🌅 कहानी से शुरुआत 📖 कहानी 1 — रामलाल का एक साल जून का महीना है। अलवर ज़िले के एक गाँव में रामलाल (काल्पनिक) आसमान की ओर देख रहा है। उसके पास कुल ढाई बीघा ज़मीन है — दादा के ज़माने में बीस बीघा थी, पर तीन पीढ़ियों के बँटवारे में टुकड़े-टुकड़े हो गई। बुवाई सिर पर है, पर बीज और खाद के पैसे नहीं। गाँव का साहूकार हर बार की तरह तैयार है — "दो रुपया सैकड़ा महीना", यानी साल का चौबीस प्रतिशत ब्याज। तभी पड़ोसी गोपाल बताता है कि बैंक से किसान क्रेडिट कार्ड बनता है, जिस पर समय पर चुकाने से केवल 4% ब्याज लगता है। रामलाल हिचकते हुए बैंक जाता है। ज़मीन के काग़ज़ अधूरे निकलते हैं — दादा के नाम की ज़मीन अभी तक तीनों भाइयों के नाम नहीं चढ़ी। पटवारी के तीन चक्कर लगते हैं, तब कार्ड बनता है। उसी हफ़्ते पीएम-किसान की ₹2,000 की किस्त भी खाते में आ जाती है। बाजरा अच्छा उगता है, पर कटाई से ठीक पहले बेमौसम ओले गिरते हैं। आधी फसल बर्बाद। रामलाल टूट जाता है — फिर उसे याद आता है कि कार्ड के साथ फसल बीमा भी हुआ था। 72 घंटे में शिकायत दर्ज होती है, फसल कटाई प्रयोग होता है, और दो महीने बाद नुकसान का एक हिस्सा खाते में आ जाता है। रबी में वह सरसों बोता है और मृदा स्वास्थ्य कार्ड देखकर पहली बार यूरिया कम और सल्फर ज़्यादा डालता है। फसल शानदार होती है। पर मंडी पहुँचकर पता चलता है कि आढ़तिया न्यूनतम समर्थन मूल्य से ₹400 कम भाव दे रहा है। गाँव के किसान उत्पादक संगठन का सचिव उसे ई-नाम पर बोली दिखाता है — गुजरात का एक तेल मिल बेहतर भाव दे रहा है। संगठन सबकी सरसों इकट्ठी करके सीधे बेच देता है। साल के अंत में रामलाल हिसाब लगाता है — साहूकार का कर्ज़ नहीं लिया, ओलों का नुकसान आधा भर गया, और सरसों का दाम बिचौलिये के बिना मिला। उसे समझ आता है कि उसकी हर चिंता के पीछे सरकार की कोई न कोई नीति खड़ी है — बस उसे जानना और उस तक पहुँचना ज़रूरी है। ✦ ✦ ✦ 📖 कहानी 2 — 1965 की भूख से 2026 के भंडार तक 1965 की एक सुबह। मुंबई बंदरगाह पर अमेरिका से आया एक जहाज़ लंगर डालता है। उसमें गेहूँ भरा है, और वह गेहूँ बिना गोदाम में रुके सीधे राशन की दुकानों तक भेजा जाता है — क्योंकि देश के पास अगले दिन खिलाने को भी पर्याप्त अनाज नहीं। अख़बार इसे "जहाज़ से मुँह तक" कहते हैं। उसी साल युद्ध छिड़ता है, और अनाज भेजने वाला देश दबाव बनाने लगता है। प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री रेडियो पर देशवासियों से सप्ताह में एक समय का भोजन छोड़ने की अपील करते हैं — और ख़ुद भी छोड़ते हैं। वे नारा देते हैं — "जय जवान, जय किसान"। उधर दिल्ली के एक प्रयोगशाला-खेत में युवा वैज्ञानिक एम.एस. स्वामीनाथन मैक्सिको से आए बौने गेहूँ के पौधों को देख रहे हैं, जिनकी बालियाँ इतनी भारी हैं कि सामान्य पौधा होता तो गिर जाता। अगले साल 18,000 टन बीज जहाज़ों में आते हैं — पर इस बार अनाज नहीं, बीज। पंजाब के किसान पहले शक करते हैं, फिर बोते हैं, और फसल देखकर दंग रह जाते हैं। कुछ ही वर्षों में गोदाम छोटे पड़ने लगते हैं। उधर गुजरात के आणंद में वर्गीज़ कुरियन दूध की एक और क्रांति गढ़ रहे होते हैं। अब 2026 में आइए। भारत दुनिया का सबसे बड़ा चावल और दूध उत्पादक है, सरकारी भंडार भरे हैं, 80 करोड़ से अधिक लोगों को मुफ़्त राशन मिल रहा है, और देश अनाज निर्यात करता है। पर एक नई चिंता खड़ी है — पंजाब का भूजल तेज़ी से नीचे जा रहा है, मिट्टी थक रही है, और जिस किसान ने देश का पेट भरा, उसकी अपनी आय अब भी कम है। 🎯 इस अध्याय में हम इन्हीं दोनों कहानियों को खोलेंगे — भारत ने भूख को कैसे हराया (हरित, श्वेत और दूसरी क्रांतियाँ, भूमि सुधार, सहकारिता); किसान को ऋण, बीमा और सही दाम दिलाने वाली व्यवस्थाएँ कैसे काम करती हैं; राशन और खाद्य सुरक्षा का ढाँचा क्या है; और खेती की आज की चुनौतियों — पानी, जलवायु, छोटी जोत और कम आय — का रास्ता क्या है। |
भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि की भूमिका केवल "अनाज उगाने" तक सीमित नहीं है — यह करोड़ों परिवारों की आजीविका, ग्रामीण माँग, उद्योगों के कच्चे माल और देश की खाद्य-पोषण सुरक्षा की नींव है। कृषि एवं संबद्ध गतिविधियों में फसलें, बागवानी, पशुपालन, डेयरी, मत्स्य पालन, पुष्प-कृषि (Floriculture), वानिकी, मधुमक्खी पालन (Apiculture) व रेशम-कीट पालन (Sericulture) शामिल हैं।
![]() चित्र 1: भारत की तीन फसल ऋतुएँ — खरीफ, रबी और ज़ायद |
![]() चित्र 2: प्रमुख फ़सलों के उत्पादन में प्रथम राज्य — मानचित्र |
❝ "बाकी सब कुछ इंतज़ार कर सकता है, पर कृषि नहीं।" (Everything else can wait, but not agriculture.) (— पंडित जवाहरलाल नेहरू) |
संकेतक | आँकड़ा |
राष्ट्रीय आय (GVA) में योगदान | लगभग 18-20% — "लगभग एक-पाँचवाँ हिस्सा" |
कुल कार्यबल में हिस्सेदारी | लगभग 46.1% जनसंख्या कृषि व संबद्ध क्षेत्रों पर निर्भर (आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण 2023-24) |
खाद्यान्न उत्पादन — 2024-25 (अंतिम) | 357.73 मिलियन टन (3,577.3 लाख टन) — तत्कालीन सर्वाधिक |
खाद्यान्न उत्पादन — 2025-26 (तृतीय अग्रिम अनुमान, 27 मई 2026) | 376.56 मिलियन टन — नया रिकॉर्ड (5.3% वृद्धि): चावल 154.02, गेहूँ 120.66, मक्का 55.09, श्री अन्न 17.58, दलहन 17.87 मिलियन टन; तिलहन 43.06 मिलियन टन; गन्ना 500.06 मिलियन टन; कपास 290.24 लाख गाँठ |
बागवानी उत्पादन (2024-25) | 362.08 मिलियन टन — खाद्यान्न से भी आगे; कृषि जीवीए का लगभग 33% (एक-तिहाई) |
कृषि निर्यात | 2024-25: लगभग $51.1 अरब (₹4.46 लाख करोड़) — कुल वस्तु निर्यात का लगभग 11.7%; 2025-26 में भी $50 अरब से अधिक |
छोटे व सीमांत किसान | कृषि जनगणना 2015-16: 86% से अधिक (2 हेक्टेयर से कम भूमि) |
औसत परिचालन जोत | कृषि जनगणना 2015-16: भारत 1.08 हेक्टेयर; नाबार्ड के हालिया सर्वेक्षण में औसत जोत घटकर लगभग 0.74 हेक्टेयर |
उत्पादन (टन में) के आधार पर शीर्ष 5 फसलें | गन्ना > चावल > गेहूँ > तिलहन > दलहन |
क्षेत्रफल के आधार पर शीर्ष फसलें | चावल > गेहूँ > मोटे अनाज > दलहन > तिलहन > कपास > गन्ना |
🔎 तालिका से क्या समझें: तालिका का पहला संदेश है — देश की कुल आय में कृषि का हिस्सा केवल लगभग पाँचवाँ है, पर लगभग आधी कार्यशक्ति इसी पर निर्भर है। यानी खेती में "लोग अधिक, आय कम" है, इसलिए प्रति व्यक्ति कृषि आय बाकी क्षेत्रों से बहुत कम रहती है। दूसरा संदेश — उत्पादन लगातार रिकॉर्ड बना रहा है और बागवानी अब खाद्यान्न से भी आगे निकल चुकी है।
📘 आसान परिभाषा: सकल मूल्य वर्धन (Gross Value Added — GVA) |
📚 परिभाषा: किसी क्षेत्र के कुल उत्पादन के मूल्य में से उसमें प्रयुक्त मध्यवर्ती वस्तुओं (बीज, उर्वरक, ईंधन, कीटनाशक) का मूल्य घटाने पर प्राप्त शुद्ध जोड़ा गया मूल्य। |
✅ आसान भाषा में: खेती ने बाहर से खरीदी चीज़ों के ऊपर अपने दम पर जितना नया मूल्य पैदा किया, वही उसका मूल्य वर्धन है। 🏠 उदाहरण: किसान ने ₹10,000 के बीज-खाद-डीज़ल लगाए और ₹50,000 की फसल बेची — उसका मूल्य वर्धन ₹40,000 है। |
⚠️ ध्यान दें — इकाइयाँ मिलियन टन और लाख टन: 1 मिलियन टन = 10 लाख टन। इसलिए 357.73 मिलियन टन = 3,577.3 लाख टन। कपास "गाँठ" में मापी जाती है — एक गाँठ (Bale) = 170 किलोग्राम रुई। 290 लाख गाँठ का अर्थ है लगभग 49 लाख टन रुई। |
समय-सीमा | वास्तविक जीवीए वृद्धि | टिप्पणी |
2024-25 | 4.6% | पशुधन व मत्स्य पालन के दम पर मज़बूत वृद्धि |
2025-26 (प्रथम अग्रिम अनुमान, पुरानी श्रृंखला) | 3.1% | सामान्य मानसून के बावजूद धीमी; नॉमिनल वृद्धि मात्र 0.8% (खाद्य मुद्रास्फीति में तेज़ गिरावट के कारण) |
पिछले 5 वर्षों का औसत | लगभग 4.40% | कोविड काल में भी कृषि ने सकारात्मक वृद्धि दी |
दशकीय औसत (2015-16 से 2024-25) | 4.45% | 1975 के बाद का सर्वाधिक दशकीय औसत — फसलें 3.5%, पशुधन 7.1%, मत्स्य पालन 8.8% |
🔎 तालिका से क्या समझें: 2025-26 में वास्तविक वृद्धि 3.1% पर नॉमिनल वृद्धि केवल 0.8% रही — यह विचित्र लगता है, क्योंकि आम तौर पर नॉमिनल अधिक होती है। इसका अर्थ है कि उत्पादन तो बढ़ा, पर कृषि उपज के दाम गिर गए (खाद्य मुद्रास्फीति बहुत कम हो गई)। उपभोक्ता के लिए यह अच्छी ख़बर है, पर किसान की नक़द आय लगभग स्थिर रह गई। दशकीय तालिका दिखाती है कि असली तेज़ी पशुधन (7.1%) और मत्स्य (8.8%) में है, फसलों (3.5%) में नहीं।
📌 संरचनात्मक बदलाव — वृद्धि के नए इंजन कृषि की वृद्धि अब "फसलों" से नहीं, बल्कि पशुधन, मत्स्य पालन और बागवानी से आ रही है। 2014-15 से 2023-24 के बीच पशुधन जीवीए में लगभग 195% की वृद्धि (चालू मूल्य पर लगभग 12.77% वार्षिक चक्रवृद्धि) हुई। कृषि वृद्धि दर कुल जीडीपी वृद्धि से धीमी रही है — इसके मूल में खंडित जोतें, अपर्याप्त मशीनीकरण और कम सार्वजनिक निवेश हैं। |
विशेषता | विवरण |
मानसून पर निर्भरता | लगभग 51% शुद्ध बोया गया क्षेत्र वर्षा-आधारित (Rainfed); कुल खेती का लगभग 60-70% किसी न किसी रूप में वर्षा पर निर्भर |
बहुफसली व मिश्रित प्रकृति | खाद्यान्न, बागवानी, दुग्ध, मत्स्य व पशुपालन — सभी साथ-साथ |
तीन फसल ऋतुएँ | खरीफ (Kharif — वर्षा ऋतु), रबी (Rabi — शीत ऋतु) व ज़ायद (Zaid — ग्रीष्म) |
निर्वाह से वाणिज्यिक की ओर | हरित क्रांति के बाद बाज़ार-उन्मुख खेती बढ़ी, पर छोटे किसान अब भी मुख्यतः निर्वाह खेती करते हैं |
🔎 तालिका से क्या समझें: ये पाँचों विशेषताएँ एक-दूसरे से जुड़ी हैं — छोटी जोत के कारण मशीन और सिंचाई में निवेश कठिन है, इसलिए खेती बारिश पर टिकी रहती है; बारिश पर टिके रहने से जोखिम बढ़ता है, और जोखिम के कारण किसान केवल पेट भरने लायक (निर्वाह) खेती करता है।
📘 आसान परिभाषा: पैमाने की मितव्ययिता (Economies of Scale) |
📚 परिभाषा: उत्पादन का आकार बढ़ने पर प्रति इकाई औसत लागत में होने वाली कमी — क्योंकि मशीन, परिवहन और ख़रीद जैसी स्थिर लागतें अधिक इकाइयों में बँट जाती हैं। |
✅ आसान भाषा में: काम जितना बड़ा, हर इकाई उतनी सस्ती। 🏠 उदाहरण: एक ट्रैक्टर 2 बीघा जोते या 50 बीघा, उसकी किस्त उतनी ही है — 50 बीघा वाले को प्रति बीघा जुताई कहीं सस्ती पड़ती है। |
📘 आसान परिभाषा: निर्वाह खेती (Subsistence Farming) |
📚 परिभाषा: वह खेती जिसमें उपज मुख्यतः किसान परिवार के अपने उपभोग के लिए होती है और बाज़ार में बेचने के लिए बहुत कम बचता है; इसके विपरीत वाणिज्यिक खेती बाज़ार में बेचने के लिए की जाती है। |
✅ आसान भाषा में: पेट भरने के लिए खेती, बेचने के लिए नहीं। 🏠 उदाहरण: छोटे किसान का बाजरा घर के आटे में खप जाता है; जबकि श्रीगंगानगर का किन्नू पूरी तरह मंडी के लिए उगाया जाता है। |
🥇 विश्व में प्रथम (शीर्ष उत्पादक) | 🥈 विश्व में द्वितीय |
◆ चावल — 2024-25 में लगभग 150 मिलियन टन के साथ चीन को पीछे छोड़कर विश्व का सबसे बड़ा उत्पादक (जनवरी 2026 में घोषणा) ◆ दूध (लगभग 247.87 मिलियन टन, 2024-25) ◆ दलहन, मसाले, मोटे अनाज (श्री अन्न), हल्दी, जूट, सूखा प्याज़ | ◆ गेहूँ, गन्ना, कपास ◆ फल, सब्ज़ियाँ, आलू ◆ अंडे (149.11 अरब, 2024-25), मछली उत्पादन ◆ मांस उत्पादन में चौथा स्थान ◆ कुल कृषि उत्पादन के मूल्य की दृष्टि से विश्व में दूसरा सबसे बड़ा कृषि उत्पादक देश (चीन के बाद) |
फसल | प्रथम | द्वितीय | तृतीय |
चावल | उत्तर प्रदेश | तेलंगाना | पश्चिम बंगाल |
गेहूँ | उत्तर प्रदेश | मध्य प्रदेश | पंजाब |
मक्का | मध्य प्रदेश | कर्नाटक | बिहार |
मोटे अनाज | राजस्थान | कर्नाटक | मध्य प्रदेश |
कुल दलहन | मध्य प्रदेश | महाराष्ट्र | राजस्थान |
चना | महाराष्ट्र | मध्य प्रदेश | राजस्थान |
मूँगफली | गुजरात | राजस्थान | मध्य प्रदेश |
रेपसीड व सरसों | राजस्थान | उत्तर प्रदेश | हरियाणा |
सोयाबीन | महाराष्ट्र | मध्य प्रदेश | राजस्थान |
कुल तिलहन | राजस्थान | मध्य प्रदेश | महाराष्ट्र |
गन्ना | उत्तर प्रदेश | महाराष्ट्र | कर्नाटक |
कपास | महाराष्ट्र | गुजरात | तेलंगाना |
🔎 तालिका से क्या समझें: इस तालिका में राजस्थान बार-बार दिखता है — सरसों, कुल तिलहन और मोटे अनाज में पहले स्थान पर, और चना, मूँगफली, दलहन तथा सोयाबीन में शीर्ष तीन में। यह बताता है कि कम पानी वाली फसलों में मरुप्रदेश देश की रीढ़ है। दूसरी ओर पानी माँगने वाले चावल-गन्ने में उत्तर प्रदेश और दक्षिण-पूर्वी राज्य आगे हैं।
फसल | किस्में |
चावल | सीआर धान 310; आईआर-8 ("मिरेकल राइस") |
गेहूँ | डब्ल्यूबी 02, सोनोरा-64, लेर्मा रोजो-64, राज-3077; कल्याण सोना, सोनालिका |
मक्का | पूसा विवेक, माही कंचन |
रागी / मडुआ | एचएचबी 299 |
जौ | आरडी-2035 |
बाजरा | आरएचबी-30 |
🎯 याद रखें — इस खंड के मुख्य बिंदु 1. कृषि का देश की आय (जीवीए) में हिस्सा लगभग 18-20%, पर लगभग 46% कार्यशक्ति इसी पर निर्भर — "लोग अधिक, आय कम"। 2. 2025-26 में खाद्यान्न 376.56 मिलियन टन (रिकॉर्ड); बागवानी उत्पादन खाद्यान्न से भी अधिक। 3. वृद्धि के नए इंजन — पशुधन (7.1%) और मत्स्य (8.8%); फसलें केवल लगभग 3.5%। 4. राजस्थान — सरसों, कुल तिलहन और मोटे अनाज में देश में पहला। |
मंत्रालय / विभाग | प्रमुख संस्थान / निकाय |
कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय — कृषि एवं किसान कल्याण विभाग | स्वायत्त/सहकारी निकाय: भारतीय राष्ट्रीय कृषि सहकारी विपणन संघ (NAFED), लघु कृषक कृषि व्यवसाय संघ (SFAC); कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (CACP) — संलग्न कार्यालय |
कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय — कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग (DARE) | भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR); 3 केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय — डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय (पूसा, बिहार), केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय (इंफाल, मणिपुर), रानी लक्ष्मी बाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय (झाँसी, उत्तर प्रदेश) |
मत्स्य पालन, पशुपालन एवं डेयरी मंत्रालय (स्थापना 2019) — पशुपालन एवं डेयरी विभाग | राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (NDDB); पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 के तहत भारतीय पशु कल्याण बोर्ड |
मत्स्य पालन, पशुपालन एवं डेयरी मंत्रालय — मत्स्य पालन विभाग | राष्ट्रीय मात्स्यिकी विकास बोर्ड (NFDB, हैदराबाद); तटीय जलकृषि प्राधिकरण (चेन्नई) |
वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय | कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (APEDA — अधिनियम 1985, स्थापना 1986); राष्ट्रीय हल्दी बोर्ड (2025); समुद्री उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (MPEDA); चाय, कॉफ़ी, रबर, मसाला व तंबाकू बोर्ड |
उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय | भारतीय खाद्य निगम (FCI) |
अन्य मंत्रालय | एमएसएमई मंत्रालय — कॉयर बोर्ड (नारियल जटा); वस्त्र मंत्रालय — केंद्रीय रेशम बोर्ड व जूट बोर्ड; कृषि मंत्रालय — नारियल विकास बोर्ड, राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड (गुरुग्राम, 1984) |
📘 आसान परिभाषा: संलग्न कार्यालय बनाम स्वायत्त निकाय (Attached Office vs Autonomous Body) |
📚 परिभाषा: संलग्न कार्यालय मंत्रालय का ही अंग होता है जो नीति हेतु विशेषज्ञ सलाह और आँकड़े देता है; स्वायत्त निकाय कानून या पंजीकरण से बना अलग संस्थान होता है जिसका अपना प्रबंधन होता है, भले ही धन सरकार दे। |
✅ आसान भाषा में: एक मंत्रालय का "भीतरी विशेषज्ञ विभाग", दूसरा "अलग से चलने वाली संस्था"। 🏠 उदाहरण: कृषि लागत एवं मूल्य आयोग संलग्न कार्यालय है (केवल सिफ़ारिश देता है); भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद स्वायत्त संस्था है (अपने सौ से अधिक संस्थान चलाती है)। |
◆ अन्य महत्वपूर्ण संस्थान: त्रिभुवन सहकारी विश्वविद्यालय (गुजरात — देश का पहला राष्ट्रीय सहकारी विश्वविद्यालय); भारतीय चरागाह एवं चारा अनुसंधान संस्थान (IGFRI, झाँसी); केंद्रीय बागवानी संस्थान (नागालैंड); भारतीय कदन्न (मिलेट्स) अनुसंधान संस्थान (IIMR, हैदराबाद); खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO — संयुक्त राष्ट्र की विशेष एजेंसी, मुख्यालय रोम, स्थापना 1945; खाद्य मूल्य सूचकांक प्रकाशित करता है)।
🎯 याद रखें — इस खंड के मुख्य बिंदु 1. कृषि लागत एवं मूल्य आयोग संलग्न कार्यालय है — समर्थन मूल्य की केवल सिफ़ारिश करता है। 2. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद — कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग के अधीन। 3. मत्स्य पालन, पशुपालन एवं डेयरी मंत्रालय — 2019 में अलग बना। 4. कृषि निर्यात संवर्धन — एपीडा (वाणिज्य मंत्रालय)। |
❝ "जय जवान, जय किसान" (Hail the soldier, hail the farmer — 1965) (— लाल बहादुर शास्त्री) |
◆ 1943 का बंगाल अकाल: द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान लगभग 30-40 लाख लोगों की भुखमरी व महामारियों से मृत्यु — स्वतंत्र भारत की खाद्य नीति के लिए स्थायी चेतावनी।
◆ युद्ध व सूखा: 1962 (भारत-चीन) व 1965 (भारत-पाकिस्तान) युद्धों के बाद आर्थिक दबाव; 1965 और 1966 में लगातार दो वर्ष भीषण सूखा — खाद्यान्न का गंभीर संकट।
◆ पीएल-480 पर निर्भरता: अमेरिका के सार्वजनिक कानून-480 (PL-480) के तहत आयातित गेहूँ पर इतनी निर्भरता कि बंदरगाह पर उतरा अनाज सीधे जनता तक भेजा जाता — इसे "जहाज़ से मुँह तक" कहा गया; 1965 के युद्ध में इस सहायता को राजनीतिक दबाव के औज़ार की तरह प्रयोग किया गया, जिससे संप्रभुता पर संकट आया। इसी से नई कृषि रणनीति अनिवार्य हुई।
📘 आसान परिभाषा: हरित क्रांति (Green Revolution) |
📚 परिभाषा: 1960 के दशक के मध्य (1965-66/1966-67) में उच्च उत्पादकता वाली किस्मों (HYV) के बीजों, रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों, सुनिश्चित सिंचाई और आधुनिक यंत्रों (ट्रैक्टर, थ्रेशर) के समन्वित "पैकेज" के प्रयोग से खाद्यान्न — विशेषकर गेहूँ व चावल — के उत्पादन में हुई तीव्र व अभूतपूर्व वृद्धि को हरित क्रांति कहते हैं। |
✅ आसान भाषा में: वैज्ञानिक तरीकों (बेहतर बीज + खाद + पानी + मशीन) से कम ज़मीन पर ज़्यादा अनाज उगाना सीखना, ताकि देश को अनाज के लिए विदेशों पर निर्भर न रहना पड़े। 🏠 उदाहरण: गेहूँ का उत्पादन 1950 के दशक में मात्र 10-12 मिलियन टन था, जो 1980 के दशक तक 55-60 मिलियन टन और 2025-26 में लगभग 120.7 मिलियन टन तक पहुँच गया। |
पहलू | विवरण |
"हरित क्रांति" (Green Revolution) शब्द | विलियम एस. गॉड (William S. Gaud, USAID) ने 1968 में गढ़ा |
भारत में जनक / वास्तुकार | डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन; नेतृत्व — कृषि मंत्री सी. सुब्रमण्यम, प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ("जय जवान, जय किसान") व इंदिरा गांधी |
विश्व स्तर पर जनक | नॉर्मन बोरलॉग — मैक्सिको में बौनी एचवाईवी गेहूँ किस्में विकसित कीं; नोबेल शांति पुरस्कार 1970 |
1966 का बीज आयात | मैक्सिको से 18,000 टन एचवाईवी गेहूँ बीज — उस समय विश्व की सबसे बड़ी बीज खरीद |
प्रथम प्रयोग-स्थल | पंजाब (साथ में हरियाणा व पश्चिमी उत्तर प्रदेश के नहरी-सिंचित क्षेत्र); वैश्विक स्तर पर पहला सफल प्रयोग मैक्सिको में |
प्रमुख किस्में | गेहूँ — कल्याण सोना, सोनालिका; चावल — आईआर-8 ("मिरेकल राइस", फिलीपींस के अंतर्राष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान — IRRI में विकसित) |
सरकारी कार्यक्रम | गहन कृषि ज़िला कार्यक्रम (IADP, 1960-61) व उच्च उत्पादकता किस्म कार्यक्रम (HYVP, 1966-67) |
सहयोगी संस्थाएँ | भारतीय खाद्य निगम (FCI) व कृषि मूल्य आयोग (अब CACP) — दोनों 1965 में; एमएसपी आधारित खरीद व बफर स्टॉक |
🔎 तालिका से क्या समझें: तालिका हरित क्रांति के तीन स्तंभ दिखाती है — बीज (वैज्ञानिक), नीति (सरकार) और संस्था (खाद्य निगम व मूल्य आयोग)। तीनों के बिना यह सफल न होती: अच्छे बीज से उत्पादन बढ़ा, समर्थन मूल्य ने किसान को नई तकनीक अपनाने का भरोसा दिया, और खाद्य निगम ने बढ़े हुए अनाज को ख़रीदकर भंडार बनाया।
📘 आसान परिभाषा: उच्च उत्पादकता किस्म (High Yielding Variety — HYV) |
📚 परिभाषा: वैज्ञानिक संकरण से विकसित वे बीज जो पर्याप्त सिंचाई और उर्वरक मिलने पर पारंपरिक देसी बीजों की तुलना में कई गुना अधिक उपज देते हैं; ये प्रायः बौने तने वाले होते हैं ताकि भारी बाली के बोझ से गिरें नहीं। |
✅ आसान भाषा में: ऐसा "तेज़" बीज जो खाद-पानी मिलने पर बहुत ज़्यादा अनाज देता है — पर बिना खाद-पानी के उसका जादू नहीं चलता। 🏠 उदाहरण: देसी गेहूँ एक हेक्टेयर में 8-10 क्विंटल देता था; बौनी किस्म ने नहरी खेत में 30-40 क्विंटल दिया। |
मुख्यतः गेहूँ व चावल (इसीलिए आरंभ में इसे "गेहूँ क्रांति" भी कहा गया) की उत्पादकता बढ़ी — विशेषकर पंजाब, हरियाणा व पश्चिमी उत्तर प्रदेश में; दलहन, तिलहन व मोटे अनाजों पर इसका असर सीमित रहा।
फसल | 1950-60 का दशक | 1980-90 का दशक | 2024-25 / 2025-26 |
गेहूँ | 10-12 मिलियन टन | 55-60 मिलियन टन | 117.9 / 120.7 मिलियन टन |
चावल | 34 मिलियन टन (1960) | 74 मिलियन टन (1980) | 150.2 / 154.0 मिलियन टन |
कुल खाद्यान्न | 51 मिलियन टन (1950) | 108 मिलियन टन (1970) | 357.7 / 376.6 मिलियन टन |
✅ हरित क्रांति की उपलब्धियाँ | ⚠️ सीमाएँ एवं नकारात्मक प्रभाव |
◆ खाद्यान्न उत्पादन व उत्पादकता में रिकॉर्ड वृद्धि ◆ खाद्यान्न आत्मनिर्भरता; एफसीआई के माध्यम से विशाल बफर स्टॉक — अकालों से मुक्ति ◆ पीएल-480 जैसी अपमानजनक खाद्य सहायता से मुक्ति — संप्रभुता व रणनीतिक स्वायत्तता मज़बूत ◆ कृषि का आधुनिकीकरण — उर्वरक, नलकूप, ट्रैक्टर; निर्वाह से वाणिज्यिक खेती ◆ किसानों की आय, कृषि-आधारित उद्योगों व ग्रामीण रोज़गार का विस्तार | ◆ क्षेत्रीय विषमता — पंजाब, हरियाणा, प. उत्तर प्रदेश (आंशिक रूप से आंध्र, तमिलनाडु) तक सीमित; पूर्वी-मध्य भारत व शुष्क क्षेत्र पीछे ◆ फसल विषमता — गेहूँ-चावल पर केंद्रित; दलहन, तिलहन, मोटे अनाजों की उपेक्षा → पोषण असंतुलन ◆ भूजल का अति-दोहन — पंजाब में लगभग 80% भूजल इकाइयाँ अति-दोहित ◆ मृदा स्वास्थ्य में गिरावट — उर्वरकों का अति-प्रयोग, लवणता, क्षारीयता, विषाक्तता ◆ जैव विविधता ह्रास — देसी किस्में लुप्त, कीटों में प्रतिरोधक क्षमता ◆ सामाजिक असमानता — पूँजी-गहन तकनीक से बड़े किसानों को अधिक लाभ; छोटे किसान ऋणग्रस्त |
🔎 तालिका से क्या समझें: बाएँ कॉलम का हर लाभ दाएँ कॉलम की किसी कीमत से जुड़ा है — उत्पादन बढ़ा पर भूजल घटा; आत्मनिर्भरता आई पर गेहूँ-चावल पर निर्भरता बढ़ी; बड़े किसान आगे बढ़े पर छोटे पीछे रहे। इसीलिए आज "दूसरी" या "सदाबहार" हरित क्रांति की बात होती है, जो उत्पादन के साथ मिट्टी-पानी को भी बचाए।
