🧩 कहानी से शुरुआत: एक "पैबंद वाली चादर" 15 अगस्त 1947। आज़ाद भारत का नक्शा किसी पैबंद लगी चादर जैसा था। ब्रिटिश प्रांतों के बीच-बीच में 560 से अधिक रियासतें थीं। कुछ केवल कुछ गाँवों जितनी छोटी थीं, तो हैदराबाद की अपनी सेना, मुद्रा, रेल और डाक-व्यवस्था तक थी। अंग्रेज़ों की सर्वोच्चता समाप्त हो चुकी थी, इसलिए रियासतें चाहें तो भारत में मिलें, चाहें पाकिस्तान में, और चाहें तो अलग रहें। ख़तरा बहुत बड़ा था। अगर हर राजा अपना अलग देश बना लेता, तो भारत का नक्शा सैकड़ों टुकड़ों में बिखर जाता। इस असंभव-से काम को 5 जुलाई 1947 को बने रियासती विभाग ने उठाया। उसके मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल थे और सचिव वी. पी. मेनन। पटेल ने राजाओं से कहा कि वे केवल रक्षा, विदेश मामले और संचार भारत को सौंप दें। कभी प्रिवी पर्स और सम्मान का आश्वासन मिला, कभी जनता का आंदोलन काम आया, कभी आर्थिक नाकेबंदी हुई और अंत में ज़रूरत पड़ने पर सेना भेजी गई। लगभग दो वर्षों में यह चादर एक अखंड वस्त्र बन गई। पर कहानी यहीं ख़त्म नहीं हुई। अब एक दूसरा सवाल सामने था। इस अखंड भारत के भीतर राज्यों की सीमाएँ कैसे खींची जाएँ, भाषा के आधार पर या प्रशासन की सुविधा के आधार पर? देश अभी धर्म के आधार पर बँटा था, इसलिए नेता भाषा के आधार से झिझक रहे थे। तभी 19 अक्टूबर 1952 को एक गांधीवादी कार्यकर्ता पोट्टि श्रीरामुलु ने अलग आंध्र राज्य के लिए आमरण अनशन शुरू किया। 58 दिन बाद, 15 दिसंबर 1952 को उनकी मृत्यु हो गई। इस मृत्यु ने इस प्रश्न का उत्तर बदल दिया। यह अध्याय इन्हीं दो कहानियों का है: जोड़ने की और नए सिरे से सजाने की। राजाओं ने विलय पत्र पर हस्ताक्षर कैसे किए? जूनागढ़, हैदराबाद और कश्मीर में क्या हुआ? और 1956 में भारत का नया नक्शा कैसे बना? आगे दो कहानियाँ भी मिलेंगी, जो जनता की इच्छा के सिद्धांत और भाषा के आधार पर बने पहले राज्य को आसान तरीक़े से समझा देंगी। |
अंग्रेज़ी शासन के समय भारत दो हिस्सों में बँटा था। एक था ब्रिटिश भारत — बंगाल, बम्बई, मद्रास, संयुक्त प्रांत जैसे प्रांत, जिन पर अंग्रेज़ सीधे शासन करते थे। दूसरा था रियासती भारत — वे देशी रियासतें (राज्य), जिन पर भारतीय राजा, महाराजा, नवाब या निज़ाम शासन करते थे, पर वे सब अंग्रेज़ों की अधीनता स्वीकार कर चुके थे। स्वतंत्रता के समय भारत को जोड़ने की सबसे बड़ी समस्या इन्हीं रियासतों से जुड़ी थी, इसलिए पहले समझें कि ये थीं क्या।
◆ संख्या — 1947 में लगभग 560 से 565 देशी रियासतें थीं। अलग-अलग पुस्तकों में संख्या थोड़ी अलग मिलती है (562, 565 आदि), क्योंकि कुछ छोटी जागीरों को अलग गिना जाता था और कुछ को नहीं। परीक्षा के लिए "लगभग 562" या "560 से अधिक" याद रखें।
◆ क्षेत्र और जनसंख्या — ये रियासतें उपमहाद्वीप के लगभग 40% क्षेत्र में फैली थीं और लगभग एक-चौथाई आबादी इनमें रहती थी। यानी हर चार भारतीयों में से एक किसी राजा की प्रजा था।
◆ आकार में भारी अंतर — हैदराबाद जनसंख्या और आय में सबसे बड़ी रियासत थी; उसकी अपनी सेना, मुद्रा, रेल और डाक-व्यवस्था थी। जम्मू-कश्मीर क्षेत्रफल में सबसे बड़ी थी। दूसरी ओर काठियावाड़ (सौराष्ट्र) में ऐसी सैकड़ों रियासतें और जागीरें थीं, जो कुछ गाँवों या कुछ एकड़ ज़मीन जितनी छोटी थीं।
◆ शासन का स्तर — मैसूर, बड़ौदा, त्रावणकोर जैसी कुछ रियासतें शिक्षा और उद्योग में ब्रिटिश प्रांतों से भी आगे थीं, जबकि अधिकांश छोटी रियासतों में शासन पुराने ढंग का, निरंकुश और सामंती था। वहाँ प्रजा को न चुनाव का अधिकार था, न बोलने की आज़ादी।
🔍 आसान परिभाषा: सर्वोच्चता (पैरामाउंटसी) |
📘 परिभाषा: ब्रिटिश सम्राट (क्राउन) का वह सर्वोपरि अधिकार, जिसके अंतर्गत देशी रियासतें अपनी रक्षा, विदेश-संबंध और संचार अंग्रेज़ों को सौंप चुकी थीं, और बदले में अंग्रेज़ उनकी रक्षा करते थे तथा आवश्यकता पड़ने पर उनके आंतरिक मामलों में भी हस्तक्षेप कर सकते थे। |
💡 आसान भाषा में: राजा अपने राज्य के भीतर राज करता था, पर उसके ऊपर एक "बड़ा मालिक" — अंग्रेज़ सरकार — बैठा था। राजा न किसी दूसरे देश से संधि कर सकता था, न सेना बढ़ा सकता था, और ग़लत शासन करने पर उसे गद्दी से हटाया भी जा सकता था। 🏠 उदाहरण: हर बड़ी रियासत में अंग्रेज़ रेज़िडेंट और छोटी रियासतों के समूह में पॉलिटिकल एजेंट रहता था, जो वायसराय (क्राउन प्रतिनिधि) की ओर से राजा पर नज़र रखता था। |
◆ सर्वोच्चता कैसे बनी — अठारहवीं-उन्नीसवीं सदी में सहायक संधि (लॉर्ड वेलेज़ली, 1798) जैसी व्यवस्थाओं से रियासतें कंपनी के अधीन हुईं। 1858 की महारानी की घोषणा ने विलय की नीति छोड़ दी और राजाओं को उनकी गद्दी की गारंटी दी; अब अंग्रेज़ रियासतों को मिलाने के बजाय उन्हें अपने वफ़ादार सहयोगी के रूप में बनाए रखने लगे (अध्याय 3)।
◆ नरेंद्र मंडल (1921) — 1919 के सुधारों के बाद 1921 में राजाओं का एक सलाहकार मंच बना, जिसे नरेंद्र मंडल (चैंबर ऑफ़ प्रिंसेज़) कहा गया। इसकी बैठकें वायसराय की अध्यक्षता में होती थीं और राजाओं में से एक चांसलर चुना जाता था। 1947 में इसके चांसलर भोपाल के नवाब हमीदुल्ला ख़ाँ थे।
◆ बटलर समिति (1927–29) — सर हरकोर्ट बटलर की अध्यक्षता में बनी इस समिति ने अंग्रेज़ सरकार और रियासतों के संबंधों की जाँच की। उसकी रिपोर्ट (1929) ने कहा कि सर्वोच्चता सर्वोपरि ही रहेगी और राजाओं का संबंध ब्रिटिश सम्राट से है, भारत सरकार से नहीं। इसका अर्थ यह निकला कि भविष्य में भारतीयों की सरकार बनी तो सर्वोच्चता अपने-आप उसे नहीं मिलेगी — यही बात 1947 में सबसे बड़ी उलझन बनी।
◆ 1935 का संघ प्रस्ताव — भारत शासन अधिनियम 1935 ने ब्रिटिश प्रांतों और रियासतों को मिलाकर एक अखिल भारतीय संघ बनाने का प्रस्ताव रखा था, पर यह तभी बनता जब पर्याप्त रियासतें इसमें शामिल होतीं। राजाओं ने रुचि नहीं दिखाई, इसलिए संघ कभी बन ही नहीं पाया।
◆ कैबिनेट मिशन (1946) — मिशन ने घोषणा की कि भारत के स्वतंत्र होते ही सर्वोच्चता समाप्त हो जाएगी और यह अधिकार न तो भारत की नई सरकार को मिलेगा, न किसी और को; रियासतें अपने भविष्य के बारे में स्वयं बातचीत करेंगी।
◆ 3 जून 1947 की माउंटबेटन योजना — विभाजन की योजना में भी यही कहा गया कि 15 अगस्त 1947 से ब्रिटिश सर्वोच्चता समाप्त होगी और रियासतें भारत या पाकिस्तान में से किसी एक में शामिल होने के लिए स्वतंत्र होंगी।
◆ भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947, धारा 7 — इस क़ानून की धारा 7 ने औपचारिक रूप से घोषणा की कि 15 अगस्त से सम्राट की सर्वोच्चता समाप्त (लैप्स) हो जाएगी और रियासतों के साथ की गई सभी संधियाँ भी ख़त्म हो जाएँगी। क़ानूनी रूप से अब हर रियासत के सामने तीन रास्ते थे — भारत में शामिल हो, पाकिस्तान में शामिल हो, या (सिद्धांततः) स्वतंत्र रहे।
🔍 आसान परिभाषा: बाल्कनीकरण |
📘 परिभाषा: किसी बड़े देश या क्षेत्र का अनेक छोटे-छोटे, आपस में विरोधी और कमज़ोर राज्यों में बँट जाना। यह शब्द यूरोप के बाल्कन प्रायद्वीप से बना, जहाँ उन्नीसवीं-बीसवीं सदी में अनेक छोटे-छोटे राज्य आपस में लड़ते रहे। |
💡 आसान भाषा में: अगर हर राजा अपना अलग देश बना लेता, तो भारत का नक्शा सैकड़ों टुकड़ों में बिखर जाता — हर टुकड़े की अपनी सीमा, अपनी चुंगी, अपनी सेना। यही ख़तरा "भारत का बाल्कनीकरण" कहलाया। 🏠 उदाहरण: यदि हैदराबाद अलग देश बन जाता तो भारत के ठीक बीच में एक विदेशी देश होता और उत्तर से दक्षिण जाने वाली रेल, सड़क और डाक उसी से होकर गुज़रतीं। |
◆ ख़तरा किसने बढ़ाया? — कई राजा — हैदराबाद, त्रावणकोर, भोपाल, जोधपुर, कश्मीर — स्वतंत्र रहने या पाकिस्तान से मिलने के सपने देख रहे थे। अंग्रेज़ी सरकार के राजनीतिक विभाग (पॉलिटिकल डिपार्टमेंट) के प्रमुख सर कॉनरैड कॉरफ़ील्ड ने जाते-जाते रियासतों से जुड़े कई गोपनीय दस्तावेज़ नष्ट करवाए और राजाओं को अलग रहने के लिए प्रोत्साहित किया। उधर जिन्ना ने कहा कि रियासतें स्वतंत्र रहने को पूरी तरह आज़ाद हैं, क्योंकि जितनी अधिक रियासतें भारत से बाहर रहतीं, भारत उतना कमज़ोर होता।
◆ जनता की ताक़त — दूसरी ओर रियासतों की जनता प्रजामंडलों और अखिल भारतीय देशी राज्य प्रजा परिषद (1927) के माध्यम से वर्षों से उत्तरदायी शासन और भारत में मिलने की माँग कर रही थी। जवाहरलाल नेहरू इस परिषद के अध्यक्ष भी रहे। इसी जन-दबाव ने आगे चलकर एकीकरण को सबसे बड़ी शक्ति दी — कई राजा अपनी ही प्रजा के आंदोलन के सामने झुके (अध्याय 15)।
बिंदु | स्थिति (1947) — पूरे अर्थ में |
संख्या | स्वतंत्रता के समय लगभग 560–565 देशी रियासतें थीं। |
क्षेत्र और जनसंख्या | ये उपमहाद्वीप के लगभग 40% क्षेत्र में फैली थीं और लगभग एक-चौथाई आबादी इनमें रहती थी। |
आकार | जनसंख्या और आय में हैदराबाद तथा क्षेत्रफल में जम्मू-कश्मीर सबसे बड़ी थी, जबकि काठियावाड़ की कई जागीरें कुछ गाँवों जितनी छोटी थीं। |
अंग्रेज़ों से संबंध | सर्वोच्चता के अंतर्गत रक्षा, विदेश और संचार अंग्रेज़ों के हाथ में थे और रेज़िडेंट तथा पॉलिटिकल एजेंट राजाओं पर नज़र रखते थे। |
राजाओं का मंच | नरेंद्र मंडल (1921) राजाओं का मंच था, जिसके अंतिम चांसलर भोपाल के नवाब हमीदुल्ला ख़ाँ थे। |
1947 का क़ानून | भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम की धारा 7 ने 15 अगस्त से सर्वोच्चता समाप्त कर दी, इसलिए रियासतें क़ानूनी रूप से भारत या पाकिस्तान में मिलने या स्वतंत्र रहने को आज़ाद हो गईं। |
स्वतंत्रता में केवल छह सप्ताह बचे थे। इतने कम समय में सैकड़ों राजाओं को भारत में लाने के लिए एक विशेष सरकारी विभाग, एक दृढ़ नेता, एक कुशल अधिकारी और एक सरल क़ानूनी दस्तावेज़ की ज़रूरत थी। ये चारों चीज़ें — रियासती विभाग, सरदार पटेल, वी. पी. मेनन और विलय पत्र — इस खंड का विषय हैं।
◆ गठन — अंतरिम सरकार ने 27 जून 1947 को रियासतों से बातचीत के लिए एक नया विभाग बनाने का निर्णय लिया और 5 जुलाई 1947 को रियासती विभाग (स्टेट्स डिपार्टमेंट) ने काम शुरू किया। अंग्रेज़ों का पुराना "राजनीतिक विभाग" समाप्त हो रहा था; अब रियासतों से संबंध भारत सरकार का यह नया विभाग देखने वाला था।
◆ कौन — विभाग के मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल (गृह मंत्री) थे और सचिव वी. पी. मेनन। पटेल ने राजनीतिक नेतृत्व दिया, मेनन ने दस्तावेज़ तैयार करने और राजाओं से आमने-सामने बातचीत का ज़मीनी काम सँभाला, और गवर्नर-जनरल माउंटबेटन ने राजाओं पर अपने व्यक्तिगत प्रभाव का उपयोग किया — इस तरह तीनों का त्रिकोणीय सहयोग बना।
◆ 5 जुलाई की अपील — उसी दिन पटेल ने राजाओं के नाम एक भावुक अपील जारी की। उन्होंने कहा कि भारत रियासतों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहता; राजा केवल तीन विषय — रक्षा, विदेश मामले और संचार — भारत को सौंप दें, जो वैसे भी अंग्रेज़ों के ज़माने में उनके पास नहीं थे। उन्होंने राजाओं से कहा कि वे मित्र के रूप में एक मेज़ पर बैठकर देश का भविष्य बनाएँ, न कि विदेशी शक्तियों के हाथ की कठपुतली बनें।
31 अक्टूबर 1875 को गुजरात के नडियाद में जन्मे पटेल ने इंग्लैंड से बैरिस्टरी पढ़ी और अहमदाबाद में सफल वकील बने। गांधीजी के प्रभाव में वे खेड़ा सत्याग्रह (1918) में आए और बारदोली सत्याग्रह (1928) की सफलता के बाद वहाँ की स्त्रियों ने उन्हें "सरदार" की उपाधि दी। वे 1931 के कराची अधिवेशन में कांग्रेस के अध्यक्ष रहे। स्वतंत्र भारत में वे पहले उप-प्रधानमंत्री और गृह मंत्री बने और रियासतों के एकीकरण का सबसे कठिन काम उन्हीं के नेतृत्व में पूरा हुआ। इसी कारण उन्हें "लौह पुरुष" और जर्मनी को एक करने वाले बिस्मार्क की तुलना में "भारत का बिस्मार्क" कहा जाता है। 15 दिसंबर 1950 को बम्बई में उनका निधन हुआ; 1991 में उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न मिला, 2014 से उनकी जयंती 31 अक्टूबर को राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाई जाती है और 2018 में गुजरात के केवड़िया में उनकी विशाल प्रतिमा "स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी" का लोकार्पण हुआ।
वप्पला पंगुन्नी मेनन का जन्म केरल (मालाबार) में हुआ। उनकी यात्रा असाधारण थी — उन्होंने सरकारी सेवा एक साधारण क्लर्क के रूप में शुरू की और अपनी योग्यता के बल पर वायसराय के संवैधानिक सुधार आयुक्त (रिफ़ॉर्म्स कमिश्नर) के ऊँचे पद तक पहुँचे — यह पद पाने वाले वे पहले भारतीय थे। सत्ता-हस्तांतरण की जिस योजना पर 3 जून 1947 की माउंटबेटन योजना आधारित थी, उसका प्रारूप तैयार करने में उनकी बड़ी भूमिका थी। रियासती विभाग के सचिव के रूप में उन्होंने विलय पत्र और यथास्थिति समझौते के प्रारूप बनाए और सैकड़ों राजाओं से व्यक्तिगत बातचीत की। बाद में उन्होंने दो प्रसिद्ध पुस्तकें लिखीं — "द स्टोरी ऑफ़ द इंटीग्रेशन ऑफ़ द इंडियन स्टेट्स" (1956) और "द ट्रांसफ़र ऑफ़ पावर इन इंडिया" (1957)।
◆ 25 जुलाई 1947 को माउंटबेटन ने दिल्ली में नरेंद्र मंडल की बैठक को संबोधित किया। वे राजाओं से भारत के गवर्नर-जनरल के रूप में नहीं, बल्कि ब्रिटिश सम्राट के प्रतिनिधि और उनके पुराने मित्र के रूप में बात कर रहे थे, इसलिए उनकी बात का वज़न बहुत अधिक था।
◆ उन्होंने राजाओं को समझाया कि सर्वोच्चता ख़त्म होने के बाद उन्हें अब अंग्रेज़ों से कोई सैन्य सुरक्षा नहीं मिलेगी। भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि अधिकांश रियासतें चारों ओर से भारत से घिरी हैं, इसलिए अलग रहना व्यावहारिक नहीं है; और रेल, डाक, बंदरगाह, व्यापार — सब के लिए उन्हें भारत पर निर्भर रहना ही होगा। इसलिए अपनी जनता की इच्छा और भूगोल देखते हुए 15 अगस्त से पहले विलय कर लेना ही उनके हित में है।
◆ इसका परिणाम यह हुआ कि अनिश्चय में पड़े अनेक राजाओं ने अगले तीन सप्ताह में विलय पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए।
पटेल की रणनीति को "गाजर और डंडे की नीति" कहा जाता है — यानी पहले प्रलोभन और सम्मान (गाजर), और न मानने पर दबाव (डंडा)। इसके दोनों पहलू इस प्रकार थे:
◆ गाजर — राजाओं को क्या आश्वासन मिला — राजाओं से वादा किया गया कि उन्हें हर वर्ष कर-मुक्त प्रिवी पर्स (राजभत्ता) मिलेगा; उनके महल और निजी संपत्ति उनके पास रहेंगे; उनकी उपाधियाँ, झंडे, तोपों की सलामी और अन्य सम्मान बने रहेंगे; और कई शासकों को राजप्रमुख या राज्यपाल जैसे ऊँचे संवैधानिक पद दिए जाएँगे। सबसे बड़ी बात — पहले चरण में उनसे केवल तीन विषय माँगे गए, पूरा राज्य नहीं।
◆ डंडा — न मानने पर क्या — जो राजा आनाकानी करते, उनके विरुद्ध प्रजामंडलों का जन-आंदोलन तेज़ होता, कई बार आर्थिक नाकेबंदी (रसद, कोयला, पेट्रोल की आपूर्ति रोकना) की गई, और अंत में — जूनागढ़ और हैदराबाद की तरह — सेना भी भेजी गई। पटेल ने साफ़ कहा था कि भारत की एकता पर कोई समझौता नहीं होगा।
◆ उदाहरण — जोधपुर के महाराजा को पाकिस्तान की ओर जाने से रोकने के लिए उन्हें सम्मान और अनाज-आपूर्ति का आश्वासन दिया गया (गाजर), जबकि हैदराबाद के निज़ाम के हठ के सामने अंततः सैन्य कार्रवाई की गई (डंडा)।
एकीकरण का पहला चरण दो क़ानूनी दस्तावेज़ों पर टिका था। दोनों के प्रारूप वी. पी. मेनन ने तैयार किए थे। इनका अंतर समझना परीक्षा की दृष्टि से बहुत ज़रूरी है।
🔍 आसान परिभाषा: विलय पत्र (इंस्ट्रूमेंट ऑफ़ एक्सेशन) |
📘 परिभाषा: वह क़ानूनी दस्तावेज़ जिस पर हस्ताक्षर करके कोई रियासत भारत डोमिनियन में शामिल होती थी और रक्षा, विदेश मामले और संचार — इन तीन विषयों पर क़ानून बनाने का अधिकार भारत की संसद (केंद्र) को सौंप देती थी। |
💡 आसान भाषा में: राजा मानो यह कह रहा था — "आज से हमारी सुरक्षा, विदेश नीति और डाक-तार-रेल भारत सरकार देखेगी; बाक़ी राज अभी हम चलाएँगे।" विलय पत्र पर हस्ताक्षर होते ही रियासत भारत का हिस्सा बन जाती थी, भले ही उसका भीतरी शासन कुछ समय तक राजा के पास रहा। 🏠 उदाहरण: लगभग सभी रियासतों ने 15 अगस्त 1947 तक विलय पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए; जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरि सिंह ने 26 अक्टूबर 1947 को इस पर हस्ताक्षर किए। |
◆ विलय पत्र की ख़ास बातें — इसका प्रारूप सभी रियासतों के लिए लगभग एक जैसा रखा गया, ताकि किसी राजा को यह शिकायत न हो कि दूसरे को अधिक छूट मिली। इसमें लिखा था कि राजा बाद के किसी संविधान को मानने के लिए बाध्य नहीं होगा, जब तक वह स्वयं स्वीकार न करे — इसलिए राजाओं को यह दस्तावेज़ सुरक्षित लगा।
