📖 अध्याय 16/20 — आधुनिक भारत का इतिहास

राष्ट्रीय आंदोलन के प्रमुख व्यक्तित्व

दादाभाई नौरोजी, गोखले, तिलक, लाजपत राय, अरविंद, महात्मा गांधी, नेहरू, पटेल, राजेंद्र प्रसाद, राजगोपालाचारी, मौलाना आज़ाद, सुभाष बोस, भगत सिंह, सावरकर, आंबेडकर और अन्य — जीवन, विचार, योगदान, उपाधियाँ, पुस्तकें, पत्र और वैचारिक तुलना

🕯️ कहानी से शुरुआत: एक "जंतर"

अगस्त 1947। भारत आज़ादी की दहलीज़ पर खड़ा था। जिस व्यक्ति ने तीस साल तक देश की राजनीति को दिशा दी थी, उसने आज़ादी के कुछ ही दिन पहले अपने एक साथी को एक छोटा-सा नोट लिखा। उसमें कोई बड़ा सिद्धांत नहीं था, कोई लंबा भाषण नहीं था। उसमें केवल एक सवाल था।

नोट में लिखा था — "जब भी तुम्हें संदेह हो... तो यह कसौटी अपनाओ: जो सबसे ग़रीब और कमज़ोर आदमी तुमने देखा हो, उसका चेहरा याद करो और अपने दिल से पूछो कि जो क़दम उठाने का तुम विचार कर रहे हो, वह उस आदमी के लिए कितना उपयोगी होगा।" आज इसे "गांधीजी का जंतर" कहा जाता है।

इस जंतर की ताक़त उसकी सरलता में है। बड़े से बड़ा नेता भी जब किसी उलझन में फँसे, तो वह सबसे कमज़ोर आदमी को सामने रखकर अपने फ़ैसले को परख सकता है।

ध्यान से देखें तो राष्ट्रीय आंदोलन के हर बड़े व्यक्तित्व के पास ऐसी ही कोई कसौटी थी। नौरोजी के पास आँकड़े थे, जिनसे वे भारत की ग़रीबी गिनकर दिखाते थे। तिलक के पास "स्वराज" था, जिसे वे जन्मसिद्ध अधिकार कहते थे। नेहरू के पास विज्ञान और समाजवाद था, आंबेडकर के पास समानता और भगत सिंह के पास क्रांति।

ये लोग कई बातों पर एक-दूसरे से सहमत नहीं थे। गोखले और तिलक का रास्ता अलग था, और जाति के प्रश्न पर गांधी तथा आंबेडकर के बीच गहरा मतभेद था। फिर भी सबका लक्ष्य एक ही था: एक स्वतंत्र और गरिमामय भारत।

तो ये लोग कौन थे? वे कहाँ जन्मे, उन्होंने क्या लिखा, जनता ने उन्हें किन नामों से पुकारा, और उनके विचार एक-दूसरे से कहाँ मिलते और कहाँ टकराते थे? यही इस अध्याय की कहानी है। आगे दो कहानियाँ भी मिलेंगी, जो नौरोजी की आँकड़ों वाली कसौटी और नेहरू के "असली भारत" की खोज को आसान तरीक़े से समझा देंगी।

📑 इस अध्याय में क्या-क्या पढ़ेंगे

01. भूमिका: व्यक्तित्व कैसे पढ़ें; जन्म-स्थानों का मानचित्र — हर स्थान का परिचय

02. प्रारंभिक राष्ट्रवादी (उदारवादी): नौरोजी, रानाडे, फ़िरोज़शाह मेहता, सुरेंद्रनाथ, गोखले और अन्य

03. उग्र राष्ट्रवादी: तिलक, लाजपत राय, बिपिनचंद्र पाल, अरविंद घोष; तिलक-गोखले तुलना

04. महात्मा गांधी I: जीवन-यात्रा के आठ पड़ाव, उपाधियाँ, पुस्तकें, पत्र और आश्रम

05. महात्मा गांधी II: विचार, रचनात्मक कार्यक्रम, योगदान और आलोचना

06. जवाहरलाल नेहरू: जीवन, पुस्तकें और विचार

07. सरदार पटेल, राजेंद्र प्रसाद, राजगोपालाचारी और मौलाना आज़ाद

08. सुभाष चंद्र बोस और क्रांतिकारी व्यक्तित्व

09. डॉ. आंबेडकर और सामाजिक-धार्मिक सुधारक

10. अन्य प्रमुख व्यक्तित्व — अठारह जीवन-परिचय

11. वैचारिक तुलना: गांधी, नेहरू, बोस, आंबेडकर, टैगोर, पटेल, तिलक-गोखले

12. त्वरित संदर्भ (दोहराव): उपाधियाँ, पुस्तकें, पत्र-पत्रिकाएँ, नारे और सार

1. भूमिका: व्यक्तित्व कैसे पढ़ें

राष्ट्रीय आंदोलन केवल घटनाओं और क़ानूनों की शृंखला नहीं था; उसे लोगों ने चलाया — किसी ने क़लम से, किसी ने भाषण से, किसी ने जेल जाकर और किसी ने फाँसी का फंदा चूमकर। इसलिए परीक्षा में व्यक्तित्वों पर लगातार प्रश्न आते हैं — कभी सीधे तथ्य (जन्म-स्थान, उपाधि, पुस्तक), तो कभी वर्णनात्मक प्रश्न ("गांधी और बोस के दृष्टिकोण की तुलना कीजिए")। किसी भी व्यक्तित्व को याद करने का सबसे अच्छा तरीक़ा यह है कि उसे छह कोणों से देखा जाए:

1. जीवन-रेखा — जन्म और मृत्यु का वर्ष, जन्म-स्थान, परिवार और शिक्षा। उदाहरण के लिए, गोखले का जन्म 1866 में रत्नागिरी ज़िले के कोटलुक गाँव में हुआ था और उनकी मृत्यु 1915 में हुई।

2. संगठन — व्यक्ति ने कौन-सी संस्था बनाई या किस संस्था से जुड़ा रहा। उदाहरण के लिए, गोखले ने 1905 में सर्वेंट्स ऑफ़ इंडिया सोसाइटी बनाई।

3. पत्र-पत्रिकाएँ — उस युग में अख़बार ही जन-जागरण का सबसे बड़ा हथियार था, इसलिए लगभग हर नेता ने कोई पत्र निकाला या संपादित किया। उदाहरण के लिए, तिलक के पत्र "केसरी" और "मराठा" थे।

4. पुस्तकें — किसी नेता की पुस्तक उसके विचारों का सबसे पक्का प्रमाण होती है। उदाहरण के लिए, नौरोजी की "पॉवर्टी एंड अन-ब्रिटिश रूल इन इंडिया" से धन-निकास का सिद्धांत समझ आता है।

5. उपाधि और नारे — जनता ने अपने नेताओं को प्यार से जो नाम दिए, वे उनकी पहचान बन गए। उदाहरण के लिए, तिलक "लोकमान्य" कहलाए और उनका नारा था — "स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है"।

6. विचार और मूल्यांकन — व्यक्ति का मूल दर्शन क्या था, उसका योगदान क्या रहा, उसकी सीमाएँ क्या थीं और दूसरों से उसके मतभेद किन बातों पर थे। उदाहरण के लिए, जाति के प्रश्न पर गांधी और आंबेडकर के बीच गहरा मतभेद था।

इस अध्याय में हर व्यक्तित्व का परिचय इसी क्रम में दिया गया है। घटनाओं का पूरा विवरण पिछले अध्यायों (अध्याय 10 से 15) में है; यहाँ ध्यान व्यक्ति पर है — वह कौन था, उसने क्या सोचा और क्या किया।

🗺️ जन्म-स्थानों का मानचित्र

नीचे के मानचित्र में राष्ट्रीय आंदोलन के प्रमुख व्यक्तित्वों के जन्म-स्थान दिखाए गए हैं। इससे एक महत्त्वपूर्ण बात समझ आती है — आंदोलन के नेता देश के हर कोने से आए: पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत से लेकर केरल तक और गुजरात से लेकर बंगाल तक। मानचित्र के बाद हर स्थान और वहाँ जन्मे व्यक्तित्व का संक्षिप्त परिचय दिया गया है; विस्तृत जीवन-परिचय आगे के खंडों में है।

चित्र 16.1: राष्ट्रीय आंदोलन के प्रमुख व्यक्तित्वों के जन्म-स्थान
चित्र 16.1: राष्ट्रीय आंदोलन के प्रमुख व्यक्तित्वों के जन्म-स्थान

🟠 गांधी और बोस

◆ पोरबंदर (गुजरात) — महात्मा गांधी — काठियावाड़ प्रायद्वीप के समुद्र-तट पर बसे पोरबंदर में 2 अक्टूबर 1869 को गांधीजी का जन्म हुआ। उनके पिता करमचंद गांधी पोरबंदर रियासत के दीवान थे। यही दिन आज गांधी जयंती और संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस है।

◆ कटक (ओडिशा) — सुभाष चंद्र बोस — 23 जनवरी 1897 को कटक में सुभाष बोस का जन्म हुआ। उनके पिता जानकीनाथ बोस कटक के प्रसिद्ध वकील थे। उनका जन्मदिन अब "पराक्रम दिवस" के रूप में मनाया जाता है।

🔵 कांग्रेस के प्रमुख नेता

◆ नडियाद (गुजरात) — सरदार वल्लभभाई पटेल — खेड़ा ज़िले के नडियाद में 31 अक्टूबर 1875 को पटेल का जन्म उनके ननिहाल में हुआ; उनका पैतृक गाँव करमसद था। खेड़ा के किसानों के बीच पले-बढ़े होने के कारण ही वे आगे चलकर किसान आंदोलनों (खेड़ा, बारडोली) के नेता बने।

◆ इलाहाबाद (उत्तर प्रदेश, आज प्रयागराज) — जवाहरलाल नेहरू और मदन मोहन मालवीय — नेहरू का जन्म 14 नवंबर 1889 को और मालवीय का जन्म 25 दिसंबर 1861 को इलाहाबाद में हुआ। इलाहाबाद का आनंद भवन (नेहरू परिवार का घर) राष्ट्रीय आंदोलन का बड़ा केंद्र था, और मालवीय ने यहीं से "अभ्युदय" और "लीडर" जैसे पत्र निकाले।

◆ ज़ीरादेई (सीवान, बिहार) — डॉ. राजेंद्र प्रसाद — 3 दिसंबर 1884 को ज़ीरादेई गाँव में जन्मे राजेंद्र प्रसाद आगे चलकर संविधान सभा के अध्यक्ष और भारत के पहले राष्ट्रपति बने।

◆ हैदराबाद (आज तेलंगाना) — सरोजिनी नायडू — 13 फ़रवरी 1879 को हैदराबाद में जन्मी सरोजिनी के पिता अघोरनाथ चट्टोपाध्याय वैज्ञानिक और शिक्षाविद थे। उनका जन्मदिन राष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में मनाया जाता है।

◆ थोरापल्ली (तमिलनाडु) — चक्रवर्ती राजगोपालाचारी — 1878 में थोरापल्ली गाँव (आज कृष्णगिरि ज़िला) में जन्मे "राजाजी" स्वतंत्र भारत के एकमात्र भारतीय गवर्नर जनरल बने।

🔴 उग्र राष्ट्रवादी और क्रांतिकारी

◆ रत्नागिरी (महाराष्ट्र) — बाल गंगाधर तिलक — कोंकण तट के रत्नागिरी में 23 जुलाई 1856 को तिलक का जन्म हुआ। संयोग से गोखले भी इसी ज़िले (कोटलुक) के थे — यानी उदारवाद और उग्रवाद, दोनों के सबसे बड़े नेता एक ही ज़िले से आए।

◆ ढुडीके (पंजाब) — लाला लाजपत राय — 28 जनवरी 1865 को ढुडीके (आज मोगा ज़िला) में जन्मे लाजपत राय "पंजाब केसरी" कहलाए।

◆ बंगा (लायलपुर, आज पाकिस्तान) — भगत सिंह — 28 सितंबर 1907 को लायलपुर (आज फ़ैसलाबाद) ज़िले के बंगा गाँव में भगत सिंह का जन्म एक क्रांतिकारी परिवार में हुआ; उनके चाचा अजीत सिंह 1907 के पंजाब किसान आंदोलन के नेता थे।

◆ भाबरा (मध्य प्रदेश) — चंद्रशेखर आज़ाद — 23 जुलाई 1906 को भाबरा (आज अलीराजपुर ज़िले का "चंद्रशेखर आज़ाद नगर") में जन्मे आज़ाद हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के सेनापति बने।

◆ भगूर (नासिक, महाराष्ट्र) — विनायक दामोदर सावरकर — 28 मई 1883 को भगूर में जन्मे सावरकर ने नासिक में ही "मित्र मेला" और "अभिनव भारत" जैसे गुप्त संगठन बनाए।

🟣 सामाजिक-धार्मिक सुधारक

◆ टंकारा (मोरबी, गुजरात) — स्वामी दयानंद सरस्वती — 1824 में टंकारा में जन्मे दयानंद (बचपन का नाम मूलशंकर) ने 1875 में आर्य समाज की स्थापना की।

◆ महू (मध्य प्रदेश) — डॉ. भीमराव आंबेडकर — 14 अप्रैल 1891 को महू की सैनिक छावनी में आंबेडकर का जन्म हुआ, जहाँ उनके पिता रामजी सकपाल सेना में सूबेदार थे। महू का नाम अब "डॉ. आंबेडकर नगर" है।

◆ कलकत्ता (पश्चिम बंगाल) — टैगोर, विवेकानंद और अरविंद — रवींद्रनाथ टैगोर (7 मई 1861), स्वामी विवेकानंद (12 जनवरी 1863) और अरविंद घोष (15 अगस्त 1872) — तीनों का जन्म कलकत्ता में हुआ। उन्नीसवीं सदी में कलकत्ता ब्रिटिश भारत की राजधानी और बंगाल पुनर्जागरण का केंद्र था, इसलिए यहाँ से इतने विचारक निकले।

◆ पुणे (महाराष्ट्र) — ज्योतिबा फुले — 1827 में जन्मे फुले का पूरा कार्यक्षेत्र पुणे रहा, जहाँ उन्होंने 1848 में बालिका विद्यालय और 1873 में सत्यशोधक समाज बनाया।

◆ इरोड (तमिलनाडु) — ई. वी. रामास्वामी "पेरियार" — 1879 में इरोड के एक व्यापारी परिवार में जन्मे पेरियार ने तमिलनाडु में आत्म-सम्मान आंदोलन चलाया।

◆ चेंपषंती (तिरुवनंतपुरम के पास, केरल) — नारायण गुरु — एझवा समुदाय में जन्मे नारायण गुरु ने केरल में जाति-भेद के विरुद्ध "एक जाति, एक धर्म, एक ईश्वर" का संदेश दिया।

🟢 अन्य व्यक्तित्व

◆ नवसारी (गुजरात) — दादाभाई नौरोजी — 4 सितंबर 1825 को नवसारी के एक पारसी परिवार में नौरोजी का जन्म हुआ; उनका बचपन और शिक्षा बम्बई में हुई।

◆ कराची (आज पाकिस्तान) — मोहम्मद अली जिन्ना — 1876 में कराची में जन्मे जिन्ना शुरू में कांग्रेस के "हिंदू-मुस्लिम एकता के राजदूत" थे, पर बाद में पाकिस्तान के संस्थापक बने।

◆ उत्मानज़ई (पेशावर घाटी, आज पाकिस्तान) — ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ाँ — 1890 में पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत के उत्मानज़ई गाँव में जन्मे ग़फ़्फ़ार ख़ाँ "सीमांत गांधी" कहलाए।

◆ अकबरपुर (उत्तर प्रदेश) — राम मनोहर लोहिया — 23 मार्च 1910 को अकबरपुर (आज आंबेडकर नगर ज़िला) में जन्मे लोहिया भारत के प्रमुख समाजवादी विचारक बने।

◆ सिताबदियारा (बिहार-उत्तर प्रदेश सीमा) — जयप्रकाश नारायण — 11 अक्टूबर 1902 को गंगा और घाघरा के संगम के पास सिताबदियारा गाँव में जन्मे जयप्रकाश "लोकनायक" कहलाए।

📌 मानचित्र से याद रखें

तीन बड़े व्यक्तित्वों के जन्म-स्थान आज पाकिस्तान में हैं — भगत सिंह (बंगा, लायलपुर), जिन्ना (कराची) और ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ाँ (उत्मानज़ई)। गुजरात से गांधी, पटेल, नौरोजी और दयानंद आए; महाराष्ट्र से तिलक, गोखले, सावरकर और फुले; और कलकत्ता से टैगोर, विवेकानंद और अरविंद।

2. प्रारंभिक राष्ट्रवादी (उदारवादी), 1885–1905

कांग्रेस की स्थापना (1885) से बंग-भंग (1905) तक का काल उदारवादी या नरमपंथी नेताओं का काल माना जाता है। ये नेता प्रायः अंग्रेज़ी पढ़े-लिखे वकील, प्रोफ़ेसर, पत्रकार और व्यापारी थे। वे मानते थे कि अंग्रेज़ स्वभाव से न्यायप्रिय हैं, पर उन्हें भारत की असली हालत का पता नहीं है; इसलिए यदि तर्क और आँकड़ों के साथ भारत की समस्याएँ उनके सामने रखी जाएँ तो वे सुधार करेंगे। उनका सबसे बड़ा योगदान था — ब्रिटिश शासन की आर्थिक आलोचना, जिसने पहली बार यह सिद्ध किया कि अंग्रेज़ी राज भारत की ग़रीबी का कारण है।

🔍 आसान परिभाषा: नरमपंथ / उदारवाद (मॉडरेट राजनीति)

📘 परिभाषा: राष्ट्रीय आंदोलन के आरंभिक चरण (1885–1905) की वह विचारधारा, जो ब्रिटिश शासन के भीतर रहकर संवैधानिक और शांतिपूर्ण तरीक़ों — प्रार्थना-पत्र (याचिका), ज्ञापन, भाषण, प्रस्ताव और प्रतिनिधिमंडल — से धीरे-धीरे सुधार और स्वशासन पाना चाहती थी।

💡 आसान भाषा में: यानी "हम क़ानून के दायरे में रहकर, विनम्रता से माँग करेंगे और सरकार को तर्क से समझाएँगे।" आलोचक इसे "राजनीतिक भिक्षावृत्ति" (प्रार्थना, याचिका और विरोध-पत्र की राजनीति) कहते थे। 🏠 उदाहरण: कांग्रेस हर वर्ष अधिवेशन में प्रस्ताव पास करती थी कि विधान परिषदों में भारतीयों की संख्या बढ़े और आई.सी.एस. परीक्षा भारत में भी हो — यह नरमपंथी तरीक़ा था। 1892 का भारतीय परिषद अधिनियम इन्हीं माँगों का सीमित परिणाम था।

2.1 👴 दादाभाई नौरोजी (1825–1917) — "भारत के वयोवृद्ध पुरुष"

📖 कहानी 1: जब एक प्रोफ़ेसर ने भारत की ग़रीबी को गिनकर दिखाया

दादाभाई नौरोजी बम्बई के एल्फ़िंस्टन कॉलेज में गणित और प्राकृतिक दर्शन के पहले भारतीय प्रोफ़ेसर थे। 1855 में वे व्यापार के सिलसिले में इंग्लैंड गए और जीवन का बड़ा भाग वहीं भारत के पक्ष में लिखने-बोलने में लगाया। उनका मानना था कि अंग्रेज़ जनता और सांसदों को भारत की असली हालत का पता ही नहीं है, और उसे समझाने का सबसे अच्छा तरीक़ा गिनती है।

इसलिए उन्होंने लंदन इंडियन सोसाइटी (1865) और ईस्ट इंडिया एसोसिएशन (1866) बनाई और भारत की आमदनी का हिसाब लगाने बैठे। 1867–68 के आसपास उन्होंने भारत की प्रति व्यक्ति वार्षिक आय का पहला अनुमान लगाया, जो लगभग 20 रुपये निकला। उन्होंने बताया कि यह रक़म एक आदमी के न्यूनतम भोजन के लिए भी पर्याप्त नहीं है।

तब उन्होंने सवाल उठाया कि इतनी ग़रीबी क्यों है। उनका उत्तर था धन-निकास। अंग्रेज़ अधिकारियों का वेतन और पेंशन, लंदन में भारत सचिव के कार्यालय का ख़र्च, और ब्रिटिश पूँजी का ब्याज तथा मुनाफ़ा हर साल इंग्लैंड चला जाता था, पर बदले में भारत को कोई आर्थिक लाभ नहीं मिलता था। 1892 में वे लिबरल पार्टी के टिकट पर ब्रिटिश संसद के पहले भारतीय सदस्य बने। 1901 में उनकी पुस्तक "पॉवर्टी एंड अन-ब्रिटिश रूल इन इंडिया" छपी। "अन-ब्रिटिश" शब्द व्यंग्य था, यानी यह शासन ब्रिटिश न्याय-परंपरा के ही विरुद्ध है।

इसी आर्थिक आलोचना ने पहली बार सिद्ध किया कि अंग्रेज़ी राज ही भारत की ग़रीबी का कारण है। इसलिए उन्हें "आर्थिक राष्ट्रवाद का जनक" कहा जाता है। 1906 के कलकत्ता अधिवेशन में 81 वर्ष की आयु में उन्होंने कांग्रेस के मंच से "स्वराज" को लक्ष्य घोषित किया और नरमपंथियों तथा उग्रपंथियों को साथ रखा।

🧭 इस कहानी से कौन-सी अवधारणा साफ़ हुई

✔ धन-निकास का सिद्धांत — भारत की संपत्ति का वह भाग, जो वेतन-पेंशन, गृह-ख़र्च और ब्याज-मुनाफ़े के रूप में हर साल इंग्लैंड जाता था और जिसके बदले भारत को कोई लाभ नहीं मिलता था।

✔ आँकड़ों की राजनीति — नरमपंथी नेता मानते थे कि तर्क और आँकड़े सामने रखने से अंग्रेज़ सुधार करेंगे। नौरोजी ने इसी तरीक़े से ब्रिटिश शासन की आर्थिक आलोचना खड़ी की।

✔ विदेश में भारत की आवाज़ — लंदन में संस्थाएँ बनाकर और संसद में बैठकर नौरोजी ने ब्रिटिश जनता तक भारत की समस्याएँ पहुँचाईं, इसलिए उन्हें "भारत का अनौपचारिक राजदूत" भी कहा जाता है।

📝 परीक्षा के लिए: दादाभाई नौरोजी (1825–1917): पुस्तक "पॉवर्टी एंड अन-ब्रिटिश रूल इन इंडिया" (1901); प्रति व्यक्ति आय का पहला अनुमान (लगभग 20 रुपये, 1867–68); ब्रिटिश संसद के पहले भारतीय सदस्य (1892); कांग्रेस अध्यक्ष 1886, 1893, 1906; 1906 में स्वराज का लक्ष्य।

◆ जन्म और शिक्षा — दादाभाई नौरोजी का जन्म 4 सितंबर 1825 को नवसारी (गुजरात) के एक पारसी परिवार में हुआ। बचपन में ही पिता का देहांत हो गया और माँ ने कठिनाई से उन्हें पढ़ाया। बम्बई के एल्फ़िंस्टन कॉलेज में पढ़ने के बाद वे वहीं गणित और प्राकृतिक दर्शन के पहले भारतीय प्रोफ़ेसर बने।

◆ समाज-सुधार और पत्रकारिता — 1851 में उन्होंने गुजराती पत्र "रास्त गोफ़्तार" (सच बोलने वाला) शुरू किया और पारसी समाज में सुधार के लिए संस्था बनाई। स्त्री-शिक्षा के वे आरंभिक समर्थक थे। बाद में उन्होंने "वॉयस ऑफ़ इंडिया" पत्र भी निकाला।

◆ लंदन में भारत की आवाज़ — 1855 में वे व्यापार के सिलसिले में इंग्लैंड गए और जीवन का बड़ा भाग वहीं भारत के पक्ष में लिखने-बोलने में लगाया। उन्होंने लंदन इंडियन सोसाइटी (1865) और ईस्ट इंडिया एसोसिएशन (1866, लंदन) बनाई, ताकि ब्रिटिश जनता और सांसदों को भारत की समस्याएँ बताई जा सकें। इसी कारण उन्हें "भारत का अनौपचारिक राजदूत" भी कहा जाता है।

◆ कांग्रेस में भूमिका — वे कांग्रेस के संस्थापक सदस्यों में थे और तीन बार अध्यक्ष रहे — 1886 (कलकत्ता), 1893 (लाहौर) और 1906 (कलकत्ता)। 1906 के कलकत्ता अधिवेशन में, जब नरमपंथियों और उग्रपंथियों में टकराव बढ़ रहा था, 81 वर्ष के नौरोजी ने पहली बार कांग्रेस के मंच से "स्वराज" को लक्ष्य घोषित किया और दोनों पक्षों को एक रखा।

◆ ब्रिटिश संसद के सदस्य — 1892 में वे लिबरल पार्टी के टिकट पर लंदन के सेंट्रल फ़िन्सबरी क्षेत्र से केवल कुछ मतों से जीतकर ब्रिटिश हाउस ऑफ़ कॉमन्स के सदस्य बने — ऐसा करने वाले वे पहले भारतीय थे। संसद में उन्होंने भारत में आई.सी.एस. परीक्षा कराने और भारत पर ख़र्च के बोझ का मुद्दा उठाया। वे भारतीय ख़र्च की जाँच के लिए बने वेल्बी आयोग (1895) के एकमात्र भारतीय सदस्य भी थे।

◆ धन-निकास सिद्धांत और पुस्तक — उनकी प्रसिद्ध पुस्तक "पॉवर्टी एंड अन-ब्रिटिश रूल इन इंडिया" (1901) है, जिसमें उन्होंने आँकड़ों से सिद्ध किया कि भारत की संपत्ति बिना किसी बदले के इंग्लैंड जा रही है। उन्होंने 1867–68 के आसपास भारत की प्रति व्यक्ति वार्षिक आय का पहला अनुमान लगाया (लगभग 20 रुपये) और बताया कि यह एक व्यक्ति के न्यूनतम भोजन के लिए भी पर्याप्त नहीं है। पुस्तक के शीर्षक का "अन-ब्रिटिश" शब्द व्यंग्य था — यानी यह शासन ब्रिटिश न्याय-परंपरा के ही विरुद्ध है।

🔍 आसान परिभाषा: धन-निकास (ड्रेन ऑफ़ वेल्थ)

📘 परिभाषा: भारत की संपत्ति और संसाधनों का वह भाग, जो अंग्रेज़ अधिकारियों के वेतन-पेंशन, "गृह-ख़र्च" (लंदन में भारत सचिव के कार्यालय का ख़र्च), ब्रिटिश पूँजी पर ब्याज और मुनाफ़े के रूप में हर वर्ष इंग्लैंड भेजा जाता था और जिसके बदले भारत को कोई आर्थिक लाभ नहीं मिलता था।

💡 आसान भाषा में: जैसे किसी घर की कमाई का बड़ा हिस्सा हर महीने कोई बाहरी व्यक्ति उठा ले जाए और घर में कुछ न लौटाए — तो घर चाहे कितनी मेहनत करे, ग़रीब ही रहेगा। 🏠 उदाहरण: नौरोजी के अनुसार अंग्रेज़ अधिकारियों की पेंशन इंग्लैंड में ख़र्च होती थी और भारत के कर से बनी रेलवे का मुनाफ़ा ब्रिटिश निवेशकों को जाता था — यही धन-निकास था (विस्तार अध्याय 4 में)।

◆ गुरु-रूप और निधन — नौरोजी युवा नेताओं के मार्गदर्शक थे; गांधीजी दक्षिण अफ़्रीका से उन्हें पत्र लिखकर सलाह लेते थे और जिन्ना 1906 में उनके निजी सचिव रहे। 30 जून 1917 को बम्बई में उनका निधन हुआ। उनकी लंबी आयु, सादगी और देशभक्ति के कारण उन्हें "भारत का वयोवृद्ध पुरुष" (ग्रैंड ओल्ड मैन ऑफ़ इंडिया) और "आर्थिक राष्ट्रवाद का जनक" कहा जाता है।

2.2 ⚖️ महादेव गोविंद रानाडे (1842–1901)

◆ परिचय — रानाडे का जन्म 18 जनवरी 1842 को नासिक ज़िले के निफाड़ में हुआ। वे बम्बई विश्वविद्यालय के पहले स्नातकों में थे और आगे चलकर बम्बई उच्च न्यायालय के न्यायाधीश बने। इसलिए उन्हें "न्यायमूर्ति रानाडे" कहा जाता है।

◆ संस्थाएँ — वे प्रार्थना समाज के प्रमुख नेता थे (इसकी स्थापना 1867 में आत्माराम पांडुरंग ने की थी; रानाडे बाद में जुड़े)। उन्होंने पूना सार्वजनिक सभा (1870) को सक्रिय राजनीतिक संस्था बनाया, विधवा विवाह के लिए संस्था बनाई और 1887 में इंडियन नेशनल सोशल कॉन्फ़्रेंस (भारतीय राष्ट्रीय सामाजिक सम्मेलन) शुरू की, जिसकी बैठक हर वर्ष कांग्रेस अधिवेशन के साथ होती थी। वे दक्कन एजुकेशन सोसाइटी के भी संरक्षकों में थे।

◆ आर्थिक चिंतन — रानाडे ने कहा कि भारत की ग़रीबी का इलाज औद्योगीकरण है; केवल खेती पर निर्भर देश कभी समृद्ध नहीं हो सकता। उनकी पुस्तक "एसेज़ ऑन इंडियन इकोनॉमिक्स" (1898) में यही विचार है। इसलिए उन्हें भारतीय अर्थशास्त्र के आरंभिक चिंतकों में गिना जाता है। उनकी दूसरी प्रसिद्ध पुस्तक "राइज़ ऑफ़ द मराठा पावर" (1900) है।

◆ गुरु और विचार — वे गोपाल कृष्ण गोखले के गुरु थे। रानाडे मानते थे कि राजनीतिक प्रगति के लिए सामाजिक सुधार पहले ज़रूरी है। उन्होंने अपनी पत्नी रमाबाई रानाडे को पढ़ाया, जो आगे चलकर पुणे सेवा सदन की संस्थापक बनीं। 16 जनवरी 1901 को उनका निधन हुआ।

2.3 🦁 फ़िरोज़शाह मेहता (1845–1915) — "बम्बई का शेर"