📘 आसान परिभाषा: अति-दोहित भूजल इकाई (Over-exploited Groundwater Unit) |
📚 परिभाषा: वह ब्लॉक या क्षेत्र जहाँ हर वर्ष निकाला जाने वाला भूजल, वर्षा से वार्षिक पुनर्भरण (Recharge) के 100% से अधिक हो। |
✅ आसान भाषा में: जितना पानी ज़मीन में साल भर में भरता है, उससे ज़्यादा निकाल लेना। 🏠 उदाहरण: बैंक खाते में महीने में ₹10,000 आएँ और आप ₹12,000 निकालें — हर महीने जमा-पूँजी घटेगी; पंजाब और राजस्थान के अधिकांश ब्लॉकों का भूजल इसी तरह घट रहा है। |
डॉ. स्वामीनाथन ने आगे चलकर "सदाबहार क्रांति" की अवधारणा दी — ऐसी उत्पादकता वृद्धि जो पर्यावरण को नुकसान पहुँचाए बिना, स्थायी रूप से प्राप्त हो। हरित क्रांति 2.0 अब जैव-प्रौद्योगिकी, जलवायु-सहनशील बीजों, जैविक व प्राकृतिक खेती तथा सटीक कृषि (Precision Agriculture) पर केंद्रित है, ताकि दलहन, तिलहन व मोटे अनाज जैसी उपेक्षित फसलों और पूर्वी भारत को भी बढ़ावा मिले। स्वामीनाथन का कथन — "यदि कृषि गलत दिशा में जाती है, तो किसी भी अन्य चीज़ को सही दिशा में जाने का अवसर नहीं मिलेगा।"
क्रांति | संबंधित क्षेत्र / वस्तु | प्रमुख व्यक्ति / योजना |
हरित क्रांति | अनाज (गेहूँ व चावल) | एम.एस. स्वामीनाथन + नॉर्मन बोरलॉग, 1965-66 |
श्वेत क्रांति | दूध (डेयरी) | डॉ. वर्गीज़ कुरियन — ऑपरेशन फ्लड (1970-96, NDDB) |
नीली क्रांति | मत्स्य पालन व जलीय कृषि | डॉ. हीरालाल चौधरी व डॉ. अरुण कृष्णन; सातवीं योजना (1985-90) में मत्स्य किसान विकास एजेंसी; आज प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना |
पीली क्रांति | तिलहन (सरसों, सोयाबीन, सूरजमुखी, मूँगफली) व खाद्य तेल | सैम पित्रोदा; तिलहन प्रौद्योगिकी मिशन (TMO), 1986 — रणनीति: संकर बीज वितरण, सिंचाई विस्तार, बेहतर मूल्य समर्थन व प्रसंस्करण; प्रभाव: खाद्य तेल आयात-निर्भरता में अस्थायी कमी व आत्मनिर्भरता की ओर प्रगति |
स्वर्णिम क्रांति (Golden) | बागवानी (फल, सब्ज़ियाँ, फूल, शहद, मसाले) | 1991-2003 की अवधि में तीव्र वृद्धि |
सदाबहार क्रांति | टिकाऊ (Sustainable) खेती | एम.एस. स्वामीनाथन — द्वितीय हरित क्रांति की अवधारणा |
अन्य प्रतीकात्मक क्रांतियाँ | गुलाबी क्रांति — मांस व मुर्गी पालन (प्याज़ व झींगा उत्पादन से भी जोड़ी जाती है); लाल क्रांति — टमाटर / मांस; रजत (Silver) क्रांति — अंडा उत्पादन (कुक्कुट पालन); गोल्डन फाइबर क्रांति — जूट; सिल्वर फाइबर क्रांति — कपास; भूरी (Brown) क्रांति — चमड़ा, कोको व गैर-परंपरागत कृषि; काली क्रांति — पेट्रोलियम / बायो-डीज़ल; ग्रे (Grey) क्रांति — उर्वरक | कोई एक बड़ा राष्ट्रीय कार्यक्रम नहीं — उत्पादन बढ़ने को दिए गए नाम |
मीठी (Sweet) क्रांति | शहद (मधुमक्खी पालन) | राष्ट्रीय मधुमक्खी पालन एवं शहद मिशन |
इंद्रधनुष क्रांति | सभी कृषि क्षेत्रों का समग्र (एकीकृत) विकास | 21वीं सदी की दृष्टि (राष्ट्रीय कृषि नीति, 2000) |
🔎 तालिका से क्या समझें: हर "रंग" एक उत्पाद से जुड़ा है — रंग याद रखने का आसान तरीका है उत्पाद का रंग सोचना: दूध सफ़ेद (श्वेत), पानी-मछली नीली, सरसों का फूल पीला, अंडा चाँदी जैसा (रजत), जूट सुनहरा रेशा। इनमें केवल हरित, श्वेत, नीली और पीली क्रांति के पीछे बड़ा राष्ट्रीय कार्यक्रम रहा; बाकी नाम प्रायः उत्पादन बढ़ने को दिए गए प्रतीकात्मक नाम हैं।
⚠️ ध्यान दें "स्वर्णिम क्रांति" को किसी एक व्यक्ति के नाम से जोड़ना व्यापक रूप से प्रमाणित नहीं है — इसे "बागवानी व शहद, 1991-2003" के रूप में याद रखना अधिक सुरक्षित है। इसी तरह "गुलाबी" व "लाल" क्रांति के क्षेत्र एक से अधिक वस्तुओं से जोड़े जाते हैं — गुलाबी: मांस, मुर्गी पालन, प्याज़, झींगा; लाल: मांस, टमाटर। |
![]() चित्र 3: भारत की प्रमुख कृषि-क्रांतियाँ — एक नज़र में |
🎯 याद रखें — इस खंड के मुख्य बिंदु 1. हरित क्रांति — 1966-67, पंजाब-हरियाणा-पश्चिमी उत्तर प्रदेश, मुख्यतः गेहूँ (फिर चावल)। 2. भारत में जनक — एम.एस. स्वामीनाथन; विश्व में — नॉर्मन बोरलॉग (नोबेल शांति, 1970)। 3. कमियाँ — क्षेत्रीय, फसल और सामाजिक विषमता, भूजल का अति-दोहन, मिट्टी की थकान। 4. रंग से याद — श्वेत = दूध, नीली = मछली, पीली = तिलहन, स्वर्णिम = बागवानी। |
📘 आसान परिभाषा: भूमि सुधार (Land Reforms) |
📚 परिभाषा: भूमिहीन व सीमांत किसानों में भूमि के पुनर्वितरण, काश्तकारी (Tenancy) को सुरक्षित करने, बिचौलियों को हटाने तथा भूमि तक समान पहुँच सुनिश्चित करने हेतु अपनाए गए नीतिगत व कानूनी उपाय भूमि सुधार कहलाते हैं। इनका मूल सिद्धांत था — "जोतने वाले को भूमि" (Land to the Tiller)। |
✅ आसान भाषा में: आज़ादी के समय बहुत सी ज़मीन कुछ बड़े जमींदारों के पास थी और असली जुताई करने वाला किसान केवल किराएदार (काश्तकार) था। भूमि सुधार का मकसद था कि जो ज़मीन जोतता है, उसे ही मालिकाना हक या सुरक्षित अधिकार मिले। 🏠 उदाहरण: किसी गाँव में एक जमींदार के पास 500 बीघा ज़मीन हो और उस पर 50 किसान परिवार खेती करते हों — भूमि सुधार के तहत उन्हें मालिकाना/स्थायी काश्तकारी हक दिलाना, ताकि वे जमींदार की मर्ज़ी पर निर्भर न रहें। |
व्यवस्था | किसने और कब | लगान कौन वसूलता था | किसान की स्थिति |
स्थायी बंदोबस्त / जमींदारी (Permanent Settlement) | लॉर्ड कॉर्नवालिस, 1793 — बंगाल, बिहार, ओडिशा | जमींदार — सरकार को तय रकम देकर किसानों से मनमाना लगान | सबसे बुरी — किसान केवल काश्तकार, बेदखली का डर |
रैयतवारी (Ryotwari) | थॉमस मुनरो व अलेक्ज़ेंडर रीड, 1820 के आसपास — मद्रास, बंबई | सरकार सीधे किसान (रैयत) से | किसान भूमि का मालिक, पर लगान बहुत ऊँचा |
महालवारी (Mahalwari) | होल्ट मैकेंज़ी, 1822 — उत्तर-पश्चिम प्रांत, पंजाब, मध्य भारत | पूरे गाँव (महाल) से सामूहिक रूप से, गाँव का मुखिया जमा करता था | सामूहिक ज़िम्मेदारी, पर लगान ऊँचा |
🔎 तालिका से क्या समझें: तीनों व्यवस्थाओं में एक बात समान थी — लगान इतना ऊँचा था कि किसान के पास निवेश के लिए कुछ नहीं बचता था। जमींदारी में तो किसान और सरकार के बीच एक पूरा बिचौलिया वर्ग खड़ा हो गया था। इसीलिए आज़ादी के बाद भूमि सुधार का पहला कदम इन बिचौलियों को हटाना था।
📘 आसान परिभाषा: काश्तकार और बटाईदार (Tenant and Sharecropper) |
📚 परिभाषा: काश्तकार वह है जो दूसरे की भूमि पर तय किराया (नकद या अनाज) देकर खेती करता है; बटाईदार वह विशेष काश्तकार है जो किराए की जगह उपज का एक निश्चित भाग — प्रायः आधा — भूस्वामी को देता है। |
✅ आसान भाषा में: ज़मीन किसी और की, पसीना इनका — और कमाई का बड़ा हिस्सा मालिक का। 🏠 उदाहरण: मोहन सेठजी की 5 बीघा ज़मीन जोतता है और हर फसल का आधा अनाज सेठजी के घर पहुँचाता है — मोहन बटाईदार है। |
स्वतंत्रता के समय देश के लगभग 57% क्षेत्र पर जमींदारी जैसी शोषणकारी व्यवस्थाएँ थीं (अन्य क्षेत्र महालवारी व रैयतवारी के अंतर्गत)। भूमि सुधारों के उद्देश्य थे — सामंती शोषण की समाप्ति, सामाजिक न्याय तथा कृषि उत्पादकता में वृद्धि।
![]() चित्र 4: भूमि सुधार के घटक और आधुनिक चरण |
घटक | उद्देश्य एवं मुख्य तथ्य |
(क) जमींदारी / मध्यस्थों का उन्मूलन (1948-54) | राज्य और वास्तविक जोतदार के बीच से जमींदार-जागीरदार जैसे बिचौलियों को हटाना; बेगार व अत्यधिक लगान की समाप्ति। लगभग 2 करोड़ (1.9 करोड़) काश्तकार सीधे राज्य के अधीन भूमि-स्वामी बने; जमींदारों को लगभग ₹670 करोड़ मुआवज़ा; जमींदारों के अधीन रही लगभग 17 करोड़ एकड़ (लगभग 6.8 करोड़ हेक्टेयर) बंजर, परती व वन भूमि राज्य के स्वामित्व में आई। यह भूमि सुधार का सबसे सफल घटक रहा। |
(ख) काश्तकारी सुधार (Tenancy Reforms) | (i) लगान का नियमन — 50-70% तक की शोषणकारी दरों को घटाकर उपज के 1/4 से 1/5 तक; (ii) कार्यकाल-सुरक्षा (Tenure Security) — मनमानी बेदखली पर रोक; (iii) स्वामित्व का अधिकार — लंबे समय से खेती कर रहे काश्तकारों को मुआवज़ा देकर मालिकाना हक। |
(ग) भूमि सीमा अधिनियम (Land Ceiling) | किसी व्यक्ति/परिवार के पास अधिकतम भूमि सीमा तय कर अधिशेष (Surplus) भूमि को भूमिहीनों व सीमांत किसानों (विशेषकर SC/ST) में बाँटना। 1960-72 के बीच कानून; 1972 के राष्ट्रीय दिशानिर्देश — सिंचित भूमि के लिए 10-18 एकड़ और असिंचित भूमि के लिए 54 एकड़ तक की सीमा। देश में लगभग 73 लाख एकड़ भूमि अधिशेष घोषित, लगभग 67 लाख एकड़ अधिग्रहीत और लगभग 54-55 लाख एकड़ का वास्तविक पुनर्वितरण लगभग 57 लाख परिवारों में — पर क्रियान्वयन कमज़ोर रहा। |
(घ) चकबंदी (Consolidation of Holdings) | उत्तराधिकार व विभाजन से बिखरे छोटे-छोटे खेतों को एक स्थान पर एकत्र (चक) करना — कृषि लागत घटी, सिंचाई व यंत्रीकरण आसान; पंजाब, हरियाणा, प. उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक सफल; अन्यत्र बिखराव की समस्या बनी हुई। |
(ङ) भूदान-ग्रामदान आंदोलन (1951-1972) | विनोबा भावे द्वारा (1951, पोचमपल्ली, तेलंगाना से) — बड़े भूस्वामियों द्वारा स्वेच्छा से भूमिहीनों को भूमि-दान। |
![]() चित्र 5: भूमि जोतों का आकार — कृषि जनगणना 2015-16 |
🔎 तालिका से क्या समझें: पाँचों घटकों में सबसे सफल रहा बिचौलियों का उन्मूलन, क्योंकि उसके लिए केवल कानून और मुआवज़ा चाहिए था। सबसे कमज़ोर रहा भूमि सीमा क़ानून — घोषित अधिशेष भूमि का लगभग तीन-चौथाई ही बँट पाया और वह भी देश की कुल कृषि भूमि का बहुत छोटा हिस्सा था। कारण नीचे दिए गए हैं।
📖 पीछे की कहानी — भूदान — एक सभा, एक माँग, सौ एकड़ अप्रैल 1951 में आचार्य विनोबा भावे तेलंगाना के पोचमपल्ली गाँव पहुँचे। वहाँ भूमिहीन दलित परिवारों ने कहा कि उन्हें जीने के लिए लगभग 80 एकड़ ज़मीन चाहिए। विनोबा ने सभा में आह्वान किया कि कोई देने को आगे आए — और गाँव के भूस्वामी वेदिरे रामचंद्र रेड्डी ने 100 एकड़ दान कर दी। यहीं से "भूदान" आंदोलन चला: विनोबा पैदल गाँव-गाँव घूमकर बड़े किसानों से ज़मीन का छठा हिस्सा माँगते रहे। आगे यह "ग्रामदान" (पूरे गाँव की ज़मीन सामूहिक) तक पहुँचा। दान में लाखों एकड़ के वचन मिले, पर बहुत-सी ज़मीन बंजर या विवादित निकली, इसलिए वास्तविक वितरण वादे से काफ़ी कम रहा। |
📖 पीछे की कहानी — ऑपरेशन बर्गा — बटाईदार का नाम काग़ज़ पर 1978 में पश्चिम बंगाल सरकार ने देखा कि क़ानून में बटाईदारों को सुरक्षा तो है, पर उनका नाम किसी रिकॉर्ड में दर्ज नहीं — इसलिए भूस्वामी कभी भी उन्हें हटा देते थे। सरकार ने गाँव-गाँव शिविर लगाए, रात में सभाएँ कीं और बटाईदारों ("बर्गादार") के नाम सरकारी अभिलेख में दर्ज किए। कुछ ही वर्षों में लगभग 14-15 लाख बटाईदार दर्ज हुए, जिन्हें बेदखली से सुरक्षा और उपज में तय हिस्से का अधिकार मिला। यह दिखाता है कि भूमि सुधार में क़ानून से ज़्यादा ज़रूरी है अभिलेख और राजनीतिक इच्छाशक्ति। |
1. राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव — राज्यों के नीति-निर्माता स्वयं बड़े भूस्वामी वर्ग से जुड़े थे।
2. कानूनी छूटें व कमियाँ — बागान, सहकारी कृषि, धार्मिक ट्रस्ट व "स्वयं खेती" (Self-cultivation) के नाम पर अत्यधिक छूट; "स्वयं खेती" की अस्पष्ट परिभाषा का लाभ उठाकर काश्तकारों की बेदखली।
3. बेनामी सौदे — सीमा से बचने के लिए भूमि रिश्तेदारों, नौकरों या फर्जी नामों पर दर्ज कराई गई।
4. प्रशासनिक उदासीनता व भ्रष्टाचार — पटवारी-तहसीलदार स्तर पर भूस्वामियों से मिलीभगत।
5. अपूर्ण व त्रुटिपूर्ण भूमि अभिलेख — वास्तविक काश्तकार की पहचान कठिन।
6. न्यायिक अड़चनें — दशकों तक लंबित मुकदमे।
7. काश्तकारों में अशिक्षा व भय — "स्वैच्छिक आत्मसमर्पण" (Voluntary Surrender) के नाम पर भूमि छोड़नी पड़ी।
8. क्षेत्रीय विषमता — केरल व पश्चिम बंगाल (ऑपरेशन बर्गा, 1978) को छोड़कर अधिकांश राज्यों में मज़बूत सामाजिक-राजनीतिक आंदोलन का अभाव।
📘 आसान परिभाषा: बेनामी सौदा (Benami Transaction) |
📚 परिभाषा: ऐसा लेन-देन जिसमें संपत्ति किसी एक व्यक्ति के नाम दर्ज हो, पर उसका वास्तविक भुगतान और लाभ किसी दूसरे व्यक्ति के पास हो। |
✅ आसान भाषा में: काग़ज़ पर मालिक कोई, असल में कोई और। 🏠 उदाहरण: भूमि सीमा से बचने के लिए ज़मींदार ने 30 एकड़ अपने नौकर के नाम दर्ज करा दी, पर फसल और कमाई ज़मींदार की ही रही। |
पहल | वर्ष | उद्देश्य / मुख्य तथ्य |
राष्ट्रीय भूमि अभिलेख आधुनिकीकरण कार्यक्रम (NLRMP) | 2008 | भूमि अभिलेखों का डिजिटलीकरण व आधुनिकीकरण |
डिजिटल इंडिया भूमि अभिलेख आधुनिकीकरण कार्यक्रम (DILRMP) | 2016 | एनएलआरएमपी का संशोधित रूप; केंद्रीय क्षेत्र की योजना (100% केंद्रीय वित्तपोषण); कैडस्ट्रल मानचित्रों व अधिकार अभिलेखों (Record of Rights) का एकीकरण |
विशिष्ट भूमि पार्सल पहचान संख्या (ULPIN) / "भू-आधार" | चालू | हर भूखंड को उसके अक्षांश-देशांतर निर्देशांकों पर आधारित 14 अंकों की विशिष्ट पहचान संख्या |
मॉडल कृषि भूमि पट्टा अधिनियम | 2016 | नीति आयोग द्वारा प्रस्तावित — भूमि-स्वामी का अधिकार सुरक्षित रखते हुए पट्टे (Leasing) को कानूनी मान्यता |
स्वामित्व योजना (SVAMITVA) | 24 अप्रैल 2020 | ग्रामीण आबादी क्षेत्रों का ड्रोन से सर्वेक्षण व मानचित्रण (पंचायती राज मंत्रालय) |
राज्य-स्तरीय पहलें | — | कर्नाटक — भूमि परियोजना (2000, डिजिटल भूमि रिकॉर्ड); "छोटे किसान, बड़े खेत" — पड़ोसी सीमांत किसान समूह बनाकर अपनी कृषि गतिविधियों को एक साथ व्यवस्थित करते हैं |
📘 आसान परिभाषा: अधिकार अभिलेख और कैडस्ट्रल नक्शा (Record of Rights & Cadastral Map) |
📚 परिभाषा: अधिकार अभिलेख वह सरकारी दस्तावेज़ है जिसमें हर भूखंड का स्वामी, काश्तकार, क्षेत्रफल और उस पर लगे भार (जैसे ऋण) दर्ज होते हैं; कैडस्ट्रल नक्शा उसी भूखंड की सीमाओं का पैमाने पर बना नक्शा है। |
✅ आसान भाषा में: एक काग़ज़ बताता है "ज़मीन किसकी है", दूसरा नक्शा बताता है "ज़मीन कहाँ और कितनी है"। 🏠 उदाहरण: राजस्थान में पटवारी की "जमाबंदी" अधिकार अभिलेख है और खसरा-नक्शा कैडस्ट्रल नक्शा; दोनों का मेल न हो तो भाइयों में मेड़ का झगड़ा अदालत तक पहुँचता है। |
🔎 तालिका से क्या समझें: तालिका बताती है कि भूमि सुधार का आज का रूप "ज़मीन बाँटना" नहीं, "ज़मीन का रिकॉर्ड साफ़ करना" है — डिजिटल अभिलेख, हर भूखंड का 14 अंकों का भू-आधार, और गाँव की आबादी भूमि का ड्रोन सर्वेक्षण। साफ़ रिकॉर्ड से ही बैंक ऋण, फसल बीमा और समर्थन मूल्य जैसे लाभ असली किसान तक पहुँचते हैं।
स्वामित्व (SVAMITVA — Survey of Villages Abadi and Mapping with Improvised Technology in Village Areas) — पंचायती राज मंत्रालय की केंद्रीय क्षेत्र की योजना, 24 अप्रैल 2020 (राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस) को प्रारंभ।
◆ उद्देश्य: ग्रामीण आवासीय भूमि का सटीक सीमांकन कर अधिकार अभिलेख (Record of Rights) देना; संपत्ति विवाद घटाना; संपत्ति को ऋण हेतु "वित्तीय परिसंपत्ति" बनाना; ग्राम पंचायत विकास योजना (GPDP) व संपत्ति कर निर्धारण हेतु सटीक डिजिटल मानचित्र।
◆ तकनीक: भारतीय सर्वेक्षण विभाग के सहयोग से ड्रोन व सतत परिचालन संदर्भ स्टेशन (CORS) नेटवर्क; 2डी/3डी मानचित्रण व जमीनी सत्यापन के बाद "संपत्ति कार्ड"।
📊 स्वामित्व योजना — प्रगति (11 मार्च 2026) — नवीनतम आँकड़े 1. योजना 30 से अधिक राज्यों/केंद्र-शासित प्रदेशों में लागू; लक्षित 3.44 लाख गाँवों में से 3.29 लाख गाँवों में ड्रोन सर्वेक्षण पूरा। 2. 1.87 लाख गाँवों के लिए 3.10 करोड़ संपत्ति कार्ड तैयार; 2.65 करोड़ संपत्ति कार्ड वितरित। 3. देश के सभी दीवानी मुकदमों में लगभग 66% मामले केवल भूमि या संपत्ति विवादों से संबंधित हैं — इसीलिए स्पष्ट भूमि अभिलेख अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। |
🎯 याद रखें — इस खंड के मुख्य बिंदु 1. सबसे सफल घटक — जमींदारी (बिचौलियों) का उन्मूलन; सबसे कमज़ोर — भूमि सीमा क़ानून। 2. भूदान — विनोबा भावे, 18 अप्रैल 1951, पोचमपल्ली (तेलंगाना)। 3. ऑपरेशन बर्गा (1978, पश्चिम बंगाल) — बटाईदारों का नाम अभिलेख में दर्ज। 4. आज का भूमि सुधार = साफ़ रिकॉर्ड — 14 अंकों का भू-आधार, स्वामित्व योजना (24 अप्रैल 2020)। |
📘 आसान परिभाषा: श्वेत क्रांति (White Revolution) |
📚 परिभाषा: श्वेत क्रांति सहकारी मॉडल के माध्यम से भारत में दुग्ध उत्पादन को भारी मात्रा में बढ़ाने का आंदोलन था, जो 1970 में एनडीडीबी द्वारा शुरू "ऑपरेशन फ्लड" के रूप में चला और जिसने भारत को विश्व का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश बना दिया। |
✅ आसान भाषा में: डॉ. वर्गीज़ कुरियन ("भारत के मिल्कमैन") ने छोटे दूध उत्पादकों को संगठित कर ऐसा सहकारी मॉडल बनाया जिसमें दूध का वाजिब दाम किसान को मिले, बिचौलिए को नहीं। 🏠 उदाहरण: गाँव का छोटा दूध उत्पादक अकेले शहर में दूध बेचने नहीं जा सकता, पर जब वह गाँव की डेयरी सहकारी समिति को दूध देता है जो आगे अमूल जैसे संघ से जुड़ी हो, तो उसे उचित दाम मिलता है — यही सहकारिता की ताकत है। |
📖 पीछे की कहानी — अमूल — एक हड़ताल से जन्मा ब्रांड 1940 के दशक में गुजरात के खेड़ा (कैरा) ज़िले के दूध उत्पादक परेशान थे — बंबई को दूध भेजने का ठेका एक निजी कंपनी के पास था, जो किसानों से बहुत सस्ता दूध लेती थी। किसान सरदार वल्लभभाई पटेल के पास गए। सरदार पटेल ने सलाह दी कि अपनी सहकारी समिति बनाओ और निजी कंपनी को दूध देना बंद करो। 1946 में किसानों ने दूध की हड़ताल कर दी — दूध नदी-नालों में बहा दिया, पर कंपनी को नहीं बेचा। अंततः सरकार झुकी और त्रिभुवनदास पटेल के नेतृत्व में खेड़ा ज़िला सहकारी दुग्ध उत्पादक संघ बना। 1949 में युवा इंजीनियर वर्गीज़ कुरियन आणंद आए और इसे आधुनिक डेयरी में बदल दिया; आगे इसका ब्रांड "अमूल" बना। इसी आणंद मॉडल को 1970 में "ऑपरेशन फ्लड" के ज़रिए पूरे देश में फैलाया गया। |
◆ "आणंद मॉडल" — त्रि-स्तरीय ढाँचा: ग्राम स्तर पर प्राथमिक दुग्ध समिति → ज़िला स्तर पर सहकारी दुग्ध संघ → राज्य स्तर पर दुग्ध महासंघ।
ऑपरेशन फ्लड का चरण | मुख्य कार्य |
प्रथम चरण (1970-1980) | विश्व खाद्य कार्यक्रम के सहयोग (दान में मिले दुग्ध पाउडर/बटर ऑयल की बिक्री) से दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई के बाज़ारों को 18 प्रमुख "मिल्क शेड्स" से जोड़ा |
द्वितीय चरण (1981-1985) | मिल्क शेड्स की संख्या बढ़ाकर 136; शहरी बाज़ारों में दुग्ध वितरण का व्यापक विस्तार |
तृतीय चरण (1985-1996) | आधारभूत संरचना का सुदृढ़ीकरण, पशु चिकित्सा अनुसंधान, संकर नस्ल सुधार, सहकारी समितियों की वित्तीय आत्मनिर्भरता |
◆ प्रभाव: भारत विश्व का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक; छोटे-सीमांत किसानों व विशेषकर ग्रामीण महिलाओं की नियमित आय; पोषण सुरक्षा; ग्रामीण अर्थव्यवस्था का विविधीकरण। डेयरी क्षेत्र 8 करोड़ से अधिक किसानों को प्रत्यक्ष आजीविका देता है।
💡 क्या आप जानते हैं? केंद्र में अलग सहकारिता मंत्रालय 6 जुलाई 2021 को बना। |
💡 क्या आप जानते हैं? संयुक्त राष्ट्र ने 2025 को अंतर्राष्ट्रीय सहकारिता वर्ष घोषित किया। |
💡 क्या आप जानते हैं? "अमूल" नाम संस्कृत शब्द "अमूल्य" से प्रेरित है — यानी "जिसका मूल्य न आँका जा सके"। |
📘 आसान परिभाषा: नाबार्ड (National Bank for Agriculture and Rural Development) |
📚 परिभाषा: बी. शिवरामन समिति (CRAFICARD) की सिफारिश पर नाबार्ड अधिनियम, 1981 के तहत 12 जुलाई 1982 को स्थापित — कृषि, कुटीर-ग्रामोद्योग, हस्तशिल्प व ग्रामीण विकास हेतु भारत की शीर्ष विकास वित्तीय संस्था। इसे आरबीआई के कृषि ऋण विभाग व कृषि पुनर्वित्त एवं विकास निगम (ARDC) के कार्य हस्तांतरित किए गए। |
✅ आसान भाषा में: जैसे कोई बड़ा बैंक छोटे बैंकों को पैसा उधार देता है ताकि वे आगे किसानों को लोन दे सकें — नाबार्ड कृषि के लिए यही करता है; यह सीधे किसान को लोन नहीं देता, बैंकों की मदद करता है। 🏠 उदाहरण: नाबार्ड ग्रामीण अवसंरचना विकास निधि (RIDF) से गाँवों में सड़क, पुल, सिंचाई परियोजनाओं के लिए राज्यों को रियायती ऋण देता है और 1992 से स्वयं सहायता समूह-बैंक संपर्क (SHG-Bank Linkage) कार्यक्रम चलाता है। |
📘 आसान परिभाषा: पुनर्वित्त (Refinance) |
📚 परिभाषा: वह व्यवस्था जिसमें कोई शीर्ष वित्तीय संस्था उन बैंकों को धन देती है जिन्होंने पहले ही अंतिम उधारकर्ताओं (किसानों) को ऋण दे दिया है, ताकि बैंकों के पास फिर से ऋण देने को धन आ जाए। |
✅ आसान भाषा में: नाबार्ड किसान को सीधे नहीं, किसानों को ऋण देने वाले बैंकों को "दोबारा पैसा" देता है। 🏠 उदाहरण: ग्रामीण बैंक ने गाँव के 500 किसानों को ₹5 करोड़ का ऋण दिया; नाबार्ड बैंक को ₹5 करोड़ सस्ती दर पर लौटा देता है, ताकि बैंक अगले मौसम में फिर ऋण दे सके। |
◆ प्रमुख कार्य: (i) वाणिज्यिक बैंकों, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों (RRB) व राज्य सहकारी बैंकों को अल्प, मध्यम व दीर्घकालिक पुनर्वित्त (Refinance) — कृषि के साथ ग्रामीण गैर-कृषि क्षेत्र हेतु भी; (ii) आरआईडीएफ से ग्रामीण अवसंरचना — सड़क-सिंचाई के साथ ग्रामीण स्वास्थ्य व शिक्षा परियोजनाएँ भी; (iii) एसएचजी-बैंक लिंकेज व किसान क्रेडिट कार्ड को प्रोत्साहन; (iv) आरआरबी व सहकारी बैंकों का पर्यवेक्षण व निरीक्षण; (v) मेगा फूड पार्कों हेतु ₹2,000 करोड़ का विशेष कोष।
पैक्स त्रि-स्तरीय अल्पकालिक सहकारी साख ढाँचे की आधारशिला (ग्राम स्तर) हैं: राज्य सहकारी बैंक (राज्य स्तर) → ज़िला केंद्रीय सहकारी बैंक — डीसीसीबी (ज़िला स्तर) → पैक्स (ग्राम स्तर)। ये किसानों से सीधा संपर्क रखती हैं।
स्तर | संस्था | काम |
राज्य | राज्य सहकारी बैंक (शीर्ष बैंक) | पूरे राज्य के सहकारी ऋण का प्रबंधन; नाबार्ड से पुनर्वित्त लेकर नीचे भेजता है |
ज़िला | ज़िला केंद्रीय सहकारी बैंक | ज़िले की सभी ग्राम समितियों को धन और निगरानी |
गाँव | प्राथमिक कृषि साख समिति (पैक्स) | किसान को सीधे फसल-ऋण, खाद-बीज; सदस्य किसान ही इसके मालिक |
🔎 तालिका से क्या समझें: धन ऊपर से नीचे बहता है — नाबार्ड से राज्य बैंक, राज्य बैंक से ज़िला बैंक, और ज़िला बैंक से पैक्स होकर किसान तक। इसीलिए पैक्स को "आधारशिला" कहते हैं: अगर गाँव की समिति कमज़ोर है तो ऊपर का पूरा ढाँचा किसान तक नहीं पहुँचता।
◆ महत्व: छोटे-सीमांत किसानों को सस्ता, समयबद्ध अल्पकालिक ऋण; बीज, उर्वरक, कीटनाशक का उचित मूल्य पर वितरण; साहूकारों पर निर्भरता की समाप्ति; भंडारण, विपणन व प्रसंस्करण में सहायता।
◆ सुदृढ़ीकरण: पैक्स का कम्प्यूटरीकरण व सामान्य लेखा प्रणाली; इन्हें बहुउद्देशीय सेवा केंद्र — साझा सेवा केंद्र (CSC), प्रधानमंत्री किसान समृद्धि केंद्र, जन औषधि केंद्र — के रूप में विकसित करना।
पहलू | विवरण |
जारी | 24 जुलाई 2025 — दृष्टि "सहकार से समृद्धि"; अवधि 2025-2045 (विकसित भारत 2047 की दिशा में); सुरेश प्रभु की अध्यक्षता वाली 40-सदस्यीय समिति ने तैयार की |
