भारत की पहचान सदियों से "कृषि प्रधान देश" के रूप में रही है। आज भी देश की लगभग आधी आबादी अपनी आजीविका के लिए किसी न किसी रूप में खेती-किसानी पर निर्भर है। सोचिए — जब एक किसान अपने खेत में बीज बोता है, तो उसे कई चिंताएँ सताती हैं: क्या बारिश समय पर होगी? क्या फसल अच्छी होगी? और सबसे बड़ी चिंता — फसल तैयार होने पर उसे उचित दाम मिलेगा या नहीं? यही वह जगह है जहाँ सरकार की नीतियाँ काम आती हैं — न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) किसान को भाव की गारंटी देता है, फसल बीमा योजना उसे प्राकृतिक आपदा से बचाती है, और खाद्य सुरक्षा कानून यह सुनिश्चित करता है कि उगाया गया अनाज देश के गरीब से गरीब व्यक्ति तक भी पहुँचे। इस अध्याय में हम कृषि से जुड़ी हर बड़ी नीति — हरित क्रांति से लेकर आज के e-NAM और नए खाद्य सुरक्षा संशोधन विधेयक तक — को कहानी, आँकड़े और उदाहरण के साथ समझेंगे।
भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि की भूमिका सिर्फ "अनाज उगाने" तक सीमित नहीं है — यह करोड़ों परिवारों की आजीविका, ग्रामीण मांग व खाद्य सुरक्षा की नींव है। नीचे दिए आँकड़े Economic Survey 2025-26 पर आधारित हैं।
| संकेतक | आँकड़ा |
|---|---|
| राष्ट्रीय आय (GDP) में योगदान | लगभग 18-20% — "लगभग एक-पाँचवाँ हिस्सा" (Economic Survey 2025-26) |
| कुल कार्यबल में हिस्सेदारी | 46.1% जनसंख्या कृषि व संबद्ध क्षेत्रों पर निर्भर (PLFS 2023-24) |
| खाद्यान्न उत्पादन (कृषि वर्ष 2024-25) | 3,577.3 लाख टन (LMT) — अब तक का सर्वाधिक उत्पादन |
| बागवानी उत्पादन (कृषि वर्ष 2024-25) | 362.08 मिलियन टन — खाद्यान्न उत्पादन से भी आगे निकला |
| कृषि निर्यात (2024-25) | ₹4.46 लाख करोड़ (लगभग $51.1 अरब) |
| विश्व में स्थान (मूल्य के आधार पर) | दूसरा सबसे बड़ा कृषि उत्पादक देश |
कृषि वृद्धि दर की बात करते समय तीन अलग आँकड़ों में भ्रमित न हों — हर एक अलग समय-सीमा को दर्शाता है:
| समय-सीमा | वास्तविक (Real) GVA वृद्धि दर | टिप्पणी |
|---|---|---|
| FY 2024-25 (बीता वर्ष) | 4.6% | पशुधन व मत्स्य पालन के दम पर मजबूत वृद्धि |
| FY 2025-26 (प्रथम अग्रिम अनुमान) | 3.1% | मानसून सामान्य होने के बावजूद वृद्धि धीमी — नॉमिनल वृद्धि तो मात्र 0.8% ही रही (मुद्रास्फीति में तेज गिरावट के कारण) |
| दशकीय औसत (FY16 से FY25 तक) | 4.45% | 1975 के बाद का सर्वाधिक दशकीय औसत — फसलों (3.5%) से ज्यादा पशुधन (7.1%) व मत्स्य पालन (8.8%) का योगदान |
| भारतीय कृषि की विशेषता | विवरण |
|---|---|
| मानसून पर निर्भरता | लगभग 60-70% खेती वर्षा-आधारित (Rainfed) है |
| छोटे व सीमांत किसान | 86.2% किसानों के पास 2 हेक्टेयर से कम भूमि है |
| बहुफसली प्रकृति | खाद्यान्न, बागवानी, दुग्ध, मत्स्य व पशुपालन — सभी शामिल |
| तीन फसल ऋतुएँ | रबी (Rabi), खरीफ (Kharif) व जायद (Zaid) |
| वैश्विक स्थिति | दूध, दलहन व जूट में विश्व में प्रथम; गेहूँ, चावल, कपास व गन्ने में द्वितीय स्थान |
आज़ादी के बाद के शुरुआती वर्षों में भारत खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर नहीं था। 1943 के बंगाल अकाल (Bengal Famine) की भयावह स्मृति अभी ताज़ा ही थी, और 1965-66 में भीषण सूखे के चलते भारत को अमेरिका से PL-480 योजना के तहत भारी मात्रा में अनाज आयात करना पड़ा — यानी भारत की खाद्य सुरक्षा दूसरे देश की मर्जी पर निर्भर थी। इसी संकट से बाहर निकलने के लिए भारत ने "हरित क्रांति" का रास्ता अपनाया।
A. हरित क्रांति (Green Revolution)
📚 मानक परिभाषा: हरित क्रांति भारत में 1965-66 में शुरू हुई वह कृषि रणनीति थी, जिसके तहत उच्च उत्पादकता वाली बीज किस्मों (HYVs), रासायनिक उर्वरकों, सिंचाई एवं आधुनिक मशीनीकरण के प्रयोग से अनाज उत्पादन में भारी वृद्धि की गई। ✅ सरल शब्दों में: सीधी भाषा में — वैज्ञानिक तरीकों (बेहतर बीज + खाद + पानी + मशीन) का उपयोग करके कम जमीन से ज्यादा अनाज उगाना सीखना, ताकि देश को अनाज के लिए विदेशों पर निर्भर न रहना पड़े। 💡 उदाहरण: गेहूँ का उत्पादन 1950 के दशक में मात्र 10-12 मिलियन टन था, जो 1980 के दशक तक 55-60 मिलियन टन और आज 110+ मिलियन टन तक पहुँच गया है।
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| "Green Revolution" शब्द | विलियम एस. गॉड (William S. Gaud) ने 1968 में गढ़ा |
| भारत में जनक (Architect) | डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन |
| तत्कालीन कृषि मंत्री | सी. सुब्रमण्यम (C. Subramaniam) |
| तत्कालीन प्रधानमंत्री | लाल बहादुर शास्त्री ("जय जवान, जय किसान" का नारा) |
| विदेशी सहयोगी वैज्ञानिक | नॉर्मन बोरलॉग (Norman Borlaug) — नोबेल शांति पुरस्कार 1970, मैक्सिको में HYV गेहूँ विकसित किया |
| 1966 में बीज आयात | मैक्सिको से 18,000 टन उच्च उत्पादकता वाले गेहूँ बीज — उस समय विश्व की सबसे बड़ी बीज खरीद |
| प्रथम प्रयोग-स्थल | पंजाब |
| प्रमुख उच्च उत्पादकता किस्में (गेहूँ) | कल्याण सोना, सोनालिका |
| प्रमुख उच्च उत्पादकता किस्म (चावल) | IR-8 ("मिरेकल राइस" — फिलीपींस के IRRI संस्थान में विकसित) |
| सरकारी कार्यक्रम | गहन कृषि जिला कार्यक्रम (IADP) व उच्च उत्पादकता किस्म कार्यक्रम (HYVP) |
| सहयोगी संस्था | भारतीय खाद्य निगम (FCI) की स्थापना भी 1965 में हुई — MSP आधारित खरीद हेतु |
| फसल | 1950-60 के दशक में | 1980-90 के दशक में | आज (2024-25) |
|---|---|---|---|
| गेहूँ | 10-12 मिलियन टन | 55-60 मिलियन टन | 110+ मिलियन टन |
| चावल | 34 मिलियन टन (1960) | 74 मिलियन टन (1980) | 137-138 मिलियन टन |