◆ परिचय — 4 अगस्त 1845 को बम्बई के एक पारसी परिवार में जन्मे फ़िरोज़शाह मेहता इंग्लैंड से बैरिस्टर बनकर लौटे और बम्बई के सबसे प्रभावशाली वकील और नागरिक नेता बने। उनके दबदबे के कारण उन्हें "बम्बई का शेर" और "बम्बई का बेताज बादशाह" कहा जाता था।

◆ नगर-प्रशासन — उन्होंने 1872 के बम्बई नगर निगम अधिनियम का प्रारूप तैयार करने में बड़ी भूमिका निभाई, जिससे नगर निगम में चुने हुए प्रतिनिधि आए। इसलिए उन्हें बम्बई के आधुनिक नगर-प्रशासन का जनक माना जाता है। वे नगर निगम के अध्यक्ष भी रहे।

◆ राजनीति — उन्होंने के. टी. तेलंग और बदरुद्दीन तैयबजी के साथ मिलकर बम्बई प्रेसीडेंसी एसोसिएशन (1885) बनाई। वे 1890 (कलकत्ता) में कांग्रेस के अध्यक्ष बने और इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल के सदस्य भी रहे। 1907 के सूरत अधिवेशन में नरमपंथी गुट के सबसे दृढ़ नेता वही थे, और उग्रपंथियों को कांग्रेस से बाहर रखने में उनकी बड़ी भूमिका रही।

◆ अन्य योगदान — उन्होंने 1910 में अंग्रेज़ी दैनिक "बॉम्बे क्रॉनिकल" शुरू करवाया और 1911 में बने सेंट्रल बैंक ऑफ़ इंडिया के संस्थापकों में रहे — यह पूरी तरह भारतीयों के स्वामित्व वाला बैंक था। 5 नवंबर 1915 को उनका निधन हुआ।

2.4 🎙️ सुरेंद्रनाथ बनर्जी (1848–1925) — "राष्ट्रगुरु"

◆ आई.सी.एस. से निष्कासन — 10 नवंबर 1848 को कलकत्ता में जन्मे सुरेंद्रनाथ ने 1869 में इंग्लैंड जाकर आई.सी.एस. परीक्षा पास की (आयु के विवाद के बाद उन्हें सेवा में लिया गया)। सिलहट में सहायक मजिस्ट्रेट रहते हुए एक मामूली प्रक्रियात्मक भूल पर 1874 में उन्हें सेवा से हटा दिया गया। उन्होंने इसे भारतीयों के साथ होने वाले भेदभाव का उदाहरण माना और तय किया कि अब जीवन देश की सेवा में लगाएँगे।

◆ इंडियन एसोसिएशन (1876) — 26 जुलाई 1876 को उन्होंने आनंद मोहन बोस के साथ कलकत्ता में इंडियन एसोसिएशन बनाई — यह कांग्रेस से पहले की सबसे महत्त्वपूर्ण अखिल भारतीय राजनीतिक संस्था थी। 1876 में आई.सी.एस. की अधिकतम आयु 21 से घटाकर 19 वर्ष की गई, तो उन्होंने 1877–78 में पूरे देश का दौरा करके इसके विरुद्ध आंदोलन चलाया — यह पहला अखिल भारतीय राजनीतिक आंदोलन माना जाता है।

◆ पत्रकारिता और जेल — उन्होंने अंग्रेज़ी पत्र "द बंगाली" का संपादन किया। 1883 में एक न्यायाधीश की आलोचना के कारण उन्हें अदालत की अवमानना में जेल भेजा गया — वे जेल जाने वाले पहले भारतीय पत्रकारों में थे। उसी वर्ष उन्होंने कलकत्ता में "नेशनल कॉन्फ़्रेंस" बुलाई, जो 1886 में कांग्रेस में मिल गई।

◆ कांग्रेस और बंग-भंग — वे 1895 (पूना) और 1902 (अहमदाबाद) में कांग्रेस के अध्यक्ष बने। 1905 के बंग-भंग विरोधी आंदोलन में वे सबसे बड़े वक्ताओं में थे। उनकी दृढ़ता के कारण अंग्रेज़ उन्हें "सरेंडर-नॉट" (कभी न झुकने वाले) बनर्जी कहते थे, और भारतीयों ने उन्हें "राष्ट्रगुरु" कहा।

◆ बाद का जीवन — उन्होंने 1919 के मॉण्टेग्यू-चेम्सफ़ोर्ड सुधारों का समर्थन किया और नरमपंथियों के साथ कांग्रेस छोड़कर इंडियन नेशनल लिबरल फ़ेडरेशन (1918–19) बनाने में भूमिका निभाई। 1921 में वे बंगाल सरकार में मंत्री बने, पर 1923 के चुनाव में युवा स्वराजवादी बिधानचंद्र राय से हार गए। उनकी आत्मकथा "ए नेशन इन मेकिंग" (1925) है। 6 अगस्त 1925 को उनका निधन हुआ।

2.5 🎓 गोपाल कृष्ण गोखले (1866–1915) — गांधीजी के राजनीतिक गुरु

◆ जन्म और शिक्षा — गोखले का जन्म 9 मई 1866 को कोटलुक (रत्नागिरी ज़िला, महाराष्ट्र) के एक साधारण परिवार में हुआ। ग़रीबी के बावजूद उन्होंने बम्बई के एल्फ़िंस्टन कॉलेज से 1884 में स्नातक किया।

◆ शिक्षक का जीवन — स्नातक होते ही वे दक्कन एजुकेशन सोसाइटी से जुड़े और इसके आजीवन सदस्य बने — यानी बहुत कम वेतन पर बीस वर्ष तक पढ़ाने का व्रत लिया। पूना के फ़र्ग्युसन कॉलेज में उन्होंने अंग्रेज़ी, अर्थशास्त्र और इतिहास पढ़ाया और बाद में इसके प्राचार्य भी रहे।

⚠️ सामान्य भ्रम — फ़र्ग्युसन कॉलेज

फ़र्ग्युसन कॉलेज (1885) की स्थापना गोखले ने नहीं की थी। इसकी स्थापना दक्कन एजुकेशन सोसाइटी (1884) ने की थी, जिसके संस्थापकों में तिलक, विष्णुशास्त्री चिपलूणकर, गोपाल गणेश आगरकर आदि थे। गोखले कॉलेज खुलने के कुछ समय बाद इससे अध्यापक के रूप में जुड़े और आगे चलकर प्राचार्य बने। कुछ पुस्तकों में "गोखले ने फ़र्ग्युसन कॉलेज स्थापित किया" लिखा मिलता है — यह ग़लत है।

◆ गुरु और पत्रकारिता — गोखले ने महादेव गोविंद रानाडे को अपना गुरु माना। रानाडे के मार्गदर्शन में वे पूना सार्वजनिक सभा के सचिव बने और उसकी त्रैमासिक पत्रिका संपादित की। उन्होंने आगरकर के पत्र "सुधारक" के अंग्रेज़ी भाग का संपादन भी किया।

◆ विधायी कार्य — 1897 में उन्होंने इंग्लैंड जाकर वेल्बी आयोग के सामने भारतीय ख़र्च पर गवाही दी। 1902 से मृत्यु तक वे इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल (केंद्रीय विधान परिषद) के सदस्य रहे, जहाँ सरकारी बजट पर उनके भाषण इतने तथ्यपूर्ण होते थे कि वायसराय भी ध्यान से सुनते थे। 1911 में उन्होंने निःशुल्क और अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा का विधेयक रखा, जिसे सरकार ने अस्वीकार कर दिया — पर यही विचार आगे चलकर संविधान और शिक्षा के अधिकार क़ानून तक पहुँचा।

◆ सर्वेंट्स ऑफ़ इंडिया सोसाइटी (1905) — 12 जून 1905 को पूना में उन्होंने "भारत सेवक समाज" (सर्वेंट्स ऑफ़ इंडिया सोसाइटी) बनाई। इसके सदस्य मामूली भत्ते पर जीवन भर देश-सेवा — शिक्षा, अकाल-राहत, सामाजिक सुधार, आदिवासी और दलित कल्याण — का व्रत लेते थे। वी. एस. श्रीनिवास शास्त्री, जी. के. देवधर, एन. एम. जोशी, ठक्कर बापा जैसे लोग इससे जुड़े।

◆ कांग्रेस अध्यक्ष (1905, बनारस) — बंग-भंग के वर्ष बनारस अधिवेशन के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने विभाजन की निंदा की और बंगाल में स्वदेशी और बहिष्कार का सीमित समर्थन किया, पर उसे पूरे देश में फैलाने के पक्ष में नहीं थे। 1905–06 और 1908 में इंग्लैंड जाकर उन्होंने भारत सचिव मॉर्ले से बातचीत की, जिसका प्रभाव 1909 के मॉर्ले-मिंटो सुधारों पर पड़ा।

◆ गांधीजी से संबंध — 1912 में गोखले गांधीजी के निमंत्रण पर दक्षिण अफ़्रीका गए और वहाँ के भारतीयों की समस्याएँ सरकार के सामने रखीं। गांधीजी ने उन्हें अपना "राजनीतिक गुरु" माना और उनकी सलाह पर भारत लौटकर एक वर्ष तक देश-भ्रमण किया। गांधीजी ने उन पर पुस्तक भी लिखी — "गोखले: माई पॉलिटिकल गुरु"। कहा जाता है कि जिन्ना "मुस्लिम गोखले" बनना चाहते थे।

◆ निधन और मूल्यांकन — 19 फ़रवरी 1915 को केवल 48 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ। तिलक ने, जो जीवन भर उनके राजनीतिक विरोधी रहे, उन्हें "भारत का हीरा, महाराष्ट्र का रत्न" कहा। गोखले संयम, तथ्य और नैतिकता की राजनीति के प्रतीक थे।

2.6 📘 अन्य उदारवादी नेता

◆ व्योमेश चंद्र बनर्जी (1844–1906) — कलकत्ता के प्रसिद्ध बैरिस्टर व्योमेश चंद्र (डब्ल्यू. सी.) बनर्जी 28 दिसंबर 1885 को बम्बई के गोकुलदास तेजपाल संस्कृत कॉलेज में हुए कांग्रेस के पहले अधिवेशन के अध्यक्ष थे। उस अधिवेशन में 72 प्रतिनिधि आए थे। वे 1892 (इलाहाबाद) में दोबारा अध्यक्ष बने और बाद में इंग्लैंड में बस गए।

◆ बदरुद्दीन तैयबजी (1844–1906) — बम्बई के प्रसिद्ध वकील और बाद में बम्बई उच्च न्यायालय के न्यायाधीश। वे 1887 (मद्रास) अधिवेशन के अध्यक्ष बने — कांग्रेस के पहले मुस्लिम अध्यक्ष। उन्होंने सर सैयद अहमद ख़ाँ के इस मत का विरोध किया कि मुसलमानों को कांग्रेस से दूर रहना चाहिए, और मुस्लिम समाज में शिक्षा तथा स्त्री-शिक्षा के लिए काम किया।

◆ दिनशा वाचा (1844–1936) — बम्बई के पारसी नेता और अर्थशास्त्री, जिन्होंने नौरोजी के साथ ब्रिटिश शासन की आर्थिक आलोचना की। वे लंबे समय तक कांग्रेस के महासचिव रहे और 1901 (कलकत्ता) में अध्यक्ष बने।

◆ आनंद मोहन बोस (1847–1906) — कैम्ब्रिज से पढ़े पहले भारतीय "रैंगलर" (गणित में सर्वोच्च श्रेणी पाने वाले), जिन्होंने सुरेंद्रनाथ के साथ इंडियन एसोसिएशन (1876) बनाई। वे साधारण ब्रह्म समाज के संस्थापकों में थे और 1898 (मद्रास) में कांग्रेस अध्यक्ष बने।

◆ रमेशचंद्र दत्त (1848–1909) — आई.सी.एस. अधिकारी, इतिहासकार और साहित्यकार। उनकी पुस्तक "इकोनॉमिक हिस्ट्री ऑफ़ इंडिया" (1901–03, दो भाग) ने आँकड़ों से दिखाया कि ब्रिटिश नीतियों ने भारतीय उद्योगों को नष्ट किया और किसानों पर भारी भू-राजस्व का बोझ डाला। वे 1899 (लखनऊ) में कांग्रेस अध्यक्ष बने।

🧠 उदारवादियों का मूल्यांकन

योगदान — इन्होंने देश में राजनीतिक चेतना और राष्ट्रीय एकता की नींव रखी; धन-निकास सिद्धांत से ब्रिटिश शासन का शोषक चेहरा उजागर किया; प्रेस की स्वतंत्रता, विधान परिषदों के विस्तार और भारतीयों को ऊँचे पदों की माँग उठाई; और 1892 के भारतीय परिषद अधिनियम जैसे सुधार पाए।

सीमा — इनका आधार शिक्षित मध्यम वर्ग तक सीमित रहा; किसान-मज़दूर इनसे नहीं जुड़े। अंग्रेज़ों की "न्यायप्रियता" पर इनका भरोसा बाद में ग़लत सिद्ध हुआ। इसी निराशा से उग्र राष्ट्रवाद का जन्म हुआ — जो अगले खंड का विषय है।

3. उग्र राष्ट्रवादी: तिलक, लाजपत राय, बिपिनचंद्र पाल, अरविंद घोष

उन्नीसवीं सदी के अंतिम दशक में कई कारणों से नरमपंथी राजनीति से निराशा बढ़ी — 1896–97 का भीषण अकाल और प्लेग, सरकार का कठोर दमन, कर्ज़न की अपमानजनक नीतियाँ और अंत में 1905 का बंग-भंग। साथ ही जापान द्वारा रूस की हार (1905) ने दिखाया कि एशियाई देश भी यूरोपीय शक्ति को हरा सकता है। इसी वातावरण में एक नई पीढ़ी के नेता सामने आए, जिन्हें उग्र राष्ट्रवादी या गरमपंथी कहा गया। इनमें सबसे प्रसिद्ध तिकड़ी थी — लाल-बाल-पाल (लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक, बिपिनचंद्र पाल) — और इनके साथ बंगाल के अरविंद घोष।

🔍 आसान परिभाषा: उग्रवाद / उग्र राष्ट्रवाद (गरमपंथ)

📘 परिभाषा: राष्ट्रीय आंदोलन का वह चरण (लगभग 1905–1918) और विचारधारा, जो याचिका-प्रार्थना के बजाय जनता की सीधी भागीदारी — स्वदेशी, बहिष्कार, राष्ट्रीय शिक्षा, जन-सभाएँ, उत्सव और निष्क्रिय प्रतिरोध — से स्वराज पाना चाहती थी और ब्रिटिश शासन को मूल रूप से शोषक मानती थी। यहाँ "उग्र" का अर्थ हिंसा नहीं, बल्कि दृढ़ और आक्रामक राजनीतिक रुख़ है।

💡 आसान भाषा में: यानी "माँगने से कुछ नहीं मिलेगा; जनता को जगाओ और सरकार को दबाव से झुकाओ।" उग्रवादी स्वाभिमान, आत्मनिर्भरता और भारतीय संस्कृति के गौरव पर ज़ोर देते थे। 🏠 उदाहरण: बंग-भंग के विरोध में विदेशी कपड़ों की होली जलाना, स्वदेशी दुकानें और राष्ट्रीय विद्यालय खोलना, और "वंदे मातरम्" गाते हुए जुलूस निकालना — ये उग्र राष्ट्रवाद के तरीक़े थे।

3.1 🦁 बाल गंगाधर तिलक (1856–1920) — "लोकमान्य"

◆ जन्म और शिक्षा — तिलक का जन्म 23 जुलाई 1856 को रत्नागिरी (महाराष्ट्र) के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ। पूना के डेक्कन कॉलेज से उन्होंने गणित में स्नातक और फिर क़ानून की डिग्री ली। वे गणित, संस्कृत और खगोलशास्त्र के गहरे विद्वान थे।

◆ शिक्षा-संस्थाएँ — उन्होंने विष्णुशास्त्री चिपलूणकर और गोपाल गणेश आगरकर के साथ 1880 में पूना में न्यू इंग्लिश स्कूल, फिर 1884 में दक्कन एजुकेशन सोसाइटी और 1885 में फ़र्ग्युसन कॉलेज की स्थापना की। उनका उद्देश्य था कि भारतीय स्वयं सस्ती और राष्ट्रवादी शिक्षा दें।

◆ पत्रकारिता (1881) — 1881 में उन्होंने मराठी साप्ताहिक "केसरी" और अंग्रेज़ी साप्ताहिक "मराठा" शुरू किए। "केसरी" के तीखे लेखों ने महाराष्ट्र के गाँव-गाँव तक राष्ट्रवाद पहुँचाया। इसी से वे जनता के नेता बने और लोगों ने उन्हें "लोकमान्य" (जनता द्वारा माना गया नेता) कहा।

◆ जन-जागरण के नए तरीक़े — तिलक पहले राष्ट्रवादी नेता थे, जिन्होंने शिक्षित वर्ग से बाहर निकलकर आम जनता से सीधा संबंध जोड़ा; इस अर्थ में वे गांधीजी के अग्रगामी थे। उन्होंने 1893 में गणपति उत्सव और 1895–96 में शिवाजी उत्सव को घरेलू पूजा से निकालकर सार्वजनिक उत्सव बना दिया, जिनमें भाषणों और गीतों से देशभक्ति जगाई जाती थी। 1896–97 के अकाल में उन्होंने किसानों से कहा कि अकाल संहिता के अनुसार वे लगान न दें (कर-बंदी अभियान)।

◆ सहमति आयु विधेयक का विरोध (1891) — तिलक ने 1891 के सहमति आयु विधेयक का विरोध किया। उनका तर्क था कि सुधार समाज के भीतर से आना चाहिए; विदेशी सरकार को हिंदुओं के धार्मिक-सामाजिक जीवन में दख़ल का अधिकार नहीं। इसी कारण सुधारक वर्ग (रानाडे, गोखले, आगरकर) से उनका मतभेद हुआ।

◆ पहला कारावास (1897) — 1897 में पूना में प्लेग नियंत्रण के नाम पर घरों की तलाशी में हुए अत्याचारों के बाद चापेकर बंधुओं ने प्लेग आयुक्त रैंड की हत्या कर दी। सरकार ने तिलक के लेखों को भड़काऊ मानकर उन पर राजद्रोह का मुक़दमा चलाया और 18 महीने की सज़ा दी। इससे वे पूरे देश में प्रसिद्ध हो गए।

◆ स्वदेशी आंदोलन और सूरत फूट — बंग-भंग के बाद तिलक ने स्वदेशी, बहिष्कार, राष्ट्रीय शिक्षा और स्वराज — इन चार सूत्रों को पूरे देश में फैलाने की माँग की। 1907 के सूरत अधिवेशन में अध्यक्ष पद को लेकर नरमपंथियों और उग्रपंथियों के बीच टकराव हुआ और कांग्रेस टूट गई (अध्याय 11)।

◆ मांडले निर्वासन (1908–1914) — 1908 में मुज़फ़्फ़रपुर बम कांड के बाद "केसरी" में लिखे लेखों के लिए उन्हें फिर राजद्रोह में 6 वर्ष की सज़ा दी गई और मांडले (बर्मा) जेल भेज दिया गया। वहीं उन्होंने अपना प्रसिद्ध ग्रंथ "गीता रहस्य" लिखा, जिसमें उन्होंने गीता को कर्मयोग — यानी कर्तव्य और कर्म — का शास्त्र बताया।

◆ होमरूल आंदोलन (1916) — जेल से लौटकर उन्होंने नरमपंथियों से मेल-मिलाप किया और अप्रैल 1916 में बेलगाँव में इंडियन होमरूल लीग की स्थापना की (इसका क्षेत्र महाराष्ट्र, कर्नाटक, मध्य प्रांत और बरार था)। इसी समय उन्होंने प्रसिद्ध नारा दिया — "स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा।" 1916 के लखनऊ समझौते में कांग्रेस और मुस्लिम लीग को साथ लाने में उनकी प्रमुख भूमिका रही।

⚠️ ध्यान दें — दो होमरूल लीगें

तिलक की लीग का नाम "इंडियन होमरूल लीग" था (अप्रैल 1916, बेलगाँव)। "ऑल इंडिया होमरूल लीग" एनी बेसेंट की थी (सितंबर 1916, मद्रास)। कई पुस्तकों में दोनों नाम आपस में मिला दिए जाते हैं — परीक्षा में यह अंतर पूछा जाता है।

◆ अंतिम वर्ष — अंग्रेज़ पत्रकार वेलेंटाइन शिरोल ने अपनी पुस्तक "इंडियन अनरेस्ट" (1910) में तिलक को "भारतीय अशांति का जनक" कहा था; तिलक ने 1918–19 में लंदन में उन पर मानहानि का मुक़दमा किया, पर हार गए। 1920 में उन्होंने कांग्रेस डेमोक्रेटिक पार्टी बनाई। 1 अगस्त 1920 को बम्बई में उनका निधन हुआ — और उसी दिन गांधीजी ने असहयोग आंदोलन शुरू किया। गांधीजी ने उन्हें "आधुनिक भारत का निर्माता" कहा।

◆ पुस्तकें — "द ओरायन" (1893) — वेदों की प्राचीनता पर खगोलीय गणना; "द आर्कटिक होम इन द वेदाज़" (1903) — जिसमें उन्होंने आर्यों का मूल निवास उत्तरी ध्रुव प्रदेश बताया; और "गीता रहस्य" (मांडले जेल में लिखी, 1915 में प्रकाशित)।

3.2 🦁 लाला लाजपत राय (1865–1928) — "पंजाब केसरी"

◆ जन्म और आरंभ — लाजपत राय का जन्म 28 जनवरी 1865 को पंजाब के ढुडीके (आज मोगा ज़िला) में हुआ। वे वकील बने और हिसार तथा लाहौर में वकालत की। युवावस्था में वे आर्य समाज से जुड़े और लाहौर के दयानंद एंग्लो-वैदिक (डी.ए.वी.) कॉलेज आंदोलन के प्रमुख नेता बने।

◆ स्वदेशी उद्यम — वे भारतीय पूँजी से चलने वाली संस्थाओं के समर्थक थे। पंजाब नेशनल बैंक (1894–95) और लक्ष्मी बीमा कंपनी की स्थापना से वे जुड़े रहे।

◆ मांडले निर्वासन (1907) — 1907 में पंजाब के किसानों ने नहर-पानी की दरें बढ़ाने और उपनिवेशीकरण क़ानून के विरुद्ध आंदोलन किया ("पगड़ी सँभाल जट्टा")। सरकार ने लाजपत राय और अजीत सिंह (भगत सिंह के चाचा) को बिना मुक़दमे के मांडले (बर्मा) निर्वासित कर दिया; जनविरोध के कारण कुछ महीनों में उन्हें छोड़ना पड़ा।

◆ अमेरिका में (1914–1919) — प्रथम विश्वयुद्ध के समय वे अमेरिका में रहे और 1917 में न्यूयॉर्क में इंडियन होमरूल लीग ऑफ़ अमेरिका बनाई। वहीं उन्होंने पुस्तक "यंग इंडिया" (1916) और "इंग्लैंड्स डेट टू इंडिया" लिखी।

◆ असहयोग और संगठन — भारत लौटकर वे सितंबर 1920 के कलकत्ता विशेष अधिवेशन के अध्यक्ष बने, जिसमें असहयोग का प्रस्ताव पास हुआ। उसी वर्ष बने अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस (एटक) के वे पहले अध्यक्ष थे। 1921 में लाहौर में उन्होंने गोखले की संस्था के ढंग पर सर्वेंट्स ऑफ़ द पीपल सोसाइटी (लोक सेवक मंडल) बनाई। वे उर्दू दैनिक "वंदे मातरम्" और अंग्रेज़ी साप्ताहिक "द पीपल" से भी जुड़े रहे।

◆ "अनहैप्पी इंडिया" (1928) — अमेरिकी लेखिका कैथरीन मेयो ने "मदर इंडिया" (1927) में भारतीय समाज को पिछड़ा और स्वशासन के अयोग्य बताया था; गांधीजी ने इसे "गटर इंस्पेक्टर की रिपोर्ट" कहा। इसके उत्तर में लाजपत राय ने "अनहैप्पी इंडिया" लिखी और दिखाया कि भारत की दुर्दशा का कारण औपनिवेशिक शासन है।

◆ बलिदान (1928) — 30 अक्टूबर 1928 को लाहौर में साइमन कमीशन के विरुद्ध शांतिपूर्ण जुलूस का नेतृत्व करते समय पुलिस अधीक्षक जेम्स स्कॉट के आदेश पर उन पर लाठियाँ बरसाई गईं। उन्होंने कहा — "मेरे शरीर पर पड़ी हर लाठी ब्रिटिश साम्राज्य के ताबूत की कील साबित होगी।" 17 नवंबर 1928 को उनका निधन हो गया। इसका बदला लेने के लिए भगत सिंह और साथियों ने सहायक पुलिस अधीक्षक सांडर्स की हत्या की (खंड 8)।

◆ उपाधियाँ — "पंजाब केसरी" और "शेर-ए-पंजाब"।

3.3 🗣️ बिपिनचंद्र पाल (1858–1932) — "क्रांतिकारी विचारों के जनक"

◆ परिचय — बिपिनचंद्र पाल का जन्म 7 नवंबर 1858 को सिलहट (आज बांग्लादेश) ज़िले में हुआ। वे युवावस्था में ब्रह्म समाज से जुड़े और एक विधवा से विवाह करके सामाजिक रूढ़ियों को चुनौती दी। वे अपने समय के सबसे ओजस्वी वक्ताओं में थे।

◆ पत्रकारिता — उन्होंने 1901 में अंग्रेज़ी साप्ताहिक "न्यू इंडिया" और अगस्त 1906 में अंग्रेज़ी दैनिक "वंदे मातरम्" शुरू किया, जिसके संपादन में अरविंद घोष उनके साथ थे। "वंदे मातरम्" उग्र राष्ट्रवाद का सबसे प्रभावशाली पत्र बन गया।

◆ स्वदेशी आंदोलन — 1905 के बाद उन्होंने बंगाल, मद्रास और दूसरे प्रांतों का दौरा करके स्वदेशी और बहिष्कार का प्रचार किया। 1907 में उन्होंने "वंदे मातरम्" राजद्रोह मामले में अरविंद के विरुद्ध गवाही देने से इनकार किया, जिसके लिए उन्हें छह महीने की जेल हुई।

◆ विचार और बाद का जीवन — वे मानते थे कि स्वराज भीख से नहीं, आत्म-शक्ति से मिलेगा। "लाल-बाल-पाल" तिकड़ी में वे बंगाल का प्रतिनिधित्व करते थे। बाद में वे गांधीजी के असहयोग के तरीक़ों से असहमत हुए और सक्रिय राजनीति से अलग हो गए। 20 मई 1932 को उनका निधन हुआ। उनके उग्र विचारों के कारण उन्हें "भारत में क्रांतिकारी विचारों का जनक" कहा जाता है।

3.4 🕉️ अरविंद घोष (1872–1950) — राष्ट्रवादी से महर्षि तक

◆ जन्म और विदेश में शिक्षा — अरविंद घोष का जन्म 15 अगस्त 1872 को कलकत्ता में हुआ। उनके पिता डॉ. कृष्णधन घोष उन्हें पूरी तरह अंग्रेज़ी वातावरण में पालना चाहते थे, इसलिए सात वर्ष की आयु में उन्हें इंग्लैंड भेज दिया गया। उन्होंने कैम्ब्रिज में पढ़ाई की और आई.सी.एस. की लिखित परीक्षा पास की, पर जान-बूझकर घुड़सवारी की परीक्षा में नहीं गए, ताकि उन्हें अंग्रेज़ सरकार की नौकरी न करनी पड़े।

◆ बड़ौदा और राष्ट्रवाद — 1893 में भारत लौटकर वे बड़ौदा राज्य की सेवा में रहे और बड़ौदा कॉलेज में पढ़ाया। 1893–94 में उन्होंने "इंदु प्रकाश" पत्र में "न्यू लैम्प्स फ़ॉर ओल्ड" लेखमाला लिखकर कांग्रेस की नरमपंथी नीति की कड़ी आलोचना की। उनके छोटे भाई बारींद्र कुमार घोष बंगाल के क्रांतिकारी संगठन अनुशीलन समिति और युगांतर समूह से जुड़े थे।

◆ बंगाल की राजनीति (1906–1908) — 1906 में वे कलकत्ता आकर बंगाल नेशनल कॉलेज के पहले प्राचार्य बने और "वंदे मातरम्" के संपादक के रूप में उग्र राष्ट्रवाद के प्रमुख सिद्धांतकार बन गए। 1907 में उन्होंने इसी पत्र में "निष्क्रिय प्रतिरोध का सिद्धांत" लेखमाला लिखी और घोषणा की कि लक्ष्य पूर्ण स्वतंत्रता है — ऐसा स्पष्ट कहने वाले वे पहले बड़े नेताओं में थे।

🔍 आसान परिभाषा: निष्क्रिय प्रतिरोध (पैसिव रेज़िस्टेंस)

📘 परिभाषा: विदेशी सरकार से संगठित असहयोग — उसकी वस्तुओं, विद्यालयों, अदालतों, नौकरियों और उपाधियों का बहिष्कार; अन्यायपूर्ण क़ानून न मानना; और उसके बदले स्वदेशी उद्योग, राष्ट्रीय शिक्षा और पंचायती न्याय जैसी समानांतर व्यवस्था खड़ी करना। अरविंद ने इसे 1907 में सिद्धांत रूप में प्रस्तुत किया।

💡 आसान भाषा में: यानी "हम सरकार पर हमला नहीं करेंगे, पर उसके काम में हाथ भी नहीं बँटाएँगे — बिना हमारे सहयोग के वह चल ही नहीं पाएगी।" अरविंद के अनुसार आवश्यकता पड़ने पर आत्मरक्षा का अधिकार भी बना रहता है। 🏠 उदाहरण: स्वदेशी आंदोलन में विदेशी कपड़े का बहिष्कार और राष्ट्रीय विद्यालय — यह निष्क्रिय प्रतिरोध था। गांधीजी का असहयोग आंदोलन (1920) इसी विचार का विस्तृत रूप था, पर गांधीजी ने इसमें पूर्ण अहिंसा और विरोधी के हृदय-परिवर्तन की शर्त जोड़ी, इसलिए वे अपने तरीक़े को "निष्क्रिय प्रतिरोध" से अलग "सत्याग्रह" कहते थे।

