📖 अध्याय 15/20 — आधुनिक भारत का इतिहास

राष्ट्रीय आंदोलन की विविध धाराएँ: मज़दूर, वामपंथ, किसान और रियासती जनता

मज़दूर वर्ग का उदय, कारख़ाना अधिनियम, बम्बई की मिल हड़तालें, अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस, ट्रेड यूनियन अधिनियम 1926, विभाजन और इंटक, एम. एन. राय और साम्यवादी आंदोलन, कानपुर और मेरठ षड्यंत्र केस, मज़दूर-किसान पार्टियाँ, कांग्रेस समाजवादी पार्टी, प्रगतिशील लेखक संघ और इप्टा, अखिल भारतीय किसान सभा, छात्र-युवा, पूँजीपति वर्ग, विदेशी सहयोगी, देशी राज्य लोक परिषद, हरिपुरा नीति और रियासतों के जन-आंदोलन
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🏭 कहानी से शुरुआत: जुलाई 1908, जब बम्बई की मिलें एक नेता के लिए रुक गईं

22 जुलाई 1908, बम्बई। अदालत का फ़ैसला सुनते ही शहर में सन्नाटा छा गया। राजद्रोह के मुक़दमे में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक को छह साल की सज़ा सुनाई गई थी और उन्हें माँडले (बर्मा) की जेल भेजा जाना था। "केसरी" में लिखे उनके लेख ही उनका अपराध बताए गए थे।

सबसे गहरी चोट उन लोगों को लगी, जिनका जीवन वकीलों और नेताओं की दुनिया से बिल्कुल अलग था। बम्बई की मिलों के मज़दूर रोज़ 14 से 16 घंटे काम करते थे, चालों के एक-एक कमरे में कई परिवारों के साथ रहते थे और छोटी-सी ग़लती पर जुर्माना भरते थे। फिर भी तिलक के मराठी पत्रों से स्वदेशी और स्वाभिमान की बात उन तक पहुँची थी, इसलिए वे तिलक को अपना नेता मानते थे।

अगले दिन मिलों की चिमनियों से धुआँ नहीं उठा। हज़ारों मज़दूर काम छोड़कर सड़कों पर आ गए और व्यापारी-दुकानदार भी उनके साथ हो गए। किसी ने वेतन या काम के घंटों की माँग नहीं रखी। वे केवल एक नेता के सम्मान में रुके थे। छह दिन तक बम्बई ठप रहा। सरकार ने सेना बुलाई, गोलियाँ चलीं और कई मज़दूर मारे गए।

दूर रूस में लेनिन ने इस हड़ताल पर लिखा कि भारत का सर्वहारा वर्ग अब राजनीतिक संघर्ष के लिए जाग उठा है। यह भारत के मज़दूरों की पहली बड़ी राजनीतिक हड़ताल थी। पर स्वदेशी आंदोलन के कमज़ोर पड़ते ही मज़दूर फिर बिना किसी स्थायी संगठन के रह गए। भारत की पहली नियमित ट्रेड यूनियन बनने में अभी दस वर्ष बाक़ी थे।

राष्ट्रीय आंदोलन केवल वकीलों और नेताओं का नहीं था। मिल के मज़दूर, खेत के किसान, छात्र, समाजवादी और रियासतों की जनता, सबने अपनी-अपनी धारा से इस नदी को भरा।

तो मज़दूर संगठित कैसे हुए? साम्यवादी राष्ट्रीय आंदोलन से क्यों जुड़े और क्यों कटे? किसानों ने अपना देशव्यापी संगठन कैसे खड़ा किया? और रियासतों की जनता राजा तथा अंग्रेज़, दोनों से कैसे लड़ी? यही इस अध्याय की कहानी है। आगे दो कहानियाँ भी मिलेंगी, जो मज़दूर-मालिक संबंध के गांधीवादी तरीक़े और रियासती जनता के साहस को आसान तरीक़े से समझा देंगी।

1. भूमिका: राष्ट्रीय आंदोलन की विविध वैचारिक धाराएँ

1920 के दशक के बाद राष्ट्रीय आंदोलन का सामाजिक आधार बहुत फैल गया। पहले यह आंदोलन मुख्यतः शहरों के पढ़े-लिखे मध्यम वर्ग — वकीलों, पत्रकारों, शिक्षकों — तक सीमित था। गांधीजी के आने के बाद गाँव के किसान, कारख़ानों के मज़दूर, स्त्रियाँ और छात्र भी बड़ी संख्या में इसमें उतरे। इन नए वर्गों की अपनी-अपनी समस्याएँ थीं — मज़दूर कम वेतन और लंबे घंटों से परेशान था, किसान भारी लगान और ज़मींदार के अत्याचार से, और रियासतों की जनता राजा के निरंकुश शासन से। इसलिए इन वर्गों ने कांग्रेस के साथ रहते हुए भी अपने अलग संगठन बनाए।

इसी दौर में समाजवाद और साम्यवाद के विचार भी भारत पहुँचे। इन विचारों ने कहा कि केवल अंग्रेज़ों को हटाना काफ़ी नहीं है; आज़ाद भारत में अमीर-ग़रीब का भेद भी मिटना चाहिए। कई बार इन धाराओं और गांधीवादी नेतृत्व के बीच गहरे मतभेद भी हुए, पर कुल मिलाकर इन सबने राष्ट्रीय आंदोलन को एक सच्चा जन-आंदोलन बनाया। नीचे राष्ट्रीय आंदोलन की सभी प्रमुख धाराएँ संक्षेप में दी गई हैं, ताकि यह अध्याय पूरी तस्वीर में अपनी जगह समझ आए।

◆ उदारवादी और उग्र राष्ट्रवादी धारा — आरंभिक कांग्रेस के उदारवादी नेता प्रार्थना-पत्र और संवैधानिक माँगों से सुधार चाहते थे, जबकि तिलक, लाला लाजपत राय और बिपिन चंद्र पाल जैसे उग्र राष्ट्रवादियों ने स्वदेशी, बहिष्कार और स्वराज का रास्ता अपनाया। इसका विस्तार अध्याय 10 में है।

◆ क्रांतिकारी धारा — इस धारा के युवा सशस्त्र संघर्ष और बलिदान से अंग्रेज़ी शासन को उखाड़ना चाहते थे। 1920 के दशक में हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के साथ इस धारा ने भी समाजवाद को अपना लक्ष्य बनाया। इसका विस्तार अध्याय 11 में है।

◆ गांधीवादी धारा — सत्य, अहिंसा, सत्याग्रह और रचनात्मक कार्यक्रम पर आधारित यह धारा राष्ट्रीय आंदोलन की मुख्य धारा बनी और इसी का जन-आधार सबसे बड़ा था। इसका विस्तार अध्याय 12 और 13 में है।

◆ समाजवादी और साम्यवादी धारा — यह धारा आर्थिक समानता चाहती थी और मज़दूरों-किसानों के वर्ग-आधारित संगठन बनाती थी। इसके कुछ नेता कांग्रेस के भीतर रहकर (कांग्रेस समाजवादी पार्टी) और कुछ कांग्रेस के बाहर रहकर (भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी) काम करते थे। इसका विस्तार इसी अध्याय में है।

◆ मज़दूर और किसान धारा — ट्रेड यूनियनों, हड़तालों और किसान सभाओं के माध्यम से इन वर्गों ने अपनी आर्थिक माँगों को राष्ट्रीय माँगों से जोड़ा। मज़दूर आंदोलन और अखिल भारतीय किसान सभा इसी अध्याय में हैं, जबकि अलग-अलग किसान विद्रोहों का विस्तार अध्याय 6 में है।