| कुल खाद्यान्न | 51 मिलियन टन (1950) | 108 मिलियन टन (1970) | 357.7 मिलियन टन (रिकॉर्ड) |
हरित क्रांति की सीमाएँ — संक्षेप में: भूजल का अत्यधिक दोहन (पंजाब में CGWB के अनुसार 80% जल इकाइयाँ अति-दोहित हैं), मिट्टी की गुणवत्ता में गिरावट (रासायनिक उर्वरकों के अति-प्रयोग से), पंजाब-हरियाणा जैसे सिंचित क्षेत्रों तक सीमित रहना (पूर्वी भारत पीछे छूटा), गेहूँ-चावल की मोनोकल्चर से फसल विविधता में कमी, तथा छोटे किसानों की तुलना में बड़े किसानों को अधिक लाभ मिलना — ये सभी इसकी प्रमुख सीमाएँ रहीं।
डॉ. स्वामीनाथन ने ही आगे चलकर "सदाबहार क्रांति (Evergreen Revolution)" की अवधारणा दी — यानी ऐसी उत्पादकता वृद्धि जो पर्यावरण को नुकसान पहुँचाए बिना, स्थायी रूप से प्राप्त हो। हरित क्रांति 2.0 अब जैव-प्रौद्योगिकी, जलवायु-सहनशील बीजों, जैविक व प्राकृतिक खेती तथा सटीक कृषि (Precision Agriculture) पर केंद्रित है — ताकि दलहन, तिलहन व मोटे अनाज (Millets) जैसी उपेक्षित फसलों को भी बढ़ावा मिले।
B. भारत की अन्य प्रमुख कृषि-क्रांतियाँ
परीक्षा में "किस क्रांति का संबंध किस क्षेत्र से है" पूछा जाना बेहद आम है — नीचे सभी प्रमुख क्रांतियाँ एक जगह दी गई हैं:
| क्रांति का नाम | संबंधित क्षेत्र | प्रमुख व्यक्ति / योजना |
|---|---|---|
| हरित क्रांति (Green Revolution) | गेहूँ, चावल (खाद्यान्न) | एम.एस. स्वामीनाथन + नॉर्मन बोरलॉग, 1965-66 |
| श्वेत क्रांति (White Revolution) | दुग्ध उत्पादन (Dairy) | डॉ. वर्गीज कुरियन — ऑपरेशन फ्लड, 1970-96 |
| नीली क्रांति (Blue Revolution) | मत्स्य पालन (Fisheries) | PM मत्स्य संपदा योजना |
| पीली क्रांति (Yellow Revolution) | तिलहन (सरसों, सूरजमुखी) | तिलहन तकनीकी मिशन, 1986 |
| स्वर्णिम क्रांति (Golden Revolution) | बागवानी व शहद | 1991-2003 की अवधि — फल-सब्जी-शहद उत्पादन में तीव्र वृद्धि |
| सदाबहार क्रांति (Evergreen Revolution) | टिकाऊ (Sustainable) खेती | एम.एस. स्वामीनाथन — द्वितीय हरित क्रांति की अवधारणा |
| गुलाबी क्रांति (Pink Revolution) | प्याज उत्पादन (कहीं-कहीं मांस/झींगा से भी जोड़ा जाता है) | — |
| रजत क्रांति (Silver Revolution) | अंडा उत्पादन (Poultry) | — |
| इंद्रधनुष क्रांति (Rainbow Revolution) | सभी कृषि क्षेत्रों का समग्र (एकीकृत) विकास | 21वीं सदी की दृष्टि |
ध्यान दें: "स्वर्णिम क्रांति" के जनक के रूप में कुछ परीक्षा-सामग्री में एक नाम प्रचलित है, परंतु यह व्यापक रूप से प्रमाणित तथ्य नहीं है — परीक्षा में इस क्रांति को "बागवानी व शहद, 1991-2003" के रूप में ही याद रखना अधिक सुरक्षित है, न कि किसी विशेष व्यक्ति के नाम के साथ।
📚 मानक परिभाषा: भूमि सुधार का अर्थ है भूमिहीन व सीमांत किसानों में भूमि के पुनर्वितरण, काश्तकारी (Tenancy) को सुरक्षित करने तथा भूमि तक समान पहुँच सुनिश्चित करने हेतु अपनाए गए नीतिगत व कानूनी उपाय। ✅ सरल शब्दों में: आज़ादी के समय बहुत सी जमीन कुछ बड़े जमींदारों के पास थी और असली जुताई करने वाला किसान सिर्फ किराएदार (काश्तकार) था। भूमि सुधार का मकसद था कि जो जमीन जोतता है, उसे ही जमीन का मालिकाना हक या सुरक्षित अधिकार मिले। 💡 उदाहरण: जैसे किसी गाँव में एक जमींदार के पास 500 बीघा जमीन हो और उस पर 50 किसान परिवार खेती करते हों — भूमि सुधार के तहत उन किसानों को खेत का मालिकाना/स्थायी काश्तकारी हक दिलाना, ताकि वे जमींदार की मर्जी पर निर्भर न रहें।
| भूमि सुधार का घटक | विवरण |
|---|---|
| जमींदारी उन्मूलन (1948-54) | राज्य व असली जोतने वाले किसान के बीच से बिचौलियों (जमींदारों) को हटाया गया — लगभग 1.9 करोड़ काश्तकारों को सीधा भूमि अधिकार मिला, जमींदारों को लगभग ₹670 करोड़ का मुआवजा दिया गया |
| काश्तकारी सुधार (Tenancy Reforms) | काश्तकारों को मालिकाना हक, कार्यकाल-सुरक्षा (Tenure Security) व न्यूनतम किराया-नियंत्रण दिया गया |
| भूमि सीमा अधिनियम (Land Ceiling, 1960-72) | परिवार/व्यक्ति के पास अधिकतम भूमि सीमा तय — लगभग 60 लाख एकड़ अतिरिक्त (Surplus) भूमि चिन्हित हुई, परंतु क्रियान्वयन कमजोर रहा |
| चकबंदी (Consolidation of Holdings) | बिखरे हुए छोटे-छोटे खेतों को इकट्ठा कर बड़ी इकाई बनाना — व्यवहार में अभी भी बिखराव की समस्या बनी हुई है |
| भूदान-ग्रामदान आंदोलन (1950-1972) | विनोबा भावे द्वारा शुरू — बड़े भूस्वामियों द्वारा स्वेच्छा से भूमिहीन किसानों को भूमि-दान |
भूमि सुधार असफल क्यों रहा?: बड़ी संख्या में छूट (Exemptions) दी गईं, बेनामी (फर्जी नाम पर) भूमि-धारण बड़े पैमाने पर हुआ, तथा राजनीतिक इच्छाशक्ति (Political Will) की कमी रही — इसीलिए भूमि सुधार का लाभ अपेक्षा से बहुत कम मिल पाया।
| पहल | वर्ष | उद्देश्य |
|---|---|---|
| राष्ट्रीय भूमि अभिलेख आधुनिकीकरण कार्यक्रम (NLRMP) | 2008 | भूमि अभिलेखों का डिजिटलीकरण व आधुनिकीकरण |
| डिजिटल इंडिया भूमि अभिलेख आधुनिकीकरण कार्यक्रम (DILRMP) | 2008 (संशोधित) | कैडेस्ट्रल मानचित्रों व अधिकार अभिलेखों (Record of Rights) का एकीकरण |
| स्वामित्व योजना (SVAMITVA) | 2020 | ड्रोन तकनीक से ग्रामीण आवासीय भूमि की मैपिंग, पंचायती राज मंत्रालय द्वारा |
| ULPIN / भू-आधार | चालू | हर भूखंड को विशिष्ट पहचान संख्या (Unique ID) देना |
| कृषि भूमि पट्टा अधिनियम मॉडल | 2016 | संस्थागत सहयोग के साथ भूमि पट्टे (Leasing) को कानूनी मान्यता |
1. कुल 3.28 लाख गाँवों का ड्रोन सर्वेक्षण पूरा। 2. अब तक 2.76 करोड़ संपत्ति कार्ड (Property Cards) जारी।