🔍 आसान परिभाषा: यथास्थिति समझौता (स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट) |
📘 परिभाषा: भारत (या पाकिस्तान) और किसी रियासत के बीच किया गया वह अस्थायी समझौता, जिसके अनुसार विलय पर अंतिम निर्णय होने तक दोनों के बीच की पुरानी प्रशासनिक और आर्थिक व्यवस्थाएँ — डाक, तार, रेल, सीमा-शुल्क, मुद्रा, सिंचाई आदि — जैसी चल रही थीं, वैसी ही चलती रहेंगी। |
💡 आसान भाषा में: "यथास्थिति" का अर्थ है "जैसी स्थिति है, वैसी ही"। यानी जब तक फ़ैसला नहीं होता, तब तक कुछ भी न बदले — ट्रेनें वैसे ही चलें, चिट्ठियाँ वैसे ही पहुँचें। यह विलय नहीं था, केवल बीच की अस्थायी व्यवस्था थी। 🏠 उदाहरण: हैदराबाद ने भारत के साथ 29 नवंबर 1947 को एक वर्ष का यथास्थिति समझौता किया; जम्मू-कश्मीर ने अगस्त 1947 में पाकिस्तान के साथ यथास्थिति समझौता किया, भारत के साथ नहीं। |
नीचे की तुलना दोनों दस्तावेज़ों का सार है — ऊपर की परिभाषाएँ पढ़ने के बाद इसे दोहराव के रूप में देखें।
📜 विलय पत्र ✔ इस पर हस्ताक्षर से रियासत भारत में शामिल हो जाती थी। ✔ केवल तीन विषय — रक्षा, विदेश, संचार — केंद्र को सौंपे जाते थे। ✔ शेष विषयों में शासक की सत्ता पहले चरण में बनी रहती थी। ✔ आगे चलकर विलय समझौतों से रियासतें प्रांतों या राज्य-संघों में पूरी तरह मिल गईं। | 🤝 यथास्थिति समझौता ✔ विलय तय होने तक डाक, तार, रेल, सीमा-शुल्क और मुद्रा जैसी पुरानी व्यवस्थाएँ वैसी ही चलती रहती थीं। ✔ यह विलय नहीं था, केवल अस्थायी व्यवस्था थी। ✔ उदाहरण: हैदराबाद ने भारत से (29 नवंबर 1947) और कश्मीर ने पाकिस्तान से (अगस्त 1947) ऐसा समझौता किया। |
नीचे का चार्ट पूरे एकीकरण के आठ पड़ावों का सार है। चार्ट केवल याद रखने के लिए है — उसके ठीक नीचे हर पड़ाव को पूरे वाक्यों में समझाया गया है और बताया गया है कि उसका विस्तार अध्याय के किस खंड में है।

◆ 3 जून 1947 — सर्वोच्चता का अंत तय — माउंटबेटन योजना ने तय किया कि 15 अगस्त से ब्रिटिश सर्वोच्चता समाप्त होगी और रियासतें भारत या पाकिस्तान में शामिल होने के लिए स्वतंत्र होंगी। इसी घोषणा से "रियासतों की समस्या" पैदा हुई (खंड 1.3)।
◆ 5 जुलाई 1947 — रियासती विभाग — पटेल के मंत्रित्व और मेनन के सचिवत्व में रियासती विभाग ने काम शुरू किया और उसी दिन पटेल ने तीन विषय सौंपकर भारत में शामिल होने की अपील की (खंड 2.1)।
◆ 25 जुलाई 1947 — नरेंद्र मंडल में माउंटबेटन — माउंटबेटन ने राजाओं को समझाया कि भूगोल और जनता की इच्छा को देखते हुए स्वतंत्र रहना व्यावहारिक नहीं है, इसलिए वे 15 अगस्त से पहले विलय कर लें (खंड 2.4)।
◆ 15 अगस्त 1947 — पहला चरण पूरा — जूनागढ़, हैदराबाद और जम्मू-कश्मीर को छोड़कर लगभग सभी रियासतों ने विलय पत्र (और आवश्यकता होने पर यथास्थिति समझौते) पर हस्ताक्षर कर दिए। यानी केवल छह सप्ताह में सैकड़ों रियासतें भारत का हिस्सा बन गईं।
◆ अक्टूबर–नवंबर 1947 — कश्मीर और जूनागढ़ — 22 अक्टूबर को पाकिस्तान समर्थित कबायलियों ने कश्मीर पर हमला किया, 26 अक्टूबर को महाराजा हरि सिंह ने विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए, और 9 नवंबर को भारत ने जूनागढ़ का प्रशासन अपने हाथ में ले लिया (खंड 4 और 6)।
◆ 1948 — दूसरा चरण: संघ और विलय — सौराष्ट्र, मत्स्य, विंध्य प्रदेश, मध्य भारत, पेप्सू और राजस्थान जैसे राज्य-संघ बने (खंड 3); 20 फ़रवरी को जूनागढ़ में जनमत संग्रह हुआ (खंड 4); और 13–18 सितंबर को हैदराबाद में ऑपरेशन पोलो चला (खंड 5)।
◆ 1949 — अंतिम विलय — बड़ौदा बम्बई प्रांत में मिला, 1 जुलाई को त्रावणकोर-कोचीन संघ बना, भोपाल केंद्र-शासित हुआ, 15 अक्टूबर को मणिपुर और त्रिपुरा भारत में पूरी तरह मिले, और 30 मार्च को वृहत् राजस्थान बना (खंड 3 और 7)।
◆ 26 जनवरी 1950 — संविधान लागू — संविधान ने राज्यों को भाग क, ख, ग और घ में बाँटा; रियासतों से बने संघ "भाग ख" राज्य बने, जिनका संवैधानिक प्रमुख राजप्रमुख कहलाया; और अनुच्छेद 291 ने प्रिवी पर्स की संवैधानिक गारंटी दी (खंड 9 और 10)।
विलय पत्र से रियासतें भारत में आ तो गईं, पर केवल तीन विषय केंद्र के पास थे; बाक़ी शासन अब भी राजाओं का था। सैकड़ों छोटी-छोटी इकाइयों का अलग-अलग शासन न तो आर्थिक रूप से व्यावहारिक था, न लोकतांत्रिक। इसलिए 1948 से 1950 के बीच दूसरा चरण चला, जिसमें रियासतों को पूरी तरह भारत के प्रशासन में मिलाया गया और वहाँ लोकप्रिय (जनता द्वारा चुनी) सरकारें बनाई गईं। यह काम तीन तरीक़ों से हुआ। पहले एक नया शब्द समझ लें:
🔍 आसान परिभाषा: विलय समझौता (मर्जर एग्रीमेंट) |
📘 परिभाषा: वह दूसरा समझौता, जिसके द्वारा किसी रियासत का शासक अपने राज्य का पूरा शासन — केवल तीन विषय नहीं, बल्कि सब कुछ — छोड़ देता था और उसकी रियासत किसी पड़ोसी प्रांत, किसी राज्य-संघ या केंद्र के शासन में पूरी तरह मिल जाती थी। बदले में शासक को प्रिवी पर्स, निजी संपत्ति और सम्मान की गारंटी मिलती थी। |
💡 आसान भाषा में: विलय पत्र से रियासत भारत के "घर" में आई थी; विलय समझौते से वह घर के एक कमरे में पूरी तरह घुल-मिल गई — अब उसकी अलग पहचान और अलग शासन नहीं रहा। 🏠 उदाहरण: उड़ीसा की रियासतों ने दिसंबर 1947 में विलय समझौते किए और 1 जनवरी 1948 से वे उड़ीसा प्रांत का हिस्सा बन गईं। |
जो रियासतें छोटी थीं और भौगोलिक रूप से किसी ब्रिटिश प्रांत से सटी हुई या उसके भीतर घिरी थीं, उन्हें सीधे उसी प्रांत में मिला दिया गया।
◆ उड़ीसा और छत्तीसगढ़ की रियासतें (1 जनवरी 1948) — पूर्वी भारत की लगभग 39 छोटी रियासतों में जनता के आंदोलन और अव्यवस्था बढ़ रही थी। दिसंबर 1947 में पटेल और मेनन ने कटक और नागपुर में इनके शासकों से बैठकें कीं और उन्हें विलय के लिए राज़ी किया। 1 जनवरी 1948 से उड़ीसा की रियासतें उड़ीसा प्रांत में और छत्तीसगढ़ की रियासतें मध्य प्रांत (बाद का मध्य प्रदेश) में मिल गईं। यह दूसरे चरण का पहला प्रयोग था, और इसकी सफलता ने आगे का रास्ता दिखाया। बड़ी रियासत मयूरभंज बाद में 1949 में उड़ीसा में मिली।
◆ दक्षिण की रियासतें — तमिल क्षेत्र की पुडुकोट्टई रियासत 1948 में मद्रास प्रांत में मिलाई गई।
◆ पश्चिम की रियासतें — दक्कन और गुजरात की अनेक छोटी रियासतें 1948 में बम्बई प्रांत में मिलीं। बड़ी रियासतें कोल्हापुर (मार्च 1949) और बड़ौदा (मई 1949) भी बम्बई प्रांत का हिस्सा बनीं। बड़ौदा अपने प्रगतिशील शासन — अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा और पुस्तकालयों — के लिए प्रसिद्ध था।
◆ उत्तर और पूर्व की रियासतें — रामपुर, बनारस और टिहरी गढ़वाल 1949 में संयुक्त प्रांत (उत्तर प्रदेश) में मिलीं। कूच बिहार 1949 में भारत सरकार के अधीन आया और 1 जनवरी 1950 को पश्चिम बंगाल में मिला दिया गया।
जहाँ कई मध्यम और छोटी रियासतें एक साथ सटी थीं और उनकी भाषा-संस्कृति मिलती-जुलती थी, वहाँ उन्हें मिलाकर एक बड़ा राज्य-संघ (यूनियन ऑफ़ स्टेट्स) बनाया गया। हर संघ का अपना मंत्रिमंडल और विधानसभा बनी, और उसका संवैधानिक प्रमुख राजप्रमुख कहलाया।
🔍 आसान परिभाषा: राजप्रमुख |
📘 परिभाषा: रियासतों को मिलाकर बने राज्य-संघ (और 1950 के बाद "भाग ख" राज्य) का संवैधानिक प्रमुख, जिसका पद वैसा ही था जैसा भाग क राज्यों में राज्यपाल का। उसे प्रायः संघ की सबसे बड़ी रियासत के शासकों में से चुना जाता था और वह मंत्रिमंडल की सलाह से काम करता था। 1956 के सातवें संविधान संशोधन से यह पद समाप्त कर दिया गया। |
💡 आसान भाषा में: राजा का राज तो चला गया, पर उसे सम्मान देने के लिए नए राज्य का "औपचारिक मुखिया" बना दिया गया — असली शासन जनता की चुनी सरकार चलाती थी। 🏠 उदाहरण: हैदराबाद में निज़ाम, मैसूर में महाराजा जयचामराजेंद्र वाडियार और मध्य भारत में ग्वालियर के महाराजा जीवाजीराव सिंधिया राजप्रमुख बने। |
◆ संयुक्त काठियावाड़ राज्य / सौराष्ट्र (15 फ़रवरी 1948) — काठियावाड़ प्रायद्वीप में दो सौ से अधिक रियासतें और जागीरें थीं, जिनमें कई बेहद छोटी थीं। इन्हें मिलाकर 15 फ़रवरी 1948 को संयुक्त काठियावाड़ राज्य बना, जो बाद में सौराष्ट्र कहलाया। नवानगर के जाम साहब इसके राजप्रमुख बने और उच्छरंगराय नवलशंकर ढेबर (यू. एन. ढेबर) इसके मुख्यमंत्री। राजधानी राजकोट थी। जूनागढ़ भी 1949 में इसी संघ में मिला दिया गया। 1956 में सौराष्ट्र बम्बई राज्य में और 1960 में गुजरात में गया।
◆ विंध्य प्रदेश (अप्रैल 1948) — बुंदेलखंड और बघेलखंड की लगभग 35 रियासतों को मिलाकर अप्रैल 1948 में यह संघ बना। रीवा के महाराजा इसके राजप्रमुख बने और रीवा ही इसकी राजधानी रही। 1956 में यह नए मध्य प्रदेश का हिस्सा बना।
◆ मध्य भारत (28 मई 1948) — ग्वालियर, इंदौर और मालवा की लगभग बीस से अधिक रियासतों को मिलाकर यह संघ बना, जिसका उद्घाटन 28 मई 1948 को नेहरू ने किया। ग्वालियर के महाराजा जीवाजीराव सिंधिया राजप्रमुख और इंदौर के यशवंतराव होलकर उप-राजप्रमुख बने। इसकी दो राजधानियाँ थीं — सर्दियों में ग्वालियर और गर्मियों में इंदौर। 1956 में यह भी मध्य प्रदेश में मिला।
◆ पटियाला और पूर्वी पंजाब राज्य संघ — पेप्सू (15 जुलाई 1948) — पंजाब की आठ रियासतों — पटियाला, कपूरथला, जींद, नाभा, फ़रीदकोट, मलेरकोटला, नालागढ़ और कलसिया — को मिलाकर यह संघ बना। पटियाला के महाराजा यादवेंद्र सिंह राजप्रमुख बने और राजधानी पटियाला रही। 1956 में पेप्सू पंजाब राज्य में मिला दिया गया।
◆ राजस्थान (1948–1956) — एक उदाहरण — राजपूताना की रियासतें सात चरणों में जुड़ीं। 18 मार्च 1948 को अलवर, भरतपुर, धौलपुर और करौली को मिलाकर मत्स्य संघ बना, जो 1949 में राजस्थान में मिला। 30 मार्च 1949 को जयपुर, जोधपुर, बीकानेर और जैसलमेर के मिलने से वृहत् राजस्थान बना (यही राजस्थान दिवस है; राजधानी जयपुर; पहले प्रधानमंत्री हीरालाल शास्त्री), और 1 नवंबर 1956 को अजमेर-मेरवाड़ा तथा आबू क्षेत्र मिलने के साथ इसका वर्तमान स्वरूप बना। यह दिखाता है कि बड़े संघ एक झटके में नहीं, कई चरणों में बने।
◆ त्रावणकोर-कोचीन (1 जुलाई 1949) — दक्षिण की दो प्रगतिशील और अधिक साक्षर रियासतें — त्रावणकोर और कोचीन — मिलकर 1 जुलाई 1949 को यह संघ बनीं। त्रावणकोर के महाराजा चितिरा तिरुनाल राजप्रमुख बने और राजधानी त्रिवेंद्रम (तिरुवनंतपुरम) रही। 1956 में इसी से केरल राज्य बना।
◆ जो बड़ी रियासतें अकेले ही राज्य बनीं — हैदराबाद, मैसूर और जम्मू-कश्मीर इतनी बड़ी थीं कि उन्हें किसी संघ में मिलाने के बजाय अपनी पुरानी सीमाओं के साथ ही अलग राज्य रखा गया। 1950 में ये भी "भाग ख" राज्य बने और इनके शासक (या उनके प्रतिनिधि) राजप्रमुख बने।
कुछ रियासतें ऐसी थीं जो सीमा पर स्थित होने, सामरिक महत्त्व रखने या अत्यधिक पिछड़ी होने के कारण न तो किसी प्रांत में आसानी से मिल सकती थीं, न अपने बल पर चल सकती थीं। इन्हें केंद्र सरकार ने सीधे अपने हाथ में लेकर मुख्य आयुक्त (चीफ़ कमिश्नर) के माध्यम से चलाया।
◆ हिमाचल प्रदेश (15 अप्रैल 1948) — शिमला की पहाड़ियों की लगभग 30 छोटी पहाड़ी रियासतों को मिलाकर यह केंद्र-शासित इकाई बनी। आगे 1954 में पड़ोसी बिलासपुर भी इसमें मिला और 1971 में यह पूर्ण राज्य बना (खंड 12)।
◆ कच्छ (1 जून 1948) — पाकिस्तान की सीमा से सटे होने के कारण कच्छ को केंद्र के सीधे शासन में रखा गया। 1956 में यह बम्बई राज्य में और 1960 में गुजरात में गया।
◆ भोपाल (1 जून 1949) — नवाब की आनाकानी और जनता के विलीनीकरण आंदोलन के बाद भोपाल केंद्र-शासित इकाई बना (खंड 7)।
◆ बिलासपुर — यह पहाड़ी रियासत कुछ वर्ष अलग केंद्र-शासित इकाई रही और 1954 में हिमाचल प्रदेश में मिली; यहाँ भाखड़ा बाँध का निर्माण होना था, इसलिए इसका महत्त्व था।
◆ मणिपुर और त्रिपुरा (15 अक्टूबर 1949) — पूर्वोत्तर की ये दोनों सीमावर्ती रियासतें विलय समझौतों के बाद केंद्र-शासित इकाइयाँ बनीं और 1972 में पूर्ण राज्य बनीं (खंड 7 और 12)।
💡 दूसरा चरण क्यों ज़रूरी था? पहले चरण के बाद भी यदि सैकड़ों छोटी रियासतें अलग-अलग चलतीं तो हर एक को अपनी पुलिस, अदालत, ख़ज़ाना और प्रशासन रखना पड़ता — जो असंभव ख़र्च था। दूसरा चरण इसलिए ज़रूरी था कि (1) प्रशासन सस्ता और कुशल बने, (2) रियासतों की प्रजा को भी ब्रिटिश प्रांतों की जनता जैसे लोकतांत्रिक अधिकार मिलें, और (3) पूरा देश एक संविधान के अंतर्गत आ सके। इसका परिणाम यह हुआ कि 26 जनवरी 1950 तक 560 से अधिक रियासतें घटकर कुछ राज्य-संघों, प्रांतों और केंद्र-शासित इकाइयों में समा गईं। |
तरीक़ा | उदाहरण — पूरे अर्थ में |
1. पड़ोसी प्रांत में विलय | उड़ीसा और छत्तीसगढ़ की रियासतें 1 जनवरी 1948 को उड़ीसा और मध्य प्रांत में मिलीं, पुडुकोट्टई 1948 में मद्रास में, बड़ौदा और कोल्हापुर 1949 में बम्बई में, और कूच बिहार 1950 में पश्चिम बंगाल में मिला। |
2. रियासतों को मिलाकर राज्य-संघ (भाग ख राज्य) | सौराष्ट्र (फ़रवरी 1948), मत्स्य (मार्च 1948), विंध्य प्रदेश (अप्रैल 1948), मध्य भारत (मई 1948), पेप्सू (जुलाई 1948), राजस्थान (1948–49) और त्रावणकोर-कोचीन (1 जुलाई 1949) इसी तरह बने, और इनका प्रमुख राजप्रमुख कहलाया। |
3. केंद्र-शासित इकाई (भाग ग राज्य) | हिमाचल प्रदेश (अप्रैल 1948), कच्छ, भोपाल, बिलासपुर, मणिपुर और त्रिपुरा को केंद्र ने मुख्य आयुक्त के माध्यम से सीधे अपने शासन में रखा। |
नीचे के मानचित्र में एकीकरण से जुड़े प्रमुख स्थान दिखाए गए हैं। मानचित्र के बाद हर चिह्नित स्थान का अर्थ पूरे वाक्य में दिया गया है; विस्तृत कहानी संबंधित खंड में है।

◆ कठिन रियासतें (लाल चिह्न) — श्रीनगर जम्मू-कश्मीर का प्रतीक है, जिसका विलय 26 अक्टूबर 1947 को हुआ (खंड 6); जूनागढ़ में 1948 के जनमत संग्रह से फ़ैसला हुआ (खंड 4); और हैदराबाद को 1948 में ऑपरेशन पोलो से भारत में मिलाया गया (खंड 5)।
◆ अन्य प्रमुख रियासतें (नीले चिह्न) — पटियाला 1948 में पेप्सू संघ की राजधानी बना; जोधपुर ने अगस्त 1947 में जिन्ना के प्रलोभन के बावजूद भारत में विलय किया (खंड 7); ग्वालियर 1948 में मध्य भारत संघ का केंद्र बना; भोपाल 1949 में केंद्र-शासित हुआ; बड़ौदा 1949 में बम्बई प्रांत में मिला; मैसूर अपनी सीमाओं के साथ भाग ख राज्य बना; और त्रिवेंद्रम 1949 में बने त्रावणकोर-कोचीन संघ की राजधानी था।
◆ पूर्वोत्तर (हरे चिह्न) — इंफाल (मणिपुर) और अगरतला (त्रिपुरा) 15 अक्टूबर 1949 को भारत में पूरी तरह मिले, जबकि गंगटोक (सिक्किम) 1975 में भारत का राज्य बना (खंड 7)।
◆ पुर्तगाली और फ़्रांसीसी क्षेत्र (त्रिकोण और चतुर्भुज) — दादरा और नगर हवेली 1954 में स्वयंसेवकों ने मुक्त कराए और पणजी (गोवा) दिसंबर 1961 में ऑपरेशन विजय से मुक्त हुआ; फ़्रांसीसी चंद्रनगर 1950 में और पांडिचेरी 1954 में भारत को मिला (खंड 8)।
15 अगस्त 1947 तक जिन तीन रियासतों ने भारत में विलय नहीं किया, वे थीं — जूनागढ़, हैदराबाद और जम्मू-कश्मीर। तीनों की कहानी अलग-अलग है, और तीनों का हल भी अलग तरीक़े से निकला। नीचे का आरेख तीनों की तुलना का सार है; इसके बाद जूनागढ़ का विस्तार इसी खंड में, हैदराबाद का खंड 5 में और कश्मीर का खंड 6 में है।

◆ भौगोलिक स्थिति — जूनागढ़ काठियावाड़ (सौराष्ट्र, आज का गुजरात) के दक्षिण-पश्चिमी तट पर स्थित था। इसकी ज़मीनी सीमाएँ चारों ओर से भारत में शामिल होने वाली रियासतों से घिरी थीं और पाकिस्तान से इसका संबंध केवल समुद्र के रास्ते था — कराची लगभग 300 मील दूर था। प्रसिद्ध सोमनाथ मंदिर और गिरनार इसी रियासत में थे।
◆ शासक और जनता — यहाँ के शासक नवाब महाबत ख़ाँ तृतीय थे, जो अपने सैकड़ों कुत्तों के शौक़ के लिए प्रसिद्ध थे। रियासत की लगभग 80% जनता हिंदू थी। मई 1947 में सिंध के मुस्लिम लीगी नेता सर शाहनवाज़ भुट्टो (पाकिस्तान के बाद के प्रधानमंत्री ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो के पिता) यहाँ के दीवान बने और उन्होंने नवाब को पाकिस्तान की ओर मोड़ दिया।
