान्यतः मुक्त हैं।
◆ पूँजी खाता परिवर्तनीयता: रुपया चालू खाते पर पूर्णतः, पर पूँजी खाते पर केवल आंशिक रूप से परिवर्तनीय है — इस पर एस.एस. तारापोर समितियाँ (1997 व 2006) बनीं; रिज़र्व बैंक आवश्यकता पड़ने पर ही बाज़ार में हस्तक्षेप करता है।
🎯 याद रखें — इस खंड के मुख्य बिंदु 1. नई औद्योगिक नीति — 24 जुलाई 1991 (नरसिम्हा राव; वित्त मंत्री मनमोहन सिंह)। 2. अनिवार्य लाइसेंस — 18 से घटकर अब 5 उद्योग; सरकारी आरक्षण — 17 से घटकर अब 2 (परमाणु ऊर्जा, रेलवे परिचालन)। 3. फ़ेरा 1973 (आपराधिक) → फ़ेमा 1999 (दीवानी; 1 जून 2000 से)। 4. चालू खाता परिवर्तनीयता — अगस्त 1994; पूँजी खाता — केवल आंशिक। |
💡 क्या आप जानते हैं? 1991-92 के बजट में आयात शुल्क की अधिकतम दर घटाकर 150% की गई — इससे पहले कुछ वस्तुओं पर यह 300% से भी अधिक थी। |
📘 आसान परिभाषा: निजीकरण (Privatisation) |
📚 परिभाषा: सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के स्वामित्व, प्रबंधन व नियंत्रण को पूर्णतः या आंशिक रूप से निजी क्षेत्र को हस्तांतरित करना, ताकि अर्थव्यवस्था में सरकार की प्रत्यक्ष भूमिका घटे और दक्षता बढ़े। इसके दो रास्ते हैं — सरकार का किसी क्षेत्र से हटना (अनारक्षण) और सरकारी उपक्रमों की बिक्री (विनिवेश)। |
✅ आसान भाषा में: सरकारी कंपनी को पूरी तरह या कुछ हिस्से में निजी हाथों में सौंप देना। 🏠 उदाहरण: जैसे किसी सरकारी स्कूल को चलाने की ज़िम्मेदारी किसी अच्छे निजी ट्रस्ट को दे दी जाए — इमारत और उद्देश्य वही, पर प्रबंधन नया। |
तुलना का आधार | उदारीकरण | निजीकरण |
मूल अर्थ | नियम, क़ानून व नियंत्रण में ढील देकर आर्थिक स्वतंत्रता | सार्वजनिक उपक्रमों के स्वामित्व या प्रबंधन का निजी हाथों में हस्तांतरण |
स्वामित्व परिवर्तन | अनिवार्य नहीं — सरकारी व निजी दोनों क्षेत्र साथ रह सकते हैं | सार्वजनिक संपत्ति या हिस्सेदारी का हस्तांतरण अनिवार्य |
राज्य की भूमिका | "नियंत्रक" से "सुविधा-प्रदाता" व "नियामक" | प्रत्यक्ष "उत्पादक/व्यवसायी" की भूमिका से पीछे हटना |
प्राथमिक उद्देश्य | एकाधिकार व लालफ़ीताशाही समाप्त कर प्रतिस्पर्धा बढ़ाना | राजकोषीय घाटा घटाना, आधुनिक तकनीक व प्रबंधकीय दक्षता लाना |
दायरा | व्यापक ढाँचा — राजकोषीय, मौद्रिक, व्यापार व औद्योगिक नीतियाँ | विशिष्ट रूप से सार्वजनिक उपक्रम, परिसंपत्तियाँ व उनका प्रबंधन |
प्रक्रिया | विनियमन-मुक्ति, आयात शुल्क में कमी, कोटा समाप्ति | विनिवेश, रणनीतिक बिक्री, निजी क्षेत्र को पट्टा (Leasing) |
भारतीय उदाहरण | लाइसेंस व्यवस्था का उन्मूलन; विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम; दूरसंचार में 100% स्वचालित विदेशी निवेश; बीमा में 74% (बजट 2025-26 में 100% की घोषणा) | एयर इंडिया, मारुति, भारत एल्युमिनियम कंपनी की बिक्री; राष्ट्रीय मुद्रीकरण पाइपलाइन; भारतीय जीवन बीमा निगम का प्रस्ताव |
🔎 तालिका से क्या समझें: दोनों शब्द अक्सर एक साथ बोले जाते हैं, पर अलग हैं — उदारीकरण में सरकार "नियम ढीले" करती है (मालिक कोई भी रहे), जबकि निजीकरण में "मालिक बदलता" है। उदाहरण के लिए दूरसंचार क्षेत्र निजी कंपनियों के लिए खोलना उदारीकरण था, पर एयर इंडिया को टाटा को बेचना निजीकरण।
◆ दोनों परस्पर पूरक हैं — उदारीकरण ने प्रतिस्पर्धी माहौल बनाया, निजीकरण ने संसाधनों का कुशल आवंटन किया; पर उपभोक्ता हित व एकाधिकार-रोधी निगरानी के लिए भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग, भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण और भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड जैसे स्वतंत्र नियामक अनिवार्य हैं।
प्रकार | क्या बिकता है | नियंत्रण किसके पास |
रणनीतिक बिक्री | 51% या अधिक हिस्सेदारी; 100% बिक्री को विराष्ट्रीयकरण भी कहते हैं | प्रबंधन नियंत्रण निजी ख़रीदार को |
आंशिक निजीकरण | 50% से अधिक, पर 100% से कम शेयर | निजी क्षेत्र |
सांकेतिक (टोकन) / घाटा निजीकरण | प्रायः 5-10% शेयर (अधिकतम 49% तक) — मुख्यतः बजट घाटा पाटने के लिए | सरकार |
अल्पमत विनिवेश | अल्प हिस्सेदारी — सरकार 51% या अधिक अपने पास रखती है | सरकार |
पूर्ण निजीकरण | 100% शेयर | निजी क्षेत्र |
📘 आसान परिभाषा: विनिवेश (Disinvestment) |
📚 परिभाषा: सरकार द्वारा किसी सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम में अपनी शेयर-हिस्सेदारी का कुछ या पूरा भाग निजी निवेशकों, संस्थाओं या जनता को बेचना। |
✅ आसान भाषा में: सरकारी कंपनी के "शेयर बेचना" — कभी थोड़े (नियंत्रण सरकार के पास), कभी अधिकांश (नियंत्रण भी ख़रीदार को)। 🏠 उदाहरण: सरकार भारतीय जीवन बीमा निगम के लगभग 3.5% शेयर जनता को बेचे (2022) — नियंत्रण सरकार का ही रहा; एयर इंडिया के 100% शेयर टाटा को बेचे — नियंत्रण पूरी तरह बदल गया। |
🔎 तालिका से क्या समझें: पूरी तालिका का निर्णायक बिंदु 51% है — जिसके पास 51% या अधिक शेयर, उसी के पास कंपनी का नियंत्रण। सरकार 49% तक बेचे तो वह "अल्पमत विनिवेश" है (पैसा जुटाना), 51% या अधिक बेचे तो "रणनीतिक विनिवेश" (प्रबंधन भी बदलना)।
🔹 टोकन (अल्पमत) विनिवेश | 🔸 रणनीतिक विनिवेश |
◆ उपक्रम की अल्प हिस्सेदारी (49% तक) की बिक्री ◆ प्रबंधन व नियंत्रण सरकार के पास — सरकारी हिस्सेदारी 51% या अधिक ◆ माध्यम: आरंभिक सार्वजनिक प्रस्ताव (IPO), अनुवर्ती प्रस्ताव (FPO), बिक्री प्रस्ताव (OFS), विनिमय-व्यापारित कोष (ETF) — जैसे "सीपीएसई ईटीएफ" (2014), "भारत-22 ईटीएफ" (नवंबर 2017) ◆ उद्देश्य: राजस्व जुटाना, बाज़ार मूल्य-निर्धारण, पारदर्शिता, जन-भागीदारी ◆ उदाहरण: भारतीय जीवन बीमा निगम का आरंभिक प्रस्ताव (मई 2022, लगभग 3.5% हिस्सेदारी), भारतीय रेल खानपान एवं पर्यटन निगम | ◆ 51% या अधिक हिस्सेदारी की बिक्री ◆ प्रबंधन नियंत्रण भी निजी ख़रीदार को हस्तांतरित ◆ माध्यम: रणनीतिक साझेदार का चयन — खुली प्रतिस्पर्धी बोली ◆ उद्देश्य: पूर्ण निजीकरण, संरचनात्मक सुधार, दीर्घकालिक दक्षता; "न्यूनतम सरकार, अधिकतम शासन" ◆ उदाहरण: मॉडर्न फ़ूड्स (2000 — पहला), भारत एल्युमिनियम कंपनी (2001), विदेश संचार निगम (2002), हिंदुस्तान ज़िंक (2002, उदयपुर), मारुति उद्योग (2002-07), एयर इंडिया (2021-22), नीलांचल इस्पात निगम (2022); भारत पेट्रोलियम का प्रस्तावित रणनीतिक विनिवेश (2022 में स्थगित) |
📘 आसान परिभाषा: विनिमय-व्यापारित कोष (Exchange Traded Fund — ETF) |
📚 परिभाषा: ऐसा निवेश कोष जो कई कंपनियों के शेयरों की एक "टोकरी" रखता है और जिसकी इकाइयाँ शेयर बाज़ार में साधारण शेयरों की तरह ख़रीदी-बेची जाती हैं। |
✅ आसान भाषा में: कई शेयरों का "मिश्रित डिब्बा", जिसे एक साथ ख़रीदा जा सकता है। 🏠 उदाहरण: भारत-22 ईटीएफ में 22 सरकारी और कुछ निजी कंपनियों के शेयर हैं — एक इकाई ख़रीदकर आम निवेशक सभी 22 कंपनियों का थोड़ा-थोड़ा हिस्सेदार बन जाता है, और सरकार को एक साथ कई कंपनियों की हिस्सेदारी बेचने का आसान रास्ता मिलता है। |
💡 आज की भाषा में — एयर इंडिया की घर-वापसी 1932 में जे.आर.डी. टाटा ने "टाटा एयरलाइंस" शुरू की, जिसका 1953 में राष्ट्रीयकरण होकर यह एयर इंडिया बनी। दशकों के घाटे के बाद 8 अक्टूबर 2021 को टाटा समूह की कंपनी "टैलेस" ने ₹18,000 करोड़ (₹2,700 करोड़ नकद + ₹15,300 करोड़ ऋण की ज़िम्मेदारी) की बोली जीती और 27 जनवरी 2022 को 100% हिस्सेदारी सौंप दी गई — यानी लगभग 69 वर्ष बाद एयरलाइन अपने मूल घर लौटी। यह रणनीतिक विनिवेश का सबसे चर्चित उदाहरण है। |
◆ विनिवेश का उद्देश्य: सरकारी हिस्सेदारी बेचकर संसाधन जुटाना, उपक्रमों में वित्तीय अनुशासन व आधुनिकीकरण लाना, बाज़ार-आधारित जवाबदेही और सार्वजनिक उपक्रमों के शासन (Governance) में सुधार।
◆ 1991-92: पहली बार विनिवेश — लक्ष्य ₹2,500 करोड़, प्राप्ति ₹3,040 करोड़।
◆ सी. रंगराजन समिति (1993): सामान्यतः 49% और विशेष मामलों में 74% तक विनिवेश की सिफ़ारिश।
◆ विनिवेश विभाग (10 दिसंबर 1999) — 14 अप्रैल 2016 से नाम बदलकर निवेश एवं सार्वजनिक परिसंपत्ति प्रबंधन विभाग (DIPAM), वित्त मंत्रालय — रणनीतिक बिक्री का नोडल विभाग; राष्ट्रीय निवेश कोष (2005) में विनिवेश आय जमा।
◆ राष्ट्रीय मुद्रीकरण पाइपलाइन (अगस्त 2021): 2021-22 से 2024-25 में ब्राउनफ़ील्ड परिसंपत्तियों (सड़क, रेलवे स्टेशन, पाइपलाइन, बिजली पारेषण) को निश्चित अवधि के लिए पट्टे पर देकर ₹6 लाख करोड़ जुटाने का लक्ष्य — स्वामित्व सरकार के पास रहता है; बजट 2025-26 में दूसरी परिसंपत्ति मुद्रीकरण योजना (2025-30) में ₹10 लाख करोड़ का लक्ष्य।
📘 आसान परिभाषा: ब्राउनफ़ील्ड और ग्रीनफ़ील्ड (Brownfield & Greenfield) |
📚 परिभाषा: ग्रीनफ़ील्ड — ख़ाली ज़मीन पर बिलकुल नई परियोजना या इकाई की स्थापना; ब्राउनफ़ील्ड — पहले से बनी और चल रही परिसंपत्ति (सड़क, कारख़ाना, स्टेशन) का विस्तार, उन्नयन या अधिग्रहण। |
✅ आसान भाषा में: ग्रीनफ़ील्ड = नया घर बनाना; ब्राउनफ़ील्ड = पुराना घर ख़रीदकर उसकी मरम्मत करना। 🏠 उदाहरण: राष्ट्रीय मुद्रीकरण पाइपलाइन में बनी-बनाई सड़कें (ब्राउनफ़ील्ड) 30 वर्ष के पट्टे पर देकर पैसा जुटाया जाता है, जिससे नई सड़कें (ग्रीनफ़ील्ड) बनाई जाती हैं। |
◆ अन्य उदाहरण: मुंबई, दिल्ली, हैदराबाद आदि हवाई अड्डों का निजी संचालन; तेल एवं प्राकृतिक गैस निगम व कोल इंडिया में अल्पमत विनिवेश; दूरसंचार, ऊर्जा व नागरिक उड्डयन जैसे क्षेत्र निजी निवेश के लिए खुले; वित्त वर्ष 2024-25 के लिए विनिवेश लक्ष्य ₹50,000 करोड़।
श्रेणी | क्षेत्र | नीति |
रणनीतिक क्षेत्र (4 समूह) | (क) परमाणु ऊर्जा, अंतरिक्ष व रक्षा; (ख) परिवहन व दूरसंचार; (ग) ऊर्जा, पेट्रोलियम, कोयला व अन्य खनिज; (घ) बैंकिंग, बीमा व वित्तीय सेवाएँ | न्यूनतम उपस्थिति — प्रत्येक क्षेत्र में होल्डिंग कंपनी स्तर पर केवल 1 से 4 सरकारी उपक्रम; शेष का निजीकरण, विलय या सहायक कंपनी के रूप में पुनर्गठन |
गैर-रणनीतिक क्षेत्र | उपभोक्ता वस्तुएँ, होटल-पर्यटन, सामान्य विनिर्माण, व्यापार आदि | निजीकरण; व्यवहार्य न हो तो बंद |
🔎 तालिका से क्या समझें: नई नीति का मूल वाक्य है — "सरकार का काम व्यापार करना नहीं"। रणनीतिक क्षेत्रों में भी सरकार केवल 1 से 4 कंपनियाँ रखेगी, और गैर-रणनीतिक क्षेत्रों (होटल, उपभोक्ता वस्तुएँ) से पूरी तरह हटेगी। इससे बचे संसाधन शिक्षा-स्वास्थ्य जैसे सामाजिक क्षेत्रों में लगाने का विचार है।
केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों को अधिक वित्तीय व परिचालन स्वायत्तता देने के लिए नवरत्न (1997), मिनीरत्न (1997) और महारत्न (2009-10) योजनाएँ शुरू की गईं। जनवरी 2026 की स्थिति में 14 महारत्न, 26 नवरत्न और 74 मिनीरत्न उपक्रम हैं।
![]() चित्र 6: सार्वजनिक उपक्रमों की "रत्न" सीढ़ी — मानदंड और निवेश स्वायत्तता |
श्रेणी | प्रमुख मानदंड | स्वायत्तता (सरकारी पूर्व-अनुमोदन के बिना निवेश) |
महारत्न | नवरत्न दर्जा; भारतीय शेयर बाज़ार में सूचीबद्ध; महत्वपूर्ण वैश्विक उपस्थिति; पिछले 3 वर्षों का औसत — कारोबार ₹25,000 करोड़ से अधिक, निवल मूल्य ₹15,000 करोड़ से अधिक, कर-पश्चात शुद्ध लाभ ₹5,000 करोड़ से अधिक | एक परियोजना में ₹5,000 करोड़ या निवल मूल्य का 15% (जो कम हो); संयुक्त उद्यम/सहायक कंपनी में निवल मूल्य के 15% (अधिकतम ₹5,000 करोड़) तक इक्विटी; वैश्विक विलय-अधिग्रहण में अधिक स्वतंत्रता |
नवरत्न | मिनीरत्न श्रेणी-1 व अनुसूची "ए" दर्जा; पिछले 5 में से 3 वर्षों में समझौता ज्ञापन रेटिंग "उत्कृष्ट" या "बहुत अच्छा"; 6 वित्तीय संकेतकों पर 100 में से कम से कम 60 अंक | एक परियोजना में ₹1,000 करोड़ या निवल मूल्य का 15%; एक वर्ष में कुल निवल मूल्य का 30% तक; बिना पूर्व मंज़ूरी संयुक्त उद्यम, सहायक कंपनी व विलय-अधिग्रहण — इक्विटी निवल मूल्य के 15% (अधिकतम ₹1,000 करोड़) तक |
मिनीरत्न श्रेणी-1 | पिछले 3 वर्ष लगातार लाभ; तीन में से किसी एक वर्ष कर-पूर्व लाभ ₹30 करोड़ या अधिक; सकारात्मक निवल मूल्य | ₹500 करोड़ या निवल मूल्य के बराबर (जो कम हो) |
मिनीरत्न श्रेणी-2 | पिछले 3 वर्ष लगातार लाभ; सकारात्मक निवल मूल्य | ₹300 करोड़ या निवल मूल्य का 50% (जो कम हो) |
📘 आसान परिभाषा: निवल मूल्य (Net Worth) |
📚 परिभाषा: किसी कंपनी की कुल परिसंपत्तियों में से उसकी कुल देनदारियाँ (ऋण आदि) घटाने पर बचा मूल्य — यानी शेयरधारकों की वास्तविक पूँजी। |
✅ आसान भाषा में: सब कुछ बेचकर और सारे कर्ज़ चुकाकर कंपनी के पास जो बचे, वही उसका "असली वज़न"। 🏠 उदाहरण: किसी कंपनी की संपत्ति ₹1,000 करोड़ और कर्ज़ ₹600 करोड़ — उसका निवल मूल्य ₹400 करोड़; नवरत्न होने पर वह एक परियोजना में इसका 15% यानी ₹60 करोड़ तक बिना सरकारी अनुमति लगा सकती है। |
🔎 तालिका से क्या समझें: "रत्न" सीढ़ी का सिद्धांत सीधा है — जितना बड़ा और लाभकारी उपक्रम, उतनी अधिक आज़ादी। मिनीरत्न श्रेणी-2 को ₹300 करोड़ तक, श्रेणी-1 को ₹500 करोड़ तक, नवरत्न को ₹1,000 करोड़ तक और महारत्न को ₹5,000 करोड़ तक के निवेश का फ़ैसला बिना सरकार से पूछे लेने की छूट है।
◆ 14 महारत्न: भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स, भारत पेट्रोलियम, कोल इंडिया, गेल, हिंदुस्तान पेट्रोलियम, इंडियन ऑयल, एनटीपीसी, तेल एवं प्राकृतिक गैस निगम, ऑयल इंडिया (2023), पावर फ़ाइनेंस कॉरपोरेशन, पावर ग्रिड, आरईसी, भारतीय इस्पात प्राधिकरण और हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स (अक्टूबर 2024 — 14वाँ)।
◆ हालिया नवरत्न: भारतीय रेल खानपान एवं पर्यटन निगम और भारतीय रेल वित्त निगम (मार्च 2025 — 25वें व 26वें)। मंत्रिमंडल सचिव की अध्यक्षता वाली समिति द्वारा शासन, पूँजीगत व्यय, लाभांश व "विकसित भारत 2047" से संरेखण जैसे नए मानदंडों पर "रत्न" ढाँचे की समीक्षा व दो नई श्रेणियाँ जोड़ने पर विचार चल रहा है।
⚠️ ध्यान दें भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स (2013), भारत पेट्रोलियम (2017) और पावर ग्रिड (2019) अब महारत्न हैं — इन्हें नवरत्न लिखना पुरानी जानकारी है। मिनीरत्न श्रेणी-1 की निवेश सीमा "₹500 करोड़ या निवल मूल्य के बराबर" है, जबकि "निवल मूल्य का 50%" वाली शर्त श्रेणी-2 (₹300 करोड़) की है। |
✅ निजीकरण के लाभ | ⚠️ चिंताएँ |
◆ आर्थिक दक्षता व उत्पादकता में वृद्धि ◆ घाटे वाले उपक्रमों से राजकोषीय बोझ में कमी; मुक्त पूँजी सामाजिक क्षेत्र में ◆ प्रतिस्पर्धा व नवाचार; बेहतर सेवा गुणवत्ता ◆ विदेशी निवेश व आधुनिक तकनीक का आगमन | ◆ रणनीतिक परिसंपत्तियों का कम मूल्यांकन ("परिवार की चाँदी बेचना") ◆ कर्मचारियों की छँटनी व आरक्षण नीति का प्रभाव ◆ निजी एकाधिकार का ख़तरा — मज़बूत नियामकों की आवश्यकता ◆ सामाजिक दायित्व (दूरस्थ क्षेत्रों में सेवा) की उपेक्षा |
🎯 याद रखें — इस खंड के मुख्य बिंदु 1. 51% हिस्सेदारी = नियंत्रण; 49% तक बिक्री — अल्पमत विनिवेश, 51% या अधिक — रणनीतिक विनिवेश। 2. पहली रणनीतिक बिक्री — मॉडर्न फ़ूड्स (2000); एयर इंडिया — टाटा को (27 जनवरी 2022)। 3. निवेश एवं सार्वजनिक परिसंपत्ति प्रबंधन विभाग (2016, पहले विनिवेश विभाग 1999)। 4. 14 महारत्न (14वाँ — हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स, 2024), 26 नवरत्न। |