राजस्थान कनेक्शन — राजस्थान काश्तकारी अधिनियम, 1955: राजस्थान काश्तकारी अधिनियम (Rajasthan Tenancy Act), 1955, 14 मार्च 1955 को पारित हुआ। यह राज्य में कृषि भूमि की काश्तकारी से जुड़े कानूनों को एकीकृत करता है और भूमि सुधार के उपाय प्रदान करता है। इसके तहत "खातेदार काश्तकार (Khatedar Tenant)" सबसे महत्वपूर्ण श्रेणी है — खातेदार का भूमि पर वंशानुगत (Inheritable) अधिकार तो होता है, पर वह भूमि को बेच, दान या ट्रस्ट में नहीं रख सकता। अधिनियम में अनुसूचित जाति, जनजाति व सहरिया जनजाति के लिए विशेष संरक्षण प्रावधान भी हैं।
अकेला किसान बाजार में मोलभाव करने की स्थिति में कमजोर होता है, लेकिन जब किसान संगठित होकर सहकारी समिति (Cooperative Society) बनाते हैं, तो उनकी सामूहिक ताकत बढ़ जाती है — चाहे बात कर्ज लेने की हो, खाद खरीदने की हो या दूध बेचने की। भारत में सहकारिता आंदोलन ने कृषि क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव लाए हैं, जिनमें सबसे प्रसिद्ध उदाहरण है — "श्वेत क्रांति (White Revolution)"।
| घटना/संस्था | वर्ष | विवरण |
|---|---|---|
| सहकारी समिति अधिनियम (Cooperative Societies Act) | 1904 | भारत में कृषि सहकारी समितियों की शुरुआत हेतु पहला कानून |
| AMUL (आनंद मिल्क यूनियन लिमिटेड) की स्थापना | 1946 | गुजरात के आनंद जिले में डेयरी सहकारिता की शुरुआत — श्वेत क्रांति का आधार |
| ऑपरेशन फ्लड (Operation Flood) | 1970-1996 | डॉ. वर्गीज कुरियन के नेतृत्व में — विश्व का सबसे बड़ा डेयरी विकास कार्यक्रम |
| गुजरात सहकारी दुग्ध विपणन संघ (GCMMF) | चालू | AMUL ब्रांड का विपणन करने वाला संघ — विश्व का सबसे बड़ा डेयरी सहकारी संगठन |
📚 मानक परिभाषा: श्वेत क्रांति भारत में दुग्ध उत्पादन को सहकारी मॉडल के जरिए भारी मात्रा में बढ़ाने का आंदोलन था, जिसने भारत को विश्व का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश बना दिया। ✅ सरल शब्दों में: डॉ. वर्गीज कुरियन को "भारत का मिल्कमैन (Milkman of India)" कहा जाता है — उन्होंने गुजरात के छोटे दूध उत्पादकों को संगठित कर एक ऐसा सहकारी मॉडल बनाया जिसमें किसान को दूध का पूरा वाजिब दाम मिले, बिचौलिए को नहीं। 💡 उदाहरण: गाँव का एक छोटा दूध उत्पादक अकेले शहर में दूध बेचने नहीं जा सकता, लेकिन जब वह गाँव की डेयरी सहकारी समिति को दूध देता है और वह समिति आगे AMUL जैसे बड़े संघ से जुड़ी हो, तो उसे उचित दाम मिल जाता है — यही सहकारिता की ताकत है।
📚 मानक परिभाषा: NABARD अधिनियम 1981 के तहत गठित एवं 12 जुलाई 1982 को स्थापित यह संस्था कृषि व ग्रामीण विकास के लिए वित्त-पोषण एवं विनियमन हेतु भारत की शीर्ष (Apex) संस्था है। यह RBI से कृषि ऋण के कार्य व ARDC (कृषि पुनर्वित्त एवं विकास निगम) के पुनर्वित्त कार्यों को हस्तांतरित करके बनाई गई थी। ✅ सरल शब्दों में: जैसे कोई बड़ा बैंक छोटे बैंकों को पैसा उधार देता है ताकि वे आगे किसानों को लोन दे सकें — NABARD ठीक यही काम कृषि क्षेत्र के लिए करता है, यह खुद सीधे किसान को लोन नहीं देता, बल्कि बैंकों की मदद करता है। 💡 उदाहरण: NABARD ग्रामीण बुनियादी ढाँचा विकास निधि (RIDF) के जरिए गाँवों में सड़क, सिंचाई परियोजनाओं के लिए राज्यों को पैसा देता है, और स्वयं सहायता समूह-बैंक संपर्क कार्यक्रम (SHG-Bank Linkage) को बढ़ावा देता है।
बजट 2026-27 — राष्ट्रीय सहकारिता नीति (National Cooperation Policy): बजट 2026-27 में सहकारिता क्षेत्र के व्यवस्थित विकास हेतु "राष्ट्रीय सहकारिता नीति" की घोषणा की गई है — जिसका उद्देश्य FPO, सहकारी समितियों (Co-operatives) व स्वयं सहायता समूहों (SHG) को एक साझा मॉडल ("विकल्प संस्थान") में एकीकृत करना है।
📚 मानक परिभाषा: FPO किसानों का एक पंजीकृत सामूहिक निकाय (कंपनी या सहकारी ढाँचे में) है, जिसमें किसान स्वयं शेयरधारक होते हैं — इसका उद्देश्य छोटे व सीमांत किसानों की सामूहिक मोलभाव क्षमता (Collective Bargaining Power) बढ़ाना है। ✅ सरल शब्दों में: अकेला छोटा किसान न तो थोक में सस्ता बीज-खाद खरीद सकता है, न ही बड़ी मात्रा में उपज बेचकर अच्छा भाव पा सकता है। लेकिन जब सैकड़ों किसान मिलकर एक FPO बनाते हैं, तो वे एक "छोटी कंपनी" की तरह काम करते हैं — सस्ता खरीदते हैं, बेहतर भाव पर बेचते हैं। 💡 उदाहरण: किसी गाँव के 300 किसान मिलकर एक FPO बनाएं, तो वे मिलकर सीधे बड़े खरीदारों या निर्यातकों को अपनी उपज बेच सकते हैं — बिना किसी बिचौलिए के, जिससे हर किसान को ज्यादा मुनाफा मिलता है।
| विशेषता | विवरण |
|---|---|
| लक्ष्य (Target) | 10,000 FPO — कृषि मंत्रालय की योजना (2020 में शुरू, अवधि विस्तारित) |
| आयकर छूट (Tax Exemption) | शुरुआती वर्षों तक आयकर से छूट |
| सहयोगी संस्थाएँ | NABARD, SFAC (Small Farmers Agribusiness Consortium) व राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम |
| बजट 2026-27 में फोकस | मत्स्य पालन व पशुपालन क्षेत्र में भी नए FPO बनाने पर जोर |
| e-NAM से जुड़ाव | FPO सीधे e-NAM प्लेटफॉर्म पर व्यापार कर सकते हैं — फरवरी 2026 तक 4,724 FPO पंजीकृत |
ध्यान दें — परीक्षा में सामान्य भ्रम: FPO एक सहकारी समिति (Cooperative Society) मात्र नहीं है — यह प्रायः एक "उत्पादक कंपनी (Producer Company)" के रूप में पंजीकृत होता है, जो कंपनी अधिनियम के प्रावधानों के तहत काम करती है, इसलिए इसे "कॉर्पोरेट ढाँचे वाला किसान संगठन" समझना अधिक सटीक है।
खेती करने के लिए किसान को बीज, खाद, सिंचाई व मजदूरी पर पहले ही पैसा खर्च करना पड़ता है, जबकि फसल की कमाई महीनों बाद आती है — इसीलिए किसान को समय पर व सस्ती दर पर कर्ज (ऋण) मिलना बेहद जरूरी है।