📖 कहानी 1: जब नवाब कुत्तों समेत कराची भाग गया और जनता ने फ़ैसला सुनाया जूनागढ़ काठियावाड़ के दक्षिण-पश्चिमी तट पर था। उसके चारों ओर वे रियासतें थीं जो भारत में शामिल हो चुकी थीं, और पाकिस्तान से उसका संबंध केवल समुद्र के रास्ते था। रियासत की लगभग 80% जनता हिंदू थी, पर नवाब महाबत ख़ाँ तृतीय मुसलमान थे। मई 1947 में शाहनवाज़ भुट्टो यहाँ के दीवान बने और उन्होंने नवाब को पाकिस्तान की ओर मोड़ दिया। 15 अगस्त 1947 को नवाब ने पाकिस्तान में विलय की घोषणा कर दी और पाकिस्तान ने 13 सितंबर को उसे स्वीकार कर लिया। भारत ने इसका विरोध किया, क्योंकि जनता की इच्छा और भूगोल, दोनों इसके विरुद्ध थे। जूनागढ़ की जनता के प्रतिनिधियों ने गांधीजी के भतीजे समलदास गांधी के नेतृत्व में बम्बई में "आरज़ी हुकूमत" (अस्थायी सरकार) बना ली, और उसके स्वयंसेवक रियासत के कई गाँवों पर नियंत्रण करने लगे। भारत ने जूनागढ़ की आर्थिक नाकेबंदी की। डाक, तार, रसद और कोयले-पेट्रोल की आपूर्ति रोक दी गई और आसपास सेना तैनात की गई। रियासत में अव्यवस्था और भुखमरी फैलने लगी। अक्टूबर 1947 के अंत में नवाब अपने परिवार, कुत्तों और ख़ज़ाने का बड़ा हिस्सा लेकर विमान से कराची भाग गया। दीवान भुट्टो ने भारत से प्रशासन सँभालने का अनुरोध किया और 9 नवंबर 1947 को भारत ने जूनागढ़ का प्रशासन अपने हाथ में ले लिया। भारत यहीं नहीं रुका। उसने कहा कि अंतिम निर्णय जनता करेगी। 20 फ़रवरी 1948 को हुए जनमत संग्रह में 99% से अधिक मत भारत के पक्ष में पड़े, जबकि पाकिस्तान के पक्ष में केवल लगभग सौ मत थे। 🧭 इस कहानी से कौन-सी अवधारणा साफ़ हुई ✔ जनता की इच्छा का सिद्धांत — जहाँ शासक और जनता की इच्छा अलग हों, वहाँ भारत ने जनता की इच्छा को निर्णायक माना। इसीलिए सेना भेजने के बाद भी अंतिम मुहर जनमत संग्रह से लगवाई गई। ✔ जनमत संग्रह (प्लेबिसाइट) — किसी क्षेत्र का भविष्य तय करने के लिए वहाँ की पूरी जनता से सीधा मतदान कराना। जूनागढ़ (1948) इसका एक प्रमुख उदाहरण है। ✔ गाजर और डंडे की नीति — जन-आंदोलन और आर्थिक नाकेबंदी का दबाव पटेल की रणनीति का "डंडा" था, जिसने नवाब को भागने पर मजबूर किया। 📝 परीक्षा के लिए: जूनागढ़: नवाब महाबत ख़ाँ तृतीय, दीवान शाहनवाज़ भुट्टो → पाकिस्तान में विलय की घोषणा (15 अगस्त 1947) → आरज़ी हुकूमत (समलदास गांधी) और नाकेबंदी → भारत का प्रशासन (9 नवंबर 1947) → जनमत संग्रह (20 फ़रवरी 1948), 99% से अधिक मत भारत के पक्ष में। |
◆ विलय की घोषणा (15 अगस्त 1947) — स्वतंत्रता के दिन ही नवाब ने पाकिस्तान में विलय की घोषणा कर दी। पाकिस्तान ने कुछ समय चुप रहकर 13 सितंबर 1947 को इस विलय को स्वीकार कर लिया। भारत ने इसका विरोध किया, क्योंकि जनता की इच्छा और भूगोल — दोनों इसके विरुद्ध थे।
◆ मंगरोल और बाबरियावाड़ का प्रश्न — जूनागढ़ के अधीन माने जाने वाले दो छोटे क्षेत्रों — मंगरोल के शेख़ और बाबरियावाड़ के सरदारों — ने स्वयं को स्वतंत्र बताते हुए भारत में विलय कर लिया। जूनागढ़ ने इसे नहीं माना और अपनी सेना भेजकर बाबरियावाड़ पर क़ब्ज़ा कर लिया। इससे टकराव और बढ़ गया।
◆ आरज़ी हुकूमत (सितंबर 1947) — जूनागढ़ की जनता के प्रतिनिधियों ने गांधीजी के भतीजे समलदास गांधी के नेतृत्व में बम्बई में "आरज़ी हुकूमत" (अस्थायी सरकार) की घोषणा की। इसके स्वयंसेवकों ने जूनागढ़ की ओर कूच किया और रियासत के कई गाँवों पर नियंत्रण कर लिया।
◆ भारत की कार्रवाई — भारत ने जूनागढ़ की आर्थिक नाकेबंदी की — डाक, तार, रसद और कोयले-पेट्रोल की आपूर्ति रोक दी गई — और आसपास की रियासतों में सेना तैनात की। रियासत में अव्यवस्था और भुखमरी फैलने लगी।
◆ नवाब का पलायन — अक्टूबर 1947 के अंत में नवाब अपने परिवार, कुत्तों और रियासत के ख़ज़ाने का बड़ा हिस्सा लेकर विमान से कराची भाग गया। पीछे रह गए दीवान शाहनवाज़ भुट्टो ने स्थिति सँभलती न देखकर भारत सरकार से प्रशासन सँभालने का अनुरोध किया।
◆ 9 नवंबर 1947 — भारत ने जूनागढ़ का प्रशासन अपने हाथ में ले लिया। पाकिस्तान ने इसे अपने क्षेत्र पर आक्रमण बताकर विरोध किया।
◆ जनमत संग्रह (20 फ़रवरी 1948) — भारत ने कहा कि अंतिम निर्णय जनता करेगी। 20 फ़रवरी 1948 को हुए जनमत संग्रह में 99% से अधिक मत भारत के पक्ष में पड़े — लगभग पौने दो लाख से अधिक मतों में से पाकिस्तान के पक्ष में केवल लगभग सौ मत थे। आसपास के मंगरोल, बाबरियावाड़ आदि क्षेत्रों में भी यही परिणाम रहा।
◆ आगे — 1949 में जूनागढ़ को सौराष्ट्र संघ में मिला दिया गया; 1956 में यह बम्बई राज्य का हिस्सा बना और 1960 से गुजरात में है।
🔍 आसान परिभाषा: जनमत संग्रह (प्लेबिसाइट) |
📘 परिभाषा: किसी क्षेत्र के भविष्य — जैसे किस देश में शामिल होना है — के प्रश्न पर वहाँ की पूरी जनता से सीधा मतदान कराकर निर्णय लेना। इसमें प्रतिनिधि नहीं, स्वयं जनता "हाँ" या "ना" में फ़ैसला करती है। |
💡 आसान भाषा में: जब यह तय करना हो कि कोई इलाक़ा किसके साथ रहे, तो वहाँ के लोगों से ही पूछ लिया जाए — यही जनमत संग्रह है। 🏠 उदाहरण: जूनागढ़ (1948), चंद्रनगर (1949) और सिक्किम (1975) में जनमत संग्रह से फ़ैसला हुआ; कश्मीर में संयुक्त राष्ट्र का प्रस्तावित जनमत संग्रह कभी नहीं हो पाया। |
◆ जनता की इच्छा का सिद्धांत — जूनागढ़ में भारत ने यह सिद्धांत स्थापित किया कि जहाँ शासक और जनता की इच्छा अलग-अलग हो, वहाँ जनता की इच्छा निर्णायक होगी। इसलिए भारत ने सेना भेजने के बाद भी अंतिम मुहर जनमत संग्रह से लगवाई।
◆ कश्मीर से तुलना — जूनागढ़ में पाकिस्तान ने तर्क दिया कि शासक (नवाब) के निर्णय से विलय वैध है, जबकि कश्मीर में उसने उलटा तर्क दिया कि मुस्लिम-बहुल जनता के कारण कश्मीर पाकिस्तान का होना चाहिए, भले ही शासक ने भारत चुना। यह विरोधाभास इतिहास में बार-बार उल्लेखित होता है।
📌 याद रखें जूनागढ़ की कहानी चार चरणों में — नवाब का पाकिस्तान-विलय (15 अगस्त 1947) → आरज़ी हुकूमत और नाकेबंदी → भारत का प्रशासन (9 नवंबर 1947) → जनमत संग्रह (20 फ़रवरी 1948) — 99% से अधिक मत भारत के पक्ष में। |
बिंदु | विवरण — पूरे अर्थ में |
स्थिति | जूनागढ़ काठियावाड़ के तट पर था, भारतीय रियासतों से घिरा था और पाकिस्तान से केवल समुद्र के रास्ते जुड़ा था। |
शासक और जनता | नवाब महाबत ख़ाँ तृतीय मुसलमान थे, जबकि लगभग 80% जनता हिंदू थी; दीवान शाहनवाज़ भुट्टो थे। |
विवाद | नवाब ने 15 अगस्त 1947 को पाकिस्तान में विलय की घोषणा की और पाकिस्तान ने 13 सितंबर को इसे स्वीकार किया। |
जन-आंदोलन | समलदास गांधी के नेतृत्व में बम्बई में आरज़ी हुकूमत बनी, जिसके स्वयंसेवकों ने जूनागढ़ की ओर कूच किया। |
भारत की कार्रवाई | नाकेबंदी के बाद नवाब कराची भाग गया और 9 नवंबर 1947 को भारत ने प्रशासन सँभाला। |
जनमत संग्रह | 20 फ़रवरी 1948 को हुए जनमत संग्रह में 99% से अधिक मत भारत के पक्ष में पड़े। |
आगे | जूनागढ़ 1949 में सौराष्ट्र संघ में, 1956 में बम्बई राज्य में और 1960 से गुजरात में है। |
हैदराबाद का प्रश्न जूनागढ़ से कहीं अधिक गंभीर था। जूनागढ़ एक छोटी तटीय रियासत थी, जबकि हैदराबाद भारत के ठीक बीच में स्थित सबसे बड़ी और सबसे धनी रियासत थी। यदि यह अलग देश बन जाता तो भारत के उत्तर और दक्षिण के बीच एक विदेशी राज्य खड़ा हो जाता। पटेल ने इसे भारत के "पेट में कैंसर" जैसा बताया था।
◆ आकार और समृद्धि — हैदराबाद का क्षेत्रफल लगभग दो लाख वर्ग किलोमीटर और जनसंख्या लगभग 1.6 करोड़ थी — यानी यह इंग्लैंड और स्कॉटलैंड को मिलाकर भी बड़ा था। इसकी अपनी सेना, मुद्रा (हाली सिक्का), रेल, डाक और रेडियो थे। यह चारों ओर से भारतीय क्षेत्र — मद्रास, बम्बई और मध्य प्रांत — से घिरा था और इसका समुद्र से कोई संपर्क नहीं था।
◆ शासक — यहाँ आसफ़जाही वंश का शासन था, जिसकी नींव 1724 में मुग़ल सूबेदार निज़ाम-उल-मुल्क ने रखी थी। 1947 में सातवें निज़ाम मीर उस्मान अली ख़ाँ (शासन 1911 से) गद्दी पर थे, जिन्हें उस समय संसार के सबसे धनी व्यक्तियों में गिना जाता था।
◆ जनता — रियासत की लगभग 85% जनता हिंदू थी, जबकि सेना, पुलिस और प्रशासन के ऊँचे पदों पर अधिकतर मुसलमान थे। भाषा के आधार पर रियासत तीन हिस्सों में बँटी थी — तेलुगु भाषी तेलंगाना, मराठी भाषी मराठवाड़ा और कन्नड़ भाषी ज़िले।
◆ स्वतंत्रता का सपना — जून 1947 में निज़ाम ने फ़रमान जारी कर कहा कि 15 अगस्त के बाद हैदराबाद न भारत में जाएगा, न पाकिस्तान में, बल्कि स्वतंत्र रहेगा। कुछ समय उसने ब्रिटिश राष्ट्रमंडल के भीतर अलग डोमिनियन का दर्जा भी माँगा, जिसे अंग्रेज़ों ने अस्वीकार कर दिया।
◆ यथास्थिति समझौता (29 नवंबर 1947) — लंबी बातचीत के बाद भारत और हैदराबाद के बीच एक वर्ष का यथास्थिति समझौता हुआ। इसका अर्थ था कि विलय पर निर्णय होने तक पुरानी व्यवस्थाएँ चलती रहेंगी और भारत हैदराबाद में सेना नहीं भेजेगा।
◆ समझौते का उल्लंघन — समझौते के बाद निज़ाम का रुख़ और कड़ा हो गया। दिसंबर 1947 में कट्टरपंथी मीर लायक़ अली रियासत के प्रधानमंत्री बने। निज़ाम ने पाकिस्तान को बड़ी राशि का ऋण दिया, रियासत में भारतीय मुद्रा पर रोक लगाई, और विदेशों से चोरी-छिपे विमानों द्वारा हथियार मँगवाए। भारत ने इन्हें समझौते का खुला उल्लंघन माना।
◆ माउंटबेटन का अंतिम प्रयास — जून 1948 में माउंटबेटन ने भारत छोड़ने से पहले एक समझौता-प्रस्ताव तैयार करवाया, जिसे भारत ने स्वीकार कर लिया, पर निज़ाम ने ठुकरा दिया। इसके बाद बातचीत का रास्ता लगभग बंद हो गया।
◆ कौन थे — मजलिस-ए-इत्तिहाद-उल-मुस्लिमीन (स्थापना 1927) नाम का संगठन हैदराबाद पर मुस्लिम शासन बनाए रखने का समर्थक था। 1946 के बाद इसके नेता क़ासिम रिज़वी ने इसका अर्धसैनिक दल खड़ा किया, जिसके सदस्य रज़ाकार (स्वयंसेवक) कहलाते थे। इनकी संख्या हज़ारों में — कुछ अनुमानों के अनुसार लगभग दो लाख तक — पहुँच गई।
◆ क्या किया — रज़ाकारों ने भारत में विलय चाहने वाली जनता, कांग्रेस कार्यकर्ताओं, हिंदू गाँवों और निज़ाम का विरोध करने वाले उदार मुसलमानों पर भी हमले, लूट और हत्याएँ कीं। पत्रकार शोएबुल्ला ख़ाँ, जो अपने अख़बार में रज़ाकारों की आलोचना करते थे, की अगस्त 1948 में हत्या कर दी गई। रज़ाकारों के आतंक से भागकर हज़ारों लोग पड़ोसी भारतीय प्रांतों में शरण लेने लगे।
◆ हैदराबाद स्टेट कांग्रेस — 1938 में बनी इस संस्था पर निज़ाम ने तुरंत प्रतिबंध लगा दिया था। इसके नेता स्वामी रामानंद तीर्थ ने अगस्त 1947 से "भारत में विलय" की माँग को लेकर सत्याग्रह चलाया; हज़ारों लोग जेल गए और स्वामीजी भी गिरफ़्तार हुए। यह शांतिपूर्ण जन-आंदोलन भारत के पक्ष में सबसे बड़ा नैतिक दबाव था।
◆ तेलंगाना सशस्त्र किसान संघर्ष (1946–1951) — पृष्ठभूमि — तेलंगाना में बड़े ज़मींदार (देशमुख और दोरा) किसानों से भारी लगान वसूलते थे और उनसे "वेट्टी" यानी बेगार (बिना मज़दूरी का ज़बरदस्ती काम) करवाते थे। आंध्र महासभा और कम्युनिस्ट पार्टी ने इस शोषण के विरुद्ध किसानों को संगठित किया।
◆ संघर्ष कैसे चला — जुलाई 1946 में जनगाँव क्षेत्र में ज़मींदार के गुंडों ने किसान कार्यकर्ता दोड्डी कोमरय्या की हत्या कर दी; इसी से संघर्ष सशस्त्र हो गया। धोबी समुदाय की साहसी महिला चाकली ऐलम्मा ने देशमुख के विरुद्ध अपनी ज़मीन बचाने की लड़ाई लड़ी और आंदोलन का प्रतीक बन गईं। पी. सुंदरय्या, रवि नारायण रेड्डी आदि नेताओं के नेतृत्व में किसानों ने लगभग तीन हज़ार गाँवों में ज़मींदारों को भगाकर ग्राम-समितियों का शासन स्थापित किया, बेगार ख़त्म की और लाखों एकड़ ज़मीन भूमिहीनों में बाँटी।
◆ परिणाम — इस संघर्ष ने निज़ाम के शासन की जड़ें हिला दीं। पर ऑपरेशन पोलो के बाद भारतीय सेना ने भी इसे दबाया, क्योंकि कम्युनिस्ट अब भारत सरकार के विरुद्ध भी सशस्त्र संघर्ष जारी रखे हुए थे। अक्टूबर 1951 में कम्युनिस्ट पार्टी ने संघर्ष वापस ले लिया। इसका स्थायी महत्त्व यह रहा कि आगे आंध्र-तेलंगाना में भूमि सुधार और भूदान आंदोलन की ज़मीन तैयार हुई — विनोबा भावे ने 1951 में तेलंगाना के पोचमपल्ली गाँव से ही भूदान आंदोलन आरंभ किया।
◆ संयुक्त राष्ट्र में शिकायत — अगस्त 1948 में निज़ाम ने अपना प्रतिनिधिमंडल भेजकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत के विरुद्ध शिकायत की, ताकि मामला अंतरराष्ट्रीय बन जाए और भारत कार्रवाई न कर सके। भारत का कहना था कि हैदराबाद भारत के भीतर की रियासत है, कोई स्वतंत्र देश नहीं, इसलिए यह भारत का आंतरिक मामला है।
◆ कार्रवाई का निर्णय — रज़ाकारों का आतंक बढ़ने, सीमावर्ती भारतीय क्षेत्रों पर हमलों और बातचीत विफल होने के बाद पटेल ने सैन्य कार्रवाई का निर्णय लिया। गवर्नर-जनरल अब सी. राजगोपालाचारी थे और नेहरू भी अंततः सहमत हुए।
◆ ऑपरेशन पोलो — 13 सितंबर 1948 को भारतीय सेना ने मेजर जनरल जे. एन. चौधरी के नेतृत्व में कई दिशाओं से हैदराबाद में प्रवेश किया। इस अभियान का सांकेतिक नाम "ऑपरेशन पोलो" रखा गया (कहा जाता है कि उस समय हैदराबाद में पोलो के सबसे अधिक मैदान थे)। रज़ाकार और निज़ाम की सेना बहुत कम प्रतिरोध कर सकीं।
◆ आत्मसमर्पण — केवल लगभग चार-पाँच दिनों में लड़ाई ख़त्म हो गई। 17 सितंबर 1948 को निज़ाम ने युद्धविराम और आत्मसमर्पण की घोषणा की, और 18 सितंबर को हैदराबाद की सेना के प्रमुख मेजर जनरल अल-इदरूस ने जनरल चौधरी के सामने औपचारिक रूप से हथियार डाल दिए। मीर लायक़ अली की सरकार भंग हुई और क़ासिम रिज़वी गिरफ़्तार हुआ। निज़ाम ने संयुक्त राष्ट्र से अपनी शिकायत भी वापस ले ली। 17 सितंबर को तेलंगाना में "हैदराबाद मुक्ति दिवस" के रूप में याद किया जाता है।
🔍 आसान परिभाषा: पुलिस कार्रवाई |
📘 परिभाषा: किसी देश द्वारा अपनी ही सीमा के भीतर क़ानून-व्यवस्था बहाल करने के लिए की गई सशस्त्र कार्रवाई, जिसे दो देशों के बीच का "युद्ध" नहीं माना जाता। |
💡 आसान भाषा में: भारत ने ऑपरेशन पोलो को "युद्ध" नहीं, "पुलिस कार्रवाई" कहा — क्योंकि उसके अनुसार हैदराबाद कोई विदेशी देश नहीं था, बल्कि भारत के भीतर की रियासत थी, जहाँ अराजकता फैल गई थी। 🏠 उदाहरण: वास्तव में यह पूरी सैन्य कार्रवाई थी, जिसमें थल सेना और वायु सेना दोनों ने भाग लिया, पर अंतरराष्ट्रीय क़ानून और संयुक्त राष्ट्र की दृष्टि से इसे "पुलिस कार्रवाई" कहना भारत की सोची-समझी नीति थी। |
◆ सैन्य और नागरिक प्रशासन — जनरल जे. एन. चौधरी सैन्य गवर्नर (1948–49) बने। इसके बाद नागरिक प्रशासन आया और 1952 के पहले आम चुनाव के बाद बी. रामकृष्ण राव के नेतृत्व में पहली निर्वाचित सरकार बनी।
◆ निज़ाम राजप्रमुख — निज़ाम को गद्दी से हटाया नहीं गया; 26 जनवरी 1950 से 31 अक्टूबर 1956 तक वे हैदराबाद राज्य के राजप्रमुख रहे। यह पटेल की उदार नीति का उदाहरण था — हार के बाद भी शासक को सम्मान दिया गया।
◆ हिंसा की जाँच — कार्रवाई के दौरान और बाद में कई स्थानों पर सांप्रदायिक हिंसा हुई, जिसकी जाँच के लिए पंडित सुंदरलाल के नेतृत्व में एक समिति भेजी गई थी। यह पक्ष भी इतिहास का हिस्सा है।
◆ राज्य का विभाजन (1956) — राज्य पुनर्गठन अधिनियम से 1 नवंबर 1956 को हैदराबाद राज्य समाप्त हो गया — तेलुगु भाषी तेलंगाना आंध्र प्रदेश में, मराठी भाषी मराठवाड़ा बम्बई राज्य में, और कन्नड़ भाषी ज़िले मैसूर राज्य में गए (खंड 11)।
बिंदु | विवरण — पूरे अर्थ में |
स्थिति | हैदराबाद दक्कन के बीच, चारों ओर से भारत से घिरी देश की सबसे बड़ी और सबसे धनी रियासत थी, जिसकी अपनी सेना, मुद्रा और रेल थी। |
शासक और जनता | निज़ाम मीर उस्मान अली ख़ाँ शासक थे, लगभग 85% जनता हिंदू थी और प्रधानमंत्री मीर लायक़ अली थे। |
यथास्थिति समझौता | 29 नवंबर 1947 को एक वर्ष का समझौता हुआ, पर निज़ाम ने पाकिस्तान को ऋण और हथियार-आयात से उसकी शर्तें तोड़ीं। |
रज़ाकार | क़ासिम रिज़वी के नेतृत्व में इत्तिहाद-उल-मुस्लिमीन के अर्धसैनिक दल ने जनता पर आतंक फैलाया। |
जन-संघर्ष | स्वामी रामानंद तीर्थ की स्टेट कांग्रेस ने सत्याग्रह किया और तेलंगाना में कम्युनिस्टों ने सशस्त्र किसान संघर्ष (1946–51) चलाया। |
ऑपरेशन पोलो | 13 से 18 सितंबर 1948 तक मेजर जनरल जे. एन. चौधरी के नेतृत्व में "पुलिस कार्रवाई" हुई और 17 सितंबर को निज़ाम ने आत्मसमर्पण की घोषणा की। |
आगे | निज़ाम 1950–56 तक राजप्रमुख रहे, 1952 में पहली निर्वाचित सरकार बनी और 1956 में राज्य तीन भाषाई हिस्सों में बँट गया। |
जम्मू-कश्मीर का प्रश्न तीनों में सबसे जटिल निकला और आज तक भारत-पाकिस्तान संबंधों का केंद्र बना हुआ है। यहाँ स्थिति जूनागढ़ और हैदराबाद से उलटी थी — शासक हिंदू था और जनता का बहुमत मुसलमान।
◆ डोगरा राज की शुरुआत — प्रथम आंग्ल-सिख युद्ध के बाद 1846 की अमृतसर संधि से जम्मू के डोगरा सरदार गुलाब सिंह ने कश्मीर घाटी अंग्रेज़ों से ख़रीद ली। तब से यहाँ डोगरा वंश का शासन था। 1947 में महाराजा हरि सिंह (शासन 1925 से) गद्दी पर थे।
◆ जनता और क्षेत्र — रियासत की लगभग 77% जनता मुसलमान थी। इसके तीन बड़े भाग थे — मुस्लिम-बहुल कश्मीर घाटी, हिंदू-बहुल जम्मू और बौद्ध-बहुल लद्दाख; साथ ही उत्तर में गिलगित-बाल्टिस्तान के पहाड़ी क्षेत्र भी इसी रियासत के अंग थे।