◆ रियासती जनता की धारा — देशी रियासतों की जनता ने राजाओं से उत्तरदायी शासन और नागरिक अधिकारों की माँग की। इसका अखिल भारतीय परिदृश्य इसी अध्याय में है और रियासतों का एकीकरण अध्याय 17 में।

◆ अन्य धाराएँ — जाति-विरोधी और दलित आंदोलनों ने सामाजिक समानता, मंदिर प्रवेश और प्रतिनिधित्व की माँग की (अध्याय 9); मुस्लिम लीग और हिंदू महासभा जैसी सांप्रदायिक धारा ने धर्म-आधारित राजनीति की (अध्याय 14); और स्त्रियों ने हर आंदोलन में भाग लेने के साथ अपने संगठन भी बनाए (अध्याय 20)।

💡 गांधीजी की "छतरी"

कांग्रेस एक दल से अधिक एक मंच थी, जिसके नीचे दक्षिणपंथी उद्योगपति-समर्थक नेता, गांधीवादी, समाजवादी और कई वर्षों तक साम्यवादी भी साथ रहे। गांधीजी ने इन सबको एक "छतरी" के नीचे रखने की कोशिश की, ताकि साम्राज्यवाद के विरुद्ध लड़ाई में राष्ट्र न बँटे। इस अध्याय में बार-बार दिखेगा कि यह संतुलन कितनी बार टूटते-टूटते बचा।

2. मज़दूर वर्ग का उदय, आरंभिक आंदोलन और कारख़ाना अधिनियम (1850–1918)

नीचे का चार्ट 1870 से 1947 तक भारतीय मज़दूर आंदोलन की पूरी यात्रा को सात चरणों में दिखाता है। यह केवल याद रखने के लिए सार है। इसके हर चरण — आरंभिक प्रयास, स्वदेशी युग की हड़तालें, पहली यूनियनें, क़ानून और उग्र चरण, विभाजन और एकता, प्रांतीय सरकारें और युद्ध, तथा युद्धोत्तर उभार — का पूरा विस्तार इस खंड और अगले खंड में क्रम से दिया गया है।

चित्र 15.1: भारतीय मज़दूर आंदोलन की विकास-यात्रा (1870–1947)
चित्र 15.1: भारतीय मज़दूर आंदोलन की विकास-यात्रा (1870–1947)

2.1 आधुनिक उद्योग और मज़दूर वर्ग का जन्म

भारत में आधुनिक, मशीन से चलने वाले उद्योग उन्नीसवीं सदी के मध्य से शुरू हुए। 1853 में बम्बई से ठाणे तक पहली रेलगाड़ी चली और रेलवे के साथ हज़ारों लोगों को वर्कशॉप, पटरियों और स्टेशनों पर काम मिला। 1854 में कावसजी नानाभाई डावर ने बम्बई में पहली सूती कपड़ा मिल खोली, और 1855 में बंगाल के रिशरा में पहली जूट मिल लगी। इसके साथ असम और बंगाल के चाय बागान, बिहार-बंगाल की कोयला खानें, और बाद में जमशेदपुर का टाटा इस्पात कारख़ाना (1907) भी खड़े हुए।

इन उद्योगों में काम करने के लिए गाँवों से ग़रीब किसान, भूमिहीन खेतिहर और बेरोज़गार कारीगर शहरों की ओर आए। वे अपनी ज़मीन या औज़ारों के मालिक नहीं थे; उनके पास बेचने को केवल अपनी मेहनत थी। इस तरह भारत में एक नया वर्ग पैदा हुआ — कारख़ाना मज़दूर या औद्योगिक सर्वहारा। शुरू में ये मज़दूर गाँव से पूरी तरह कटे नहीं थे, जाति और क्षेत्र के आधार पर बँटे हुए थे और पढ़े-लिखे नहीं थे, इसलिए इनके संगठित होने में काफ़ी समय लगा।

2.2 मज़दूरों की दशा — इतनी कठिन क्यों थी?

◆ काम के घंटे — कारख़ानों में दिन में 14 से 16 घंटे तक काम लिया जाता था और साप्ताहिक छुट्टी का कोई नियम नहीं था। बिजली की रोशनी आने के बाद तो रात में भी मिलें चलने लगीं, जिससे घंटे और बढ़ गए।

◆ मज़दूरी — वेतन बहुत कम और अनिश्चित था। छोटी-छोटी ग़लतियों पर जुर्माना काट लिया जाता था। मज़दूर की भर्ती "जॉबर" (बम्बई) या "सरदार" (कलकत्ता) नाम के बिचौलिये करते थे, जो नौकरी दिलाने और बनाए रखने के बदले मज़दूर की कमाई का हिस्सा ले लेते थे।

◆ बाल और महिला श्रम — छोटे-छोटे बच्चों से भी पूरे दिन काम लिया जाता था, क्योंकि उन्हें बहुत कम मज़दूरी देनी पड़ती थी। महिलाओं को पुरुषों से कम मज़दूरी मिलती थी और प्रसव के समय कोई छुट्टी या सहायता नहीं थी।

◆ रहने की दशा — बम्बई की "चालों" (एक-एक कमरे वाली लंबी इमारतें) और कलकत्ता की "बस्तियों" में एक छोटे कमरे में कई परिवार रहते थे। गंदगी और भीड़ के कारण हैज़ा, प्लेग और क्षय रोग फैलते रहते थे।

◆ बागान मज़दूरों की विशेष पीड़ा — असम के चाय बागानों में मज़दूरों को अनुबंध (इंडेंचर) क़ानूनों के तहत कई वर्षों के लिए बाँध दिया जाता था। बागान छोड़कर भागने पर उन्हें पकड़कर सज़ा दी जा सकती थी। इसलिए उनकी दशा लगभग ग़ुलामी जैसी थी।

◆ सुरक्षा का अभाव — मशीनों पर काम करते हुए दुर्घटना में अंग कट जाए या मृत्यु हो जाए, तो कोई मुआवज़ा नहीं मिलता था। जो मज़दूर संगठन बनाने की बात करता, उसे नौकरी से निकाल दिया जाता था।

🔍 आसान परिभाषा: ट्रेड यूनियन (मज़दूर संघ)

📘 परिभाषा: एक ही उद्योग, कारख़ाने या पेशे में काम करने वाले मज़दूरों का स्थायी, नियमित सदस्यता और चंदे वाला संगठन, जो अपने सदस्यों के वेतन, काम के घंटों, सुरक्षा और सेवा-शर्तों की रक्षा के लिए मालिकों से सामूहिक रूप से बातचीत (सामूहिक सौदेबाज़ी) करता है और ज़रूरत पड़ने पर हड़ताल जैसे साधन अपनाता है।

💡 आसान भाषा में: अकेला मज़दूर मालिक के सामने कमज़ोर है — मालिक उसे कभी भी निकाल सकता है। पर जब सारे मज़दूर एक होकर माँग रखते हैं, तो मालिक को सुनना पड़ता है। "एकता में शक्ति" — यही ट्रेड यूनियन का मूल विचार है। 🏠 उदाहरण: मद्रास लेबर यूनियन (1918) को भारत की पहली नियमित ट्रेड यूनियन माना जाता है, क्योंकि उसमें नियमित सदस्यता और चंदा था; जबकि 1890 का बॉम्बे मिल हैंड्स एसोसिएशन मज़दूरों का संगठन तो था, पर नियमित सदस्यता वाली यूनियन नहीं था।

2.3 आरंभिक राष्ट्रवादियों का रुख़ — दुविधा क्यों?