2034 तक के लक्ष्य | सहकारी क्षेत्र का जीडीपी योगदान तीन गुना; 50 करोड़ सक्रिय सदस्य; हर गाँव में कम से कम एक सहकारी समिति; सहकारी समितियों की संख्या (वर्तमान लगभग 8.3 लाख) में 30% वृद्धि |
छह रणनीतिक स्तंभ | नींव का सुदृढ़ीकरण; जीवंतता को बढ़ावा; भविष्य के लिए तैयारी; समावेशिता व पहुँच का विस्तार; नए क्षेत्रों (पर्यटन, टैक्सी, बीमा, हरित ऊर्जा) में विस्तार; युवा पीढ़ी को तैयार करना |
प्रमुख पहलें | हर तहसील में 5 आदर्श सहकारी गाँव; श्वेत क्रांति 2.0; त्रिभुवन सहकारी विश्वविद्यालय; "सहकार टैक्सी"; तकनीक-सक्षम पैक्स; राष्ट्रीय सहकारी डेटाबेस |
तीन राष्ट्रीय बहु-राज्य सहकारी समितियाँ | राष्ट्रीय जैविक सहकारी समिति (NCOL) — जैविक उत्पादों का प्रमाणीकरण व विपणन; भारतीय बीज सहकारी समिति (BBSSL) — उन्नत बीज; राष्ट्रीय सहकारी निर्यात लिमिटेड (NCEL) — कृषि निर्यात |
कर प्रोत्साहन | नई विनिर्माण सहकारी समितियों के लिए कॉर्पोरेट कर 15%; सहकारी समितियों पर अधिभार (Surcharge) व न्यूनतम वैकल्पिक कर (MAT) में कमी; नकद निकासी सीमा में छूट; ऋण-निपटान (Loan Settlement) नियमों में ढील |
बजट 2026-27 | "विकल्प संस्थान" — एफपीओ, सहकारी समितियों व स्वयं सहायता समूहों को एक साझा मॉडल में जोड़ने व सहकारिता नीति के क्रियान्वयन पर बल |
🎯 याद रखें — इस खंड के मुख्य बिंदु 1. अमूल — 1946, खेड़ा (कैरा); त्रिभुवनदास पटेल, फिर वर्गीज़ कुरियन। 2. ऑपरेशन फ्लड — 1970-96, तीन चरण; भारत विश्व का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक। 3. नाबार्ड — 12 जुलाई 1982; किसान को सीधे नहीं, बैंकों को पुनर्वित्त देता है। 4. सहकारी ऋण का त्रि-स्तरीय ढाँचा — राज्य सहकारी बैंक → ज़िला केंद्रीय सहकारी बैंक → पैक्स। |
![]() चित्र 6: किसान उत्पादक संगठन — छोटे किसान, बड़ी ताक़त |
🏏 क्रिकेट की भाषा में — अकेला बल्लेबाज़ बनाम पूरी टीम एक छोटा किसान उस अकेले बल्लेबाज़ जैसा है जिसे हर गेंद (बीज का दाम, मंडी का भाव, ऋण) खुद झेलनी पड़ती है। किसान उत्पादक संगठन उसे पूरी टीम देता है — मिलकर बीज-खाद सस्ते में खरीदना, मिलकर उपज बेचना और मोलभाव की ताकत बढ़ाना, यानी साझेदारी से बड़ा स्कोर। |
📘 आसान परिभाषा: किसान उत्पादक संगठन (FPO) |
📚 परिभाषा: प्राथमिक उत्पादकों — विशेषकर छोटे व सीमांत किसानों — द्वारा अपने आर्थिक-सामाजिक हितों के लिए गठित पंजीकृत सामूहिक निकाय, जो प्रायः कंपनी अधिनियम, 2013 (पूर्व कंपनी अधिनियम 1956 का भाग IX-A) के तहत "उत्पादक कंपनी" (Producer Company) या सहकारी समिति के रूप में पंजीकृत होता है; इसके सदस्य किसान ही शेयरधारक व निर्णयकर्ता होते हैं। यह एकत्रीकरण (Aggregation) के सिद्धांत पर काम करता है। |
✅ आसान भाषा में: अकेला छोटा किसान न थोक में सस्ता बीज-खाद खरीद सकता है, न बड़ी मात्रा में उपज बेचकर अच्छा भाव पा सकता है; पर सैकड़ों किसान मिलकर एफपीओ बनाते हैं तो वे एक "छोटी कंपनी" की तरह सस्ता खरीदते और बेहतर भाव पर बेचते हैं। 🏠 उदाहरण: किसी गाँव के 300 किसान मिलकर एफपीओ बनाएँ तो वे सीधे बड़े खरीदारों या निर्यातकों को उपज बेच सकते हैं — बिना बिचौलिए के, जिससे हर किसान को ज़्यादा मुनाफ़ा मिलता है। |
विशेषता | विवरण |
लक्ष्य | 10,000 एफपीओ का गठन व संवर्धन — कृषि मंत्रालय की केंद्रीय क्षेत्र योजना (फरवरी 2020 में शुरू; अवधि विस्तारित) |
कर लाभ | शुरुआती वर्षों में आयकर से छूट |
कार्यान्वयन एजेंसियाँ | नाबार्ड, लघु कृषक कृषि व्यवसाय संघ (SFAC), राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (NCDC) |
बजट 2026-27 में फोकस | मत्स्य पालन व पशुपालन क्षेत्र में भी नए एफपीओ बनाने पर ज़ोर |
ई-नाम से जुड़ाव | एफपीओ सीधे ई-नाम पर व्यापार कर सकते हैं — मार्च 2026 तक 4,724 एफपीओ पंजीकृत |
📘 आसान परिभाषा: कस्टम हायरिंग केंद्र (Custom Hiring Centre) |
📚 परिभाषा: वह केंद्र जहाँ ट्रैक्टर, हार्वेस्टर, रोटावेटर, ड्रोन जैसे महँगे कृषि यंत्र रखे जाते हैं और किसानों को घंटे या दिन के किराए पर दिए जाते हैं। |
✅ आसान भाषा में: मशीन ख़रीदो मत, ज़रूरत पड़ने पर किराए पर लो। 🏠 उदाहरण: शादी के लिए कोई टेंट नहीं ख़रीदता, किराए पर लेता है — वैसे ही 2 बीघा वाला किसान ₹8 लाख का रोटावेटर नहीं, ₹1,200 प्रति घंटा किराया देता है। |
◆ पैमाने की मितव्ययिता व कम इनपुट लागत: बीज, उर्वरक, कीटनाशक व यंत्र थोक दर पर — उत्पादन लागत 20-30% तक कम।
◆ सौदेबाज़ी शक्ति व बेहतर बाज़ार पहुँच: ग्रेडिंग, पैकेजिंग, प्राथमिक प्रसंस्करण से मूल्य संवर्धन; बिचौलियों के बिना सीधे बड़े खरीदारों, प्रसंस्करणकर्ताओं, निर्यातकों, ई-नाम व ओएनडीसी से जुड़ाव; बेहतर मूल्य-खोज (Price Discovery)।
◆ कस्टम हायरिंग केंद्र: ड्रोन, हार्वेस्टर जैसे आधुनिक यंत्र सदस्यों को सस्ते किराए पर — छोटे खेतों में भी यंत्रीकरण।
◆ संस्थागत ऋण व जोखिम प्रबंधन: बैंकों, नाबार्ड, एसएफएसी से ऋण, इक्विटी अनुदान व ऋण-गारंटी; अनुबंध कृषि से बाज़ार जोखिम में कमी।
आधार | एफपीओ (उत्पादक कंपनी) | पैक्स |
कानूनी ढाँचा | कंपनी अधिनियम, 2013 के तहत पंजीकृत | संबंधित राज्य के सहकारी समिति अधिनियम के तहत पंजीकृत |
प्राथमिक उद्देश्य | मूल्य संवर्धन, सामूहिक प्रसंस्करण, ब्रांडिंग, आपूर्ति शृंखला प्रबंधन व व्यावसायिक विपणन | ग्राम स्तर पर अल्प/मध्यमकालिक कृषि ऋण व इनपुट वितरण |
प्रबंधन | निदेशक मंडल व नियुक्त पेशेवर प्रबंधन (मुख्य कार्यकारी अधिकारी/विशेषज्ञ) | निर्वाचित प्रबंधन समिति व सचिव; पेशेवर विशेषज्ञता का अभाव |
स्वायत्तता | पूर्ण परिचालन स्वायत्तता; सरकारी-राजनीतिक हस्तक्षेप नगण्य | राज्य सहकारिता विभाग (रजिस्ट्रार) का कड़ा प्रशासनिक नियंत्रण; राजनीतिक प्रभाव अधिक |
कार्यक्षेत्र | ब्लॉक, ज़िला या अंतर-राज्यीय स्तर तक | एक गाँव या कुछ निकटवर्ती ग्राम पंचायतों तक सीमित |
📌 सामान्य भ्रम एफपीओ केवल एक सहकारी समिति नहीं है — यह प्रायः "उत्पादक कंपनी" के रूप में पंजीकृत होता है, इसलिए इसे "कॉर्पोरेट ढाँचे वाला किसान संगठन" समझना अधिक सटीक है। यह सहकारी लोकतांत्रिक भावना ("एक सदस्य, एक मत") के साथ कॉर्पोरेट अनुशासन, पारदर्शिता और पेशेवर प्रबंधन जोड़ता है। |
🎯 याद रखें — इस खंड के मुख्य बिंदु 1. किसान उत्पादक संगठन प्रायः कंपनी अधिनियम, 2013 में "उत्पादक कंपनी" के रूप में पंजीकृत। 2. 10,000 संगठनों की योजना — फ़रवरी 2020। 3. मूल अंतर — पैक्स ऋण देने वाली संस्था, उत्पादक संगठन व्यापार करने वाली संस्था। |
खेती में बीज, खाद, सिंचाई व मज़दूरी पर पहले पैसा लगाना पड़ता है, जबकि फसल की कमाई महीनों बाद आती है — इसलिए समय पर व सस्ता ऋण अनिवार्य है।
◆ कार्यशील पूँजी: प्रमाणित बीज, उर्वरक, सूक्ष्म पोषक तत्व, कीटनाशक व सिंचाई साधनों की समय पर खरीद।
◆ यंत्रीकरण व अवसंरचना: ट्रैक्टर, कंबाइन हार्वेस्टर, सौर पंप, ड्रिप-स्प्रिंकलर, खेत-स्तरीय भंडारण व प्राथमिक प्रसंस्करण हेतु मध्यम व दीर्घकालिक ऋण।
◆ जोखिम से सुरक्षा: मानसून, सूखा, बाढ़ व कीट-प्रकोप के समय तरलता व आघात-सहनशीलता।
◆ साहूकारों से मुक्ति व विविधीकरण: ऊँचे ब्याज के ऋण-जाल से मुक्ति; बागवानी, डेयरी, मत्स्य व कृषि-उद्यमिता हेतु वित्त।
संस्थागत ऋण स्रोत | कृषि ऋण में हिस्सेदारी |
अनुसूचित वाणिज्यिक बैंक | लगभग 76% |
सहकारी बैंक (PACS आदि) | लगभग 12.1% |
क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक (RRB) | लगभग 11.9% |
📘 आसान परिभाषा: संस्थागत बनाम गैर-संस्थागत ऋण (Institutional vs Non-institutional Credit) |
📚 परिभाषा: संस्थागत ऋण वह है जो बैंक, सहकारी समिति या ग्रामीण बैंक जैसी विनियमित संस्थाएँ नियत ब्याज दर पर देती हैं; गैर-संस्थागत ऋण साहूकार, व्यापारी, आढ़तिये या रिश्तेदार देते हैं, जिस पर कोई नियमन नहीं होता। |
✅ आसान भाषा में: एक तरफ़ लिखित नियम और सस्ता ब्याज, दूसरी तरफ़ मौखिक शर्तें और महँगा ब्याज। 🏠 उदाहरण: बैंक से केसीसी पर 4-7% सालाना, जबकि साहूकार से "दो रुपया सैकड़ा महीना" यानी 24% सालाना। |
📊 कृषि ऋण — महत्वपूर्ण तथ्य — नवीनतम आँकड़े 1. गैर-संस्थागत (साहूकारी) ऋण की हिस्सेदारी 1950 के लगभग 90% से घटकर 2021-22 में 23.4% रह गई — पर अब भी काफ़ी ऊँची। 2. लगभग 52% कृषि परिवार ऋणग्रस्त हैं (NABARD अखिल भारतीय ग्रामीण वित्तीय समावेशन सर्वेक्षण); केवल लगभग 30-33% किसानों तक ही औपचारिक ऋण की पहुँच। 3. प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र ऋण (PSL): बैंकों के समायोजित निवल बैंक ऋण का 18% कृषि के लिए निर्धारित। 4. किसान ऋण पोर्टल (सितंबर 2023): लगभग 6 करोड़ किसान; 30 अनुसूचित वाणिज्यिक बैंक, 42 आरआरबी, 20 राज्य सहकारी बैंक व 356 ज़िला केंद्रीय सहकारी बैंक एक मंच पर — ब्याज अनुदान दावों का डिजिटल निपटान। 5. प्रधानमंत्री मुद्रा योजना: मुर्गी पालन, डेयरी, मधुमक्खी पालन जैसी संबद्ध गतिविधियों के लिए ₹10 लाख (अब "तरुण प्लस" में ₹20 लाख तक) तक का ऋण। 6. किसानों की आय दोगुनी करने हेतु अशोक दलवई समिति गठित की गई थी। |
📘 आसान परिभाषा: प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र ऋण (Priority Sector Lending) |
📚 परिभाषा: भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा तय वह व्यवस्था जिसमें हर बैंक को अपने कुल समायोजित निवल बैंक ऋण का न्यूनतम 40% कृषि, सूक्ष्म-लघु उद्योग, शिक्षा, आवास जैसे क्षेत्रों को देना होता है; इसमें कृषि का उप-लक्ष्य 18% है। |
✅ आसान भाषा में: बैंक अपनी मर्ज़ी से सारा पैसा बड़ी कंपनियों को नहीं दे सकता — एक तय हिस्सा किसानों और छोटे उद्यमियों का है। 🏠 उदाहरण: किसी बैंक ने कुल ₹1,000 करोड़ उधार दिए, तो कम से कम ₹180 करोड़ कृषि को जाने चाहिए; कम पड़े तो उतना धन नाबार्ड की ग्रामीण निधि में जमा करना पड़ता है। |
📘 आसान परिभाषा: किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) |
📚 परिभाषा: 1998 में आरबीआई व नाबार्ड की पहल पर (आर.वी. गुप्ता समिति की सिफारिश पर) शुरू योजना, जो किसानों को फसल उत्पादन, कार्यशील पूँजी, फसलोत्तर व्यय, उपकरण रखरखाव व घरेलू उपभोग के लिए अल्पकालिक औपचारिक ऋण एक ही कार्ड के माध्यम से देती है। |
✅ आसान भाषा में: जैसे डेबिट/क्रेडिट कार्ड से ज़रूरत पड़ने पर पैसे निकालते हैं — वैसे ही केसीसी से किसान बुवाई के समय बैंक से पैसा निकाल सकता है, बार-बार अलग लोन-आवेदन किए बिना। 🏠 उदाहरण: केसीसी धारक किसान बुवाई के मौसम में बैंक से ₹50,000 निकालकर बीज-खाद खरीदता है और फसल बिकने पर लौटा देता है — समय पर चुकाने पर प्रभावी ब्याज मात्र 4%। |
विशेषता | विवरण |
पात्रता | भूस्वामी, काश्तकार किसान, मौखिक पट्टेदार, बटाईदार व स्वयं सहायता समूह (SHG); 2018-19 से पशुपालन व मत्स्य पालन करने वाले किसानों तक विस्तार |
ऋण सीमा का निर्धारण | भूमि जोत, फसल प्रतिरूप व "वित्त के पैमाने" (Scale of Finance) के आधार पर; फसलोत्तर व्यय (10%) व रखरखाव/घरेलू उपभोग (20%) भी शामिल; वैधता 5 वर्ष, वार्षिक 10% सीमा वृद्धि |
ब्याज संरचना (संशोधित ब्याज अनुदान योजना — MISS) | सामान्य दर लगभग 9% → केंद्र का 2% अनुदान → 7%; समय पर भुगतान पर अतिरिक्त 3% शीघ्र पुनर्भुगतान प्रोत्साहन → प्रभावी दर 4% |
ऋण सीमा में वृद्धि (बजट 2025-26) | एमआईएसएस के तहत ऋण सीमा ₹3 लाख से बढ़ाकर ₹5 लाख |
बिना गारंटी (Collateral-free) ऋण | 1 जनवरी 2025 से ₹1.6 लाख से बढ़कर ₹2 लाख प्रति उधारकर्ता (टाई-अप व्यवस्था में ₹3 लाख तक) |
पशुपालन व मत्स्य | ₹2 लाख तक के अल्पकालिक ऋण पर भी 2% अनुदान + 3% शीघ्र भुगतान प्रोत्साहन (प्रभावी 4%) |
सक्रिय कार्ड (मार्च 2026) | 7.72 करोड़ से अधिक सक्रिय केसीसी; बकाया ऋण लगभग ₹10.2 लाख करोड़ |
डिजिटल पहलें | जन समर्थ पोर्टल आधारित डिजिटल केसीसी (5 राज्यों में पायलट); ज़िला-स्तरीय साप्ताहिक शिविरों से "केसीसी संतृप्ति अभियान"; बजट 2026 — मछुआरों हेतु प्रधानमंत्री मत्स्य किसान क्रेडिट कार्ड |
दीर्घकालिक ऋण | ब्याज दर बैंकों की सीमांत लागत आधारित ऋण दर (MCLR) से जुड़ी |
🧮 किसान क्रेडिट कार्ड पर ब्याज कैसे 4% बनता है? बैंक की सामान्य दर ≈ 9% 9% − 2% (केंद्र का ब्याज अनुदान) = 7% 7% − 3% (समय पर चुकाने का प्रोत्साहन) = 4% (किसान की प्रभावी दर) |
🔎 तालिका से क्या समझें: केसीसी की ताकत तीन बातों में है — एक बार बना कार्ड 5 साल चलता है, ज़रूरत के समय पैसा निकाला जा सकता है, और समय पर चुकाने वाले को केवल 4% ब्याज देना पड़ता है। ₹2 लाख तक के ऋण पर कोई गारंटी नहीं माँगी जाती, जो छोटे किसान के लिए सबसे बड़ी राहत है।
📘 आसान परिभाषा: सीमांत लागत आधारित ऋण दर (Marginal Cost of Funds based Lending Rate — MCLR) |
📚 परिभाषा: वह न्यूनतम ब्याज दर जिससे नीचे बैंक सामान्यतः ऋण नहीं दे सकता; यह बैंक को नया धन जुटाने में लगने वाली ताज़ा लागत के आधार पर हर महीने तय होती है। |
✅ आसान भाषा में: बैंक की "न्यूनतम ब्याज दर", जो उसकी अपनी लागत से जुड़ी है। 🏠 उदाहरण: जैसे दुकानदार किसी सामान को उसकी ख़रीद-कीमत से कम पर नहीं बेचता — बैंक भी अपनी लागत से कम दर पर लंबा ऋण नहीं देता। |
💡 क्या आप जानते हैं? पहले अखिल भारतीय ग्रामीण ऋण सर्वेक्षण (1951-54) ने पाया था कि किसान के कुल कर्ज़ का 90% से अधिक साहूकारों-व्यापारियों से आता था। |
📘 आसान परिभाषा: कृषि अवसंरचना निधि (AIF) |
📚 परिभाषा: जुलाई 2020 में शुरू ₹1 लाख करोड़ की मध्यम-दीर्घकालिक ऋण वित्तपोषण सुविधा, जो फसलोत्तर प्रबंधन अवसंरचना (कोल्ड स्टोरेज, गोदाम, साइलो, पैक-हाउस, छँटाई-ग्रेडिंग इकाइयाँ) और सामुदायिक कृषि परिसंपत्तियों के निर्माण हेतु ब्याज सहायता व ऋण गारंटी के साथ रियायती ऋण देती है। |
✅ आसान भाषा में: फसल कटने के बाद किसान के पास उसे सुरक्षित रखने की जगह नहीं होती, जिससे उपज खराब होती है या औने-पौने दाम पर बेचनी पड़ती है। एआईएफ ऐसी भंडारण सुविधाएँ बनाने के लिए सस्ता कर्ज देती है। 🏠 उदाहरण: कोई एफपीओ अपने गाँव में कोल्ड स्टोरेज बनाना चाहे तो एआईएफ के तहत उसे ₹2 करोड़ तक के ऋण पर 7 वर्ष तक 3% ब्याज सहायता मिलती है — किसान तुरंत बेचने की मजबूरी से बच जाते हैं। |
विशेषता | विवरण |
कुल कोष | ₹1 लाख करोड़ (ऋण संवितरण 2020-21 से 2025-26 तक) |
योजना अवधि | 13 वर्ष — 2020-21 से 2032-33 (ब्याज सहायता व गारंटी आगे तक जारी) |
ब्याज सहायता | 3% प्रति वर्ष, अधिकतम ₹2 करोड़ तक के ऋण पर, अधिकतम 7 वर्ष तक (₹2 करोड़ से अधिक ऋण पर ब्याज सहायता नहीं) |
ऋण गारंटी | सूक्ष्म एवं लघु उद्यम ऋण गारंटी निधि ट्रस्ट (CGTMSE) के तहत ₹2 करोड़ तक — शुल्क सरकार वहन करती है; ऋण की अधिकतम अवधि 9 वर्ष |
पात्र लाभार्थी | किसान, एफपीओ, पैक्स, कृषि-उद्यमी, स्टार्टअप, एसएचजी, एपीएमसी, सहकारी समितियाँ |
पात्र परियोजनाएँ | ई-मार्केटिंग मंच, गोदाम, साइलो, पैक-हाउस, परीक्षण इकाइयाँ, छँटाई-ग्रेडिंग, कोल्ड चेन, लॉजिस्टिक्स, प्राथमिक प्रसंस्करण केंद्र, पकाने के कक्ष (Ripening Chambers), कस्टम हायरिंग केंद्र |
ऋणदाता संस्थाएँ | अनुसूचित वाणिज्यिक बैंक, सहकारी बैंक, आरआरबी, लघु वित्त बैंक, एनबीएफसी, राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (NCDC) |
प्रगति (2025 तक) | 50,000 से अधिक परियोजनाएँ स्वीकृत; ₹30,000 करोड़ से अधिक संवितरित |
🎯 याद रखें — इस खंड के मुख्य बिंदु 1. किसान क्रेडिट कार्ड — 1998; 9% − 2% अनुदान − 3% समय पर चुकाने का प्रोत्साहन = 4%। 2. ब्याज अनुदान की सीमा ₹5 लाख तक; बिना गारंटी ऋण ₹2 लाख तक। 3. प्राथमिकता क्षेत्र ऋण में कृषि का हिस्सा — 18%। 4. कृषि अवसंरचना निधि — ₹1 लाख करोड़; ₹2 करोड़ तक के ऋण पर 3% ब्याज सहायता। |
💡 क्या आप जानते हैं? 1969 में 14 बड़े बैंकों के राष्ट्रीयकरण का एक प्रमुख उद्देश्य गाँव और खेती तक बैंक ऋण पहुँचाना था। |
💡 क्या आप जानते हैं? भारतीय रिज़र्व बैंक ने 1972 में "प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र" की अवधारणा औपचारिक रूप से अपनाई — कृषि इसका सबसे बड़ा हिस्सा है। |
📘 आसान परिभाषा: प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) |
📚 परिभाषा: 13 जनवरी 2016 को मंत्रिमंडल की स्वीकृति, 18 फ़रवरी 2016 को शुभारंभ और खरीफ 2016 से पुरानी योजनाओं (राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना — NAIS व संशोधित NAIS) के स्थान पर लागू योजना, जो बुवाई-पूर्व से फसलोत्तर तक प्राकृतिक आपदाओं, कीटों व बीमारियों से होने वाले फसल नुकसान के विरुद्ध कम प्रीमियम पर बीमा सुरक्षा देती है। नोडल मंत्रालय — कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय। |
✅ आसान भाषा में: जैसे बाइक या घर का बीमा होता है — दुर्घटना पर कंपनी नुकसान भरती है; वैसे ही बाढ़, सूखा या ओलावृष्टि से फसल बर्बाद हो तो सरकार व बीमा कंपनी मिलकर किसान को मुआवज़ा देती हैं। 🏠 उदाहरण: किसी किसान की सोयाबीन असमय बारिश से बर्बाद हो जाए तो उपग्रह, ड्रोन व फसल कटाई प्रयोगों से नुकसान का आकलन कर बीमा राशि सीधे उसके बैंक खाते में भेजी जाती है। |
फसल श्रेणी | किसान द्वारा देय अधिकतम प्रीमियम (बीमित राशि का) |
खरीफ फसलें | 2% |
रबी फसलें | 1.5% |
वार्षिक वाणिज्यिक / बागवानी फसलें | 5% |
📘 आसान परिभाषा: बीमांकिक प्रीमियम (Actuarial Premium) |
📚 परिभाषा: किसी क्षेत्र में फसल-नुकसान की ऐतिहासिक संभावना और संभावित दावे की राशि के गणितीय आकलन से बीमा कंपनी द्वारा तय वास्तविक प्रीमियम दर। |
✅ आसान भाषा में: जोखिम के हिसाब से बीमे की "असली कीमत" — जहाँ नुकसान ज़्यादा होता है, वहाँ यह ज़्यादा होती है। 🏠 उदाहरण: सूखा-प्रवण बाड़मेर में बाजरे का असली प्रीमियम 15% हो सकता है, जबकि नहरी श्रीगंगानगर में गेहूँ का 3%। |
🧮 एक उदाहरण — ₹1,00,000 की बीमित खरीफ फसल बीमांकिक प्रीमियम 12% = ₹12,000 किसान देता है 2% = ₹2,000 शेष ₹10,000 : केंद्र ₹5,000 + राज्य ₹5,000 (50:50) |
🔎 तालिका से क्या समझें: किसान को केवल 1.5-5% देना होता है, चाहे असली जोखिम कितना भी हो — बाकी पूरी रकम सरकारें देती हैं और इस पर कोई ऊपरी सीमा नहीं है। इसीलिए योजना की सफलता राज्यों के समय पर अंशदान पर टिकी है।
💡 क्या आप जानते हैं? भारत की पहली देशव्यापी फसल बीमा योजना — व्यापक फसल बीमा योजना — 1985 में शुरू हुई थी। |
📘 आसान परिभाषा: फसल कटाई प्रयोग (Crop Cutting Experiment) |
📚 परिभाषा: किसी क्षेत्र की औसत उपज जानने के लिए यादृच्छिक रूप से चुने गए खेतों में एक तय आकार के टुकड़े की फसल काटकर तौलने की वैज्ञानिक विधि; बीमा दावे इसी औसत उपज और "सामान्य उपज" के अंतर से तय होते हैं। |
✅ आसान भाषा में: पूरे गाँव की उपज का अंदाज़ा कुछ चुने हुए खेतों के छोटे टुकड़ों को काटकर लगाना। 🏠 उदाहरण: पटवारी और बीमा प्रतिनिधि 5×5 मीटर का टुकड़ा काटकर तौलते हैं — 10 किलो निकला, जबकि सामान्य वर्ष में 15 किलो निकलता था; तो उपज में एक-तिहाई की कमी मानी जाती है। |
◆ शेष प्रीमियम सब्सिडी: वास्तविक बीमांकिक प्रीमियम और किसान के हिस्से का अंतर केंद्र-राज्य 50:50 (पूर्वोत्तर व हिमालयी राज्यों में 90:10) में वहन; सब्सिडी पर कोई ऊपरी सीमा नहीं।
◆ अन्य विशेषताएँ: "एक राष्ट्र, एक योजना" — पूरे देश में एकसमान प्रीमियम दरें; भूस्वामियों के साथ बटाईदार भी शामिल; 2020 से सभी किसानों (ऋणी सहित) के लिए स्वैच्छिक; लगभग 55% नामांकन गैर-ऋणी किसानों का; कार्यान्वयन सार्वजनिक व निजी बीमा कंपनियों से — राज्य एक बार में 3 वर्ष के लिए कंपनियाँ चुनते हैं; दावा भुगतान में देरी पर बीमा कंपनी पर 12% दंड।
◆ स्थिति: किसान नामांकन में विश्व की सबसे बड़ी और प्रीमियम में तीसरी सबसे बड़ी फसल बीमा योजना; 2024-25 में 4.19 करोड़ किसानों का बीमा व 6.2 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र कवर।
◆ तकनीक: दावा-आकलन में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), रिमोट सेंसिंग व ड्रोन का उपयोग; उपग्रह-आधारित उपज अनुमान, पंचायत स्तर पर स्वचालित मौसम केंद्र और मोबाइल ऐप से फसल-चित्र — दावों का आकलन और भुगतान तेज़ व स्वचालित।
📌 खरीफ 2026 से विस्तार जंगली जानवरों के हमले से फसल क्षति को "स्थानीयकृत जोखिम" के रूप में (राज्यों द्वारा ऐड-ऑन कवर) तथा धान के जलमग्न होने (Paddy Inundation) को — जिसे 2018 में आकलन-कठिनाइयों के कारण हटाया गया था — फिर से शामिल किया गया; किसान को 72 घंटे के भीतर नुकसान की सूचना देनी होगी। |
बजट वर्ष | पीएमएफबीवाई आवंटन | टिप्पणी |
2024-25 (संशोधित अनुमान) | ₹15,864 करोड़ | वास्तविक व्यय ₹14,473 करोड़ |
2025-26 | ₹12,242 करोड़ | 2024-25 से लगभग 23% कम — 2019-20 के बाद सबसे कम |
2026-27 | ₹12,200 करोड़ | पिछले 8 वर्षों में सबसे कम; वर्ष 2025 में भुगतान किए गए दावे घटकर मात्र ₹576 करोड़ (सामान्य वार्षिक औसत लगभग ₹21,288 करोड़) |
◆ कारण: तकनीक से सटीक आकलन व फर्जी दावों में कमी; 2020 के बाद योजना स्वैच्छिक होने से नामांकन में स्थिरता; कुछ राज्यों का वित्तीय दबाव व अपनी अलग क्षतिपूर्ति योजनाओं की ओर जाना।
◆ चुनौतियाँ: राज्य अंशदान में देरी से दावा निपटान में विलंब; गैर-ऋणी व बटाईदार किसानों का सीमित कवरेज; जलवायु परिवर्तन से बढ़ती चरम घटनाओं के बीच घटता सुरक्षा-कवच — यह एक नीतिगत विरोधाभास (Policy Paradox) है।
◆ आगे की राह: उपग्रह-आकलन के तुरंत बाद डीबीटी से स्वचालित दावा भुगतान; पंचायत स्तर पर स्वचालित मौसम केंद्रों का विस्तार; प्रीमियम सब्सिडी हेतु केंद्र-राज्य संयुक्त एस्क्रो खाता; डिजिटल किसान पहचान-पत्र व भू-अभिलेखों से बटाईदारों का नामांकन।
योजना | मुख्य प्रावधान |
प्रधानमंत्री किसान मानधन योजना (PM-KMY) | छोटे-सीमांत किसानों की वृद्धावस्था सामाजिक सुरक्षा; आयु 18-40 वर्ष; 2 हेक्टेयर तक भूमि वाले छोटे-सीमांत किसान; प्रवेश-आयु पर निर्भर ₹55-₹200 मासिक अंशदान (केंद्र समान अंशदान देता है); 60 वर्ष पर ₹3,000 मासिक पेंशन |
प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान (PM-AASHA) | 12 सितंबर 2018 को मंत्रिमंडल की स्वीकृति — केंद्रीय क्षेत्र योजना; तीन घटक: (i) मूल्य समर्थन योजना (PSS) — बाज़ार मूल्य एमएसपी से नीचे गिरने पर केंद्रीय एजेंसियाँ एमएसपी पर खरीदती हैं; (ii) मूल्य अंतर भुगतान योजना (PDPS) — तिलहन को एपीएमसी में एमएसपी से कम पर बेचने पर अंतर राशि सीधे खाते में; (iii) निजी खरीद एवं स्टॉकिस्ट योजना (PPSS) — निजी एजेंसियों की भागीदारी; बजट 2026-27 में ₹7,200 करोड़ |
प्रधानमंत्री किसान भाई (भंडारण प्रोत्साहन) | किसानों को गोदाम सुविधा व कटाई के बाद कम से कम 3 महीने उपज रोकने हेतु प्रोत्साहन — कब व कहाँ बेचना है, इसकी स्वायत्तता; संकटकालीन बिक्री से बचाव |