◆ शेख़ अब्दुल्ला और नेशनल कॉन्फ़्रेंस — शेख़ मोहम्मद अब्दुल्ला ("शेर-ए-कश्मीर") ने 1932 में मुस्लिम कॉन्फ़्रेंस बनाई, जिसे 1939 में सभी धर्मों के लिए खोलकर नेशनल कॉन्फ़्रेंस का रूप दिया। यह संगठन धर्मनिरपेक्ष था, नेहरू और कांग्रेस के निकट था, और जिन्ना की मुस्लिम लीग का विरोधी था। 1946 में इसने महाराजा के निरंकुश शासन के विरुद्ध "कश्मीर छोड़ो" आंदोलन चलाया, जिसके कारण शेख़ अब्दुल्ला जेल गए।
◆ महाराजा की दुविधा (अगस्त 1947) — महाराजा हरि सिंह न भारत में जाना चाहते थे (जहाँ नेहरू और शेख़ अब्दुल्ला के लोकतांत्रिक विचार उनके निरंकुश शासन के लिए ख़तरा थे), न पाकिस्तान में (जहाँ हिंदू शासक का भविष्य नहीं था)। वे स्वतंत्र रहना चाहते थे। उन्होंने पाकिस्तान के साथ यथास्थिति समझौता किया, पर भारत के साथ नहीं।
◆ पाकिस्तान का दबाव — समझौते के बावजूद पाकिस्तान ने कश्मीर को जाने वाली रसद, पेट्रोल और आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति रोककर आर्थिक दबाव डाला। पुंछ क्षेत्र में महाराजा के विरुद्ध विद्रोह भी भड़क उठा।
◆ कबायली हमला (22 अक्टूबर 1947) — पाकिस्तान के समर्थन और हथियारों से पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत के हज़ारों पठान कबायलियों ने कश्मीर पर आक्रमण कर दिया। उन्होंने मुज़फ़्फ़राबाद पर क़ब्ज़ा किया और बारामूला में भयंकर लूटपाट और हत्याएँ कीं। महाराजा की छोटी-सी सेना टिक न सकी; उसके ब्रिगेडियर राजिंदर सिंह ने उड़ी के पास हमलावरों को रोकते हुए प्राण दिए। श्रीनगर की बिजली भी काट दी गई और हमलावर राजधानी की ओर बढ़ने लगे।
◆ विलय पत्र (26 अक्टूबर 1947) — संकट में महाराजा ने भारत से सैनिक सहायता माँगी। भारत ने स्पष्ट किया कि जब तक कश्मीर भारत का हिस्सा नहीं बनता, वहाँ सेना भेजना क़ानूनी रूप से संभव नहीं। वी. पी. मेनन श्रीनगर गए; महाराजा जम्मू चले गए और वहाँ 26 अक्टूबर 1947 को उन्होंने भारत के साथ विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए। 27 अक्टूबर को गवर्नर-जनरल माउंटबेटन ने इसे स्वीकार किया और अपने पत्र में लिखा कि आक्रमणकारियों को हटाकर शांति स्थापित होने के बाद विलय के प्रश्न पर जनता की राय ली जाएगी।
◆ भारतीय सेना श्रीनगर में (27 अक्टूबर 1947) — अगली सुबह भारतीय सेना की पहली टुकड़ी हवाई मार्ग से श्रीनगर हवाई अड्डे पर उतरी और हमलावरों को श्रीनगर पहुँचने से ठीक पहले रोक दिया। 3 नवंबर 1947 को बडगाम की लड़ाई में मेजर सोमनाथ शर्मा ने वीरगति पाई; उन्हें स्वतंत्र भारत का पहला परमवीर चक्र मिला। नवंबर तक बारामूला और उड़ी वापस ले लिए गए।
◆ शेख़ अब्दुल्ला का प्रशासन — जेल से रिहा हुए शेख़ अब्दुल्ला को 30 अक्टूबर 1947 को आपातकालीन प्रशासन का प्रमुख बनाया गया और मार्च 1948 में वे रियासत के प्रधानमंत्री बने। कश्मीरी जनता का बड़ा वर्ग उनके नेतृत्व में हमलावरों के विरुद्ध भारत के साथ खड़ा रहा।
◆ गिलगित का हाथ से निकलना — नवंबर 1947 की शुरुआत में गिलगित में तैनात गिलगित स्काउट्स ने अपने अंग्रेज़ अधिकारी के नेतृत्व में विद्रोह कर दिया और इस क्षेत्र को पाकिस्तान के हवाले कर दिया। इस तरह रियासत का उत्तरी भाग भी पाकिस्तान के क़ब्ज़े में चला गया।
◆ संयुक्त राष्ट्र में शिकायत (1 जनवरी 1948) — नेहरू की सरकार ने 1 जनवरी 1948 को संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 35 के अंतर्गत सुरक्षा परिषद में शिकायत की कि पाकिस्तान हमलावरों की सहायता कर रहा है। भारत को आशा थी कि पाकिस्तान को हमलावर घोषित किया जाएगा, पर बड़ी शक्तियों की राजनीति के कारण मामला "भारत-पाकिस्तान विवाद" बनकर उलझ गया। बाद में कई इतिहासकारों ने इस निर्णय की आलोचना की।
◆ संयुक्त राष्ट्र का प्रस्ताव (13 अगस्त 1948) — संयुक्त राष्ट्र आयोग के इस प्रस्ताव के तीन क्रमिक भाग थे — पहले युद्धविराम, फिर पाकिस्तान अपनी सेना और कबायलियों को पूरी तरह हटाए और भारत भी अधिकांश सेना घटाए, और उसके बाद ही जनमत संग्रह हो। पाकिस्तान ने अपनी सेना कभी नहीं हटाई, इसलिए जनमत संग्रह की शर्त कभी पूरी नहीं हुई।
◆ युद्धविराम (1 जनवरी 1949) — 1 जनवरी 1949 से युद्धविराम लागू हुआ। जुलाई 1949 के कराची समझौते से युद्धविराम रेखा खींची गई। इसके पश्चिम और उत्तर का भाग — जिसे भारत "पाक-अधिकृत कश्मीर" कहता है — पाकिस्तान के अवैध क़ब्ज़े में रहा। 1972 के शिमला समझौते के बाद यही रेखा नियंत्रण रेखा कहलाई।
◆ भारत का आधिकारिक दृष्टिकोण — भारत के अनुसार 26 अक्टूबर 1947 का विलय पूर्ण और अंतिम है; इसलिए पाक-अधिकृत कश्मीर, गिलगित-बाल्टिस्तान और चीन के क़ब्ज़े वाले अक्साई चिन सहित संपूर्ण जम्मू-कश्मीर और लद्दाख भारत के अभिन्न अंग हैं। भारत के सभी आधिकारिक मानचित्र इसी पूरे क्षेत्र को भारत में दिखाते हैं।
◆ अनुच्छेद 370 और विशेष दर्जा — संविधान सभा में एन. गोपालस्वामी आयंगर ने कश्मीर के लिए अनुच्छेद 370 का प्रारूप रखा, जिसे एक "अस्थायी" प्रावधान कहा गया। इसके अनुसार रक्षा, विदेश और संचार के अलावा केंद्र के क़ानून राज्य सरकार की सहमति से ही लागू होते थे और राज्य को अपना अलग संविधान बनाने का अधिकार मिला। 1952 के दिल्ली समझौते से कुछ और विषय केंद्र को मिले, और 1954 के राष्ट्रपति आदेश से अनुच्छेद 35क जोड़ा गया, जो राज्य के "स्थायी निवासियों" को विशेष अधिकार देता था। जम्मू-कश्मीर का अपना संविधान 26 जनवरी 1957 से लागू हुआ।
◆ विरोध — श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने "एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे" का नारा देकर विशेष दर्जे का विरोध किया; 1953 में कश्मीर में बिना परमिट प्रवेश करने पर वे गिरफ़्तार हुए और 23 जून 1953 को हिरासत में उनकी मृत्यु हो गई। इसी वर्ष अगस्त 1953 में शेख़ अब्दुल्ला को भी प्रधानमंत्री पद से हटाकर गिरफ़्तार कर लिया गया।
◆ 2019 का बदलाव — 5 अगस्त 2019 को राष्ट्रपति के आदेश और संसद के प्रस्ताव से अनुच्छेद 370 के विशेष प्रावधान निष्प्रभावी कर दिए गए और अनुच्छेद 35क भी समाप्त हो गया। जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम 2019 के अनुसार 31 अक्टूबर 2019 से राज्य को दो केंद्र-शासित प्रदेशों — जम्मू-कश्मीर (विधानसभा सहित) और लद्दाख (विधानसभा रहित) — में बाँट दिया गया। दिसंबर 2023 में सर्वोच्च न्यायालय ने इस निर्णय को वैध ठहराया।
⚖️ तीनों कठिन रियासतें — एक तुलना जूनागढ़ — मुस्लिम शासक, हिंदू-बहुल जनता; फ़ैसला जनमत संग्रह से। हैदराबाद — मुस्लिम शासक, हिंदू-बहुल जनता; फ़ैसला सैन्य "पुलिस कार्रवाई" से। कश्मीर — हिंदू शासक, मुस्लिम-बहुल जनता; फ़ैसला विलय पत्र से, पर पाकिस्तान के आक्रमण के कारण युद्ध और अंतरराष्ट्रीय विवाद। इसलिए यह कहना ग़लत है कि एकीकरण केवल धर्म के आधार पर हुआ — असल आधार भूगोल, जनता की इच्छा और क़ानूनी विलय था। |
तिथि | घटना — पूरे अर्थ में |
1947 से पहले | डोगरा महाराजा हरि सिंह शासक थे, लगभग 77% जनता मुसलमान थी और शेख़ अब्दुल्ला की नेशनल कॉन्फ़्रेंस ने 1946 में "कश्मीर छोड़ो" आंदोलन चलाया। |
अगस्त 1947 | महाराजा ने स्वतंत्र रहना चाहा और पाकिस्तान से यथास्थिति समझौता किया, भारत से नहीं। |
22 अक्टूबर 1947 | पाकिस्तान समर्थित कबायली हमला हुआ और हमलावर मुज़फ़्फ़राबाद और बारामूला तक पहुँच गए। |
26 अक्टूबर 1947 | महाराजा ने भारत के साथ विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए, जिसे माउंटबेटन ने 27 अक्टूबर को स्वीकार किया। |
27 अक्टूबर 1947 | भारतीय सेना हवाई मार्ग से श्रीनगर पहुँची और शेख़ अब्दुल्ला आपात प्रशासन के प्रमुख बने। |
1 जनवरी 1948 | भारत ने सुरक्षा परिषद में शिकायत की; 13 अगस्त 1948 के प्रस्ताव में युद्धविराम, पाकिस्तानी सेना की वापसी और फिर जनमत संग्रह की बात थी। |
1 जनवरी 1949 | युद्धविराम लागू हुआ और कराची समझौते (1949) की युद्धविराम रेखा 1972 के शिमला समझौते से नियंत्रण रेखा बनी। |
1950–1957 | अनुच्छेद 370 से विशेष दर्जा मिला, 1952 में दिल्ली समझौता हुआ, 1954 में अनुच्छेद 35क जुड़ा और 1957 से राज्य का अपना संविधान लागू हुआ। |
2019 | 5 अगस्त 2019 को अनुच्छेद 370 के विशेष प्रावधान निष्प्रभावी हुए और 31 अक्टूबर 2019 से जम्मू-कश्मीर और लद्दाख दो केंद्र-शासित प्रदेश बने। |
जूनागढ़, हैदराबाद और कश्मीर के अलावा भी कुछ रियासतों ने स्वतंत्र रहने या पाकिस्तान की ओर झुकने की कोशिश की, जबकि कुछ ने सहजता से भारत को अपनाया। हर रियासत की कहानी यह दिखाती है कि जनता का दबाव, भौगोलिक सच्चाई और पटेल-मेनन की कूटनीति — तीनों ने मिलकर कैसे काम किया।
◆ पृष्ठभूमि — दक्षिण की समृद्ध और शिक्षित रियासत त्रावणकोर के महाराजा चितिरा तिरुनाल थे, पर असली सत्ता शक्तिशाली दीवान सर सी. पी. रामास्वामी अय्यर के हाथ में थी। उन्होंने तर्क दिया कि त्रावणकोर के पास समुद्री तट, बंदरगाह और थोरियम जैसे खनिज हैं, इसलिए वह अलग देश बन सकता है।
◆ स्वतंत्रता की घोषणा — 11 जून 1947 को दीवान ने घोषणा की कि 15 अगस्त के बाद त्रावणकोर स्वतंत्र रहेगा। इससे पहले 1946 में उनके प्रस्तावित "अमेरिकी मॉडल" के संविधान के विरुद्ध कम्युनिस्टों के नेतृत्व में पुन्नप्रा-वायलार का मज़दूर-किसान विद्रोह हुआ था, जिसे कठोरता से कुचला गया था।
◆ विरोध और मोड़ — त्रावणकोर स्टेट कांग्रेस और कम्युनिस्टों ने इस घोषणा का तीव्र विरोध किया। 25 जुलाई 1947 को एक युवा समाजवादी कार्यकर्ता ने दीवान पर जानलेवा हमला किया। घायल दीवान का साहस टूट गया और महाराजा ने 30 जुलाई 1947 के आसपास भारत में विलय स्वीकार कर लिया; दीवान ने त्यागपत्र देकर राज्य छोड़ दिया।
◆ आगे — 1 जुलाई 1949 को त्रावणकोर-कोचीन संघ बना और 1956 में यही केरल राज्य का आधार बना।
◆ पृष्ठभूमि — पाकिस्तान की सीमा से सटी इस बड़ी रियासत के युवा महाराजा हनवंत सिंह (जो 1947 में ही गद्दी पर बैठे थे) पाकिस्तान की ओर आकर्षित हुए।
◆ जिन्ना का प्रस्ताव — जिन्ना ने उन्हें लगभग मनचाही शर्तें देने का प्रस्ताव रखा — कराची बंदरगाह के उपयोग की सुविधा, हथियार-आयात की छूट और अकाल के समय अनाज की आपूर्ति। यदि जोधपुर पाकिस्तान में जाता तो पड़ोसी जैसलमेर, बीकानेर जैसी रियासतों पर भी असर पड़ता।
◆ परिणाम — वी. पी. मेनन उन्हें माउंटबेटन के पास ले गए और पटेल ने भी उन्हें समझाया कि हिंदू-बहुल जनता वाली रियासत का पाकिस्तान में जाना सांप्रदायिक आग भड़का देगा; साथ ही भारत की ओर से भी हथियार और अनाज की आपूर्ति का आश्वासन दिया गया। कहा जाता है कि हस्ताक्षर के समय महाराजा ने तनाव में मेनन पर पिस्तौल भी तान दी थी। अंततः 11 अगस्त 1947 को जोधपुर ने भारत के विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए।
◆ पृष्ठभूमि — भोपाल के नवाब हमीदुल्ला ख़ाँ नरेंद्र मंडल के चांसलर, जिन्ना के निकट और मुस्लिम लीग के समर्थक थे। उनकी रियासत भारत के बीचोंबीच थी और जनता का बहुमत हिंदू था, फिर भी वे स्वतंत्र रहने के पक्ष में थे और अन्य राजाओं को भी इसके लिए उकसा रहे थे।
◆ विलय पत्र — स्थिति भाँपकर उन्होंने चांसलर पद छोड़ दिया और अंततः 15 अगस्त से पहले विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए, पर यह शर्त रखी कि इसकी घोषणा कुछ दिन बाद की जाए। रियासत का भीतरी शासन उन्हीं के हाथ में रहा।
◆ विलीनीकरण आंदोलन (1948–49) — भोपाल की जनता ने नवाबी शासन समाप्त करके भारत में पूर्ण विलय की माँग को लेकर विलीनीकरण आंदोलन चलाया, जिसमें युवा डॉ. शंकर दयाल शर्मा (बाद में भारत के राष्ट्रपति) भी जेल गए। दबाव में नवाब ने विलय समझौता किया और 1 जून 1949 से भोपाल केंद्र-शासित (आगे "भाग ग" राज्य) बना। 1956 में यह नए मध्य प्रदेश में मिला और भोपाल उसकी राजधानी बना।
◆ विलय — मैसूर के महाराजा जयचामराजेंद्र वाडियार भारत-समर्थक थे और रियासत ने बिना किसी विवाद के अगस्त 1947 में ही भारत में विलय कर लिया।
◆ "मैसूर चलो" आंदोलन — विलय के बाद भी शासन महाराजा के दीवान के हाथ में था। सितंबर 1947 में मैसूर कांग्रेस ने "मैसूर चलो" आंदोलन चलाकर उत्तरदायी (लोकप्रिय) सरकार की माँग की। इसके परिणामस्वरूप अक्टूबर 1947 में के. सी. रेड्डी के नेतृत्व में पहली लोकप्रिय सरकार बनी।
◆ आगे — 1950 में मैसूर "भाग ख" राज्य बना और महाराजा उसके राजप्रमुख रहे; 1956 में राजप्रमुख पद समाप्त होने के बाद वे बड़े मैसूर राज्य के राज्यपाल बने। 1 नवंबर 1973 से इस राज्य का नाम कर्नाटक हो गया।
◆ पृष्ठभूमि — मणिपुर के महाराजा बोधचंद्र सिंह ने अगस्त 1947 में विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए थे। उन्होंने 1947 में ही मणिपुर राज्य संविधान अधिनियम लागू किया और 1948 में वयस्क मताधिकार पर चुनाव कराकर विधानसभा बनाई — ऐसा करने वाली यह भारत की आरंभिक रियासतों में थी।
◆ विलय समझौता — 21 सितंबर 1949 को शिलांग में महाराजा ने भारत के साथ विलय समझौते पर हस्ताक्षर किए और 15 अक्टूबर 1949 से मणिपुर भारत के सीधे शासन में आ गया। मणिपुर के कई संगठन आज भी कहते हैं कि यह समझौता महाराजा पर दबाव डालकर और निर्वाचित विधानसभा से पूछे बिना कराया गया था — इसलिए यह घटना मणिपुर की राजनीति में संवेदनशील मानी जाती है।
◆ आगे — 1950 में यह "भाग ग" राज्य, 1956 में केंद्र-शासित प्रदेश और 21 जनवरी 1972 को पूर्ण राज्य बना।
◆ पृष्ठभूमि — त्रिपुरा के महाराजा बीर बिक्रम किशोर माणिक्य का 1947 में निधन हो गया और उनके उत्तराधिकारी अल्पवयस्क थे। इसलिए महारानी कंचनप्रभा देवी ने संरक्षिका (रीजेंट) के रूप में शासन सँभाला। पूर्वी पाकिस्तान से घिरी इस रियासत पर पाकिस्तान की ओर से दबाव और घुसपैठ का ख़तरा था।
◆ विलय — महारानी ने सितंबर 1949 में विलय समझौते पर हस्ताक्षर किए और 15 अक्टूबर 1949 से त्रिपुरा भारत के सीधे शासन में आ गया। यह 1950 में "भाग ग" राज्य, 1956 में केंद्र-शासित प्रदेश और 21 जनवरी 1972 को पूर्ण राज्य बना।
◆ पृष्ठभूमि — हिमालय की यह छोटी रियासत नामग्याल वंश के चोग्याल (धर्म-राजा) के शासन में थी। अंग्रेज़ों के समय भी यह भारतीय रियासतों से अलग एक संरक्षित राज्य माना जाता था, इसलिए 1947 में इसका विलय नहीं हुआ।
◆ 1950 की संधि — 1950 की भारत-सिक्किम संधि से सिक्किम भारत का संरक्षित राज्य (प्रोटेक्टोरेट) बना — इसकी रक्षा, विदेश संबंध और संचार भारत के पास रहे, जबकि भीतरी शासन चोग्याल का।
◆ लोकतंत्र की माँग (1973–74) — अंतिम चोग्याल पाल्डेन थोंडुप नामग्याल के निरंकुश शासन के विरुद्ध काज़ी लेंडुप दोरजी के नेतृत्व में सिक्किम नेशनल कांग्रेस ने 1973 में बड़ा जन-आंदोलन चलाया। 1974 के चुनाव में उनकी पार्टी को भारी बहुमत मिला और नई विधानसभा ने भारत से निकट संबंध की माँग की।
◆ 35वाँ संशोधन (1974) — "सहयोगी राज्य" — संसद ने 35वाँ संविधान संशोधन पारित कर सिक्किम को भारत का "सहयोगी राज्य" (एसोसिएट स्टेट) बनाया और उसे संसद में प्रतिनिधित्व दिया। यह एक अनोखी और अस्थायी व्यवस्था थी।
◆ जनमत संग्रह और 36वाँ संशोधन (1975) — अप्रैल 1975 में सिक्किम विधानसभा ने राजतंत्र समाप्त करने का प्रस्ताव पारित किया और 14 अप्रैल 1975 के जनमत संग्रह में भारी बहुमत ने राजतंत्र समाप्त करने और भारत में पूर्ण विलय का समर्थन किया। इसके बाद 36वें संविधान संशोधन से 16 मई 1975 को सिक्किम भारत का 22वाँ राज्य बना और काज़ी लेंडुप दोरजी उसके पहले मुख्यमंत्री बने।
🧠 याद रखने की तरकीब "त्रा-जो-भो-जू-है-क" — त्रावणकोर, जोधपुर, भोपाल, जूनागढ़, हैदराबाद, कश्मीर: वे रियासतें जिन्होंने विलय में आनाकानी की। इनमें से जूनागढ़ (जनमत संग्रह), हैदराबाद (सैन्य कार्रवाई) और कश्मीर (विलय पत्र और युद्ध) — तीनों का रास्ता अलग-अलग रहा; त्रावणकोर, जोधपुर और भोपाल जन-दबाव और कूटनीति से माने। |
रियासत | शासक / प्रमुख व्यक्ति | क्या हुआ — पूरे अर्थ में |
त्रावणकोर | दीवान सी. पी. रामास्वामी अय्यर; महाराजा चितिरा तिरुनाल | दीवान ने 11 जून 1947 को स्वतंत्रता की घोषणा की, पर 25 जुलाई को उन पर हमले के बाद महाराजा ने विलय स्वीकार किया; 1949 में त्रावणकोर-कोचीन और 1956 में केरल बना। |
जोधपुर | महाराजा हनवंत सिंह | जिन्ना के प्रलोभनों के बावजूद पटेल-मेनन के समझाने पर 11 अगस्त 1947 को भारत में विलय हुआ। |
