🌅 कहानी से शुरुआत: "नियति से साक्षात्कार" और अंधेरे में छलांग 14–15 अगस्त 1947 की मध्यरात्रि। दिल्ली में संविधान सभा का विशेष सत्र चल रहा था। घड़ी बारह बजाने ही वाली थी, तभी जवाहरलाल नेहरू बोले — “बहुत वर्ष पहले हमने नियति से एक वादा किया था… आज रात बारह बजे, जब दुनिया सो रही होगी, भारत जीवन और स्वतंत्रता के लिए जागेगा।” सदन में बैठे लोग सदियों की ग़ुलामी के अंत का क्षण सुन रहे थे। पर जिस महापुरुष ने आज़ादी की लड़ाई को जन-आंदोलन बनाया था, वह उस रात दिल्ली में नहीं था। महात्मा गांधी कलकत्ता में थे और उन्होंने उत्सव में शामिल होने के बजाय उपवास और प्रार्थना में दिन बिताया। कारण साफ़ था — बँटवारे की आग अभी बुझी नहीं थी और सांप्रदायिक हिंसा थमी नहीं थी। सुबह होते ही असली परीक्षा शुरू हो गई। सीमा के आर-पार शरणार्थियों के काफ़िले चल रहे थे, ख़ज़ाना ख़ाली था, अकाल की याद ताज़ा थी, निरक्षरता बहुत ऊँची थी और खेती पूरी तरह बारिश के भरोसे थी। दुनिया के कई विद्वानों को लगता था कि इतना विविध और ग़रीब देश लोकतंत्र को संभाल ही नहीं पाएगा। कुछ ने तो भविष्यवाणी कर दी थी कि भारत जल्दी ही टुकड़ों में बँट जाएगा या सेना के शासन में चला जाएगा। भारत ने इसका जवाब क़दम-दर-क़दम दिया। 30 जनवरी 1948 को गांधीजी की हत्या ने पूरे देश को झकझोर दिया, पर इसी सदमे ने धर्मनिरपेक्ष राज्य बनाने का संकल्प और मज़बूत कर दिया। 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू हुआ और पहले ही दिन हर वयस्क को वोट का अधिकार मिल गया। फिर 1951–52 में लगभग 17 करोड़ मतदाताओं, जिनमें अधिकांश पढ़-लिख नहीं सकते थे, ने पहली बार अपनी सरकार चुनी — जिसे उस समय “अंधेरे में छलांग” कहा गया। तो क्या यह छलांग सही जगह उतरी? योजनाओं, बाँधों, इस्पात संयंत्रों, युद्धों, आपातकाल और 1991 के सुधारों से गुज़रते हुए भारत ने अगले पचास वर्षों में उन शंकाओं को कैसे ग़लत साबित किया, और रास्ते में कहाँ-कहाँ ठोकरें खाईं? यही इस अध्याय की कहानी है। आगे दो कहानियाँ भी मिलेंगी, जो पहले चुनाव की चुनौती और 1991 के आर्थिक संकट को आसान तरीक़े से समझा देंगी। |
स्वतंत्र भारत के सामने तीन बड़ी चुनौतियाँ थीं — एकता बनाए रखना, लोकतंत्र स्थापित करना और सबका विकास करना। पहली चुनौती का उत्तर रियासतों का एकीकरण और राज्यों का पुनर्गठन था, जिसे पिछले अध्याय में पढ़ा जा चुका है। बाक़ी दो चुनौतियों — लोकतंत्र और विकास — का उत्तर इस अध्याय में है। पहले यह समझ लें कि 1947 में देश की हालत वास्तव में कैसी थी।
◆ विभाजन के घाव — देश के बँटवारे के साथ इतिहास का सबसे बड़ा जन-विस्थापन हुआ। लगभग डेढ़ करोड़ लोगों को अपना घर छोड़कर सीमा के इस पार या उस पार जाना पड़ा और सांप्रदायिक हिंसा में लाखों लोग मारे गए। पंजाब और बंगाल से आए शरणार्थियों को भोजन, छत और रोज़गार देना नई सरकार का पहला काम था। इसके लिए पुनर्वास मंत्रालय बना और दिल्ली के आसपास फ़रीदाबाद, राजेंद्र नगर, लाजपत नगर जैसी नई बस्तियाँ बसाई गईं।
◆ गांधीजी की हत्या — 30 जनवरी 1948 को नाथूराम गोडसे ने गांधीजी की हत्या कर दी। इससे सांप्रदायिक तनाव चरम पर पहुँच गया, पर इसका एक परिणाम यह भी हुआ कि पूरा देश सदमे में एकजुट हुआ और धर्मनिरपेक्ष राज्य बनाने का संकल्प और मज़बूत हो गया।
◆ ग़रीबी और अकाल — उस समय भारतीय की औसत आयु केवल लगभग 32 वर्ष थी और 1951 की जनगणना में साक्षरता केवल लगभग 18% थी। 1943 के बंगाल अकाल की याद ताज़ा थी और देश को अनाज बाहर से मँगाना पड़ता था। इसलिए सरकार ने नियोजन, भूमि सुधार और सिंचाई पर ज़ोर दिया और आगे चलकर हरित क्रांति आई।
◆ उद्योग का अभाव — अंग्रेज़ों ने भारत को ऐसी औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था बना दिया था जो कच्चा माल बाहर भेजती थी और तैयार माल आयात करती थी। देश में मशीनें बनाने वाले भारी उद्योग लगभग नहीं थे। इसका उत्तर था — सार्वजनिक क्षेत्र के बड़े कारख़ाने, भारी उद्योग और मिश्रित अर्थव्यवस्था (खंड 3)।
◆ लोकतंत्र की स्थापना — करोड़ों निरक्षर मतदाता थे और देश को चुनाव कराने का कोई अनुभव नहीं था। इसका उत्तर था 26 जनवरी 1950 का संविधान, जिसने पहले ही दिन हर वयस्क को वोट का अधिकार दिया, और एक स्वतंत्र निर्वाचन आयोग, जिसकी स्थापना 25 जनवरी 1950 को हुई।
🔍 आसान परिभाषा: सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार |
📘 परिभाषा: ऐसी व्यवस्था, जिसमें एक निश्चित आयु पूरी कर चुके हर नागरिक को — धर्म, जाति, लिंग, शिक्षा, संपत्ति या आय का भेद किए बिना — वोट देने का बराबर अधिकार हो। |
💡 आसान भाषा में: अमीर-ग़रीब, पढ़ा-अनपढ़, स्त्री-पुरुष — सबके एक वोट की क़ीमत बराबर है। अंग्रेज़ों के समय केवल संपत्ति या शिक्षा वाले थोड़े से लोग वोट दे पाते थे। 🏠 उदाहरण: 1950 में वोट की आयु 21 वर्ष थी; 61वें संशोधन (1988) के बाद यह 18 वर्ष हो गई। 1935 के अधिनियम में केवल लगभग 10–15% लोगों को मताधिकार था। |
📖 कहानी 1: जब 17 करोड़ मतदाताओं को चिह्न देखकर वोट डालना सिखाया गया 1951 में भारत के सामने एक अजीब सवाल था — जिस देश के अधिकांश लोग अपना नाम तक नहीं लिख सकते, वह चुनाव कैसे कराएगा? लगभग 17 करोड़ मतदाता थे, और चुनाव कराने का ज़िम्मा मुख्य निर्वाचन आयुक्त सुकुमार सेन पर था, जो गणितज्ञ और अनुभवी प्रशासक थे। विदेशों में कई लोग मान रहे थे कि यह प्रयोग असफल होगा। समाधान सीधा था, पर बड़ा था। पढ़ न सकने वाले मतदाता भी पहचान सकें, इसलिए हर दल को चुनाव चिह्न मिला — जैसे कांग्रेस का “दो बैलों की जोड़ी”। मतपत्र पर नाम पढ़ने की ज़रूरत ही नहीं रही। इसके साथ हर प्रत्याशी के लिए अलग मतपेटी रखी गई, जिस पर उसका चिह्न बना होता था। मतदाता को बस अपने पसंदीदा चिह्न वाली पेटी में पर्ची डालनी थी। तैयारी में भी कई मुश्किलें थीं। मतदाता सूची बनाने के दौरान बहुत-सी महिलाओं ने अपना नाम बताने के बजाय ख़ुद को किसी की माँ या पत्नी के रूप में लिखवाया। निर्वाचन आयोग ने इस पर आपत्ति की और ज़ोर दिया कि हर नागरिक का अपना नाम दर्ज हो, क्योंकि वोट का अधिकार व्यक्ति का है, परिवार का नहीं। लाखों कर्मचारियों को प्रशिक्षण देना और दूर-दराज़ इलाक़ों तक पेटियाँ पहुँचाना अलग चुनौती थी। मतदान 25 अक्टूबर 1951 से 21 फ़रवरी 1952 तक चला। पहला वोट हिमाचल प्रदेश के चीनी (आज के किन्नौर) में डाला गया, क्योंकि वहाँ सर्दियों में बर्फ़ से रास्ते बंद हो जाते थे। नतीजों में लोकसभा की 489 सीटों में से कांग्रेस को 364 सीटें मिलीं। चुनाव शांतिपूर्ण और निष्पक्ष रहा और “अंधेरे में छलांग” कहे गए इस प्रयोग ने दुनिया को दिखा दिया कि ग़रीब और अनपढ़ जनता भी समझदारी से अपना शासक चुन सकती है। 🧭 इस कहानी से कौन-सी अवधारणा साफ़ हुई ✔ सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार — धर्म, जाति, लिंग, शिक्षा या संपत्ति का भेद किए बिना हर वयस्क को वोट का बराबर अधिकार; संविधान ने यह पहले ही दिन दे दिया। ✔ चुनाव चिह्न और अलग मतपेटी — निरक्षर मतदाताओं के लिए चित्र पहचानकर वोट डालने की व्यवस्था, जिसने लोकतंत्र को सबके लिए संभव बनाया। ✔ स्वतंत्र निर्वाचन आयोग — 25 जनवरी 1950 को बना, जिसने पहले चुनाव को निष्पक्ष ढंग से संपन्न कराया; पहले मुख्य निर्वाचन आयुक्त सुकुमार सेन थे। 📝 परीक्षा के लिए: परीक्षा-सूत्र: निर्वाचन आयोग 25 जनवरी 1950; सुकुमार सेन; पहला आम चुनाव 25 अक्टूबर 1951 से 21 फ़रवरी 1952; लोकसभा 489 सीटें, कांग्रेस 364; पहला वोट चीनी (किन्नौर) |
◆ कब और किसने कराया — पहला आम चुनाव 25 अक्टूबर 1951 से 21 फ़रवरी 1952 तक, लगभग चार महीने चला। इसे पहले मुख्य निर्वाचन आयुक्त सुकुमार सेन ने संपन्न कराया, जो गणितज्ञ और अनुभवी प्रशासक थे। पहला वोट हिमाचल प्रदेश के चीनी (आज का किन्नौर) क्षेत्र में डाला गया, क्योंकि वहाँ सर्दियों में बर्फ़ से रास्ते बंद हो जाते थे।
◆ कठिनाई कितनी बड़ी थी — लगभग 17 करोड़ मतदाता थे, जिनमें अधिकांश पढ़-लिख नहीं सकते थे। इसलिए हर दल और प्रत्याशी को एक चुनाव चिह्न दिया गया (जैसे कांग्रेस का "दो बैलों की जोड़ी") और हर प्रत्याशी के लिए अलग मतपेटी रखी गई, ताकि मतदाता चित्र पहचानकर सही पेटी में पर्ची डाल सके। मतदाता सूची बनाने, लाखों कर्मचारियों को प्रशिक्षण देने और दूर-दराज़ इलाक़ों तक पेटियाँ पहुँचाने का काम अपने आप में बहुत बड़ा था।
◆ परिणाम — लोकसभा की 489 सीटों में से कांग्रेस को 364 सीटें मिलीं; दूसरे स्थान पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी रही। जवाहरलाल नेहरू पहले निर्वाचित प्रधानमंत्री बने। 1952 में ही डॉ. राजेंद्र प्रसाद पहले निर्वाचित राष्ट्रपति बने और गणेश वासुदेव मावलंकर लोकसभा के पहले अध्यक्ष।
◆ महत्त्व — उस समय इसे "अंधेरे में छलांग" कहा गया, क्योंकि किसी ने इतने बड़े और ग़रीब देश में ऐसा प्रयोग नहीं किया था। पर चुनाव शांतिपूर्ण और निष्पक्ष रहा और इसने सिद्ध कर दिया कि ग़रीब और अनपढ़ जनता भी समझदारी से अपने शासक चुन सकती है। यह दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक प्रयोग की सफल शुरुआत थी।
💡 "कांग्रेस प्रणाली" क्या थी? पहले तीन आम चुनावों (1952, 1957, 1962) में कांग्रेस ने लगातार भारी बहुमत पाया। राजनीतिशास्त्री रजनी कोठारी ने इसे "कांग्रेस प्रणाली" कहा — यानी एक ऐसा प्रभुत्वशाली दल, जिसके भीतर ही समाजवादी, पूँजीवाद-समर्थक, किसान और उद्योगपति सबके गुट थे, और विपक्ष बाहर से दबाव डालकर कांग्रेस के भीतर के गुटों को प्रभावित करता था। यह प्रभुत्व 1967 में पहली बार टूटा (खंड 8)। |
जवाहरलाल नेहरू का जन्म 14 नवंबर 1889 को इलाहाबाद में प्रसिद्ध वकील मोतीलाल नेहरू के घर हुआ। उन्होंने इंग्लैंड के हैरो और कैम्ब्रिज में पढ़ाई की और बैरिस्टर बने। गांधीजी के प्रभाव में वे स्वतंत्रता आंदोलन में कूदे और लगभग नौ वर्ष जेल में बिताए; 1929 के लाहौर अधिवेशन में उनकी अध्यक्षता में पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव पारित हुआ। जेल में ही उन्होंने "डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया" (भारत की खोज), "ग्लिम्प्सेज़ ऑफ़ वर्ल्ड हिस्ट्री" (विश्व इतिहास की झलक) और अपनी आत्मकथा लिखी। वे 15 अगस्त 1947 से 27 मई 1964 तक — लगभग 17 वर्ष — भारत के प्रधानमंत्री रहे; यह अब तक का सबसे लंबा कार्यकाल है। उन्हें "आधुनिक भारत का निर्माता" कहा जाता है, 1955 में उन्हें भारत रत्न मिला और उनका जन्मदिन बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है।
◆ संसदीय लोकतंत्र — नेहरू का मानना था कि भारत जैसे विविध देश को केवल लोकतंत्र ही जोड़कर रख सकता है। इसलिए उन्होंने संसद में नियमित उपस्थित रहकर प्रश्नों के उत्तर दिए, छोटे-से विपक्ष की बात भी ध्यान से सुनी और न्यायपालिका, निर्वाचन आयोग जैसी संस्थाओं को स्वतंत्र रहने दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि आगे चलकर संकटों के बावजूद लोकतांत्रिक संस्थाएँ टिकी रहीं।
◆ धर्मनिरपेक्षता — विभाजन की हिंसा के बाद भी नेहरू ने भारत को किसी एक धर्म का राज्य नहीं बनने दिया। उनका विचार था कि राज्य का अपना कोई धर्म न हो और सभी धर्मों के लोगों को बराबर अधिकार और सुरक्षा मिले। वे बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक — दोनों तरह की सांप्रदायिकता को राष्ट्र के लिए ख़तरा मानते थे।
◆ लोकतांत्रिक समाजवाद — नेहरू सोवियत संघ की तेज़ प्रगति से प्रभावित थे, पर वहाँ की तानाशाही उन्हें स्वीकार नहीं थी। इसलिए उन्होंने बीच का रास्ता चुना — नियोजन, बड़ा सार्वजनिक क्षेत्र और मिश्रित अर्थव्यवस्था, पर लोकतंत्र और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के साथ। उद्देश्य था कि विकास का लाभ केवल कुछ अमीरों तक सीमित न रहे।
◆ गुटनिरपेक्ष विदेश नीति — दुनिया जब अमेरिका और सोवियत संघ के दो गुटों में बँट रही थी, नेहरू ने भारत को किसी सैन्य गुट में शामिल नहीं किया, ताकि देश अपने निर्णय स्वयं ले सके और अपनी सीमित शक्ति हथियारों के बजाय विकास पर लगा सके (खंड 5)।
◆ बड़े बाँध और नदी घाटी परियोजनाएँ — सतलुज नदी पर भाखड़ा-नांगल, ओडिशा में महानदी पर हीराकुड और अमेरिका की टेनेसी घाटी प्राधिकरण के नमूने पर बना दामोदर घाटी निगम (1948) — इन परियोजनाओं से सिंचाई, बिजली और बाढ़-नियंत्रण तीनों का लक्ष्य था। नेहरू ने इन्हें "आधुनिक भारत के मंदिर" कहा, क्योंकि उनके अनुसार नए भारत की पूजा इन्हीं कार्यस्थलों पर होनी थी।
◆ इस्पात संयंत्र — दूसरी योजना में सरकारी क्षेत्र में तीन बड़े इस्पात कारख़ाने लगे — सोवियत संघ के सहयोग से भिलाई (आज छत्तीसगढ़), पश्चिम जर्मनी के सहयोग से राउरकेला (ओडिशा) और ब्रिटेन के सहयोग से दुर्गापुर (पश्चिम बंगाल)। इससे पता चलता है कि गुटनिरपेक्ष भारत ने दोनों गुटों से सहायता ली।
◆ वैज्ञानिक और शैक्षिक संस्थान — परमाणु ऊर्जा आयोग (1948), पहला भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान — आई.आई.टी. खड़गपुर (1951) और अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, दिल्ली (1956) जैसी संस्थाएँ इसी दौर में बनीं। नेहरू "वैज्ञानिक दृष्टिकोण" को राष्ट्र-निर्माण का आधार मानते थे।
◆ सामाजिक सुधार — हिंदू कोड बिल — डॉ. आंबेडकर का विधेयक विरोध के कारण अटका तो 1951 में उन्होंने क़ानून मंत्री पद से इस्तीफ़ा दे दिया। पर नेहरू ने इसे चार अलग क़ानूनों में बाँटकर पारित करवाया — हिंदू विवाह अधिनियम (1955), हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम (1956), हिंदू अवयस्कता और संरक्षकता अधिनियम (1956) और हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम (1956)। इनसे स्त्रियों को तलाक़, संपत्ति और गोद लेने के अधिकार मिले।
❝ केवल विज्ञान ही भूख और ग़रीबी, गंदगी और निरक्षरता, अंधविश्वास और जड़ रूढ़ियों की समस्याओं को हल कर सकता है। ❞ (जवाहरलाल नेहरू) |
🏛️ नेहरूवादी दृष्टि के चार स्तंभ ✔ संसदीय लोकतंत्र — संस्थाओं और विपक्ष का सम्मान किया गया। ✔ धर्मनिरपेक्षता — राज्य का कोई धर्म नहीं, सब धर्मों को समान अधिकार मिले। ✔ लोकतांत्रिक समाजवाद — नियोजन और मिश्रित अर्थव्यवस्था अपनाई गई। ✔ गुटनिरपेक्ष विदेश नीति — शीतयुद्ध में भारत ने स्वतंत्र मार्ग चुना। | 🔬 संस्थागत विरासत ✔ बाँध — भाखड़ा-नांगल, हीराकुड और दामोदर घाटी "आधुनिक भारत के मंदिर" बने। ✔ इस्पात — भिलाई, राउरकेला और दुर्गापुर संयंत्र लगे। ✔ संस्थान — परमाणु ऊर्जा आयोग, आई.आई.टी. और अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान बने। ✔ हिंदू कोड बिल (1955–56) से स्त्रियों को नए अधिकार मिले। |
आज़ादी से पहले ही नेताओं और अर्थशास्त्रियों ने मान लिया था कि बाज़ार अपने-आप भारत की ग़रीबी दूर नहीं करेगा — सरकार को योजना बनाकर तय करना होगा कि सीमित धन किस क्षेत्र में, कितना और कब लगाया जाए। स्वतंत्रता के बाद सोवियत संघ की पंचवर्षीय योजनाओं से प्रेरणा लेकर, पर लोकतांत्रिक ढाँचे में, भारत ने नियोजित विकास का मार्ग चुना।
🔍 आसान परिभाषा: आर्थिक नियोजन और पंचवर्षीय योजना |
📘 परिभाषा: आर्थिक नियोजन का अर्थ है — एक केंद्रीय संस्था द्वारा देश के उपलब्ध संसाधनों का आकलन करके निश्चित अवधि के लिए लक्ष्य तय करना और यह निर्धारित करना कि किस क्षेत्र में कितना निवेश होगा। जब यह योजना पाँच वर्ष की अवधि के लिए बनाई जाए तो उसे पंचवर्षीय योजना कहते हैं। |
💡 आसान भाषा में: जैसे एक परिवार महीने की आमदनी देखकर तय करता है कि कितना राशन पर, कितना पढ़ाई पर और कितना बचत में जाएगा — वैसे ही सरकार पाँच साल का "घरेलू बजट" देश के लिए बनाती है। 🏠 उदाहरण: पहली योजना (1951–56) ने सबसे अधिक धन कृषि और सिंचाई को दिया; दूसरी योजना (1956–61) ने भारी उद्योगों को। |
◆ राष्ट्रीय योजना समिति (1938) — कांग्रेस अध्यक्ष सुभाष चंद्र बोस की पहल पर बनी इस समिति के अध्यक्ष नेहरू थे। युद्ध और नेताओं की गिरफ़्तारी के कारण इसका काम अधूरा रहा, पर नियोजन का विचार कांग्रेस की नीति का हिस्सा बन गया।
◆ बम्बई योजना (1944) — जे. आर. डी. टाटा, घनश्यामदास बिड़ला सहित आठ बड़े उद्योगपतियों ने यह योजना बनाई। दिलचस्प बात यह है कि उद्योगपतियों ने भी माना था कि भारी उद्योग और आधारभूत ढाँचे में राज्य को बड़ी भूमिका निभानी होगी, क्योंकि उसमें लगने वाला धन निजी क्षेत्र के पास नहीं था।
◆ गांधीवादी योजना (1944) — श्रीमन्नारायण अग्रवाल ने गांधीजी के विचारों पर आधारित योजना बनाई, जिसमें कुटीर उद्योग, आत्मनिर्भर गाँव और विकेंद्रीकृत विकास पर बल था।
◆ जन योजना (1945) — क्रांतिकारी विचारक एम. एन. राय ने कृषि, किसानों और मज़दूरों के हित पर केंद्रित योजना प्रस्तुत की। 1950 में जयप्रकाश नारायण ने भी सर्वोदय योजना प्रस्तुत की।
◆ योजना आयोग की स्थापना — 15 मार्च 1950 को केंद्रीय मंत्रिमंडल के एक प्रस्ताव से योजना आयोग बना। ध्यान रहे कि यह न तो संवैधानिक संस्था थी (संविधान में इसका उल्लेख नहीं) और न वैधानिक (संसद के किसी क़ानून से नहीं बनी) — यह केवल सरकार के प्रस्ताव से बनी परामर्शदात्री संस्था थी।
◆ संरचना और काम — इसके अध्यक्ष प्रधानमंत्री होते थे और रोज़ का काम उपाध्यक्ष देखते थे; पहले उपाध्यक्ष गुलज़ारीलाल नंदा थे। आयोग देश के संसाधनों का आकलन करता, योजना का प्रारूप बनाता, केंद्र और राज्यों के बीच योजना-धन का बँटवारा तय करता और योजनाओं की प्रगति की समीक्षा करता था।
◆ राष्ट्रीय विकास परिषद — 6 अगस्त 1952 को बनी इस परिषद में प्रधानमंत्री (अध्यक्ष), केंद्रीय मंत्री, सभी राज्यों के मुख्यमंत्री और योजना आयोग के सदस्य होते थे। योजना आयोग का बनाया प्रारूप यहीं अंतिम स्वीकृति पाता था। इसका उद्देश्य था कि योजना केवल केंद्र की न रहे, राज्यों की भी सहमति हो — यानी यह सहकारी संघवाद का मंच था।
◆ नीति आयोग — लगभग 65 वर्ष बाद, 1 जनवरी 2015 को योजना आयोग का स्थान नीति आयोग (राष्ट्रीय भारत परिवर्तन संस्थान) ने लिया, जो ऊपर से योजना थोपने के बजाय राज्यों के साथ मिलकर नीति बनाने वाला "विचार-केंद्र" है।
🔍 आसान परिभाषा: मिश्रित अर्थव्यवस्था |
📘 परिभाषा: ऐसी अर्थव्यवस्था जिसमें सार्वजनिक (सरकारी) और निजी — दोनों क्षेत्र साथ-साथ काम करें, और राज्य नियोजन, लाइसेंस और क़ानून के माध्यम से विकास की दिशा तय करे। |
💡 आसान भाषा में: न पूरी तरह सरकार के हाथ (सोवियत मॉडल), न पूरी तरह बाज़ार के हाथ (अमेरिकी मॉडल) — बीच का रास्ता। जहाँ बहुत बड़ा धन और जोखिम है या जो राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा है, वहाँ सरकार; बाक़ी जगह निजी उद्यमी। 🏠 उदाहरण: इस्पात, रेल, बिजली, परमाणु ऊर्जा — सरकार के पास; कपड़ा, साबुन, साइकिल जैसी उपभोक्ता वस्तुएँ — निजी उद्योगपतियों के पास। |
स्वतंत्र भारत की पहली औद्योगिक नीति उद्योग मंत्री श्यामा प्रसाद मुखर्जी के समय घोषित हुई। इसने उद्योगों को चार श्रेणियों में बाँटा, ताकि साफ़ रहे कि कौन-सा क्षेत्र किसके हाथ में होगा:
1. केवल केंद्र सरकार का एकाधिकार — हथियार और गोला-बारूद, परमाणु ऊर्जा और रेल परिवहन। ये सुरक्षा से जुड़े थे, इसलिए निजी क्षेत्र को इनमें आने की अनुमति नहीं थी।
2. नई इकाइयाँ केवल सरकार लगाएगी — कोयला, लोहा-इस्पात, विमान-निर्माण, जहाज़-निर्माण, टेलीफ़ोन-तार उपकरण और खनिज तेल। इन क्षेत्रों में पहले से चल रहे निजी कारख़ानों को दस वर्ष तक चलने दिया गया, पर नए कारख़ाने सरकार ही लगाने वाली थी।
3. सरकारी नियंत्रण में निजी क्षेत्र — नमक, मोटरगाड़ी, ट्रैक्टर, भारी मशीनें, खाद, सीमेंट, कपड़ा, चीनी, काग़ज़ जैसे लगभग 18 बुनियादी उद्योग निजी क्षेत्र में रहे, पर सरकार उनका नियमन करने वाली थी।
4. बाक़ी सब निजी क्षेत्र के लिए खुले — शेष उद्योगों में निजी और सहकारी उद्यम स्वतंत्र थे।
◆ इसी नीति को लागू करने के लिए उद्योग (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1951 बना, जिसके अनुसार बड़ा कारख़ाना लगाने या उत्पादन बढ़ाने के लिए सरकार से लाइसेंस लेना ज़रूरी हो गया। आगे चलकर यही व्यवस्था "लाइसेंस-परमिट राज" कहलाई, जिसे 1991 में तोड़ा गया (खंड 11)।
◆ पृष्ठभूमि — दिसंबर 1954 में संसद ने और जनवरी 1955 में कांग्रेस के आवड़ी अधिवेशन (मद्रास के पास) ने लक्ष्य घोषित किया — "समाजवादी ढंग का समाज", यानी ऐसा समाज जिसमें उत्पादन के मुख्य साधनों पर सामाजिक नियंत्रण हो और आय तथा संपत्ति की असमानता घटे। साथ ही दूसरी योजना भारी उद्योगों पर केंद्रित होने वाली थी। इसलिए 1948 की नीति बदलकर नई नीति लाई गई।
◆ अनुसूची क (17 उद्योग) — ये उद्योग पूरी तरह राज्य के थे; इनमें नई इकाई केवल सरकार लगा सकती थी। इनमें हथियार, परमाणु ऊर्जा, लोहा-इस्पात, भारी मशीनें, कोयला, खनिज तेल, विमान-निर्माण, हवाई परिवहन, रेल, जहाज़-निर्माण, टेलीफ़ोन और बिजली उत्पादन-वितरण जैसे उद्योग थे।
◆ अनुसूची ख (12 उद्योग) — इनमें राज्य धीरे-धीरे आगे बढ़कर नई इकाइयाँ लगाएगा, पर निजी क्षेत्र भी सहायक के रूप में काम कर सकता था। जैसे — एल्युमिनियम, मशीन-उपकरण, खाद, रसायन, दवाएँ (एंटीबायोटिक) और सड़क-समुद्री परिवहन।
◆ अनुसूची ग (शेष उद्योग) — बाक़ी सारे उद्योग सामान्यतः निजी क्षेत्र के लिए छोड़े गए, पर लाइसेंस और नियमन के साथ। साथ ही कुटीर और लघु उद्योगों को विशेष प्रोत्साहन देने की बात कही गई।
◆ महत्त्व — इस नीति ने अगले पैंतीस वर्षों तक भारत के औद्योगिक विकास की दिशा तय की, इसलिए इसे भारत का "आर्थिक संविधान" कहा गया। इससे सार्वजनिक क्षेत्र अर्थव्यवस्था की "ऊँचाइयों" (भारी और आधारभूत उद्योगों) पर छा गया।
📄 औद्योगिक नीति 1948 (6 अप्रैल) ✔ उद्योगों को चार श्रेणियों में बाँटा गया। ✔ हथियार, परमाणु ऊर्जा और रेल केवल सरकार के पास रहे। ✔ कोयला, इस्पात, विमान, जहाज़ में नई इकाइयाँ सरकार लगाएगी। ✔ तीसरी श्रेणी सरकारी नियंत्रण में निजी रही और चौथी पूरी तरह निजी। | 📄 औद्योगिक नीति 1956 (30 अप्रैल) ✔ लक्ष्य "समाजवादी ढंग का समाज" (आवड़ी, 1955) था। ✔ अनुसूची क के 17 उद्योग केवल सरकार के थे। ✔ अनुसूची ख के 12 उद्योगों में सरकार आगे बढ़ेगी, निजी क्षेत्र सहायक रहेगा। ✔ अनुसूची ग के शेष उद्योग निजी क्षेत्र के लिए थे; इसे "आर्थिक संविधान" कहा गया। |