आरंभिक राष्ट्रवादी नेता मज़दूरों के प्रश्न पर दुविधा में थे, और इसके पीछे दो कारण थे। पहला — जब सरकार ने कारख़ाना क़ानून बनाए, तो राष्ट्रवादियों को लगा कि ये क़ानून मज़दूरों की भलाई के लिए कम और लंकाशायर (इंग्लैंड) के मिल-मालिकों के दबाव में अधिक लाए जा रहे हैं। लंकाशायर के मालिक चाहते थे कि भारतीय मिलों के काम के घंटे कम हों, ताकि भारतीय कपड़ा महँगा हो जाए और उनका कपड़ा बाज़ार में टिका रहे। दूसरा — राष्ट्रवादी नेता नहीं चाहते थे कि भारतीय मिल-मालिकों और भारतीय मज़दूरों के बीच टकराव हो, क्योंकि इससे साम्राज्यवाद के विरुद्ध राष्ट्रीय एकता कमज़ोर होती।

पर जहाँ उद्योग विदेशी स्वामित्व के थे — जैसे असम के चाय बागान और रेलवे — वहाँ राष्ट्रवादियों ने मज़दूरों का खुलकर साथ दिया, क्योंकि वहाँ शोषक अंग्रेज़ थे। ब्रह्म समाजी द्वारकानाथ गांगुली ने स्वयं असम जाकर चाय बागानों के "कुलियों" की दशा देखी और "संजीवनी" पत्र में उन पर लेख लिखे। कांग्रेस ने बागान मज़दूरों को बाँधकर रखने वाले अंतर्देशीय प्रवास अधिनियम (1901) का भी विरोध किया।

📌 याद रखें

इसका परिणाम यह हुआ कि उन्नीसवीं सदी में मज़दूरों के लिए पहली आवाज़ राष्ट्रवादी राजनीति से नहीं, बल्कि परोपकारी समाज-सुधारकों — शशिपद बनर्जी, सोराबजी शापुरजी बंगाली और नारायण मेघाजी लोखंडे — से उठी। मज़दूर आंदोलन का राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ाव स्वदेशी युग (1903–08) में शुरू हुआ।

2.4 आरंभिक प्रयास (1870–1899)

◆ शशिपद बनर्जी (1870, 1874) — बंगाल के ब्रह्म समाजी सुधारक शशिपद बनर्जी ने 1870 में कलकत्ता के पास बारानगर में मज़दूरों के लिए "वर्किंग मेन्स क्लब" बनाया, जहाँ मज़दूरों को पढ़ना-लिखना सिखाया जाता था और उनकी भलाई की बातें होती थीं। 1874 में उन्होंने मज़दूरों के लिए बांग्ला मासिक पत्र "भारत श्रमजीवी" निकाला। उनका उद्देश्य मज़दूरों को शिक्षित और जागरूक बनाना था, हड़ताल या संघर्ष नहीं।

◆ सोराबजी शापुरजी बंगाली (1878) — बम्बई के इस पारसी समाजसेवी ने मज़दूरों, विशेषकर स्त्रियों और बच्चों के काम के घंटे सीमित करने के लिए बम्बई विधान परिषद में विधेयक लाने का प्रयास किया। यह प्रयास सफल नहीं हुआ, पर इससे कारख़ाना क़ानून की माँग को बल मिला।

नारायण मेघाजी लोखंडे (1848–1897) — भारतीय मज़दूर आंदोलन के अग्रदूत

महाराष्ट्र के माली समुदाय में जन्मे लोखंडे ज्योतिबा फुले के सत्यशोधक समाज से जुड़े थे और स्वयं कुछ समय मिल में काम कर चुके थे। 1880 में उन्होंने मराठी पत्र "दीनबंधु" का संपादन शुरू किया, जिसमें मज़दूरों की पीड़ा छपती थी। 1884 में उन्होंने बम्बई में मिल मज़दूरों की एक बड़ी सभा बुलाकर साप्ताहिक छुट्टी, दोपहर में आधे घंटे का विश्राम और दुर्घटना पर मुआवज़े जैसी माँगों वाला ज्ञापन तैयार करवाया, जिस पर हज़ारों मज़दूरों ने हस्ताक्षर किए। 1890 में उन्होंने "बॉम्बे मिल हैंड्स एसोसिएशन" बनाया, जिसे भारत का पहला मज़दूर संगठन माना जाता है; उसी वर्ष बम्बई के मिल-मालिकों ने मज़दूरों को रविवार की साप्ताहिक छुट्टी देना स्वीकार किया। ध्यान रहे कि यह संगठन नियमित सदस्यता और चंदे वाली यूनियन नहीं था। लोखंडे ने जाति और सांप्रदायिक सद्भाव के प्रश्नों पर भी साहसी काम किया और 1896–97 के प्लेग में रोगियों की सेवा करते हुए उनकी मृत्यु हुई। भारत सरकार ने 2005 में उन पर डाक टिकट जारी किया।

◆ ग्रेट इंडियन पेनिनसुलर रेलवे की हड़ताल (1899) — इस रेलवे के सिग्नल कर्मचारियों ने वेतन और काम के घंटों को लेकर हड़ताल की। इस हड़ताल की ख़ास बात यह थी कि तिलक के "मराठा" और "केसरी" जैसे राष्ट्रवादी पत्रों ने इसका खुलकर समर्थन किया और उसके लिए चंदा भी इकट्ठा किया गया — यानी राष्ट्रवादी और मज़दूर एक-दूसरे के क़रीब आने लगे थे।

2.5 स्वदेशी युग की हड़तालें (1903–1908)

बंगाल विभाजन के विरुद्ध चले स्वदेशी आंदोलन ने पहली बार मज़दूर आंदोलन को राष्ट्रीय राजनीति से जोड़ा। उग्र राष्ट्रवादी नेताओं ने समझा कि विदेशी मालिकों वाले कारख़ानों, छापाख़ानों और रेलवे में हड़ताल भी अंग्रेज़ी शासन पर आर्थिक आघात का एक तरीक़ा है। बंगाल के अश्विनी कुमार बनर्जी, प्रभात कुमार रायचौधरी, प्रेमतोष बोस और अपूर्व कुमार घोष जैसे नेता इन हड़तालों को संगठित करने में आगे रहे।

◆ कलकत्ता सरकारी छापाख़ाना (1905) — सरकारी प्रेस के कर्मचारियों ने कम वेतन और कठोर नियमों के विरुद्ध हड़ताल की और उसी दौरान प्रिंटर्स यूनियन बनाई, जो भारत की आरंभिक यूनियनों में गिनी जाती है।

◆ ईस्ट इंडियन रेलवे (1906–07) — बंगाल में इस विदेशी रेलवे कंपनी के कर्मचारियों ने कई हड़तालें कीं और रेलवेमेन्स यूनियन बनाई। राष्ट्रवादी पत्रों और नेताओं ने इनका साथ दिया, जिससे मज़दूरों की लड़ाई "अंग्रेज़ मालिक के विरुद्ध भारतीय मज़दूर" की लड़ाई बन गई।