भोपाल | नवाब हमीदुल्ला ख़ाँ | नवाब ने अनिच्छा से विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए और विलीनीकरण आंदोलन के बाद 1 जून 1949 को भोपाल केंद्र-शासित हुआ; 1956 में मध्य प्रदेश में मिला। |
मैसूर | महाराजा जयचामराजेंद्र वाडियार | मैसूर ने सहजता से विलय किया, "मैसूर चलो" आंदोलन के बाद लोकप्रिय सरकार बनी और 1973 में राज्य का नाम कर्नाटक हुआ। |
मणिपुर | महाराजा बोधचंद्र सिंह | 21 सितंबर 1949 को शिलांग में विलय समझौता हुआ, 15 अक्टूबर 1949 से मणिपुर भारत का भाग बना और 1972 में पूर्ण राज्य बना। |
त्रिपुरा | महारानी कंचनप्रभा देवी (संरक्षिका) | 15 अक्टूबर 1949 को त्रिपुरा भारत में मिला और 1972 में पूर्ण राज्य बना। |
सिक्किम | चोग्याल; काज़ी लेंडुप दोरजी | 1950 में संरक्षित राज्य, 1974 में सहयोगी राज्य बना और 1975 के जनमत संग्रह के बाद 16 मई 1975 को भारत का 22वाँ राज्य बना। |
1947 में अंग्रेज़ चले गए, पर भारत की धरती पर दो और यूरोपीय शक्तियों के उपनिवेश बचे रहे — फ़्रांस के (पांडिचेरी, कारिकल, माहे, यनम और चंद्रनगर) और पुर्तगाल के (गोवा, दमन, दीव, दादरा और नगर हवेली)। दोनों का व्यवहार बिल्कुल अलग रहा: फ़्रांस ने बातचीत से अपने क्षेत्र लौटाए, जबकि पुर्तगाल के अड़ियल रुख़ के कारण गोवा के लिए सैन्य कार्रवाई करनी पड़ी। पहले दो क़ानूनी शब्द समझ लें:
🔍 आसान परिभाषा: वास्तविक और वैधानिक हस्तांतरण |
📘 परिभाषा: वास्तविक हस्तांतरण (डी फ़ैक्टो) का अर्थ है किसी क्षेत्र का प्रशासन व्यवहार में दूसरे देश को सौंप देना; वैधानिक हस्तांतरण (डी ज्यूरे) का अर्थ है दोनों देशों की संधि के अनुमोदन के बाद उस क्षेत्र पर क़ानूनी संप्रभुता का औपचारिक रूप से बदल जाना। |
💡 आसान भाषा में: पहले चाबी दे दी गई और घर में रहना शुरू हो गया (वास्तविक), फिर कुछ वर्ष बाद रजिस्ट्री भी नाम हो गई (वैधानिक)। 🏠 उदाहरण: पांडिचेरी का वास्तविक हस्तांतरण 1 नवंबर 1954 को हुआ, पर वैधानिक हस्तांतरण फ़्रांसीसी संसद के अनुमोदन के बाद 16 अगस्त 1962 को हुआ। |
◆ पृष्ठभूमि — 1948 में भारत और फ़्रांस के बीच सहमति बनी कि इन क्षेत्रों का भविष्य वहाँ की जनता की राय से तय होगा।
◆ चंद्रनगर (बंगाल) — हुगली नदी के किनारे बसे चंद्रनगर में जून 1949 के जनमत संग्रह में लगभग सारी जनता ने भारत के पक्ष में मत दिया। 2 मई 1950 को इसका वास्तविक हस्तांतरण हुआ, बाद में संधि से वैधानिक हस्तांतरण हुआ, और 2 अक्टूबर 1954 को यह पश्चिम बंगाल में मिला दिया गया।
◆ पांडिचेरी, कारिकल, माहे और यनम — इन क्षेत्रों में जनमत संग्रह की जगह अक्टूबर 1954 में किझूर में निर्वाचित प्रतिनिधियों (नगर पार्षदों और विधायकों) का मतदान हुआ, जिसमें भारी बहुमत ने भारत में विलय का समर्थन किया। 1 नवंबर 1954 को इनका वास्तविक हस्तांतरण हुआ, 28 मई 1956 को हस्तांतरण की संधि हुई और फ़्रांसीसी संसद के अनुमोदन के बाद 16 अगस्त 1962 को वैधानिक हस्तांतरण हुआ। 14वें संविधान संशोधन (1962) से इन्हें मिलाकर पांडिचेरी केंद्र-शासित प्रदेश बना, जिसका नाम 2006 में पुडुचेरी हुआ।
◆ एक रोचक तथ्य — यह केंद्र-शासित प्रदेश चार बिखरे टुकड़ों से बना है — पुडुचेरी और कारिकल तमिलनाडु से घिरे हैं, माहे केरल के तट पर और यनम आंध्र प्रदेश में है। इसीलिए इसका मानचित्र अनोखा है।
◆ मुक्ति (1954) — गुजरात-महाराष्ट्र की सीमा के पास स्थित ये दो पुर्तगाली बस्तियाँ चारों ओर से भारतीय क्षेत्र से घिरी थीं। जुलाई 1954 में युनाइटेड फ़्रंट ऑफ़ गोअन्स के स्वयंसेवकों ने दादरा को, और 2 अगस्त 1954 को आज़ाद गोमांतक दल सहित विभिन्न संगठनों के स्वयंसेवकों ने नगर हवेली को पुर्तगाली शासन से मुक्त करा लिया। भारत ने पुर्तगाली सैनिकों को अपने क्षेत्र से होकर वहाँ पहुँचने नहीं दिया।
◆ स्वतंत्र प्रशासन और अंतरराष्ट्रीय न्यायालय — लगभग सात वर्ष तक यहाँ स्थानीय लोगों की "स्वतंत्र दादरा और नगर हवेली" सरकार चली। पुर्तगाल ने अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में मुक़दमा किया कि उसे भारतीय क्षेत्र से होकर अपनी बस्तियों तक जाने का अधिकार है। 1960 के निर्णय में न्यायालय ने माना कि असैनिक आवाजाही का अधिकार था, पर सशस्त्र सेना ले जाने का अधिकार नहीं — यानी भारत का रुख़ उचित ठहरा।
◆ भारत में विलय — 10वें संविधान संशोधन (1961) से दादरा और नगर हवेली भारत का केंद्र-शासित प्रदेश बना। 26 जनवरी 2020 से इसे दमन और दीव के साथ मिलाकर एक केंद्र-शासित प्रदेश बना दिया गया।
◆ पृष्ठभूमि — 1510 में पुर्तगाली गवर्नर अल्बुकर्क ने बीजापुर के सुल्तान से गोवा छीना था, और तब से लगभग साढ़े चार सौ वर्ष यह पुर्तगाल का उपनिवेश रहा। पुर्तगाल के तानाशाह सालाज़ार ने 1951 में अपने संविधान में बदलाव कर गोवा को उपनिवेश के बजाय पुर्तगाल का "समुद्रपार प्रांत" घोषित कर दिया — ताकि कहा जा सके कि यह पुर्तगाल का ही अंग है, इसलिए उसे छोड़ने का प्रश्न ही नहीं उठता।
◆ गोवा राष्ट्रवाद के आरंभिक नेता — त्रिस्ताओ ब्रगांज़ा कुन्हा (टी. बी. कुन्हा) को "गोवा राष्ट्रवाद का जनक" कहा जाता है। उन्होंने 1928 में बम्बई में गोवा कांग्रेस समिति बनाई और पुर्तगाली शासन के अत्याचारों के विरुद्ध लेख लिखे।
◆ लोहिया का सत्याग्रह (18 जून 1946) — समाजवादी नेता डॉ. राम मनोहर लोहिया गोवा गए और 18 जून 1946 को मडगाँव में नागरिक अधिकारों पर लगी पाबंदियों को तोड़कर सभा की। उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया, पर इस घटना ने गोवा में सविनय अवज्ञा की लहर पैदा कर दी। इसी कारण 18 जून को गोवा में "गोवा क्रांति दिवस" मनाया जाता है।
◆ भारत के शांतिपूर्ण प्रयास — स्वतंत्रता के बाद भारत ने 1950 से पुर्तगाल से बातचीत का प्रस्ताव रखा, पर पुर्तगाल ने बात करने से भी इनकार कर दिया। 1953 में भारत ने लिस्बन से अपना राजनयिक मिशन वापस बुला लिया।
◆ 1954–55 का सत्याग्रह — भारत भर से सत्याग्रही गोवा की सीमा पार करने लगे। 15 अगस्त 1955 को हज़ारों निहत्थे सत्याग्रहियों ने कई स्थानों से गोवा में प्रवेश किया, तो पुर्तगाली पुलिस ने गोली चलाई, जिसमें अनेक सत्याग्रही मारे गए। इसके बाद भारत ने 1955 में पुर्तगाल से राजनयिक संबंध पूरी तरह तोड़ दिए और गोवा की आर्थिक नाकेबंदी की। सशस्त्र संगठन आज़ाद गोमांतक दल भी सक्रिय रहा; इसके कई सदस्यों — जैसे मोहन रानाडे — को पुर्तगाल की जेलों में वर्षों क़ैद रहना पड़ा।
◆ अंतरराष्ट्रीय स्थिति — पुर्तगाल नाटो का सदस्य था और 1955 में अमेरिका ने भी पुर्तगाल के दावे का समर्थन करता हुआ बयान दिया। नेहरू शांति और अहिंसा की अंतरराष्ट्रीय छवि के कारण लंबे समय तक सैन्य कार्रवाई से बचते रहे।
◆ ऑपरेशन विजय (18–19 दिसंबर 1961) — 1961 के अंत में पुर्तगाली सैनिकों ने अंजदीव द्वीप से भारतीय नौकाओं पर गोलीबारी की, और अफ़्रीका-एशिया के नव-स्वतंत्र देश भी भारत पर उपनिवेशवाद ख़त्म करने का दबाव डाल रहे थे। तब रक्षा मंत्री वी. के. कृष्ण मेनन के समय भारत ने 18 दिसंबर 1961 को थल सेना, नौसेना और वायु सेना की संयुक्त कार्रवाई शुरू की, जिसे "ऑपरेशन विजय" कहा गया। लगभग 36 घंटों में ही पुर्तगाली प्रतिरोध समाप्त हो गया और 19 दिसंबर 1961 को पुर्तगाली गवर्नर-जनरल वासालो ए सिल्वा ने आत्मसमर्पण कर दिया। यही दिन गोवा मुक्ति दिवस है। उसी समय दमन और दीव भी मुक्त हुए।
◆ संवैधानिक व्यवस्था — 12वें संविधान संशोधन (1962) से गोवा, दमन और दीव को मिलाकर एक केंद्र-शासित प्रदेश बनाया गया। मेजर जनरल के. पी. कैंडेथ कुछ समय सैन्य गवर्नर रहे।
◆ जनमत सर्वेक्षण (1967) — गोवा को पड़ोसी महाराष्ट्र में मिलाया जाए या अलग रखा जाए, इस प्रश्न पर 16 जनवरी 1967 को जनमत सर्वेक्षण (ओपिनियन पोल) हुआ। बहुमत ने गोवा की अलग पहचान बनाए रखने के पक्ष में मत दिया। स्वतंत्र भारत में किसी राज्य के भविष्य पर इस तरह का यह अनोखा मतदान था।
◆ पूर्ण राज्य (30 मई 1987) — गोवा को 30 मई 1987 को भारत का 25वाँ राज्य बनाया गया, जबकि दमन और दीव अलग केंद्र-शासित प्रदेश बने रहे। गोवा की भाषा कोंकणी को 1992 में संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया।
⚠️ भ्रम से बचें — दो "ऑपरेशन विजय" 1961 का ऑपरेशन विजय गोवा, दमन और दीव को पुर्तगाल से मुक्त कराने के लिए था; जबकि 1999 में कारगिल युद्ध में पाकिस्तानी घुसपैठियों को खदेड़ने वाले सैन्य अभियान का नाम भी "ऑपरेशन विजय" था। प्रश्न में वर्ष और संदर्भ देखकर उत्तर दें। |
क्षेत्र | विलय की प्रक्रिया — पूरे अर्थ में |
चंद्रनगर (बंगाल) | 1949 के जनमत संग्रह में जनता ने भारत को चुना, 2 मई 1950 को वास्तविक हस्तांतरण हुआ और 2 अक्टूबर 1954 को यह पश्चिम बंगाल में मिला। |
पांडिचेरी, कारिकल, माहे, यनम | 1 नवंबर 1954 को वास्तविक और 16 अगस्त 1962 को वैधानिक हस्तांतरण हुआ; 14वें संशोधन (1962) से यह केंद्र-शासित प्रदेश बना और 2006 से पुडुचेरी कहलाता है। |
दादरा और नगर हवेली | स्वयंसेवकों ने 1954 में इन्हें मुक्त कराया और 10वें संशोधन (1961) से ये केंद्र-शासित प्रदेश बने। |
गोवा, दमन और दीव | 18–19 दिसंबर 1961 के ऑपरेशन विजय से मुक्त हुए और 12वें संशोधन (1962) से केंद्र-शासित प्रदेश बने; गोवा 30 मई 1987 को 25वाँ राज्य बना। |
रियासतों के विलय की कहानी 1950 में पूरी नहीं हुई। विलय के समय राजाओं से जो वादे किए गए थे, उनमें सबसे बड़ा वादा था — हर वर्ष मिलने वाला प्रिवी पर्स। बीस वर्ष बाद यही वादा स्वतंत्र भारत की राजनीति का बड़ा प्रश्न बन गया: एक ओर "दिया हुआ वचन", दूसरी ओर "समानता का सिद्धांत"। इस खंड में हम देखेंगे कि प्रिवी पर्स क्या था, उसे हटाने की माँग क्यों उठी और वह अंततः कैसे समाप्त हुआ।
🔍 आसान परिभाषा: प्रिवी पर्स (राजभत्ता) |
📘 परिभाषा: विलय के बदले पूर्व शासकों को भारत सरकार द्वारा दिया जाने वाला वार्षिक, कर-मुक्त भत्ता, जिसकी गारंटी संविधान के अनुच्छेद 291 में थी; अनुच्छेद 362 उनके निजी अधिकारों और विशेषाधिकारों की रक्षा करता था। |
💡 आसान भाषा में: राजाओं ने अपना राज्य देश को सौंप दिया, तो बदले में उन्हें और उनके उत्तराधिकारियों को हर साल एक तय रक़म — एक तरह की "पेंशन" — और कुछ सम्मान मिलते रहे। 🏠 उदाहरण: बड़ी रियासतों के शासकों को लाखों रुपये वार्षिक मिलते थे, जबकि बहुत छोटी रियासतों के शासकों को केवल कुछ हज़ार रुपये; राशि रियासत की वार्षिक आय के आधार पर तय की गई थी। |
◆ पृष्ठभूमि — 1947–49 में जब शासकों ने विलय समझौतों पर हस्ताक्षर किए, तो उन्होंने अपनी पूरी सत्ता, अपनी सेना, अपना ख़ज़ाना और अपने राज्य की आय छोड़ दी। पटेल और मेनन ने बदले में उन्हें आश्वासन दिया कि उनके परिवार के निजी ख़र्च के लिए सरकार हर वर्ष एक निश्चित राशि देगी। पटेल का तर्क था कि बिना रक्तपात के इतना बड़ा भू-भाग मिल जाना बहुत सस्ता सौदा है।
◆ राशि कैसे तय हुई — राशि रियासत की औसत वार्षिक आय के एक हिस्से के रूप में तय की गई और रियासत जितनी बड़ी थी, उतना बड़ा उसका प्रिवी पर्स था। यह राशि कर-मुक्त थी। अधिकतर मामलों में यह भी तय था कि शासक की मृत्यु के बाद उसके उत्तराधिकारी को मिलने वाली राशि घटा दी जाएगी।
◆ संविधान की गारंटी — संविधान के अनुच्छेद 291 ने कहा कि प्रिवी पर्स की राशि भारत की संचित निधि से दी जाएगी और उस पर आयकर नहीं लगेगा। अनुच्छेद 362 ने कहा कि संसद और विधानमंडल क़ानून बनाते समय शासकों के निजी अधिकारों, विशेषाधिकारों और सम्मान का ध्यान रखेंगे।
◆ विशेषाधिकार क्या थे — पूर्व शासक अपनी उपाधियाँ (महाराजा, नवाब आदि) रख सकते थे, अपने निजी झंडे और गाड़ियों की विशेष नंबर-प्लेट का प्रयोग कर सकते थे, कुछ करों और शुल्कों से मुक्त थे और सरकार उन्हें आधिकारिक रूप से "शासक" के रूप में मान्यता देती थी।
◆ समानता का तर्क — आलोचकों का कहना था कि जिस देश का संविधान सभी नागरिकों को बराबर मानता है, वहाँ कुछ परिवारों को केवल जन्म के आधार पर सरकारी ख़ज़ाने से धन और विशेष दर्जा देना लोकतंत्र और समानता के सिद्धांत के विरुद्ध है।
◆ समाजवादी नीति का दौर — 1960 के दशक के अंत में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार समाजवादी कार्यक्रम पर ज़ोर दे रही थी। 1969 में चौदह बड़े बैंकों का राष्ट्रीयकरण हुआ; प्रिवी पर्स की समाप्ति भी इसी कार्यक्रम का हिस्सा थी। कांग्रेस ने 1967 में ही प्रिवी पर्स और विशेषाधिकार समाप्त करने का संकल्प ले लिया था।
◆ राजनीतिक कारण — कई पूर्व शासक चुनाव लड़कर संसद और विधानसभाओं में पहुँच रहे थे और उनमें से अनेक स्वतंत्र पार्टी जैसे विपक्षी दलों के साथ थे। इसलिए यह प्रश्न सिद्धांत के साथ-साथ राजनीतिक मुक़ाबले का भी बन गया।
◆ विरोध का तर्क — पूर्व शासकों और उनके समर्थकों का कहना था कि प्रिवी पर्स कोई दान नहीं, बल्कि विलय की शर्त थी; सरकार ने वचन दिया था और संविधान ने उसकी गारंटी दी थी, इसलिए उसे तोड़ना वादा-खिलाफ़ी होगी। उनका यह भी कहना था कि कुल राशि देश के बजट की तुलना में बहुत छोटी थी।
1. सितंबर 1970 — विधेयक राज्यसभा में गिरा — सरकार प्रिवी पर्स समाप्त करने के लिए संविधान संशोधन विधेयक लाई। लोकसभा ने उसे आवश्यक दो-तिहाई बहुमत से पारित कर दिया, पर राज्यसभा में वह दो-तिहाई बहुमत से केवल एक मत कम रह जाने के कारण गिर गया।
2. राष्ट्रपति का आदेश — विधेयक गिरने के तुरंत बाद सरकार ने दूसरा रास्ता अपनाया। राष्ट्रपति वी. वी. गिरि ने एक आदेश जारी करके सभी पूर्व शासकों की मान्यता वापस ले ली। सरकार का तर्क था कि जब कोई "शासक" ही नहीं रहा, तो उसे प्रिवी पर्स देने का प्रश्न भी नहीं रहा।
3. दिसंबर 1970 — सर्वोच्च न्यायालय का फ़ैसला — पूर्व शासकों ने इस आदेश को न्यायालय में चुनौती दी। माधवराव सिंधिया बनाम भारत संघ मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रपति के आदेश को अवैध ठहराया। न्यायालय का कहना था कि संविधान में दी गई गारंटी को एक कार्यकारी आदेश से समाप्त नहीं किया जा सकता।
4. 1971 — चुनाव और 26वाँ संशोधन — इसके बाद लोकसभा भंग हुई और 1971 के आम चुनाव में इंदिरा गांधी को भारी बहुमत मिला। नई संसद ने 26वाँ संविधान संशोधन अधिनियम (1971) पारित किया। इस संशोधन ने अनुच्छेद 291 और 362 को हटा दिया और नया अनुच्छेद 363क जोड़ा, जिसके अनुसार शासकों की मान्यता और प्रिवी पर्स दोनों समाप्त हो गए।
📌 याद रखें — प्रिवी पर्स गारंटी अनुच्छेद 291 (प्रिवी पर्स) और अनुच्छेद 362 (विशेषाधिकार) में थी। 1970 में संशोधन विधेयक राज्यसभा में एक मत से गिरा; राष्ट्रपति के आदेश को सर्वोच्च न्यायालय ने माधवराव सिंधिया मामले में रद्द किया। 26वें संविधान संशोधन (1971) ने अनुच्छेद 291 और 362 हटाए और अनुच्छेद 363क जोड़ा। उस समय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी थीं। |
◆ राजशाही का अंतिम चिह्न मिटा — 1947–49 में राजाओं की सत्ता गई थी; 1971 में उनकी क़ानूनी पहचान और भत्ता भी समाप्त हो गया। अब वे क़ानून की नज़र में सामान्य नागरिक थे। उपाधियाँ सामाजिक व्यवहार में चलती रहीं, पर उनका कोई क़ानूनी महत्त्व नहीं रहा।
◆ संसद और न्यायालय का संबंध — यह प्रसंग उस दौर के बड़े टकराव का हिस्सा था, जिसमें सरकार सामाजिक-आर्थिक बदलाव के लिए संविधान में संशोधन करना चाहती थी और न्यायालय संविधान की गारंटियों की रक्षा कर रहा था। बैंक राष्ट्रीयकरण और प्रिवी पर्स, दोनों मामलों में पहले न्यायालय ने सरकार के क़दम रोके और फिर संसद ने संशोधन करके अपना रास्ता बनाया।
◆ दो मत — समर्थकों के अनुसार यह क़दम समानता पर आधारित गणतंत्र के लिए ज़रूरी था। आलोचकों के अनुसार इससे यह संदेश गया कि सरकार अपने ही दिए हुए गंभीर वचन से पीछे हट सकती है। परीक्षा में मूल्यांकन लिखते समय दोनों पक्ष लिखना अच्छा रहता है।
रियासतों के एकीकरण से भारत का नक्शा जुड़ तो गया, पर अब दूसरा प्रश्न सामने था — इस जुड़े हुए भारत के भीतर राज्यों की सीमाएँ किस आधार पर तय हों? अंग्रेज़ों के प्रांत किसी सोची-समझी योजना से नहीं बने थे। जो इलाक़ा जिस क्रम में जीता गया, वह उसी प्रांत में जोड़ दिया गया। इसलिए मद्रास प्रांत में तमिल, तेलुगु, मलयालम और कन्नड़ बोलने वाले साथ थे और बम्बई प्रांत में मराठी, गुजराती और कन्नड़ बोलने वाले। लोगों की माँग थी कि एक भाषा बोलने वालों का अपना राज्य हो।
🔍 आसान परिभाषा: भाषाई राज्य |
📘 परिभाषा: ऐसा राज्य, जिसकी सीमाएँ इस प्रकार खींची गई हों कि उसमें मुख्य रूप से एक ही भाषा बोलने वाले लोग रहें और वही भाषा राज्य के प्रशासन, शिक्षा और न्यायालयों के कामकाज की भाषा बने। |