नीचे के चार्ट में नौ योजनाओं और बीच के अवकाशों का कालक्रम एक नज़र में है। चार्ट के बाद हर योजना का उद्देश्य, उसका मॉडल, उपलब्धियाँ और विफलताएँ अलग-अलग समझाई गई हैं। विकास दर के आँकड़े लगभग मान हैं, जिन्हें याद रखने के लिए पर्याप्त समझें।

🔍 आसान परिभाषा: विकास दर (आर्थिक वृद्धि दर) |
📘 परिभाषा: किसी वर्ष में देश के कुल उत्पादन (राष्ट्रीय आय या सकल घरेलू उत्पाद) में पिछले वर्ष की तुलना में हुई प्रतिशत बढ़ोतरी। |
💡 आसान भाषा में: अगर पिछले साल देश ने 100 रुपये का माल और सेवाएँ पैदा कीं और इस साल 105 रुपये की, तो विकास दर 5% हुई। योजना का "लक्ष्य" वह दर है जो सरकार पाना चाहती थी; "उपलब्धि" वह जो वास्तव में मिली। 🏠 उदाहरण: पहली योजना का लक्ष्य 2.1% था पर लगभग 3.6% वृद्धि हुई — यानी लक्ष्य से अधिक सफलता। |
◆ उद्देश्य — आज़ादी के समय देश अनाज की कमी, विभाजन के शरणार्थियों और बढ़ती क़ीमतों से जूझ रहा था। इसलिए पहली योजना ने कृषि, सिंचाई और बिजली को सबसे ऊपर रखा, ताकि पहले देश का पेट भरे और क़ीमतें स्थिर हों।
◆ मॉडल — यह हैरोड-डोमर मॉडल पर आधारित थी, जिसके अनुसार विकास की गति इस पर निर्भर करती है कि देश अपनी आय का कितना भाग बचाकर निवेश करता है। योजना के प्रमुख शिल्पी अर्थशास्त्री के. एन. राज माने जाते हैं।
◆ मुख्य काम — भाखड़ा-नांगल, हीराकुड और दामोदर घाटी जैसी बड़ी परियोजनाओं पर काम तेज़ हुआ, सामुदायिक विकास कार्यक्रम (1952) शुरू हुआ और ज़मींदारी उन्मूलन के क़ानून बने।
◆ परिणाम — विकास दर का लक्ष्य केवल 2.1% था, पर अच्छे मानसून की मदद से लगभग 3.6% वृद्धि हुई। अनाज उत्पादन बढ़ा और क़ीमतें स्थिर रहीं, इसलिए इसे सफल योजना माना जाता है। इसी सफलता से आत्मविश्वास पाकर दूसरी योजना में बड़े लक्ष्य रखे गए।
◆ उद्देश्य — तेज़ औद्योगीकरण, विशेषकर भारी और आधारभूत उद्योग (इस्पात, मशीनें, रसायन), ताकि भारत मशीनें बनाने वाली मशीनें ख़ुद बना सके और हर चीज़ के लिए विदेश पर निर्भर न रहे। इसी योजना से "समाजवादी ढंग का समाज" बनाने का लक्ष्य जुड़ा।
◆ मॉडल — महालनोबिस मॉडल — सांख्यिकीविद् प्रशांत चंद्र महालनोबिस (भारतीय सांख्यिकी संस्थान, कलकत्ता के संस्थापक) का तर्क था कि अगर आज निवेश का बड़ा भाग पूँजीगत वस्तुओं (मशीन, इस्पात) के उत्पादन में लगाया जाए, तो कुछ वर्षों बाद पूरी अर्थव्यवस्था बहुत तेज़ी से बढ़ेगी। उपभोक्ता वस्तुओं की पूर्ति छोटे और कुटीर उद्योगों से होनी थी।
◆ उपलब्धियाँ — भिलाई, राउरकेला और दुर्गापुर इस्पात संयंत्र, चित्तरंजन रेल इंजन कारख़ाने का विस्तार, भारी विद्युत उपकरण और खाद कारख़ाने लगे। विकास दर लक्ष्य 4.5% के मुक़ाबले लगभग 4.2% रही।
◆ समस्याएँ — मशीनें आयात करने में इतनी विदेशी मुद्रा ख़र्च हुई कि 1957–58 में विदेशी मुद्रा संकट आ गया और योजना में कटौती करनी पड़ी। कृषि की अपेक्षाकृत उपेक्षा से महँगाई भी बढ़ी। आलोचकों का कहना था कि भारी उद्योगों पर इतना ज़ोर रोज़गार और खेती की क़ीमत पर दिया गया।
◆ उद्देश्य — "आत्मनिर्भर और स्वयं-स्फूर्त अर्थव्यवस्था" बनाना, यानी ऐसी अर्थव्यवस्था जो बिना बाहरी सहायता के अपने बल पर बढ़ती रहे। इसके लिए कृषि और उद्योग दोनों पर बराबर ध्यान देने और अनाज में आत्मनिर्भर होने का लक्ष्य रखा गया।
◆ क्या हुआ — योजना के बीच में ही 1962 का भारत-चीन युद्ध और 1965 का भारत-पाक युद्ध हुआ, जिससे धन विकास से हटकर रक्षा पर लगाना पड़ा। फिर 1965–66 में भयंकर सूखा पड़ा और अनाज उत्पादन बहुत गिर गया।
◆ परिणाम — विकास दर का लक्ष्य 5.6% था, पर वास्तविक वृद्धि केवल लगभग 2.4% रही। महँगाई बढ़ी और देश को अमेरिका से अनाज मँगाना पड़ा, इसलिए यह योजना विफल मानी जाती है। इस विफलता ने ही हरित क्रांति की ज़रूरत को स्पष्ट किया।
◆ क्यों — दो युद्धों, सूखे, महँगाई और विदेशी सहायता की अनिश्चितता के कारण चौथी योजना समय पर नहीं बन सकी। इसलिए 1966–67, 1967–68 और 1968–69 में एक-एक वर्ष की तीन वार्षिक योजनाएँ चलीं। इस अवधि को "योजना अवकाश" कहते हैं।
◆ इस दौर की मुख्य घटनाएँ — जून 1966 में रुपये का अवमूल्यन हुआ (खंड 8) और अधिक उपज वाली किस्मों का कार्यक्रम शुरू होकर हरित क्रांति की नींव पड़ी (खंड 4.5)।
◆ उद्देश्य — "स्थिरता के साथ विकास" (यानी महँगाई पर नियंत्रण रखते हुए वृद्धि) और "आत्मनिर्भरता की प्राप्ति"। अनाज के बफ़र स्टॉक (संकट के समय के लिए सुरक्षित भंडार) बनाने पर भी ज़ोर था।
◆ मुख्य बातें — योजना आयोग के उपाध्यक्ष डी. आर. गाडगिल के नाम पर बने गाडगिल फ़ॉर्मूले (1969) से तय हुआ कि केंद्र राज्यों को योजना-सहायता किस आधार पर देगा — जनसंख्या, प्रति व्यक्ति आय, कर-प्रयास और विशेष समस्याओं के आधार पर। इसी योजना के दौरान 1969 में 14 बैंकों का राष्ट्रीयकरण हुआ।
◆ परिणाम — विकास दर का लक्ष्य 5.7% था, पर लगभग 3.3% ही मिली। कारण थे — 1971 का युद्ध और लगभग एक करोड़ शरणार्थियों का बोझ, 1972–73 का सूखा और 1973 का तेल संकट, जिससे महँगाई बहुत बढ़ गई। इस प्रकार "स्थिरता" का लक्ष्य भी पूरा नहीं हुआ।
◆ उद्देश्य — ग़रीबी उन्मूलन और आत्मनिर्भरता। यह इंदिरा गांधी के 1971 के नारे "ग़रीबी हटाओ" से जुड़ी थी। इसी योजना में न्यूनतम आवश्यकता कार्यक्रम शुरू हुआ, जिसका उद्देश्य गाँवों तक प्राथमिक शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, सड़क और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाएँ पहुँचाना था।
◆ मुख्य बातें — 1975 में आपातकाल के दौरान 20 सूत्री कार्यक्रम घोषित हुआ (खंड 9)। विकास दर का लक्ष्य लगभग 4.4% था और उपलब्धि लगभग 4.8% रही।
◆ समय से पहले अंत — मूल रूप से यह योजना 1974–79 के लिए थी, पर 1977 में आई जनता सरकार ने इसे एक वर्ष पहले, 1978 में समाप्त कर दिया और 1978–80 के लिए अनवरत योजना शुरू की।
🔍 आसान परिभाषा: अनवरत योजना (रोलिंग प्लान) |
📘 परिभाषा: ऐसी योजना, जिसमें हर वर्ष पिछले वर्ष के प्रदर्शन की समीक्षा करके लक्ष्य और आवंटन बदल दिए जाते हैं और योजना-अवधि एक वर्ष आगे "खिसका" दी जाती है। |
💡 आसान भाषा में: जैसे गाड़ी चलाते समय हर मोड़ पर रास्ता दोबारा देख लेना — पाँच साल के लिए लक्ष्य पत्थर पर नहीं लिखे जाते, हर साल बदलते रहते हैं। 🏠 उदाहरण: जनता सरकार ने 1978–80 में इसे अपनाया; 1980 में लौटी कांग्रेस सरकार ने इसे छोड़कर फिर से पाँच वर्ष की निश्चित योजना बनाई। |
◆ उद्देश्य — ग़रीबी उन्मूलन और रोज़गार सृजन को सीधे लक्ष्य बनाया गया। पहले माना जाता था कि विकास होगा तो लाभ अपने-आप नीचे तक "रिसकर" पहुँचेगा; छठी योजना ने ग़रीबों के लिए सीधे कार्यक्रम चलाए।
◆ प्रमुख कार्यक्रम — समन्वित ग्रामीण विकास कार्यक्रम (ग़रीब परिवारों को पशु, छोटी दुकान आदि के लिए सस्ता ऋण और अनुदान; 2 अक्टूबर 1980 से पूरे देश में), राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार कार्यक्रम (1980) और ग्रामीण भूमिहीन रोज़गार गारंटी कार्यक्रम (1983)।
◆ परिणाम — विकास दर का लक्ष्य 5.2% था और उपलब्धि लगभग 5.7% रही, इसलिए यह लक्ष्य से अधिक सफल योजना मानी जाती है। पर कई कार्यक्रमों में भ्रष्टाचार और गलत लाभार्थियों के चयन की शिकायतें भी रहीं।
◆ उद्देश्य — इसका नारा था "भोजन, काम और उत्पादकता"। अनाज उत्पादन बढ़ाना, रोज़गार के अवसर पैदा करना और उद्योगों की उत्पादकता बढ़ाना — तीनों साथ-साथ। पहली बार निजी क्षेत्र को सार्वजनिक क्षेत्र से अधिक महत्त्व देने की शुरुआत भी इसी योजना में दिखी।
◆ मुख्य बातें — अप्रैल 1989 में पुराने दो रोज़गार कार्यक्रमों को मिलाकर जवाहर रोज़गार योजना शुरू हुई। विकास दर का लक्ष्य 5% था और उपलब्धि लगभग 6% रही — यह भी सफल योजना थी।
◆ फिर दो वार्षिक योजनाएँ (1990–92) — 1989–91 की राजनीतिक अस्थिरता (तीन वर्षों में तीन प्रधानमंत्री) और 1991 के आर्थिक संकट के कारण आठवीं योजना समय पर शुरू नहीं हो सकी, इसलिए 1990–91 और 1991–92 में दो वार्षिक योजनाएँ चलीं।
◆ उद्देश्य — 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद बनी यह पहली योजना थी। इसका अंतिम लक्ष्य "मानव संसाधन विकास" बताया गया — यानी शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार और जनसंख्या-नियंत्रण के माध्यम से लोगों की क्षमता बढ़ाना।
◆ मॉडल — इसे नरसिम्हा राव–मनमोहन सिंह मॉडल कहा जाता है, जिसमें सरकार स्वयं उद्योग चलाने के बजाय "सुविधा देने वाले" की भूमिका में आई और निजी तथा विदेशी निवेश को आगे बढ़ने दिया गया।
◆ परिणाम — लक्ष्य 5.6% के मुक़ाबले लगभग 6.8% वृद्धि हुई — यह उस समय तक की सबसे तेज़ वृद्धि थी। इसी दौर में प्रधानमंत्री रोज़गार योजना (1993) और सांसद स्थानीय क्षेत्र विकास योजना (1993) शुरू हुईं।
◆ उद्देश्य — "सामाजिक न्याय और समानता के साथ विकास"। यह योजना स्वतंत्रता की 50वीं वर्षगाँठ के वर्ष में शुरू हुई। कृषि और ग्रामीण विकास को प्राथमिकता, सबके लिए भोजन और पोषण, महिलाओं तथा अनुसूचित जाति-जनजाति के सशक्तीकरण पर बल दिया गया।
◆ परिणाम — विकास दर का लक्ष्य लगभग 6.5% था, पर एशियाई वित्तीय संकट (1997), परमाणु परीक्षण के बाद लगे प्रतिबंधों और कारगिल युद्ध जैसी परिस्थितियों के कारण उपलब्धि लगभग 5.4% रही।
📌 याद रखें — योजनाओं का सार लक्ष्य से अधिक सफल: पहली, पाँचवीं, छठी, सातवीं और आठवीं। सबसे असफल: तीसरी (युद्ध और सूखा)। योजना अवकाश: 1966–69। अनवरत योजना: 1978–80 (जनता सरकार)। वार्षिक योजनाएँ: 1990–92। मॉडल: पहली — हैरोड-डोमर; दूसरी — महालनोबिस; आठवीं — राव-मनमोहन। नौवीं योजना के बाद दसवीं (2002–07), ग्यारहवीं (2007–12) और बारहवीं (2012–17) योजनाएँ आईं; बारहवीं अंतिम पंचवर्षीय योजना थी। |
आज़ादी के समय लगभग 70% लोग खेती पर निर्भर थे, पर ज़मीन पर ज़मींदारों का क़ब्ज़ा था और अधिकांश किसान काश्तकार (किराये पर ज़मीन जोतने वाले), बटाईदार (फ़सल का हिस्सा देकर खेती करने वाले) या भूमिहीन मज़दूर थे। जो किसान ज़मीन का मालिक न हो, वह उसमें सुधार — कुआँ, मेड़, खाद — पर पैसा क्यों लगाए? इसलिए भूमि सुधार नई सरकार की पहली प्राथमिकताओं में था। स्वतंत्रता आंदोलन के समय से ही कांग्रेस का नारा था — "ज़मीन जोतने वाले की"।
🔍 आसान परिभाषा: भूमि सुधार |
📘 परिभाषा: भूमि के स्वामित्व, काश्तकारी और जोत के आकार से जुड़ी संस्थागत व्यवस्था में ऐसा परिवर्तन, जिससे बिचौलिए समाप्त हों, जोतने वाले को सुरक्षा और स्वामित्व मिले और भूमि का वितरण अधिक न्यायपूर्ण हो। |
💡 आसान भाषा में: ज़मीन का असली लाभ उस किसान को मिले जो पसीना बहाकर उसे जोतता है, न कि उसे जो शहर में बैठकर केवल लगान वसूलता है। 🏠 उदाहरण: ज़मींदारी उन्मूलन, लगान की सीमा, बेदख़ली पर रोक, भूमि-हदबंदी और चकबंदी — ये सब भूमि सुधार के हिस्से हैं। |
◆ पृष्ठभूमि — अंग्रेज़ों की स्थायी बंदोबस्त जैसी व्यवस्थाओं ने ज़मींदारों को किसान और सरकार के बीच बिचौलिया बना दिया था। ज़मींदार मनमाना लगान वसूलते, बेगार लेते और किसान को कभी भी बेदख़ल कर देते थे।
◆ क्या हुआ — 1950 के दशक की शुरुआत में लगभग सभी राज्यों ने ज़मींदारी उन्मूलन के क़ानून बनाए, जैसे उत्तर प्रदेश ज़मींदारी उन्मूलन एवं भूमि सुधार अधिनियम (1950–51)। ज़मींदारों को मुआवज़ा देकर उनके अधिकार समाप्त किए गए और किसान सीधे राज्य को लगान देने लगे।
◆ अदालती चुनौती और पहला संशोधन — ज़मींदारों ने इन क़ानूनों को संपत्ति के मौलिक अधिकार के विरुद्ध बताकर अदालतों में चुनौती दी; बिहार का भूमि सुधार क़ानून तो पटना उच्च न्यायालय ने रद्द भी कर दिया। तब 18 जून 1951 को पहला संविधान संशोधन हुआ, जिसने नौवीं अनुसूची जोड़ी — इसमें रखे गए क़ानूनों को मौलिक अधिकारों के आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती थी।
◆ परिणाम — यह भूमि सुधार का सबसे सफल चरण था। लगभग दो करोड़ काश्तकार राज्य के सीधे संपर्क में आ गए और ज़मींदार वर्ग की राजनीतिक-आर्थिक शक्ति टूट गई। पर एक सीमा यह रही कि कई ज़मींदारों ने "निजी खेती" के नाम पर बड़ी ज़मीन अपने पास रख ली।
◆ क्या करना था — किराये पर खेती करने वाले काश्तकारों के लिए तीन काम — (1) लगान की अधिकतम सीमा तय करना (सामान्यतः उपज का एक-चौथाई से एक-पाँचवाँ भाग), (2) बेदख़ली पर रोक लगाकर उन्हें सुरक्षा देना और (3) उन्हें उस भूमि का मालिकाना हक़ दिलाना।
◆ क्यों असफल रहा — भूस्वामियों ने काश्तकारों से लिखवा लिया कि वे "अपनी इच्छा से" ज़मीन छोड़ रहे हैं — इसे "स्वैच्छिक समर्पण" कहा गया। अधिकांश बटाईदारी मौखिक थी, इसलिए काग़ज़ पर काश्तकार का नाम ही नहीं था और उसे क़ानून का लाभ नहीं मिला।
◆ अपवाद — केरल और पश्चिम बंगाल — केरल में 1969 के संशोधित भूमि सुधार क़ानून से लाखों काश्तकारों को मालिकाना हक़ मिला। पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा सरकार ने 1978 में "ऑपरेशन बर्गा" चलाया, जिसमें गाँव-गाँव शिविर लगाकर बटाईदारों (बर्गादारों) के नाम सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज किए गए, ताकि उन्हें बेदख़ल न किया जा सके।
🔍 आसान परिभाषा: भूमि हदबंदी (सीलिंग) |
📘 परिभाषा: क़ानून द्वारा यह तय करना कि एक व्यक्ति या परिवार अधिकतम कितनी कृषि भूमि रख सकता है; इस सीमा से अधिक भूमि "अतिरिक्त" घोषित करके सरकार ले लेती है और भूमिहीनों में बाँटती है। |
💡 आसान भाषा में: जैसे एक थाली में सबसे ज़्यादा कितनी रोटियाँ रखी जा सकती हैं, यह तय कर दिया जाए, ताकि बची रोटियाँ भूखे को मिल सकें। 🏠 उदाहरण: 1972 के राष्ट्रीय दिशानिर्देशों में दो फ़सल वाली सिंचित भूमि के लिए सीमा लगभग 10–18 एकड़ और सूखी भूमि के लिए अधिकतम 54 एकड़ तक रखी गई। |
◆ दो दौर — 1950–60 के दशक में राज्यों ने अलग-अलग सीमाएँ तय कीं, जिनमें बहुत छूटें थीं; फिर 1972 में मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन के बाद राष्ट्रीय दिशानिर्देश बने और सीमाएँ घटाई गईं।
◆ क्यों कम सफल — क़ानून आने से पहले ही बड़े भूस्वामियों ने ज़मीन रिश्तेदारों, नौकरों, यहाँ तक कि पशुओं के नाम कर दी — इसे बेनामी हस्तांतरण कहते हैं। मुक़दमों में वर्षों तक मामले अटके रहे। परिणाम यह हुआ कि जितनी अतिरिक्त भूमि का अनुमान था, उसका बहुत छोटा भाग ही भूमिहीनों तक पहुँचा।
◆ चकबंदी — भूमि सुधार का एक और हिस्सा चकबंदी था, यानी एक किसान के अलग-अलग जगह बिखरे छोटे-छोटे खेतों को मिलाकर एक जगह बड़ा "चक" बनाना, ताकि सिंचाई और खेती आसान हो। यह पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सबसे सफल रही — और यही क्षेत्र आगे हरित क्रांति में सबसे आगे रहे।
◆ कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन (जनवरी 1959) में प्रस्ताव पारित हुआ कि भविष्य में खेती सहकारी ढंग से हो, यानी किसान अपनी ज़मीन मिलाकर साथ खेती करें और उपज बाँटें। किसानों को डर हुआ कि इससे उनकी ज़मीन छिन जाएगी, इसलिए भारी विरोध हुआ और यह व्यवहार में नहीं आया।
◆ इसी प्रस्ताव और बढ़ते सरकारी नियंत्रण के विरोध में सी. राजगोपालाचारी (राजाजी) ने जून 1959 में स्वतंत्र पार्टी बनाई, जो खुले बाज़ार और निजी उद्यम की समर्थक थी। 1967 के चुनाव में यह लोकसभा में सबसे बड़ा विपक्षी दल बनी।
सुधार | क्या हुआ | परिणाम |
ज़मींदारी उन्मूलन | 1950 के दशक की शुरुआत में लगभग सभी राज्यों में क़ानून बने और ज़मींदारों को मुआवज़ा देकर हटाया गया। | बिचौलिए समाप्त हुए और लगभग दो करोड़ काश्तकार राज्य के सीधे संपर्क में आए; यह सबसे सफल सुधार था। |
काश्तकारी सुधार | लगान की सीमा, बेदख़ली पर रोक और काश्तकार को मालिकाना हक़ देने के क़ानून बने। | "स्वैच्छिक समर्पण" के नाम पर बेदख़ली हुई; केरल और पश्चिम बंगाल (ऑपरेशन बर्गा, 1978) अपवाद रहे। |
भूमि हदबंदी | एक परिवार के पास अधिकतम भूमि की सीमा तय हुई और 1972 में राष्ट्रीय दिशानिर्देश बने। | बेनामी हस्तांतरण और मुक़दमों के कारण बहुत कम अतिरिक्त भूमि बँट सकी। |
◆ पृष्ठभूमि — भूमि सुधार से स्वामित्व बदल सकता था, पर गाँव का समग्र विकास — खेती की नई विधियाँ, स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क — इसके लिए अलग प्रयास चाहिए था। इसके पहले उत्तर प्रदेश के इटावा में अमेरिकी नगर-योजनाकार अल्बर्ट मेयर की "इटावा पायलट परियोजना" (1948) और हरियाणा (तब पंजाब) के नीलोखेड़ी में शरणार्थियों के लिए एस. के. डे का प्रयोग सफल रहे थे।
◆ कब और कैसे — 2 अक्टूबर 1952 (गांधी जयंती) को 55 परियोजनाओं के साथ सामुदायिक विकास कार्यक्रम शुरू हुआ। इसकी इकाई प्रखंड (ब्लॉक) थी — लगभग सौ गाँवों का समूह, जिसमें प्रखंड विकास अधिकारी और गाँव स्तर पर ग्राम सेवक नियुक्त हुए। अगले वर्ष, 1953 में, इसके विस्तार के लिए राष्ट्रीय विस्तार सेवा शुरू हुई।
◆ उद्देश्य — खेती, पशुपालन, सिंचाई, स्वास्थ्य, सफ़ाई, शिक्षा, सड़क और कुटीर उद्योग — गाँव के हर पहलू का विकास, और वह भी गाँव वालों की अपनी भागीदारी से।
◆ कमी — कुछ ही वर्षों में साफ़ हो गया कि कार्यक्रम सरकारी बनकर रह गया है; गाँव वाले इसे "सरकार का काम" मानते थे और उनकी भागीदारी नहीं थी। लाभ भी मुख्यतः बड़े किसानों तक पहुँचा। इसी कमी की जाँच के लिए बलवंत राय मेहता समिति बनी।
🔍 आसान परिभाषा: लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण |
📘 परिभाषा: शासन की शक्तियों, कार्यों और संसाधनों का ऊपर (केंद्र और राज्य) से नीचे की निर्वाचित स्थानीय संस्थाओं — गाँव, प्रखंड और ज़िला — तक हस्तांतरण, ताकि स्थानीय लोग अपने विकास के निर्णय स्वयं ले सकें। |
💡 आसान भाषा में: गाँव की सड़क या कुआँ कहाँ बने, यह दिल्ली या राजधानी में बैठा अधिकारी नहीं, गाँव के चुने हुए लोग तय करें। 🏠 उदाहरण: त्रिस्तरीय पंचायती राज — ग्राम पंचायत (गाँव), पंचायत समिति (प्रखंड) और ज़िला परिषद (ज़िला)। |
◆ बलवंत राय मेहता समिति (1957) — जनवरी 1957 में सामुदायिक विकास कार्यक्रम और राष्ट्रीय विस्तार सेवा की समीक्षा के लिए बनी इस समिति ने नवंबर 1957 में रिपोर्ट दी। इसका निष्कर्ष था कि कार्यक्रम इसलिए असफल हुआ क्योंकि इसमें जनता की भागीदारी नहीं थी। इसने "लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण" की सिफ़ारिश की — गाँव में ग्राम पंचायत, प्रखंड में पंचायत समिति और ज़िले में ज़िला परिषद — यानी त्रिस्तरीय पंचायती राज। इसमें पंचायत समिति को सबसे महत्त्वपूर्ण कार्यकारी इकाई माना गया। राष्ट्रीय विकास परिषद ने जनवरी 1958 में इसे स्वीकार किया। (बलवंत राय मेहता आगे गुजरात के मुख्यमंत्री बने और 1965 के युद्ध में उनका विमान पाकिस्तानी लड़ाकू विमान ने मार गिराया था।)
◆ पंचायती राज की शुरुआत (1959) — 2 अक्टूबर 1959 को प्रधानमंत्री नेहरू ने नागौर (राजस्थान) में देश की पहली पंचायती राज व्यवस्था का उद्घाटन किया। उसी महीने आंध्र प्रदेश में भी इसे लागू किया गया और फिर अधिकांश राज्यों ने इसे अपनाया।
◆ पतन — 1960 के दशक के मध्य के बाद पंचायती राज कमज़ोर पड़ गया। राज्य सरकारों ने समय पर चुनाव नहीं कराए, पंचायतों को पर्याप्त धन और अधिकार नहीं दिए और कई जगह इन पर प्रभावशाली वर्गों का क़ब्ज़ा हो गया।
◆ अशोक मेहता समिति (1977–78) — जनता सरकार ने दिसंबर 1977 में यह समिति बनाई, जिसने अगस्त 1978 में रिपोर्ट दी। इसकी मुख्य सिफ़ारिशें थीं — (1) द्विस्तरीय व्यवस्था — ज़िला स्तर पर ज़िला परिषद और कई गाँवों के समूह के लिए मंडल पंचायत; (2) राज्य के नीचे विकेंद्रीकरण की पहली इकाई ज़िला हो; (3) पंचायत चुनावों में राजनीतिक दलों की खुली भागीदारी हो; (4) पंचायतों को कर लगाने का अधिकार मिले; और (5) पंचायती राज को संवैधानिक मान्यता दी जाए। जनता सरकार के शीघ्र गिरने से ये सिफ़ारिशें केंद्र स्तर पर लागू नहीं हुईं, पर कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और पश्चिम बंगाल ने इनके आधार पर पंचायतों को नया जीवन दिया।
◆ संवैधानिक दर्जा (1992–93) — 1980 के दशक में अन्य समितियों ने भी संवैधानिक दर्जे की सिफ़ारिश की। राजीव गांधी सरकार का 64वाँ संशोधन विधेयक (1989) राज्यसभा में पारित नहीं हो सका। अंततः नरसिम्हा राव सरकार के समय 73वाँ संशोधन (पंचायतें) और 74वाँ संशोधन (नगरपालिकाएँ) 1992 में पारित हुए और 1993 में लागू हुए। इनसे हर पाँच वर्ष में अनिवार्य चुनाव, राज्य निर्वाचन आयोग, राज्य वित्त आयोग और एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हुईं। 73वाँ संशोधन 24 अप्रैल 1993 से लागू हुआ, इसलिए यह दिन राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस है।
कार्यक्रम / समिति | वर्ष | मुख्य बात |
सामुदायिक विकास कार्यक्रम | 2 अक्टूबर 1952 | प्रखंड को इकाई बनाकर गाँव के समग्र विकास का सरकारी कार्यक्रम शुरू हुआ; 1953 में राष्ट्रीय विस्तार सेवा आई। |
बलवंत राय मेहता समिति | 1957 | जन-भागीदारी की कमी पाकर इसने त्रिस्तरीय पंचायती राज की सिफ़ारिश की। |
पंचायती राज की शुरुआत | 2 अक्टूबर 1959 | नेहरू ने नागौर में उद्घाटन किया और उसी महीने आंध्र प्रदेश ने भी इसे अपनाया। |
अशोक मेहता समिति | 1977–78 | इसने द्विस्तरीय व्यवस्था, दलों की भागीदारी और संवैधानिक मान्यता की सिफ़ारिश की। |
73वाँ और 74वाँ संशोधन | 1992 (लागू 1993) | पंचायतों और नगरपालिकाओं को संवैधानिक दर्जा मिला और एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हुईं। |
आचार्य विनोबा भावे का जन्म 11 सितंबर 1895 को महाराष्ट्र के गागोदे गाँव में हुआ। वे गांधीजी के सबसे निकट आध्यात्मिक सहयोगियों में थे और वर्धा के पास पवनार आश्रम में रहते थे। 1940 के व्यक्तिगत सत्याग्रह में गांधीजी ने उन्हें पहला सत्याग्रही चुना था। भूदान आंदोलन के लिए 1958 में उन्हें रेमन मैग्सेसे पुरस्कार मिला — यह पुरस्कार पाने वाले वे पहले भारतीय थे। 1982 में उनका निधन हुआ और 1983 में उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न दिया गया।
◆ पृष्ठभूमि — तेलंगाना क्षेत्र (तब हैदराबाद रियासत, फिर आंध्र प्रदेश) उस समय कम्युनिस्टों के सशस्त्र किसान संघर्ष का केंद्र था, जिसमें भूमिहीन किसान बलपूर्वक ज़मींदारों की ज़मीन छीन रहे थे। सवाल था — क्या भूमि की समस्या बिना हिंसा के हल हो सकती है?
