📖 अध्याय 19/20 — आधुनिक भारत का इतिहास

आधुनिक भारत में विज्ञान और प्रौद्योगिकी

औपनिवेशिक विज्ञान और सर्वेक्षण, वैज्ञानिक संस्थाएँ, भारतीय वैज्ञानिक पुनर्जागरण (बसु, राय, रामानुजन, रमन, साहा, बोस), स्वतंत्र भारत की विज्ञान नीति, परमाणु ऊर्जा, अंतरिक्ष कार्यक्रम, रक्षा अनुसंधान, कृषि-स्वास्थ्य-जैव प्रौद्योगिकी, सूचना प्रौद्योगिकी और प्रमुख वैज्ञानिक

🚲 कहानी से शुरुआत: साइकिल पर रॉकेट

थुम्बा, केरल — 1962–63। तिरुवनंतपुरम के पास समुद्र-किनारे का यह मछुआरों का गाँव पृथ्वी की चुंबकीय भूमध्य रेखा के बहुत पास है, इसलिए ऊपरी वायुमंडल के अध्ययन के लिए सबसे उपयुक्त था। पर वैज्ञानिकों के पास न इमारतें थीं, न ज़मीन। तब वहाँ के बिशप और मछुआरों ने अपना चर्च और ज़मीन विज्ञान के लिए दे दी। चर्च प्रयोगशाला बन गया और बिशप का घर वैज्ञानिकों का दफ़्तर।

21 नवंबर 1963 की शाम वहीं से भारत की धरती का पहला रॉकेट छोड़ा गया। वह अमेरिका में बना एक छोटा साउंडिंग रॉकेट था, और उसके पुर्ज़े साइकिल पर लादकर प्रक्षेपण स्थल तक पहुँचाए गए थे। इस टीम का नेतृत्व विक्रम साराभाई कर रहे थे और उसमें एक युवा इंजीनियर भी था — ए. पी. जे. अब्दुल कलाम। रॉकेट आसमान में गया और भारत के अंतरिक्ष युग की शुरुआत हो गई।

साधन आगे भी कम ही रहे। 1981 में जब भारत का पहला प्रायोगिक संचार उपग्रह एप्पल परीक्षण के दौर में था, तब उसे बैलगाड़ी पर रखा गया — और वह तस्वीर आज भी भारतीय विज्ञान की सादगी का प्रतीक है।

फिर आई असली रुकावट। भारी संचार उपग्रहों को ऊँची कक्षा में पहुँचाने के लिए क्रायोजेनिक इंजन चाहिए था, पर 1990 के दशक में दबाव के चलते वह तकनीक देने से मना कर दिया गया। भारतीय वैज्ञानिकों ने हार नहीं मानी और लगभग दो दशक की मेहनत से स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन बना लिया, जिसकी सफल उड़ान 2014 में हुई।

इसी भरोसे के साथ भारत आगे बढ़ा। 23 अगस्त 2023 को चंद्रयान-3 चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास उतरा — उस क्षेत्र में पहले कोई देश नहीं उतरा था। जो देश कभी साइकिल पर रॉकेट ढोता था, वह चंद्रमा पर पहुँच गया।

यह यात्रा कैसे संभव हुई? औपनिवेशिक सर्वेक्षणों से लेकर चंद्रमा तक विज्ञान की नींव किसने रखी? पराधीनता और कम साधनों के बीच विश्वस्तरीय विज्ञान किन लोगों ने खड़ा किया? यही इस अध्याय की कहानी है। आगे दो कहानियाँ भी मिलेंगी, जो रमन प्रभाव की खोज और क्रायोजेनिक इंजन की चुनौती को आसान तरीक़े से समझा देंगी।

📑 इस अध्याय में क्या-क्या पढ़ेंगे

01. भूमिका: औपनिवेशिक विज्ञान और राष्ट्रवाद

02. औपनिवेशिक काल की वैज्ञानिक संस्थाएँ — हर संस्था विस्तार से

03. भारतीय वैज्ञानिक पुनर्जागरण (1880–1947) — ग्यारह वैज्ञानिक

04. स्वतंत्र भारत की विज्ञान नीतियाँ और संस्थाएँ

05. परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम — त्रि-चरणीय योजना और पोखरण

06. अंतरिक्ष कार्यक्रम — प्रक्षेपण यान और प्रमुख मिशन

07. रक्षा अनुसंधान और मिसाइल कार्यक्रम

08. कृषि, स्वास्थ्य और जैव प्रौद्योगिकी

09. सूचना प्रौद्योगिकी और संचार क्रांति

10. स्वतंत्र भारत के प्रमुख वैज्ञानिक

11. वैज्ञानिक केंद्रों का मानचित्र और राष्ट्रीय दिवस

12. मूल्यांकन, कालक्रम और सार

1. भूमिका: औपनिवेशिक विज्ञान और राष्ट्रवाद

भारत में विज्ञान की परंपरा बहुत पुरानी है — आर्यभट, वराहमिहिर, ब्रह्मगुप्त, भास्कराचार्य, चरक और सुश्रुत के नाम इसके प्रमाण हैं। पर आधुनिक, प्रयोग पर आधारित पश्चिमी विज्ञान भारत में मुख्यतः अंग्रेज़ी शासन के साथ आया। अंग्रेज़ों ने विज्ञान को बढ़ावा अवश्य दिया, पर उनका मुख्य उद्देश्य भारत की जनता का कल्याण नहीं, बल्कि साम्राज्य की ज़रूरतें पूरी करना था। इसलिए इस काल के विज्ञान को इतिहासकार "औपनिवेशिक विज्ञान" कहते हैं।

1.1 औपनिवेशिक विज्ञान की विशेषताएँ

◆ सर्वेक्षण पर ज़ोर — किसी देश पर शासन करने के लिए पहले उसे "जानना" पड़ता है। इसलिए अंग्रेज़ों ने सबसे पहले भूमि, पहाड़, नदियों, चट्टानों, खनिजों, पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों और मौसम के बड़े-बड़े सर्वेक्षण कराए। भारतीय सर्वेक्षण विभाग, भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण, वनस्पति सर्वेक्षण और प्राणी सर्वेक्षण इसी सोच से बने।

◆ साम्राज्य के आर्थिक और सैनिक हित — नक्शे सेना की आवाजाही और भू-राजस्व वसूली के लिए ज़रूरी थे। कोयले की खोज रेलगाड़ियों और भाप के जहाज़ों के लिए की गई। वनस्पति विज्ञान का उपयोग नील, चाय, कपास और अफ़ीम जैसी नक़दी फ़सलें उगाने में हुआ। उदाहरण के लिए, मलेरिया की दवा कुनैन बनाने वाला सिनकोना का पेड़ दक्षिण अमेरिका से लाकर 1860 के दशक में नीलगिरि और दार्जिलिंग की पहाड़ियों में लगाया गया — ताकि भारत में तैनात अंग्रेज़ सैनिक और अधिकारी मलेरिया से बच सकें।

◆ भारत एक "प्रयोगशाला" और "आँकड़ों की खान" — भारत से इकट्ठा किए गए पौधे, चट्टानें और आँकड़े लंदन भेजे जाते थे, जहाँ उन पर शोध होता और पुस्तकें छपतीं। इस तरह भारत ज्ञान का "कच्चा माल" देने वाला देश बन गया और उस ज्ञान से बने सिद्धांतों का श्रेय यूरोप को मिला।

◆ भारतीयों के साथ भेदभाव — सरकारी वैज्ञानिक विभागों के ऊँचे पद लगभग पूरी तरह यूरोपीय लोगों के लिए आरक्षित थे। भारतीय वैज्ञानिक को उसी काम के लिए कम वेतन मिलता था। जगदीश चंद्र बसु को प्रेसिडेंसी कॉलेज में अंग्रेज़ प्राध्यापकों से कम वेतन दिया गया, तो उन्होंने विरोध में तीन वर्ष तक वेतन लेने से इनकार कर दिया; अंत में सरकार को झुककर उन्हें पूरा वेतन पिछली तिथि से देना पड़ा।

◆ तकनीकी शिक्षा की उपेक्षा — अंग्रेज़ों को भारत में केवल छोटे स्तर के तकनीकी कर्मचारी (ओवरसियर, सर्वेयर, ड्राफ़्ट्समैन) चाहिए थे, बड़े इंजीनियर और वैज्ञानिक नहीं। इसलिए उच्च तकनीकी शिक्षा बहुत धीरे फैली। रुड़की का थॉमसन कॉलेज (1847) प्रायः देश का पहला इंजीनियरिंग कॉलेज माना जाता है, जो गंगा नहर के निर्माण के लिए कर्मचारी तैयार करने हेतु खोला गया था।

1.2 राष्ट्रवादियों की दृष्टि: विज्ञान आत्मनिर्भरता का साधन

उन्नीसवीं सदी के अंत तक शिक्षित भारतीय समझ गए कि यूरोप की ताक़त का रहस्य उसका विज्ञान और उद्योग है। इसलिए राष्ट्रवादियों ने विज्ञान को राष्ट्रीय पुनर्जागरण और आर्थिक आत्मनिर्भरता का साधन माना। उनके प्रयास इस प्रकार थे:

◆ भारतीयों की अपनी संस्था — कलकत्ता के चिकित्सक डॉ. महेंद्रलाल सरकार ने 1876 में "इंडियन एसोसिएशन फ़ॉर द कल्टिवेशन ऑफ़ साइंस" बनाई, ताकि भारतीय स्वयं, बिना सरकारी सहायता के, मौलिक शोध कर सकें (खंड 2.8)।

◆ उद्योगपतियों का योगदान — जमशेदजी टाटा ने अपनी संपत्ति का बड़ा भाग देकर उच्च विज्ञान शिक्षा के लिए संस्थान की योजना बनाई, जो भारतीय विज्ञान संस्थान, बंगलौर (1909) के रूप में साकार हुई।

◆ स्वदेशी आंदोलन और तकनीकी शिक्षा — बंगाल विभाजन (1905) के विरुद्ध स्वदेशी आंदोलन में राष्ट्रीय शिक्षा परिषद (1906) बनी और उसके अंतर्गत बंगाल तकनीकी संस्थान खुला, जो आगे चलकर जादवपुर विश्वविद्यालय बना। प्रफुल्ल चंद्र राय की बंगाल केमिकल्स ने दिखाया कि भारतीय स्वयं दवा और रसायन उद्योग चला सकते हैं।

◆ योजना और विज्ञान — 1938 में कांग्रेस ने जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में राष्ट्रीय योजना समिति बनाई, जिसमें मेघनाद साहा जैसे वैज्ञानिक शामिल थे। साहा ने 1935 में "साइंस एंड कल्चर" पत्रिका निकालकर तर्क दिया कि स्वतंत्र भारत का विकास बड़े उद्योगों, बिजली और वैज्ञानिक योजना से ही होगा।

◆ गांधी और नेहरू — दो दृष्टियाँ — गांधीजी बड़ी मशीनों के अंधे प्रयोग के आलोचक थे, क्योंकि उनसे बेरोज़गारी और शोषण बढ़ता है; वे गाँव-आधारित, छोटे पैमाने की तकनीक चाहते थे। नेहरू मानते थे कि भूख और ग़रीबी का उत्तर आधुनिक विज्ञान और बड़े उद्योग हैं। स्वतंत्र भारत की नीति पर नेहरू की दृष्टि का प्रभाव अधिक पड़ा, पर गांधीजी की "उचित तकनीक" की सोच भी खादी-ग्रामोद्योग जैसे कार्यक्रमों में बनी रही।

🔍 आसान परिभाषा: वैज्ञानिक दृष्टिकोण

📘 परिभाषा: किसी भी बात को आँख मूँदकर मानने के बजाय प्रमाण, प्रयोग और तर्क के आधार पर परखने की सोच। नेहरू ने अपनी पुस्तक "भारत की खोज" (डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया) में इसे "साइंटिफ़िक टेंपर" कहा।

💡 आसान भाषा में: यानी "क्यों?" और "कैसे?" पूछने की आदत, और जो बात जाँच में सही निकले उसी को मानना। 🏠 उदाहरण: कोई कहे कि ग्रहण के समय खाना खाने से रोग होता है, तो वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाला व्यक्ति पूछेगा — इसका प्रमाण क्या है? संविधान का अनुच्छेद 51क (ज) इसी दृष्टिकोण के विकास को नागरिकों का मौलिक कर्तव्य बताता है।

नीचे की तालिका दोनों दृष्टियों को आमने-सामने रखकर दोहराती है — पहले ऊपर का विस्तार पढ़ें, फिर तालिका से याद पक्का करें।

🇬🇧 औपनिवेशिक विज्ञान

✔ इसका मुख्य उद्देश्य राजस्व, कच्चा माल और सैनिक नियंत्रण था।

✔ इसमें सर्वेक्षणों पर ज़ोर था और मौलिक शोध कम था।

✔ ऊँचे पद यूरोपीय लोगों के लिए थे और भारतीयों को कम वेतन मिलता था।

✔ तकनीकी शिक्षा केवल छोटे कर्मचारी तैयार करने तक सीमित रही।

🇮🇳 राष्ट्रवादी विज्ञान

✔ इसका उद्देश्य आत्मनिर्भरता, उद्योग और राष्ट्रीय सम्मान था।

✔ भारतीयों ने अपनी संस्थाएँ बनाईं, जैसे महेंद्रलाल सरकार की संस्था (1876)।

✔ स्वदेशी आंदोलन ने तकनीकी शिक्षा और देशी उद्योग को बढ़ाया।

✔ राष्ट्रीय योजना समिति (1938) ने विज्ञान को विकास-योजना से जोड़ा।

2. औपनिवेशिक काल की वैज्ञानिक संस्थाएँ

नीचे के कालक्रम-चार्ट में 1767 से 1945 तक की सोलह प्रमुख संस्थाएँ एक नज़र में दी गई हैं। चार्ट केवल याद रखने के लिए है। इसके बाद हर संस्था को अलग से समझाया गया है — वह क्यों बनी, किसने बनाई, वह क्या काम करती थी और आज उसका क्या रूप है।

चित्र 19.1: औपनिवेशिक काल की प्रमुख वैज्ञानिक संस्थाएँ (1767–1945)
चित्र 19.1: औपनिवेशिक काल की प्रमुख वैज्ञानिक संस्थाएँ (1767–1945)

2.1 भारतीय सर्वेक्षण विभाग (1767)

◆ क्यों बना — 1765 में बंगाल की दीवानी (राजस्व वसूली का अधिकार) मिलने के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी को यह जानना था कि उसके पास कितनी ज़मीन है, गाँव कहाँ हैं और नदियाँ-रास्ते किधर जाते हैं। बिना नक्शे के न राजस्व ठीक से वसूला जा सकता था, न सेना भेजी जा सकती थी।

◆ किसने — 1767 में जेम्स रेनेल को बंगाल का पहला सर्वेयर जनरल बनाया गया। इसी वर्ष को भारतीय सर्वेक्षण विभाग का स्थापना-वर्ष माना जाता है। रेनेल ने "बंगाल एटलस" और 1782 में "हिंदुस्तान का नक्शा" तैयार किया, इसलिए उन्हें भारतीय मानचित्रण का अग्रदूत कहा जाता है।

◆ काम और आज का रूप — यह विभाग देश के आधिकारिक नक्शे (स्थलाकृतिक मानचित्र या "टोपोशीट") बनाता है। इसका मुख्यालय आज देहरादून में है और यह भारत का सबसे पुराना वैज्ञानिक विभाग माना जाता है।

2.2 एशियाटिक सोसाइटी, कलकत्ता (1784)

◆ किसने और कब — कलकत्ता के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश और भाषाविद सर विलियम जोन्स ने 15 जनवरी 1784 को इसकी स्थापना की। गवर्नर-जनरल वॉरेन हेस्टिंग्स इसके संरक्षक थे।

◆ क्यों — अंग्रेज़ शासकों को लगा कि भारत पर अच्छा शासन करने के लिए उसकी भाषाओं, क़ानूनों, इतिहास और प्रकृति को समझना ज़रूरी है। इसलिए इस संस्था का उद्देश्य "एशिया के मनुष्य और प्रकृति" — दोनों का अध्ययन था।

◆ काम — सोसाइटी ने "एशियाटिक रिसर्चेज़" नाम की शोध-पत्रिका निकाली। जोन्स ने 1786 में बताया कि संस्कृत, यूनानी और लैटिन भाषाएँ एक ही मूल से निकली हैं — यह तुलनात्मक भाषा-विज्ञान की नींव बनी। जोन्स ने कालिदास के "अभिज्ञानशाकुंतलम्" का अंग्रेज़ी अनुवाद (1789) भी किया। सोसाइटी ने प्राचीन पांडुलिपियाँ, सिक्के और अभिलेख इकट्ठे किए; इसी से जुड़े जेम्स प्रिंसेप ने 1837 में ब्राह्मी लिपि पढ़कर अशोक के अभिलेखों का रहस्य खोला।

◆ महत्त्व — इसे भारत में प्राच्य अध्ययन (भारत विद्या) और आधुनिक शोध-परंपरा की शुरुआत माना जाता है। 1814 में इसके संग्रह से भारतीय संग्रहालय, कलकत्ता की शुरुआत हुई। आज यह "एशियाटिक सोसाइटी, कोलकाता" के नाम से राष्ट्रीय महत्त्व की संस्था है।

2.3 मद्रास वेधशाला (1792)

◆ क्यों — समुद्री जहाज़ों को रास्ता खोजने के लिए सही समय और देशांतर जानना ज़रूरी था, और यह तारों के सटीक अवलोकन से ही संभव था। इसलिए ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1792 में मद्रास में वेधशाला को अपने अधीन लेकर चलाया; इसकी शुरुआत एक अंग्रेज़ अधिकारी की निजी वेधशाला से हुई थी।

◆ काम और आगे का विकास — यहाँ से तारों की सूचियाँ बनीं और भारत के देशांतर तय करने में सहायता मिली। आगे चलकर सूर्य के अध्ययन के लिए वेधशाला का मुख्य कार्य तमिलनाडु की पहाड़ियों में कोडाईकनाल (1899) ले जाया गया, जहाँ सूर्य के धब्बों पर महत्त्वपूर्ण खोजें हुईं।

2.4 महान त्रिकोणमितीय सर्वेक्षण (1802)

🔍 आसान परिभाषा: त्रिकोणमितीय सर्वेक्षण

📘 परिभाषा: भूमि पर बड़े-बड़े काल्पनिक त्रिभुजों की शृंखला बनाकर, एक आधार-रेखा की लंबाई नापकर और त्रिभुजों के कोण थियोडोलाइट यंत्र से मापकर, दूर-दूर के बिंदुओं की सटीक दूरी और ऊँचाई गणित (त्रिकोणमिति) से निकालने की विधि।

💡 आसान भाषा में: यानी हर जगह फ़ीता लेकर नापने की ज़रूरत नहीं — एक भुजा और कोण पता हों तो बाक़ी दूरी गणित बता देता है। 🏠 उदाहरण: आप नदी के एक किनारे खड़े हैं और सामने के पेड़ की दूरी जानना चाहते हैं। अपने किनारे पर 100 मीटर की रेखा नापकर उसके दोनों सिरों से पेड़ का कोण माप लें — पेड़ की दूरी निकल आएगी, नदी पार किए बिना।

◆ किसने और कब — पैदल सेना के अधिकारी विलियम लैम्बटन ने 10 अप्रैल 1802 को मद्रास के पास आधार-रेखा नापकर यह सर्वेक्षण शुरू किया। उनके बाद जॉर्ज एवरेस्ट (सर्वेयर जनरल 1830–1843) ने इसे आगे बढ़ाया।

◆ काम — इसका सबसे बड़ा काम "महान चाप" (ग्रेट आर्क) था — लगभग 78° पूर्वी देशांतर के साथ-साथ कन्याकुमारी से हिमालय की तलहटी तक त्रिभुजों की शृंखला। इससे पृथ्वी के आकार (गोलाई) का सटीक माप मिला। इसके थियोडोलाइट इतने भारी थे कि उन्हें ढोने के लिए दर्जनों मज़दूर लगते थे और ऊँची मीनारें बनानी पड़ती थीं।

◆ राधानाथ सिकदर और सबसे ऊँची चोटी — बंगाल के गणितज्ञ राधानाथ सिकदर इस सर्वेक्षण में "मुख्य गणक" थे। 1852 में उन्होंने गणना करके पाया कि हिमालय की "चोटी 15" (पीक XV) विश्व की सबसे ऊँची चोटी है (लगभग 29,000 फ़ुट)। 1856 में इसकी घोषणा हुई और 1865 में पूर्व सर्वेयर जनरल के नाम पर इसका नाम "माउंट एवरेस्ट" रखा गया। नेपाली में इसे सागरमाथा और तिब्बती में चोमोलुंगमा कहते हैं।

◆ एक रोचक उदाहरण — पंडित नैन सिंह — तिब्बत में अंग्रेज़ों का प्रवेश वर्जित था, इसलिए सर्वेक्षण विभाग ने भारतीय "पंडितों" को वेश बदलकर भेजा। कुमाऊँ के नैन सिंह रावत ने 1860 के दशक में तीर्थयात्री बनकर तिब्बत की यात्रा की; वे सौ मनकों की माला से अपने क़दम गिनते थे और हर सौ क़दम पर एक मनका खिसकाते थे। इसी से उन्होंने ल्हासा की सही स्थिति और रास्तों की दूरियाँ पता कीं।

2.5 थॉमसन इंजीनियरिंग कॉलेज, रुड़की (1847)

◆ क्यों — उत्तर भारत में गंगा नहर (1842–1854) जैसी बड़ी सिंचाई योजना बन रही थी, जिसके लिए प्रशिक्षित इंजीनियरों और सर्वेयरों की ज़रूरत थी। पश्चिमोत्तर प्रांत के लेफ़्टिनेंट गवर्नर जेम्स थॉमसन की पहल पर 1847 में रुड़की में यह कॉलेज खुला।

◆ महत्त्व और आज — इसे प्रायः भारत का पहला इंजीनियरिंग कॉलेज माना जाता है। 1949 में यह रुड़की विश्वविद्यालय बना और 2001 में आई.आई.टी. रुड़की में बदल गया। इसी दौर में पूना, मद्रास (गिंडी) और कलकत्ता (शिवपुर) में भी इंजीनियरिंग शिक्षा के केंद्र खुले।

2.6 भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (1851)

◆ क्यों — 1850 के दशक में भारत में रेलवे की शुरुआत हो रही थी (पहली यात्री रेल 1853) और भाप के इंजनों के लिए भारी मात्रा में कोयला चाहिए था। इसलिए कोयले और अन्य खनिजों की खोज के लिए 1851 में यह विभाग बना।

◆ किसने — आयरलैंड के भूविज्ञानी थॉमस ओल्डहैम इसके पहले प्रमुख बने। आरंभिक काम दामोदर घाटी (रानीगंज) के कोयला क्षेत्रों पर केंद्रित था।

◆ भारतीय योगदान का उदाहरण — प्रमथनाथ बोस इस विभाग में ऊँचे पद पर पहुँचने वाले आरंभिक भारतीय भूविज्ञानियों में थे। उन्होंने मयूरभंज (ओडिशा) में लौह-अयस्क के बड़े भंडार का पता लगाया और 1904 में जमशेदजी टाटा के पुत्रों को इसकी सूचना दी। इसी खोज के आधार पर जमशेदपुर में टाटा इस्पात कारख़ाना (1907) लगा — यानी भूविज्ञान ने भारतीय उद्योग की नींव रखी।

◆ आज — इसका मुख्यालय कोलकाता में है और यह खनिज-सर्वेक्षण, भूकंप-अध्ययन और भूस्खलन-मानचित्रण जैसे काम करता है।

2.7 भारत मौसम विज्ञान विभाग (1875)

◆ क्यों — 1864 में कलकत्ता में आए भयंकर चक्रवात और 1866 (ओडिशा) तथा बाद के अकालों ने दिखाया कि मौसम और मानसून की पूर्व सूचना कितनी ज़रूरी है। भारत की खेती पूरी तरह मानसून पर निर्भर थी, इसलिए वर्षा का अनुमान राजस्व और अकाल-प्रबंधन दोनों के लिए ज़रूरी था।

◆ किसने और क्या काम — 1875 में विभाग बना और हेनरी ब्लैनफ़र्ड इसके पहले प्रमुख ("मौसम संवाददाता") बने। उन्होंने हिमालय की बर्फ़ और मानसून के संबंध के आधार पर 1880 के दशक में मानसून का दीर्घकालीन पूर्वानुमान देना शुरू किया। बाद में प्रमुख बने गिल्बर्ट वॉकर ने समुद्र के वायुदाब के उतार-चढ़ाव (दक्षिणी दोलन) की खोज की, जो आज भी "अल-नीनो" को समझने का आधार है।

◆ आज — विभाग का मुख्यालय कलकत्ता से शिमला और पुणे होते हुए अब नई दिल्ली में है। यह आज पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अधीन चक्रवात-चेतावनी, मानसून-पूर्वानुमान और भूकंप-सूचना देता है।

2.8 इंडियन एसोसिएशन फ़ॉर द कल्टिवेशन ऑफ़ साइंस, कलकत्ता (1876)

◆ किसने और क्यों — कलकत्ता के प्रसिद्ध चिकित्सक डॉ. महेंद्रलाल सरकार ने 29 जुलाई 1876 को इसकी स्थापना की। उनका मानना था कि भारत का उद्धार तभी होगा जब भारतीय स्वयं विज्ञान पढ़ें और मौलिक शोध करें। इसलिए यह संस्था भारतीयों के चंदे से, भारतीयों के प्रबंधन में बनी — यह भारतीयों द्वारा बनाई गई पहली विज्ञान-शोध संस्था मानी जाती है।

◆ काम — शुरू में यहाँ आम लोगों के लिए विज्ञान के व्याख्यान और प्रयोग-प्रदर्शन होते थे। बाद में यह गंभीर शोध का केंद्र बनी। सी. वी. रमन 1907 से सरकारी वित्त विभाग में नौकरी करते हुए शाम को यहीं प्रयोग करते थे और 1928 में रमन प्रभाव की खोज भी इसी संस्था की प्रयोगशाला में हुई।

◆ महत्त्व — इस संस्था ने सिद्ध किया कि सरकारी सहायता के बिना भी भारतीय विश्वस्तरीय विज्ञान कर सकते हैं। आज यह कोलकाता के जादवपुर क्षेत्र में स्थित प्रमुख शोध संस्थान है।

2.9 भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण (1890) और कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा (1905)

◆ वनस्पति सर्वेक्षण — 1890 में कलकत्ता के वनस्पति उद्यान के अधीक्षक जॉर्ज किंग के नेतृत्व में भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण बना। इसका काम देश के पेड़-पौधों को खोजना, पहचानना, उनका नामकरण और संग्रह करना था, क्योंकि लकड़ी, दवा और नक़दी फ़सलों के लिए यह जानकारी ज़रूरी थी। इसकी जड़ें कलकत्ता के वनस्पति उद्यान (1787) में थीं, जो अपने विशाल बरगद के लिए प्रसिद्ध है।

◆ पूसा का कृषि अनुसंधान संस्थान — बार-बार के अकालों के बाद लॉर्ड कर्ज़न के समय 1905 में बिहार के पूसा में इंपीरियल कृषि अनुसंधान संस्थान खुला। इसके लिए अमेरिकी दानदाता हेनरी फ़िप्स ने धन दिया था। यहाँ गेहूँ, गन्ने और अन्य फ़सलों की उन्नत किस्मों पर शोध हुआ।

◆ दिल्ली स्थानांतरण — 1934 के बिहार भूकंप में भवन क्षतिग्रस्त हो गए, तो 1936 में संस्थान नई दिल्ली ले जाया गया। पुराने स्थान की याद में दिल्ली का परिसर भी "पूसा" कहलाता है। स्वतंत्रता के बाद यही भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान बना, जिसने हरित क्रांति में केंद्रीय भूमिका निभाई (खंड 8)।

2.10 चिकित्सा अनुसंधान: प्लेग, मलेरिया और काला-अज़ार

उन्नीसवीं सदी के अंत में हैज़ा, प्लेग और मलेरिया से लाखों लोग मरते थे। इन्हीं महामारियों से लड़ने के लिए भारत में चिकित्सा-शोध की नींव पड़ी। इसके प्रमुख उदाहरण ये हैं:

◆ वाल्डेमार हाफ़किन — रूसी मूल के इस वैज्ञानिक ने 1890 के दशक में हैज़े का टीका भारत में आज़माया और 1896–97 में बम्बई में फैले प्लेग का टीका बनाया। उनकी प्रयोगशाला आगे चलकर बम्बई का हाफ़किन संस्थान बनी।