📘 आसान परिभाषा: वैश्वीकरण (Globalisation) |
📚 परिभाषा: किसी देश की अर्थव्यवस्था का विश्व अर्थव्यवस्था के साथ एकीकरण — वस्तुओं, सेवाओं, पूँजी, तकनीक, विचारों और लोगों का सीमाओं के पार निर्बाध आदान-प्रदान। लक्ष्य है एक "सीमाहीन विश्व" (Borderless World)। |
✅ आसान भाषा में: दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं को इस तरह जोड़ना कि एक देश की घटना का असर दूसरे देशों पर भी पड़े। 🏠 उदाहरण: जैसे मोहल्ले की अलग-अलग दुकानें मिलकर एक बड़ा बाज़ार बन जाएँ — अब ग्राहक और दुकानदार दोनों के विकल्प बढ़ जाते हैं, पर प्रतिस्पर्धा भी बढ़ती है। 2008 में अमेरिका के वित्तीय संकट का असर भारत के शेयर बाज़ार और सूचना प्रौद्योगिकी कंपनियों तक पहुँचा था। |
◆ भारत में वैश्वीकरण के उपाय: आयात शुल्क में कटौती; प्रत्यक्ष विदेशी निवेश व विदेशी पोर्टफ़ोलियो निवेश की अनुमति; चालू खाता परिवर्तनीयता; निर्यात-आयात नीति; विशेष आर्थिक क्षेत्र; मुक्त व्यापार समझौते (जैसे 2026 का भारत-यूरोपीय संघ समझौता)।
प्रशुल्क एवं व्यापार पर सामान्य समझौता (GATT) — 1947 में 23 देशों द्वारा हस्ताक्षरित, 1948 से प्रभावी — का उत्तराधिकारी विश्व व्यापार संगठन 1 जनवरी 1995 को अस्तित्व में आया (उरुग्वे दौर, 1986-94; मराकेश समझौता)। भारत दोनों का संस्थापक सदस्य है। इसकी भूमिका — नियम-आधारित, पारदर्शी व गैर-भेदभावपूर्ण व्यापार प्रणाली ("सर्वाधिक अनुग्रहप्राप्त राष्ट्र" व "राष्ट्रीय व्यवहार" सिद्धांत); वस्तु (GATT), सेवा (GATS) व बौद्धिक संपदा (TRIPS) समझौते; विवाद निपटान तंत्र; विकासशील देशों के लिए "विशेष एवं विभेदक व्यवहार"। (विस्तृत चर्चा अध्याय 9 में।)
📘 आसान परिभाषा: सर्वाधिक अनुग्रहप्राप्त राष्ट्र (Most Favoured Nation — MFN) |
📚 परिभाषा: विश्व व्यापार संगठन का मूल सिद्धांत, जिसमें कोई सदस्य देश किसी एक सदस्य को जो व्यापारिक रियायत (जैसे कम आयात शुल्क) देता है, वही रियायत उसे बाकी सभी सदस्यों को भी देनी होती है। |
✅ आसान भाषा में: "सबसे प्रिय देश" — यानी सबके साथ बराबर व्यवहार, किसी के साथ भेदभाव नहीं। 🏠 उदाहरण: अगर भारत जापान की कारों पर शुल्क 10% करे, तो उसे कोरिया और जर्मनी की कारों पर भी 10% ही रखना होगा; मुक्त व्यापार समझौते इस नियम के तय अपवाद हैं। |
वैश्वीकरण का बड़ा परिणाम है आउटसोर्सिंग — कंपनियाँ अपनी सेवाएँ ख़ुद बनाने के बजाय बाहरी स्रोतों, अक्सर दूसरे देशों से लेती हैं। सूचना प्रौद्योगिकी की प्रगति से ग्राहक सेवा, लेखा, रिकॉर्ड-रखाव, टेली-मेडिसिन जैसी सेवाओं के लिए व्यवसाय प्रक्रिया आउटसोर्सिंग (BPO) केंद्र भारत आए। सस्ता व कुशल अंग्रेज़ी-भाषी श्रम भारत की ताक़त बना — आज बहुराष्ट्रीय कंपनियों के वैश्विक क्षमता केंद्र (GCC) भारत में तेज़ी से बढ़ रहे हैं और एक अमेरिकी तकनीकी कंपनी के भारत में अमेरिका से भी अधिक कर्मचारी हैं।
◆ भारतीय बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ: तेल एवं प्राकृतिक गैस निगम विदेश (16 देशों में), टाटा स्टील (26 देशों में; कोरस अधिग्रहण 2007), टाटा मोटर्स (जगुआर-लैंड रोवर 2008), हिंडाल्को (नोवेलिस 2007), एचसीएल टेक्नोलॉजीज़ (31 देशों में कार्यालय), डॉ. रेड्डीज़ लैबोरेटरीज़ — वैश्वीकरण ने भारतीय कंपनियों को भी "वैश्विक खिलाड़ी" बनाया।
📘 आसान परिभाषा: विशेष आर्थिक क्षेत्र (Special Economic Zone) |
📚 परिभाषा: विशेष आर्थिक क्षेत्र अधिनियम, 2005 के तहत अधिसूचित ऐसा भौगोलिक क्षेत्र, जिसे व्यापार, शुल्क व प्रशुल्क के प्रयोजन से "मानित विदेशी क्षेत्र" (Deemed Foreign Territory) माना जाता है और जहाँ निर्यात व निवेश बढ़ाने के लिए कर-छूट, एकल-खिड़की मंज़ूरी व सरल प्रक्रियाएँ मिलती हैं। |
✅ आसान भाषा में: देश के अंदर एक ऐसा ख़ास इलाक़ा जहाँ कंपनियों को टैक्स में भारी छूट मिलती है ताकि वे वहाँ माल बनाकर विदेश भेजें। 🏠 उदाहरण: जैसे किसी मेले में "ड्यूटी-फ़्री ज़ोन" — वहाँ बिकने वाला सामान सस्ता पड़ता है, पर उसे बाहर (घरेलू बाज़ार में) ले जाने पर सामान्य शुल्क देना पड़ता है। |
पड़ाव / प्रावधान | विवरण |
निर्यात प्रसंस्करण क्षेत्र | कांडला (गुजरात), 1965 — एशिया का पहला; बाद में सांताक्रूज़ (मुंबई) आदि; प्रक्रियागत जटिलता, अवसंरचना की सीमाओं व नीतिगत कमियों के कारण इन्हें विशेष आर्थिक क्षेत्र मॉडल में बदला गया |
नीति व अधिनियम | विशेष आर्थिक क्षेत्र नीति — अप्रैल 2000; अधिनियम — 2005 (नियम 10 फ़रवरी 2006 से प्रभावी) |
कर प्रोत्साहन | इकाइयों को आयकर में — पहले 5 वर्ष 100%, अगले 5 वर्ष 50%, अगले 5 वर्ष पुनर्निवेशित लाभ पर 50% छूट (कुल 15 वर्ष); सीमा शुल्क, उत्पाद शुल्क, सेवा कर व केंद्रीय बिक्री कर (वस्तु एवं सेवा कर से पहले) से छूट; 31 मार्च 2020 के बाद उत्पादन शुरू करने वाली इकाइयों को आयकर छूट नहीं ("सूर्यास्त" प्रावधान) |
अन्य सुविधाएँ | एकल-खिड़की मंज़ूरी; न्यूनतम निरीक्षण व स्व-प्रमाणन; स्वचालित मार्ग से 100% प्रत्यक्ष विदेशी निवेश; सार्वजनिक-निजी भागीदारी में अवसंरचना |
प्रशासन | विकास आयुक्त व अनुमोदन बोर्ड; पर्यावरण प्रभाव आकलन — विकासकर्ता की ज़िम्मेदारी |
आकार | प्रकार के अनुसार लगभग 10 हेक्टेयर (जैसे सूचना प्रौद्योगिकी) से अधिकतम 5,000 हेक्टेयर तक; 2025 में सेमीकंडक्टर व इलेक्ट्रॉनिक घटक क्षेत्रों के लिए न्यूनतम क्षेत्र घटाकर 10 हेक्टेयर |
उद्देश्य | अतिरिक्त आर्थिक गतिविधि, निर्यात संवर्धन, घरेलू व विदेशी निवेश, रोज़गार सृजन, विश्वस्तरीय अवसंरचना |
सुधार प्रयास | बाबा कल्याणी समिति (2018) की सिफ़ारिश पर "उद्यम एवं सेवा केंद्र विकास" (DESH) विधेयक का प्रस्ताव — निर्यात-केंद्रित से आगे बढ़कर घरेलू बाज़ार से भी जोड़ने का विचार |
🔎 तालिका से क्या समझें: विशेष आर्थिक क्षेत्र का पूरा आकर्षण "कर-अवकाश" में था — पहले 5 वर्ष 100% आयकर छूट। पर 2020 के बाद नई इकाइयों के लिए यह छूट ख़त्म हो गई और जीएसटी आने से दूसरे लाभ भी कम हुए, इसीलिए इन्हें घरेलू बाज़ार से जोड़ने वाले नए क़ानून (देश विधेयक) पर विचार हो रहा है।
📖 पीछे की कहानी — शेनझेन — मछुआरों का गाँव जो "विश्व का कारख़ाना" बना 1980 में चीन ने हांगकांग की सीमा से लगे मछुआरों के छोटे से गाँव शेनझेन को अपना पहला विशेष आर्थिक क्षेत्र बनाया। वहाँ विदेशी कंपनियों को सस्ती ज़मीन, कर-छूट और आसान नियम मिले। चार दशकों में यह गाँव एक करोड़ से अधिक आबादी वाला विशाल औद्योगिक महानगर बन गया, जहाँ मोबाइल, ड्रोन और इलेक्ट्रॉनिक्स की दुनिया की बड़ी कंपनियाँ हैं। भारत ने 2000 में विशेष आर्थिक क्षेत्र नीति बनाते समय इसी मॉडल से प्रेरणा ली, पर छोटे आकार, भूमि विवाद और कमज़ोर अवसंरचना के कारण वैसी सफलता नहीं मिली। |
आधार | विशेष आर्थिक क्षेत्र | राष्ट्रीय निवेश एवं विनिर्माण क्षेत्र |
कानूनी आधार | विशेष आर्थिक क्षेत्र अधिनियम, 2005 | राष्ट्रीय विनिर्माण नीति, 2011 (25 अक्टूबर 2011) |
मुख्य उद्देश्य | निर्यात संवर्धन, विदेशी मुद्रा अर्जन | विनिर्माण की जीडीपी हिस्सेदारी 25% करना; समग्र औद्योगिक विकास |
आकार | अपेक्षाकृत छोटा — प्रकार के अनुसार | न्यूनतम 5,000 हेक्टेयर (50 वर्ग किमी), ऊपरी सीमा नहीं |
स्वरूप | शुल्क-मुक्त परिक्षेत्र — "मानित विदेशी क्षेत्र" | स्कूल, अस्पताल, आवास सहित आत्मनिर्भर एकीकृत औद्योगिक टाउनशिप |
बाज़ार | मुख्यतः निर्यात; घरेलू बाज़ार में बिक्री पर सामान्य शुल्क | घरेलू और वैश्विक दोनों बाज़ार |
प्रबंधन | विकास आयुक्त | राज्य सरकार द्वारा गठित विशेष प्रयोजन वाहन (SPV) |
पर्यावरण आकलन | विकासकर्ता | राज्य सरकार; हरित तकनीक, स्व-प्रमाणन वाले लचीले श्रम-पर्यावरण नियम |
प्रोत्साहन का ज़ोर | कर-अवकाश व वित्तीय रियायतें | हरित भवन, अपशिष्ट प्रबंधन, कौशल विकास; बड़े पैमाने के क्लस्टर उत्पादन से पैमाने की मितव्ययिता — अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा |
उदाहरण | कांडला, नोएडा, महिंद्रा वर्ल्ड सिटी (जयपुर), सीतापुरा (जयपुर) | प्रकाशम व चित्तूर (आंध्र प्रदेश), संगारेड्डी (तेलंगाना), कलिंगनगर (ओडिशा), तुमकुरु (कर्नाटक) |
🔎 तालिका से क्या समझें: मूल अंतर आकार और लक्ष्य का है — विशेष आर्थिक क्षेत्र छोटे "निर्यात के द्वीप" हैं, जबकि राष्ट्रीय निवेश एवं विनिर्माण क्षेत्र कम से कम 5,000 हेक्टेयर के पूरे "औद्योगिक शहर", जो देश और विदेश दोनों बाज़ारों के लिए बनाते हैं।
विचारक | पुस्तक | दृष्टिकोण |
जगदीश भगवती | वैश्वीकरण के बचाव में (In Defense of Globalization, 2004) | वैश्वीकरण का प्रबल समर्थन |
जोसेफ़ ई. स्टिग्लिट्ज़ | वैश्वीकरण को सफल बनाना (Making Globalization Work, 2006); वैश्वीकरण और उसके असंतोष (Globalization and Its Discontents, 2002) | सुधारवादी आलोचना — नियम निष्पक्ष हों |
उलरिच बेक | वैश्वीकरण क्या है? (What is Globalization?) | समाजशास्त्रीय विश्लेषण |
मिल्टन फ़्रीडमैन | पूँजीवाद और स्वतंत्रता (Capitalism and Freedom, 1962) | मुक्त बाज़ार का समर्थन |
थॉमस फ़्रीडमैन | दुनिया चपटी है (The World Is Flat, 2005) | तकनीक से सपाट होती वैश्विक प्रतिस्पर्धा |
◆ भू-रणनीतिक वैश्वीकरण: अब देश जुड़े तो रहते हैं, पर यह देखकर कि वे किससे व्यापार करते हैं, कच्चा माल कहाँ से लेते हैं और किन साझेदारों पर निर्भर हैं — "मित्र-देशों में उत्पादन" (Friend-shoring) और "चीन+1" इसी सोच के उदाहरण हैं।
◆ वैश्विक झटकों की शृंखला: 1995-2000 का दूरसंचार-मीडिया-प्रौद्योगिकी बुलबुला (डॉट-कॉम बुलबुला); 2001 में चीन का विश्व व्यापार संगठन में प्रवेश (चीन "विश्व का कारख़ाना" बना); 2008 का वैश्विक वित्तीय संकट — "वित्तीयकरण" (अर्थव्यवस्था का विनिर्माण के बजाय वित्तीय परिसंपत्तियों से संचालित होना) का परिणाम।
🎯 याद रखें — इस खंड के मुख्य बिंदु 1. विश्व व्यापार संगठन — 1 जनवरी 1995; भारत संस्थापक सदस्य। 2. एशिया का पहला निर्यात प्रसंस्करण क्षेत्र — कांडला (1965)। 3. विशेष आर्थिक क्षेत्र — नीति 2000, अधिनियम 2005; "मानित विदेशी क्षेत्र"। 4. राष्ट्रीय निवेश एवं विनिर्माण क्षेत्र — 2011 की नीति; न्यूनतम 5,000 हेक्टेयर। |
मापदंड | 1990-91 के आसपास | वर्तमान (2025-26 के आसपास) |
विदेशी मुद्रा भंडार | लगभग 1.1-1.2 अरब डॉलर (जून 1991) | 700 अरब डॉलर से अधिक |
प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (वार्षिक) | लगभग 9.7 करोड़ डॉलर | लगभग 95 अरब डॉलर (सकल) — लगभग 1,000 गुना |
निर्यात (जीडीपी का %) | लगभग 7% | लगभग 22-23% |
व्यापार-जीडीपी अनुपात | लगभग 17% | लगभग 46% |
सेवा क्षेत्र (जीडीपी का %) | लगभग 39% | लगभग 54% |
गरीबी | लगभग 45% (1993-94, तेंदुलकर पद्धति) | अत्यधिक गरीबी लगभग 2.3% (2022-23) |
अर्थव्यवस्था का आकार (नाममात्र) | लगभग 17वाँ स्थान | चौथा स्थान; क्रय शक्ति समता पर तीसरा |
🔎 तालिका से क्या समझें: तीन दशकों की तुलना में सबसे नाटकीय बदलाव विदेशी मुद्रा भंडार (लगभग 600 गुना) और विदेशी निवेश (लगभग 1,000 गुना) में है — यानी "भरोसे का संकट" "भरोसे की ताक़त" में बदला। पर सेवा क्षेत्र का हिस्सा 39% से 54% हुआ, जबकि विनिर्माण लगभग वहीं का वहीं रहा — यही सुधारों की सबसे बड़ी अधूरी कहानी है।
✅ पक्ष — सुधारों की उपलब्धियाँ | ❌ विपक्ष — आलोचनाएँ |
◆ जीडीपी वृद्धि दर "हिंदू संवृद्धि दर" से ऊपर उठकर लंबे समय तक 6-8% ◆ विदेशी निवेश का भारी प्रवाह; विदेशी मुद्रा संकट का अंत ◆ प्रति व्यक्ति आय व कर-जीडीपी अनुपात में वृद्धि ◆ सुधारों ने लगभग 60 करोड़ लोगों को गरीबी से बाहर निकालने में मदद की ◆ बेहतर सेवाएँ और विकल्प — 1991 में टेलीफ़ोन कनेक्शन के लिए दो वर्ष इंतज़ार; आज सस्ता मोबाइल डेटा ◆ सूचना प्रौद्योगिकी क्रांति; वैश्विक मूल्य शृंखलाओं में भागीदारी ◆ धन-प्रेषण पाने वाले देशों में भारत शीर्ष पर — केरल जैसे राज्यों की अर्थव्यवस्था में इसकी बड़ी भूमिका ◆ सूचना प्रौद्योगिकी उछाल — इन्फ़ोसिस, विप्रो, एचसीएल; आईबीएम के भारत में अमेरिका से अधिक कर्मचारी; सॉफ़्टवेयर सेवा निर्यात 200 अरब डॉलर से अधिक; दूरसंचार व विमानन क्षेत्र का खुलना | ◆ अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष-विश्व बैंक की शर्तों पर "थोपे गए" सुधार ◆ कृषि क्षेत्र की उपेक्षा; विनिर्माण की जीडीपी हिस्सेदारी लगभग स्थिर (16-17%) ◆ असमानता — शीर्ष 10% आबादी के पास राष्ट्रीय संपत्ति का लगभग 77%; प्रति व्यक्ति आय में 197 देशों में लगभग 149वाँ स्थान ◆ लगभग 90% कार्यबल असंगठित; महिला श्रम-बल भागीदारी लगभग 41.7% ◆ शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण जैसे सामाजिक संकेतकों की उपेक्षा ◆ कमज़ोर वित्तीय बाज़ार (1992 का हर्षद मेहता घोटाला — अब पूर्णतः इलेक्ट्रॉनिक व्यापार प्रणाली); निरंतर व्यापार घाटा; प्रतिभा पलायन (एक विदेशी छात्र के आने पर लगभग 25 भारतीय छात्र विदेश जाते हैं) ◆ "नव-उपनिवेशवाद", सांस्कृतिक "अमेरिकीकरण" व "मैकडॉनल्डीकरण"; अंधाधुंध उपभोक्तावाद से जलवायु परिवर्तन को बढ़ावा |
📘 आसान परिभाषा: प्रतिभा पलायन (Brain Drain) |
📚 परिभाषा: किसी देश के उच्च-शिक्षित और कुशल लोगों — डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक — का बेहतर अवसरों के लिए स्थायी रूप से विदेश चले जाना। |
✅ आसान भाषा में: देश ने पढ़ाया-लिखाया, पर उनकी प्रतिभा का लाभ दूसरे देश को मिला। 🏠 उदाहरण: किसी आईआईटी स्नातक की पढ़ाई पर देश के लाखों रुपये लगे और वह अमेरिका की कंपनी में बस गया; हालाँकि वह जो धन-प्रेषण और ज्ञान वापस भेजता है, उससे इसे अब "प्रतिभा का प्रवाह" भी कहा जाता है। |
◆ 1991 की औद्योगिक नीति की विशिष्ट आलोचनाएँ: ध्यान मुख्यतः आंतरिक उदारीकरण पर; निर्यात-उन्मुख के बजाय उपभोग-आधारित वृद्धि को प्राथमिकता; आर्थिक असमानता व श्रम शोषण जैसी पूँजीवादी बुराइयाँ; नेहरूवादी समाजवाद व कल्याणकारी राज्य से भटकाव; बहुराष्ट्रीय कंपनियों से स्वदेशी उद्योगों को असमान प्रतिस्पर्धा; विनिर्माण की हिस्सेदारी लगभग 16-17% पर ठहरी — इसीलिए लगभग तीन दशक पुरानी औद्योगिक नीति को नई नीति से बदलने की माँग।
◆ संवैधानिक कसौटी: अनुच्छेद 38 (आय की असमानता घटाना), अनुच्छेद 39(ख) (भौतिक संसाधनों का न्यायसंगत वितरण) व 39(ग) (धन व उत्पादन-साधनों के संकेंद्रण को रोकना) — सुधारों का लक्ष्य केवल वृद्धि नहीं, समावेशी विकास भी होना चाहिए।
◆ आगे की राह: "सुधार, प्रदर्शन और परिवर्तन" (Reform, Perform, Transform) के सिद्धांत पर अगली पीढ़ी के सुधार — भूमि, श्रम, न्यायिक व प्रशासनिक सुधार — राज्यों व हितधारकों की सहमति से; भारत को "मानव-केंद्रित वैश्वीकरण" का नेतृत्व करना चाहिए।
🏏 क्रिकेट की भाषा में — एलपीजी सुधार — टेस्ट से टी-20 तक 1991 से पहले भारतीय अर्थव्यवस्था धीमे टेस्ट मैच जैसी थी — हर रन (उत्पादन) के लिए अंपायर (सरकार) की अनुमति और विदेशी टीमों से खेलना लगभग बंद। 1991 के बाद "आईपीएल" जैसी खुली प्रतियोगिता आई — विदेशी खिलाड़ी (निवेश) आए, स्कोरिंग (विकास दर) तेज़ हुई। पर जैसे आईपीएल में सिर्फ़ बड़े सितारे ही न चमकें, घरेलू प्रतिभा भी निखरे — वैसे ही सुधारों का लाभ छोटे किसान, मज़दूर और लघु उद्यम तक पहुँचना चाहिए। |