| ऋण स्रोत (Credit Source) | हिस्सेदारी |
|---|---|
| अनुसूचित वाणिज्यिक बैंक (Scheduled Commercial Banks) | 76% |
| सहकारी बैंक (Cooperatives — PACS आदि) | 12.1% |
| क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक (Regional Rural Banks — RRBs) | 11.9% |
📚 मानक परिभाषा: 1998 में RBI व NABARD की संयुक्त पहल पर शुरू की गई यह योजना किसानों को अल्पकालिक औपचारिक ऋण (कार्यशील पूँजी, उपकरण रखरखाव आदि) उपलब्ध कराती है, ताकि वे अनौपचारिक साहूकारों (Moneylenders) के ऊँचे ब्याज के जाल से बच सकें। ✅ सरल शब्दों में: जैसे एक डेबिट/क्रेडिट कार्ड से आप जरूरत पड़ने पर पैसे निकाल सकते हैं — वैसे ही KCC से किसान बुवाई के समय जरूरी पैसा बैंक से निकाल सकता है, बिना बार-बार अलग से लोन-आवेदन किए। 💡 उदाहरण: अगर किसी किसान के पास KCC हो तो वह बुवाई के मौसम में सीधे बैंक से ₹50,000 निकालकर बीज-खाद खरीद सकता है, और फसल बिकने पर वह पैसा वापस जमा कर देता है — बिना ऊँचे ब्याज वाले साहूकार के पास जाए।
| विशेषता | विवरण |
|---|---|
| शुरुआत | 1998 (RBI + NABARD पहल) |
| सक्रिय खाते (2025) | 7.5 करोड़ से अधिक |
| ऋण सीमा एवं ब्याज दर | ₹3 लाख तक @ 7% ब्याज दर |
| समय पर भुगतान पर छूट | अतिरिक्त 3% छूट — यानी प्रभावी ब्याज दर मात्र 4% |
| डिजिटल पहल (बजट 2025) | जन समर्थ पोर्टल आधारित डिजिटल KCC — 5 राज्यों में पायलट शुरू |
| बजट 2026 की नई पहल | PM मत्स्य किसान क्रेडिट कार्ड — मछुआरों के लिए भी KCC जैसी सुविधा |
📚 मानक परिभाषा: जुलाई 2020 में शुरू की गई ₹1 लाख करोड़ की यह निधि फसलोत्तर प्रबंधन (Post-Harvest Management) व सामुदायिक कृषि अवसंरचना (कोल्ड स्टोरेज, गोदाम, छँटाई इकाइयाँ) के निर्माण हेतु रियायती ऋण उपलब्ध कराती है। ✅ सरल शब्दों में: फसल कटने के बाद किसान के पास अक्सर उसे सुरक्षित रखने की जगह (कोल्ड स्टोरेज/गोदाम) नहीं होती, जिससे उपज खराब हो जाती है या उसे औने-पौने दाम पर तुरंत बेचना पड़ता है। AIF ऐसी भंडारण सुविधाएँ बनाने के लिए सस्ता कर्ज देती है। 💡 उदाहरण: कोई FPO या किसान समूह अगर अपने गाँव में कोल्ड स्टोरेज बनाना चाहे, तो AIF के तहत उसे 3% ब्याज सहायता के साथ लोन मिल सकता है, जिससे किसान फसल तुरंत बेचने की मजबूरी से बच जाते हैं।
| विशेषता | विवरण |
|---|---|
| कुल आवंटन (Outlay) | ₹1 लाख करोड़ |
| अवधि | 2020-21 से 2029-30 तक (ऋण संवितरण), ब्याज सहायता सहयोग आगे तक जारी |
| ब्याज सहायता (Interest Subvention) | 3% प्रति परियोजना (अधिकतम ₹2 करोड़ तक) |
| ऋण गारंटी | CGTMSE के माध्यम से लघु इकाइयों हेतु बिना गिरवी (Collateral-Free) ऋण गारंटी |
| लाभार्थी | FPO, PACS, कृषि-स्टार्टअप, सहकारी समितियाँ, स्वयं सहायता समूह |
| प्रगति (2025 तक) | 50,000 से अधिक परियोजनाएँ स्वीकृत, ₹30,000 करोड़ से अधिक संवितरित |
📚 मानक परिभाषा: 2016 में पुरानी बीमा योजनाओं (NAIS व MNAIS) के स्थान पर शुरू की गई यह योजना प्राकृतिक आपदाओं, कीटों व बीमारियों से होने वाले फसल नुकसान के विरुद्ध किसानों को बीमा सुरक्षा प्रदान करती है। ✅ सरल शब्दों में: जैसे आपकी बाइक या घर का बीमा होता है — अगर कोई दुर्घटना हो जाए तो बीमा कंपनी नुकसान की भरपाई करती है। ठीक वैसे ही किसान की फसल का भी "बीमा" होता है — अगर बाढ़, सूखा या ओलावृष्टि से फसल बर्बाद हो जाए, तो सरकार व बीमा कंपनी मिलकर किसान को मुआवजा देती हैं। 💡 उदाहरण: अगर किसी किसान की सोयाबीन की फसल असमय बारिश से बर्बाद हो जाए, तो PMFBY के तहत उसे हुए नुकसान का आकलन कर बीमा राशि सीधे उसके बैंक खाते में भेजी जाती है।
| फसल श्रेणी | किसान का प्रीमियम हिस्सा |
|---|---|
| खरीफ फसलें | 2% |
| रबी फसलें | 1.5% |
| वाणिज्यिक/बागवानी फसलें | 5% |
शेष प्रीमियम राशि केंद्र व राज्य सरकार मिलकर वहन करती हैं। कवरेज बुवाई-पूर्व जोखिम (Prevented Sowing) से लेकर फसलोत्तर हानि (Post-Harvest Loss) तक होता है, और दावों के सटीक आकलन हेतु ड्रोन, सैटेलाइट इमेजरी व AI तकनीक का उपयोग किया जाता है।
| बजट वर्ष | PMFBY आवंटन | टिप्पणी |
|---|---|---|
| 2024-25 (संशोधित अनुमान) | ₹15,864 करोड़ | वास्तविक व्यय ₹14,473 करोड़ रहा |
| 2025-26 | ₹12,242 करोड़ | 2024-25 RE से लगभग 23% कम — 2019-20 के बाद सबसे कम आवंटन |
| 2026-27 | ₹12,200 करोड़ | पिछले 8 वर्षों में सबसे कम आवंटन |
विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण (10-अंक के उत्तर के लिए): जहाँ एक ओर जलवायु परिवर्तन के कारण प्राकृतिक आपदाओं का खतरा बढ़ रहा है, वहीं दूसरी ओर फसल बीमा योजना का बजट आवंटन लगातार घट रहा है — यह एक महत्वपूर्ण नीतिगत विरोधाभास (Policy Paradox) है, जिसे RAS Mains में विश्लेषणात्मक ढंग से उठाया जा सकता है।
📚 मानक परिभाषा: 2015 में शुरू की गई यह योजना "हर खेत को पानी" व "प्रति बूँद अधिक फसल (More Crop Per Drop)" के दोहरे उद्देश्य से सिंचाई सुविधाओं का विस्तार व जल उपयोग दक्षता बढ़ाने पर केंद्रित है। ✅ सरल शब्दों में: भारत की बड़ी समस्या यह है कि बहुत सी खेती आज भी सिर्फ बारिश पर निर्भर है — PMKSY का लक्ष्य है कि हर खेत तक किसी न किसी तरीके से पानी पहुँचे, और जो पानी मिले उसका सबसे कुशलता से (बर्बादी के बिना) उपयोग हो। 💡 उदाहरण: खेत में पूरे खेत को पानी से भरने (परंपरागत सिंचाई) की बजाय ड्रिप सिंचाई (Drip Irrigation) से पौधे की जड़ में सीधा पानी टपकाया जाए — इससे वही फसल कम पानी में हो जाती है, यही "More Crop Per Drop" है।