◆ तूतीकोरिन की कोरल मिल (1908) — मद्रास प्रेसीडेंसी के तूतीकोरिन में अंग्रेज़ों की कोरल कॉटन मिल के मज़दूरों ने वी. ओ. चिदंबरम पिल्लै और सुब्रमण्य शिव के नेतृत्व में हड़ताल की। चिदंबरम पिल्लै ने अंग्रेज़ी जहाज़रानी कंपनी का मुक़ाबला करने के लिए स्वदेशी जहाज़ कंपनी भी बनाई थी, इसलिए उन्हें "कप्पलोट्टिय तमिऴन" (जहाज़ चलाने वाला तमिल) कहा जाता है। हड़ताल सफल रही, पर मार्च 1908 में दोनों नेताओं की गिरफ़्तारी के बाद तिरुनेलवेली में दंगे और गोलीबारी हुई और चिदंबरम पिल्लै को लंबी सज़ा हुई।

जुलाई 1908 की बम्बई राजनीतिक हड़ताल

◆ पृष्ठभूमि — तिलक बम्बई के मज़दूरों में बहुत लोकप्रिय थे, क्योंकि उन्होंने मराठी पत्रों के माध्यम से स्वदेशी और राष्ट्रीय स्वाभिमान की बात घर-घर पहुँचाई थी। 22 जुलाई 1908 को "केसरी" में लिखे लेखों के लिए उन्हें राजद्रोह में छह वर्ष की सज़ा सुनाई गई और माँडले (बर्मा) भेज दिया गया।

◆ घटनाक्रम — सज़ा के विरोध में बम्बई के कपड़ा मिल मज़दूरों ने काम बंद कर दिया और छह दिन तक हड़ताल चली। शहर के व्यापारी और दुकानदार भी शामिल हुए। सरकार ने सेना बुलाई और गोली चलने से कई मज़दूर मारे गए।

◆ महत्त्व — यह भारतीय मज़दूरों की पहली बड़ी राजनीतिक हड़ताल थी, जो वेतन के लिए नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय नेता के सम्मान में हुई। लेनिन ने इसे भारत के सर्वहारा वर्ग के राजनीतिक जागरण का संकेत माना। इससे यह भी सिद्ध हुआ कि मज़दूर वर्ग राष्ट्रीय आंदोलन की एक बड़ी शक्ति बन सकता है।

◆ सीमा — स्वदेशी आंदोलन के कमज़ोर पड़ते ही (1908 के बाद) ये हड़तालें भी थम गईं, क्योंकि अभी स्थायी यूनियनें नहीं बनी थीं। स्थायी संगठन का दौर प्रथम विश्वयुद्ध के बाद आया।

2.6 कारख़ाना अधिनियम और श्रम क़ानून — क्रम से

कारख़ाना अधिनियम (फ़ैक्टरी एक्ट) वह क़ानून है जो कारख़ानों में काम के घंटे, बच्चों और स्त्रियों से काम लेने की शर्तें, छुट्टी और सुरक्षा के नियम तय करता है। भारत में ऐसे क़ानून धीरे-धीरे, कई चरणों में बने। हर नया अधिनियम पिछले की कमियाँ दूर करता गया:

◆ पहला कारख़ाना अधिनियम, 1881 (लॉर्ड रिपन) — यह उन कारख़ानों पर लागू था जो मशीन की शक्ति से चलते थे और जिनमें 100 या अधिक मज़दूर काम करते थे। इसने 7 वर्ष से कम आयु के बच्चों से काम लेना वर्जित किया, 7 से 12 वर्ष के बच्चों के लिए काम के घंटे अधिकतम 9 घंटे प्रतिदिन तय किए और उन्हें महीने में 4 छुट्टियाँ दीं। ख़तरनाक मशीनों को घेरने का नियम भी बना। पर इसमें स्त्री मज़दूरों और वयस्क पुरुषों के लिए कोई प्रावधान नहीं था, इसलिए मज़दूर इससे निराश रहे।

◆ दूसरा कारख़ाना अधिनियम, 1891 (लॉर्ड लैंसडाउन) — इसे 50 या अधिक मज़दूरों वाले कारख़ानों पर लागू किया गया। बच्चों की न्यूनतम आयु 9 वर्ष की गई और 9 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए 7 घंटे तय हुए। पहली बार स्त्रियों के लिए अधिकतम 11 घंटे (बीच में डेढ़ घंटे का विश्राम) तय हुए और सभी मज़दूरों को साप्ताहिक छुट्टी का अधिकार मिला।

◆ कारख़ाना अधिनियम, 1911 — पहली बार वयस्क पुरुषों के घंटे सीमित हुए: सूती मिलों में पुरुषों के लिए अधिकतम 12 घंटे और बच्चों के लिए 6 घंटे। बच्चों से रात में काम लेने पर भी रोक लगी।

◆ कारख़ाना अधिनियम, 1922 — यह अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के प्रभाव में बना। इसमें सभी वयस्कों के लिए रोज़ 11 घंटे और सप्ताह में 60 घंटे की सीमा तय हुई; बच्चों की आयु 12 से 15 वर्ष और उनके लिए 6 घंटे तय हुए; और यह 20 या अधिक मज़दूरों वाले कारख़ानों पर लागू हुआ।

◆ कामगार क्षतिपूर्ति अधिनियम, 1923 — काम के दौरान दुर्घटना में मज़दूर घायल हो जाए या उसकी मृत्यु हो जाए, तो मालिक को मुआवज़ा देना अनिवार्य हुआ। उदाहरण — मशीन में हाथ कट जाने पर अब मज़दूर या उसका परिवार क़ानूनी रूप से मुआवज़ा माँग सकता था।

◆ कारख़ाना अधिनियम, 1934 — व्हिटली आयोग (शाही श्रम आयोग) की सिफ़ारिशों पर बना। पूरे वर्ष चलने वाले स्थायी कारख़ानों में रोज़ 10 घंटे और सप्ताह में 54 घंटे की सीमा तय हुई; बच्चों के लिए 5 घंटे तय हुए।

◆ मज़दूरी भुगतान अधिनियम, 1936 — मज़दूरों को समय पर वेतन देना अनिवार्य हुआ और वेतन से मनमानी कटौती (जैसे बिना कारण जुर्माना) पर रोक लगी।

◆ अन्य — ट्रेड यूनियन अधिनियम (1926) और व्यापार विवाद अधिनियम (1929) मज़दूर संगठनों से जुड़े थे, इसलिए उनका विस्तार अगले खंड में है। बम्बई प्रांत ने 1929 में स्त्री मज़दूरों के लिए मातृत्व लाभ अधिनियम भी बनाया।

3. संगठित मज़दूर आंदोलन: अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस से इंटक तक (1918–1947)

3.1 पृष्ठभूमि — प्रथम विश्वयुद्ध के बाद संगठन की लहर क्यों?