◆ रोनाल्ड रॉस — भारतीय चिकित्सा सेवा के इस अधिकारी ने 1897 में सिकंदराबाद में सिद्ध किया कि मलेरिया का परजीवी मच्छर से फैलता है। इस खोज के लिए उन्हें 1902 में चिकित्सा का नोबेल पुरस्कार मिला — यह भारत में किए गए काम पर मिला पहला नोबेल था।

◆ उपेंद्रनाथ ब्रह्मचारी — कलकत्ता के इस भारतीय चिकित्सक ने 1922 में "यूरिया स्टिबामाइन" नाम की दवा बनाई, जिसने काला-अज़ार जैसे जानलेवा रोग के इलाज को संभव बनाया और असम-बंगाल में लाखों जानें बचाईं।

◆ संस्थागत ढाँचा — 1911 में चिकित्सा-शोध को धन देने के लिए भारतीय अनुसंधान निधि संघ बना, जो 1949 में भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आई.सी.एम.आर.) बन गया। कसौली का पाश्चर संस्थान (1900) और केंद्रीय अनुसंधान संस्थान (1905) भी इसी दौर में बने।

2.11 भारतीय विज्ञान संस्थान, बंगलौर (1909)

◆ पृष्ठभूमि — उद्योगपति जमशेदजी नसरवानजी टाटा मानते थे कि भारत को अपने वैज्ञानिक और इंजीनियर स्वयं तैयार करने होंगे। कहा जाता है कि 1893 में जापान से अमेरिका जाते हुए जहाज़ पर स्वामी विवेकानंद से उनकी भेंट हुई थी, और 1898 में उन्होंने विवेकानंद को पत्र लिखकर अपनी विज्ञान-संस्थान की योजना में सहयोग माँगा।

◆ कठिनाइयाँ — जमशेदजी ने इसके लिए अपनी संपत्ति का बड़ा भाग दान करने की घोषणा की, पर लॉर्ड कर्ज़न की सरकार योजना को लेकर संशय में रही। 1904 में जमशेदजी का निधन हो गया, पर उनके पुत्रों ने योजना जारी रखी।

◆ स्थापना — 1909 में बंगलौर में संस्थान की स्थापना हुई। मैसूर के महाराजा कृष्णराज वडियार चतुर्थ ने इसके लिए बड़ी ज़मीन दी और मैसूर राज्य ने आर्थिक सहायता दी। इसके पहले निदेशक अंग्रेज़ रसायनशास्त्री मॉरिस ट्रैवर्स थे और 1933 में सी. वी. रमन इसके पहले भारतीय निदेशक बने।

◆ महत्त्व — यह भारत में उच्च विज्ञान शिक्षा और शोध का पहला बड़ा केंद्र बना। होमी भाभा, विक्रम साराभाई और सतीश धवन जैसे वैज्ञानिकों ने यहीं काम किया। आज यह देश के सर्वश्रेष्ठ शोध संस्थानों में गिना जाता है और लोग इसे प्यार से "टाटा संस्थान" भी कहते हैं।

2.12 भारतीय विज्ञान कांग्रेस (1914)

◆ किसने और क्यों — दो अंग्रेज़ रसायनशास्त्रियों — जे. एल. सिमोनसेन और पी. एस. मैकमोहन — की पहल पर भारतीय विज्ञान कांग्रेस संघ बना। उद्देश्य था कि देश भर के वैज्ञानिक हर वर्ष एक मंच पर मिलें, अपने शोध प्रस्तुत करें और विज्ञान को जनता तक पहुँचाएँ।

◆ पहला अधिवेशन — जनवरी 1914 में कलकत्ता में पहला अधिवेशन हुआ, जिसकी अध्यक्षता कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति सर आशुतोष मुखर्जी ने की।

◆ महत्त्व — स्वतंत्रता के बाद प्रधानमंत्री प्रायः हर वर्ष इसका उद्घाटन करते रहे और कई विज्ञान नीतियाँ इसी मंच से घोषित हुईं (जैसे 2003 और 2013 की नीतियाँ)। इस तरह यह वैज्ञानिकों और सरकार के बीच संवाद का मंच बना।

2.13 भारतीय प्राणी सर्वेक्षण (1916) और बोस संस्थान (1917)

◆ प्राणी सर्वेक्षण — 1 जुलाई 1916 को भारतीय संग्रहालय के प्राणी-विभाग को अलग करके भारतीय प्राणी सर्वेक्षण बनाया गया; इसके पहले निदेशक नेल्सन एनैंडेल थे। इसका काम देश के पशु-पक्षियों, कीटों और जलीय जीवों की खोज, पहचान और सूची बनाना है। मुख्यालय कोलकाता में है।

◆ बोस संस्थान — जगदीश चंद्र बसु ने प्रेसिडेंसी कॉलेज से सेवानिवृत्त होने के बाद अपनी जमा-पूँजी और दान से 30 नवंबर 1917 (अपने जन्मदिन) को कलकत्ता में बोस संस्थान की स्थापना की। उन्होंने इसे "विज्ञान का मंदिर" कहा, जहाँ भौतिकी और जीव-विज्ञान दोनों पर शोध हो — क्योंकि वे सजीव और निर्जीव की प्रतिक्रियाओं में समानता खोज रहे थे। यह भारत के सबसे पुराने आधुनिक शोध संस्थानों में है।

2.14 कृषि अनुसंधान परिषद (1929) और भारतीय सांख्यिकी संस्थान (1931)

◆ इंपीरियल कृषि अनुसंधान परिषद (1929) — लॉर्ड लिनलिथगो की अध्यक्षता वाले शाही कृषि आयोग (1926–28) ने सुझाव दिया कि पूरे देश के कृषि-शोध को एक केंद्रीय संस्था समन्वित करे। इसी सिफ़ारिश पर 16 जुलाई 1929 को यह परिषद बनी, जो स्वतंत्रता के बाद भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आई.सी.ए.आर.) कहलाई। आज इसके अधीन सौ से अधिक शोध संस्थान और देश भर के कृषि विश्वविद्यालय जुड़े हैं।

◆ भारतीय सांख्यिकी संस्थान (1931) — प्रेसिडेंसी कॉलेज के भौतिकी प्राध्यापक प्रशांत चंद्र महालनोबिस ने अपने कमरे की एक छोटी-सी प्रयोगशाला से शुरुआत करके 17 दिसंबर 1931 को कलकत्ता में यह संस्थान बनाया। यहाँ नमूना सर्वेक्षण (कुछ खेतों के आधार पर पूरे प्रांत की फ़सल का अनुमान) जैसी विधियाँ विकसित हुईं। 1956 में यहीं भारत का पहला कंप्यूटर लगाया गया और 1959 में संसद ने इसे राष्ट्रीय महत्त्व की संस्था घोषित किया।

2.15 वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद — सी.एस.आई.आर. (1942)

◆ पृष्ठभूमि — द्वितीय विश्व युद्ध (1939–45) में आयात बंद होने लगे, तो सरकार को सेना और उद्योग की ज़रूरतें — जैसे दवाएँ, रसायन, कपड़ा, विस्फोटक — देश में ही पूरी करनी पड़ीं। इसके लिए 1940 में वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान बोर्ड बना।

◆ स्थापना — 26 सितंबर 1942 को इसे स्वायत्त संस्था के रूप में सी.एस.आई.आर. बनाया गया। इसके पहले महानिदेशक रसायनशास्त्री शांति स्वरूप भटनागर थे।

◆ शांति स्वरूप भटनागर (1894–1955) — लंदन से रसायन में डॉक्टरेट करके लौटे भटनागर ने लाहौर में पढ़ाते हुए तेल-कुओं की खुदाई में काम आने वाले घोल की समस्या हल की थी। सी.एस.आई.आर. प्रमुख के रूप में उन्होंने देश भर में लगभग बारह राष्ट्रीय प्रयोगशालाएँ स्थापित कीं, इसलिए उन्हें "भारत में प्रयोगशालाओं का जनक" कहा जाता है। वे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के पहले अध्यक्ष भी बने। उनकी स्मृति में 1958 से युवा वैज्ञानिकों को शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार दिया जाता है।

◆ आज — सी.एस.आई.आर. के अधीन लगभग 37–38 प्रयोगशालाएँ हैं, जैसे राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला (दिल्ली) — जो भारतीय मानक समय बनाए रखती है, राष्ट्रीय रासायनिक प्रयोगशाला (पुणे), केंद्रीय औषधि अनुसंधान संस्थान (लखनऊ) और केंद्रीय खाद्य प्रौद्योगिकी अनुसंधान संस्थान (मैसूर)।

2.16 टाटा मूलभूत अनुसंधान संस्थान — टी.आई.एफ़.आर. (1945)

◆ पृष्ठभूमि — युवा भौतिकशास्त्री होमी जहाँगीर भाभा द्वितीय विश्व युद्ध के कारण यूरोप से भारत लौटकर बंगलौर में रमन के साथ काम कर रहे थे। उन्होंने अनुभव किया कि भारत में परमाणु भौतिकी और गणित जैसे मूल विषयों पर ऊँचे स्तर का शोध केंद्र नहीं है।

◆ स्थापना — 1944 में भाभा ने सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट को पत्र लिखकर ऐसे संस्थान का प्रस्ताव रखा। ट्रस्ट की सहायता से 1945 में बम्बई में टाटा मूलभूत अनुसंधान संस्थान बना, जिसके पहले निदेशक स्वयं भाभा थे।

◆ महत्त्व — यही संस्थान आगे चलकर भारतीय परमाणु कार्यक्रम की जननी बना; परमाणु ऊर्जा आयोग के आरंभिक वैज्ञानिक यहीं से निकले। 1960 में यहीं भारत का पहला स्वदेशी कंप्यूटर "टिफ़्रैक" बना (खंड 9)।

📋 दोहराव तालिका: औपनिवेशिक काल की प्रमुख संस्थाएँ

संस्था और वर्ष

संस्थापक / पहल

मुख्य काम या विशेष बात

भारतीय सर्वेक्षण विभाग (1767)

जेम्स रेनेल, पहले सर्वेयर जनरल

यह देश के आधिकारिक नक्शे बनाता है और आज इसका मुख्यालय देहरादून में है।

एशियाटिक सोसाइटी, कलकत्ता (1784)

सर विलियम जोन्स

इसने प्राच्य अध्ययन और आधुनिक शोध-परंपरा की नींव रखी।

मद्रास वेधशाला (1792)

ईस्ट इंडिया कंपनी

यहाँ तारों के अवलोकन से समय और देशांतर तय किए जाते थे।

महान त्रिकोणमितीय सर्वेक्षण (1802)

विलियम लैम्बटन, फिर जॉर्ज एवरेस्ट

इसी के आँकड़ों से 1852 में राधानाथ सिकदर ने सबसे ऊँची चोटी की गणना की।

थॉमसन कॉलेज, रुड़की (1847)

जेम्स थॉमसन

इसे प्रायः पहला इंजीनियरिंग कॉलेज माना जाता है; आज यह आई.आई.टी. रुड़की है।

भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (1851)

थॉमस ओल्डहैम

यह रेलवे के लिए कोयले और खनिजों की खोज हेतु बना था।

मौसम विज्ञान विभाग (1875)

हेनरी ब्लैनफ़र्ड

चक्रवात और अकालों के बाद मानसून-पूर्वानुमान के लिए यह विभाग बना।

इंडियन एसोसिएशन फ़ॉर द कल्टिवेशन ऑफ़ साइंस (1876)

डॉ. महेंद्रलाल सरकार

यह भारतीयों की पहली विज्ञान-शोध संस्था थी और यहीं रमन प्रभाव खोजा गया।

भारतीय विज्ञान संस्थान, बंगलौर (1909)

जमशेदजी टाटा की योजना; मैसूर राज्य का सहयोग

यह उच्च विज्ञान शिक्षा का पहला बड़ा केंद्र बना और 1933 में रमन इसके पहले भारतीय निदेशक बने।

भारतीय अनुसंधान निधि संघ (1911)

सरकार

इसने चिकित्सा-शोध को धन दिया और 1949 में यह आई.सी.एम.आर. बन गया।

भारतीय विज्ञान कांग्रेस (1914)

सिमोनसेन और मैकमोहन; अध्यक्ष आशुतोष मुखर्जी

इसका पहला अधिवेशन कलकत्ता में हुआ और यह वैज्ञानिकों का वार्षिक मंच बना।

बोस संस्थान (1917)

जगदीश चंद्र बसु

यहाँ भौतिकी और जीव-विज्ञान पर साथ-साथ शोध हुआ।

भारतीय सांख्यिकी संस्थान (1931)

प्रशांत चंद्र महालनोबिस

इसने नमूना सर्वेक्षण की विधि विकसित की और 1956 में यहीं देश का पहला कंप्यूटर लगा।

सी.एस.आई.आर. (1942)

पहले महानिदेशक शांति स्वरूप भटनागर

इसके अधीन राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं का जाल बना, इसलिए भटनागर "प्रयोगशालाओं के जनक" कहलाए।

टी.आई.एफ़.आर., बम्बई (1945)

होमी भाभा और दोराबजी टाटा ट्रस्ट

यह संस्थान भारतीय परमाणु कार्यक्रम की जननी बना।

3. भारतीय वैज्ञानिक पुनर्जागरण (1880–1947)

पराधीनता, कम साधनों और भेदभाव के बावजूद उन्नीसवीं सदी के अंत से भारतीय वैज्ञानिकों ने ऐसी खोजें कीं जिन्हें पूरी दुनिया ने माना। इनमें से अधिकांश ने विदेश में पढ़ाई की, पर शोध के लिए भारत लौटकर यहीं संस्थाएँ खड़ी कीं। उनकी सफलता ने यह धारणा तोड़ दी कि भारतीय केवल "रटने" वाले हैं, मौलिक सोच वाले नहीं। इसलिए यह वैज्ञानिक उपलब्धि भी राष्ट्रीय जागरण का ही एक रूप थी।

नीचे के आरेख में आठ प्रमुख वैज्ञानिक एक नज़र में हैं। उसके बाद इन आठों के साथ तीन और — एम. विश्वेश्वरैया, सालिम अली और जानकी अम्माल — का परिचय विस्तार से दिया गया है।

चित्र 19.2: औपनिवेशिक भारत के आठ महान वैज्ञानिक
चित्र 19.2: औपनिवेशिक भारत के आठ महान वैज्ञानिक

3.1 जगदीश चंद्र बसु (1858–1937)

जगदीश चंद्र बसु का जन्म 30 नवंबर 1858 को पूर्वी बंगाल (आज बांग्लादेश) के मैमनसिंह में हुआ। कलकत्ता के सेंट ज़ेवियर्स कॉलेज और फिर इंग्लैंड के कैम्ब्रिज में पढ़ाई के बाद 1885 में वे प्रेसिडेंसी कॉलेज में भौतिकी के प्राध्यापक बने, जहाँ वेतन के भेदभाव के विरुद्ध उन्होंने तीन वर्ष वेतन नहीं लिया। 1895 में उन्होंने कलकत्ता में सार्वजनिक प्रदर्शन किया, जिसमें अदृश्य विद्युत-चुंबकीय तरंगों (सूक्ष्म तरंगें या माइक्रोवेव) से दूर रखी घंटी बजाई और बारूद में विस्फोट कराया — यानी बिना तार के संकेत भेजे। वे रेडियो और सूक्ष्म तरंगों के अग्रदूतों में गिने जाते हैं, पर उन्होंने अपनी खोज का पेटेंट कराने में रुचि नहीं ली, क्योंकि वे ज्ञान को सबके लिए मुक्त मानते थे।

बाद में उन्होंने पौधों पर शोध किया और "क्रेस्कोग्राफ़" नाम का यंत्र बनाया, जो पौधों की वृद्धि को हज़ारों गुना बड़ा करके दिखाता था। इससे उन्होंने सिद्ध किया कि पौधे भी गर्मी, ठंड, ज़हर और चोट पर प्रतिक्रिया करते हैं — ठीक जैसे जीव-जंतुओं की मांसपेशियाँ करती हैं। उदाहरण के लिए, ज़हर देने पर पौधे की प्रतिक्रिया धीरे-धीरे कमज़ोर होकर रुक जाती थी, मानो पौधा "मर" रहा हो। 1917 में उन्हें "सर" की उपाधि मिली और उन्होंने बोस संस्थान बनाया; 1920 में वे लंदन की रॉयल सोसाइटी के सदस्य (फ़ेलो) बने। वे बांग्ला में विज्ञान-कथा लिखने वाले आरंभिक लेखकों में भी थे।

3.2 प्रफुल्ल चंद्र राय (1861–1944)

प्रफुल्ल चंद्र राय का जन्म 2 अगस्त 1861 को बंगाल के खुलना ज़िले (आज बांग्लादेश) में हुआ। उन्होंने एडिनबर्ग विश्वविद्यालय से रसायन में डॉक्टरेट की और 1889 में प्रेसिडेंसी कॉलेज में पढ़ाने लगे। 1896 में उन्होंने एक नए यौगिक "मर्क्यूरस नाइट्राइट" (पारे का एक स्थिर लवण) की खोज की, जिससे उन्हें अंतरराष्ट्रीय ख्याति मिली। उन्होंने देखा कि देश की दवाएँ और रसायन विदेश से आते हैं, इसलिए 1892 में बहुत छोटी पूँजी से दवाएँ बनाना शुरू किया, जो 1901 में "बंगाल केमिकल एंड फ़ार्मास्युटिकल वर्क्स" नाम की कंपनी बनी — इसे भारत की पहली आधुनिक दवा कंपनी माना जाता है।

उन्होंने दो खंडों में "हिंदू रसायन का इतिहास" (1902 और 1908) लिखा, जिसमें प्राचीन भारत के रसायन-ज्ञान (जैसे धातु-शोधन, औषधि-निर्माण) को दुनिया के सामने रखा। इसीलिए उन्हें "भारतीय रसायन का जनक" कहा जाता है। वे सादा जीवन जीते थे, अपना वेतन छात्रों और बाढ़-पीड़ितों पर ख़र्च करते थे और स्वदेशी आंदोलन तथा खादी के समर्थक थे। उनके शिष्यों में मेघनाद साहा और शांति स्वरूप भटनागर जैसे नाम शामिल हैं।

3.3 श्रीनिवास रामानुजन (1887–1920)

महान गणितज्ञ रामानुजन का जन्म 22 दिसंबर 1887 को तमिलनाडु के इरोड में हुआ और बचपन कुंभकोणम में बीता। गणित में वे इतने डूबे रहते थे कि दूसरे विषयों में असफल होने के कारण उनकी कॉलेज की पढ़ाई छूट गई और उन्हें मद्रास पोर्ट ट्रस्ट में क्लर्क की नौकरी करनी पड़ी। 1913 में उन्होंने कैम्ब्रिज के प्रसिद्ध गणितज्ञ जी. एच. हार्डी को अपने सूत्रों से भरा पत्र भेजा; हार्डी तुरंत समझ गए कि यह असाधारण प्रतिभा है और 1914 में उन्हें कैम्ब्रिज बुला लिया।

बिना औपचारिक प्रशिक्षण के रामानुजन ने लगभग 3900 गणितीय परिणाम दिए — संख्या सिद्धांत, अनंत श्रेणियों, संख्याओं के विभाजन (किसी संख्या को कितने तरीक़ों से जोड़कर बनाया जा सकता है) और पाई के मान के लिए अद्भुत सूत्र। 1918 में वे रॉयल सोसाइटी के फ़ेलो चुने गए — ऐसा सम्मान पाने वाले वे सबसे कम आयु के लोगों में थे। इंग्लैंड की ठंड और शाकाहारी भोजन की कठिनाई से उनका स्वास्थ्य बिगड़ा; वे 1919 में भारत लौटे और 26 अप्रैल 1920 को केवल 32 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।

🔢 उदाहरण: 1729 — "हार्डी-रामानुजन संख्या"

एक बार हार्डी अस्पताल में रामानुजन से मिलने टैक्सी नंबर 1729 में गए और बोले कि यह तो बड़ी "नीरस" संख्या है। रामानुजन ने तुरंत कहा — नहीं, यह बहुत रोचक है! यह सबसे छोटी संख्या है जिसे दो घनों के योग के रूप में दो अलग तरीक़ों से लिखा जा सकता है: 1729 = 1³ + 12³ = 9³ + 10³ (यानी 1 + 1728 = 729 + 1000)। उनके जन्मदिन 22 दिसंबर को 2012 से राष्ट्रीय गणित दिवस मनाया जाता है।

3.4 चंद्रशेखर वेंकट रमन (1888–1970)

📖 कहानी 1: जहाज़ की डेक पर उठा सवाल — समुद्र नीला क्यों है?

1907 में रमन ने सरकारी वित्त विभाग में सहायक महालेखाकार की नौकरी की और कलकत्ता आ गए। दिन भर वे दफ़्तर में हिसाब-किताब देखते, पर उनका मन भौतिकी में ही लगा रहता था। शाम को वे इंडियन एसोसिएशन फ़ॉर द कल्टिवेशन ऑफ़ साइंस की प्रयोगशाला पहुँच जाते और वहाँ ध्वनि और प्रकाश पर प्रयोग करते। 1917 में उन्होंने अच्छी नौकरी छोड़कर कम वेतन वाला कलकत्ता विश्वविद्यालय का प्राध्यापक पद चुना, ताकि पूरा समय शोध को दे सकें।

1921 में इंग्लैंड से भारत लौटते हुए वे जहाज़ की डेक पर खड़े होकर भूमध्य सागर का गहरा नीला पानी देख रहे थे। तब एक पुराना वैज्ञानिक उत्तर प्रचलित था कि समुद्र आकाश का नीला रंग प्रतिबिंबित करता है। रमन को यह उत्तर अधूरा लगा। वे जेब में रखे छोटे उपकरणों से पानी और आकाश के प्रकाश की जाँच करने लगे और इस नतीजे पर पहुँचे कि पानी के अणु स्वयं प्रकाश को बिखेरते हैं। यहीं से प्रकाश के प्रकीर्णन पर उनका लंबा शोध शुरू हुआ।

सात वर्ष की मेहनत के बाद 28 फ़रवरी 1928 को, अपने सहयोगी के. एस. कृष्णन के साथ, उन्होंने देखा कि जब एक रंग का प्रकाश किसी पारदर्शी पदार्थ से गुज़रता है, तो बिखरे प्रकाश का बहुत छोटा-सा भाग अपना रंग बदल लेता है। यह खोज रमन प्रभाव कहलाई। यह काम भारत की प्रयोगशाला में बहुत साधारण और सस्ते उपकरणों से हुआ था। 1930 में रमन को भौतिकी का नोबेल पुरस्कार मिला और वे विज्ञान में नोबेल पाने वाले पहले एशियाई बने।

इस खोज की याद में 28 फ़रवरी को 1987 से हर वर्ष राष्ट्रीय विज्ञान दिवस मनाया जाता है। रमन की कहानी बताती है कि बड़ी खोज के लिए महँगे साधन से ज़्यादा ज़रूरी जिज्ञासा और धैर्य है।

🧭 इस कहानी से कौन-सी अवधारणा साफ़ हुई

✔ प्रकाश का प्रकीर्णन — प्रकाश का किसी पदार्थ के कणों से टकराकर इधर-उधर बिखरना; समुद्र के नीले दिखने का कारण पानी के अणुओं द्वारा प्रकाश का बिखरना है।

✔ रमन प्रभाव — बिखरे प्रकाश के बहुत छोटे भाग का रंग (तरंगदैर्ध्य) बदल जाना, क्योंकि वह पदार्थ के अणुओं के कंपन से ऊर्जा लेता या देता है; इससे पदार्थ की "पहचान" मिलती है।

✔ साधारण साधनों में बड़ी खोज — यह शोध भारत में, कम ख़र्च के उपकरणों से हुआ और 1930 में नोबेल पुरस्कार मिला।

📝 परीक्षा के लिए: परीक्षा-सूत्र: रमन प्रभाव की खोज 28 फ़रवरी 1928 (सहयोगी के. एस. कृष्णन); नोबेल पुरस्कार 1930 (पहले एशियाई वैज्ञानिक); राष्ट्रीय विज्ञान दिवस 28 फ़रवरी (1987 से)

सी. वी. रमन का जन्म 7 नवंबर 1888 को तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली में हुआ। मद्रास के प्रेसिडेंसी कॉलेज से भौतिकी में सर्वोच्च अंक पाने के बाद भी विदेश जाकर शोध का अवसर न मिलने पर वे 1907 में सरकारी वित्त विभाग में सहायक महालेखाकार बनकर कलकत्ता आए। दफ़्तर के बाद वे शाम को इंडियन एसोसिएशन फ़ॉर द कल्टिवेशन ऑफ़ साइंस में प्रयोग करते थे। 1917 में उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़कर कलकत्ता विश्वविद्यालय में भौतिकी का प्राध्यापक पद स्वीकार किया, भले ही वेतन कम था। उन्होंने तबले और मृदंग जैसे भारतीय वाद्ययंत्रों की ध्वनि पर भी शोध किया।

1921 में इंग्लैंड से जहाज़ से लौटते हुए वे सोचने लगे कि समुद्र नीला क्यों दिखता है। इसी प्रश्न से प्रकाश के प्रकीर्णन (बिखरने) पर उनका शोध शुरू हुआ, जिसका परिणाम 28 फ़रवरी 1928 को अपने सहयोगी के. एस. कृष्णन के साथ "रमन प्रभाव" की खोज के रूप में सामने आया। 1929 में उन्हें "सर" की उपाधि मिली और 1930 में भौतिकी का नोबेल पुरस्कार — वे विज्ञान में नोबेल पाने वाले पहले एशियाई और पहले अश्वेत व्यक्ति थे। 1933 में वे भारतीय विज्ञान संस्थान के पहले भारतीय निदेशक बने, 1948 में बंगलौर में रमन शोध संस्थान बनाया, 1954 में भारत रत्न पाया और 21 नवंबर 1970 को उनका निधन हुआ।

🔍 आसान परिभाषा: रमन प्रभाव

📘 परिभाषा: जब एक ही रंग (एक ही तरंगदैर्ध्य) का प्रकाश किसी पारदर्शी पदार्थ (द्रव, गैस या ठोस) से गुज़रता है, तो बिखरा हुआ अधिकांश प्रकाश उसी रंग का रहता है, पर उसका बहुत छोटा भाग पदार्थ के अणुओं के कंपन से ऊर्जा लेकर या देकर थोड़े बदले हुए रंग (तरंगदैर्ध्य) का हो जाता है। प्रकाश के इस बदलाव को रमन प्रभाव कहते हैं।

💡 आसान भाषा में: यानी प्रकाश किसी पदार्थ से टकराकर लौटते समय उस पदार्थ की "पहचान" साथ लेकर आता है। हर पदार्थ के अणु अलग ढंग से काँपते हैं, इसलिए हर पदार्थ का रंग-बदलाव अलग होता है — जैसे हर व्यक्ति की उँगलियों के निशान अलग होते हैं। 🏠 उदाहरण: टेनिस की गेंद किसी स्थिर दीवार से टकराकर उसी गति से लौटती है, पर हिलते हुए बल्ले से टकराकर तेज़ या धीमी लौटती है। अणु "हिलते बल्ले" जैसे हैं। आज "रमन स्पेक्ट्रोस्कोपी" से दवाओं की शुद्धता, रत्नों की असलियत और हवाई अड्डों पर विस्फोटकों की जाँच की जाती है; चंद्रयान जैसे अभियानों में भी ऐसी तकनीकें पदार्थ पहचानने में काम आती हैं।

रमन प्रभाव की खोज की स्मृति में 28 फ़रवरी को 1987 से हर वर्ष राष्ट्रीय विज्ञान दिवस मनाया जाता है। रमन की यह खोज इसलिए भी ख़ास है कि यह भारत में, भारतीय प्रयोगशाला में, बहुत साधारण और सस्ते उपकरणों से की गई थी।

3.5 मेघनाद साहा (1893–1956)

मेघनाद साहा का जन्म 6 अक्टूबर 1893 को ढाका ज़िले (आज बांग्लादेश) के एक ग़रीब परिवार में हुआ। स्कूल के दिनों में बंगाल विभाजन के विरोध में गवर्नर के दौरे का बहिष्कार करने पर उन्हें विद्यालय से निकाल दिया गया था। कलकत्ता के प्रेसिडेंसी कॉलेज में वे प्रफुल्ल चंद्र राय और जगदीश चंद्र बसु के शिष्य रहे और सत्येंद्र नाथ बोस उनके सहपाठी थे। 1920 में उन्होंने "ताप आयनन समीकरण" (साहा समीकरण) दिया, जिससे खगोल-भौतिकी में क्रांति आ गई।