| घटक (Component) | उद्देश्य |
|---|---|
| त्वरित सिंचाई लाभ कार्यक्रम (AIBP) | बड़ी व मध्यम सिंचाई परियोजनाओं को तेज़ी से पूरा करना |
| हर खेत को पानी (Har Khet Ko Pani) | भूमिगत व सतही जल स्रोतों का विस्तार |
| प्रति बूँद अधिक फसल (More Crop Per Drop) | ड्रिप व स्प्रिंकलर जैसी सूक्ष्म सिंचाई (Micro-Irrigation) तकनीकों को बढ़ावा |
| वाटरशेड विकास घटक (WDC-PMKSY 2.0) | वर्षा-आधारित क्षेत्रों में जलग्रहण क्षेत्र (Watershed) विकास |
1. बजट 2026-27 में WDC-PMKSY 2.0 (वाटरशेड विकास) के लिए ₹2,482 करोड़ आवंटित। 2. भारत का वर्तमान शुद्ध सिंचित क्षेत्रफल लगभग 80 मिलियन हेक्टेयर है — कुल कृषि भूमि का लगभग 50%। 3. सिंचित क्षेत्र (सकल फसली क्षेत्र में): FY16 के 49.3% से बढ़कर FY21 में 55% हुआ। 4. PM-KUSUM योजना के तहत सौर पंपों (Solar Pumps) को बढ़ावा — इससे बिना नहर तंत्र (Canal System) का विस्तार किए सिंचाई लागत घटती है।
किसान का सबसे बड़ा डर यह होता है कि मेहनत से उगाई फसल बाजार में बेचते समय उसे सही दाम नहीं मिलेगा — बिचौलिए (Middlemen) कम दाम देकर मुनाफा कमा लेते हैं। इसी समस्या को हल करने के लिए MSP और संगठित मंडी व्यवस्था बनाई गई।
A. न्यूनतम समर्थन मूल्य (Minimum Support Price — MSP)
📚 मानक परिभाषा: MSP वह न्यूनतम कीमत है, जिस पर सरकार किसानों से उनकी उपज खरीदने की गारंटी देती है, चाहे बाजार में उस समय कीमत इससे कम ही क्यों न हो। इसकी सिफारिश कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (CACP) करता है और मंजूरी आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में) देती है। ✅ सरल शब्दों में: जैसे शेयर बाजार में "फ्लोर प्राइस" होती है, उससे नीचे भाव नहीं जा सकता — वैसे ही सरकार तय कर देती है कि किसान की फसल का दाम इससे कम नहीं होगा। 💡 उदाहरण: अगर गेहूँ का MSP ₹2,585 प्रति क्विंटल तय है और बाजार में व्यापारी सिर्फ ₹2,200 दे रहे हैं, तो किसान अपनी फसल सरकारी खरीद केंद्र पर ले जाकर ₹2,585 प्रति क्विंटल के हिसाब से बेच सकता है।
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| MSP की शुरुआत | 1966-67 (हरित क्रांति के साथ, सबसे पहले गेहूँ के लिए) |
| सिफारिश करने वाली संस्था | कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (CACP), स्थापना 1965 |
| मंजूरी देने वाली संस्था | आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (CCEA), प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में |
| MSP पर फसलों की संख्या | 22-23 फसलें |
| खरीद करने वाली एजेंसियाँ | FCI, NAFED व राज्य एजेंसियाँ |
A. A2 लागत: किसान द्वारा सीधे खर्च की गई लागत — बीज, खाद, कीटनाशक, मजदूरी, पट्टे की जमीन का किराया, ईंधन व सिंचाई।
B. A2 + FL: A2 लागत + परिवार के सदस्यों की अवैतनिक मेहनत (Family Labour) का अनुमानित मूल्य।
C. C2 लागत: A2+FL में मालिकाना जमीन का किराया मूल्य व पूँजी संपत्तियों पर ब्याज भी जोड़ी जाए तो यह व्यापक "C2" लागत बनती है।
| MSP फॉर्मूला | किसने सुझाया | वर्तमान स्थिति |
|---|---|---|
| A2+FL लागत का 1.5 गुना | सरकार द्वारा वर्तमान में अपनाया गया (2018 से) | लागू |
| C2 लागत का 1.5 गुना | स्वामीनाथन आयोग (राष्ट्रीय किसान आयोग, 2006) की सिफारिश | अभी तक पूर्ण रूप से लागू नहीं — किसान संगठनों की प्रमुख माँग |
परीक्षा में सामान्य भ्रम — ध्यान दें: MSP अभी तक किसान का "कानूनी अधिकार (Legal Right)" नहीं है — यह सरकार की एक नीति है, कानून नहीं। किसान संगठन लंबे समय से MSP को कानूनी गारंटी बनाने की माँग कर रहे हैं। साथ ही, 22-23 घोषित फसलों में से केवल गेहूँ व चावल की ही मुख्य रूप से प्रभावी खरीद होती है, बाकी फसलों की MSP पर खरीद सीमित है।
1. गेहूँ (Rabi 2026-27 सीज़न): ₹2,585 — पिछले वर्ष (₹2,425) से 6.59% अधिक — अक्टूबर 2025 में मंत्रिमंडल द्वारा स्वीकृत। 2. सामान्य धान (Kharif 2025-26): ₹2,369 प्रति क्विंटल; ग्रेड-A धान: ₹2,389 प्रति क्विंटल। 3. मसूर जैसी दलहनों की MSP उत्पादन लागत से लगभग 89% अधिक रखी गई है — दलहन-तिलहन विविधीकरण को प्रोत्साहन हेतु।
B. कृषि उपज मंडी समिति (APMC) एवं e-NAM
📚 मानक परिभाषा: अप्रैल 2016 में शुरू किया गया e-NAM एक अखिल भारतीय इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग पोर्टल है, जो देशभर की कृषि मंडियों को एक साझा ऑनलाइन नेटवर्क से जोड़ता है। इसे लघु किसान कृषि व्यापार संघ (SFAC) द्वारा संचालित किया जाता है। ✅ सरल शब्दों में: जैसे OLX या Amazon पर आप देशभर के खरीदारों को अपना सामान बेच सकते हैं, ठीक वैसे ही e-NAM पर किसान अपनी फसल सिर्फ अपने गाँव की मंडी तक सीमित न रखकर देशभर के खरीदारों को दिखा व बेच सकता है। 💡 उदाहरण: अगर राजस्थान के किसी किसान की सरसों को स्थानीय मंडी में कम भाव मिल रहा हो, तो e-NAM के जरिए वह देश के किसी दूसरे राज्य के खरीदार को — जहाँ ज्यादा भाव मिल रहा हो — अपनी उपज बेच सकता है।
| e-NAM आँकड़ा | मूल्य (फरवरी 2026 तक) |
|---|---|
| जुड़ी हुई मंडियाँ | 1,656 (23 राज्य + 4 केंद्र-शासित प्रदेश) |
| पंजीकृत किसान | 1.80 करोड़ |
| पंजीकृत व्यापारी | 2.72 लाख |
| पंजीकृत FPO | 4,724 |
| कुल व्यापार मात्रा (शुरुआत से) | 13.22 करोड़ मीट्रिक टन |
| कुल व्यापार मूल्य (शुरुआत से) | लगभग ₹4.82 लाख करोड़ |