🎯 याद रखें — इस खंड के मुख्य बिंदु 1. प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना — 2016; किसान का प्रीमियम खरीफ 2%, रबी 1.5%, बागवानी/वाणिज्यिक 5%। 2. शेष प्रीमियम केंद्र-राज्य 50:50 (पूर्वोत्तर-हिमालयी राज्य 90:10); 2020 से सभी के लिए स्वैच्छिक। 3. किसान मानधन — 60 वर्ष पर ₹3,000 मासिक पेंशन; पीएम-आशा — मूल्य समर्थन, मूल्य अंतर भुगतान, निजी ख़रीद। |
![]() चित्र 7: प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के चार घटक |
📘 आसान परिभाषा: प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY) |
📚 परिभाषा: 1 जुलाई 2015 को शुरू केंद्र प्रायोजित योजना, जिसका उद्देश्य "हर खेत को पानी" से सिंचित क्षेत्र का विस्तार तथा "प्रति बूँद अधिक फसल" (More Crop Per Drop) से खेत-स्तर पर जल उपयोग दक्षता बढ़ाना है। |
✅ आसान भाषा में: बहुत सी खेती आज भी सिर्फ बारिश पर निर्भर है — पीएमकेएसवाई का लक्ष्य है कि हर खेत तक किसी न किसी तरह पानी पहुँचे और उस पानी का बिना बर्बादी सबसे कुशल उपयोग हो। 🏠 उदाहरण: पूरे खेत को पानी से भरने (आप्लावन/बाढ़ सिंचाई) के बजाय ड्रिप से सीधे पौधे की जड़ में पानी टपकाया जाए — वही फसल कम पानी में हो जाती है; यही "प्रति बूँद अधिक फसल" है। |
पीएमकेएसवाई के 4 घटक | उद्देश्य |
त्वरित सिंचाई लाभ कार्यक्रम (AIBP) | जल शक्ति मंत्रालय के अंतर्गत बड़ी व मध्यम सिंचाई परियोजनाओं को शीघ्र पूरा करना |
हर खेत को पानी | कमान क्षेत्र विकास, लघु सिंचाई, जल निकायों की मरम्मत-नवीनीकरण-जीर्णोद्धार (RRR), भूजल विकास |
जलग्रहण (Watershed) विकास — डब्ल्यूडीसी-पीएमकेएसवाई 2.0 | ग्रामीण विकास मंत्रालय के अंतर्गत वर्षा-आधारित क्षेत्रों में जलग्रहण विकास; बजट 2026-27 में ₹2,482 करोड़ |
प्रति बूँद अधिक फसल (PDMC) | ड्रिप, स्प्रिंकलर, फर्टिगेशन, मल्चिंग; सहायता — छोटे व सीमांत किसानों को 55%, अन्य को 45% |
🔎 तालिका से क्या समझें: चारों घटक पानी की पूरी यात्रा ढकते हैं — बड़ा बाँध और नहर (त्वरित सिंचाई लाभ), नहर से खेत तक नालियाँ (हर खेत को पानी), बारिश के पानी को रोकना (जलग्रहण विकास) और खेत में पानी का किफ़ायती उपयोग (प्रति बूँद अधिक फसल)। छोटे-सीमांत किसान को ड्रिप पर 55% सहायता इसलिए है कि उसके लिए शुरुआती लागत सबसे बड़ी बाधा है।
📘 आसान परिभाषा: कमान क्षेत्र (Command Area) |
📚 परिभाषा: किसी सिंचाई परियोजना की नहरों से वास्तव में सिंचित किया जा सकने वाला कृषि क्षेत्र; कमान क्षेत्र विकास में नहर के अंतिम छोर तक खेत-नालियाँ, समतलीकरण और जल-निकासी बनाई जाती है। |
✅ आसान भाषा में: नहर का पानी जिन-जिन खेतों तक पहुँच सकता है, वह पूरा इलाका। 🏠 उदाहरण: इंदिरा गांधी नहर का कमान क्षेत्र श्रीगंगानगर से जैसलमेर-बाड़मेर तक फैला है; नहर बनी पर खेत-नालियाँ न बनें, तो पानी अंतिम खेत तक नहीं पहुँचता। |
◆ जल बचत: पारंपरिक सिंचाई की तुलना में 40-60% — पानी सीधे जड़ों तक, वाष्पीकरण व बहाव से हानि नगण्य।
◆ फर्टिगेशन (Fertigation): सिंचाई के पानी में घुलनशील उर्वरक सीधे जड़ों तक — उर्वरक की 20-30% बचत।
◆ उत्पादकता: निरंतर संतुलित नमी से पैदावार में 20-40% वृद्धि व गुणवत्ता सुधार।
◆ अन्य: खरपतवार व कीट-रोग कम; श्रम, समय व बिजली/डीज़ल लागत कम; मृदा क्षरण-जलभराव नहीं; असमतल व बंजर भूमि पर भी खेती संभव।
📊 सिंचाई — महत्वपूर्ण तथ्य — नवीनतम आँकड़े 1. शुद्ध सिंचित क्षेत्र लगभग 80 मिलियन हेक्टेयर — शुद्ध बोए गए क्षेत्र का लगभग 50%; सकल फसली क्षेत्र में सिंचित हिस्सा 2015-16 के 49.3% से बढ़कर 2020-21 में लगभग 55%। 2. लगभग 51% शुद्ध बोया गया क्षेत्र वर्षा पर निर्भर; चावल, गन्ना जैसी अधिक जल खपत वाली फसलें और मुफ़्त बिजली से आप्लावन सिंचाई — पानी की भारी बर्बादी। 3. पीएम-कुसुम के सौर पंप — बिना नहर तंत्र के विस्तार के सिंचाई लागत में कमी। |
📘 आसान परिभाषा: शुद्ध बोया गया क्षेत्र बनाम सकल फसली क्षेत्र (Net Sown Area vs Gross Cropped Area) |
📚 परिभाषा: शुद्ध बोया गया क्षेत्र — वर्ष में कम से कम एक बार बोई गई कुल भूमि (एक खेत एक ही बार गिना जाता है); सकल फसली क्षेत्र — वर्ष में जितनी बार बोया गया, उतनी बार गिनकर जोड़ा गया क्षेत्र। |
✅ आसान भाषा में: पहला बताता है "कितनी ज़मीन पर खेती हुई", दूसरा बताता है "कुल कितनी फसलें बोई गईं"। 🏠 उदाहरण: आपके पास 1 हेक्टेयर है, उसमें बाजरा और फिर सरसों बोई — शुद्ध बोया क्षेत्र 1 हेक्टेयर, सकल फसली क्षेत्र 2 हेक्टेयर। |
अटल भूजल योजना | विवरण |
शुभारंभ | 25 दिसंबर 2019; नोडल — जल शक्ति मंत्रालय |
वित्त पोषण | विश्व बैंक : केंद्र सरकार = 50:50; कुल ₹6,000 करोड़ (₹4,600 करोड़ राज्यों को प्रोत्साहन + ₹1,400 करोड़ संस्थागत सुदृढ़ीकरण व क्षमता निर्माण) |
उद्देश्य | पंचायत के नेतृत्व में सामुदायिक भूजल प्रबंधन और जल-उपयोग व्यवहार में परिवर्तन |
कवरेज | 7 राज्य — राजस्थान, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, गुजरात, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक; 80 ज़िलों की 8,213 ग्राम पंचायतें |
🎯 याद रखें — इस खंड के मुख्य बिंदु 1. प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना — 1 जुलाई 2015; "हर खेत को पानी" और "प्रति बूँद अधिक फसल"। 2. ड्रिप-फव्वारा से 40-60% पानी की बचत; छोटे किसान को 55% सहायता। 3. लगभग 51% शुद्ध बोया गया क्षेत्र अब भी वर्षा-आधारित। 4. अटल भूजल योजना — 25 दिसंबर 2019; 7 राज्य (राजस्थान सहित); विश्व बैंक : केंद्र = 50:50। |
◆ भारत उर्वरकों का विश्व में सबसे बड़ा आयातक और चीन के बाद दूसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता; उर्वरक उद्योग आठ प्रमुख (कोर) उद्योगों में शामिल।
◆ कुल उर्वरक खपत में यूरिया का हिस्सा दो-तिहाई से अधिक; डीएपी (डाई-अमोनियम फॉस्फेट) दूसरा सबसे अधिक प्रयुक्त — फॉस्फोरस जड़ों के विकास में सहायक, इसलिए बुवाई के समय प्रयोग।
◆ भारत पोटाश की 100% और फॉस्फोरस की 80-85% आवश्यकता के लिए आयात पर निर्भर।
◆ नीम-लेपित यूरिया — मिट्टी में नाइट्रोजन घुलने की दर धीमी; यूरिया गोल्ड — यूरिया में लगभग 17% सल्फर; सल्फर-कमी दूर करता है और नाइट्रोजन उपयोग दक्षता बढ़ाता है (धीमा-क्रमिक नाइट्रोजन रिसाव); नैनो यूरिया व नैनो डीएपी — तरल रूप, कम मात्रा में अधिक दक्षता; बजट 2026-27 में नैनो-डीएपी का सभी कृषि-जलवायु क्षेत्रों में विस्तार।
🧮 एनपीके अनुपात — आदर्श बनाम भारत आदर्श — नाइट्रोजन : फॉस्फोरस : पोटाश = 4 : 2 : 1 भारत (2022-23) ≈ 10.9 : 4.1 : 1 — नाइट्रोजन (यूरिया) का अत्यधिक प्रयोग |
🔎 सूत्र से क्या समझें: आदर्श अनुपात 4 : 2 : 1 है, पर भारत में नाइट्रोजन लगभग ढाई गुना अधिक डाली जा रही है। कारण साफ़ है — यूरिया पर भारी सब्सिडी से वह बहुत सस्ता है, जबकि फॉस्फोरस और पोटाश महँगे हैं। नतीजा: मिट्टी असंतुलित, पैदावार ठहरी हुई, और अतिरिक्त नाइट्रोजन बहकर जलाशयों तक पहुँचती है।
📘 आसान परिभाषा: सुपोषण (Eutrophication) |
📚 परिभाषा: खेतों से बहकर आए नाइट्रोजन और फॉस्फोरस जैसे पोषक तत्वों के कारण झीलों-तालाबों में शैवाल की अत्यधिक वृद्धि, जिससे पानी में घुली ऑक्सीजन घटती है और जलीय जीव मरने लगते हैं। |
✅ आसान भाषा में: तालाब को "ज़रूरत से ज़्यादा खाद" मिल गई और उसका दम घुटने लगा। 🏠 उदाहरण: खेतों के किनारे के तालाब पर हरी चादर जम जाना और गर्मियों में मरी मछलियाँ तैरना। |
📘 आसान परिभाषा: पोषक तत्व आधारित सब्सिडी (Nutrient Based Subsidy — NBS) |
📚 परिभाषा: 2010 से फॉस्फेट और पोटाश उर्वरकों पर लागू व्यवस्था, जिसमें सब्सिडी उर्वरक की बोरी पर नहीं, उसमें मौजूद पोषक तत्व (नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटाश, सल्फर) की प्रति किलो मात्रा पर तय होती है; यूरिया इससे बाहर है और उसकी कीमत सरकार नियंत्रित करती है। |
✅ आसान भाषा में: जिस खाद में जितना पोषण, उतनी सब्सिडी। 🏠 उदाहरण: जैसे मिठाई की दुकान पर छूट डिब्बे पर नहीं, उसमें भरे घी की मात्रा पर मिले। |
◆ चुनौतियाँ: मृदा क्षरण, जल-निकायों का सुपोषण, राजकोषीय बोझ (उर्वरक सब्सिडी 2026-27 में लगभग ₹1,70,799 करोड़; 2022-23 में यह लगभग ₹2.25 लाख करोड़ के शिखर पर थी), आयात निर्भरता, असंतुलित प्रयोग।
◆ प्रयास: मृदा स्वास्थ्य कार्ड, पोषक तत्व आधारित सब्सिडी (NBS), "एक राष्ट्र-एक उर्वरक" (भारत ब्रांड), गोबर-धन योजना, पीएम-प्रणाम, उर्वरक उड़नदस्ते, नैनो उर्वरकों पर अनुसंधान।
योजना | मुख्य बिंदु |
मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना (2015) | मिट्टी का परीक्षण 12 मापदंडों पर — 9 रासायनिक: नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटैशियम, सल्फर, जिंक, आयरन, कॉपर, मैंगनीज़, बोरॉन; 3 भौतिक: पीएच, विद्युत चालकता, जैविक कार्बन — खाद की उचित मात्रा का सुझाव |
पीएम-प्रणाम (PM-PRANAM) | "पृथ्वी माता की पुनर्स्थापना, जागरूकता, पोषण व सुधार हेतु प्रधानमंत्री कार्यक्रम" — रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय; बजट 2023-24 में घोषित; रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग घटाना व वैकल्पिक (नैनो, जैविक) उर्वरकों को बढ़ावा; अलग बजट नहीं — राज्य द्वारा बचाई गई सब्सिडी का 50% केंद्र अनुदान के रूप में देगा |
एकीकृत पोषक तत्व व कीट प्रबंधन | जैविक, रासायनिक व यांत्रिक विधियों का समन्वित उपयोग |
◆ समस्याएँ: हरित क्रांति के बाद एकल-फसल (Monocropping); "ट्रेडमिल प्रभाव" — समान उपज के लिए हर वर्ष अधिक शक्तिशाली बीजों की आवश्यकता; बीज प्रतिस्थापन दर कम (<20%); महँगे एचवाईवी बीज; कृषि अनुसंधान एवं विकास पर कृषि जीवीए का केवल लगभग 0.43% व्यय (विकसित देशों व ब्राज़ील में 1% से अधिक)।
📘 आसान परिभाषा: बीज प्रतिस्थापन दर (Seed Replacement Rate) |
📚 परिभाषा: किसी फसल के कुल बोए गए क्षेत्र का वह प्रतिशत, जिसमें किसान ने अपने पिछले वर्ष के बचाए बीज की जगह प्रमाणित या गुणवत्तापूर्ण नया बीज बोया। |
✅ आसान भाषा में: कितने खेतों में हर साल नया, अच्छा बीज बोया जाता है। 🏠 उदाहरण: गाँव के 100 खेतों में से केवल 18 में नया प्रमाणित गेहूँ-बीज बोया गया — दर 18%, जो 20% से कम है; बाकी पुराने घरेलू बीज से उपज धीरे-धीरे घटती है। |
📘 आसान परिभाषा: "ट्रेडमिल प्रभाव" (Treadmill Effect) |
📚 परिभाषा: वह स्थिति जिसमें किसान को उतनी ही उपज बनाए रखने के लिए हर वर्ष अधिक उन्नत बीज, अधिक खाद और अधिक कीटनाशक लगाने पड़ते हैं, क्योंकि कीट प्रतिरोधी हो जाते हैं और मिट्टी थक जाती है। |
✅ आसान भाषा में: जिम की चलती पट्टी पर दौड़ते रहो, फिर भी वहीं के वहीं। 🏠 उदाहरण: 2010 में 2 बोरी यूरिया से 40 क्विंटल गेहूँ मिलता था; आज उतनी ही उपज के लिए 3 बोरी लग रही हैं। |
◆ समाधान: साथी पोर्टल (SATHI — बीज पता लगाने की क्षमता, प्रमाणीकरण व समग्र सूची; विषय "उत्तम बीज — समृद्ध किसान"); राष्ट्रीय बीज मिशन; बजट 2025-26 में "उच्च उपज वाले बीजों पर राष्ट्रीय मिशन" (₹100 करोड़); पौधा किस्म एवं कृषक अधिकार संरक्षण (PPV&FR) अधिनियम, 2001 के तहत प्राधिकरण; मिश्रित खेती, अंतर-फसलीकरण, फसल चक्र, कृषि वानिकी, जलवायु-अनुकूल किस्में।
◆ जीएम (आनुवंशिक रूप से संशोधित) फसलें: पर्यावरण मंत्रालय की आनुवंशिक अभियांत्रिकी मूल्यांकन समिति (GEAC) द्वारा पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत विनियमित — उदाहरण: जीएम सरसों डीएमएच-11।
📖 पीछे की कहानी — बीटी कपास — भारत की एकमात्र स्वीकृत जीएम फसल 2002 में भारत ने बीटी कपास को व्यावसायिक खेती की अनुमति दी। इसमें मिट्टी के एक जीवाणु का जीन डाला गया था, जिससे पौधा स्वयं ऐसा प्रोटीन बनाता है जो कपास की सबसे बड़ी दुश्मन "बॉलवर्म" सुंडी को मार देता है। कुछ ही वर्षों में भारत का कपास उत्पादन लगभग दोगुना हुआ और भारत बड़ा निर्यातक बना। पर लगभग दस वर्ष बाद गुलाबी सुंडी ने प्रतिरोध विकसित कर लिया और महँगे बीज-कीटनाशक का बोझ फिर बढ़ गया — यही "ट्रेडमिल प्रभाव" का जीवंत उदाहरण है। जीएम सरसों (डीएमएच-11) को 2022 में पर्यावरणीय मंज़ूरी मिली, पर उसका मामला सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन रहा। |
📘 आसान परिभाषा: चावल सघनीकरण प्रणाली (System of Rice Intensification — SRI) |
📚 परिभाषा: धान की खेती की एक कृषि-पारिस्थितिक (Agroecological) विधि, जिसमें 8-15 दिन के बहुत छोटे पौधों को एक-एक करके वर्गाकार पैटर्न (जैसे 25×25 सेमी) में लगाया जाता है और रुक-रुक कर सिंचाई व जैविक खाद से मिट्टी में वायु-संचार बनाए रखा जाता है। |
✅ आसान भाषा में: कम बीज, कम पानी और कम बिजली में ज़्यादा धान — और खेत में लगातार पानी न भरा रहने से मीथेन गैस भी कम बनती है। 🏠 उदाहरण: एसआरआई अपनाने पर धान की पैदावार 20% से 50% या अधिक बढ़ सकती है, जबकि बीज व पानी की खपत काफ़ी घट जाती है — इसलिए यह पर्यावरण-अनुकूल भी है। |
योजना / पहल | मुख्य बिंदु |
परंपरागत कृषि विकास योजना (PKVY), 2015 | मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन के अंतर्गत केंद्र प्रायोजित; 20 हेक्टेयर या अधिक के क्लस्टर में जैविक खेती; लगभग ₹50,000 प्रति हेक्टेयर (3 वर्ष) सहायता; प्रमाणीकरण हेतु सहभागी प्रत्याभूति प्रणाली (PGS-India) |
भारतीय प्राकृतिक कृषि पद्धति (BPKP) | पीकेवीवाई की उप-योजना; रासायनिक उर्वरक-कीटनाशक का पूर्ण निषेध; देशी गाय के गोबर-गोमूत्र आधारित जीवामृत, बीजामृत, घनजीवामृत व आच्छादन (Mulching) — कृषि लागत में भारी कमी |
राष्ट्रीय प्राकृतिक कृषि मिशन (नवंबर 2024) | मिशन मोड में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा |
शून्य बजट प्राकृतिक खेती | सुभाष पालेकर द्वारा प्रवर्तित — बाहरी आदानों के बिना खेती |
पूर्वोत्तर हेतु जैविक मूल्य शृंखला मिशन (MOVCD-NER) | पूर्वोत्तर राज्यों में जैविक उत्पादन से विपणन तक |
🔎 तालिका से क्या समझें: जैविक और प्राकृतिक खेती में अंतर है — जैविक खेती में बाहर से ख़रीदी गई जैविक खाद (वर्मीकम्पोस्ट आदि) डाली जा सकती है और उत्पाद का प्रमाणन होता है; प्राकृतिक खेती में बाहर से लगभग कुछ नहीं ख़रीदा जाता, खेत और देसी गाय से ही जीवामृत-बीजामृत बनाए जाते हैं।
📖 पीछे की कहानी — शून्य बजट प्राकृतिक खेती — एक किसान का प्रयोग महाराष्ट्र के विदर्भ के किसान सुभाष पालेकर ने 1990 के दशक में देखा कि रासायनिक खेती में लागत बढ़ती जा रही है और कर्ज़ में डूबे किसान आत्महत्या कर रहे हैं। उन्होंने वर्षों जंगलों का अध्ययन किया — वहाँ बिना खाद-पानी के पेड़ फलते-फूलते हैं। इसी से उन्होंने देसी गाय के गोबर-गोमूत्र, गुड़ और बेसन से "जीवामृत" बनाने और मल्चिंग से नमी बचाने की विधि बनाई, जिसमें बाहर से ख़रीदने की लागत लगभग "शून्य" हो। आंध्र प्रदेश ने इसे राज्य-स्तर पर अपनाया और आगे केंद्र ने राष्ट्रीय प्राकृतिक कृषि मिशन (2024) शुरू किया। |
📌 सिक्किम — विश्व का पहला 100% जैविक राज्य (2016) महत्व: रासायनिक उर्वरकों के निषेध से मृदा उर्वरता, जल-स्रोतों की शुद्धता व हिमालयी जैव विविधता का संरक्षण; जैविक उत्पादों को प्रीमियम मूल्य और पर्यावरण-पर्यटन से किसानों की आय वृद्धि; रसायन-मुक्त पोषक भोजन से जन-स्वास्थ्य; एफएओ का "फ्यूचर पॉलिसी गोल्ड अवार्ड" (2018) — विश्व के लिए अनुकरणीय मॉडल। उत्तराखंड व त्रिपुरा भी 100% जैविक बनने की राह पर। |
📖 पीछे की कहानी — सिक्किम कैसे बना पूरी तरह जैविक 2003 में सिक्किम विधानसभा ने राज्य को जैविक बनाने का संकल्प लिया। अगले वर्षों में रासायनिक खाद और कीटनाशक की बिक्री धीरे-धीरे बंद की गई, उन पर सब्सिडी हटाई गई और अंत में प्रतिबंध लगाकर जुर्माने और जेल तक का प्रावधान किया गया। किसानों को जैविक खाद, बीज और प्रमाणन में सहायता दी गई। जनवरी 2016 में सिक्किम को पूर्ण जैविक राज्य घोषित किया गया। शुरू में कुछ फसलों की उपज घटी, पर पर्यटन, जैविक ब्रांड और साफ़ नदियों के रूप में राज्य को दीर्घकालिक लाभ मिला। |
🎯 याद रखें — इस खंड के मुख्य बिंदु 1. एनपीके का आदर्श अनुपात 4 : 2 : 1; भारत में लगभग 10.9 : 4.1 : 1 — नाइट्रोजन का अति-प्रयोग। 2. मृदा स्वास्थ्य कार्ड — 19 फ़रवरी 2015, सूरतगढ़ (श्रीगंगानगर); 12 मापदंड। 3. पोषक तत्व आधारित सब्सिडी — 2010 से; यूरिया इससे बाहर। 4. सिक्किम — पहला 100% जैविक राज्य (2016); बीटी कपास — भारत की एकमात्र व्यावसायिक जीएम फसल। |
किसान का सबसे बड़ा डर यह होता है कि मेहनत से उगाई फसल का सही दाम नहीं मिलेगा — बिचौलिए कम दाम देकर मुनाफ़ा कमा लेते हैं। कृषि विपणन में वे सभी सेवाएँ आती हैं जो उपज को खेत से अंतिम उपभोक्ता तक पहुँचाती हैं — योजना, उत्पादन, ग्रेडिंग, भंडारण, परिवहन व बिक्री। कृषि विपणन मुख्यतः राज्य सूची का विषय है।
![]() चित्र 8: उपज की यात्रा — पारंपरिक मंडी बनाम ई-नाम |
⬆️ ऊर्ध्वप्रवाह (Upstream) — कटाई-पूर्व व खेत-स्तर | ⬇️ अनुप्रवाह (Downstream) — कटाई-पश्चात व बाज़ार वितरण |
◆ गुणवत्तापूर्ण बीज व उर्वरक ◆ कटाई, सफ़ाई ◆ छँटाई व ग्रेडिंग | ◆ भंडारण व वेयरहाउसिंग ◆ परिवहन व लॉजिस्टिक्स ◆ प्रसंस्करण व मूल्य संवर्धन ◆ ब्रांडिंग — पैकेजिंग, लेबलिंग, मूल्य निर्धारण |
📘 आसान परिभाषा: न्यूनतम समर्थन मूल्य |
📚 परिभाषा: एमएसपी वह न्यूनतम गारंटीकृत मूल्य है जिस पर सरकार बुवाई से पहले घोषणा करके किसानों से उपज खरीदने का आश्वासन देती है, चाहे बाज़ार मूल्य उससे कम क्यों न हो। इसकी सिफारिश कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (CACP) करता है और अंतिम मंज़ूरी प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (CCEA) देती है। यह "न्यूनतम कीमत" (Price Floor) का उत्कृष्ट उदाहरण है (दूसरा उदाहरण — न्यूनतम मज़दूरी)। |
✅ आसान भाषा में: जैसे शेयर बाज़ार में "फ्लोर प्राइस" से नीचे भाव नहीं जा सकता, वैसे ही सरकार तय कर देती है कि किसान की फसल का दाम इससे कम नहीं होगा। 🏠 उदाहरण: रबी विपणन वर्ष 2026-27 के लिए गेहूँ का एमएसपी ₹2,585 प्रति क्विंटल है; यदि व्यापारी केवल ₹2,200 दें तो किसान सरकारी खरीद केंद्र पर ₹2,585 में बेच सकता है। |
पहलू | विवरण |
एमएसपी की शुरुआत | 1966-67 — हरित क्रांति के साथ, सबसे पहले गेहूँ के लिए |
सिफारिश | सीएसीपी (स्थापना 1965, मूल नाम कृषि मूल्य आयोग) — कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय का संलग्न कार्यालय |
मंज़ूरी | सीसीईए (अध्यक्ष — प्रधानमंत्री) |
फसलें | 22 फसलों पर एमएसपी + गन्ने के लिए एफआरपी = कुल 23: 14 खरीफ — धान, ज्वार, बाजरा, मक्का, रागी, अरहर, मूँग, उड़द, मूँगफली (छिलके सहित), सोयाबीन, सूरजमुखी, तिल, रामतिल (नाइजरसीड), कपास; 6 रबी — गेहूँ, जौ, चना, मसूर, रेपसीड-सरसों, कुसुम (Safflower); 2 वाणिज्यिक — जूट व खोपरा |
उचित एवं लाभकारी मूल्य (FRP) | केंद्र द्वारा तय न्यूनतम मूल्य जिस पर चीनी मिलों को गन्ना खरीदना अनिवार्य; कुछ राज्य इससे अधिक राज्य सलाहकारी मूल्य (SAP) घोषित करते हैं |
एमएसपी तय करने के कारक | उत्पादन लागत (A2+FL), माँग-आपूर्ति, घरेलू व अंतर्राष्ट्रीय मूल्य प्रवृत्ति, अंतर-फसल मूल्य समता, उत्पादन लागत पर कम से कम 50% लाभ |
खरीद एजेंसियाँ | एफसीआई (गेहूँ, धान); नेफेड, एनसीसीएफ, राज्य एजेंसियाँ (दलहन-तिलहन) |
🔎 तालिका से क्या समझें: तालिका बताती है कि समर्थन मूल्य कोई एक संस्था अकेले तय नहीं करती — आयोग लागत के आधार पर सिफ़ारिश करता है, मंत्रिमंडल समिति मंज़ूरी देती है, और ख़रीद अलग एजेंसियाँ करती हैं। गन्ना इस सूची से अलग है, क्योंकि उसे सरकार नहीं, चीनी मिलें ख़रीदती हैं — इसलिए उसके लिए "उचित एवं लाभकारी मूल्य" तय होता है।
📘 आसान परिभाषा: उचित एवं लाभकारी मूल्य और राज्य परामर्श मूल्य (FRP & SAP) |
📚 परिभाषा: उचित एवं लाभकारी मूल्य — केंद्र द्वारा घोषित वह न्यूनतम कीमत जिस पर चीनी मिलों को किसान से गन्ना ख़रीदना कानूनन अनिवार्य है; राज्य परामर्श मूल्य — कुछ राज्यों (जैसे उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा) द्वारा इससे ऊपर घोषित गन्ना मूल्य। |
✅ आसान भाषा में: गन्ने का "न्यूनतम सरकारी भाव", जिसे कुछ राज्य अपनी ओर से और बढ़ा देते हैं। 🏠 उदाहरण: मान लीजिए केंद्र ने गन्ने का भाव ₹355 प्रति क्विंटल रखा और किसी राज्य ने अपने किसानों के लिए ₹380 घोषित किया — उस राज्य की मिलों को ₹380 देने होंगे। |
📘 आसान परिभाषा: अंतर-फसल मूल्य समता (Inter-crop Price Parity) |
📚 परिभाषा: विभिन्न फसलों के समर्थन मूल्य इस तरह तय करना कि किसी एक फसल का भाव इतना आकर्षक न हो जाए कि किसान दूसरी ज़रूरी फसलें (जैसे दलहन-तिलहन) बोना छोड़ दें। |
✅ आसान भाषा में: फसलों के दामों में ऐसा संतुलन, ताकि सब फसलें बोई जाती रहें। 🏠 उदाहरण: अगर गेहूँ का भाव बहुत ऊँचा और चने का बहुत नीचा रखा जाए, तो सब किसान गेहूँ बोएँगे और देश को चना आयात करना पड़ेगा। |
लागत | क्या शामिल है |
ए2 (प्रत्यक्ष भुगतान लागत) | किसान द्वारा नकद व वस्तु रूप में किया गया वास्तविक खर्च — बीज, उर्वरक, कीटनाशक, किराए का मज़दूर, बैल/मशीनरी का किराया, पट्टे की ज़मीन का किराया, ईंधन, सिंचाई, कार्यशील पूँजी पर ब्याज |
ए2 + एफएल | ए2 + परिवार के सदस्यों के अवैतनिक श्रम (Family Labour) का अनुमानित मूल्य — छोटे किसानों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण |
सी2 (व्यापक लागत) | ए2 + एफएल + किसान की अपनी भूमि का अनुमानित किराया + अचल पूँजी (यंत्र, नलकूप) पर छोड़ा गया ब्याज (Interest Forgone); भू-राजस्व भी ए2 में सम्मिलित |
🧮 लागत का क्रम एवं न्यूनतम समर्थन मूल्य का सूत्र ए2 < ए2 + एफएल < सी2 वर्तमान सरकारी नीति (बजट 2018-19 से): एमएसपी = (A2 + FL) × 1.5 स्वामीनाथन आयोग (राष्ट्रीय किसान आयोग, 2004-06) की सिफारिश: एमएसपी = सी2 × 1.5 (C2 + 50%) |
![]() चित्र 9: न्यूनतम समर्थन मूल्य की लागत-सीढ़ी — ए2, ए2 + एफएल एवं सी2 |
तुलना का आधार | स्वामीनाथन आयोग (C2 + 50%) | वर्तमान नीति (A2+FL + 50%) |
लागत का आधार | समग्र लागत — भूमि का किराया व स्थायी पूँजी पर ब्याज भी शामिल | केवल प्रत्यक्ष लागत व पारिवारिक श्रम |
एमएसपी का स्तर व किसान आय | एमएसपी ऊँचा — किसान को वास्तविक लाभ व अधिक शुद्ध आय | एमएसपी अपेक्षाकृत कम — केवल परिचालन लागत पर मार्जिन |
राजकोषीय प्रभाव | खरीद व खाद्य सब्सिडी बिल में भारी वृद्धि | सरकार पर वित्तीय भार नियंत्रित |
मुद्रास्फीति व प्रतिस्पर्धा | खाद्य मुद्रास्फीति का अधिक जोखिम; वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता प्रभावित | उपभोक्ता कीमतों पर सीमित प्रभाव |
स्थिति | पूर्ण रूप से लागू नहीं — किसान संगठनों की प्रमुख माँग | लागू |
🧮 हल किया हुआ उदाहरण — एक क्विंटल गेहूँ ए2 (नकद ख़र्च) = ₹1,000; परिवार का श्रम (FL) = ₹300; अपनी ज़मीन का किराया व पूँजी पर ब्याज = ₹500 वर्तमान नीति : (1,000 + 300) × 1.5 = ₹1,950 स्वामीनाथन सूत्र : सी2 = 1,000 + 300 + 500 = 1,800; 1,800 × 1.5 = ₹2,700 |