⭐ साहा समीकरण आसान भाषा में

दूर के तारों तक कोई जा नहीं सकता, पर उनका प्रकाश आता है। प्रकाश को प्रिज़्म से तोड़ने पर रंगों की पट्टी (वर्णक्रम) में कुछ काली रेखाएँ दिखती हैं, जो बताती हैं कि तारे में कौन-से तत्व हैं। साहा ने दिखाया कि तारा जितना गर्म होता है, उसके परमाणु उतने अधिक आयनित (इलेक्ट्रॉन खोए हुए) होते हैं और इसी से रेखाएँ बदलती हैं। यानी तारे का वर्णक्रम देखकर उसका तापमान बताया जा सकता है — जैसे लोहे की छड़ का रंग (लाल, नारंगी, सफ़ेद) देखकर लोहार उसकी गर्मी का अंदाज़ा लगा लेता है।

साहा केवल प्रयोगशाला तक सीमित नहीं रहे। 1927 में वे रॉयल सोसाइटी के फ़ेलो बने। उन्होंने 1935 में "साइंस एंड कल्चर" पत्रिका निकाली, 1938 में कांग्रेस की राष्ट्रीय योजना समिति में भाग लिया और बाढ़ से बचाव के लिए दामोदर घाटी जैसी नदी-घाटी योजनाओं की वकालत की। 1949 में उन्होंने कलकत्ता में परमाणु भौतिकी संस्थान बनाया, जो आज साहा परमाणु भौतिकी संस्थान कहलाता है। 1952 में वे निर्दलीय सांसद चुने गए और उनकी अध्यक्षता वाली पंचांग सुधार समिति की सिफ़ारिश पर शक संवत पर आधारित राष्ट्रीय पंचांग अपनाया गया। 16 फ़रवरी 1956 को उनका निधन हुआ।

3.6 सत्येंद्र नाथ बोस (1894–1974)

सत्येंद्र नाथ बोस का जन्म 1 जनवरी 1894 को कलकत्ता में हुआ। वे ढाका विश्वविद्यालय में भौतिकी पढ़ा रहे थे, तभी 1924 में उन्होंने प्रकाश के कणों (फ़ोटॉन) की गणना का एक बिल्कुल नया तरीक़ा खोजा, जिससे प्लांक का विकिरण नियम पुराने भौतिकी के सहारे के बिना निकल आया। जब एक ब्रिटिश पत्रिका ने उनका शोध-पत्र नहीं छापा, तो उन्होंने उसे सीधे अल्बर्ट आइंस्टीन को भेज दिया। आइंस्टीन ने उसे स्वयं जर्मन में अनुवाद करके छपवाया और उसे आगे बढ़ाया — इसी से "बोस-आइंस्टीन सांख्यिकी" बनी।

इस सांख्यिकी का पालन करने वाले कणों को बोस के सम्मान में "बोसॉन" कहा जाता है — जैसे प्रकाश का कण फ़ोटॉन और 2012 में खोजा गया प्रसिद्ध हिग्स बोसॉन (जिसे मीडिया ने "गॉड पार्टिकल" कहा)। बोस-आइंस्टीन सिद्धांत ने पदार्थ की एक नई अवस्था — "बोस-आइंस्टीन संघनित" — की भविष्यवाणी की, जो 1995 में प्रयोगशाला में बनाई गई। बोस को 1954 में पद्म विभूषण मिला, 1958 में वे रॉयल सोसाइटी के फ़ेलो बने और 1959 में राष्ट्रीय प्रोफ़ेसर नियुक्त हुए। वे मातृभाषा बांग्ला में विज्ञान पढ़ाने के प्रबल समर्थक थे। 4 फ़रवरी 1974 को उनका निधन हुआ; कोलकाता का सत्येंद्र नाथ बोस राष्ट्रीय मूलभूत विज्ञान केंद्र उनके नाम पर है।

3.7 बीरबल साहनी (1891–1949)

बीरबल साहनी का जन्म 14 नवंबर 1891 को पंजाब के भेरा (आज पाकिस्तान) में हुआ। लाहौर के गवर्नमेंट कॉलेज के बाद उन्होंने कैम्ब्रिज और लंदन में पढ़ाई की और 1921 में लखनऊ विश्वविद्यालय में वनस्पति विज्ञान के प्रोफ़ेसर बने। उनका विषय था पुरावनस्पति विज्ञान — यानी चट्टानों में दबे करोड़ों वर्ष पुराने पौधों के जीवाश्मों का अध्ययन। झारखंड की राजमहल पहाड़ियों से मिले जीवाश्मों पर उनका शोध विश्व-प्रसिद्ध है, जहाँ उन्होंने प्राचीन बीज-पौधों के एक नए समूह ("पेंटॉक्सिलॉन") की पहचान की।

जीवाश्म पौधों से यह पता चलता है कि लाखों वर्ष पहले किसी स्थान की जलवायु कैसी थी और महाद्वीप कैसे खिसके। साहनी ने भूविज्ञान और पुरातत्व में भी योगदान दिया — उन्होंने प्राचीन सिक्के ढालने के साँचों का भी अध्ययन किया। 1936 में वे रॉयल सोसाइटी के फ़ेलो बनने वाले पहले भारतीय वनस्पति वैज्ञानिक बने। 1946 में उन्होंने लखनऊ में पुरावनस्पति विज्ञान संस्थान की स्थापना की, जिसके भवन की नींव अप्रैल 1949 में नेहरू ने रखी; इसके कुछ ही दिन बाद 10 अप्रैल 1949 को साहनी का निधन हो गया। उन्हें "भारतीय पुरावनस्पति विज्ञान का जनक" कहा जाता है।

3.8 प्रशांत चंद्र महालनोबिस (1893–1972)

महालनोबिस का जन्म 29 जून 1893 को कलकत्ता में हुआ। कैम्ब्रिज में भौतिकी पढ़ते हुए उनकी रुचि सांख्यिकी (आँकड़ों का विज्ञान) में जागी। भारत लौटकर उन्होंने आँकड़ों से व्यावहारिक समस्याएँ हल कीं — जैसे बाढ़ के आँकड़ों से बचाव-योजना सुझाना। 1931 में उन्होंने भारतीय सांख्यिकी संस्थान बनाया और 1933 में सांख्यिकी की पत्रिका "संख्या" निकाली। 1936 में उन्होंने "महालनोबिस दूरी" का सूत्र दिया।

📏 महालनोबिस दूरी और नमूना सर्वेक्षण — उदाहरण से

महालनोबिस दूरी बताती है कि कोई एक वस्तु किसी समूह से कितनी "अलग" है — केवल एक गुण नहीं, कई गुणों (जैसे लंबाई, वज़न, आयु) को एक साथ और उनके आपसी संबंध को ध्यान में रखकर। आज बैंक इसी तरह के तरीक़ों से असामान्य लेन-देन (धोखाधड़ी) पकड़ते हैं। नमूना सर्वेक्षण का अर्थ है पूरे देश के हर खेत या घर को गिनने के बजाय वैज्ञानिक ढंग से चुने गए कुछ हज़ार खेतों या घरों के आधार पर सही अनुमान लगाना — जैसे पतीले में चावल पके या नहीं, यह जानने के लिए चम्मच भर चावल देखना काफ़ी होता है।

स्वतंत्रता के बाद महालनोबिस नेहरू के प्रमुख सलाहकार बने। उनकी पहल पर 1950 में राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण शुरू हुआ और केंद्रीय सांख्यिकी संगठन बना। दूसरी पंचवर्षीय योजना (1956–61) उनके "महालनोबिस मॉडल" पर आधारित थी, जिसमें भारी उद्योगों (इस्पात, मशीनें) पर ज़ोर दिया गया। वे योजना आयोग के सदस्य रहे, 1945 में रॉयल सोसाइटी के फ़ेलो बने और 1968 में पद्म विभूषण पाया। उन्हें "भारतीय सांख्यिकी का जनक" कहा जाता है और उनके जन्मदिन 29 जून को 2007 से सांख्यिकी दिवस मनाया जाता है।

3.9 एम. विश्वेश्वरैया (1861–1962)

मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया का जन्म 15 सितंबर 1861 को मैसूर राज्य (आज कर्नाटक) के मुद्देनहल्ली गाँव में हुआ। पुणे के इंजीनियरिंग कॉलेज से पढ़ाई के बाद वे बम्बई के लोक निर्माण विभाग में इंजीनियर बने। उन्होंने बाँधों के लिए स्वचालित बाढ़-द्वार (ऑटोमैटिक स्लूस गेट) बनाए, जो पानी एक सीमा से ऊपर जाते ही अपने-आप खुल जाते थे और स्तर घटने पर बंद हो जाते थे — ये पहली बार पुणे के पास खडकवासला जलाशय पर लगाए गए। 1908 की भीषण बाढ़ के बाद उन्होंने हैदराबाद को बाढ़ से बचाने की योजना बनाई।

मैसूर के मुख्य अभियंता के रूप में उन्होंने कावेरी नदी पर कृष्णराज सागर बाँध के निर्माण का नेतृत्व किया, जिससे सिंचाई और बिजली मिली। 1912 से 1918 तक वे मैसूर के दीवान रहे और मैसूर साबुन कारख़ाना, भद्रावती लौह कारख़ाना, बैंक ऑफ़ मैसूर और बंगलौर का इंजीनियरिंग कॉलेज स्थापित कराए। उन्होंने "भारत के लिए नियोजित अर्थव्यवस्था" (1934) लिखकर आर्थिक योजना का विचार रखा। 1915 में उन्हें "सर" की उपाधि और 1955 में भारत रत्न मिला; वे लगभग सौ वर्ष जीवित रहे और 1962 में उनका निधन हुआ। उनके जन्मदिन 15 सितंबर को अभियंता दिवस मनाया जाता है।

3.10 सालिम अली (1896–1987)

सालिम मोइज़ुद्दीन अब्दुल अली का जन्म 12 नवंबर 1896 को बम्बई में हुआ। बचपन में उन्होंने खिलौना बंदूक से एक गौरैया मारी, जिसके गले पर पीला धब्बा था। उसकी पहचान जानने के लिए वे बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी पहुँचे, और वहीं से पक्षियों के प्रति उनकी जीवन भर की रुचि शुरू हुई। उन्होंने कई रियासतों (जैसे हैदराबाद, त्रावणकोर-कोचीन) में वैज्ञानिक पक्षी-सर्वेक्षण किए और पक्षियों के व्यवहार, प्रवास और आवास का गहराई से अध्ययन किया।

1941 में उनकी पुस्तक "द बुक ऑफ़ इंडियन बर्ड्स" छपी, जिसने आम लोगों में पक्षी-दर्शन को लोकप्रिय बनाया। अमेरिकी पक्षी-विज्ञानी डिलन रिप्ले के साथ उन्होंने दस खंडों में भारतीय उपमहाद्वीप के पक्षियों की विस्तृत पुस्तिका लिखी। उन्होंने केरल की साइलेंट वैली जैसे वनों को बचाने के आंदोलनों का समर्थन किया। उन्हें "भारत का पक्षी-पुरुष" कहा जाता है; 1976 में पद्म विभूषण मिला और उनकी आत्मकथा का नाम "एक गौरैया का पतन" (द फ़ॉल ऑफ़ ए स्पैरो) है। 1987 में उनका निधन हुआ।

3.11 जानकी अम्माल (1897–1984)

एडावलेथ कक्कट जानकी अम्माल का जन्म 4 नवंबर 1897 को केरल के तलश्शेरी में हुआ। जिस समय भारत में लड़कियों की पढ़ाई ही कठिन थी, उन्होंने अमेरिका के मिशिगन विश्वविद्यालय से वनस्पति विज्ञान में डॉक्टरेट की (1931) — वे ऐसा करने वाली आरंभिक भारतीय महिलाओं में थीं। कोयंबटूर के गन्ना प्रजनन संस्थान में उन्होंने गन्ने की ऐसी संकर (हाइब्रिड) किस्में विकसित करने में योगदान दिया जो भारत की जलवायु में अच्छी उपज और अधिक मिठास देती थीं — इससे भारत को विदेश से गन्ने की किस्में मँगाने पर निर्भर नहीं रहना पड़ा।

उन्होंने पौधों के गुणसूत्रों (कोशिका के भीतर आनुवंशिक सूचना ले जाने वाली संरचनाएँ) का अध्ययन किया और इंग्लैंड में रहते हुए 1945 में "खेती के पौधों का गुणसूत्र एटलस" सह-लेखक के रूप में लिखा। नेहरू के आमंत्रण पर वे भारत लौटीं और 1950 के दशक में भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण का पुनर्गठन किया। 1957 में उन्हें पद्मश्री मिला। उन्होंने भी साइलेंट वैली बचाओ आंदोलन का समर्थन किया। 1984 में उनका निधन हुआ; भारत सरकार ने उनके नाम पर वर्गीकरण विज्ञान (टैक्सोनॉमी) का राष्ट्रीय पुरस्कार शुरू किया।

📋 दोहराव तालिका: ग्यारह महान वैज्ञानिक

वैज्ञानिक (जीवन)

क्षेत्र

याद रखने योग्य मुख्य योगदान

जगदीश चंद्र बसु (1858–1937)

भौतिकी, जीव-भौतिकी

उन्होंने सूक्ष्म तरंगों से बिना तार संकेत भेजे और क्रेस्कोग्राफ़ से पौधों की संवेदना सिद्ध की; 1917 में बोस संस्थान बनाया।

प्रफुल्ल चंद्र राय (1861–1944)

रसायन

उन्होंने 1896 में मर्क्यूरस नाइट्राइट खोजा और बंगाल केमिकल्स बनाई; वे "भारतीय रसायन के जनक" हैं।

श्रीनिवास रामानुजन (1887–1920)

गणित

उन्होंने लगभग 3900 परिणाम दिए और हार्डी के साथ काम किया; 22 दिसंबर राष्ट्रीय गणित दिवस है।

सी. वी. रमन (1888–1970)

भौतिकी

उन्होंने 28 फ़रवरी 1928 को रमन प्रभाव खोजा, 1930 में नोबेल और 1954 में भारत रत्न पाया।

मेघनाद साहा (1893–1956)

खगोल-भौतिकी

उनके ताप आयनन समीकरण (1920) से तारों का तापमान जाना जा सका; उन्होंने नदी-घाटी योजना और पंचांग सुधार में योगदान दिया।

सत्येंद्र नाथ बोस (1894–1974)

भौतिकी

बोस-आइंस्टीन सांख्यिकी (1924) उन्हीं की देन है और "बोसॉन" कण उनके नाम पर हैं।

बीरबल साहनी (1891–1949)

पुरावनस्पति विज्ञान

उन्होंने राजमहल पहाड़ियों के जीवाश्म पौधों पर शोध किया और 1946 में लखनऊ में संस्थान बनाया।

प्रशांत चंद्र महालनोबिस (1893–1972)

सांख्यिकी

उन्होंने 1931 में भारतीय सांख्यिकी संस्थान बनाया और दूसरी योजना का मॉडल दिया; 29 जून सांख्यिकी दिवस है।

एम. विश्वेश्वरैया (1861–1962)

अभियांत्रिकी

उन्होंने स्वचालित बाढ़-द्वार और कृष्णराज सागर बाँध बनवाए; 1955 में भारत रत्न मिला और 15 सितंबर अभियंता दिवस है।

सालिम अली (1896–1987)

पक्षी-विज्ञान

वे "भारत के पक्षी-पुरुष" कहलाते हैं और उन्होंने देश भर में पक्षी-सर्वेक्षण किए।

जानकी अम्माल (1897–1984)

वनस्पति आनुवंशिकी

उन्होंने गन्ने की उन्नत संकर किस्में विकसित कीं और भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण का पुनर्गठन किया।

इन वैज्ञानिकों के साथ कुछ महिला वैज्ञानिकों और चिकित्सकों ने भी कठिन सामाजिक परिस्थितियों में इतिहास रचा, जिन्हें याद रखना ज़रूरी है:

🧠 याद रखने की बात: विज्ञान में महिलाएँ

डॉ. आनंदीबाई जोशी (अमेरिका से, 1886) और कादंबिनी गांगुली (कलकत्ता से) — पश्चिमी चिकित्सा में डिग्री पाने वाली पहली भारतीय महिलाओं में गिनी जाती हैं।

कमला सोहोनी — कैम्ब्रिज से 1939 में विज्ञान में डॉक्टरेट पाने वाली पहली भारतीय महिला मानी जाती हैं; उन्हें पहले भारतीय विज्ञान संस्थान में प्रवेश देने से मना किया गया था। असीमा चटर्जी — 1944 में किसी भारतीय विश्वविद्यालय (कलकत्ता) से विज्ञान में डॉक्टरेट पाने वाली पहली महिला; उन्होंने मिर्गी और मलेरिया-रोधी औषधियों पर शोध किया।

28 फ़रवरी — राष्ट्रीय विज्ञान दिवस (रमन प्रभाव की खोज की स्मृति में, 1987 से)।

4. स्वतंत्र भारत की विज्ञान नीतियाँ और संस्थाएँ

15 अगस्त 1947 को जब भारत स्वतंत्र हुआ, तब देश में गिनी-चुनी प्रयोगशालाएँ थीं, इंजीनियरिंग कॉलेज बहुत कम थे और मशीनें, दवाएँ तथा वैज्ञानिक उपकरण लगभग सब विदेश से आते थे। प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू मानते थे कि भूख, ग़रीबी, बीमारी और अंधविश्वास — इन चारों का उत्तर विज्ञान ही है। इसलिए उन्होंने विज्ञान को सरकार की प्राथमिकता बनाया, स्वयं वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद के अध्यक्ष रहे और परमाणु ऊर्जा जैसे विभाग सीधे अपने पास रखे। नई प्रयोगशालाओं, बाँधों और कारख़ानों को वे "आधुनिक भारत के मंदिर" कहते थे।

इस खंड में पहले हम वे नीतियाँ पढ़ेंगे जिनसे सरकार ने विज्ञान की दिशा तय की, और फिर वे संस्थाएँ और विभाग जिन्होंने इन नीतियों को ज़मीन पर उतारा।

4.1 वैज्ञानिक नीति प्रस्ताव (1958)

◆ पृष्ठभूमि — स्वतंत्रता के पहले दस वर्षों में कई प्रयोगशालाएँ और संस्थान खुल चुके थे, पर सरकार की विज्ञान के प्रति सोच किसी एक दस्तावेज़ में लिखी नहीं गई थी। नेहरू चाहते थे कि देश स्पष्ट रूप से घोषित करे कि वह विज्ञान को किस नज़र से देखता है।

◆ कब और किसने — 4 मार्च 1958 को यह प्रस्ताव संसद में रखा गया। इसे तैयार करने में नेहरू के साथ होमी भाभा जैसे वैज्ञानिकों की भूमिका थी। यह स्वतंत्र भारत की पहली विज्ञान नीति थी।

◆ मुख्य बातें — प्रस्ताव में कहा गया कि किसी राष्ट्र की समृद्धि तीन चीज़ों के मेल से आती है — तकनीक, कच्चा माल और पूँजी — और इनमें तकनीक सबसे महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि नई तकनीक कच्चे माल और पूँजी की कमी को भी पूरा कर सकती है। सरकार ने वचन दिया कि वह शुद्ध, प्रायोगिक और शैक्षिक — हर प्रकार के वैज्ञानिक शोध को बढ़ावा देगी, अच्छे वैज्ञानिक पर्याप्त संख्या में तैयार करेगी और उनके काम को राष्ट्र की शक्ति का अंग मानेगी।

◆ महत्त्व — इस प्रस्ताव के बाद विज्ञान पर सरकारी ख़र्च बढ़ा, वैज्ञानिकों का वेतन और सम्मान बढ़ा और नई प्रयोगशालाएँ खुलीं। सीमा यह रही कि ज़ोर सरकारी प्रयोगशालाओं पर रहा; विश्वविद्यालयों और निजी उद्योग में शोध उतना नहीं बढ़ सका।

4.2 प्रौद्योगिकी नीति वक्तव्य (1983)

◆ पृष्ठभूमि — 1970 के दशक तक भारत के पास वैज्ञानिक तो बहुत हो गए थे, पर कारख़ानों की मशीनें और तकनीक अब भी विदेश से ख़रीदी जाती थी। 1974 के परमाणु परीक्षण के बाद कई देशों ने भारत को उन्नत तकनीक देने पर रोक भी लगा दी थी।

◆ कब और क्या — प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के समय 1983 में यह वक्तव्य घोषित हुआ। इसका मुख्य लक्ष्य तकनीकी आत्मनिर्भरता था — यानी देश अपनी ज़रूरत की तकनीक स्वयं विकसित करे, और जो तकनीक बाहर से लेनी पड़े, उसे समझकर अपने अनुसार ढाले।

◆ परिणाम — इसी सोच से 1980 के दशक में मिसाइल कार्यक्रम (1983), सी-डॉट (1984) और सुपरकंप्यूटर (1988) जैसी स्वदेशी परियोजनाएँ शुरू हुईं, जिन्हें हम आगे के खंडों में पढ़ेंगे।

4.3 विज्ञान और प्रौद्योगिकी नीति (2003)

◆ पृष्ठभूमि — 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद भारतीय उद्योग को विश्व-बाज़ार में प्रतिस्पर्धा करनी थी। अब केवल सरकारी प्रयोगशालाओं से काम नहीं चल सकता था।

◆ मुख्य बातें — इस नीति ने पहली बार विज्ञान और प्रौद्योगिकी को एक साथ रखा। इसमें शोध और विकास पर ख़र्च बढ़ाकर सकल घरेलू उत्पाद के 2 प्रतिशत तक ले जाने का लक्ष्य रखा गया और उद्योग तथा शोध-संस्थानों के बीच सहयोग बढ़ाने पर बल दिया गया। यह लक्ष्य आज तक पूरा नहीं हो सका है।

4.4 विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार नीति (2013)

◆ मुख्य बातें — इस नीति में पहली बार "नवाचार" शब्द जोड़ा गया। इसका संदेश था कि खोज तभी सार्थक है जब वह किसी उपयोगी वस्तु या सेवा में बदले और आम लोगों तक पहुँचे। नीति ने निजी क्षेत्र को शोध में अधिक धन लगाने के लिए प्रेरित किया और युवाओं को विज्ञान में जीविका बनाने के लिए प्रोत्साहित करने की बात कही।

🔍 आसान परिभाषा: नवाचार

📘 परिभाषा: किसी नए विचार, खोज या तरीक़े को ऐसी उपयोगी वस्तु, सेवा या प्रक्रिया में बदलना जिससे लोगों की कोई समस्या पहले से बेहतर, सस्ते या तेज़ ढंग से हल हो।

💡 आसान भाषा में: यानी केवल नई बात खोज लेना काफ़ी नहीं; उसे काम की चीज़ बनाकर लोगों तक पहुँचाना नवाचार है। 🏠 उदाहरण: बिना बिजली के चलने वाला मिट्टी का फ्रिज, कम दाम का हृदय-स्टेंट या मोबाइल से तुरंत पैसा भेजने की यूपीआई व्यवस्था — ये सब नवाचार के उदाहरण हैं, क्योंकि इनमें विज्ञान का उपयोग आम आदमी की ज़रूरत के लिए हुआ।

4.5 संविधान में वैज्ञानिक दृष्टिकोण (1976)

◆ क्या जोड़ा गया — 1976 में 42वें संविधान संशोधन से संविधान में मौलिक कर्तव्य जोड़े गए। इनमें अनुच्छेद 51क (ज) कहता है कि हर नागरिक का कर्तव्य है कि वह वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करे।

◆ महत्त्व — भारत उन गिने-चुने देशों में है जिनके संविधान में वैज्ञानिक सोच को नागरिक का कर्तव्य बताया गया है। इसका अर्थ यह है कि विज्ञान केवल प्रयोगशाला की चीज़ नहीं, बल्कि सोचने का एक तरीक़ा है — किसी बात को प्रमाण देखकर मानना (खंड 1.2 की परिभाषा देखें)।

नीचे की तालिका इन पाँचों को एक साथ दोहराती है।

📋 दोहराव तालिका: विज्ञान नीतियाँ

नीति

वर्ष

मुख्य बात

वैज्ञानिक नीति प्रस्ताव

4 मार्च 1958

यह संसद में रखा गया और इसने विज्ञान को राष्ट्रीय विकास का आधार माना।

प्रौद्योगिकी नीति वक्तव्य

1983

इसने स्वदेशी तकनीक और तकनीकी आत्मनिर्भरता को लक्ष्य बनाया।

विज्ञान और प्रौद्योगिकी नीति

2003

इसने शोध पर ख़र्च बढ़ाने और उद्योग को शोध-संस्थानों से जोड़ने पर बल दिया।

विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार नीति

2013

इसने नवाचार को जोड़ा और कहा कि विज्ञान समाज के काम आना चाहिए।

अनुच्छेद 51क (ज)

1976

42वें संशोधन ने वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विकास को हर नागरिक का मौलिक कर्तव्य बनाया।

4.6 भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान — आई.आई.टी.