🎯 याद रखें — इस खंड के मुख्य बिंदु 1. विदेशी मुद्रा भंडार — 1.1 अरब डॉलर (1991) से 700 अरब डॉलर से अधिक। 2. सेवा क्षेत्र का हिस्सा बढ़ा, पर विनिर्माण लगभग 16-17% पर ठहरा। 3. आलोचनाएँ — असमानता, कृषि की उपेक्षा, असंगठित रोज़गार, हर्षद मेहता घोटाला (1992)। |
📊 विनिर्माण एवं औद्योगिक क्षेत्र — नवीनतम आँकड़े 1. औद्योगिक सकल मूल्य वर्धन की वृद्धि 2025-26 की पहली छमाही में लगभग 7% रही (2024-25 में 5.9%)। 2. विनिर्माण सकल मूल्य वर्धन की वृद्धि 2024-25 की दूसरी तिमाही के केवल 2.2% से उछलकर 2025-26 की पहली तिमाही में 7.72% और दूसरी तिमाही में 9.13% — संरचनात्मक सुधार का संकेत। 3. विनिर्माण का अर्थव्यवस्था में योगदान लगभग 17%; मध्यम एवं उच्च-तकनीक उद्योग कुल विनिर्माण मूल्य वर्धन का लगभग 46.3% — भारत अब तकनीकी रूप से जटिल उत्पादों की ओर बढ़ रहा है। 4. इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं का घरेलू उत्पादन 2014-15 से 2023-24 के बीच लगभग 17.5% की वार्षिक चक्रवृद्धि दर से बढ़ा; मोबाइल फ़ोन उत्पादन ₹18,000 करोड़ (2014-15) से बढ़कर ₹5.45 लाख करोड़ (2024-25); इलेक्ट्रॉनिक्स 2024-25 में भारत का तीसरा सबसे बड़ा निर्यात क्षेत्र (2021-22 में सातवाँ)। 5. वाहन उत्पादन 2014-15 से 2024-25 के बीच लगभग 33% बढ़ा; दवा उद्योग का कारोबार 2024-25 में ₹4.72 लाख करोड़। |
📈 तेज़ी के कारण | 🌏 "चीन+1" (China+1) रणनीति |
◆ घरेलू माँग — निजी अंतिम उपभोग व्यय में सुधार ◆ क्षमता उपयोग दीर्घकालिक औसत से ऊपर — नए निजी निवेश का चक्र ◆ कच्चे माल व जिंसों की क़ीमतों में नरमी ◆ सरकार का भारी पूँजीगत व्यय (रेल, राजमार्ग, ऊर्जा) — बजट 2026-27 में लगभग ₹12.2 लाख करोड़ (जीडीपी का लगभग 3.1%) | ◆ बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ भू-राजनीतिक जोखिम घटाने के लिए चीन के साथ एक और उत्पादन केंद्र चाहती हैं ◆ भारत के पक्ष में — उत्पादन आधारित प्रोत्साहन, पीएम गति शक्ति व राष्ट्रीय लॉजिस्टिक्स नीति, एकल-खिड़की प्रणाली, विशाल बाज़ार व युवा कार्यबल ◆ उदाहरण — मोबाइल फ़ोन का बड़ा हिस्सा अब भारत में असेंबल होकर निर्यात |
📘 आसान परिभाषा: क्षमता उपयोग (Capacity Utilisation) |
📚 परिभाषा: किसी कारख़ाने या उद्योग के वास्तविक उत्पादन का उसकी अधिकतम संभावित उत्पादन क्षमता से प्रतिशत अनुपात। |
✅ आसान भाषा में: मशीनें अपनी पूरी ताक़त का कितना हिस्सा चल रही हैं। 🏠 उदाहरण: कोई कारख़ाना रोज़ 1,000 जूते बना सकता है पर 750 बना रहा है — क्षमता उपयोग 75%; जब यह 75-80% से ऊपर जाता है, तो कंपनियाँ नई मशीनें और नए कारख़ाने लगाने लगती हैं (नया निवेश)। |
📘 आसान परिभाषा: "चीन+1" रणनीति (China+1 Strategy) |
📚 परिभाषा: बहुराष्ट्रीय कंपनियों की वह रणनीति जिसमें वे अपने सारे उत्पादन को केवल चीन पर निर्भर रखने के बजाय किसी दूसरे देश में भी उत्पादन केंद्र बनाती हैं, ताकि भू-राजनीतिक या आपूर्ति-शृंखला जोखिम घटे। |
✅ आसान भाषा में: सारे अंडे एक टोकरी में न रखना। 🏠 उदाहरण: कोविड में चीन के कारख़ाने बंद हुए तो दुनिया भर में मोबाइल और दवाओं की कमी हुई — इसलिए एप्पल जैसी कंपनियों ने भारत और वियतनाम में भी उत्पादन बढ़ाया। |
बिंदु | क्रय प्रबंधक सूचकांक (PMI) | औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP) | उद्योगों का वार्षिक सर्वेक्षण (ASI) |
जारीकर्ता | निजी संस्था — एसएंडपी ग्लोबल (एचएसबीसी इंडिया पीएमआई) | राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय, सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय | राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय |
आधार | लगभग 400-500 निजी कंपनियों के क्रय प्रबंधकों का सर्वेक्षण — गुणात्मक धारणा | कारख़ानों का वास्तविक भौतिक उत्पादन — मात्रात्मक आँकड़े | कारख़ाना अधिनियम में पंजीकृत इकाइयों का विस्तृत वित्तीय व रोज़गार डेटा |
आवृत्ति | मासिक — माह समाप्त होते ही | मासिक — पहले लगभग 42 दिन बाद, 2025 से लगभग 28 दिन बाद | वार्षिक |
पैमाना | 0-100; 50 से ऊपर विस्तार, 50 से नीचे संकुचन | भारित सूचकांक — आधार वर्ष के सापेक्ष परिवर्तन | निरपेक्ष आँकड़े |
कवरेज | विनिर्माण व सेवा (अलग-अलग सूचकांक) | खनन, विनिर्माण, बिजली (नई शृंखला में गैस, जल आपूर्ति भी) | संगठित विनिर्माण |
संकेतक प्रकृति | अग्रणी संकेतक (Leading) | पश्चगामी संकेतक (Lagging) | संरचनात्मक आँकड़े |
जीडीपी गणना में उपयोग | नहीं | हाँ — त्रैमासिक अनुमानों में | हाँ — संगठित विनिर्माण के वार्षिक अनुमान |
🔎 तालिका से क्या समझें: तीनों सूचकांक तीन अलग सवालों के जवाब हैं — क्रय प्रबंधक सूचकांक: "कंपनियाँ आगे के बारे में क्या सोच रही हैं?" (अग्रणी); औद्योगिक उत्पादन सूचकांक: "पिछले महीने कितना बना?" (पश्चगामी); उद्योगों का वार्षिक सर्वेक्षण: "पूरे वर्ष उद्योगों की संरचना कैसी रही?" (विस्तृत)। ध्यान रखें — क्रय प्रबंधक सूचकांक में 50 सीमा-रेखा है, जबकि औद्योगिक उत्पादन सूचकांक आधार वर्ष = 100 पर आधारित है।
◆ सकल घरेलू उत्पाद (फ़रवरी 2026) के बाद औद्योगिक उत्पादन सूचकांक का आधार वर्ष भी 2011-12 से बदलकर 2022-23 किया गया; नई शृंखला का पहला आँकड़ा जून 2026 में जारी हुआ — अप्रैल 2026 में औद्योगिक उत्पादन 4.9% और विनिर्माण 6.2% बढ़ा।
◆ टोकरी का विस्तार — 463 मद-समूहों में 1,042 उत्पाद; 64 नए मद-समूह जुड़े (जैसे डेबिट कार्ड, सीसीटीवी कैमरा, टीके) और 64 पुराने हटे (जैसे केरोसिन, फ़्लोरोसेंट ट्यूब); विनिर्माण का भार लगभग 76.06%।
◆ पहली बार गैस आपूर्ति और जल आपूर्ति, सीवरेज व अपशिष्ट प्रबंधन गतिविधियाँ भी शामिल — दुर्लभ खनिज व नवीकरणीय ऊर्जा को भी स्थान मिला।
🎯 याद रखें — इस खंड के मुख्य बिंदु 1. क्रय प्रबंधक सूचकांक — निजी संस्था, मासिक, 50 से ऊपर = विस्तार (अग्रणी संकेतक)। 2. औद्योगिक उत्पादन सूचकांक — राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय, मासिक; नया आधार वर्ष 2022-23। 3. उद्योगों का वार्षिक सर्वेक्षण — संगठित विनिर्माण का वार्षिक विस्तृत आँकड़ा। |
उद्योग | भारत की स्थिति | मुख्य तथ्य व पहलें |
सीमेंट | चीन के बाद विश्व में दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक | स्थापित क्षमता लगभग 690 मिलियन टन; 2024-25 में उत्पादन लगभग 453 मिलियन टन; प्रति व्यक्ति खपत लगभग 290 किग्रा (वैश्विक औसत लगभग 540 किग्रा) — विकास की बड़ी गुंजाइश |
इस्पात | विश्व में दूसरा सबसे बड़ा कच्चा इस्पात उत्पादक (प्रथम — चीन) | हाल के वर्षों में तैयार इस्पात का शुद्ध आयातक — सस्ते आयात पर रक्षोपाय शुल्क; देश के कुल ग्रीनहाउस उत्सर्जन में लगभग 12%; प्रति टन इस्पात पर लगभग 2.5 टन कार्बन डाइऑक्साइड; विशेष इस्पात हेतु उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (2021); राष्ट्रीय इस्पात नीति 2017 — 2030-31 तक 300 मिलियन टन क्षमता; हरित इस्पात वर्गीकरण (2024) |
कोयला | विश्व में पाँचवाँ सबसे बड़ा भंडार; दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक व उपभोक्ता | 2024-25 में रिकॉर्ड 1,047.52 मिलियन टन उत्पादन; कुल बिजली उत्पादन का लगभग 74% कोयले से; "मिशन कोकिंग कोल" — आयात घटाना; कोयला गैसीकरण, कोल बेड मीथेन, कोयला खदान मीथेन, कोयले से तरल ईंधन व मेथनॉल जैसे स्वच्छ उपयोग |
रसायन व पेट्रो-रसायन | एशिया के प्रमुख उत्पादकों में | 2023-24 में विनिर्माण सकल मूल्य वर्धन में लगभग 8.1% योगदान |
📘 आसान परिभाषा: रक्षोपाय शुल्क (Safeguard Duty) |
📚 परिभाषा: किसी वस्तु के आयात में अचानक और तेज़ वृद्धि से घरेलू उद्योग को गंभीर नुकसान की आशंका होने पर, विश्व व्यापार संगठन के नियमों के तहत अस्थायी रूप से लगाया गया अतिरिक्त आयात शुल्क। |
✅ आसान भाषा में: सस्ते विदेशी माल की "बाढ़" से घरेलू उद्योग बचाने के लिए कुछ समय की "बाँध-दीवार"। 🏠 उदाहरण: 2024-25 में सस्ते आयातित इस्पात की बाढ़ आई, तो भारत ने कुछ चपटे इस्पात उत्पादों पर अस्थायी रक्षोपाय शुल्क लगाया ताकि देसी इस्पात कंपनियों पर संकट न आए। |
🔎 तालिका से क्या समझें: चारों आधारभूत उद्योगों में भारत उत्पादन में दुनिया के शीर्ष देशों में है, पर प्रति व्यक्ति खपत अभी कम है (सीमेंट में वैश्विक औसत का लगभग आधा) — इसका अर्थ है कि घर, सड़क और कारख़ाने बनने के साथ इन उद्योगों के बढ़ने की बड़ी गुंजाइश है। चुनौती यह है कि इस्पात और कोयला सबसे अधिक कार्बन छोड़ने वाले उद्योग भी हैं।
📖 पीछे की कहानी — जमशेदपुर — एक सपना जो इस्पात बना 19वीं सदी के अंत में उद्योगपति जमशेदजी नसरवानजी टाटा ने सपना देखा कि भारत अपना इस्पात ख़ुद बनाए — जब अंग्रेज़ अधिकारी इसका मज़ाक उड़ाते थे। उनके निधन (1904) के बाद उनके बेटे दोराबजी टाटा ने खोज जारी रखी और झारखंड के साकची गाँव के पास लौह अयस्क, कोयला और पानी एक साथ मिले। 1907 में टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी बनी और 1912 में पहला इस्पात निकला। जिस गाँव में कारख़ाना लगा, वह आज जमशेदपुर कहलाता है — भारत का पहला योजनाबद्ध औद्योगिक शहर। |
◆ वाहन उद्योग लगभग 3 करोड़ लोगों को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रोज़गार देता है और वस्तु एवं सेवा कर संग्रह में लगभग 15% योगदान करता है; भारत दोपहिया व तिपहिया वाहनों का विश्व में सबसे बड़ा बाज़ार और कुल वाहन बाज़ार में तीसरा सबसे बड़ा है।
◆ चुनौती: एक इलेक्ट्रिक कार में पारंपरिक कार से लगभग 6 गुना अधिक खनिज लगते हैं; भारत लिथियम-आयन बैटरियों का लगभग 75% चीन से आयात करता है और निकेल, कोबाल्ट, लिथियम जैसे महत्वपूर्ण खनिजों के प्रसंस्करण के लगभग 65% पर चीन का नियंत्रण है — इसीलिए राष्ट्रीय महत्वपूर्ण खनिज मिशन (जनवरी 2025) और दुर्लभ-मृदा चुंबक योजना (नवंबर 2025) शुरू हुईं।
योजना | वर्ष | उद्देश्य / विशेषता |
हाइब्रिड व इलेक्ट्रिक वाहनों को तेज़ी से अपनाने व निर्माण की योजना (FAME) | पहला चरण 2015, दूसरा चरण 2019 | इलेक्ट्रिक वाहनों की ख़रीद पर मांग-प्रोत्साहन |
उन्नत रसायन सेल बैटरी भंडारण हेतु उत्पादन आधारित प्रोत्साहन | मई 2021 | 50 गीगावाट-घंटा बैटरी निर्माण क्षमता का लक्ष्य |
वाहन व वाहन-पुर्ज़े हेतु उत्पादन आधारित प्रोत्साहन | सितंबर 2021 | उन्नत वाहन तकनीक का घरेलू निर्माण |
भारत में इलेक्ट्रिक यात्री कार निर्माण प्रोत्साहन योजना | मार्च 2024 | न्यूनतम निवेश पर तैयार कारों के आयात शुल्क में रियायत |
पीएम ई-ड्राइव योजना | सितंबर 2024 | ₹10,900 करोड़ — ई-दोपहिया, ई-तिपहिया, ई-बस, चार्जिंग स्टेशन |
पीएम ई-बस सेवा — भुगतान सुरक्षा तंत्र | अक्टूबर 2024 | सार्वजनिक परिवहन में ई-बसों के संचालकों को भुगतान की गारंटी |
ई-अमृत पोर्टल | — | नीति आयोग व ब्रिटेन के सहयोग से इलेक्ट्रिक वाहन संबंधी जानकारी का एकल मंच |
कर राहत | — | इलेक्ट्रिक वाहनों पर वस्तु एवं सेवा कर 12% से घटाकर 5% |
🔎 तालिका से क्या समझें: इलेक्ट्रिक वाहन योजनाएँ दो तरफ़ से काम करती हैं — माँग पक्ष (ख़रीदार को छूट — फ़ेम, पीएम ई-ड्राइव, जीएसटी 5%) और आपूर्ति पक्ष (कंपनियों को देश में बनाने का प्रोत्साहन — बैटरी और वाहन की उत्पादन योजनाएँ)। सबसे कमज़ोर कड़ी बैटरी है, जिसका कच्चा माल अभी लगभग पूरी तरह आयात होता है।
भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल फ़ोन निर्माता है और इलेक्ट्रॉनिक्स देश का तीसरा सबसे बड़ा निर्यात उत्पाद बन चुका है।
💡 आज की भाषा में — आपका मोबाइल, भारत की कहानी दस साल पहले भारत में बिकने वाले अधिकांश स्मार्टफ़ोन आयात होते थे। आज आपकी जेब का फ़ोन बहुत संभव है कि नोएडा, चेन्नई या बेंगलुरु के पास किसी कारख़ाने में असेंबल हुआ हो — और अगले चरण का लक्ष्य है कि उसके अंदर की चिप भी गुजरात के धोलेरा या सानंद में बने। उत्पादन आधारित प्रोत्साहन "असेंबली" लाया, सेमीकंडक्टर मिशन "दिमाग़" (चिप) लाने की कोशिश है। |
योजना / मिशन | वर्ष | मुख्य बिंदु |
बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण हेतु उत्पादन आधारित प्रोत्साहन | अप्रैल 2020 | मोबाइल फ़ोन व घटक — सबसे सफल प्रोत्साहन योजना |
इलेक्ट्रॉनिक घटक व सेमीकंडक्टर विनिर्माण प्रोत्साहन योजना (SPECS) | अप्रैल 2020 | पूँजीगत व्यय पर 25% वित्तीय प्रोत्साहन |
इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण क्लस्टर 2.0 | 2020 | "प्लग एंड प्ले" अवसंरचना |
आईटी हार्डवेयर हेतु उत्पादन आधारित प्रोत्साहन 2.0 | मई 2023 | लैपटॉप, टैबलेट, सर्वर |
भारत सेमीकंडक्टर मिशन (ISM) | दिसंबर 2021 | ₹76,000 करोड़ (लगभग 10 अरब डॉलर) का सेमीकंडक्टर व डिस्प्ले कार्यक्रम; परियोजना लागत का 50% तक प्रत्यक्ष सहायता; 10 परियोजनाओं में लगभग ₹1.6 लाख करोड़ निवेश; फ़ैब, डिस्प्ले, चिप डिज़ाइन-आधारित प्रोत्साहन व असेंबली-परीक्षण-पैकेजिंग (ATMP/OSAT) इकाइयाँ; सानंद (गुजरात) में चिप असेंबली-परीक्षण, धोलेरा में पहला व्यावसायिक फ़ैब; मोबाइल, वाहन, चिकित्सा उपकरण व आईटी हार्डवेयर के लिए चिप "पिछली कड़ी" (Backward Linkage) का कच्चा माल |
इलेक्ट्रॉनिक्स घटक विनिर्माण योजना (ECMS) | अप्रैल 2025 | प्रारंभिक परिव्यय ₹22,919 करोड़ — बजट 2026-27 में बढ़ाकर ₹40,000 करोड़; कारोबार व पूँजीगत व्यय आधारित प्रोत्साहन |
सेमीकंडक्टर मिशन 2.0 (सेमीकॉन 2.0) | बजट 2026-27 में घोषणा; मंत्रिमंडल स्वीकृति 15 जुलाई 2026 | ₹1,27,500 करोड़ — उपकरण व सामग्री निर्माण, स्वदेशी बौद्धिक संपदा, मज़बूत आपूर्ति शृंखला |
मोबाइल फ़ोन विनिर्माण योजना | 15 जुलाई 2026 | ₹62,500 करोड़ |
![]() चित्र 7: प्रमुख खनिज क्षेत्र और इस्पात संयंत्र — मानचित्र |
🔎 तालिका से क्या समझें: तालिका इलेक्ट्रॉनिक्स की "सीढ़ी" दिखाती है — पहले असेंबली (मोबाइल प्रोत्साहन, 2020), फिर पुर्ज़े (घटक योजना, 2025), और अंत में दिमाग़ यानी चिप (सेमीकंडक्टर मिशन, 2021 और 2026)। जितना ऊपर चढ़ते हैं, उतना निवेश बड़ा और लाभ स्थायी होता है।
◆ मात्रा की दृष्टि से विश्व में तीसरा और मूल्य की दृष्टि से लगभग 14वाँ; वैश्विक जेनेरिक दवाओं की आपूर्ति में मात्रा के आधार पर लगभग 20% हिस्सा; विश्व की शीर्ष 20 जेनेरिक कंपनियों में से 8 भारतीय; पिछले दशक में निर्यात लगभग 7% वार्षिक दर से 191 देशों तक।
◆ प्रयास: बल्क ड्रग (सक्रिय दवा सामग्री व मध्यवर्ती) हेतु उत्पादन आधारित प्रोत्साहन — चीन पर निर्भरता घटाना; बल्क ड्रग पार्क योजना (₹3,000 करोड़ — गुजरात, हिमाचल प्रदेश, आंध्र प्रदेश); फ़ार्मा उद्योग सुदृढ़ीकरण योजना (₹500 करोड़); चिकित्सा उपकरण पार्क प्रोत्साहन योजना (उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश — उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु व मध्य प्रदेश को ₹100-100 करोड़ की सहायता जारी); चिकित्सा उपकरण उद्योग सुदृढ़ीकरण योजना (नवंबर 2024, ₹500 करोड़)।
📘 आसान परिभाषा: जेनेरिक दवा और सक्रिय दवा घटक (Generic Drug & API) |