◆ अलीपुर बम मामला (1908–09) — 1908 में मुज़फ़्फ़रपुर में खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी के बम कांड के बाद कलकत्ता के मानिकतल्ला बगीचे से बम बनाने का केंद्र पकड़ा गया और अरविंद सहित अनेक लोगों पर अलीपुर षड्यंत्र मामला चला। उनकी पैरवी चित्तरंजन दास ने की और मई 1909 में वे बरी हो गए। जेल में रहते हुए उन्हें गहरे आध्यात्मिक अनुभव हुए।

◆ पांडिचेरी और आध्यात्मिक जीवन — जेल से लौटकर उन्होंने अंग्रेज़ी साप्ताहिक "कर्मयोगिन" और बांग्ला "धर्म" निकाला। गिरफ़्तारी की आशंका के बीच 1910 में वे पहले चंदननगर और फिर फ़्रांसीसी क्षेत्र पांडिचेरी चले गए और सक्रिय राजनीति छोड़कर योग-साधना में लग गए। वहाँ उनका आश्रम बना, जिसकी देखरेख बाद में "श्रीमाँ" (मीरा अल्फ़ासा) ने की। उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं — "द लाइफ़ डिवाइन", महाकाव्य "सावित्री", "द सिंथेसिस ऑफ़ योग" और "एसेज़ ऑन द गीता"।

◆ संयोग और निधन — उनका जन्मदिन 15 अगस्त ही भारत की स्वतंत्रता का दिन बना; उस दिन उन्होंने राष्ट्र के नाम संदेश दिया। 5 दिसंबर 1950 को पांडिचेरी में उनका निधन हुआ। उन्हें "महर्षि अरविंद" या "श्री अरविंद" कहा जाता है।

3.5 ⚖️ तिलक और गोखले — दो रास्ते, एक मंज़िल

तिलक और गोखले — दोनों महाराष्ट्र के, दोनों चितपावन ब्राह्मण, दोनों शिक्षक, दोनों दक्कन एजुकेशन सोसाइटी से जुड़े — फिर भी राजनीति में दोनों के रास्ते बिल्कुल अलग थे। गोखले मानते थे कि ब्रिटिश शासन में सुधार हो सकता है और भारत का हित ब्रिटेन से जुड़े रहने में है; इसलिए वे विधान परिषद में तर्क, याचिका और संवैधानिक सुधार का रास्ता अपनाते थे। तिलक मानते थे कि ब्रिटिश शासन मूल रूप से शोषक है और केवल जनता के दबाव से ही झुकेगा; इसलिए वे स्वदेशी, बहिष्कार और जन-आंदोलन का रास्ता अपनाते थे। सामाजिक सुधार पर भी दोनों अलग थे — गोखले (रानाडे की परंपरा में) पहले समाज-सुधार चाहते थे और सहमति आयु विधेयक के समर्थक थे, जबकि तिलक पहले राजनीतिक स्वतंत्रता चाहते थे और विदेशी सरकार द्वारा थोपे गए सुधार के विरोधी थे। फिर भी दोनों एक-दूसरे का सम्मान करते थे, और आगे चलकर गांधीजी ने दोनों की विरासत मिलाई — गोखले की नैतिकता और तिलक का जन-आंदोलन।

📋 दोहराव तालिका: गोखले बनाम तिलक

🟦 गोखले (उदारवादी)

✔ उनका मार्ग संवैधानिक था — याचिका, भाषण और विधान परिषद में बहस।

✔ वे ब्रिटिश शासन को सुधार योग्य मानते थे और ब्रिटेन से संबंध को भारत के हित में समझते थे।

✔ वे पहले सामाजिक सुधार चाहते थे और 1891 के सहमति आयु विधेयक के समर्थक थे।

✔ उनका लक्ष्य साम्राज्य के भीतर स्वशासन था।

✔ उनकी संस्था सर्वेंट्स ऑफ़ इंडिया सोसाइटी (1905) थी।

🟥 तिलक (उग्र राष्ट्रवादी)

✔ उनका मार्ग जन-आंदोलन था — स्वदेशी, बहिष्कार, राष्ट्रीय शिक्षा और उत्सव।

✔ वे ब्रिटिश शासन को शोषक मानते थे, जो केवल जनता के दबाव से झुकेगा।

✔ वे पहले राजनीतिक स्वतंत्रता चाहते थे और विदेशी सरकार द्वारा थोपे गए सामाजिक क़ानून के विरोधी थे।

✔ उनका लक्ष्य स्वराज था, जिसे वे "जन्मसिद्ध अधिकार" कहते थे।

✔ उनकी संस्था इंडियन होमरूल लीग (1916) थी।

4. महात्मा गांधी I: जीवन-यात्रा, उपाधियाँ, पुस्तकें और पत्र

मोहनदास करमचंद गांधी का जीवन अपने-आप में राष्ट्रीय आंदोलन का इतिहास है। 1915 से 1948 तक भारतीय राजनीति का लगभग हर बड़ा मोड़ उनके निर्णयों से जुड़ा रहा। घटनाओं का पूरा विवरण अध्याय 12, 13 और 14 में है; यहाँ उनकी जीवन-यात्रा को आठ पड़ावों में समझा गया है। नीचे का चार्ट इन पड़ावों का सार है, और उसके बाद हर पड़ाव का विस्तार।

चित्र 16.2: महात्मा गांधी की जीवन-यात्रा (1869–1948)
चित्र 16.2: महात्मा गांधी की जीवन-यात्रा (1869–1948)

पड़ाव 1: पोरबंदर से लंदन तक (1869–1891)

◆ जन्म और परिवार — गांधीजी का जन्म 2 अक्टूबर 1869 को पोरबंदर में हुआ। पिता करमचंद गांधी पोरबंदर और बाद में राजकोट रियासत के दीवान थे; माता पुतलीबाई अत्यंत धार्मिक थीं और व्रत-उपवास रखती थीं। माता से ही गांधीजी ने संयम, उपवास और सहनशीलता सीखी। राजा हरिश्चंद्र और श्रवण कुमार की कथाओं ने बचपन में उन पर गहरा असर डाला।

◆ विवाह — लगभग 13 वर्ष की आयु में उनका विवाह कस्तूरबा से हुआ। चार्ट में यह वर्ष 1882 दिया गया है; अधिकांश जीवनीकार इसे मई 1883 बताते हैं। बाद में गांधीजी ने स्वयं अपनी आत्मकथा में बाल विवाह की कड़ी आलोचना की।

◆ लंदन में शिक्षा (1888–1891) — सितंबर 1888 में वे क़ानून पढ़ने लंदन गए। जाने से पहले माँ को वचन दिया कि वे मांस, मदिरा और परस्त्री से दूर रहेंगे — और उन्होंने यह वचन निभाया। लंदन में उन्होंने इनर टेम्पल से पढ़ाई की, शाकाहारी संगठनों से जुड़े और पहली बार गीता का अंग्रेज़ी अनुवाद पढ़ा। जून 1891 में बैरिस्टर बनकर वे भारत लौटे, पर बम्बई और राजकोट में वकालत में सफल नहीं हुए।

पड़ाव 2: दक्षिण अफ़्रीका — सत्याग्रह की प्रयोगशाला (1893–1914)

◆ पीटरमैरित्सबर्ग की घटना (1893) — 1893 में वे गुजराती व्यापारी दादा अब्दुल्ला के एक मुक़दमे के लिए दक्षिण अफ़्रीका गए। 7 जून 1893 को डरबन से प्रिटोरिया जाते समय प्रथम श्रेणी का टिकट होने के बावजूद उन्हें "काला" होने के कारण पीटरमैरित्सबर्ग स्टेशन पर डिब्बे से धक्का देकर उतार दिया गया। ठंडी रात स्टेशन पर बिताते हुए उन्होंने तय किया कि वे रंगभेद के विरुद्ध लड़ेंगे — यह उनके जीवन का निर्णायक मोड़ था।

◆ संगठन और पत्र — 1894 में उन्होंने नटाल इंडियन कांग्रेस बनाई, 1903 में साप्ताहिक "इंडियन ओपिनियन" शुरू किया और 1904 में डरबन के पास फ़ीनिक्स फ़ार्म बसाया, जहाँ सब लोग मिलकर श्रम करते और सादा जीवन जीते थे। बोअर युद्ध (1899) और ज़ुलु विद्रोह (1906) के समय उन्होंने घायलों की सेवा के लिए एम्बुलेंस दल बनाया।

◆ पहला सत्याग्रह (1906) — 1906 में ट्रांसवाल सरकार ने क़ानून बनाया कि हर भारतीय को अँगुलियों के निशान सहित पंजीकरण कराना होगा (इसे "काला क़ानून" कहा गया)। सितंबर 1906 में जोहान्सबर्ग की एक सभा में भारतीयों ने शपथ ली कि वे इसे नहीं मानेंगे, चाहे जेल जाना पड़े — यहीं से सत्याग्रह पद्धति का जन्म हुआ।

◆ टॉल्स्टॉय फ़ार्म और अंतिम सफलता — 1910 में जर्मन मित्र हरमन कालेनबाख़ की दी हुई भूमि पर जोहान्सबर्ग के पास टॉल्स्टॉय फ़ार्म बना, जहाँ सत्याग्रहियों के परिवार रहते थे। 1913 में तीन पाउंड के कर और ईसाई रीति के बाहर हुए विवाहों को अवैध मानने के विरुद्ध हज़ारों मज़दूरों का बड़ा आंदोलन हुआ। अंततः 1914 में जनरल स्मट्स से समझौता हुआ और इंडियन रिलीफ़ एक्ट से कई माँगें मानी गईं।

पड़ाव 3: भारत वापसी (1915)

◆ 9 जनवरी 1915 को गांधीजी बम्बई लौटे — इसी की स्मृति में आज प्रवासी भारतीय दिवस मनाया जाता है। गोखले को उन्होंने अपना राजनीतिक गुरु माना और उनकी सलाह पर एक वर्ष तक बिना राजनीति में कूदे पूरे देश का भ्रमण किया, ताकि भारत को अपनी आँखों से समझ सकें। मई 1915 में अहमदाबाद के कोचरब में सत्याग्रह आश्रम बना, जो 17 जून 1917 को साबरमती नदी के किनारे स्थानांतरित हुआ।

पड़ाव 4: भारत में पहले सत्याग्रह (1917–1918)

◆ चंपारण (1917) — बिहार के चंपारण में नील किसानों से तिनकठिया प्रथा (हर बीस कट्ठे में से तीन कट्ठे पर नील बोना अनिवार्य) के तहत ज़बरदस्ती नील बुवाई कराई जाती थी। किसान राजकुमार शुक्ल के आग्रह पर गांधीजी वहाँ गए; ज़िला छोड़ने का आदेश मानने से इनकार किया — यह भारत में उनका पहला सत्याग्रह था। राजेंद्र प्रसाद, जे. बी. कृपलानी, मज़हरुल हक़ जैसे सहयोगी यहीं मिले।

◆ अहमदाबाद मिल हड़ताल (1918) — प्लेग-बोनस बंद होने पर मिल मज़दूरों और मालिकों में विवाद हुआ। गांधीजी ने मज़दूरों का साथ दिया और अपना पहला उपवास (भूख हड़ताल) किया; अंततः मज़दूरों को 35% वेतन-वृद्धि मिली। अनसूया साराभाई ने मज़दूरों का नेतृत्व किया, जबकि उनके भाई अंबालाल साराभाई मिल मालिकों में थे।

◆ खेड़ा (1918) — गुजरात के खेड़ा में फ़सल ख़राब होने पर भी लगान वसूली हो रही थी। गांधीजी ने लगान न देने का आह्वान किया — इसे भारत में उनका पहला असहयोग माना जाता है। इसी आंदोलन में वल्लभभाई पटेल उनके साथ आए।

पड़ाव 5: राष्ट्रीय नेतृत्व (1919–1922)

◆ रॉलेट सत्याग्रह (1919) — बिना मुक़दमे के गिरफ़्तारी की अनुमति देने वाले रॉलेट एक्ट के विरुद्ध गांधीजी ने 6 अप्रैल 1919 को देशव्यापी हड़ताल कराई — यह उनका पहला अखिल भारतीय आंदोलन था। इसके बाद 13 अप्रैल को जलियाँवाला बाग़ हत्याकांड हुआ।

◆ ख़िलाफ़त और असहयोग (1920–22) — उन्होंने तुर्की के ख़लीफ़ा के समर्थन में चले ख़िलाफ़त आंदोलन को असहयोग से जोड़कर हिंदू-मुस्लिम एकता का अभूतपूर्व दृश्य बनाया। 1 अगस्त 1920 को असहयोग शुरू हुआ और नागपुर अधिवेशन (दिसंबर 1920) ने उसे स्वीकार किया। इसी समय उन्होंने कैसर-ए-हिंद पदक लौटा दिया।

◆ चौरी-चौरा और सज़ा — 5 फ़रवरी 1922 को गोरखपुर के चौरी-चौरा में भीड़ ने थाने में आग लगा दी, जिसमें 22 पुलिसकर्मी मारे गए। हिंसा से दुखी होकर गांधीजी ने 12 फ़रवरी 1922 को बारदोली में आंदोलन वापस ले लिया। मार्च 1922 में उन्हें गिरफ़्तार करके राजद्रोह के लिए 6 वर्ष की सज़ा दी गई; बीमारी के कारण 1924 में वे रिहा हुए। 1924 के बेलगाँव अधिवेशन की अध्यक्षता उन्होंने की — यह एकमात्र अवसर था जब गांधीजी कांग्रेस के अध्यक्ष बने।

पड़ाव 6: सविनय अवज्ञा (1930–1934)

◆ दांडी यात्रा (1930) — 12 मार्च 1930 को साबरमती आश्रम से 78 साथियों के साथ पैदल चलकर 6 अप्रैल 1930 को उन्होंने दांडी में समुद्र किनारे नमक बनाकर नमक क़ानून तोड़ा। इस सीधे-सादे प्रतीक ने पूरे देश को जोड़ दिया और सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू हुआ।

◆ गांधी-इरविन समझौता और दूसरा गोलमेज (1931) — 5 मार्च 1931 को वायसराय इरविन से समझौता हुआ और गांधीजी कांग्रेस के एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में दूसरे गोलमेज सम्मेलन (सितंबर–दिसंबर 1931, लंदन) में गए, पर सांप्रदायिक प्रश्न पर सम्मेलन विफल रहा।

◆ पूना पैक्ट और हरिजन अभियान (1932–34) — अगस्त 1932 के सांप्रदायिक पंचाट में दलितों को पृथक निर्वाचन मिलने के विरुद्ध गांधीजी ने यरवदा जेल में आमरण अनशन किया। 24 सितंबर 1932 को आंबेडकर से पूना पैक्ट हुआ — पृथक निर्वाचन के बजाय आरक्षित सीटें बढ़ाई गईं। इसके बाद उन्होंने हरिजन सेवक संघ (1932) बनाया, "हरिजन" (1933) पत्र निकाला और देशव्यापी हरिजन यात्रा की। 1934 में उन्होंने कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता भी छोड़ दी, ताकि रचनात्मक कार्य पर ध्यान दे सकें; 1936 में वे वर्धा के पास सेवाग्राम में रहने लगे।

पड़ाव 7: व्यक्तिगत सत्याग्रह और भारत छोड़ो (1940–1944)

◆ व्यक्तिगत सत्याग्रह (1940) — द्वितीय विश्वयुद्ध में भारत को बिना पूछे शामिल करने के विरोध में गांधीजी ने अक्टूबर 1940 में व्यक्तिगत सत्याग्रह शुरू किया — विनोबा भावे पहले और नेहरू दूसरे सत्याग्रही चुने गए।

◆ भारत छोड़ो (1942) — 8 अगस्त 1942 को बम्बई के गोवालिया टैंक मैदान में "भारत छोड़ो" प्रस्ताव पास हुआ और गांधीजी ने मंत्र दिया — "करो या मरो"। अगली सुबह ही उन्हें गिरफ़्तार करके पुणे के आग़ा ख़ाँ महल में बंदी बनाया गया।

◆ व्यक्तिगत आघात और रिहाई — बंदीगृह में ही 15 अगस्त 1942 को उनके निजी सचिव महादेव देसाई और 22 फ़रवरी 1944 को पत्नी कस्तूरबा का निधन हुआ। फ़रवरी 1943 में उन्होंने 21 दिन का उपवास भी किया। बिगड़ते स्वास्थ्य के कारण 6 मई 1944 को उन्हें रिहा कर दिया गया।

पड़ाव 8: अंतिम अध्याय (1946–1948)

◆ शांति-यात्राएँ — अगस्त 1946 के "सीधी कार्यवाही दिवस" के बाद फैले दंगों के बीच गांधीजी नवंबर 1946 में पूर्वी बंगाल के नोआखाली गए और गाँव-गाँव पैदल घूमकर हिंदुओं को ढाढ़स बँधाया; फिर बिहार में मुसलमानों की रक्षा के लिए घूमे।

◆ स्वतंत्रता का दिन — 15 अगस्त 1947 को जब दिल्ली में उत्सव हो रहा था, गांधीजी कलकत्ता के बेलियाघाटा में उपवास और प्रार्थना कर रहे थे। सितंबर 1947 में कलकत्ता के दंगे रोकने के लिए उनके उपवास से शहर शांत हुआ, इसीलिए माउंटबेटन ने उन्हें "एक व्यक्ति की सीमा सेना" कहा।

◆ अंतिम उपवास और हत्या — 13 से 18 जनवरी 1948 तक उन्होंने दिल्ली में सांप्रदायिक शांति और पाकिस्तान को उसके हिस्से के 55 करोड़ रुपये देने के लिए अंतिम उपवास किया। 30 जनवरी 1948 की शाम बिड़ला भवन (दिल्ली) में प्रार्थना सभा में जाते समय नाथूराम गोडसे ने गोली मारकर उनकी हत्या कर दी। यह दिन शहीद दिवस के रूप में मनाया जाता है। नेहरू ने रेडियो पर कहा — "हमारे जीवन से प्रकाश चला गया है।"

🏅 गांधीजी की उपाधियाँ और संबोधन

◆ "महात्मा" (महान आत्मा) — यह संबोधन प्रायः रवींद्रनाथ टैगोर से जोड़ा जाता है; 1915 में भारत लौटने के बाद यह देशभर में प्रचलित हो गया। गांधीजी स्वयं इस उपाधि से असहज रहते थे।

◆ "राष्ट्रपिता" — सुभाष चंद्र बोस ने 6 जुलाई 1944 को रंगून से आज़ाद हिंद रेडियो पर भाषण देते हुए पहली बार गांधीजी को "राष्ट्रपिता" कहा और आज़ाद हिंद फ़ौज के संघर्ष के लिए उनका आशीर्वाद माँगा। राजनीतिक मतभेद के बावजूद यह सम्मान बोस की उदारता दिखाता है।

◆ "बापू" — आश्रमवासियों और आम जनता का स्नेह-भरा संबोधन, जिसका अर्थ है "पिता"।

◆ "अधनंगा फ़क़ीर" — 1931 में ब्रिटिश नेता विंस्टन चर्चिल ने गांधी-इरविन वार्ता पर व्यंग्य करते हुए कहा कि एक "अधनंगा फ़क़ीर" वायसराय भवन की सीढ़ियाँ चढ़कर सम्राट के प्रतिनिधि से बराबरी पर बात कर रहा है।

◆ "एक व्यक्ति की सीमा सेना" — माउंटबेटन ने 1947 में कहा कि पंजाब में 55 हज़ार सैनिक दंगे नहीं रोक पाए, पर बंगाल में यह काम अकेले गांधीजी ने कर दिखाया।

◆ "कैसर-ए-हिंद" — दक्षिण अफ़्रीका में बोअर युद्ध और ज़ुलु विद्रोह के समय घायलों की सेवा के लिए ब्रिटिश सरकार ने 1915 में उन्हें कैसर-ए-हिंद स्वर्ण पदक दिया था; 1920 में असहयोग आंदोलन के समय उन्होंने इसे लौटा दिया।

◆ "मैन ऑफ़ द ईयर" — अमेरिकी पत्रिका "टाइम" ने दांडी यात्रा के बाद उन्हें 1930 का "मैन ऑफ़ द ईयर" चुना।

📚 गांधीजी की पुस्तकें

◆ "हिंद स्वराज" (1909) — गांधीजी ने इसे गुजराती में 1909 में लंदन से दक्षिण अफ़्रीका लौटते समय जहाज़ (किल्डोनन कैसल) पर केवल दस दिनों में लिखा। संवाद-शैली (पाठक और संपादक) की इस पुस्तक में उन्होंने आधुनिक पश्चिमी सभ्यता — रेल, वकील, डॉक्टर, मशीन — की आलोचना की और बताया कि सच्चा स्वराज आत्म-नियंत्रण है। इसमें उन्होंने ब्रिटिश संसद को "बाँझ और वेश्या" कहा — बाँझ इसलिए कि वह अपने-आप कोई अच्छा काम नहीं करती, और वेश्या इसलिए कि वह हर बार बदलते मंत्रियों के अधीन रहती है। ब्रिटिश सरकार ने गुजराती संस्करण पर प्रतिबंध लगाया, तो उन्होंने स्वयं इसका अंग्रेज़ी अनुवाद प्रकाशित किया।

◆ "सत्य के प्रयोग" (आत्मकथा) — मूल गुजराती में लिखी यह आत्मकथा 1925 से 1929 के बीच "नवजीवन" में धारावाहिक रूप में छपी। इसमें 1920 तक के जीवन का वर्णन है और गांधीजी ने अपनी ग़लतियाँ भी खुलकर स्वीकार की हैं।

◆ "दक्षिण अफ़्रीका में सत्याग्रह" — दक्षिण अफ़्रीका के संघर्ष का इतिहास, जो उन्होंने 1922–24 की जेल-अवधि में लिखना शुरू किया।

◆ "सर्वोदय" (1908) — अंग्रेज़ विचारक जॉन रस्किन की पुस्तक "अन्टू दिस लास्ट" का गुजराती रूपांतर। इसी पुस्तक ने उन्हें सिखाया कि सबके कल्याण में ही अपना कल्याण है, वकील और नाई के काम का मूल्य बराबर है, और श्रम का जीवन ही सच्चा जीवन है।

◆ "रचनात्मक कार्यक्रम: उसका अर्थ और स्थान" (1941) — स्वराज की नींव के लिए 18 रचनात्मक कार्यों की रूपरेखा (खंड 5 में विस्तार)।

◆ "आरोग्य की कुंजी" — स्वास्थ्य, भोजन और प्राकृतिक चिकित्सा पर; और "गोखले: माई पॉलिटिकल गुरु" — अपने गुरु गोखले पर लेखों का संग्रह।

📰 गांधीजी के पत्र-पत्रिकाएँ

◆ "इंडियन ओपिनियन" (1903) — दक्षिण अफ़्रीका में भारतीयों की आवाज़; अंग्रेज़ी, गुजराती आदि भाषाओं में छपता था।

◆ "यंग इंडिया" (अंग्रेज़ी) और "नवजीवन" (गुजराती) — दोनों 1919 से गांधीजी के संपादन में निकले और असहयोग आंदोलन के विचार पूरे देश तक पहुँचाए। "यंग इंडिया" मूल रूप से बम्बई के होमरूल समर्थकों का पत्र था, जिसे गांधीजी ने अपने हाथ में लिया।

◆ "हरिजन" (1933) — अंग्रेज़ी साप्ताहिक, जिसके साथ हिंदी में "हरिजन सेवक" और गुजराती में "हरिजनबंधु" भी निकले। इनका मुख्य विषय अस्पृश्यता-निवारण और रचनात्मक कार्य था।

🌱 गांधीजी के प्रेरणा-स्रोत

◆ भगवद्गीता — जिसे वे "माता" कहते थे; गीता का अनासक्त कर्म उनके जीवन का आधार बना। उन्होंने इस पर "अनासक्ति योग" लिखा।

◆ लियो टॉल्स्टॉय (रूसी लेखक) — उनकी पुस्तक "द किंगडम ऑफ़ गॉड इज़ विदिन यू" ने गांधीजी को अहिंसा के प्रति दृढ़ किया; दोनों के बीच पत्र-व्यवहार भी हुआ, और गांधीजी ने अपने फ़ार्म का नाम उन्हीं पर रखा।

◆ जॉन रस्किन — "अन्टू दिस लास्ट" से सर्वोदय और श्रम की गरिमा का विचार मिला।

◆ हेनरी डेविड थोरो (अमेरिकी विचारक) — उनके निबंध "सविनय अवज्ञा" से यह विचार मिला कि अन्यायपूर्ण क़ानून को शांतिपूर्वक तोड़कर सज़ा भुगतना नागरिक का कर्तव्य है।

◆ श्रीमद राजचंद्र (रायचंदभाई) — जैन संत और जौहरी, जिन्हें गांधीजी अपना आध्यात्मिक मार्गदर्शक मानते थे; उनसे अहिंसा और सत्य की गहरी समझ मिली।

🏡 गांधीजी के आश्रम

◆ फ़ीनिक्स फ़ार्म (1904) — डरबन के पास, जहाँ "इंडियन ओपिनियन" छपता था और सब मिलकर खेती-छपाई करते थे।

◆ टॉल्स्टॉय फ़ार्म (1910) — जोहान्सबर्ग के पास, हरमन कालेनबाख़ के सहयोग से; यहाँ सत्याग्रहियों के परिवार सामूहिक जीवन जीते थे।

◆ सत्याग्रह आश्रम — पहले कोचरब (अहमदाबाद, मई 1915), फिर साबरमती नदी के किनारे (17 जून 1917)। दांडी यात्रा यहीं से शुरू हुई, और गांधीजी ने प्रण किया था कि स्वराज मिले बिना वे यहाँ नहीं लौटेंगे।

◆ सेवाग्राम आश्रम (1936) — महाराष्ट्र के वर्धा के पास सेगाँव गाँव में, जिसका नाम बदलकर सेवाग्राम रखा गया। 1936 से 1948 तक यही उनका मुख्य निवास और रचनात्मक कार्य का केंद्र रहा।

📋 दोहराव तालिका: गांधीजी — एक नज़र में

विषय

मुख्य तथ्य

जीवन-रेखा

जन्म 2 अक्टूबर 1869 को पोरबंदर में हुआ और 30 जनवरी 1948 को दिल्ली के बिड़ला भवन में उनकी हत्या हुई।

भारत में पहले प्रयोग

चंपारण (1917) पहला सत्याग्रह, अहमदाबाद (1918) पहला उपवास और खेड़ा (1918) पहला असहयोग था।

कांग्रेस अध्यक्षता

वे केवल एक बार, 1924 के बेलगाँव अधिवेशन में, कांग्रेस के अध्यक्ष बने।

प्रमुख पुस्तकें

हिंद स्वराज (1909), सत्य के प्रयोग (आत्मकथा) और रचनात्मक कार्यक्रम (1941) उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं।

प्रमुख पत्र

इंडियन ओपिनियन (1903), यंग इंडिया और नवजीवन (1919) तथा हरिजन (1933) उनके पत्र थे।

उपाधियाँ

बोस ने 1944 में "राष्ट्रपिता" कहा, चर्चिल ने "अधनंगा फ़क़ीर" और माउंटबेटन ने "एक व्यक्ति की सीमा सेना" कहा।

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5. महात्मा गांधी II: विचार, रचनात्मक कार्यक्रम और मूल्यांकन

गांधीजी केवल राजनीतिक नेता नहीं, एक विचारक भी थे। उनके विचार किसी एक पुस्तक में व्यवस्थित सिद्धांत के रूप में नहीं, बल्कि उनके जीवन के प्रयोगों, लेखों और पत्रों में बिखरे हैं। नीचे के आरेख में उनके दर्शन का केंद्र और उसके आठ प्रमुख स्तंभ दिखाए गए हैं; आरेख के बाद हर विचार को उदाहरण सहित समझाया गया है।

चित्र 16.3: गांधीजी के आठ प्रमुख विचार
चित्र 16.3: गांधीजी के आठ प्रमुख विचार

5.1 केंद्र-बिंदु: साधन और साध्य — दोनों पवित्र

गांधी-दर्शन का केंद्र यह विचार है कि अच्छे लक्ष्य (साध्य) को पाने के लिए साधन भी अच्छे (पवित्र) होने चाहिए। बहुत-से राजनीतिक विचारक मानते थे कि "लक्ष्य अच्छा हो तो कोई भी तरीक़ा ठीक है"। गांधीजी ने इसका खंडन किया। उनका प्रसिद्ध कथन है — "साधन बीज है और साध्य पेड़; जैसा बीज बोओगे, वैसा ही पेड़ उगेगा।" यानी हिंसा और झूठ से मिली आज़ादी भी हिंसा और झूठ से भरी होगी। इसी कारण 1922 में चौरी-चौरा की हिंसा के बाद उन्होंने सफल होते हुए असहयोग आंदोलन को भी रोक दिया, क्योंकि उनकी दृष्टि में ग़लत साधन से मिली जीत असली जीत नहीं थी।

5.2 सत्य — "सत्य ही ईश्वर है"

◆ अर्थ — गांधीजी के लिए सत्य केवल सच बोलना नहीं, बल्कि विचार, वाणी और कर्म — तीनों में सच्चाई था। शुरू में वे कहते थे "ईश्वर सत्य है", पर लगभग 1931 से उन्होंने कहना शुरू किया — "सत्य ही ईश्वर है"। इस बदलाव का अर्थ था कि जो व्यक्ति ईश्वर को नहीं मानता (नास्तिक), वह भी सत्य की खोज कर सकता है — सत्य सबको जोड़ता है।

◆ जीवन = सत्य के प्रयोग — उन्होंने अपनी आत्मकथा का नाम ही "सत्य के प्रयोग" रखा, क्योंकि वे अपने भोजन, ब्रह्मचर्य, राजनीति — सबको सत्य की खोज का प्रयोग मानते थे और ग़लती होने पर उसे सार्वजनिक रूप से स्वीकार करते थे (जैसे 1919 में उन्होंने कहा कि बिना तैयारी के सत्याग्रह शुरू करना उनकी "हिमालय जैसी भूल" थी)।

◆ राजनीति का आधार — उनके अनुसार राजनीति भी नैतिकता और धर्म (यहाँ धर्म का अर्थ नैतिक कर्तव्य है, संप्रदाय नहीं) से अलग नहीं हो सकती। उनका कहना था कि "धर्म-विहीन राजनीति मृत्यु का जाल है।"