◆ पृष्ठभूमि — स्वतंत्रता से ठीक पहले यह साफ़ था कि युद्ध के बाद भारत में उद्योग खड़े करने के लिए ऊँचे दर्जे के इंजीनियर चाहिए होंगे। इसके लिए नलिनी रंजन सरकार की अध्यक्षता में एक समिति बनी, जिसने 1946 में सिफ़ारिश की कि देश के चारों भागों में उच्च तकनीकी संस्थान खोले जाएँ।

◆ पहला संस्थान — 1951 में पश्चिम बंगाल के खड़गपुर में पहला आई.आई.टी. खुला। यह हिजली के उस भवन में शुरू हुआ जहाँ अंग्रेज़ों ने स्वतंत्रता सेनानियों को नज़रबंद रखा था — यानी जो जगह कभी क़ैदख़ाना थी, वही स्वतंत्र भारत के इंजीनियर गढ़ने लगी।

◆ अन्य संस्थान — इसके बाद बम्बई (1958), मद्रास (1959), कानपुर (1959) और दिल्ली (1961) में संस्थान खुले। इन्हें खड़ा करने में अलग-अलग देशों ने सहायता दी — बम्बई को सोवियत संघ ने, मद्रास को पश्चिम जर्मनी ने, कानपुर को अमेरिका ने और दिल्ली को ब्रिटेन ने। इससे भारत की गुटनिरपेक्ष नीति का लाभ भी दिखता है — भारत ने दोनों गुटों से तकनीकी सहायता ली।

◆ क़ानूनी दर्जा — संसद ने क़ानून बनाकर इन संस्थानों को "राष्ट्रीय महत्त्व के संस्थान" घोषित किया; 1961 के प्रौद्योगिकी संस्थान अधिनियम ने सबको एक ढाँचे में रखा। इन्हें अपना पाठ्यक्रम बनाने और अपनी उपाधि देने की स्वतंत्रता मिली।

◆ महत्त्व और सीमा — इन संस्थानों ने विश्वस्तर के इंजीनियर तैयार किए, जो आगे चलकर भारत के सूचना प्रौद्योगिकी उद्योग की रीढ़ बने। पर इनके बहुत-से स्नातक विदेश चले गए, जिसे "प्रतिभा पलायन" कहा गया (खंड 12)।

4.7 अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग

◆ अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), नई दिल्ली (1956) — यह संसद के क़ानून से बना। स्वतंत्र भारत की पहली स्वास्थ्य मंत्री राजकुमारी अमृत कौर ने इसकी स्थापना में मुख्य भूमिका निभाई। इसका उद्देश्य एक ही जगह पर उच्च चिकित्सा शिक्षा, शोध और रोगियों का इलाज — तीनों देना था।

◆ विश्वविद्यालय अनुदान आयोग — यह 1953 में बना और 1956 में संसद के क़ानून से इसे वैधानिक दर्जा मिला। इसका काम विश्वविद्यालयों को धन देना और शिक्षा का स्तर बनाए रखना है। इसके पहले अध्यक्ष शांति स्वरूप भटनागर थे।

◆ राष्ट्रीय प्रयोगशालाएँ — वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद ने स्वतंत्रता के तुरंत बाद राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला (दिल्ली) और राष्ट्रीय रासायनिक प्रयोगशाला (पुणे) जैसी प्रयोगशालाएँ खोलीं (खंड 2.15)।

4.8 विज्ञान के सरकारी विभाग — कौन-सा कब बना

जैसे-जैसे विज्ञान के नए क्षेत्र उभरे, सरकार ने उनके लिए अलग विभाग बनाए। इनका क्रम याद रखना उपयोगी है, क्योंकि हर विभाग उस समय की ज़रूरत बताता है।

◆ परमाणु ऊर्जा विभाग (1954) — यह 3 अगस्त 1954 को बना और सीधे प्रधानमंत्री के अधीन रखा गया, ताकि निर्णय तेज़ी से हो सकें। इसके पहले सचिव होमी भाभा थे।

◆ रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (1958) — सेना के लिए हथियार और उपकरण देश में ही विकसित करने के लिए यह संगठन बना (खंड 7)।

◆ इलेक्ट्रॉनिकी विभाग (1970) — कंप्यूटर और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के उद्योग को दिशा देने के लिए बना (खंड 9)।

◆ विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (1971) — देश भर के वैज्ञानिक शोध को धन देने और नए क्षेत्रों को बढ़ावा देने के लिए बना।

◆ अंतरिक्ष विभाग (1972) — अंतरिक्ष आयोग के साथ बना; भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन इसी के अधीन आया (खंड 6)।

◆ महासागर विकास विभाग (1981) — समुद्र के संसाधनों और ध्रुवीय शोध के लिए बना। इसी के प्रयास से 1981–82 में भारत का पहला अंटार्कटिका अभियान गया और वहाँ "दक्षिण गंगोत्री" (1983) नाम का पहला भारतीय शोध-केंद्र बना; बाद में "मैत्री" (1989) और "भारती" (2012) केंद्र बने। 2006 में इस विभाग को बढ़ाकर पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय बनाया गया, जिसमें मौसम विभाग भी आ गया।

◆ जैव प्रौद्योगिकी विभाग (1986) — टीकों, जीन-शोध और जैव-उद्योग के लिए बना (खंड 8)।

🧠 याद रखने की बात: विभागों का क्रम

1954 परमाणु ऊर्जा → 1958 रक्षा अनुसंधान → 1970 इलेक्ट्रॉनिकी → 1971 विज्ञान और प्रौद्योगिकी → 1972 अंतरिक्ष → 1981 महासागर विकास → 1986 जैव प्रौद्योगिकी → 2006 पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय।

पहला आई.आई.टी. — खड़गपुर, 1951; सिफ़ारिश — सरकार समिति, 1946। एम्स — 1956। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग — 1953 (वैधानिक 1956)।

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5. परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम

परमाणु के नाभिक में बहुत बड़ी ऊर्जा छिपी होती है। इस ऊर्जा से शहरों को बिजली भी दी जा सकती है और बम भी बनाया जा सकता है। 1945 में हिरोशिमा और नागासाकी पर गिरे बमों ने दुनिया को इसकी विनाशक शक्ति दिखाई। भारत ने शुरू से कहा कि वह परमाणु ऊर्जा का उपयोग शांतिपूर्ण कामों — बिजली, चिकित्सा और खेती — के लिए करेगा। इस पूरे कार्यक्रम के शिल्पकार डॉ. होमी जहाँगीर भाभा थे, जिन्हें "भारतीय परमाणु कार्यक्रम का जनक" कहा जाता है।

🔍 आसान परिभाषा: नाभिकीय विखंडन

📘 परिभाषा: वह प्रक्रिया जिसमें यूरेनियम या प्लूटोनियम जैसे भारी परमाणु का नाभिक न्यूट्रॉन की चोट से दो छोटे नाभिकों में टूट जाता है और साथ में बहुत अधिक ऊर्जा तथा नए न्यूट्रॉन निकलते हैं। ये नए न्यूट्रॉन आगे दूसरे नाभिकों को तोड़ते हैं, जिसे शृंखला अभिक्रिया कहते हैं।

💡 आसान भाषा में: यानी भारी परमाणु को तोड़कर ऊर्जा निकालना। यह टूटना धीरे-धीरे और नियंत्रण में हो तो बिजलीघर चलता है; एकदम और बेक़ाबू हो तो बम बनता है। 🏠 उदाहरण: परमाणु रिएक्टर में यूरेनियम की छड़ें धीरे-धीरे टूटती हैं; इससे निकली गर्मी पानी को भाप बनाती है और भाप टरबाइन घुमाकर बिजली बनाती है — ठीक वैसे ही जैसे कोयले के बिजलीघर में, बस कोयले की जगह यूरेनियम है।

5.1 होमी भाभा और कार्यक्रम की नींव

◆ भाभा का परिचय — होमी भाभा का जन्म 1909 में बम्बई के एक पारसी परिवार में हुआ। उन्होंने कैम्ब्रिज में भौतिकी पढ़ी और अंतरिक्ष से आने वाली ब्रह्मांडीय किरणों पर ऐसा शोध किया कि वे युवावस्था में ही विश्व-प्रसिद्ध हो गए। 1939 में वे छुट्टी पर भारत आए थे कि द्वितीय विश्व युद्ध छिड़ गया और वे यहीं रुक गए।

◆ टाटा मूलभूत अनुसंधान संस्थान (1945) — भाभा ने बम्बई में यह संस्थान बनाया (खंड 2.16)। इसी के वैज्ञानिकों से आगे परमाणु कार्यक्रम खड़ा हुआ।

◆ परमाणु ऊर्जा अधिनियम और आयोग (1948) — स्वतंत्रता के अगले ही वर्ष संसद ने परमाणु ऊर्जा अधिनियम पारित किया और परमाणु ऊर्जा आयोग बना, जिसके अध्यक्ष भाभा थे। इसका अर्थ था कि नया-नया स्वतंत्र हुआ ग़रीब देश भी सबसे आधुनिक विज्ञान में पीछे नहीं रहना चाहता था।

◆ परमाणु ऊर्जा विभाग और ट्रॉम्बे (1954) — 3 अगस्त 1954 को परमाणु ऊर्जा विभाग बना। उसी वर्ष बम्बई के पास ट्रॉम्बे में परमाणु ऊर्जा प्रतिष्ठान की स्थापना हुई। भाभा की मृत्यु के बाद 1967 में इसका नाम भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र रखा गया।

◆ अंतरराष्ट्रीय सम्मान — 1955 में जिनेवा में परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग पर संयुक्त राष्ट्र का पहला सम्मेलन हुआ और भाभा उसके अध्यक्ष चुने गए। यह भारत के विज्ञान के लिए बड़े सम्मान की बात थी।

◆ निधन — 24 जनवरी 1966 को भाभा का विमान यूरोप में आल्प्स के मोंट ब्लां पर्वत से टकरा गया और उनका निधन हो गया। उनके बाद विक्रम साराभाई परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष बने।

❝ जब परमाणु ऊर्जा बिजली उत्पादन के लिए सफलतापूर्वक उपयोग होने लगेगी, तब भारत को विशेषज्ञों के लिए विदेश नहीं देखना पड़ेगा — वे यहीं तैयार मिलेंगे। ❞ (होमी जहाँगीर भाभा (1944 का पत्र))

5.2 त्रि-चरणीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम — हर चरण विस्तार से

भाभा के सामने एक बड़ी समस्या थी। परमाणु बिजली का सामान्य ईंधन यूरेनियम है, पर भारत में यूरेनियम बहुत कम है। दूसरी ओर, थोरियम नाम का तत्व भारत में बहुत अधिक है — केरल, तमिलनाडु और ओडिशा के समुद्र तटों की मोनाज़ाइट रेत में विश्व के सबसे बड़े थोरियम भंडारों में से एक है। कठिनाई यह है कि थोरियम सीधे ईंधन की तरह नहीं जलता; उसे पहले एक दूसरे पदार्थ में बदलना पड़ता है। इसलिए भाभा ने 1950 के दशक में तीन चरणों की ऐसी योजना बनाई जिसमें हर चरण अगले चरण के लिए ईंधन तैयार करता है।

चित्र 19.3: भाभा का त्रि-चरणीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम — यूरेनियम से थोरियम तक
चित्र 19.3: भाभा का त्रि-चरणीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम — यूरेनियम से थोरियम तक

ऊपर का आरेख केवल सार है। अब तीनों चरणों को एक-एक करके समझें — हर चरण में कौन-सा रिएक्टर है, कौन-सा ईंधन जलता है, क्या बनता है और वह चरण क्यों ज़रूरी है।

◆ पहला चरण — रिएक्टर — इस चरण में दाबित भारी जल रिएक्टर लगाए जाते हैं। भारत के अधिकतर परमाणु बिजलीघर इसी प्रकार के हैं।

◆ पहला चरण — ईंधन — इसमें प्राकृतिक यूरेनियम जलता है। प्राकृतिक यूरेनियम में दो प्रकार के परमाणु होते हैं — बहुत थोड़ा-सा यूरेनियम-235 (एक प्रतिशत से भी कम), जो टूटकर ऊर्जा देता है, और लगभग सारा यूरेनियम-238, जो स्वयं नहीं टूटता।

◆ पहला चरण — उत्पाद — इससे बिजली बनती है। साथ ही, रिएक्टर के भीतर यूरेनियम-238 न्यूट्रॉन सोखकर एक नए पदार्थ प्लूटोनियम-239 में बदल जाता है। जले हुए ईंधन से यह प्लूटोनियम अलग निकाल लिया जाता है। यही दूसरे चरण का ईंधन है।

◆ पहला चरण — स्थिति — यह चरण पूरी तरह चालू है। रावतभाटा (राजस्थान), कलपक्कम (तमिलनाडु), नरोरा (उत्तर प्रदेश), काकरापार (गुजरात) और कैगा (कर्नाटक) के बिजलीघर इसी प्रकार के हैं। तारापुर (महाराष्ट्र) में भी ऐसे रिएक्टर हैं, यद्यपि वहाँ के पहले दो रिएक्टर दूसरे प्रकार (उबलते पानी वाले) के थे।

🔍 आसान परिभाषा: दाबित भारी जल रिएक्टर

📘 परिभाषा: वह परमाणु रिएक्टर जिसमें प्राकृतिक यूरेनियम ईंधन होता है और "भारी जल" दो काम करता है — न्यूट्रॉनों की गति धीमी करना (मंदक) और रिएक्टर की गर्मी बाहर ले जाना (शीतलक)। भारी जल को ऊँचे दाब पर रखा जाता है ताकि वह गर्म होकर भी उबले नहीं।

💡 आसान भाषा में: यानी ऐसा रिएक्टर जो बिना महँगे संवर्धन के, सीधे खदान से निकले साधारण यूरेनियम से चल जाता है — शर्त यह कि उसमें साधारण पानी की जगह भारी जल हो। 🏠 उदाहरण: साधारण पानी में हाइड्रोजन होती है; भारी जल में उसकी जगह हाइड्रोजन का दुगुने भार वाला रूप (ड्यूटीरियम) होता है। भारत के पास यूरेनियम को संवर्धित करने के बड़े कारख़ाने नहीं थे, इसलिए भाभा ने यही रिएक्टर चुना। रावतभाटा का बिजलीघर इसका उदाहरण है।

◆ दूसरा चरण — रिएक्टर — इस चरण में फ़ास्ट ब्रीडर रिएक्टर लगते हैं। "फ़ास्ट" इसलिए कि इनमें न्यूट्रॉनों को धीमा नहीं किया जाता, और "ब्रीडर" इसलिए कि ये ईंधन "पैदा" करते हैं।

◆ दूसरा चरण — ईंधन — इसमें पहले चरण से निकला प्लूटोनियम-239 जलता है। प्लूटोनियम के चारों ओर यूरेनियम-238 और थोरियम-232 का एक आवरण (घेरा) रखा जाता है।

◆ दूसरा चरण — उत्पाद — इससे बिजली बनती है और साथ ही आवरण में रखा यूरेनियम-238 नए प्लूटोनियम में तथा थोरियम-232 एक नए ईंधन यूरेनियम-233 में बदल जाता है। इस रिएक्टर की ख़ूबी यह है कि जितना ईंधन जलता है, उससे अधिक नया ईंधन बन जाता है। यही यूरेनियम-233 तीसरे चरण का ईंधन है।

◆ दूसरा चरण — स्थिति — तमिलनाडु के कलपक्कम में इंदिरा गांधी परमाणु अनुसंधान केंद्र है, जहाँ 1985 से एक छोटा परीक्षण ब्रीडर रिएक्टर चल रहा है। वहीं 500 मेगावाट का प्रोटोटाइप फ़ास्ट ब्रीडर रिएक्टर बनाया गया है, जिसे चालू करने की प्रक्रिया चल रही है। यह चरण अभी आरंभिक अवस्था में है।

🔍 आसान परिभाषा: फ़ास्ट ब्रीडर रिएक्टर

📘 परिभाषा: वह परमाणु रिएक्टर जो तेज़ गति के न्यूट्रॉनों से चलता है और जिसमें ईंधन के चारों ओर रखा अनुपयोगी पदार्थ (यूरेनियम-238 या थोरियम-232) न्यूट्रॉन सोखकर नए ईंधन में बदलता रहता है, जिससे जलने वाले ईंधन से अधिक नया ईंधन तैयार होता है। इसमें गर्मी निकालने के लिए पानी की जगह पिघला हुआ सोडियम काम में लिया जाता है।

💡 आसान भाषा में: यानी ऐसा चूल्हा जो जितनी लकड़ी जलाता है, उससे ज़्यादा नई लकड़ी बना देता है। 🏠 उदाहरण: मान लीजिए रिएक्टर में 100 किलो प्लूटोनियम जला; तो उसी दौरान आवरण में 100 किलो से अधिक नया ईंधन तैयार हो गया। कलपक्कम का प्रोटोटाइप फ़ास्ट ब्रीडर रिएक्टर इसी सिद्धांत पर बना है।

◆ तीसरा चरण — रिएक्टर — इस चरण में थोरियम पर आधारित रिएक्टर लगेंगे; इसके लिए भारतीय वैज्ञानिकों ने उन्नत भारी जल रिएक्टर का नमूना तैयार किया है।

◆ तीसरा चरण — ईंधन — इसमें थोरियम-232 और दूसरे चरण से मिला यूरेनियम-233 साथ रखे जाते हैं। यूरेनियम-233 जलकर ऊर्जा देता है और उससे निकले न्यूट्रॉन आसपास के थोरियम को फिर नए यूरेनियम-233 में बदलते रहते हैं।

◆ तीसरा चरण — उत्पाद — इसका फल है दीर्घकालीन ऊर्जा-सुरक्षा। एक बार यह चक्र चल पड़े तो भारत अपने ही थोरियम से सैकड़ों वर्षों तक बिजली बना सकता है और उसे यूरेनियम के लिए किसी देश पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।

◆ तीसरा चरण — क्यों और स्थिति — यह चरण इसलिए रखा गया कि भारत में यूरेनियम कम और थोरियम बहुत अधिक है। यह चरण अभी भविष्य की बात है, क्योंकि इसके लिए पहले दूसरे चरण से पर्याप्त यूरेनियम-233 बनना ज़रूरी है। कलपक्कम में "कामिनी" नाम का एक छोटा शोध रिएक्टर यूरेनियम-233 से चलता है, जो इस दिशा का प्रयोग है।

🔗 तीनों चरण एक वाक्य में

पहला चरण यूरेनियम जलाकर प्लूटोनियम देता है → दूसरा चरण प्लूटोनियम जलाकर थोरियम से यूरेनियम-233 बनाता है → तीसरा चरण यूरेनियम-233 और थोरियम से लंबे समय तक बिजली देता है। इसे ऐसे समझें — पहली फ़सल के बीज से दूसरी फ़सल, और दूसरी के बीज से तीसरी; किसान को बाहर से बीज नहीं ख़रीदना पड़ता।

5.3 रिएक्टर और बिजलीघर — एक-एक पड़ाव

◆ अप्सरा (1956) — 4 अगस्त 1956 को ट्रॉम्बे में भारत का पहला परमाणु रिएक्टर "अप्सरा" चालू हुआ। यह एशिया का पहला अनुसंधान रिएक्टर था। यह बिजली बनाने के लिए नहीं, बल्कि शोध और प्रशिक्षण के लिए था। इसका ढाँचा भारतीय वैज्ञानिकों ने बनाया और ईंधन ब्रिटेन से आया। पानी के कुंड में नीली चमक देखकर नेहरू ने इसे "अप्सरा" नाम दिया।

◆ साइरस (1960) — 1960 में ट्रॉम्बे में "साइरस" नाम का बड़ा शोध रिएक्टर चालू हुआ। यह कनाडा के सहयोग से बना और इसके लिए भारी जल अमेरिका ने दिया। इसके जले ईंधन से प्लूटोनियम निकालने का कारख़ाना भी ट्रॉम्बे में भारतीय वैज्ञानिकों ने बनाया। आगे 1974 के परीक्षण में इसी अनुभव का उपयोग हुआ।

◆ तारापुर (1969) — 1969 में महाराष्ट्र के तारापुर में भारत का पहला परमाणु बिजलीघर चालू हुआ। यह अमेरिका के सहयोग से बना और इसका ईंधन (संवर्धित यूरेनियम) भी अमेरिका से आता था। यानी अब परमाणु ऊर्जा से घरों और कारख़ानों को बिजली मिलने लगी।

◆ रावतभाटा (1973) — राजस्थान में कोटा के पास रावतभाटा में कनाडा के सहयोग से दाबित भारी जल रिएक्टर वाला बिजलीघर बना। 1974 के परमाणु परीक्षण के बाद कनाडा ने सहयोग बंद कर दिया, तो भारतीय इंजीनियरों ने बाक़ी काम स्वयं पूरा किया। इसका परिणाम यह हुआ कि भारत इस प्रकार के रिएक्टर पूरी तरह स्वयं बनाना सीख गया।

◆ कलपक्कम और आगे — 1980 के दशक में तमिलनाडु के कलपक्कम में पूरी तरह स्वदेशी बिजलीघर चालू हुआ। इसके बाद नरोरा, काकरापार और कैगा में बिजलीघर बने। 1987 में इन बिजलीघरों को बनाने और चलाने के लिए भारतीय परमाणु विद्युत निगम बना। यूरेनियम झारखंड की जादूगोड़ा खदान से निकाला जाता है।

◆ कुडनकुलम (2013 से) — तमिलनाडु के कुडनकुलम में रूस के सहयोग से हज़ार-हज़ार मेगावाट के बड़े रिएक्टर लगे, जिनसे 2013 से बिजली मिलने लगी। यह देश का सबसे बड़ा परमाणु बिजलीघर है। इसके निर्माण के समय आसपास के मछुआरों ने सुरक्षा की आशंका से लंबा विरोध-आंदोलन भी किया।

◆ बिजली के अलावा उपयोग — परमाणु विज्ञान केवल बिजली नहीं देता। रिएक्टरों में बने रेडियो-समस्थानिक कैंसर की जाँच और इलाज में काम आते हैं; विकिरण से मूँगफली और दालों की अधिक उपज वाली नई किस्में बनाई गई हैं; और विकिरण से प्याज़, आलू तथा मसालों को लंबे समय तक ख़राब होने से बचाया जाता है।

5.4 पोखरण-1 (1974) — "शांतिपूर्ण परमाणु विस्फोट"

◆ पृष्ठभूमि — 1962 में चीन से हार हुई और 1964 में चीन ने परमाणु बम का परीक्षण कर लिया। अब भारत के दो पड़ोसियों में से एक परमाणु शक्ति था। 1968 में बड़ी शक्तियों ने परमाणु अप्रसार संधि बनाई, जिसके अनुसार केवल वे पाँच देश परमाणु हथियार रख सकते थे जो 1967 से पहले परीक्षण कर चुके थे। भारत ने इसे भेदभावपूर्ण बताकर हस्ताक्षर नहीं किए — क्योंकि यह कुछ देशों को हथियार रखने देती थी और बाक़ी को रोकती थी।

◆ कब, कहाँ, किसने — 18 मई 1974 को राजस्थान के जैसलमेर ज़िले में पोखरण के रेगिस्तान में भारत ने ज़मीन के नीचे अपना पहला परमाणु परीक्षण किया। उस समय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी थीं। वैज्ञानिक दल के प्रमुख राजा रमन्ना थे और परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष होमी सेठना थे। उस दिन बुद्ध पूर्णिमा थी, इसलिए सफलता का संकेत-संदेश था — "बुद्ध मुस्कुराए"।

◆ भारत का पक्ष — भारत ने इसे "शांतिपूर्ण परमाणु विस्फोट" कहा, यानी यह हथियार बनाने के लिए नहीं, बल्कि खनन और नहर-खुदाई जैसे शांतिपूर्ण कामों की तकनीक परखने के लिए था। भारत ने इसके बाद बम नहीं बनाए।

◆ प्रतिक्रिया — पश्चिमी देशों ने इसे हथियार-परीक्षण ही माना। कनाडा और अमेरिका ने परमाणु सहयोग रोक दिया। परमाणु सामग्री बेचने वाले देशों ने मिलकर परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह बनाया, जिसका उद्देश्य भारत जैसे देशों को परमाणु तकनीक और ईंधन न देना था।

◆ परिणाम — भारत को अगले तीन दशक तक तकनीकी प्रतिबंध झेलने पड़े। पर इसका उलटा लाभ भी हुआ — भारतीय वैज्ञानिकों को भारी जल, ईंधन और रिएक्टर के पुर्ज़े स्वयं बनाने पड़े और देश आत्मनिर्भर हुआ।

5.5 पोखरण-2 (1998) — "ऑपरेशन शक्ति"

◆ पृष्ठभूमि — 1990 के दशक में दो बातें हुईं। एक, यह स्पष्ट होता गया कि पाकिस्तान चीन की सहायता से परमाणु हथियार बना रहा है। दो, 1996 में व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि आई, जो सभी परीक्षणों पर रोक लगाती थी; भारत को लगा कि यदि अभी परीक्षण नहीं किया तो फिर कभी नहीं कर सकेगा। भारत ने इस संधि पर भी हस्ताक्षर नहीं किए।

◆ कब और कैसे — प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने 11 मई 1998 को पोखरण में तीन और 13 मई 1998 को दो — कुल पाँच परमाणु परीक्षण किए। इस अभियान का नाम "ऑपरेशन शक्ति" था। तैयारी इतनी गुप्त रखी गई कि अमेरिका के जासूसी उपग्रह भी उसे नहीं पकड़ सके।

◆ वैज्ञानिक — इस अभियान के दो प्रमुख वैज्ञानिक थे — रक्षा अनुसंधान संगठन के प्रमुख ए. पी. जे. अब्दुल कलाम और परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष आर. चिदंबरम।

◆ प्रतिक्रिया — इस बार भारत ने खुलकर स्वयं को परमाणु हथियार संपन्न देश घोषित किया। अमेरिका, जापान और कई देशों ने आर्थिक प्रतिबंध लगाए। कुछ ही दिन बाद, मई 1998 के अंत में, पाकिस्तान ने भी बलूचिस्तान के चगाई में परीक्षण कर दिए।

◆ महत्त्व — 11 मई को हर वर्ष राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस मनाया जाता है। परीक्षणों के बाद भारत ने स्वेच्छा से आगे परीक्षण न करने की घोषणा की।

5.6 परमाणु सिद्धांत (2003)

हथियार बना लेने के बाद यह बताना ज़रूरी था कि भारत उनका उपयोग कब और कैसे करेगा, ताकि दुनिया को भरोसा रहे कि भारत ज़िम्मेदार देश है। इसलिए 2003 में सरकार ने अपना परमाणु सिद्धांत घोषित किया। इसकी तीन मुख्य बातें हैं:

◆ "पहले प्रयोग नहीं" — भारत किसी देश पर परमाणु हथियार से पहला वार नहीं करेगा। वह इनका उपयोग तभी करेगा जब भारत पर या भारतीय सेनाओं पर परमाणु हमला हो। जिन देशों के पास परमाणु हथियार नहीं हैं, उनके विरुद्ध भारत इनका उपयोग नहीं करेगा।

◆ विश्वसनीय न्यूनतम प्रतिरोध — भारत हथियारों की होड़ में नहीं पड़ेगा; वह केवल उतने हथियार रखेगा जितने से शत्रु को यह डर बना रहे कि हमला करने पर उसे असहनीय जवाब मिलेगा।

◆ नागरिक नियंत्रण — परमाणु हथियार के उपयोग का आदेश सेना नहीं, केवल चुनी हुई सरकार दे सकती है। इसके लिए परमाणु कमान प्राधिकरण बनाया गया, जिसकी राजनीतिक परिषद के अध्यक्ष प्रधानमंत्री होते हैं।

🔍 आसान परिभाषा: विश्वसनीय न्यूनतम प्रतिरोध

📘 परिभाषा: ऐसी रक्षा-नीति जिसमें कोई देश उतने ही परमाणु हथियार रखता है जितने शत्रु को हमला करने से रोकने के लिए पर्याप्त हों, और यह पक्का करता है कि पहला हमला झेलने के बाद भी उसके पास जवाब देने की क्षमता बची रहे।

💡 आसान भाषा में: यानी हथियार लड़ने के लिए नहीं, बल्कि इसलिए कि कोई लड़ने की हिम्मत ही न करे। 🏠 उदाहरण: घर के बाहर बैठा पहरेदार किसी पर हमला नहीं करता, पर उसकी मौजूदगी से चोर पास नहीं आता। भारत के परमाणु हथियार इसी तरह "पहरेदार" हैं; पनडुब्बी में रखी मिसाइलें (खंड 7) यह पक्का करती हैं कि जवाब देने की क्षमता बची रहे।

5.7 भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौता (2008)

◆ पृष्ठभूमि — 1974 से भारत को बाहर से यूरेनियम और रिएक्टर नहीं मिल रहे थे। देश में यूरेनियम कम था, इसलिए कई बिजलीघर अपनी क्षमता से कम चल रहे थे।

◆ घटनाक्रम — 2005 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने समझौते की घोषणा की। भारत ने अपने रिएक्टरों को दो भागों में बाँटना माना — असैन्य (बिजली वाले) और सैन्य; असैन्य रिएक्टरों को अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी की निगरानी में रखा गया। 2008 में परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह ने भारत को विशेष छूट दी और समझौता पूरा हुआ।

◆ विरोध — देश के भीतर वामपंथी दलों ने इसे अमेरिका पर निर्भरता बताकर सरकार से समर्थन वापस ले लिया; सरकार ने जुलाई 2008 में लोकसभा में विश्वास मत जीतकर समझौता आगे बढ़ाया।

◆ महत्त्व — भारत ऐसा अकेला देश बना जिसने परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर नहीं किए, फिर भी उसे दुनिया से परमाणु ईंधन और तकनीक ख़रीदने की अनुमति मिली। इससे 34 वर्ष का परमाणु-अलगाव समाप्त हुआ।

नीचे की तालिका परमाणु कार्यक्रम के सभी पड़ावों को तिथि-क्रम में दोहराती है।

📋 दोहराव तालिका: परमाणु कार्यक्रम के पड़ाव

वर्ष

घटना

1948

परमाणु ऊर्जा अधिनियम पारित हुआ और भाभा की अध्यक्षता में परमाणु ऊर्जा आयोग बना।

1954

3 अगस्त को परमाणु ऊर्जा विभाग बना और ट्रॉम्बे में परमाणु ऊर्जा प्रतिष्ठान खुला, जो 1967 से भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र कहलाता है।

4 अगस्त 1956

ट्रॉम्बे में अप्सरा चालू हुआ, जो एशिया का पहला अनुसंधान रिएक्टर था।

1960

कनाडा के सहयोग से साइरस रिएक्टर चालू हुआ।

24 जनवरी 1966

आल्प्स के मोंट ब्लां पर्वत पर विमान दुर्घटना में भाभा का निधन हुआ।

1969

अमेरिका के सहयोग से तारापुर में भारत का पहला परमाणु बिजलीघर चालू हुआ।

18 मई 1974

पोखरण-1 हुआ, जिसे भारत ने शांतिपूर्ण परमाणु विस्फोट कहा; इसके प्रमुख वैज्ञानिक राजा रमन्ना थे।

11 और 13 मई 1998

पोखरण-2 यानी ऑपरेशन शक्ति में पाँच परीक्षण हुए; 11 मई राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस है।

2003

परमाणु सिद्धांत घोषित हुआ, जिसका आधार "पहले प्रयोग नहीं" और विश्वसनीय न्यूनतम प्रतिरोध है।

2008

भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौता पूरा हुआ और परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह ने भारत को विशेष छूट दी।

2013 से

रूस के सहयोग से बना कुडनकुलम बिजलीघर बिजली देने लगा; यह देश का सबसे बड़ा परमाणु बिजलीघर है।