📚 परिभाषा: जेनेरिक दवा — पेटेंट समाप्त होने के बाद किसी मूल ब्रांडेड दवा के समान रासायनिक संरचना, मात्रा और असर वाली दवा; सक्रिय दवा घटक — दवा का वह मूल रसायन जो बीमारी पर असर करता है (बाकी हिस्सा भराव या आवरण होता है)। |
✅ आसान भाषा में: जेनेरिक = वही असर, कम दाम वाली दवा; सक्रिय घटक = दवा की "जान"। 🏠 उदाहरण: बुख़ार की गोली में असली असर करने वाला रसायन पैरासिटामोल (सक्रिय घटक) है; भारत इन घटकों का बड़ा हिस्सा चीन से मँगाता है, इसीलिए उनके लिए अलग प्रोत्साहन योजना और बल्क ड्रग पार्क बने। |
📊 वस्त्र उद्योग — नवीनतम आँकड़े 1. जीडीपी में लगभग 2.3%, विनिर्माण सकल मूल्य वर्धन में लगभग 11% और कुल निर्यात में लगभग 12% योगदान; लगभग 4.5 करोड़ लोग प्रत्यक्ष रूप से कार्यरत; क्षेत्र में लगभग 80% इकाइयाँ सूक्ष्म-लघु-मध्यम उद्यम। 2. कपास के बुवाई क्षेत्रफल में विश्व में प्रथम; जूट उत्पादन में प्रथम; रेशम व कपास उत्पादन में दूसरा; मानव-निर्मित रेशे, पॉलिएस्टर व विस्कोस में दूसरा। 3. वस्त्र-परिधान निर्यात में विश्व में छठा (लगभग 4% हिस्सा); निर्यात क्रम — तैयार वस्त्र > सूती वस्त्र > मानव-निर्मित वस्त्र > हस्तशिल्प > कालीन > जूट > रेशम; लक्ष्य — 2030 तक लगभग 100 अरब डॉलर का निर्यात। 4. चुनौती — चीन, बांग्लादेश व वियतनाम से कड़ी प्रतिस्पर्धा। |
🔎 सूची से क्या समझें: वस्त्र उद्योग "खेत से विदेश" तक की पूरी कड़ी है — कपास किसान, कताई मिल, बुनकर, दर्ज़ी और निर्यातक। कृषि के बाद सबसे अधिक रोज़गार यहीं है, इसलिए पीएम मित्र पार्क में पूरी कड़ी को एक ही जगह लाने का विचार है, ताकि ढुलाई का ख़र्च घटे और बांग्लादेश-वियतनाम से मुक़ाबला किया जा सके।
◆ पीएम मित्र पार्क (प्रधानमंत्री मेगा एकीकृत वस्त्र क्षेत्र एवं परिधान पार्क): 2021-22 से 2027-28 तक ₹4,445 करोड़ से 7 पार्क — तमिलनाडु (विरुधुनगर), तेलंगाना (वारंगल), गुजरात (नवसारी), कर्नाटक (कलबुर्गी), मध्य प्रदेश (धार), उत्तर प्रदेश (लखनऊ) व महाराष्ट्र (अमरावती); प्रत्येक लगभग 1,000 एकड़; ग्रीनफ़ील्ड पार्क को ₹800 करोड़ व ब्राउनफ़ील्ड को ₹500 करोड़ तक सहायता; प्रति पार्क लगभग 1 लाख प्रत्यक्ष व 2 लाख अप्रत्यक्ष रोज़गार; प्रेरणा — "5एफ़" विज़न: खेत से रेशा, रेशे से कारख़ाना, कारख़ाने से फ़ैशन, फ़ैशन से विदेश (Farm to Fibre to Factory to Fashion to Foreign)।
◆ मानव-निर्मित रेशा व तकनीकी वस्त्र हेतु उत्पादन आधारित प्रोत्साहन; राष्ट्रीय तकनीकी वस्त्र मिशन (बुलेटप्रूफ़ जैकेट, कार एयरबैग, चिकित्सा वस्त्र); बजट 2026-27 — राष्ट्रीय रेशा योजना, वस्त्र विस्तार एवं रोज़गार योजना और राष्ट्रीय हथकरघा एवं हस्तशिल्प कार्यक्रम।
◆ 2023-24 में भारत की लॉजिस्टिक्स लागत जीडीपी का लगभग 7.97% आँकी गई (पहले के 13-14% के अनुमानों से काफ़ी कम); विश्व बैंक के लॉजिस्टिक्स प्रदर्शन सूचकांक 2023 (विषय — "प्रतिस्पर्धा के लिए जुड़ाव") में 139 देशों में भारत 38वें स्थान पर (प्रथम — सिंगापुर)।
◆ प्रयास: पीएम गति शक्ति राष्ट्रीय मास्टर प्लान (अक्टूबर 2021), राष्ट्रीय लॉजिस्टिक्स नीति (सितंबर 2022), एकीकृत लॉजिस्टिक्स इंटरफ़ेस प्लेटफ़ॉर्म, समर्पित माल गलियारे, भारतमाला व सागरमाला, राज्यों की लॉजिस्टिक्स सुगमता रिपोर्ट (वाणिज्य मंत्रालय)।
📘 आसान परिभाषा: लॉजिस्टिक्स लागत (Logistics Cost) |
📚 परिभाषा: किसी वस्तु को कच्चे माल से उपभोक्ता तक पहुँचाने में होने वाला परिवहन, भंडारण, पैकेजिंग, माल-ढुलाई प्रबंधन और काग़ज़ी प्रक्रिया का कुल ख़र्च, जिसे प्रायः जीडीपी के प्रतिशत में मापा जाता है। |
✅ आसान भाषा में: सामान बनाने के बाद उसे "पहुँचाने" का ख़र्च। 🏠 उदाहरण: जोधपुर का हस्तशिल्प मुंबई बंदरगाह तक ट्रक से, फिर जहाज़ से यूरोप जाता है — रास्ते में देरी और ढुलाई जितनी महँगी, उतना ही भारतीय सामान विदेश में महँगा पड़ता है। |
🎯 याद रखें — इस खंड के मुख्य बिंदु 1. भारत — इस्पात, सीमेंट, मोबाइल फ़ोन में दूसरा; कोयला उत्पादन 2024-25 में रिकॉर्ड 1,047 मिलियन टन। 2. भारत सेमीकंडक्टर मिशन (दिसंबर 2021) — ₹76,000 करोड़; सानंद व धोलेरा (गुजरात)। 3. दवा उद्योग — मात्रा में तीसरा, "विश्व की फ़ार्मेसी"; वस्त्र — कृषि के बाद सबसे बड़ा रोज़गारदाता; 7 पीएम मित्र पार्क। 4. लॉजिस्टिक्स प्रदर्शन सूचकांक 2023 — भारत 38वाँ। |
विकास बैंक (Development Financial Institutions) वे विशेष संस्थाएँ हैं जो उद्योग, कृषि, व्यापार व अवसंरचना को दीर्घकालिक पूँजी, जोखिम-युक्त वित्त और संवर्धनात्मक सेवाएँ देती हैं। वाणिज्यिक बैंकों के विपरीत इनका मुख्य उद्देश्य लाभ नहीं, बल्कि राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के अनुरूप क्षेत्र-विशेष का विकास है।
संस्था | स्थापना | मुख्य कार्य |
भारतीय औद्योगिक वित्त निगम (IFCI) | 1 जुलाई 1948 | भारत की पहली विकास वित्तीय संस्था — बड़े उद्योगों को दीर्घकालिक ऋण |
भारतीय औद्योगिक ऋण एवं निवेश निगम (ICICI) | 1955 | निजी क्षेत्र के उद्योगों को वित्त; 2002 में वाणिज्यिक बैंक में विलय |
भारतीय औद्योगिक विकास बैंक (IDBI) | 1 जुलाई 1964 | औद्योगिक वित्त की शीर्ष संस्था रहा; 2004 में वाणिज्यिक बैंक बना |
नाबार्ड | 12 जुलाई 1982 | बी. शिवरामन समिति की सिफ़ारिश; पूर्णतः भारत सरकार के स्वामित्व में; कृषि, ग्रामीण कुटीर उद्योग व ग्रामीण अवसंरचना — राज्य सहकारी बैंकों व क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों को पुनर्वित्त; ग्रामीण अवसंरचना विकास निधि; स्वयं सहायता समूह-बैंक संपर्क व किसान क्रेडिट कार्ड का नेतृत्व |
भारतीय निर्यात-आयात बैंक (EXIM) | 1 जनवरी 1982 | निर्यात-उन्मुख इकाइयों को ऋण, ख़रीदार ऋण, मित्र देशों को ऋण-रेखा (Line of Credit), परियोजना निर्यात; जोखिम प्रबंधन, बाज़ार अनुसंधान व परामर्श |
राष्ट्रीय आवास बैंक | 9 जुलाई 1988 | आवास वित्त कंपनियों का पुनर्वित्त व पर्यवेक्षण |
भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक (SIDBI) | 2 अप्रैल 1990 | सूक्ष्म-लघु-मध्यम उद्यमों की शीर्ष वित्तीय संस्था — बैंकों, गैर-बैंकिंग वित्त कंपनियों व राज्य वित्त निगमों को पुनर्वित्त, प्रत्यक्ष ऋण, स्टार्टअप कोष-के-कोष का प्रबंधन, मुद्रा समन्वय व वित्तीय साक्षरता |
मुद्रा (सूक्ष्म इकाई विकास एवं पुनर्वित्त एजेंसी) | 8 अप्रैल 2015 | गैर-कॉरपोरेट सूक्ष्म उद्यमों को ऋण — शिशु, किशोर, तरुण व तरुण-प्लस श्रेणियाँ |
राष्ट्रीय अवसंरचना वित्तपोषण एवं विकास बैंक (NaBFID) | 2021 (अधिनियम) | राष्ट्रीय अवसंरचना पाइपलाइन को गति; परिवहन, ऊर्जा, शहरी विकास जैसी 15-30 वर्ष की परियोजनाओं का वित्त; कॉरपोरेट बॉन्ड बाज़ार का विकास व संप्रभु धन कोष-पेंशन कोषों को आकर्षित करना; बैंकों की परिसंपत्ति-देयता असंतुलन समस्या का समाधान |
🔎 तालिका से क्या समझें: तालिका भारत के औद्योगिक वित्त का इतिहास है — 1948-64 में बड़े उद्योगों के लिए (औद्योगिक वित्त निगम, ऋण एवं निवेश निगम, औद्योगिक विकास बैंक), 1982-90 में क्षेत्र-विशेष के लिए (नाबार्ड, निर्यात-आयात बैंक, लघु उद्योग विकास बैंक), और 2021 में फिर से अवसंरचना के लिए। बीच में (2002-04) पुरानी संस्थाएँ वाणिज्यिक बैंक बन गई थीं, जिससे लंबी अवधि के ऋण की कमी पैदा हुई।
📘 आसान परिभाषा: परिसंपत्ति-देयता असंतुलन (Asset-Liability Mismatch) |
📚 परिभाषा: जब किसी बैंक की देनदारियाँ (जमा) कम अवधि की हों, पर उसकी परिसंपत्तियाँ (दिए गए ऋण) बहुत लंबी अवधि की हों — जिससे जमाकर्ता पैसा माँगें तो बैंक के पास तुरंत लौटाने को धन न हो। |
✅ आसान भाषा में: पैसा 1-3 साल के लिए लिया, पर 20-25 साल के लिए उधार दे दिया। 🏠 उदाहरण: बैंक के पास लोगों की 3 साल की सावधि जमा है, पर उसने 25 साल की सड़क परियोजना को ऋण दे दिया — इसी समस्या से बचने के लिए अलग अवसंरचना वित्तपोषण बैंक बनाया गया। |
आधार | लघु उद्योग विकास बैंक | नाबार्ड | निर्यात-आयात बैंक | अवसंरचना वित्तपोषण बैंक |
स्थापना | 1990 | 1982 | 1982 | 2021 |
वित्त की प्रकृति | मुख्यतः पुनर्वित्त, कुछ प्रत्यक्ष ऋण व उद्यम पूँजी | पुनर्वित्त व ग्रामीण अवसंरचना निधि से राज्यों को ऋण | प्रत्यक्ष विदेश-व्यापार ऋण, ख़रीदार साख, ऋण-रेखा | प्रत्यक्ष दीर्घकालिक ऋण, पुनर्वित्त, बॉन्ड हामीदारी |
पूँजी स्रोत | बजटीय सहायता, बॉन्ड, विश्व बैंक-एशियाई विकास बैंक | भारत सरकार, ग्रामीण अवसंरचना निधि अंशदान, बाज़ार उधारी | भारत सरकार की शेयर पूँजी, घरेलू-विदेशी बॉन्ड | केंद्र की इक्विटी, बहुपक्षीय संस्थाएँ, बॉन्ड बाज़ार |
प्रमुख प्रभाव | रोज़गार, उद्यमिता, नवाचार | ग्रामीण आजीविका, खाद्य सुरक्षा, वित्तीय समावेशन | निर्यात प्रतिस्पर्धा, व्यापार घाटे में कमी | दीर्घकालिक अवसंरचना व विकास दर |
🔎 तालिका से क्या समझें: चारों संस्थाओं का "ग्राहक" अलग है — लघु उद्योग विकास बैंक छोटे उद्यमों के लिए, नाबार्ड गाँव और खेती के लिए, निर्यात-आयात बैंक विदेश-व्यापार के लिए और अवसंरचना वित्तपोषण बैंक सड़क-बिजली जैसी बड़ी परियोजनाओं के लिए। चारों वाणिज्यिक बैंकों से इस मायने में अलग हैं कि इनका पहला लक्ष्य लाभ नहीं, विकास है।
◆ विनियमन: निर्यात-आयात बैंक, नाबार्ड, राष्ट्रीय आवास बैंक, लघु उद्योग विकास बैंक व अवसंरचना वित्तपोषण बैंक — ये पाँचों रिज़र्व बैंक द्वारा अखिल भारतीय वित्तीय संस्थाओं (AIFI) के रूप में विनियमित हैं।
⚠️ ध्यान दें नाबार्ड और निर्यात-आयात बैंक — दोनों की स्थापना 1982 में हुई, जबकि लघु उद्योग विकास बैंक 1990 में बना। शुरू में लघु उद्योग विकास बैंक भारतीय औद्योगिक विकास बैंक की सहायक संस्था था। |
🎯 याद रखें — इस खंड के मुख्य बिंदु 1. पहली विकास वित्तीय संस्था — भारतीय औद्योगिक वित्त निगम (1 जुलाई 1948)। 2. नाबार्ड और निर्यात-आयात बैंक — दोनों 1982; लघु उद्योग विकास बैंक — 2 अप्रैल 1990। 3. मुद्रा — 8 अप्रैल 2015; अवसंरचना वित्तपोषण बैंक — 2021। |
📘 आसान परिभाषा: सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम |
📚 परिभाषा: सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम विकास अधिनियम, 2006 (2 अक्टूबर 2006 से लागू) के तहत विनिर्माण व सेवा उद्यमों को संयंत्र-मशीनरी/उपकरण में निवेश और वार्षिक कारोबार (Turnover) की सीमा के आधार पर सूक्ष्म, लघु व मध्यम श्रेणियों में बाँटा जाता है। |
✅ आसान भाषा में: छोटी, मँझोली और मध्यम आकार की फ़ैक्ट्रियों-दुकानों को उनके निवेश और सालाना बिक्री के हिसाब से तीन श्रेणियों में रखना, ताकि सरकार हर श्रेणी को सही मदद (सस्ता ऋण, कर-छूट, सरकारी ख़रीद) दे सके। 🏠 उदाहरण: जैसे स्कूल में कक्षा के हिसाब से अलग-अलग छात्रवृत्ति — मोहल्ले की छोटी सिलाई दुकान "सूक्ष्म" कक्षा में है, और शहर की मध्यम आकार की वाहन-पुर्ज़ा फ़ैक्ट्री "मध्यम" कक्षा में। |
श्रेणी | 2020 — निवेश / कारोबार | 2025 (1 अप्रैल से) — निवेश / कारोबार | वृद्धि |
सूक्ष्म | ₹1 करोड़ / ₹5 करोड़ | ₹2.5 करोड़ / ₹10 करोड़ | निवेश 2.5 गुना, कारोबार 2 गुना |
लघु | ₹10 करोड़ / ₹50 करोड़ | ₹25 करोड़ / ₹100 करोड़ | निवेश 2.5 गुना, कारोबार 2 गुना |
मध्यम | ₹50 करोड़ / ₹250 करोड़ | ₹125 करोड़ / ₹500 करोड़ | निवेश 2.5 गुना, कारोबार 2 गुना |
🔎 तालिका से क्या समझें: 2025 में सीमाएँ निवेश में ढाई गुना और कारोबार में दोगुनी की गईं। इसका सीधा अर्थ — जो इकाई कल तक "मध्यम" से बाहर होकर लाभ खो देती, वह अब भी उद्यम श्रेणी में रहकर सस्ता ऋण और सरकारी ख़रीद का लाभ ले सकती है। यह "बौनेपन" की समस्या का इलाज है, ताकि उद्यम बढ़ने से न डरें।
![]() चित्र 8: सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों के वर्गीकरण की यात्रा — 2006, 2020 व 2025 |
📘 आसान परिभाषा: औपचारिकीकरण (Formalisation) |
📚 परिभाषा: अनौपचारिक (अपंजीकृत, बिना हिसाब-किताब वाली) आर्थिक इकाइयों और रोज़गार को सरकारी पंजीकरण, कर-प्रणाली, बैंकिंग और सामाजिक सुरक्षा के दायरे में लाने की प्रक्रिया। |
✅ आसान भाषा में: काम को "काग़ज़ पर" लाना — पंजीकरण, खाता, बिल और बीमा के साथ। 🏠 उदाहरण: गली की नमकीन बनाने वाली इकाई उद्यम पोर्टल पर पंजीकरण कराती है, जीएसटी नंबर लेती है और मज़दूरों का बीमा कराती है — अब उसे बैंक ऋण और सरकारी ख़रीद का लाभ मिल सकता है। |
◆ 2006 की व्यवस्था: केवल निवेश-आधारित; विनिर्माण व सेवा के लिए अलग-अलग सीमाएँ — सूक्ष्म: विनिर्माण ₹25 लाख, सेवा ₹10 लाख तक; लघु: विनिर्माण ₹25 लाख-₹5 करोड़, सेवा ₹10 लाख-₹2 करोड़; मध्यम: विनिर्माण ₹5-10 करोड़, सेवा ₹2-5 करोड़।
◆ 2020 का संशोधन (आत्मनिर्भर भारत पैकेज; 1 जुलाई 2020 से): विनिर्माण-सेवा का भेद समाप्त; निवेश + कारोबार का संयुक्त मापदंड; निर्यात से आय कारोबार की गणना से बाहर — ताकि निर्यात बढ़ाने पर श्रेणी न बदले।
◆ 2025 का संशोधन: बजट 2025-26 की घोषणा; 21 मार्च 2025 को अधिसूचित, 1 अप्रैल 2025 से प्रभावी — ताकि उद्यम बड़ा होने पर भी लाभ से वंचित न हो, बड़े पैमाने, बेहतर ऋण व बाज़ार विस्तार को बढ़ावा मिले।
◆ 1 जुलाई 2020 से निःशुल्क, काग़ज़-रहित, स्व-घोषणा आधारित ऑनलाइन पंजीकरण; आयकर व वस्तु एवं सेवा कर डेटाबेस से स्वतः सत्यापन; लगभग 37 अन्य पोर्टलों से अनुप्रयोग प्रोग्रामिंग इंटरफ़ेस (API) द्वारा जुड़ा — नीति-निर्माण हेतु पारदर्शी एकीकृत डेटाबेस।
◆ उद्यम पोर्टल पर 3.80 करोड़ से अधिक इकाइयाँ; अनौपचारिक सूक्ष्म उद्यमों के लिए उद्यम सहायता मंच (जनवरी 2023) को मिलाकर कुल पंजीकरण 6.5 करोड़ से अधिक; देश में कुल सूक्ष्म-लघु-मध्यम उद्यम लगभग 7.47 करोड़।
◆ लाभ: प्राथमिकता-प्राप्त क्षेत्र ऋण, ऋण गारंटी, सरकारी ख़रीद में आरक्षण (कुल ख़रीद का 25% सूक्ष्म-लघु उद्यमों से — जिसमें 4% अनुसूचित जाति-जनजाति व 3% महिला उद्यमियों से), विलंबित भुगतान से सुरक्षा, मुद्रा ऋण व प्रौद्योगिकी उन्नयन अनुदान तक सीधी पहुँच, औपचारिक अर्थव्यवस्था में प्रवेश।
📊 सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों का आर्थिक योगदान — नवीनतम आँकड़े 1. सकल मूल्य वर्धन / जीडीपी में लगभग 30-31% योगदान। 2. कुल विनिर्माण उत्पादन में लगभग 35.4% हिस्सा। 3. कुल निर्यात में हिस्सा — 2023-24 में लगभग 45.7%, 2024-25 में लगभग 48.58%; निर्यात मूल्य ₹3.95 लाख करोड़ (2020-21) से बढ़कर ₹12.39 लाख करोड़ (2024-25) — लगभग 3 गुना। 4. लगभग 32 करोड़ से अधिक लोगों को रोज़गार — कृषि के बाद दूसरा सबसे बड़ा रोज़गारदाता; समान उत्पादन के लिए बड़े उद्यमों की तुलना में लगभग 4 गुना अधिक श्रमिक — यानी अत्यंत श्रम-गहन। 5. ग्रामीण व अर्ध-शहरी क्षेत्रों में उद्योगों का विकेंद्रीकरण, क्षेत्रीय असमानता में कमी और महिला उद्यमिता को बढ़ावा। |
🔎 सूची से क्या समझें: लघु-मध्यम उद्यम देश के निर्यात का लगभग आधा और विनिर्माण का एक-तिहाई देते हैं, पर उनकी सबसे बड़ी ताक़त रोज़गार है — समान उत्पादन के लिए बड़े उद्योगों से लगभग चार गुना अधिक लोग। इसीलिए बेरोज़गारी का सबसे व्यावहारिक इलाज इन्हीं उद्यमों को मज़बूत करना माना जाता है।