🔎 तालिका से क्या समझें: एक ही फसल पर दोनों सूत्रों में ₹750 प्रति क्विंटल का अंतर है। इसका कारण है कि वर्तमान नीति किसान की अपनी ज़मीन के किराए और उसकी मशीनों पर लगी पूँजी के ब्याज को लागत नहीं मानती। किसान संगठन कहते हैं कि अपनी ज़मीन भी एक लागत है — यही बहस की जड़ है।
📖 पीछे की कहानी — स्वामीनाथन आयोग — "किसान सिर्फ़ उत्पादक नहीं" 2004 में किसानों की आत्महत्याओं की बढ़ती ख़बरों के बीच केंद्र ने राष्ट्रीय किसान आयोग बनाया, जिसके अध्यक्ष हरित क्रांति के वैज्ञानिक एम.एस. स्वामीनाथन थे। आयोग ने 2004 से 2006 तक पाँच रिपोर्टें दीं। उसकी सबसे चर्चित सिफ़ारिश थी कि समर्थन मूल्य "व्यापक लागत (C2) के ऊपर कम से कम 50%" हो। आयोग ने यह भी कहा कि कृषि की सफलता उत्पादन से नहीं, किसान की शुद्ध आय से नापी जाए। 2018 में सरकार ने "लागत पर 50%" को अपनाया, पर आधार ए2+एफएल रखा, सी2 नहीं — इसीलिए यह माँग आज भी आंदोलनों के केंद्र में है। |
📊 नवीनतम एमएसपी (₹ प्रति क्विंटल) — नवीनतम आँकड़े 1. गेहूँ (रबी विपणन वर्ष 2026-27): ₹2,585 — पिछले वर्ष (₹2,425) से ₹160 या 6.59% अधिक (अक्टूबर 2025 में स्वीकृत)। 2. धान (खरीफ विपणन वर्ष 2026-27, 13 मई 2026 को स्वीकृत): सामान्य धान ₹2,441 (2025-26 में सामान्य धान ₹2,369, ग्रेड-A ₹2,389); 14 खरीफ फसलों में दलहन व तिलहन को अपेक्षाकृत अधिक प्रतिशत वृद्धि — जल-गहन धान-गेहूँ चक्र से फसल विविधीकरण हेतु। 3. मसूर जैसी दलहनों का एमएसपी उत्पादन लागत से लगभग 89% अधिक रखा गया है। |
◆ किसानों को मूल्य-गिरावट से सुरक्षा व लाभकारी मूल्य; इनपुट व नई तकनीक में निवेश को प्रोत्साहन; वांछित फसल-प्रारूप (Cropping Pattern) का संकेत; पीडीएस व आपातकालीन बफर स्टॉक हेतु अनाज की उपलब्धता; उपभोक्ताओं के लिए मूल्य स्थिरता।
◆ सीमित लाभ: शांता कुमार समिति (2015) का आकलन — केवल लगभग 6% किसान ही एमएसपी खरीद का लाभ ले पाते हैं; लाभ मुख्यतः बड़े व समृद्ध किसानों को।
◆ फसल-वार विषमता: 22-23 घोषित फसलों में से प्रभावी खरीद मुख्यतः गेहूँ व धान की; दलहन, तिलहन व मोटे अनाजों के लिए खरीद-भंडारण तंत्र कमज़ोर — फसल विविधीकरण बाधित।
◆ भौगोलिक विषमता: खरीद मुख्यतः पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश व उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों तक।
◆ अत्यधिक भंडार व राजकोषीय बोझ: गेहूँ-चावल की आवश्यकता से अधिक खरीद → विशाल बफर स्टॉक, एफसीआई गोदामों में बर्बादी; खरीद, भंडारण, परिवहन व खाद्य सब्सिडी पर भारी व्यय।
◆ देरी: एमएसपी की देर से घोषणा (मूल्य-संकेतक के रूप में प्रभाव कम) व खरीद में देरी → किसान स्थानीय व्यापारियों को एमएसपी से कम पर बेचने को विवश (संकटकालीन बिक्री)।
◆ खरीद तंत्र की कमियाँ: खरीद केंद्रों की अपर्याप्त संख्या व कठोर गुणवत्ता मानक (नमी, दाने का रंग) — किसान एमएसपी से कम पर बेचने को विवश; एफसीआई का नेटवर्क मुख्यतः खाद्यान्न तक सीमित, नेफेड दलहन-तिलहन की सीमित मात्रा ही खरीद पाता है।
◆ कानूनी स्थिति: एमएसपी अभी कानूनी अधिकार नहीं, सरकारी नीति है — कानूनी गारंटी किसान संगठनों की पुरानी माँग।
◆ नीतिगत निहितार्थ: ए2+एफएल आधार में भूमि व स्थायी पूँजी की लागत छूट जाती है — दीर्घकाल में खेती अलाभकारी बनती है; इसीलिए सी2 आधार की माँग।
◆ समाधान: विकेंद्रीकृत खरीद, खरीद का विविधीकरण (दलहन-तिलहन-श्री अन्न), मूल्य अंतर भुगतान (PDPS) / भावांतर भुगतान योजना, पीएम-आशा का सुदृढ़ीकरण, इनपुट लागत (C2) घटाने वाली तकनीक।
राज्यों के एपीएमसी अधिनियमों का उद्देश्य किसानों को बिचौलियों के शोषण से बचाना था — उपज को अधिसूचित मंडी में नीलामी से बेचना अनिवार्य किया गया। समय के साथ यह व्यवस्था स्वयं मंडी-एकाधिकार की समस्या बन गई:
◆ आढ़तियों व बिचौलियों का वर्चस्व — किसान का बाज़ार से सीधा संपर्क नहीं, सौदेबाज़ी शक्ति क्षीण।
◆ व्यापारियों की गुटबंदी (Cartelization) — नीलामी में कृत्रिम रूप से कम मूल्य।
◆ एकाधिक शुल्क व उपकर — प्रवेश शुल्क, मंडी शुल्क, उपयोगकर्ता प्रभार, आढ़त; किसान की प्राप्ति घटती, उपभोक्ता मूल्य बढ़ता।
◆ अपारदर्शी मूल्य-खोज — खुली बोली या गुप्त बोली ("हत्था प्रणाली"); सूचना विषमता।
◆ अवसंरचना का अभाव — भंडारण, कोल्ड-चेन, ग्रेडिंग, स्वचालित तौल; जल्दी खराब होने वाली उपज (Perishables) का भारी नुकसान।
◆ भौगोलिक विखंडन — किसान केवल अपनी अधिसूचित स्थानीय मंडी तक सीमित; अखिल भारतीय एकीकृत बाज़ार नहीं बना।
📘 आसान परिभाषा: आढ़तिया (Commission Agent) |
📚 परिभाषा: मंडी में लाइसेंस प्राप्त वह बिचौलिया जो किसान की उपज की नीलामी कराता है, तौल-भुगतान की व्यवस्था करता है और बदले में कमीशन (आढ़त) लेता है; कई बार वही किसान को फसल-ऋण भी देता है। |
✅ आसान भाषा में: मंडी का "दलाल", जो सौदा भी कराता है और उधार भी देता है। 🏠 उदाहरण: किसान ने आढ़तिये से बुवाई के समय ₹20,000 उधार लिए; अब वह मजबूरी में अपनी फसल उसी के ज़रिए बेचता है, भले दूसरी जगह भाव बेहतर हो। |
💡 क्या आप जानते हैं? पहला न्यूनतम समर्थन मूल्य 1966-67 में गेहूँ के लिए लगभग ₹54 प्रति क्विंटल घोषित हुआ था — आज यह ₹2,585 है। |
📘 आसान परिभाषा: ई-नाम (National Agriculture Market) |
📚 परिभाषा: 14 अप्रैल 2016 को लघु कृषक कृषि व्यवसाय संघ (SFAC) द्वारा शुरू अखिल भारतीय इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग पोर्टल, जो भौतिक एपीएमसी मंडियों के नेटवर्क को एक साझा ऑनलाइन मंच से जोड़कर "एक राष्ट्र, एक बाज़ार" की अवधारणा साकार करता है। यह केंद्रीय क्षेत्र की योजना (100% केंद्रीय वित्तपोषण) है। |
✅ आसान भाषा में: जैसे ऑनलाइन बाज़ार पर आप देशभर के खरीदारों को सामान बेच सकते हैं, वैसे ही ई-नाम पर किसान अपनी फसल केवल गाँव की मंडी नहीं, देशभर के खरीदारों को दिखा व बेच सकता है। 🏠 उदाहरण: किसी किसान की सरसों को स्थानीय मंडी में कम भाव मिल रहा हो तो ई-नाम से वह किसी दूसरे राज्य के खरीदार को — जहाँ ज़्यादा भाव मिल रहा हो — अपनी उपज बेच सकता है। |
ई-नाम आँकड़ा | मूल्य (मार्च 2026 तक) |
जुड़ी हुई मंडियाँ | 1,656 (23 राज्य + 4 केंद्र-शासित प्रदेश) |
पंजीकृत किसान | 1.80 करोड़ |
पंजीकृत व्यापारी | लगभग 2.73 लाख |
पंजीकृत एफपीओ | 4,724 |
कुल व्यापार (शुरुआत से) | लगभग 13.25 करोड़ मीट्रिक टन, मूल्य लगभग ₹4.82 लाख करोड़; 200 से अधिक अधिसूचित वस्तुएँ |
सहायता | हार्डवेयर-सॉफ्टवेयर, गुणवत्ता परीक्षण (Assaying) व संबंधित ढाँचे हेतु प्रति एपीएमसी मंडी ₹75 लाख |
गोदाम आधारित व्यापार | इलेक्ट्रॉनिक परक्राम्य गोदाम रसीद (e-NWR) के आधार पर गोदामों से सीधे व्यापार |
🔎 तालिका से क्या समझें: लगभग 1,656 मंडियाँ और 1.8 करोड़ किसान जुड़ चुके हैं, पर असली कसौटी है "अंतर-मंडी" और "अंतर-राज्य" व्यापार — यानी क्या राजस्थान का किसान सचमुच मध्य प्रदेश के व्यापारी को बेच पा रहा है? यह हिस्सा अभी कम है, क्योंकि परख प्रयोगशालाएँ, परिवहन और भरोसा तीनों अधूरे हैं।
📘 आसान परिभाषा: परख (Assaying) |
📚 परिभाषा: उपज के नमूने की प्रयोगशाला में नमी, दाने के आकार, टूटे दाने, मिलावट और तेल-मात्रा जैसे गुणों की मानक जाँच, जिसका प्रमाणपत्र ऑनलाइन बोली में दिखाया जाता है। |
✅ आसान भाषा में: माल की "गुणवत्ता रिपोर्ट", ताकि दूर बैठा ख़रीदार बिना देखे भरोसा कर सके। 🏠 उदाहरण: ई-नाम पर "सरसों — तेल मात्रा 42%, नमी 7%" लिखा देखकर गुजरात का तेल मिल मालिक बोली लगा देता है। |
◆ ई-नाम से सुधार: मंडियों का डिजिटल एकीकरण; पारदर्शी ऑनलाइन बोली से स्थानीय गुटबंदी टूटी; बिचौलियों की भूमिका घटी; किसान के खाते में सीधा व त्वरित ऑनलाइन भुगतान; परख-प्रयोगशालाएँ व ग्रेडिंग मानक; एफपीओ का एकीकरण; हर राज्य के लिए एकल बाज़ार शुल्क व एकल लाइसेंस की दिशा।
◆ चुनौतियाँ: राज्यों के मंडी कानूनों में एकरूपता का अभाव; किसानों में डिजिटल साक्षरता की कमी — अब भी आढ़तियों पर निर्भरता; कई मंडियों में परख-प्रयोगशालाएँ निष्क्रिय; अंतर-राज्यीय परिवहन व कोल्ड-चेन कमज़ोर; अधिकांश व्यापार अब भी एक ही मंडी के भीतर — अंतर-मंडी/अंतर-राज्यीय व्यापार का हिस्सा कम।
◆ आगे की राह: ई-नाम 2.0 में गोदाम-आधारित व्यापार व परिवहन एग्रीगेटर (जैसे "किसान रथ" ऐप); सभी राज्यों में एकल व्यापार लाइसेंस व एकल-बिंदु मंडी शुल्क; हर मंडी में परख प्रयोगशाला व ब्लॉकचेन आधारित ट्रेसेबिलिटी; एफपीओ के माध्यम से डिजिटल साक्षरता।
पहल | मुख्य बिंदु |
परक्राम्य गोदाम रसीद (NWR) | गोदाम में जमा उपज के स्वामित्व, मात्रा व गुणवत्ता का प्रमाण; इसे बेचा या बैंक ऋण हेतु ज़मानत के रूप में प्रयोग किया जा सकता है — उपज को भौतिक रूप से हटाए बिना नकद तरलता |
कृषि उड़ान 2.0 | अक्टूबर 2021; नागरिक उड्डयन मंत्रालय; कृषि उत्पादों के हवाई परिवहन में सहायता |
किसान रेल, ऑपरेशन ग्रीन्स | जल्दी खराब होने वाली उपज का तीव्र परिवहन; टमाटर-प्याज़-आलू (TOP) से आगे सभी फल-सब्ज़ियों की मूल्य स्थिरता |
एक ज़िला एक उत्पाद (ODOP) | विपणन व प्रसंस्करण हेतु ज़िला-विशिष्ट उत्पाद पर फोकस |
ग्रामीण कृषि बाज़ार (GrAMs) | ग्रामीण हाटों का उन्नयन — किसान के निकट बाज़ार |
कृषि निर्यात नीति, 2018 | कृषि निर्यात को $60 अरब तक बढ़ाने का लक्ष्य; एपीडा द्वारा निर्यात संवर्धन |
🎯 याद रखें — इस खंड के मुख्य बिंदु 1. समर्थन मूल्य — 22 फसलें + गन्ने का उचित एवं लाभकारी मूल्य; सिफ़ारिश आयोग की, मंज़ूरी आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति की। 2. वर्तमान सूत्र — (ए2 + एफएल) × 1.5; स्वामीनाथन आयोग — सी2 × 1.5। 3. केवल लगभग 6% किसान समर्थन मूल्य पर बेच पाते हैं। 4. ई-नाम — 14 अप्रैल 2016, लघु कृषक कृषि व्यवसाय संघ द्वारा; "एक राष्ट्र, एक बाज़ार"। |
खाद्य प्रबंधन के तीन उद्देश्य हैं — (1) किसानों से लाभकारी मूल्य (MSP) पर खरीद, (2) उपभोक्ताओं विशेषकर कमज़ोर वर्गों को किफ़ायती दरों पर वितरण (लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली व प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना), और (3) खाद्य सुरक्षा व मूल्य स्थिरता हेतु बफर स्टॉक बनाए रखना (FCI गोदाम + केंद्रीय व राज्य भंडारण निगम + निजी क्षमता)। तीनों घटक भारतीय खाद्य निगम (FCI) द्वारा प्रबंधित किए जाते हैं।
![]() चित्र 10: खाद्य प्रबंधन की कड़ी — खरीद, भंडारण, आवंटन एवं वितरण |
◆ स्थापना: खाद्य निगम अधिनियम, 1964 के तहत 1965 में वैधानिक निकाय; मुख्यालय नई दिल्ली; उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय के अधीन।
◆ खरीद: राज्य एजेंसियों के साथ एमएसपी पर गेहूँ-धान की खुली (Open-ended) खरीद; केंद्रीकृत खरीद (FCI द्वारा प्रत्यक्ष) और विकेंद्रीकृत खरीद (DCP) — राज्य स्वयं खरीद व वितरण करते हैं और अधिशेष केंद्रीय पूल में देते हैं; पैक्स व एपीएमसी के माध्यम से पारदर्शी खरीद व सीधे बैंक भुगतान।
◆ भंडारण: "बफर मानदंडों" जितना स्टॉक; एफसीआई गोदाम, केंद्रीय भंडारण निगम (CWC), राज्य भंडारण निगम व "निजी उद्यमी गारंटी" (PEG) योजना के तहत आधुनिक स्टील साइलो; विश्व खाद्य कार्यक्रम की "फ्लॉस्पैन" पूर्वनिर्मित मोबाइल भंडारण इकाइयाँ (पहाड़ी-दूरस्थ क्षेत्रों हेतु)।
◆ वितरण: केंद्रीय निर्गम मूल्य (CIP) पर राज्यों को आवंटन; अधिशेष राज्यों (पंजाब, हरियाणा) से कमी वाले राज्यों (पूर्वोत्तर, बिहार, राजस्थान) तक रेल-सड़क से अंतर-राज्यीय संचलन।
◆ आवंटन का दायरा: एफसीआई का अनाज केवल एनएफएसए तक सीमित नहीं — पीएम-पोषण (मध्याह्न भोजन), आईसीडीएस व अन्य कल्याणकारी योजनाओं को भी आवंटन।
शब्द | अर्थ | उदाहरण |
खुली ख़रीद (Open-ended Procurement) | समर्थन मूल्य पर जितना भी गेहूँ-धान किसान लाए, सरकार सब ख़रीदेगी — कोई ऊपरी सीमा नहीं | पंजाब का किसान 500 क्विंटल लाए या 5,000, सब ख़रीदा जाएगा |
विकेंद्रीकृत ख़रीद (Decentralised Procurement) | राज्य स्वयं ख़रीदता, भंडार करता और अपने यहाँ बाँटता है; बचा अनाज केंद्रीय पूल को देता है, ख़र्च केंद्र भरता है | मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ धान-गेहूँ स्वयं ख़रीदकर राशन में बाँटते हैं |
केंद्रीय निर्गम मूल्य (Central Issue Price) | जिस कीमत पर केंद्र राज्यों को राशन का अनाज देता है | जनवरी 2023 से राशन मुफ़्त, इसलिए लाभार्थी के लिए यह मूल्य शून्य |
बफर मानदंड (Buffer Norms) | हर तिमाही की शुरुआत में केंद्रीय पूल में रखा जाने वाला न्यूनतम अनाज भंडार | अप्रैल की शुरुआत में गेहूँ-चावल का एक तय न्यूनतम स्टॉक ज़रूरी |
📘 आसान परिभाषा: राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA), 2013 |
📚 परिभाषा: एनएफएसए देश की 75% ग्रामीण व 50% शहरी जनसंख्या (कुल लगभग 67%; 2011 की जनगणना के आधार पर लगभग 81.35 करोड़ लोग) को लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (TPDS) के माध्यम से रियायती खाद्यान्न का कानूनी अधिकार देता है — इसने खाद्य सुरक्षा को "कल्याण" से "विधिक अधिकार" बना दिया। |
✅ आसान भाषा में: सरकार ने कानून बनाकर तय कर दिया कि हर गरीब परिवार को सस्ता या मुफ़्त अनाज मिलना उसका "अधिकार" है, कोई "दया" नहीं। 🏠 उदाहरण: राशन कार्डधारी गरीब परिवार को हर महीने तय मात्रा में गेहूँ-चावल उचित दर दुकान (Fair Price Shop) से मिलना कानूनी अधिकार है — दुकानदार मना नहीं कर सकता; अनाज न मिले तो राज्य को "खाद्य सुरक्षा भत्ता" देना होता है। |
प्रावधान | विवरण |
लाभार्थियों का चयन | राज्य सरकारें — राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण (2011-12) के घरेलू उपभोग व्यय आँकड़ों के आधार पर; इसलिए बीपीएल व एपीएल दोनों शामिल |
अंत्योदय अन्न योजना (AAY) — सबसे गरीब | 35 किग्रा खाद्यान्न प्रति परिवार प्रति माह (परिवार-आधारित) |
प्राथमिकता वाले परिवार (PHH) | 5 किग्रा प्रति व्यक्ति प्रति माह (व्यक्ति-आधारित) |
अधिनियम में निर्धारित दरें (अनुसूची-I) | चावल ₹3, गेहूँ ₹2, मोटा अनाज ₹1 प्रति किग्रा — जनवरी 2023 से पूर्णतः निःशुल्क |
गर्भवती व स्तनपान कराने वाली माताएँ | गर्भावस्था व प्रसव के 6 माह तक आंगनवाड़ी में निःशुल्क भोजन / 600 कैलोरी का "टेक होम राशन"; किस्तों में कम से कम ₹6,000 का मातृत्व लाभ |
बच्चे | 6 माह-6 वर्ष — आंगनवाड़ी में; 6-14 वर्ष — सरकारी स्कूलों में एक समय का मुफ़्त गर्म भोजन (पीएम-पोषण / मध्याह्न भोजन) |
महिला सशक्तिकरण | राशन कार्ड हेतु परिवार की 18 वर्ष या अधिक आयु की सबसे वरिष्ठ महिला परिवार की मुखिया |
शिकायत निवारण | त्रि-स्तरीय — आंतरिक तंत्र (हेल्पलाइन), ज़िला शिकायत निवारण अधिकारी (DGRO), राज्य खाद्य आयोग; सामाजिक अंकेक्षण व सतर्कता समितियाँ |
◆ प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना (PMGKAY): कोविड-19 के दौरान अप्रैल 2020 में अतिरिक्त निःशुल्क अनाज हेतु शुरू; जनवरी 2023 से एनएफएसए में विलय और नियमित एनएफएसए हकदारी पूरी तरह निःशुल्क; नवंबर 2023 में 5 वर्ष (जनवरी 2024 से दिसंबर 2028) के लिए विस्तार — अनुमानित लागत ₹11.8 लाख करोड़।
◆ एक राष्ट्र-एक राशन कार्ड (ONORC): राशन कार्डों की अंतर-राज्यीय व अंतः-राज्यीय पोर्टेबिलिटी — प्रवासी लाभार्थी किसी भी उचित दर दुकान पर इलेक्ट्रॉनिक पॉइंट ऑफ़ सेल (e-PoS) पर बायोमेट्रिक/आधार प्रमाणीकरण से राशन ले सकते हैं; अब सभी 36 राज्यों/केंद्र-शासित प्रदेशों में लागू — एनएफएसए की 100% आबादी कवर।
📌 राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा (संशोधन) विधेयक, 2026 — मसौदा जारी: 2026 के मध्य (जून-जुलाई 2026) में खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग ने सार्वजनिक टिप्पणियों हेतु मसौदा जारी किया। प्रस्ताव: एएवाई परिवारों को 7 किग्रा प्रति व्यक्ति प्रति माह, पर अधिकतम 35 किग्रा प्रति परिवार — यानी 1 सदस्य: 7 किग्रा, 2: 14, 3: 21, 4: 28, 5 या अधिक: 35 किग्रा। (शांता कुमार समिति ने भी AAY को 7 किग्रा/व्यक्ति की सिफारिश की थी।) सरकार का तर्क: छोटे एएवाई परिवारों को बड़े परिवारों की तुलना में प्रति व्यक्ति कहीं अधिक अनाज मिल रहा था — इस "अंतः-श्रेणी असमानता" को दूर करना। आलोचना: छोटे परिवारों (बुज़ुर्ग दंपती, विधवाएँ, दिव्यांग) की हकदारी घटेगी; तमिलनाडु, केरल जैसे छोटे औसत परिवार-आकार वाले राज्यों पर प्रतिकूल ("उत्तर-दक्षिण विभाजन" की आशंका); केवल अनाज — दलहन, खाद्य तेल, प्रोटीन शामिल नहीं; कवरेज अब भी 2011 की जनगणना पर आधारित; बायोमेट्रिक/ई-केवाईसी विफलता व प्रवासियों के बहिष्करण जैसी समस्याएँ अनसुलझी; साथ ही भंडारण, परिवहन व अतिरिक्त पोषक तत्वों की लागत-साझेदारी पर केंद्र-राज्य विवाद; खाद्य सब्सिडी बोझ व मुद्रास्फीति का दबाव; ग्रामीण, जनजातीय व हाशिए के समुदायों में डिजिटल विभाजन (आधार-प्रमाणीकरण विफलता)। आगे की राह: सहकारी संघवाद को बढ़ावा; राज्य खाद्य आयोग व डीजीआरओ को पर्याप्त बजट व प्रशासनिक शक्तियाँ; आपूर्ति श्रृंखला में जीपीएस ट्रैकिंग व डिजिटल इन्वेंटरी प्रबंधन; कमज़ोर वर्गों का स्वतः समावेशन; टीपीडीएस अभिलेखों का अनिवार्य सार्वजनिक प्रकटीकरण। |
◆ विकेंद्रीकृत खरीद: पंजाब, हरियाणा, आंध्र प्रदेश जैसे मज़बूत खरीद-तंत्र वाले राज्यों में खरीद पूरी तरह राज्य एजेंसियों को सौंपकर एफसीआई पूर्वी राज्यों (असम, बिहार, ओडिशा, उत्तर प्रदेश) पर ध्यान दे।
◆ नकद हस्तांतरण: 50 लाख से अधिक आबादी वाले शहरों व अनाज-अधिशेष राज्यों में भौतिक राशन के स्थान पर खाद्य सब्सिडी सीधे बैंक खातों में।
◆ एनएफएसए कवरेज का युक्तिकरण: 67% से घटाकर लगभग 40% (वास्तविक निर्धन); एएवाई को 7 किग्रा/व्यक्ति।
◆ भंडारण: पीपीपी मॉडल से स्टील साइलो; लगभग 5 मिलियन टन का रणनीतिक भंडार; खरीद से वितरण तक पूर्ण कम्प्यूटरीकरण।
आधार | वर्तमान भौतिक पीडीएस | प्रस्तावित नकद हस्तांतरण |
राजकोषीय दक्षता | भंडारण, ढुलाई, संचालन लागत व अनाज सड़ने से भारी सब्सिडी बोझ | खरीद-परिवहन-भंडारण लागत में बचत |
रिसाव व भ्रष्टाचार | राशन दुकान व परिवहन स्तर पर 30-45% तक कालाबाज़ारी/विचलन (2011-12 के आसपास) | बिचौलिये समाप्त — लक्षित लाभार्थी को शत-प्रतिशत सहायता |
उपभोक्ता विकल्प व पोषण | केवल गेहूँ/चावल — आहार विविधता प्रभावित, बाज़ार मूल्य विकृत | दालें, दूध, अंडे, फल खरीदने की स्वतंत्रता |
मुद्रास्फीति जोखिम | कीमतें बढ़ने पर भी निश्चित मात्रा सुनिश्चित — पूर्ण सुरक्षा | खाद्य मुद्रास्फीति में नकद का वास्तविक मूल्य घटता |
सामाजिक प्रभाव | अनाज सीधे परिवार के उपभोग में — भुखमरी से प्रत्यक्ष बचाव | नकद के गैर-खाद्य/अवांछित मदों में व्यय का जोखिम |
अवसंरचना | उचित दर दुकानों का दूरदराज़ तक नेटवर्क | दूरस्थ क्षेत्रों में बैंक/एटीएम व कनेक्टिविटी की कमी; स्थानीय अनाज उपलब्धता की समस्या |
🔎 तालिका से क्या समझें: तालिका का निष्कर्ष है कि नकद और अनाज, दोनों के अपने जोखिम हैं — नकद से रिसाव घटता है और भोजन में विविधता आती है, पर महँगाई में उसका मूल्य घटता है और दूरदराज़ इलाकों में बैंक-बाज़ार दूर होते हैं। इसलिए "हाइब्रिड मॉडल" सबसे व्यावहारिक माना जाता है।
📖 पीछे की कहानी — शांता कुमार समिति — "खाद्य निगम को फिर से गढ़ो" 2014 में केंद्र ने पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार की अध्यक्षता में समिति बनाई, क्योंकि खाद्य निगम के गोदाम भरे पड़े थे, अनाज सड़ रहा था, फिर भी देश के बड़े हिस्से में किसानों को समर्थन मूल्य नहीं मिल रहा था। 2015 की रिपोर्ट का सबसे चौंकाने वाला निष्कर्ष था कि केवल लगभग 6% किसान ही समर्थन मूल्य पर बेच पाते हैं। समिति ने कहा कि खाद्य निगम पंजाब-हरियाणा जैसे राज्यों से हटकर पूर्वी भारत के किसानों पर ध्यान दे, और राशन का दायरा 67% से घटाकर वास्तव में ग़रीब लोगों तक सीमित हो। दायरा घटाने की सिफ़ारिश लागू नहीं हुई, पर ख़रीद के विस्तार पर काम आगे बढ़ा। |
संतुलित निष्कर्ष: पूर्णतः नकद हस्तांतरण के बजाय "हाइब्रिड मॉडल" उपयुक्त — मज़बूत बैंकिंग व सक्रिय बाज़ार वाले बड़े शहरों में डीबीटी, जबकि ग्रामीण, जनजातीय व दूरस्थ क्षेत्रों में डिजिटल रूप से एकीकृत (ONORC व e-PoS युक्त) भौतिक पीडीएस।
प्रकार | अर्थ | उदाहरण |
प्रत्यक्ष सब्सिडी | लाभार्थी को नकद रूप में | पीएम-किसान |
अप्रत्यक्ष सब्सिडी | किसी वस्तु की कीमत घटाने हेतु छूट के रूप में | बीज, यूरिया, बिजली, सिंचाई |
इनपुट सब्सिडी | उत्पादन आदानों पर | बीज सब्सिडी, फसल बीमा प्रीमियम सब्सिडी |
खरीद सब्सिडी | एमएसपी पर खरीद व वितरण | न्यूनतम समर्थन मूल्य, सार्वजनिक वितरण प्रणाली |
ब्याज छूट / अनुदान | ऋण पर ब्याज में राहत | किसान क्रेडिट कार्ड, कृषि अवसंरचना निधि |
◆ भारत में सब्सिडी का घटता क्रम: खाद्य > उर्वरक > ब्याज > ईंधन (LPG)।
◆ समस्याएँ: अवसर लागत (पूँजीगत व्यय से संसाधन हटते हैं); रिसाव; फर्जी लाभार्थी (उदाहरण — हरियाणा में 36 लाख फर्जी लाभार्थियों की पहचान से लगभग ₹7,800 करोड़ की बचत); नकारात्मक बाह्यताएँ (यूरिया-केरोसिन); समावेशन त्रुटि (~40% संपन्न परिवारों को लाभ) व बहिष्करण त्रुटि (~50% वास्तविक गरीब वंचित)।
अवधारणा | अर्थ | कृषि में उदाहरण |
अवसर लागत (Opportunity Cost) | एक विकल्प चुनने पर छोड़े गए सबसे अच्छे दूसरे विकल्प का मूल्य | सब्सिडी पर ख़र्च हुआ पैसा सिंचाई, सड़क या कोल्ड स्टोरेज में लगता तो स्थायी संपत्ति बनती |
नकारात्मक बाह्यता (Negative Externality) | किसी के निर्णय से समाज को होने वाला वह नुकसान जिसकी कीमत निर्णय लेने वाला नहीं चुकाता | मुफ़्त बिजली से अंधाधुंध भूजल दोहन; सस्ते यूरिया से मिट्टी और पानी ख़राब |
समावेशन त्रुटि (Inclusion Error) | अपात्र व्यक्ति का योजना में शामिल हो जाना | संपन्न परिवार के पास ग़रीबों वाला राशन कार्ड |
बहिष्करण त्रुटि (Exclusion Error) | पात्र व्यक्ति का योजना से छूट जाना | झोंपड़ी में रहने वाली विधवा, जिसका आधार प्रमाणीकरण नहीं हो पाया |
🎯 याद रखें — इस खंड के मुख्य बिंदु 1. भारतीय खाद्य निगम — 1965 (खाद्य निगम अधिनियम, 1964); ख़रीद, भंडार, वितरण। 2. खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 — 75% ग्रामीण, 50% शहरी; अंत्योदय 35 किग्रा/परिवार, प्राथमिकता परिवार 5 किग्रा/व्यक्ति। 3. जनवरी 2023 से राशन मुफ़्त; यह व्यवस्था दिसंबर 2028 तक। 4. एक राष्ट्र-एक राशन कार्ड — सभी 36 राज्यों/केंद्र-शासित प्रदेशों में। |
📘 आसान परिभाषा: खाद्य प्रसंस्करण (Food Processing) |
📚 परिभाषा: कच्चे कृषि उत्पादों को उन विधियों व तकनीकों से तैयार या अर्ध-तैयार उत्पादों में बदलना, जिससे उनकी भंडारण क्षमता, परिवहन-योग्यता, स्वाद, रंग, शेल्फ-आयु, बनावट व पोषण मूल्य बढ़े — यह कृषि और विनिर्माण के बीच सेतु है। |