📚 मानक परिभाषा: NFSA, 2013 भारत के लगभग 75% ग्रामीण व 50% शहरी जनसंख्या (2011 जनगणना अनुसार कुल 81.35 करोड़ लोग) को लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (TPDS) के माध्यम से सस्ती दर पर खाद्यान्न उपलब्ध कराने का कानूनी अधिकार देता है। ✅ सरल शब्दों में: सरकार ने कानून बनाकर यह तय कर दिया कि देश के हर गरीब परिवार को सस्ता या मुफ्त अनाज मिलना उसका "अधिकार" है, कोई "दया" या "एहसान" नहीं। 💡 उदाहरण: अगर कोई गरीब परिवार राशन कार्ड धारक है, तो उसे हर महीने तय मात्रा में गेहूँ-चावल राशन की दुकान (Fair Price Shop) से मिलना कानूनी अधिकार है — दुकानदार मना नहीं कर सकता।
| श्रेणी | हकदारी (वर्तमान नियम) |
|---|---|
| अंत्योदय अन्न योजना (AAY) परिवार — सबसे गरीब | 35 किग्रा अनाज प्रति परिवार प्रति माह |
| प्राथमिकता वाले परिवार (Priority Households — PHH) | 5 किग्रा अनाज प्रति व्यक्ति प्रति माह |
बड़ी करेंट अफेयर्स अपडेट — राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा (संशोधन) विधेयक, 2026: जून 2026 में खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग ने NFSA में संशोधन का मसौदा (Draft) जारी किया है। प्रस्ताव: AAY परिवार में हर सदस्य को 7 किग्रा अनाज प्रति व्यक्ति प्रति माह मिलेगा, परंतु अधिकतम सीमा 35 किग्रा प्रति परिवार रहेगी। सरकार का तर्क: छोटे परिवारों को अभी बड़े परिवारों की तुलना में प्रति व्यक्ति असमान रूप से ज्यादा अनाज मिल रहा था, इसे तर्कसंगत बनाना है। आलोचना: यह संशोधन सिर्फ अनाज (Cereals) तक सीमित है, दलहन-खाद्य तेल शामिल नहीं; बड़े परिवारों को अब भी 35 किग्रा की सीमा के कारण प्रति व्यक्ति कम अनाज मिलेगा; कवरेज अब भी 2011 की जनगणना पर आधारित है।
📚 मानक परिभाषा: खाद्य प्रसंस्करण का अर्थ है कच्चे कृषि उत्पादों को प्रसंस्कृत, पैकेज्ड व उपभोग-योग्य उत्पादों में बदलना — इससे उत्पाद का मूल्य बढ़ता है, बर्बादी कम होती है व शेल्फ-लाइफ बढ़ती है। ✅ सरल शब्दों में: जैसे कच्चे टमाटर को सीधे बेचने की बजाय उसे केचप बनाकर बेचा जाए तो उसकी कीमत और बिकने की अवधि दोनों बढ़ जाती है — यही खाद्य प्रसंस्करण का फायदा है। 💡 उदाहरण: गाँव का दूध बिना प्रसंस्करण के जल्दी खराब हो सकता है, लेकिन उसी दूध को पाश्चुरीकृत करके पैकेट में बंद कर दिया जाए तो वह कई दिन चल सकता है और दूर के शहरों तक भी बेचा जा सकता है।
1. भारतीय खाद्य प्रसंस्करण बाजार 2024 में लगभग ₹30,49,800 करोड़ (लगभग $354.5 अरब) तक पहुँच गया। 2. FY26 के अंत तक यह बाजार बढ़कर लगभग ₹45,84,415 करोड़ (लगभग $535 अरब) होने की संभावना है।
कृषि सिर्फ फसल उगाने तक सीमित नहीं — पशुपालन, मत्स्य पालन व बागवानी जैसे "संबद्ध क्षेत्र (Allied Sectors)" आज कृषि की वृद्धि के सबसे बड़े इंजन बन चुके हैं, फसलों से भी ज्यादा तेज़ी से बढ़ रहे हैं।
| क्षेत्र | प्रमुख उपलब्धि |
|---|---|
| पशुधन (Livestock) | GVA में +195% वृद्धि (FY15-FY24), वार्षिक वृद्धि दर 7.1% — दूध उत्पादन में भारत विश्व में प्रथम |
| मत्स्य पालन (Fisheries) | उत्पादन में +140% वृद्धि (2014-2025), वार्षिक वृद्धि दर 8.8% — भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा मछली उत्पादक |
| बागवानी (Horticulture) | 362.08 मिलियन टन उत्पादन (2024-25) — कृषि GVA का 33% हिस्सा, खाद्यान्न उत्पादन से भी आगे |
| कुक्कुट पालन (Poultry) | अंडा उत्पादन में भारत विश्व में तीसरे स्थान पर — "रजत क्रांति" से जुड़ा क्षेत्र |
📚 मानक परिभाषा: श्री अन्न ज्वार, बाजरा, रागी, कोदो, कुटकी, कंगनी, चेना व सांवा जैसे मोटे अनाजों (Millets) को दिया गया नाम है, जिन्हें भारत सरकार पोषण-सुरक्षा व जलवायु-अनुकूल खेती के लिए बढ़ावा दे रही है। ✅ सरल शब्दों में: गेहूँ-चावल की तुलना में मोटे अनाज बहुत कम पानी में उग जाते हैं और सूखे को भी झेल सकते हैं — साथ ही इनमें आयरन, कैल्शियम व फाइबर भी अधिक होता है। इसलिए इन्हें "सुपरफूड" व जलवायु-अनुकूल फसल दोनों माना जाता है। 💡 उदाहरण: राजस्थान जैसे कम बारिश वाले राज्य में गेहूँ उगाना पानी की बहुत खपत करता है, लेकिन उसी जमीन पर बाजरा आसानी से उग जाता है — यही वजह है कि राजस्थान बाजरा उत्पादन में देश में सबसे आगे है।
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| अंतर्राष्ट्रीय मोटा अनाज वर्ष (IYoM) | 2023 — भारत की पहल पर संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित |
| भारत की वैश्विक स्थिति | विश्व का सबसे बड़ा मोटा अनाज उत्पादक (40%+ वैश्विक उत्पादन) |
| प्रमुख उत्पादक राज्य | राजस्थान, झारखंड, छत्तीसगढ़, गुजरात |
| शोध केंद्र | भारतीय मिलेट्स अनुसंधान संस्थान (IIMR), हैदराबाद — उत्कृष्टता केंद्र (Centre of Excellence) |
| संबंधित नई योजना (2025-26) | राष्ट्रीय खाद्य तेल मिशन में मोटे अनाज व तिलहन दोनों पर संयुक्त फोकस |
भारतीय कृषि ने बहुत प्रगति की है, फिर भी कई गहरी संरचनात्मक समस्याएँ बनी हुई हैं — RAS Mains में "चुनौतियाँ व समाधान" शैली के प्रश्नों के लिए यह सेक्शन बेहद उपयोगी है।
| चुनौती | समस्या का स्वरूप |
|---|---|
| जलवायु परिवर्तन | अनियमित मानसून, बाढ़-सूखा — फसल उत्पादन में अनिश्चितता |
| भूमि विखंडन | 86.2% किसानों के पास 2 हेक्टेयर से कम भूमि — पैमाने की अर्थव्यवस्था (Economies of Scale) संभव नहीं |
| कम उत्पादकता | वैश्विक औसत से कम उपज — जैसे भारत की चावल उपज ~2.8 टन/हेक्टेयर बनाम चीन की ~7.0 टन/हेक्टेयर |
| विपणन की समस्याएँ | APMC एकाधिकार, बिचौलिए व मूल्य में उतार-चढ़ाव |
| किसान ऋणग्रस्तता | अनौपचारिक ऋण का ऊँचा ब्याज — किसान संकट का बड़ा कारण |
| भंडारण की कमी | फसलोत्तर हानि लगभग 25-30% — अपर्याप्त शीत भंडारण (Cold Chain) |
| जल संकट | भूजल का अति-दोहन — पंजाब में 80% जल इकाइयाँ अति-दोहित (CGWB) |