🎯 याद रखें — इस खंड के मुख्य बिंदु 1. सूक्ष्म-लघु-मध्यम उद्यम विकास अधिनियम — 2006; 2020 से निवेश + कारोबार का संयुक्त मापदंड। 2. 2025 की सीमाएँ — सूक्ष्म ₹2.5 करोड़ / ₹10 करोड़, लघु ₹25 / ₹100 करोड़, मध्यम ₹125 / ₹500 करोड़। 3. उद्यम पोर्टल — 1 जुलाई 2020; निर्यात आय कारोबार की गणना से बाहर। 4. योगदान — जीडीपी ~30%, निर्यात ~45-48%, कृषि के बाद दूसरा सबसे बड़ा रोज़गारदाता। |
योजना | मुख्य बिंदु |
सूक्ष्म एवं लघु उद्यम ऋण गारंटी निधि न्यास (CGTMSE) | 2000 में सूक्ष्म-लघु-मध्यम उद्यम मंत्रालय व लघु उद्योग विकास बैंक द्वारा स्थापित; बिना गिरवी ऋण की गारंटी; बजट 2025-26 में सीमा ₹5 करोड़ से बढ़ाकर ₹10 करोड़ (1 अप्रैल 2025 से) — अगले 5 वर्षों में ₹1.5 लाख करोड़ अतिरिक्त ऋण; ₹9,000 करोड़ के अतिरिक्त कोष से ₹2 लाख करोड़ का अतिरिक्त ऋण संभव; महिला-उद्यमों को 90% तक गारंटी |
अनुकूलित क्रेडिट कार्ड | उद्यम पर पंजीकृत सूक्ष्म उद्यमों को ₹5 लाख सीमा का क्रेडिट कार्ड — पहले वर्ष 10 लाख कार्ड का लक्ष्य |
स्टार्टअप ऋण गारंटी | गारंटी कवर ₹10 करोड़ से बढ़ाकर ₹20 करोड़; 27 प्राथमिक क्षेत्रों में गारंटी शुल्क घटाकर 1% |
आपातकालीन क्रेडिट लाइन गारंटी योजना (ECLGS) | मई 2020 से मार्च 2023 (कई चरणों में विस्तार) — कोविड काल में बिना गिरवी अतिरिक्त कार्यशील पूँजी; सूक्ष्म-लघु-मध्यम उद्यमों को 100% सरकारी गारंटी |
आत्मनिर्भर भारत कोष (SRI Fund) | सक्षम सूक्ष्म-लघु-मध्यम उद्यमों में ₹50,000 करोड़ का इक्विटी निवेश |
प्रधानमंत्री रोज़गार सृजन कार्यक्रम (PMEGP) | 2008 से; नए सूक्ष्म उद्यमों को मार्जिन मनी अनुदान — 2023-24 में 89,118 इकाइयाँ, ₹3,093.87 करोड़ अनुदान, 7.13 लाख रोज़गार |
व्यापार प्राप्य बट्टाकरण प्रणाली (TReDS) | बिलों को तुरंत नकदी में बदलने का ऑनलाइन मंच; बड़ी कंपनियों व सार्वजनिक उपक्रमों के अनिवार्य पंजीकरण की कारोबार-सीमा ₹500 करोड़ से घटाकर ₹250 करोड़; सार्वजनिक उपक्रमों की ख़रीद में इसका उपयोग अनिवार्य |
सूक्ष्म-लघु-मध्यम उद्यम वृद्धि कोष | बजट 2026-27 — ₹10,000 करोड़, भविष्य के रोज़गार सृजक उद्यमों को चुनिंदा मानदंडों पर प्रोत्साहन |
रैम्प योजना (RAMP) | विश्व बैंक समर्थित; यू.के. सिन्हा समिति की सिफ़ारिश — बाज़ार व ऋण तक पहुँच, कोविड के बाद पुनरुद्धार |
पीएम विश्वकर्मा | 17 सितंबर 2023 — 18 पारंपरिक व्यवसायों के कारीगरों को प्रशिक्षण, टूलकिट व सस्ता ऋण |
45 दिन में भुगतान नियम | आयकर अधिनियम की धारा 43बी(ज) (वित्त अधिनियम 2023; वित्त वर्ष 2023-24 से) — सूक्ष्म-लघु उद्यमों को 45 दिन में भुगतान न करने पर ख़रीदार को कर-कटौती का लाभ नहीं |
📘 आसान परिभाषा: संपार्श्विक / गिरवी (Collateral) |
📚 परिभाषा: ऋण के बदले उधारकर्ता द्वारा बैंक के पास सुरक्षा के रूप में रखी गई संपत्ति (ज़मीन, मकान, सोना, मशीन), जिसे ऋण न चुकाने पर बैंक बेचकर अपनी राशि वसूल सकता है। |
✅ आसान भाषा में: कर्ज़ के बदले "गारंटी के तौर पर रखी चीज़"। 🏠 उदाहरण: छोटे उद्यमी के पास गिरवी रखने को ज़मीन नहीं — इसलिए ऋण गारंटी न्यास बैंक को भरोसा देता है कि ऋण डूबा तो उसका बड़ा हिस्सा न्यास चुकाएगा; इसी से बिना गिरवी ऋण संभव होता है। |
🔎 तालिका से क्या समझें: इन योजनाओं के तीन लक्ष्य हैं — (1) बिना गिरवी ऋण (ऋण गारंटी न्यास, क्रेडिट कार्ड); (2) इक्विटी यानी हिस्सेदारी पूँजी (आत्मनिर्भर भारत कोष, वृद्धि कोष); (3) समय पर भुगतान (बिल बट्टाकरण मंच, 45 दिन का नियम)। छोटे उद्यम की तीनों मुख्य बीमारियाँ — ऋण नहीं, पूँजी नहीं, भुगतान देर से — इन्हीं से ठीक करने की कोशिश है।
📘 आसान परिभाषा: व्यापार प्राप्य बट्टाकरण प्रणाली (Trade Receivables Discounting System — TReDS) |
📚 परिभाषा: एक ऑनलाइन मंच जहाँ लघु-मध्यम उद्यम बड़ी कंपनियों या सरकारी उपक्रमों पर अपने बकाया बिल (प्राप्य) अपलोड करते हैं और बैंक-वित्त कंपनियाँ थोड़ी कटौती (बट्टा) लेकर उन्हें तुरंत भुगतान कर देती हैं; बाद में बड़ी कंपनी बैंक को पूरी राशि चुकाती है। |
✅ आसान भाषा में: उधार के बिल को "आज की नकदी" में बदलना। 🏠 उदाहरण: एक छोटी इकाई ने किसी बड़ी कार कंपनी को ₹10 लाख के पुर्ज़े दिए, भुगतान 90 दिन बाद मिलना है — मंच पर बिल डालते ही बैंक ₹9.8 लाख आज दे देता है और कंपनी 90 दिन बाद बैंक को ₹10 लाख चुकाती है। |
पोर्टल / पहल | उद्देश्य |
समाधान | विलंबित भुगतान के विरुद्ध शिकायत (अधिनियम, 2006 के तहत); ऑनलाइन विवाद समाधान — 24×7 बहुभाषी सुविधा |
संबंध | सार्वजनिक उपक्रमों द्वारा सूक्ष्म-लघु उद्यमों से की गई ख़रीद की निगरानी |
चैंपियंस | सूचना-संचार तकनीक आधारित शिकायत निवारण व सहायता मंच |
उद्यम | निवेश व कारोबार के आधार पर वर्गीकरण व काग़ज़-रहित पंजीकरण |
डिजिटल वाणिज्य के लिए खुला नेटवर्क (ONDC) | ई-कॉमर्स का लोकतंत्रीकरण — छोटे विक्रेताओं की पहुँच |
व्यापार सक्षमता एवं विपणन योजना (TEAM) | 5 लाख सूक्ष्म-लघु उद्यमों का डिजिटलीकरण |
चुनौती | विवरण |
औपचारिकीकरण अंतराल | बड़ी संख्या में सूक्ष्म उद्यम अब भी अनौपचारिक — पंजीकरण व लाभ से वंचित |
वित्त तक सीमित पहुँच | गिरवी (Collateral) के अभाव में बैंक ऋण कठिन; साहूकारों पर निर्भरता |
विलंबित भुगतान | बड़ी कंपनियों व सरकारी विभागों से देर से भुगतान — कार्यशील पूँजी का संकट |
तकनीकी पिछड़ापन | आधुनिक तकनीक, डिजिटलीकरण व अनुसंधान में कम निवेश — लागत अधिक, गुणवत्ता कम |
कुशल श्रम की कमी | बदलती ज़रूरतों व स्वचालन के अनुरूप प्रशिक्षित कामगार नहीं |
अवसंरचना बाधाएँ | बिजली, सड़क, भंडारण की कमी |
जटिल अनुपालन | वस्तु एवं सेवा कर, श्रम व पर्यावरण नियमों की लागत व जटिलता |
वैश्विक प्रतिस्पर्धा | सस्ते विदेशी आयात व आपूर्ति-शृंखला के उतार-चढ़ाव |
🔎 तालिका से क्या समझें: आठ चुनौतियों में सबसे जड़ वाली है वित्त तक पहुँच — गिरवी नहीं, तो ऋण नहीं; ऋण नहीं, तो नई तकनीक नहीं; तकनीक नहीं, तो गुणवत्ता कम और विदेशी माल से हार। विलंबित भुगतान इस चक्र को और कसता है, क्योंकि छोटे उद्यम की कार्यशील पूँजी बड़े ग्राहकों के पास अटकी रहती है।
📘 आसान परिभाषा: बौनापन (Dwarfism) की समस्या |
📚 परिभाषा: सरकार छोटे उद्यमों को श्रम कानूनों में छूट, सस्ता ऋण व गारंटी जैसे प्रोत्साहन देती है ताकि वे बढ़कर बड़े बनें; पर कई बार ये "विकृत प्रोत्साहन" (Perverse Incentives) बन जाते हैं — उद्यम जान-बूझकर छोटे बने रहते हैं ताकि रियायतें न छिनें। ऐसे बौने उद्यम विनिर्माण की आधी से अधिक इकाइयाँ हैं, पर रोज़गार में उनका योगदान केवल लगभग 14% है। |
✅ आसान भाषा में: छूट खोने के डर से व्यापार न बढ़ाना। 🏠 उदाहरण: जैसे कोई छात्र छात्रवृत्ति की आय-सीमा पार न हो, इसलिए परिवार की दुकान की बिक्री ही न बढ़ाए — छोटी बचत के लिए बड़ा अवसर गँवा देना। 2025 में सीमाएँ ढाई गुना बढ़ाना इसी समस्या का एक समाधान है। |
🐪 राजस्थान की भाषा में — सांगानेर की छपाई इकाई जयपुर के सांगानेर में हाथ-ठप्पा छपाई करने वाली एक सूक्ष्म इकाई उद्यम पोर्टल पर पंजीकरण कराती है, ऋण गारंटी से बिना गिरवी ऋण लेकर नई मशीन लगाती है, सरकारी ई-मार्केटप्लेस पर बिक्री करती है और 45 दिन के भुगतान नियम से उसका पैसा समय पर आता है। निर्यात बढ़ने पर भी निर्यात-आय कारोबार में न गिने जाने से उसकी श्रेणी नहीं बदलती — यही है लघु उद्यम नीति का ज़मीनी रूप। |
🎯 याद रखें — इस खंड के मुख्य बिंदु 1. ऋण गारंटी न्यास — 2000; सीमा अब ₹10 करोड़ तक। 2. सरकारी ख़रीद का 25% सूक्ष्म-लघु उद्यमों से (4% अनुसूचित जाति-जनजाति, 3% महिला)। 3. 45 दिन में भुगतान का नियम — आयकर अधिनियम की धारा 43बी(ज)। 4. पीएम विश्वकर्मा — 17 सितंबर 2023, 18 पारंपरिक व्यवसाय; बौनापन — छूट के डर से छोटा बने रहना। |
💡 क्या आप जानते हैं? 30 अगस्त को भारत में राष्ट्रीय लघु उद्योग दिवस मनाया जाता है। |
📘 आसान परिभाषा: मेक इन इंडिया (Make in India) |
📚 परिभाषा: 25 सितंबर 2014 को वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय (उद्योग संवर्धन एवं आंतरिक व्यापार विभाग) के नेतृत्व में शुरू अभियान, जिसका उद्देश्य भारत को विनिर्माण, डिज़ाइन व नवाचार का वैश्विक केंद्र बनाना, निवेश आकर्षित करना और रोज़गार सृजित करना है। प्रतीक चिह्न — चलता हुआ शेर। |
✅ आसान भाषा में: दुनिया की कंपनियों से कहना — "सामान बाहर से मँगाने के बजाय भारत में बनाओ"। 🏠 उदाहरण: जैसे कोई दुकानदार कहे "यहीं बनाओ, यहीं बेचो" — आज आई-फ़ोन का बड़ा हिस्सा भारत में असेंबल होकर निर्यात हो रहा है। |
पहलू | विवरण |
चार स्तंभ | नई प्रक्रियाएँ (व्यापार सुगमता), नई अवसंरचना (औद्योगिक गलियारे, स्मार्ट शहर), नए क्षेत्र (रक्षा, रेलवे, बीमा में विदेशी निवेश), नई सोच (सरकार "सुविधा-प्रदाता") |
मूल लक्ष्य | बौद्धिक संपदा संरक्षण, अनुसंधान-विकास व कौशल उन्नयन; विनिर्माण वृद्धि दर 12-14% वार्षिक; 2022 तक 10 करोड़ अतिरिक्त रोज़गार; विनिर्माण का जीडीपी हिस्सा 2022 तक 25% (बाद में समय-सीमा 2025) |
मेक इन इंडिया 2.0 (2022) | 27 क्षेत्र — 15 विनिर्माण (उद्योग संवर्धन एवं आंतरिक व्यापार विभाग) + 12 सेवा (वाणिज्य विभाग) |
वास्तविक स्थिति | विनिर्माण का हिस्सा 2013-14 के लगभग 16.7% से 2023-24 में लगभग 15.9% — दशक भर में लगभग स्थिर |
उपलब्धियाँ | रिकॉर्ड विदेशी निवेश; भारत दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल निर्माता; रक्षा स्वदेशीकरण व निर्यात में उछाल; सौर मॉड्यूल व इलेक्ट्रिक वाहन निर्माण में प्रगति |
कमी के कारण | भूमि अधिग्रहण व श्रम कानूनों की जटिलता; अनुबंध प्रवर्तन में देरी; ऊँची लॉजिस्टिक्स लागत (पुराने अनुमानों में GDP का 13-14%, वैश्विक औसत लगभग 8%); अनुसंधान-विकास पर जीडीपी का 0.7% से कम व्यय; इलेक्ट्रॉनिक घटकों व कच्चे माल की आयात-निर्भरता; वैश्विक मंदी, आपूर्ति-शृंखला व्यवधान और कोविड-19 |
🔎 तालिका से क्या समझें: मेक इन इंडिया के "इरादे" और "नतीजे" में अंतर साफ़ दिखता है — मोबाइल, रक्षा और सौर जैसे क्षेत्रों में बड़ी सफलता, पर पूरी अर्थव्यवस्था में विनिर्माण का हिस्सा लगभग स्थिर (16-17%)। कारण नीचे की पंक्ति में हैं — ज़मीन, श्रम क़ानून, ढुलाई लागत और अनुसंधान पर कम ख़र्च।
📖 पीछे की कहानी — आईफ़ोन का भारत आना — एक छोटी शुरुआत 2017 में बेंगलुरु के पास एक ताइवानी कंपनी के कारख़ाने में आईफ़ोन का एक पुराना मॉडल जोड़ा (असेंबल) जाना शुरू हुआ — शुरुआत में बहुत छोटे पैमाने पर। 2020 की उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना के बाद चेन्नई और बेंगलुरु में बड़े कारख़ाने लगे, और कुछ ही वर्षों में भारत आईफ़ोन का एक बड़ा उत्पादन व निर्यात केंद्र बन गया; एक भारतीय औद्योगिक समूह भी इनका निर्माता बना। यह कहानी दिखाती है कि सही प्रोत्साहन और "चीन+1" का मौक़ा मिलें, तो भारत वैश्विक मूल्य-शृंखला में जगह बना सकता है। |
⚠️ ध्यान दें विनिर्माण हिस्सेदारी के तीन अलग-अलग लक्ष्य अक्सर गड्डमड्ड होते हैं — (1) राष्ट्रीय विनिर्माण नीति 2011 व मेक इन इंडिया: 25% (पहले 2022, फिर 2025 तक); (2) नीति आयोग का विनिर्माण रोडमैप (29 अक्टूबर 2025): 2035 तक 25% से अधिक और 10 करोड़ से अधिक रोज़गार; (3) दीर्घकालिक दृष्टि: "विकसित भारत 2047"। विनिर्माण हिस्सेदारी का आँकड़ा "सकल मूल्य वर्धन" और "सकल घरेलू उत्पाद" के आधार पर थोड़ा अलग आता है — इसलिए 15-17% की सीमा में अलग-अलग संख्याएँ दिखती हैं। |
मेक इन इंडिया के अधूरे लक्ष्यों को नई गति देने के लिए 1 फ़रवरी 2025 के बजट में छोटे, मझोले व बड़े — तीनों प्रकार के उद्योगों को कवर करने वाला राष्ट्रीय विनिर्माण मिशन घोषित हुआ। इसके पाँच केंद्र-बिंदु हैं:
![]() चित्र 9: मेक इन इंडिया के चार स्तंभ |
![]() चित्र 10: उत्पादन से जुड़ा प्रोत्साहन — 14 क्षेत्र |
![]() चित्र 11: श्रम सुधार — 29 क़ानूनों से 4 संहिताएँ |
(क) व्यापार करने की सुगमता एवं लागत में सुधार।
(ख) भविष्य के लिए तैयार कार्यबल — नई माँग वाली नौकरियों हेतु कौशल।
(ग) जीवंत व गतिशील सूक्ष्म-लघु-मध्यम उद्यम क्षेत्र।
(घ) तकनीक की उपलब्धता।
(ङ) गुणवत्तापूर्ण उत्पाद।
◆ सहायक आधार: नवाचार व अनुसंधान-विकास, अवसंरचना व लॉजिस्टिक्स सुधार से लागत में कमी; नीति आयोग के आकलन में 2035 तक विनिर्माण हिस्सा लगभग दोगुना कर 25% और वैश्विक मूल्य-शृंखलाओं से जुड़कर वस्तु निर्यात लगभग 1.2 ट्रिलियन डॉलर तक ले जाने की आकांक्षा।
◆ पुरानी राष्ट्रीय विनिर्माण नीति (2011) के घटक: राष्ट्रीय निवेश एवं विनिर्माण क्षेत्र, प्रौद्योगिकी अधिग्रहण एवं विकास कोष (TADF) से स्वच्छ-हरित तकनीक, लघु उद्यमों को वित्त-तकनीक सहायता, श्रम-पर्यावरण नियमों का युक्तिकरण; लक्ष्य — 25% हिस्सा व 10 करोड़ रोज़गार।
◆ स्वच्छ-तकनीक विनिर्माण पर बल: सौर फ़ोटोवोल्टिक सेल, इलेक्ट्रिक वाहन बैटरी, मोटर व नियंत्रक, इलेक्ट्रोलाइज़र, पवन टरबाइन, अति-उच्च वोल्टेज पारेषण उपकरण, ग्रिड-स्तरीय बैटरी।
◆ जूता-चमड़ा क्षेत्र हेतु "फ़ोकस उत्पाद योजना": लक्ष्य — 22 लाख रोज़गार, ₹4 लाख करोड़ कारोबार, ₹1.1 लाख करोड़ से अधिक निर्यात।
◆ विनिर्माण के तीन वर्ग (दृष्टिकोण): (1) पैमाना (Scale) — वाहन, दवा जैसे बड़े उद्योग; (2) सुधार एवं रूपांतरण (Fix and Transform) — इलेक्ट्रॉनिक्स, पूँजीगत वस्तुएँ; (3) बीज / उदीयमान (Seed) — सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रिक वाहन जैसी भविष्य की तकनीकें।
📘 आसान परिभाषा: उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना (Production Linked Incentive) |
📚 परिभाषा: "आत्मनिर्भर भारत" दृष्टि के तहत शुरू योजना, जिसमें देश में निर्मित वस्तुओं की आधार-वर्ष की तुलना में अतिरिक्त (वृद्धिशील) बिक्री पर निश्चित अवधि के लिए लगभग 4-6% (क्षेत्र के अनुसार अलग) नकद प्रोत्साहन मिलता है — बशर्ते न्यूनतम निवेश व बिक्री की सीमा पूरी हो। यह घरेलू व विदेशी दोनों कंपनियों के लिए खुली है। |
✅ आसान भाषा में: "जितना ज़्यादा भारत में बनाओगे और बेचोगे, उतना ज़्यादा प्रोत्साहन पाओगे।" 🏠 उदाहरण: जैसे दुकान की योजना — "पिछले साल से जितनी ज़्यादा ख़रीद, उस पर उतना कैशबैक"। |
बिंदु | विवरण |
शुरुआत | मार्च 2020 (मोबाइल-इलेक्ट्रॉनिक्स, दवा सामग्री, चिकित्सा उपकरण); नवंबर 2020 में विस्तार — कुल 14 क्षेत्र |
कुल परिव्यय | लगभग ₹1.97 लाख करोड़ |
14 क्षेत्र | (1) बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रॉनिक्स (मोबाइल) (2) महत्वपूर्ण दवा सामग्री व सक्रिय दवा घटक (3) चिकित्सा उपकरण (4) वाहन व पुर्ज़े (5) दवाइयाँ (6) विशेष इस्पात (7) दूरसंचार व नेटवर्किंग (8) इलेक्ट्रॉनिक / आईटी हार्डवेयर (9) श्वेत वस्तुएँ — एसी व एलईडी (10) खाद्य उत्पाद (11) वस्त्र — मानव-निर्मित रेशा व तकनीकी वस्त्र (12) उच्च-दक्षता सौर मॉड्यूल (13) उन्नत रसायन सेल बैटरी (14) ड्रोन व पुर्ज़े |
सबसे सफल क्षेत्र | इलेक्ट्रॉनिक्स (मोबाइल — फ़ॉक्सकॉन, पेगाट्रॉन, सैमसंग जैसी कंपनियाँ); दवा (सक्रिय दवा घटक व प्रमुख प्रारंभिक सामग्री); खाद्य प्रसंस्करण (रेडी-टू-ईट, मोटे अनाज उत्पाद, समुद्री उत्पाद — ग्रामीण-अर्धशहरी रोज़गार); दूरसंचार (राउटर, स्विच, 5जी उपकरण); चिकित्सा उपकरण (सीटी स्कैन, एमआरआई, कैंसर जाँच उपकरण) |
प्रभाव | इलेक्ट्रॉनिक्स में सृजित प्रत्यक्ष रोज़गार में महिलाओं की भागीदारी उल्लेखनीय (लगभग 40-50%) |