💡 आसान भाषा में: जहाँ ज़्यादातर लोग तेलुगु बोलते हैं, वह एक राज्य; जहाँ ज़्यादातर लोग मराठी बोलते हैं, वह दूसरा राज्य — ताकि आम आदमी सरकार से अपनी ही भाषा में बात कर सके। 🏠 उदाहरण: 1953 में मद्रास राज्य के तेलुगु-भाषी ज़िलों को अलग करके बना आंध्र राज्य भाषा के आधार पर बना पहला राज्य था। |
◆ आंदोलन के दौर में कांग्रेस का वादा — कांग्रेस ने 1920 के नागपुर अधिवेशन में अपनी प्रांतीय समितियों को भाषा के आधार पर गठित किया, ताकि आंदोलन का संदेश जनता तक उसकी अपनी भाषा में पहुँचे। इसलिए अंग्रेज़ों का प्रांत एक था, पर कांग्रेस की समितियाँ अलग-अलग थीं — जैसे आंध्र, कर्नाटक और महाराष्ट्र की अलग समितियाँ। नेहरू रिपोर्ट (1928) ने भी भाषाई प्रांतों का समर्थन किया था।
◆ भाषाई राज्य के पक्ष में तर्क — जब शासन, न्यायालय और शिक्षा जनता की भाषा में होंगे, तभी आम आदमी लोकतंत्र में सचमुच भाग ले सकेगा। अंग्रेज़ी या किसी दूसरी भाषा में चलने वाला प्रशासन केवल पढ़े-लिखे छोटे वर्ग के काम का होता है।
◆ स्वतंत्रता के बाद झिझक क्यों — 1947 में देश धर्म के आधार पर बँट चुका था, लाखों शरणार्थी आ रहे थे, कश्मीर में युद्ध चल रहा था और रियासतों का एकीकरण अधूरा था। नेहरू और पटेल को डर था कि इस समय भाषा के आधार पर सीमाएँ खींचने से नई फूट पैदा होगी और देश की एकता कमज़ोर होगी। इसलिए नेतृत्व इस प्रश्न को टालना चाहता था।
भाषाई पुनर्गठन को समझने के लिए पहले यह जानना ज़रूरी है कि 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होते समय राज्य किस रूप में थे। संविधान ने राज्यों को चार श्रेणियों में रखा था। यह बँटवारा भाषा पर नहीं, बल्कि इस बात पर आधारित था कि वह इकाई पहले क्या थी — ब्रिटिश प्रांत, रियासत या केंद्र के अधीन छोटा क्षेत्र।
🔍 आसान परिभाषा: भाग क, ख, ग और घ राज्य |
📘 परिभाषा: संविधान की पहली अनुसूची में 1950 में किया गया राज्यों का चार श्रेणियों वाला वर्गीकरण, जिसमें हर श्रेणी के राज्यों का संवैधानिक प्रमुख, शासन-व्यवस्था और केंद्र से संबंध अलग-अलग था; सातवें संविधान संशोधन (1956) ने इसे समाप्त कर दिया। |
💡 आसान भाषा में: आज़ादी के बाद सब राज्य बराबर दर्जे के नहीं थे — पुराने ब्रिटिश प्रांत "पहली श्रेणी" में थे, रियासतों से बने राज्य "दूसरी" में, केंद्र के चलाए छोटे राज्य "तीसरी" में और अंडमान-निकोबार "चौथी" में। 🏠 उदाहरण: बम्बई (पुराना ब्रिटिश प्रांत) भाग क राज्य था और वहाँ राज्यपाल था; जबकि हैदराबाद (पुरानी रियासत) भाग ख राज्य था और वहाँ निज़ाम राजप्रमुख थे। |
◆ भाग क राज्य (9) — ये वे इकाइयाँ थीं, जो पहले ब्रिटिश भारत के गवर्नर वाले प्रांत थीं। इनमें राज्यपाल संवैधानिक प्रमुख था और जनता द्वारा चुना हुआ विधानमंडल तथा मंत्रिमंडल था। ये राज्य थे — असम, बिहार, बम्बई, मध्य प्रदेश, मद्रास, उड़ीसा, पंजाब, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल।
◆ भाग ख राज्य (9) — ये पुरानी बड़ी रियासतों या रियासतों को मिलाकर बने राज्य-संघों से बने थे। इनका संवैधानिक प्रमुख राज्यपाल नहीं, बल्कि राजप्रमुख कहलाता था, जो प्रायः कोई पूर्व शासक होता था। इनमें भी निर्वाचित विधानमंडल था, पर शुरू के वर्षों में केंद्र का नियंत्रण इन पर अधिक था। ये राज्य थे — हैदराबाद, जम्मू-कश्मीर, मध्य भारत, मैसूर, पेप्सू (पटियाला और पूर्वी पंजाब राज्य संघ), राजस्थान, सौराष्ट्र, त्रावणकोर-कोचीन और विंध्य प्रदेश। विंध्य प्रदेश को शीघ्र ही भाग ग में डाल दिया गया।
◆ भाग ग राज्य (10) — ये छोटी इकाइयाँ थीं, जिनमें पुराने मुख्य आयुक्त के प्रांत और कुछ रियासतें शामिल थीं। इनका शासन केंद्र सरकार राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त मुख्य आयुक्त या उपराज्यपाल के माध्यम से चलाती थी। ये थे — अजमेर, भोपाल, बिलासपुर, कूच बिहार, कुर्ग, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, कच्छ, मणिपुर और त्रिपुरा। कूच बिहार 1950 में ही पश्चिम बंगाल में मिला दिया गया।
◆ भाग घ (1) — इसमें केवल अंडमान और निकोबार द्वीप समूह था, जिसका शासन केंद्र द्वारा नियुक्त मुख्य आयुक्त सीधे चलाता था और वहाँ कोई विधानमंडल नहीं था।
◆ इस व्यवस्था की कमी — यह वर्गीकरण अस्थायी और असमान था। एक ही देश के नागरिकों को अलग-अलग दर्जे के राज्यों में रहना पड़ता था और सीमाएँ अब भी इतिहास की दुर्घटनाओं से बनी थीं। इसलिए यह स्पष्ट था कि देर-सबेर राज्यों को नए सिरे से गढ़ना पड़ेगा।
◆ पृष्ठभूमि — संविधान बन रहा था और दक्षिण भारत से, विशेषकर आंध्र, कर्नाटक, केरल और महाराष्ट्र से, भाषाई प्रांत बनाने की माँग संविधान सभा तक पहुँच रही थी। संविधान सभा को यह तय करना था कि नए संविधान में प्रांत किस रूप में लिखे जाएँ।
◆ कौन और कब — 17 जून 1948 को संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने भाषाई प्रांत आयोग नियुक्त किया। इसके अध्यक्ष इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश एस. के. धर थे, इसलिए इसे धर आयोग कहते हैं। इसके दो अन्य सदस्य पन्ना लाल और जगत नारायण लाल थे।
◆ रिपोर्ट (10 दिसंबर 1948) — आयोग ने कहा कि प्रांतों का पुनर्गठन भाषा के आधार पर नहीं, बल्कि प्रशासनिक सुविधा के आधार पर होना चाहिए और साथ में इतिहास, भूगोल और आर्थिक स्थिति को देखा जाना चाहिए। आयोग के अनुसार उस समय भाषाई प्रांत बनाना राष्ट्रीय एकता के लिए ख़तरनाक होता।
◆ प्रतिक्रिया — इस रिपोर्ट से दक्षिण भारत में, ख़ासकर तेलुगु-भाषी क्षेत्रों में, गहरी निराशा और रोष फैला। लोगों का कहना था कि कांग्रेस ने तीस वर्ष तक जो वादा किया, उससे वह सत्ता में आते ही पीछे हट रही है।
◆ गठन — धर आयोग की रिपोर्ट से उपजे असंतोष को देखते हुए कांग्रेस ने अपने जयपुर अधिवेशन (दिसंबर 1948) में इस प्रश्न पर फिर से विचार के लिए अपनी एक समिति बनाई। यह सरकारी आयोग नहीं, बल्कि कांग्रेस पार्टी की समिति थी।
◆ सदस्य और नाम — इसके तीन सदस्य थे — जवाहरलाल नेहरू, वल्लभभाई पटेल और पट्टाभि सीतारमैया। तीनों के नाम के पहले अक्षरों से इसका नाम जे.वी.पी. समिति पड़ा। पट्टाभि सीतारमैया उस समय कांग्रेस के अध्यक्ष थे और स्वयं आंध्र के नेता थे।
◆ रिपोर्ट (अप्रैल 1949) — समिति ने भी भाषा को राज्यों के पुनर्गठन का आधार मानने से इनकार किया। उसका कहना था कि इस समय देश की एकता, सुरक्षा और आर्थिक विकास पहली ज़रूरत है और भाषाई प्रांतों का प्रश्न कुछ वर्ष के लिए टाल देना चाहिए।
◆ एक खिड़की खुली छोड़ी — समिति ने यह भी माना कि जहाँ जनता की भावना बहुत प्रबल और व्यापक हो और संबंधित पक्षों में सहमति हो, वहाँ माँग पर विचार किया जा सकता है। उसने आंध्र के मामले को इस दृष्टि से विचार-योग्य माना, पर शर्त यह थी कि आंध्र के लोग मद्रास शहर पर अपना दावा छोड़ें। इसी शर्त पर बात अटकी रही।
उदाहरण से समझें — दोनों में अंतर धर आयोग और जे.वी.पी. समिति में अंतर याद रखने का सरल तरीक़ा यह है: धर आयोग संविधान सभा का बनाया हुआ आयोग था और उसने भाषा के आधार को पूरी तरह नकारा; जे.वी.पी. समिति कांग्रेस की बनाई हुई समिति थी और उसने भी भाषा के आधार को टाला, पर आंध्र के लिए थोड़ी गुंजाइश छोड़ी। |
📖 कहानी 2: 58 दिन का अनशन, जिसने राज्यों का नक्शा बदल दिया मद्रास राज्य में तेलुगु-भाषी लोग बहुत थे, पर उन्हें लगता था कि प्रशासन, नौकरियों और शिक्षा में तमिल-भाषियों का दबदबा है। अलग आंध्र के लिए आंध्र महासभा 1913 से सक्रिय थी। पर धर आयोग और जे.वी.पी. समिति, दोनों ने भाषाई राज्य की माँग को टाल दिया था, और तेलुगु क्षेत्रों में गहरी निराशा फैली थी। तब एक व्यक्ति ने अपने जीवन को ही दाँव पर लगा दिया। पोट्टि श्रीरामुलु (1901–1952) रेलवे में नौकरी करते थे। पत्नी और संतान की मृत्यु के बाद उन्होंने नौकरी छोड़ दी और गांधीजी से जुड़ गए। वे नमक सत्याग्रह में जेल गए और दलितों के मंदिर-प्रवेश के लिए भी अनशन कर चुके थे। 19 अक्टूबर 1952 को उन्होंने मद्रास में अलग आंध्र राज्य के लिए आमरण अनशन शुरू किया। शुरू में सरकार ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। 58वें दिन, 15 दिसंबर 1952 को श्रीरामुलु की मृत्यु हो गई। तेलुगु समाज उन्हें "अमरजीवी" कहकर याद करता है। ख़बर फैलते ही आंध्र के शहरों में हड़ताल, प्रदर्शन और हिंसा फैल गई, रेलगाड़ियाँ रोकी गईं और पुलिस की गोलीबारी में कई लोग मारे गए। चार दिन बाद, 19 दिसंबर 1952 को प्रधानमंत्री नेहरू ने अलग आंध्र राज्य की घोषणा कर दी। 1 अक्टूबर 1953 को आंध्र राज्य बना। यह स्वतंत्र भारत में भाषा के आधार पर बना पहला राज्य था। इसकी राजधानी कुरनूल बनी, टंगुटूरी प्रकाशम पहले मुख्यमंत्री बने और मद्रास शहर मद्रास राज्य के पास ही रहा। 🧭 इस कहानी से कौन-सी अवधारणा साफ़ हुई ✔ भाषाई राज्य — ऐसा राज्य, जिसमें मुख्य रूप से एक भाषा बोलने वाले लोग रहें और वही भाषा प्रशासन, शिक्षा और न्यायालयों की भाषा बने। ✔ जन-दबाव और गांधीवादी अनशन — नेतृत्व की झिझक को तोड़ने का काम एक कार्यकर्ता के अनशन और उसके बाद उठे जन-आंदोलन ने किया। ✔ एक राज्य ने रास्ता खोला — आंध्र बनते ही मराठी, गुजराती, कन्नड़ और मलयालम-भाषियों की माँगें तेज़ हो गईं। इसी से दिसंबर 1953 में राज्य पुनर्गठन आयोग बना। 📝 परीक्षा के लिए: पोट्टि श्रीरामुलु (1901–1952): अनशन 19 अक्टूबर 1952 → मृत्यु 15 दिसंबर 1952 (58वाँ दिन) → नेहरू की घोषणा 19 दिसंबर 1952 → आंध्र राज्य 1 अक्टूबर 1953 (पहला भाषाई राज्य; राजधानी कुरनूल; पहले मुख्यमंत्री प्रकाशम)। "आंध्र प्रदेश" बना 1 नवंबर 1956 को। |
◆ आंध्र की माँग सबसे पुरानी क्यों थी — मद्रास राज्य में तेलुगु-भाषी लोग संख्या में बहुत थे, पर उन्हें लगता था कि प्रशासन, नौकरियों और शिक्षा में तमिल-भाषियों का दबदबा है। अलग आंध्र के लिए आंध्र महासभा 1913 से ही सक्रिय थी। स्वतंत्रता के बाद यह माँग "विशाल आंध्र" के नारे के साथ और तेज़ हो गई।
◆ पोट्टि श्रीरामुलु कौन थे — श्रीरामुलु (1901–1952) का जन्म मद्रास में एक तेलुगु परिवार में हुआ था। वे रेलवे में नौकरी करते थे; पत्नी और संतान की मृत्यु के बाद उन्होंने नौकरी छोड़ दी और गांधीजी के साथ जुड़ गए। उन्होंने नमक सत्याग्रह और बाद के आंदोलनों में भाग लिया और जेल गए। वे दलितों के मंदिर-प्रवेश के लिए भी अनशन कर चुके थे। अर्थात् अनशन उनके लिए गांधीवादी संघर्ष का जाना-पहचाना साधन था।
◆ आमरण अनशन (19 अक्टूबर 1952) — श्रीरामुलु ने 19 अक्टूबर 1952 को मद्रास में अलग आंध्र राज्य की माँग को लेकर आमरण अनशन शुरू किया। शुरू में सरकार ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। जैसे-जैसे दिन बीतते गए, तेलुगु क्षेत्रों में सहानुभूति और बेचैनी बढ़ती गई।
◆ मृत्यु (15 दिसंबर 1952) — अनशन के 58वें दिन, 15 दिसंबर 1952 को श्रीरामुलु की मृत्यु हो गई। तेलुगु समाज उन्हें "अमरजीवी" कहकर याद करता है।
◆ जन-विस्फोट — उनकी मृत्यु की ख़बर फैलते ही आंध्र के शहरों में हड़ताल, प्रदर्शन और हिंसा फैल गई। रेलगाड़ियाँ रोकी गईं, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुँचा और पुलिस की गोलीबारी में कई लोग मारे गए।
◆ नेहरू की घोषणा (19 दिसंबर 1952) — हालात को देखते हुए प्रधानमंत्री नेहरू ने श्रीरामुलु की मृत्यु के चार दिन बाद, 19 दिसंबर 1952 को अलग आंध्र राज्य बनाने की घोषणा कर दी।
◆ आंध्र राज्य (1 अक्टूबर 1953) — 1 अक्टूबर 1953 को मद्रास राज्य के तेलुगु-भाषी ज़िलों को अलग करके आंध्र राज्य बनाया गया। यह स्वतंत्र भारत में भाषा के आधार पर बना पहला राज्य था। इसकी राजधानी कुरनूल बनी और पहले मुख्यमंत्री टंगुटूरी प्रकाशम बने, जिन्हें "आंध्र केसरी" कहा जाता है। मद्रास शहर मद्रास राज्य के पास ही रहा।
◆ ध्यान दें — आंध्र और आंध्र प्रदेश अलग हैं — 1953 का राज्य केवल "आंध्र" कहलाता था और उसमें हैदराबाद रियासत का तेलंगाना क्षेत्र शामिल नहीं था। "आंध्र प्रदेश" 1 नवंबर 1956 को बना, जब आंध्र में तेलंगाना जोड़ा गया और राजधानी हैदराबाद बनी।
◆ सिद्धांत की जीत — आंध्र बनते ही यह स्थापित हो गया कि भाषा के आधार पर राज्य बन सकता है। अब सरकार के लिए दूसरे क्षेत्रों को मना करना संभव नहीं था।
◆ दूसरी माँगें तेज़ हुईं — मराठी-भाषियों ने संयुक्त महाराष्ट्र की, गुजराती-भाषियों ने महागुजरात की, कन्नड़-भाषियों ने एकीकृत कर्नाटक की और मलयालम-भाषियों ने ऐक्य केरल की माँग तेज़ कर दी।
◆ परिणाम — सरकार को समझ आ गया कि हर माँग पर अलग-अलग और दबाव में फ़ैसला करने से बेहतर है कि पूरे देश के लिए एक साथ, सोच-समझकर नीति बनाई जाए। इसी सोच से दिसंबर 1953 में राज्य पुनर्गठन आयोग बना, जिसे हम अगले खंड में पढ़ेंगे।
नीचे का चार्ट 1920 से 1956 तक की इस पूरी यात्रा का सार है। इसकी पहली पाँच सीढ़ियाँ ऊपर विस्तार से समझाई जा चुकी हैं; अंतिम दो सीढ़ियाँ — राज्य पुनर्गठन आयोग और 1956 का अधिनियम — अगले खंड का विषय हैं।

आधार | धर आयोग | जे.वी.पी. समिति |
किसने बनाया | इसे संविधान सभा के अध्यक्ष ने 17 जून 1948 को नियुक्त किया। | इसे कांग्रेस ने जयपुर अधिवेशन (दिसंबर 1948) में बनाया। |
सदस्य | अध्यक्ष एस. के. धर थे और सदस्य पन्ना लाल तथा जगत नारायण लाल थे। | इसके सदस्य जवाहरलाल नेहरू, वल्लभभाई पटेल और पट्टाभि सीतारमैया थे। |
रिपोर्ट | इसने 10 दिसंबर 1948 को रिपोर्ट दी। | इसने अप्रैल 1949 में रिपोर्ट दी। |
निष्कर्ष | इसने भाषा की जगह प्रशासनिक सुविधा को आधार बताया और भाषाई पुनर्गठन को उस समय अनुचित माना। | इसने भी भाषा के आधार को टाला और एकता को प्राथमिकता दी, पर आंध्र के मामले को विचार-योग्य माना। |
आंध्र बनने के बाद केंद्र सरकार ने तय किया कि राज्यों की सीमाओं का प्रश्न टुकड़ों में नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए एक साथ हल किया जाए। इसके लिए एक उच्च-स्तरीय आयोग बना, उसकी रिपोर्ट पर देश-भर में बहस हुई और अंत में संसद ने 1956 में वह क़ानून बनाया, जिसने भारत के राजनीतिक नक्शे का आज वाला ढाँचा तैयार किया।
◆ गठन — प्रधानमंत्री नेहरू ने दिसंबर 1953 में संसद में राज्य पुनर्गठन आयोग की घोषणा की। इसका काम था — पूरे देश में राज्यों की सीमाओं के प्रश्न की निष्पक्ष जाँच करना और सुझाव देना।
◆ सदस्य — आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति फ़ज़ल अली थे, जो सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश रह चुके थे और उस समय उड़ीसा के राज्यपाल थे। इसलिए इसे फ़ज़ल अली आयोग भी कहते हैं। दो अन्य सदस्य थे — इतिहासकार और राजनयिक के. एम. पणिक्कर तथा अनुभवी सांसद हृदयनाथ कुंज़रू।
◆ काम करने का तरीक़ा — आयोग ने लगभग दो वर्ष तक देश-भर का दौरा किया, हज़ारों ज्ञापन पढ़े और हज़ारों लोगों से बातचीत की। इससे पता चलता है कि यह प्रश्न जनता के लिए कितना महत्त्वपूर्ण था।
◆ रिपोर्ट — आयोग ने 30 सितंबर 1955 को अपनी रिपोर्ट सौंपी।
आयोग ने कहा कि किसी राज्य की सीमा तय करते समय चार बातों को ध्यान में रखा जाना चाहिए। इन्हें क्रम से समझें, क्योंकि परीक्षा में ये बार-बार पूछे जाते हैं।
1. देश की एकता और सुरक्षा — कोई भी नई सीमा ऐसी नहीं होनी चाहिए, जिससे भारत की एकता कमज़ोर हो या सीमावर्ती क्षेत्रों की सुरक्षा पर असर पड़े। आयोग ने इसे सबसे पहला आधार माना।
2. भाषा और संस्कृति की समानता — एक भाषा और एक जैसी संस्कृति वाले लोगों को यथासंभव एक राज्य में रखा जाए, क्योंकि इससे प्रशासन सरल होता है और जनता शासन से जुड़ती है।
3. वित्तीय, आर्थिक और प्रशासनिक व्यवहार्यता — नया राज्य अपने पैरों पर खड़ा हो सके; उसके पास पर्याप्त आय, संसाधन और प्रशासन चलाने की क्षमता हो। केवल भावना के आधार पर ऐसा राज्य न बने, जो आर्थिक रूप से चल ही न सके।
4. राष्ट्रीय योजना की सफलता और जन-कल्याण — राज्यों की सीमाएँ ऐसी हों कि पंचवर्षीय योजनाओं का काम आसान हो और हर राज्य के साथ-साथ पूरे देश के लोगों का कल्याण बढ़े।
◆ भाषा मुख्य आधार, पर अकेला आधार नहीं — आयोग ने माना कि भाषा राज्यों के पुनर्गठन का प्रमुख आधार है, पर उसने "एक भाषा, एक राज्य" के सिद्धांत को अस्वीकार कर दिया। इसका अर्थ यह था कि एक भाषा के एक से अधिक राज्य हो सकते हैं (जैसे हिंदी के कई राज्य हैं) और ज़रूरत हो तो एक राज्य में दो भाषाएँ भी रह सकती हैं।
◆ चार श्रेणियों का अंत — आयोग ने सुझाव दिया कि भाग क, ख, ग और घ का भेद समाप्त कर दिया जाए, राजप्रमुख का पद ख़त्म हो और सभी राज्यों का दर्जा बराबर हो।