| प्रच्छन्न बेरोजगारी | कृषि में आवश्यकता से अधिक श्रम शक्ति का जमाव |
| बढ़ती इनपुट लागत | उर्वरक, कीटनाशक व बीज की कीमतें लगातार बढ़ना |
| किसान आत्महत्या | ऋण, फसल असफलता व मूल्य पतन से जुड़ा गंभीर सामाजिक मुद्दा — NCRB के अनुसार प्रतिवर्ष 11,000 से अधिक मामले |
1. फसलोत्तर हानि (Post-Harvest Losses) से वार्षिक लगभग ₹90,000 करोड़ का नुकसान। 2. केवल 30-33% किसानों तक ही औपचारिक ऋण (Formal Credit) की पहुँच है। 3. व्यापार की शर्तें (Terms of Trade) कृषि के विरुद्ध झुकी हुई हैं — इनपुट कीमतें आउटपुट कीमतों से तेज़ी से बढ़ रही हैं। 4. IPCC के अनुमान अनुसार जलवायु परिवर्तन से 2100 तक फसल उपज में 10-25% तक गिरावट संभव।
📚 मानक परिभाषा: 24 फरवरी 2019 को शुरू की गई यह केंद्रीय क्षेत्र की योजना पात्र भूमि-धारक किसान परिवारों को सीधे बैंक खाते में ₹6,000 प्रति वर्ष की आय सहायता, तीन बराबर किस्तों (हर किस्त ₹2,000, हर 4 महीने में) में देती है। ✅ सरल शब्दों में: सरकार बिना किसी बिचौलिए के सीधे किसान के बैंक खाते में तय राशि भेज देती है — जैसे कोई सरकारी "जेब खर्च" सीधे किसान को मिलता है। 💡 उदाहरण: 22वीं किस्त मार्च 2026 में जारी हुई, जिसमें 9.32 करोड़ से अधिक किसानों को ₹18,640 करोड़ की राशि सीधे हस्तांतरित की गई।
| पात्रता व अपात्रता | विवरण |
|---|---|
| पात्र | भूमि-अभिलेखों में दर्ज सभी भूमि-धारक किसान परिवार |
| अपात्र | आयकरदाता, संस्थागत भूमि-धारक, तथा सरकारी/PSU कर्मचारी |
| e-KYC अनिवार्यता | 2022 से सभी लाभार्थियों के लिए अनिवार्य |
1. 22वीं किस्त (मार्च 2026): ₹18,640 करोड़, 9.32 करोड़+ किसान लाभान्वित। 2. योजना शुरू होने के बाद से अब तक कुल ₹4.09 लाख करोड़ से अधिक राशि लगभग 11-12 करोड़ किसान परिवारों को वितरित की जा चुकी है। 3. बजट 2026-27 में PM-KISAN के लिए ₹63,500 करोड़ का आवंटन (पिछले वर्षों के समान स्तर पर स्थिर)।
| योजना/घोषणा | विवरण |
|---|---|
| भारत-विस्तार (Bharat-VISTAAR) | AgriStack, ICAR व AI प्रणालियों को जोड़ने वाला बहुभाषी AI आधारित कृषि सलाहकार मंच — फसल योजना, मौसम अपडेट व बाजार भाव क्षेत्रीय भाषाओं में |
| नमो ड्रोन दीदी (Namo Drone Didi) | स्वयं सहायता समूह की महिलाओं को ड्रोन देकर फसल छिड़काव व सर्वेक्षण हेतु प्रशिक्षित करना |
| नैनो-DAP का विस्तार | सभी कृषि-जलवायु क्षेत्रों (Agro-Climatic Zones) में नैनो उर्वरक का प्रसार |
| नारियल संवर्धन योजना | अनुत्पादक नारियल के पेड़ों को बदलकर उत्पादकता बढ़ाना |
| चंदन संरक्षण कार्यक्रम | भारतीय चंदन (Sandalwood) पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली |
| झींगा ब्रूडस्टॉक कार्यक्रम | NABARD वित्त-पोषण से न्यूक्लियस ब्रीडिंग केंद्रों की स्थापना |
| SHE Marts | स्वयं सहायता समूह आधारित महिला उद्यमिता केंद्र — "लखपति दीदी" कार्यक्रम का विस्तार |
| PM धन-धान्य कृषि योजना | कम उत्पादकता वाले 100 जिलों को कवर करने वाला विशेष कार्यक्रम |
| राष्ट्रीय सहकारिता नीति | सहकारिता क्षेत्र के व्यवस्थित विकास हेतु नई नीति |
बजट 2026-27 — कृषि मंत्रालय आवंटन: कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय को कुल ₹1.40 लाख करोड़ का आवंटन (2025-26 के ₹1.37 लाख करोड़ से 2.19% अधिक) — 2013-14 में यह आवंटन मात्र ₹21,933 करोड़ था, यानी एक दशक से अधिक में लगभग 6 गुना वृद्धि। हालाँकि कुल केंद्रीय बजट में कृषि मंत्रालय की हिस्सेदारी 2022-23 के 3.3% से घटकर 2026-27 में 2.6% रह गई है।
ग्रामीण रोजगार में बड़ा बदलाव — VB-GRAMG: बजट 2026-27 में 20 वर्ष पुरानी मनरेगा (MGNREGA) की जगह "विकसित भारत-गारंटी फॉर रोजगार एवं आजीविका मिशन (ग्रामीण) — VB-GRAMG" नामक नई योजना लागू की गई है, जिसे ₹95,692 करोड़ (ग्रामीण विकास मंत्रालय के बजट का लगभग 49%) आवंटित हुआ है। इसमें वार्षिक गारंटीशुदा रोजगार 100 दिन से बढ़ाकर 125 दिन किया गया है, और केंद्र-राज्य लागत-साझेदारी अनुपात 60:40 (हिमालयी/पूर्वोत्तर राज्यों के लिए 90:10) रखा गया है। पुरानी मनरेगा योजना का आवंटन 2025-26 के ₹86,000 करोड़ से घटाकर 2026-27 में केवल ₹30,000 करोड़ कर दिया गया है, क्योंकि परिवर्तन चरणबद्ध (Phased) तरीके से हो रहा है। यह ग्रामीण आजीविका व कृषि-श्रम बाजार दोनों के लिए बड़ा प्रभाव डालेगा।
1. राजस्थान बाजरा (Pearl Millet), सरसों (Mustard), मूंग, ग्वार (Guar) व जौ के उत्पादन में देश में प्रथम स्थान पर है। 2. ग्वार: विश्व के कुल ग्वार उत्पादन का लगभग 70-80% अकेला राजस्थान उत्पादित करता है। 3. सरसों (Rapeseed-Mustard): राजस्थान की रबी सीज़न की सबसे महत्वपूर्ण तिलहन फसल है, राज्य देश में इसके उत्पादन में शीर्ष पर है। 4. श्री अन्न (Millets) अभियान में राजस्थान देश के अग्रणी उत्पादक राज्यों में से एक है — बाजरा उत्पादन में सबसे आगे। 5. राजस्थान की GSVA में कृषि क्षेत्र का योगदान लगभग 25.74% है (आर्थिक समीक्षा 2025-26, चालू मूल्य)। 6. राजस्थान काश्तकारी अधिनियम, 1955 राज्य में भूमि सुधार व काश्तकारी अधिकारों का मुख्य आधार है।