✅ आसान भाषा में: कच्चे टमाटर सीधे बेचने के बजाय केचप बनाकर बेचें तो कीमत और बिकने की अवधि दोनों बढ़ जाती हैं — यही खाद्य प्रसंस्करण का लाभ है। 🏠 उदाहरण: आलू से चिप्स, गन्ने से गुड़, टमाटर से केचप; गाँव का दूध जल्दी खराब होता है, पर पाश्चुरीकृत कर पैकेट में बंद करने पर कई दिन चलता है और दूर शहरों तक बिकता है। |
📊 खाद्य प्रसंस्करण — मुख्य तथ्य — नवीनतम आँकड़े 1. कुल संगठित विनिर्माण रोज़गार में खाद्य प्रसंस्करण उद्योग का हिस्सा लगभग 12.91%; 75% से अधिक उद्योग असंगठित क्षेत्र में। 2. भारत अपने कृषि उत्पादन के 10% से भी कम का प्रसंस्करण करता है (अमेरिका में लगभग 65%)। 3. माँग के प्रेरक: तीव्र शहरीकरण, कामकाजी महिलाओं की बढ़ती संख्या, प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि, रेडी-टू-ईट भोजन की ओर झुकाव, संगठित खुदरा व ई-कॉमर्स का विस्तार। 4. खाद्य प्रसंस्करण में स्वचालित मार्ग से 100% एफडीआई; खाद्य प्रसंस्करण हेतु उत्पादन-संबद्ध प्रोत्साहन योजना (PLISFPI, 2021)। 5. फसलोत्तर हानि से वार्षिक लगभग ₹92,500 करोड़ का नुकसान। |
✅ लाभ | ⚠️ चुनौतियाँ |
◆ रोज़गार सृजन (श्रम-सघन) — ग्रामीण पलायन पर रोक ◆ फसलोत्तर हानि व खाद्य बर्बादी में कमी ◆ किसानों की आय में वृद्धि (मूल्य संवर्धन) ◆ उपभोक्ताओं को अधिक विकल्प (टमाटर महँगा हो तो केचप) व खाद्य मुद्रास्फीति पर नियंत्रण ◆ गुणवत्ता, शेल्फ-आयु व पोषण मूल्य में वृद्धि (चावल फोर्टिफिकेशन से स्कूली बच्चों में एनीमिया में कमी) ◆ निर्यात वृद्धि, कुपोषण में कमी | ◆ कोल्ड-चेन व रीफर (प्रशीतित) ट्रकों का अभाव ◆ सड़क-रेल लॉजिस्टिक्स की कमी, ऊँची लॉजिस्टिक्स लागत ◆ बंदरगाहों व सीमा शुल्क बिंदुओं पर निकासी बाधाएँ ◆ स्वास्थ्य चिंताएँ — मसालों में कीटनाशक अवशेष जैसे आरोप ◆ सांस्कृतिक आदत — ताज़े भोजन की पसंद; क्षेत्रीय विविधता से कोई एक "राष्ट्रीय" प्रसंस्कृत उत्पाद नहीं ◆ बड़े ब्रांडों को प्राथमिकता — स्थानीय इकाइयों के लिए कठिनाई; जटिल विनियम ◆ खेत-स्तर पर अपर्याप्त प्राथमिक प्रसंस्करण अवसंरचना |
योजना | मुख्य बिंदु |
प्रधानमंत्री किसान संपदा योजना (PMKSY — संपदा) | 2017 में घोषित केंद्रीय क्षेत्र की अंब्रेला योजना (प्रारंभिक आवंटन ₹6,000 करोड़); खेत से खुदरा केंद्र तक आधुनिक अवसंरचना — मेगा फूड पार्क, एकीकृत कोल्ड चेन व मूल्य संवर्धन, खाद्य प्रसंस्करण क्षमता, कृषि-प्रसंस्करण क्लस्टर (FPO/उद्यमियों को एक स्थान पर कोल्ड स्टोरेज, टेस्टिंग लैब, गोदाम, बिजली-पानी), बैकवर्ड-फॉरवर्ड लिंकेज, ऑपरेशन ग्रीन्स |
मेगा फूड पार्क | कुल 41 स्वीकृत, इनमें से लगभग दो दर्जन संचालित (नई स्वीकृतियाँ अब बंद); नाबार्ड का ₹2,000 करोड़ का विशेष कोष |
प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यम उन्नयन योजना (PMFME) | 29 जून 2020, खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय; केंद्र प्रायोजित (आत्मनिर्भर भारत); 2 लाख सूक्ष्म इकाइयों को सहायता; पात्र परियोजना लागत का 35% क्रेडिट-लिंक्ड पूँजीगत सब्सिडी (अधिकतम ₹10 लाख प्रति इकाई); एसएचजी सदस्य को ₹40,000 प्रारंभिक पूँजी (प्रति SHG अधिकतम ₹4 लाख); एक ज़िला एक उत्पाद (ODOP) दृष्टिकोण; 2020-21 से 2024-25 हेतु ₹10,000 करोड़ |
पीएलआई — खाद्य प्रसंस्करण (PLISFPI) | भारतीय कंपनियों को वैश्विक चैंपियन बनाना; रेडी-टू-कुक/रेडी-टू-ईट, प्रसंस्कृत फल-सब्ज़ी, समुद्री उत्पाद, मोटे अनाज आधारित व जैविक उत्पाद |
एपीडा | वाणिज्य मंत्रालय के अधीन; ताज़े व प्रसंस्कृत कृषि उत्पादों का निर्यात संवर्धन, गुणवत्ता नियंत्रण, स्वच्छता-पादप स्वच्छता (फाइटोसैनिटरी) मानक, जैविक प्रमाणीकरण, व्यापार मेलों व ब्रांडिंग में सहायता |
प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) | मत्स्य क्षेत्र में प्रसंस्करण व भंडारण अवसंरचना हेतु सहायता |
📘 आसान परिभाषा: मेगा फ़ूड पार्क (Mega Food Park) |
📚 परिभाषा: एक ही परिसर में कोल्ड स्टोरेज, गोदाम, परख प्रयोगशाला, पैकिंग, बिजली-पानी जैसी साझा सुविधाएँ देने वाला बड़ा खाद्य-प्रसंस्करण क्षेत्र, जिसमें कई उद्यमी अपनी इकाइयाँ लगाते हैं और आसपास के संग्रह-केंद्र किसानों से कच्चा माल लाते हैं। |
✅ आसान भाषा में: खाद्य उद्योगों की "साझा कॉलोनी", जहाँ महँगी सुविधाएँ सब मिलकर इस्तेमाल करते हैं। 🏠 उदाहरण: अजमेर ज़िले (रूपनगढ़) का मेगा फ़ूड पार्क — आसपास के किसानों की फल-सब्ज़ी और मसाले वहीं साफ़, प्रसंस्कृत और पैक होते हैं। |
📘 आसान परिभाषा: उत्पादन-संबद्ध प्रोत्साहन (Production Linked Incentive — PLI) |
📚 परिभाषा: वह योजना जिसमें कंपनी को आधार वर्ष की तुलना में बढ़ी हुई बिक्री या उत्पादन के एक तय प्रतिशत के बराबर नक़द प्रोत्साहन मिलता है। |
✅ आसान भाषा में: जितना ज़्यादा बनाओ-बेचो, उतना ज़्यादा इनाम। 🏠 उदाहरण: कोई मसाला कंपनी पिछले वर्ष से ₹100 करोड़ अधिक बेचे, तो उसे उसका 4-6% सरकार से प्रोत्साहन मिलता है। |
◆ कृषि-प्रसंस्करण क्लस्टर (PMKSY-संपदा का घटक): छोटे-मध्यम उद्यमों की लागत में कमी, खेत-द्वार (Farm Gate) पर मूल्य संवर्धन, लोडिंग-अनलोडिंग व साझा सुविधाएँ; खेत से थाली (Farm to Fork) — एकीकृत कोल्ड चेन व स्मार्ट लॉजिस्टिक्स से आपूर्ति श्रृंखला का आधुनिकीकरण।
◆ पीएलआई का प्रभाव: घरेलू विनिर्माण में वृद्धि, अतिरिक्त निवेश व रोज़गार सृजन; एपीडा बाज़ार अनुसंधान व आधुनिक पैकेजिंग अवसंरचना हेतु वित्तीय सहायता भी देता है।
◆ आगे की राह: अनुसंधान एवं विकास, गुणवत्ता मानकों (FSSAI, अंतर्राष्ट्रीय मानक) का कड़ाई से पालन, एफपीओ का प्रसंस्करण उद्योग से सीधा जुड़ाव, कोल्ड चेन में निजी निवेश।
🎯 याद रखें — इस खंड के मुख्य बिंदु 1. भारत अपने कृषि उत्पादन का 10% से भी कम प्रसंस्कृत करता है। 2. संपदा योजना (2017) — मेगा फ़ूड पार्क, कोल्ड चेन; सूक्ष्म खाद्य उद्यम योजना (29 जून 2020) — "एक ज़िला एक उत्पाद", 35% सब्सिडी। 3. खाद्य प्रसंस्करण में स्वचालित मार्ग से 100% विदेशी निवेश। |
कृषि केवल फसल उगाने तक सीमित नहीं है। संबद्ध क्षेत्र (Allied Sectors) वे पूरक गतिविधियाँ हैं जो कृषि से निकटता से जुड़ी हैं, किसान की आय में विविधता लाती हैं और फसल-विफलता के समय सुरक्षा कवच बनती हैं — पशुपालन, डेयरी, कुक्कुट पालन, मत्स्य पालन व जलीय कृषि, बागवानी, पुष्प कृषि, वानिकी व कृषि-वानिकी, मधुमक्खी पालन (एपिकल्चर) तथा रेशम कीट पालन (सेरीकल्चर)। आज ये क्षेत्र फसल क्षेत्र से कहीं अधिक तेज़ी से बढ़ रहे हैं और कृषि जीवीए में एक-तिहाई से अधिक योगदान देते हैं।
क्षेत्र | प्रमुख उपलब्धि |
🐄 पशुधन (Livestock) | जीवीए में लगभग 195% वृद्धि (FY15-FY24), औसत वार्षिक वृद्धि लगभग 7.1%; दूध उत्पादन में भारत विश्व में प्रथम |
🐟 मत्स्य पालन (Fisheries) | उत्पादन दोगुने से अधिक — 2013-14 के 95.79 लाख टन से 2024-25 में 197.75 लाख टन; औसत वार्षिक वृद्धि लगभग 8.8%; भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा मछली उत्पादक |
🍎 बागवानी (Horticulture) | 362.08 मिलियन टन उत्पादन (2024-25) — कृषि जीवीए का लगभग 33%; खाद्यान्न उत्पादन से भी अधिक |
🥚 कुक्कुट पालन (Poultry) | अंडा उत्पादन में भारत विश्व में दूसरे स्थान पर (149.11 अरब अंडे, 2024-25) |
📊 पशुपालन एवं डेयरी (2024-25) — नवीनतम आँकड़े 1. दूध: 247.87 मिलियन टन — विश्व में प्रथम; प्रति व्यक्ति उपलब्धता लगभग 485 ग्राम/दिन; शीर्ष राज्य — उत्तर प्रदेश (15.66%) > राजस्थान (14.82%)। 2. अंडा: 149.11 अरब — विश्व में दूसरा; शीर्ष राज्य — आंध्र प्रदेश > तमिलनाडु। 3. मांस: 10.50 मिलियन टन — विश्व में चौथा; शीर्ष राज्य — उत्तर प्रदेश > पश्चिम बंगाल। 4. ऊन: 34.57 मिलियन किग्रा — राजस्थान (47.85%) प्रथम, दूसरे स्थान पर पश्चिम बंगाल। 5. आजीविका सुरक्षा: छोटे, सीमांत व भूमिहीन किसानों के लिए नकदी का निरंतर स्रोत; सूखे व फसल-खराबे में जोखिम-न्यूनीकरण; पशु अपशिष्ट से जैविक खाद व बायोगैस — रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता घटती है। 6. रोज़गार: डेयरी क्षेत्र 8 करोड़ से अधिक किसानों को प्रत्यक्ष आजीविका देता है — भारत का सबसे बड़ा एकल कृषि उत्पाद (मूल्य की दृष्टि से) दूध ही है। |
पशुधन गणना (Livestock Census) | विवरण |
आयोजन | पशुपालन एवं डेयरी विभाग द्वारा 1919-20 से प्रत्येक 5 वर्ष में |
20वीं गणना (2019) | कुल पशुधन 536.76 मिलियन; क्रम — मवेशी (गोवंश) > बकरी > भैंस > भेड़ |
21वीं गणना | 25 अक्टूबर 2024 से शुरू — पहली बार पूर्णतः डिजिटल (मोबाइल ऐप), 16 प्रजातियों व 219 देशी नस्लों की गणना; पशुपालकों का भी पहली बार आँकड़ा संग्रह |
🏛️ पशुपालन एवं डेयरी — प्रमुख योजनाएँ ◆ ◆ राष्ट्रीय पशु रोग नियंत्रण कार्यक्रम (NADCP, 2019): खुरपका-मुँहपका रोग (FMD) व ब्रुसेलोसिस के विरुद्ध गोवंश, भैंस, भेड़, बकरी व सूअर का 100% टीकाकरण — 2030 तक इन रोगों का उन्मूलन लक्ष्य। ◆ ◆ राष्ट्रीय गोकुल मिशन (Rashtriya Gokul Mission, 2014): देशी नस्लों का संरक्षण व आनुवंशिक सुधार; लिंग-वर्गीकृत वीर्य (Sex-sorted Semen), गोकुल ग्राम, कृत्रिम गर्भाधान का विस्तार। ◆ ◆ राष्ट्रीय पशुधन मिशन (National Livestock Mission, 2014-15): छोटे पशु (भेड़, बकरी, सूअर, कुक्कुट) में उद्यमिता, चारा व आहार विकास, नस्ल सुधार। ◆ ◆ पशुपालन अवसंरचना विकास निधि (AHIDF, 2020): डेयरी व मांस प्रसंस्करण, पशु आहार संयंत्र व नस्ल सुधार फार्म हेतु निजी निवेश पर 3% ब्याज अनुदान। ◆ ◆ डेयरी प्रसंस्करण एवं अवसंरचना विकास निधि (DIDF, 2017-18): नाबार्ड के माध्यम से दुग्ध सहकारी संघों की प्रसंस्करण क्षमता व शीतलन (Chilling) अवसंरचना का आधुनिकीकरण। ◆ ◆ केसीसी का विस्तार (बजट 2018-19): पशुपालन व मत्स्य पालन करने वाले किसानों को भी किसान क्रेडिट कार्ड की सुविधा। |
📘 आसान परिभाषा: लिंग-वर्गीकृत वीर्य (Sex-sorted Semen) |
📚 परिभाषा: प्रयोगशाला में ऐसी तकनीक से तैयार किया गया वीर्य जिससे कृत्रिम गर्भाधान करने पर लगभग 90% संभावना मादा बछड़ी (बछिया) के जन्म की होती है। |
✅ आसान भाषा में: ऐसा उपाय जिससे गाय-भैंस से ज़्यादातर बछिया ही पैदा हो। 🏠 उदाहरण: पशुपालक को बछड़ा होने पर बोझ लगता है, जबकि बछिया आगे चलकर दूध देती है — इस तकनीक से डेयरी की आय बढ़ती है और आवारा नर पशुओं की समस्या घटती है। |
📘 आसान परिभाषा: जलीय कृषि (Aquaculture) |
📚 परिभाषा: समुद्र, झील, नदी, तालाब व जलधाराओं जैसे नियंत्रित जलीय वातावरण में जलीय प्रजातियों — जीव व वनस्पति दोनों — का पालन-पोषण, प्रजनन तथा कटाई/एकत्रीकरण (Harvesting) की प्रक्रिया। |
✅ आसान भाषा में: जैसे खेत में फसल उगाई जाती है, वैसे ही तालाब या टैंक में मछली, झींगा या समुद्री शैवाल "उगाए" जाते हैं। 🏠 उदाहरण: आंध्र प्रदेश के तटीय जिलों में खारे पानी के तालाबों में झींगा (Shrimp) पालन — इसी से भारत झींगा निर्यात में अग्रणी बना है। |
📊 मत्स्य क्षेत्र — नवीनतम आँकड़े 1. कुल उत्पादन (2024-25): लगभग 197.75 लाख टन — 2013-14 (95.79 लाख टन) की तुलना में लगभग 106% अधिक; भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा मछली उत्पादक व चौथा सबसे बड़ा मछली निर्यातक। 2. योगदान: अंतर्देशीय (Inland) मत्स्य पालन लगभग 68%, समुद्री (Marine) लगभग 32%। 3. प्रमुख राज्य: आंध्र प्रदेश (अंतर्देशीय में प्रथम), गुजरात (समुद्री में अग्रणी); कुल उत्पादन में आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक व गुजरात आगे। 4. आजीविका: 2.8 करोड़ से अधिक लोग प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से निर्भर। 5. एफडीआई: मत्स्य पालन व जलीय कृषि में स्वचालित मार्ग से 100% प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति। |
✅ लाभ | ⚠️ चुनौतियाँ |
◆ खाद्य व पोषण सुरक्षा — प्रोटीन व ओमेगा-3 फैटी एसिड का सस्ता स्रोत ◆ रोज़गार व ग्रामीण आय में वृद्धि ◆ निर्यात से विदेशी मुद्रा आय (समुद्री उत्पाद) ◆ प्राकृतिक जल निकायों (Wild Stocks) पर मछली पकड़ने का दबाव घटता है | ◆ गुणवत्तापूर्ण इनपुट (मछली बीज, चारा, दवाएँ) की कमी ◆ कुछ ही प्रजातियों पर निर्भरता; रोगों का जोखिम ◆ तालाबों में रसायनों के उपयोग से जलीय प्रदूषण ◆ कोल्ड चेन व प्रशीतित परिवहन का अभाव |
🏛️ मत्स्य क्षेत्र — संस्थागत प्रयास एवं योजनाएँ ◆ ◆ स्वतंत्र मंत्रालय: 2019 में मत्स्य पालन, पशुपालन एवं डेयरी मंत्रालय का गठन (मत्स्य पालन विभाग अलग)। ◆ ◆ मत्स्य पालन एवं जलीय कृषि अवसंरचना विकास कोष (FIDF, 2018-19): बंदरगाह, लैंडिंग केंद्र, हैचरी आदि के लिए रियायती वित्त। ◆ ◆ प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY, 2020): 2020-21 से 2024-25 (बाद में 2025-26 तक विस्तारित) — उत्पादन, उत्पादकता, कटाई-पश्चात अवसंरचना, मछुआरा कल्याण व निर्यात; अब तक का सबसे बड़ा मत्स्य निवेश। ◆ ◆ प्रधानमंत्री मत्स्य किसान समृद्धि सह-योजना (PM-MKSSY): फरवरी 2024 में स्वीकृत, पीएमएमएसवाई के अंतर्गत केंद्रीय क्षेत्र की उप-योजना; असंगठित मत्स्य क्षेत्र को औपचारिक बनाना; परिव्यय ₹6,000 करोड़ (विश्व बैंक व फ्रांसीसी विकास एजेंसी AFD की सहायता सहित); अवधि 2023-24 से 2026-27 (चार वर्ष); लाभार्थी — मछली पालक, मछली विक्रेता, सूक्ष्म-लघु उद्यम, मत्स्य कृषक उत्पादक संगठन (FFPO), ग्राम स्तरीय संगठन। ◆ ◆ समुद्री उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (MPEDA): वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के अधीन वैधानिक निकाय (1972) — समुद्री निर्यात संवर्धन; झींगा हैचरी के लिए "शफरी" (Shaphari) प्रमाणन। ◆ ◆ बजट 2026-27: नाबार्ड वित्त-पोषण से झींगा ब्रूडस्टॉक कार्यक्रम — न्यूक्लियस ब्रीडिंग केंद्रों की स्थापना। |
बागवानी में फल, सब्ज़ियाँ, कंद व जड़ वाली फसलें, मसाले, फूल, सुगंधित व औषधीय पौधे, मशरूम, नारियल, काजू, कोको व बाँस आदि आते हैं। कम भूमि पर प्रति हेक्टेयर अधिक आय, फसल विविधीकरण और प्रसंस्करण-आधारित ग्रामीण रोज़गार — ये इसकी तीन बड़ी ताकतें हैं। बागवानी उत्पादन 362.08 मिलियन टन (2024-25) है, जो खाद्यान्न उत्पादन से अधिक है; भारत फल व सब्ज़ी उत्पादन में विश्व में दूसरे स्थान पर है।
कृषोन्नति योजना — घटक | मुख्य बिंदु |
एकीकृत बागवानी विकास मिशन (MIDH) | केंद्र प्रायोजित योजना, 2014-15 से; बागवानी का समग्र विकास — पौध सामग्री, क्षेत्र विस्तार, संरक्षित खेती, कोल्ड चेन; राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड (गुरुग्राम, 1984) इसका अंग |
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा एवं पोषण मिशन (NFSNM) | चावल, गेहूँ, दलहन, मोटे अनाज व पोषक-अनाज का उत्पादन बढ़ाना (पूर्व का NFSM) |
कृषि विस्तार पर उप-मिशन (SMAE) | आत्मा आधारित विस्तार तंत्र, किसान कॉल सेंटर, कृषि-क्लिनिक |
कृषि विपणन पर एकीकृत योजना (ISAM) | भंडारण, ग्रेडिंग, बाज़ार सूचना व ई-नाम सहायता |
डिजिटल कृषि मिशन (DAM) — 2 सितंबर 2024 | तीन स्तंभ — एग्रीस्टैक (AgriStack) (किसान रजिस्ट्री, गाँव भू-नक्शे, बोई गई फसल रजिस्ट्री) + कृषि निर्णय समर्थन प्रणाली + मृदा प्रोफ़ाइल मैपिंग; डिजिटल फसल सर्वेक्षण |
राष्ट्रीय खाद्य तेल मिशन — तिलहन (NMEO-OS) व ऑयल पाम (NMEO-OP) | भारत वनस्पति तेल का विश्व में दूसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता व सबसे बड़ा आयातक; लक्ष्य — 2030-31 तक लगभग 70 मिलियन टन तिलहन उत्पादन |
पूर्वोत्तर क्षेत्र हेतु जैविक मूल्य श्रृंखला विकास मिशन (MOVCD-NER) | पूर्वोत्तर राज्यों में प्रमाणित जैविक उत्पादन से बाज़ार तक पूरी श्रृंखला |
📌 ध्यान दें कृषोन्नति योजना कृषि मंत्रालय की 8 योजनाओं की एक छत्र (Umbrella) योजना है; बजट 2026-27 में इसका आवंटन ₹11,200 करोड़ (लगभग 64.7% वृद्धि) रखा गया। |
कृषि-वानिकी में एक ही भूमि पर कृषि और वानिकी गतिविधियाँ साथ-साथ की जाती हैं। इससे लाभप्रदता, सततता, जैव विविधता, खाद्य सुरक्षा व जलवायु अनुकूलता — पाँचों बढ़ते हैं।
प्रकार | संयोजन | उदाहरण |
कृषि-सिल्वीकल्चर (Agri-silviculture) | फसलें + पेड़ | खेजड़ी के साथ बाजरा-मूँग (पश्चिमी राजस्थान) |
सिल्वोपास्टोरल (Silvopastoral) | चारागाह/पशुधन + पेड़ | चरागाह में बबूल-अंजन घास |
एग्रोसिल्वोपास्टोरल (Agrosilvopastoral) | फसलें + चारागाह + पेड़ | घर-बाड़ी (Homestead) प्रणाली — केरल |
🔎 तालिका से क्या समझें: पश्चिमी राजस्थान की खेजड़ी-बाजरा प्रणाली कृषि-वानिकी का सबसे सुंदर देसी उदाहरण है — खेजड़ी की जड़ें गहरी होती हैं, इसलिए वह फसल से पानी नहीं छीनती; उसकी पत्तियाँ (लूँग) पशुओं का चारा, फलियाँ (साँगरी) सब्ज़ी, और उसकी जड़ें हवा की नाइट्रोजन को मिट्टी में स्थिर करती हैं।
📖 पीछे की कहानी — खेजड़ली — पेड़ के लिए 363 प्राण 1730 में जोधपुर के राजा ने महल बनाने के लिए चूना पकाने हेतु लकड़ी मँगवाई। सैनिक खेजड़ली गाँव पहुँचे, जहाँ बिश्नोई समाज खेजड़ी के पेड़ों को पवित्र मानता था। अमृता देवी बिश्नोई पेड़ से लिपट गईं और कहा — "सिर साटे रूख रहे तो भी सस्तो जाण" (सिर कटकर भी पेड़ बचे तो सौदा सस्ता है)। उनके साथ उनकी बेटियाँ और फिर गाँव-गाँव से आए 363 बिश्नोई पेड़ों से लिपटकर बलिदान हो गए। अंत में राजा ने क्षमा माँगी और बिश्नोई गाँवों में पेड़ काटने पर रोक का आदेश दिया। आज भी खेजड़ी राजस्थान का राज्य वृक्ष है और यह घटना पर्यावरण-संरक्षण की विश्व-प्रसिद्ध मिसाल है। |
◆ प्रयास: राष्ट्रीय कृषि-वानिकी नीति, 2014 (ऐसी नीति बनाने वाला भारत विश्व का पहला देश); कृषि-वानिकी पर उप-मिशन — "हर मेढ़ पर पेड़"; एमआईडीएच के अंतर्गत बागवानी-वृक्षारोपण।
📘 आसान परिभाषा: एकीकृत कृषि प्रणाली (Integrated Farming System — IFS) |
📚 परिभाषा: एक सतत, परस्पर जुड़ी कृषि पद्धति जिसमें एक ही खेत पर फसल उत्पादन, पशुपालन, जलीय कृषि और कृषि-वानिकी को इस प्रकार जोड़ा जाता है कि एक घटक का अपशिष्ट दूसरे का संसाधन बने। |
✅ आसान भाषा में: "कुछ भी बेकार नहीं" — गाय का गोबर खाद बनता है, खेत का भूसा गाय का चारा, और तालाब की गाद खेत की उर्वरता। 🏠 उदाहरण: एक किसान के 2 एकड़ खेत में धान-सब्ज़ी, 2 गायें, एक छोटा मछली तालाब व मेड़ पर सागवान — वर्ष भर आय और फसल खराब होने पर भी आमदनी बनी रहती है। |
◆ आईएफएस के लाभ: संसाधनों का पुनर्चक्रण, वर्ष भर आय, जोखिम का शमन, पारिस्थितिक संतुलन, बाहरी इनपुट (रासायनिक उर्वरक) पर निर्भरता में कमी।
🎯 याद रखें — इस खंड के मुख्य बिंदु 1. दूध — 247.87 मिलियन टन, विश्व में पहला; उत्तर प्रदेश > राजस्थान (दूसरा)। 2. ऊन में राजस्थान पहला (लगभग 48%)। 3. भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा मछली उत्पादक; उत्पादन का लगभग दो-तिहाई अंतर्देशीय। 4. राष्ट्रीय कृषि-वानिकी नीति, 2014 — ऐसी नीति वाला विश्व का पहला देश। |
🐪 राजस्थान की भाषा में — धोरों का सोना कम पानी, तेज़ धूप और रेतीली मिट्टी में भी जो फसल लहलहा जाए, वही बाजरा है — इसलिए इसे "जलवायु-सहिष्णु" (Climate Resilient) अनाज कहते हैं। पानी की कमी वाले भारत के लिए श्री अन्न भविष्य की खाद्य व पोषण सुरक्षा की कुंजी है। |
📘 आसान परिभाषा: श्री अन्न (Shree Anna / Millets) |
📚 परिभाषा: ज्वार, बाजरा, रागी (मंडुआ), कुटकी, काकुन/कंगनी, चेना/चीना (Proso Millet), साँवा/झंगोरा व कोदो जैसे मोटे अनाजों को दिया गया नाम — ये मुख्यतः खरीफ की वर्षा-आधारित (Rainfed) फसलें हैं, जिन्हें अन्य प्रमुख फसलों की तुलना में बहुत कम पानी व इनपुट चाहिए। |
✅ आसान भाषा में: गेहूँ-चावल की तुलना में मोटे अनाज बहुत कम पानी में उग जाते हैं और सूखा भी झेल लेते हैं — साथ ही इनमें आयरन, कैल्शियम व फाइबर अधिक होता है। इसलिए इन्हें "सुपरफूड" और जलवायु-अनुकूल फसल दोनों माना जाता है। 🏠 उदाहरण: राजस्थान जैसे कम वर्षा वाले राज्य में गेहूँ उगाने में बहुत पानी लगता है, लेकिन उसी ज़मीन पर बाजरा आसानी से उग जाता है — इसीलिए राजस्थान बाजरा उत्पादन में देश में सबसे आगे है। |
पहलू | विवरण |
उत्पादन में भारत | विश्व का सबसे बड़ा उत्पादक — लगभग 170 लाख टन, जो एशिया के उत्पादन का लगभग 80% व वैश्विक उत्पादन का लगभग 20% है |
उपज | भारत की औसत उपज लगभग 1,239 किग्रा/हेक्टेयर, वैश्विक औसत (1,229 किग्रा/हे.) से थोड़ी अधिक |
वैश्विक व्यापार | वैश्विक अनाज व्यापार में मोटे अनाजों की हिस्सेदारी 3% से भी कम — निर्यात की बड़ी संभावना |
पोषक-अनाज (Nutri-cereals) | भारत सरकार ने अप्रैल 2018 में मोटे अनाजों को "पोषक-अनाज" के रूप में अधिसूचित किया; 2018 को "राष्ट्रीय मोटा अनाज वर्ष" मनाया |
अंतर्राष्ट्रीय मोटा अनाज वर्ष (IYM) | भारत के प्रस्ताव पर संयुक्त राष्ट्र महासभा ने मार्च 2021 में अपने 75वें सत्र में 2023 को अंतर्राष्ट्रीय मोटा अनाज वर्ष घोषित किया (70+ देशों का समर्थन) |
शोध केंद्र | भारतीय कदन्न (मिलेट्स) अनुसंधान संस्थान (IIMR), हैदराबाद — वैश्विक उत्कृष्टता केंद्र (Global Centre of Excellence) |
महर्षि | मिलेट व अन्य प्राचीन अनाज अंतर्राष्ट्रीय अनुसंधान पहल — आईआईएमआर द्वारा संचालित (G20 कृषि कार्य समूह, 2023) |
प्रमुख उत्पादक राज्य | राजस्थान (बाजरा में प्रथम), कर्नाटक (रागी व ज्वार), महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात |
लाभ का आयाम | विवरण |
🥗 पोषण से भरपूर | प्रोटीन, फाइबर, कैल्शियम, पोटेशियम, मैग्नीशियम, आयरन, मैंगनीज़, ज़िंक व बी-कॉम्प्लेक्स विटामिन; सूजन-रोधी व एंटी-ऑक्सीडेंट फाइटोकेमिकल्स; बच्चों-महिलाओं में एनीमिया व कुपोषण निवारण |
🩺 स्वास्थ्य लाभ | ग्लूटेन-मुक्त व कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स — मधुमेह, मोटापा व हृदय रोग जैसी जीवनशैली-जनित समस्याओं में उपयोगी |
🌦️ जलवायु अनुकूल | शुष्क भूमि कृषि की रीढ़; धान-गन्ने की तुलना में लगभग 70% तक कम पानी; उच्च तापमान सहन, कम कार्बन व जल पदचिह्न — इसलिए "चमत्कारी अनाज" या "भविष्य की फसलें" |
🌱 पारिस्थितिक संधारणीयता | रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता नहीं; स्वाभाविक रूप से कीट कम आकर्षित — कीटनाशकों का बहुत सीमित उपयोग; खराब मिट्टी में भी उपज |
👨🌾 छोटे किसान का सशक्तिकरण | लगभग 85% छोटे-सीमांत किसान, अधिकांश वर्षा-आधारित क्षेत्रों में — कम लागत से शुद्ध आय में वृद्धि; एमएसपी व पीडीएस/मध्याह्न भोजन में समावेश से निश्चित बाज़ार |
🌍 निर्यात व ब्रांडिंग | मिलेट स्टार्टअप, मूल्य संवर्धित उत्पाद (बिस्कुट, नूडल्स, रेडी-टू-ईट) — वैश्विक ब्रांड "श्री अन्न" |
📘 आसान परिभाषा: ग्लाइसेमिक इंडेक्स (Glycemic Index) |
📚 परिभाषा: किसी भोजन के खाने के बाद रक्त में शर्करा (ग्लूकोज़) कितनी तेज़ी से बढ़ती है, इसका 0 से 100 का पैमाना; 55 से कम को "निम्न" माना जाता है। |
✅ आसान भाषा में: खाना कितनी जल्दी ख़ून में "मीठा" बनकर पहुँचता है। 🏠 उदाहरण: मैदे की सफ़ेद ब्रेड तुरंत शुगर बढ़ाती है (उच्च सूचकांक), जबकि बाजरे की रोटी धीरे-धीरे पचकर देर तक ऊर्जा देती है (निम्न सूचकांक) — इसीलिए मधुमेह रोगियों को मोटा अनाज सुझाया जाता है। |