◆ शुरुआत (18 अप्रैल 1951) — सर्वोदय सम्मेलन से लौटते हुए विनोबा नलगोंडा ज़िले के पोचमपल्ली गाँव में ठहरे। वहाँ के लगभग 40 भूमिहीन हरिजन परिवारों ने उनसे ज़मीन की माँग की। विनोबा ने गाँव वालों से पूछा कि क्या कोई मदद कर सकता है — तब गाँव के ज़मींदार वी. रामचंद्र रेड्डी ने 100 एकड़ भूमि दान देने की घोषणा की। इसी स्वतःस्फूर्त दान से भूदान (भूमि का दान) आंदोलन का जन्म हुआ।
◆ विचार — विनोबा ने गांधीजी के "न्यासिता" (ट्रस्टीशिप) के विचार को आगे बढ़ाया — धनी व्यक्ति अपनी संपत्ति को समाज की धरोहर मानकर उसका एक भाग स्वेच्छा से ज़रूरतमंदों को दे। वे कहते थे — "मुझे अपना पाँचवाँ बेटा मानकर अपनी ज़मीन का छठा भाग दे दो।" यानी हिंसा के बजाय हृदय-परिवर्तन।
◆ प्रसार — विनोबा ने लगभग तेरह वर्षों तक पूरे देश में पदयात्रा की। लक्ष्य था भूमिहीनों के लिए 5 करोड़ एकड़ भूमि जुटाना। जयप्रकाश नारायण ने सक्रिय राजनीति छोड़कर 1953–54 में इस आंदोलन के लिए अपना "जीवनदान" कर दिया। कई राज्यों ने भूदान में मिली भूमि के वितरण के लिए भूदान यज्ञ अधिनियम भी बनाए।
◆ ग्रामदान — आंदोलन का अगला रूप ग्रामदान था, जिसमें किसी एक व्यक्ति के बजाय पूरे गाँव की भूमि का स्वामित्व ग्राम-सभा को सौंप दिया जाता था और ग्राम-सभा सबको ज़रूरत के अनुसार खेती के लिए भूमि देती थी। पहला ग्रामदान 1952 में उत्तर प्रदेश के मंगरौठ गाँव में हुआ, और सबसे अधिक सफलता ओडिशा (विशेषकर कोरापुट ज़िले) में मिली।
◆ परिणाम और सीमाएँ — 5 करोड़ एकड़ के लक्ष्य के मुक़ाबले लगभग 40–50 लाख एकड़ भूमि ही दान में मिली। इसका बड़ा भाग बंजर या विवादित था, और जो अच्छी भूमि मिली, उसका भी बड़ा हिस्सा समय पर भूमिहीनों में बँट नहीं सका। 1960 के दशक के बाद आंदोलन धीमा पड़ गया। फिर भी इसने दिखाया कि भूमि जैसा गंभीर प्रश्न अहिंसक और नैतिक रास्ते से भी उठाया जा सकता है और इसने भूमिहीनों की समस्या को राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में ला दिया।
🔍 आसान परिभाषा: हरित क्रांति |
📘 परिभाषा: अधिक उपज देने वाले बीजों, रासायनिक खाद, सिंचाई, कीटनाशकों, सस्ते ऋण और समर्थन मूल्य के "पैकेज" के प्रयोग से 1960 के दशक के अंत में खाद्यान्न — विशेषकर गेहूँ — के उत्पादन में आई तेज़ और बड़ी वृद्धि। |
💡 आसान भाषा में: पहले एक खेत से जितना गेहूँ निकलता था, नए बीज और पूरा पानी-खाद देने पर उसी खेत से दोगुना निकलने लगा — खेतों की "हरियाली" अचानक बढ़ गई। 🏠 उदाहरण: 1965–66 में भारत का गेहूँ उत्पादन लगभग 1 करोड़ टन था; 1971–72 तक यह दोगुने से भी अधिक हो गया। |
◆ पृष्ठभूमि — 1965 और 1966 में लगातार भयंकर सूखा पड़ा। भारत अमेरिका के "पी.एल.-480" कार्यक्रम के अंतर्गत आने वाले गेहूँ पर इतना निर्भर हो गया कि कहा जाने लगा — भारत "जहाज़ से मुँह तक" (यानी बंदरगाह पर उतरता अनाज सीधे लोगों के पेट में) जी रहा है। अमेरिका इस सहायता के बदले भारत की विदेश नीति पर दबाव भी डालता था, जैसे वियतनाम युद्ध पर भारत की आलोचना से नाराज़ होकर उसने अनाज की खेपें रोकीं।
◆ नेतृत्व — कृषि मंत्री सी. सुब्रमण्यम (1998 में भारत रत्न) ने राजनीतिक विरोध के बावजूद नई रणनीति अपनाई। कृषि वैज्ञानिक एम. एस. स्वामीनाथन को भारत में "हरित क्रांति का जनक" कहा जाता है। मेक्सिको में गेहूँ की बौनी और अधिक उपज वाली किस्में विकसित करने वाले अमेरिकी वैज्ञानिक नॉर्मन बोरलॉग को 1970 में नोबेल शांति पुरस्कार मिला। मेक्सिको से बीज मँगाकर भारतीय परिस्थितियों के अनुसार ढाले गए।
◆ पैकेज — क्या-क्या दिया गया — 1966–67 से अधिक उपज वाली किस्मों का कार्यक्रम शुरू हुआ। किसानों को नए बीज, रासायनिक खाद, नलकूप से सिंचाई, कीटनाशक और बैंकों से सस्ता ऋण मिला। 1965 में बने भारतीय खाद्य निगम और कृषि मूल्य आयोग ने न्यूनतम समर्थन मूल्य पर अनाज की सरकारी ख़रीद की गारंटी दी, ताकि किसान को भरोसा रहे कि ज़्यादा उपज का दाम गिरेगा नहीं।
◆ परिणाम — गेहूँ उत्पादन कुछ ही वर्षों में दोगुने से अधिक हो गया। पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश सबसे आगे रहे, क्योंकि वहाँ सिंचाई, चकबंदी और बड़े किसान थे। 1970 के दशक में भारत खाद्यान्न में आत्मनिर्भर हो गया, विदेशी अनाज पर निर्भरता ख़त्म हुई और बफ़र स्टॉक बनने लगा।
◆ समस्याएँ — (1) क्षेत्रीय असमानता — लाभ सिंचित क्षेत्रों तक सीमित रहा, वर्षा पर निर्भर पूर्वी और मध्य भारत पीछे रह गया। (2) वर्गीय असमानता — बड़े किसान अधिक अमीर हुए, छोटे किसान और मज़दूर पीछे रहे। (3) पर्यावरण — मिट्टी की उर्वरता घटी, भूजल स्तर गिरा और रसायनों का अति-प्रयोग हुआ। (4) फ़सलें — मुख्यतः गेहूँ और धान तक सीमित रहा; दालें और तिलहन पीछे रह गए।
वर्गीज़ कुरियन का जन्म 26 नवंबर 1921 को केरल के कोझिकोड में हुआ। अमेरिका से डेयरी इंजीनियरिंग पढ़कर वे 1949 में सरकारी नौकरी के तहत गुजरात के आनंद पहुँचे और फिर जीवन भर वहीं रहकर सहकारी डेयरी आंदोलन को खड़ा किया। उन्हें "श्वेत क्रांति का जनक" और "भारत का दूधवाला" कहा जाता है; उन्हें रेमन मैग्सेसे (1963) और विश्व खाद्य पुरस्कार (1989) मिले और उनका जन्मदिन 26 नवंबर राष्ट्रीय दुग्ध दिवस के रूप में मनाया जाता है।
◆ अमूल की कहानी (1946) — गुजरात के खेड़ा (कैरा) ज़िले के दूध उत्पादक किसानों का शोषण एक निजी कंपनी करती थी, जो उनका दूध सस्ते में ख़रीदती थी। सरदार पटेल की सलाह पर किसान नेता त्रिभुवनदास पटेल के नेतृत्व में 1946 में खेड़ा ज़िला सहकारी दुग्ध उत्पादक संघ बना, जिसके उत्पाद आगे "अमूल" नाम से प्रसिद्ध हुए। कुरियन इसके प्रबंधक बने।
🔍 आसान परिभाषा: सहकारी समिति और आनंद पैटर्न |
📘 परिभाषा: सहकारी समिति ऐसा संगठन है, जिसके सदस्य (जैसे दूध उत्पादक) स्वयं उसके मालिक होते हैं, लोकतांत्रिक ढंग से उसे चलाते हैं और लाभ आपस में बाँटते हैं। "आनंद पैटर्न" में यह तीन स्तर पर होता है — गाँव की दुग्ध समिति, ज़िला संघ और राज्य महासंघ। |
💡 आसान भाषा में: गाँव का हर पशुपालक, चाहे उसके पास एक ही भैंस हो, दूध समिति में बेचता है और कंपनी का "मालिक" भी है — बीच में कोई साहूकार या व्यापारी नहीं। 🏠 उदाहरण: अमूल — गाँव की समितियाँ, खेड़ा ज़िला संघ और गुजरात सहकारी दुग्ध विपणन महासंघ। |
◆ राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (1965) — प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री 1964 में आनंद गए और इस मॉडल से इतने प्रभावित हुए कि इसे पूरे देश में फैलाने के लिए 1965 में आनंद में ही राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड बनाया गया, जिसके अध्यक्ष कुरियन बने।
◆ ऑपरेशन फ़्लड (1970–1996) — यह दुनिया का सबसे बड़ा डेयरी विकास कार्यक्रम था, जो तीन चरणों में चला। यूरोपीय देशों से उपहार में मिले दूध पाउडर और मक्खन-तेल को भारत में बेचकर उससे धन जुटाया गया। गाँवों की सहकारी समितियों को "राष्ट्रीय दुग्ध ग्रिड" के ज़रिए बड़े शहरों के बाज़ार से जोड़ा गया, ताकि दूर गाँव का दूध भी दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई तक पहुँचे।
◆ परिणाम — भारत 1990 के दशक के अंत में दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश बन गया और आज भी है। करोड़ों छोटे किसानों, भूमिहीनों और महिलाओं को नियमित आय मिली, क्योंकि पशुपालन के लिए बड़ी ज़मीन की ज़रूरत नहीं होती। इसीलिए कहा जाता है कि हरित क्रांति का लाभ बड़े किसानों को अधिक मिला, पर श्वेत क्रांति ने ग़रीब ग्रामीणों तक लाभ पहुँचाया।
🌾 हरित क्रांति (1966–67 से) ✔ पृष्ठभूमि — 1965–66 का सूखा और पी.एल.-480 गेहूँ पर निर्भरता थी। ✔ नेतृत्व — सी. सुब्रमण्यम, एम. एस. स्वामीनाथन और नॉर्मन बोरलॉग (नोबेल शांति 1970) ने राह दिखाई। ✔ पैकेज — नए बीज, खाद, नलकूप, ऋण, समर्थन मूल्य और भारतीय खाद्य निगम (1965) साथ आए। ✔ परिणाम — गेहूँ उत्पादन दोगुने से अधिक हुआ और पंजाब-हरियाणा सबसे आगे रहे। ✔ समस्याएँ — क्षेत्रीय-वर्गीय असमानता और मिट्टी-भूजल का क्षरण हुआ। | 🥛 श्वेत क्रांति (ऑपरेशन फ़्लड) ✔ अमूल — 1946 में आनंद में खेड़ा ज़िला सहकारी संघ बना (त्रिभुवनदास पटेल)। ✔ वर्गीज़ कुरियन — "श्वेत क्रांति के जनक" कहलाए। ✔ राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड — 1965 में आनंद में बना। ✔ ऑपरेशन फ़्लड — 1970 से तीन चरणों में गाँवों को शहरों से जोड़ा गया। ✔ परिणाम — भारत विश्व का सबसे बड़ा दूध उत्पादक बना। |
द्वितीय विश्वयुद्ध (1939–45) के बाद दुनिया दो ख़ेमों में बँट गई। एक ओर संयुक्त राज्य अमेरिका के नेतृत्व में पूँजीवादी देशों का गुट था, दूसरी ओर सोवियत संघ के नेतृत्व में साम्यवादी देशों का गुट। दोनों सीधे आपस में नहीं लड़े, पर हथियारों की होड़, सैन्य संधियों और एक-दूसरे को घेरने की कोशिशों से पूरी दुनिया में तनाव बना रहा। इसी तनावपूर्ण दौर को शीतयुद्ध कहते हैं। ठीक इसी समय भारत आज़ाद हुआ। नेहरू प्रधानमंत्री के साथ-साथ विदेश मंत्री भी थे, इसलिए भारत की विदेश नीति पर उनकी गहरी छाप है। उनके सामने प्रश्न था — क्या भारत किसी एक गुट में शामिल हो जाए? नेहरू का उत्तर था — नहीं।
🔍 आसान परिभाषा: शीतयुद्ध |
📘 परिभाषा: द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद लगभग 1945 से 1991 तक अमेरिकी गुट और सोवियत गुट के बीच चला वैचारिक, राजनीतिक, आर्थिक और सैन्य तनाव, जिसमें दोनों महाशक्तियों ने आमने-सामने युद्ध नहीं किया, पर हथियारों की होड़ और सैन्य गठबंधनों के ज़रिए प्रभाव बढ़ाने की प्रतिस्पर्धा की। |
💡 आसान भाषा में: दो पहलवान अखाड़े में एक-दूसरे को घूरते रहें, ताक़त दिखाते रहें, अपने-अपने समर्थक जुटाते रहें, पर सीधी कुश्ती न लड़ें — यही "ठंडा" युद्ध था। 🏠 उदाहरण: अमेरिका ने "नाटो" (1949) जैसे सैन्य गठबंधन बनाए और सोवियत संघ ने "वारसा संधि" (1955); पाकिस्तान 1954–55 में अमेरिकी गठबंधनों "सीएटो" और "सेंटो" में शामिल हुआ, जबकि भारत किसी में नहीं गया। |
नीचे के आरेख में नेहरू की विदेश नीति के आठ स्तंभ एक साथ दिखाए गए हैं। आरेख केवल सार है; इसके बाद आठों स्तंभ एक-एक करके पूरे विस्तार से समझाए गए हैं।

◆ क्यों अपनाई गई — इसके तीन मुख्य कारण थे। पहला, भारत ने लगभग दो सौ वर्ष की ग़ुलामी के बाद आज़ादी पाई थी और वह अपने निर्णय किसी महाशक्ति के दबाव में नहीं लेना चाहता था। दूसरा, देश ग़रीब था; अगर वह किसी सैन्य गुट में जाता तो उसे हथियारों पर भारी ख़र्च करना पड़ता और विकास पीछे छूट जाता। तीसरा, किसी एक गुट में जाने का अर्थ था दूसरे गुट को शत्रु बना लेना, जबकि भारत को दोनों से आर्थिक और तकनीकी सहायता चाहिए थी।
◆ अर्थ — गुटनिरपेक्षता का मतलब था कि भारत न अमेरिकी सैन्य गुट में शामिल होगा, न सोवियत सैन्य गुट में, और हर अंतरराष्ट्रीय प्रश्न पर अपने हित और न्याय को देखकर स्वतंत्र निर्णय करेगा। नेहरू ने 7 सितंबर 1946 को अंतरिम सरकार के उपाध्यक्ष के रूप में अपने पहले रेडियो भाषण में ही कह दिया था कि भारत उन गुटों की सत्ता-राजनीति से दूर रहेगा, जो एक-दूसरे के विरुद्ध खड़े हैं।
◆ गुटनिरपेक्षता तटस्थता नहीं है — यह सबसे महत्त्वपूर्ण बात है। तटस्थता का अर्थ है युद्ध या विवाद में किसी का पक्ष न लेना और चुप रहना (जैसे स्विट्ज़रलैंड)। गुटनिरपेक्षता में देश चुप नहीं रहता; वह हर मुद्दे पर बोलता है, पर गुट देखकर नहीं, मुद्दे का सही-ग़लत देखकर। यह पृथकतावाद (दुनिया से कटकर रहना) भी नहीं है, क्योंकि भारत विश्व-मामलों में बहुत सक्रिय रहा।
◆ उदाहरण — 1956 में जब ब्रिटेन, फ़्रांस और इज़राइल ने स्वेज़ नहर के राष्ट्रीयकरण के बाद मिस्र पर हमला किया, तो भारत ने खुलकर पश्चिमी देशों की निंदा की और मिस्र का साथ दिया। उसी वर्ष सोवियत संघ ने हंगरी में सेना भेजी, तो भारत ने देर से और नरम शब्दों में आलोचना की, जिसके लिए उसकी आलोचना भी हुई। आर्थिक क्षेत्र में भारत ने दोनों गुटों से सहायता ली — सोवियत संघ से भिलाई और पश्चिम जर्मनी तथा ब्रिटेन से राउरकेला और दुर्गापुर के इस्पात संयंत्र।
🔍 आसान परिभाषा: गुटनिरपेक्षता |
📘 परिभाषा: विदेश नीति का वह सिद्धांत, जिसके अनुसार कोई देश शीतयुद्ध के किसी भी सैन्य गुट का सदस्य नहीं बनता, अपनी भूमि पर किसी महाशक्ति के सैन्य अड्डे नहीं बनने देता और प्रत्येक अंतरराष्ट्रीय मुद्दे पर गुण-दोष के आधार पर स्वतंत्र निर्णय लेता है। |
💡 आसान भाषा में: कक्षा में दो दबंग गुट हों और एक समझदार विद्यार्थी कहे — "मैं किसी गुट का सदस्य नहीं बनूँगा, दोनों से दोस्ती रखूँगा, पर जो ग़लत करेगा उसे ग़लत ज़रूर कहूँगा।" 🏠 उदाहरण: भारत ने स्वेज़ संकट (1956) में पश्चिमी देशों की आलोचना की और कोरिया युद्ध में दोनों पक्षों के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाई। |
◆ पृष्ठभूमि — 1949 में चीन में माओ त्से-तुंग के नेतृत्व में साम्यवादी क्रांति हुई और भारत साम्यवादी चीन को मान्यता देने वाले पहले ग़ैर-साम्यवादी देशों में था। 1950 में चीन ने तिब्बत पर अधिकार कर लिया, जिससे भारत और चीन पहली बार सीधे पड़ोसी बन गए। अंग्रेज़ों के समय से भारत को तिब्बत में कुछ विशेष अधिकार (व्यापार चौकियाँ, डाक-तार, छोटे सैनिक दस्ते) मिले हुए थे। नेहरू चाहते थे कि दो बड़े एशियाई पड़ोसी मित्र बनकर रहें।
◆ समझौता — 29 अप्रैल 1954 को पीकिंग (बीजिंग) में "चीन के तिब्बत क्षेत्र और भारत के बीच व्यापार और आवागमन" का समझौता हुआ। इसमें भारत ने तिब्बत को चीन का क्षेत्र माना और वहाँ के अपने विशेष अधिकार छोड़ दिए। इसी समझौते की प्रस्तावना में वे पाँच सिद्धांत लिखे गए, जो पंचशील कहलाए। "पंचशील" शब्द बौद्ध परंपरा से लिया गया है, जहाँ इसका अर्थ आचरण के पाँच नियम है।
◆ झोउ एनलाई की यात्रा — जून 1954 में चीन के प्रधानमंत्री झोउ एनलाई (चाउ एन-लाई) भारत आए और दोनों प्रधानमंत्रियों के संयुक्त वक्तव्य में इन सिद्धांतों को दोहराया गया। अक्टूबर 1954 में नेहरू चीन गए। इन्हीं दिनों "हिंदी-चीनी भाई-भाई" का नारा लोकप्रिय हुआ।
पंचशील के पाँचों सिद्धांत और उनका अर्थ इस प्रकार है:
1. एक-दूसरे की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता का सम्मान — हर देश की सीमाएँ और अपने क्षेत्र पर उसका पूरा अधिकार दूसरे देश को मानना होगा। यानी कोई देश दूसरे की ज़मीन पर दावा नहीं करेगा और न उसके टुकड़े करने की कोशिश करेगा।
2. पारस्परिक अनाक्रमण — कोई देश दूसरे पर हमला नहीं करेगा। विवाद हो भी तो उसे सेना से नहीं, बातचीत से सुलझाया जाएगा।
3. एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करना — किसी देश में कैसी सरकार हो, उसकी आर्थिक नीति या क़ानून क्या हों, यह उसी देश की जनता तय करेगी। दूसरा देश वहाँ के विद्रोहियों या किसी दल की मदद करके दख़ल नहीं देगा।
4. समानता और पारस्परिक लाभ — बड़ा देश हो या छोटा, अमीर हो या ग़रीब, संबंध बराबरी के आधार पर होंगे और व्यापार या समझौते ऐसे होंगे जिनसे दोनों को लाभ हो, केवल एक को नहीं।
5. शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व — अलग-अलग विचारधारा और शासन-प्रणाली वाले देश (जैसे लोकतांत्रिक भारत और साम्यवादी चीन) भी एक-दूसरे को मिटाने की कोशिश किए बिना साथ-साथ शांति से रह सकते हैं।
◆ महत्त्व — पंचशील केवल भारत-चीन तक सीमित नहीं रहा। बांडुंग सम्मेलन (1955) के दस सिद्धांतों में और आगे गुटनिरपेक्ष आंदोलन में इन्हें अपनाया गया, और संयुक्त राष्ट्र में भी इन्हें अंतरराष्ट्रीय संबंधों के आदर्श नियम के रूप में सराहा गया।
◆ सीमा — समझौता केवल आठ वर्ष के लिए था और 1962 में, जिस वर्ष उसकी अवधि पूरी हुई, उसी वर्ष चीन ने भारत पर आक्रमण कर दिया। आलोचकों का कहना है कि भारत ने तिब्बत में अपने अधिकार छोड़ दिए, पर बदले में चीन से सीमा की स्पष्ट मान्यता नहीं ली। इस प्रकार पंचशील एक ऊँचा आदर्श था, पर अकेले आदर्श सुरक्षा की गारंटी नहीं बन सके।
◆ पृष्ठभूमि — नेहरू आज़ादी से पहले ही एशियाई एकता के पक्षधर थे। मार्च–अप्रैल 1947 में उन्होंने नई दिल्ली में एशियाई संबंध सम्मेलन बुलाया था और जनवरी 1949 में इंडोनेशिया की आज़ादी के समर्थन में भी दिल्ली में सम्मेलन हुआ। बांडुंग इसी सिलसिले की सबसे बड़ी कड़ी था।
◆ कब और कहाँ — 18 से 24 अप्रैल 1955 तक इंडोनेशिया के बांडुंग नगर में एशिया और अफ़्रीका के 29 देशों का सम्मेलन हुआ। मेज़बान इंडोनेशिया के राष्ट्रपति सुकर्णो थे। आयोजक देश पाँच थे — भारत, इंडोनेशिया, बर्मा (म्यांमार), श्रीलंका (तब सीलोन) और पाकिस्तान। इसमें नेहरू के साथ मिस्र के नासिर और चीन के झोउ एनलाई भी शामिल हुए।
◆ क्या तय हुआ — सम्मेलन ने उपनिवेशवाद और नस्लीय भेदभाव की निंदा की, एशिया-अफ़्रीका के देशों के बीच आर्थिक और सांस्कृतिक सहयोग की बात कही और विश्व-शांति के लिए दस सिद्धांत स्वीकार किए, जिनमें पंचशील के पाँचों सिद्धांत समाए हुए थे।
◆ महत्त्व — यह पहला अवसर था जब हाल ही में आज़ाद हुए एशियाई-अफ़्रीकी देश बिना किसी पश्चिमी शक्ति के एक मंच पर आए। इस एकजुटता को "बांडुंग की भावना" कहा गया, और यही सम्मेलन छह वर्ष बाद बने गुटनिरपेक्ष आंदोलन की भूमिका बना।
◆ पाँच संस्थापक नेता — गुटनिरपेक्ष आंदोलन को पाँच नेताओं ने खड़ा किया — भारत के जवाहरलाल नेहरू, मिस्र के जमाल अब्दुल नासिर, यूगोस्लाविया के जोसिप ब्रोज़ टीटो, इंडोनेशिया के सुकर्णो और घाना के क्वामे एनक्रूमा। इनमें नेहरू, नासिर और टीटो की तिकड़ी सबसे प्रमुख थी; 1956 में तीनों यूगोस्लाविया के ब्रियोनी द्वीप पर मिले थे।
◆ पहला शिखर सम्मेलन — 1 से 6 सितंबर 1961 तक यूगोस्लाविया की राजधानी बेलग्रेड में पहला गुटनिरपेक्ष शिखर सम्मेलन हुआ, जिसमें 25 सदस्य देशों ने भाग लिया। उस समय बर्लिन संकट के कारण महाशक्तियों में तनाव चरम पर था, इसलिए सम्मेलन ने अमेरिका और सोवियत संघ दोनों से शांति वार्ता की अपील की।
◆ उद्देश्य — आंदोलन के मुख्य उद्देश्य थे — शीतयुद्ध के सैन्य गुटों से दूर रहना, उपनिवेशवाद और रंगभेद का विरोध, निरस्त्रीकरण, नए आज़ाद देशों की स्वतंत्रता और संप्रभुता की रक्षा, और आगे चलकर ग़रीब देशों के लिए न्यायपूर्ण अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था की माँग।
◆ आगे का सफ़र — आंदोलन के सदस्य बढ़ते-बढ़ते सौ से अधिक हो गए। मार्च 1983 में सातवाँ शिखर सम्मेलन नई दिल्ली में हुआ और इंदिरा गांधी आंदोलन की अध्यक्ष बनीं। 1991 में सोवियत संघ के विघटन और शीतयुद्ध की समाप्ति के बाद इसकी प्रासंगिकता पर प्रश्न उठे, पर विकासशील देशों की साझा आवाज़ के रूप में यह आज भी बना हुआ है।
◆ एशिया-अफ़्रीका की आज़ादी का समर्थन — भारत स्वयं उपनिवेशवाद का शिकार रहा था, इसलिए उसने हर ग़ुलाम देश की आज़ादी का समर्थन किया। इंडोनेशिया की डच शासन से मुक्ति के लिए भारत ने 1949 में सम्मेलन बुलाया, और संयुक्त राष्ट्र में अफ़्रीकी देशों — जैसे घाना, अल्जीरिया, केन्या — की स्वतंत्रता के पक्ष में लगातार आवाज़ उठाई।
◆ रंगभेद का विरोध — दक्षिण अफ़्रीका की गोरी सरकार की रंगभेद नीति (नस्ल के आधार पर अश्वेतों और भारतीय मूल के लोगों से भेदभाव) का प्रश्न 1946 में संयुक्त राष्ट्र में सबसे पहले भारत ने ही उठाया और उसी वर्ष दक्षिण अफ़्रीका से व्यापारिक संबंध तोड़ लिए। यह वही देश था जहाँ गांधीजी ने सत्याग्रह का पहला प्रयोग किया था।
◆ अपने घर में — भारत की भूमि पर बचे उपनिवेश भी समाप्त हुए। फ़्रांस ने पांडिचेरी 1954 में बातचीत से सौंप दिया, पर पुर्तगाल गोवा छोड़ने को तैयार नहीं था। अंततः दिसंबर 1961 में सैन्य कार्रवाई "ऑपरेशन विजय" से गोवा, दमन और दीव मुक्त कराए गए (विस्तार पिछले अध्याय में)।
◆ समस्या — राष्ट्रमंडल उन देशों का संघ था जो कभी ब्रिटिश साम्राज्य के अंग रहे थे और जिनका प्रमुख ब्रिटिश सम्राट होता था। भारत गणराज्य बनने जा रहा था, यानी उसका राष्ट्राध्यक्ष निर्वाचित राष्ट्रपति होगा, सम्राट नहीं। तब क्या भारत राष्ट्रमंडल में रह सकता था?