📊 उत्पादन आधारित प्रोत्साहन — उपलब्धियाँ (31 दिसंबर 2025 तक) — नवीनतम आँकड़े 1. कुल वास्तविक निवेश ₹2.16 लाख करोड़ से अधिक (प्रतिबद्ध निवेश ₹3 लाख करोड़ से अधिक); 14 क्षेत्रों में 836 आवेदन स्वीकृत। 2. प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रोज़गार 14.39 लाख से अधिक। 3. संचयी उत्पादन/बिक्री ₹20.41 लाख करोड़ से अधिक; निर्यात ₹8.3 लाख करोड़ से अधिक। 4. सरकार द्वारा वितरित प्रोत्साहन राशि ₹28,748 करोड़। |
🔎 तालिका से क्या समझें: यह योजना "पहले उत्पादन, फिर इनाम" के सिद्धांत पर चलती है — कंपनी पहले निवेश करती है और बिक्री बढ़ाती है, उसके बाद ही प्रोत्साहन मिलता है। इसलिए सरकार का पैसा केवल उन्हीं को जाता है जो सचमुच उत्पादन बढ़ाते हैं; पुरानी सब्सिडी की तरह पहले से पैसा नहीं बँटता।
⚠️ ध्यान दें यह एक निरंतर अद्यतन होने वाली योजना है, इसलिए अलग-अलग समय के आँकड़े अलग मिलते हैं (जैसे आर्थिक समीक्षा 2025-26 के समय लगभग ₹2 लाख करोड़ निवेश व 12.6 लाख रोज़गार)। मोटे तौर पर याद रखें — निवेश ₹2-2.2 लाख करोड़, रोज़गार 12-15 लाख। भारत सेमीकंडक्टर मिशन उत्पादन आधारित प्रोत्साहन का हिस्सा नहीं, बल्कि अलग किंतु पूरक पहल है। |
⚙️ उत्पादन आधारित प्रोत्साहन | 🔬 भारत सेमीकंडक्टर मिशन |
◆ वृद्धिशील बिक्री पर लगभग 4-6% प्रोत्साहन ◆ परिचालन दक्षता व विनिर्माण विस्तार पर केंद्रित ◆ तैयार उत्पाद — "नीचे की कड़ी" (Downstream) ◆ उदाहरण — मोबाइल, वाहन, चिकित्सा उपकरण | ◆ परियोजना लागत / पूँजीगत व्यय पर 50% तक प्रत्यक्ष सहायता ◆ अत्यधिक पूँजी-गहन, दीर्घकालिक अवसंरचनात्मक मिशन ◆ चिप निर्माण — "ऊपर की कड़ी" (Upstream); डिज़ाइन-आधारित प्रोत्साहन भी ◆ दोनों मिलकर संपूर्ण इलेक्ट्रॉनिक्स मूल्य-शृंखला बनाते हैं |
योजना / कार्यक्रम | मुख्य बिंदु |
भारत औद्योगिक विकास योजना (भव्य — BHAVYA) | मंत्रिमंडल स्वीकृति 18 मार्च 2026; ₹33,660 करोड़; देशभर में 100 "प्लग-एंड-प्ले" औद्योगिक पार्क (प्रत्येक 100-1,000 एकड़; पहाड़ी व पूर्वोत्तर क्षेत्रों में छोटे क्लस्टर); मूल व मूल्य-वर्धित अवसंरचना हेतु ₹1 करोड़ प्रति एकड़ तक सहायता; बाहरी अवसंरचना हेतु परियोजना लागत का 25% तक; अवधि 2026-27 से 2031-32; चयन "चुनौती पद्धति" से; नोडल — उद्योग संवर्धन एवं आंतरिक व्यापार विभाग, क्रियान्वयन — राष्ट्रीय औद्योगिक गलियारा विकास निगम; पहाड़ी व पूर्वोत्तर क्षेत्रों में 25 एकड़ तक के छोटे क्लस्टर; पूर्व-अनुमोदित भूमि, हरित ऊर्जा, भूमिगत उपयोगिता गलियारे |
उन्नति योजना 2024 (उत्तर-पूर्व परिवर्तनकारी औद्योगीकरण योजना) | मार्च 2024; उद्योग संवर्धन एवं आंतरिक व्यापार विभाग की केंद्रीय क्षेत्र योजना; पूर्वोत्तर राज्यों के लिए ₹10,037 करोड़ (लगभग 10 वर्ष); पूँजी निवेश, ब्याज अनुदान व विनिर्माण-सेवा आधारित प्रोत्साहन |
राष्ट्रीय औद्योगिक गलियारा विकास कार्यक्रम | 11 औद्योगिक गलियारे (कुछ — जैसे पूर्वी तट आर्थिक गलियारा — एशियाई विकास बैंक की सहायता से); अगस्त 2024 में 12 नए औद्योगिक स्मार्ट शहर स्वीकृत (राजस्थान का जोधपुर-पाली-मारवाड़ सहित) |
दिल्ली-मुंबई औद्योगिक गलियारा (DMIC) | उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात व महाराष्ट्र से होकर; जापान अंतर्राष्ट्रीय सहयोग एजेंसी (JICA) की लगभग 26% वित्तीय भागीदारी; पश्चिमी समर्पित माल गलियारे पर आधारित |
एक ज़िला एक उत्पाद | हर ज़िले के विशिष्ट उत्पाद की ब्रांडिंग, विपणन व निर्यात |
राष्ट्रीय एकल खिड़की प्रणाली (सितंबर 2021) | उद्योग संवर्धन एवं आंतरिक व्यापार विभाग — केंद्र व राज्यों की मंज़ूरियाँ एक पोर्टल पर |
व्यापार सुधार कार्य योजना (BRAP) | राज्यों की व्यापार सुगमता का आकलन — चार श्रेणियाँ: शीर्ष उपलब्धिकर्ता, उपलब्धिकर्ता, आकांक्षी, उभरता व्यापार पारिस्थितिकी तंत्र; ज़िला-स्तर पर "ज़िला व्यापार सुधार कार्य योजना" |
📘 आसान परिभाषा: "प्लग-एंड-प्ले" औद्योगिक पार्क (Plug-and-Play Industrial Park) |
📚 परिभाषा: ऐसा औद्योगिक क्षेत्र जहाँ भूमि, सड़क, बिजली, पानी, जल-निकासी, गोदाम और सभी आवश्यक मंज़ूरियाँ पहले से तैयार होती हैं, ताकि निवेशक आते ही उत्पादन शुरू कर सके। |
✅ आसान भाषा में: बना-बनाया "तैयार घर" — बस मशीनें लगाओ और काम शुरू। 🏠 उदाहरण: जैसे मोबाइल का चार्जर प्लग में लगाते ही चलने लगता है — वैसे ही कंपनी को ज़मीन ख़रीदने और बिजली कनेक्शन के लिए वर्षों भटकना नहीं पड़ता। |
🔎 तालिका से क्या समझें: तालिका में योजनाएँ "जगह" से जुड़ी हैं — गलियारे (लंबी पट्टी), स्मार्ट औद्योगिक शहर, प्लग-एंड-प्ले पार्क और पूर्वोत्तर की विशेष योजना। सोच यह है कि अकेला कारख़ाना नहीं, पूरा "पारिस्थितिकी तंत्र" (सड़क, बंदरगाह, आवास, कौशल केंद्र) एक साथ बने।
◆ श्रम संहिताएँ: 29 पुराने केंद्रीय श्रम क़ानूनों को मिलाकर बनी 4 संहिताएँ — वेतन संहिता (2019), औद्योगिक संबंध संहिता (2020), सामाजिक सुरक्षा संहिता (2020), व्यावसायिक सुरक्षा-स्वास्थ्य एवं कार्य-दशा संहिता (2020) — 21 नवंबर 2025 से लागू।
◆ विनियमन-मुक्ति: जन विश्वास अधिनियम 2023 — 42 क़ानूनों के 183 प्रावधानों को अपराध-मुक्त किया; जन विश्वास 2.0 विधेयक (2025); अनुपालन-भार घटाने हेतु मंत्रिमंडल सचिव की अध्यक्षता में कार्यबल (जनवरी 2025)।
◆ वस्तु एवं सेवा कर 2.0 (22 सितंबर 2025): मुख्यतः 5% व 18% की दो दरें — सरल व पारदर्शी कर ढाँचा।
◆ विदेशी निवेश: अधिकांश क्षेत्रों में स्वचालित मार्ग से 100%; रक्षा में 74% तक स्वचालित और उससे अधिक सरकारी मार्ग से (जैसे स्वीडन की कंपनी साब को हरियाणा में रॉकेट-लॉन्चर इकाई हेतु 100% विदेशी निवेश की मंज़ूरी)।
◆ अवसंरचना: राष्ट्रीय अवसंरचना पाइपलाइन, राष्ट्रीय मुद्रीकरण पाइपलाइन, अवसंरचना निवेश न्यास (InvITs) व रियल एस्टेट निवेश न्यास (REITs), सार्वजनिक-निजी भागीदारी; औद्योगिक वित्त हेतु बॉन्ड बाज़ार सुधार।
चरण | आधार | पहचान |
उद्योग 1.0 | भाप व जल शक्ति | उत्पादन का यंत्रीकरण (18वीं सदी की औद्योगिक क्रांति) |
उद्योग 2.0 | विद्युत ऊर्जा | बड़े पैमाने पर उत्पादन, असेंबली लाइन |
उद्योग 3.0 | इलेक्ट्रॉनिक्स, कंप्यूटर, प्रोग्रामिंग | विनिर्माण में डिजिटल क्रांति, स्वचालन |
उद्योग 4.0 | कृत्रिम बुद्धिमत्ता, इंटरनेट ऑफ़ थिंग्स, क्लाउड, बिग डेटा, मशीन लर्निंग | भौतिक, डिजिटल व जैविक जगत का एकीकरण; "स्मार्ट फ़ैक्ट्री" में स्वायत्त निर्णय |
उद्योग 5.0 | उद्योग 4.0 + मानव-केंद्रिकता | श्रमिक कल्याण, संधारणीयता व चक्रीय अर्थव्यवस्था; मानव-रोबोट सहयोग |
🔎 तालिका से क्या समझें: हर चरण में "ऊर्जा का नया स्रोत" या "नई तकनीक" बदली — भाप, बिजली, कंप्यूटर, फिर कृत्रिम बुद्धिमत्ता। उद्योग 5.0 की नई बात तकनीक नहीं, बल्कि मनुष्य को फिर केंद्र में लाना है — मशीनें मनुष्य की जगह नहीं, उसके साथ काम करें और उत्पादन पर्यावरण-अनुकूल हो।
◆ उद्योग संक्रमण हेतु नेतृत्व समूह (LeadIT): सितंबर 2019 के संयुक्त राष्ट्र जलवायु कार्रवाई शिखर सम्मेलन में भारत और स्वीडन द्वारा शुरू — भारी उद्योगों (इस्पात, सीमेंट आदि) को पेरिस समझौते के अनुरूप 2050 तक शुद्ध-शून्य उत्सर्जन की ओर ले जाना; जलवायु सम्मेलनों (COP-27, COP-28) में विस्तार पर चर्चा।
🎯 याद रखें — इस खंड के मुख्य बिंदु 1. मेक इन इंडिया — 25 सितंबर 2014; प्रतीक — शेर; 4 स्तंभ। 2. उत्पादन आधारित प्रोत्साहन — 14 क्षेत्र, लगभग ₹1.97 लाख करोड़; वृद्धिशील बिक्री पर ~4-6%। 3. राष्ट्रीय विनिर्माण मिशन (बजट 2025-26); लक्ष्य — 2035 तक विनिर्माण हिस्सा 25% से अधिक। 4. चार श्रम संहिताएँ — 21 नवंबर 2025 से लागू (29 क़ानूनों के स्थान पर)। |
📘 आसान परिभाषा: स्टार्टअप इंडिया (Startup India) |
📚 परिभाषा: 16 जनवरी 2016 को उद्योग संवर्धन एवं आंतरिक व्यापार विभाग द्वारा शुरू अभियान — नवाचार व उद्यमिता का पारिस्थितिकी तंत्र बनाना; मान्यता-प्राप्त स्टार्टअप को कर-छूट, स्व-प्रमाणन, सरल अनुपालन, पेटेंट शुल्क में छूट व वित्त-पोषण सहायता। |
✅ आसान भाषा में: नए विचार वाले युवाओं को "नौकरी माँगने वाला" नहीं, "नौकरी देने वाला" बनाना। 🏠 उदाहरण: जैसे नई क्रिकेट प्रतिभा को अकादमी, कोच और मैच खेलने का मौक़ा मिले — वैसे ही नए उद्यमियों को इनक्यूबेटर, मेंटर और पूँजी। |
बिंदु | विवरण |
स्टार्टअप की परिभाषा (संशोधित) | निगमन से 10 वर्ष तक; वार्षिक कारोबार ₹200 करोड़ से अधिक नहीं; उत्पाद, प्रक्रिया या सेवा में नवाचार/सुधार से मूल्य सृजन |
गहन-तकनीक (Deep Tech) स्टार्टअप | निगमन से 20 वर्ष तक; कारोबार ₹300 करोड़ तक |
यूनिकॉर्न | 1 अरब डॉलर या अधिक मूल्यांकन वाला स्टार्टअप — जैसे फ़्लिपकार्ट, कारदेखो |
फ़्लिपिंग व रिवर्स फ़्लिपिंग | भारतीय कंपनी का मुख्यालय विदेश ले जाकर विदेशी होल्डिंग की सहायक बनना "फ़्लिपिंग"; कर व विनियमन लाभ देखकर वापस भारत आना "रिवर्स फ़्लिपिंग" — उदाहरण: फ़ोनपे (2022, सिंगापुर से भारत) |
राउंड ट्रिपिंग | देश का धन पहले (अक्सर अवैध रूप से) विदेश भेजकर फिर उसे विदेशी निवेश के रूप में वापस लाना — मुख्यतः कर-चोरी हेतु; मॉरीशस, सिंगापुर जैसे "कर-स्वर्ग" मार्ग |
📊 स्टार्टअप इकोसिस्टम (2026) — नवीनतम आँकड़े 1. उद्योग संवर्धन एवं आंतरिक व्यापार विभाग से मान्यता-प्राप्त स्टार्टअप 2.40 लाख से अधिक — भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र। 2. 2025-26 में रिकॉर्ड 55,200 से अधिक नए स्टार्टअप को मान्यता; मार्च 2026 तक लगभग 23.36 लाख प्रत्यक्ष रोज़गार। 3. लगभग 48% स्टार्टअप द्वितीय व तृतीय श्रेणी के शहरों से; 47% से अधिक में कम से कम एक महिला निदेशक। 4. जून 2026 तक 131 यूनिकॉर्न; 2026 के नए — जसपे (जनवरी), क्रेडिटबी (अप्रैल), स्काईरूट एयरोस्पेस (मई); यूनिकॉर्न में बेंगलुरु (55) सबसे आगे, फिर मुंबई (22) व गुरुग्राम (21)। |
📘 आसान परिभाषा: उद्यम पूँजी और एंजल निवेशक (Venture Capital & Angel Investor) |
📚 परिभाषा: एंजल निवेशक — वह व्यक्ति जो बिलकुल शुरुआती चरण के स्टार्टअप में अपनी निजी पूँजी लगाता है; उद्यम पूँजी — पेशेवर कोष द्वारा ऊँची वृद्धि वाले नए व्यवसायों में हिस्सेदारी के बदले लगाया गया धन, जिसमें जोखिम भी ऊँचा और संभावित लाभ भी। |
✅ आसान भाषा में: विचार पर भरोसा करके "हिस्सेदारी के बदले पैसा" देने वाले लोग और कोष। 🏠 उदाहरण: दो दोस्तों के ऐप-विचार पर किसी अनुभवी उद्यमी ने ₹20 लाख लगाए (एंजल); ऐप चल पड़ा तो एक बड़े कोष ने ₹50 करोड़ लगाकर 20% हिस्सेदारी ली (उद्यम पूँजी)। |
📘 आसान परिभाषा: इनक्यूबेटर (Incubator) |
📚 परिभाषा: ऐसा संस्थान जो नए स्टार्टअप को शुरुआती वर्षों में कार्यस्थल, मार्गदर्शन (मेंटरिंग), तकनीकी-कानूनी सहायता, नेटवर्क और कभी-कभी बीज-पूँजी देकर "पालता" है। |
✅ आसान भाषा में: नए व्यवसायों की "नर्सरी"। 🏠 उदाहरण: जयपुर का भामाशाह टेक्नो हब या किसी आईआईटी का इनक्यूबेशन केंद्र — जहाँ छात्र अपने विचार को कंपनी में बदलना सीखते हैं। |
🔎 तालिका से क्या समझें: स्टार्टअप की परिभाषा तीन बातों पर टिकी है — उम्र (10 वर्ष, गहन-तकनीक में 20), आकार (कारोबार ₹200 करोड़, गहन-तकनीक में ₹300 करोड़) और नवाचार। "फ़्लिपिंग" और "राउंड ट्रिपिंग" ऐसे शब्द हैं जिनसे पता चलता है कि पूँजी और कंपनियाँ देशों के बीच कैसे आती-जाती हैं।
📖 पीछे की कहानी — फ़्लिपकार्ट — दो कमरों के फ़्लैट से अरबों डॉलर तक 2007 में आईआईटी दिल्ली के दो पूर्व छात्र सचिन बंसल और बिन्नी बंसल ने बेंगलुरु के एक छोटे फ़्लैट से ऑनलाइन किताबें बेचना शुरू किया — शुरुआती पूँजी केवल कुछ लाख रुपये थी और वे ख़ुद स्कूटर पर किताबें पहुँचाते थे। कुछ वर्षों में यह भारत की सबसे बड़ी ई-कॉमर्स कंपनियों में बन गई और 2018 में एक अमेरिकी खुदरा कंपनी ने इसकी बड़ी हिस्सेदारी लगभग 16 अरब डॉलर में ख़रीदी। यह कहानी बताती है कि भारत में नवाचार और पूँजी मिलें, तो एक विचार भी "यूनिकॉर्न" बन सकता है। |
सहायता योजना | मुख्य बिंदु |
स्टार्टअप हेतु कोष-के-कोष (Fund of Funds) | ₹10,000 करोड़; यह सीधे स्टार्टअप में नहीं, बल्कि सेबी-पंजीकृत वैकल्पिक निवेश कोषों में निवेश करता है (135 से अधिक); नोडल — उद्योग संवर्धन एवं आंतरिक व्यापार विभाग, क्रियान्वयन — लघु उद्योग विकास बैंक; बजट 2025-26 में ₹10,000 करोड़ का नया कोष |
स्टार्टअप इंडिया बीज कोष योजना | अप्रैल 2021 — प्रारंभिक चरण (अवधारणा-प्रमाण, प्रोटोटाइप) के लिए |
स्टार्टअप ऋण गारंटी योजना | बिना गिरवी ऋण की गारंटी — अब ₹20 करोड़ तक |
अनुसंधान राष्ट्रीय अनुसंधान फ़ाउंडेशन अधिनियम, 2023 | राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 की सिफ़ारिश पर; 2023-28 में अनुसंधान हेतु ₹50,000 करोड़ |
अनुसंधान, विकास एवं नवाचार (RDI) योजना | 6 वर्षों में ₹1 लाख करोड़ — निजी अनुसंधान को सस्ता दीर्घकालिक वित्त; 2025-26 में ₹20,000 करोड़ |
स्वायत्त (SWAYATT) पहल | वाणिज्य मंत्रालय — सरकारी ई-मार्केटप्लेस पर स्टार्टअप, महिला व युवा उद्यमियों की भागीदारी |
अटल नवाचार मिशन (2016) व मिशन | इंडिया-एआई मिशन, भारत सेमीकंडक्टर मिशन, राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन, राष्ट्रीय क्वांटम मिशन; राज्यों के इनक्यूबेटर (जैसे जयपुर का भामाशाह टेक्नो हब) |
📊 नवाचार एवं अनुसंधान — नवीनतम आँकड़े 1. वैश्विक नवाचार सूचकांक 2025 (विश्व बौद्धिक संपदा संगठन, कॉर्नेल विश्वविद्यालय, इनसीड; विषय — "नवाचार एक निर्णायक मोड़ पर"): 139 देशों में भारत 38वाँ (2024 में 39वाँ, 2023 में 40वाँ); निम्न-मध्यम आय वाली 37 अर्थव्यवस्थाओं व मध्य-दक्षिण एशिया की 10 अर्थव्यवस्थाओं में प्रथम; शीर्ष — स्विट्ज़रलैंड, स्वीडन, अमेरिका; चीन पहली बार शीर्ष 10 में (10वाँ)। 2. वर्ष 2025 में भारत का प्रदर्शन नवाचार इनपुट की तुलना में नवाचार आउटपुट में बेहतर रहा। 3. बौद्धिक संपदा फ़ाइलिंग (2024) — ट्रेडमार्क में चौथा, पेटेंट में छठा, औद्योगिक डिज़ाइन में सातवाँ स्थान; 64 महत्वपूर्ण तकनीकों में से 45 में भारत शीर्ष 5 देशों में — जैव-विनिर्माण, उन्नत कंपोज़िट सामग्री व जैव-ईंधन में दूसरा; उन्नत विमान इंजन, एंटीबायोटिक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता एल्गोरिदम, मशीन लर्निंग, नैनो सामग्री, सुपरकैपेसिटर व परमाणु अपशिष्ट प्रबंधन में तीसरा। 4. अनुसंधान-विकास पर सकल व्यय जीडीपी का केवल लगभग 0.64% (अमेरिका 3.48%, चीन 2.43%); इसमें निजी क्षेत्र का हिस्सा केवल लगभग 41% (अमेरिका 75%, चीन 77%)। |
🔎 सूची से क्या समझें: भारत का स्टार्टअप तंत्र अब केवल बड़े महानगरों का नहीं रहा — लगभग आधे स्टार्टअप छोटे शहरों से हैं और लगभग आधे में कम से कम एक महिला निदेशक है। चिंता का विषय है अनुसंधान पर बहुत कम ख़र्च (जीडीपी का 0.64%), जबकि चीन लगभग चार गुना और अमेरिका पाँच गुना ख़र्च करते हैं।
⚠️ स्टार्टअप की चुनौतियाँ | 🔄 मेक इन इंडिया बनाम स्टार्टअप इंडिया |