5.3 अहिंसा — वीर की अहिंसा

◆ केवल हिंसा न करना नहीं — गांधीजी की अहिंसा का अर्थ केवल किसी को चोट न पहुँचाना नहीं, बल्कि विरोधी से भी प्रेम करना, उसके प्रति मन में घृणा न रखना और उसके भले की कामना करना है। वे कहते थे — "पाप से घृणा करो, पापी से नहीं।"

◆ कायरता से हिंसा बेहतर — गांधीजी की अहिंसा कमज़ोर की मजबूरी नहीं, वीर का हथियार थी। उन्होंने स्पष्ट कहा — "यदि कायरता और हिंसा में से एक को चुनना हो, तो मैं हिंसा चुनने की सलाह दूँगा।" पर अहिंसा दोनों से सर्वश्रेष्ठ है, क्योंकि उसमें सबसे अधिक साहस चाहिए — मार खाकर भी पलटकर न मारना।

◆ उदाहरण — धरासना नमक सत्याग्रह (मई 1930) में सत्याग्रही एक-एक पंक्ति में आगे बढ़ते रहे और पुलिस की लाठियाँ खाकर गिरते रहे, पर किसी ने हाथ नहीं उठाया। अमेरिकी पत्रकार वेब मिलर की रिपोर्ट ने इस दृश्य को दुनिया भर में पहुँचाया।

5.4 सत्याग्रह — सत्य के लिए आग्रह

🔍 आसान परिभाषा: सत्याग्रह

📘 परिभाषा: सत्य के प्रति आग्रह — अन्याय का विरोध अहिंसा और स्वयं कष्ट सहकर करना, ताकि विरोधी का हृदय-परिवर्तन हो; इसमें घृणा, झूठ और हिंसा के लिए कोई जगह नहीं। यह शब्द गांधीजी ने दक्षिण अफ़्रीका में (लगभग 1906–08) गढ़ा।

💡 आसान भाषा में: "मैं ग़लत बात नहीं मानूँगा, पर तुम्हें चोट भी नहीं पहुँचाऊँगा — सज़ा मैं ख़ुद भुगतूँगा, ताकि तुम्हें अपनी ग़लती दिखे।" 🏠 उदाहरण: असहयोग, सविनय अवज्ञा (जैसे नमक क़ानून तोड़ना), हड़ताल, धरना, उपवास और हिजरत (अत्याचारी क्षेत्र छोड़ देना — जैसे 1928 में बारडोली के कुछ किसानों ने किया) — ये सब सत्याग्रह के रूप हैं।

◆ सत्याग्रह और निष्क्रिय प्रतिरोध में अंतर — गांधीजी ने स्वयं स्पष्ट किया कि निष्क्रिय प्रतिरोध "कमज़ोर का हथियार" माना जाता है, जिसमें मजबूरी में हिंसा से बचा जाता है और अवसर मिलने पर हिंसा भी हो सकती है; जबकि सत्याग्रह "बलवान का हथियार" है, जिसमें किसी भी परिस्थिति में हिंसा नहीं होती और उद्देश्य विरोधी को हराना नहीं, उसका हृदय बदलना है।

◆ सत्याग्रही के गुण — सत्याग्रही को सत्यवादी, अहिंसक, निडर, अनुशासित और कष्ट सहने को तैयार होना चाहिए। उसे अपने विरोधी से खुलकर बात करने और समझौते के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए। इसलिए गांधीजी हर आंदोलन में वार्ता का द्वार खुला रखते थे।

5.5 स्वराज — आत्म-शासन

◆ केवल अंग्रेज़ों से मुक्ति नहीं — "हिंद स्वराज" (1909) में गांधीजी ने लिखा कि यदि अंग्रेज़ चले जाएँ पर उनकी जगह भारतीय वही शोषक व्यवस्था चलाएँ, तो वह "बाघ के बिना बाघ का राज" होगा — सच्चा स्वराज नहीं। स्वराज का पहला अर्थ है आत्म-नियंत्रण — व्यक्ति अपनी इच्छाओं पर शासन करे।

◆ ग्राम स्वराज — राजनीतिक स्तर पर गांधीजी का आदर्श था — स्वावलंबी गाँव-गणराज्य, जहाँ हर गाँव अपनी भोजन, वस्त्र, शिक्षा और न्याय की ज़रूरतें स्वयं पूरी करे और पंचायत शासन चलाए। सत्ता ऊपर से नीचे नहीं, नीचे से ऊपर जाए। संविधान के अनुच्छेद 40 (ग्राम पंचायतों का गठन) और 73वें संशोधन (1992) में इसी विचार की झलक है।

◆ सबका स्वराज — गांधीजी कहते थे कि स्वराज तब पूरा होगा जब सबसे ग़रीब व्यक्ति भी महसूस करे कि यह देश उसका है — यही इस अध्याय की शुरुआत वाले "जंतर" का भाव है।

5.6 सर्वोदय और अंत्योदय

🔍 आसान परिभाषा: सर्वोदय और अंत्योदय

📘 परिभाषा: सर्वोदय = सबका उदय (सबका कल्याण) — ऐसा समाज, जिसमें किसी एक वर्ग या बहुमत का नहीं, बल्कि हर व्यक्ति का विकास हो। अंत्योदय = अंतिम व्यक्ति का उदय — विकास की कसौटी यह है कि समाज के सबसे निचले, सबसे ग़रीब व्यक्ति को क्या मिला।

💡 आसान भाषा में: पश्चिमी विचार "अधिकतम लोगों का अधिकतम सुख" कहता है, जिसमें कुछ लोग छूट सकते हैं; गांधीजी कहते थे — "सबका सुख", कोई भी न छूटे। 🏠 उदाहरण: गांधीजी ने यह विचार जॉन रस्किन की पुस्तक "अन्टू दिस लास्ट" से लिया और उसका गुजराती रूपांतर "सर्वोदय" (1908) नाम से किया। स्वतंत्रता के बाद विनोबा भावे का भूदान आंदोलन "सर्वोदय आंदोलन" का हिस्सा था, और आज की "अंत्योदय अन्न योजना" का नाम भी इसी विचार से आया है।

◆ रस्किन से मिली तीन सीखें — गांधीजी ने "अन्टू दिस लास्ट" से तीन बातें सीखीं: (1) व्यक्ति का भला सबके भले में है; (2) वकील और नाई — दोनों के काम का मूल्य बराबर है, क्योंकि सबको अपनी आजीविका कमाने का समान अधिकार है; (3) श्रम का जीवन — किसान और कारीगर का जीवन — ही सच्चा जीवन है। इन्हीं विचारों से उन्होंने फ़ीनिक्स फ़ार्म बसाया।

5.7 न्यासिता (ट्रस्टीशिप)

🔍 आसान परिभाषा: न्यासिता (ट्रस्टीशिप)

📘 परिभाषा: गांधीजी का वह आर्थिक सिद्धांत, जिसके अनुसार धनी व्यक्ति अपनी संपत्ति का मालिक नहीं, बल्कि न्यासी (ट्रस्टी) है — वह अपनी उचित आवश्यकता भर रखे और बाक़ी संपत्ति का उपयोग समाज के कल्याण के लिए करे। इसमें धनी और ग़रीब के बीच वर्ग-संघर्ष के बजाय हृदय-परिवर्तन और सहयोग से आर्थिक समानता लाने की बात है।

💡 आसान भाषा में: जैसे किसी अनाथ बच्चे की संपत्ति की देखभाल करने वाला न्यासी उस संपत्ति को अपना नहीं मानता, बल्कि बच्चे के हित में ख़र्च करता है — वैसे ही उद्योगपति अपनी फ़ैक्टरी को समाज की अमानत समझे। 🏠 उदाहरण: मार्क्सवादी मानते थे कि पूँजीपति की संपत्ति बल से छीनी जाए; गांधीजी कहते थे कि उसे समझाकर न्यासी बनाया जाए। जमनालाल बजाज को गांधीजी अपना "पाँचवाँ पुत्र" कहते थे और उन्हें न्यासिता का आदर्श उदाहरण मानते थे।

◆ आलोचना — वामपंथियों ने कहा कि यह सिद्धांत व्यावहारिक नहीं है, क्योंकि पूँजीपति स्वेच्छा से अपनी संपत्ति समाज को नहीं देंगे; इससे पूँजीपतियों को ही बचाव मिलता है। गांधीजी का उत्तर था कि यदि समझाने से काम न बने तो अहिंसक असहयोग से उन्हें न्यासी बनने के लिए प्रेरित किया जा सकता है।

5.8 स्वदेशी, खादी और मशीन

◆ स्वदेशी — गांधीजी के लिए स्वदेशी का अर्थ केवल विदेशी वस्तु का बहिष्कार नहीं, बल्कि पड़ोसी की बनाई वस्तु को प्राथमिकता देना था — ताकि स्थानीय कारीगर को रोज़गार मिले और गाँव आत्मनिर्भर बनें।

◆ चरखा और खादी — चरखा गांधीजी के लिए आर्थिक स्वावलंबन, श्रम की गरिमा और राष्ट्रीय एकता का प्रतीक था। जब अमीर-ग़रीब, हिंदू-मुसलमान सब मिलकर सूत कातते थे, तो ऊँच-नीच की दीवार टूटती थी। 1921 में कांग्रेस ने सदस्यों के लिए खादी पहनना और कताई अनिवार्य की, और 1925 में अखिल भारतीय चरखा संघ बना। उनके लिए खादी "आज़ादी की वर्दी" थी।

◆ कुटीर उद्योग — खादी के साथ तेल-घानी, हाथ-काग़ज़, मधुमक्खी-पालन, चमड़ा आदि ग्रामोद्योग के लिए अखिल भारतीय ग्रामोद्योग संघ (1934) बना।

◆ मशीन का प्रश्न — गांधीजी मशीन के विरोधी नहीं थे; वे "मशीन के प्रति पागलपन" के विरोधी थे। उनका कहना था कि जो मशीन करोड़ों लोगों को बेरोज़गार करे और धन कुछ हाथों में इकट्ठा करे, वह अभिशाप है; पर सिलाई मशीन जैसी मशीन, जो मनुष्य का श्रम हल्का करे, स्वागत योग्य है। भारत जैसे अधिक जनसंख्या वाले देश में वे "अधिक लोगों द्वारा उत्पादन" चाहते थे, न कि "अधिक उत्पादन" मात्र।

5.9 रचनात्मक कार्यक्रम — "स्वराज की नींव"

गांधीजी का मानना था कि केवल आंदोलन से स्वराज नहीं आएगा; जब तक समाज भीतर से मज़बूत, एकजुट और आत्मनिर्भर नहीं होगा, तब तक आज़ादी टिकेगी नहीं। इसलिए हर आंदोलन के बीच "विराम" के समय वे कार्यकर्ताओं को रचनात्मक कार्य में लगाते थे। 1941 में उन्होंने पुस्तिका "रचनात्मक कार्यक्रम: उसका अर्थ और स्थान" में इसके 18 बिंदु गिनाए (बाद के संस्करणों में पशु-सुधार जैसे विषय भी जुड़े):

1. सांप्रदायिक एकता — हर धर्म के लोगों के बीच हृदय की एकता, केवल राजनीतिक समझौता नहीं।

2. अस्पृश्यता-निवारण — छुआछूत को हिंदू धर्म का कलंक मानकर उसे जड़ से मिटाना।

3. नशाबंदी — शराब और नशे पर रोक, जिससे ग़रीब परिवार बर्बाद होते थे।

4. खादी — हर घर में कताई-बुनाई, ताकि वस्त्र के लिए कोई विदेश पर निर्भर न रहे।

5. अन्य ग्रामोद्योग — तेल-घानी, हाथ-काग़ज़, गुड़, साबुन जैसे उद्योगों का पुनर्जीवन।

6. गाँव की सफ़ाई — गाँवों को स्वच्छ रखना, शौच और कचरे का उचित प्रबंध।

7. नई या बुनियादी तालीम — हस्तशिल्प के माध्यम से बच्चों की शिक्षा।

8. प्रौढ़ शिक्षा — बड़ों को साक्षर बनाना और उनमें राजनीतिक समझ जगाना।

9. स्त्रियों का उत्थान — स्त्रियों को पुरुषों के बराबर अधिकार और सम्मान।

10. आरोग्य और स्वास्थ्य-शिक्षा — स्वच्छता, संतुलित भोजन और रोगों से बचाव की जानकारी।

11. प्रांतीय भाषाएँ — शिक्षा और कामकाज मातृभाषा में।

12. राष्ट्रभाषा — पूरे देश को जोड़ने वाली भाषा के रूप में हिंदुस्तानी का प्रसार।

13. आर्थिक समानता — अमीर-ग़रीब की खाई कम करना; न्यासिता का सिद्धांत इसी का आधार था।

14. किसान — किसानों को संगठित करके उनके अधिकारों की रक्षा।

15. मज़दूर — मज़दूरों के अहिंसक संगठन, जैसे अहमदाबाद का मज़दूर महाजन संघ।

16. आदिवासी — आदिवासियों की सेवा और उन्हें राष्ट्रीय जीवन से जोड़ना।

17. कुष्ठ रोगी — समाज से बहिष्कृत कुष्ठ रोगियों की सेवा।

18. विद्यार्थी — विद्यार्थियों को अनुशासित, सेवाभावी और राष्ट्रनिष्ठ बनाना।

5.10 गांधीजी के अन्य विचार

◆ बुनियादी शिक्षा (नई तालीम) — 1937 में वर्धा में हुए शिक्षा सम्मेलन में गांधीजी की योजना रखी गई, जिसे वर्धा योजना कहा जाता है (डॉ. ज़ाकिर हुसैन की समिति ने इसका विस्तृत रूप तैयार किया)। इसके अनुसार 7 वर्ष की निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा मातृभाषा में हो और किसी हस्तशिल्प (कताई, बढ़ईगीरी, खेती) के माध्यम से दी जाए, ताकि बच्चा "हाथ, हृदय और मस्तिष्क" — तीनों से सीखे और स्कूल कुछ हद तक आत्मनिर्भर हो।

◆ धर्म — गांधीजी सर्वधर्म समभाव में विश्वास करते थे — सभी धर्म सत्य तक पहुँचने के अलग-अलग रास्ते हैं। वे कहते थे, "मैं हिंदू हूँ, मुसलमान हूँ, ईसाई हूँ, पारसी हूँ, यहूदी हूँ।" उनकी प्रार्थना सभाओं में गीता, क़ुरान और बाइबिल — सबके पाठ होते थे। वे धर्म के आधार पर राष्ट्र (दो-राष्ट्र सिद्धांत) के कट्टर विरोधी थे।

◆ जाति और अस्पृश्यता — गांधीजी ने अस्पृश्यता को हिंदू धर्म पर कलंक कहा और दलितों के लिए "हरिजन" (ईश्वर के जन) शब्द का प्रयोग किया। पर शुरू में वे वर्ण-व्यवस्था को जन्म पर आधारित ऊँच-नीच नहीं, बल्कि श्रम-विभाजन की व्यवस्था मानते थे — इसी बात पर आंबेडकर से उनका गहरा मतभेद था (खंड 11)। बाद के वर्षों में वे अंतरजातीय विवाहों का खुलकर समर्थन करने लगे।

◆ महिलाएँ — गांधीजी ने स्त्रियों को अहिंसा की सबसे बड़ी शक्ति कहा, क्योंकि सहनशीलता और त्याग में वे पुरुषों से आगे हैं। उनके आंदोलनों में पहली बार लाखों स्त्रियाँ घरों से निकलकर धरने, जुलूस और जेल तक पहुँचीं। उन्होंने बाल विवाह, पर्दा और दहेज का विरोध किया।

5.11 मूल्यांकन — योगदान और आलोचना

◆ जन-आंदोलन — गांधीजी का सबसे बड़ा योगदान यह था कि उन्होंने राष्ट्रीय आंदोलन को शिक्षित शहरी वर्ग से निकालकर किसानों, मज़दूरों, स्त्रियों और गाँवों तक पहुँचाया। उनकी सरल भाषा, वेशभूषा और जीवन ने आम आदमी को यह भरोसा दिया कि वह भी आज़ादी का सिपाही है।

◆ नैतिक शक्ति का हथियार — सत्याग्रह ने दिखाया कि निहत्थी जनता भी नैतिक शक्ति से साम्राज्य का मुक़ाबला कर सकती है। आगे चलकर अमेरिका में मार्टिन लूथर किंग जूनियर और दक्षिण अफ़्रीका में नेल्सन मंडेला ने इसी से प्रेरणा ली।

◆ संघर्ष-विराम-संघर्ष — इतिहासकारों ने गांधीजी की रणनीति को "संघर्ष-विराम-संघर्ष" कहा है — एक बड़े आंदोलन (संघर्ष) के बाद कुछ समय का विराम, जिसमें रचनात्मक कार्य से शक्ति जुटाई जाती थी, और फिर नया आंदोलन। इससे लंबे संघर्ष में जनता थकी नहीं।

◆ आंबेडकर की आलोचना — आंबेडकर का कहना था कि गांधीजी जाति-व्यवस्था की जड़ पर आघात नहीं करते, केवल अस्पृश्यता की ऊपरी बुराई दूर करना चाहते हैं; और पूना पैक्ट के समय अनशन के दबाव में दलितों को पृथक निर्वाचन छोड़ना पड़ा।

◆ क्रांतिकारियों और वामपंथियों की आलोचना — उन्होंने 1922 में आंदोलन अचानक वापस लेने, 1931 में भगत सिंह की फाँसी के प्रश्न पर गांधी-इरविन समझौते को न तोड़ने और पूँजीपतियों से निकटता की आलोचना की।

◆ टैगोर की आपत्तियाँ — टैगोर ने चरखे को सब समस्याओं का हल मानने, विदेशी वस्त्रों की होली जलाने और स्कूल-कॉलेजों के बहिष्कार पर आपत्ति की; उन्हें डर था कि इससे संकीर्ण राष्ट्रवाद और अंधभक्ति बढ़ेगी।

◆ अन्य आलोचनाएँ — ख़िलाफ़त जैसे धार्मिक मुद्दे को राजनीति से जोड़ने, जिससे आगे सांप्रदायिक राजनीति को बल मिला; और आधुनिक विज्ञान व बड़े उद्योगों के प्रति संदेह — इन बातों पर भी उनकी आलोचना हुई।

📋 दोहराव: योगदान और आलोचनाएँ

🌟 योगदान

✔ उन्होंने राष्ट्रीय आंदोलन को जन-आंदोलन बनाया, जिसमें किसान, मज़दूर, महिलाएँ और गाँव शामिल हुए।

✔ सत्याग्रह से नैतिक शक्ति द्वारा साम्राज्य का मुक़ाबला किया, जिससे मार्टिन लूथर किंग और मंडेला को प्रेरणा मिली।

✔ उन्होंने अस्पृश्यता-विरोध, सांप्रदायिक एकता और रचनात्मक कार्य को राजनीति से जोड़ा।

✔ "संघर्ष-विराम-संघर्ष" की रणनीति से लंबे संघर्ष में जनता को थकने नहीं दिया।

⚖️ आलोचनाएँ

✔ आंबेडकर के अनुसार वे जाति-व्यवस्था पर नरम थे और पूना पैक्ट में अनशन का दबाव डाला गया।

✔ क्रांतिकारी और वामपंथी 1922 में आंदोलन अचानक वापस लेने और पूँजीपतियों से निकटता के आलोचक थे।

✔ टैगोर को चरखे और विदेशी वस्त्र-दहन पर आपत्ति थी और संकीर्ण राष्ट्रवाद का ख़तरा दिखता था।

✔ ख़िलाफ़त जैसे धार्मिक मुद्दे से राजनीति जोड़ने और आधुनिक उद्योग के प्रति संदेह की भी आलोचना हुई।

गांधीजी स्वयं आलोचना से नहीं घबराते थे। उन्होंने कहा था कि उनके लेखों में यदि विरोधाभास दिखे तो बाद वाली बात को सही माना जाए, क्योंकि वे लगातार सीखते और बदलते रहे। उनके जीवन का सार उन्हीं के शब्दों में —

❝ मेरा जीवन ही मेरा संदेश है। ❞ (महात्मा गांधी)

6. जवाहरलाल नेहरू (1889–1964) — "आधुनिक भारत के निर्माता"

अगर गांधीजी राष्ट्रीय आंदोलन की आत्मा थे, तो नेहरू उसका आधुनिक मस्तिष्क थे। वे गांधीजी के सबसे प्रिय साथी होते हुए भी कई बातों में उनसे अलग सोचते थे — विज्ञान, समाजवाद, बड़े उद्योग और अंतरराष्ट्रीय राजनीति। स्वतंत्रता के बाद 17 वर्ष तक प्रधानमंत्री रहकर उन्होंने इन्हीं विचारों से आधुनिक भारत की नींव रखी।

📖 कहानी 2: प्रतापगढ़ के किसानों ने नेहरू को "असली भारत" दिखाया

जवाहरलाल नेहरू का बचपन और जवानी एक बहुत सफल वकील मोतीलाल नेहरू के घर में बीती। उन्होंने हैरो और कैम्ब्रिज में पढ़ाई की और 1912 में बैरिस्टर बनकर भारत लौटे। 1916 में लखनऊ अधिवेशन में उनकी पहली बार गांधीजी से भेंट हुई और वे होमरूल आंदोलन में सक्रिय हुए।

सब कुछ 1920 में बदला, जब वे प्रतापगढ़ और अवध के किसानों के बीच गए। उन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा कि फटे कपड़ों में, भूखे पर आशा-भरी आँखों वाले किसानों को देखकर उन्हें पहली बार असली भारत दिखा। इसके बाद वे असहयोग आंदोलन में पहली बार जेल गए। आगे के वर्षों में वे लगभग नौ बार जेल गए और कुल मिलाकर लगभग नौ वर्ष जेल में रहे।

नेहरू ने इन जेलों को लिखने की मेज़ बना लिया। बेटी इंदिरा को लिखे पत्र "ग्लिम्प्सेज़ ऑफ़ वर्ल्ड हिस्ट्री" बने, 1934–35 में जेल में "ऑटोबायोग्राफ़ी" लिखी गई, और 1942–45 में अहमदनगर क़िले में "द डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया"। इसमें उन्होंने भारत को एक ऐसी प्राचीन पांडुलिपि कहा, जिस पर एक के ऊपर एक अनेक परतें लिखी गई हैं, पर कोई भी पुरानी परत पूरी तरह मिटी नहीं।

आज़ादी के बाद प्रधानमंत्री बनकर नेहरू ने उसी किसान की ग़रीबी मिटाने के लिए योजना आयोग (1950) और पंचवर्षीय योजनाएँ शुरू कीं। वे कहते थे कि हर चीज़ प्रतीक्षा कर सकती है, पर खेती नहीं।

🧭 इस कहानी से कौन-सी अवधारणा साफ़ हुई

✔ ग़रीब से जुड़ाव और लोकतांत्रिक समाजवाद — नेहरू समाजवाद चाहते थे, पर हिंसा या तानाशाही से नहीं, बल्कि लोकतंत्र, संसद और क़ानून के रास्ते से।

✔ वैज्ञानिक दृष्टिकोण — विज्ञान की पढ़ाई ने नेहरू में तर्क और प्रमाण से सोचने की आदत पक्की की। उन्होंने "साइंटिफ़िक टेम्पर" शब्द को लोकप्रिय बनाया।

✔ विविधता में एकता — "द डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया" में उन्होंने दिखाया कि भारत की संस्कृति हज़ारों वर्षों से बहुत-सी परतों को साथ लेकर चलती आई है।

📝 परीक्षा के लिए: नेहरू: जन्म 14 नवंबर 1889, इलाहाबाद; प्रतापगढ़ के किसानों से भेंट (1920); पुस्तकें — ग्लिम्प्सेज़ ऑफ़ वर्ल्ड हिस्ट्री (1934), ऑटोबायोग्राफ़ी (1936), द डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया (1946, अहमदनगर क़िले में लिखी); योजना आयोग 1950; भारत रत्न 1955।

जन्म और शिक्षा

◆ जवाहरलाल नेहरू का जन्म 14 नवंबर 1889 को इलाहाबाद में हुआ। उनके पिता मोतीलाल नेहरू देश के सबसे सफल वकीलों में थे और माता स्वरूप रानी थीं। बच्चों से उनके स्नेह के कारण उन्हें "चाचा नेहरू" कहा गया और उनका जन्मदिन बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है।

◆ घर पर अंग्रेज़ शिक्षकों से पढ़ने के बाद वे इंग्लैंड के हैरो स्कूल और फिर ट्रिनिटी कॉलेज, कैम्ब्रिज गए, जहाँ उन्होंने प्राकृतिक विज्ञान पढ़ा। फिर लंदन के इनर टेम्पल से बैरिस्टर बनकर 1912 में भारत लौटे। विज्ञान की इसी पढ़ाई से उनमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण पक्का हुआ।

राजनीति में प्रवेश

◆ 1912 में उन्होंने कांग्रेस के बांकीपुर (पटना) अधिवेशन में प्रतिनिधि के रूप में भाग लिया। 1916 में लखनऊ अधिवेशन में उनकी पहली बार गांधीजी से भेंट हुई और वे होमरूल आंदोलन में सक्रिय हुए। उसी वर्ष कमला कौल से उनका विवाह हुआ।

◆ 1920 में प्रतापगढ़ और अवध के किसानों के बीच जाने से उनकी राजनीति की दिशा बदल गई। उन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा कि फटे कपड़ों में, भूखे पर आशा-भरी आँखों वाले किसानों को देखकर उन्हें पहली बार असली भारत दिखा। असहयोग आंदोलन में वे पहली बार जेल गए।

अंतरराष्ट्रीय और समाजवादी दृष्टि

◆ फ़रवरी 1927 में उन्होंने ब्रसेल्स (बेल्जियम) में उत्पीड़ित राष्ट्रों के सम्मेलन में कांग्रेस का प्रतिनिधित्व किया, जहाँ साम्राज्यवाद-विरोधी लीग बनी। नवंबर 1927 में वे पिता के साथ सोवियत संघ की क्रांति की दसवीं वर्षगाँठ पर गए और वहाँ की योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था से बहुत प्रभावित हुए।

◆ 1927 के मद्रास अधिवेशन में उन्होंने पूर्ण स्वतंत्रता का प्रस्ताव पास करवाया। 1928 में उन्होंने सुभाष बोस के साथ इंडिपेंडेंस फ़ॉर इंडिया लीग बनाई, क्योंकि वे नेहरू रिपोर्ट के "डोमिनियन स्टेटस" (अधिराज्य) से संतुष्ट नहीं थे। दिसंबर 1928 में कलकत्ता में हुई पहली अखिल भारतीय समाजवादी युवा कांग्रेस की अध्यक्षता भी उन्होंने की।

कांग्रेस अध्यक्ष और कारावास

◆ 1929 के लाहौर अधिवेशन में 40 वर्ष की आयु में वे कांग्रेस अध्यक्ष बने; इसी अधिवेशन में पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव पास हुआ और 31 दिसंबर 1929 की रात रावी के तट पर उन्होंने तिरंगा फहराया। इसके बाद वे 1936 (लखनऊ), दिसंबर 1936 (फ़ैज़पुर — पहला ग्रामीण अधिवेशन) और 1946 में अध्यक्ष बने; स्वतंत्रता के बाद 1951–54 में भी।

◆ 1929 में वे एटक (ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस) के नागपुर अधिवेशन के अध्यक्ष रहे। 1938 में कांग्रेस अध्यक्ष सुभाष बोस द्वारा बनाई गई राष्ट्रीय योजना समिति के वे अध्यक्ष बने। अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद के भी वे अध्यक्ष रहे (1939 और 1945–46)।

◆ स्वतंत्रता संग्राम में वे लगभग नौ बार जेल गए और कुल मिलाकर लगभग नौ वर्ष जेल में बिताए। उनकी सबसे लंबी क़ैद भारत छोड़ो आंदोलन (1942–45) के समय अहमदनगर क़िले में थी।

पुस्तकें — जेल में लिखा इतिहास

◆ "लेटर्स फ़्रॉम ए फ़ादर टू हिज़ डॉटर" (1929) — 1928 में बेटी इंदिरा को लिखे पत्र, जिनमें पृथ्वी, जीवन और मानव सभ्यता के आरंभ की कहानी सरल भाषा में है।

◆ "ग्लिम्प्सेज़ ऑफ़ वर्ल्ड हिस्ट्री" (1934) — 1930–33 में जेल से इंदिरा को लिखे लगभग 200 पत्र, जिनमें पूरी दुनिया का इतिहास है।

◆ "ऑटोबायोग्राफ़ी" (1936) — हिंदी में "मेरी कहानी"; 1934–35 में जेल में लिखी गई।

◆ "द डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया" (1946) — हिंदी में "भारत एक खोज"; 1942–45 में अहमदनगर क़िले की जेल में लिखी गई। इसमें उन्होंने भारत की "विविधता में एकता" और हज़ारों वर्षों की सांस्कृतिक निरंतरता का वर्णन किया और भारत को एक ऐसी प्राचीन पांडुलिपि कहा, जिस पर एक के ऊपर एक अनेक परतें लिखी गई हैं, पर कोई भी पुरानी परत पूरी तरह मिटी नहीं।

संविधान निर्माण और प्रधानमंत्री काल

◆ 2 सितंबर 1946 को बनी अंतरिम सरकार में वे उपाध्यक्ष (वास्तव में सरकार के प्रमुख) बने। 13 दिसंबर 1946 को उन्होंने संविधान सभा में उद्देश्य प्रस्ताव रखा, जो आगे चलकर संविधान की प्रस्तावना का आधार बना।

◆ 14–15 अगस्त 1947 की आधी रात को उन्होंने प्रसिद्ध भाषण "नियति से साक्षात्कार" दिया और 1947 से 27 मई 1964 (मृत्यु) तक भारत के पहले प्रधानमंत्री रहे। वे लोकसभा में फूलपुर (इलाहाबाद) का प्रतिनिधित्व करते थे।

◆ उनके काल में योजना आयोग (1950) और पंचवर्षीय योजनाएँ, बड़े सार्वजनिक उपक्रम (भिलाई, राउरकेला, दुर्गापुर इस्पात संयंत्र), आई.आई.टी., परमाणु ऊर्जा आयोग और अनेक वैज्ञानिक संस्थाएँ बनीं; चीन के साथ पंचशील (1954) समझौता हुआ और गुटनिरपेक्ष आंदोलन (पहला शिखर सम्मेलन बेलग्रेड, 1961) की नींव पड़ी (विस्तार अध्याय 18 में)। 1955 में उन्हें भारत रत्न मिला।