◆ समाधान — लंदन घोषणा — अप्रैल 1949 में राष्ट्रमंडल प्रधानमंत्रियों के सम्मेलन की लंदन घोषणा में तय हुआ कि भारत गणराज्य बनकर भी सदस्य रहेगा और ब्रिटिश सम्राट को केवल "स्वतंत्र सदस्य देशों के स्वैच्छिक संघ का प्रतीक" और इस नाते राष्ट्रमंडल का प्रमुख मानेगा। सम्राट का भारत के शासन में कोई अधिकार नहीं रहा।
◆ महत्त्व — देश में कुछ लोगों ने इसे ग़ुलामी की निशानी कहकर विरोध किया, पर नेहरू का तर्क था कि सदस्यता से भारत की स्वतंत्रता पर कोई आँच नहीं आती, जबकि व्यापार, शिक्षा और कूटनीति में लाभ मिलता है। इस घोषणा से राष्ट्रमंडल का स्वरूप ही बदल गया; आगे चलकर एशिया-अफ़्रीका के कई गणराज्य इसी आधार पर उसके सदस्य बने।
◆ कोरिया युद्ध (1950–53) — जब साम्यवादी उत्तर कोरिया ने दक्षिण कोरिया पर हमला किया, तो भारत ने संयुक्त राष्ट्र में हमले की निंदा का समर्थन किया, पर लड़ने के लिए सेना नहीं भेजी; केवल एक चिकित्सा दल भेजा। भारत दोनों पक्षों के बीच संदेश पहुँचाने वाला भरोसेमंद मध्यस्थ बना। युद्धविराम के बाद युद्धबंदियों को उनकी इच्छा के अनुसार घर भेजने के लिए बने तटस्थ राष्ट्र युद्धबंदी प्रत्यावर्तन आयोग का अध्यक्ष भारत के जनरल के. एस. थिमैया को बनाया गया।
◆ हिंद-चीन (1954) — वियतनाम, लाओस और कंबोडिया में युद्धविराम की निगरानी के लिए बने अंतरराष्ट्रीय नियंत्रण आयोग की अध्यक्षता भी भारत को मिली। दोनों गुटों का भारत पर यह भरोसा उसकी गुटनिरपेक्ष छवि का ही परिणाम था।
◆ शांति सेनाएँ — भारत ने संयुक्त राष्ट्र की शांति सेनाओं में बड़ी संख्या में सैनिक भेजे — 1956 के स्वेज़ संकट के बाद गाज़ा क्षेत्र में और 1960 के बाद कांगो में। आज भी भारत शांति सेनाओं में सबसे अधिक सैनिक भेजने वाले देशों में है।
◆ अन्य — 1953 में नेहरू की बहन विजयलक्ष्मी पंडित संयुक्त राष्ट्र महासभा की पहली महिला अध्यक्ष चुनी गईं। भारत ने साम्यवादी चीन को संयुक्त राष्ट्र में स्थान दिलाने की भी लगातार पैरवी की।
◆ पृष्ठभूमि — 1945 में हिरोशिमा और नागासाकी पर गिरे परमाणु बमों के बाद अमेरिका और सोवियत संघ, दोनों और भी विनाशकारी हाइड्रोजन बमों के परीक्षण करने लगे। नेहरू को डर था कि हथियारों की यह होड़ पूरी मानव जाति को नष्ट कर सकती है।
◆ भारत की पहल — 1954 में नेहरू दुनिया के पहले बड़े नेता बने, जिन्होंने परमाणु परीक्षणों पर तुरंत रोक लगाने के समझौते की माँग की। भारत की नीति थी कि परमाणु ऊर्जा का उपयोग केवल शांतिपूर्ण कार्यों — बिजली, चिकित्सा, कृषि — के लिए हो। इसी सोच से भारत ने 1963 की आंशिक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि पर हस्ताक्षर किए।
◆ आगे का रुख़ — पर भारत ने 1968 की परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर नहीं किए, क्योंकि उसके अनुसार यह संधि भेदभावपूर्ण थी — जिन पाँच देशों के पास पहले से परमाणु हथियार थे वे उन्हें रख सकते थे, पर बाक़ी देश नहीं बना सकते थे। भारत का कहना था कि निरस्त्रीकरण सबके लिए बराबर होना चाहिए।
🔍 आसान परिभाषा: निरस्त्रीकरण |
📘 परिभाषा: अंतरराष्ट्रीय समझौतों के माध्यम से हथियारों — विशेषकर परमाणु और अन्य जनसंहारक हथियारों — के निर्माण, परीक्षण और भंडार को घटाना या पूरी तरह समाप्त करना। |
💡 आसान भाषा में: दो झगड़ालू पड़ोसी आपस में तय कर लें कि दोनों अपनी-अपनी लाठियाँ फेंक देंगे, ताकि झगड़ा हो भी तो जान न जाए। 🏠 उदाहरण: 1963 की आंशिक परीक्षण प्रतिबंध संधि ने वायुमंडल, अंतरिक्ष और पानी के भीतर परमाणु परीक्षणों पर रोक लगाई। |
◆ उपलब्धियाँ — एक ग़रीब और नया आज़ाद देश होते हुए भी भारत को विश्व-मंच पर अपनी शक्ति से कहीं अधिक सम्मान और प्रभाव मिला। देश ने अपनी विदेश नीति की स्वतंत्रता बचाए रखी, दोनों गुटों से सहायता ली और एशिया-अफ़्रीका के नए देशों का स्वाभाविक नेता बना।
◆ कमियाँ — आलोचकों के अनुसार यह नीति अत्यधिक आदर्शवादी थी। चीन के इरादों को परखने में भूल हुई और रक्षा-तैयारी की उपेक्षा हुई, जिसकी क़ीमत 1962 में चुकानी पड़ी। कश्मीर का प्रश्न जनवरी 1948 में संयुक्त राष्ट्र ले जाने के निर्णय की भी आलोचना होती है, क्योंकि वहाँ यह मामला शीतयुद्ध की राजनीति में उलझ गया।
स्तंभ | कब | एक वाक्य में सार |
गुटनिरपेक्षता | 1947 से | भारत किसी सैन्य गुट में शामिल नहीं हुआ और हर मुद्दे पर स्वतंत्र निर्णय लेता रहा; यह तटस्थता नहीं थी। |
पंचशील | 29 अप्रैल 1954 | तिब्बत-व्यापार पर भारत-चीन समझौते की प्रस्तावना में शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के पाँच सिद्धांत लिखे गए। |
बांडुंग सम्मेलन | 18–24 अप्रैल 1955 | इंडोनेशिया में एशिया-अफ़्रीका के 29 देशों ने उपनिवेशवाद का विरोध किया और दस सिद्धांत अपनाए। |
बेलग्रेड सम्मेलन | 1–6 सितंबर 1961 | यूगोस्लाविया में 25 देशों के पहले शिखर सम्मेलन से गुटनिरपेक्ष आंदोलन की औपचारिक शुरुआत हुई। |
उपनिवेशवाद-विरोध | 1946 से | भारत ने एशिया-अफ़्रीका की आज़ादी का समर्थन किया और रंगभेद का प्रश्न सबसे पहले संयुक्त राष्ट्र में उठाया। |
राष्ट्रमंडल | अप्रैल 1949 | लंदन घोषणा के अनुसार भारत गणराज्य बनकर भी राष्ट्रमंडल का सदस्य बना रहा। |
संयुक्त राष्ट्र और शांति | 1950 के दशक में | भारत ने कोरिया में मध्यस्थता की, जनरल थिमैया प्रत्यावर्तन आयोग के अध्यक्ष बने और भारत ने शांति सेनाएँ भेजीं। |
निरस्त्रीकरण | 1954 | नेहरू ने परमाणु परीक्षणों पर रोक की माँग की और परमाणु ऊर्जा के केवल शांतिपूर्ण उपयोग पर बल दिया। |
स्वतंत्र भारत ने पहले पचास वर्षों में चार बड़े युद्ध लड़े — 1962 में चीन से और 1965, 1971 तथा 1999 में पाकिस्तान से। (1947–48 का कश्मीर युद्ध पिछले अध्याय में पढ़ा जा चुका है।) नीचे की तुलना में चारों युद्धों के कारण, मोर्चे, नेतृत्व और परिणाम एक नज़र में दिए गए हैं। चित्र के ठीक बाद चारों का छोटा परिचय है; फिर इस खंड में 1962 के युद्ध का, खंड 7 में 1965 का, खंड 8 में 1971 का और खंड 11 में 1999 के कारगिल युद्ध का पूरा विस्तार मिलेगा।

◆ भारत-चीन युद्ध (1962) — इसके कारण थे मैकमोहन रेखा और अक्साई चिन का सीमा-विवाद, 1959 में दलाई लामा को भारत में शरण और भारत की अग्रिम चौकी नीति। लड़ाई दो मोर्चों पर हुई — पश्चिम में लद्दाख (अक्साई चिन) और पूर्व में नेफ़ा (आज का अरुणाचल प्रदेश), जहाँ चीनी सेना तवांग, सेला और बोमडिला तक आ गई। उस समय प्रधानमंत्री नेहरू और रक्षा मंत्री वी. के. कृष्ण मेनन थे। चीन ने 20 अक्टूबर को हमला किया और 21 नवंबर को एकतरफ़ा युद्धविराम की घोषणा की; भारत की हार हुई और इसके बाद रक्षा-तैयारी पर ज़ोर दिया गया।
◆ भारत-पाक युद्ध (1965) — अप्रैल में कच्छ के रन में झड़प हुई और अगस्त में पाकिस्तान ने "ऑपरेशन जिब्राल्टर" के तहत कश्मीर में घुसपैठिए भेजे। फिर उसने "ग्रैंड स्लैम" नाम से छंब-अखनूर पर हमला किया, जिसके उत्तर में भारत ने 6 सितंबर को लाहौर और सियालकोट के मोर्चे खोल दिए; असल उत्तर में बड़ा टैंक युद्ध हुआ। नेतृत्व लाल बहादुर शास्त्री का था, जिन्होंने "जय जवान, जय किसान" का नारा दिया। 23 सितंबर को युद्धविराम हुआ, 10 जनवरी 1966 को ताशकंद समझौता हुआ और अगले ही दिन, 11 जनवरी को शास्त्रीजी का निधन हो गया।
◆ भारत-पाक युद्ध (1971) — पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी सेना के दमन के कारण लगभग एक करोड़ शरणार्थी भारत आ गए। 3 दिसंबर को पाकिस्तान ने भारतीय हवाई अड्डों पर हमला किया, जिसके बाद भारतीय सेना ने पूर्व में मुक्ति वाहिनी के साथ तेज़ अभियान चलाया। नेतृत्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी, सेनाध्यक्ष सैम मानेकशॉ और पूर्वी कमान के लेफ़्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा का था। 16 दिसंबर को ढाका में लगभग 93,000 पाकिस्तानी सैनिकों ने आत्मसमर्पण किया, बांग्लादेश का जन्म हुआ और 1972 में शिमला समझौता हुआ।
◆ कारगिल युद्ध (1999) — पाकिस्तानी सैनिकों और घुसपैठियों ने नियंत्रण रेखा पार करके कारगिल की ऊँची चोटियों पर क़ब्ज़ा कर लिया था। लड़ाई कारगिल, द्रास और बटालिक क्षेत्रों में हुई, जहाँ तोलोलिंग और टाइगर हिल जैसी चोटियाँ वापस ली गईं। प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी थे और अभियान का नाम "ऑपरेशन विजय" था। 26 जुलाई तक सभी चोटियाँ वापस मिल गईं, इसलिए यह दिन "कारगिल विजय दिवस" है; बाद में चूकों की जाँच के लिए कारगिल समीक्षा समिति बनी।
◆ तिब्बत का प्रश्न — 1950 में चीन ने तिब्बत पर अधिकार किया, जिससे भारत और चीन के बीच का "बीच का पर्दा" हट गया। मार्च 1959 में तिब्बत की राजधानी ल्हासा में चीनी शासन के विरुद्ध विद्रोह हुआ, जिसे चीन ने कुचल दिया। तिब्बत के धर्मगुरु और शासक दलाई लामा हज़ारों अनुयायियों के साथ भागकर भारत आए और भारत ने उन्हें शरण दी; वे आगे हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में बसे। चीन ने इसे अपने आंतरिक मामले में भारत का हस्तक्षेप माना और संबंध तेज़ी से बिगड़ने लगे।
◆ पूर्वी क्षेत्र — मैकमोहन रेखा — 1914 के शिमला सम्मेलन में ब्रिटिश भारत, तिब्बत और चीन के प्रतिनिधि मिले थे। वहाँ ब्रिटिश प्रतिनिधि हेनरी मैकमोहन ने तिब्बत और भारत के पूर्वोत्तर के बीच जो सीमा-रेखा खींची, वही मैकमोहन रेखा है। चीन का कहना था कि उसके प्रतिनिधि ने इस पर अंतिम हस्ताक्षर नहीं किए थे और तिब्बत को अकेले संधि करने का अधिकार नहीं था, इसलिए वह इस रेखा को नहीं मानता। चीन पूरे नेफ़ा (उत्तर-पूर्व सीमांत एजेंसी — आज का अरुणाचल प्रदेश) पर दावा करने लगा।
◆ पश्चिमी क्षेत्र — अक्साई चिन — लद्दाख का उत्तर-पूर्वी भाग अक्साई चिन एक ऊँचा, ठंडा और निर्जन पठार है। चीन के लिए यह इसलिए महत्त्वपूर्ण था कि उसके दो प्रांतों — शिनजियांग और तिब्बत — को जोड़ने का सबसे सीधा रास्ता यहीं से जाता था। चीन ने 1950 के दशक के मध्य में यहाँ से सड़क बना ली और भारत को इसकी पक्की जानकारी 1957–58 में हुई। चीनी नक़्शों में भी भारत के बड़े भू-भाग चीन के हिस्से के रूप में दिखाए जाने लगे।
◆ बातचीत की विफलता — 1959 में सीमा पर पहली ख़ूनी झड़पें हुईं — अगस्त में नेफ़ा के लोंगजू में और अक्टूबर में लद्दाख के कोंगका दर्रे पर, जहाँ भारतीय पुलिस के जवान मारे गए। अप्रैल 1960 में झोउ एनलाई दिल्ली आए और संकेत दिया कि यदि भारत अक्साई चिन पर चीन का नियंत्रण मान ले तो चीन पूर्व में मैकमोहन रेखा मान सकता है। भारत ने इसे अस्वीकार कर दिया, क्योंकि उसके अनुसार दोनों क्षेत्र उसके अपने थे।
◆ अग्रिम चौकी नीति (1961 से) — चीन को और आगे बढ़ने से रोकने के लिए भारत ने विवादित क्षेत्रों में, कई जगह चीनी चौकियों के पीछे तक, छोटी-छोटी सैनिक चौकियाँ बनानी शुरू कीं। यह नीति रक्षा मंत्री वी. के. कृष्ण मेनन और ख़ुफ़िया तथा सैन्य सलाहकारों की इस धारणा पर टिकी थी कि चीन बड़ा हमला नहीं करेगा। पर इन चौकियों के पास न पर्याप्त सैनिक थे, न रसद, न सड़कें। चीन ने इसे उकसावा माना।
🔍 आसान परिभाषा: अग्रिम चौकी नीति |
📘 परिभाषा: विवादित सीमा-क्षेत्र में अपना दावा जताने और विरोधी सेना को आगे बढ़ने से रोकने के लिए, मुख्य सैन्य ठिकानों से बहुत आगे छोटी-छोटी सैनिक चौकियाँ स्थापित करने की नीति। |
💡 आसान भाषा में: खेत की मेड़ को लेकर झगड़ा हो और एक पड़ोसी विवादित पट्टी में जगह-जगह अपने खूँटे गाड़ दे — पर उन खूँटों की रखवाली के लिए आदमी ही न हों। 🏠 उदाहरण: 1961–62 में भारत ने लद्दाख और नेफ़ा में दर्जनों ऐसी चौकियाँ बनाईं, जो अक्टूबर 1962 के हमले में कुछ ही दिनों में घिर गईं। |
◆ पहला चरण (20 अक्टूबर से) — 20 अक्टूबर 1962 को चीनी सेना ने लद्दाख और नेफ़ा — दोनों मोर्चों पर एक साथ, बड़ी तैयारी के साथ हमला किया। यह वही समय था जब दुनिया का ध्यान क्यूबा मिसाइल संकट पर लगा था। पूर्व में नामका चू नदी के पास भारतीय चौकियाँ टूट गईं और कुछ ही दिनों में तवांग चीन के हाथ में चला गया। 26 अक्टूबर को देश में पहली बार राष्ट्रीय आपातकाल घोषित हुआ।
◆ दूसरा चरण (मध्य नवंबर) — लगभग तीन सप्ताह के ठहराव के बाद चीन ने दोबारा हमला किया। नेफ़ा में सेला दर्रे की मज़बूत मानी जाने वाली रक्षा-पंक्ति बिना बड़ी लड़ाई के टूट गई और चीनी सेना बोमडिला तक, यानी असम के मैदानों के पास पहुँच गई।
◆ रेज़ांग ला की लड़ाई (18 नवंबर) — लद्दाख के चुशूल क्षेत्र में लगभग 16,000 फ़ुट की ऊँचाई पर रेज़ांग ला दर्रे पर कुमाऊँ रेजिमेंट की एक कंपनी ने मेजर शैतान सिंह के नेतृत्व में अंतिम साँस तक मुक़ाबला किया। कंपनी के 120 में से अधिकांश जवान शहीद हो गए, पर उन्होंने कहीं अधिक संख्या में आए चीनी सैनिकों को भारी हानि पहुँचाई। मेजर शैतान सिंह को मरणोपरांत परमवीर चक्र मिला। यह दिखाता है कि हार नेतृत्व और तैयारी की थी, सैनिकों के साहस की नहीं।
◆ एकतरफ़ा युद्धविराम (21 नवंबर) — 21 नवंबर 1962 को चीन ने अचानक एकतरफ़ा युद्धविराम की घोषणा की और पूर्व में अपनी सेना मैकमोहन रेखा के पीछे हटा ली। पर पश्चिम में उसने अक्साई चिन (लगभग 38,000 वर्ग किलोमीटर) पर अपना क़ब्ज़ा बनाए रखा, जो आज तक बना हुआ है।
◆ कोलंबो प्रस्ताव (दिसंबर 1962) — श्रीलंका की प्रधानमंत्री सिरिमावो भंडारनायके की पहल पर छह गुटनिरपेक्ष देशों ने कोलंबो में मिलकर समझौते के प्रस्ताव रखे। भारत ने उन्हें स्वीकार किया, पर चीन ने शर्तों के साथ ही माना, इसलिए सीमा-विवाद सुलझ नहीं सका।
◆ ग़लत आकलन — नेतृत्व को भरोसा था कि चीन बड़ा युद्ध नहीं छेड़ेगा, इसलिए ख़तरे की चेतावनियों को गंभीरता से नहीं लिया गया।
◆ तैयारी की कमी — सैनिकों के पास ऊँचे पहाड़ों की ठंड के लायक़ कपड़े, आधुनिक राइफ़लें और पर्याप्त गोला-बारूद नहीं था; सीमा तक सड़कें नहीं थीं, जबकि चीन ने तिब्बत की ओर से सड़कें बना ली थीं।
◆ नेतृत्व की भूलें — सेना की नियुक्तियों में राजनीतिक दख़ल, रक्षा मंत्री और वरिष्ठ सेनाधिकारियों के बीच तनाव और मोर्चे पर अनुभवहीन कमान ने हालात बिगाड़े। वायुसेना का आक्रामक उपयोग भी नहीं किया गया।
◆ राजनीतिक परिणाम — रक्षा मंत्री कृष्ण मेनन को इस्तीफ़ा देना पड़ा और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री यशवंतराव चव्हाण नए रक्षा मंत्री बने। अगस्त 1963 में आचार्य जे. बी. कृपलानी ने नेहरू सरकार के विरुद्ध लोकसभा में पहला अविश्वास प्रस्ताव रखा, जो गिर गया, पर सरकार की साख को चोट पहुँची।
◆ रक्षा में बदलाव — रक्षा बजट लगभग दोगुना किया गया, सेना का आकार बढ़ाया गया, पहाड़ी युद्ध के लिए नई टुकड़ियाँ बनीं और सीमा पर सड़कें बनाने का काम तेज़ हुआ। हार के कारणों की जाँच हेंडरसन ब्रुक्स–भगत रिपोर्ट में हुई, जिसे सरकार ने आज तक पूरी तरह सार्वजनिक नहीं किया। इन्हीं सुधारों का लाभ 1965 के युद्ध में मिला।
◆ विदेश नीति पर प्रभाव — "हिंदी-चीनी भाई-भाई" और पंचशील की भावना टूट गई। संकट में भारत को अमेरिका और ब्रिटेन से हथियारों की मदद माँगनी पड़ी, जिससे गुटनिरपेक्षता पर प्रश्न उठे। दूसरी ओर चीन और पाकिस्तान निकट आ गए; 1963 में पाकिस्तान ने अपने क़ब्ज़े वाले कश्मीर का एक भाग चीन को सौंप दिया।
◆ आर्थिक प्रभाव — धन विकास से हटकर रक्षा पर लगाना पड़ा, जो तीसरी पंचवर्षीय योजना की विफलता का एक बड़ा कारण बना (खंड 3.5)।
◆ नेहरू पर प्रभाव — यह हार नेहरू के लिए व्यक्तिगत आघात थी। 1963 में संगठन को मज़बूत करने के नाम पर कामराज योजना आई, जिसके तहत कई वरिष्ठ मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों ने पद छोड़कर पार्टी का काम सँभाला। जनवरी 1964 में नेहरू को पक्षाघात का दौरा पड़ा और 27 मई 1964 को उनका निधन हो गया। इसके साथ ही नेहरू युग समाप्त हुआ।
📌 याद रखें — 1962 का सबक़ 1962 ने सिखाया कि शांति की नीति भी तभी सफल होती है जब उसके पीछे मज़बूत रक्षा-तैयारी हो। आदर्शवाद और यथार्थ, दोनों का संतुलन ज़रूरी है। युद्ध की तिथियाँ याद रखें — हमला 20 अक्टूबर 1962, एकतरफ़ा युद्धविराम 21 नवंबर 1962; पूर्व में विवाद मैकमोहन रेखा का और पश्चिम में अक्साई चिन का। |
लाल बहादुर शास्त्री का जन्म 2 अक्टूबर 1904 को उत्तर प्रदेश के मुग़लसराय में एक साधारण परिवार में हुआ। पिता का देहांत बचपन में ही हो गया और उन्होंने बड़ी कठिनाई से पढ़ाई की। असहयोग आंदोलन के समय उन्होंने पढ़ाई छोड़ी और फिर काशी विद्यापीठ से "शास्त्री" की उपाधि ली, जो आगे उनके नाम का हिस्सा बन गई। वे कई बार जेल गए। आज़ादी के बाद वे केंद्र में रेल मंत्री बने और 1956 में एक बड़ी रेल दुर्घटना की नैतिक ज़िम्मेदारी लेते हुए इस्तीफ़ा दे दिया — यह भारतीय राजनीति में नैतिकता का दुर्लभ उदाहरण माना जाता है। बाद में वे गृह मंत्री भी रहे। सादगी, ईमानदारी और विनम्रता उनकी पहचान थी।
◆ नेहरू के निधन के बाद सबसे वरिष्ठ मंत्री गुलज़ारीलाल नंदा तेरह दिन कार्यवाहक प्रधानमंत्री रहे। असली प्रश्न था — "नेहरू के बाद कौन?" कई विदेशी पर्यवेक्षकों को आशंका थी कि उत्तराधिकार के झगड़े में भारत का लोकतंत्र बिखर जाएगा।
◆ कांग्रेस अध्यक्ष के. कामराज और कुछ प्रभावशाली क्षेत्रीय नेताओं के समूह को "सिंडिकेट" कहा जाता था। इस समूह ने दावेदार मोरारजी देसाई के बजाय सर्वसम्मति से शास्त्री का नाम आगे बढ़ाया। 9 जून 1964 को शास्त्री भारत के दूसरे प्रधानमंत्री बने। सत्ता का यह शांतिपूर्ण हस्तांतरण भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता का प्रमाण था। उनका कार्यकाल केवल लगभग 19 महीने का रहा, पर वह तीन बड़ी चुनौतियों से भरा था।
◆ समस्या — 1964–66 के दौरान मानसून बार-बार विफल हुआ, अनाज उत्पादन गिरा और क़ीमतें तेज़ी से बढ़ीं। देश अमेरिकी गेहूँ पर निर्भर था।
◆ शास्त्री के क़दम — उन्होंने देशवासियों से सप्ताह में एक समय का भोजन छोड़ने की अपील की और पहले स्वयं अपने परिवार में इसे लागू किया। कृषि मंत्री सी. सुब्रमण्यम को नई कृषि नीति की छूट दी, 1965 में भारतीय खाद्य निगम और कृषि मूल्य आयोग बने और राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड की स्थापना हुई (खंड 4.5 और 4.6)। इस प्रकार हरित क्रांति और श्वेत क्रांति — दोनों की नींव शास्त्री के समय पड़ी।
◆ पृष्ठभूमि — संविधान के अनुसार हिंदी संघ की राजभाषा थी, पर अंग्रेज़ी को पंद्रह वर्ष तक, यानी 26 जनवरी 1965 तक, साथ चलने की अनुमति थी। दक्षिण भारत, विशेषकर तमिलनाडु (तब मद्रास राज्य), के लोगों को डर था कि इस तिथि के बाद अंग्रेज़ी हटने से वे केंद्रीय नौकरियों में पिछड़ जाएँगे और उन पर हिंदी "थोपी" जाएगी।
◆ आंदोलन — जनवरी–फ़रवरी 1965 में द्रविड़ मुनेत्र कड़गम के नेतृत्व में और छात्रों की अगुवाई में उग्र हिंदी-विरोधी आंदोलन हुआ; कई युवाओं ने आत्मदाह किया और पुलिस गोलीबारी में अनेक लोग मारे गए।
◆ समाधान — शास्त्री ने आश्वासन दिया कि जब तक अहिंदी-भाषी राज्य चाहेंगे, तब तक अंग्रेज़ी केंद्र के कामकाज में सह-राजभाषा के रूप में चलती रहेगी। इस आश्वासन को इंदिरा गांधी के समय राजभाषा (संशोधन) अधिनियम, 1967 से क़ानूनी रूप मिला। परिणाम यह हुआ कि भाषा के प्रश्न पर देश टूटने से बच गया, और 1967 में तमिलनाडु में द्रविड़ मुनेत्र कड़गम सत्ता में आ गई।
◆ पाकिस्तान का आकलन — पाकिस्तान के सैनिक शासक फ़ील्ड मार्शल अयूब ख़ाँ को लगा कि 1962 की हार से भारतीय सेना का मनोबल टूटा है, नेहरू के बाद नेतृत्व कमज़ोर है और देश खाद्य संकट तथा भाषा-विवाद में उलझा है। साथ ही पाकिस्तान को अमेरिका से आधुनिक पैटन टैंक और सेबर विमान मिले थे। उसे लगा कि कश्मीर छीनने का यही सही समय है।
◆ कच्छ का रन (अप्रैल 1965) — पाकिस्तान ने पहले गुजरात के दलदली और निर्जन कच्छ के रन में सीमा-विवाद पर झड़प छेड़कर भारत की प्रतिक्रिया परखी। ब्रिटेन की मध्यस्थता से जून में युद्धविराम हुआ और मामला अंतरराष्ट्रीय पंचाट को सौंपा गया, जिसने 1968 में विवादित क्षेत्र का लगभग दसवाँ भाग पाकिस्तान को दिया।
◆ "ऑपरेशन जिब्राल्टर" (अगस्त 1965) — पाकिस्तान ने हज़ारों प्रशिक्षित हथियारबंद घुसपैठियों को युद्धविराम रेखा पार कराकर कश्मीर में भेजा। योजना थी कि वे स्थानीय जनता को भड़काकर विद्रोह कराएँगे। पर कश्मीर के लोगों ने साथ नहीं दिया, बल्कि ख़ुद सेना को घुसपैठियों की ख़बर दी। भारतीय सेना ने उन्हें खदेड़ा और घुसपैठ का मुख्य रास्ता हाजी पीर दर्रा जीत लिया।
◆ "ऑपरेशन ग्रैंड स्लैम" (1 सितंबर) — योजना विफल होते देख पाकिस्तान ने टैंकों के साथ जम्मू के छंब-अखनूर क्षेत्र पर खुला हमला किया। लक्ष्य था अखनूर का पुल काटकर कश्मीर को शेष भारत से जोड़ने वाले रास्ते को बंद कर देना।
◆ भारत का उत्तर (6 सितंबर) — शास्त्री ने सेना को छूट दी कि वह जहाँ उचित समझे, वहाँ मोर्चा खोले। 6 सितंबर 1965 को भारतीय सेना ने अंतरराष्ट्रीय सीमा पार करके पंजाब में लाहौर की ओर और फिर सियालकोट की ओर मोर्चे खोल दिए। इससे पाकिस्तान को अखनूर से अपनी सेना हटाकर लाहौर बचाने में लगानी पड़ी। पाकिस्तान को इसकी उम्मीद नहीं थी।
◆ असल उत्तर का टैंक युद्ध — पंजाब के खेमकरण क्षेत्र के असल उत्तर गाँव के पास भारतीय सेना ने पाकिस्तान के पैटन टैंकों को गन्ने के खेतों और पानी भरी ज़मीन में फँसाकर बड़ी संख्या में नष्ट कर दिया; वह जगह "पैटन नगर" कहलाई। यहीं हवलदार अब्दुल हमीद ने जीप पर लगी तोप से कई टैंक नष्ट किए और वीरगति पाई; उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र मिला। सियालकोट क्षेत्र के टैंक युद्धों में लेफ़्टिनेंट कर्नल ए. बी. तारापोर को भी मरणोपरांत परमवीर चक्र मिला।
◆ युद्धविराम (23 सितंबर) — संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव और महाशक्तियों के दबाव के बाद 23 सितंबर 1965 को युद्धविराम हो गया। इस युद्ध में भारत का पलड़ा भारी रहा — पाकिस्तान कश्मीर छीनने के अपने उद्देश्य में पूरी तरह विफल रहा और उसके टैंक बल को भारी हानि हुई।
❝ जय जवान, जय किसान। ❞ (लाल बहादुर शास्त्री (1965) — सीमा की रक्षा करने वाला सैनिक और देश का पेट भरने वाला किसान, दोनों राष्ट्र की शक्ति हैं) |
◆ कौन, कहाँ — सोवियत प्रधानमंत्री अलेक्सेई कोसिगिन की मध्यस्थता से सोवियत संघ के ताशकंद नगर (आज उज़्बेकिस्तान में) में शास्त्री और अयूब ख़ाँ की वार्ता हुई और 10 जनवरी 1966 को ताशकंद घोषणा पर हस्ताक्षर हुए।
◆ मुख्य बातें — दोनों देशों की सेनाएँ 5 अगस्त 1965 से पहले की स्थिति पर लौटेंगी; दोनों देश बल-प्रयोग नहीं करेंगे और विवाद शांतिपूर्ण ढंग से सुलझाएँगे; एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में दख़ल नहीं देंगे; और राजनयिक तथा व्यापारिक संबंध बहाल करेंगे।
◆ आलोचना — समझौते के कारण भारत को हाजी पीर दर्रा जैसी जीती हुई महत्त्वपूर्ण जगहें लौटानी पड़ीं, जबकि पाकिस्तान से भविष्य में घुसपैठ न करने की कोई ठोस गारंटी नहीं मिली। इसलिए देश में कई लोगों ने कहा कि सेना ने जो मैदान में जीता, वह मेज़ पर खो दिया गया।
◆ शास्त्री का निधन — समझौते के कुछ ही घंटे बाद, 11 जनवरी 1966 की रात ताशकंद में ही हृदयाघात से शास्त्रीजी का निधन हो गया। उन्हें 1966 में मरणोपरांत भारत रत्न दिया गया — वे मरणोपरांत यह सम्मान पाने वाले पहले व्यक्ति थे। दिल्ली में उनकी समाधि विजय घाट कहलाती है।