1. हरित क्रांति भारत में 1965-66 में शुरू हुई, पंजाब पहला प्रयोग-स्थल था। 📌 Pre 2. "Green Revolution" शब्द विलियम एस. गॉड ने 1968 में गढ़ा; डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन भारत में इसके जनक माने जाते हैं। 📌 Pre 3. नॉर्मन बोरलॉग को 1970 में नोबेल शांति पुरस्कार मिला — मैक्सिको में HYV गेहूँ विकसित करने के लिए। 📌 Pre 4. 2024-25 में भारत का खाद्यान्न उत्पादन रिकॉर्ड 357.7 मिलियन टन (3,577.3 LMT) रहा। 📌 Pre 5. बागवानी उत्पादन (362.08 मिलियन टन) अब कृषि GVA का 33% है — खाद्यान्न से भी आगे निकल चुका है। 📌 Pre 6. कृषि GVA वृद्धि: FY25 में 4.6%, FY26 (अग्रिम अनुमान) में 3.1%, दशकीय औसत (FY16-25) 4.45% — 1975 के बाद सर्वाधिक। 📌 Pre / 📝 10M 7. जमींदारी उन्मूलन से लगभग 1.9 करोड़ काश्तकारों को भूमि अधिकार मिला। 📌 Pre 8. राजस्थान काश्तकारी अधिनियम 14 मार्च 1955 को पारित हुआ — "खातेदार काश्तकार" इसकी मुख्य श्रेणी है। 📌 Pre / 📝 5M 9. AMUL की स्थापना 1946 में हुई; ऑपरेशन फ्लड (1970-96) डॉ. वर्गीज कुरियन के नेतृत्व में चला — उन्हें "मिल्कमैन ऑफ इंडिया" कहा जाता है। 📌 Pre 10. NABARD अधिनियम 1981 के तहत, 12 जुलाई 1982 को स्थापित हुआ — यह कृषि व ग्रामीण विकास की शीर्ष वित्तीय संस्था है। 📌 Pre 11. किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) 1998 में शुरू हुआ — ₹3 लाख तक 7% ब्याज, समय पर भुगतान पर प्रभावी दर 4%। 📌 Pre 12. MSP की सिफारिश CACP करता है, मंजूरी प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली CCEA देती है। 📌 Pre / 📝 10M 13. स्वामीनाथन आयोग (2006) ने MSP को C2 लागत का 1.5 गुना रखने की सिफारिश की — सरकार वर्तमान में A2+FL का 1.5 गुना अपनाती है। 📌 Pre / 📝 10M 14. गेहूँ का MSP 2026-27 के लिए ₹2,585/क्विंटल है — पिछले वर्ष से 6.59% अधिक। 📌 Pre 15. e-NAM अप्रैल 2016 में SFAC द्वारा शुरू हुआ, फरवरी 2026 तक 1,656 मंडियाँ व 1.80 करोड़ किसान इससे जुड़े। 📌 Pre 16. NFSA 2013, 75% ग्रामीण व 50% शहरी जनसंख्या (81.35 करोड़ लोग) को कवर करता है। 📌 Pre / 📝 5M 17. PMGKAY जनवरी 2023 से NFSA में मिला दी गई, मुफ्त अनाज योजना दिसंबर 2028 तक बढ़ाई गई। 📌 Pre / 📝 10M 18. जून 2026 में NFSA संशोधन विधेयक का मसौदा जारी — AAY को अब 7 किग्रा/व्यक्ति/माह (अधिकतम 35 किग्रा/परिवार) मिलने का प्रस्ताव। 📌 Pre / 📝 10M 19. PM-KISAN के तहत ₹6,000/वर्ष, 3 किस्तों में मिलते हैं — 22वीं किस्त मार्च 2026 में जारी हुई (₹18,640 करोड़, 9.32 करोड़ किसान)। 📌 Pre / 📝 5M 20. PMFBY का बजट आवंटन लगातार घट रहा है — 2024-25 के ₹15,864 करोड़ से 2026-27 में ₹12,200 करोड़ (8 वर्षों में सबसे कम)। 📌 Pre 21. 2023 अंतर्राष्ट्रीय मोटा अनाज वर्ष (IYoM) भारत की पहल पर मनाया गया — भारत विश्व का 40%+ मोटा अनाज उत्पादन करता है। 📌 Pre 22. बजट 2026-27 में मनरेगा (MGNREGA) की जगह VB-GRAMG योजना लाई गई — ₹95,692 करोड़ आवंटन, 100 से बढ़ाकर 125 दिन गारंटीशुदा रोजगार। 📌 Pre / 📝 10M 23. FPO में आयकर छूट प्रारंभिक वर्षों तक मिलती है; लक्ष्य 10,000 FPO बनाने का है। 📌 Pre 24. राजस्थान बाजरा, सरसों, मूंग व ग्वार उत्पादन में देश में प्रथम स्थान पर है (ग्वार में विश्व का 70-80%)। 📌 Pre
Q1. हरित क्रांति क्या है? इसके सकारात्मक व नकारात्मक प्रभाव बताइए। (10 अंक) Q2. भारत में हुई विभिन्न कृषि-क्रांतियों (श्वेत, नीली, पीली) का संक्षिप्त विवरण दीजिए। (5 अंक) Q3. भूमि सुधार के प्रमुख घटकों का वर्णन कीजिए। राजस्थान काश्तकारी अधिनियम 1955 का संक्षिप्त परिचय दीजिए। (10 अंक) Q4. किसान उत्पादक संगठन (FPO) किस प्रकार छोटे किसानों की मदद करते हैं? (5 अंक) Q5. न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की गणना कैसे की जाती है? स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश क्या थी? (10 अंक) Q6. राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 की मुख्य विशेषताएँ बताइए। 2026 के प्रस्तावित संशोधन का उल्लेख कीजिए। (10 अंक) Q7. भारतीय कृषि की प्रमुख चुनौतियाँ क्या हैं? (5 अंक) Q8. श्री अन्न (Millets) अभियान भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है? (5 अंक) Q9. e-NAM किस प्रकार किसानों को बेहतर मूल्य दिलाने में मदद करता है? (Pre MCQ) Q10. VB-GRAMG योजना, मनरेगा से किस प्रकार भिन्न है? (10 अंक)
| वर्ष | घटना / नीति | महत्व |
|---|---|---|
| 1904 | सहकारी समिति अधिनियम | भारत में कृषि सहकारिता की शुरुआत |
| 1946 | AMUL की स्थापना | श्वेत क्रांति की नींव |
| 1955 | राजस्थान काश्तकारी अधिनियम | राज्य में भूमि सुधार व काश्तकार अधिकारों की नींव |
| 1965 | CACP व FCI की स्थापना | MSP सिफारिश व खरीद तंत्र की नींव |
| 1965-66 | हरित क्रांति की शुरुआत (पंजाब) | खाद्यान्न आत्मनिर्भरता की दिशा में पहला कदम |
| 1970-96 | ऑपरेशन फ्लड (श्वेत क्रांति) | भारत विश्व का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक बना |
| 1982 | NABARD की स्थापना | कृषि व ग्रामीण वित्त की शीर्ष संस्था |
| 1998 | किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) शुरू | औपचारिक कृषि ऋण तक पहुँच बढ़ी |
| 2006 | स्वामीनाथन आयोग (राष्ट्रीय किसान आयोग) | MSP को C2 लागत का 1.5 गुना करने की सिफारिश |
| 2013 | राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA) | खाद्यान्न को कानूनी अधिकार का दर्जा |
| 2015 | PMKSY (सिंचाई योजना) शुरू | "हर खेत को पानी" अभियान |
| 2016 | PMFBY, e-NAM व FPO मिशन शुरू | फसल बीमा, डिजिटल मंडी व किसान संगठनों की शुरुआत |
| 2019 | PM-KISAN योजना शुरू | किसानों को सीधी आय सहायता |
| 2020 | SVAMITVA योजना व कृषि अवसंरचना निधि | ग्रामीण भूमि रिकॉर्ड डिजिटलीकरण व फसलोत्तर अवसंरचना वित्त |
| 2023 | अंतर्राष्ट्रीय मोटा अनाज वर्ष (IYoM) | श्री अन्न अभियान को वैश्विक मान्यता |
| जून 2026 | NFSA संशोधन विधेयक का मसौदा जारी | AAY हकदारी परिवार-आकार आधारित करने का प्रस्ताव |