◆ "फ़ंडिंग विंटर" — ऊँची ब्याज दरों से उद्यम पूँजी में कमी; घरेलू पूँजी की कमी, विदेशी पूँजी पर निर्भरता ◆ ऊँची विफलता दर — अधिकांश 3-5 वर्षों में बंद ◆ भौगोलिक संकेंद्रण — बेंगलुरु, दिल्ली-एनसीआर, मुंबई; छोटे शहरों में इनक्यूबेशन व मेंटरशिप की कमी ◆ कुछ क्षेत्रों (फ़िनटेक, ई-कॉमर्स, सॉफ़्टवेयर सेवा) तक सीमित ◆ कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर व गहन-तकनीक में प्रतिभा की कमी; उद्योग-अकादमिक जगत में कमज़ोर समन्वय ◆ जटिल अनुपालन, "एंजल टैक्स" जैसे विवाद (2024 में समाप्त) ◆ हार्डवेयर व गहन-तकनीक स्टार्टअप के लिए परीक्षण सुविधाओं, विनिर्माण पारिस्थितिकी व अनुसंधान अवसंरचना की कमी | ◆ मेक इन इंडिया — पूँजी-गहन विनिर्माण व भारी उद्योग; स्टार्टअप इंडिया — नवाचार-आधारित, सेवा व तकनीक ◆ मेक इन इंडिया — अकुशल व अर्ध-कुशल श्रमिकों के लिए बड़े पैमाने पर रोज़गार; स्टार्टअप इंडिया — कुशल, उच्च-तकनीकी व प्रबंधकीय प्रतिभा ◆ दोनों परस्पर पूरक — स्टार्टअप के रोबोटिक्स, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, इंटरनेट ऑफ़ थिंग्स व लॉजिस्टिक्स समाधान विनिर्माण को दक्ष बनाते हैं ◆ आगे की राह — अनुसंधान निवेश, छोटे शहरों में इनक्यूबेटर, हार्डवेयर व गहन-तकनीक स्टार्टअप को विशेष प्रोत्साहन |
बिंदु | विवरण |
शुभारंभ | 5 अप्रैल 2016; नोडल — वित्त मंत्रालय का वित्तीय सेवा विभाग |
उद्देश्य | अनुसूचित जाति/जनजाति व महिलाओं में उद्यमिता |
प्रावधान | प्रत्येक अनुसूचित वाणिज्यिक बैंक की हर शाखा कम से कम एक अनुसूचित जाति/जनजाति और एक महिला उद्यमी को ₹10 लाख से ₹1 करोड़ तक ऋण दे |
शर्तें | केवल ग्रीनफ़ील्ड (नए) उद्यम — विनिर्माण, सेवा, कृषि-संबद्ध गतिविधि या व्यापार; ऋण परियोजना लागत का 85% तक (2019 से उधारकर्ता का अंशदान 15% तक) |
अवधि व उपलब्धि | 2025 तक विस्तारित; 2.35 लाख से अधिक लाभार्थी |
नई योजना (बजट 2025-26) | पहली बार उद्यम शुरू करने वाली 5 लाख महिला, अनुसूचित जाति व जनजाति उद्यमियों को 5 वर्षों में ₹2 करोड़ तक सावधि ऋण |
तुलना का आधार | स्टार्टअप इंडिया | स्टैंड-अप इंडिया |
प्राथमिक उद्देश्य | नवाचार, उद्यमिता व अनुकूल पारिस्थितिकी तंत्र | ग्रीनफ़ील्ड उद्यम हेतु संस्थागत ऋण व आर्थिक सशक्तीकरण |
लक्षित लाभार्थी | कोई भी मान्यता-प्राप्त नवाचारी उद्यमी/संस्था — जाति, वर्ग या लिंग का बंधन नहीं | केवल अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति व महिला उद्यमी |
सहायता का स्वरूप | कर-छूट, बीज कोष, कोष-के-कोष, बौद्धिक संपदा सहायता | ₹10 लाख से ₹1 करोड़ तक बैंक ऋण |
नोडल | उद्योग संवर्धन एवं आंतरिक व्यापार विभाग | वित्तीय सेवा विभाग |
🔎 तालिका से क्या समझें: स्टार्टअप इंडिया सबके लिए है और "विचार" को पूँजी देता है; स्टैंड-अप इंडिया केवल अनुसूचित जाति-जनजाति और महिलाओं के लिए है और "नए उद्यम" को बैंक ऋण देता है। पहला नवाचार की योजना है, दूसरा सामाजिक समावेशन की।
कोविड-19 महामारी के बीच 12 मई 2020 को घोषित, लगभग ₹20 लाख करोड़ (जीडीपी का लगभग 10%) के पैकेज वाला यह अभियान भारत को आत्मनिर्भर और वैश्विक आपूर्ति-शृंखला का मज़बूत खिलाड़ी बनाने की दृष्टि है — मूल मंत्र "वोकल फ़ॉर लोकल" (स्थानीय के लिए मुखर)। यह आत्मनिर्भरता "दुनिया से कटना" नहीं, बल्कि "दुनिया से बराबरी पर जुड़ना" है।
पाँच स्तंभ | अर्थ |
1. अर्थव्यवस्था (Economy) | क्रमिक बदलाव नहीं, लंबी छलांग (Quantum Jump) |
2. अवसंरचना (Infrastructure) | आधुनिक भारत की पहचान बनने वाली विश्वस्तरीय अवसंरचना |
3. व्यवस्था (System) | 21वीं सदी की तकनीक-आधारित पारदर्शी व्यवस्था |
4. जीवंत जनसांख्यिकी (Vibrant Demography) | युवा आबादी — जनसांख्यिकीय लाभांश को ऊर्जा-स्रोत बनाना |
5. माँग (Demand) | माँग व आपूर्ति-शृंखला की पूर्ण क्षमता का उपयोग |
◆ संबंध: उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना आत्मनिर्भर भारत का सबसे प्रमुख क्रियान्वयन उपकरण है — यह सीधे घरेलू विनिर्माण बढ़ाकर आयात-निर्भरता घटाती है; सूक्ष्म-लघु-मध्यम उद्यम की 2020 की नई परिभाषा, नई सार्वजनिक क्षेत्र उद्यम नीति और आत्मनिर्भर भारत कोष भी इसी पैकेज के अंग थे।
🎯 याद रखें — इस खंड के मुख्य बिंदु 1. स्टार्टअप इंडिया — 16 जनवरी 2016; परिभाषा — 10 वर्ष, ₹200 करोड़ तक कारोबार। 2. स्टैंड-अप इंडिया — 5 अप्रैल 2016; अनुसूचित जाति/जनजाति व महिला, ₹10 लाख-₹1 करोड़। 3. आत्मनिर्भर भारत — 12 मई 2020, ~₹20 लाख करोड़; 5 स्तंभ। 4. वैश्विक नवाचार सूचकांक 2025 — भारत 38वाँ; अनुसंधान व्यय — जीडीपी का ~0.64%। |
प्रावधान | विषय |
संघ सूची, प्रविष्टि 52 | वे उद्योग जिनका नियंत्रण संसद क़ानून द्वारा लोकहित में संघ के अधीन घोषित करे (जैसे 1951 का उद्योग विकास एवं विनियमन अधिनियम) |
राज्य सूची, प्रविष्टि 24 | शेष उद्योग — संघ सूची की प्रविष्टि 7 व 52 के अधीन रहते हुए |
संघ सूची, प्रविष्टि 54 / राज्य सूची, प्रविष्टि 23 | खनिजों का विनियमन — प्रमुख खनिज (कोयला, लौह अयस्क, बॉक्साइट, पेट्रोलियम, परमाणु खनिज) का नियंत्रण केंद्र के पास; गौण खनिज (रेत, संगमरमर, ग्रेनाइट, जिप्सम, अभ्रक, खड़िया, शेल) पर क़ानून, रॉयल्टी व प्रशासन राज्यों के पास — खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) अधिनियम, 1957 |
अनुच्छेद 43क | उद्योगों के प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी (42वाँ संशोधन, 1976) |
अनुच्छेद 38, 39(ख), 39(ग) | आय-असमानता घटाना, संसाधनों का न्यायसंगत वितरण, धन के संकेंद्रण पर रोक — औद्योगिक नीति की नैतिक कसौटी |
अनुच्छेद 19(1)(छ) | कोई भी वृत्ति, उपजीविका, व्यापार या कारोबार करने का मौलिक अधिकार |
🔎 तालिका से क्या समझें: संविधान उद्योगों को दो हिस्सों में बाँटता है — जिन्हें संसद क़ानून बनाकर "लोकहित में" केंद्र के अधीन घोषित करे (संघ सूची 52), वे केंद्र के; बाकी राज्यों के (राज्य सूची 24)। इसीलिए औद्योगिक नीति केंद्र और राज्य दोनों बनाते हैं — जैसे राजस्थान की निवेश प्रोत्साहन योजना। अनुच्छेद 19(1)(छ) व्यापार की आज़ादी देता है और अनुच्छेद 39 उस आज़ादी को "धन के संकेंद्रण" से रोकने की ज़िम्मेदारी।
सतत विकास लक्ष्य-9 — "उद्योग, नवाचार और अवसंरचना": लचीली अवसंरचना, समावेशी व सतत औद्योगीकरण और नवाचार को बढ़ावा। भारत की औद्योगिक संवृद्धि को इसी लक्ष्य के अनुरूप — हरित, समावेशी और तकनीक-आधारित — होना चाहिए; अनुच्छेद 43क की भावना के अनुरूप श्रमिकों की भागीदारी न्यायसंगत विकास सुनिश्चित करती है।
मॉडल | देश | विशेषता | भारत के लिए सबक |
सामाजिक बाज़ार अर्थव्यवस्था (Soziale Marktwirtschaft) | जर्मनी | मुक्त बाज़ार + मज़बूत सामाजिक सुरक्षा; कौशल-आधारित "मिटेलस्टैंड" (मध्यम उद्यम) | मध्यम उद्यमों को मज़बूत कर "बौनेपन" से बचना; व्यावसायिक प्रशिक्षण |
केइरेत्सु (Keiretsu) | जापान | परस्पर शेयरधारिता वाले व्यावसायिक समूहों का संगठित नेटवर्क; आपूर्तिकर्ता-निर्माता का दीर्घकालिक संबंध | बड़े निर्माताओं व लघु आपूर्तिकर्ताओं का क्लस्टर-आधारित जुड़ाव |
चेबोल (Chaebol) | दक्षिण कोरिया | परिवार-संचालित विशाल व्यापारिक समूह; सरकार-समर्थित निर्यात रणनीति | निर्यात-उन्मुख "राष्ट्रीय चैंपियन"; पर एकाधिकार का जोखिम |
राज्य-निर्देशित पूँजीवाद | चीन | 1978 के सुधार; विशेष आर्थिक क्षेत्र (शेन्ज़ेन); 2001 में विश्व व्यापार संगठन प्रवेश — "विश्व का कारख़ाना" | बड़े पैमाने की अवसंरचना, लॉजिस्टिक्स व निर्यात क्लस्टर |
🔎 तालिका से क्या समझें: चारों मॉडलों में भारत के लिए एक साझा सबक है — सफल देशों में सरकार और उद्योग साथ चले: जर्मनी ने कौशल दिया, जापान ने बड़ी और छोटी कंपनियों को जोड़ा, कोरिया ने निर्यात करने वाली बड़ी कंपनियाँ बनाईं और चीन ने विशाल अवसंरचना। भारत की चुनौती इन सबका ऐसा मेल बनाना है जिसमें लोकतंत्र और रोज़गार दोनों बचे रहें।
📊 वैश्विक पटल पर भारतीय उद्योग — नवीनतम आँकड़े 1. वैश्विक विनिर्माण में हिस्सा लगभग 2.8-2.9%; वैश्विक वस्तु निर्यात में लगभग 1.8% (चीन कहीं आगे)। 2. प्रतिस्पर्धी औद्योगिक प्रदर्शन सूचकांक — 37वाँ; वैश्विक नवाचार सूचकांक 2025 — 38वाँ; लॉजिस्टिक्स प्रदर्शन सूचकांक 2023 — 38वाँ। 3. दूसरा सबसे बड़ा इस्पात, सीमेंट व मोबाइल फ़ोन उत्पादक; मात्रा में तीसरा सबसे बड़ा दवा उत्पादक; दोपहिया वाहनों का सबसे बड़ा बाज़ार। 4. लक्ष्य — 2035 तक विनिर्माण हिस्सा 25% से अधिक; भारत को उन्नत विनिर्माण के शीर्ष तीन वैश्विक केंद्रों में लाना। |
⚠️ ध्यान दें "आत्मनिर्भरता" का अर्थ 1950-80 वाला "आयात प्रतिस्थापन" नहीं है। पुराना मॉडल विदेशी प्रतिस्पर्धा से बचाकर घरेलू उद्योग खड़ा करता था, जबकि आज का मॉडल वैश्विक प्रतिस्पर्धा में उतरकर — प्रोत्साहन, अवसंरचना और वैश्विक मूल्य-शृंखला से जुड़कर — घरेलू क्षमता बढ़ाता है। |
🎯 याद रखें — इस खंड के मुख्य बिंदु 1. उद्योग — संघ सूची प्रविष्टि 52 और राज्य सूची प्रविष्टि 24। 2. अनुच्छेद 43क — उद्योग प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी (42वाँ संशोधन, 1976)। 3. सतत विकास लक्ष्य-9 — उद्योग, नवाचार और अवसंरचना। 4. औद्योगिक मॉडल — जर्मनी (मिटेलस्टैंड), जापान (केइरेत्सु), दक्षिण कोरिया (चेबोल), चीन (राज्य-निर्देशित)। |
📊 राजस्थान — उद्योग व निवेश — नवीनतम आँकड़े 1. राजस्थान का सकल राज्य घरेलू उत्पाद 2025-26 में वर्तमान मूल्यों पर लगभग ₹18.75 लाख करोड़ अनुमानित — पिछले वर्ष से लगभग 10.24% अधिक; राज्य का लक्ष्य — 350 अरब डॉलर की अर्थव्यवस्था। 2. राज्य के सकल मूल्य वर्धन में उद्योग क्षेत्र का हिस्सा लगभग 26.5% — पत्थर (संगमरमर, बलुआ पत्थर, ग्रेनाइट), सीमेंट, जस्ता-सीसा और हाइड्रोकार्बन (बाड़मेर का कच्चा तेल) में अग्रणी स्थिति से बल। 3. हिंदुस्तान ज़िंक (उदयपुर) — 2002 में रणनीतिक विनिवेश का प्रमुख उदाहरण; आज विश्व के सबसे बड़े एकीकृत जस्ता उत्पादकों में। 4. एचपीसीएल राजस्थान रिफ़ाइनरी — पचपदरा (बालोतरा ज़िला); 9 मिलियन टन वार्षिक क्षमता वाली रिफ़ाइनरी-सह-पेट्रो-रसायन परियोजना। |
🔎 सूची से क्या समझें: राजस्थान की औद्योगिक ताक़त "धरती के नीचे" से आती है — संगमरमर, ग्रेनाइट, जस्ता-सीसा, तांबा और कच्चा तेल। चुनौती यह है कि केवल खनन से रोज़गार कम बनते हैं; इसलिए राज्य की नीति खनिजों के प्रसंस्करण (कच्चे पत्थर से तैयार टाइल, अयस्क से धातु, कच्चे तेल से पेट्रो-रसायन) पर ज़ोर देती है।
पहलू | विवरण |
आयोजन | 9-11 दिसंबर 2024, जयपुर प्रदर्शनी एवं सम्मेलन केंद्र (सीतापुरा) |
हस्ताक्षरित समझौता ज्ञापन | लगभग ₹35 लाख करोड़ — राज्य के इतिहास में सर्वाधिक; 11,000 से अधिक सक्रिय समझौते |
अंतर्राष्ट्रीय भागीदारी | 32 देशों की भागीदारी, अनेक देश "भागीदार देश" के रूप में |
प्रमुख क्षेत्र | नवीकरणीय ऊर्जा (सौर, पवन, हरित हाइड्रोजन); खनन व खनिज-आधारित उद्योग (सीसा-जस्ता, संगमरमर, ग्रेनाइट, लिग्नाइट प्रसंस्करण) व पेट्रो-रसायन; अवसंरचना व लॉजिस्टिक्स; सूचना प्रौद्योगिकी; वाहन, इलेक्ट्रिक वाहन व रक्षा विनिर्माण; पर्यटन (विरासत, पारिस्थितिक व वेलनेस); कृषि-खाद्य प्रसंस्करण; वस्त्र |
संभावित प्रभाव | राज्य के सकल घरेलू उत्पाद में द्वितीयक व तृतीयक क्षेत्र का हिस्सा बढ़ना, राजस्व वृद्धि, अवसंरचना का आधुनिकीकरण, स्थानीय रोज़गार |
ज़मीनी स्थिति | जुलाई 2026 तक ₹8 लाख करोड़ से अधिक के प्रस्ताव धरातल पर उतरे; शेष के लिए नवंबर 2026 तक का लक्ष्य |
रणनीति | देश-विदेश में रोड-शो, "सिंगल विंडो 2.0", समयबद्ध समझौता-निगरानी तंत्र, नीतिगत स्थिरता |
⚠️ ध्यान दें समझौता ज्ञापन (MoU) केवल निवेश का इरादा है, वास्तविक निवेश नहीं। ₹35 लाख करोड़ "हस्ताक्षरित राशि" है; ज़मीन पर उतरा निवेश इससे कम होता है और चरणबद्ध रूप से आता है — इसीलिए "ग्राउंडिंग" (धरातल पर उतरना) का आँकड़ा अलग से देखा जाता है। |
🔎 तालिका से क्या समझें: राइज़िंग राजस्थान ने निवेश का "इरादा" बहुत बड़ा दिखाया, पर असली कसौटी ज़मीन पर उतरा निवेश है। इसीलिए राज्य ने समझौतों की समयबद्ध निगरानी और एकल-खिड़की 2.0 जैसे क़दम उठाए।
नीति / योजना | मुख्य बिंदु |
राजस्थान निवेश प्रोत्साहन योजना (RIPS) 2024 | पिछली योजना का परिष्कृत रूप; तीन स्तंभ — हरित विकास, निर्यात संवर्धन व क्षमता निर्माण; पूँजीगत अनुदान व ब्याज अनुदान; स्टांप शुल्क व भूमि रूपांतरण शुल्क में 100% तक छूट; 7-10 वर्ष तक बिजली शुल्क व मंडी शुल्क में छूट; स्थानीय युवाओं को रोज़गार देने पर कर्मचारी भविष्य निधि/कर्मचारी राज्य बीमा अंशदान की प्रतिपूर्ति व विशेष वेतन-आधारित (पेरोल) अनुदान; शून्य अपशिष्ट-जल निस्सरण जैसी हरित तकनीक पर अतिरिक्त प्रोत्साहन; महिला, अनुसूचित जाति-जनजाति, स्टार्टअप व लघु उद्यमों हेतु विशेष पैकेज |
उदीयमान (Sunrise) क्षेत्र | सेमीकंडक्टर, रक्षा व एयरोस्पेस, हरित हाइड्रोजन, डेटा सेंटर, ड्रोन, इलेक्ट्रिक वाहन, सौर उपकरण, कृषि-प्रसंस्करण |
प्रमुख (Thrust) क्षेत्र | वस्त्र, चमड़ा, हस्तशिल्प, रत्न-आभूषण जैसे रोज़गारपरक पारंपरिक उद्योग |
राजस्थान सूक्ष्म-लघु-मध्यम उद्यम नीति 2024 | लघु उद्योगों का विस्तार व सरलीकरण; छोटे उद्योगों के लिए 1 एकड़ तक भूमि-रूपांतरण शुल्क-मुक्त |
अन्य नीतियाँ | राजस्थान निर्यात संवर्धन नीति 2024, एक ज़िला एक उत्पाद नीति 2024, राजस्थान खनिज नीति 2024, एकीकृत क्लस्टर विकास योजना 2024 |
🔎 तालिका से क्या समझें: राज्य की नीतियों में दो तरह के क्षेत्र हैं — उदीयमान (सेमीकंडक्टर, ड्रोन, हरित हाइड्रोजन — भविष्य की तकनीक) और प्रमुख (वस्त्र, हस्तशिल्प, रत्न — अधिक रोज़गार देने वाले पारंपरिक उद्योग)। रणनीति यह है कि नए उद्योग निवेश लाएँ और पुराने उद्योग रोज़गार बचाएँ।
राजस्थान राज्य औद्योगिक विकास एवं निवेश निगम (RIICO) राज्य की औद्योगिक अवसंरचना की रीढ़ है — 400 से अधिक औद्योगिक क्षेत्रों का विकास, ऑनलाइन नीलामी से भूखंड आवंटन, सड़क-जल-बिजली-सीवरेज, "प्लग एंड प्ले" सुविधाएँ, बड़े-मध्यम उद्यमों को सावधि ऋण व संघ-वित्तपोषण।
🐪 राजस्थान की भाषा में — लाइसेंस राज से "सिंगल विंडो" तक जिस तरह 1991 में केंद्र ने लाइसेंस राज हटाकर देशभर में उद्योग लगाना आसान किया, उसी तर्ज़ पर राजस्थान ने निवेश प्रोत्साहन योजना 2024, एकल-खिड़की मंज़ूरी और 1 एकड़ तक भूमि-रूपांतरण छूट जैसे क़दमों से छोटे उद्यमी के लिए फ़ैक्ट्री लगाना आसान बनाया है। मरुधरा की ताक़त — धूप (सौर ऊर्जा), पत्थर (खनिज) और हुनर (हस्तशिल्प) — अब नीति की ताक़त से जुड़ रही है; चुनौती है पानी की कमी, लॉजिस्टिक्स लागत और कुशल श्रम। |
![]() चित्र 12: राष्ट्रीय औद्योगिक गलियारे — मानचित्र |
पार्क / क्षेत्र | स्थान | विशेषता |
जापानी निवेश क्षेत्र | नीमराना व घिलोठ (कोटपूतली-बहरोड़ ज़िला) | जापानी कंपनियों का विशेष संकुल |
औद्योगिक केंद्र | भिवाड़ी (खैरथल-तिजारा ज़िला) | वाहन-पुर्ज़े, इलेक्ट्रॉनिक्स, इस्पात |
विशेष आर्थिक क्षेत्र | महिंद्रा वर्ल्ड सिटी (जयपुर), सीतापुरा (जयपुर), बोरानाडा (जोधपुर) | सूचना प्रौद्योगिकी, रत्न-आभूषण, हस्तशिल्प |
कृषि-खाद्य पार्क | कोटा, जोधपुर, श्रीगंगानगर, अलवर | कृषि-आधारित उद्योग |
मेगा फ़ूड पार्क | रूपनगढ़ (अजमेर) | खाद्य प्रसंस्करण |