◆ 16 राज्य और 3 केंद्र-शासित क्षेत्र — आयोग ने देश को 16 राज्यों और 3 केंद्र-शासित क्षेत्रों में बाँटने की सिफ़ारिश की।
◆ बम्बई को द्विभाषी रखने का सुझाव — आयोग ने मराठी और गुजराती भाषियों के लिए अलग राज्य बनाने के बजाय बम्बई को द्विभाषी राज्य बनाए रखने की बात कही, क्योंकि बम्बई शहर पर दोनों का दावा था।
◆ तेलंगाना पर सावधानी — आयोग का सुझाव था कि हैदराबाद के तेलुगु-भाषी तेलंगाना क्षेत्र को तुरंत आंध्र में न मिलाया जाए, बल्कि कुछ वर्ष अलग रखा जाए और बाद में वहाँ की विधानसभा दो-तिहाई बहुमत से चाहे, तभी विलय हो। कारण यह था कि तेलंगाना शिक्षा और आर्थिक दृष्टि से पिछड़ा था और उसे डर था कि बड़े आंध्र में उसके हित दब जाएँगे।
◆ पंजाबी सूबा अस्वीकार — आयोग ने अलग पंजाबी-भाषी राज्य की माँग नहीं मानी।
◆ संसद का फ़ैसला — रिपोर्ट पर देश-भर में तीखी बहस हुई और कई जगह आंदोलन हुए। संसद ने आयोग की सिफ़ारिशों को कुछ बदलावों के साथ स्वीकार किया और राज्य पुनर्गठन अधिनियम 1956 पारित किया।
◆ सातवाँ संविधान संशोधन (1956) — चूँकि भाग क-ख-ग-घ का वर्गीकरण संविधान में लिखा था, इसलिए उसे हटाने के लिए संविधान में संशोधन ज़रूरी था। सातवें संशोधन ने यह वर्गीकरण समाप्त किया, राजप्रमुख का पद ख़त्म किया और देश की इकाइयों को केवल दो वर्गों में रखा — राज्य और केंद्र-शासित प्रदेश। इसी संशोधन ने यह भी संभव किया कि एक ही व्यक्ति दो या अधिक राज्यों का राज्यपाल हो सके।
◆ लागू होने की तिथि — नई व्यवस्था 1 नवंबर 1956 से लागू हुई। उस दिन भारत में 14 राज्य और 6 केंद्र-शासित प्रदेश थे। इसी कारण कई राज्य आज भी 1 नवंबर को अपना स्थापना दिवस मनाते हैं।
◆ आयोग और अधिनियम का अंतर — आयोग ने 16 राज्य और 3 केंद्र-शासित क्षेत्र सुझाए थे, जबकि अधिनियम से 14 राज्य और 6 केंद्र-शासित प्रदेश बने। एक बड़ा अंतर यह था कि आयोग की सावधानी के विपरीत तेलंगाना को आंध्र में मिला दिया गया; दूसरा यह कि विदर्भ को अलग राज्य न बनाकर बम्बई में जोड़ दिया गया।
🔍 आसान परिभाषा: केंद्र-शासित प्रदेश |
📘 परिभाषा: भारत संघ की वह इकाई, जिसका प्रशासन राष्ट्रपति अपने द्वारा नियुक्त प्रशासक या उपराज्यपाल के माध्यम से चलाते हैं; यह श्रेणी सातवें संविधान संशोधन (1956) से बनी। |
💡 आसान भाषा में: ऐसा इलाक़ा, जिसे कोई राज्य सरकार नहीं, बल्कि सीधे दिल्ली की केंद्र सरकार चलाती है — प्रायः इसलिए कि वह बहुत छोटा है, या सामरिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है, या उसकी संस्कृति अलग है। 🏠 उदाहरण: 1956 में दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, मणिपुर, त्रिपुरा, अंडमान-निकोबार और लक्षद्वीप समूह केंद्र-शासित प्रदेश बने। |
14 राज्य ये थे — आंध्र प्रदेश, असम, बिहार, बम्बई, जम्मू-कश्मीर, केरल, मध्य प्रदेश, मद्रास, मैसूर, उड़ीसा, पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल। 6 केंद्र-शासित प्रदेश ये थे — अंडमान और निकोबार द्वीप समूह; दिल्ली; हिमाचल प्रदेश; लक्कादीव, मिनिकॉय और अमीनदीवी द्वीप समूह; मणिपुर; और त्रिपुरा।
◆ आंध्र प्रदेश — 1953 के आंध्र राज्य में हैदराबाद राज्य का तेलुगु-भाषी तेलंगाना क्षेत्र जोड़ा गया और नया राज्य आंध्र प्रदेश कहलाया। राजधानी कुरनूल से हटकर हैदराबाद आ गई। तेलंगाना के डर को दूर करने के लिए फ़रवरी 1956 में दोनों क्षेत्रों के नेताओं के बीच "सज्जनों का समझौता" (जेंटलमेन्स एग्रीमेंट) हुआ, जिसमें नौकरियों, शिक्षा और विकास के ख़र्च में तेलंगाना के हितों की रक्षा का वादा था। इस समझौते के ठीक से लागू न होने की शिकायत ही आगे तेलंगाना आंदोलन की जड़ बनी।
◆ केरल — मलयालम-भाषी क्षेत्रों को जोड़कर केरल बना। इसमें त्रावणकोर-कोचीन राज्य का अधिकांश भाग और मद्रास राज्य का मालाबार ज़िला तथा कासरगोड क्षेत्र शामिल हुए। त्रावणकोर-कोचीन के दक्षिणी तमिल-भाषी तालुके, जिनमें कन्याकुमारी क्षेत्र है, मद्रास राज्य को दे दिए गए।
◆ मैसूर (आज का कर्नाटक) — पुराने मैसूर राज्य में कुर्ग और बम्बई, हैदराबाद तथा मद्रास राज्यों के कन्नड़-भाषी क्षेत्र जोड़े गए। इस तरह पहली बार अधिकांश कन्नड़-भाषी एक राज्य में आए। बम्बई से आया बेलगाम ज़िला आगे चलकर महाराष्ट्र और कर्नाटक के बीच सीमा-विवाद का कारण बना।
◆ बम्बई — बम्बई को द्विभाषी (मराठी और गुजराती) राज्य रखा गया और उसे और बड़ा कर दिया गया। उसमें सौराष्ट्र और कच्छ, हैदराबाद राज्य का मराठी-भाषी मराठवाड़ा तथा पुराने मध्य प्रदेश का मराठी-भाषी विदर्भ जोड़े गए, जबकि उसके कन्नड़-भाषी ज़िले मैसूर को दिए गए। यह व्यवस्था न मराठी-भाषियों को पसंद आई, न गुजराती-भाषियों को, और केवल चार वर्ष बाद टूट गई।
◆ मध्य प्रदेश — पुराने मध्य प्रदेश का हिंदी-भाषी भाग (महाकोशल), मध्य भारत, विंध्य प्रदेश और भोपाल — इन चारों को मिलाकर नया, बहुत बड़ा मध्य प्रदेश बना। इसकी राजधानी भोपाल बनी। पुराने मध्य प्रदेश की राजधानी नागपुर विदर्भ के साथ बम्बई राज्य में चली गई।
◆ मद्रास (आज का तमिलनाडु) — मद्रास से मालाबार केरल को और दक्षिण कनारा मैसूर को गया, जबकि कन्याकुमारी क्षेत्र उसमें जुड़ा। इस तरह मद्रास मुख्य रूप से तमिल-भाषी राज्य बन गया।
◆ पंजाब — रियासतों से बना पेप्सू (पटियाला और पूर्वी पंजाब राज्य संघ) पंजाब में मिला दिया गया। पंजाबी सूबे की माँग नहीं मानी गई, इसलिए राज्य में पंजाबी और हिंदी दोनों क्षेत्र बने रहे।
◆ राजस्थान — केंद्र-शासित अजमेर-मेरवाड़ा, बम्बई राज्य का आबू क्षेत्र और मध्य भारत का सुनेल टप्पा राजस्थान में जोड़े गए, जबकि सिरोंज क्षेत्र मध्य प्रदेश को दिया गया। इसी के साथ राजस्थान का वर्तमान स्वरूप पूरा हुआ।
◆ हैदराबाद राज्य समाप्त — निज़ाम की पुरानी रियासत से बना हैदराबाद राज्य भाषा के आधार पर तीन हिस्सों में बँट गया — तेलंगाना आंध्र प्रदेश में गया, मराठवाड़ा बम्बई में और कन्नड़-भाषी ज़िले मैसूर में। इसी तरह मध्य भारत, विंध्य प्रदेश, भोपाल, सौराष्ट्र, कच्छ, पेप्सू, अजमेर और कुर्ग अलग इकाइयों के रूप में समाप्त हो गए।
◆ बिहार और पश्चिम बंगाल — उसी वर्ष एक अलग क़ानून से बिहार के कुछ बांग्ला-भाषी क्षेत्र, जैसे पुरुलिया, पश्चिम बंगाल को दिए गए।
◆ जिनमें बड़ा बदलाव नहीं हुआ — असम, उड़ीसा, उत्तर प्रदेश और जम्मू-कश्मीर की सीमाएँ लगभग पहले जैसी रहीं।
🔍 आसान परिभाषा: क्षेत्रीय परिषद |
📘 परिभाषा: राज्य पुनर्गठन अधिनियम 1956 द्वारा बनाई गई सांविधिक सलाहकारी संस्था, जिसमें एक भौगोलिक क्षेत्र के पड़ोसी राज्य और केंद्र-शासित प्रदेश मिलकर साझा प्रश्नों पर विचार करते हैं; इसके अध्यक्ष केंद्रीय गृह मंत्री होते हैं। |
💡 आसान भाषा में: पड़ोसी राज्यों के मुख्यमंत्रियों की एक साझा बैठक, जहाँ वे सीमा, नदी-जल, सड़क-परिवहन जैसे आपसी मामलों को बातचीत से सुलझाने की कोशिश करते हैं। 🏠 उदाहरण: उत्तरी क्षेत्रीय परिषद में पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान और दिल्ली जैसी इकाइयाँ साथ बैठती हैं। |
◆ क्यों बनीं — नेहरू को चिंता थी कि भाषा के आधार पर बने राज्य कहीं अपने-अपने दायरे में सिमट न जाएँ और पड़ोसियों से झगड़ने न लगें। इसलिए पुनर्गठन के साथ ही ऐसी संस्था बनाई गई, जो राज्यों में सहयोग और मेल-जोल की आदत डाले।
◆ कितनी हैं — अधिनियम से पाँच क्षेत्रीय परिषदें बनीं — उत्तरी, मध्य, पूर्वी, पश्चिमी और दक्षिणी।
◆ संरचना — हर परिषद के अध्यक्ष केंद्रीय गृह मंत्री होते हैं। उस क्षेत्र के राज्यों के मुख्यमंत्री इसके सदस्य होते हैं और वे बारी-बारी से एक-एक वर्ष के लिए उपाध्यक्ष बनते हैं।
◆ स्वरूप — ये सांविधिक संस्थाएँ हैं, संवैधानिक नहीं; अर्थात् ये संविधान के किसी अनुच्छेद से नहीं, बल्कि संसद के एक अधिनियम से बनी हैं। इनका काम केवल सलाह देना है; इनके निर्णय बाध्यकारी नहीं होते।
◆ पूर्वोत्तर परिषद — पूर्वोत्तर राज्यों के लिए अलग पूर्वोत्तर परिषद बाद में 1971 के एक अलग अधिनियम से बनी। यह उन पाँच क्षेत्रीय परिषदों में नहीं गिनी जाती।
📌 याद रखें — 1953 से 1956 राज्य पुनर्गठन आयोग — गठन दिसंबर 1953; सदस्य फ़ज़ल अली (अध्यक्ष), के. एम. पणिक्कर और हृदयनाथ कुंज़रू; रिपोर्ट 30 सितंबर 1955; सिफ़ारिश 16 राज्य और 3 केंद्र-शासित क्षेत्र। राज्य पुनर्गठन अधिनियम और सातवाँ संविधान संशोधन — 1 नवंबर 1956 से लागू; 14 राज्य और 6 केंद्र-शासित प्रदेश; भाग क-ख-ग-घ और राजप्रमुख का पद समाप्त। आयोग ने भाषा को प्रमुख आधार माना, पर "एक भाषा, एक राज्य" का सिद्धांत नहीं माना। |
राज्य | किन क्षेत्रों को मिलाकर बना |
आंध्र प्रदेश | आंध्र राज्य में हैदराबाद का तेलंगाना क्षेत्र जोड़ा गया और राजधानी हैदराबाद बनी। |
केरल | त्रावणकोर-कोचीन में मद्रास का मालाबार ज़िला जोड़ा गया, जबकि कन्याकुमारी क्षेत्र मद्रास को गया। |
मैसूर | मैसूर में कुर्ग और बम्बई, हैदराबाद तथा मद्रास के कन्नड़-भाषी क्षेत्र जोड़े गए। |
बम्बई | बम्बई में सौराष्ट्र, कच्छ, मराठवाड़ा और विदर्भ जोड़े गए और यह द्विभाषी राज्य रहा। |
मध्य प्रदेश | महाकोशल, मध्य भारत, विंध्य प्रदेश और भोपाल को मिलाया गया और राजधानी भोपाल बनी। |
पंजाब | पंजाब में पेप्सू का विलय किया गया। |
1956 का पुनर्गठन इस कहानी का अंत नहीं, शुरुआत था। 14 राज्यों वाला भारत आज 28 राज्यों वाला भारत है। 1956 के बाद नए राज्य चार तरह के कारणों से बने — कहीं भाषा के कारण (महाराष्ट्र, गुजरात, पंजाब), कहीं जनजातीय पहचान के कारण (नागालैंड, मेघालय, मिज़ोरम, झारखंड), कहीं क्षेत्रीय पिछड़ेपन और उपेक्षा की भावना के कारण (उत्तराखंड, छत्तीसगढ़, तेलंगाना) और कहीं केंद्र-शासित प्रदेश को पूर्ण राज्य का दर्जा देकर (हिमाचल प्रदेश, गोवा)। नीचे हर राज्य को उसकी पृष्ठभूमि के साथ क्रम से समझाया गया है।
🔍 आसान परिभाषा: अनुच्छेद 3 — नए राज्य बनाने की शक्ति |
📘 परिभाषा: संविधान का वह अनुच्छेद, जो संसद को क़ानून बनाकर नया राज्य बनाने, किसी राज्य का क्षेत्र घटाने-बढ़ाने, उसकी सीमा बदलने और उसका नाम बदलने की शक्ति देता है; ऐसा विधेयक राष्ट्रपति की सिफ़ारिश से ही पेश होता है और राष्ट्रपति उसे संबंधित राज्य के विधानमंडल के पास राय के लिए भेजते हैं, पर संसद उस राय को मानने के लिए बाध्य नहीं है। |
💡 आसान भाषा में: भारत में नया राज्य बनाने का अंतिम अधिकार संसद के पास है। राज्य की विधानसभा से केवल राय पूछी जाती है; वह मना भी कर दे, तब भी संसद साधारण बहुमत से नया राज्य बना सकती है। 🏠 उदाहरण: 2014 में आंध्र प्रदेश की विधानसभा ने राज्य के बँटवारे का विधेयक अस्वीकार कर दिया था, फिर भी संसद ने क़ानून पारित किया और तेलंगाना बना। |
◆ पृष्ठभूमि — 1956 में बम्बई को द्विभाषी राज्य रखा गया था, जिसमें मराठी और गुजराती बोलने वाले साथ थे। झगड़े की असली जड़ बम्बई शहर था — वह मराठी-भाषी क्षेत्र में स्थित था, पर उसके व्यापार और उद्योग में गुजराती-भाषियों की बड़ी भूमिका थी। दोनों ही उसे छोड़ने को तैयार नहीं थे।
◆ संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन — मराठी-भाषियों ने संयुक्त महाराष्ट्र समिति बनाकर माँग की कि बम्बई शहर सहित सभी मराठी-भाषी क्षेत्रों का एक राज्य बने। इस आंदोलन में अलग-अलग विचारधाराओं के दल साथ आए। बम्बई में पुलिस की गोलीबारी में सौ से अधिक आंदोलनकारी मारे गए, जिनकी स्मृति में मुंबई का हुतात्मा चौक बना है।
◆ महागुजरात आंदोलन — गुजराती-भाषियों ने इंदुलाल याज्ञिक के नेतृत्व में महागुजरात जनता परिषद बनाकर अलग गुजरात राज्य के लिए आंदोलन चलाया। अहमदाबाद में भी छात्रों पर गोली चली और आंदोलन तेज़ हो गया।
◆ परिणाम — 1957 के चुनाव में इन क्षेत्रों में कांग्रेस को भारी नुकसान हुआ। अंततः संसद ने बम्बई पुनर्गठन अधिनियम 1960 पारित किया और 1 मई 1960 को बम्बई राज्य दो राज्यों में बँट गया — महाराष्ट्र (राजधानी बम्बई) और गुजरात (राजधानी पहले अहमदाबाद, बाद में गांधीनगर)। इसलिए 1 मई को दोनों राज्य अपना स्थापना दिवस मनाते हैं। गुजरात भारत का 15वाँ राज्य बना।
◆ पृष्ठभूमि — नगा पहाड़ियाँ असम का एक ज़िला थीं। नगा जनजातियों की भाषा, धर्म और रीति-रिवाज मैदानी असम से बिलकुल अलग थे और अंग्रेज़ों के समय इस क्षेत्र को बाक़ी भारत से लगभग अलग-थलग रखा गया था। अंगामी ज़ापू फ़िज़ो के नेतृत्व में नगा नेशनल काउंसिल ने भारत से अलग स्वतंत्र देश की माँग की और 1950 के दशक में सशस्त्र विद्रोह शुरू हो गया।
◆ समाधान की कोशिश — सरकार ने एक ओर सेना से विद्रोह को रोका और दूसरी ओर उदार नगा नेताओं से बातचीत की। 1957 में नगा पहाड़ी ज़िले को असम से अलग करके केंद्र के अधीन किया गया। 1960 में नगा नेताओं के एक सम्मेलन और केंद्र सरकार के बीच समझौता हुआ, जिसमें भारत के भीतर अलग राज्य बनाने पर सहमति बनी।
◆ राज्य का गठन — 13वें संविधान संशोधन (1962) और नागालैंड राज्य अधिनियम के आधार पर 1 दिसंबर 1963 को नागालैंड भारत का 16वाँ राज्य बना; राजधानी कोहिमा है। संविधान में जोड़ा गया अनुच्छेद 371क नगाओं की धार्मिक-सामाजिक प्रथाओं, परंपरागत क़ानून और भूमि पर उनके अधिकार की रक्षा करता है।
◆ महत्त्व — यह पहला राज्य था, जो भाषा के नहीं, बल्कि जनजातीय पहचान के आधार पर और एक अलगाववादी आंदोलन को लोकतांत्रिक रास्ते पर लाने के लिए बना। विद्रोह इससे पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ, पर बड़ी संख्या में नगा मुख्यधारा की राजनीति में आए।
◆ पृष्ठभूमि — 1956 के पंजाब में पंजाबी-भाषी और हिंदी-भाषी दोनों क्षेत्र थे। अकाली दल ने मास्टर तारा सिंह और बाद में संत फ़तेह सिंह के नेतृत्व में पंजाबी-भाषी राज्य — "पंजाबी सूबा" — की माँग उठाई।
◆ माँग देर से क्यों मानी गई — सरकार को लगता था कि यह माँग भाषा की आड़ में धर्म पर आधारित है, क्योंकि पंजाबी-भाषी क्षेत्र में सिख बहुसंख्या में थे और विभाजन के बाद धर्म के आधार पर कोई राज्य बनाना नेतृत्व को स्वीकार नहीं था। दूसरी ओर हिंदी-भाषी क्षेत्र में अलग हरियाणा की माँग भी थी।
◆ शाह आयोग — लंबे आंदोलन के बाद 1966 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार ने माँग सिद्धांत रूप में मान ली। सीमा तय करने के लिए न्यायमूर्ति जे. सी. शाह की अध्यक्षता में शाह आयोग बना।
◆ परिणाम — पंजाब पुनर्गठन अधिनियम 1966 के अनुसार 1 नवंबर 1966 को तीन बातें हुईं। पहली, पंजाबी-भाषी क्षेत्र पंजाब राज्य रहा। दूसरी, हिंदी-भाषी क्षेत्र से हरियाणा बना, जो भारत का 17वाँ राज्य है। तीसरी, पहाड़ी क्षेत्र — जैसे काँगड़ा, कुल्लू और शिमला — केंद्र-शासित हिमाचल प्रदेश में जोड़ दिए गए।
◆ चंडीगढ़ — चंडीगढ़ शहर पर दोनों राज्यों का दावा था, इसलिए उसे केंद्र-शासित प्रदेश बनाया गया और वह पंजाब और हरियाणा दोनों की साझा राजधानी बना। चंडीगढ़ और नदी-जल के बँटवारे का प्रश्न आज भी दोनों राज्यों के बीच विवाद का विषय है।
◆ पृष्ठभूमि — हिमाचल प्रदेश 15 अप्रैल 1948 को लगभग तीस पहाड़ी रियासतों को मिलाकर एक केंद्र-शासित इकाई के रूप में बना था (खंड 3)। 1950 में यह भाग ग राज्य बना, 1954 में बिलासपुर इसमें मिला और 1956 में यह केंद्र-शासित प्रदेश बना। 1966 में पंजाब के पहाड़ी क्षेत्र जुड़ने से इसका आकार लगभग दुगुना हो गया।
◆ पूर्ण राज्य — पहाड़ी जनता अपनी अलग पहचान और अपनी सरकार चाहती थी। हिमाचल प्रदेश राज्य अधिनियम 1970 के आधार पर 25 जनवरी 1971 को हिमाचल प्रदेश भारत का 18वाँ राज्य बना। राजधानी शिमला है और डॉ. यशवंत सिंह परमार इसके पहले मुख्यमंत्री तथा राज्य के निर्माता माने जाते हैं।
◆ पृष्ठभूमि — 1956 में पूर्वोत्तर में केवल एक बड़ा राज्य असम था, जिसमें मैदानी क्षेत्र के साथ खासी, गारो, जयंतिया, मिज़ो और नगा पहाड़ियाँ भी थीं; इसके अलावा मणिपुर और त्रिपुरा केंद्र-शासित प्रदेश थे और चीन की सीमा से लगा क्षेत्र "नेफ़ा" (उत्तर-पूर्व सीमांत एजेंसी) कहलाता था। पहाड़ी जनजातियों को लगता था कि असम की सरकार में उनकी भाषा और संस्कृति की उपेक्षा हो रही है। जब 1960 में असम में असमिया को राजभाषा बनाया गया, तो यह असंतोष और बढ़ गया।
◆ मेघालय — खासी, जयंतिया और गारो पहाड़ियों के लोगों ने ऑल पार्टी हिल लीडर्स कॉन्फ़्रेंस के माध्यम से शांतिपूर्ण आंदोलन चलाया। पहले 1970 में मेघालय को असम के भीतर ही एक स्वायत्त राज्य बनाया गया, जो एक अनोखा प्रयोग था। फिर 21 जनवरी 1972 को वह पूर्ण राज्य बना; राजधानी शिलांग है। "मेघालय" का अर्थ है — "बादलों का घर"।