◆ नीतिगत पहलें: राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा एवं पोषण मिशन में पोषक-अनाज घटक; एमएसपी पर खरीद व पीडीएस/आईसीडीएस/पीएम-पोषण में समावेश; मिलेट आधारित उत्पादों हेतु पीएलआई (PLISMBP); बजट 2023-24 में "श्री अन्न" नामकरण।
🎯 याद रखें — इस खंड के मुख्य बिंदु 1. भारत मोटे अनाज का विश्व में सबसे बड़ा उत्पादक; राजस्थान बाजरे में पहला। 2. अप्रैल 2018 — मोटे अनाज "पोषक-अनाज" घोषित; बजट 2023-24 में नाम "श्री अन्न"। 3. 2023 — अंतर्राष्ट्रीय मोटा अनाज वर्ष (भारत के प्रस्ताव पर)। 4. अनुसंधान केंद्र — भारतीय कदन्न अनुसंधान संस्थान, हैदराबाद। |
पहल | मुख्य बिंदु |
इनपुट डीलरों के लिए कृषि विस्तार सेवा डिप्लोमा (DAESI) | खाद-बीज-कीटनाशक विक्रेताओं को 48 सप्ताह के पाठ्यक्रम से प्रशिक्षण, ताकि उनका व्यवसाय कृषि विस्तार सेवा से जुड़ सके |
कृषि प्रौद्योगिकी प्रबंधन एजेंसी (ATMA) | ज़िला स्तर पर विकेंद्रीकृत, माँग-आधारित कृषि विस्तार तंत्र (SMAE के अंतर्गत) |
किसान कॉल सेंटर | टोल-फ्री 1800-180-1551 — किसानों की समस्याओं का 22 भारतीय भाषाओं में त्वरित समाधान (2004 से) |
राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन (NMSA) | वर्षा-आधारित क्षेत्र विकास, मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन, कृषि-वानिकी, जलवायु-अनुकूल सतत कृषि (NAPCC के 8 मिशनों में से एक) |
कृषि यंत्रीकरण पर उप-मिशन (SMAM) | छोटे-सीमांत किसानों तक यंत्रीकरण — कस्टम हायरिंग केंद्र, फार्म मशीनरी बैंक, यंत्रों पर अनुदान |
कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) | आईसीएआर के अधीन ज़िला-स्तरीय "ज्ञान केंद्र" — प्रदर्शन, प्रशिक्षण, तकनीक हस्तांतरण (पहला KVK — पुडुचेरी, 1974) |
भारत-विस्तार (Bharat-VISTAAR) — बजट 2026-27 | एग्रीस्टैक, आईसीएआर ज्ञान-भंडार व एआई प्रणालियों को जोड़ने वाला बहुभाषी एआई कृषि सलाहकार मंच — फसल योजना, मौसम व बाज़ार भाव क्षेत्रीय भाषाओं में |
नमो ड्रोन दीदी | 30 नवंबर 2023 को शुरू; 2024-25 से 2025-26 में 15,000 महिला स्वयं सहायता समूहों को ड्रोन; ड्रोन व सहायक उपकरणों की लागत का 80% (अधिकतम ₹8 लाख) केंद्रीय सहायता; 15 दिन का प्रशिक्षण (5 दिन ड्रोन पायलट + 10 दिन कृषि उपयोग) — बजट 2026-27 में ₹677 करोड़ |
शब्द/तथ्य | अर्थ |
कॉबवेब चक्र (Cobweb Cycle) | कृषि अर्थशास्त्र का सिद्धांत — फसल की कीमत बढ़ी → किसानों ने अगले वर्ष अधिक बोया → आपूर्ति में भारी वृद्धि → कीमत अचानक गिरी → अगले वर्ष कम बुवाई → फिर कीमत बढ़ी। प्याज-टमाटर की कीमतों का उतार-चढ़ाव इसका उदाहरण |
हैप्पी सीडर (Happy Seeder) | ट्रैक्टर-चालित शून्य-जुताई बुवाई मशीन — धान के अवशेष वाले खेत में अवशेष काटकर सीधे गेहूँ बोती है और अवशेषों को मल्च के रूप में बिछा देती है; पराली जलाने का विकल्प |
ट्रक फार्मिंग / मार्केट गार्डनिंग | स्थानीय व क्षेत्रीय बाज़ारों की दैनिक माँग पूरी करने हेतु सब्ज़ी, फल व फूल जैसी उच्च मूल्य फसलों की सघन, छोटे पैमाने की खेती (प्रायः शहरों के निकट) |
भागीदारी गारंटी प्रणाली (PGS-India) | जैविक खेती का सहभागी, कम लागत वाला प्रमाणन तंत्र — किसानों के समूह एक-दूसरे का सत्यापन करते हैं |
कृषि अवसंरचना एवं विकास उपकर (AIDC) | बजट 2021-22 से — पेट्रोल पर ₹2.5/लीटर व डीज़ल पर ₹4/लीटर (उत्पाद शुल्क के साथ); सोना, चाँदी, शराब, कुछ फलों आदि पर सीमा शुल्क के रूप में |
एथेनॉल का प्रशासित मूल्य | मक्का-आधारित एथेनॉल > शीरा (Molasses)-आधारित > चावल-आधारित एथेनॉल |
100% एफडीआई | कृषि (कुछ शर्तों सहित), पशुपालन, बागान क्षेत्र (Plantation) व खाद्य प्रसंस्करण में स्वचालित मार्ग से |
🔎 तालिका से क्या समझें: इन अवधारणाओं में "कॉबवेब चक्र" सबसे ज़्यादा रोज़मर्रा का है — इस साल प्याज़ महँगा बिका तो अगले साल सबने प्याज़ बोया, बाज़ार भर गया और दाम ज़मीन पर आ गए; फिर अगले साल कम बोया तो दाम फिर आसमान पर। इस चक्र को तोड़ने के लिए भंडारण, बाज़ार-सूचना और प्रसंस्करण चाहिए, ताकि किसान केवल पिछले साल के भाव देखकर बुवाई न करे।
🎯 याद रखें — इस खंड के मुख्य बिंदु 1. पहला कृषि विज्ञान केंद्र — पुडुचेरी, 1974। 2. किसान कॉल सेंटर — 1800-180-1551 (2004 से)। 3. नमो ड्रोन दीदी — ड्रोन लागत का 80% (अधिकतम ₹8 लाख)। 4. कॉबवेब चक्र — पिछले साल के भाव देखकर बुवाई से दामों का उतार-चढ़ाव। |
💡 क्या आप जानते हैं? 23 दिसंबर को किसान दिवस मनाया जाता है — पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह की जयंती। |
📘 आसान परिभाषा: प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (PM-KISAN) |
📚 परिभाषा: 24 फरवरी 2019 (गोरखपुर, उत्तर प्रदेश) को शुरू की गई — 1 दिसंबर 2018 से प्रभावी — यह 100% केंद्रीय क्षेत्र योजना पात्र भूमि-धारक किसान परिवारों को ₹6,000 प्रति वर्ष की आय सहायता तीन बराबर किस्तों (₹2,000 प्रत्येक, हर 4 माह में) में सीधे आधार-संबद्ध बैंक खाते में (DBT) देती है। |
✅ आसान भाषा में: सरकार साल में तीन बार किसान के खाते में सीधे ₹2,000 भेजती है, ताकि बुवाई के समय बीज-खाद खरीदने के लिए उसे साहूकार के पास न जाना पड़े। 🏠 उदाहरण: रबी बुवाई से पहले आई ₹2,000 की किस्त से एक सीमांत किसान सरसों के प्रमाणित बीज और डीएपी की एक बोरी खरीद लेता है। |
पहलू | विवरण |
परिवार की परिभाषा | पति, पत्नी व नाबालिग बच्चे |
पात्रता | प्रारंभ में केवल 2 हेक्टेयर तक के लघु-सीमांत किसान; जून 2019 से भूमि-सीमा हटाकर सभी भूमि-धारक किसान परिवार |
अपात्र | संस्थागत भूमि-धारक; संवैधानिक पदधारक (पूर्व/वर्तमान); मंत्री, सांसद, विधायक, महापौर, ज़िला पंचायत अध्यक्ष; सरकारी/पीएसयू कर्मचारी (MTS/समूह-D को छोड़कर); ₹10,000+ मासिक पेंशन वाले; आयकरदाता; पंजीकृत डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, सीए, आर्किटेक्ट |
सत्यापन | भू-अभिलेख सीडिंग, ई-केवाईसी अनिवार्य (2022 से), आधार-सीडेड बैंक खाता; पीएम-किसान पोर्टल व ऐप (फेस-ऑथेंटिकेशन से e-KYC) |
नोडल मंत्रालय | कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय |
📊 पीएम-किसान — नवीनतम आँकड़े 1. 22वीं किस्त (मार्च 2026): ₹18,640 करोड़, 9.32 करोड़ से अधिक किसान। 2. 23वीं किस्त (20 जून 2026, हुगली — पश्चिम बंगाल): लगभग ₹18,880 करोड़, लगभग 9.44 करोड़ किसान। 3. कुल वितरण: योजना शुरू होने से 22वीं किस्त तक ₹4.09 लाख करोड़ से अधिक, लगभग 11-12 करोड़ किसान परिवार कभी न कभी लाभान्वित। 4. बजट 2026-27: ₹63,500 करोड़ — कृषि मंत्रालय के कुल बजट का लगभग 45% (पिछले वर्षों के समान स्तर)। |
🔎 सूची से क्या समझें: पीएम-किसान अकेली योजना कृषि मंत्रालय के बजट का लगभग 45% ले लेती है। इसकी ताकत है सीधा, बिना बिचौलिये का भुगतान; इसकी सीमा है कि ₹6,000 सालाना यानी ₹500 महीना छोटी राशि है और भूमिहीन बटाईदार — जो असली खेती करता है — इसमें शामिल नहीं, क्योंकि ज़मीन उसके नाम नहीं।
पहलू | प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना | दलहन में आत्मनिर्भरता मिशन |
स्वीकृति / शुभारंभ | मंत्रिमंडल स्वीकृति 16 जुलाई 2025; शुभारंभ 11 अक्टूबर 2025 | बजट 2025-26 में घोषणा; शुभारंभ 11 अक्टूबर 2025 |
प्रेरणा | आकांक्षी ज़िला कार्यक्रम — कृषि के लिए | दलहन आयात-निर्भरता घटाना |
कवरेज | कम उत्पादकता, कम फसल-सघनता व कम ऋण उपलब्धता वाले 100 ज़िले | लगभग 35 लाख हेक्टेयर अतिरिक्त क्षेत्र; लगभग 2 करोड़ किसान |
वित्त | ₹24,000 करोड़ प्रति वर्ष; 11 मंत्रालयों की 36 योजनाओं का अभिसरण (Convergence) | ₹11,440 करोड़ (2025-26 से 2030-31) |
अवधि | 6 वर्ष (2025-26 से 2030-31) | 6 वर्ष |
फोकस | उत्पादकता, फसल विविधीकरण, पंचायत-ब्लॉक स्तर पर भंडारण, सिंचाई, दीर्घ व अल्पकालिक ऋण | अरहर (तुअर), उड़द, मसूर पर विशेष बल; नेफेड-एनसीसीएफ द्वारा 4 वर्ष तक सुनिश्चित खरीद |
मद | आवंटन (₹ करोड़) | टिप्पणी |
कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय (कुल) | 1,40,529 (≈ ₹1.40 लाख करोड़) | 2025-26 के बजट अनुमान (≈ ₹1.37 लाख करोड़) से लगभग 2.2% अधिक; संशोधित अनुमान (₹1,33,370 करोड़) से लगभग 5.4% अधिक |
कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग (DARE) | 9,967 | लगभग 3% कमी |
पीएम-किसान | 63,500 | मंत्रालय बजट का लगभग 45% |
संशोधित ब्याज अनुदान योजना (MISS) | 22,600 | केसीसी पर ब्याज सहायता |
पीएमएफबीवाई | 12,200 | 2024-25 के ₹15,864 करोड़ से घटकर — 8 वर्षों में सबसे कम |
कृषोन्नति योजना | 11,200 | लगभग 64.7% वृद्धि |
राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (RKVY) | 8,550 | राज्यों को लचीली सहायता |
पीएम-आशा | 7,200 | मूल्य समर्थन व खरीद |
नमो ड्रोन दीदी | 677 | महिला एसएचजी को ड्रोन |
बजट 2026-27 की अन्य घोषणा | विवरण |
नारियल संवर्धन योजना | अनुत्पादक नारियल पेड़ों को बदलकर उत्पादकता वृद्धि |
चंदन संरक्षण कार्यक्रम | भारतीय चंदन पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली |
शी-मार्ट्स | स्वयं सहायता समूह आधारित महिला उद्यमिता केंद्र — "लखपति दीदी" का विस्तार |
📉 बजट का विरोधाभास कृषि मंत्रालय का आवंटन 2013-14 के मात्र ₹21,933 करोड़ से बढ़कर 2026-27 में लगभग ₹1.40 लाख करोड़ — एक दशक से अधिक में लगभग 6 गुना निरपेक्ष वृद्धि। परंतु कुल केंद्रीय बजट में कृषि मंत्रालय की हिस्सेदारी 2022-23 के 3.3% से घटकर 2026-27 में 2.6% रह गई है — यानी सापेक्ष प्राथमिकता घटी है। |
"वीबी-जी राम जी" (VB-G RAM G) अधिनियम को 21 दिसंबर 2025 को राष्ट्रपति की स्वीकृति मिली और इसने लगभग 20 वर्ष पुराने मनरेगा (MGNREGA, 2005) का स्थान लिया। बजट 2026-27 में इसे ₹95,692 करोड़ (ग्रामीण विकास मंत्रालय के बजट का लगभग 49%) मिले, जबकि चरणबद्ध परिवर्तन के कारण पुरानी मनरेगा का आवंटन 2025-26 के ₹86,000 करोड़ से घटकर ₹30,000 करोड़ रह गया।
तुलना का आधार | पीएम-किसान | ग्रामीण रोज़गार गारंटी (2025) |
सहायता की प्रकृति | बिना शर्त प्रत्यक्ष नकद आय सहायता — कोई श्रम अनिवार्य नहीं | कार्य के बदले मज़दूरी — रोज़गार आधारित |
लक्षित लाभार्थी | केवल भूमि-धारक किसान परिवार | मुख्यतः भूमिहीन मज़दूर, सीमांत श्रमिक, अकुशल/अर्धकुशल ग्रामीण कार्यबल |
परिसंपत्ति निर्माण | कोई सार्वजनिक परिसंपत्ति नहीं; व्यक्तिगत इनपुट खरीद व उपभोग | सामुदायिक व टिकाऊ परिसंपत्तियाँ — जल संचयन, ग्रामीण सड़क, भंडारण |
वित्त-पोषण | 100% केंद्र (केंद्रीय क्षेत्र योजना) | केंद्र-राज्य साझा (60:40 / 90:10) |
संकट निवारण में भूमिका | बुवाई के समय तरलता (Liquidity) की कमी दूर | गैर-कृषि मौसम में रोज़गार, संकटकालीन पलायन में कमी |
⚖️ निष्कर्ष दोनों योजनाएँ परस्पर पूरक (Complementary) हैं — पीएम-किसान भूमि-धारक किसान के उत्पादन चक्र को स्थिरता देती है, जबकि रोज़गार गारंटी भूमिहीन ग्रामीण श्रमिक को गरिमापूर्ण आजीविका व गाँव को टिकाऊ अवसंरचना देती है। |
पहल | राज्य | विवरण |
कालेश्वरम लिफ्ट सिंचाई परियोजना | तेलंगाना | गोदावरी नदी पर विश्व की सबसे बड़ी बहु-स्तरीय लिफ्ट सिंचाई परियोजना |
मिशन काकतीय | तेलंगाना | सभी लघु सिंचाई टैंकों व झीलों का जीर्णोद्धार |
मुख्यमंत्री समेकित चौर विकास योजना (2025) | बिहार | अनुपयोगी व जलमग्न (चौर) भूमि का विकास — मत्स्य, कृषि व बागवानी |
सौदा पत्रक पहल (2021) | मध्य प्रदेश | डिजिटल सुधार — लाइसेंसधारी व्यापारी किसान के घर/खेत से एमएसपी या उससे अधिक पर उपज कानूनी रूप से खरीद सकते हैं |
रायथू भरोसा केंद्र | आंध्र प्रदेश | किसानों के लिए एकल-खिड़की — "बीज से बिक्री तक" सेवाएँ |
ई-फार्मार्केट प्लेटफ़ॉर्म | आंध्र प्रदेश | रायथू भरोसा केंद्रों के माध्यम से किसान-व्यापारी को जोड़ना |
फ्रूट्स प्लेटफ़ॉर्म (2020) | कर्नाटक | किसानों की भूमि, उगाई गई फसलों व मौसम पूर्वानुमान के आँकड़ों का एकीकृत डेटाबेस |
मेरी फसल-मेरा ब्योरा पोर्टल | हरियाणा | बीमा, सब्सिडी, मुआवज़ा व फसल खरीद के लाभ सीधे किसान के नाम |
🎯 याद रखें — इस खंड के मुख्य बिंदु 1. पीएम-किसान — 24 फ़रवरी 2019 (1 दिसंबर 2018 से प्रभावी); ₹6,000 सालाना, तीन किस्तों में। 2. धन-धान्य कृषि योजना — कम उत्पादकता वाले 100 ज़िले; 11 मंत्रालयों की 36 योजनाएँ एक साथ। 3. कृषि मंत्रालय का बजट 2026-27 — लगभग ₹1.40 लाख करोड़; सबसे बड़ा हिस्सा पीएम-किसान। 4. नया ग्रामीण रोज़गार अधिनियम — 125 दिन, केंद्र-राज्य 60:40। |
भारतीय कृषि ने खाद्यान्न आत्मनिर्भरता हासिल कर ली है, फिर भी देश की लगभग आधी कार्यशील आबादी को रोज़गार देने वाला यह क्षेत्र कई गहरी संरचनात्मक समस्याओं से जूझ रहा है।
चुनौती | समस्या का स्वरूप |
🌦️ जलवायु परिवर्तन | अनियमित मानसून, बाढ़-सूखा, लू; आईपीसीसी अनुमान — 2100 तक फसल उपज में 10-25% तक गिरावट संभव |
🧩 भूमि विखंडन | 86.2% किसानों के पास 2 हेक्टेयर से कम भूमि; औसत जोत लगभग 1.08 हेक्टेयर — पैमाने की अर्थव्यवस्था संभव नहीं |
📉 कम उत्पादकता | भारत की चावल उपज लगभग 2.8 टन/हे. बनाम चीन लगभग 7 टन/हे. |
🏪 विपणन समस्याएँ | एपीएमसी एकाधिकार, बिचौलिए, मूल्य में उतार-चढ़ाव, संकटकालीन बिक्री |
💸 ऋणग्रस्तता | लगभग 52% कृषि परिवार ऋणग्रस्त; केवल 30-33% किसानों तक औपचारिक ऋण की प्रभावी पहुँच; साहूकारों का ऊँचा ब्याज |
🏚️ भंडारण की कमी | फसल-उपरांत हानि लगभग 25-30% (फल-सब्ज़ी में); वार्षिक नुकसान लगभग ₹90,000-92,500 करोड़; कोल्ड चेन का अभाव |
💧 जल संकट | भूजल का अति-दोहन — पंजाब में लगभग 80% भूजल इकाइयाँ अति-दोहित; जल-गहन धान-गन्ना |
👥 प्रच्छन्न बेरोज़गारी | कृषि में आवश्यकता से अधिक श्रम का जमाव — सीमांत उत्पादकता लगभग शून्य |
📈 बढ़ती इनपुट लागत | उर्वरक, कीटनाशक, बीज, डीज़ल व बिजली की कीमतें लगातार बढ़ना |
😔 किसान आत्महत्या | ऋण, फसल-विफलता व मूल्य-पतन से जुड़ा गंभीर सामाजिक संकट — वर्ष 2022 में 11,000 से अधिक (11,290) कृषक व खेतिहर मज़दूरों की आत्महत्या |
📘 आसान परिभाषा: प्रच्छन्न बेरोज़गारी (Disguised Unemployment) |
📚 परिभाषा: वह स्थिति जिसमें किसी काम में आवश्यकता से अधिक लोग लगे हों, जिससे अतिरिक्त श्रमिकों की सीमांत उत्पादकता शून्य या लगभग शून्य हो — यानी उन्हें हटाने पर भी कुल उत्पादन न घटे। |
✅ आसान भाषा में: देखने में सब काम पर हैं, पर असल में कुछ लोगों की वहाँ ज़रूरत ही नहीं। 🏠 उदाहरण: 3 बीघा खेत पर एक ही परिवार के 7 सदस्य काम करते हैं; अगर 3 लोग शहर में नौकरी करने लगें, तब भी खेत की उपज उतनी ही रहेगी — वे 3 लोग "प्रच्छन्न बेरोज़गार" थे। |
चरण | समस्या | समाधान/पहल |
भूमि | छोटी व बिखरी जोत, अस्पष्ट भू-अभिलेख, काश्तकार को अधिकार नहीं | चकबंदी, डीआईएलआरएमपी, यूएलपिन, मॉडल भूमि पट्टा अधिनियम 2016 |
ऋण | अनौपचारिक ऋण पर निर्भरता, काश्तकार-बटाईदार को केसीसी नहीं | केसीसी, एमआईएसएस, पैक्स कंप्यूटरीकरण, जेएलजी |
बीज | नकली/निम्न गुणवत्ता बीज, बीज प्रतिस्थापन दर कम | साथी पोर्टल, पीपीवी एंड एफआर अधिनियम 2001 |
सिंचाई | लगभग आधा क्षेत्र वर्षा-आधारित, कम जल उपयोग दक्षता | पीएमकेएसवाई, "प्रति बूँद अधिक फसल", अटल भूजल |
उर्वरक | एनपीके असंतुलन (यूरिया का अति-प्रयोग), मृदा स्वास्थ्य में गिरावट | मृदा स्वास्थ्य कार्ड, नैनो-उर्वरक, पीएम-प्रणाम |
तकनीक | मशीनीकरण केवल 40-45% (अमेरिका लगभग 95%); 1,000+ एग्रीटेक स्टार्टअप पर पहुँच सीमित | कस्टम हायरिंग केंद्र, नमो ड्रोन दीदी, डिजिटल कृषि मिशन |
फसल-उपरांत | भंडारण, प्रसंस्करण व कोल्ड चेन का अभाव | एआईएफ, पीएमकेएसवाई-संपदा, सहकारी भंडारण योजना |
विपणन | बिचौलिए, कम मूल्य-प्राप्ति | ई-नाम, एफपीओ, एमएसपी, पीएम-आशा |
🔗 विखंडन → निम्न उत्पादकता कैसे? | 🇨🇳 चीन की ऊँची चावल उपज के कारण |
◆ पैमाने की मितव्ययिता (Economies of Scale) का अभाव — प्रति इकाई लागत अधिक ◆ छोटे-संकीर्ण खेतों में ट्रैक्टर, कंबाइन, लेज़र लैंड लेवलर अव्यावहारिक ◆ मेड़ बनाने में भूमि का अपव्यय ◆ बिखरे खेतों में नलकूप/ड्रिप महँगा — बाढ़ सिंचाई से जल बर्बादी ◆ कम मात्रा में इनपुट खरीद — थोक छूट नहीं; छोटी जोत पर बैंक ऋण कठिन | ◆ भूमि समेकन व सघन कृषि प्रबंधन ◆ संकर (हाइब्रिड) चावल का कवरेज 50% से अधिक ◆ उन्नत मशीनीकरण, सटीक उर्वरक प्रयोग व कुशल सिंचाई ◆ भारत में — अत्यधिक विखंडन, मानसून निर्भरता, पारंपरिक तकनीक, अनुसंधान एवं विकास का सीमित ज़मीनी प्रसार |
◆ एफपीओ — "भूमि जोड़े बिना आर्थिक एकत्रीकरण": थोक दर पर इनपुट खरीद से उत्पादन लागत में 20-30% तक कमी; कस्टम हायरिंग केंद्रों से छोटे खेतों में भी यंत्रीकरण; संगठित निकाय होने से संस्थागत ऋण; ग्रेडिंग-पैकेजिंग-भंडारण से मूल्य संवर्धन; ई-नाम, ओएनडीसी, थोक खरीदारों व निर्यातकों से सीधा संपर्क।
◆ आगे की राह: 10,000 एफपीओ योजना में पेशेवर प्रबंधन सहायता; नाबार्ड के माध्यम से बिना संपार्श्विक ऋण का विस्तार; एफपीओ का ई-नाम व ओएनडीसी से एकीकरण; राज्यों द्वारा मॉडल भूमि पट्टा अधिनियम अपनाना, ताकि किसान स्वामित्व खोए बिना सामूहिक/अनुबंध खेती कर सकें।
🧮 कृषि की व्यापार की शर्तें व्यापार की शर्तें (ToT) = (किसान को प्राप्त कीमतों का सूचकांक ÷ किसान द्वारा चुकाई गई कीमतों का सूचकांक) × 100 टीओटी < 100 → व्यापार की शर्तें किसान के प्रतिकूल (विरुद्ध झुकी हुई) टीओटी > 100 → व्यापार की शर्तें किसान के अनुकूल |
🧮 हल किया हुआ उदाहरण — व्यापार की शर्तें किसान को मिली कीमतों का सूचकांक = 110; किसान द्वारा चुकाई कीमतों का सूचकांक = 125 व्यापार की शर्तें = (110 ÷ 125) × 100 = 88 88 < 100 : शर्तें किसान के विरुद्ध — उसकी फसल के दाम, उसके ख़र्चों से धीमे बढ़े |
◆ प्रतिकूल होने के कारण: इनपुट लागत (बीज, उर्वरक, डीज़ल, बिजली, यंत्र) में उपज-मूल्य से तेज़ वृद्धि; लंबी आपूर्ति श्रृंखला व बिचौलियों से उपभोक्ता मूल्य का छोटा हिस्सा ही किसान तक; एमएसपी की प्रभावी खरीद कुछ राज्यों व दो फसलों तक सीमित; मुद्रास्फीति नियंत्रण हेतु उपभोक्ता-समर्थक नीतियाँ — गेहूँ, गैर-बासमती चावल, प्याज पर निर्यात प्रतिबंध, शुल्क-मुक्त आयात; जलवायु-जनित फसल क्षति व बीमा दावों में देरी।
◆ बजट हिस्सेदारी घटने के निहितार्थ: बजट का बड़ा भाग आय सहायता व सब्सिडी जैसे राजस्व व्यय में — सिंचाई, कोल्ड स्टोरेज जैसे पूँजी निर्माण में कमी; कृषि अनुसंधान एवं विकास पर कृषि जीवीए का केवल लगभग 0.4% (ब्राज़ील व विकसित देश 1% से अधिक), जलवायु-सहिष्णु बीजों के विकास पर असर; निजी निवेश का "क्राउड-इन" नहीं; दीर्घकालीन खाद्य-पोषण सुरक्षा पर जोखिम।
◆ सुधार: राजस्व व्यय से पूँजीगत व्यय (AIF, PMKSY) की ओर झुकाव; ई-नाम व एफपीओ-भंडारण संपर्क; प्राकृतिक खेती, ड्रिप-स्प्रिंकलर व यंत्रीकरण से लागत में कमी; पूर्वानुमेय व स्थिर कृषि निर्यात नीति।
भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची (राज्य सूची, प्रविष्टि 46) के तहत कृषि आय पर कर लगाने का अधिकार केवल राज्यों को है; आयकर अधिनियम में कृषि आय केंद्रीय आयकर से मुक्त है।
✅ कर लगाने के पक्ष में तर्क | ❌ विरोध में तर्क |
◆ क्षैतिज समता — समान आय पर समान कर ◆ के.एन. राज समिति (1972) — केवल समृद्ध किसानों पर कृषि होल्डिंग कर (Agricultural Holding Tax) का सुझाव ◆ बड़े किसानों व कॉरपोरेट-फार्म हाउस द्वारा कर-चोरी हेतु "कृषि आय" का दुरुपयोग ◆ कर आधार का विस्तार व राजकोषीय संसाधन ◆ डॉ. अंबेडकर ने भी कृषि आय को कर-दायरे में लाने का समर्थन किया था | ◆ लगभग 86% किसान छोटे-सीमांत — कर योग्य आय बहुत कम ◆ कृषि आय अनिश्चित व मौसम-निर्भर; लेखांकन कठिन ◆ संग्रह लागत अधिक, राजस्व कम (केलकर कार्यबल — 95% से अधिक किसान वैसे भी कर-सीमा से नीचे) — एडम स्मिथ के "मितव्ययिता के सिद्धांत" (Canon of Economy) का उल्लंघन ◆ कृषि की पहले से सुस्त वृद्धि (औसतन केवल 3-4%) — कर से और हतोत्साहन ◆ राजनीतिक संवेदनशीलता व ग्रामीण संकट |
🌾 निष्कर्ष भारतीय कृषि की यात्रा "अकाल से अधिशेष" तक पहुँच चुकी है — अब लक्ष्य "उत्पादन-केंद्रित" से "पोषण, सततता एवं किसान-आय केंद्रित" कृषि की ओर बढ़ना है। संविधान का अनुच्छेद 48 राज्य को कृषि व पशुपालन को आधुनिक-वैज्ञानिक ढंग से संगठित करने का निर्देश देता है, और सतत विकास लक्ष्य-2 (शून्य भुखमरी) भी यही माँग करता है — छोटे किसान की उत्पादकता व आय दोगुनी करना। डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन के शब्दों में — "यदि कृषि गलत हो जाए, तो देश में और कुछ भी सही नहीं हो सकता।" |
🎯 याद रखें — इस खंड के मुख्य बिंदु 1. 86% से अधिक किसान छोटे-सीमांत; औसत जोत लगभग 1.08 हेक्टेयर। 2. व्यापार की शर्तें 100 से कम = किसान के विरुद्ध। 3. कृषि आय पर कर लगाने का अधिकार राज्यों का (राज्य सूची, प्रविष्टि 46)। 4. प्रच्छन्न बेरोज़गारी — हटाने पर भी उत्पादन न घटे। |
कृषि मूलतः राज्य का विषय है, पर खाद्य-व्यापार, अंतर्राष्ट्रीय समझौते और वित्त के कारण केंद्र की भूमिका भी बड़ी है — इसीलिए कृषि-नीति को सहकारी संघवाद का सबसे अच्छा उदाहरण माना जाता है।
प्रावधान | विषय-वस्तु |
राज्य सूची — प्रविष्टि 14 | कृषि, जिसमें कृषि शिक्षा व अनुसंधान, नाशकजीवों से सुरक्षा व पादप रोगों की रोकथाम शामिल |
राज्य सूची — प्रविष्टि 18 | भूमि — भू-धारण, काश्तकारी, लगान, कृषि भूमि का हस्तांतरण, कृषि ऋण |
राज्य सूची — प्रविष्टि 28 व 46 | बाज़ार व मेले (मंडी व्यवस्था का आधार); कृषि आय पर कर |
समवर्ती सूची — प्रविष्टि 33 | खाद्य पदार्थों, पशु-चारे, कच्चे कपास, जूट आदि का व्यापार, वाणिज्य, उत्पादन, आपूर्ति व वितरण |
अनुच्छेद 48 | कृषि व पशुपालन को आधुनिक-वैज्ञानिक आधार पर संगठित करना; गोवंश की नस्ल सुधार (नीति-निदेशक तत्व) |
अनुच्छेद 243छ व 11वीं अनुसूची | पंचायतों को 29 विषय — कृषि, भूमि सुधार, लघु सिंचाई, पशुपालन, मत्स्य, सामाजिक वानिकी आदि |
🔎 तालिका से क्या समझें: तालिका से स्पष्ट है कि खेती, ज़मीन, मंडी और कृषि आय पर कर — चारों राज्य सूची में हैं, जबकि खाद्य पदार्थों का व्यापार और आपूर्ति समवर्ती सूची में। 2020 के कृषि क़ानून केंद्र ने इसी समवर्ती सूची की प्रविष्टि 33 के आधार पर बनाए थे, जबकि राज्यों का तर्क था कि मंडी (प्रविष्टि 28) उनका विषय है — यही संवैधानिक विवाद की जड़ थी।
⚠️ ध्यान दें — विधायी अधिकार कृषि आय पर कर लगाने का अधिकार राज्यों का है (राज्य सूची, प्रविष्टि 46); केंद्र का आयकर कृषि आय पर लागू नहीं होता। 2020 के कृषि कानूनों पर "केंद्र की विधायी क्षमता" की बहस इसी से उठी — केंद्र ने इन्हें समवर्ती सूची की प्रविष्टि 33 (खाद्य पदार्थों का व्यापार व वाणिज्य) के आधार पर बनाया था, जबकि आलोचक इसे राज्य सूची (कृषि व मंडी) का विषय मानते थे। |