◆ महँगाई — प्रथम विश्वयुद्ध (1914–18) के दौरान और उसके बाद अनाज, कपड़े और रोज़मर्रा की चीज़ों के दाम बहुत बढ़ गए, पर मज़दूरी लगभग वहीं की वहीं रही। दूसरी ओर युद्ध के समय की माँग से मिल-मालिकों ने भारी मुनाफ़ा कमाया। इस असमानता ने मज़दूरों में गहरा असंतोष पैदा किया।

◆ रूसी क्रांति (1917) — रूस में मज़दूरों और किसानों की सरकार बनने की ख़बर ने पूरी दुनिया के मज़दूरों को यह विश्वास दिया कि संगठित होकर वे भी बड़ी शक्ति बन सकते हैं।

◆ अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (1919) — युद्ध के बाद 1919 में अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आई.एल.ओ.) बना, जिसमें हर देश से मज़दूरों का प्रतिनिधि जाना था। भारत में ऐसा कोई राष्ट्रीय मज़दूर संगठन नहीं था जो यह प्रतिनिधि चुन सके, इसलिए सरकार ने 1919 में एन. एम. जोशी को मनोनीत किया। इससे यह ज़रूरत सामने आई कि मज़दूरों का अपना अखिल भारतीय संगठन हो।

◆ गांधीजी और असहयोग — गांधीजी के आने से राजनीति जन-आधारित बनी और मज़दूर भी रौलेट सत्याग्रह तथा असहयोग आंदोलन की सभाओं और हड़तालों में शामिल होने लगे। परिणाम यह हुआ कि 1918 से 1921 के बीच देशभर में हड़तालों की बाढ़ आ गई और पहली नियमित ट्रेड यूनियनें बनीं। बम्बई में सूती मिल मज़दूरों ने 1919 और 1920 में बड़ी हड़तालें कीं।

3.2 मद्रास लेबर यूनियन (27 अप्रैल 1918) — पहली नियमित ट्रेड यूनियन

◆ कौन, कब, कहाँ — 27 अप्रैल 1918 को मद्रास में बी. पी. वाडिया ने मद्रास लेबर यूनियन की स्थापना की। इसमें मुख्य रूप से बकिंघम और कर्नाटक मिलों के कपड़ा मज़दूर थे। वाडिया एक पारसी थियोसोफ़िस्ट थे, जो एनी बेसेंट के सहयोगी और होमरूल आंदोलन के कार्यकर्ता थे।

◆ विशेषता — इसमें नियमित सदस्यता और चंदे की व्यवस्था थी, इसलिए इसे भारत की पहली नियमित (आधुनिक) ट्रेड यूनियन माना जाता है। इसने मज़दूरों के लिए काम के घंटे कम करने, भोजन-अवकाश और बेहतर व्यवहार की माँग उठाई।

◆ मुक़दमा और उसका महत्त्व — मिल-मालिकों ने हड़ताल से हुए नुक़सान के लिए यूनियन के नेताओं पर मद्रास उच्च न्यायालय में मुक़दमा किया और अदालत ने यूनियन को हड़ताल के लिए ज़िम्मेदार ठहराया। इसका अर्थ था कि उस समय के क़ानून में हड़ताल कराने वाले यूनियन नेता पर मुक़दमा चल सकता था। इसी अनुभव से यह माँग उठी कि यूनियनों को क़ानूनी मान्यता और सुरक्षा मिले — जो आगे ट्रेड यूनियन अधिनियम (1926) के रूप में पूरी हुई।

◆ आगे — मद्रास लेबर यूनियन के बाद शीघ्र ही बम्बई, कलकत्ता (जैसे भारतीय नाविकों का संघ) और मद्रास में कई और यूनियनें बनीं।

3.3 अहमदाबाद मिल हड़ताल (1918) और मजूर महाजन (1920)

📖 कहानी 1: मिल-मालिक की बहन मज़दूरों के साथ

1917 में अहमदाबाद में प्लेग फैला तो मज़दूर शहर छोड़कर भागने लगे। मिलें बंद न हो जाएँ, इसलिए मालिकों ने उन्हें रोकने के लिए अतिरिक्त "प्लेग बोनस" देना शुरू किया। प्लेग ख़त्म हुआ तो मालिक यह बोनस बंद करना चाहते थे, जबकि महँगाई के कारण मज़दूर वेतन में 50 प्रतिशत वृद्धि माँग रहे थे।

इस विवाद में एक अनोखी बात थी। मिल-मालिकों के नेता अंबालाल साराभाई थे, पर उनकी अपनी बहन अनसूया साराभाई मज़दूरों के साथ खड़ी थीं। मार्च 1918 में गांधीजी ने मज़दूरों का नेतृत्व सँभाला। उन्होंने मज़दूरों से अहिंसक रहने का वचन लिया और माँग घटाकर 35 प्रतिशत वृद्धि पर शांतिपूर्ण हड़ताल शुरू कराई। मालिकों के प्रति कड़वाहट न फैले, इसका उन्होंने पूरा ध्यान रखा।

कुछ दिनों बाद हड़ताल कमज़ोर पड़ने लगी और कुछ मज़दूर डगमगाने लगे। तब गांधीजी ने अनशन कर लिया। भारत में यह उनका पहला अनशन था। उसका उद्देश्य मालिकों को डराना नहीं, बल्कि मज़दूरों को उनके अपने वचन की याद दिलाना था। लगभग तीन दिन में मामला पंच-निर्णय (मध्यस्थता) को सौंपा गया और पंच ने मज़दूरों के पक्ष में 35 प्रतिशत वृद्धि तय की।

इसी संघर्ष से अहमदाबाद टेक्सटाइल लेबर एसोसिएशन की नींव पड़ी, जो 1920 में औपचारिक रूप से बनी और "मजूर महाजन" कहलाई। यह यूनियन मालिक और मज़दूर के रिश्ते का एक नया गांधीवादी नमूना बनी।

🧭 इस कहानी से कौन-सी अवधारणा साफ़ हुई

✔ वर्ग-सहयोग, वर्ग-संघर्ष नहीं — गांधीवादी तरीक़े में मालिक को शत्रु नहीं, मज़दूरों का "न्यासी" माना जाता है। इसीलिए यह साम्यवादियों के वर्ग-संघर्ष से बिल्कुल अलग था।

✔ पंच-निर्णय और हड़ताल अंतिम उपाय — विवाद को बातचीत और मध्यस्थता से सुलझाना पहला रास्ता है और हड़ताल केवल आख़िरी उपाय है।

✔ अनशन का नैतिक बल — गांधीजी का पहला अनशन किसी को झुकाने के लिए नहीं, बल्कि आंदोलन के अपने साथियों को वचन पर टिकाए रखने के लिए था।

📝 परीक्षा के लिए: अहमदाबाद मिल हड़ताल (मार्च 1918) → गांधीजी का पहला अनशन → 35% वृद्धि का पंच-निर्णय → मजूर महाजन (1920); मालिकों के नेता अंबालाल साराभाई, मज़दूरों के साथ अनसूया साराभाई।

◆ पृष्ठभूमि — 1917 में अहमदाबाद में प्लेग फैलने पर मज़दूरों को शहर में रोकने के लिए मिल-मालिकों ने अतिरिक्त "प्लेग बोनस" दिया था। प्लेग ख़त्म होने पर मालिक यह बोनस बंद करना चाहते थे, जबकि महँगाई के कारण मज़दूर वेतन में 50% वृद्धि माँग रहे थे।

◆ घटनाक्रम — मार्च 1918 में गांधीजी ने मज़दूरों का नेतृत्व किया और उन्हें 35% वृद्धि की माँग पर अहिंसक हड़ताल के लिए तैयार किया। मिल-मालिकों के नेता अंबालाल साराभाई थे, जबकि उनकी बहन अनसूया साराभाई मज़दूरों के साथ थीं। जब हड़ताल कमज़ोर पड़ने लगी, तो गांधीजी ने अनशन किया — भारत में यह उनका पहला अनशन था।

◆ परिणाम — मामला पंच-निर्णय (मध्यस्थता) को सौंपा गया और पंच ने मज़दूरों के पक्ष में 35% वृद्धि का निर्णय दिया।

◆ मजूर महाजन — इसी संघर्ष से अहमदाबाद टेक्सटाइल लेबर एसोसिएशन की नींव पड़ी, जो 1920 में औपचारिक रूप से बना और "मजूर महाजन" कहलाया। (कुछ प्रश्नों में इसकी स्थापना 1918 और संस्थापक महात्मा गांधी बताए जाते हैं — ऐसा इसलिए कि इसकी नींव 1918 की हड़ताल में ही पड़ी थी।) गुलज़ारीलाल नंदा और शंकरलाल बैंकर इसके प्रमुख कार्यकर्ता रहे।