6. अंतरिक्ष कार्यक्रम

1957 में सोवियत संघ ने पहला कृत्रिम उपग्रह "स्पुतनिक" छोड़ा और अमेरिका-सोवियत संघ में अंतरिक्ष की होड़ शुरू हो गई। बहुत-से लोगों ने पूछा कि जिस देश में करोड़ों लोग भूखे हैं, उसे रॉकेट से क्या लेना-देना? इसका उत्तर डॉ. विक्रम साराभाई ने दिया, जिन्हें "भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम का जनक" कहा जाता है। उन्होंने कहा कि भारत का लक्ष्य चंद्रमा पर जाने की होड़ नहीं है; भारत अंतरिक्ष तकनीक इसलिए चाहता है कि उससे आम आदमी की समस्याएँ — शिक्षा, संचार, मौसम की जानकारी, खेती और आपदा से बचाव — हल हों।

❝ हमें इस बात में कोई भ्रम नहीं है कि हम चंद्रमा या ग्रहों की खोज में आर्थिक रूप से उन्नत देशों से होड़ कर रहे हैं। पर हमारा विश्वास है कि यदि हमें राष्ट्रों के समुदाय में सार्थक भूमिका निभानी है, तो मनुष्य और समाज की वास्तविक समस्याओं के लिए उन्नत तकनीक के उपयोग में हमें किसी से पीछे नहीं रहना चाहिए। ❞ (विक्रम साराभाई)

इस खंड में पहले आरेख से पूरी यात्रा एक नज़र में देखें, फिर उसके हर पड़ाव को विस्तार से पढ़ें।

चित्र 19.4: भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम की प्रमुख उपलब्धियाँ (1962–2025)
चित्र 19.4: भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम की प्रमुख उपलब्धियाँ (1962–2025)

ऊपर के कालक्रम में नौ पड़ाव हैं। नीचे इन्हीं नौ पड़ावों का, और उनके साथ हर प्रक्षेपण यान तथा हर बड़े मिशन का, अलग-अलग विस्तार दिया गया है।

6.1 शुरुआत: राष्ट्रीय समिति और थुम्बा (1962–1963)

◆ अंतरिक्ष अनुसंधान की राष्ट्रीय समिति (1962) — 1962 में परमाणु ऊर्जा विभाग के अंतर्गत यह समिति बनी, जिसके अध्यक्ष विक्रम साराभाई थे। भाभा और नेहरू ने इसे पूरा समर्थन दिया। यही आगे चलकर इसरो बनी।

◆ थुम्बा क्यों चुना गया — केरल में तिरुवनंतपुरम के पास थुम्बा नाम का मछुआरों का गाँव पृथ्वी की चुंबकीय भूमध्य रेखा के बहुत पास है। ऊपरी वायुमंडल के अध्ययन के लिए यह स्थान बहुत उपयुक्त था। वहाँ के ईसाई मछुआरों और बिशप ने वैज्ञानिकों के अनुरोध पर अपना चर्च और ज़मीन विज्ञान के लिए दे दी।

◆ पहला रॉकेट (21 नवंबर 1963) — इसी दिन थुम्बा से भारत की धरती से पहला रॉकेट छोड़ा गया। यह अमेरिका में बना छोटा साउंडिंग रॉकेट था। इसके पुर्ज़े साइकिल पर लाए गए थे (अध्याय की आरंभिक कहानी देखें)। कुछ वर्ष बाद भारत ने "रोहिणी" नाम से अपने साउंडिंग रॉकेट बनाना शुरू कर दिया।

🔍 आसान परिभाषा: साउंडिंग रॉकेट

📘 परिभाषा: छोटा रॉकेट जो वैज्ञानिक उपकरणों को ऊपरी वायुमंडल तक ले जाता है, वहाँ कुछ मिनट माप लेता है और फिर नीचे गिर जाता है। यह पृथ्वी की परिक्रमा नहीं करता और कोई उपग्रह कक्षा में नहीं छोड़ता।

💡 आसान भाषा में: यानी आसमान की "जाँच" करने वाला छोटा रॉकेट — ऊपर गया, हवा-तापमान नापा और लौट आया। 🏠 उदाहरण: जैसे डॉक्टर थर्मामीटर लगाकर बुख़ार नापता है, वैसे ही 1963 में थुम्बा से छोड़े गए रॉकेट ने ऊपरी वायुमंडल में हवाओं की दिशा नापी। बड़ा प्रक्षेपण यान बनाने से पहले वैज्ञानिक इन्हीं छोटे रॉकेटों से सीखते हैं।

6.2 इसरो की स्थापना (15 अगस्त 1969)

◆ स्थापना — 15 अगस्त 1969 को राष्ट्रीय समिति की जगह भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) बना। इसका मुख्यालय बंगलौर में है।

◆ अंतरिक्ष आयोग और अंतरिक्ष विभाग (1972) — 1972 में सरकार ने अंतरिक्ष आयोग और अलग अंतरिक्ष विभाग बनाया और इसरो को इसके अधीन रखा। परमाणु ऊर्जा की तरह यह विभाग भी सीधे प्रधानमंत्री के अधीन रहा।

◆ साराभाई का निधन और सतीश धवन — 30 दिसंबर 1971 को केवल 52 वर्ष की आयु में साराभाई का अचानक निधन हो गया। उनके बाद 1972 से 1984 तक सतीश धवन इसरो के अध्यक्ष रहे। उन्होंने संगठन को मज़बूत ढाँचा दिया, उपग्रह और प्रक्षेपण यान दोनों के कार्यक्रम खड़े किए और विफलता की ज़िम्मेदारी स्वयं लेकर सफलता का श्रेय अपनी टीम को देने की परंपरा बनाई। आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा का प्रक्षेपण केंद्र आज उन्हीं के नाम पर सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र कहलाता है, और तिरुवनंतपुरम का रॉकेट केंद्र साराभाई के नाम पर विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र है।

6.3 आर्यभट और "साइट" (1975)

◆ आर्यभट (19 अप्रैल 1975) — यह भारत का पहला उपग्रह था, जिसका नाम पाँचवीं सदी के महान गणितज्ञ-खगोलशास्त्री आर्यभट के नाम पर रखा गया। इसे भारतीय वैज्ञानिकों ने बंगलौर में बनाया; इस दल के प्रमुख यू. आर. राव थे। उस समय भारत के पास अपना प्रक्षेपण यान नहीं था, इसलिए इसे सोवियत संघ के रॉकेट से सोवियत धरती से छोड़ा गया। इसका महत्त्व यह था कि भारत ने उपग्रह बनाना सीख लिया।

◆ "साइट" प्रयोग (1975–76) — इसका पूरा नाम उपग्रह शैक्षिक दूरदर्शन प्रयोग था। अमेरिका के एक उपग्रह को एक वर्ष के लिए उधार लेकर छह राज्यों के लगभग 2400 गाँवों में सामुदायिक टीवी लगाए गए और उन पर खेती, स्वास्थ्य, परिवार नियोजन और बच्चों की पढ़ाई के कार्यक्रम दिखाए गए। जिन गाँवों में बिजली और सड़क तक नहीं थी, वहाँ आसमान से शिक्षा पहुँची। यह साराभाई के सपने का पहला बड़ा प्रमाण था कि अंतरिक्ष तकनीक ग़रीब देश के काम आ सकती है।

◆ भास्कर (1979) — यह भारत का पहला प्रायोगिक सुदूर संवेदन उपग्रह था, जो सोवियत रॉकेट से छोड़ा गया। इसने अंतरिक्ष से धरती के चित्र लेकर वन, जल और भू-विज्ञान के अध्ययन का प्रयोग किया।

6.4 एस.एल.वी.-3 — पहला स्वदेशी प्रक्षेपण यान (1980)

◆ क्या था — उपग्रह प्रक्षेपण यान यानी एस.एल.वी.-3 भारत का पहला स्वदेशी प्रक्षेपण यान था। यह चार चरणों वाला, ठोस ईंधन से चलने वाला रॉकेट था, जो लगभग 40 किलोग्राम का छोटा उपग्रह पृथ्वी की निचली कक्षा में पहुँचा सकता था।

◆ विफलता और सफलता — इसकी पहली उड़ान 1979 में विफल रही और रॉकेट बंगाल की खाड़ी में गिर गया। दल ने हार नहीं मानी और 18 जुलाई 1980 को श्रीहरिकोटा से दूसरी उड़ान में "रोहिणी" उपग्रह को सफलतापूर्वक कक्षा में स्थापित कर दिया। इस परियोजना के निदेशक ए. पी. जे. अब्दुल कलाम थे।

◆ महत्त्व — इस सफलता के साथ भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल हो गया जो अपने यान से अपना उपग्रह छोड़ सकते थे। इसी यान की ठोस ईंधन तकनीक से आगे अग्नि मिसाइल का विकास हुआ (खंड 7)।

6.5 ए.एस.एल.वी. — संवर्धित प्रक्षेपण यान (1987–94)

◆ क्या था — यह एस.एल.वी.-3 का बड़ा रूप था, जिसका उद्देश्य लगभग 150 किलोग्राम के उपग्रह छोड़ना और आगे के बड़े यानों के लिए नई तकनीकें परखना था।

◆ क्या हुआ — 1987 से 1994 के बीच इसकी उड़ानें हुईं। आरंभिक उड़ानें विफल रहीं और बाद की दो उड़ानें सफल हुईं। यह यान अधिक काम में नहीं आया, पर इसकी विफलताओं से मिली सीख ने अगले यान — पी.एस.एल.वी. — को भरोसेमंद बनाया।

6.6 एप्पल, इन्सैट और राकेश शर्मा (1981–1984)

◆ एप्पल (1981) — यह भारत का पहला प्रायोगिक संचार उपग्रह था, जिसे यूरोप के रॉकेट से छोड़ा गया। परीक्षण के समय इसी उपग्रह को बैलगाड़ी पर रखा गया था, जिसका चित्र भारतीय विज्ञान की सादगी का प्रतीक बन गया।

◆ इन्सैट शृंखला (1982 से) — भारतीय राष्ट्रीय उपग्रह प्रणाली के उपग्रह एक साथ तीन काम करते थे — टेलीफ़ोन और टीवी का संचार, मौसम के चित्र और आपदा की चेतावनी। पहला उपग्रह (1982) कुछ ही महीनों में बंद हो गया, पर इन्सैट-1बी (1983) पूरी तरह सफल रहा। इसका परिणाम यह हुआ कि दूरदर्शन देश के कोने-कोने तक पहुँच गया, दूर-दराज़ के इलाक़ों में टेलीफ़ोन पहुँचा और चक्रवात आने से पहले तटीय गाँवों को चेतावनी मिलने लगी।

◆ राकेश शर्मा (3 अप्रैल 1984) — भारतीय वायुसेना के पायलट राकेश शर्मा सोवियत अंतरिक्ष यान में बैठकर अंतरिक्ष में गए और लगभग आठ दिन सोवियत अंतरिक्ष स्टेशन पर रहे। वे अंतरिक्ष में जाने वाले पहले भारतीय बने। जब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उनसे पूछा कि ऊपर से भारत कैसा दिखता है, तो उनका उत्तर था — "सारे जहाँ से अच्छा"।

🔍 आसान परिभाषा: ध्रुवीय कक्षा और भू-स्थिर कक्षा

📘 परिभाषा: ध्रुवीय कक्षा वह पथ है जिसमें उपग्रह कुछ सौ किलोमीटर की ऊँचाई पर उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव के ऊपर से होकर पृथ्वी का चक्कर लगाता है। भू-स्थिर कक्षा भूमध्य रेखा के ऊपर लगभग 36,000 किलोमीटर की ऊँचाई का वह पथ है जिसमें उपग्रह ठीक उतने समय (24 घंटे) में एक चक्कर लगाता है जितने में पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है।

💡 आसान भाषा में: यानी ध्रुवीय कक्षा का उपग्रह ऊपर-नीचे घूमते हुए बारी-बारी से पूरी धरती को देख लेता है; भू-स्थिर कक्षा का उपग्रह धरती के साथ-साथ घूमता है, इसलिए हमें आसमान में एक ही जगह "ठहरा" दिखता है। 🏠 उदाहरण: खेत, जंगल और खनिज के चित्र लेने वाले सुदूर संवेदन उपग्रह ध्रुवीय कक्षा में रखे जाते हैं। टीवी और मौसम के उपग्रह (जैसे इन्सैट) भू-स्थिर कक्षा में रखे जाते हैं — इसी कारण घर की छतरी (डिश) को एक बार एक दिशा में लगा देने पर उसे बार-बार घुमाना नहीं पड़ता।

6.7 सुदूर संवेदन उपग्रह (1988 से)

◆ आई.आर.एस.-1ए (1988) — भारतीय सुदूर संवेदन उपग्रह शृंखला का यह पहला उपग्रह सोवियत रॉकेट से छोड़ा गया। इसके बाद भारत ने ऐसे अनेक उपग्रह अपने यानों से छोड़े और आज भारत के पास विश्व के बड़े सुदूर संवेदन उपग्रह-समूहों में से एक है।

◆ उपयोग — इन उपग्रहों के चित्रों से फ़सल के क्षेत्रफल और उपज का अनुमान लगाया जाता है, भूजल के स्रोत खोजे जाते हैं, वनों की कटाई पर नज़र रखी जाती है, बाढ़ और सूखे का आकलन होता है और मछुआरों को बताया जाता है कि समुद्र में मछलियाँ कहाँ अधिक मिलेंगी।

🔍 आसान परिभाषा: सुदूर संवेदन

📘 परिभाषा: किसी वस्तु या क्षेत्र को बिना छुए, दूर से — विमान या उपग्रह पर लगे कैमरों और संवेदकों की सहायता से — उसकी जानकारी इकट्ठा करने की तकनीक। संवेदक धरती से लौटने वाले प्रकाश और ऊष्मा-किरणों को नापते हैं।

💡 आसान भाषा में: यानी आसमान से धरती की "फ़ोटो" खींचकर यह जान लेना कि नीचे क्या है और कैसी हालत में है। 🏠 उदाहरण: हरी-भरी स्वस्थ फ़सल और सूखी फ़सल उपग्रह के चित्र में अलग-अलग रंग की दिखती हैं; इससे सरकार बुवाई के कुछ ही सप्ताह बाद अनुमान लगा लेती है कि इस वर्ष गेहूँ कितना होगा, और सूखे की आशंका वाले ज़िलों को पहले से सहायता भेज सकती है।

6.8 पी.एस.एल.वी. — "इसरो का भरोसेमंद घोड़ा" (1994)

◆ क्या है — ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान चार चरणों वाला रॉकेट है, जिसमें ठोस और द्रव ईंधन के चरण बारी-बारी से लगे हैं। इसे सुदूर संवेदन उपग्रहों को ध्रुवीय कक्षा में पहुँचाने के लिए बनाया गया, ताकि भारत को विदेशी रॉकेट किराये पर न लेने पड़ें।

◆ कब — इसकी पहली उड़ान 1993 में विफल रही; 1994 में पहली सफल उड़ान हुई। इसके बाद इसने लगातार इतनी सफल उड़ानें भरीं कि इसे "इसरो का भरोसेमंद घोड़ा" कहा जाने लगा।

◆ क्या हासिल हुआ — इसी यान से चंद्रयान-1 (2008), मंगलयान (2013) और आदित्य-एल1 (2023) छोड़े गए। 15 फ़रवरी 2017 को इसने एक ही उड़ान में 104 उपग्रह कक्षा में पहुँचाकर उस समय का विश्व रिकॉर्ड बनाया। इसकी कम लागत के कारण कई देश अपने उपग्रह इससे छुड़वाते हैं, जिससे भारत को विदेशी मुद्रा मिलती है।

6.9 जी.एस.एल.वी. और क्रायोजेनिक इंजन की कहानी (2001–2014)

📖 कहानी 2: जिस तकनीक को देने से मना किया गया, उसे भारत ने ख़ुद बनाया

संचार उपग्रह भारी होते हैं और उन्हें लगभग 36,000 किलोमीटर ऊँची भू-स्थिर कक्षा में पहुँचाना होता है, जहाँ से वे धरती के साथ-साथ घूमते हुए आसमान में एक ही जगह ठहरे दिखते हैं। इसरो का पी.एस.एल.वी. इतना बोझ इतनी ऊँचाई तक नहीं ले जा सकता था। इसलिए भू-स्थिर उपग्रह प्रक्षेपण यान (जी.एस.एल.वी.) बनाने का फ़ैसला हुआ, जिसके सबसे ऊपरी चरण में क्रायोजेनिक इंजन लगना था।

यह इंजन द्रव हाइड्रोजन और द्रव ऑक्सीजन से चलता है, जिन्हें द्रव बनाए रखने के लिए शून्य से सैकड़ों डिग्री कम तापमान चाहिए। इतनी ठंड में साधारण धातु काँच की तरह चटक जाती है और वाल्व जम जाते हैं, इसीलिए यह तकनीक गिने-चुने देशों के पास थी। 1990 के दशक की शुरुआत में भारत ने रूस से यह इंजन और उसकी तकनीक लेने का समझौता किया।

लेकिन अमेरिका ने दबाव डाला कि इस तकनीक से मिसाइल भी बन सकती है। दबाव में रूस ने कुछ बने-बनाए इंजन तो दिए, पर तकनीक नहीं दी। 2001 में जी.एस.एल.वी. की पहली उड़ान रूसी इंजन के सहारे हुई, पर भारत समझ चुका था कि हमेशा दूसरों पर निर्भर नहीं रहा जा सकता।

इसलिए भारतीय वैज्ञानिक लगभग दो दशक तक अपना क्रायोजेनिक इंजन बनाने में जुटे रहे। 2014 में स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन वाली उड़ान सफल हुई और भारत भारी संचार उपग्रह स्वयं छोड़ने लगा। इसी क्रायोजेनिक चरण वाले यान से आगे चंद्रयान-2 और चंद्रयान-3 जैसे अभियान भी भेजे गए। रुकावट ने भारत को पीछे नहीं धकेला, बल्कि आत्मनिर्भर बना दिया।

🧭 इस कहानी से कौन-सी अवधारणा साफ़ हुई

✔ भू-स्थिर कक्षा — भूमध्य रेखा के ऊपर लगभग 36,000 किलोमीटर की ऊँचाई, जहाँ उपग्रह 24 घंटे में एक चक्कर लगाकर धरती के साथ घूमता है; टीवी और मौसम के उपग्रह यहीं रखे जाते हैं।

✔ क्रायोजेनिक इंजन — अत्यंत ठंडे द्रव हाइड्रोजन और द्रव ऑक्सीजन से चलने वाला इंजन, जो उसी भार के दूसरे ईंधनों से कहीं अधिक धक्का देता है।

✔ तकनीक पर रोक और आत्मनिर्भरता — तकनीक देने से मना किए जाने पर भारत ने अपना इंजन ख़ुद बनाया, जो प्रतिबंधों के बीच आत्मनिर्भरता का बड़ा उदाहरण है।

📝 परीक्षा के लिए: परीक्षा-सूत्र: जी.एस.एल.वी. की पहली उड़ान 2001 (रूसी इंजन); स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन की सफल उड़ान 2014; भू-स्थिर कक्षा लगभग 36,000 किमी

◆ ज़रूरत क्यों पड़ी — संचार उपग्रह भारी होते हैं और उन्हें 36,000 किलोमीटर ऊँची भू-स्थिर कक्षा में पहुँचाना होता है। पी.एस.एल.वी. इतना बोझ उतनी ऊँचाई तक नहीं ले जा सकता था। इसलिए भू-स्थिर उपग्रह प्रक्षेपण यान बनाया गया, जिसके सबसे ऊपरी चरण में क्रायोजेनिक इंजन चाहिए था।

◆ तकनीक देने से इनकार — भारत ने 1990 के दशक की शुरुआत में रूस से क्रायोजेनिक इंजन और उसकी तकनीक लेने का समझौता किया। पर अमेरिका ने दबाव डाला कि इस तकनीक से मिसाइल बन सकती है। दबाव में रूस ने कुछ बने-बनाए इंजन तो दिए, पर तकनीक नहीं दी।

◆ क्या हुआ — जी.एस.एल.वी. की पहली उड़ान 2001 में रूसी इंजन के साथ हुई। इस बीच भारतीय वैज्ञानिकों ने लगभग दो दशक की मेहनत से स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन बना लिया, जिसकी सफल उड़ान 2014 में हुई। यह प्रतिबंधों के बीच आत्मनिर्भरता का बड़ा उदाहरण है।

🔍 आसान परिभाषा: क्रायोजेनिक इंजन

📘 परिभाषा: वह रॉकेट इंजन जिसमें ईंधन के रूप में द्रव हाइड्रोजन और उसे जलाने के लिए द्रव ऑक्सीजन काम में ली जाती है। इन गैसों को द्रव बनाए रखने के लिए अत्यंत कम तापमान चाहिए — हाइड्रोजन के लिए शून्य से लगभग 253 डिग्री सेल्सियस नीचे और ऑक्सीजन के लिए लगभग 183 डिग्री नीचे।

💡 आसान भाषा में: यानी बेहद ठंडे द्रव ईंधन से चलने वाला इंजन, जो उतने ही भार के दूसरे ईंधनों से कहीं अधिक धक्का देता है। 🏠 उदाहरण: इतनी ठंड में साधारण धातु काँच की तरह चटक जाती है और वाल्व जम जाते हैं; इसी कारण यह तकनीक बहुत कठिन है और गिने-चुने देशों के पास है। 2014 में स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन वाली उड़ान सफल होने पर भारत भारी संचार उपग्रह स्वयं छोड़ने लगा।

6.10 एल.वी.एम.3 — सबसे भारी यान

◆ क्या है — यह इसरो का सबसे भारी और शक्तिशाली प्रक्षेपण यान है। इसमें दो बड़े ठोस ईंधन के बूस्टर, एक द्रव ईंधन का चरण और ऊपर स्वदेशी क्रायोजेनिक चरण है। यह लगभग चार टन का उपग्रह भू-स्थिर कक्षा की ओर भेज सकता है।

◆ क्या हासिल हुआ — इसी यान से चंद्रयान-2 (2019) और चंद्रयान-3 (2023) छोड़े गए। भारत की मानव अंतरिक्ष उड़ान "गगनयान" भी इसी यान के मानव-योग्य रूप से भेजी जाएगी।

◆ छोटा यान — छोटे उपग्रहों की बढ़ती माँग को देखकर इसरो ने एक लघु उपग्रह प्रक्षेपण यान भी बनाया है, जो कम समय और कम ख़र्च में तैयार हो जाता है।

पाँचों मुख्य यानों को नीचे की तालिका से एक साथ दोहराएँ।

📋 दोहराव तालिका: प्रक्षेपण यान

प्रक्षेपण यान

विशेष बात

एस.एल.वी.-3

यह पहला स्वदेशी यान था, जिसने 18 जुलाई 1980 को रोहिणी उपग्रह कक्षा में पहुँचाया।

ए.एस.एल.वी.

यह संवर्धित यान 1987 से 1994 के बीच उड़ा और इसकी दो उड़ानें सफल रहीं।

पी.एस.एल.वी.

इस ध्रुवीय यान की पहली सफल उड़ान 1994 में हुई; इसने चंद्रयान-1, मंगलयान और आदित्य-एल1 छोड़े तथा 2017 में एक साथ 104 उपग्रह छोड़े।

जी.एस.एल.वी.

यह भू-स्थिर कक्षा के लिए है; स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन के साथ इसकी सफल उड़ान 2014 में हुई।

एल.वी.एम.3

यह सबसे भारी यान है, जिसने चंद्रयान-2 और चंद्रयान-3 छोड़े और जो गगनयान का आधार है।

6.11 चंद्रयान-1 (2008)

◆ क्या था — यह चंद्रमा की ओर भारत का पहला मिशन था। यह चंद्रमा पर उतरा नहीं, बल्कि उसकी परिक्रमा करते हुए उसकी सतह और खनिजों का अध्ययन करता रहा। इसे अक्टूबर 2008 में पी.एस.एल.वी. से छोड़ा गया।

◆ क्या हासिल हुआ — इसके साथ गया एक छोटा उपकरण (जिस पर तिरंगा बना था) नवंबर 2008 में चंद्रमा की सतह से टकराया, यानी भारत का झंडा चंद्रमा तक पहुँचा। इस मिशन के उपकरणों ने चंद्रमा पर पानी के अणुओं के प्रमाण दिए — यह खोज विश्व-विज्ञान के लिए बहुत बड़ी थी, क्योंकि तब तक चंद्रमा को बिलकुल सूखा माना जाता था।

6.12 मंगलयान (2013–14)

◆ क्या था — इसका औपचारिक नाम मंगल कक्षित्र मिशन था। इसे 5 नवंबर 2013 को पी.एस.एल.वी. से छोड़ा गया और लगभग दस महीने की यात्रा के बाद 24 सितंबर 2014 को यह मंगल की कक्षा में पहुँच गया।

◆ क्या हासिल हुआ — भारत पहले ही प्रयास में मंगल की कक्षा में पहुँचने वाला विश्व का पहला देश बना, और मंगल तक पहुँचने वाला पहला एशियाई देश भी। इसकी लागत लगभग 450 करोड़ रुपये थी — हॉलीवुड की एक बड़ी फ़िल्म के बजट से भी कम। इसलिए यह कम ख़र्च में बड़ा विज्ञान का विश्व-प्रसिद्ध उदाहरण बना।

6.13 "नाविक" — भारत की अपनी नेविगेशन प्रणाली

◆ क्या है — इसका औपचारिक नाम भारतीय क्षेत्रीय नेविगेशन उपग्रह प्रणाली है। इसमें कई उपग्रह मिलकर भारत और उसके आसपास के क्षेत्र में किसी भी स्थान की सटीक स्थिति बताते हैं। इसे भारत का अपना "जीपीएस" कहा जा सकता है।

◆ क्यों ज़रूरी — जीपीएस अमेरिका की सेना की प्रणाली है और संकट के समय वह इसकी जानकारी देने से मना कर सकता है। अपनी प्रणाली होने से सेना, जहाज़, विमान और मछुआरे किसी दूसरे देश पर निर्भर नहीं रहते।

6.14 चंद्रयान-2 (2019)

◆ क्या था — इसे जुलाई 2019 में छोड़ा गया। इसके तीन भाग थे — परिक्रमा करने वाला कक्षित्र, उतरने वाला लैंडर "विक्रम" (साराभाई के नाम पर) और चलने वाला रोवर "प्रज्ञान"।

◆ क्या हुआ — सितंबर 2019 में उतरते समय अंतिम क्षणों में लैंडर से संपर्क टूट गया और वह सतह से टकरा गया। पर कक्षित्र सफल रहा और चंद्रमा की परिक्रमा करते हुए आँकड़े भेजता रहा। इस आंशिक विफलता से मिली सीख ने ही चंद्रयान-3 की सफलता का रास्ता बनाया।

6.15 चंद्रयान-3 और आदित्य-एल1 (2023)

◆ चंद्रयान-3 — इसे जुलाई 2023 में छोड़ा गया और 23 अगस्त 2023 को इसका लैंडर "विक्रम" चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास धीरे से उतर गया। भारत चंद्रमा पर उतरने वाला चौथा देश बना (सोवियत संघ, अमेरिका और चीन के बाद) और दक्षिणी ध्रुव के पास उतरने वाला पहला। रोवर "प्रज्ञान" ने सतह पर चलकर मिट्टी की जाँच की और वहाँ गंधक होने की पुष्टि की।

◆ शिव शक्ति बिंदु और राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस — जिस स्थान पर लैंडर उतरा, उसका नाम "शिव शक्ति बिंदु" रखा गया। 23 अगस्त को हर वर्ष राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस मनाया जाता है।

◆ दक्षिणी ध्रुव क्यों — चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के गहरे गड्ढों में सूर्य का प्रकाश कभी नहीं पहुँचता, इसलिए वहाँ जमी हुई बर्फ़ होने की संभावना है। पानी मिल जाए तो भविष्य में चंद्रमा पर मानव-बस्ती और ईंधन बनाना संभव हो सकता है।

◆ आदित्य-एल1 — यह सूर्य के अध्ययन के लिए भारत का पहला मिशन है। इसे सितंबर 2023 में पी.एस.एल.वी. से छोड़ा गया और यह पृथ्वी से लगभग 15 लाख किलोमीटर दूर उस बिंदु पर पहुँचा जहाँ से सूर्य बिना किसी रुकावट के लगातार दिखता है। यह सूर्य की बाहरी परत और सौर तूफ़ानों का अध्ययन करता है, जो हमारे उपग्रहों और बिजली-जाल को हानि पहुँचा सकते हैं।

6.16 अंतरिक्ष डॉकिंग और अंतरिक्ष स्टेशन (2025)

◆ "स्पेडेक्स" (जनवरी 2025) — इस प्रयोग में इसरो ने अंतरिक्ष में घूम रहे अपने दो उपग्रहों को आपस में जोड़ा। इसे डॉकिंग कहते हैं। यह तकनीक इसलिए ज़रूरी है कि अंतरिक्ष स्टेशन बनाने, उसमें यात्रियों को पहुँचाने और चंद्रमा से नमूने लाने के लिए दो यानों को अंतरिक्ष में जोड़ना पड़ता है।