💡 शास्त्री युग का महत्त्व केवल 19 महीनों में शास्त्री ने सिद्ध किया कि नेहरू के बाद भी भारतीय लोकतंत्र स्थिर है। 1965 के युद्ध ने 1962 की हार से गिरा राष्ट्रीय आत्मविश्वास लौटाया, और "जय जवान, जय किसान" ने रक्षा तथा खाद्य-आत्मनिर्भरता — दोनों को राष्ट्रीय प्राथमिकता बना दिया। |
इंदिरा गांधी का जन्म 19 नवंबर 1917 को इलाहाबाद में हुआ; वे जवाहरलाल नेहरू की इकलौती संतान थीं। उन्होंने शांतिनिकेतन और ऑक्सफ़ोर्ड में पढ़ाई की और 1942 में फ़िरोज़ गांधी से विवाह किया। नेहरू के प्रधानमंत्री रहते वे उनके साथ रहकर राजनीति को निकट से देखती रहीं, 1959 में कांग्रेस की अध्यक्ष बनीं और शास्त्री मंत्रिमंडल में सूचना और प्रसारण मंत्री रहीं। शास्त्री के निधन के बाद गुलज़ारीलाल नंदा फिर कुछ दिन कार्यवाहक प्रधानमंत्री रहे। इस बार मोरारजी देसाई ने मुक़ाबले पर ज़ोर दिया, इसलिए कांग्रेस संसदीय दल में मतदान हुआ, जिसमें सिंडिकेट के समर्थन से इंदिरा गांधी ने देसाई को हरा दिया। 24 जनवरी 1966 को वे भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं। सिंडिकेट को लगता था कि वे उसके इशारों पर चलेंगी; समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया ने तो उन्हें "गूँगी गुड़िया" तक कह दिया था। पर कुछ ही वर्षों में वे देश की सबसे शक्तिशाली नेता बन गईं।
◆ पृष्ठभूमि — इंदिरा को विरासत में सूखा, अनाज की कमी, महँगाई और युद्ध से ख़ाली ख़ज़ाना मिला। विदेशी सहायता युद्ध के कारण रुकी हुई थी। अमेरिका और विश्व बैंक ने सहायता फिर शुरू करने के लिए शर्त रखी कि भारत अपनी मुद्रा का मूल्य घटाए और व्यापार पर नियंत्रण ढीले करे।
◆ निर्णय — 6 जून 1966 को रुपये का अवमूल्यन किया गया। एक अमेरिकी डॉलर का मूल्य लगभग 4.76 रुपये से बढ़ाकर 7.50 रुपये कर दिया गया, यानी रुपये का मूल्य लगभग 36.5% घट गया।
◆ परिणाम — आशा थी कि निर्यात बढ़ेगा, पर सूखे के कारण ऐसा नहीं हुआ; उलटे आयात महँगा होने से क़ीमतें और बढ़ीं। वादा की गई विदेशी सहायता भी पूरी नहीं मिली। देश में इसे अमेरिकी दबाव के आगे झुकना कहा गया और कांग्रेस के भीतर भी इसकी कड़ी आलोचना हुई। इस अनुभव ने इंदिरा को आगे समाजवादी और आत्मनिर्भरता वाली नीतियों की ओर मोड़ा।
🔍 आसान परिभाषा: अवमूल्यन |
📘 परिभाषा: सरकार द्वारा जान-बूझकर अपनी मुद्रा का मूल्य विदेशी मुद्राओं की तुलना में घटा देना, ताकि देश का माल विदेशियों को सस्ता पड़े और निर्यात बढ़े, जबकि आयात महँगा होकर घटे। |
💡 आसान भाषा में: पहले एक डॉलर के बदले लगभग पौने पाँच रुपये मिलते थे; सरकार ने कह दिया कि अब साढ़े सात रुपये मिलेंगे। विदेशी ख़रीदार को उसी डॉलर में अब ज़्यादा भारतीय माल मिलेगा, इसलिए वह ज़्यादा ख़रीदेगा — पर हमें विदेशी तेल या मशीन के लिए ज़्यादा रुपये देने पड़ेंगे। 🏠 उदाहरण: भारत में रुपये का बड़ा अवमूल्यन तीन बार हुआ — 1949 में, जून 1966 में और जुलाई 1991 में (खंड 11)। |
◆ पृष्ठभूमि — दो युद्ध, सूखा, महँगाई, अवमूल्यन, दो प्रधानमंत्रियों का निधन और गोहत्या-विरोध तथा भाषा जैसे आंदोलनों से जनता में असंतोष था। समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया ने "ग़ैर-कांग्रेसवाद" की रणनीति दी — यानी कांग्रेस को हराने के लिए अलग-अलग विचारधारा वाले विपक्षी दल भी मिलकर लड़ें।
◆ परिणाम — फ़रवरी 1967 के चुनाव में कांग्रेस लोकसभा में सरकार बनाने लायक़ बहुमत तो पा गई (520 में से 283 सीटें), पर यह तब तक का उसका सबसे कमज़ोर प्रदर्शन था। कामराज सहित सिंडिकेट के कई दिग्गज चुनाव हार गए। राज्यों में तो धक्का और बड़ा था — कांग्रेस आठ राज्यों — बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, मद्रास और केरल — में बहुमत नहीं पा सकी। तमिलनाडु में द्रविड़ मुनेत्र कड़गम के रूप में पहली बार किसी क्षेत्रीय दल ने अपने बल पर सरकार बनाई।
◆ संयुक्त विधायक दल की सरकारें — कई राज्यों में जनसंघ से लेकर कम्युनिस्टों तक — विपरीत विचारधारा वाले दलों ने मिलकर संयुक्त विधायक दल की सरकारें बनाईं। इनमें आपसी खींचतान रहती थी, इसलिए अधिकांश जल्दी गिर गईं। यहीं से भारतीय राजनीति में गठबंधन का प्रयोग शुरू हुआ।
◆ "आया राम, गया राम" — सरकारें बनाने-गिराने के लिए विधायकों की ख़रीद-फ़रोख़्त होने लगी। हरियाणा के विधायक गया लाल ने 1967 में कुछ ही दिनों के भीतर तीन बार दल बदला। तभी से दल-बदल के लिए "आया राम, गया राम" की कहावत चल पड़ी। इस बुराई पर रोक 1985 के दल-बदल विरोधी क़ानून से लगी (खंड 10)।
🔍 आसान परिभाषा: दल-बदल |
📘 परिभाषा: किसी निर्वाचित विधायक या सांसद द्वारा उस राजनीतिक दल को छोड़कर, जिसके टिकट पर वह चुना गया था, पद, धन या अन्य लाभ के लिए दूसरे दल में चले जाना। |
💡 आसान भाषा में: मतदाता ने उम्मीदवार को "क" दल का मानकर वोट दिया, पर जीतने के बाद वह मंत्री बनने के लालच में "ख" दल में चला गया — यह मतदाता के साथ धोखा है। 🏠 उदाहरण: 1967 में हरियाणा के विधायक गया लाल का बार-बार दल बदलना; इसे रोकने के लिए 1985 में 52वें संशोधन से दसवीं अनुसूची जोड़ी गई। |
◆ नक्सलबाड़ी विद्रोह (1967) — इसी वर्ष पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग ज़िले के नक्सलबाड़ी क्षेत्र में भूमिहीन किसानों और आदिवासियों ने ज़मींदारों की ज़मीन पर बलपूर्वक क़ब्ज़ा करना शुरू किया। इसका नेतृत्व कम्युनिस्ट नेता चारु मजूमदार और कानू सान्याल ने किया, जो मानते थे कि संसद के रास्ते नहीं, बल्कि सशस्त्र किसान क्रांति से ही बदलाव आएगा। इसी स्थान के नाम पर यह धारा नक्सलवाद कहलाई। यह अधूरे भूमि सुधारों (खंड 4.1) का ही परिणाम था।
◆ टकराव की जड़ — सिंडिकेट चाहता था कि सरकार पार्टी संगठन के निर्देश पर चले; इंदिरा अपनी स्वतंत्र पहचान बनाना चाहती थीं। 1967 में उन्होंने दस सूत्री कार्यक्रम के रूप में वामपंथी झुकाव वाली नीतियाँ आगे रखीं — बैंकों पर सामाजिक नियंत्रण, बीमा का राष्ट्रीयकरण, प्रिवी पर्स की समाप्ति, भूमि सुधार — जिनसे सिंडिकेट के कई नेता सहमत नहीं थे।
◆ राष्ट्रपति चुनाव — मई 1969 में राष्ट्रपति डॉ. ज़ाकिर हुसैन का निधन हो गया। सिंडिकेट ने इंदिरा की इच्छा के विरुद्ध नीलम संजीव रेड्डी को कांग्रेस का आधिकारिक उम्मीदवार बना दिया। उपराष्ट्रपति वी. वी. गिरि निर्दलीय खड़े हुए। इंदिरा ने कांग्रेसी सांसदों-विधायकों से कहा कि वे "अंतरात्मा की आवाज़" पर वोट दें — यानी पार्टी के उम्मीदवार को वोट देना ज़रूरी नहीं। अगस्त 1969 में गिरि जीत गए; यह सिंडिकेट की खुली हार थी।
◆ विभाजन (नवंबर 1969) — कांग्रेस अध्यक्ष एस. निजलिंगप्पा ने अनुशासनहीनता के आरोप में प्रधानमंत्री को ही पार्टी से निकाल दिया। पार्टी दो भागों में बँट गई — सिंडिकेट के नेतृत्व वाली कांग्रेस (संगठन) या कांग्रेस (ओ), और इंदिरा के नेतृत्व वाली कांग्रेस (रिक्विज़िशनिस्ट) या कांग्रेस (आर)। अधिकांश सांसद इंदिरा के साथ रहे, पर लोकसभा में उनका बहुमत नहीं बचा; उनकी सरकार भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और द्रविड़ मुनेत्र कड़गम के बाहरी समर्थन से चली।
◆ महत्त्व — इंदिरा ने इस लड़ाई को व्यक्तियों की नहीं, विचारधारा की लड़ाई बताया — ग़रीबों के पक्ष में समाजवादी नीतियाँ बनाम अमीरों के हित। इसके बाद पार्टी और सरकार दोनों पर उनका पूरा नियंत्रण हो गया, पर पार्टी के भीतर सामूहिक नेतृत्व और आंतरिक लोकतंत्र कमज़ोर पड़ा।
◆ पृष्ठभूमि — उस समय बड़े बैंक बड़े औद्योगिक घरानों के हाथ में थे और उनका अधिकांश ऋण बड़े उद्योगों और व्यापारियों को ही जाता था। कुल बैंक-ऋण में कृषि का हिस्सा लगभग दो प्रतिशत था, जबकि देश की अधिकांश जनता खेती पर निर्भर थी। गाँवों में बैंक की शाखाएँ लगभग नहीं थीं और किसान साहूकारों के चंगुल में थे।
◆ क्या हुआ — इंदिरा गांधी ने पहले वित्त मंत्री मोरारजी देसाई से वित्त विभाग ले लिया (जिस पर उन्होंने इस्तीफ़ा दे दिया) और फिर 19 जुलाई 1969 को एक अध्यादेश से उन 14 बड़े निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया, जिनकी जमा राशि 50 करोड़ रुपये से अधिक थी। ये बैंक देश की लगभग 85% बैंक-जमा सँभालते थे। सर्वोच्च न्यायालय ने 1970 में मुआवज़े के प्रश्न पर इसे रद्द किया, तो सरकार ने नया क़ानून बनाकर इसे बनाए रखा।
◆ परिणाम — बैंकों की शाखाएँ गाँव-गाँव और क़स्बों में खुलीं, कृषि, छोटे उद्योग और छोटे व्यापारियों को "प्राथमिकता क्षेत्र" मानकर ऋण देना अनिवार्य हुआ, और आम लोगों की बचत बैंकों में आने लगी। इससे हरित क्रांति को भी सहारा मिला। 15 अप्रैल 1980 को छह और बैंकों का राष्ट्रीयकरण हुआ। सीमा यह रही कि आगे चलकर राजनीतिक दबाव में दिए गए ऋण डूबे और सरकारी बैंकों की कार्यकुशलता घटी।
🔍 आसान परिभाषा: राष्ट्रीयकरण |
📘 परिभाषा: निजी स्वामित्व वाले उद्योग, बैंक या अन्य संस्था को क़ानून द्वारा, सामान्यतः मुआवज़ा देकर, सरकार के स्वामित्व और नियंत्रण में ले लेना। |
💡 आसान भाषा में: जो बैंक कल तक किसी सेठ या औद्योगिक घराने का था, वह आज से सरकार का हो गया — अब उसका मालिक, उसके नियम और उसका उद्देश्य सरकार तय करेगी। 🏠 उदाहरण: 1969 में 14 बैंक और 1980 में 6 बैंक; 1956 में जीवन बीमा; 1972–73 में सामान्य बीमा और कोयला खदानें। इसका उलटा "निजीकरण" है (खंड 11)। |
◆ रियासतों के विलय के समय राजाओं को वचन दिया गया था कि उन्हें हर वर्ष सरकारी ख़ज़ाने से एक निश्चित राशि — प्रिवी पर्स — और कुछ विशेषाधिकार मिलते रहेंगे (पिछला अध्याय)। इंदिरा का तर्क था कि समानता वाले गणराज्य में जन्म के आधार पर ऐसा विशेष भुगतान उचित नहीं। 1970 में इस संबंध का संशोधन विधेयक राज्यसभा में एक वोट की कमी से गिर गया, फिर राष्ट्रपति के आदेश से राजाओं की मान्यता समाप्त की गई, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने रद्द कर दिया। 1971 की भारी जीत के बाद 26वें संविधान संशोधन (1971) से प्रिवी पर्स और राजाओं के विशेषाधिकार अंतिम रूप से समाप्त कर दिए गए।
◆ एकाधिकार और प्रतिबंधात्मक व्यापार व्यवहार अधिनियम (1969) — इसका उद्देश्य था कि आर्थिक शक्ति कुछ बड़े औद्योगिक घरानों के हाथ में केंद्रित न हो। एक सीमा से बड़ी कंपनियों को विस्तार या नया कारख़ाना लगाने से पहले सरकार की विशेष अनुमति लेनी पड़ती थी। इससे "लाइसेंस-परमिट राज" और कड़ा हुआ, और 1991 में इसकी ये बाधाएँ हटा दी गईं।
◆ अन्य राष्ट्रीयकरण — 1972 में सामान्य बीमा और 1972–73 में कोयला खदानों का राष्ट्रीयकरण हुआ। 1973 में विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम बनाकर विदेशी कंपनियों पर कड़े नियंत्रण लगाए गए।
◆ न्यायपालिका से टकराव — संपत्ति के अधिकार और समाजवादी क़ानूनों को लेकर संसद और सर्वोच्च न्यायालय में खींचतान चली। 24 अप्रैल 1973 के केशवानंद भारती मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि संसद संविधान में संशोधन कर सकती है, पर उसके "मूल ढाँचे" को नहीं बदल सकती। इसके तुरंत बाद सरकार ने तीन वरिष्ठ न्यायाधीशों को छोड़कर कनिष्ठ न्यायाधीश को मुख्य न्यायाधीश बनाया, जिसे न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर आघात माना गया।
◆ समय से पहले चुनाव — अल्पमत सरकार चलाने के बजाय इंदिरा ने दिसंबर 1970 में लोकसभा भंग करा दी और मार्च 1971 में, तय समय से एक वर्ष पहले, चुनाव कराए। पहली बार लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव अलग-अलग हुए।
◆ दो नारे — कांग्रेस (ओ), जनसंघ, स्वतंत्र पार्टी और संयुक्त समाजवादी दल ने मिलकर "महागठबंधन" बनाया, जिसका एकमात्र कार्यक्रम था — "इंदिरा हटाओ"। इंदिरा ने उत्तर दिया — "वे कहते हैं इंदिरा हटाओ, मैं कहती हूँ ग़रीबी हटाओ।" यह नारा भूमिहीनों, दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों, महिलाओं और बेरोज़गार युवाओं के दिल को छू गया।
◆ परिणाम — कांग्रेस (आर) को 518 में से 352 सीटें मिलीं और महागठबंधन बुरी तरह हारा। इससे सिद्ध हो गया कि "असली कांग्रेस" इंदिरा की ही है। इसी जीत के बल पर प्रिवी पर्स समाप्त हुए और पाँचवीं योजना ग़रीबी उन्मूलन पर केंद्रित हुई।
◆ पाकिस्तान के दो हिस्सों का अंतर — पाकिस्तान के दो भाग थे, जिनके बीच लगभग 1,600 किलोमीटर भारतीय भूमि थी। पूर्वी पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश) की जनसंख्या अधिक थी और वह बांग्ला बोलती थी, पर सत्ता, सेना और धन पर पश्चिमी पाकिस्तान का नियंत्रण था। बांग्ला भाषा की उपेक्षा और आर्थिक शोषण से वहाँ गहरा असंतोष था।
◆ चुनाव का नतीजा न मानना — दिसंबर 1970 के आम चुनाव में शेख़ मुजीबुर रहमान की अवामी लीग ने पूर्वी पाकिस्तान की लगभग सारी सीटें जीतकर पूरे पाकिस्तान की संसद में स्पष्ट बहुमत पा लिया। पर सैनिक शासक जनरल याह्या ख़ाँ और पश्चिमी पाकिस्तान के नेता ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो ने मुजीब को सत्ता सौंपने से इनकार कर दिया।
◆ दमन और शरणार्थी — 25 मार्च 1971 की रात पाकिस्तानी सेना ने पूर्वी पाकिस्तान में भीषण दमन शुरू किया, मुजीब को गिरफ़्तार कर लिया गया और बड़े पैमाने पर नरसंहार हुआ। जान बचाकर लगभग एक करोड़ शरणार्थी भारत के पश्चिम बंगाल, असम, त्रिपुरा और मेघालय में आ गए। इतने लोगों को खिलाना और बसाना भारत की अर्थव्यवस्था पर असहनीय बोझ था, इसलिए यह भारत का अपना संकट बन गया।
◆ कूटनीतिक तैयारी — इंदिरा गांधी ने कई देशों की यात्रा करके दुनिया को इस संकट से अवगत कराया, पर अमेरिका (राष्ट्रपति निक्सन) और चीन पाकिस्तान के पक्ष में थे। इस घेराबंदी का उत्तर देने के लिए 9 अगस्त 1971 को भारत ने सोवियत संघ के साथ बीस वर्ष की शांति, मैत्री और सहयोग की संधि की, जिसके अनुसार किसी एक पर हमले का ख़तरा होने पर दोनों देश तुरंत आपसी परामर्श करेंगे। भारत ने बांग्ला स्वतंत्रता सेनानियों की सेना मुक्ति वाहिनी को प्रशिक्षण और सहायता भी दी।
◆ युद्ध की शुरुआत (3 दिसंबर) — 3 दिसंबर 1971 की शाम पाकिस्तान की वायुसेना ने पश्चिमी भारत के कई हवाई अड्डों पर हमला कर दिया। इसके साथ ही खुला युद्ध शुरू हुआ। 6 दिसंबर को भारत ने बांग्लादेश को स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता दे दी।
◆ पूर्व में तेज़ अभियान — थल सेनाध्यक्ष जनरल सैम मानेकशॉ की रणनीति थी कि पूर्व में बड़े नगरों की लड़ाई में उलझे बिना सीधे ढाका की ओर बढ़ा जाए। पूर्वी कमान के प्रमुख लेफ़्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के नेतृत्व में सेना, मुक्ति वाहिनी की मदद से, नदियों को पार करती हुई तेज़ी से ढाका पहुँच गई। नौसेना ने कराची बंदरगाह पर हमला किया (4 दिसंबर, जो आज नौसेना दिवस है) और वायुसेना ने पूर्व के आकाश पर पूरा नियंत्रण कर लिया।
◆ अमेरिकी दबाव — अमेरिका ने भारत को डराने के लिए अपना सातवाँ बेड़ा बंगाल की खाड़ी की ओर भेजा, पर सोवियत संघ के समर्थन और युद्ध के जल्दी समाप्त हो जाने से यह दबाव काम नहीं आया।
◆ आत्मसमर्पण (16 दिसंबर) — केवल तेरह दिन के युद्ध के बाद 16 दिसंबर 1971 को ढाका में पाकिस्तानी पूर्वी कमान के प्रमुख लेफ़्टिनेंट जनरल ए. ए. के. नियाज़ी ने जनरल अरोड़ा के सामने लगभग 93,000 सैनिकों के साथ आत्मसमर्पण किया। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद यह दुनिया का सबसे बड़ा सैन्य आत्मसमर्पण था। यह दिन विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है। अगले दिन भारत ने पश्चिमी मोर्चे पर एकतरफ़ा युद्धविराम कर दिया।
◆ बांग्लादेश का जन्म — दक्षिण एशिया का नक़्शा बदल गया; शेख़ मुजीब रिहा होकर नए राष्ट्र के नेता बने और शरणार्थी अपने घर लौट गए।
◆ भारत की प्रतिष्ठा — यह स्वतंत्र भारत की सबसे निर्णायक सैन्य विजय थी। भारत दक्षिण एशिया की सबसे बड़ी शक्ति के रूप में उभरा और 1962 का दाग़ धुल गया। इंदिरा गांधी की लोकप्रियता शिखर पर पहुँच गई; उनकी तुलना "दुर्गा" से की गई और उन्हें भारत रत्न (1971) मिला। जनरल मानेकशॉ 1973 में भारत के पहले फ़ील्ड मार्शल बने।
◆ द्वि-राष्ट्र सिद्धांत की हार — यह सिद्ध हो गया कि केवल धर्म किसी राष्ट्र को जोड़कर नहीं रख सकता; भाषा और संस्कृति का सम्मान तथा बराबरी की भागीदारी भी उतनी ही ज़रूरी है।
◆ आर्थिक क़ीमत — शरणार्थियों और युद्ध का ख़र्च, फिर सूखा और तेल संकट — इन सबसे 1972–74 में भारी महँगाई आई, जिसने आगे के राजनीतिक संकट की ज़मीन तैयार की (खंड 9)।
◆ कौन, कहाँ — युद्ध के बाद शिमला में इंदिरा गांधी और पाकिस्तान के नए राष्ट्रपति ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो के बीच वार्ता हुई और 2 जुलाई 1972 को समझौते पर हस्ताक्षर हुए।
◆ मुख्य प्रावधान — (1) दोनों देश अपने सभी विवाद द्विपक्षीय बातचीत से, शांतिपूर्ण ढंग से सुलझाएँगे — यानी किसी तीसरे देश या संस्था की मध्यस्थता के बिना। (2) जम्मू-कश्मीर में 17 दिसंबर 1971 के युद्धविराम के समय जो रेखा थी, उसे नियंत्रण रेखा माना जाएगा और कोई पक्ष उसे बलपूर्वक बदलने की कोशिश नहीं करेगा। (3) अंतरराष्ट्रीय सीमा पर दोनों सेनाएँ अपनी-अपनी ओर लौटेंगी; भारत ने पश्चिमी मोर्चे पर जीती हुई भूमि लौटा दी। (4) दोनों देश एक-दूसरे की क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करेंगे और शत्रुतापूर्ण प्रचार रोकेंगे।
◆ महत्त्व — भारत आज भी इसी समझौते के आधार पर कहता है कि कश्मीर सहित हर मुद्दा केवल द्विपक्षीय है और इसमें किसी बाहरी मध्यस्थ की जगह नहीं। 1949 की "युद्धविराम रेखा" अब "नियंत्रण रेखा" बन गई।
◆ आलोचना — आलोचकों का कहना है कि 93,000 युद्धबंदी और जीती हुई भूमि हाथ में होते हुए भी भारत कश्मीर समस्या का अंतिम समाधान नहीं करा सका। युद्धबंदी बाद के समझौतों के तहत लौटा दिए गए, और पाकिस्तान ने आगे चलकर नियंत्रण रेखा का सम्मान नहीं किया, जैसा कारगिल (1999) में दिखा।
◆ पृष्ठभूमि — चीन ने 1964 में परमाणु बम का परीक्षण कर लिया था और 1971 के युद्ध में अमेरिकी बेड़े की धमकी ने दिखा दिया था कि भारत को अपनी सुरक्षा के लिए ख़ुद सक्षम होना होगा। भारत का परमाणु कार्यक्रम डॉ. होमी जहाँगीर भाभा ने शुरू किया था।
◆ परीक्षण — 18 मई 1974 को राजस्थान के पोखरण में भारत ने पहला भूमिगत परमाणु परीक्षण किया। इसका गुप्त नाम "स्माइलिंग बुद्धा" (मुस्कुराते बुद्ध) था, क्योंकि उस दिन बुद्ध पूर्णिमा थी। इस दल का नेतृत्व वैज्ञानिक राजा रामन्ना ने किया और परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष होमी सेठना थे।
◆ भारत का रुख़ और परिणाम — भारत ने इसे "शांतिपूर्ण परमाणु विस्फोट" कहा और बम न बनाने की बात दोहराई। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पाँच स्थायी सदस्यों के बाहर भारत ऐसा परीक्षण करने वाला पहला देश बना। पर इसके बाद कनाडा और अमेरिका ने परमाणु सहयोग रोक दिया और परमाणु सामग्री के निर्यात पर नियंत्रण के लिए देशों का एक समूह बना। 24 वर्ष बाद 1998 में दूसरा परीक्षण हुआ (खंड 11)।
◆ सिक्किम का विलय (1975) — हिमालयी राज्य सिक्किम में राजा (चोग्याल) के शासन के विरुद्ध जन-आंदोलन हुआ और जनमत-संग्रह में जनता ने भारत में मिलने के पक्ष में मत दिया। 36वें संविधान संशोधन (1975) से सिक्किम भारत का 22वाँ राज्य बना।
◆ आर्यभट (1975) — 19 अप्रैल 1975 को भारत का पहला उपग्रह आर्यभट सोवियत संघ की सहायता से अंतरिक्ष में छोड़ा गया, जिससे भारत के अंतरिक्ष युग की शुरुआत हुई (विस्तार अगले अध्याय में)।
कब | क्या हुआ | महत्त्व |
6 जून 1966 | रुपये का लगभग 36.5% अवमूल्यन किया गया। | इसे अमेरिकी दबाव का परिणाम माना गया और इसकी कड़ी आलोचना हुई। |
1967 | चौथे आम चुनाव में कांग्रेस आठ राज्यों में बहुमत नहीं पा सकी और नक्सलबाड़ी विद्रोह हुआ। | "कांग्रेस प्रणाली" को पहला झटका लगा और गठबंधन तथा दल-बदल का दौर शुरू हुआ। |
19 जुलाई 1969 | 50 करोड़ रुपये से अधिक जमा वाले 14 निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण हुआ। | बैंक गाँवों तक पहुँचे और कृषि तथा छोटे उद्योगों को ऋण मिलने लगा। |
नवंबर 1969 | वी. वी. गिरि की जीत के बाद कांग्रेस दो भागों में बँट गई। | पार्टी और सरकार पर इंदिरा गांधी का पूरा नियंत्रण हो गया। |
मार्च 1971 | "ग़रीबी हटाओ" के नारे पर कांग्रेस (आर) ने 352 सीटें जीतीं। | इंदिरा को भारी जनादेश मिला और प्रिवी पर्स समाप्त किए गए। |
दिसंबर 1971 | तेरह दिन के युद्ध के बाद ढाका में पाकिस्तानी सेना ने आत्मसमर्पण किया। | बांग्लादेश बना और भारत दक्षिण एशिया की प्रमुख शक्ति के रूप में उभरा। |
2 जुलाई 1972 | इंदिरा गांधी और भुट्टो ने शिमला समझौते पर हस्ताक्षर किए। | विवादों को द्विपक्षीय बातचीत से सुलझाने और नियंत्रण रेखा का सम्मान करने पर सहमति बनी। |
18 मई 1974 | पोखरण में "स्माइलिंग बुद्धा" नाम से पहला परमाणु परीक्षण हुआ। | भारत परमाणु क्षमता वाला देश बना, पर उसने इसे शांतिपूर्ण विस्फोट कहा। |
1971 में इंदिरा गांधी लोकप्रियता के शिखर पर थीं, पर केवल चार वर्ष बाद देश में ऐसा राजनीतिक संकट आया कि 25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक, लगभग 21 महीने, आपातकाल लागू रहा। इसे भारतीय लोकतंत्र का सबसे कठिन दौर माना जाता है। इसे समझने के लिए पहले यह जानना ज़रूरी है कि संविधान में आपातकाल की व्यवस्था क्या है।
🔍 आसान परिभाषा: राष्ट्रीय आपातकाल (अनुच्छेद 352) |
📘 परिभाषा: संविधान की वह व्यवस्था, जिसके अंतर्गत राष्ट्रपति देश या उसके किसी भाग की सुरक्षा पर गंभीर संकट होने पर आपातकाल घोषित कर सकते हैं; इस दौरान केंद्र सरकार की शक्तियाँ बहुत बढ़ जाती हैं, वह राज्यों को निर्देश दे सकती है और नागरिकों के कुछ मौलिक अधिकार निलंबित किए जा सकते हैं। |
💡 आसान भाषा में: घर में आग लग जाए तो घर का मुखिया कुछ समय के लिए सारे फ़ैसले अकेले लेने लगता है और बाक़ी सबको बिना बहस उसकी बात माननी पड़ती है — संविधान ने ऐसी ही असाधारण शक्ति असाधारण संकट के लिए रखी है। 🏠 उदाहरण: भारत में राष्ट्रीय आपातकाल तीन बार लगा — 1962 में चीन के हमले पर, 1971 में पाकिस्तान से युद्ध पर और 1975 में "आंतरिक अशांति" के आधार पर। पहले दो बाहरी आक्रमण के कारण थे; केवल तीसरा आंतरिक कारण से लगा। |
◆ आर्थिक संकट — बांग्लादेश युद्ध और शरणार्थियों का ख़र्च, 1972–73 में मानसून की विफलता और 1973 का तेल संकट (अरब देशों ने कच्चे तेल के दाम कई गुना बढ़ा दिए) — इन सबसे 1973–74 में महँगाई बीस प्रतिशत से ऊपर चली गई। अनाज, तेल और रोज़मर्रा की चीज़ें महँगी हुईं और बेरोज़गारी बढ़ी। "ग़रीबी हटाओ" का वादा पूरा होता नहीं दिखा, इसलिए जनता में निराशा फैली।
◆ गुजरात का नवनिर्माण आंदोलन (1974) — जनवरी 1974 में अहमदाबाद के एक इंजीनियरिंग कॉलेज के छात्रों ने छात्रावास के भोजन का शुल्क बढ़ने पर विरोध शुरू किया। यह देखते-देखते महँगाई और भ्रष्टाचार के विरुद्ध पूरे गुजरात का आंदोलन बन गया। दबाव में मुख्यमंत्री को इस्तीफ़ा देना पड़ा और विधानसभा भंग कर दी गई। यह दिखा गया कि सड़क का आंदोलन एक चुनी हुई सरकार को गिरा सकता है।