कृषि पर समझौता (Agreement on Agriculture) के तीन स्तंभ हैं — बाज़ार पहुँच (आयात शुल्क घटाना), घरेलू समर्थन (सब्सिडी पर अनुशासन) और निर्यात प्रतिस्पर्धा (निर्यात सब्सिडी हटाना)। घरेलू सब्सिडी को रंगीन "बॉक्स" में बाँटा गया है:
बॉक्स | किस प्रकार की सब्सिडी | नियम |
पीला (Amber) बॉक्स | व्यापार को विकृत करने वाली — मूल्य समर्थन (एमएसपी), इनपुट सब्सिडी (बिजली, उर्वरक) | कटौती योग्य; "न्यूनतम सीमा" (De Minimis) — विकासशील देशों के लिए उत्पादन-मूल्य का 10%, विकसित देशों के लिए 5% |
नीला (Blue) बॉक्स | उत्पादन-सीमित करने वाले कार्यक्रमों से जुड़ा प्रत्यक्ष भुगतान | फ़िलहाल कोई सीमा नहीं |
हरा (Green) बॉक्स | न्यूनतम या शून्य व्यापार-विकृति — अनुसंधान, विस्तार, पर्यावरण कार्यक्रम, उत्पादन से असंबद्ध आय सहायता (जैसे पीएम-किसान) | कोई सीमा नहीं |
विशेष एवं विभेदक व्यवहार (अनुच्छेद 6.2) | विकासशील देशों के निम्न-आय व संसाधन-विहीन किसानों को निवेश व इनपुट सब्सिडी | छूट प्राप्त |
🔎 तालिका से क्या समझें: रंगों से याद रखिए — ट्रैफ़िक सिग्नल की तरह पीला यानी "सावधान, सीमा में रहो", हरा यानी "चलो, कोई रोक नहीं", और नीला बीच की श्रेणी। भारत का न्यूनतम समर्थन मूल्य पीले बॉक्स में गिना जाता है, इसीलिए विकसित देश उस पर आपत्ति करते हैं; जबकि अनुसंधान, सिंचाई ढाँचा और पीएम-किसान जैसी आय सहायता हरे बॉक्स के अनुकूल मानी जाती है।
📘 आसान परिभाषा: न्यूनतम सीमा (De minimis) |
📚 परिभाषा: विश्व व्यापार संगठन के नियमों में व्यापार-विकृत करने वाली घरेलू सब्सिडी की वह सीमा जिसे बिना कटौती के दिया जा सकता है — विकासशील देशों के लिए उत्पादन मूल्य का 10% और विकसित देशों के लिए 5%। |
✅ आसान भाषा में: सब्सिडी की "अनुमत छूट-सीमा" — इससे ऊपर दिया तो नियम टूटा। 🏠 उदाहरण: किसी देश में चावल का कुल उत्पादन मूल्य ₹4 लाख करोड़ है, तो विकासशील देश के रूप में वह ₹40,000 करोड़ तक का व्यापार-विकृत समर्थन दे सकता है। |
📘 आसान परिभाषा: शांति खंड (Peace Clause) |
📚 परिभाषा: 2013 के बाली सम्मेलन में तय वह अस्थायी प्रावधान जिसके तहत कोई विकासशील देश खाद्य सुरक्षा हेतु सार्वजनिक भंडारण के लिए न्यूनतम सीमा पार कर जाए, तो दूसरे देश उसके विरुद्ध विवाद नहीं उठाएँगे, जब तक स्थायी समाधान न मिल जाए। |
✅ आसान भाषा में: स्थायी हल मिलने तक "युद्धविराम" — गरीबों के अनाज भंडार के लिए सीमा टूटे तो मुक़दमा नहीं। 🏠 उदाहरण: भारत ने 2018-19 में चावल पर सीमा पार की और इसी खंड का सहारा लेकर विवाद से बचा। |
◆ शांति खंड (Peace Clause) — बाली मंत्रिस्तरीय सम्मेलन (दिसंबर 2013) में खाद्य सुरक्षा हेतु सार्वजनिक भंडारण के लिए अंतरिम संरक्षण: यदि कोई विकासशील देश इस कारण सीमा पार करे, तो उसके विरुद्ध विवाद नहीं उठाया जाएगा। स्थायी समाधान अब तक लंबित।
◆ भारत ने 2020 में चावल (विपणन वर्ष 2018-19) के लिए शांति खंड का उपयोग किया — ऐसा करने वाला पहला देश।
◆ नैरोबी सम्मेलन (2015): कृषि निर्यात सब्सिडी समाप्त करने का निर्णय (विकासशील देशों को अतिरिक्त समय)।
⚠️ ध्यान दें — न्यूनतम सीमा की गणना भारत की समस्या यह है कि न्यूनतम सीमा की गणना 1986-88 के बाहरी संदर्भ मूल्य से होती है — पुराना संदर्भ मूल्य होने से आज का एमएसपी "सब्सिडी" अधिक दिखता है, जबकि मुद्रास्फीति का ध्यान नहीं रखा जाता। |
◆ लक्ष्य-2: भुखमरी समाप्त करना, खाद्य सुरक्षा व बेहतर पोषण प्राप्त करना तथा सतत कृषि को बढ़ावा देना।
◆ उप-लक्ष्य 2.3: 2030 तक छोटे खाद्य उत्पादकों की उत्पादकता व आय को दोगुना करना — भारत की किसान-आय दोगुनी करने की पहल (दलवाई समिति) से सीधा जुड़ाव।
◆ भारत की पहलें: राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, पीएम गरीब कल्याण अन्न योजना, पोषण अभियान, श्री अन्न मिशन, राष्ट्रीय प्राकृतिक कृषि मिशन।
🎯 याद रखें — इस खंड के मुख्य बिंदु 1. कृषि — राज्य सूची प्रविष्टि 14; भूमि — 18; बाज़ार — 28; खाद्य पदार्थों का व्यापार — समवर्ती सूची 33। 2. विश्व व्यापार संगठन — पीला (व्यापार-विकृत, सीमित), नीला, हरा (छूट) बॉक्स। 3. विकासशील देशों की न्यूनतम सीमा — उत्पादन मूल्य का 10%। 4. शांति खंड — बाली, 2013; भारत ने 2020 में चावल के लिए पहली बार उपयोग किया। |
कानून | मुख्य प्रावधान |
कृषक उपज व्यापार एवं वाणिज्य (संवर्धन एवं सरलीकरण) अधिनियम, 2020 | अधिसूचित मंडी क्षेत्र के बाहर "व्यापार क्षेत्र" में बिना मंडी शुल्क के बिक्री की छूट; अंतर-राज्यीय व ई-व्यापार |
कृषक (सशक्तिकरण एवं संरक्षण) मूल्य आश्वासन एवं कृषि सेवा करार अधिनियम, 2020 | अनुबंध खेती का राष्ट्रीय ढाँचा — बुवाई से पहले तय मूल्य पर खरीद का करार |
आवश्यक वस्तु (संशोधन) अधिनियम, 2020 | अनाज, दलहन, तिलहन, प्याज़, आलू को सामान्य परिस्थितियों में भंडारण-सीमा से मुक्त करना |
तिथि | घटना |
सितंबर 2020 | संसद से पारित; 27 सितंबर 2020 को राष्ट्रपति की स्वीकृति |
नवंबर 2020 से | दिल्ली की सीमाओं पर किसान संगठनों का लंबा आंदोलन |
12 जनवरी 2021 | सर्वोच्च न्यायालय ने कानूनों के क्रियान्वयन पर रोक लगाई व विशेषज्ञ समिति बनाई |
19 नवंबर 2021 | प्रधानमंत्री द्वारा तीनों कानूनों को वापस लेने की घोषणा |
1 दिसंबर 2021 | कृषि कानून निरसन अधिनियम, 2021 को राष्ट्रपति की स्वीकृति |
जुलाई 2022 | एमएसपी को अधिक प्रभावी-पारदर्शी बनाने, प्राकृतिक खेती व फसल-विविधीकरण हेतु समिति — अध्यक्ष संजय अग्रवाल (पूर्व कृषि सचिव) |
📖 पीछे की कहानी — कृषि क़ानून — संसद से सड़क और फिर वापसी जून 2020 में कोविड लॉकडाउन के बीच सरकार तीन अध्यादेश लाई और सितंबर 2020 में उन्हें संसद से पारित करा लिया। सरकार का तर्क था कि किसान को मंडी के बाहर कहीं भी बेचने की आज़ादी मिलेगी, निजी निवेश आएगा और अनुबंध खेती से जोखिम घटेगा। पंजाब और हरियाणा के किसानों को डर था कि मंडी के बाहर बिना शुल्क का व्यापार धीरे-धीरे मंडियों को ख़त्म कर देगा और फिर समर्थन मूल्य पर सरकारी ख़रीद भी कमज़ोर हो जाएगी। नवंबर 2020 में हज़ारों किसान ट्रैक्टर-ट्रॉलियों में राशन लेकर दिल्ली की सीमाओं — सिंघु, टीकरी, ग़ाज़ीपुर — पर आ बैठे। सर्दी, गर्मी और कोविड की दूसरी लहर के बीच यह धरना लगभग एक साल चला। जनवरी 2021 में सर्वोच्च न्यायालय ने क़ानूनों पर रोक लगाई और 19 नवंबर 2021 (गुरु नानक जयंती) को प्रधानमंत्री ने तीनों क़ानून वापस लेने की घोषणा की। सबक़ यह रहा कि कृषि जैसे राज्य-विषय पर बड़े सुधार राज्यों और किसान संगठनों की सहमति के बिना टिकाऊ नहीं होते। |
🎯 याद रखें — इस खंड के मुख्य बिंदु 1. तीन कृषि क़ानून — सितंबर 2020; दिल्ली सीमा पर आंदोलन — नवंबर 2020 से। 2. सर्वोच्च न्यायालय की रोक — 12 जनवरी 2021। 3. वापसी की घोषणा — 19 नवंबर 2021; निरसन अधिनियम — 1 दिसंबर 2021। |
💡 क्या आप जानते हैं? आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 में बना था — 2020 में इसी में संशोधन किया गया था, जो बाद में वापस हुआ। |
✅ पक्ष में तर्क | ⚠️ विपक्ष में तर्क |
◆ किसान को मूल्य-गिरावट व संकटकालीन बिक्री से सुरक्षा ◆ केवल गेहूँ-धान नहीं, सभी घोषित फसलों को लाभ — फसल-विविधीकरण ◆ आय की निश्चितता से निवेश व तकनीक अपनाने को बढ़ावा ◆ निजी व्यापारियों की मनमानी पर अंकुश | ◆ भारी राजकोषीय बोझ; खरीद-भंडारण की सीमित क्षमता ◆ बाज़ार मूल्य से ऊपर गारंटी से निजी खरीदार पीछे हट सकते हैं ◆ विश्व व्यापार संगठन की न्यूनतम सीमा से टकराव ◆ पानी-खपत वाली फसलों को और बढ़ावा — पर्यावरणीय क्षति |
💰 मूल्य समर्थन (एमएसपी, खरीद) | 🏦 आय समर्थन (पीएम-किसान जैसे) |
◆ केवल विपणन योग्य अधिशेष बेचने वाले किसानों को लाभ ◆ फसल-विशेष व क्षेत्र-विशेष (पंजाब, हरियाणा) केंद्रित ◆ बाज़ार को विकृत करता है; पीले बॉक्स में गिना जाता है ◆ खाद्य सुरक्षा व बफर स्टॉक से सीधा जुड़ाव | ◆ सभी भू-धारक किसानों तक सीधा लाभ अंतरण ◆ फसल-निरपेक्ष — बाज़ार कम विकृत; हरे बॉक्स के अनुकूल ◆ राशि छोटी; काश्तकार व भूमिहीन मज़दूर अक्सर बाहर ◆ उत्पादकता या मूल्य जोखिम का समाधान नहीं |
🌟 उपलब्धियाँ | 🚧 चुनौतियाँ |
◆ खाद्यान्न में आत्मनिर्भरता — अकाल से अधिशेष तक ◆ दूध, दलहन व बाजरा उत्पादन में विश्व में प्रथम ◆ संबद्ध क्षेत्रों (पशुपालन, मत्स्य) की तेज़ वृद्धि ◆ डिजिटल कृषि, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण व ई-नाम से पारदर्शिता | ◆ छोटी व बिखरी जोतें; प्रति हेक्टेयर कम उत्पादकता ◆ लगभग आधी कार्यशक्ति, पर जीवीए में केवल लगभग 18% ◆ भूजल का अति-दोहन, मृदा क्षरण व जलवायु जोखिम ◆ खाद्य तेल व दलहन के लिए आयात-निर्भरता |
🎯 याद रखें — इस खंड के मुख्य बिंदु 1. भारत ने भूख की समस्या लगभग हल की — अब चुनौती किसान की आय की है। 2. बड़ी बहसें — समर्थन मूल्य की क़ानूनी गारंटी और मूल्य समर्थन बनाम आय समर्थन। 3. भविष्य का पैमाना — टन प्रति हेक्टेयर नहीं, शुद्ध आय, पानी और मिट्टी की सेहत। |
क्षेत्र | राष्ट्रीय संदर्भ में स्थिति |
बाजरा, रेपसीड-सरसों, ग्वार | देश में प्रथम; विश्व के ग्वार उत्पादन का लगभग 70-80% — ग्वार-गम का निर्यात (तेल-गैस उद्योग) |
कुल तिलहन व कुल मोटे अनाज | देश में प्रथम — खाद्य तेल आत्मनिर्भरता व श्री अन्न मिशन में अहम भूमिका |
दूध व ऊन | दूध उत्पादन में देश में दूसरा (लगभग 14.82%); ऊन में प्रथम (लगभग 47.85%) |
मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना | राष्ट्रीय शुभारंभ 19 फरवरी 2015 को सूरतगढ़ (श्रीगंगानगर) से |
अटल भूजल योजना | भूजल संकट वाले 7 राज्यों में शामिल |
🔎 तालिका से क्या समझें: राजस्थान देश के कुल क्षेत्रफल का लगभग 10.4% है, पर सतही जल केवल लगभग 1% के आसपास है। इसके बावजूद राज्य बाजरा, सरसों, ग्वार, कुल तिलहन और ऊन में पहले और दूध में दूसरे स्थान पर है — यह "कम पानी में अधिक उत्पादन" की मिसाल है।
विविध वर्षा, मिट्टी और तापमान के आधार पर राजस्थान को 10 कृषि-जलवायु खंडों में बाँटा गया है। मोटे तौर पर इन्हें पाँच बड़े क्षेत्रों में समझा जा सकता है:
बड़ा क्षेत्र | वर्षा व मिट्टी | प्रमुख फसलें |
पश्चिमी शुष्क मैदान (मरुस्थलीय भाग) | बहुत कम वर्षा (लगभग 100-350 मिमी), रेतीली मिट्टी, धोरे | बाजरा, मोठ, ग्वार, मूँग, तिल; नहरी भाग में सरसों, जीरा, इसबगोल |
उत्तर-पश्चिमी सिंचित मैदान (नहरी क्षेत्र) | कम वर्षा, पर गंगनहर, भाखड़ा व इंदिरा गांधी नहर से सिंचाई | गेहूँ, कपास, सरसों, गन्ना, किन्नू — राज्य का "अन्न भंडार" |
अर्ध-शुष्क पूर्वी मैदान व आंतरिक अपवाह क्षेत्र | मध्यम वर्षा (लगभग 400-650 मिमी), दोमट-बलुई मिट्टी | बाजरा, सरसों, गेहूँ, चना, मूँगफली |
दक्षिणी उप-आर्द्र व आर्द्र मैदान, अरावली क्षेत्र | अधिक वर्षा (लगभग 650-1000 मिमी), लाल-काली मिट्टी | मक्का, धान, उड़द, गेहूँ, कपास |
दक्षिण-पूर्वी आर्द्र मैदान (हाड़ौती) | अधिक वर्षा, उपजाऊ काली मिट्टी, चंबल की नहरें | सोयाबीन, गेहूँ, धनिया, लहसुन, संतरा |
🔎 तालिका से क्या समझें: पश्चिम से पूर्व-दक्षिण की ओर जाते हुए वर्षा बढ़ती है और फसलें "कम पानी वाली" (बाजरा, ग्वार) से "अधिक पानी वाली" (धान, सोयाबीन, गन्ना) होती जाती हैं। नहरी क्षेत्र अपवाद है — वहाँ वर्षा कम है पर नहर के कारण गेहूँ-कपास जैसी फसलें होती हैं।
पहलू | विवरण |
शुरुआत | 1958 में "राजस्थान नहर" नाम से; 1984 में नाम इंदिरा गांधी नहर परियोजना |
पानी कहाँ से | पंजाब में सतलज और व्यास नदियों के संगम पर बने हरिके बैराज से |
लंबाई | राजस्थान फीडर लगभग 204 किमी (अधिकांश पंजाब-हरियाणा में) + मुख्य नहर लगभग 445 किमी (पूरी राजस्थान में) = लगभग 649 किमी |
पहुँच | श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़, बीकानेर, चूरू, जोधपुर, जैसलमेर, बाड़मेर आदि; मुख्य नहर जैसलमेर ज़िले में मोहनगढ़ के पास समाप्त |
प्रभाव | मरुस्थल में गेहूँ, सरसों, कपास, चना की खेती; पेयजल; पर कई जगह जलभराव और लवणता की नई समस्या |
🔎 तालिका से क्या समझें: इस नहर ने थार के एक बड़े हिस्से को खेती योग्य बनाया, पर यह भी सिखाया कि रेगिस्तान में नहर के साथ जल-निकास और सही फसल-चयन भी ज़रूरी है — वरना पानी की कमी की जगह पानी की अधिकता (जलभराव) समस्या बन जाती है।
विषय | मुख्य तथ्य |
राज्य की किसान सहायता | पीएम-किसान के ₹6,000 के अतिरिक्त राज्य सरकार अपनी ओर से "मुख्यमंत्री किसान सम्मान निधि" के रूप में राशि जोड़ती है |
जल बचत पर अनुदान | खेत-तलाई (फ़ार्म पॉन्ड), डिग्गी, पाइपलाइन, ड्रिप-फव्वारा, सौर पंप (पीएम-कुसुम) और तारबंदी पर अनुदान |
डिजिटल मंच | "राज किसान साथी" पोर्टल — योजनाओं का आवेदन व अनुदान एक जगह |
कृषि-प्रसंस्करण नीति | राजस्थान कृषि प्रसंस्करण, कृषि व्यवसाय एवं कृषि निर्यात प्रोत्साहन नीति, 2019 — प्रसंस्करण इकाइयों को पूँजी अनुदान व ब्याज सहायता |
प्रमुख मंडियाँ | कोटा की भामाशाह मंडी (अनाज, सोयाबीन); रामगंजमंडी (धनिया); मेड़ता व जोधपुर (जीरा); बीकानेर व जोधपुर (ग्वार); श्रीगंगानगर (गेहूँ, कपास) |
कृषि विश्वविद्यालय | स्वामी केशवानंद राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय, बीकानेर (1987); महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर; श्री कर्ण नरेंद्र कृषि विश्वविद्यालय, जोबनेर; कृषि विश्वविद्यालय जोधपुर व कोटा; राजस्थान पशुचिकित्सा एवं पशु विज्ञान विश्वविद्यालय, बीकानेर |
राष्ट्रीय अनुसंधान संस्थान | केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान, जोधपुर (1959); सरसों अनुसंधान निदेशालय, भरतपुर; बीजीय मसाला अनुसंधान केंद्र, तबीजी (अजमेर); केंद्रीय भेड़ एवं ऊन अनुसंधान संस्थान, अविकानगर (टोंक); राष्ट्रीय ऊष्ट्र अनुसंधान केंद्र, बीकानेर |
विशेष फसलें | ग्वार, जीरा, इसबगोल, मेथी, धनिया, मेहंदी (सोजत) — इनमें राजस्थान देश के अग्रणी राज्यों में |
🔎 तालिका से क्या समझें: यह तालिका दिखाती है कि राजस्थान की कृषि-नीति का केंद्र "पानी" है — लगभग हर बड़ी योजना (खेत-तलाई, डिग्गी, ड्रिप, सौर पंप) पानी बचाने या जुटाने से जुड़ी है। दूसरी ताकत "विशिष्ट फसलें" हैं — ग्वार, जीरा, इसबगोल और मसाले, जिनसे निर्यात और प्रसंस्करण की बड़ी संभावना है।
⚠️ ध्यान दें — राजस्थान राज्य के आधे से अधिक भूजल ब्लॉक "अति-दोहित" श्रेणी में हैं — इसीलिए अटल भूजल योजना में राजस्थान शामिल है और यहाँ ड्रिप-फव्वारा सिंचाई को सबसे अधिक प्रोत्साहन दिया जाता है। इंदिरा गांधी नहर का पानी हरिके (पंजाब) से आता है, जहाँ सतलज और व्यास मिलती हैं — इसे भाखड़ा नहर या गंगनहर से न मिलाएँ। गंगनहर (1927) सतलज से फ़िरोज़पुर के पास से निकाली गई थी। |
🎯 याद रखें — इस खंड के मुख्य बिंदु 1. इंदिरा गांधी नहर — 1958 में शुरू, 1984 में नाम; पानी हरिके बैराज (सतलज-व्यास संगम, पंजाब) से; अंत मोहनगढ़ (जैसलमेर)। 2. राजस्थान के 10 कृषि-जलवायु खंड; पश्चिम से पूर्व की ओर वर्षा बढ़ती है। 3. संस्थान — काज़री, जोधपुर (1959); सरसों अनुसंधान निदेशालय, भरतपुर; बीजीय मसाला केंद्र, तबीजी (अजमेर)। 4. राज्य के आधे से अधिक भूजल ब्लॉक अति-दोहित — इसलिए ड्रिप-फव्वारा पर ज़ोर। |
व्यक्तित्व | प्रमुख योगदान |
डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन | भारत में हरित क्रांति के जनक; "सदाबहार क्रांति" की अवधारणा; राष्ट्रीय किसान आयोग (2004-06) के अध्यक्ष; भारत रत्न (2024) |
नॉर्मन बोरलॉग | मेक्सिको में अधिक उपज वाली बौनी गेहूँ किस्में; विश्व में हरित क्रांति के जनक; नोबेल शांति पुरस्कार (1970) |
विलियम गॉड | 1968 में "हरित क्रांति" शब्द का प्रयोग किया |
सी. सुब्रमण्यम | कृषि मंत्री (1964-67) के रूप में हरित क्रांति की नीति के राजनीतिक सूत्रधार; भारत रत्न (1998) |
लाल बहादुर शास्त्री | "जय जवान, जय किसान" (1965); खाद्य आत्मनिर्भरता पर बल |
डॉ. वर्गीज़ कुरियन | श्वेत क्रांति व ऑपरेशन फ्लड; "भारत के मिल्कमैन"; जन्मदिवस 26 नवंबर — राष्ट्रीय दुग्ध दिवस |
त्रिभुवनदास पटेल | खेड़ा (कैरा) ज़िला सहकारी दुग्ध संघ (1946) — अमूल के संस्थापक |
विनोबा भावे | भूदान आंदोलन (18 अप्रैल 1951, पोचमपल्ली — तेलंगाना) |
हीरालाल चौधरी व अरुण कृष्णन | नीली क्रांति (मत्स्य पालन) से संबद्ध |
सैम पित्रोदा | पीली क्रांति — तिलहन प्रौद्योगिकी मिशन (1986) |
शांता कुमार | भारतीय खाद्य निगम के पुनर्गठन पर उच्च-स्तरीय समिति (2015) — केवल लगभग 6% किसान एमएसपी का लाभ लेते हैं |
अशोक दलवाई | किसानों की आय दोगुनी करने संबंधी समिति (2016-18) |
सुभाष पालेकर | शून्य बजट प्राकृतिक खेती की अवधारणा |
के.एन. राज | कृषि आय पर कर संबंधी समिति (1972) — कृषि होल्डिंग कर का सुझाव |
![]() चित्र 11: भारतीय कृषि नीति की समय-रेखा |
वर्ष | घटना / नीति | महत्व |
1904 | सहकारी साख समिति अधिनियम | भारत में कृषि सहकारिता की शुरुआत |
1946 | अमूल (कैरा ज़िला सहकारी दुग्ध संघ) की स्थापना | श्वेत क्रांति की नींव |
1965 | कृषि मूल्य आयोग (अब CACP) व एफसीआई की स्थापना; एनडीडीबी | एमएसपी सिफारिश व खरीद तंत्र की नींव |
1965-66 / 1966-67 | हरित क्रांति की शुरुआत (पंजाब) — 1966-67 से एचवाईवी कार्यक्रम औपचारिक रूप से | खाद्यान्न आत्मनिर्भरता की दिशा में पहला कदम |
1970-96 | ऑपरेशन फ्लड (श्वेत क्रांति) | भारत विश्व का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक बना |
1982 | नाबार्ड की स्थापना (12 जुलाई) | कृषि व ग्रामीण वित्त की शीर्ष संस्था |
1998 | किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) | औपचारिक कृषि ऋण तक पहुँच बढ़ी |
2004-06 | स्वामीनाथन आयोग (राष्ट्रीय किसान आयोग) | एमएसपी को सी2 लागत का 1.5 गुना करने की सिफारिश |
2013 | राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA) | खाद्यान्न को कानूनी अधिकार का दर्जा |
2014 | राष्ट्रीय कृषि-वानिकी नीति; राष्ट्रीय गोकुल मिशन; एमआईडीएच | संबद्ध क्षेत्रों पर बल |
2015 | पीएमकेएसवाई (1 जुलाई); मृदा स्वास्थ्य कार्ड (19 फरवरी) | "हर खेत को पानी"; संतुलित उर्वरक |
2016 | पीएमएफबीवाई (फसल बीमा), ई-नाम (14 अप्रैल) | फसल बीमा व डिजिटल मंडी |
2018 | पोषक-अनाज अधिसूचना; एफआईडीएफ; पीएम-आशा | मोटे अनाज व मूल्य समर्थन |
2019 | पीएम-किसान (24 फरवरी); मत्स्य-पशुपालन-डेयरी मंत्रालय; एनएडीसीपी | सीधी आय सहायता; संबद्ध क्षेत्रों को अलग मंत्रालय |
2020 | 10,000 एफपीओ योजना (29 फरवरी); स्वामित्व (24 अप्रैल); एआईएफ; पीएमएमएसवाई; पीएमएफएमई | किसान संगठन, ग्रामीण भू-अभिलेख, फसल-उपरांत अवसंरचना |
2020-21 | तीन कृषि कानून (सितंबर 2020); सर्वोच्च न्यायालय की रोक (जनवरी 2021); निरसन अधिनियम (1 दिसंबर 2021); कृषि उड़ान 2.0 (अक्टूबर 2021) | कृषि विपणन सुधार पर राष्ट्रीय बहस |
2023 | अंतर्राष्ट्रीय मोटा अनाज वर्ष; नमो ड्रोन दीदी (30 नवंबर) | श्री अन्न को वैश्विक मान्यता; महिला-ड्रोन क्रांति |
2024 | पीएम-एमकेएसएसवाई (फरवरी); डिजिटल कृषि मिशन (2 सितंबर); 21वीं पशुधन गणना (25 अक्टूबर); राष्ट्रीय प्राकृतिक कृषि मिशन (नवंबर) | डिजिटल व प्राकृतिक खेती |
2025 | राष्ट्रीय सहकारिता नीति (24 जुलाई); पीएम धन-धान्य कृषि योजना व दलहन मिशन (11 अक्टूबर); नया ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम (21 दिसंबर) | सहकारिता, पिछड़े कृषि ज़िले, मनरेगा का स्थानापन्न |
2026 | बजट 2026-27 — भारत-विस्तार; पीएमएफबीवाई खरीफ 2026 विस्तार; एनएफएसए संशोधन विधेयक का मसौदा | एआई-आधारित सलाह, जंगली पशु क्षति का बीमा, एएवाई हकदारी परिवार-आकार आधारित करने का प्रस्ताव |
अध्याय पढ़ने के बाद दोहराने (रिवीज़न) के लिए — हर ज़रूरी शब्द एक पंक्ति में। विस्तृत परिभाषा और उदाहरण अध्याय के भीतर "आसान परिभाषा" बॉक्स में हैं।
शब्द | एक पंक्ति में अर्थ |
सकल मूल्य वर्धन (GVA) | खेती ने अपने दम पर कितना नया मूल्य पैदा किया। |
खरीफ, रबी, ज़ायद | बरसात, सर्दी और गर्मी की तीन फसल-ऋतुएँ। |
वर्षा-आधारित खेती (Rainfed Farming) | बादल बरसे तो फसल, न बरसे तो नुकसान। |
उत्पादकता / उपज (Yield) | एक जितनी ज़मीन से कितना अनाज निकला। |
फसल सघनता (Cropping Intensity) | एक खेत से साल में कितनी फसलें ली गईं। |
बीज प्रतिस्थापन दर (Seed Replacement Rate) | कितने किसान हर साल नया अच्छा बीज खरीदते हैं। |
जोत (Operational Holding) | एक किसान कितनी ज़मीन पर खेती करता है। |
शब्द | एक पंक्ति में अर्थ |
काश्तकार / बटाईदार (Tenant / Sharecropper) | ज़मीन किसी की, मेहनत किसी और की। |
लगान (Rent) | ज़मीन का किराया। |
भूमि सीमा (Land Ceiling) | ज़मीन रखने की "ऊपरी हद"। |
सहकारी समिति (Cooperative) | मिलकर काम, मिलकर फ़ायदा। |
पुनर्वित्त (Refinance) | "बैंकों का बैंक" बनकर उन्हें दोबारा पैसा देना। |
संलग्न कार्यालय (Attached Office) | मंत्रालय का "विशेषज्ञ विभाग"। |
शब्द | एक पंक्ति में अर्थ |
न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) | फसल के दाम की "फ़र्श" — इससे नीचे सरकार नहीं गिरने देगी। |
बफर स्टॉक (Buffer Stock) | देश का "अनाज का गुल्लक"। |
ब्याज अनुदान (Interest Subvention) | ब्याज का कुछ भाग सरकार भरती है। |
बीमांकिक प्रीमियम (Actuarial Premium) | जोखिम के हिसाब से बीमे की असली कीमत। |
संकटकालीन बिक्री (Distress Sale) | मजबूरी में औने-पौने दाम। |
व्यापार की शर्तें (Terms of Trade) | किसान जो बेचता है बनाम जो खरीदता है — किसका भाव तेज़ी से बढ़ा। |
शब्द | एक पंक्ति में अर्थ |
आढ़तिया (Commission Agent) | मंडी का "दलाल"। |
परख (Assaying) | माल की "गुणवत्ता रिपोर्ट"। |
केंद्रीय निर्गम मूल्य (Central Issue Price) | राज्य को राशन का अनाज जिस दाम पर मिलता है। |
समावेशन व बहिष्करण त्रुटि (Inclusion & Exclusion Error) | ग़लत लोग अंदर, सही लोग बाहर। |
मूल्य संवर्धन (Value Addition) | वही माल, ज़्यादा दाम। |
फसलोत्तर हानि (Post-Harvest Loss) | खेत से थाली तक रास्ते में खोया अनाज-फल। |
शब्द | एक पंक्ति में अर्थ |
पैमाने की मितव्ययिता (Economies of Scale) | जितना बड़ा काम, उतनी सस्ती हर इकाई। |
प्रच्छन्न बेरोज़गारी (Disguised Unemployment) | दिखते काम पर हैं, पर असल में उनकी ज़रूरत नहीं। |
अवसर लागत (Opportunity Cost) | एक चीज़ चुनी तो दूसरी क्या गँवाई। |
नकारात्मक बाह्यता (Negative Externality) | मेरे काम का नुकसान दूसरों पर। |
सुपोषण (Eutrophication) | ज़्यादा खाद, तालाब का दम घुटा। |
मूल्य की फ़र्श (Price Floor) | दाम की "निचली दीवार"। |
पूरे अध्याय को एक पेज पर देखिए — पढ़ाई के बाद दोहराने का सबसे तेज़ तरीका। हर डिब्बा अध्याय के एक बड़े हिस्से को तीन मुख्य बिंदुओं में समेटता है।
![]() चित्र 12: भारतीय कृषि — पूरे अध्याय का नक्शा |