◆ शुभांशु शुक्ला (2025) — भारतीय वायुसेना के पायलट शुभांशु शुक्ला 2025 में एक अंतरराष्ट्रीय मिशन के साथ अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर गए। वे वहाँ जाने वाले पहले भारतीय और राकेश शर्मा के बाद अंतरिक्ष में जाने वाले दूसरे भारतीय नागरिक बने।

◆ आगे की योजना — गगनयान — इस मिशन में भारतीय अंतरिक्ष यात्री भारतीय यान में बैठकर भारत की धरती से अंतरिक्ष में जाएँगे। इसके बाद भारत अपना अंतरिक्ष स्टेशन बनाने की योजना पर काम कर रहा है।

🧠 याद रखने की बात: अंतरिक्ष के "पहले"

पहला रॉकेट — थुम्बा, 21 नवंबर 1963। पहला उपग्रह — आर्यभट, 19 अप्रैल 1975 (सोवियत रॉकेट से)। पहला स्वदेशी यान — एस.एल.वी.-3, 18 जुलाई 1980 (रोहिणी)।

अंतरिक्ष में पहले भारतीय — राकेश शर्मा, 3 अप्रैल 1984। अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर पहले भारतीय — शुभांशु शुक्ला, 2025।

पहला चंद्र मिशन — चंद्रयान-1 (2008)। पहला मंगल मिशन — मंगलयान (कक्षा में 24 सितंबर 2014)। पहला सौर मिशन — आदित्य-एल1 (2023)।

भारतीय मूल की अंतरिक्ष यात्री कल्पना चावला और सुनीता विलियम्स अमेरिकी अंतरिक्ष संस्था की ओर से अंतरिक्ष में गईं; कल्पना चावला का 2003 में कोलंबिया यान की दुर्घटना में निधन हुआ।

7. रक्षा अनुसंधान और मिसाइल कार्यक्रम

स्वतंत्रता के समय भारत की सेना के लगभग सारे हथियार विदेश से आते थे। 1962 में चीन के हाथों हार ने दिखा दिया कि केवल ख़रीदे हुए हथियारों पर टिकी सेना सुरक्षित नहीं है — क्योंकि युद्ध के समय बेचने वाला देश पुर्ज़े और गोला-बारूद रोक सकता है। इसलिए भारत ने धीरे-धीरे अपनी मिसाइलें, विमान, टैंक, रडार और पनडुब्बियाँ स्वयं बनाने का रास्ता चुना।

7.1 रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (1958)

◆ स्थापना — 1958 में रक्षा विज्ञान से जुड़ी कुछ पुरानी संस्थाओं को मिलाकर रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन बनाया गया। भौतिकशास्त्री दौलत सिंह कोठारी रक्षा मंत्री के पहले वैज्ञानिक सलाहकार थे और उन्होंने इस संगठन की नींव रखने में मुख्य भूमिका निभाई।

◆ काम — यह संगठन देश भर में फैली दर्जनों प्रयोगशालाओं के माध्यम से सेना के लिए मिसाइल, लड़ाकू विमान, रडार, टैंक, तोप, संचार उपकरण और सैनिकों के लिए विशेष भोजन तथा कपड़े तक विकसित करता है। इसकी मिसाइल प्रयोगशाला हैदराबाद में है।

◆ आरंभिक प्रयास — 1960 के दशक में बंगलौर के हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स कारख़ाने में भारत का पहला अपना जेट लड़ाकू विमान "मारुत" बना। यह दिखाता है कि आत्मनिर्भरता का प्रयास आरंभ से ही था, भले ही सफलता धीरे मिली।

🔍 आसान परिभाषा: बैलिस्टिक और क्रूज़ मिसाइल

📘 परिभाषा: बैलिस्टिक मिसाइल वह है जिसे रॉकेट शुरू में बहुत ऊँचाई तक (प्रायः वायुमंडल के बाहर) ले जाता है और फिर वह गुरुत्वाकर्षण के कारण फेंके गए पत्थर की तरह वक्र पथ से लक्ष्य पर गिरती है। क्रूज़ मिसाइल पूरे रास्ते अपने इंजन से, वायुमंडल के भीतर कम ऊँचाई पर, विमान की तरह उड़ती हुई लक्ष्य तक जाती है और रास्ते में दिशा बदल सकती है।

💡 आसान भाषा में: यानी बैलिस्टिक मिसाइल ऊपर उछाली गई गेंद की तरह है — ऊँची जाती है और दूर जाकर गिरती है; क्रूज़ मिसाइल बिना पायलट के छोटे विमान की तरह है — नीचे-नीचे उड़कर निशाने तक पहुँचती है। 🏠 उदाहरण: अग्नि और पृथ्वी बैलिस्टिक मिसाइलें हैं, जो हज़ारों किलोमीटर दूर तक मार कर सकती हैं। ब्रह्मोस क्रूज़ मिसाइल है, जो कम ऊँचाई पर बहुत तेज़ उड़ती है, इसलिए शत्रु के रडार के लिए उसे समय रहते पकड़ना कठिन होता है।

7.2 समन्वित निर्देशित मिसाइल विकास कार्यक्रम (1983)

◆ पृष्ठभूमि — 1974 के बाद कोई देश भारत को मिसाइल तकनीक देने को तैयार नहीं था। 1980 में एस.एल.वी.-3 की सफलता से भारत के पास रॉकेट बनाने का अनुभव आ चुका था।

◆ कब और किसने — 1983 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार ने यह कार्यक्रम स्वीकृत किया। इसका नेतृत्व ए. पी. जे. अब्दुल कलाम को सौंपा गया, जो इसरो से रक्षा अनुसंधान संगठन में आए थे। इसी कारण वे "मिसाइल मैन" कहलाए।

◆ क्या था — इस एक कार्यक्रम के अंतर्गत पाँच मिसाइलें एक साथ विकसित की गईं — पृथ्वी, अग्नि, त्रिशूल, आकाश और नाग। "समन्वित" का अर्थ यही था कि पाँचों पर काम एक ही छत के नीचे, साझा तकनीक और साझा प्रयोगशालाओं से हो।

◆ विरोध और उत्तर — पश्चिमी देशों ने मिसाइल प्रौद्योगिकी नियंत्रण व्यवस्था बनाकर भारत को ज़रूरी पुर्ज़े और धातुएँ बेचने पर रोक लगा दी। इसका उत्तर भारतीय प्रयोगशालाओं और उद्योगों ने वे पुर्ज़े स्वयं बनाकर दिया।

7.3 पाँचों मिसाइलें — एक-एक करके

◆ पृथ्वी — यह सतह से सतह पर मार करने वाली पहली स्वदेशी बैलिस्टिक मिसाइल है। इसका पहला परीक्षण 1988 में हुआ। यह कम दूरी (कुछ सौ किलोमीटर) की मिसाइल है और द्रव ईंधन से चलती है। इसके अलग-अलग रूप थलसेना, वायुसेना और नौसेना के लिए बने।

◆ अग्नि — यह मध्यम से लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों की शृंखला है। इसका पहला परीक्षण 1989 में हुआ। इसके बाद क्रमशः अधिक दूरी वाले रूप बने — अग्नि-1 से लेकर अग्नि-5 तक। अग्नि-5 का पहला परीक्षण 2012 में हुआ; इसकी मारक दूरी 5000 किलोमीटर से अधिक है, यानी यह अंतरमहाद्वीपीय दूरी की मिसाइल है। अग्नि मिसाइलें परमाणु हथियार ले जा सकती हैं, इसलिए ये भारत के परमाणु प्रतिरोध की रीढ़ हैं। अग्नि कार्यक्रम में वैज्ञानिक टेसी थॉमस की प्रमुख भूमिका रही, जिन्हें "मिसाइल वुमन" कहा जाता है।

◆ त्रिशूल — यह कम दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल थी, जिसका काम नीचे उड़ते शत्रु-विमानों को गिराना था। इसके कई परीक्षण हुए, पर इसे सेना में बड़े पैमाने पर शामिल नहीं किया गया; इससे मिली तकनीक दूसरी मिसाइलों में काम आई।

◆ आकाश — यह मध्यम दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल है। यह कई किलोमीटर दूर से आते शत्रु के विमानों और मिसाइलों को हवा में ही नष्ट कर सकती है। यह थलसेना और वायुसेना दोनों में तैनात है और भारत इसे दूसरे देशों को बेच भी रहा है।

◆ नाग — यह टैंक-रोधी मिसाइल है। इसकी विशेषता "दागो और भूल जाओ" है — यानी एक बार निशाना साधकर छोड़ देने के बाद यह स्वयं टैंक का पीछा करती है और दागने वाले को निशाना साधे रखने की ज़रूरत नहीं पड़ती। इसका हेलिकॉप्टर से दागा जाने वाला रूप भी बना है।

🧠 याद रखने का सूत्र: पाँच मिसाइलें

"पृथ्वी पर अग्नि, त्रिशूल लेकर आकाश में नाग" — पृथ्वी (सतह से सतह, कम दूरी) • अग्नि (सतह से सतह, लंबी दूरी) • त्रिशूल (सतह से हवा, कम दूरी) • आकाश (सतह से हवा, मध्यम दूरी) • नाग (टैंक-रोधी)।

मिसाइलों का परीक्षण ओडिशा के तट पर चांदीपुर (बालासोर) और पास के द्वीप से होता है; इस द्वीप का नाम अब अब्दुल कलाम द्वीप है।

7.4 ब्रह्मोस (1998)

◆ क्या है — यह भारत और रूस का संयुक्त उपक्रम है, जो 1998 में बना। इसका नाम दो नदियों — भारत की ब्रह्मपुत्र और रूस की मोस्कवा — के नामों को जोड़कर रखा गया।

◆ विशेषता — यह क्रूज़ मिसाइल है और ध्वनि की गति से लगभग तीन गुना तेज़ उड़ती है। इसलिए इसे विश्व की सबसे तेज़ क्रूज़ मिसाइलों में गिना जाता है। इसे ज़मीन, युद्धपोत, पनडुब्बी और लड़ाकू विमान — चारों से दागा जा सकता है।

◆ महत्त्व — यह दिखाती है कि भारत अब केवल ख़रीदार नहीं, बल्कि साझेदार और निर्यातक भी है; भारत ने इसे फ़िलीपींस को बेचा है।

7.5 तेजस — स्वदेशी हल्का लड़ाकू विमान

◆ पृष्ठभूमि — वायुसेना के पुराने सोवियत विमानों की जगह लेने के लिए 1980 के दशक में स्वदेशी हल्का लड़ाकू विमान बनाने की परियोजना शुरू हुई।

◆ क्या हुआ — इसकी पहली उड़ान 2001 में हुई। प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने इसे "तेजस" नाम दिया। लंबे परीक्षणों के बाद 2016 में यह वायुसेना में शामिल हुआ। इसे बंगलौर का हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स बनाता है।

◆ सीमा — परियोजना में बहुत देर लगी और इसका इंजन अब भी विदेशी है। फिर भी इससे भारत में लड़ाकू विमान की रूपरेखा बनाने और उसे बनाने की पूरी क्षमता विकसित हुई।

7.6 आई.एन.एस. अरिहंत और परमाणु त्रिक

◆ क्या है — आई.एन.एस. अरिहंत भारत की पहली स्वदेशी परमाणु पनडुब्बी है। "परमाणु पनडुब्बी" का अर्थ है कि यह परमाणु रिएक्टर से चलती है, इसलिए महीनों तक पानी के नीचे रह सकती है; और यह परमाणु हथियार वाली मिसाइलें भी ले जा सकती है। इसे 2009 में पानी में उतारा गया और 2016 में नौसेना में शामिल किया गया।

◆ परमाणु त्रिक — जब कोई देश थल (ज़मीन की मिसाइलें), वायु (विमान) और जल (पनडुब्बी) — तीनों से परमाणु हथियार दाग सकता है, तो कहा जाता है कि उसका "परमाणु त्रिक" पूरा है। अरिहंत के साथ भारत का त्रिक पूरा हुआ।

◆ महत्त्व — समुद्र की गहराई में छिपी पनडुब्बी को ढूँढ़कर नष्ट करना लगभग असंभव है। इसलिए यदि शत्रु पहले हमला करके ज़मीन की मिसाइलें और हवाई अड्डे नष्ट भी कर दे, तो पनडुब्बी जवाब दे सकती है। "पहले प्रयोग नहीं" की नीति वाले देश के लिए यही क्षमता सबसे ज़रूरी है (खंड 5.6)।

◆ आई.एन.एस. विक्रांत (2022) — यह भारत का पहला स्वदेशी विमानवाहक पोत है, जो कोच्चि के जहाज़-कारख़ाने में बना और 2022 में नौसेना में शामिल हुआ। विमानवाहक पोत समुद्र में तैरता हवाई अड्डा होता है।

7.7 मिशन शक्ति (2019)

◆ क्या हुआ — 27 मार्च 2019 को भारत ने ज़मीन से एक मिसाइल दागकर पृथ्वी की निचली कक्षा में घूम रहे अपने ही एक उपग्रह को नष्ट कर दिया। इसे उपग्रह-रोधी मिसाइल परीक्षण कहते हैं।

◆ महत्त्व — अमेरिका, रूस और चीन के बाद ऐसी क्षमता दिखाने वाला भारत चौथा देश बना। आज संचार, नेविगेशन और जासूसी — सब उपग्रहों पर टिके हैं; इसलिए युद्ध में उपग्रहों की रक्षा और शत्रु के उपग्रह को रोकने की क्षमता महत्त्वपूर्ण हो गई है।

◆ सावधानी — परीक्षण जान-बूझकर कम ऊँचाई पर किया गया, ताकि टूटे उपग्रह के टुकड़े जल्दी वायुमंडल में गिरकर जल जाएँ और दूसरे उपग्रहों के लिए ख़तरा न बनें।

नीचे की तालिका रक्षा क्षेत्र की सभी प्रणालियों को दोहराती है।

📋 दोहराव तालिका: रक्षा प्रणालियाँ

कार्यक्रम / हथियार

विवरण

समन्वित निर्देशित मिसाइल विकास कार्यक्रम

यह 1983 में अब्दुल कलाम के नेतृत्व में शुरू हुआ और इसमें पाँच मिसाइलें बनीं।

पृथ्वी

यह सतह से सतह पर मार करने वाली पहली स्वदेशी मिसाइल है, जिसका पहला परीक्षण 1988 में हुआ।

अग्नि शृंखला

ये मध्यम से अंतरमहाद्वीपीय दूरी की मिसाइलें हैं; अग्नि-5 (2012) पाँच हज़ार किलोमीटर से अधिक दूर मार करती है।

त्रिशूल

यह कम दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल थी, जो तकनीक परखने के काम आई।

आकाश और नाग

आकाश सतह से हवा में मार करती है और नाग टैंक-रोधी मिसाइल है।

ब्रह्मोस

यह 1998 का भारत-रूस संयुक्त उपक्रम है और विश्व की सबसे तेज़ क्रूज़ मिसाइलों में है।

तेजस

यह स्वदेशी हल्का लड़ाकू विमान है, जिसकी पहली उड़ान 2001 में हुई।

आई.एन.एस. अरिहंत

यह पहली स्वदेशी परमाणु पनडुब्बी है, जो 2016 में नौसेना में आई और जिससे परमाणु त्रिक पूरा हुआ।

मिशन शक्ति

27 मार्च 2019 को उपग्रह-रोधी मिसाइल का परीक्षण हुआ; ऐसी क्षमता वाला भारत चौथा देश है।

परमाणु, अंतरिक्ष और रक्षा — ये तीनों क्षेत्र देश की सुरक्षा और प्रतिष्ठा से जुड़े थे। अगले भाग में हम विज्ञान के उन क्षेत्रों को पढ़ेंगे जिन्होंने आम आदमी की थाली, सेहत और रोज़मर्रा के जीवन को सीधे बदला।

8. कृषि, स्वास्थ्य और जैव प्रौद्योगिकी

रॉकेट और रिएक्टर अख़बार की सुर्ख़ियाँ बनते हैं, पर आम भारतीय के जीवन को सबसे अधिक उस विज्ञान ने बदला जिसने उसकी थाली में रोटी और बच्चे को टीका पहुँचाया। 1947 में भारतीय की औसत आयु लगभग 32 वर्ष थी; आज यह 70 वर्ष के आसपास है। 1960 के दशक में भारत अमेरिका से आए गेहूँ पर निर्भर था; आज वह अनाज का निर्यात करता है। यह बदलाव कृषि और स्वास्थ्य विज्ञान की देन है।

8.1 कृषि अनुसंधान की संस्थाएँ

◆ भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान — यह 1905 में बिहार के पूसा में बना था। 1934 के भूकंप में इसका भवन टूट गया, तो 1936 में इसे दिल्ली लाया गया; पर नाम के साथ "पूसा" जुड़ा रहा। हरित क्रांति के बीजों पर मुख्य शोध यहीं हुआ।

◆ भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (1929) — यह देश भर के कृषि शोध-संस्थानों और कृषि विश्वविद्यालयों को धन और दिशा देने वाली शीर्ष संस्था है (खंड 2.14)।

◆ कृषि विश्वविद्यालय — देश का पहला कृषि विश्वविद्यालय 1960 में उत्तर प्रदेश (अब उत्तराखंड) के पंतनगर में खुला। यह अमेरिका के "भूमि-अनुदान" विश्वविद्यालयों के नमूने पर बना, जिनकी विशेषता यह है कि वहाँ पढ़ाई, शोध और किसानों तक जानकारी पहुँचाना — तीनों काम एक साथ होते हैं। बाद में लुधियाना, हिसार और दूसरे स्थानों पर ऐसे विश्वविद्यालय खुले, जिन्होंने हरित क्रांति को खेत तक पहुँचाया।

8.2 हरित क्रांति — विज्ञान की दृष्टि से

◆ पृष्ठभूमि — 1960 के दशक के मध्य में लगातार सूखे पड़े और भारत को अमेरिका से गेहूँ मँगाना पड़ा। देश की स्थिति को "जहाज़ से मुँह तक" कहा जाता था — यानी जहाज़ से अनाज उतरता और सीधे खाने को जाता (इसका आर्थिक पक्ष अध्याय 18 में पढ़ चुके हैं)।

◆ वैज्ञानिक खोज — अमेरिकी वैज्ञानिक नॉर्मन बोरलॉग ने मेक्सिको में गेहूँ की बौनी किस्में तैयार की थीं। पुरानी लंबी किस्मों में अधिक खाद देने पर पौधा बालियों के भार से गिर जाता था; बौना पौधा मज़बूत तने के कारण नहीं गिरता और अधिक दाने देता है। भारतीय वैज्ञानिक एम. एस. स्वामीनाथन ने इन बीजों को भारत बुलवाया और भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान में उन्हें भारतीय मिट्टी, जलवायु और स्वाद के अनुसार ढाला।

◆ सरकार की भूमिका — कृषि मंत्री सी. सुब्रमण्यम ने बड़ी मात्रा में ये बीज आयात करने का साहसी निर्णय लिया। अधिक उपज वाले बीज, रासायनिक खाद, सिंचाई और सरकारी ख़रीद — चारों का मेल पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किया गया।

◆ परिणाम — कुछ ही वर्षों में गेहूँ का उत्पादन बहुत बढ़ गया और भारत खाद्यान्न में आत्मनिर्भर हो गया। स्वामीनाथन "भारत में हरित क्रांति के जनक" कहलाए। सीमा यह रही कि लाभ कुछ क्षेत्रों और कुछ फ़सलों तक सीमित रहा और आगे चलकर भूजल गिरने तथा मिट्टी बिगड़ने की समस्याएँ आईं; इसलिए स्वामीनाथन ने स्वयं "सदाबहार क्रांति" की बात कही, यानी पर्यावरण को हानि पहुँचाए बिना उपज बढ़ाना।

8.3 श्वेत, नीली और पीली क्रांति

◆ श्वेत क्रांति (दूध) — गुजरात के आणंद में किसानों की सहकारी समिति "अमूल" के प्रबंधक वर्गीज़ कुरियन ने दूध उत्पादक किसानों को सीधे बाज़ार से जोड़ा। 1965 में राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड बना और 1970 में "ऑपरेशन फ़्लड" शुरू हुआ, जिसने आणंद के नमूने को पूरे देश में फैलाया। इसमें विज्ञान की भी भूमिका थी — भारत में पहली बार भैंस के दूध से दूध-पाउडर बनाने की तकनीक विकसित हुई, जिसे यूरोप के विशेषज्ञ असंभव मानते थे। परिणाम यह हुआ कि भारत विश्व का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश बन गया।

◆ नीली क्रांति (मछली) — तालाबों और समुद्र में मछली-पालन की वैज्ञानिक विधियों से मछली उत्पादन कई गुना बढ़ा।

◆ पीली क्रांति (तिलहन) — 1980 के दशक में खाने के तेल का आयात घटाने के लिए सरसों, मूँगफली और सोयाबीन जैसी तिलहन फ़सलों का उत्पादन बढ़ाने का अभियान चला।

8.4 जैव प्रौद्योगिकी और जीन-संवर्धित फ़सलें

🔍 आसान परिभाषा: जैव प्रौद्योगिकी

📘 परिभाषा: जीवित कोशिकाओं, सूक्ष्म जीवों या उनके अंशों (जैसे जीन और एंज़ाइम) का उपयोग करके मनुष्य के काम की वस्तुएँ — दवाएँ, टीके, उन्नत बीज, औद्योगिक रसायन — बनाने की तकनीक।

💡 आसान भाषा में: यानी जीवों से "काम करवाने" का विज्ञान। 🏠 उदाहरण: दही जमाना जैव प्रौद्योगिकी का सबसे पुराना और सरल उदाहरण है — सूक्ष्म जीवाणु दूध को दही में बदलते हैं। आधुनिक उदाहरण है मधुमेह के रोगियों के लिए इंसुलिन, जिसे अब जीवाणुओं में मनुष्य का जीन डालकर कारख़ानों में बनाया जाता है।

◆ जैव प्रौद्योगिकी विभाग (1986) — सरकार ने 1986 में अलग विभाग बनाया, जो टीकों, जीन-शोध, कृषि जैव प्रौद्योगिकी और जैव-उद्योग को बढ़ावा देता है। भारत इस प्रकार का अलग विभाग बनाने वाले आरंभिक देशों में था।

◆ डीएनए अंगुली-छाप — हैदराबाद के कोशिकीय एवं आणविक जीवविज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक लालजी सिंह ने भारत में वह तकनीक विकसित की जिससे किसी व्यक्ति की पहचान उसके डीएनए से की जाती है। आज इसका उपयोग अपराधों की जाँच और माता-पिता की पहचान के मामलों में अदालतों में होता है। उन्हें "भारत में डीएनए अंगुली-छाप का जनक" कहा जाता है।

◆ बीटी कपास (2002) — यह भारत में व्यावसायिक खेती के लिए अनुमोदित पहली जीन-संवर्धित फ़सल है और आज तक एकमात्र ऐसी फ़सल है जिसकी व्यावसायिक खेती की अनुमति है। इसमें मिट्टी के एक जीवाणु का जीन डाला गया है, जिससे पौधा स्वयं ऐसा प्रोटीन बनाता है जो कपास की सूँडी (डोडा-कीट) के लिए विष है। इससे कीटनाशक का छिड़काव घटा और उत्पादन बढ़ा; भारत कपास के बड़े उत्पादक और निर्यातक देशों में आ गया।

◆ विवाद — बीज महँगे होने, हर वर्ष नया बीज ख़रीदने की मजबूरी और कीटों में प्रतिरोध पैदा होने को लेकर आलोचना भी हुई। खाने की फ़सल बीटी बैंगन पर सरकार ने 2010 में व्यापक विरोध के बाद रोक लगा दी। यानी जीन-संवर्धित फ़सलों पर देश में अब भी बहस जारी है।

🔍 आसान परिभाषा: जीन-संवर्धित फ़सल

📘 परिभाषा: ऐसी फ़सल जिसके पौधे में प्रयोगशाला की तकनीक से किसी दूसरे जीव का जीन डाला गया हो, ताकि उसमें कोई नया गुण आ जाए — जैसे कीट से बचाव, सूखा सहने की क्षमता या अधिक पोषण।

💡 आसान भाषा में: यानी पौधे की "आनुवंशिक बनावट" में सीधा बदलाव करके बनाई गई फ़सल, जो साधारण संकरण से नहीं बन सकती। 🏠 उदाहरण: साधारण संकरण में गेहूँ की एक किस्म को गेहूँ की ही दूसरी किस्म से मिलाया जाता है। बीटी कपास में कपास के पौधे में एक जीवाणु का जीन डाला गया है — यह प्रकृति में अपने-आप नहीं होता। इसी कारण ऐसी फ़सलों को अनुमति देने से पहले सुरक्षा की लंबी जाँच होती है।

8.5 चेचक का उन्मूलन (1977)

◆ पृष्ठभूमि — चेचक (बड़ी माता) सदियों से भारत की सबसे घातक बीमारियों में थी। इससे हर वर्ष बड़ी संख्या में लोग मरते थे और जो बचते, उनके चेहरे पर दाग़ रह जाते या आँखों की रोशनी चली जाती थी। 1960–70 के दशक में दुनिया के चेचक के अधिकतर रोगी भारत में थे।

◆ अभियान — 1962 में राष्ट्रीय चेचक उन्मूलन कार्यक्रम शुरू हुआ। आरंभ में सबको टीका लगाने का प्रयास हुआ, पर इतनी बड़ी आबादी में यह कठिन था। 1970 के दशक में विश्व स्वास्थ्य संगठन के साथ मिलकर नई रणनीति अपनाई गई — स्वास्थ्यकर्मी घर-घर जाकर रोगी खोजते, और जहाँ रोगी मिलता, उसके चारों ओर के सभी लोगों को टीका लगाकर रोग का "घेरा" बना देते। रोगी की सूचना देने वाले को इनाम भी दिया जाता था।

◆ परिणाम — 1975 में भारत में चेचक का अंतिम रोगी मिला और 1977 में भारत को चेचक-मुक्त घोषित किया गया। 1980 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने पूरी दुनिया को चेचक-मुक्त घोषित किया। चेचक मनुष्य की पहली ऐसी बीमारी है जिसे धरती से पूरी तरह मिटा दिया गया।

8.6 पोलियो का उन्मूलन (2014)

◆ पृष्ठभूमि — पोलियो एक विषाणु से होने वाला रोग है, जो छोटे बच्चों के हाथ-पैर को जीवन भर के लिए अपंग कर देता है। 1990 के दशक की शुरुआत तक भारत में हर वर्ष बहुत बड़ी संख्या में बच्चे इसके शिकार होते थे।

◆ "पल्स पोलियो" अभियान (1995) — 1995 में यह अभियान शुरू हुआ। इसमें तय दिनों पर पूरे देश में पाँच वर्ष तक के हर बच्चे को एक साथ मुँह से "दो बूँद" दवा पिलाई जाती थी — चाहे उसे पहले टीका लगा हो या नहीं। रेलवे स्टेशनों, बस अड्डों और मेलों तक में बूथ लगे। इसका नारा "दो बूँद ज़िंदगी की" घर-घर पहुँचा।

◆ कठिनाइयाँ — घनी आबादी, गंदगी, घूमंतू परिवार और कुछ इलाक़ों में टीके के विरुद्ध फैली अफ़वाहें बड़ी बाधाएँ थीं। इन्हें दूर करने के लिए धर्मगुरुओं, शिक्षकों और स्थानीय नेताओं की सहायता ली गई।

◆ परिणाम — भारत में पोलियो का अंतिम रोगी जनवरी 2011 में पश्चिम बंगाल में मिला। लगातार तीन वर्ष कोई नया रोगी न मिलने पर 27 मार्च 2014 को विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भारत को पोलियो-मुक्त होने का प्रमाणपत्र दिया। जिस देश को विशेषज्ञ पोलियो मिटाने के लिए "सबसे कठिन" मानते थे, उसकी यह सफलता जन-स्वास्थ्य की विश्व की बड़ी उपलब्धियों में गिनी जाती है।

◆ नियमित टीकाकरण — 1985 में सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम शुरू हुआ, जिसमें बच्चों और गर्भवती महिलाओं को कई बीमारियों के टीके निःशुल्क लगते हैं। 2014 में छूटे हुए बच्चों तक पहुँचने के लिए "मिशन इंद्रधनुष" चलाया गया।

8.7 दवा उद्योग — "विश्व की फ़ार्मेसी"