◆ मणिपुर और त्रिपुरा — ये दोनों पुरानी रियासतें थीं, जिनका विलय 1949 में हुआ था (खंड 7)। 1956 से ये केंद्र-शासित प्रदेश थे। 21 जनवरी 1972 को दोनों को पूर्ण राज्य का दर्जा मिला। मणिपुर की राजधानी इंफाल और त्रिपुरा की राजधानी अगरतला है।
◆ क़ानूनी आधार — ये सब बदलाव पूर्वोत्तर क्षेत्र (पुनर्गठन) अधिनियम 1971 से हुए। इसी अधिनियम से असम का मिज़ो ज़िला मिज़ोरम नाम से और नेफ़ा अरुणाचल प्रदेश नाम से केंद्र-शासित प्रदेश बने। मणिपुर, त्रिपुरा और मेघालय क्रमशः भारत के 19वें, 20वें और 21वें राज्य बने।
◆ संक्षेप में — सिक्किम 1950 की संधि से भारत का संरक्षित राज्य था। चोग्याल के शासन के विरुद्ध जन-आंदोलन के बाद 35वें संशोधन (1974) से वह "सहयोगी राज्य" बना और जनमत संग्रह के बाद 36वें संशोधन से 16 मई 1975 को भारत का 22वाँ राज्य बना; राजधानी गंगटोक है। पूरा प्रसंग खंड 7 में विस्तार से दिया जा चुका है।
◆ मिज़ोरम की पृष्ठभूमि — मिज़ो पहाड़ियाँ (पुराना नाम लुशाई पहाड़ियाँ) असम का एक ज़िला थीं। 1959 के आसपास वहाँ बाँस के फूलने से चूहों की संख्या बहुत बढ़ गई और उन्होंने फ़सलें नष्ट कर दीं, जिससे भयंकर अकाल पड़ा। मिज़ो लोगों को लगा कि असम सरकार ने उनकी ठीक से मदद नहीं की। राहत के लिए बना संगठन आगे चलकर लालडेंगा के नेतृत्व में मिज़ो नेशनल फ़्रंट बन गया, जिसने 1966 में भारत से अलग होने के लिए सशस्त्र विद्रोह कर दिया।
◆ मिज़ो समझौता — लगभग बीस वर्ष के संघर्ष के बाद 30 जून 1986 को प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार और लालडेंगा के बीच मिज़ो समझौता हुआ। विद्रोहियों ने हथियार डाल दिए और भारत के संविधान को स्वीकार किया; बदले में मिज़ोरम को पूर्ण राज्य का दर्जा मिला और लालडेंगा मुख्यमंत्री बने। 20 फ़रवरी 1987 को मिज़ोरम भारत का 23वाँ राज्य बना; राजधानी आइज़ोल है। इसे भारत में किसी विद्रोह के सबसे सफल शांतिपूर्ण समाधानों में गिना जाता है।
◆ अरुणाचल प्रदेश — चीन की सीमा से लगा यह क्षेत्र पहले नेफ़ा कहलाता था और असम के राज्यपाल के माध्यम से केंद्र इसका प्रशासन चलाता था। 1972 में इसे "अरुणाचल प्रदेश" नाम देकर केंद्र-शासित प्रदेश बनाया गया और 20 फ़रवरी 1987 को यह भारत का 24वाँ राज्य बना; राजधानी ईटानगर है। सीमा की दृष्टि से संवेदनशील इस क्षेत्र को पूर्ण राज्य बनाना यह जताना भी था कि यह भारत का अभिन्न अंग है।
◆ संक्षेप में — 1961 में पुर्तगाल से मुक्त होने के बाद गोवा, दमन और दीव एक केंद्र-शासित प्रदेश थे। 1967 के जनमत सर्वेक्षण में गोवा की जनता ने महाराष्ट्र में मिलने के बजाय अलग रहना चुना। 30 मई 1987 को गोवा भारत का 25वाँ राज्य बना (राजधानी पणजी), जबकि दमन और दीव केंद्र-शासित प्रदेश बने रहे। पूरा प्रसंग खंड 8 में दिया जा चुका है।
नवंबर 2000 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के समय एक साथ तीन नए राज्य बने। इन तीनों की विशेषता यह थी कि ये भाषा के आधार पर नहीं बने — तीनों अपने मूल राज्य की तरह हिंदी-भाषी ही थे। इनका आधार था क्षेत्रीय पहचान, जनजातीय संस्कृति और विकास में उपेक्षा की भावना।
◆ छत्तीसगढ़ (1 नवंबर 2000) — यह मध्य प्रदेश के दक्षिण-पूर्वी भाग से बना और भारत का 26वाँ राज्य है; राजधानी रायपुर है। यह क्षेत्र खनिज और वन-संपदा से समृद्ध है और यहाँ जनजातीय आबादी बड़ी है, पर यहाँ के लोगों को लगता था कि राजधानी भोपाल बहुत दूर है और क्षेत्र की संपदा का लाभ स्थानीय लोगों को नहीं मिल रहा।
◆ उत्तरांचल (9 नवंबर 2000) — यह उत्तर प्रदेश के पहाड़ी ज़िलों (गढ़वाल और कुमाऊँ) से बना और भारत का 27वाँ राज्य है; अंतरिम राजधानी देहरादून बनी। पहाड़ के लोगों का कहना था कि लखनऊ से चलने वाली सरकार पहाड़ की अलग समस्याओं — जैसे कठिन भूगोल, पलायन और रोज़गार की कमी — को नहीं समझती। 1994 में यह आंदोलन बहुत तेज़ हुआ, जिसमें महिलाओं की बड़ी भूमिका थी। 2007 से इस राज्य का नाम उत्तराखंड है।
◆ झारखंड (15 नवंबर 2000) — यह बिहार के दक्षिणी पठारी भाग (छोटा नागपुर और संथाल परगना) से बना और भारत का 28वाँ राज्य है; राजधानी राँची है। अलग झारखंड की माँग सबसे पुरानी थी — जनजातीय नेता जयपाल सिंह मुंडा ने स्वतंत्रता के आसपास के वर्षों में ही झारखंड पार्टी बनाकर इसे उठाया था, पर राज्य पुनर्गठन आयोग ने इसे नहीं माना। 1970 के दशक में शिबू सोरेन के झारखंड मुक्ति मोर्चा ने आंदोलन को नई शक्ति दी। राज्य की स्थापना के लिए 15 नवंबर इसलिए चुना गया, क्योंकि यह बिरसा मुंडा की जयंती है।
◆ पृष्ठभूमि — 1956 में तेलंगाना को आंध्र में मिलाते समय "सज्जनों का समझौता" हुआ था (खंड 11)। तेलंगाना के लोगों की शिकायत थी कि इस समझौते का पालन नहीं हुआ और नौकरियों, सिंचाई के पानी तथा विकास के ख़र्च में उनके साथ भेदभाव हुआ। ध्यान दें कि दोनों क्षेत्रों की भाषा तेलुगु ही थी — अर्थात् यहाँ झगड़ा भाषा का नहीं, क्षेत्रीय असमानता का था।
◆ 1969 का आंदोलन — 1969 में "जय तेलंगाना" आंदोलन भड़का, जिसमें छात्र सबसे आगे थे और पुलिस की गोलीबारी में बड़ी संख्या में लोग मारे गए। इसके बाद कुछ संवैधानिक सुरक्षा-उपाय किए गए, पर अलग राज्य नहीं बना।
◆ दूसरा चरण — 2001 में के. चंद्रशेखर राव ने अलग राज्य के एकमात्र उद्देश्य से तेलंगाना राष्ट्र समिति बनाई। 2009 के अंत में उनके अनशन के बाद केंद्र सरकार ने राज्य-निर्माण की प्रक्रिया शुरू करने की घोषणा की। इस प्रश्न पर विचार के लिए न्यायमूर्ति बी. एन. श्रीकृष्ण की अध्यक्षता में समिति बनी।
◆ परिणाम — संसद ने आंध्र प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम 2014 पारित किया और 2 जून 2014 को तेलंगाना भारत का 29वाँ राज्य बना। हैदराबाद तेलंगाना की राजधानी बना और उसे अधिकतम दस वर्ष के लिए दोनों राज्यों की साझा राजधानी रखा गया।
◆ 5 अगस्त 2019 — केंद्र सरकार ने राष्ट्रपति के आदेश और संसद के प्रस्ताव के माध्यम से अनुच्छेद 370 के अंतर्गत जम्मू-कश्मीर को मिला विशेष दर्जा समाप्त कर दिया (इस अनुच्छेद की पृष्ठभूमि खंड 6 में है)। इसके साथ अनुच्छेद 35क भी निष्प्रभावी हो गया।
◆ जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम 2019 — इस अधिनियम से जम्मू-कश्मीर राज्य को दो केंद्र-शासित प्रदेशों में बाँट दिया गया — जम्मू-कश्मीर, जिसकी अपनी विधानसभा है, और लद्दाख, जिसकी विधानसभा नहीं है। यह व्यवस्था 31 अक्टूबर 2019 से लागू हुई, जो सरदार पटेल की जयंती है। स्वतंत्र भारत में यह पहला अवसर था, जब किसी राज्य को केंद्र-शासित प्रदेश बनाया गया।
◆ परिणाम — राज्यों की संख्या 29 से घटकर 28 रह गई और केंद्र-शासित प्रदेशों की संख्या 7 से बढ़कर 9 हो गई। दिसंबर 2023 में सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 370 हटाने के निर्णय को वैध ठहराया।
◆ 26 जनवरी 2020 — दो केंद्र-शासित प्रदेशों — दादरा और नगर हवेली तथा दमन और दीव — को मिलाकर एक केंद्र-शासित प्रदेश बना दिया गया। इससे केंद्र-शासित प्रदेशों की संख्या 9 से घटकर 8 रह गई।
नीचे के मानचित्र में 1956 के बाद बने राज्य उनकी राजधानी और वर्ष के साथ दिखाए गए हैं। ऊपर के उपखंडों को पढ़ने के बाद इसे देखें और हर राज्य की स्थिति पहचानने का अभ्यास करें।

मानचित्र के साथ-साथ आज की कुल संख्या भी याद कर लें, क्योंकि यह सीधे पूछी जाती है।
📌 आज की स्थिति भारत में आज 28 राज्य और 8 केंद्र-शासित प्रदेश हैं। आठ केंद्र-शासित प्रदेश ये हैं — अंडमान और निकोबार द्वीप समूह; चंडीगढ़; दादरा और नगर हवेली तथा दमन और दीव; दिल्ली; जम्मू-कश्मीर; लद्दाख; लक्षद्वीप; और पुडुचेरी। दिल्ली को 69वें संविधान संशोधन (1991) से "राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र" का विशेष दर्जा और विधानसभा मिली; पुडुचेरी और जम्मू-कश्मीर में भी विधानसभा है। |
नए राज्य बनने के साथ-साथ कई राज्यों ने अपने नाम भी बदले। अधिकतर मामलों में अंग्रेज़ों के समय का नाम हटाकर स्थानीय भाषा और संस्कृति से जुड़ा नाम अपनाया गया। नाम बदलने के लिए भी संसद को अनुच्छेद 3 के अंतर्गत क़ानून बनाना पड़ता है।
◆ संयुक्त प्रांत से उत्तर प्रदेश (1950) — अंग्रेज़ों के समय का "संयुक्त प्रांत" संविधान लागू होने के समय उत्तर प्रदेश कहलाया।
◆ मद्रास से तमिलनाडु (1969) — मद्रास राज्य का नाम 1969 में तमिलनाडु किया गया, जिसका अर्थ है "तमिलों की भूमि"। उस समय मुख्यमंत्री सी. एन. अन्नादुरै थे।
◆ मैसूर से कर्नाटक (1973) — 1 नवंबर 1973 से मैसूर राज्य कर्नाटक कहलाने लगा, क्योंकि "मैसूर" केवल पुरानी रियासत का नाम था, जबकि राज्य में अब सभी कन्नड़-भाषी क्षेत्र शामिल थे।
◆ लक्कादीव, मिनिकॉय और अमीनदीवी से लक्षद्वीप (1973) — इस केंद्र-शासित द्वीप समूह का लंबा नाम 1973 में बदलकर लक्षद्वीप कर दिया गया।
◆ पांडिचेरी से पुडुचेरी (2006) — पुराने फ़्रांसीसी क्षेत्र का नाम 2006 में तमिल रूप पुडुचेरी किया गया।
◆ उत्तरांचल से उत्तराखंड (2007) — राज्य बनने के लगभग छह वर्ष बाद, 2007 में, इसका नाम वही रखा गया, जो आंदोलन के समय से प्रचलित था।
◆ उड़ीसा से ओडिशा (2011) — 2011 में राज्य का नाम ओडिशा और उसकी भाषा का नाम "उड़िया" से ओड़िया किया गया।
तिथि | राज्य और क्रमांक | किससे और क्यों बना |
1 मई 1960 | महाराष्ट्र और गुजरात (15वाँ) बने। | द्विभाषी बम्बई राज्य संयुक्त महाराष्ट्र और महागुजरात आंदोलनों के बाद दो हिस्सों में बँटा। |
1 दिसंबर 1963 | नागालैंड 16वाँ राज्य बना। | यह असम के नगा पहाड़ी क्षेत्र से नगा जनजातीय पहचान के आधार पर बना। |
1 नवंबर 1966 | हरियाणा 17वाँ राज्य बना। | पंजाबी सूबा आंदोलन के बाद पंजाब का हिंदी-भाषी भाग अलग हुआ और चंडीगढ़ केंद्र-शासित बना। |
25 जनवरी 1971 | हिमाचल प्रदेश 18वाँ राज्य बना। | इस केंद्र-शासित प्रदेश को पूर्ण राज्य का दर्जा दिया गया। |
21 जनवरी 1972 | मणिपुर, त्रिपुरा और मेघालय बने। | पूर्वोत्तर के पुनर्गठन में दो केंद्र-शासित प्रदेश राज्य बने और मेघालय असम से अलग हुआ। |
16 मई 1975 | सिक्किम 22वाँ राज्य बना। | जनमत संग्रह के बाद 36वें संशोधन से यह संरक्षित राज्य भारत में मिला। |
20 फ़रवरी 1987 | मिज़ोरम (23वाँ) और अरुणाचल प्रदेश (24वाँ) बने। | मिज़ो समझौते (1986) के बाद मिज़ोरम और सीमांत क्षेत्र अरुणाचल को पूर्ण राज्य बनाया गया। |
30 मई 1987 | गोवा 25वाँ राज्य बना। | गोवा को दमन और दीव से अलग करके पूर्ण राज्य बनाया गया। |
नवंबर 2000 | छत्तीसगढ़, उत्तरांचल और झारखंड बने। | ये क्रमशः मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार से क्षेत्रीय तथा जनजातीय पहचान के आधार पर बने। |
2 जून 2014 | तेलंगाना 29वाँ राज्य बना। | यह क्षेत्रीय असमानता की शिकायत पर आंध्र प्रदेश से अलग हुआ। |
31 अक्टूबर 2019 | जम्मू-कश्मीर और लद्दाख केंद्र-शासित प्रदेश बने। | जम्मू-कश्मीर राज्य का पुनर्गठन हुआ और राज्यों की संख्या 28 रह गई। |
इस अध्याय में हमने दो बड़ी प्रक्रियाएँ पढ़ीं — रियासतों का एकीकरण और राज्यों का पुनर्गठन। अब दोनों को तौलकर देखें कि इनसे भारत को क्या मिला और कौन-से प्रश्न अधूरे रह गए।
◆ असाधारण उपलब्धि — 560 से अधिक रियासतें, जो देश के लगभग दो-पाँचवें हिस्से में फैली थीं, लगभग दो वर्षों में और अधिकतर बिना रक्तपात के भारत का भाग बन गईं। विश्व इतिहास में इतने कम समय में इतना बड़ा शांतिपूर्ण एकीकरण दुर्लभ है। इसी कारण सरदार पटेल को "भारत का लौह पुरुष" और "भारत का बिस्मार्क" कहा जाता है।
◆ एकीकरण के साथ लोकतंत्रीकरण — रियासतों का केवल नक्शे में विलय नहीं हुआ; वहाँ की प्रजा नागरिक बनी। जहाँ पहले राजा की इच्छा ही क़ानून थी, वहाँ चुनी हुई सरकारें, मौलिक अधिकार और स्वतंत्र न्यायालय आए।
◆ सफलता के कारण — पटेल की दृढ़ता और मेनन की कूटनीति, माउंटबेटन का सहयोग, रियासतों की भौगोलिक मजबूरी और सबसे बढ़कर प्रजामंडल आंदोलनों का जन-दबाव — इन सबने मिलकर काम किया।
◆ सीमाएँ — कश्मीर का प्रश्न संयुक्त राष्ट्र में जाकर अंतरराष्ट्रीय विवाद बन गया और आज तक पूरी तरह हल नहीं हुआ। हैदराबाद और जूनागढ़ में बल-प्रयोग करना पड़ा। प्रिवी पर्स की समाप्ति पर वादा-खिलाफ़ी का आरोप लगा।
◆ डर ग़लत साबित हुआ — नेहरू और पटेल को भय था कि भाषाई राज्य देश को तोड़ देंगे। हुआ इसका उलटा — जब लोगों की भाषाई आकांक्षा पूरी हो गई, तो उनका भारत से जुड़ाव और मज़बूत हुआ। पड़ोस के कुछ देशों में भाषा की माँग दबाने से गंभीर संकट पैदा हुए, जबकि भारत ने भाषा को जगह देकर एकता बचाई।
◆ लोकतंत्र गहरा हुआ — प्रशासन, शिक्षा और न्याय का काम जनता की भाषा में होने लगा, जिससे आम आदमी शासन में भाग ले सका। क्षेत्रीय भाषाओं के साहित्य, समाचार-पत्रों और सिनेमा को बढ़ावा मिला और नया क्षेत्रीय नेतृत्व उभरा।
◆ लचीलापन — भारतीय व्यवस्था ने दिखाया कि वह नई माँगों को संवैधानिक रास्ते से समायोजित कर सकती है। 1956 के बाद बने राज्यों के आधार बदलते रहे — पहले भाषा, फिर जनजातीय पहचान, फिर विकास और प्रशासनिक सुविधा।
◆ सीमाएँ और चुनौतियाँ — कुछ सीमा-विवाद आज तक चल रहे हैं, जैसे बेलगाम को लेकर महाराष्ट्र और कर्नाटक का विवाद तथा चंडीगढ़ को लेकर पंजाब और हरियाणा का विवाद। नदी-जल के बँटवारे पर राज्यों में टकराव होता है। कहीं-कहीं क्षेत्रवाद और "भूमिपुत्र" की राजनीति उभरी, जिसमें दूसरे राज्यों से आए लोगों का विरोध किया गया। हर राज्य में भाषाई अल्पसंख्यक भी रह गए, जिनके हितों की रक्षा एक स्थायी ज़िम्मेदारी है। नए राज्यों की माँगें आज भी उठती रहती हैं।
✅ उपलब्धियाँ — सार ✔ रियासतें लगभग बिना रक्तपात के भारत में मिलीं। ✔ रियासती प्रजा को लोकतंत्र और नागरिक अधिकार मिले। ✔ भाषाई राज्यों से शासन जनता की भाषा में आया। ✔ भाषाई पहचान राष्ट्रीय एकता की विरोधी नहीं निकली। | ⚠️ चुनौतियाँ — सार ✔ कश्मीर का प्रश्न अंतरराष्ट्रीय विवाद बन गया। ✔ प्रिवी पर्स पर वादा-खिलाफ़ी का आरोप लगा। ✔ बेलगाम, चंडीगढ़ और नदी-जल के विवाद बने हुए हैं। ✔ क्षेत्रवाद और नए राज्यों की माँगें जारी हैं। |
वर्ष / तिथि | घटना |
5 जुलाई 1947 | रियासती विभाग बना; पटेल उसके मंत्री और वी. पी. मेनन सचिव बने। |
15 अगस्त 1947 | तीन को छोड़कर लगभग सभी रियासतें भारत में मिल चुकी थीं। |
26 अक्टूबर 1947 | महाराजा हरि सिंह ने कश्मीर के विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए। |
20 फ़रवरी 1948 | जूनागढ़ में जनमत संग्रह हुआ और जनता ने भारत को चुना। |
13–18 सितंबर 1948 | ऑपरेशन पोलो से हैदराबाद भारत में मिला। |
17 जून – 10 दिसंबर 1948 | धर आयोग बना और उसने भाषाई पुनर्गठन के विरुद्ध रिपोर्ट दी। |
दिसंबर 1948 – अप्रैल 1949 | जे.वी.पी. समिति बनी और उसने भाषाई राज्यों का प्रश्न टालने की सलाह दी। |
15 अक्टूबर 1949 | मणिपुर और त्रिपुरा भारत का भाग बने। |
26 जनवरी 1950 | संविधान लागू हुआ और राज्य भाग क, ख, ग और घ में बँटे। |
15 दिसंबर 1952 | 58 दिन के अनशन के बाद पोट्टि श्रीरामुलु की मृत्यु हुई। |
1 अक्टूबर 1953 | आंध्र पहला भाषाई राज्य बना और उसकी राजधानी कुरनूल बनी। |
30 सितंबर 1955 | राज्य पुनर्गठन आयोग ने अपनी रिपोर्ट दी। |
1 नवंबर 1956 | राज्य पुनर्गठन अधिनियम लागू हुआ; 14 राज्य और 6 केंद्र-शासित प्रदेश बने। |
1 मई 1960 | महाराष्ट्र और गुजरात बने। |
19 दिसंबर 1961 | ऑपरेशन विजय से गोवा मुक्त हुआ। |
1 नवंबर 1966 | हरियाणा बना और चंडीगढ़ केंद्र-शासित प्रदेश बना। |
1971 | 26वें संविधान संशोधन से प्रिवी पर्स समाप्त हुआ। |
16 मई 1975 | सिक्किम भारत का 22वाँ राज्य बना। |
1987 | मिज़ोरम, अरुणाचल प्रदेश और गोवा पूर्ण राज्य बने। |
नवंबर 2000 | छत्तीसगढ़, उत्तरांचल और झारखंड बने। |
2 जून 2014 | तेलंगाना भारत का 29वाँ राज्य बना। |
31 अक्टूबर 2019 | जम्मू-कश्मीर और लद्दाख केंद्र-शासित प्रदेश बने। |
🔑 कीवर्ड सार पटेल-मेनन • विलय पत्र (रक्षा, विदेश, संचार) • यथास्थिति समझौता • राजप्रमुख • भाग क-ख-ग-घ • जूनागढ़ जनमत संग्रह • ऑपरेशन पोलो • रज़ाकार • अनुच्छेद 370 ऑपरेशन विजय • प्रिवी पर्स — 26वाँ संशोधन • धर आयोग • जे.वी.पी. • पोट्टि श्रीरामुलु • फ़ज़ल अली आयोग • 7वाँ संशोधन • क्षेत्रीय परिषदें • अनुच्छेद 3 • 28 राज्य, 8 केंद्र-शासित प्रदेश |
💡 अंतिम बात पटेल ने नक्शे को जोड़ा और भाषाई पुनर्गठन ने उसे जनता की भाषा दी — "विविधता में एकता" का यही व्यावहारिक रूप है। अगले अध्याय में — नेहरू युग से आर्थिक सुधारों तक: योजनाबद्ध आर्थिक विकास, भूमि सुधार, गुटनिरपेक्षता और आधुनिक भारत की नींव। |