⚠️ ध्यान दें नीमराना और घिलोठ अब कोटपूतली-बहरोड़ ज़िले में तथा भिवाड़ी खैरथल-तिजारा ज़िले में हैं — इन्हें "अलवर" लिखना पुरानी प्रशासनिक स्थिति है। इसी प्रकार पचपदरा रिफ़ाइनरी बालोतरा ज़िले में है। |
🔎 तालिका से क्या समझें: रीको की स्थापना 1969 में हुई थी और यही राज्य में ज़मीन, सड़क, पानी और बिजली वाले औद्योगिक क्षेत्र तैयार करता है। तालिका में दिए सभी क्षेत्र — नीमराना का जापानी क्षेत्र, भिवाड़ी, सीतापुरा और बोरानाडा — रीको की ही देन हैं।
◆ गलियारे की लगभग 38% लंबाई (लगभग 553 किमी) राजस्थान से गुज़रती है और राज्य का 58% से अधिक क्षेत्र इसके प्रभाव-क्षेत्र में आता है।
◆ निवेश क्षेत्र: खुशखेड़ा-भिवाड़ी-नीमराना; अजमेर-किशनगढ़। औद्योगिक क्षेत्र: जयपुर-दौसा, राजसमंद-भीलवाड़ा, जोधपुर-पाली-मारवाड़ (अगस्त 2024 में औद्योगिक स्मार्ट शहर के रूप में स्वीकृत)।
◆ स्टार्टअप: राज्य का "आई-स्टार्ट" कार्यक्रम और जयपुर का भामाशाह टेक्नो हब — प्रमुख इनक्यूबेशन केंद्र।
उद्योग | प्रमुख केंद्र | विशेषता |
संगमरमर व पत्थर | मकराना, किशनगढ़, राजसमंद; कोटा स्टोन (रामगंजमंडी) | मकराना का संगमरमर ताजमहल में लगा; किशनगढ़ — देश की बड़ी संगमरमर मंडी |
जस्ता-सीसा | रामपुरा-आगूचा खान (भीलवाड़ा); चंदेरिया व देबारी प्रगालक | हिंदुस्तान ज़िंक — विश्व के बड़े एकीकृत जस्ता उत्पादकों में |
तांबा | खेतड़ी (झुंझुनूं) | हिंदुस्तान कॉपर का प्रमुख केंद्र |
कच्चा तेल व रिफ़ाइनरी | बाड़मेर (मंगला क्षेत्र); पचपदरा रिफ़ाइनरी (बालोतरा) | देश के घरेलू कच्चे तेल उत्पादन का बड़ा हिस्सा |
सीमेंट | चित्तौड़गढ़, निंबाहेड़ा, ब्यावर, सिरोही | चूना-पत्थर की प्रचुरता — सीमेंट उत्पादन में देश के अग्रणी राज्यों में |
वस्त्र | भीलवाड़ा, पाली, बालोतरा, किशनगढ़ | भीलवाड़ा — "वस्त्र नगरी"; पाली-बालोतरा — रंगाई-छपाई |
रत्न-आभूषण व हस्तशिल्प | जयपुर, सांगानेर, बगरू, जोधपुर | जयपुर — रंगीन रत्नों की कटाई का बड़ा केंद्र; जोधपुर — लकड़ी का फ़र्नीचर-हस्तशिल्प |
वाहन व इलेक्ट्रॉनिक्स | भिवाड़ी, नीमराना, घिलोठ | दिल्ली-मुंबई औद्योगिक गलियारे का प्रवेश-द्वार |
🔎 तालिका से क्या समझें: राजस्थान के उद्योग तीन "धन" पर टिके हैं — खनिज-धन (पत्थर, जस्ता, तेल), हुनर-धन (हस्तशिल्प, छपाई, रत्न) और स्थान-धन (दिल्ली से निकटता — भिवाड़ी-नीमराना)। कई पारंपरिक उत्पाद — जैसे कोटा डोरिया, सांगानेरी और बगरू छपाई, बीकानेरी भुजिया — भौगोलिक संकेत (GI) टैग पा चुके हैं, जिससे उनकी ब्रांड-पहचान और निर्यात मज़बूत हुआ।
📖 पीछे की कहानी — मंगला — रेगिस्तान के नीचे छिपा तेल वर्षों तक माना जाता था कि थार में तेल की संभावना कम है। 2004 में एक निजी तेल कंपनी को बाड़मेर ज़िले में मंगला क्षेत्र में बड़ा तेल भंडार मिला — दशकों में भारत की सबसे बड़ी स्थलीय तेल खोजों में से एक। अगस्त 2009 में यहाँ से उत्पादन शुरू हुआ और बाड़मेर देश के घरेलू कच्चे तेल का बड़ा स्रोत बन गया। इसी तेल के आधार पर पचपदरा (अब बालोतरा ज़िला) में रिफ़ाइनरी-सह-पेट्रो-रसायन परिसर बनाया गया, ताकि कच्चा तेल बाहर भेजने के बजाय राज्य में ही उससे प्लास्टिक, रसायन और ईंधन बनें। |
💡 क्या आप जानते हैं? हिंदुस्तान ज़िंक की रामपुरा-आगूचा (भीलवाड़ा) खान विश्व की सबसे बड़ी भूमिगत जस्ता खानों में गिनी जाती है। |
🎯 याद रखें — इस खंड के मुख्य बिंदु 1. राइज़िंग राजस्थान 2024 — लगभग ₹35 लाख करोड़ के समझौते; समझौता = इरादा, निवेश नहीं। 2. राजस्थान निवेश प्रोत्साहन योजना 2024 — हरित विकास, निर्यात संवर्धन, क्षमता निर्माण। 3. दिल्ली-मुंबई औद्योगिक गलियारे की लगभग 38% लंबाई राजस्थान में; नीमराना — जापानी निवेश क्षेत्र। 4. मंगला (बाड़मेर) — 2009 से तेल उत्पादन; पचपदरा रिफ़ाइनरी — बालोतरा ज़िला। |
व्यक्तित्व | योगदान |
एम. विश्वेश्वरैया | "भारत के लिए नियोजित अर्थव्यवस्था" (1934); नारा — "उद्योगीकरण करो या नष्ट हो जाओ" |
जवाहरलाल नेहरू | मिश्रित अर्थव्यवस्था व योजनाबद्ध विकास; राष्ट्रीय योजना समिति (1938) के अध्यक्ष; बाँधों को "आधुनिक भारत के मंदिर" कहा |
श्यामा प्रसाद मुखर्जी | पहले उद्योग मंत्री — औद्योगिक नीति प्रस्ताव, 1948 |
पी.सी. महालनोबिस | दूसरी योजना का भारी उद्योग आधारित मॉडल; आय वितरण समिति (1960) |
डी.जी. कार्वे | ग्राम एवं लघु उद्योग समिति (1955) — लघु उद्योग आरक्षण की नींव |
राज कृष्णा | "हिंदू संवृद्धि दर" शब्द (1978) |
जॉर्ज फ़र्नांडीस | औद्योगिक नीति 1977 — कुटीर-लघु उद्योग, ज़िला उद्योग केंद्र |
पी.वी. नरसिम्हा राव | 1991 के सुधारों के समय प्रधानमंत्री; नई औद्योगिक नीति |
डॉ. मनमोहन सिंह | वित्त मंत्री के रूप में 24 जुलाई 1991 का ऐतिहासिक बजट — एलपीजी सुधारों के सूत्रधार |
एम. नरसिम्हम | वित्तीय क्षेत्र सुधार समितियाँ (1991, 1998) |
राजा जे. चेलैया | कर सुधार समिति (1991) |
सी. रंगराजन | विनिवेश समिति (1993) |
एस.एस. तारापोर | पूँजी खाता परिवर्तनीयता समितियाँ (1997, 2006) |
यू.के. सिन्हा | सूक्ष्म-लघु-मध्यम उद्यम विशेषज्ञ समिति — रैम्प योजना का आधार |
बाबा कल्याणी | विशेष आर्थिक क्षेत्र नीति समीक्षा समिति (2018) |
जे.आर.डी. टाटा | टाटा एयरलाइंस (1932) के संस्थापक — जो आगे एयर इंडिया बनी |
वर्गीज़ कुरियन | सहकारी डेयरी उद्योग (अमूल) — ग्रामीण औद्योगीकरण का सहकारी मॉडल |
जगदीश भगवती | वैश्वीकरण के प्रबल समर्थक अर्थशास्त्री |
अशोक कुमार लाहिड़ी | नीति आयोग के उपाध्यक्ष (अप्रैल 2026 से) |
देंग शियाओपिंग | चीन के 1978 के बाज़ार सुधारों के सूत्रधार — भारत के सुधारों की वैश्विक पृष्ठभूमि |
वर्ष / तिथि | घटना / नीति | महत्व |
1934-1945 | विश्वेश्वरैया योजना, राष्ट्रीय योजना समिति (1938), बॉम्बे योजना व गांधीवादी योजना (1944), जन योजना (1945) | स्वतंत्रता-पूर्व नियोजन के विचार |
6 अप्रैल 1948 | पहली औद्योगिक नीति; भारतीय औद्योगिक वित्त निगम (1 जुलाई) | मिश्रित अर्थव्यवस्था की नींव |
15 मार्च 1950 | योजना आयोग | नियोजन का संस्थागत ढाँचा |
1951 | उद्योग (विकास एवं विनियमन) अधिनियम; पहली पंचवर्षीय योजना | लाइसेंस राज का विधिक आधार |
1955 | कार्वे समिति; भारतीय औद्योगिक ऋण एवं निवेश निगम | लघु उद्योग आरक्षण |
30 अप्रैल 1956 | औद्योगिक नीति संकल्प; दूसरी योजना (महालनोबिस मॉडल) | "आर्थिक संविधान" — अनुसूची क, ख, ग |
1964 | भारतीय औद्योगिक विकास बैंक; एकाधिकार जाँच आयोग | औद्योगिक वित्त; एकाधिकार की पड़ताल |
1965 | कांडला निर्यात प्रसंस्करण क्षेत्र | एशिया का पहला |
1969 | एकाधिकार एवं प्रतिबंधात्मक व्यापार व्यवहार अधिनियम; 14 बैंकों का राष्ट्रीयकरण | आर्थिक शक्ति के संकेंद्रण पर रोक |
1973 | विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम | विदेशी मुद्रा पर कड़ा नियंत्रण |
1977 / 1980 | औद्योगिक नीति वक्तव्य | कुटीर उद्योग व ज़िला उद्योग केंद्र / क्रमिक उदारीकरण |
1982 | नाबार्ड व निर्यात-आयात बैंक | ग्रामीण व निर्यात वित्त |
1990 | भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक (2 अप्रैल) | लघु उद्योग वित्त |
मई-जुलाई 1991 | लगभग 67 टन सोना गिरवी; रुपये का अवमूल्यन (1 व 3 जुलाई) | भुगतान संतुलन संकट |
24 जुलाई 1991 | नई औद्योगिक नीति व ऐतिहासिक बजट | एलपीजी सुधारों की शुरुआत |
1992-1994 | सेबी को वैधानिक दर्जा (1992); निजी बैंकों को प्रवेश (1993); चालू खाता परिवर्तनीयता (अगस्त 1994) | वित्तीय व बाह्य क्षेत्र सुधार |
1 जनवरी 1995 | विश्व व्यापार संगठन | भारत संस्थापक सदस्य |
1997 | नवरत्न व मिनीरत्न योजना | सार्वजनिक उपक्रमों को स्वायत्तता |
1999 / 2000 | विनिवेश विभाग (1999); विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (1 जून 2000 से); विशेष आर्थिक क्षेत्र नीति (2000); मॉडर्न फ़ूड्स की रणनीतिक बिक्री | दंडात्मक से प्रबंधकीय दृष्टि |
2002 | प्रतिस्पर्धा अधिनियम; हिंदुस्तान ज़िंक व विदेश संचार निगम का विनिवेश | प्रतिस्पर्धा-आधारित नियमन |
2005 / 2006 | विशेष आर्थिक क्षेत्र अधिनियम (2005); सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम विकास अधिनियम (2006) | विधिक ढाँचा |
2009 | एकाधिकार अधिनियम निरस्त (1 सितंबर); महारत्न योजना | प्रतिस्पर्धा आयोग पूर्णतः सक्रिय |
2011 | राष्ट्रीय विनिर्माण नीति | राष्ट्रीय निवेश एवं विनिर्माण क्षेत्र की परिकल्पना |
2014 / 2015 | मेक इन इंडिया (25 सितंबर 2014); नीति आयोग (1 जनवरी 2015); मुद्रा (अप्रैल 2015) | विनिर्माण अभियान |
2016 | स्टार्टअप इंडिया (16 जनवरी); स्टैंड-अप इंडिया (5 अप्रैल); निवेश एवं सार्वजनिक परिसंपत्ति प्रबंधन विभाग | उद्यमिता व समावेशी ऋण |
1 जुलाई 2017 | वस्तु एवं सेवा कर | एकीकृत अप्रत्यक्ष कर |
2019 | निगम कर में कटौती (22% / 15%); उद्योग संक्रमण नेतृत्व समूह (भारत-स्वीडन) | निवेश-अनुकूल कर; हरित उद्योग |
2020 | आत्मनिर्भर भारत (12 मई); लघु उद्यमों की नई परिभाषा व उद्यम पोर्टल (1 जुलाई); उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (मार्च-नवंबर) | कोविड-उपरांत आत्मनिर्भरता |
2021 | अवसंरचना वित्तपोषण बैंक; नई सार्वजनिक क्षेत्र उद्यम नीति; भारत सेमीकंडक्टर मिशन; राष्ट्रीय मुद्रीकरण पाइपलाइन; पीएम गति शक्ति; एयर इंडिया की बोली (अक्टूबर) | अवसंरचना व रणनीतिक विनिवेश |
2022 | एयर इंडिया टाटा को सौंपी (27 जनवरी); राष्ट्रीय लॉजिस्टिक्स नीति (सितंबर); मेक इन इंडिया 2.0 | निजीकरण का प्रतीक |
2023 | जन विश्वास अधिनियम; अनुसंधान राष्ट्रीय अनुसंधान फ़ाउंडेशन अधिनियम; पीएम विश्वकर्मा | विनियमन-मुक्ति व अनुसंधान |
2024 | उन्नति योजना (मार्च); पीएम ई-ड्राइव (सितंबर); 12 औद्योगिक स्मार्ट शहर (अगस्त); राइज़िंग राजस्थान समिट व राजस्थान निवेश प्रोत्साहन योजना 2024 (दिसंबर) | क्षेत्रीय औद्योगीकरण |
2025 | राष्ट्रीय विनिर्माण मिशन (बजट); लघु उद्यमों की नई सीमाएँ (1 अप्रैल); इलेक्ट्रॉनिक्स घटक योजना (अप्रैल); नीति आयोग विनिर्माण रोडमैप (29 अक्टूबर); श्रम संहिताएँ लागू (21 नवंबर); वस्तु एवं सेवा कर 2.0 (22 सितंबर) | विनिर्माण को नई गति |
2026 | सेमीकंडक्टर मिशन 2.0 व लघु-मध्यम उद्यम वृद्धि कोष (बजट); भव्य योजना (18 मार्च); नीति आयोग के नए उपाध्यक्ष (24 अप्रैल); औद्योगिक उत्पादन सूचकांक का नया आधार वर्ष 2022-23 (जून); सेमीकॉन 2.0 व मोबाइल विनिर्माण योजना को मंज़ूरी (15 जुलाई) | नई पीढ़ी के औद्योगिक सुधार |
❝ "उद्योगीकरण करो या नष्ट हो जाओ।" (Industrialise or Perish.) (— सर एम. विश्वेश्वरैया) |
🏭 निष्कर्ष भारत की औद्योगिक यात्रा "नियंत्रण से प्रतिस्पर्धा" और "आयात प्रतिस्थापन से वैश्विक मूल्य-शृंखला" तक की यात्रा है — 1956 की नीति ने आधार बनाया, 1991 के सुधारों ने दरवाज़े खोले और आज उत्पादन आधारित प्रोत्साहन, सेमीकंडक्टर मिशन व राष्ट्रीय विनिर्माण मिशन उस आधार पर नई मंज़िल बना रहे हैं। फिर भी विनिर्माण की हिस्सेदारी का लगभग स्थिर रहना, लघु उद्यमों का "बौनापन", अनुसंधान पर कम व्यय और रोज़गार-विहीन वृद्धि जैसी चुनौतियाँ बताती हैं कि अगली पीढ़ी के सुधार — भूमि, श्रम, कौशल, लॉजिस्टिक्स और नवाचार — अनिवार्य हैं। लगभग 140 करोड़ भारतीयों की ज़रूरतें पूरी करने और लघु उद्यमों को वैश्विक मूल्य-शृंखला से जोड़कर भारत को 21वीं सदी का नया विनिर्माण केंद्र बनाने के लिए तीन दशक पुरानी औद्योगिक नीति की जगह नई औद्योगिक नीति की आवश्यकता है। करोड़ों युवाओं को रोज़गार देने, 5 ट्रिलियन डॉलर से आगे बढ़ने और "विकसित भारत 2047" के लक्ष्य के लिए उद्योग को समावेशी, हरित और तकनीक-आधारित बनाना — यही सतत विकास लक्ष्य-9 और संविधान के नीति-निदेशक तत्वों की भावना है। |
अध्याय पढ़ने के बाद दोहराने (रिवीज़न) के लिए — हर ज़रूरी शब्द एक पंक्ति में। विस्तृत परिभाषा और उदाहरण अध्याय के भीतर "आसान परिभाषा" बॉक्स में हैं।
शब्द | एक पंक्ति में अर्थ |
द्वितीयक क्षेत्र (Secondary Sector) | कच्चे माल को तैयार माल में बदलने वाला क्षेत्र — विनिर्माण, निर्माण, खनन, बिजली-गैस-जल। |
कोर उद्योग (Core Industries) | आठ आधारभूत उद्योग — कोयला, कच्चा तेल, प्राकृतिक गैस, रिफ़ाइनरी उत्पाद, उर्वरक, इस्पात, सीमेंट, बिजली। |
मिश्रित अर्थव्यवस्था (Mixed Economy) | जहाँ सरकारी और निजी — दोनों क्षेत्र साथ-साथ काम करें। |
लाइसेंस-परमिट राज (License Raj) | हर बड़े व्यावसायिक फ़ैसले से पहले सरकारी अनुमति की व्यवस्था (1951-1991)। |
आयात प्रतिस्थापन (Import Substitution) | जो सामान बाहर से आता है, उसे देश में ही बनाना। |
शिशु उद्योग तर्क (Infant Industry Argument) | नए घरेलू उद्योग को विदेशी प्रतिस्पर्धा से कुछ समय बचाकर बड़ा होने देना। |
हिंदू संवृद्धि दर (Hindu Rate of Growth) | 1950-80 की लगभग 3.5% की धीमी वृद्धि दर का व्यंग्यात्मक नाम। |
शब्द | एक पंक्ति में अर्थ |
भुगतान संतुलन (Balance of Payments) | एक वर्ष में देश के कुल विदेशी लेन-देन का हिसाब। |
चालू खाता घाटा (Current Account Deficit) | वस्तु-सेवा आयात और विदेश भुगतान, निर्यात व विदेशी आय से अधिक। |
जुड़वाँ घाटा (Twin Deficit) | राजकोषीय घाटा और चालू खाता घाटा — दोनों एक साथ ऊँचे। |
अवमूल्यन (Devaluation) | सरकार द्वारा अपनी मुद्रा का मूल्य विदेशी मुद्रा के मुक़ाबले जानबूझकर घटाना। |
उदारीकरण (Liberalisation) | सरकारी नियंत्रण घटाकर बाज़ार को फ़ैसले लेने देना। |
विनिवेश (Disinvestment) | सरकारी उपक्रम में सरकार की हिस्सेदारी बेचना। |
स्वचालित मार्ग (Automatic Route) | विदेशी निवेश जिसके लिए सरकार की पूर्व-अनुमति नहीं चाहिए। |
चालू खाता परिवर्तनीयता (Current Account Convertibility) | व्यापार, यात्रा, पढ़ाई जैसे लेन-देन के लिए रुपये को विदेशी मुद्रा में बदलने की स्वतंत्रता। |
शब्द | एक पंक्ति में अर्थ |
औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP) | कारख़ानों के भौतिक उत्पादन का मासिक सूचकांक। |
क्रय प्रबंधक सूचकांक (PMI) | कंपनियों की धारणा पर आधारित सूचकांक — 50 से ऊपर विस्तार। |
क्षमता उपयोग (Capacity Utilisation) | कारख़ाना अपनी पूरी क्षमता का कितना हिस्सा उपयोग कर रहा है। |
विकास वित्तीय संस्था (DFI) | उद्योग-अवसंरचना को लंबी अवधि का ऋण देने वाली विशेष संस्था। |
पुनर्वित्त (Refinance) | ऋण दे चुके बैंकों को बड़ी संस्था द्वारा फिर से धन देना। |
संपार्श्विक / गिरवी (Collateral) | ऋण के बदले बैंक के पास रखी जाने वाली संपत्ति। |
बौनापन (Dwarfism) | छूट खोने के डर से उद्यम का जानबूझकर छोटा बने रहना। |
उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) | देश में बढ़ी हुई बिक्री पर सरकार का नकद इनाम। |
यूनिकॉर्न (Unicorn) | 1 अरब डॉलर या अधिक मूल्यांकन वाला स्टार्टअप। |
उद्यम पूँजी (Venture Capital) | नए, जोखिम भरे पर संभावनाशील व्यवसायों में हिस्सेदारी के बदले लगाया गया धन। |
पूरे अध्याय को एक पेज पर देखिए — पढ़ाई के बाद दोहराने का सबसे तेज़ तरीका। हर डिब्बा अध्याय के एक बड़े हिस्से को तीन मुख्य बिंदुओं में समेटता है।
![]() चित्र 13: उद्योग एवं औद्योगिक नीति — पूरे अध्याय का नक्शा |