◆ पृष्ठभूमि — 1960 के दशक तक भारत में दवाएँ विदेशी कंपनियाँ बेचती थीं और उनके दाम विश्व के सबसे ऊँचे दामों में थे।

◆ पेटेंट अधिनियम (1970) — इस क़ानून ने दवाओं पर केवल बनाने की विधि का पेटेंट माना, स्वयं दवा का नहीं। इसका अर्थ था कि भारतीय कंपनियाँ किसी विदेशी दवा को दूसरी विधि से बनाकर सस्ते में बेच सकती थीं। इसका परिणाम यह हुआ कि भारत में जेनेरिक दवाओं का बड़ा उद्योग खड़ा हो गया। विश्व व्यापार संगठन के नियमों के कारण 2005 में क़ानून बदलकर दवा पर भी पेटेंट दिया जाने लगा, पर तब तक भारतीय उद्योग मज़बूत हो चुका था।

◆ महत्त्व — आज भारत दुनिया भर को सस्ती दवाएँ और टीके भेजता है, इसलिए उसे "विश्व की फ़ार्मेसी" (दवाख़ाना) कहा जाता है। अफ़्रीका के ग़रीब देशों में एड्स की दवाएँ भारतीय कंपनियों के कारण ही आम रोगी की पहुँच में आ सकीं। दुनिया के बच्चों को लगने वाले टीकों का बड़ा भाग भारत में बनता है।

🔍 आसान परिभाषा: जेनेरिक दवा

📘 परिभाषा: वह दवा जिसमें वही रासायनिक तत्व, उतनी ही मात्रा में होता है जो किसी नामी कंपनी की मूल (ब्रांड वाली) दवा में है और जो उतना ही असर करती है, पर जिसे मूल दवा का पेटेंट समाप्त होने के बाद या क़ानून की अनुमति से कोई दूसरी कंपनी बिना ब्रांड-नाम के बनाकर बेचती है।

💡 आसान भाषा में: यानी वही दवा, वही असर — पर बिना महँगे ब्रांड-नाम के, इसलिए बहुत सस्ती। 🏠 उदाहरण: बुख़ार की एक ही दवा नामी ब्रांड के नाम से महँगी मिलती है और केवल अपने रासायनिक नाम (पैरासिटामॉल) से बहुत सस्ती। सरकार के "जन औषधि केंद्रों" पर ऐसी ही जेनेरिक दवाएँ मिलती हैं।

8.8 कोविड-19 और टीके (2020–21)

◆ पृष्ठभूमि — 2020 में कोविड-19 महामारी पूरी दुनिया में फैल गई। भारत में मार्च 2020 में देशव्यापी तालाबंदी लगी। महामारी रोकने का पक्का उपाय टीका ही था, और 140 करोड़ लोगों के लिए टीका विदेश से ख़रीदना संभव नहीं था।

◆ दो टीके — भारत में मुख्यतः दो टीके लगे। "कोवैक्सिन" पूरी तरह स्वदेशी टीका था, जिसे हैदराबाद की एक भारतीय कंपनी ने भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद के साथ मिलकर विकसित किया। "कोविशील्ड" की खोज ब्रिटेन के ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय और एक विदेशी कंपनी ने की थी, पर इसका निर्माण भारत में पुणे के सीरम इंस्टीट्यूट ने किया, जो ख़ुराकों की संख्या के हिसाब से विश्व का सबसे बड़ा टीका-निर्माता है।

◆ टीकाकरण अभियान — 16 जनवरी 2021 से टीकाकरण शुरू हुआ — पहले स्वास्थ्यकर्मियों को, फिर बुज़ुर्गों को और फिर सभी वयस्कों को। टीके का समय लेने और प्रमाणपत्र देने के लिए "कोविन" नाम का डिजिटल मंच बनाया गया। अक्टूबर 2021 तक 100 करोड़ ख़ुराकें लग चुकी थीं।

◆ महत्त्व और सीमा — भारत ने अपने नागरिकों को टीका लगाने के साथ-साथ "वैक्सीन मैत्री" के अंतर्गत दूसरे देशों को भी टीके भेजे। पर 2021 की दूसरी लहर में ऑक्सीजन और अस्पताल के बिस्तरों की भारी कमी ने यह भी दिखाया कि देश की सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाएँ अब भी कमज़ोर हैं।

नीचे की तालिका कृषि और स्वास्थ्य की मुख्य बातों को आमने-सामने रखकर दोहराती है।

🌾 कृषि विज्ञान — दोहराव

✔ कृषि अनुसंधान संस्थान 1905 में पूसा में बना और 1936 में दिल्ली आया।

✔ हरित क्रांति के जनक एम. एस. स्वामीनाथन थे, जिन्होंने बौने गेहूँ के बीज भारत के अनुसार ढाले।

✔ श्वेत क्रांति दूध की, नीली क्रांति मछली की और पीली क्रांति तिलहन की थी।

✔ पहला कृषि विश्वविद्यालय 1960 में पंतनगर में खुला।

✔ बीटी कपास (2002) पहली अनुमोदित जीन-संवर्धित फ़सल है।

🩺 स्वास्थ्य विज्ञान — दोहराव

✔ भारत 1977 में चेचक-मुक्त घोषित हुआ।

✔ पल्स पोलियो 1995 में शुरू हुआ और 27 मार्च 2014 को भारत पोलियो-मुक्त प्रमाणित हुआ।

✔ सस्ती जेनेरिक दवाओं और टीकों के कारण भारत "विश्व की फ़ार्मेसी" कहलाता है।

✔ कोविड टीकाकरण 16 जनवरी 2021 से शुरू हुआ और अक्टूबर 2021 तक 100 करोड़ ख़ुराकें लगीं।

✔ जैव प्रौद्योगिकी विभाग 1986 में बना।

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9. सूचना प्रौद्योगिकी और संचार क्रांति

1960 के दशक में पूरे भारत में गिने-चुने कंप्यूटर थे और टेलीफ़ोन का कनेक्शन पाने के लिए वर्षों प्रतीक्षा करनी पड़ती थी। आज भारत विश्व के सबसे बड़े सॉफ़्टवेयर सेवा निर्यातकों में है, लगभग हर हाथ में मोबाइल फ़ोन है और सब्ज़ी वाला भी मोबाइल से भुगतान लेता है। यह यात्रा तीन शक्तियों के मेल से हुई — सरकारी संस्थाएँ, निजी कंपनियाँ और युवा इंजीनियर। इसे चार दौरों में समझें।

9.1 पहला दौर: आरंभिक कंप्यूटर (1955–1980)

◆ पहले कंप्यूटर — 1950 के दशक के मध्य में भारतीय सांख्यिकी संस्थान, कलकत्ता में देश का पहला कंप्यूटर लगा, जो विदेश से आया था; इसका उपयोग योजना आयोग के आँकड़ों की गणना में हुआ।

◆ टिफ़्रैक (1960) — बम्बई के टाटा मूलभूत अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों ने भारत का पहला स्वदेशी कंप्यूटर बनाया, जो 1960 में चालू हुआ। नेहरू ने इसे "टिफ़्रैक" नाम दिया। यह एक बड़े कमरे जितना था, पर इसका महत्त्व यह था कि भारतीय वैज्ञानिकों ने कंप्यूटर बनाना सीख लिया।

◆ इलेक्ट्रॉनिक्स कॉर्पोरेशन ऑफ़ इंडिया (1967) — परमाणु ऊर्जा विभाग ने हैदराबाद में यह सरकारी कंपनी बनाई। परमाणु रिएक्टरों को चलाने के लिए इलेक्ट्रॉनिक उपकरण चाहिए थे, जो विदेश से नहीं मिल रहे थे। आगे चलकर इसी कंपनी ने कंप्यूटर, टीवी और इलेक्ट्रॉनिक मतदान मशीनें बनाईं।

◆ पहली सॉफ़्टवेयर कंपनी (1968) — टाटा समूह ने 1968 में बम्बई में टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज़ शुरू की, जो भारत की पहली बड़ी सॉफ़्टवेयर सेवा कंपनी बनी। 1970 में सरकार ने इलेक्ट्रॉनिकी विभाग बनाया।

◆ सीमा — इस दौर में सरकार की नीति कंप्यूटर के आयात पर कड़ा नियंत्रण रखने की थी, और कर्मचारी संगठन कंप्यूटर का विरोध करते थे क्योंकि उन्हें डर था कि मशीन नौकरियाँ छीन लेगी। इसलिए कंप्यूटर का फैलाव बहुत धीमा रहा।

9.2 दूसरा दौर: संचार क्रांति की नींव (1984–1991)

◆ नई सोच — 1984 में प्रधानमंत्री बने राजीव गांधी कंप्यूटर और दूरसंचार को देश के भविष्य की कुंजी मानते थे। उनकी सरकार ने कंप्यूटर के आयात के नियम ढीले किए। 1986 में रेलवे का कंप्यूटर से आरक्षण शुरू हुआ, जिससे आम आदमी ने पहली बार कंप्यूटर का लाभ अपनी आँखों से देखा।

◆ सी-डॉट (1984) — उस समय टेलीफ़ोन एक्सचेंज विदेश से आते थे, बहुत महँगे थे और भारत की गर्मी-धूल में जल्दी ख़राब हो जाते थे। अमेरिका से लौटे इंजीनियर सैम पित्रोदा के नेतृत्व में 1984 में टेलीमैटिक्स विकास केंद्र (सी-डॉट) बना। इसके युवा इंजीनियरों ने कुछ ही वर्षों में ऐसा स्वदेशी डिजिटल टेलीफ़ोन एक्सचेंज बना दिया जो बिना वातानुकूलन के गाँव में भी चल सकता था।

◆ परिणाम — इसके बाद देश भर में पीले रंग के "एसटीडी-पीसीओ" बूथ खुल गए। जिनके घर में फ़ोन नहीं था, वे भी अब बूथ से दूसरे शहर में बात कर सकते थे; और लाखों लोगों को इन बूथों से रोज़गार मिला। यही भारत की संचार क्रांति की नींव थी।

◆ सी-डैक और "परम 8000" (1988–1991) — 1980 के दशक में भारत ने मौसम की भविष्यवाणी के लिए अमेरिका से सुपरकंप्यूटर ख़रीदना चाहा। अमेरिका ने यह कहकर मना कर दिया कि इसका उपयोग हथियार बनाने में हो सकता है। उत्तर में सरकार ने 1988 में पुणे में प्रगत संगणन विकास केंद्र (सी-डैक) बनाया। वैज्ञानिक विजय भटकर के नेतृत्व में इसने केवल तीन वर्ष में, 1991 में, भारत का पहला स्वदेशी सुपरकंप्यूटर "परम 8000" बना दिया। "परम" संस्कृत का शब्द है, जिसका अर्थ है "सर्वोच्च"।

🔍 आसान परिभाषा: सुपरकंप्यूटर

📘 परिभाषा: वह कंप्यूटर जो अपने समय के साधारण कंप्यूटरों की तुलना में हज़ारों-लाखों गुना तेज़ गणना करता है। इसमें बहुत-से प्रोसेसर एक साथ जुड़कर एक ही समस्या के अलग-अलग भागों को एक ही समय में हल करते हैं, जिसे समानांतर संगणन कहते हैं।

💡 आसान भाषा में: यानी हज़ारों कंप्यूटरों की ताक़त वाला एक महा-कंप्यूटर, जो वह गणना घंटों में कर देता है जिसमें साधारण कंप्यूटर को वर्षों लग जाएँ। 🏠 उदाहरण: कल का मौसम बताने के लिए पूरे वायुमंडल की हवा, तापमान और नमी की करोड़ों गणनाएँ कुछ ही घंटों में करनी पड़ती हैं — नहीं तो भविष्यवाणी आने तक "कल" बीत चुका होगा। इसीलिए मौसम, चक्रवात की चेतावनी, नई दवाओं की खोज और रॉकेट की रूपरेखा बनाने में सुपरकंप्यूटर चाहिए। "परम 8000" ऐसा पहला भारतीय कंप्यूटर था।

9.3 तीसरा दौर: सॉफ़्टवेयर उद्योग, इंटरनेट और मोबाइल (1991–2000)

◆ आर्थिक सुधार और सॉफ़्टवेयर पार्क (1991) — 1991 के आर्थिक सुधारों ने विदेशी निवेश और निर्यात के रास्ते खोले। उसी वर्ष सरकार ने सॉफ़्टवेयर टेक्नोलॉजी पार्क्स ऑफ़ इंडिया बनाया, जो सॉफ़्टवेयर कंपनियों को उपग्रह से तेज़ संचार-संपर्क और कर में छूट देता था। अब भारत में बैठा इंजीनियर अमेरिका की कंपनी के लिए काम कर सकता था।

◆ आई.टी. नगर — इसका परिणाम यह हुआ कि बंगलौर, हैदराबाद, पुणे, चेन्नई और गुड़गाँव सॉफ़्टवेयर उद्योग के केंद्र बन गए। बंगलौर को "भारत की सिलिकॉन घाटी" कहा जाने लगा। अंग्रेज़ी जानने वाले, गणित में अच्छे और कम वेतन पर काम करने को तैयार इंजीनियर भारत की ताक़त बने।

◆ पहली मोबाइल कॉल (31 जुलाई 1995) — इसी दिन भारत में पहली मोबाइल फ़ोन कॉल हुई — कोलकाता से दिल्ली। पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री ज्योति बसु ने केंद्रीय संचार मंत्री सुखराम से बात की। आरंभ में कॉल की दर बहुत ऊँची थी और फ़ोन सुनने के भी पैसे लगते थे।

◆ आम जनता के लिए इंटरनेट (15 अगस्त 1995) — इसी दिन सरकारी कंपनी विदेश संचार निगम लिमिटेड ने आम लोगों के लिए इंटरनेट सेवा शुरू की। इससे पहले इंटरनेट केवल कुछ शोध-संस्थानों तक सीमित था।

◆ नियामक — निजी कंपनियों के आने पर ग्राहकों के हित की रक्षा और दरें तय करने के लिए 1997 में भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण बना। प्रतिस्पर्धा बढ़ने से कॉल दरें लगातार गिरीं और कुछ ही वर्षों में मोबाइल आम आदमी की चीज़ बन गया।

◆ सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (2000) — इंटरनेट पर होने वाले लेन-देन को क़ानूनी आधार देने के लिए संसद ने 2000 में यह क़ानून बनाया। इसने इलेक्ट्रॉनिक दस्तावेज़ों और अंकीय हस्ताक्षर को काग़ज़ के दस्तावेज़ और हाथ के हस्ताक्षर जैसी मान्यता दी, और कंप्यूटर में सेंध लगाने तथा आँकड़े चुराने जैसे साइबर अपराधों के लिए सज़ा तय की।

9.4 चौथा दौर: डिजिटल पहचान और भुगतान (2009 से)

◆ आधार (2010) — 2009 में भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण बना, जिसके पहले अध्यक्ष सॉफ़्टवेयर उद्यमी नंदन नीलेकणि थे। 29 सितंबर 2010 को महाराष्ट्र के नंदुरबार ज़िले के टेंभली गाँव की एक आदिवासी महिला को पहला आधार नंबर दिया गया। आधार बारह अंकों की संख्या है, जो व्यक्ति की अंगुलियों की छाप और आँख की पुतली से जुड़ी होती है। यह विश्व की सबसे बड़ी बायोमेट्रिक पहचान प्रणाली है।

◆ आधार का लाभ और विवाद — इससे सरकारी सहायता (जैसे गैस की सब्सिडी, छात्रवृत्ति, पेंशन) बिचौलियों के बिना सीधे खाते में पहुँचने लगी और फ़र्ज़ी नाम हटे। दूसरी ओर, निजता को लेकर चिंताएँ उठीं; 2017 में सर्वोच्च न्यायालय ने निजता को मौलिक अधिकार माना और 2018 में आधार को वैध ठहराते हुए उसके अनिवार्य उपयोग की सीमाएँ तय कीं।

◆ डिजिटल इंडिया (1 जुलाई 2015) — इस कार्यक्रम के तीन लक्ष्य हैं — हर नागरिक तक डिजिटल ढाँचा (इंटरनेट, पहचान, बैंक खाता) पहुँचाना, सरकारी सेवाएँ इंटरनेट पर देना और नागरिकों को डिजिटल रूप से सक्षम बनाना।

◆ यूपीआई (2016) — 2016 में भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम ने एकीकृत भुगतान इंटरफ़ेस शुरू किया। इसी दौरान सस्ते मोबाइल इंटरनेट के फैलने से यह तेज़ी से लोकप्रिय हुआ। इसका परिणाम यह हुआ कि भारत विश्व में सबसे अधिक डिजिटल भुगतान करने वाला देश बन गया और कई देशों ने इस प्रणाली को अपनाया है।

🔍 आसान परिभाषा: यूपीआई (एकीकृत भुगतान इंटरफ़ेस)

📘 परिभाषा: ऐसी भुगतान प्रणाली जो मोबाइल फ़ोन के माध्यम से किसी भी बैंक के खाते से किसी भी दूसरे बैंक के खाते में तुरंत, चौबीसों घंटे पैसा भेजने की सुविधा देती है; इसके लिए खाता संख्या की जगह केवल एक सरल पहचान (मोबाइल नंबर या क्यूआर कोड) चाहिए।

💡 आसान भाषा में: यानी मोबाइल से एक बटन दबाकर सीधे अपने बैंक खाते से सामने वाले के खाते में पैसा भेजना। 🏠 उदाहरण: चाय की दुकान पर लगे चौकोर चित्र (क्यूआर कोड) को मोबाइल से देखकर दस रुपये चुकाना यूपीआई है। ग्राहक का बैंक अलग है, दुकानदार का अलग — फिर भी पैसा कुछ ही पलों में पहुँच जाता है और खुले पैसों की झंझट नहीं रहती।

◆ आगे — 2022 में देश में 5जी मोबाइल सेवा शुरू हुई और 2023 में नागरिकों के निजी आँकड़ों की रक्षा के लिए डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम बना। राष्ट्रीय सुपरकंप्यूटिंग मिशन (2015) के अंतर्गत देश के संस्थानों में नए सुपरकंप्यूटर लगाए जा रहे हैं।

नीचे की तालिका सूचना प्रौद्योगिकी की सभी घटनाओं को तिथि-क्रम में दोहराती है।

📋 दोहराव तालिका: सूचना प्रौद्योगिकी के पड़ाव

वर्ष

घटना

महत्त्व

1960

टाटा मूलभूत अनुसंधान संस्थान में पहला स्वदेशी कंप्यूटर टिफ़्रैक चालू हुआ।

इससे भारत में कंप्यूटर युग की शुरुआत हुई।

1967

हैदराबाद में इलेक्ट्रॉनिक्स कॉर्पोरेशन ऑफ़ इंडिया बनी।

इससे सरकारी इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग खड़ा हुआ।

1984

सैम पित्रोदा के नेतृत्व में सी-डॉट बना।

इसने स्वदेशी टेलीफ़ोन एक्सचेंज बनाया और गाँव-गाँव एसटीडी-पीसीओ खुले।

1988 / 1991

सी-डैक बना और विजय भटकर ने परम 8000 बनाया।

यह अमेरिका के सुपरकंप्यूटर देने से इनकार का उत्तर था।

1991

सॉफ़्टवेयर टेक्नोलॉजी पार्क बने और आर्थिक सुधार हुए।

इससे बंगलौर, हैदराबाद और पुणे आई.टी. केंद्र बने।

1995

31 जुलाई को पहली मोबाइल कॉल हुई और 15 अगस्त को आम जनता को इंटरनेट मिला।

यहीं से संचार क्रांति आम आदमी तक पहुँची।

2000

सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम बना।

इससे अंकीय हस्ताक्षर को मान्यता और साइबर अपराध का क़ानून मिला।

2010

29 सितंबर को पहला आधार नंबर दिया गया।

यह विश्व की सबसे बड़ी बायोमेट्रिक पहचान प्रणाली है।

2015 / 2016

1 जुलाई 2015 को डिजिटल इंडिया और 2016 में यूपीआई शुरू हुआ।

भारत विश्व में सबसे अधिक डिजिटल भुगतान वाला देश बना।

10. स्वतंत्र भारत के प्रमुख वैज्ञानिक

संस्थाएँ ईंट-पत्थर से नहीं, लोगों से बनती हैं। पिछले खंडों में जिन कार्यक्रमों को हमने पढ़ा, उनके पीछे कुछ ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने विदेश की आरामदेह नौकरियाँ छोड़कर या कम साधनों में काम करके देश के विज्ञान को खड़ा किया। नीचे ऐसे तेरह व्यक्तियों का परिचय है।

10.1 होमी जहाँगीर भाभा (1909–1966)

भाभा का जन्म बम्बई के एक संपन्न पारसी परिवार में हुआ। पिता चाहते थे कि वे इंजीनियर बनें, पर कैम्ब्रिज में उनका मन भौतिकी में लगा और उन्होंने ब्रह्मांडीय किरणों पर ऐसा शोध किया जिससे उन्हें विश्व-प्रसिद्धि मिली। 1939 में भारत लौटकर उन्होंने 1945 में टाटा मूलभूत अनुसंधान संस्थान बनाया और 1948 में परमाणु ऊर्जा आयोग के पहले अध्यक्ष बने। उन्होंने त्रि-चरणीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम की योजना बनाई, जो आज भी भारत की नीति का आधार है। वे चित्रकला और संगीत के भी गहरे प्रेमी थे। 1966 में विमान दुर्घटना में उनका निधन हुआ; ट्रॉम्बे का परमाणु केंद्र उन्हीं के नाम पर है। उन्हें "भारतीय परमाणु कार्यक्रम का जनक" कहा जाता है।

10.2 विक्रम साराभाई (1919–1971)

साराभाई का जन्म अहमदाबाद के एक उद्योगपति परिवार में हुआ, जो स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ा था। उन्होंने कैम्ब्रिज में पढ़ाई की और ब्रह्मांडीय किरणों पर शोध किया। 1947 में उन्होंने अहमदाबाद में भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला बनाई, जिसे भारतीय अंतरिक्ष विज्ञान का पालना कहा जाता है। वे संस्थाएँ बनाने में अद्वितीय थे — भारतीय प्रबंध संस्थान, अहमदाबाद की स्थापना में भी उनकी मुख्य भूमिका थी। 1962 में वे अंतरिक्ष अनुसंधान की राष्ट्रीय समिति के अध्यक्ष बने, थुम्बा केंद्र बनाया और भाभा के बाद परमाणु ऊर्जा आयोग भी सँभाला। 30 दिसंबर 1971 को उनका निधन हुआ। चंद्रयान-2 और चंद्रयान-3 के लैंडर का नाम उन्हीं के सम्मान में "विक्रम" रखा गया। वे "भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक" हैं।

10.3 सतीश धवन (1920–2002)

धवन का जन्म श्रीनगर में हुआ। उन्होंने अमेरिका से वायुगतिकी (हवा के बहाव का विज्ञान) में ऊँची शिक्षा पाई और लौटकर बंगलौर के भारतीय विज्ञान संस्थान में पढ़ाया, जिसके वे लंबे समय तक निदेशक रहे। साराभाई के निधन के बाद 1972 से 1984 तक वे इसरो के अध्यक्ष रहे। उनके समय में आर्यभट, एस.एल.वी.-3 और इन्सैट जैसी सफलताएँ मिलीं। उनका नेतृत्व का तरीक़ा प्रसिद्ध है — 1979 में एस.एल.वी.-3 की विफलता पर उन्होंने पत्रकारों के सामने स्वयं ज़िम्मेदारी ली, और 1980 में सफलता मिलने पर परियोजना निदेशक कलाम को आगे कर दिया। श्रीहरिकोटा का प्रक्षेपण केंद्र उन्हीं के नाम पर है।

10.4 ए. पी. जे. अब्दुल कलाम (1931–2015)

कलाम का जन्म 15 अक्टूबर 1931 को तमिलनाडु के रामेश्वरम में एक साधारण नाविक परिवार में हुआ; बचपन में वे पढ़ाई का ख़र्च निकालने के लिए अख़बार बाँटते थे। मद्रास से वैमानिकी अभियांत्रिकी पढ़कर वे पहले रक्षा अनुसंधान संगठन में और फिर इसरो में आए, जहाँ वे एस.एल.वी.-3 के परियोजना निदेशक रहे (1980)। इसके बाद उन्होंने 1983 से मिसाइल कार्यक्रम का नेतृत्व किया और "मिसाइल मैन" कहलाए। 1998 के पोखरण-2 परीक्षणों में उनकी प्रमुख भूमिका थी। उन्हें 1997 में भारत रत्न मिला और वे 2002 से 2007 तक भारत के राष्ट्रपति रहे; बच्चों और युवाओं से उनके लगाव के कारण उन्हें "जनता का राष्ट्रपति" कहा गया। उनकी प्रसिद्ध पुस्तकें "विंग्स ऑफ़ फ़ायर" (अग्नि की उड़ान) और "इंडिया 2020" हैं। 27 जुलाई 2015 को शिलांग में विद्यार्थियों को व्याख्यान देते हुए उनका निधन हुआ।

10.5 राजा रमन्ना (1925–2004)

रमन्ना का जन्म कर्नाटक में हुआ। उन्होंने लंदन से परमाणु भौतिकी में डॉक्टरेट की और लौटकर भाभा के साथ ट्रॉम्बे में काम किया। वे भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र के निदेशक बने और 18 मई 1974 के पोखरण-1 परीक्षण के वैज्ञानिक दल के प्रमुख थे। बाद में वे परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष और कुछ समय केंद्र सरकार में रक्षा राज्य मंत्री भी रहे। वे पश्चिमी शास्त्रीय संगीत के कुशल पियानो-वादक थे — यानी विज्ञान और कला दोनों में निपुण।

10.6 एम. एस. स्वामीनाथन (1925–2023)

स्वामीनाथन का जन्म 1925 में तमिलनाडु के कुंभकोणम में हुआ। 1943 के बंगाल अकाल की भयावहता देखकर उन्होंने तय किया कि वे चिकित्सा की जगह कृषि विज्ञान पढ़ेंगे, ताकि देश से भूख मिटा सकें। उन्होंने बौने गेहूँ की किस्मों को भारत के अनुसार ढालकर हरित क्रांति का वैज्ञानिक नेतृत्व किया और "भारत में हरित क्रांति के जनक" कहलाए। 1987 में उन्हें पहला विश्व खाद्य पुरस्कार मिला, जिसकी राशि से उन्होंने चेन्नई में शोध-संस्थान बनाया। राष्ट्रीय किसान आयोग के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने सिफ़ारिश की कि किसान को उसकी लागत से कम से कम डेढ़ गुना दाम मिलना चाहिए। 2023 में उनका निधन हुआ और 2024 में उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न दिया गया।

10.7 वर्गीज़ कुरियन (1921–2012)

कुरियन का जन्म 26 नवंबर 1921 को केरल के कोझिकोड में हुआ। वे इंजीनियर थे और सरकारी छात्रवृत्ति की शर्त पूरी करने के लिए 1949 में अनिच्छा से गुजरात के छोटे क़स्बे आणंद आए थे; पर वहाँ के किसान नेता त्रिभुवनदास पटेल के आग्रह पर रुक गए और फिर जीवन भर वहीं रहे। उन्होंने दूध उत्पादक किसानों की सहकारी समिति को "अमूल" ब्रांड बनाया, राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (1965) के पहले अध्यक्ष बने और "ऑपरेशन फ़्लड" (1970) चलाया। उनका सिद्धांत था कि संस्था के मालिक किसान हों और पेशेवर प्रबंधक उनके कर्मचारी। वे "श्वेत क्रांति के जनक" और "भारत के दुग्ध-पुरुष" कहलाते हैं; उनका जन्मदिन 26 नवंबर राष्ट्रीय दुग्ध दिवस है।

10.8 हरगोविंद खुराना (1922–2011)

खुराना का जन्म अविभाजित पंजाब के एक छोटे गाँव में (जो अब पाकिस्तान में है) एक पटवारी के घर हुआ। उन्होंने लाहौर में पढ़ाई की और छात्रवृत्ति पर ब्रिटेन गए। भारत में उपयुक्त काम न मिलने पर वे विदेश में ही शोध करते रहे और बाद में अमेरिका के नागरिक बन गए। उन्होंने यह समझाया कि कोशिका के भीतर आनुवंशिक कोड कैसे पढ़ा जाता है — यानी डीएनए में लिखी सूचना से प्रोटीन कैसे बनते हैं। इसके लिए उन्हें 1968 में चिकित्सा का नोबेल पुरस्कार (दो अन्य वैज्ञानिकों के साथ) मिला। बाद में उन्होंने प्रयोगशाला में पहला कृत्रिम जीन भी बनाया, जिससे आगे जैव प्रौद्योगिकी का रास्ता खुला।