◆ बिहार आंदोलन और "संपूर्ण क्रांति" — मार्च 1974 में बिहार के छात्रों ने महँगाई, बेरोज़गारी और भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलन छेड़ा। उन्होंने राजनीति से संन्यास ले चुके वयोवृद्ध गांधीवादी-समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण (जेपी) से नेतृत्व करने का आग्रह किया। जेपी ने दो शर्तों पर इसे स्वीकार किया — आंदोलन अहिंसक रहेगा और केवल बिहार तक सीमित नहीं रहेगा। 5 जून 1974 को पटना के गांधी मैदान में उन्होंने "संपूर्ण क्रांति" का आह्वान किया, जिसका अर्थ था — केवल सरकार बदलना नहीं, बल्कि राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, शैक्षिक और नैतिक — हर क्षेत्र में बदलाव। उन्हें "लोकनायक" कहा गया।
◆ रेल हड़ताल (मई 1974) — मज़दूर नेता जॉर्ज फ़र्नांडिस के नेतृत्व में लाखों रेल कर्मचारियों ने वेतन और बोनस की माँग पर लगभग तीन सप्ताह देशव्यापी हड़ताल की। सरकार ने इसे कठोरता से दबाया और हज़ारों कर्मचारी गिरफ़्तार हुए। इससे मज़दूर वर्ग भी सरकार से नाराज़ हो गया।
◆ इलाहाबाद उच्च न्यायालय का निर्णय (12 जून 1975) — 1971 के चुनाव में रायबरेली से इंदिरा गांधी से हारे समाजवादी नेता राजनारायण ने उनके चुनाव को अदालत में चुनौती दी थी। न्यायमूर्ति जगमोहनलाल सिन्हा ने उन्हें चुनाव में सरकारी तंत्र के दुरुपयोग (जैसे एक सरकारी अधिकारी से चुनाव-कार्य लेना और सभाओं के मंच बनवाने में सरकारी कर्मचारियों की मदद) का दोषी पाया, उनका चुनाव रद्द कर दिया और उन्हें छह वर्ष तक चुनाव लड़ने के अयोग्य ठहरा दिया। संयोग से उसी दिन गुजरात विधानसभा के चुनाव में भी कांग्रेस विपक्षी मोर्चे से हार गई।
◆ सर्वोच्च न्यायालय का सशर्त स्थगन (24 जून) — अपील पर सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति वी. आर. कृष्ण अय्यर ने केवल आंशिक राहत दी — अपील के निपटारे तक इंदिरा प्रधानमंत्री बनी रह सकती थीं, पर सांसद के रूप में संसद में वोट नहीं दे सकती थीं।
◆ रामलीला मैदान की रैली (25 जून) — विपक्ष ने इंदिरा से इस्तीफ़े की माँग की। 25 जून 1975 की शाम दिल्ली के रामलीला मैदान की विशाल रैली में जेपी ने देशव्यापी सत्याग्रह की घोषणा की और सेना, पुलिस तथा सरकारी कर्मचारियों से कहा कि वे सरकार के "अवैध और अनैतिक" आदेश न मानें। इसी सभा में कवि रामधारी सिंह दिनकर की पंक्ति गूँजी — "सिंहासन ख़ाली करो कि जनता आती है।" सरकार ने इसे सेना को विद्रोह के लिए उकसाना बताया।
◆ कैसे लगा — 25 जून 1975 की रात प्रधानमंत्री की सलाह पर राष्ट्रपति फ़ख़रुद्दीन अली अहमद ने अनुच्छेद 352 के अंतर्गत "आंतरिक अशांति" के आधार पर आपातकाल की घोषणा पर हस्ताक्षर कर दिए। मंत्रिमंडल को इसकी जानकारी अगली सुबह, 26 जून को दी गई — यानी निर्णय पहले हो गया, मंत्रिमंडल की बैठक बाद में हुई। उसी सुबह इंदिरा गांधी ने रेडियो पर देश को इसकी सूचना दी।
◆ सरकार का तर्क — सरकार ने कहा कि विपक्ष लोकतांत्रिक ढंग से चुनी हुई सरकार को आंदोलन, हड़ताल और घेराव से काम नहीं करने दे रहा, सेना-पुलिस को भड़का रहा है और देश में अराजकता फैलाने का षड्यंत्र चल रहा है, इसलिए कठोर क़दम ज़रूरी है। विपक्ष का तर्क था कि प्रधानमंत्री ने अदालत के फ़ैसले के बाद अपनी कुर्सी बचाने के लिए आपातकाल लगाया।
◆ ध्यान देने योग्य बात — उस समय 1971 के युद्ध के कारण लगा बाहरी आक्रमण वाला आपातकाल पहले से चल रहा था। 1975 में उसके ऊपर दूसरा, आंतरिक आपातकाल लगाया गया।
🔍 आसान परिभाषा: "आंतरिक अशांति" और "सशस्त्र विद्रोह" |
📘 परिभाषा: मूल संविधान के अनुच्छेद 352 में आपातकाल के तीन आधार थे — युद्ध, बाहरी आक्रमण और "आंतरिक अशांति"। "आंतरिक अशांति" एक अस्पष्ट और बहुत व्यापक शब्द था। 44वें संशोधन (1978) ने इसे हटाकर "सशस्त्र विद्रोह" कर दिया, जिसका अर्थ है — हथियार उठाकर राज्य के विरुद्ध किया गया संगठित विद्रोह। |
💡 आसान भाषा में: "अशांति" तो किसी भी हड़ताल, धरने या बड़े जुलूस को कहा जा सकता है; पर "सशस्त्र विद्रोह" तभी कहा जाएगा जब लोग सचमुच बंदूक़ उठाकर सरकार से लड़ने लगें। यानी अब केवल आंदोलन का बहाना बनाकर आपातकाल नहीं लगाया जा सकता। 🏠 उदाहरण: 1975 में विपक्ष के शांतिपूर्ण आंदोलन और रैलियों को "आंतरिक अशांति" बताकर आपातकाल लगाया गया था; आज के नियम में यह संभव नहीं होता। |
◆ विपक्षी नेताओं की गिरफ़्तारी — घोषणा की रात ही जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, चरण सिंह, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी सहित लगभग सभी प्रमुख विपक्षी नेता गिरफ़्तार कर लिए गए। कांग्रेस के भीतर के असहमत नेता, जैसे चंद्रशेखर, भी जेल भेजे गए। इसके लिए आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था अधिनियम (जिसे संक्षेप में "मीसा" कहा जाता था) का उपयोग हुआ, जिसमें किसी को भी बिना मुक़दमा चलाए बंदी बनाया जा सकता था। पूरे दौर में एक लाख से अधिक लोग जेलों में डाले गए।
◆ समाचार पत्रों पर सेंसरशिप — घोषणा की रात दिल्ली के बड़े अख़बारों के दफ़्तरों की बिजली काट दी गई, ताकि अगली सुबह अख़बार न छप सकें। इसके बाद हर ख़बर छापने से पहले सरकारी अधिकारी से स्वीकृति लेना अनिवार्य कर दिया गया। कुछ अख़बारों ने विरोध में अपना संपादकीय स्थान ख़ाली छोड़ दिया। आकाशवाणी और दूरदर्शन सरकार के प्रचार का माध्यम बन गए।
◆ मौलिक अधिकारों का निलंबन — नागरिकों का यह अधिकार निलंबित कर दिया गया कि वे अपने मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए अदालत जा सकें। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और जमात-ए-इस्लामी सहित कई संगठनों पर प्रतिबंध लगा। हड़तालों पर रोक लगी।
◆ जबलपुर का ए.डी.एम. मामला (अप्रैल 1976) — कई उच्च न्यायालयों ने कहा था कि आपातकाल में भी बंदी अपनी गिरफ़्तारी को चुनौती दे सकता है। पर सर्वोच्च न्यायालय ने चार के मुक़ाबले एक के बहुमत से निर्णय दिया कि आपातकाल के दौरान कोई व्यक्ति अपनी ग़ैरक़ानूनी गिरफ़्तारी के विरुद्ध, यहाँ तक कि जीवन के अधिकार के लिए भी, अदालत नहीं जा सकता। अकेले न्यायमूर्ति एच. आर. खन्ना ने असहमति जताई और कहा कि जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार संविधान की देन नहीं, मनुष्य का स्वाभाविक अधिकार है। इसकी क़ीमत उन्हें चुकानी पड़ी — वरिष्ठ होने पर भी उन्हें मुख्य न्यायाधीश नहीं बनाया गया। इस निर्णय को न्यायपालिका के इतिहास का सबसे कमज़ोर क्षण माना जाता है।
◆ 20 सूत्री कार्यक्रम (1 जुलाई 1975) — इंदिरा गांधी ने ग़रीबों के लिए बीस सूत्री आर्थिक कार्यक्रम घोषित किया — जैसे महँगाई पर रोक, भूमि-हदबंदी क़ानूनों को लागू करना, भूमिहीनों को आवास-भूमि, बंधुआ मज़दूरी की समाप्ति, ग्रामीण ऋण से मुक्ति और कर-चोरी तथा तस्करी पर कार्रवाई। शुरुआती महीनों में रेलगाड़ियाँ समय पर चलीं, दफ़्तरों में अनुशासन आया और क़ीमतें कुछ स्थिर हुईं; इसी कारण कुछ लोगों ने इसे "अनुशासन पर्व" भी कहा।
◆ संजय गांधी और ज़्यादतियाँ — प्रधानमंत्री के छोटे पुत्र संजय गांधी के पास कोई संवैधानिक पद नहीं था, फिर भी वे सत्ता का समानांतर केंद्र बन गए। उनका पाँच सूत्री कार्यक्रम था — परिवार नियोजन, वृक्षारोपण, दहेज-प्रथा का विरोध, प्रौढ़ साक्षरता और जाति-प्रथा की समाप्ति। उद्देश्य अच्छे थे, पर अमल ज़बरदस्ती से हुआ। परिवार नियोजन के नाम पर अधिकारियों को लक्ष्य दे दिए गए और उत्तर भारत में लाखों ग़रीबों की जबरन नसबंदी की गई। दिल्ली को "सुंदर" बनाने के नाम पर झुग्गियाँ बुलडोज़रों से तोड़ी गईं; अप्रैल 1976 में पुरानी दिल्ली के तुर्कमान गेट पर विरोध कर रहे लोगों पर पुलिस ने गोली चलाई, जिसमें कई लोग मारे गए।
⚠️ आपातकाल के विरुद्ध और पक्ष में तर्क पक्ष में (सरकार का तर्क): बार-बार के आंदोलन, हड़तालें और घेराव शासन को ठप कर रहे थे; सेना-पुलिस को आदेश न मानने के लिए उकसाना ख़तरनाक था; 20 सूत्री कार्यक्रम से ग़रीबों को लाभ और प्रशासन में अनुशासन आया। विरुद्ध (आलोचकों का तर्क): आंदोलन अधिकांशतः शांतिपूर्ण थे और उनसे निपटने के लिए सामान्य क़ानून पर्याप्त थे; असली कारण अदालत का निर्णय और कुर्सी बचाना था; बिना मुक़दमे के गिरफ़्तारी, सेंसरशिप, जबरन नसबंदी और संविधान से छेड़छाड़ लोकतंत्र पर सीधा आघात थे। |
आपातकाल के दौरान, जब अधिकांश विपक्षी सांसद जेल में थे, संसद ने कई संशोधन पारित किए। 38वें संशोधन ने आपातकाल की घोषणा को अदालत की समीक्षा से बाहर कर दिया और 39वें संशोधन (1975) ने प्रधानमंत्री के चुनाव को अदालत में चुनौती देने का रास्ता बंद करने की कोशिश की। पर सबसे व्यापक था 42वाँ संशोधन (1976), जिसने संविधान में इतने अधिक बदलाव किए कि इसे "लघु संविधान" कहा जाता है। इसके मुख्य बदलाव ये थे:
1. प्रस्तावना में तीन शब्द जुड़े — "संप्रभु लोकतंत्रात्मक गणराज्य" की जगह "संप्रभु समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य" लिखा गया, और "राष्ट्र की एकता" की जगह "राष्ट्र की एकता और अखंडता"। यानी "समाजवादी", "पंथनिरपेक्ष" और "अखंडता" — ये तीन शब्द जोड़े गए।
2. मौलिक कर्तव्य जोड़े गए — सरदार स्वर्ण सिंह समिति की सिफ़ारिश पर नया भाग 4-क और अनुच्छेद 51-क जोड़कर नागरिकों के दस मौलिक कर्तव्य लिखे गए — जैसे संविधान, राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान का सम्मान, देश की रक्षा, भाईचारा, पर्यावरण की रक्षा और वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास। (ग्यारहवाँ कर्तव्य 2002 में जुड़ा।)
3. नीति निदेशक तत्त्वों को मौलिक अधिकारों से ऊपर रखा गया — कहा गया कि किसी भी निदेशक तत्त्व को लागू करने के लिए बना क़ानून इस आधार पर रद्द नहीं होगा कि वह समानता या स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन करता है।
4. न्यायपालिका की शक्ति घटाई गई — संसद की संविधान-संशोधन की शक्ति को असीमित घोषित किया गया और कहा गया कि किसी भी संशोधन को किसी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती। उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय के क़ानूनों की वैधता जाँचने के अधिकार पर भी कई बंदिशें लगाई गईं।
5. लोकसभा और विधानसभाओं का कार्यकाल पाँच वर्ष से बढ़ाकर छह वर्ष कर दिया गया।
6. राष्ट्रपति को मंत्रिपरिषद की सलाह मानने के लिए बाध्य कर दिया गया।
7. पाँच विषय राज्य सूची से समवर्ती सूची में गए — शिक्षा, वन, वन्य जीवों और पक्षियों का संरक्षण, नाप-तौल और न्याय का प्रशासन। इससे इन विषयों पर केंद्र की शक्ति बढ़ी।
8. अन्य बदलाव — नए निदेशक तत्त्व जोड़े गए (ग़रीबों को निःशुल्क क़ानूनी सहायता, उद्योगों के प्रबंध में मज़दूरों की भागीदारी, पर्यावरण और वनों की रक्षा); प्रशासनिक अधिकरणों की व्यवस्था हुई; और लोकसभा तथा विधानसभाओं की सीटों की संख्या 1971 की जनगणना के आधार पर स्थिर कर दी गई।
◆ आगे क्या हुआ — इनमें से लोकतंत्र-विरोधी माने गए अधिकांश प्रावधान जनता सरकार ने 43वें और 44वें संशोधन से हटा दिए। संसद की "असीमित" संशोधन-शक्ति और निदेशक तत्त्वों को पूरी तरह ऊपर रखने वाले प्रावधान सर्वोच्च न्यायालय ने मिनर्वा मिल्स मामले (1980) में रद्द कर दिए। पर प्रस्तावना के तीन शब्द, मौलिक कर्तव्य और समवर्ती सूची में गए विषय आज भी संविधान में हैं।
◆ चुनाव की घोषणा — 18 जनवरी 1977 को इंदिरा गांधी ने अचानक लोकसभा चुनाव कराने की घोषणा कर दी और नेताओं को रिहा कर दिया। संभवतः उन्हें ख़ुफ़िया रिपोर्टों से जीत का भरोसा था और वे अपने शासन को जनता की मुहर से वैध बनाना चाहती थीं।
◆ जनता पार्टी का गठन — जेल से छूटे नेताओं ने कुछ ही दिनों में चार दलों — कांग्रेस (संगठन), भारतीय जनसंघ, भारतीय लोक दल और सोशलिस्ट पार्टी — को मिलाकर 23 जनवरी 1977 को जनता पार्टी बना ली। जेपी इसके मार्गदर्शक थे। फ़रवरी में वरिष्ठ दलित नेता और केंद्रीय मंत्री जगजीवन राम ने कांग्रेस छोड़कर "कांग्रेस फ़ॉर डेमोक्रेसी" बनाई और जनता पार्टी के साथ मिलकर चुनाव लड़ा। विपक्ष का नारा था — "लोकतंत्र या तानाशाही"।
◆ परिणाम (मार्च 1977) — जनता पार्टी और उसके सहयोगियों को 542 में से लगभग 330 सीटें मिलीं, जिनमें अकेले जनता पार्टी की 295 थीं। कांग्रेस 154 सीटों पर सिमट गई। इंदिरा गांधी स्वयं रायबरेली से राजनारायण से और संजय गांधी अमेठी से चुनाव हार गए। उत्तर भारत में, जहाँ नसबंदी और ज़्यादतियाँ सबसे अधिक हुई थीं, कांग्रेस का लगभग सफ़ाया हो गया; पर दक्षिण भारत में, जहाँ आपातकाल का असर कम था, कांग्रेस ने अच्छा प्रदर्शन किया।
◆ आपातकाल की समाप्ति — हार के बाद 21 मार्च 1977 को आपातकाल औपचारिक रूप से हटा लिया गया। इंदिरा गांधी ने शांतिपूर्वक पद छोड़ दिया। इस प्रकार जिस आपातकाल को हटाने के लिए न कोई विद्रोह हुआ, न सेना आई — उसे साधारण मतदाता ने वोट से समाप्त किया।
◆ पहली ग़ैर-कांग्रेसी सरकार — 24 मार्च 1977 को मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने। वे उस समय 81 वर्ष के थे। यह केंद्र में पहली ग़ैर-कांग्रेसी सरकार थी — आज़ादी के तीस वर्ष बाद पहली बार केंद्र में सत्ता बदली। चरण सिंह गृह मंत्री, जगजीवन राम रक्षा मंत्री, अटल बिहारी वाजपेयी विदेश मंत्री और लालकृष्ण आडवाणी सूचना-प्रसारण मंत्री बने। जुलाई 1977 में नीलम संजीव रेड्डी निर्विरोध राष्ट्रपति चुने गए।
◆ शाह आयोग — आपातकाल की ज़्यादतियों की जाँच के लिए सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश जे. सी. शाह की अध्यक्षता में आयोग बना। उसकी रिपोर्टों में मनमानी गिरफ़्तारियों, सेंसरशिप, जबरन नसबंदी और झुग्गी-तोड़ अभियान का ब्योरा दर्ज हुआ।
◆ अन्य क़दम — सरकार ने प्रेस की स्वतंत्रता बहाल की और "मीसा" समाप्त किया; पाँचवीं योजना को एक वर्ष पहले समाप्त करके अनवरत योजना शुरू की (खंड 3.5); पंचायती राज पर अशोक मेहता समिति बनाई (खंड 4.3); पिछड़े वर्गों के लिए मंडल आयोग गठित किया (खंड 10.6); "काम के बदले अनाज" कार्यक्रम चलाया; जनवरी 1978 में एक हज़ार, पाँच हज़ार और दस हज़ार रुपये के नोट बंद किए; और विदेश नीति में दोनों महाशक्तियों से संतुलित संबंध की "सच्ची गुटनिरपेक्षता" की बात कही। विदेश मंत्री वाजपेयी ने 1977 में संयुक्त राष्ट्र महासभा में पहली बार हिंदी में भाषण दिया।
जनता सरकार की सबसे स्थायी देन 44वाँ संविधान संशोधन है। इसका उद्देश्य था कि भविष्य में कोई भी सरकार 1975 जैसा दुरुपयोग न कर सके। इसके मुख्य बदलाव ये हैं:
1. आपातकाल का आधार बदला — अनुच्छेद 352 में "आंतरिक अशांति" की जगह "सशस्त्र विद्रोह" शब्द रखा गया। अब आपातकाल केवल युद्ध, बाहरी आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह पर ही लग सकता है।
2. मंत्रिमंडल की लिखित सलाह अनिवार्य — राष्ट्रपति आपातकाल तभी घोषित करेंगे जब पूरा मंत्रिमंडल लिखित में इसकी सिफ़ारिश करे; अकेले प्रधानमंत्री की सलाह पर्याप्त नहीं होगी, जैसा 1975 में हुआ था।
3. संसद की कड़ी निगरानी — घोषणा को एक महीने के भीतर संसद के दोनों सदनों से विशेष बहुमत से पारित कराना होगा (पहले यह अवधि दो महीने थी और साधारण बहुमत काफ़ी था)। एक बार की स्वीकृति केवल छह महीने चलेगी, और लोकसभा साधारण बहुमत से आपातकाल हटाने का प्रस्ताव पारित कर सकती है।
4. जीवन का अधिकार अब कभी निलंबित नहीं — अनुच्छेद 20 (अपराधों के लिए दोषसिद्धि में संरक्षण) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) आपातकाल में भी निलंबित नहीं किए जा सकते। इस प्रकार जबलपुर के ए.डी.एम. मामले जैसी स्थिति दोबारा नहीं आ सकती।
5. संपत्ति का अधिकार मौलिक अधिकार नहीं रहा — इसे मौलिक अधिकारों की सूची से हटाकर अनुच्छेद 300-क के अंतर्गत केवल क़ानूनी (संवैधानिक) अधिकार बना दिया गया। इससे भूमि सुधार जैसे क़ानूनों की राह की पुरानी बाधा हटी।
6. कार्यकाल फिर पाँच वर्ष — लोकसभा और विधानसभाओं का कार्यकाल छह से घटाकर फिर पाँच वर्ष किया गया।
7. राष्ट्रपति को पुनर्विचार का अधिकार — राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद की सलाह को एक बार पुनर्विचार के लिए लौटा सकते हैं; दोबारा वही सलाह आने पर उसे मानना होगा।
8. न्यायपालिका की शक्तियाँ बहाल — सर्वोच्च और उच्च न्यायालयों के वे अधिकार लौटाए गए, जो 42वें संशोधन ने घटाए थे, और प्रधानमंत्री के चुनाव को अदालत की जाँच से बाहर रखने वाला प्रावधान हटाया गया।
विषय | 42वाँ संशोधन (1976) — इंदिरा सरकार | 44वाँ संशोधन (1978) — जनता सरकार |
आपातकाल का आधार | आधार "आंतरिक अशांति" ही बना रहा और घोषणा को अदालत की जाँच से बाहर रखा गया। | "आंतरिक अशांति" की जगह "सशस्त्र विद्रोह" रखा गया और मंत्रिमंडल की लिखित सलाह अनिवार्य हुई। |
सदनों का कार्यकाल | लोकसभा और विधानसभाओं का कार्यकाल पाँच से बढ़ाकर छह वर्ष किया गया। | कार्यकाल फिर से पाँच वर्ष कर दिया गया। |
मौलिक अधिकार | निदेशक तत्त्वों को मौलिक अधिकारों से ऊपर रखा गया। | अनुच्छेद 20 और 21 को आपातकाल में भी निलंबित न करने की गारंटी दी गई। |
संपत्ति का अधिकार | यह मौलिक अधिकार बना रहा। | इसे मौलिक अधिकारों से हटाकर अनुच्छेद 300-क में क़ानूनी अधिकार बनाया गया। |
राष्ट्रपति | राष्ट्रपति को मंत्रिपरिषद की सलाह मानने के लिए बाध्य किया गया। | राष्ट्रपति को सलाह एक बार पुनर्विचार के लिए लौटाने का अधिकार मिला। |
न्यायपालिका | न्यायिक समीक्षा की शक्ति पर कई बंदिशें लगाई गईं। | न्यायालयों की घटाई गई शक्तियाँ बहाल की गईं। |
स्थायी देन | प्रस्तावना में "समाजवादी", "पंथनिरपेक्ष" और "अखंडता" शब्द तथा दस मौलिक कर्तव्य जुड़े। | आपातकाल के दुरुपयोग के विरुद्ध मज़बूत संवैधानिक सुरक्षा बनी। |
◆ आपसी खींचतान — जनता पार्टी अलग-अलग विचारधाराओं के दलों का जोड़ थी, जिन्हें केवल आपातकाल के विरोध ने जोड़ा था। सत्ता मिलते ही तीन बड़े नेताओं — मोरारजी देसाई, चरण सिंह और जगजीवन राम — में प्रधानमंत्री पद की होड़ शुरू हो गई। सरकार के पास कोई साझा आर्थिक कार्यक्रम नहीं था, और इंदिरा गांधी के विरुद्ध की गई कार्रवाइयाँ (जैसे उनकी गिरफ़्तारी) जनता को बदले की भावना जैसी लगीं।
◆ "दोहरी सदस्यता" का विवाद — समाजवादी धड़े ने माँग की कि जनसंघ से आए सदस्य या तो जनता पार्टी में रहें या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में — दोनों की सदस्यता एक साथ नहीं चलेगी। इस प्रश्न पर पार्टी टूट गई।
◆ चरण सिंह की सरकार — बहुमत खोने पर जुलाई 1979 में मोरारजी देसाई ने इस्तीफ़ा दे दिया। 28 जुलाई 1979 को चौधरी चरण सिंह कांग्रेस (इंदिरा) के बाहरी समर्थन से प्रधानमंत्री बने, पर संसद में बहुमत सिद्ध करने से पहले ही कांग्रेस ने समर्थन वापस ले लिया। वे संसद का सामना किए बिना इस्तीफ़ा देने वाले अकेले प्रधानमंत्री रहे। इसी बीच 8 अक्टूबर 1979 को जेपी का निधन हो गया।
◆ 1980 का चुनाव — जनवरी 1980 के मध्यावधि चुनाव में इंदिरा गांधी ने नारा दिया — "ऐसी सरकार चुनिए जो चल सके।" कांग्रेस (इंदिरा) को 353 सीटें मिलीं और 14 जनवरी 1980 को इंदिरा गांधी फिर प्रधानमंत्री बन गईं।
💡 आपातकाल का सबक़ आपातकाल ने दिखाया कि लोकतंत्र की रक्षा केवल संविधान की किताब से नहीं होती — उसके लिए सजग जनता, स्वतंत्र न्यायपालिका और स्वतंत्र प्रेस चाहिए। 1977 में ग़रीब और कम पढ़े-लिखे माने जाने वाले मतदाता ने शांतिपूर्ण ढंग से सत्ता बदलकर सिद्ध किया कि उसके लिए स्वतंत्रता भी उतनी ही क़ीमती है जितनी रोटी। और 1980 में उसी मतदाता ने अस्थिर सरकार को भी नकार दिया। |
1980 का दशक उथल-पुथल से भरा था। एक ओर पंजाब, असम और श्रीलंका जैसे संकट थे और दो प्रधानमंत्रियों की हत्या का आघात; दूसरी ओर कंप्यूटर, दूरसंचार और नई आर्थिक सोच की शुरुआत थी। इस दशक की घटनाएँ यहाँ क्रम से दी गई हैं।
◆ शुरुआती घटनाएँ — सत्ता में लौटते ही 15 अप्रैल 1980 को छह और बैंकों का राष्ट्रीयकरण हुआ। 6 अप्रैल 1980 को पुराने जनसंघ के नेताओं ने जनता पार्टी से अलग होकर भारतीय जनता पार्टी बनाई, जिसके पहले अध्यक्ष अटल बिहारी वाजपेयी थे। 23 जून 1980 को संजय गांधी की दिल्ली में विमान दुर्घटना में मृत्यु हो गई, जिसके बाद इंदिरा के बड़े पुत्र राजीव गांधी, जो विमान चालक थे, राजनीति में आए।
◆ उपलब्धियाँ — छठी योजना में ग़रीबी-उन्मूलन के सीधे कार्यक्रम चले (खंड 3.5)। 1982 में दिल्ली में नौवें एशियाई खेल हुए और इसी के साथ देश में रंगीन टेलीविज़न का प्रसारण शुरू हुआ। मार्च 1983 में नई दिल्ली में गुटनिरपेक्ष शिखर सम्मेलन हुआ। अप्रैल 1984 में राकेश शर्मा अंतरिक्ष में जाने वाले पहले भारतीय बने और उसी महीने सेना ने "ऑपरेशन मेघदूत" से सियाचिन हिमनद पर नियंत्रण किया।
◆ पृष्ठभूमि — 1966 में भाषा के आधार पर पंजाब का पुनर्गठन हुआ, पर कुछ प्रश्न अनसुलझे रहे — चंडीगढ़ किसे मिले, पंजाबी-भाषी कुछ क्षेत्र और नदियों के पानी का बँटवारा। अकाली दल ने 1973 के आनंदपुर साहिब प्रस्ताव में राज्यों को अधिक स्वायत्तता देने की माँग रखी थी। 1980 के दशक की शुरुआत में ये माँगें आंदोलन बनीं।
◆ उग्रवाद का उदय — इसी दौर में जरनैल सिंह भिंडरावाले के नेतृत्व में एक उग्र धड़ा उभरा, जिसने अलग राष्ट्र "ख़ालिस्तान" की बात उठाई। हत्याओं और हिंसा का दौर चला। भिंडरावाले और उसके हथियारबंद साथियों ने अमृतसर के स्वर्ण मंदिर परिसर को अपना ठिकाना बना लिया और वहाँ हथियार जमा कर लिए। आलोचकों के अनुसार शुरुआती वर्षों में अकाली दल को कमज़ोर करने की दलगत राजनीति ने भी इस धड़े को बढ़ने दिया।
◆ ऑपरेशन ब्लू स्टार (जून 1984) — बातचीत विफल होने पर सरकार ने सेना को स्वर्ण मंदिर परिसर से उग्रवादियों को निकालने का आदेश दिया। जून 1984 के पहले सप्ताह में हुई इस कार्रवाई में भिंडरावाले मारा गया, पर सैनिकों, उग्रवादियों और निर्दोष श्रद्धालुओं सहित बड़ी संख्या में लोग मरे और सिखों के सर्वोच्च धार्मिक स्थल अकाल तख़्त को भारी क्षति पहुँची।
◆ परिणाम — सैन्य दृष्टि से कार्रवाई सफल रही, पर पवित्र स्थल में सेना के प्रवेश से देश-विदेश के सिखों की भावनाएँ गहरे आहत हुईं। इसका परिणाम यह हुआ कि उग्रवाद ख़त्म होने के बजाय अगले कई वर्षों तक और बढ़ा।
◆ हत्या (31 अक्टूबर 1984) — ऑपरेशन ब्लू स्टार के लगभग पाँच महीने बाद 31 अक्टूबर 1984 की सुबह नई दिल्ली में अपने निवास पर इंदिरा गांधी की उनके ही दो सिख अंगरक्षकों ने गोली मारकर हत्या कर दी। उसी शाम राजीव गांधी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली; चालीस वर्ष की आयु में वे भारत के सबसे युवा प्रधानमंत्री बने।
◆ सिख-विरोधी हिंसा — हत्या के बाद दिल्ली, कानपुर, बोकारो और कई अन्य नगरों में भीड़ ने निर्दोष सिखों पर हमले किए। अकेले दिल्ली में हज़ारों सिख मारे गए और उनके घर-दुकानें जलाई गईं। प्रशासन और पुलिस कई दिनों तक हिंसा रोकने में विफल रहे, और पीड़ितों को न्याय मिलने में दशकों लग गए। यह स्वतंत्र भारत के इतिहास के सबसे दुखद अध्यायों में है।