◆ महत्त्व — गांधीवादी मॉडल — इस यूनियन ने मज़दूर-मालिक संबंध का गांधीवादी तरीक़ा सामने रखा: वर्ग-संघर्ष नहीं, वर्ग-सहयोग; विवाद को बातचीत और पंच-निर्णय से सुलझाना; हड़ताल अंतिम उपाय; और मालिक को मज़दूरों का "न्यासी" मानना। यह साम्यवादियों के वर्ग-संघर्ष वाले तरीक़े से बिल्कुल अलग था।

3.4 अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस (31 अक्टूबर 1920)

◆ पृष्ठभूमि — 1918–20 तक अलग-अलग शहरों में यूनियनें बन चुकी थीं, पर उनका कोई राष्ट्रीय मंच नहीं था। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन में भारतीय मज़दूरों का प्रतिनिधि चुनने के लिए भी एक राष्ट्रीय संगठन चाहिए था। इसलिए भारतीय श्रमिक संगठनों ने आपस में संगठित होने का फ़ैसला किया।

◆ स्थापना — 31 अक्टूबर 1920 को बम्बई में अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस की स्थापना हुई। यह भारत का पहला राष्ट्रीय मज़दूर संगठन था। इसके पहले अधिवेशन में 60 से अधिक यूनियनों के प्रतिनिधि आए।

◆ पदाधिकारी — पहले अध्यक्ष लाला लाजपत राय, उपाध्यक्ष जोसेफ़ बैप्टिस्टा और महासचिव दीवान चमन लाल थे। इसके गठन में सबसे बड़ी भूमिका एन. एम. जोशी की थी, इसलिए इसकी स्थापना का श्रेय प्रायः उन्हें दिया जाता है।

◆ कांग्रेस से संबंध — कांग्रेस के गया अधिवेशन (1922) ने अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस के गठन का स्वागत किया और उसकी सहायता के लिए समिति बनाई। आगे चलकर कई बड़े राष्ट्रीय नेता इसके अध्यक्ष बने — सी. आर. दास (1923 और 1924), वी. वी. गिरि (1926 और 1942), जवाहरलाल नेहरू (1929, नागपुर) और सुभाष चंद्र बोस (1931, कलकत्ता)। इसी संगठन ने अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन में भारतीय मज़दूरों का प्रतिनिधित्व किया।

◆ महत्त्व — इससे मज़दूर आंदोलन स्थानीय से राष्ट्रीय बना और मज़दूरों की आर्थिक माँगें साम्राज्यवाद-विरोध की राजनीतिक लड़ाई से जुड़ गईं।

❝ साम्राज्यवाद और सैन्यवाद, पूँजीवाद की जुड़वाँ संतानें हैं। ❞ (लाला लाजपत राय, ट्रेड यूनियन कांग्रेस का पहला अधिवेशन, बम्बई, 1920)

लाला लाजपत राय ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा कि भारत के मज़दूरों को एक साथ दो शत्रुओं से लड़ना है — विदेशी साम्राज्यवाद और देशी-विदेशी पूँजी का शोषण। यानी उन्होंने पहली बार मज़दूर आंदोलन को सीधे साम्राज्यवाद-विरोध से जोड़ा।

प्रमुख व्यक्तित्व

◆ लाला लाजपत राय (1865–1928) — पंजाब के फ़िरोज़पुर ज़िले के ढुडिके गाँव में जन्मे लाला जी "पंजाब केसरी" कहलाते हैं। वे आर्य समाज से जुड़े, लाल-बाल-पाल की उग्र राष्ट्रवादी त्रयी के सदस्य रहे और 1907 में उन्हें बर्मा के माँडले निर्वासित किया गया। अमेरिका में रहते हुए उन्होंने इंडियन होमरूल लीग ऑफ़ अमेरिका (1917) बनाई और "यंग इंडिया" पुस्तक लिखी। वे 1920 के कलकत्ता विशेष अधिवेशन में कांग्रेस के अध्यक्ष और उसी वर्ष ट्रेड यूनियन कांग्रेस के पहले अध्यक्ष बने। उन्होंने पंजाब नेशनल बैंक की स्थापना में भूमिका निभाई और सर्वेंट्स ऑफ़ द पीपुल सोसाइटी (1921) बनाई। 30 अक्टूबर 1928 को लाहौर में साइमन कमीशन के विरोध-जुलूस पर लाठीचार्ज में वे घायल हुए और 17 नवंबर 1928 को उनकी मृत्यु हो गई।

◆ एन. एम. जोशी (नारायण मल्हार जोशी, 1879–1955) — महाराष्ट्र में जन्मे जोशी गोपाल कृष्ण गोखले की सर्वेंट्स ऑफ़ इंडिया सोसाइटी के सदस्य थे। 1911 में उन्होंने बम्बई में सोशल सर्विस लीग बनाई, जो मज़दूरों के लिए रात्रि-विद्यालय, पुस्तकालय और सहकारी समितियाँ चलाती थी। 1919 से वे कई बार अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के सम्मेलनों में भारतीय मज़दूरों के प्रतिनिधि बने और केंद्रीय विधानसभा में मज़दूरों के प्रतिनिधि के रूप में मनोनीत हुए, जहाँ उन्होंने ट्रेड यूनियन क़ानून की माँग उठाई। वे अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस के प्रमुख संस्थापक और लंबे समय तक उसके महासचिव रहे। वे नरमपंथी, संवैधानिक तरीक़ों के समर्थक थे, इसलिए 1929 में कम्युनिस्टों से मतभेद होने पर अलग होकर इंडियन ट्रेड यूनियन फ़ेडरेशन बनाई। उन्हें "भारतीय ट्रेड यूनियन आंदोलन का जनक" कहा जाता है।

◆ जोसेफ़ बैप्टिस्टा और दीवान चमन लाल — बम्बई के बैरिस्टर जोसेफ़ बैप्टिस्टा ("काका बैप्टिस्टा") तिलक के निकट सहयोगी और होमरूल आंदोलन के कार्यकर्ता थे। पंजाब के दीवान चमन लाल पत्रकार और मज़दूर नेता थे, जो ट्रेड यूनियन कांग्रेस के पहले महासचिव बने।

3.5 असम के चाय बागान और चाँदपुर घटना (1921)

◆ पृष्ठभूमि — असम की चरगोला घाटी के चाय बागानों में मज़दूरों की मज़दूरी बहुत कम थी और उन्हें बागान छोड़ने की आज़ादी नहीं थी। असहयोग आंदोलन के दौरान "गांधी राज" की ख़बरों से उनमें साहस आया।

◆ घटनाक्रम — मई 1921 में हज़ारों बागान मज़दूर ("कुली") बागान छोड़कर अपने गाँवों की ओर चल पड़े। पूर्वी बंगाल के चाँदपुर रेलवे स्टेशन और घाट पर जब ये थके-भूखे मज़दूर जहाज़ की प्रतीक्षा कर रहे थे, तब गोरखा सैनिकों ने उन पर हमला कर दिया।

◆ परिणाम और महत्त्व — इस क्रूरता के विरोध में जे. एम. सेनगुप्ता के नेतृत्व में असम-बंगाल रेलवे के कर्मचारियों और जहाज़ कर्मचारियों ने लंबी हड़ताल की। यह घटना दिखाती है कि असहयोग आंदोलन के समय मज़दूरों की लड़ाई और राष्ट्रीय लड़ाई एक-दूसरे में घुल-मिल गई थीं।