10.9 सुब्रह्मण्यन चंद्रशेखर (1910–1995)

चंद्रशेखर का जन्म लाहौर में एक तमिल परिवार में हुआ; वे सी. वी. रमन के भतीजे थे। मद्रास में पढ़ने के बाद, उन्नीस-बीस वर्ष की आयु में इंग्लैंड जाते समय जहाज़ पर ही उन्होंने वह गणना की जो आगे चलकर "चंद्रशेखर सीमा" कहलाई। यह सीमा बताती है कि जिस तारे का बचा हुआ भार सूर्य के भार के लगभग 1.4 गुना से अधिक हो, वह अपने जीवन के अंत में शांत "श्वेत वामन" तारा नहीं बन सकता, बल्कि और सिकुड़कर न्यूट्रॉन तारा या ब्लैक होल बन जाता है। आरंभ में बड़े वैज्ञानिकों ने उनकी बात का मज़ाक़ उड़ाया, पर बाद में वही सही सिद्ध हुई। वे अमेरिका में बस गए और उन्हें 1983 में भौतिकी का नोबेल पुरस्कार मिला। अमेरिका की एक अंतरिक्ष दूरबीन का नाम उनके सम्मान में "चंद्र" रखा गया है।

10.10 सी. एन. आर. राव (जन्म 1934)

चिंतामणि नागेश रामचंद्र राव का जन्म बंगलौर में हुआ। वे ठोस अवस्था और पदार्थ रसायन के विश्व-प्रसिद्ध वैज्ञानिक हैं — यानी वे यह अध्ययन करते हैं कि ठोस पदार्थों की भीतरी बनावट से उनके गुण कैसे तय होते हैं, जिससे नए उपयोगी पदार्थ बनाए जा सकें। उन्होंने सैकड़ों शोध-पत्र और अनेक पुस्तकें लिखी हैं। वे भारतीय विज्ञान संस्थान के निदेशक रहे, बंगलौर में जवाहरलाल नेहरू उन्नत वैज्ञानिक अनुसंधान केंद्र की स्थापना की और कई प्रधानमंत्रियों की वैज्ञानिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष रहे। उन्हें 2014 में भारत रत्न दिया गया।

10.11 सैम पित्रोदा (जन्म 1942)

सत्यनारायण गंगाराम पित्रोदा का जन्म ओडिशा के एक छोटे क़स्बे में एक गुजराती परिवार में हुआ। अमेरिका में पढ़कर वे दूरसंचार के सफल इंजीनियर और आविष्कारक बने। 1980 के दशक में वे भारत लौटे और राजीव गांधी के सलाहकार के रूप में 1984 में सी-डॉट बनाया, जिसने स्वदेशी टेलीफ़ोन एक्सचेंज विकसित किया। उन्होंने पीने के पानी, टीकाकरण, साक्षरता, तिलहन और दूरसंचार जैसे विषयों पर "प्रौद्योगिकी मिशन" भी चलाए। बाद में वे राष्ट्रीय ज्ञान आयोग के अध्यक्ष रहे। उन्हें भारत की संचार क्रांति का सूत्रधार माना जाता है।

10.12 विजय भटकर (जन्म 1946)

भटकर का जन्म महाराष्ट्र के एक गाँव में हुआ। जब अमेरिका ने भारत को सुपरकंप्यूटर देने से मना किया, तब 1988 में पुणे में बने सी-डैक के पहले प्रमुख के रूप में उन्होंने यह चुनौती स्वीकार की। उनके दल ने 1991 में "परम 8000" बना दिया और इसके बाद "परम" शृंखला के और तेज़ कंप्यूटर बनाए। उन्होंने भारतीय भाषाओं को कंप्यूटर पर लाने की तकनीक के विकास में भी योगदान दिया। उन्हें "भारतीय सुपरकंप्यूटर के जनक" कहा जाता है।

10.13 ई. श्रीधरन (जन्म 1932)

एलाट्टुवलपिल श्रीधरन का जन्म केरल में हुआ। वे रेलवे के इंजीनियर थे। 1964 में तमिलनाडु में तूफ़ान से टूटे पंबन पुल को उन्होंने तय समय से बहुत पहले, कुछ ही सप्ताहों में ठीक कर दिया। उन्होंने पश्चिमी घाट के पहाड़ों, सुरंगों और नदियों के बीच से गुज़रने वाली कठिन कोंकण रेलवे बनवाई और फिर दिल्ली मेट्रो का निर्माण तय समय और तय ख़र्च में पूरा कराया, जिसकी पहली लाइन 2002 में चली। समय की पाबंदी और ईमानदारी के कारण वे "मेट्रो मैन" कहलाए। उनका काम दिखाता है कि बड़ी सरकारी परियोजनाएँ भी समय पर पूरी हो सकती हैं।

इन तेरह के अतिरिक्त कुछ और नाम याद रखने योग्य हैं। यू. आर. राव ने आर्यभट उपग्रह बनाने वाले दल का नेतृत्व किया और बाद में इसरो के अध्यक्ष रहे। आर. चिदंबरम 1974 और 1998 — दोनों परमाणु परीक्षणों से जुड़े रहे। टेसी थॉमस अग्नि मिसाइल परियोजना की प्रमुख रहीं। और भारत में जन्मे वेंकटरामन रामकृष्णन को कोशिका में प्रोटीन बनाने वाली संरचना (राइबोसोम) पर शोध के लिए 2009 में रसायन का नोबेल पुरस्कार मिला।

📋 दोहराव तालिका: स्वतंत्र भारत के वैज्ञानिक

वैज्ञानिक

क्षेत्र

याद रखने योग्य

होमी जहाँगीर भाभा

परमाणु ऊर्जा

वे परमाणु कार्यक्रम के जनक हैं और उन्होंने त्रि-चरणीय कार्यक्रम बनाया।

विक्रम साराभाई

अंतरिक्ष

वे अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक हैं; चंद्रयान के लैंडर का नाम "विक्रम" उन्हीं पर है।

सतीश धवन

अंतरिक्ष, वायुगतिकी

वे 1972 से 1984 तक इसरो अध्यक्ष रहे और श्रीहरिकोटा केंद्र उनके नाम पर है।

ए. पी. जे. अब्दुल कलाम

अंतरिक्ष, मिसाइल

वे "मिसाइल मैन" हैं; उन्हें 1997 में भारत रत्न मिला और वे 2002 से 2007 तक राष्ट्रपति रहे।

राजा रमन्ना

परमाणु भौतिकी

वे 1974 के पोखरण-1 परीक्षण के प्रमुख वैज्ञानिक थे।

एम. एस. स्वामीनाथन

कृषि विज्ञान

वे हरित क्रांति के जनक हैं; उन्हें 1987 में पहला विश्व खाद्य पुरस्कार और 2024 में भारत रत्न मिला।

वर्गीज़ कुरियन

डेयरी

वे श्वेत क्रांति के जनक हैं; 26 नवंबर राष्ट्रीय दुग्ध दिवस है।

हरगोविंद खुराना

जैव रसायन

उन्होंने आनुवंशिक कोड की व्याख्या की और 1968 में चिकित्सा का नोबेल पाया।

सुब्रह्मण्यन चंद्रशेखर

खगोल भौतिकी

उन्होंने "चंद्रशेखर सीमा" दी और 1983 में भौतिकी का नोबेल पाया।

सी. एन. आर. राव

रसायन

वे ठोस अवस्था रसायन के वैज्ञानिक हैं और उन्हें 2014 में भारत रत्न मिला।

सैम पित्रोदा और विजय भटकर

दूरसंचार और कंप्यूटर

पित्रोदा ने सी-डॉट बनाया और भटकर ने परम सुपरकंप्यूटर बनाया।

ई. श्रीधरन

अभियांत्रिकी

वे "मेट्रो मैन" हैं, जिन्होंने कोंकण रेलवे और दिल्ली मेट्रो बनवाई।

विज्ञान और अभियांत्रिकी के क्षेत्र में देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान पाने वालों और नोबेल पुरस्कार पाने वालों की सूची अलग से याद कर लें:

🏅 विज्ञान में भारत रत्न और नोबेल

भारत रत्न — सी. वी. रमन (1954), एम. विश्वेश्वरैया (1955), ए. पी. जे. अब्दुल कलाम (1997), सी. एन. आर. राव (2014), एम. एस. स्वामीनाथन (2024, मरणोपरांत)।

विज्ञान में नोबेल — सी. वी. रमन (1930, भौतिकी; भारत में रहकर किए गए काम के लिए), हरगोविंद खुराना (1968, चिकित्सा), सुब्रह्मण्यन चंद्रशेखर (1983, भौतिकी), वेंकटरामन रामकृष्णन (2009, रसायन)। अंतिम तीनों भारत में जन्मे, पर पुरस्कार के समय विदेश के नागरिक थे।

11. वैज्ञानिक केंद्रों का मानचित्र और राष्ट्रीय दिवस

अब तक जिन संस्थाओं और घटनाओं को हमने पढ़ा, वे देश के किस कोने में हैं — यह मानचित्र पर देखने से याद पक्की होती है। मानचित्र में चार प्रकार के चिह्न हैं — परमाणु ऊर्जा के केंद्र, अंतरिक्ष के केंद्र, रक्षा अनुसंधान के केंद्र और अन्य विज्ञान संस्थान।

चित्र 19.5: भारत के प्रमुख वैज्ञानिक और तकनीकी केंद्र
चित्र 19.5: भारत के प्रमुख वैज्ञानिक और तकनीकी केंद्र

मानचित्र में दिखाए गए हर स्थान का महत्त्व नीचे समूह के अनुसार दिया गया है।

11.1 परमाणु ऊर्जा के केंद्र

◆ ट्रॉम्बे (मुंबई) — यहाँ भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र है, जो भारत के परमाणु शोध का मुख्य केंद्र है। अप्सरा (1956) और साइरस (1960) रिएक्टर यहीं बने।

◆ तारापुर (महाराष्ट्र) — यहाँ 1969 में भारत का पहला परमाणु बिजलीघर चालू हुआ।

◆ रावतभाटा (राजस्थान) — चंबल नदी के किनारे कोटा के पास यहाँ दाबित भारी जल रिएक्टरों वाला परमाणु बिजलीघर है।

◆ पोखरण (राजस्थान) — जैसलमेर ज़िले के इस रेगिस्तानी क्षेत्र में 1974 और 1998 के परमाणु परीक्षण हुए।

◆ कलपक्कम (तमिलनाडु) — चेन्नई के पास समुद्र तट पर यहाँ परमाणु बिजलीघर और फ़ास्ट ब्रीडर रिएक्टर हैं; यह त्रि-चरणीय कार्यक्रम के दूसरे चरण का केंद्र है।

◆ कुडनकुलम (तमिलनाडु) — देश के दक्षिणी छोर के पास यहाँ रूस के सहयोग से बना देश का सबसे बड़ा परमाणु बिजलीघर है।

11.2 अंतरिक्ष के केंद्र

◆ थुम्बा (केरल) — तिरुवनंतपुरम के पास इसी स्थान से 21 नवंबर 1963 को भारत का पहला रॉकेट छोड़ा गया। आज यहाँ विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र है, जहाँ प्रक्षेपण यान बनाए जाते हैं।

◆ श्रीहरिकोटा (आंध्र प्रदेश) — बंगाल की खाड़ी के तट पर स्थित इस द्वीप पर सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र है, जहाँ से भारत के सभी उपग्रह और चंद्रयान-मंगलयान छोड़े गए। पूर्वी तट इसलिए चुना गया कि पृथ्वी पश्चिम से पूर्व घूमती है; पूर्व की ओर छोड़ा गया रॉकेट इस घुमाव का लाभ पाता है और उसके गिरने वाले भाग समुद्र में गिरते हैं।

◆ बंगलौर (कर्नाटक) — यहाँ इसरो का मुख्यालय और उपग्रह बनाने का केंद्र है। यहीं भारतीय विज्ञान संस्थान (1909) और हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स भी हैं; इसी कारण यह नगर देश की विज्ञान और आई.टी. राजधानी बना।

◆ अहमदाबाद (गुजरात) — यहाँ साराभाई की बनाई भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला (1947) है, और इसरो का वह केंद्र भी जो उपग्रहों के उपकरण बनाता है।

11.3 रक्षा अनुसंधान के केंद्र

◆ हैदराबाद (तेलंगाना) — यहाँ रक्षा अनुसंधान संगठन की मिसाइल प्रयोगशाला है, जहाँ कलाम के नेतृत्व में पृथ्वी और अग्नि जैसी मिसाइलें विकसित हुईं।

◆ चांदीपुर (बालासोर, ओडिशा) — बंगाल की खाड़ी के तट पर यहाँ मिसाइल परीक्षण केंद्र है। मिसाइलें यहाँ से समुद्र की ओर दागी जाती हैं, ताकि आबादी को कोई ख़तरा न हो।

11.4 अन्य विज्ञान संस्थान

◆ देहरादून (उत्तराखंड) — यहाँ भारतीय सर्वेक्षण विभाग का मुख्यालय है, जो देश के मानचित्र बनाता है (खंड 2.1)।

◆ नई दिल्ली — यहाँ भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (पूसा), अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान और राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला हैं।

◆ कोलकाता (पश्चिम बंगाल) — यहाँ एशियाटिक सोसाइटी (1784), महेंद्रलाल सरकार की संस्था (1876), बोस संस्थान (1917) और भारतीय सांख्यिकी संस्थान हैं। उन्नीसवीं और बीसवीं सदी के आरंभ में यह नगर भारतीय विज्ञान की राजधानी था।

◆ पुणे (महाराष्ट्र) — यहाँ राष्ट्रीय रासायनिक प्रयोगशाला है; यहीं सी-डैक ने परम सुपरकंप्यूटर बनाया और यहीं विश्व का सबसे बड़ा टीका-कारख़ाना है।

🗺️ मानचित्र याद रखने की युक्ति

परमाणु बिजलीघर प्रायः समुद्र या बड़ी नदी के किनारे हैं (तारापुर, कलपक्कम, कुडनकुलम समुद्र तट पर और रावतभाटा चंबल के किनारे), क्योंकि रिएक्टर को ठंडा करने के लिए बहुत पानी चाहिए। रॉकेट और मिसाइल के केंद्र पूर्वी तट पर हैं (श्रीहरिकोटा, चांदीपुर), ताकि वे समुद्र के ऊपर से उड़ें। और परमाणु परीक्षण का स्थान रेगिस्तान में है (पोखरण), जहाँ आबादी बहुत कम है।

11.5 विज्ञान से जुड़े राष्ट्रीय दिवस

कई राष्ट्रीय दिवस किसी वैज्ञानिक के जन्मदिन या किसी बड़ी वैज्ञानिक घटना की स्मृति में मनाए जाते हैं। इनमें से अधिकतर को हम पिछले खंडों में पढ़ चुके हैं; नीचे की तालिका उन्हें एक जगह दोहराती है।

दिवस

तिथि

किसकी स्मृति में

राष्ट्रीय विज्ञान दिवस

28 फ़रवरी

इस दिन 1928 में सी. वी. रमन ने रमन प्रभाव की खोज की थी।

राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस

11 मई

इस दिन 1998 में पोखरण-2 के परमाणु परीक्षण हुए थे।

सांख्यिकी दिवस

29 जून

यह प्रशांत चंद्र महालनोबिस का जन्मदिन है।

राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस

1 जुलाई

यह डॉ. बिधानचंद्र राय के जन्म और निधन, दोनों की तिथि है।

राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस

23 अगस्त

इस दिन 2023 में चंद्रयान-3 चंद्रमा पर उतरा था।

अभियंता दिवस

15 सितंबर

यह एम. विश्वेश्वरैया का जन्मदिन है।

राष्ट्रीय दुग्ध दिवस

26 नवंबर

यह वर्गीज़ कुरियन का जन्मदिन है।

राष्ट्रीय गणित दिवस

22 दिसंबर

यह श्रीनिवास रामानुजन का जन्मदिन है।

12. मूल्यांकन, कालक्रम और सार

लगभग ढाई सौ वर्षों की इस यात्रा को हमने तीन पड़ावों में देखा — औपनिवेशिक विज्ञान, जो साम्राज्य की सेवा के लिए था; राष्ट्रवादी विज्ञान, जिसमें बसु, राय, रमन और साहा जैसे वैज्ञानिकों ने पराधीनता में भी विश्वस्तरीय काम करके देश का आत्मविश्वास जगाया; और स्वतंत्र भारत का विज्ञान, जिसने राष्ट्र-निर्माण का बीड़ा उठाया। अब यह परखें कि स्वतंत्र भारत के विज्ञान ने क्या पाया और कहाँ कमी रह गई।

12.1 उपलब्धियाँ

◆ कम साधनों में विश्वस्तरीय क्षमता — भारत उन गिने-चुने देशों में है जो अपने उपग्रह स्वयं बनाते और छोड़ते हैं, परमाणु बिजलीघर स्वयं बनाते हैं और चंद्रमा तथा मंगल तक पहुँचे हैं। यह सब विकसित देशों की तुलना में बहुत कम ख़र्च में हुआ; मंगलयान इसका सबसे प्रसिद्ध उदाहरण है।

◆ भोजन और स्वास्थ्य की सुरक्षा — हरित और श्वेत क्रांति से देश खाद्यान्न और दूध में आत्मनिर्भर हुआ। चेचक और पोलियो मिटे, औसत आयु दुगुनी से अधिक हुई और सस्ती दवाओं तथा टीकों ने भारत को "विश्व की फ़ार्मेसी" बना दिया।

◆ प्रतिबंधों के बीच आत्मनिर्भरता — 1974 और 1998 के बाद लगे प्रतिबंध, क्रायोजेनिक इंजन देने से इनकार और सुपरकंप्यूटर देने से इनकार — हर बार भारतीय वैज्ञानिकों ने वह तकनीक स्वयं बनाकर दिखाई। यानी रोक ने देश को कमज़ोर नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर बनाया।

◆ मानव संसाधन और डिजिटल ढाँचा — भारत के पास विश्व के सबसे बड़े वैज्ञानिक और तकनीकी मानव संसाधनों में से एक है। आधार और यूपीआई जैसे डिजिटल ढाँचे ने करोड़ों लोगों को बैंक और सरकारी सेवाओं से जोड़ा है।

◆ संस्था-निर्माण — भाभा, साराभाई, भटनागर और महालनोबिस जैसे वैज्ञानिकों ने केवल खोजें नहीं कीं, बल्कि ऐसी संस्थाएँ बनाईं जो उनके बाद भी चलती रहीं। यही निरंतरता भारत के विज्ञान की सबसे बड़ी ताक़त है।

12.2 चुनौतियाँ और सीमाएँ

◆ शोध पर कम ख़र्च — भारत शोध और विकास पर अपने सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 0.7 प्रतिशत ही ख़र्च करता है, जबकि 2003 की नीति का लक्ष्य 2 प्रतिशत था और कई विकसित देश इससे कहीं अधिक ख़र्च करते हैं। इसमें भी अधिकतर धन सरकार देती है; निजी उद्योग का योगदान कम है।

◆ प्रतिभा पलायन — देश के बहुत-से श्रेष्ठ वैज्ञानिक और इंजीनियर बेहतर सुविधाओं के लिए विदेश चले जाते हैं। खुराना, चंद्रशेखर और रामकृष्णन — तीनों को नोबेल विदेश में किए गए काम के लिए मिला; स्वतंत्र भारत में रहकर किए गए काम के लिए अब तक विज्ञान का नोबेल किसी को नहीं मिला है।

◆ उद्योग और विश्वविद्यालय का कमज़ोर संबंध — अच्छा शोध कुछ चुनिंदा राष्ट्रीय संस्थानों तक सीमित है; अधिकतर विश्वविद्यालयों में प्रयोगशालाएँ कमज़ोर हैं। प्रयोगशाला की खोज कारख़ाने तक कम पहुँचती है, इसलिए भारत के पेटेंट कम हैं और कई उन्नत वस्तुओं (जैसे विमान के इंजन और कंप्यूटर के चिप) के लिए देश अब भी आयात पर निर्भर है।

◆ बड़े विज्ञान और आम ज़रूरतों का असंतुलन — आलोचक कहते हैं कि परमाणु, अंतरिक्ष और रक्षा पर तो बहुत ध्यान दिया गया, पर स्वच्छ पानी, प्राथमिक स्वास्थ्य, स्वच्छता और प्राथमिक शिक्षा जैसे क्षेत्रों में विज्ञान का लाभ उतनी तेज़ी से नहीं पहुँचा।

◆ महिलाओं की कम भागीदारी और डिजिटल अंतर — विज्ञान पढ़ने वाली लड़कियाँ बहुत हैं, पर शोध-संस्थानों के ऊँचे पदों पर महिलाएँ कम हैं। इसी तरह गाँव और शहर, अमीर और ग़रीब के बीच इंटरनेट और कंप्यूटर की पहुँच में बड़ा डिजिटल अंतर है।

◆ वैज्ञानिक दृष्टिकोण की कमी — संविधान में कर्तव्य होने के बावजूद समाज में अंधविश्वास, झाड़-फूँक और झूठी ख़बरों पर विश्वास अब भी व्यापक है। यानी विज्ञान की उपलब्धियाँ बढ़ीं, पर वैज्ञानिक सोच उतनी नहीं फैली।

🔍 आसान परिभाषा: प्रतिभा पलायन

📘 परिभाषा: किसी देश के उच्च शिक्षित और कुशल लोगों — वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, डॉक्टरों — का बेहतर वेतन, सुविधाओं या अवसरों के लिए स्थायी रूप से दूसरे देश में जाकर बस जाना, जिससे उन्हें तैयार करने वाला देश उनकी सेवाओं से वंचित रह जाता है।

💡 आसान भाषा में: यानी देश ने पढ़ा-लिखाकर जिसे तैयार किया, उसकी योग्यता का लाभ किसी दूसरे देश को मिलना। 🏠 उदाहरण: सरकारी ख़र्च पर प्रौद्योगिकी संस्थान से पढ़ा इंजीनियर यदि जीवन भर अमेरिका की कंपनी में काम करे, तो यह प्रतिभा पलायन है। पर इसका दूसरा पक्ष भी है — सैम पित्रोदा जैसे कई लोग विदेश का अनुभव लेकर लौटे और देश के काम आए; इसे "प्रतिभा की वापसी" कहा जाता है।

दोनों पक्षों को नीचे की तालिका से आमने-सामने दोहराएँ।

✅ उपलब्धियाँ — दोहराव

✔ कम साधनों में विश्वस्तरीय अंतरिक्ष और परमाणु क्षमता बनी, जिसका उदाहरण मंगलयान है।

✔ देश खाद्यान्न में आत्मनिर्भर हुआ और सस्ती दवाएँ तथा टीके बनाने लगा।

✔ प्रतिबंधों के बावजूद स्वदेशी तकनीक विकसित हुई।

✔ भारत के पास बड़ा तकनीकी मानव संसाधन है और वह डिजिटल भुगतान में अग्रणी है।

⚠️ चुनौतियाँ — दोहराव

✔ शोध और विकास पर ख़र्च सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 0.7 प्रतिशत ही है।

✔ अच्छे वैज्ञानिक विदेश चले जाते हैं, जिसे प्रतिभा पलायन कहते हैं।

✔ उद्योग और विश्वविद्यालयों का संबंध कमज़ोर है और पेटेंट कम हैं।

✔ विज्ञान में महिलाओं की भागीदारी कम है और गाँव-शहर के बीच डिजिटल अंतर है।

12.3 कालक्रम: एक नज़र में

पूरे अध्याय की मुख्य तिथियाँ नीचे क्रम से दी गई हैं। परीक्षा से पहले इसी तालिका को दोहरा लेना पर्याप्त है।

वर्ष

घटना

1784 / 1851

1784 में एशियाटिक सोसाइटी बनी और 1851 में भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण बना।

1876 / 1909 / 1914

1876 में महेंद्रलाल सरकार की संस्था, 1909 में भारतीय विज्ञान संस्थान और 1914 में विज्ञान कांग्रेस बनी।

1928 / 1930

1928 में रमन प्रभाव खोजा गया और 1930 में रमन को नोबेल मिला।

1942 / 1945 / 1948

1942 में सी.एस.आई.आर., 1945 में टी.आई.एफ़.आर. और 1948 में परमाणु ऊर्जा आयोग बना।

1951 / 1956 / 1958

1951 में पहला आई.आई.टी. खुला; 1956 में अप्सरा रिएक्टर चला और एम्स बना; 1958 में वैज्ञानिक नीति प्रस्ताव आया और डी.आर.डी.ओ. बना।

1963 / 1969

1963 में थुम्बा से पहला रॉकेट छूटा; 1969 में इसरो बना और तारापुर बिजलीघर चला।

1974 / 1975

1974 में पोखरण-1 हुआ और 1975 में आर्यभट उपग्रह छोड़ा गया।

1977 / 1980

1977 में भारत चेचक-मुक्त घोषित हुआ और 1980 में एस.एल.वी.-3 ने रोहिणी को कक्षा में पहुँचाया।

1983 / 1984

1983 में मिसाइल कार्यक्रम शुरू हुआ; 1984 में राकेश शर्मा अंतरिक्ष में गए और सी-डॉट बना।

1991 / 1995 / 1998

1991 में परम 8000 बना; 1995 में इंटरनेट और मोबाइल आए; 1998 में पोखरण-2 हुआ और ब्रह्मोस उपक्रम बना।

2008 / 2014

2008 में चंद्रयान-1 गया और परमाणु समझौता हुआ; 2014 में मंगलयान मंगल की कक्षा में पहुँचा और भारत पोलियो-मुक्त प्रमाणित हुआ।

2016 / 2019 / 2021

2016 में यूपीआई शुरू हुआ; 2019 में मिशन शक्ति हुआ; 2021 में कोविड टीकाकरण शुरू हुआ।

2023 / 2025

2023 में चंद्रयान-3 उतरा और आदित्य-एल1 छोड़ा गया; 2025 में स्पेडेक्स डॉकिंग हुई और शुभांशु शुक्ला अंतरिक्ष स्टेशन पर गए।

अंत में पूरे अध्याय के मुख्य शब्द, जिन्हें देखते ही पूरी बात याद आ जानी चाहिए:

🔑 कीवर्ड सार

एशियाटिक सोसाइटी • महेंद्रलाल सरकार • भारतीय विज्ञान संस्थान (टाटा) • बसु-क्रेस्कोग्राफ़ • रमन प्रभाव • बोस-आइंस्टीन • साहा समीकरण • भटनागर • वैज्ञानिक नीति प्रस्ताव 1958 • अनुच्छेद 51क (ज) • सरकार समिति — आई.आई.टी. खड़गपुर 1951

भाभा — त्रि-चरणीय कार्यक्रम • दाबित भारी जल रिएक्टर • फ़ास्ट ब्रीडर — कलपक्कम • थोरियम — मोनाज़ाइट रेत • अप्सरा • तारापुर • पोखरण 1974/1998 • "पहले प्रयोग नहीं" • साराभाई — थुम्बा • आर्यभट • साइट • एस.एल.वी.-3 • क्रायोजेनिक इंजन • मंगलयान • चंद्रयान-3 — शिव शक्ति बिंदु

कलाम — मिसाइल • पृथ्वी-अग्नि-त्रिशूल-आकाश-नाग • ब्रह्मोस • तेजस • अरिहंत — परमाणु त्रिक • मिशन शक्ति • स्वामीनाथन • कुरियन • बीटी कपास • पल्स पोलियो • कोवैक्सिन • सी-डॉट • परम 8000 • आधार • यूपीआई

इस अध्याय के साथ हमने देखा कि आधुनिक भारत ने विज्ञान के बल पर अपनी सुरक्षा, भोजन और संचार की समस्याएँ कैसे हल कीं। पर किसी भी समाज की प्रगति अधूरी है, यदि उसकी आधी आबादी पीछे छूट जाए।

💡 अंतिम बात

साइकिल पर ढोए गए रॉकेट से चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव तक की यह यात्रा बताती है कि आत्मविश्वास, संस्थाएँ और निरंतरता कम साधनों को भी बड़ी उपलब्धि में बदल देती हैं।

इस अध्याय में हमने जानकी अम्माल, असीमा चटर्जी और टेसी थॉमस जैसी वैज्ञानिकों को देखा, जिन्होंने कठिन सामाजिक परिस्थितियों में अपना स्थान बनाया। अगला और अंतिम अध्याय इसी बड़े प्रश्न को उठाता है — आधुनिक भारत में महिला सशक्तीकरण — यानी सती-निषेध और स्त्री-शिक्षा से लेकर संसद में आरक्षण तक भारतीय महिलाओं की पूरी यात्रा।

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