💭 नेहरू के विचार

◆ लोकतांत्रिक समाजवाद — नेहरू समाजवाद चाहते थे, पर सोवियत संघ की तरह हिंसा और तानाशाही से नहीं, बल्कि लोकतंत्र, संसद और क़ानून के रास्ते से। उनका लक्ष्य था — ग़रीबी, असमानता और शोषण का अंत, पर व्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करते हुए।

🔍 आसान परिभाषा: मिश्रित अर्थव्यवस्था

📘 परिभाषा: ऐसी अर्थव्यवस्था, जिसमें सार्वजनिक क्षेत्र (सरकार के स्वामित्व वाले उद्योग) और निजी क्षेत्र (व्यक्तियों और कंपनियों के उद्योग) — दोनों साथ-साथ काम करते हैं, और सरकार योजना बनाकर अर्थव्यवस्था की दिशा तय करती है।

💡 आसान भाषा में: न पूरी तरह पूँजीवाद (जहाँ सब कुछ बाज़ार और निजी मालिकों के हाथ में हो) और न पूरी तरह साम्यवाद (जहाँ सब कुछ सरकार के हाथ में हो) — बीच का रास्ता। 🏠 उदाहरण: स्वतंत्र भारत के औद्योगिक नीति प्रस्ताव (6 अप्रैल 1948) में पहली बार इसकी संकल्पना की गई और 1956 के प्रस्ताव में इसे और स्पष्ट किया गया — रेलवे, परमाणु ऊर्जा, भारी उद्योग सरकार के पास; कपड़ा, उपभोक्ता वस्तुएँ मुख्यतः निजी क्षेत्र के पास।

◆ धर्मनिरपेक्षता — नेहरू के अनुसार राज्य का कोई धर्म नहीं होगा; वह सब धर्मों से समान दूरी और समान सम्मान रखेगा, और नागरिकता धर्म पर आधारित नहीं होगी। विभाजन की हिंसा के बाद भी उन्होंने भारत को "हिंदू पाकिस्तान" बनने से रोकने पर ज़ोर दिया।

◆ वैज्ञानिक दृष्टिकोण (साइंटिफ़िक टेम्पर) — "साइंटिफ़िक टेम्पर" शब्द नेहरू ने ही लोकप्रिय बनाया। वे मानते थे कि अंधविश्वास और रूढ़ि छोड़कर तर्क, प्रयोग और प्रमाण से सोचने की आदत ही देश को आगे ले जाएगी। यह विचार आज संविधान के मूल कर्तव्यों (अनुच्छेद 51क) में शामिल है।

◆ योजनाबद्ध औद्योगीकरण — वे भारी उद्योग और बड़े बाँधों को विकास का आधार मानते थे और भाखड़ा-नांगल जैसे बाँधों को "आधुनिक भारत के मंदिर" कहते थे। साथ ही उन्होंने कहा था — "हर चीज़ प्रतीक्षा कर सकती है, पर खेती नहीं।"

◆ अंतरराष्ट्रीयतावाद — नेहरू साम्राज्यवाद और फ़ासीवाद दोनों के विरोधी थे और एशियाई एकता के समर्थक थे (मार्च 1947 में दिल्ली में एशियाई संबंध सम्मेलन)। शीतयुद्ध में उन्होंने किसी गुट में शामिल न होकर स्वतंत्र विदेश नीति — गुटनिरपेक्षता — अपनाई।

◆ नारा — स्वतंत्रता के बाद देश के पुनर्निर्माण के लिए उन्होंने नारा दिया — "आराम हराम है"।

📌 याद रखें — नेहरू

जन्म 14 नवंबर 1889, इलाहाबाद; लाहौर (1929) में पूर्ण स्वराज वाले अधिवेशन के अध्यक्ष; "द डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया" अहमदनगर क़िले में लिखी; उद्देश्य प्रस्ताव 13 दिसंबर 1946; पहले प्रधानमंत्री (1947–1964); भारत रत्न 1955; मृत्यु 27 मई 1964। उनके जीवनीकारों में फ़्रैंक मोरेस और सर्वपल्ली गोपाल प्रमुख हैं।

❝ बहुत वर्ष पहले हमने नियति से एक वादा किया था, और अब समय आ गया है कि हम अपनी प्रतिज्ञा पूरी करें... आधी रात के इस क्षण, जब दुनिया सो रही है, भारत जीवन और स्वतंत्रता के लिए जागेगा। ❞ (जवाहरलाल नेहरू, "नियति से साक्षात्कार", 14–15 अगस्त 1947)

7. सरदार पटेल, राजेंद्र प्रसाद, राजगोपालाचारी और मौलाना आज़ाद

नेहरू के साथ ये चार नेता कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के स्तंभ थे। चारों गांधीजी के निकट सहयोगी रहे, चारों ने लंबी जेलें काटीं, और चारों ने स्वतंत्र भारत के निर्माण में सर्वोच्च पद सँभाले — पटेल गृह मंत्री, राजेंद्र प्रसाद राष्ट्रपति, राजाजी गवर्नर जनरल और आज़ाद शिक्षा मंत्री।

7.1 🗿 सरदार वल्लभभाई पटेल (1875–1950) — "लौह पुरुष"

◆ जन्म और आरंभ — पटेल का जन्म 31 अक्टूबर 1875 को गुजरात के नडियाद में एक किसान परिवार में हुआ। उन्होंने स्वयं पैसे बचाकर इंग्लैंड में बैरिस्टरी पढ़ी और अहमदाबाद के सबसे सफल फ़ौजदारी वकीलों में गिने जाने लगे। शुरू में वे गांधीजी के विचारों का मज़ाक़ उड़ाते थे, पर चंपारण की सफलता ने उन्हें प्रभावित किया।

◆ किसान नेता — 1918 के खेड़ा सत्याग्रह में वे गांधीजी के प्रमुख सहयोगी बने और वकालत छोड़ दी। 1923 में उन्होंने नागपुर का झंडा सत्याग्रह और गुजरात का बोरसद सत्याग्रह (डाकुओं से सुरक्षा के नाम पर लगाए गए "दंडात्मक कर" के विरुद्ध) सफलतापूर्वक चलाया।

◆ बारडोली सत्याग्रह (1928) और "सरदार" उपाधि — 1928 में सूरत ज़िले के बारडोली तालुका में लगान लगभग 22% बढ़ा दिया गया। पटेल के नेतृत्व में किसानों ने लगान देना बंद कर दिया; ज़मीन-मवेशी ज़ब्त होने पर भी वे डटे रहे। अंततः सरकार को मैक्सवेल-ब्रूमफ़ील्ड जाँच बैठानी पड़ी, जिसने वृद्धि को अनुचित माना और उसे घटाकर लगभग 6% किया गया। इस जीत के बाद बारडोली की महिलाओं ने उन्हें "सरदार" (नेता) कहा।

◆ कांग्रेस संगठन — वे मार्च 1931 के कराची अधिवेशन के अध्यक्ष बने, जिसमें मौलिक अधिकारों और आर्थिक कार्यक्रम का प्रस्ताव पास हुआ और गांधी-इरविन समझौते का अनुमोदन हुआ। 1937 के चुनावों में कांग्रेस के संसदीय बोर्ड के प्रमुख के रूप में उन्होंने प्रांतीय मंत्रिमंडलों पर नियंत्रण रखा। वे कांग्रेस के सबसे कुशल संगठनकर्ता थे और भारत छोड़ो आंदोलन में जेल गए।

◆ रियासतों का एकीकरण — स्वतंत्र भारत के पहले उप-प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के रूप में उन्होंने रियासती विभाग (सचिव वी. पी. मेनन) के माध्यम से 560 से अधिक रियासतों को भारत में मिलाया। अधिकांश रियासतें विलय पत्र पर हस्ताक्षर से जुड़ीं, जबकि जूनागढ़ (जनमत संग्रह, 1948) और हैदराबाद ("ऑपरेशन पोलो", सितंबर 1948) के लिए कठोर क़दम उठाने पड़े (विस्तार अध्याय 17 में)। इसी अभूतपूर्व कार्य के कारण उन्हें "लौह पुरुष" और जर्मनी के एकीकरणकर्ता की तरह "भारत का बिस्मार्क" कहा गया।

◆ सिविल सेवाओं के संरक्षक — संविधान सभा में उन्होंने अखिल भारतीय सेवाओं (आई.ए.एस., आई.पी.एस.) को बनाए रखने का ज़ोरदार समर्थन किया और उन्हें देश का "स्टील फ़्रेम" (इस्पाती ढाँचा) कहा। 21 अप्रैल 1947 को दिल्ली में प्रशिक्षु अधिकारियों को दिए उनके भाषण की स्मृति में यह दिन सिविल सेवा दिवस के रूप में मनाया जाता है। संविधान सभा में वे मौलिक अधिकारों, अल्पसंख्यकों और जनजातीय क्षेत्रों संबंधी सलाहकार समिति के अध्यक्ष भी थे।

◆ निधन और सम्मान — 15 दिसंबर 1950 को बम्बई में उनका निधन हुआ। उन्हें 1991 में मरणोपरांत भारत रत्न मिला। उनका जन्मदिन 31 अक्टूबर राष्ट्रीय एकता दिवस है, और गुजरात के केवड़िया में नर्मदा तट पर 2018 में बनी उनकी "स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी" (182 मीटर) विश्व की सबसे ऊँची प्रतिमा है।

7.2 🏛️ डॉ. राजेंद्र प्रसाद (1884–1963) — पहले राष्ट्रपति

◆ जन्म और मेधा — राजेंद्र प्रसाद का जन्म 3 दिसंबर 1884 को बिहार के सीवान ज़िले के ज़ीरादेई गाँव में हुआ। वे असाधारण मेधावी छात्र थे — कलकत्ता विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा में प्रथम आए। कहा जाता है कि एक परीक्षक ने उनकी उत्तर-पुस्तिका पर लिखा — "परीक्षार्थी परीक्षक से बेहतर है।" वे क़ानून में स्नातकोत्तर और डॉक्टरेट थे और पटना में सफल वकालत करते थे।

◆ चंपारण और गांधीजी — 1917 के चंपारण सत्याग्रह में वे गांधीजी के प्रमुख सहयोगी बने और किसानों के बयान दर्ज करने का काम सँभाला। इसके बाद उन्होंने वकालत छोड़ दी, असहयोग में भाग लिया और बिहार विद्यापीठ की स्थापना में भूमिका निभाई। 1934 के बिहार भूकंप में राहत कार्य का नेतृत्व किया।

◆ कांग्रेस अध्यक्ष — तीन बार — वे 1934 (बम्बई) में अध्यक्ष बने; 1939 में सुभाष बोस के त्यागपत्र के बाद फिर अध्यक्ष बने; और 1947 में आचार्य कृपलानी के त्यागपत्र के बाद तीसरी बार।

◆ संविधान सभा और राष्ट्रपति पद — 1946 की अंतरिम सरकार में वे खाद्य और कृषि मंत्री बने। 11 दिसंबर 1946 को वे संविधान सभा के स्थायी अध्यक्ष चुने गए। 26 जनवरी 1950 को वे भारत के पहले राष्ट्रपति बने और 1952 तथा 1957 में चुने जाकर 1962 तक इस पद पर रहे — दो बार राष्ट्रपति बनने वाले वे एकमात्र व्यक्ति हैं।

◆ पुस्तकें, सम्मान और निधन — उनकी पुस्तकें "इंडिया डिवाइडेड" (विभाजन के तर्कों का खंडन), "आत्मकथा" (हिंदी में) और "बापू के क़दमों में" हैं। उन्हें 1962 में भारत रत्न मिला और 28 फ़रवरी 1963 को पटना के सदाक़त आश्रम में उनका निधन हुआ। सादगी के कारण लोग उन्हें "राजेंद्र बाबू" और "देशरत्न" कहते थे।

7.3 🧂 चक्रवर्ती राजगोपालाचारी (1878–1972) — "राजाजी"

◆ परिचय — राजगोपालाचारी का जन्म 10 दिसंबर 1878 को तमिलनाडु के थोरापल्ली गाँव में हुआ। वे सेलम में सफल वकील थे और गांधीजी के सबसे तीक्ष्ण बुद्धि वाले सहयोगियों में गिने जाते थे; उनकी बेटी लक्ष्मी का विवाह गांधीजी के पुत्र देवदास से हुआ। गांधीजी उन्हें अपनी "अंतरात्मा का रक्षक" कहते थे।

◆ वेदारण्यम नमक सत्याग्रह (1930) — गांधीजी की दांडी यात्रा के साथ ही उन्होंने अप्रैल 1930 में त्रिचनापल्ली से वेदारण्यम (तंजौर तट) तक पैदल यात्रा करके नमक क़ानून तोड़ा — इससे दक्षिण भारत में सविनय अवज्ञा फैली।

◆ मद्रास के प्रधानमंत्री (1937–39) — 1937 के चुनावों के बाद वे मद्रास प्रांत के प्रधानमंत्री (मुख्यमंत्री) बने; उन्होंने नशाबंदी, मंदिर-प्रवेश और किसानों के कर्ज़-राहत क़ानून बनाए, पर स्कूलों में हिंदी अनिवार्य करने पर विरोध भी झेला।

◆ सी. आर. फ़ॉर्मूला (1944) — भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध करके वे कुछ समय कांग्रेस से अलग रहे। 1944 में उन्होंने कांग्रेस-लीग गतिरोध तोड़ने के लिए "सी. आर. फ़ॉर्मूला" रखा — युद्ध के बाद मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों में जनमत संग्रह करके अलग होने का विकल्प, पर रक्षा, संचार जैसे विषय साझे रहें। इसी आधार पर गांधी-जिन्ना वार्ता (सितंबर 1944) हुई, पर जिन्ना ने इसे "कटा-छँटा पाकिस्तान" कहकर अस्वीकार कर दिया।

◆ स्वतंत्र भारत में — वे 1947–48 में पश्चिम बंगाल के राज्यपाल रहे और 21 जून 1948 से 26 जनवरी 1950 तक स्वतंत्र भारत के पहले और अंतिम भारतीय गवर्नर जनरल बने (माउंटबेटन के बाद)। फिर केंद्रीय गृह मंत्री और 1952–54 में मद्रास के मुख्यमंत्री रहे। 1959 में नेहरू की समाजवादी नीतियों ("लाइसेंस-परमिट राज") के विरोध में उन्होंने स्वतंत्र पार्टी बनाई।

◆ लेखन और सम्मान — उन्होंने रामायण ("चक्रवर्ती तिरुमगन") और महाभारत का सरल पुनर्कथन लिखा, जो आज भी लोकप्रिय है। 1954 में उन्हें भारत रत्न मिला — वे पहले तीन प्राप्तकर्ताओं (राजाजी, सर्वपल्ली राधाकृष्णन, सी. वी. रमन) में थे। 25 दिसंबर 1972 को उनका निधन हुआ।

7.4 📖 मौलाना अबुल कलाम आज़ाद (1888–1958) — पहले शिक्षा मंत्री

◆ जन्म और शिक्षा — मौलाना आज़ाद (मूल नाम मोहिउद्दीन अहमद) का जन्म 11 नवंबर 1888 को मक्का (अरब) में हुआ; परिवार बाद में कलकत्ता आ गया। उन्होंने पारंपरिक इस्लामी शिक्षा घर पर ही पाई और अरबी, फ़ारसी, उर्दू के गहरे विद्वान बने। "आज़ाद" उनका उपनाम (तख़ल्लुस) था। युवावस्था में वे बंगाल के क्रांतिकारियों के संपर्क में भी रहे।

◆ पत्रकारिता — 1912 में उन्होंने कलकत्ता से उर्दू साप्ताहिक "अल-हिलाल" निकाला, जिसने मुसलमानों को अलीगढ़ की ब्रिटिश-भक्त राजनीति से हटाकर राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ने का काम किया। 1914 में इस पर प्रतिबंध लगने के बाद उन्होंने 1915 में "अल-बलाग़" शुरू किया। 1916 से 1920 तक उन्हें राँची में नज़रबंद रखा गया।

◆ ख़िलाफ़त और कांग्रेस — वे ख़िलाफ़त और असहयोग आंदोलनों के प्रमुख नेता बने। सितंबर 1923 में दिल्ली के विशेष अधिवेशन के अध्यक्ष बने — केवल 35 वर्ष की आयु में, कांग्रेस के सबसे युवा अध्यक्ष। फिर 1940 (रामगढ़) से 1946 तक लगातार अध्यक्ष रहे — यानी भारत छोड़ो आंदोलन, शिमला सम्मेलन और कैबिनेट मिशन से वार्ता के समय कांग्रेस का नेतृत्व उन्हीं के हाथ में था। उन्होंने जीवन भर विभाजन और दो-राष्ट्र सिद्धांत का विरोध किया और राष्ट्रवादी मुसलमानों के सबसे बड़े प्रतीक बने।

◆ पहले शिक्षा मंत्री (1947–1958) — स्वतंत्र भारत के पहले शिक्षा मंत्री के रूप में उन्होंने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यू.जी.सी.), पहला आई.आई.टी. (खड़गपुर, 1951), साहित्य अकादमी, संगीत नाटक अकादमी, ललित कला अकादमी और भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद जैसी संस्थाएँ बनवाईं। उन्होंने 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा तथा प्रौढ़ शिक्षा पर ज़ोर दिया। उनका जन्मदिन 11 नवंबर राष्ट्रीय शिक्षा दिवस है।

◆ पुस्तकें और सम्मान — उनकी प्रसिद्ध पुस्तकें हैं — "इंडिया विन्स फ़्रीडम" (आत्मकथात्मक विवरण, 1959 में प्रकाशित), "ग़ुबार-ए-ख़ातिर" (अहमदनगर क़िले की जेल से लिखे पत्र) और "तर्जुमान-उल-क़ुरान" (क़ुरान का उर्दू अनुवाद और व्याख्या)। 22 फ़रवरी 1958 को उनका निधन हुआ और 1992 में उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न दिया गया।

📋 दोहराव तालिका: चार स्तंभ

नेता

सबसे महत्त्वपूर्ण तथ्य

सरदार पटेल (1875–1950)

बारडोली (1928) की जीत पर "सरदार" कहलाए, कराची (1931) के अध्यक्ष रहे और 560 से अधिक रियासतों का एकीकरण किया; भारत रत्न 1991 में मिला।

राजेंद्र प्रसाद (1884–1963)

चंपारण में गांधीजी के सहयोगी, संविधान सभा के अध्यक्ष और 1950–1962 तक पहले राष्ट्रपति रहे; भारत रत्न 1962 में मिला।

राजगोपालाचारी (1878–1972)

वेदारण्यम नमक सत्याग्रह (1930) और सी. आर. फ़ॉर्मूला (1944) के लिए प्रसिद्ध हैं; एकमात्र भारतीय गवर्नर जनरल बने और 1959 में स्वतंत्र पार्टी बनाई।

मौलाना आज़ाद (1888–1958)

अल-हिलाल (1912) निकाला, 1923 में सबसे युवा अध्यक्ष और 1940–46 तक लगातार अध्यक्ष रहे; पहले शिक्षा मंत्री बने और भारत रत्न 1992 में मिला।

8. सुभाष चंद्र बोस और क्रांतिकारी व्यक्तित्व

गांधीजी के अहिंसक जन-आंदोलन के साथ-साथ राष्ट्रीय आंदोलन की एक दूसरी धारा भी लगातार बहती रही — क्रांतिकारी धारा। इस धारा के लोग मानते थे कि अंग्रेज़ी राज केवल प्रार्थना और सत्याग्रह से नहीं जाएगा, उसे बल से हिलाना पड़ेगा। इन क्रांतिकारियों की संख्या कम थी, पर इनके साहस और बलिदान ने पूरे देश के युवाओं में आज़ादी की आग जलाई। इस खंड में पहले सुभाष चंद्र बोस का जीवन पढ़ेंगे और फिर दस क्रांतिकारी व्यक्तित्वों का परिचय। आंदोलनों का घटना-क्रम अध्याय 11 और 13 में है; यहाँ ध्यान व्यक्ति पर है।

8.1 🎖️ सुभाष चंद्र बोस (1897–1945) — "नेताजी"

◆ जन्म और शिक्षा — सुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 को उड़ीसा के कटक में हुआ। उनके पिता जानकीनाथ बोस कटक के प्रसिद्ध वकील थे। सुभाष बचपन से ही स्वामी विवेकानंद के विचारों से बहुत प्रभावित थे। उन्होंने कलकत्ता में दर्शनशास्त्र की पढ़ाई की और फिर इंग्लैंड के कैम्ब्रिज गए।

◆ आई.सी.एस. से त्यागपत्र (1921) — 1920 में उन्होंने भारतीय सिविल सेवा (आई.सी.एस.) की परीक्षा चौथे स्थान के साथ पास की। यह उस समय किसी भारतीय के लिए सबसे ऊँची नौकरी थी। पर सुभाष का मानना था कि विदेशी सरकार की सेवा और देश की सेवा साथ-साथ नहीं हो सकती। इसलिए उन्होंने 1921 में इस नौकरी से त्यागपत्र दे दिया और भारत लौट आए।

◆ राजनीतिक गुरु चित्तरंजन दास — भारत लौटकर वे बम्बई में गांधीजी से मिले, जिन्होंने उन्हें बंगाल के नेता देशबंधु चित्तरंजन दास के पास भेजा। दास ही उनके राजनीतिक गुरु बने। जब 1924 में दास कलकत्ता के मेयर बने तो सुभाष कलकत्ता निगम के मुख्य कार्यकारी अधिकारी बनाए गए। उसी वर्ष अंग्रेज़ सरकार ने उन्हें गिरफ़्तार करके बर्मा की मांडले जेल भेज दिया, जहाँ वे 1927 तक रहे। 1930 में वे स्वयं कलकत्ता के मेयर चुने गए।

◆ युवा नेता और पूर्ण स्वराज की माँग — 1928 में जब नेहरू रिपोर्ट ने "डोमिनियन स्टेटस" (अधिराज्य का दर्जा) माँगा, तब सुभाष और जवाहरलाल नेहरू ने इसे कम माना और पूर्ण स्वतंत्रता की माँग के लिए "इंडिपेंडेंस फ़ॉर इंडिया लीग" बनाई। इस तरह वे कांग्रेस के भीतर युवा और वामपंथी धारा के नेता बन गए। 1933 से 1936 तक वे इलाज के लिए यूरोप में रहे और वहीं उन्होंने अपनी पुस्तक "द इंडियन स्ट्रगल" लिखी, जिसमें 1920 से 1934 तक के राष्ट्रीय आंदोलन का वर्णन है।

◆ हरिपुरा अधिवेशन (1938) — फ़रवरी 1938 में गुजरात के हरिपुरा में वे कांग्रेस के अध्यक्ष बने। उनका मानना था कि आज़ाद भारत की ग़रीबी केवल योजनाबद्ध औद्योगीकरण से मिटेगी। इसलिए उन्होंने राष्ट्रीय योजना समिति बनवाई, जिसके अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू बनाए गए। आगे चलकर स्वतंत्र भारत का योजना आयोग इसी सोच से निकला।

◆ त्रिपुरी संकट (1939) — 1939 में सुभाष दोबारा अध्यक्ष बनना चाहते थे, जबकि गांधीजी पट्टाभि सीतारमैया को चाहते थे। चुनाव हुआ और सुभाष 1580 के मुक़ाबले 1377 मतों से जीत गए। गांधीजी ने कहा — "पट्टाभि की हार मेरी हार है।" इसके बाद कार्यसमिति के अधिकतर सदस्यों ने सुभाष के साथ काम करने से मना कर दिया। परिणाम यह हुआ कि सुभाष ने अप्रैल 1939 में अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे दिया और उनकी जगह डॉ. राजेंद्र प्रसाद अध्यक्ष बने।

◆ फ़ॉरवर्ड ब्लॉक (मई 1939) — त्यागपत्र के बाद उन्होंने कांग्रेस के भीतर ही "फ़ॉरवर्ड ब्लॉक" नाम का दल बनाया, ताकि सभी वामपंथी और उग्र विचार वाले लोग एक मंच पर आ सकें। उनका मुख्य मतभेद यह था कि दूसरा विश्वयुद्ध भारत के लिए सुनहरा अवसर है — ब्रिटेन संकट में है, इसलिए अभी निर्णायक संघर्ष छेड़ देना चाहिए।

◆ महानिष्क्रमण (जनवरी 1941) — 1940 में सरकार ने उन्हें गिरफ़्तार किया और फिर कलकत्ता में उनके घर में नज़रबंद कर दिया। 16–17 जनवरी 1941 की रात वे वेश बदलकर "ज़ियाउद्दीन" नाम से घर से निकल गए। वे पेशावर और काबुल होते हुए रूस के रास्ते जर्मनी की राजधानी बर्लिन पहुँचे। इस साहसिक पलायन को "महानिष्क्रमण" कहा जाता है।

◆ जर्मनी में — बर्लिन में उन्होंने "फ़्री इंडिया सेंटर" बनाया और जर्मनी के क़ब्ज़े में आए भारतीय युद्धबंदियों को लेकर एक भारतीय सैन्य दल तैयार किया। आज़ाद हिंद रेडियो से वे भारतवासियों को संबोधित करते थे। जर्मनी में ही भारतीय सैनिकों ने उन्हें पहली बार "नेताजी" कहा और यहीं "जय हिंद" का अभिवादन अपनाया गया।

◆ पूर्वी एशिया और आज़ाद हिंद फ़ौज — 1943 की शुरुआत में वे पनडुब्बी से लंबी और ख़तरनाक यात्रा करके पूर्वी एशिया पहुँचे। यहाँ ध्यान रखें कि आज़ाद हिंद फ़ौज का पहला गठन 1942 में कैप्टन मोहन सिंह ने किया था, जो जापान के हाथों बंदी बने भारतीय सैनिकों से बनी थी। जापान में रह रहे पुराने क्रांतिकारी रासबिहारी बोस "इंडियन इंडिपेंडेंस लीग" चला रहे थे। जुलाई 1943 में सिंगापुर में रासबिहारी बोस ने लीग और फ़ौज का नेतृत्व सुभाष को सौंप दिया। यानी सुभाष ने फ़ौज की स्थापना नहीं की, बल्कि उसका पुनर्गठन करके उसे नई जान दी।

◆ आज़ाद हिंद सरकार (21 अक्टूबर 1943) — सिंगापुर में सुभाष ने "स्वतंत्र भारत की अस्थायी सरकार" बनाई, जिसे जापान और जर्मनी सहित कई देशों ने मान्यता दी। फ़ौज की टुकड़ियों के नाम गांधी, नेहरू, आज़ाद और सुभाष ब्रिगेड रखे गए। महिलाओं की "रानी झाँसी रेजिमेंट" बनी, जिसकी कमान कैप्टन लक्ष्मी स्वामीनाथन (बाद में लक्ष्मी सहगल) के हाथ में थी। जापान ने अंडमान और निकोबार द्वीप इस सरकार को सौंपे, जिनका नाम सुभाष ने "शहीद द्वीप" और "स्वराज द्वीप" रखा।

◆ "दिल्ली चलो" और अंत — 1944 में आज़ाद हिंद फ़ौज जापानी सेना के साथ बर्मा के रास्ते भारत की सीमा में घुसी और इंफाल-कोहिमा तक पहुँची; मणिपुर के मोइरांग में तिरंगा फहराया गया। इसी समय उन्होंने "तुम मुझे ख़ून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा" का नारा दिया। पर भारी वर्षा, रसद की कमी और जापान की हार के कारण फ़ौज को पीछे हटना पड़ा। 18 अगस्त 1945 को ताइवान के ताइहोकू में एक विमान दुर्घटना में उनके निधन की सूचना मिली।

◆ विचार — सुभाष समाजवाद, तेज़ औद्योगीकरण और योजना के पक्षधर थे। वे अनुशासित और मज़बूत राष्ट्र चाहते थे। उनकी फ़ौज में हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई सैनिक एक साथ एक ही रसोई में खाते थे, जो धर्मनिरपेक्ष एकता का जीवंत उदाहरण था।

◆ उपाधियाँ और सम्मान — रवींद्रनाथ टैगोर ने उन्हें "देशनायक" कहा। गांधीजी से गहरे मतभेद के बावजूद सुभाष ने 6 जुलाई 1944 को रंगून रेडियो से गांधीजी को पहली बार "राष्ट्रपिता" कहकर आशीर्वाद माँगा। उनका जन्मदिन 23 जनवरी अब "पराक्रम दिवस" के रूप में मनाया जाता है।

🔍 आसान परिभाषा: अस्थायी सरकार (प्रोविज़नल गवर्नमेंट)

📘 परिभाषा: ऐसी सरकार जो किसी देश के पूरी तरह स्वतंत्र होने से पहले, उसकी ओर से काम करने के लिए अस्थायी रूप से बनाई जाती है और अक्सर देश के बाहर से चलती है।

💡 आसान भाषा में: जब अपना देश अभी ग़ुलाम हो और उसके नेता विदेश में बैठकर एक "अपनी सरकार" की घोषणा कर दें, ताकि दूसरे देश उन्हें भारत का असली प्रतिनिधि मानें। 🏠 उदाहरण: 21 अक्टूबर 1943 को सुभाष चंद्र बोस ने सिंगापुर में आज़ाद हिंद सरकार बनाई। इससे पहले 1915 में राजा महेंद्र प्रताप ने काबुल में भारत की पहली अस्थायी सरकार बनाई थी।

अब उन क्रांतिकारियों को जानें जिन्होंने देश के भीतर और विदेशों में रहकर अंग्रेज़ी राज को चुनौती दी।

8.2 🔥 भगत सिंह (1907–1931) — "शहीद-ए-आज़म"

◆ जन्म और परिवार — भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर 1907 को पंजाब के लायलपुर ज़िले के बंगा गाँव में हुआ, जो अब पाकिस्तान में है। उनका परिवार ही देशभक्तों का था — पिता किशन सिंह और चाचा अजीत सिंह दोनों आंदोलनकारी थे। बचपन में ही जलियाँवाला बाग़ हत्याकांड (1919) ने उनके मन पर गहरी छाप छोड़ी। उन्होंने लाहौर के नेशनल कॉलेज में पढ़ाई की।