◆ भोपाल गैस त्रासदी (2–3 दिसंबर 1984) — मध्य प्रदेश के भोपाल में अमेरिकी कंपनी यूनियन कार्बाइड के कीटनाशक कारख़ाने से रात में मिथाइल आइसोसाइनेट नामक ज़हरीली गैस रिस गई। सोते हुए हज़ारों लोग मारे गए और लाखों लोग जीवन भर के लिए बीमार हो गए। यह दुनिया की सबसे भीषण औद्योगिक दुर्घटनाओं में गिनी जाती है। इसी के बाद पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 बना।
◆ आठवाँ आम चुनाव (दिसंबर 1984) — सहानुभूति की लहर में कांग्रेस को लोकसभा में 400 से अधिक सीटें मिलीं — यह किसी भी दल को अब तक मिला सबसे बड़ा बहुमत है। विपक्ष इतना बिखर गया कि आंध्र प्रदेश का क्षेत्रीय दल तेलुगु देशम लोकसभा में सबसे बड़ा विपक्षी दल बना, और भारतीय जनता पार्टी को केवल दो सीटें मिलीं।
राजीव गांधी युवा थे, उनकी छवि साफ़-सुथरी थी और वे भारत को "इक्कीसवीं सदी में ले जाने" की बात करते थे। उनके पहले दो-तीन वर्ष समझौतों और सुधारों के रहे।
◆ पंजाब समझौता (24 जुलाई 1985) — राजीव गांधी और अकाली दल के अध्यक्ष संत हरचंद सिंह लोंगोवाल के बीच समझौता हुआ, जिसमें चंडीगढ़ पंजाब को देने, बदले में कुछ हिंदी-भाषी क्षेत्र हरियाणा को देने और नदी-जल का बँटवारा एक न्यायाधिकरण से कराने की बात थी। पर एक महीने के भीतर उग्रवादियों ने लोंगोवाल की हत्या कर दी और समझौता पूरी तरह लागू नहीं हो सका। पंजाब में शांति 1990 के दशक के पहले वर्षों में ही लौट पाई।
◆ असम समझौता (15 अगस्त 1985) — असम में 1979 से अखिल असम छात्र संघ के नेतृत्व में आंदोलन चल रहा था। उसकी माँग थी कि बांग्लादेश से अवैध रूप से आए "विदेशियों" की पहचान करके उन्हें बाहर निकाला जाए, क्योंकि उनसे असम की भाषा, संस्कृति और राजनीति पर संकट था। समझौते में तय हुआ कि 25 मार्च 1971 के बाद आए लोगों को विदेशी मानकर वापस भेजा जाएगा। इसके बाद छात्र नेताओं ने असम गण परिषद बनाई, जो चुनाव जीत गई, और छात्र नेता प्रफुल्ल कुमार महंत देश के सबसे युवा मुख्यमंत्री बने।
◆ मिज़ो समझौता (30 जून 1986) — मिज़ो पहाड़ियों में 1959 के भीषण अकाल के समय सरकार की उपेक्षा से नाराज़ होकर लालडेंगा के नेतृत्व में मिज़ो नेशनल फ़्रंट ने 1966 से अलगाववादी सशस्त्र संघर्ष छेड़ रखा था। बीस वर्ष बाद समझौता हुआ — मिज़ो नेशनल फ़्रंट ने हथियार डाले, मिज़ोरम को 1987 में पूर्ण राज्य का दर्जा मिला और लालडेंगा मुख्यमंत्री बने। इसे भारत के सबसे सफल शांति समझौतों में गिना जाता है। 1987 में ही अरुणाचल प्रदेश और गोवा भी पूर्ण राज्य बने।
◆ दल-बदल विरोधी क़ानून (1985) — 52वें संविधान संशोधन से संविधान में दसवीं अनुसूची जोड़ी गई। इसके अनुसार कोई सांसद या विधायक यदि स्वेच्छा से अपना दल छोड़ दे या सदन में दल के निर्देश (व्हिप) के विरुद्ध मतदान करे, तो उसकी सदस्यता समाप्त की जा सकती है। निर्णय सदन के अध्यक्ष या सभापति करते हैं। उस समय एक-तिहाई सदस्यों के एक साथ अलग होने को "विभाजन" मानकर छूट दी गई थी, जिसे 2003 में 91वें संशोधन से हटा दिया गया। इससे "आया राम, गया राम" की प्रवृत्ति पर बड़ी हद तक रोक लगी।
◆ राष्ट्रीय शिक्षा नीति (1986) — इसमें सबके लिए प्राथमिक शिक्षा, प्राथमिक विद्यालयों में न्यूनतम सुविधाएँ देने के लिए "ऑपरेशन ब्लैकबोर्ड", ग्रामीण प्रतिभाशाली बच्चों के लिए हर ज़िले में आवासीय नवोदय विद्यालय और दूर-शिक्षा के लिए खुले विश्वविद्यालय पर बल दिया गया।
◆ दूरसंचार और कंप्यूटर क्रांति — राजीव ने अमेरिका से लौटे इंजीनियर सैम पित्रोदा को सलाहकार बनाया। 1984 में बने "सी-डॉट" (टेलीमैटिक्स विकास केंद्र) ने भारतीय परिस्थितियों के लिए सस्ते टेलीफ़ोन एक्सचेंज बनाए और गाँव-क़स्बों में पीले रंग के सार्वजनिक टेलीफ़ोन बूथ खुल गए, जिनसे आम आदमी दूसरे नगर में सीधे बात कर सकता था। रेल आरक्षण और बैंकों में कंप्यूटर आए; कंप्यूटर और इलेक्ट्रॉनिक सामान पर आयात शुल्क घटाया गया। पेयजल, साक्षरता, टीकाकरण, तिलहन, दूरसंचार और दूध उत्पादन के लिए छह प्रौद्योगिकी मिशन बने। यहीं से आगे की सूचना प्रौद्योगिकी क्रांति की नींव पड़ी।
◆ अन्य क़दम — 61वें संशोधन (1988 में पारित, 1989 में लागू) से मतदान की आयु 21 से घटाकर 18 वर्ष की गई, जिससे करोड़ों युवा मतदाता बने। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम (1986) बना। पंचायतों को संवैधानिक दर्जा देने का 64वाँ संशोधन विधेयक (1989) राज्यसभा में गिर गया (खंड 4.3)। उद्योगों के लाइसेंस और आयात के नियमों में कुछ ढील दी गई, जिसे 1991 के सुधारों की भूमिका माना जाता है।
◆ शाह बानो मामला (1985–86) — इंदौर की बुज़ुर्ग तलाक़शुदा मुस्लिम महिला शाह बानो के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने 1985 में निर्णय दिया कि उसे अपने पूर्व पति से गुज़ारा भत्ता पाने का अधिकार है। मुस्लिम समाज के रूढ़िवादी वर्ग ने इसे अपने निजी क़ानून में दख़ल बताकर विरोध किया। दबाव में सरकार ने मुस्लिम महिला (तलाक़ पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 1986 पारित कर इस निर्णय को निष्प्रभावी कर दिया। आलोचकों ने इसे महिलाओं के अधिकार की क़ीमत पर "तुष्टीकरण" कहा।
◆ अयोध्या का ताला खुलना (1986) — फ़रवरी 1986 में एक ज़िला अदालत के आदेश पर अयोध्या के विवादित ढाँचे का ताला खोल दिया गया। इन दोनों घटनाओं से सांप्रदायिक राजनीति को बल मिला और राम जन्मभूमि आंदोलन तेज़ हुआ।
◆ भारत-श्रीलंका समझौता (29 जुलाई 1987) — श्रीलंका में बहुसंख्यक सिंहली और अल्पसंख्यक तमिलों के बीच गृहयुद्ध चल रहा था और तमिल उग्रवादी संगठन लिट्टे अलग देश की माँग कर रहा था। राजीव गांधी और श्रीलंका के राष्ट्रपति जे. आर. जयवर्धने के समझौते के तहत तमिल क्षेत्रों को स्वायत्तता मिलनी थी और उग्रवादियों को हथियार डालने थे। इसकी निगरानी के लिए भारतीय शांति सेना श्रीलंका भेजी गई। पर लिट्टे ने हथियार नहीं डाले और शांति सेना को उसी से लड़ना पड़ा। एक हज़ार से अधिक भारतीय सैनिक मारे गए और मार्च 1990 तक सेना वापस बुलानी पड़ी। इसे भारत की विदेश नीति की बड़ी भूलों में गिना जाता है।
◆ बोफ़ोर्स विवाद (1987) — 1987 में स्वीडन के रेडियो ने दावा किया कि स्वीडिश कंपनी बोफ़ोर्स ने भारतीय सेना को तोपें बेचने के सौदे में दलाली दी थी। वित्त और फिर रक्षा मंत्री रहे विश्वनाथ प्रताप सिंह ने भ्रष्टाचार के प्रश्न पर सरकार और कांग्रेस छोड़ दी और वे विपक्ष के नायक बन गए। "साफ़ छवि" वाले राजीव की साख को इससे गहरा धक्का लगा।
◆ नौवाँ आम चुनाव (नवंबर 1989) — वी. पी. सिंह ने कई दलों को मिलाकर जनता दल बनाया और क्षेत्रीय दलों के साथ राष्ट्रीय मोर्चा खड़ा किया। चुनाव में कांग्रेस 197 सीटों के साथ सबसे बड़ा दल तो रही, पर बहुमत से बहुत दूर थी और उसने विपक्ष में बैठना चुना।
◆ अनोखी सरकार — 2 दिसंबर 1989 को विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रधानमंत्री बने। यह अल्पमत सरकार थी, जिसे दो विपरीत विचारधाराओं — भारतीय जनता पार्टी और वाम दलों — ने बाहर से समर्थन दिया। यहीं से केंद्र में गठबंधन और अल्पमत सरकारों का लंबा दौर शुरू हुआ। इसी समय कश्मीर घाटी में उग्रवाद भड़का और 1990 की शुरुआत में कश्मीरी पंडितों को घाटी छोड़नी पड़ी।
◆ पृष्ठभूमि — संविधान ने अनुसूचित जातियों और जनजातियों के अलावा "सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों" के लिए भी विशेष प्रावधान की अनुमति दी थी। पहला पिछड़ा वर्ग आयोग काका कालेलकर की अध्यक्षता में 1953 में बना था, पर उसकी रिपोर्ट लागू नहीं हुई। दक्षिण के राज्यों में पिछड़े वर्गों को आरक्षण पहले से मिल रहा था, पर केंद्र की नौकरियों में नहीं।
◆ आयोग का गठन — जनता सरकार ने 1 जनवरी 1979 को बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल की अध्यक्षता में दूसरा पिछड़ा वर्ग आयोग बनाया, जो मंडल आयोग कहलाया। इसने दिसंबर 1980 में रिपोर्ट दी।
◆ सिफ़ारिशें — आयोग ने सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक कसौटियों पर 3,743 जातियों को पिछड़ा माना और अनुमान लगाया कि अन्य पिछड़ा वर्ग देश की जनसंख्या का लगभग 52% है। पर सर्वोच्च न्यायालय पहले कह चुका था कि कुल आरक्षण 50% से अधिक नहीं होना चाहिए, और अनुसूचित जाति-जनजाति को पहले से 22.5% आरक्षण मिल रहा था। इसलिए आयोग ने अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए केंद्रीय सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थाओं में 27% आरक्षण की सिफ़ारिश की। उसने भूमि सुधार जैसी अन्य सिफ़ारिशें भी कीं।
◆ लागू करना (अगस्त 1990) — रिपोर्ट दस वर्ष तक ठंडे बस्ते में रही। 7 अगस्त 1990 को वी. पी. सिंह ने संसद में घोषणा की कि केंद्र सरकार की नौकरियों में अन्य पिछड़ा वर्ग को 27% आरक्षण दिया जाएगा।
◆ प्रतिक्रिया — उत्तर भारत के नगरों में सवर्ण छात्रों ने उग्र विरोध किया; सड़कें जाम हुईं और कुछ छात्रों ने आत्मदाह तक का प्रयास किया। दूसरी ओर पिछड़े वर्गों ने इसे सदियों के अन्याय के सुधार के रूप में देखा और इसका ज़ोरदार समर्थन किया।
◆ अदालत का निर्णय — इंद्रा साहनी मामला (16 नवंबर 1992) — सर्वोच्च न्यायालय की नौ न्यायाधीशों की पीठ ने 27% आरक्षण को वैध ठहराया, पर तीन शर्तें जोड़ीं — (1) पिछड़े वर्गों के संपन्न लोग, जिन्हें "क्रीमी लेयर" (मलाईदार परत) कहा गया, आरक्षण से बाहर रहेंगे; (2) कुल आरक्षण सामान्यतः 50% से अधिक नहीं होगा; और (3) आरक्षण केवल भर्ती में होगा, पदोन्नति में नहीं। इसके बाद 1993 से यह आरक्षण लागू हुआ।
◆ दूरगामी परिणाम — मंडल ने भारतीय राजनीति का चेहरा बदल दिया। उत्तर भारत में पिछड़े वर्गों से आए नेता और उनके दल सत्ता के केंद्र में आ गए और राजनीति में सामाजिक न्याय मुख्य मुद्दा बन गया। 1990 के दशक की राजनीति को अक्सर तीन शब्दों में समेटा जाता है — "मंडल, मंदिर और बाज़ार"।
◆ रथयात्रा — भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी ने अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के समर्थन में 25 सितंबर 1990 को गुजरात के सोमनाथ से रथयात्रा शुरू की। 23 अक्टूबर को बिहार के समस्तीपुर में मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव की सरकार ने उन्हें गिरफ़्तार कर लिया।
◆ सरकार का गिरना — इस गिरफ़्तारी पर भारतीय जनता पार्टी ने समर्थन वापस ले लिया और 7 नवंबर 1990 को वी. पी. सिंह सरकार लोकसभा में विश्वास मत हार गई। जनता दल टूट गया और 10 नवंबर 1990 को चंद्रशेखर कांग्रेस के बाहरी समर्थन से प्रधानमंत्री बने। उनके पास बहुत कम सांसद थे; कुछ ही महीनों में कांग्रेस ने समर्थन खींच लिया और मार्च 1991 में उन्हें इस्तीफ़ा देना पड़ा। इस अस्थिरता के बीच देश का आर्थिक संकट गहराता गया।
◆ राजीव गांधी की हत्या (21 मई 1991) — मध्यावधि चुनाव के प्रचार के दौरान तमिलनाडु के श्रीपेरंबदूर में लिट्टे की एक आत्मघाती महिला हमलावर ने बम विस्फोट करके राजीव गांधी की हत्या कर दी। यह श्रीलंका में भारतीय शांति सेना भेजने का बदला था। उन्हें 1991 में मरणोपरांत भारत रत्न दिया गया। चुनाव के शेष चरणों में कांग्रेस सबसे बड़े दल के रूप में उभरी।
कब | घटना |
जनवरी–जून 1980 | इंदिरा गांधी सत्ता में लौटीं, भारतीय जनता पार्टी बनी, छह और बैंकों का राष्ट्रीयकरण हुआ और संजय गांधी की मृत्यु हुई। |
जून 1984 | अमृतसर के स्वर्ण मंदिर परिसर से उग्रवादियों को निकालने के लिए ऑपरेशन ब्लू स्टार हुआ। |
31 अक्टूबर 1984 | इंदिरा गांधी की हत्या हुई, राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने और सिख-विरोधी हिंसा हुई। |
दिसंबर 1984 | भोपाल गैस त्रासदी हुई और आम चुनाव में कांग्रेस को 400 से अधिक सीटें मिलीं। |
1985–86 | पंजाब, असम और मिज़ो समझौते हुए, दल-बदल विरोधी क़ानून बना और नई शिक्षा नीति आई। |
1987 | भारत-श्रीलंका समझौते के बाद शांति सेना श्रीलंका गई और बोफ़ोर्स विवाद उठा। |
1988–89 | 61वें संशोधन से मतदान की आयु 18 वर्ष हुई और 1989 के चुनाव के बाद वी. पी. सिंह प्रधानमंत्री बने। |
अगस्त 1990 | मंडल आयोग की सिफ़ारिश पर अन्य पिछड़ा वर्ग को 27% आरक्षण देने की घोषणा हुई। |
सितंबर–नवंबर 1990 | सोमनाथ से रथयात्रा निकली, वी. पी. सिंह सरकार गिरी और चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने। |
21 मई 1991 | श्रीपेरंबदूर में चुनाव प्रचार के दौरान राजीव गांधी की हत्या कर दी गई। |
21 जून 1991 को पी. वी. नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री बने। वे आंध्र प्रदेश के अनुभवी नेता, कई भाषाओं के जानकार और दक्षिण भारत से आने वाले पहले प्रधानमंत्री थे। उनकी सरकार के पास लोकसभा में पूरा बहुमत भी नहीं था और ख़ज़ाना लगभग ख़ाली था। उन्होंने राजनीति से बाहर के अर्थशास्त्री और रिज़र्व बैंक के पूर्व गवर्नर डॉ. मनमोहन सिंह को वित्त मंत्री बनाया। इन दोनों ने मिलकर चालीस वर्ष पुराने "लाइसेंस-परमिट राज" की दिशा ही बदल दी। नीचे के आरेख में संकट, नेतृत्व और सुधारों के सभी हिस्से एक साथ दिखाए गए हैं; उसके बाद हर हिस्से का विस्तार है।

🔍 आसान परिभाषा: भुगतान संतुलन |
📘 परिभाषा: किसी देश और शेष विश्व के बीच एक वर्ष में हुए सभी आर्थिक लेन-देन — वस्तुओं और सेवाओं के आयात-निर्यात, विदेश से आए धन, ऋण और निवेश — का पूरा हिसाब। जब देश को बाहर जितनी विदेशी मुद्रा चुकानी हो, उससे कम उसके पास आए, तो "भुगतान संतुलन का संकट" पैदा होता है। |
💡 आसान भाषा में: एक परिवार की महीने की कमाई दस हज़ार हो, ख़र्च और क़र्ज़ की किस्त पंद्रह हज़ार, और जमा-पूँजी भी ख़त्म होने वाली हो — तो दुकानदार उधार देना बंद कर देता है। देश के साथ यही तब होता है जब उसके पास आयात का बिल चुकाने के लिए डॉलर नहीं बचते। 🏠 उदाहरण: 1991 में भारत के पास केवल लगभग दो सप्ताह के आयात (तेल, खाद, दवाएँ) के लायक़ विदेशी मुद्रा बची थी। |
◆ लंबे समय के कारण — 1980 के दशक में सरकार का ख़र्च उसकी आमदनी से लगातार बहुत अधिक रहा — यानी राजकोषीय घाटा बहुत बढ़ गया — और इसे पूरा करने के लिए देश-विदेश से भारी क़र्ज़ लिया गया। घाटे में चलते सरकारी उपक्रम, अनुदानों का बोझ और कमज़ोर निर्यात ने स्थिति बिगाड़ी।
◆ तात्कालिक कारण — अगस्त 1990 में इराक़ ने कुवैत पर हमला किया और खाड़ी युद्ध छिड़ गया। कच्चे तेल के दाम अचानक बढ़ गए, और खाड़ी देशों में काम करने वाले लाखों भारतीयों का घर भेजा जाने वाला धन रुक गया। इसी समय भारत का बड़ा व्यापारिक साझेदार सोवियत संघ बिखर रहा था। देश में तीन वर्षों में तीन सरकारें बदलीं, जिससे विदेशी निवेशकों और प्रवासी भारतीयों का भरोसा डगमगाया और वे अपना जमा धन निकालने लगे।
◆ संकट की गहराई — जून 1991 तक विदेशी मुद्रा भंडार घटकर इतना रह गया कि उससे केवल लगभग दो सप्ताह का आयात हो सकता था। महँगाई बहुत ऊँची थी। अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने भारत की साख घटा दी और कोई नया क़र्ज़ देने को तैयार नहीं था। ख़तरा यह था कि भारत इतिहास में पहली बार अपने विदेशी क़र्ज़ की किस्त चुकाने में चूक कर जाएगा।
📖 कहानी 2: जब भारत को अपना सोना गिरवी रखना पड़ा जून 1991 में जब पी. वी. नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री बने, तब देश की हालत ऐसी थी कि विदेशी मुद्रा भंडार से केवल लगभग दो सप्ताह का आयात हो सकता था। तेल, खाद और दवाएँ बाहर से आती हैं, और उनका दाम डॉलर में चुकाना पड़ता है। डॉलर ख़त्म हो जाते तो देश विदेशी क़र्ज़ की किस्त चुकाने में चूक जाता, यानी भारत इतिहास में पहली बार दिवालिया होने की कगार पर था। संकट की जड़ें 1980 के दशक के भारी क़र्ज़ में थीं, और अगस्त 1990 के खाड़ी युद्ध ने उसे बढ़ा दिया। तेल के दाम बढ़े और खाड़ी देशों से आने वाला धन रुक गया। तब सरकार को बाहर से मदद लेने के लिए अपना सोना गिरवी रखना पड़ा। पहले चंद्रशेखर सरकार के समय लगभग बीस टन सोना विदेश भेजा गया, और जुलाई 1991 में रिज़र्व बैंक ने लगभग 47 टन सोना बैंक ऑफ़ इंग्लैंड के पास गिरवी रखकर ऋण लिया। भारत जैसे देश में सोना गिरवी रखना घर की आख़िरी मजबूरी माना जाता है, इसलिए यह ख़बर राष्ट्रीय स्वाभिमान पर गहरी चोट थी। पर इसी चोट ने कड़े फ़ैसलों के लिए जनमत तैयार कर दिया। राव ने अर्थशास्त्री डॉ. मनमोहन सिंह को वित्त मंत्री बनाया। 1 और 3 जुलाई 1991 को रुपये का लगभग 18–19% अवमूल्यन किया गया ताकि निर्यात बढ़े और विदेशी मुद्रा आए। फिर 24 जुलाई 1991 को नई औद्योगिक नीति और मनमोहन सिंह का पहला बजट आया। इन दोनों ने चालीस वर्ष पुराने लाइसेंस-परमिट राज की दिशा बदल दी। यानी जिस संकट ने भारत को झुकाया था, उसी ने उसे अर्थव्यवस्था खोलने के रास्ते पर डाला। उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की कहानी यहीं से शुरू हुई। 🧭 इस कहानी से कौन-सी अवधारणा साफ़ हुई ✔ भुगतान संतुलन का संकट — जब देश के पास आयात का बिल और विदेशी क़र्ज़ चुकाने लायक़ विदेशी मुद्रा न बचे; 1991 में भंडार केवल लगभग दो सप्ताह के आयात भर का था। ✔ अवमूल्यन — विदेशी मुद्रा के मुक़ाबले रुपये का मूल्य सरकार द्वारा घटाना, ताकि भारतीय माल विदेश में सस्ता हो और निर्यात बढ़े। ✔ संकट से सुधार — सोना गिरवी रखने की मजबूरी ने जनमत तैयार किया और नई औद्योगिक नीति से लाइसेंस राज की समाप्ति हुई। 📝 परीक्षा के लिए: परीक्षा-सूत्र: प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव (21 जून 1991) और वित्त मंत्री मनमोहन सिंह; अवमूल्यन 1 और 3 जुलाई 1991; जुलाई 1991 में लगभग 47 टन सोना बैंक ऑफ़ इंग्लैंड के पास गिरवी; नई औद्योगिक नीति और बजट 24 जुलाई 1991 |
◆ सोना गिरवी — क़र्ज़ की किस्तें चुकाने के लिए भारत को अपना सोना गिरवी रखना पड़ा। पहले चंद्रशेखर सरकार के समय लगभग बीस टन सोना विदेश भेजा गया, और फिर जुलाई 1991 में रिज़र्व बैंक ने लगभग 47 टन सोना विमानों से भेजकर बैंक ऑफ़ इंग्लैंड के पास गिरवी रखा और बदले में ऋण लिया। जिस समाज में सोना गिरवी रखना घर की आख़िरी मजबूरी मानी जाती है, वहाँ यह ख़बर राष्ट्रीय स्वाभिमान पर गहरी चोट थी — और इसी ने कड़े सुधारों के लिए जनमत तैयार किया।
◆ अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से ऋण — भारत ने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक से आपात ऋण लिया। बदले में इन संस्थाओं की शर्त थी कि भारत अपनी अर्थव्यवस्था को खोले, सरकारी घाटा घटाए और नियंत्रण ढीले करे।
◆ रुपये का अवमूल्यन — जुलाई 1991 के पहले सप्ताह में दो चरणों में (1 और 3 जुलाई) रुपये का कुल लगभग 18–19% अवमूल्यन किया गया। उद्देश्य था कि भारतीय माल विदेशों में सस्ता होकर निर्यात बढ़े और विदेशी मुद्रा आए (अवमूल्यन की परिभाषा खंड 8.1 में)।
24 जुलाई 1991 एक ही दिन में दो बड़ी घोषणाएँ हुईं — संसद में नई औद्योगिक नीति रखी गई और मनमोहन सिंह ने अपना पहला बजट पेश किया। नई औद्योगिक नीति ने 1956 के "आर्थिक संविधान" को लगभग पलट दिया:
1. लाइसेंस राज की समाप्ति — सुरक्षा, पर्यावरण और सामरिक महत्त्व के केवल 18 उद्योगों को छोड़कर बाक़ी सभी उद्योगों के लिए लाइसेंस की अनिवार्यता समाप्त कर दी गई। अब उद्यमी को कारख़ाना लगाने या उत्पादन बढ़ाने के लिए सरकार से अनुमति नहीं माँगनी थी। (आगे चलकर यह सूची और छोटी होती गई।)
2. सार्वजनिक क्षेत्र का दायरा घटा — केवल सरकार के लिए आरक्षित उद्योगों की संख्या 17 से घटाकर 8 कर दी गई (बाद में और घटी, और अंततः परमाणु ऊर्जा तथा रेल जैसे दो-तीन क्षेत्र ही बचे)। बाक़ी क्षेत्र निजी कंपनियों के लिए खोल दिए गए।
3. एकाधिकार क़ानून की बाधाएँ हटीं — बड़ी कंपनियों को विस्तार से पहले विशेष अनुमति लेने की जो शर्त 1969 के एकाधिकार अधिनियम में थी, वह हटा दी गई।
4. विदेशी निवेश का स्वागत — कई प्राथमिकता वाले उद्योगों में 51% तक विदेशी प्रत्यक्ष निवेश को स्वतः अनुमति दी गई (पहले सीमा सामान्यतः 40% थी और हर मामले में सरकारी मंज़ूरी चाहिए थी)। विदेशी तकनीक के समझौतों को भी आसान किया गया।
5. सरकारी उपक्रमों में विनिवेश — चुने हुए सरकारी उपक्रमों के कुछ शेयर जनता और वित्तीय संस्थाओं को बेचने तथा लगातार घाटे वाले उपक्रमों के पुनर्गठन की नीति घोषित हुई।
❝ दुनिया की कोई ताक़त उस विचार को नहीं रोक सकती, जिसका समय आ गया हो। ❞ (फ़्रांसीसी लेखक विक्टर ह्यूगो का कथन, जिसे डॉ. मनमोहन सिंह ने 24 जुलाई 1991 के बजट भाषण में उद्धृत किया) |
🔍 आसान परिभाषा: उदारीकरण-निजीकरण-वैश्वीकरण (एल.पी.जी.) |
📘 परिभाषा: उदारीकरण — उद्योग, व्यापार और वित्त पर लगे सरकारी नियंत्रणों (लाइसेंस, कोटा, परमिट) को ढीला करना या हटाना। निजीकरण — सरकारी उपक्रमों का स्वामित्व या प्रबंध निजी हाथों में देना और जो क्षेत्र केवल सरकार के लिए आरक्षित थे उन्हें निजी कंपनियों के लिए खोलना। वैश्वीकरण — देश की अर्थव्यवस्था को व्यापार, निवेश और तकनीक के माध्यम से विश्व-अर्थव्यवस्था से जोड़ना। |
💡 आसान भाषा में: उदारीकरण यानी "अनुमति की खिड़कियों" की लंबी कतार ख़त्म; निजीकरण यानी "सरकार हर दुकान ख़ुद नहीं चलाएगी"; वैश्वीकरण यानी "देश के बाज़ार के दरवाज़े दुनिया के लिए और दुनिया के दरवाज़े देश के लिए खुले"। 🏠 उदाहरण: पहले टेलीफ़ोन लगवाने के लिए वर्षों प्रतीक्षा करनी पड़ती थी और एक ही सरकारी कंपनी थी; सुधारों के बाद निजी और विदेशी कंपनियाँ आईं और टेलीफ़ोन कुछ ही दिनों में मिलने लगा। |
◆ उदारीकरण — औद्योगिक लाइसेंस हटाने के साथ-साथ आयात पर लगी लाइसेंस-व्यवस्था ढीली की गई, ब्याज दरों पर सरकारी नियंत्रण घटाया गया और कर-ढाँचे को सरल बनाया गया। राजा चेलैया समिति की सिफ़ारिशों पर आयकर और सीमा शुल्क की बहुत ऊँची दरें घटाई गईं, ताकि कर-चोरी घटे और ईमानदारी से कर देना आसान हो।
◆ निजीकरण — सरकारी उपक्रमों में विनिवेश शुरू हुआ, यानी सरकार ने अपने शेयरों का एक भाग बेचना शुरू किया। दूरसंचार, विमानन, बिजली, बैंकिंग और बीमा जैसे क्षेत्र, जहाँ पहले केवल सरकार थी, धीरे-धीरे निजी क्षेत्र के लिए खोले गए — जैसे 1994 की राष्ट्रीय दूरसंचार नीति के बाद निजी टेलीफ़ोन कंपनियाँ आईं और 1995 में देश में मोबाइल फ़ोन तथा इंटरनेट सेवा शुरू हुई।
◆ वैश्वीकरण — विदेशी प्रत्यक्ष निवेश को 51% तक स्वतः अनुमति मिली, विदेशी संस्थागत निवेशकों को भारतीय शेयर बाज़ार में पैसा लगाने की छूट मिली, आयात शुल्क की बहुत ऊँची दरें चरणबद्ध ढंग से घटाई गईं और रुपये को व्यापारिक लेन-देन के लिए धीरे-धीरे बाज़ार से तय होने दिया गया। 1 जनवरी 1995 को विश्व व्यापार संगठन बना और भारत उसका संस्थापक सदस्य था। 1999 में पुराने कठोर विदेशी मुद्रा क़ानून की जगह उदार विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम लाया गया।
◆ नरसिम्हम समिति (1991) — रिज़र्व बैंक के पूर्व गवर्नर एम. नरसिम्हम की अध्यक्षता वाली समिति ने बैंकिंग सुधार सुझाए — बैंकों को अपनी जमा का जो बड़ा भाग अनिवार्य रूप से सरकार के पास या सरकारी प्रतिभूतियों में रखना पड़ता था, उसे घटाना; ब्याज दरें बाज़ार से तय होने देना; डूबे ऋणों का सही हिसाब रखना; और नए निजी बैंकों को अनुमति देना। इसके बाद 1990 के दशक के मध्य में नए निजी बैंक खुले। 1998 में इसी समिति की दूसरी रिपोर्ट आई।