3.6 ट्रेड यूनियन अधिनियम, 1926

◆ पृष्ठभूमि — मद्रास लेबर यूनियन के मुक़दमे ने दिखा दिया था कि यूनियनों की कोई क़ानूनी हैसियत नहीं है और हड़ताल कराने पर उनके नेताओं को दीवानी और फ़ौजदारी मुक़दमों में फँसाया जा सकता है। एन. एम. जोशी ने 1921 में केंद्रीय विधानसभा में प्रस्ताव रखकर यूनियनों के पंजीकरण और सुरक्षा के लिए क़ानून की माँग की।

◆ मुख्य प्रावधान — यूनियनें सरकार के पास पंजीकरण करा सकती थीं और पंजीकरण के बाद उन्हें क़ानूनी मान्यता मिलती थी। पंजीकृत यूनियन और उसके पदाधिकारियों को वैध ट्रेड यूनियन गतिविधियों — जैसे वैध हड़ताल — के लिए दीवानी और फ़ौजदारी कार्यवाही से सुरक्षा मिली। यूनियन का कोष किन कामों में ख़र्च होगा, यह तय हुआ और राजनीतिक कामों के लिए अलग राजनीतिक कोष रखने की अनुमति दी गई।

◆ सीमा — पंजीकरण अनिवार्य नहीं था और मालिकों के लिए यूनियन को मान्यता देना या उससे बातचीत करना भी अनिवार्य नहीं था। यूनियनों के खातों और पदाधिकारियों पर सरकारी नियंत्रण भी रखा गया।

◆ महत्त्व — फिर भी पहली बार भारत में मज़दूर संगठन क़ानूनी संस्था बने। इसके बाद यूनियनों की संख्या तेज़ी से बढ़ी और मज़दूर आंदोलन अधिक संगठित हुआ।

3.7 1928–29: उग्र चरण और बम्बई की महान कपड़ा हड़ताल

1920 के दशक के उत्तरार्द्ध में मज़दूर आंदोलन में वामपंथी और कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं का प्रभाव तेज़ी से बढ़ा (इन पर विस्तार खंड 4 में)। उन्होंने मज़दूरों को केवल वेतन के लिए ही नहीं, बल्कि वर्ग-चेतना और राजनीतिक संघर्ष के लिए भी तैयार किया। परिणाम यह हुआ कि 1928 हड़तालों का सबसे बड़ा वर्ष बना — उस वर्ष लगभग 3.1 करोड़ कार्य-दिवस हड़तालों में गए, यानी इतने दिनों का काम हड़ताल के कारण नहीं हुआ।

◆ अन्य बड़ी हड़तालें — खड़गपुर रेलवे वर्कशॉप (1927), कलकत्ता के पास लिलुआ रेल वर्कशॉप (1928), जमशेदपुर के टाटा इस्पात कारख़ाने (1928) और कलकत्ता की जूट मिलों में बड़ी हड़तालें हुईं। रेलवे और इस्पात जैसे बड़े उद्योगों में हड़ताल से सरकार भी चिंतित हो उठी।

बम्बई कपड़ा हड़ताल (अप्रैल–अक्टूबर 1928)

◆ पृष्ठभूमि — जापानी कपड़े से प्रतिस्पर्धा और मंदी के कारण बम्बई के मिल-मालिक ख़र्च घटाने के लिए "युक्तिकरण" (रेशनलाइज़ेशन) लागू कर रहे थे — यानी एक मज़दूर से अधिक करघे चलवाना, मज़दूरों की छँटनी करना और वेतन में कटौती करना।

◆ घटनाक्रम — अप्रैल 1928 में लगभग 1.5 लाख मज़दूरों ने काम बंद कर दिया और हड़ताल लगभग छह महीने तक चली। इसी हड़ताल के दौरान कम्युनिस्ट नेतृत्व वाली गिरनी कामगार यूनियन (मराठी में "मिल मज़दूर यूनियन") का उदय हुआ, जिसे "लाल बावटा" (लाल झंडा) यूनियन भी कहा गया। एस. ए. डांगे, एस. वी. घाटे, के. एन. जोगलेकर और एस. एस. मिरजकर जैसे नेता इसके प्रमुख थे। कुछ ही महीनों में इसकी सदस्यता हज़ारों तक पहुँच गई।

◆ परिणाम — अक्टूबर 1928 में सरकार द्वारा जाँच समिति (फ़ॉसेट समिति) बनाने के आश्वासन पर हड़ताल समाप्त हुई। मज़दूरों को पूरी जीत नहीं मिली, पर गिरनी कामगार यूनियन बम्बई की सबसे शक्तिशाली यूनियन बन गई। 1929 में इसी यूनियन की दूसरी हड़ताल विफल रही।

सरकार का जवाब — दो विधेयक और असेंबली बम कांड

◆ जन सुरक्षा विधेयक — इसका उद्देश्य था कि सरकार भारत में सक्रिय विदेशी (विशेषकर अंग्रेज़) कम्युनिस्टों को बिना मुक़दमे के देश से निकाल सके। केंद्रीय विधानसभा में यह विधेयक पारित नहीं हो सका, तो वायसराय ने इसे अध्यादेश से लागू किया।

◆ व्यापार विवाद अधिनियम, 1929 — इसमें औद्योगिक विवादों के लिए जाँच न्यायालय और समझौता बोर्ड बनाने की व्यवस्था हुई। पर साथ ही जनोपयोगी सेवाओं (जैसे डाक, रेल, पानी, बिजली) में बिना पूर्व सूचना हड़ताल पर रोक लगाई गई और मालिकों पर दबाव डालने के बजाय सरकार पर दबाव डालने वाली हड़तालों को अवैध घोषित किया गया। इसलिए मज़दूर नेताओं ने इसे मज़दूरों की आवाज़ दबाने वाला क़ानून माना।

◆ असेंबली बम कांड — इन्हीं दो विधेयकों के विरोध में 8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने केंद्रीय विधानसभा में धुआँ फैलाने वाले बम फेंके और "इंक़लाब ज़िंदाबाद" के नारे लगाते हुए गिरफ़्तारी दी (अध्याय 11)।

शाही श्रम आयोग — व्हिटली आयोग (1929–1931)

◆ गठन और उद्देश्य — 1929 में ब्रिटिश सरकार ने जे. एच. व्हिटली की अध्यक्षता में शाही श्रम आयोग नियुक्त किया, ताकि भारत के कारख़ानों, खानों, बागानों और रेलवे में मज़दूरों की दशा की जाँच हो सके।

◆ बहिष्कार — वामपंथी प्रभाव वाली ट्रेड यूनियन कांग्रेस ने आयोग का बहिष्कार किया, क्योंकि उसमें मज़दूरों का कोई सच्चा प्रतिनिधि नहीं था, पर एन. एम. जोशी जैसे कुछ नरमपंथी नेताओं ने उसके साथ सहयोग किया। यही मतभेद 1929 के विभाजन का एक कारण बना।

◆ रिपोर्ट (1931) — आयोग ने सैकड़ों सिफ़ारिशें कीं — बाल श्रम पर कड़ी रोक, काम के घंटे कम करना, मातृत्व लाभ, श्रम निरीक्षकों की नियुक्ति, मज़दूरी का समय पर भुगतान और मज़दूरों के स्वास्थ्य-आवास में सुधार। इनमें से कई सिफ़ारिशें 1934 के कारख़ाना अधिनियम और 1936 के मज़दूरी भुगतान अधिनियम में शामिल हुईं।