◆ संगठन — 1926 में उन्होंने लाहौर में "नौजवान भारत सभा" बनाई, जिसका काम युवाओं, किसानों और मज़दूरों में जागृति फैलाना था। सितंबर 1928 में दिल्ली के फ़िरोज़शाह कोटला के खंडहरों में हुई बैठक में पुराने संगठन का नाम बदलकर "हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन" रखा गया। नाम में "सोशलिस्ट" (समाजवादी) शब्द भगत सिंह के ही आग्रह पर जुड़ा, क्योंकि वे केवल अंग्रेज़ों को हटाना नहीं, बल्कि शोषण-मुक्त समाज बनाना चाहते थे।

◆ सांडर्स की हत्या (17 दिसंबर 1928) — साइमन कमीशन के विरोध में लाहौर में हुए प्रदर्शन पर पुलिस ने लाठियाँ चलाईं, जिसमें लाला लाजपत राय घायल हुए और कुछ दिन बाद उनका निधन हो गया। इसका बदला लेने के लिए भगत सिंह, राजगुरु और चंद्रशेखर आज़ाद ने लाहौर में पुलिस अधिकारी सांडर्स को गोली मार दी।

◆ केंद्रीय असेंबली में बम (8 अप्रैल 1929) — भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने दिल्ली की केंद्रीय असेंबली में दो बम फेंके। ये बम जानबूझकर ख़ाली जगह पर फेंके गए ताकि कोई मरे नहीं। उनका उद्देश्य दो दमनकारी विधेयकों — सार्वजनिक सुरक्षा विधेयक और व्यापार विवाद विधेयक — का विरोध करना था। उनके पर्चे में लिखा था कि "बहरों को सुनाने के लिए ऊँची आवाज़ की ज़रूरत होती है।" दोनों भागे नहीं, बल्कि "इंक़लाब ज़िंदाबाद" के नारे लगाते हुए स्वयं गिरफ़्तार हो गए, ताकि अदालत को अपने विचार फैलाने का मंच बना सकें।

◆ जेल में भूख हड़ताल — जेल में उन्होंने राजनीतिक क़ैदियों के साथ बेहतर व्यवहार की माँग पर लंबी भूख हड़ताल की। इसी हड़ताल में उनके साथी जतिन दास का 63 दिन के उपवास के बाद निधन हो गया, जिससे पूरा देश हिल गया।

◆ फाँसी (23 मार्च 1931) — लाहौर षड्यंत्र मुक़दमे में भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फाँसी की सज़ा हुई। 23 मार्च 1931 की शाम लाहौर सेंट्रल जेल में तीनों को फाँसी दे दी गई। उस समय भगत सिंह की उम्र केवल 23 वर्ष थी। यह दिन "शहीद दिवस" के रूप में मनाया जाता है।

◆ विचार और लेखन — भगत सिंह केवल बंदूक़ उठाने वाले युवा नहीं थे, वे गहरे पढ़ने-लिखने वाले विचारक थे। जेल में उन्होंने प्रसिद्ध निबंध "मैं नास्तिक क्यों हूँ" लिखा। उनका कहना था कि "क्रांति की तलवार विचारों की सान पर तेज़ होती है", यानी क्रांति का अर्थ ख़ून-ख़राबा नहीं, बल्कि अन्याय पर टिकी व्यवस्था को बदलना है। "इंक़लाब ज़िंदाबाद" का नारा मौलाना हसरत मोहानी ने गढ़ा था, पर उसे घर-घर तक भगत सिंह ने पहुँचाया।

8.3 🎯 चंद्रशेखर आज़ाद (1906–1931)

◆ जन्म — चंद्रशेखर आज़ाद का जन्म 23 जुलाई 1906 को मध्य प्रदेश के भाबरा गाँव में हुआ। उनका मूल नाम चंद्रशेखर तिवारी था।

◆ "आज़ाद" नाम कैसे पड़ा — असहयोग आंदोलन के समय वे लगभग पंद्रह वर्ष की उम्र में बनारस में गिरफ़्तार हुए। अदालत में जब उनसे नाम पूछा गया तो उन्होंने कहा — नाम "आज़ाद", पिता का नाम "स्वतंत्रता" और घर "जेलख़ाना"। उन्हें पंद्रह बेंतों की सज़ा मिली और हर बेंत पर वे "भारत माता की जय" बोलते रहे। तभी से वे "आज़ाद" कहलाए।

◆ क्रांतिकारी जीवन — असहयोग आंदोलन के अचानक वापस लिए जाने से निराश होकर वे क्रांतिकारी दल में शामिल हो गए। उन्होंने काकोरी कांड (1925) में भाग लिया और पुलिस के हाथ कभी नहीं आए। 1928 में नया संगठन बनने पर वे उसकी सैनिक शाखा के सेनापति (कमांडर-इन-चीफ़) बने और सांडर्स की हत्या की योजना में शामिल रहे।

◆ बलिदान (27 फ़रवरी 1931) — इलाहाबाद के अल्फ़्रेड पार्क में पुलिस ने उन्हें घेर लिया। वे अकेले देर तक लड़ते रहे और जब केवल एक गोली बची तो उन्होंने वह स्वयं को मार ली, क्योंकि उनका प्रण था कि वे जीवित अंग्रेज़ों के हाथ नहीं आएँगे। आज वह पार्क "चंद्रशेखर आज़ाद पार्क" कहलाता है।

8.4 📜 विनायक दामोदर सावरकर (1883–1966)

◆ जन्म और आरंभिक संगठन — सावरकर का जन्म 28 मई 1883 को महाराष्ट्र के नासिक के पास भगूर गाँव में हुआ। उन्होंने 1899 में "मित्र मेला" नाम का गुप्त संगठन बनाया, जो 1904 में "अभिनव भारत" बन गया। यह नाम इटली के क्रांतिकारी मैज़िनी के संगठन "यंग इटली" से प्रेरित था।

◆ लंदन में — 1906 में वे श्यामजी कृष्ण वर्मा की छात्रवृत्ति पर क़ानून पढ़ने लंदन गए और इंडिया हाउस में रहकर क्रांतिकारी गतिविधियाँ चलाईं। वहीं उन्होंने "फ़्री इंडिया सोसाइटी" बनाई। 1909 में उनकी पुस्तक "1857 का स्वातंत्र्य समर" आई, जिसमें उन्होंने 1857 के विद्रोह को पहली बार "भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम" कहा। अंग्रेज़ सरकार ने इस पुस्तक पर छपने से पहले ही प्रतिबंध लगा दिया।

◆ गिरफ़्तारी और काला पानी — 1910 में उन्हें लंदन में गिरफ़्तार किया गया। भारत लाते समय फ़्रांस के मार्सेई बंदरगाह पर उन्होंने जहाज़ से समुद्र में कूदकर भागने की कोशिश की, पर पकड़े गए। उन्हें दो आजीवन कारावास (कुल पचास वर्ष) की सज़ा हुई और वे 1911 से 1921 तक अंडमान की सेलुलर जेल में रहे। बाद में उन्हें रत्नागिरी में रखा गया, जहाँ से निकलने की उन्हें 1937 तक अनुमति नहीं थी।

◆ "हिंदुत्व" और हिंदू महासभा — 1923 में उन्होंने "हिंदुत्व" नाम की पुस्तक लिखी। वे 1937 से 1943 तक हिंदू महासभा के अध्यक्ष रहे। यहाँ एक आम भूल से बचें — सावरकर हिंदू महासभा के संस्थापक नहीं थे; यह संगठन 1915 में मदन मोहन मालवीय जैसे नेताओं के प्रयास से बन चुका था। रत्नागिरी में रहते हुए उन्होंने छुआछूत के विरुद्ध और सहभोज तथा मंदिर-प्रवेश के पक्ष में भी काम किया। 26 फ़रवरी 1966 को बम्बई में उनका निधन हुआ।

8.5 🚂 रामप्रसाद बिस्मिल और अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ

◆ परिचय — रामप्रसाद बिस्मिल (जन्म 1897) और अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ (जन्म 1900) दोनों उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर के रहने वाले थे और गहरे मित्र थे। बिस्मिल कवि भी थे; "बिस्मिल" उनका उपनाम था। 1924 में कानपुर में शचींद्रनाथ सान्याल और बिस्मिल जैसे क्रांतिकारियों ने "हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन" बनाई।

◆ काकोरी कांड (9 अगस्त 1925) — संगठन को हथियारों के लिए धन चाहिए था। इसलिए बिस्मिल के नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने लखनऊ के पास काकोरी में एक रेलगाड़ी रोककर सरकारी ख़ज़ाना लूट लिया। उनका तर्क था कि यह जनता का नहीं, सरकार का धन है।

◆ फाँसी (दिसंबर 1927) — काकोरी मुक़दमे में चार क्रांतिकारियों को फाँसी हुई। 19 दिसंबर 1927 को बिस्मिल को गोरखपुर, अशफ़ाक़उल्ला को फ़ैज़ाबाद और रोशन सिंह को इलाहाबाद की जेल में फाँसी दी गई; राजेंद्र लाहिड़ी को दो दिन पहले गोंडा में फाँसी दी गई थी।

◆ महत्त्व — एक आर्यसमाजी हिंदू और एक मुसलमान की यह मित्रता हिंदू-मुस्लिम एकता का सबसे सुंदर प्रतीक मानी जाती है। प्रसिद्ध ग़ज़ल "सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है" असल में पटना के शायर बिस्मिल अज़ीमाबादी की रचना है; रामप्रसाद बिस्मिल ने इसे गाकर क्रांतिकारियों का गीत बना दिया।

8.6 🌏 विदेशों में सक्रिय क्रांतिकारी

अंग्रेज़ी राज की पकड़ से बचने के लिए कई क्रांतिकारी विदेश चले गए और वहीं से आंदोलन चलाया। इनमें पाँच नाम सबसे महत्त्वपूर्ण हैं।

◆ श्यामजी कृष्ण वर्मा (1857–1930) — उनका जन्म गुजरात के कच्छ के मांडवी में हुआ। वे संस्कृत के विद्वान और बैरिस्टर थे। 1905 में उन्होंने लंदन में "इंडियन होमरूल सोसाइटी" बनाई, "द इंडियन सोशियोलॉजिस्ट" नाम का पत्र निकाला और भारतीय छात्रों के रहने के लिए "इंडिया हाउस" खोला। यही इंडिया हाउस सावरकर, मदनलाल ढींगरा और हरदयाल जैसे युवाओं का केंद्र बना। अंग्रेज़ों के दबाव में वे पहले पेरिस और फिर जिनेवा चले गए, जहाँ 1930 में उनका निधन हुआ।

◆ भीकाजी कामा (1861–1936) — मैडम कामा का जन्म बम्बई के एक धनी पारसी परिवार में हुआ। 22 अगस्त 1907 को जर्मनी के स्टुटगार्ट में हुए अंतरराष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन में उन्होंने भारत का झंडा फहराया — विदेशी धरती पर भारतीय ध्वज फहराने वाली वे पहली व्यक्ति थीं। उन्होंने पेरिस से "वंदे मातरम्" नाम का पत्र निकाला। उन्हें "भारतीय क्रांति की माता" कहा जाता है। ध्यान रखें कि "फ़्री इंडिया सोसाइटी" सावरकर ने बनाई थी, कामा ने नहीं।

◆ लाला हरदयाल (1884–1939) — दिल्ली में जन्मे हरदयाल बहुत मेधावी थे और उन्होंने देशप्रेम के कारण ऑक्सफ़ोर्ड की सरकारी छात्रवृत्ति छोड़ दी। 1913 में अमेरिका के सैन फ़्रांसिस्को में ग़दर पार्टी बनी, जिसके अध्यक्ष सोहन सिंह भकना और मुख्य प्रेरक हरदयाल थे। पार्टी का मुख्यालय "युगांतर आश्रम" था और वहीं से "ग़दर" नाम का साप्ताहिक पत्र निकलता था। इस पार्टी के अधिकतर सदस्य अमेरिका और कनाडा में बसे पंजाबी किसान और मज़दूर थे।

◆ रासबिहारी बोस (1886–1945) — उन्होंने 23 दिसंबर 1912 को दिल्ली के चाँदनी चौक में वायसराय लॉर्ड हार्डिंग पर बम फेंकने की योजना बनाई। फ़रवरी 1915 में उन्होंने ग़दर के क्रांतिकारियों के साथ सेना में विद्रोह की योजना बनाई, पर भेद खुल जाने से वह विफल हो गई और वे जापान चले गए। वहाँ उन्होंने "इंडियन इंडिपेंडेंस लीग" को संगठित किया और जुलाई 1943 में उसका तथा आज़ाद हिंद फ़ौज का नेतृत्व सुभाष चंद्र बोस को सौंप दिया।

◆ ऊधम सिंह (1899–1940) — पंजाब के सुनाम में जन्मे ऊधम सिंह ने जलियाँवाला बाग़ हत्याकांड का बदला लेने का प्रण किया था। इक्कीस वर्ष बाद 13 मार्च 1940 को लंदन के कैक्सटन हॉल में उन्होंने माइकल ओ'डायर को गोली मार दी। ओ'डायर 1919 में पंजाब का लेफ़्टिनेंट गवर्नर था और उसने हत्याकांड को सही ठहराया था। यहाँ यह भेद याद रखें कि बाग़ में गोली चलवाने वाला अधिकारी जनरल डायर था, जिसकी मृत्यु 1927 में ही हो चुकी थी। ऊधम सिंह ने अपना नाम "राम मोहम्मद सिंह आज़ाद" बताया, जो तीनों धर्मों की एकता का प्रतीक था। उन्हें 1940 में लंदन में फाँसी दी गई।

8.7 ⚔️ सूर्य सेन (1894–1934) — "मास्टर दा"

◆ परिचय — सूर्य सेन बंगाल के चटगाँव (अब बांग्लादेश में) के एक स्कूल शिक्षक थे, इसलिए लोग उन्हें प्यार से "मास्टर दा" कहते थे। वे असहयोग आंदोलन में सक्रिय रहे और स्थानीय कांग्रेस से भी जुड़े थे।

◆ चटगाँव शस्त्रागार कांड (18 अप्रैल 1930) — उनके नेतृत्व में लगभग पैंसठ युवाओं ने "इंडियन रिपब्लिकन आर्मी" के नाम से चटगाँव के दो सरकारी शस्त्रागारों पर एक साथ धावा बोला, टेलीफ़ोन-तार की लाइनें काट दीं और एक अस्थायी क्रांतिकारी सरकार की घोषणा की। कुछ दिन बाद जलालाबाद की पहाड़ी पर सेना से उनकी मुठभेड़ हुई।

◆ विशेषता — इस दल में प्रीतिलता वादेदार और कल्पना दत्त जैसी युवतियाँ भी हथियार लेकर लड़ीं। यह क्रांतिकारी आंदोलन में महिलाओं की सीधी भागीदारी का बड़ा उदाहरण है।

◆ अंत — सूर्य सेन लगभग तीन वर्ष तक गाँवों में छिपकर काम करते रहे। 1933 में वे पकड़े गए और जनवरी 1934 में उन्हें फाँसी दे दी गई।

🧠 याद रखें: अक्सर होने वाली भूलें

आज़ाद हिंद फ़ौज का पहला गठन मोहन सिंह (1942) ने किया; सुभाष चंद्र बोस ने 1943 में उसका पुनर्गठन और नेतृत्व किया।

"इंक़लाब ज़िंदाबाद" हसरत मोहानी ने गढ़ा और भगत सिंह ने लोकप्रिय बनाया; "सरफ़रोशी की तमन्ना" बिस्मिल अज़ीमाबादी की रचना है।

जनरल डायर ने जलियाँवाला बाग़ में गोली चलवाई; माइकल ओ'डायर पंजाब का लेफ़्टिनेंट गवर्नर था, और ऊधम सिंह ने इसी ओ'डायर को मारा।

सावरकर हिंदू महासभा के अध्यक्ष (1937–43) थे, संस्थापक नहीं; "फ़्री इंडिया सोसाइटी" सावरकर की थी, कामा की नहीं।

📋 दोहराव तालिका: क्रांतिकारी व्यक्तित्व

व्यक्तित्व

एक वाक्य में पहचान

सुभाष चंद्र बोस (1897–1945)

हरिपुरा (1938) और त्रिपुरी (1939) के अध्यक्ष रहे, फ़ॉरवर्ड ब्लॉक बनाया और 21 अक्टूबर 1943 को आज़ाद हिंद सरकार की स्थापना की।

भगत सिंह (1907–1931)

नौजवान भारत सभा बनाई, 8 अप्रैल 1929 को असेंबली में बम फेंका और 23 मार्च 1931 को फाँसी पर चढ़े।

चंद्रशेखर आज़ाद (1906–1931)

काकोरी कांड में शामिल रहे और 27 फ़रवरी 1931 को इलाहाबाद के अल्फ़्रेड पार्क में शहीद हुए।

वि. दा. सावरकर (1883–1966)

अभिनव भारत (1904) बनाया, "1857 का स्वातंत्र्य समर" लिखा और सेलुलर जेल में दस वर्ष रहे।

बिस्मिल और अशफ़ाक़उल्ला

काकोरी कांड (9 अगस्त 1925) के नायक थे और दोनों को 19 दिसंबर 1927 को फाँसी दी गई।

श्यामजी कृष्ण वर्मा (1857–1930)

उन्होंने 1905 में लंदन में इंडिया हाउस और इंडियन होमरूल सोसाइटी की स्थापना की।

भीकाजी कामा (1861–1936)

उन्होंने 22 अगस्त 1907 को स्टुटगार्ट में पहली बार विदेशी धरती पर भारत का झंडा फहराया।

लाला हरदयाल (1884–1939)

वे 1913 में सैन फ़्रांसिस्को में बनी ग़दर पार्टी के मुख्य प्रेरक थे।

रासबिहारी बोस (1886–1945)

हार्डिंग बम कांड (1912) की योजना बनाई और जापान में इंडियन इंडिपेंडेंस लीग चलाई।

ऊधम सिंह (1899–1940)

उन्होंने 13 मार्च 1940 को लंदन में माइकल ओ'डायर को मारकर जलियाँवाला का बदला लिया।

सूर्य सेन (1894–1934)

"मास्टर दा" ने 18 अप्रैल 1930 को चटगाँव शस्त्रागार पर धावे का नेतृत्व किया।

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9. डॉ. आंबेडकर और सामाजिक-धार्मिक सुधारक

राजनीतिक आज़ादी की लड़ाई के साथ एक और लड़ाई चल रही थी — समाज के भीतर की ग़ुलामी के विरुद्ध। जाति-भेद, छुआछूत, स्त्रियों की दुर्दशा और अंधविश्वास भारतीय समाज को भीतर से कमज़ोर कर रहे थे। इस खंड में पहले डॉ. भीमराव आंबेडकर का विस्तृत जीवन पढ़ेंगे और फिर आठ सुधारकों का परिचय, जिनके आंदोलनों का पूरा विवरण अध्याय 8 और 9 में दिया गया है।

9.1 ⚖️ डॉ. भीमराव आंबेडकर (1891–1956) — "बाबासाहेब"

◆ जन्म और बचपन — आंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1891 को मध्य प्रदेश की महू छावनी में हुआ। उनके पिता रामजी सकपाल सेना में सूबेदार थे। वे महार जाति से थे, जिसे उस समय "अछूत" माना जाता था। स्कूल में उन्हें कक्षा में अलग बैठाया जाता था और पानी के बर्तन को छूने नहीं दिया जाता था। बचपन के इन्हीं अपमानों ने उनके जीवन का लक्ष्य तय कर दिया।

◆ असाधारण शिक्षा — बम्बई से स्नातक करने के बाद उन्हें बड़ौदा के महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ की छात्रवृत्ति मिली। इसके सहारे वे अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय गए और वहाँ से अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट की। फिर उन्होंने लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स से डी.एससी. की उपाधि ली और बैरिस्टर भी बने। वे अपने समय के सबसे अधिक पढ़े-लिखे भारतीय नेताओं में से एक थे।

◆ आरंभिक संगठन और पत्र — 1920 में उन्होंने मराठी पत्र "मूकनायक" निकाला, जिसका अर्थ है "बेज़ुबानों का नेता"। 1924 में उन्होंने "बहिष्कृत हितकारिणी सभा" बनाई, जिसका उद्देश्य दलितों में शिक्षा फैलाना और उनकी समस्याएँ उठाना था। इसके बाद उन्होंने "बहिष्कृत भारत" (1927) और "जनता" (1930) पत्र निकाले; "जनता" का नाम आगे चलकर "प्रबुद्ध भारत" हुआ।

◆ महाड़ सत्याग्रह (1927) — महाराष्ट्र के महाड़ में चवदार तालाब एक सार्वजनिक तालाब था, पर दलितों को उससे पानी लेने नहीं दिया जाता था। 20 मार्च 1927 को आंबेडकर ने हज़ारों लोगों के साथ तालाब का पानी पीकर यह रोक तोड़ी। यह पानी पीने का नहीं, बराबरी के अधिकार का आंदोलन था। उसी वर्ष 25 दिसंबर 1927 को उन्होंने मनुस्मृति की प्रति सार्वजनिक रूप से जलाई, क्योंकि वे इसे जाति-भेद और स्त्री-विरोध का आधार मानते थे।

◆ कालाराम मंदिर सत्याग्रह (1930) — नासिक के कालाराम मंदिर में दलितों के प्रवेश के लिए उन्होंने 1930 में लंबा सत्याग्रह चलाया। कई वर्षों के प्रयास के बाद भी मंदिर के द्वार नहीं खुले। इससे आंबेडकर को लगा कि हिंदू समाज के भीतर रहकर सम्मान पाना बहुत कठिन है।

◆ गोलमेज सम्मेलन और पूना समझौता (1932) — आंबेडकर ने लंदन के तीनों गोलमेज सम्मेलनों में दलितों के प्रतिनिधि के रूप में भाग लिया और उनके लिए पृथक निर्वाचक मंडल की माँग की। अगस्त 1932 के सांप्रदायिक पंचाट में ब्रिटिश प्रधानमंत्री मैकडोनाल्ड ने यह माँग मान ली। गांधीजी ने इसे हिंदू समाज को बाँटने वाला क़दम मानकर पूना की यरवदा जेल में आमरण अनशन शुरू कर दिया। अंत में 24 सितंबर 1932 को पूना समझौता हुआ — पृथक निर्वाचक मंडल छोड़ दिया गया, पर बदले में प्रांतीय विधानमंडलों में दलितों की आरक्षित सीटें 71 से बढ़ाकर 148 कर दी गईं।

🔍 आसान परिभाषा: पृथक निर्वाचक मंडल

📘 परिभाषा: ऐसी चुनाव व्यवस्था जिसमें किसी समुदाय के लिए सीटें आरक्षित होती हैं और उन सीटों के प्रतिनिधि को केवल उसी समुदाय के मतदाता चुनते हैं।

💡 आसान भाषा में: मान लो एक सीट केवल एक समुदाय के लिए है और उस पर वोट भी केवल उसी समुदाय के लोग डाल सकते हैं — बाक़ी लोग उस चुनाव से बाहर रहते हैं। 🏠 उदाहरण: 1909 में मुसलमानों को यह व्यवस्था मिली। 1932 में इसे दलितों तक बढ़ाया गया, पर पूना समझौते के बाद उसकी जगह "संयुक्त निर्वाचन में आरक्षित सीटें" तय हुईं, जहाँ उम्मीदवार दलित होता है पर वोट सब देते हैं।

◆ धर्म-परिवर्तन की घोषणा (1935) — नासिक ज़िले के येवला में उन्होंने घोषणा की — "मैं हिंदू के रूप में पैदा हुआ, यह मेरे वश में नहीं था; पर मैं हिंदू के रूप में मरूँगा नहीं।" 1936 में उनकी सबसे प्रसिद्ध पुस्तक "एनिहिलेशन ऑफ़ कास्ट" (जाति का विनाश) छपी। यह असल में लाहौर के एक सम्मेलन के लिए तैयार किया गया भाषण था, जिसे आयोजकों ने बहुत कड़ा मानकर रद्द कर दिया था।

◆ राजनीतिक दल — 1936 में उन्होंने "इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी" बनाई, जिसने 1937 के चुनाव में बम्बई प्रांत में अच्छी सफलता पाई। 1942 में उन्होंने "अखिल भारतीय अनुसूचित जाति संघ" बनाया। शिक्षा के लिए 1945 में "पीपुल्स एजुकेशन सोसाइटी" स्थापित की, जिसने बम्बई में सिद्धार्थ कॉलेज खोला।

◆ श्रम सदस्य (1942–46) — वे वायसराय की कार्यकारी परिषद में श्रम सदस्य रहे। इस पद पर उन्होंने मज़दूरों के काम के घंटे घटाने, महिला मज़दूरों के लिए मातृत्व लाभ और रोज़गार कार्यालय जैसी व्यवस्थाओं के लिए काम किया।

◆ संविधान निर्माता — 29 अगस्त 1947 को वे संविधान सभा की प्रारूप समिति के अध्यक्ष बने। इसी कारण उन्हें "भारतीय संविधान का प्रधान शिल्पी" कहा जाता है। संविधान में अस्पृश्यता का अंत (अनुच्छेद 17), समानता का अधिकार और आरक्षण की व्यवस्था उनकी सोच की देन हैं। उन्होंने अनुच्छेद 32 (संवैधानिक उपचारों का अधिकार) को संविधान की "आत्मा और हृदय" कहा।

◆ पहले क़ानून मंत्री और त्यागपत्र — वे स्वतंत्र भारत के पहले क़ानून मंत्री बने। उन्होंने हिंदू कोड बिल तैयार किया, जो हिंदू स्त्रियों को संपत्ति, विवाह और तलाक़ में बराबर अधिकार देता था। जब यह विधेयक संसद में अटक गया तो उन्होंने 1951 में मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दे दिया।

◆ बौद्ध धर्म की दीक्षा (14 अक्टूबर 1956) — नागपुर में उन्होंने अपने लाखों अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म अपना लिया। वह स्थान आज "दीक्षाभूमि" कहलाता है। इसके कुछ ही सप्ताह बाद 6 दिसंबर 1956 को दिल्ली में उनका निधन हो गया। यह दिन "महापरिनिर्वाण दिवस" के रूप में मनाया जाता है। उनकी अंतिम पुस्तक "द बुद्ध एंड हिज़ धम्म" उनके निधन के बाद छपी।

◆ पुस्तकें — उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं — "द प्रॉब्लम ऑफ़ द रुपी" (1923), जो भारतीय मुद्रा की समस्या पर है; "एनिहिलेशन ऑफ़ कास्ट" (1936); "थॉट्स ऑन पाकिस्तान" (1940); "हू वेयर द शूद्राज़?" (1946); "द अनटचेबल्स" (1948) और "द बुद्ध एंड हिज़ धम्म"।

◆ विचार — आंबेडकर का मानना था कि राजनीतिक लोकतंत्र तब तक टिक नहीं सकता जब तक उसकी नींव में सामाजिक लोकतंत्र न हो। सामाजिक लोकतंत्र का अर्थ उन्होंने बताया — स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को जीवन का सिद्धांत मानना। आर्थिक क्षेत्र में वे राज्य समाजवाद के पक्ष में थे। उनका प्रसिद्ध संदेश है — "शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो।"

◆ सम्मान — उन्हें 1990 में मरणोपरांत भारत रत्न दिया गया। उनका जन्मदिन 14 अप्रैल पूरे देश में आंबेडकर जयंती के रूप में मनाया जाता है।

❝ हम 26 जनवरी 1950 को विरोधाभासों के जीवन में प्रवेश करने जा रहे हैं। राजनीति में हमारे पास समानता होगी, पर सामाजिक और आर्थिक जीवन में असमानता होगी। ❞ (डॉ. आंबेडकर — संविधान सभा में अंतिम भाषण (25 नवंबर 1949))

इस कथन का अर्थ सीधा है — वोट की बराबरी मिल जाना काफ़ी नहीं है; यदि समाज में ऊँच-नीच और अमीरी-ग़रीबी की खाई बनी रही तो लोकतंत्र ख़तरे में पड़ जाएगा।

9.2 🌅 सामाजिक-धार्मिक सुधारक — आठ परिचय

नीचे के आठ सुधारकों ने अलग-अलग क्षेत्रों और समुदायों में सुधार की मशाल जलाई। इनके आंदोलनों का विस्तार अध्याय 8 और 9 में है; यहाँ हर सुधारक की मुख्य पहचान दी जा रही है।

◆ राजा राममोहन राय (1772–1833) — उनका जन्म बंगाल के राधानगर गाँव में हुआ। उन्हें "आधुनिक भारत का जनक" और "भारतीय पुनर्जागरण का अग्रदूत" कहा जाता है। उन्होंने 1815 में आत्मीय सभा और 1828 में ब्रह्म सभा (बाद में ब्रह्म समाज) बनाई, जो एक ईश्वर की उपासना और मूर्तिपूजा के विरोध पर आधारित थी। उन्हीं के प्रयासों से गवर्नर जनरल विलियम बेंटिंक ने 1829 में सती प्रथा पर क़ानूनी रोक लगाई। उन्होंने "संवाद कौमुदी" और "मिरात-उल-अख़बार" पत्र निकाले। "राजा" की उपाधि उन्हें मुग़ल बादशाह अकबर द्वितीय ने दी थी, जिनकी पेंशन का मामला लेकर वे इंग्लैंड गए थे। वहीं ब्रिस्टल में 1833 में उनका निधन हुआ।

◆ ईश्वरचंद्र विद्यासागर (1820–1891) — वे बंगाल के एक ग़रीब ब्राह्मण परिवार में जन्मे और अपनी विद्वत्ता के कारण "विद्यासागर" (विद्या का सागर) कहलाए। वे कलकत्ता के संस्कृत कॉलेज के प्राचार्य रहे और उन्होंने कॉलेज के द्वार ग़ैर-ब्राह्मण छात्रों के लिए भी खोले। उनके अथक प्रयासों से 1856 में हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम पास हुआ। उन्होंने बंगाल में लड़कियों के कई विद्यालय खुलवाए और बच्चों के लिए बांग्ला वर्णमाला की पुस्तक "वर्ण परिचय" लिखकर आधुनिक बांग्ला गद्य को सरल रूप दिया।

◆ स्वामी दयानंद सरस्वती (1824–1883) — उनका जन्म गुजरात के टंकारा में हुआ और बचपन का नाम मूलशंकर था। मथुरा के स्वामी विरजानंद उनके गुरु थे। उन्होंने 1875 में बम्बई में आर्य समाज की स्थापना की और "वेदों की ओर लौटो" का नारा दिया। उनकी पुस्तक "सत्यार्थ प्रकाश" है। उन्होंने मूर्तिपूजा, बाल विवाह और जन्म पर आधारित जाति का विरोध किया तथा "शुद्धि" आंदोलन चलाया। "स्वराज" शब्द का प्रयोग सबसे पहले उन्होंने ही किया और कहा कि "अच्छे से अच्छा विदेशी राज भी स्वदेशी राज की बराबरी नहीं कर सकता।"