◆ सेबी को वैधानिक दर्जा (1992) — शेयर बाज़ार की निगरानी के लिए भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (संक्षेप में सेबी) 1988 में बना था, पर उसके पास क़ानूनी शक्ति नहीं थी। 1992 में शेयर बाज़ार के एक बड़े घोटाले के बीच क़ानून बनाकर इसे वैधानिक दर्जा और दंड देने की शक्ति दी गई, ताकि छोटे निवेशकों का धन सुरक्षित रहे। इसी दौर में कंप्यूटर से चलने वाला राष्ट्रीय स्टॉक एक्सचेंज भी शुरू हुआ।
◆ सकारात्मक परिणाम — दो-तीन वर्षों में संकट टल गया; विदेशी मुद्रा भंडार तेज़ी से बढ़ा और गिरवी रखा सोना छुड़ा लिया गया। आठवीं योजना में विकास दर लगभग 6.8% रही (खंड 3.5)। सेवा क्षेत्र, विशेषकर सूचना प्रौद्योगिकी और दूरसंचार, तेज़ी से बढ़े और बेंगलुरु तथा हैदराबाद जैसे नगर दुनिया के सॉफ़्टवेयर केंद्र बने। उपभोक्ता को गाड़ियों, टेलीफ़ोन, टेलीविज़न चैनलों और रोज़मर्रा के सामान में पहली बार विकल्प मिले और प्रतीक्षा-सूचियाँ ख़त्म हुईं। एक बड़ा मध्य वर्ग उभरा।
◆ आलोचना — आलोचकों के अनुसार सुधारों का लाभ नगरों और पढ़े-लिखे वर्ग को अधिक मिला। कृषि में सरकारी निवेश घटा और किसानों का संकट बढ़ा; अमीर-ग़रीब और राज्यों के बीच असमानता बढ़ी; उत्पादन जितनी तेज़ी से बढ़ा, संगठित क्षेत्र में रोज़गार उतनी तेज़ी से नहीं बढ़े, जिसे "रोज़गारविहीन विकास" कहा गया; और छोटे उद्योगों को विदेशी माल की प्रतिस्पर्धा झेलनी पड़ी।
◆ निरंतरता — महत्त्वपूर्ण बात यह है कि 1996 के बाद आई हर सरकार ने — चाहे वह संयुक्त मोर्चा हो या राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन — इन सुधारों को जारी रखा। यानी 1991 की दिशा पर एक व्यापक राष्ट्रीय सहमति बन गई।
विषय | 1991 से पहले | 1991 के बाद |
औद्योगिक लाइसेंस | लगभग हर बड़े उद्योग के लिए सरकार से लाइसेंस लेना पड़ता था। | केवल 18 उद्योगों को छोड़कर लाइसेंस की शर्त हटा दी गई। |
सार्वजनिक क्षेत्र | 17 उद्योग केवल सरकार के लिए आरक्षित थे। | आरक्षित उद्योग घटाकर 8 किए गए और विनिवेश शुरू हुआ। |
विदेशी निवेश | सीमा सामान्यतः 40% थी और हर मामले में मंज़ूरी लेनी पड़ती थी। | कई उद्योगों में 51% तक निवेश को स्वतः अनुमति मिली। |
आयात और रुपया | आयात पर कड़े नियंत्रण और बहुत ऊँचे शुल्क थे और रुपये की दर सरकार तय करती थी। | शुल्क चरणबद्ध ढंग से घटे, रुपये का अवमूल्यन हुआ और दर धीरे-धीरे बाज़ार से तय होने लगी। |
वित्तीय क्षेत्र | बैंकिंग लगभग पूरी तरह सरकारी थी और शेयर बाज़ार का कोई शक्तिशाली नियामक नहीं था। | नरसिम्हम समिति के सुझावों पर निजी बैंक आए और सेबी को वैधानिक दर्जा मिला। |
◆ पंचायती राज को संवैधानिक दर्जा — 73वें और 74वें संशोधन (1992 में पारित, 1993 में लागू) से पंचायतों और नगरपालिकाओं को संवैधानिक दर्जा मिला (खंड 4.3)।
◆ अयोध्या (6 दिसंबर 1992) — अयोध्या में एकत्र भीड़ ने विवादित ढाँचे को गिरा दिया। इसके बाद देश के कई भागों में सांप्रदायिक दंगे हुए, जिनमें बड़ी संख्या में लोग मारे गए। केंद्र ने उत्तर प्रदेश सहित चार राज्यों की सरकारें बर्ख़ास्त कर दीं। मार्च 1993 में मुंबई में एक ही दिन में कई बम धमाके हुए, जिनमें ढाई सौ से अधिक लोग मारे गए। इन घटनाओं ने भारत की धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था को गहरी चुनौती दी।
◆ एस. आर. बोम्मई मामला (1994) — सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की केंद्र की शक्ति असीमित नहीं है; उसकी न्यायिक समीक्षा हो सकती है और सरकार के बहुमत की परीक्षा विधानसभा के पटल पर होनी चाहिए। न्यायालय ने धर्मनिरपेक्षता को संविधान के मूल ढाँचे का हिस्सा भी बताया।
◆ विदेश नीति — शीतयुद्ध की समाप्ति के बाद राव सरकार ने दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों से व्यापार और संबंध बढ़ाने की "पूर्व की ओर देखो" नीति अपनाई और 1992 में इज़राइल के साथ पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित किए।
◆ महत्त्व — नरसिम्हा राव नेहरू-गांधी परिवार के बाहर के पहले कांग्रेसी प्रधानमंत्री थे, जिन्होंने पूरे पाँच वर्ष का कार्यकाल पूरा किया — वह भी अल्पमत सरकार के साथ।
🔍 आसान परिभाषा: गठबंधन सरकार |
📘 परिभाषा: ऐसी सरकार, जो तब बनती है जब किसी एक दल को विधायिका में स्पष्ट बहुमत न मिले और दो या अधिक दल एक साझा कार्यक्रम पर सहमत होकर मिलकर मंत्रिमंडल बनाएँ, या कुछ दल सरकार में शामिल हुए बिना "बाहर से समर्थन" दें। |
💡 आसान भाषा में: जब कोई एक खिलाड़ी अकेले टीम नहीं बना पाता, तो कई खिलाड़ी मिलकर टीम बनाते हैं — पर हर खिलाड़ी की बात माननी पड़ती है, वरना टीम टूट जाती है। 🏠 उदाहरण: 1996–98 की संयुक्त मोर्चा सरकार तेरह दलों का गठबंधन थी, जिसे कांग्रेस बाहर से समर्थन दे रही थी। |
◆ 1996 का चुनाव और तेरह दिन की सरकार — ग्यारहवें आम चुनाव में किसी दल को बहुमत नहीं मिला। भारतीय जनता पार्टी पहली बार सबसे बड़ा दल बनी और 16 मई 1996 को अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने। पर वे बहुमत नहीं जुटा सके और केवल तेरह दिन बाद इस्तीफ़ा दे दिया।
◆ संयुक्त मोर्चा सरकारें (1996–98) — इसके बाद क्षेत्रीय दलों, जनता दल और वाम दलों के संयुक्त मोर्चा ने कांग्रेस के बाहरी समर्थन से सरकार बनाई। 1 जून 1996 को कर्नाटक के मुख्यमंत्री एच. डी. देवेगौड़ा प्रधानमंत्री बने। उनके समय दिसंबर 1996 में बांग्लादेश के साथ गंगा जल-बँटवारे की संधि हुई। कांग्रेस के दबाव में 21 अप्रैल 1997 को उनकी जगह इंद्र कुमार गुजराल प्रधानमंत्री बने। नवंबर 1997 में कांग्रेस ने समर्थन वापस ले लिया और यह सरकार भी गिर गई।
◆ गुजराल सिद्धांत — विदेश मंत्री और फिर प्रधानमंत्री के रूप में गुजराल ने पड़ोसी देशों के लिए जो नीति दी, वह "गुजराल सिद्धांत" कहलाई। इसका मुख्य विचार था कि भारत बड़ा देश होने के नाते नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, श्रीलंका और मालदीव जैसे छोटे पड़ोसियों से बदले में बराबर की अपेक्षा किए बिना सद्भाव से जो दे सकता है, देगा; कोई देश अपनी भूमि का उपयोग दूसरे के विरुद्ध नहीं होने देगा; और सब एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में दख़ल नहीं देंगे।
◆ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (1998) — 1998 के चुनाव के बाद भारतीय जनता पार्टी ने कई क्षेत्रीय दलों के साथ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन बनाया और 19 मार्च 1998 को वाजपेयी फिर प्रधानमंत्री बने। इसी बीच 1997 में स्वतंत्रता की स्वर्ण जयंती मनाई गई और के. आर. नारायणन भारत के पहले दलित राष्ट्रपति बने।
◆ पृष्ठभूमि — 1974 के परीक्षण के बाद भारत ने परमाणु हथियार नहीं बनाए थे, पर चीन परमाणु शक्ति था और पाकिस्तान चीन की मदद से गुप्त रूप से बम बना रहा था। 1996 में दुनिया के देश व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि पर हस्ताक्षर कर रहे थे, जिस पर भारत ने भेदभावपूर्ण बताकर हस्ताक्षर नहीं किए। भारत को लगा कि यदि अभी परीक्षण नहीं किए तो यह रास्ता हमेशा के लिए बंद हो जाएगा।
◆ परीक्षण — 11 मई 1998 को राजस्थान के पोखरण में तीन और 13 मई को दो — कुल पाँच भूमिगत परमाणु परीक्षण किए गए। इस अभियान का नाम "ऑपरेशन शक्ति" था। तैयारी इतनी गुप्त रखी गई कि अमेरिकी जासूसी उपग्रह भी उसे नहीं पकड़ सके। इसमें रक्षा अनुसंधान के प्रमुख डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम और परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष डॉ. आर. चिदंबरम की प्रमुख भूमिका थी। 11 मई अब राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस है।
◆ परिणाम — भारत ने स्वयं को परमाणु शस्त्र-संपन्न देश घोषित किया। दो सप्ताह के भीतर पाकिस्तान ने भी बलूचिस्तान के चगाई में परीक्षण किए, जिससे दक्षिण एशिया में दो परमाणु शक्तियाँ आमने-सामने हो गईं। अमेरिका, जापान और कई देशों ने भारत पर आर्थिक प्रतिबंध लगाए, जो कुछ वर्षों में ढीले पड़ गए। भारत ने घोषणा की कि वह परमाणु हथियार का "पहले प्रयोग नहीं" करेगा और केवल न्यूनतम आवश्यक शक्ति रखेगा।
◆ परमाणु परीक्षणों से बढ़े तनाव को घटाने के लिए वाजपेयी फ़रवरी 1999 में दिल्ली-लाहौर बस सेवा की पहली बस में बैठकर लाहौर गए। वहाँ 21 फ़रवरी 1999 को उन्होंने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ के साथ लाहौर घोषणा पर हस्ताक्षर किए, जिसमें दोनों देशों ने शिमला समझौते के अनुसार सभी विवाद शांति से सुलझाने और परमाणु युद्ध के ख़तरे को घटाने का वचन दिया। पर इसी समय पाकिस्तानी सेना चुपचाप कारगिल में घुसपैठ की तैयारी कर रही थी।
◆ कारण — सर्दियों में भारी बर्फ़ के कारण दोनों देशों की सेनाएँ नियंत्रण रेखा की बहुत ऊँची चौकियाँ ख़ाली कर देती थीं। 1998–99 की सर्दियों में पाकिस्तानी सेना के जवानों और घुसपैठियों ने नियंत्रण रेखा पार करके जम्मू-कश्मीर के कारगिल, द्रास और बटालिक क्षेत्रों की ख़ाली चोटियों पर क़ब्ज़ा कर लिया। इन चोटियों से श्रीनगर–लेह राजमार्ग सीधे निशाने पर था, यानी उद्देश्य लद्दाख का रास्ता काटना और कश्मीर के प्रश्न को फिर अंतरराष्ट्रीय बनाना था। इसकी योजना पाकिस्तानी सेनाध्यक्ष जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ ने बनाई थी।
◆ घटनाक्रम — मई 1999 की शुरुआत में स्थानीय चरवाहों ने घुसपैठ की सूचना दी। इसके बाद सेना ने "ऑपरेशन विजय" और वायुसेना ने "ऑपरेशन सफ़ेद सागर" शुरू किया। लड़ाई बेहद कठिन थी, क्योंकि दुश्मन ऊपर चोटियों पर बैठा था और भारतीय सैनिकों को 16,000–18,000 फ़ुट की ऊँचाई पर खड़ी चट्टानों पर चढ़ते हुए लड़ना था। जून में तोलोलिंग और जुलाई की शुरुआत में टाइगर हिल जैसी महत्त्वपूर्ण चोटियाँ वापस ली गईं। भारत ने जान-बूझकर नियंत्रण रेखा पार नहीं की, जिससे दुनिया में उसकी छवि एक संयमी और ज़िम्मेदार देश की बनी।
◆ अंतरराष्ट्रीय दबाव — अमेरिका सहित अधिकांश देशों ने पाकिस्तान को ही दोषी माना। 4 जुलाई 1999 को नवाज़ शरीफ़ को वॉशिंगटन में अमेरिकी राष्ट्रपति को वचन देना पड़ा कि पाकिस्तान अपनी सेना पीछे हटाएगा।
◆ परिणाम — 26 जुलाई 1999 को भारत ने सभी चोटियाँ वापस मिलने की घोषणा की; यह दिन कारगिल विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है। युद्ध में पाँच सौ से अधिक भारतीय सैनिक शहीद हुए। चार वीरों को परमवीर चक्र मिला — कैप्टन विक्रम बत्रा (मरणोपरांत), लेफ़्टिनेंट मनोज कुमार पांडे (मरणोपरांत), ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव और राइफ़लमैन संजय कुमार। पाकिस्तान में सेना और सरकार का टकराव बढ़ा और अक्टूबर 1999 में जनरल मुशर्रफ़ ने तख़्ता पलटकर सत्ता हथिया ली।
◆ कारगिल समीक्षा समिति — घुसपैठ का समय पर पता क्यों नहीं चला, इसकी जाँच के लिए रक्षा विशेषज्ञ के. सुब्रह्मण्यम की अध्यक्षता में समिति बनी। उसने ख़ुफ़िया तंत्र के तालमेल, सीमा-निगरानी और रक्षा प्रबंधन में बड़े सुधार सुझाए।
◆ अप्रैल 1999 में एक सहयोगी दल के समर्थन वापस लेने पर वाजपेयी सरकार लोकसभा में केवल एक वोट से विश्वास मत हार गई थी। कारगिल के बाद सितंबर–अक्टूबर 1999 के चुनाव में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को स्पष्ट बहुमत मिला और 13 अक्टूबर 1999 को वाजपेयी तीसरी बार प्रधानमंत्री बने। यह केंद्र की पहली ग़ैर-कांग्रेसी सरकार थी, जिसने आगे पूरे पाँच वर्ष का कार्यकाल पूरा किया, और इससे सिद्ध हुआ कि गठबंधन सरकारें भी स्थिर हो सकती हैं।
◆ नवंबर 2000 में तीन नए राज्य बने — 1 नवंबर को मध्य प्रदेश से छत्तीसगढ़, 9 नवंबर को उत्तर प्रदेश से उत्तरांचल (आज का उत्तराखंड) और 15 नवंबर को बिहार से झारखंड। इस प्रकार राज्यों की संख्या 25 से बढ़कर 28 हो गई। इन राज्यों की माँग भाषा के आधार पर नहीं, बल्कि क्षेत्रीय पिछड़ेपन, आदिवासी और पहाड़ी पहचान तथा बेहतर प्रशासन के आधार पर उठी थी।
इस अध्याय में जिन स्थानों का बार-बार उल्लेख आया, वे आगे दिए मानचित्र (चित्र 18.5) में चार प्रकार के चिह्नों से दिखाए गए हैं। पहले हर स्थान का महत्त्व एक-एक वाक्य में दोहरा लें, फिर उसे मानचित्र पर खोजें।
◆ युद्ध के मोर्चे (लाल चौकोर) — लद्दाख का अक्साई चिन 1962 से चीन के क़ब्ज़े में है। अरुणाचल प्रदेश का तवांग 1962 में नेफ़ा मोर्चे पर चीनी हमले का पहला बड़ा निशाना बना। गुजरात के कच्छ के रन में अप्रैल 1965 की झड़प से उस वर्ष के युद्ध की भूमिका बनी। पंजाब के असल उत्तर में 1965 में पाकिस्तानी टैंक बल की हार हुई। बांग्लादेश की राजधानी ढाका में 16 दिसंबर 1971 को पाकिस्तानी सेना ने आत्मसमर्पण किया। और कारगिल में 1999 में घुसपैठियों से चोटियाँ वापस ली गईं।
◆ अन्य राजनीतिक घटनाएँ (बैंगनी चिह्न) — अमृतसर में जून 1984 में ऑपरेशन ब्लू स्टार हुआ। शिमला में 2 जुलाई 1972 को भारत-पाक समझौता हुआ। राजस्थान के पोखरण में 1974 और 1998 में परमाणु परीक्षण किए गए।
◆ नेहरू युग के बाँध और इस्पात संयंत्र (नीले गोले) — सतलुज पर भाखड़ा-नांगल बाँध और महानदी पर हीराकुड बाँध "आधुनिक भारत के मंदिर" कहलाए। भिलाई इस्पात संयंत्र सोवियत संघ के, राउरकेला पश्चिम जर्मनी के और दुर्गापुर ब्रिटेन के सहयोग से बना (खंड 2.2)।
◆ ग्रामीण विकास के प्रयोग (हरे त्रिकोण) — राजस्थान के नागौर में 2 अक्टूबर 1959 को पंचायती राज का उद्घाटन हुआ। गुजरात का आनंद अमूल और श्वेत क्रांति का केंद्र है। और तेलंगाना के पोचमपल्ली में 18 अप्रैल 1951 को भूदान आंदोलन का जन्म हुआ (खंड 4)।

अध्याय में जिन प्रधानमंत्रियों का उल्लेख आया, उनका क्रम, कार्यकाल और एक-एक मुख्य पहचान नीचे दोहराई गई है। ध्यान रहे कि गुलज़ारीलाल नंदा दो बार (1964 में नेहरू और 1966 में शास्त्री के निधन के बाद) केवल तेरह-तेरह दिन कार्यवाहक प्रधानमंत्री रहे।
प्रधानमंत्री | कार्यकाल | याद रखने योग्य बात |
जवाहरलाल नेहरू | 15 अगस्त 1947 – 27 मई 1964 | उनका कार्यकाल सबसे लंबा रहा और उन्होंने नियोजन तथा गुटनिरपेक्षता की नींव रखी। |
लाल बहादुर शास्त्री | 9 जून 1964 – 11 जनवरी 1966 | उन्होंने "जय जवान, जय किसान" का नारा दिया और ताशकंद में उनका निधन हुआ। |
इंदिरा गांधी (पहली बार) | 24 जनवरी 1966 – 24 मार्च 1977 | वे पहली महिला प्रधानमंत्री थीं; बैंक राष्ट्रीयकरण, 1971 की विजय और आपातकाल उनके समय हुए। |
मोरारजी देसाई | 24 मार्च 1977 – 28 जुलाई 1979 | उन्होंने केंद्र में पहली ग़ैर-कांग्रेसी सरकार बनाई और 44वाँ संशोधन कराया। |
चौधरी चरण सिंह | 28 जुलाई 1979 – 14 जनवरी 1980 | वे संसद का सामना किए बिना इस्तीफ़ा देने वाले अकेले प्रधानमंत्री रहे। |
इंदिरा गांधी (दूसरी बार) | 14 जनवरी 1980 – 31 अक्टूबर 1984 | इस कार्यकाल में ऑपरेशन ब्लू स्टार हुआ और पद पर रहते उनकी हत्या हुई। |
राजीव गांधी | 31 अक्टूबर 1984 – 2 दिसंबर 1989 | वे सबसे युवा प्रधानमंत्री थे और उन्होंने दल-बदल विरोधी क़ानून तथा दूरसंचार-कंप्यूटर क्रांति दी। |
विश्वनाथ प्रताप सिंह | 2 दिसंबर 1989 – 10 नवंबर 1990 | उन्होंने मंडल आयोग की सिफ़ारिश लागू करने की घोषणा की। |
चंद्रशेखर | 10 नवंबर 1990 – 21 जून 1991 | उनकी अल्पमत सरकार के समय आर्थिक संकट गहराया और पहली बार सोना बाहर भेजा गया। |
पी. वी. नरसिम्हा राव | 21 जून 1991 – 16 मई 1996 | वे दक्षिण भारत से पहले प्रधानमंत्री थे और उन्होंने आर्थिक सुधार शुरू किए। |
अटल बिहारी वाजपेयी (पहली बार) | 16 मई 1996 – 1 जून 1996 | उनकी पहली सरकार केवल तेरह दिन चली। |
एच. डी. देवेगौड़ा | 1 जून 1996 – 21 अप्रैल 1997 | उन्होंने संयुक्त मोर्चा सरकार चलाई और गंगा जल संधि की। |
इंद्र कुमार गुजराल | 21 अप्रैल 1997 – 19 मार्च 1998 | वे पड़ोसियों के प्रति उदारता वाले "गुजराल सिद्धांत" के लिए जाने जाते हैं। |
अटल बिहारी वाजपेयी | 19 मार्च 1998 – 22 मई 2004 | उनके समय पोखरण-2, लाहौर बस यात्रा और कारगिल विजय हुई। |
◆ लोकतंत्र की जड़ें मज़बूत हुईं — एशिया और अफ़्रीका के अधिकांश नए देशों में लोकतंत्र सैनिक शासन या एक-दलीय तानाशाही में बदल गया, पर भारत में नियमित चुनाव होते रहे और 1977, 1989, 1996 तथा 1998 में सत्ता शांतिपूर्ण ढंग से बदली। आपातकाल का अनुभव भी अंततः लोकतंत्र को और मज़बूत करके गया।
◆ एकता बनी रही — भाषा, धर्म और क्षेत्र की इतनी विविधता के बावजूद देश एक रहा। भाषाई राज्यों, संघीय ढाँचे और समझौतों (जैसे मिज़ो समझौता) ने विविधता को एकता की शक्ति बनाया।
◆ खाद्यान्न में आत्मनिर्भरता — जो देश 1960 के दशक में विदेशी अनाज पर निर्भर था, वह हरित क्रांति से अपना पेट भरने लगा और श्वेत क्रांति से दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक बना।
◆ औद्योगिक और वैज्ञानिक आधार — इस्पात, भारी मशीनें, बिजली, बाँध, परमाणु ऊर्जा, अंतरिक्ष और उच्च शिक्षा के संस्थानों का ऐसा आधार बना, जिस पर आगे की सूचना प्रौद्योगिकी क्रांति खड़ी हुई।
◆ स्वतंत्र विदेश नीति और सुरक्षा — भारत किसी महाशक्ति का पिछलग्गू नहीं बना; 1971 की विजय और परमाणु क्षमता ने उसकी सुरक्षा और प्रतिष्ठा बढ़ाई।
◆ मानव विकास में सुधार — औसत आयु लगभग 32 वर्ष से बढ़कर साठ वर्ष से ऊपर पहुँची और साक्षरता लगभग 18% से बढ़कर 2001 की जनगणना तक लगभग 65% हो गई।
◆ ग़रीबी और असमानता — भूमि सुधार अधूरे रहे, और 1990 के दशक के अंत में भी देश की एक-चौथाई से अधिक जनसंख्या ग़रीबी रेखा के नीचे थी। प्राथमिक शिक्षा और स्वास्थ्य पर उतना ध्यान नहीं दिया गया जितना भारी उद्योगों पर।
◆ धीमी आर्थिक वृद्धि — 1950 से 1980 तक अर्थव्यवस्था औसतन केवल लगभग 3.5% की दर से बढ़ी, जिसे अर्थशास्त्री राज कृष्ण ने व्यंग्य में "हिंदू विकास दर" कहा। जनसंख्या भी तेज़ी से बढ़ रही थी, इसलिए प्रति व्यक्ति आय बहुत धीरे बढ़ी।
◆ लाइसेंस-परमिट राज — नियंत्रणों की अधिकता से भ्रष्टाचार, लालफ़ीताशाही और अकुशलता पनपी, और कई सरकारी उपक्रम लगातार घाटे में रहे।
◆ सुरक्षा और लोकतंत्र पर आघात — 1962 की हार ने रक्षा-तैयारी की कमी उजागर की, और 1975–77 के आपातकाल ने दिखाया कि लोकतांत्रिक संस्थाएँ कितनी आसानी से दबाई जा सकती हैं।
◆ सामाजिक तनाव — सांप्रदायिक हिंसा (1984, 1992–93), पंजाब, कश्मीर और पूर्वोत्तर में अलगाववाद, जातिगत तनाव और राजनीति में धन तथा अपराध का बढ़ता प्रभाव बड़ी चुनौतियाँ बने रहे।
🔍 आसान परिभाषा: "हिंदू विकास दर" |
📘 परिभाषा: 1950 से 1980 के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था की औसत वार्षिक वृद्धि दर, जो लगभग 3.5% पर टिकी रही; यह शब्द अर्थशास्त्री राज कृष्ण ने दिया था। |
💡 आसान भाषा में: जैसे कोई विद्यार्थी हर वर्ष मेहनत के बावजूद लगभग उतने ही अंक लाता रहे — न बहुत गिरे, न बहुत बढ़े। जनसंख्या लगभग 2% की दर से बढ़ रही थी, इसलिए हर व्यक्ति की आय वास्तव में केवल डेढ़ प्रतिशत के आसपास बढ़ती थी। 🏠 उदाहरण: 1980 के दशक में यह दर बढ़कर लगभग 5.5% हुई और 1991 के सुधारों के बाद 6% से ऊपर पहुँच गई। इस शब्द का किसी धर्म से कोई संबंध नहीं है। |
वर्ष | घटना |
1950–51 | योजना आयोग बना (15 मार्च 1950), पहली पंचवर्षीय योजना शुरू हुई, पोचमपल्ली से भूदान आंदोलन चला और पहला संविधान संशोधन हुआ। |
1951–52 | पहला आम चुनाव हुआ और नेहरू पहले निर्वाचित प्रधानमंत्री बने। |
1952 | सामुदायिक विकास कार्यक्रम शुरू हुआ और राष्ट्रीय विकास परिषद बनी। |
1954–56 | पंचशील समझौता (1954), बांडुंग सम्मेलन और आवड़ी अधिवेशन (1955) तथा दूसरी औद्योगिक नीति और दूसरी योजना (1956) आईं। |
1959 | नागौर में पंचायती राज शुरू हुआ, दलाई लामा भारत आए और स्वतंत्र पार्टी बनी। |
1961–62 | बेलग्रेड में पहला गुटनिरपेक्ष सम्मेलन हुआ, गोवा मुक्त हुआ और 1962 में चीन ने आक्रमण किया। |
1964–66 | नेहरू का निधन हुआ, शास्त्री प्रधानमंत्री बने, 1965 का युद्ध और ताशकंद समझौता हुआ, फिर इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनीं। |
1966–67 | रुपये का अवमूल्यन हुआ, हरित क्रांति शुरू हुई, चौथे चुनाव में कांग्रेस को झटका लगा और नक्सलबाड़ी विद्रोह हुआ। |
1969 | चौदह बैंकों का राष्ट्रीयकरण हुआ (19 जुलाई) और कांग्रेस का विभाजन हुआ। |
1970–72 | ऑपरेशन फ़्लड शुरू हुआ, "ग़रीबी हटाओ" पर इंदिरा जीतीं, बांग्लादेश बना (1971) और शिमला समझौता हुआ (1972)। |
1974 | जेपी ने संपूर्ण क्रांति का आह्वान किया और पोखरण में पहला परमाणु परीक्षण हुआ। |
1975–77 | आपातकाल लगा (25 जून 1975 से 21 मार्च 1977) और 42वाँ संशोधन हुआ (1976)। |
1977–79 | जनता सरकार बनी, 44वाँ संशोधन हुआ (1978) और मंडल आयोग गठित हुआ (1979)। |
1984 | ऑपरेशन ब्लू स्टार, इंदिरा गांधी की हत्या और भोपाल गैस त्रासदी हुई। |
1985–87 | दल-बदल विरोधी क़ानून बना, पंजाब, असम और मिज़ो समझौते हुए और भारतीय शांति सेना श्रीलंका गई। |
1989–90 | मतदान की आयु 18 वर्ष हुई, राष्ट्रीय मोर्चा सरकार बनी और मंडल आयोग की सिफ़ारिश लागू करने की घोषणा हुई। |
1991 | राजीव गांधी की हत्या हुई और नरसिम्हा राव सरकार ने आर्थिक सुधार शुरू किए (नई औद्योगिक नीति 24 जुलाई)। |
1992–93 | अयोध्या की घटना हुई, इंद्रा साहनी निर्णय आया और 73वाँ तथा 74वाँ संशोधन लागू हुए। |
1995–96 | भारत विश्व व्यापार संगठन का संस्थापक सदस्य बना (1995) और 1996 से गठबंधन सरकारों का दौर शुरू हुआ। |
1998–99 | पोखरण-2 परीक्षण हुए (मई 1998), वाजपेयी लाहौर गए और कारगिल युद्ध हुआ (1999)। |
2000 | छत्तीसगढ़, उत्तरांचल और झारखंड तीन नए राज्य बने। |
🔑 कीवर्ड सार नियति से साक्षात्कार • सुकुमार सेन • योजना आयोग (1950) • महालनोबिस • समाजवादी ढंग का समाज • ज़मींदारी उन्मूलन • नौवीं अनुसूची • नागौर (1959) • पोचमपल्ली • स्वामीनाथन-बोरलॉग • कुरियन गुटनिरपेक्षता • पंचशील (1954) • बांडुंग (1955) • बेलग्रेड (1961) • मैकमोहन रेखा • अक्साई चिन • जय जवान, जय किसान • ताशकंद • बैंक राष्ट्रीयकरण (1969) • ग़रीबी हटाओ • शिमला समझौता • स्माइलिंग बुद्धा संपूर्ण क्रांति • अनुच्छेद 352 • 42वाँ और 44वाँ संशोधन • शाह आयोग • ऑपरेशन ब्लू स्टार • दसवीं अनुसूची • मंडल (27%) • इंद्रा साहनी • भुगतान संतुलन • एल.पी.जी. • गुजराल सिद्धांत • ऑपरेशन शक्ति • ऑपरेशन विजय |
💡 अंतिम बात 1947 में जिस लोकतंत्र को "अंधेरे में छलांग" कहा गया था, वह पचास वर्षों में युद्ध, अकाल, आपातकाल और आर्थिक संकट — सबसे गुज़रकर और मज़बूत हुआ। योजनाओं ने नींव रखी, हरित क्रांति ने पेट भरा, 1977 के मतदाता ने स्वतंत्रता बचाई और 1991 के सुधारों ने नई उड़ान दी। इस पूरी यात्रा के पीछे एक और शक्ति चुपचाप काम कर रही थी — विज्ञान। अगले अध्याय में पढ़ेंगे स्वतंत्र भारत में विज्ञान और प्रौद्योगिकी की कहानी: परमाणु ऊर्जा, अंतरिक्ष कार्यक्रम, रक्षा अनुसंधान, सूचना प्रौद्योगिकी और वे वैज्ञानिक जिन्होंने इसे संभव बनाया। |