◆ स्वामी विवेकानंद (1863–1902) — उनका जन्म 12 जनवरी 1863 को कलकत्ता में हुआ और मूल नाम नरेंद्रनाथ दत्त था। वे रामकृष्ण परमहंस के शिष्य थे। सितंबर 1893 में अमेरिका के शिकागो की विश्व धर्म संसद में उन्होंने "अमेरिका के बहनो और भाइयो" कहकर भाषण शुरू किया और भारतीय दर्शन को दुनिया के सामने सम्मान दिलाया। 1897 में उन्होंने रामकृष्ण मिशन बनाया, जिसका सिद्धांत है कि मनुष्य की सेवा ही ईश्वर की सेवा है। उनका संदेश था — "उठो, जागो और लक्ष्य प्राप्ति तक मत रुको।" उनका जन्मदिन राष्ट्रीय युवा दिवस है।

◆ ज्योतिबा फुले (1827–1890) — पुणे के माली परिवार में जन्मे फुले ने निम्न जातियों और स्त्रियों की शिक्षा को अपना जीवन-लक्ष्य बनाया। 1848 में उन्होंने अपनी पत्नी सावित्रीबाई फुले के साथ पुणे में लड़कियों का विद्यालय खोला; सावित्रीबाई को भारत की पहली महिला शिक्षिकाओं में गिना जाता है। 1873 में उन्होंने सत्यशोधक समाज बनाया और उसी वर्ष "ग़ुलामगीरी" पुस्तक लिखी, जो उन्होंने अमेरिका में दास-प्रथा के विरुद्ध लड़ने वालों को समर्पित की। 1888 में जनता ने उन्हें "महात्मा" की उपाधि दी। आंबेडकर उन्हें अपने तीन गुरुओं (बुद्ध, कबीर, फुले) में गिनते थे।

◆ सर सैयद अहमद ख़ाँ (1817–1898) — दिल्ली में जन्मे सर सैयद का मानना था कि मुसलमानों की उन्नति आधुनिक अंग्रेज़ी और वैज्ञानिक शिक्षा से ही होगी। उन्होंने 1864 में "साइंटिफ़िक सोसाइटी" बनाई, "तहज़ीब-उल-अख़लाक़" पत्रिका निकाली और 1875 में अलीगढ़ में मोहम्मडन एंग्लो-ओरिएंटल स्कूल खोला, जो शीघ्र ही कॉलेज बना और 1920 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय बना। इसी पूरे प्रयास को अलीगढ़ आंदोलन कहते हैं। बाद के वर्षों में उन्होंने मुसलमानों को कांग्रेस से दूर रहने की सलाह दी।

◆ श्री नारायण गुरु (1856–1928) — केरल के एझवा समुदाय में जन्मे नारायण गुरु ने जाति-भेद को बिना टकराव के चुनौती दी। 1888 में उन्होंने अरुविप्पुरम में स्वयं शिव-प्रतिमा की स्थापना की, जबकि यह अधिकार केवल ब्राह्मणों का माना जाता था। 1903 में "श्री नारायण धर्म परिपालन योगम" बना। उनका संदेश था — "मनुष्य के लिए एक जाति, एक धर्म, एक ईश्वर।"

◆ ई. वी. रामास्वामी "पेरियार" (1879–1973) — तमिलनाडु के ईरोड में जन्मे पेरियार पहले कांग्रेस में थे। केरल के वैकोम सत्याग्रह (1924–25) में, जो मंदिर के पास की सड़कों पर दलितों के चलने के अधिकार के लिए था, उनकी भूमिका के कारण वे "वैकोम के नायक" कहलाए। कांग्रेस में ब्राह्मण-वर्चस्व से असंतुष्ट होकर उन्होंने 1925 में पार्टी छोड़ी और "आत्म-सम्मान आंदोलन" शुरू किया, जिसने जाति, पुरोहितवाद और अंधविश्वास का विरोध किया। 1944 में उन्होंने "द्रविड़ कड़गम" बनाया। "पेरियार" का अर्थ है "महान व्यक्ति"।

📋 दोहराव तालिका: आंबेडकर और सुधारक

व्यक्तित्व

एक वाक्य में पहचान

डॉ. आंबेडकर (1891–1956)

महाड़ सत्याग्रह (1927) और पूना समझौते (1932) के नायक थे, प्रारूप समिति के अध्यक्ष बने और 1956 में बौद्ध धर्म अपनाया।

राजा राममोहन राय (1772–1833)

उन्होंने 1828 में ब्रह्म समाज की नींव रखी और 1829 में सती प्रथा पर रोक लगवाई।

ईश्वरचंद्र विद्यासागर (1820–1891)

उनके प्रयास से 1856 में विधवा पुनर्विवाह अधिनियम बना।

स्वामी दयानंद (1824–1883)

उन्होंने 1875 में बम्बई में आर्य समाज बनाया और "सत्यार्थ प्रकाश" लिखी।

स्वामी विवेकानंद (1863–1902)

उन्होंने 1893 में शिकागो में भाषण दिया और 1897 में रामकृष्ण मिशन बनाया।

ज्योतिबा फुले (1827–1890)

उन्होंने 1873 में सत्यशोधक समाज बनाया और "ग़ुलामगीरी" लिखी।

सर सैयद अहमद ख़ाँ (1817–1898)

उन्होंने 1875 में अलीगढ़ में आधुनिक शिक्षा की संस्था खोलकर अलीगढ़ आंदोलन चलाया।

नारायण गुरु (1856–1928)

केरल में उन्होंने "एक जाति, एक धर्म, एक ईश्वर" का संदेश दिया।

पेरियार (1879–1973)

वे वैकोम सत्याग्रह के नायक थे और 1925 में आत्म-सम्मान आंदोलन शुरू किया।

10. अन्य प्रमुख व्यक्तित्व — अठारह जीवन-परिचय

राष्ट्रीय आंदोलन केवल पाँच-सात बड़े नामों की कहानी नहीं है। इसमें वकील, कवि, शिक्षक, डॉक्टर, संन्यासी और विदेशी मित्र तक शामिल थे। इस खंड में ऐसे अठारह व्यक्तित्वों का परिचय है। पढ़ने की सुविधा के लिए इन्हें पाँच समूहों में बाँटा गया है।

10.1 🏛️ कांग्रेस के वरिष्ठ नेता

◆ चित्तरंजन दास (1870–1925) — "देशबंधु" — दास कलकत्ता के सबसे बड़े वकीलों में थे। अलीपुर षड्यंत्र मुक़दमे (1908–09) में उन्होंने अरविंद घोष का बचाव करके उन्हें बरी कराया, जिससे वे पूरे देश में प्रसिद्ध हो गए। असहयोग आंदोलन में उन्होंने अपनी भारी कमाई वाली वकालत छोड़ दी। वे दिसंबर 1922 के गया अधिवेशन के अध्यक्ष थे, जहाँ उनका "विधान परिषदों में घुसकर भीतर से विरोध" का प्रस्ताव गिर गया। इसलिए उन्होंने मोतीलाल नेहरू के साथ 1 जनवरी 1923 को स्वराज पार्टी बनाई, जिसके अध्यक्ष दास और सचिव मोतीलाल थे। 1924 में वे कलकत्ता के मेयर बने। उन्होंने "फ़ॉरवर्ड" पत्र निकाला और वे सुभाष चंद्र बोस के राजनीतिक गुरु थे। जून 1925 में दार्जिलिंग में उनका निधन हुआ।

◆ मोतीलाल नेहरू (1861–1931) — जवाहरलाल नेहरू के पिता मोतीलाल इलाहाबाद के बहुत सफल वकील थे। वे दो बार कांग्रेस के अध्यक्ष बने — 1919 (अमृतसर) और 1928 (कलकत्ता)। उन्होंने 1919 में "इंडिपेंडेंट" नाम का पत्र निकाला। 1923 में वे स्वराज पार्टी के सह-संस्थापक बने और केंद्रीय असेंबली में विपक्ष के नेता रहे। 1928 की नेहरू रिपोर्ट उन्हीं की अध्यक्षता में बनी, जो भारतीयों द्वारा अपना संविधान बनाने का पहला बड़ा प्रयास थी। उन्होंने इलाहाबाद का अपना घर आनंद भवन कांग्रेस को दे दिया, जो "स्वराज भवन" कहलाया। फ़रवरी 1931 में उनका निधन हुआ।

◆ मदन मोहन मालवीय (1861–1946) — "महामना" — इलाहाबाद में जन्मे मालवीय शिक्षक, वकील, पत्रकार और नेता सब कुछ थे। उनकी सबसे बड़ी देन बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (1916) है, जिसके लिए उन्होंने देश भर से चंदा जुटाया। वे 1909 (लाहौर) और 1918 (दिल्ली) में कांग्रेस के अध्यक्ष रहे; 1932 और 1933 में भी चुने गए, पर गिरफ़्तारी के कारण अध्यक्षता नहीं कर सके। वे हिंदू महासभा के प्रमुख नेताओं में थे। उन्होंने "हिंदुस्तान", "अभ्युदय" और "लीडर" (1909) जैसे पत्रों का संपादन या स्थापना की। मुंडक उपनिषद के वाक्य "सत्यमेव जयते" को उन्होंने ही राष्ट्रीय जीवन में लोकप्रिय बनाया। उन्हें 2015 में मरणोपरांत भारत रत्न दिया गया।

◆ तेज बहादुर सप्रू (1875–1949) — सप्रू इलाहाबाद के महान विधिवेत्ता और उदारवादी नेता थे। वे आंदोलन और जेल की राजनीति से दूर रहे, पर कांग्रेस और सरकार के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाते रहे। वे नेहरू रिपोर्ट समिति के सदस्य थे और उन्होंने गोलमेज सम्मेलनों में भाग लिया। एम. आर. जयकर के साथ मिलकर उन्होंने गांधी-इरविन समझौते (1931) का रास्ता बनाया। 1945–46 के आज़ाद हिंद फ़ौज मुक़दमे में वे भूलाभाई देसाई और जवाहरलाल नेहरू के साथ बचाव पक्ष में थे।

10.2 👩 आंदोलन की दो महान महिलाएँ

◆ एनी बेसेंट (1847–1933) — लंदन में जन्मी एनी बेसेंट आयरिश मूल की थीं। वे 1893 में थियोसोफ़िकल सोसाइटी के काम से भारत आईं और यहीं की होकर रह गईं; 1907 में वे इस सोसाइटी की अध्यक्ष बनीं। उन्होंने 1898 में बनारस में सेंट्रल हिंदू कॉलेज खोला, जो आगे चलकर बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की नींव बना। 1914 में उन्होंने "कॉमनवील" और "न्यू इंडिया" पत्र शुरू किए। सितंबर 1916 में उन्होंने मद्रास में होमरूल लीग बनाई। 1917 में सरकार ने उन्हें नज़रबंद किया, जिससे उनकी लोकप्रियता और बढ़ी, और उसी वर्ष कलकत्ता अधिवेशन में वे कांग्रेस की पहली महिला अध्यक्ष बनीं।

◆ सरोजिनी नायडू (1879–1949) — "भारत कोकिला" — उनका जन्म 13 फ़रवरी 1879 को हैदराबाद में हुआ। वे अंग्रेज़ी की प्रतिभाशाली कवयित्री थीं; उनके काव्य-संग्रह "द गोल्डन थ्रेशोल्ड" (1905) और "द बर्ड ऑफ़ टाइम" हैं। उनकी मधुर कविता और वाणी के कारण गांधीजी ने उन्हें "भारत कोकिला" कहा। 1925 के कानपुर अधिवेशन में वे कांग्रेस की पहली भारतीय महिला अध्यक्ष बनीं। नमक सत्याग्रह में गांधीजी की गिरफ़्तारी के बाद मई 1930 में उन्होंने धरासना के नमक गोदाम पर धावे का नेतृत्व किया, और 1931 में दूसरे गोलमेज सम्मेलन में गईं। स्वतंत्रता के बाद वे संयुक्त प्रांत (उत्तर प्रदेश) की राज्यपाल बनीं — भारत की पहली महिला राज्यपाल।

🧠 याद रखें: कांग्रेस की महिला अध्यक्ष

पहली महिला अध्यक्ष — एनी बेसेंट (1917, कलकत्ता)।

पहली भारतीय महिला अध्यक्ष — सरोजिनी नायडू (1925, कानपुर)।

स्वतंत्रता से पहले की तीसरी महिला अध्यक्ष नेली सेनगुप्ता (1933, कलकत्ता) थीं।

10.3 🕌 राष्ट्रवादी मुस्लिम नेता, जिन्ना और इक़बाल

◆ ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ाँ (1890–1988) — "सीमांत गांधी" — उनका जन्म पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत के उतमानज़ई गाँव में हुआ। पठानों को आमतौर पर लड़ाकू माना जाता था, पर ग़फ़्फ़ार ख़ाँ ने उन्हें अहिंसा का रास्ता सिखाया — यही उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि है। 1929 में उन्होंने "ख़ुदाई ख़िदमतगार" (ईश्वर के सेवक) संगठन बनाया, जिसके स्वयंसेवक लाल रंग की कमीज़ पहनते थे, इसलिए वे "लाल कुर्ती" कहलाए। उन्हें "बादशाह ख़ान" और "सीमांत गांधी" कहा जाता है। वे विभाजन के कट्टर विरोधी थे; जब कांग्रेस ने विभाजन मान लिया तो उन्होंने दुखी होकर कहा कि "आपने हमें भेड़ियों के आगे फेंक दिया।" 1987 में उन्हें भारत रत्न मिला — यह सम्मान पाने वाले वे पहले ग़ैर-भारतीय नागरिक थे।

◆ हकीम अजमल ख़ाँ (1868–1927) — वे दिल्ली के प्रसिद्ध यूनानी चिकित्सक थे और उन्होंने दिल्ली में तिब्बिया कॉलेज की स्थापना की। वे ख़िलाफ़त और असहयोग आंदोलन के प्रमुख नेता रहे और 1921 के अहमदाबाद अधिवेशन की अध्यक्षता उन्होंने की, क्योंकि चुने हुए अध्यक्ष चित्तरंजन दास जेल में थे। वे जामिया मिल्लिया इस्लामिया के संस्थापकों में थे और उसके पहले कुलाधिपति बने।

◆ डॉ. मुख़्तार अहमद अंसारी (1880–1936) — वे दिल्ली के जाने-माने शल्य-चिकित्सक थे। बाल्कन युद्ध के समय उन्होंने तुर्की के घायलों की सेवा के लिए भारत से एक चिकित्सा दल का नेतृत्व किया। वे 1927 के मद्रास अधिवेशन के अध्यक्ष थे। अजमल ख़ाँ के बाद वे जामिया मिल्लिया के कुलाधिपति बने। जामिया मिल्लिया इस्लामिया की स्थापना 1920 में असहयोग आंदोलन के दौरान अलीगढ़ में एक राष्ट्रीय शिक्षा संस्था के रूप में हुई थी और बाद में यह दिल्ली आ गई।

◆ मोहम्मद अली जिन्ना (1876–1948) — जिन्ना का जन्म कराची में हुआ और उन्होंने लंदन से बैरिस्टरी की। शुरू में वे पक्के राष्ट्रवादी और कांग्रेसी थे — 1906 के कलकत्ता अधिवेशन में वे दादाभाई नौरोजी के निजी सचिव थे और गोखले को अपना आदर्श मानते थे। 1913 में वे मुस्लिम लीग में भी शामिल हुए और 1916 के लखनऊ समझौते में कांग्रेस-लीग को पास लाने में मुख्य भूमिका निभाई; इसी कारण सरोजिनी नायडू ने उन्हें "हिंदू-मुस्लिम एकता का राजदूत" कहा। असहयोग आंदोलन की जन-राजनीति से असहमत होकर उन्होंने 1920 में कांग्रेस छोड़ दी। 1929 में उन्होंने नेहरू रिपोर्ट के उत्तर में "चौदह सूत्र" रखे। 1940 के लाहौर प्रस्ताव के बाद वे दो-राष्ट्र सिद्धांत और पाकिस्तान की माँग के सबसे बड़े नेता बन गए। वे "क़ायदे-आज़म" (महान नेता) कहलाए और पाकिस्तान के पहले गवर्नर जनरल बने (विस्तार अध्याय 14 में)।

◆ मोहम्मद इक़बाल (1877–1938) — सियालकोट में जन्मे इक़बाल उर्दू और फ़ारसी के महान कवि और दार्शनिक थे। 1904 में उन्होंने "सारे जहाँ से अच्छा हिंदोस्ताँ हमारा" (तराना-ए-हिंद) लिखा, जो आज भी देशभक्ति का सबसे लोकप्रिय गीत है। बाद में उनके विचार बदले और 1930 में मुस्लिम लीग के इलाहाबाद अधिवेशन के अध्यक्षीय भाषण में उन्होंने उत्तर-पश्चिम भारत में एक अलग मुस्लिम राज्य का विचार रखा। इस तरह एक ही कवि के जीवन में राष्ट्रीय एकता और अलगाव, दोनों धाराएँ दिखती हैं।

10.4 🖋️ साहित्यकार और विचारक

◆ रवींद्रनाथ टैगोर (1861–1941) — "गुरुदेव" — टैगोर का जन्म 7 मई 1861 को कलकत्ता के जोड़ासाँको में हुआ। 1901 में उन्होंने शांतिनिकेतन में एक विद्यालय खोला, जहाँ बच्चे खुले आकाश के नीचे पेड़ों की छाया में पढ़ते थे; 1921 में यही विश्वभारती विश्वविद्यालय बना। उनके काव्य-संग्रह "गीतांजलि" के लिए उन्हें 1913 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला — वे यह पुरस्कार पाने वाले पहले एशियाई थे। 1905 के बंग-भंग के विरोध में उन्होंने "आमार सोनार बांग्ला" गीत लिखा और हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए रक्षाबंधन उत्सव मनाया। जलियाँवाला बाग़ हत्याकांड के विरोध में उन्होंने 1919 में अंग्रेज़ों की दी हुई "सर" (नाइटहुड) की उपाधि लौटा दी। भारत का राष्ट्रगान "जन गण मन" उन्हीं की रचना है, जिसकी एक पंक्ति "भारत भाग्य विधाता" है; यह पहली बार दिसंबर 1911 के कलकत्ता अधिवेशन में गाया गया। बांग्लादेश का राष्ट्रगान "आमार सोनार बांग्ला" भी उन्हीं का है।

◆ बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय (1838–1894) — बंकिम 1858 में कलकत्ता विश्वविद्यालय के पहले स्नातकों में थे और सरकारी नौकरी में डिप्टी मजिस्ट्रेट रहे। 1872 में उन्होंने "बंगदर्शन" पत्रिका शुरू की। उनका उपन्यास "आनंदमठ" (1882) अठारहवीं सदी के संन्यासी विद्रोह की पृष्ठभूमि पर लिखा गया है और इसी में "वंदे मातरम्" गीत है। यह गीत 1905 के स्वदेशी आंदोलन का नारा बन गया और अब भारत का राष्ट्रगीत है। उन्हें बांग्ला उपन्यास का जनक माना जाता है।

◆ सुब्रमण्य भारती (1882–1921) — वे तमिल के महान राष्ट्रकवि थे और उन्हें "महाकवि भारती" कहा जाता है। उन्होंने स्वदेशी आंदोलन के समय देशभक्ति, स्त्री-मुक्ति और जाति-विरोध के गीत लिखे और तमिल साप्ताहिक "इंडिया" का संपादन किया। अंग्रेज़ सरकार की गिरफ़्तारी से बचने के लिए वे लगभग दस वर्ष फ़्रांसीसी क्षेत्र पांडिचेरी में रहे, जहाँ उनकी भेंट अरविंद घोष से भी हुई।

◆ वी. ओ. चिदंबरम पिल्लै (1872–1936) — वे तमिलनाडु के तूतीकोरिन के वकील थे। समुद्री व्यापार पर अंग्रेज़ी कंपनियों का एकाधिकार तोड़ने के लिए उन्होंने 1906 में "स्वदेशी स्टीम नेविगेशन कंपनी" बनाई, जिसके जहाज़ तूतीकोरिन और कोलंबो के बीच चलते थे। यह स्वदेशी आंदोलन का दक्षिण भारत में सबसे साहसी प्रयोग था। 1908 में उन्हें राजद्रोह में कठोर कारावास हुआ और जेल में उनसे कोल्हू तक खिंचवाया गया। तमिल जनता उन्हें "कप्पलोट्टिय तमिऴन" (जहाज़ चलाने वाला तमिल) कहती है।

10.5 🌾 समाजवादी, सर्वोदयी और विदेशी मित्र

◆ जयप्रकाश नारायण (1902–1979) — "लोकनायक" — बिहार के सिताबदियारा में जन्मे जयप्रकाश ने अमेरिका में पढ़ाई की, जहाँ वे मार्क्सवाद से प्रभावित हुए। 1934 में उन्होंने आचार्य नरेंद्र देव के साथ कांग्रेस समाजवादी पार्टी बनाई। भारत छोड़ो आंदोलन के समय नवंबर 1942 में वे हज़ारीबाग़ जेल की दीवार फाँदकर भाग निकले और भूमिगत आंदोलन चलाया। स्वतंत्रता के बाद उन्होंने सत्ता की राजनीति छोड़कर भूदान आंदोलन में जीवन लगाया। 5 जून 1974 को पटना में उन्होंने "संपूर्ण क्रांति" का आह्वान किया। उन्हें 1999 में मरणोपरांत भारत रत्न मिला।

◆ डॉ. राम मनोहर लोहिया (1910–1967) — उत्तर प्रदेश के अकबरपुर में जन्मे लोहिया ने जर्मनी से डॉक्टरेट की। वे कांग्रेस समाजवादी पार्टी के प्रमुख नेता थे। 1942 में जब सारे बड़े नेता जेल में थे, तब उन्होंने उषा मेहता के साथ गुप्त "कांग्रेस रेडियो" चलाने में सहयोग दिया, जिससे आंदोलन की ख़बरें जनता तक पहुँचती रहीं। 18 जून 1946 को उन्होंने पुर्तगाली शासन के विरुद्ध गोवा मुक्ति आंदोलन की शुरुआत की। स्वतंत्रता के बाद वे ग़ैर-कांग्रेसवाद और पिछड़े वर्गों को आगे लाने की राजनीति के प्रमुख विचारक बने।

◆ आचार्य विनोबा भावे (1895–1982) — महाराष्ट्र में जन्मे विनोबा गांधीजी के आध्यात्मिक उत्तराधिकारी माने जाते हैं। अक्टूबर 1940 में गांधीजी ने उन्हें पहला व्यक्तिगत सत्याग्रही चुना (दूसरे जवाहरलाल नेहरू थे)। 18 अप्रैल 1951 को तेलंगाना के पोचमपल्ली गाँव में एक ज़मींदार ने भूमिहीनों के लिए सौ एकड़ ज़मीन दान की, और यहीं से भूदान आंदोलन शुरू हुआ। विनोबा ने पूरे देश में पैदल घूमकर ज़मींदारों से ज़मीन माँगी और भूमिहीनों में बाँटी। 1958 में उन्हें रेमन मैग्सेसे पुरस्कार मिला, जिसे पाने वाले वे पहले भारतीय थे, और 1983 में मरणोपरांत भारत रत्न दिया गया।

🔍 आसान परिभाषा: भूदान

📘 परिभाषा: भूमि-सुधार का एक स्वैच्छिक आंदोलन, जिसमें बड़े भूस्वामियों से अपनी ज़मीन का एक हिस्सा दान में लेकर भूमिहीन किसानों में बाँटा जाता था।

💡 आसान भाषा में: क़ानून या ज़बरदस्ती से नहीं, बल्कि समझा-बुझाकर और दिल बदलकर अमीर किसान से ज़मीन लेना और ग़रीब को देना। 🏠 उदाहरण: विनोबा भावे गाँव-गाँव जाकर कहते थे — "मुझे अपना पाँचवाँ बेटा मानकर ज़मीन का पाँचवाँ हिस्सा दे दो।" यह गांधीजी के न्यासिता और हृदय-परिवर्तन के विचार का व्यावहारिक रूप था।

◆ सी. एफ़. एंड्रूज़ (1871–1940) — "दीनबंधु" — चार्ल्स फ़्रीयर एंड्रूज़ एक अंग्रेज़ पादरी थे, जो 1904 में दिल्ली के सेंट स्टीफ़ेंस कॉलेज में पढ़ाने भारत आए। वे गांधीजी और टैगोर, दोनों के घनिष्ठ मित्र थे। गोखले के कहने पर वे दक्षिण अफ़्रीका गए और वहाँ गांधीजी के संघर्ष में सहायक बने। उन्होंने फ़िजी जैसे उपनिवेशों में गिरमिटिया (अनुबंध पर ले जाए गए) भारतीय मज़दूरों की दुर्दशा के विरुद्ध आवाज़ उठाई, जिससे यह प्रथा बंद कराने में मदद मिली। ग़रीबों की इसी सेवा के कारण उन्हें "दीनबंधु" (ग़रीबों का मित्र) कहा गया। वे इस बात का उदाहरण हैं कि भारत की लड़ाई अंग्रेज़ जाति से नहीं, अंग्रेज़ी साम्राज्यवाद से थी।

📋 दोहराव तालिका: अठारह व्यक्तित्व

व्यक्तित्व

एक वाक्य में पहचान

चित्तरंजन दास

"देशबंधु" ने 1923 में स्वराज पार्टी बनाई और वे सुभाष बोस के राजनीतिक गुरु थे।

मोतीलाल नेहरू

वे 1919 और 1928 में अध्यक्ष रहे और 1928 की नेहरू रिपोर्ट उन्हीं की अध्यक्षता में बनी।

मदन मोहन मालवीय

"महामना" ने 1916 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय स्थापित किया।

तेज बहादुर सप्रू

वे उदारवादी विधिवेत्ता थे, जो कांग्रेस और सरकार के बीच मध्यस्थ बने।

एनी बेसेंट

उन्होंने 1916 में होमरूल लीग बनाई और 1917 में कांग्रेस की पहली महिला अध्यक्ष बनीं।

सरोजिनी नायडू

"भारत कोकिला" 1925 में पहली भारतीय महिला अध्यक्ष और बाद में पहली महिला राज्यपाल बनीं।

ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ाँ

"सीमांत गांधी" ने 1929 में ख़ुदाई ख़िदमतगार संगठन बनाया।

अजमल ख़ाँ और अंसारी

दोनों जामिया मिल्लिया से जुड़े थे और क्रमशः 1921 तथा 1927 में कांग्रेस अध्यक्ष रहे।

मोहम्मद अली जिन्ना

वे पहले "हिंदू-मुस्लिम एकता के राजदूत" कहलाए और बाद में पाकिस्तान के संस्थापक बने।

मोहम्मद इक़बाल

उन्होंने 1904 में "सारे जहाँ से अच्छा" लिखा और 1930 में अलग मुस्लिम राज्य का विचार रखा।

रवींद्रनाथ टैगोर

"गुरुदेव" को 1913 में नोबेल पुरस्कार मिला और उन्होंने 1919 में नाइटहुड लौटा दी।

बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय

उन्होंने "आनंदमठ" (1882) लिखा, जिसमें "वंदे मातरम्" गीत है।

सुब्रमण्य भारती

वे तमिल के राष्ट्रकवि थे और उन्होंने "इंडिया" पत्र का संपादन किया।

वी. ओ. चिदंबरम पिल्लै

उन्होंने 1906 में तूतीकोरिन में स्वदेशी जहाज़ कंपनी चलाई।

जयप्रकाश नारायण

"लोकनायक" 1942 में हज़ारीबाग़ जेल से निकले और 1974 में संपूर्ण क्रांति का आह्वान किया।

राम मनोहर लोहिया

उन्होंने 1942 में कांग्रेस रेडियो और 1946 में गोवा मुक्ति आंदोलन में भूमिका निभाई।

विनोबा भावे

वे 1940 के पहले व्यक्तिगत सत्याग्रही थे और 1951 में भूदान आंदोलन शुरू किया।

सी. एफ़. एंड्रूज़

"दीनबंधु" गांधीजी के अंग्रेज़ मित्र थे, जिन्होंने गिरमिटिया मज़दूरों के लिए संघर्ष किया।

11. वैचारिक तुलना

अब तक हमने हर नेता को अलग-अलग पढ़ा। पर असली समझ तब बनती है जब हम उन्हें आमने-सामने रखकर देखें — किस प्रश्न पर कौन क्या सोचता था और क्यों। नीचे का आरेख चार नेताओं के विचारों का सार देता है; उसके बाद हर पंक्ति को विस्तार से समझाया गया है।

चित्र 16.4: गांधी, नेहरू, बोस और आंबेडकर के विचारों की तुलना
चित्र 16.4: गांधी, नेहरू, बोस और आंबेडकर के विचारों की तुलना

आरेख में पाँच कसौटियाँ हैं — स्वतंत्रता का मार्ग, आर्थिक दृष्टि, धर्म और राजनीति, जाति और समाज, तथा विरासत। आइए, हर कसौटी पर चारों नेताओं को बारी-बारी से देखें।

11.1 स्वतंत्रता का मार्ग — आज़ादी कैसे मिलेगी?

◆ गांधी — उनका रास्ता अहिंसक सत्याग्रह था। वे एक बड़ा आंदोलन चलाते, फिर उसे रोककर रचनात्मक कार्य से जनता को तैयार करते, और फिर अगला आंदोलन छेड़ते; इस तरीक़े को "संघर्ष-विराम-संघर्ष" कहा जाता है। वे सरकार से वार्ता का द्वार हमेशा खुला रखते थे, जैसे 1931 का गांधी-इरविन समझौता।

◆ नेहरू — वे गांधीजी के नेतृत्व वाले अहिंसक जन-आंदोलन को ही सही मार्ग मानते थे। उनकी अलग देन यह थी कि उन्होंने भारत की लड़ाई को दुनिया भर के साम्राज्यवाद-विरोधी संघर्ष का हिस्सा बताया और इसी कारण फ़ासीवाद का भी विरोध किया।

◆ बोस — उनका मानना था कि ज़रूरत पड़े तो सशस्त्र संघर्ष भी उचित है। वे दूसरे विश्वयुद्ध को अवसर मानते थे और "दुश्मन का दुश्मन मित्र है" की नीति पर जर्मनी-जापान से सहायता लेने को तैयार थे। आज़ाद हिंद फ़ौज इसी सोच का परिणाम थी।

◆ आंबेडकर — वे कहते थे कि केवल अंग्रेज़ों के जाने से दलितों को आज़ादी नहीं मिलेगी; राजनीतिक आज़ादी के साथ सामाजिक आज़ादी भी चाहिए। वे सत्याग्रह या क्रांति के बजाय संवैधानिक तरीक़ों — क़ानून, विधानमंडल और अधिकारों — पर भरोसा करते थे।

11.2 आर्थिक दृष्टि — आज़ाद भारत की अर्थव्यवस्था कैसी हो?

◆ गांधी — उनका आदर्श ग्राम स्वराज था, यानी हर गाँव अपनी ज़रूरत की चीज़ें स्वयं बनाए। वे खादी और कुटीर उद्योग चाहते थे, क्योंकि बड़ी मशीनें कुछ लोगों को अमीर और बहुतों को बेरोज़गार बनाती हैं। अमीरों के लिए उन्होंने न्यासिता का सिद्धांत दिया।

◆ नेहरू — वे लोकतांत्रिक समाजवाद के पक्षधर थे। उनके अनुसार ग़रीबी मिटाने के लिए भारी उद्योग, बाँध और इस्पात कारखाने ज़रूरी हैं, जिन्हें सरकार पंचवर्षीय योजनाओं से खड़ा करे। निजी और सरकारी, दोनों क्षेत्रों वाली मिश्रित अर्थव्यवस्था उनकी देन है।

◆ बोस — वे भी समाजवाद और तीव्र औद्योगीकरण चाहते थे। 1938 में अध्यक्ष बनते ही उन्होंने राष्ट्रीय योजना समिति बनवाई। इस प्रश्न पर बोस और नेहरू लगभग एकमत थे और दोनों गांधीजी से भिन्न थे।

◆ आंबेडकर — वे राज्य समाजवाद के पक्ष में थे। उनका सुझाव था कि खेती की ज़मीन और बुनियादी उद्योगों पर राज्य का स्वामित्व हो। साथ ही वे औद्योगीकरण और श्रमिकों के अधिकारों के समर्थक थे, क्योंकि उनके अनुसार गाँव की अर्थव्यवस्था ही जाति को टिकाए रखती है।

🔍 आसान परिभाषा: राज्य समाजवाद

📘 परिभाषा: ऐसी आर्थिक व्यवस्था जिसमें उत्पादन के प्रमुख साधन — जैसे ज़मीन, बड़े उद्योग और बीमा — निजी लोगों के बजाय राज्य (सरकार) के स्वामित्व में हों, और यह व्यवस्था लोकतंत्र के भीतर संविधान द्वारा लागू की जाए।

💡 आसान भाषा में: बड़े खेत और बड़े कारखाने किसी एक सेठ के न होकर सरकार के हों, ताकि उनका लाभ सबमें बँटे; पर सरकार जनता के वोट से ही चुनी जाए। 🏠 उदाहरण: आंबेडकर ने 1947 में संविधान सभा को दिए अपने ज्ञापन "स्टेट्स एंड माइनॉरिटीज़" में यही सुझाव दिया था। यह नेहरू की मिश्रित अर्थव्यवस्था से एक क़दम आगे की माँग थी।

11.3 धर्म और राजनीति

◆ गांधी — उनके लिए राजनीति को धर्म से अलग नहीं किया जा सकता था। पर यहाँ "धर्म" का अर्थ कोई संप्रदाय नहीं, बल्कि नैतिकता और सत्य है। वे सर्वधर्म समभाव मानते थे, यानी सभी धर्मों का बराबर आदर।

◆ नेहरू — वे धर्मनिरपेक्ष राज्य के पक्षधर थे, जहाँ राज्य का अपना कोई धर्म न हो और धर्म हर व्यक्ति का निजी विषय रहे। वे वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर ज़ोर देते थे और अंधविश्वास के विरोधी थे।

◆ बोस — वे स्वयं धार्मिक स्वभाव के थे, पर राजनीति में पूरी तरह धर्मनिरपेक्ष। उनकी फ़ौज में सभी धर्मों के सैनिक साथ रहते थे और फ़ौज का अभिवादन "जय हिंद" किसी एक धर्म का नहीं था।

◆ आंबेडकर — वे धर्म को आवश्यक मानते थे, पर ऐसा धर्म जो समानता पर टिका हो। जिस धर्म में मनुष्य-मनुष्य में भेद हो, उसे वे धर्म नहीं मानते थे। इसी कसौटी पर उन्होंने 1956 में बौद्ध धर्म चुना।

11.4 जाति और समाज

◆ गांधी — वे अस्पृश्यता को पाप और हिंदू धर्म का कलंक मानते थे। उन्होंने दलितों को "हरिजन" कहा, हरिजन सेवक संघ बनाया और मंदिर-प्रवेश के लिए यात्राएँ कीं। उनका तरीक़ा सवर्णों का हृदय-परिवर्तन था।

◆ नेहरू — वे जाति को पुराने समाज का अवशेष मानते थे, जो आधुनिक शिक्षा, क़ानून और आर्थिक विकास के साथ अपने-आप कमज़ोर पड़ेगी।

◆ बोस — वे एक अनुशासित और संगठित राष्ट्र चाहते थे, जिसमें जाति और धर्म की दीवारें न हों। महिलाओं को उन्होंने सैनिक भूमिका तक दी, जो उस समय बहुत क्रांतिकारी क़दम था।

◆ आंबेडकर — वे केवल छुआछूत नहीं, पूरी जाति-व्यवस्था का उन्मूलन चाहते थे। उनके अनुसार हृदय-परिवर्तन की प्रतीक्षा करना व्यर्थ है; दलितों को क़ानूनी अधिकार, आरक्षण, शिक्षा और राजनीतिक शक्ति चाहिए।

11.5 विरासत — आज इन्हें किस रूप में याद किया जाता है?

◆ गांधी राष्ट्रपिता हैं और अहिंसा का उनका संदेश पूरी दुनिया में फैला; उनका जन्मदिन 2 अक्टूबर अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस है।

◆ नेहरू आधुनिक भारत के निर्माता माने जाते हैं; संसदीय लोकतंत्र, योजना और गुटनिरपेक्षता उनकी देन हैं।

◆ बोस नेताजी के रूप में साहस और बलिदान के प्रतीक हैं; "जय हिंद" आज देश का अभिवादन है।

◆ आंबेडकर संविधान निर्माता और सामाजिक न्याय के सबसे बड़े प्रतीक हैं।

11.6 जोड़ी-वार तुलना — मतभेद और संबंध

परीक्षा में अक्सर दो नेताओं की तुलना पूछी जाती है। नीचे छह जोड़ियों के संबंध और मतभेद समझाए गए हैं।

◆ गांधी और टैगोर — दोनों एक-दूसरे का गहरा सम्मान करते थे। टैगोर ने गांधीजी को "महात्मा" कहा और गांधीजी ने टैगोर को "गुरुदेव" तथा "महान प्रहरी" कहा। फिर भी टैगोर ने असहयोग आंदोलन की कुछ बातों पर खुलकर आपत्ति की। उन्हें छात्रों से स्कूल-कॉलेज छुड़वाना ठीक नहीं लगा, विदेशी कपड़ों की होली जलाना उन्हें नकारात्मक लगा, और चरखे को हर समस्या का हल मानना उन्हें अतार्किक लगा। टैगोर संकीर्ण राष्ट्रवाद से डरते थे और स्वयं को विश्व-मानव मानते थे। गांधीजी का उत्तर था कि भूखे आदमी के लिए ईश्वर रोटी के रूप में ही आता है, और चरखा उसी रोटी का साधन है।

◆ गांधी और आंबेडकर — दोनों अस्पृश्यता मिटाना चाहते थे, पर निदान अलग था। गांधीजी मानते थे कि यह हिंदू धर्म में आई बुराई है, जिसे धर्म के भीतर रहकर हृदय-परिवर्तन से दूर किया जा सकता है; वे वर्ण को काम का बँटवारा मानते थे। आंबेडकर का कहना था कि समस्या की जड़ जाति-व्यवस्था ही है और उसे धर्मग्रंथों का सहारा मिला हुआ है। गांधीजी का आदर्श गाँव था, जबकि आंबेडकर ने गाँव को "स्थानीयता का गड्ढा और अज्ञान का अड्डा" कहा। दोनों का सीधा टकराव और समझौता पूना समझौते (1932) में हुआ।

◆ गांधी और बोस — गांधीजी अहिंसा, धैर्य और वार्ता में विश्वास करते थे, जबकि बोस तुरंत और निर्णायक संघर्ष चाहते थे। यह मतभेद त्रिपुरी संकट (1939) में खुलकर सामने आया। फिर भी दोनों में व्यक्तिगत सम्मान बना रहा — बोस ने फ़ौज की एक टुकड़ी का नाम "गांधी ब्रिगेड" रखा और गांधीजी को "राष्ट्रपिता" कहा, तथा गांधीजी ने बोस को "देशभक्तों का राजकुमार" कहा।

◆ गांधी और नेहरू — दोनों अहिंसा, धर्मों की एकता और ग़रीबों की चिंता पर एकमत थे। मतभेद अर्थनीति और जीवन-दृष्टि पर था — गांधीजी गाँव और चरखा चाहते थे, नेहरू कारखाने और विज्ञान; गांधीजी धर्मनिष्ठ थे, नेहरू तर्कवादी। इसके बाद भी गांधीजी ने नेहरू को अपना "उत्तराधिकारी" घोषित किया और कहा कि "मेरे जाने के बाद वह मेरी ही भाषा बोलेगा।"

◆ नेहरू और पटेल — नेहरू आदर्शवादी, अंतरराष्ट्रीय दृष्टि वाले और समाजवाद की ओर झुके हुए थे; पटेल व्यावहारिक, कुशल संगठनकर्ता और दृढ़ प्रशासक थे। कश्मीर, चीन के प्रति नीति और आर्थिक नीति पर दोनों की राय अलग थी। फिर भी दोनों एक-दूसरे के पूरक थे — नेहरू ने जनता को सपना दिया और पटेल ने देश को एक ढाँचा। गांधीजी के निधन के बाद दोनों ने मतभेद भुलाकर साथ काम करने का निश्चय किया।

◆ तिलक और गोखले — दोनों महाराष्ट्र के चितपावन ब्राह्मण और पुणे के शिक्षक थे, पर रास्ते अलग थे। गोखले प्रार्थना, तर्क और धीमे सुधार वाले उदारवादी थे; तिलक स्वराज, बहिष्कार और जन-आंदोलन वाले उग्र राष्ट्रवादी थे। इनकी विस्तृत तुलना खंड 3.5 में दी गई है।

🔍 आसान परिभाषा: विश्व-मानवतावाद

📘 परिभाषा: यह विचार कि पूरी मानव जाति एक परिवार है और किसी एक राष्ट्र, धर्म या जाति की भक्ति से ऊपर मनुष्यता का स्थान है।

💡 आसान भाषा में: अपने देश से प्रेम करो, पर इतना नहीं कि दूसरे देशों के लोगों से घृणा करने लगो — क्योंकि सबसे पहले हम सब मनुष्य हैं। 🏠 उदाहरण: टैगोर ने अपने विश्वविद्यालय का नाम "विश्वभारती" रखा और उसका ध्येय-वाक्य चुना — "जहाँ सारा विश्व एक घोंसला बन जाता है।" इसी सोच के कारण वे उग्र राष्ट्रवाद के आलोचक थे।

📋 दोहराव तालिका: कौन किससे कहाँ भिन्न

जोड़ी

सार — एक वाक्य में

गांधी और टैगोर

परस्पर सम्मान था, पर टैगोर ने स्कूल-बहिष्कार, वस्त्र-दहन और चरखे की आलोचना की।

गांधी और आंबेडकर

गांधीजी हृदय-परिवर्तन से अस्पृश्यता मिटाना चाहते थे, आंबेडकर क़ानूनी अधिकारों से पूरी जाति-व्यवस्था।

गांधी और बोस

गांधीजी अहिंसा और धैर्य के पक्ष में थे, बोस तुरंत संघर्ष और ज़रूरत हो तो शस्त्र के पक्ष में।

गांधी और नेहरू

अहिंसा पर दोनों एकमत थे, पर गांधीजी ग्राम-उद्योग चाहते थे और नेहरू भारी उद्योग।

नेहरू और पटेल

नेहरू आदर्शवादी और समाजवादी थे, पटेल व्यावहारिक और दृढ़ प्रशासक; दोनों एक-दूसरे के पूरक रहे।

तिलक और गोखले

गोखले उदार और क्रमिक सुधार के पक्षधर थे, तिलक स्वराज और जन-आंदोलन के।

12. त्वरित संदर्भ: उपाधियाँ, पुस्तकें, पत्र-पत्रिकाएँ, नारे और सार

यह खंड केवल दोहराव के लिए है। ऊपर जो कुछ विस्तार से पढ़ा, उसे यहाँ चार सूचियों में समेटा गया है — उपाधियाँ, पुस्तकें, पत्र-पत्रिकाएँ और नारे। परीक्षा से ठीक पहले केवल यही खंड दोहरा लेना काफ़ी रहेगा। अंत में पूरे अध्याय का मूल्यांकन, कालक्रम और सार दिया गया है।

12.1 🏅 प्रमुख उपाधियाँ

उपाधियाँ याद करते समय यह भी याद रखें कि उपाधि किसने दी — परीक्षा में अक्सर यही पूछा जाता है।

उपाधि

व्यक्तित्व और संदर्भ

महात्मा; राष्ट्रपिता; बापू

ये तीनों महात्मा गांधी के संबोधन हैं; "महात्मा" टैगोर से और "राष्ट्रपिता" सुभाष बोस से जुड़ा है।

लौह पुरुष; सरदार

वल्लभभाई पटेल को "सरदार" बारडोली की महिलाओं ने कहा।

लोकमान्य; भारतीय अशांति का जनक

बाल गंगाधर तिलक को "भारतीय अशांति का जनक" अंग्रेज़ पत्रकार वेलेंटाइन शिरोल ने कहा था।

पंजाब केसरी

यह लाला लाजपत राय की उपाधि है।

भारत के वयोवृद्ध पुरुष (ग्रैंड ओल्ड मैन)

यह दादाभाई नौरोजी के लिए कहा जाता है।

राष्ट्रगुरु

यह सुरेंद्रनाथ बनर्जी की उपाधि है।

बम्बई का शेर

यह फ़िरोज़शाह मेहता के लिए कहा जाता है।

देशबंधु

यह चित्तरंजन दास की उपाधि है।

महामना

यह मदन मोहन मालवीय की उपाधि है।

नेताजी; देशनायक

सुभाष चंद्र बोस को "देशनायक" टैगोर ने कहा।

शहीद-ए-आज़म

यह भगत सिंह के लिए कहा जाता है।

मास्टर दा

यह सूर्य सेन का लोकप्रिय नाम है।

भारतीय क्रांति की माता

यह भीकाजी कामा के लिए कहा जाता है।

गुरुदेव

यह रवींद्रनाथ टैगोर का संबोधन है, जो गांधीजी ने दिया।

भारत कोकिला

सरोजिनी नायडू को यह नाम गांधीजी ने दिया।

सीमांत गांधी; बादशाह ख़ान

ये ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ाँ के नाम हैं।

क़ायदे-आज़म

यह मोहम्मद अली जिन्ना की उपाधि है।

बाबासाहेब

यह डॉ. भीमराव आंबेडकर का संबोधन है।

लोकनायक

यह जयप्रकाश नारायण की उपाधि है।

राजाजी

यह चक्रवर्ती राजगोपालाचारी का लोकप्रिय नाम है।

दीनबंधु

यह सी. एफ़. एंड्रूज़ की उपाधि है।

आधुनिक भारत के जनक

यह राजा राममोहन राय के लिए कहा जाता है।

कप्पलोट्टिय तमिऴन

यह वी. ओ. चिदंबरम पिल्लै के लिए कहा जाता है।

12.2 📚 प्रमुख पुस्तकें और उनके लेखक

पुस्तकों के नाम मूल रूप में (देवनागरी में) दिए गए हैं, क्योंकि प्रश्नों में यही नाम आते हैं।

लेखक

पुस्तकें

दादाभाई नौरोजी

उन्होंने "पॉवर्टी एंड अन-ब्रिटिश रूल इन इंडिया" लिखी।

रमेशचंद्र दत्त

उन्होंने "इकोनॉमिक हिस्ट्री ऑफ़ इंडिया" लिखी।

सुरेंद्रनाथ बनर्जी

उनकी आत्मकथा "ए नेशन इन मेकिंग" है।

बाल गंगाधर तिलक

उन्होंने "गीता रहस्य" और "द आर्कटिक होम इन द वेदाज़" लिखीं।

लाला लाजपत राय

उन्होंने "अनहैप्पी इंडिया" और "यंग इंडिया" लिखीं।

अरविंद घोष

उनकी प्रमुख रचनाएँ "द लाइफ़ डिवाइन" और "सावित्री" हैं।

महात्मा गांधी

उन्होंने "हिंद स्वराज" और आत्मकथा "सत्य के प्रयोग" लिखीं।

जवाहरलाल नेहरू

उन्होंने "द डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया", "ग्लिम्प्सेज़ ऑफ़ वर्ल्ड हिस्ट्री" और आत्मकथा लिखी।

सुभाष चंद्र बोस

उन्होंने "द इंडियन स्ट्रगल" लिखी।

मौलाना आज़ाद

उन्होंने "इंडिया विन्स फ़्रीडम" और "ग़ुबार-ए-ख़ातिर" लिखीं।

राजेंद्र प्रसाद

उन्होंने "इंडिया डिवाइडेड" लिखी।

भीमराव आंबेडकर

उन्होंने "एनिहिलेशन ऑफ़ कास्ट", "द प्रॉब्लम ऑफ़ द रुपी" और "द बुद्ध एंड हिज़ धम्म" लिखीं।

वि. दा. सावरकर

उन्होंने "1857 का स्वातंत्र्य समर" और "हिंदुत्व" लिखीं।

भगत सिंह

उनका प्रसिद्ध निबंध "मैं नास्तिक क्यों हूँ" है।

रवींद्रनाथ टैगोर

उन्होंने "गीतांजलि", "गोरा" और "घरे-बाइरे" लिखीं।

बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय

उन्होंने "आनंदमठ" लिखा।

स्वामी दयानंद

उन्होंने "सत्यार्थ प्रकाश" लिखी।

ज्योतिबा फुले

उन्होंने "ग़ुलामगीरी" लिखी।

दीनबंधु मित्र

उन्होंने नील किसानों की पीड़ा पर नाटक "नील दर्पण" लिखा।

मैथिलीशरण गुप्त

उन्होंने "भारत भारती" लिखी।

12.3 📰 प्रमुख पत्र-पत्रिकाएँ

उस समय पत्र-पत्रिकाएँ ही जनता तक पहुँचने का सबसे बड़ा साधन थीं; इसलिए लगभग हर बड़े नेता ने कोई-न-कोई पत्र निकाला।

संस्थापक / संपादक

पत्र-पत्रिकाएँ

राजा राममोहन राय

उन्होंने "संवाद कौमुदी" और "मिरात-उल-अख़बार" निकाले।

दादाभाई नौरोजी

उन्होंने "रास्त गोफ़्तार" निकाला।

शिशिर कुमार और मोतीलाल घोष

उन्होंने "अमृत बाज़ार पत्रिका" निकाली।

सुरेंद्रनाथ बनर्जी

उन्होंने "द बंगाली" का संपादन किया।

बाल गंगाधर तिलक

उन्होंने "केसरी" (मराठी) और "मराठा" (अंग्रेज़ी) निकाले।

फ़िरोज़शाह मेहता

उन्होंने "बॉम्बे क्रॉनिकल" शुरू किया।

बिपिनचंद्र पाल और अरविंद घोष

ये कलकत्ता के "वंदे मातरम्" पत्र से जुड़े थे।

श्यामजी कृष्ण वर्मा

उन्होंने लंदन से "द इंडियन सोशियोलॉजिस्ट" निकाला।

ग़दर पार्टी (लाला हरदयाल)

सैन फ़्रांसिस्को से "ग़दर" पत्र निकला।

मदन मोहन मालवीय

उन्होंने "अभ्युदय" और "लीडर" निकाले।

मौलाना आज़ाद

उन्होंने "अल-हिलाल" और "अल-बलाग़" निकाले।

मौलाना मोहम्मद अली

उन्होंने "कॉमरेड" (अंग्रेज़ी) और "हमदर्द" (उर्दू) निकाले।

एनी बेसेंट

उन्होंने "न्यू इंडिया" और "कॉमनवील" निकाले।

मोतीलाल नेहरू

उन्होंने "इंडिपेंडेंट" निकाला।

महात्मा गांधी

उन्होंने "इंडियन ओपिनियन", "यंग इंडिया", "नवजीवन" और "हरिजन" निकाले।

भीमराव आंबेडकर

उन्होंने "मूकनायक", "बहिष्कृत भारत" और "जनता" निकाले।

12.4 📣 प्रसिद्ध नारे और कथन

नारों में सबसे अधिक भूल वहाँ होती है जहाँ नारा गढ़ने वाला और उसे लोकप्रिय बनाने वाला अलग-अलग व्यक्ति हैं। ऐसी जगहों पर विशेष ध्यान दें।

नारा / कथन

किसका है

"स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा"

यह बाल गंगाधर तिलक का कथन है।

"करो या मरो"

यह महात्मा गांधी ने 8 अगस्त 1942 को भारत छोड़ो आंदोलन में दिया।

"भारत छोड़ो"

यह नारा यूसुफ़ मेहर अली ने गढ़ा था।

"तुम मुझे ख़ून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा"; "दिल्ली चलो"

ये सुभाष चंद्र बोस के नारे हैं।

"जय हिंद"

इसे सुभाष चंद्र बोस ने आज़ाद हिंद फ़ौज का अभिवादन बनाया।

"इंक़लाब ज़िंदाबाद"

इसे हसरत मोहानी ने गढ़ा और भगत सिंह ने लोकप्रिय बनाया।

"सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है"

यह बिस्मिल अज़ीमाबादी की रचना है, जिसे रामप्रसाद बिस्मिल ने लोकप्रिय बनाया।

"वंदे मातरम्"

यह बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय के "आनंदमठ" से है।

"सारे जहाँ से अच्छा हिंदोस्ताँ हमारा"

यह मोहम्मद इक़बाल की रचना है।

"जन गण मन"

यह रवींद्रनाथ टैगोर की रचना है।

"आराम हराम है"

यह जवाहरलाल नेहरू का नारा है।

"शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो"

यह डॉ. आंबेडकर का संदेश है।

"वेदों की ओर लौटो"

यह स्वामी दयानंद सरस्वती का नारा है।

"उठो, जागो और लक्ष्य प्राप्ति तक मत रुको"

यह स्वामी विवेकानंद का संदेश है।

"सत्यमेव जयते"

इसे मदन मोहन मालवीय ने लोकप्रिय बनाया।

12.5 ⚖️ समग्र मूल्यांकन — इन व्यक्तित्वों से क्या सीखें?

◆ अनेक धाराएँ, एक लक्ष्य — उदारवादियों ने तर्क और आँकड़ों से अंग्रेज़ी राज की पोल खोली, उग्र राष्ट्रवादियों ने स्वराज की माँग को जनता तक पहुँचाया, गांधीजी ने करोड़ों साधारण लोगों को आंदोलन से जोड़ा, और क्रांतिकारियों ने बलिदान की मिसाल रखी। ये धाराएँ एक-दूसरे की विरोधी नहीं, पूरक थीं।

◆ असहमति लोकतंत्र की शक्ति थी — गांधी और आंबेडकर, गांधी और बोस, नेहरू और पटेल — ये सब खुलकर असहमत हुए, पर एक-दूसरे का सम्मान बना रहा। इसी परंपरा से स्वतंत्र भारत का लोकतंत्र निकला।

◆ राजनीतिक और सामाजिक मुक्ति साथ-साथ — फुले, नारायण गुरु, पेरियार और आंबेडकर ने याद दिलाया कि विदेशी शासन से आज़ादी तब तक अधूरी है जब तक समाज के भीतर बराबरी न हो।

◆ सीमाएँ भी थीं — शुरुआती नेतृत्व अधिकतर शहरी, शिक्षित और उच्च वर्ग से था। महिलाओं, दलितों, आदिवासियों और किसानों की आवाज़ धीरे-धीरे ही नेतृत्व तक पहुँची। अंत में सांप्रदायिक राजनीति को रोका नहीं जा सका और देश का विभाजन हुआ।

◆ आज के लिए संदेश — स्वतंत्र भारत का संविधान इन सभी विचारों का संगम है — उसमें गांधीजी का ग्राम स्वराज (पंचायतें), नेहरू का धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र, आंबेडकर का सामाजिक न्याय और पटेल की राष्ट्रीय एकता, सब एक साथ मिलते हैं।

12.6 📅 कालक्रम — एक नज़र में

नीचे इस अध्याय के व्यक्तित्वों से जुड़ी सबसे महत्त्वपूर्ण तिथियाँ क्रम से दी गई हैं।

वर्ष

घटना

1828

राजा राममोहन राय ने ब्रह्म सभा की स्थापना की।

1873

ज्योतिबा फुले ने सत्यशोधक समाज बनाया।

1875

स्वामी दयानंद ने बम्बई में आर्य समाज की स्थापना की।

1892

दादाभाई नौरोजी ब्रिटिश संसद के सदस्य चुने गए।

1893

विवेकानंद ने शिकागो में भाषण दिया और गांधीजी दक्षिण अफ़्रीका पहुँचे।

1905

गोखले ने भारत सेवक समाज बनाया और श्यामजी कृष्ण वर्मा ने लंदन में इंडिया हाउस खोला।

1907

भीकाजी कामा ने स्टुटगार्ट में भारत का झंडा फहराया।

1913

टैगोर को नोबेल पुरस्कार मिला और सैन फ़्रांसिस्को में ग़दर पार्टी बनी।

1915

गांधीजी दक्षिण अफ़्रीका से भारत लौटे।

1916

तिलक और एनी बेसेंट ने होमरूल लीगें बनाईं; मालवीय ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय स्थापित किया।

1923

चित्तरंजन दास और मोतीलाल नेहरू ने स्वराज पार्टी बनाई।

1927

आंबेडकर ने महाड़ सत्याग्रह किया; बिस्मिल और अशफ़ाक़उल्ला को फाँसी हुई।

1928

बारडोली की जीत पर पटेल "सरदार" कहलाए; लाला लाजपत राय का निधन हुआ।

1929

नेहरू लाहौर अधिवेशन के अध्यक्ष बने; ग़फ़्फ़ार ख़ाँ ने ख़ुदाई ख़िदमतगार बनाया।

1931

चंद्रशेखर आज़ाद शहीद हुए और भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव को फाँसी दी गई।

1932

गांधीजी और आंबेडकर के बीच पूना समझौता हुआ।

1939

त्रिपुरी संकट के बाद सुभाष बोस ने फ़ॉरवर्ड ब्लॉक बनाया।

1943

सुभाष बोस ने सिंगापुर में आज़ाद हिंद सरकार बनाई।

1947

देश स्वतंत्र हुआ; नेहरू प्रधानमंत्री और पटेल गृह मंत्री बने; आंबेडकर प्रारूप समिति के अध्यक्ष बने।

1948

30 जनवरी को महात्मा गांधी की हत्या हुई।

1950

राजेंद्र प्रसाद पहले राष्ट्रपति बने और सरदार पटेल का निधन हुआ।

1956

आंबेडकर ने बौद्ध धर्म अपनाया और उसी वर्ष उनका निधन हुआ।

अब पूरे अध्याय को कुछ कीवर्डों में समेट लें, ताकि अंतिम दोहराव एक नज़र में हो सके।

🔑 कीवर्ड सार

उदारवादी — नौरोजी (धन-निकास), रानाडे, फ़िरोज़शाह मेहता, सुरेंद्रनाथ, गोखले (भारत सेवक समाज)।

उग्र राष्ट्रवादी — तिलक (केसरी, स्वराज), लाजपत राय, बिपिनचंद्र पाल, अरविंद घोष।

गांधी — सत्य, अहिंसा, सत्याग्रह, सर्वोदय, न्यासिता, स्वदेशी, रचनात्मक कार्यक्रम, हिंद स्वराज।

नेहरू और चार स्तंभ — समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता, योजना; पटेल (एकीकरण), राजेंद्र प्रसाद (राष्ट्रपति), राजाजी (गवर्नर जनरल), आज़ाद (शिक्षा मंत्री)।

बोस और क्रांतिकारी — फ़ॉरवर्ड ब्लॉक, आज़ाद हिंद सरकार; भगत सिंह, आज़ाद, बिस्मिल, सावरकर, कामा, हरदयाल, ऊधम सिंह, सूर्य सेन।

आंबेडकर और सुधारक — महाड़, पूना समझौता, प्रारूप समिति, बौद्ध दीक्षा; राममोहन राय, विद्यासागर, दयानंद, विवेकानंद, फुले, सर सैयद, नारायण गुरु, पेरियार।

अन्य — देशबंधु, महामना, एनी बेसेंट, भारत कोकिला, सीमांत गांधी, गुरुदेव, लोकनायक, विनोबा, दीनबंधु।

इन व्यक्तित्वों की कहानी 1947 पर समाप्त नहीं होती। आज़ादी मिलते ही उनके सामने एक नई और बहुत कठिन चुनौती खड़ी थी।

💡 अंतिम बात

नौरोजी के आँकड़ों से तिलक के "स्वराज" तक, गांधी के सत्याग्रह से भगत सिंह के बलिदान तक, नेहरू के विज्ञान से आंबेडकर के संविधान तक — राष्ट्रीय आंदोलन का हर व्यक्तित्व एक अलग रंग था, और इन सब रंगों से आज़ाद भारत का तिरंगा बना। इनकी असहमतियाँ भी उतनी ही शिक्षाप्रद हैं जितने इनके योगदान।

15 अगस्त 1947 को जब देश आज़ाद हुआ, तब भारत के नक़्शे पर 560 से अधिक रियासतें अलग-अलग राजाओं के अधीन थीं। इन्हें एक देश में कैसे जोड़ा गया? अगले अध्याय 17 में पढ़ेंगे — सरदार पटेल और वी. पी. मेनन द्वारा रियासतों का एकीकरण और फिर राज्यों का पुनर्गठन।

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