⚖️ मेरठ षड्यंत्र केस (1929) — संक्षेप

हड़तालों की इस लहर से घबराकर सरकार ने 20 मार्च 1929 को देशभर से मज़दूर आंदोलन के प्रमुख कम्युनिस्ट और वामपंथी नेताओं को गिरफ़्तार कर मेरठ में मुक़दमा चलाया। इससे मज़दूर आंदोलन का उग्र नेतृत्व कई वर्षों के लिए जेल में चला गया। इस मुक़दमे का पूरा विवरण साम्यवादी आंदोलन के साथ खंड 4.6 में दिया गया है।

3.8 विभाजन और फिर एकता (1929–1940)

◆ पहला विभाजन — नागपुर, 1929 (अध्यक्ष नेहरू) — पृष्ठभूमि: कम्युनिस्टों का प्रभाव बढ़ने के साथ नरमपंथियों और उग्र वामपंथियों में मतभेद गहरे हुए। घटनाक्रम: नागपुर अधिवेशन में बहुमत ने व्हिटली आयोग के बहिष्कार, "साम्राज्यवाद-विरोधी लीग" से जुड़ने और नेहरू रिपोर्ट की आलोचना जैसे प्रस्ताव पारित किए। परिणाम: एन. एम. जोशी, वी. वी. गिरि, शिवा राव आदि नरमपंथी नेता अलग हो गए और उन्होंने इंडियन ट्रेड यूनियन फ़ेडरेशन बनाई।

◆ दूसरा विभाजन — कलकत्ता, 1931 (अध्यक्ष सुभाष) — अब कम्युनिस्टों ने स्वयं ट्रेड यूनियन कांग्रेस को "सुधारवादी" मानकर उसे छोड़ दिया और एस. वी. देशपांडे तथा बी. टी. रणदिवे के नेतृत्व में रेड ट्रेड यूनियन कांग्रेस बनाई। इस तरह 1931 में मज़दूर आंदोलन तीन टुकड़ों में बँट गया।

◆ एकता की ओर — 1935 में कम्युनिस्ट अंतरराष्ट्रीय नीति बदलकर "संयुक्त मोर्चे" की ओर आए, इसलिए 1935 में रेड ट्रेड यूनियन कांग्रेस वापस ट्रेड यूनियन कांग्रेस में मिल गई। नरमपंथियों का फ़ेडरेशन (जो आगे नेशनल ट्रेड यूनियन फ़ेडरेशन बना) भी 1940 में पूरी तरह वापस मिल गया।

◆ 1941 — एम. एन. राय का अलग संगठन — द्वितीय विश्वयुद्ध में फ़ासीवाद के विरुद्ध ब्रिटेन का साथ देने के पक्षधर एम. एन. राय ने युद्ध-समर्थक इंडियन फ़ेडरेशन ऑफ़ लेबर बनाया, जिसे सरकार से सहायता भी मिली।

3.9 प्रांतीय सरकारें, युद्ध और युद्धोत्तर उभार (1937–1947)

◆ 1937–39: कांग्रेसी मंत्रिमंडलों का दौर — 1937 में कई प्रांतों में कांग्रेस सरकारें बनीं, जिससे मज़दूरों को लगा कि अब उनकी सुनवाई होगी। इसलिए यूनियनों की सदस्यता तेज़ी से बढ़ी और हड़तालें भी बढ़ीं। पर बम्बई की कांग्रेस सरकार ने बम्बई औद्योगिक विवाद अधिनियम (1938) बनाया, जिसमें हड़ताल से पहले समझौते की लंबी प्रक्रिया अनिवार्य की गई। वामपंथियों ने इसे "काला क़ानून" कहा और इसके विरोध में 7 नवंबर 1938 को बम्बई में एक दिन की आम हड़ताल हुई।

◆ 1939–45: युद्ध का दौर — युद्ध के दौरान महँगाई बहुत बढ़ी। युद्ध को "साम्राज्यवादी" मानने वाले कम्युनिस्टों के नेतृत्व में 1940 में बम्बई के कपड़ा मज़दूरों ने महँगाई भत्ते के लिए बड़ी हड़ताल की। जून 1941 के बाद कम्युनिस्टों ने युद्ध को "जनयुद्ध" मानकर उत्पादन बढ़ाने पर ज़ोर दिया और हड़तालों से परहेज़ किया (खंड 5)।

◆ 1945–47: युद्धोत्तर उभार — युद्ध के बाद महँगाई, छँटनी और राष्ट्रीय उत्साह ने मिलकर हड़तालों की बाढ़ ला दी। 1946 में लगभग 1,600 हड़तालें हुईं। जुलाई 1946 में देशभर में डाक-तार कर्मचारियों की बड़ी हड़ताल हुई। 22 फ़रवरी 1946 को नौसेना विद्रोहियों के समर्थन में बम्बई के मज़दूरों ने शहर बंद रखा और पुलिस-सेना की गोलीबारी में अनेक लोग मारे गए (अध्याय 13)। रेलवे मज़दूरों ने भी 1946 में देशव्यापी हड़ताल की तैयारी की।

3.10 इंटक — भारतीय राष्ट्रीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस (3 मई 1947)

◆ पृष्ठभूमि — 1940 के दशक तक अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस पर कम्युनिस्टों का प्रभाव बहुत बढ़ गया था, और 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के विरोध के बाद कांग्रेस और कम्युनिस्टों के संबंध टूट चुके थे। कांग्रेस चाहती थी कि मज़दूरों का एक ऐसा संगठन हो जो गांधीवादी तरीक़ों — बातचीत, पंच-निर्णय और वर्ग-सहयोग — पर चले। इसकी तैयारी 1938 में गांधीवादी कार्यकर्ताओं द्वारा बनाए गए हिंदुस्तान मज़दूर सेवक संघ से शुरू हो चुकी थी।

◆ स्थापना — 3 मई 1947 को नई दिल्ली में भारतीय राष्ट्रीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस (इंटक) बनी। इसके गठन में सरदार पटेल, गुलज़ारीलाल नंदा, खंडूभाई देसाई आदि की प्रमुख भूमिका थी और इसके पहले अध्यक्ष सुरेश चंद्र बनर्जी थे।

◆ महत्त्व — स्वतंत्रता के बाद इंटक ही सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त सबसे बड़ा मज़दूर संगठन बना। इसके साथ मज़दूर आंदोलन स्पष्ट रूप से राजनीतिक दलों के आधार पर बँट गया।

◆ स्वतंत्रता के बाद के संगठन — समाजवादियों ने हिंद मज़दूर सभा (1948), क्रांतिकारी समाजवादियों ने संयुक्त ट्रेड यूनियन कांग्रेस (1949), राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े कार्यकर्ताओं ने भारतीय मज़दूर संघ (1955) और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े नेताओं ने भारतीय ट्रेड यूनियन केंद्र (सीटू, 1970) बनाया। अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़ी रही।

📋 दोहराव तालिका: मज़दूर संगठन और श्रम क़ानून

वर्ष और नाम

संस्थापक / किसके समय

मुख्य बात

1881 — पहला कारख़ाना अधिनियम

लॉर्ड रिपन

7 वर्ष से कम बच्चों का काम वर्जित हुआ और 7–12 वर्ष के बच्चों के लिए 9 घंटे तय हुए।

1890 — बॉम्बे मिल हैंड्स एसोसिएशन

नारायण मेघाजी लोखंडे

यह भारत का पहला मज़दूर संगठन माना जाता है, पर नियमित यूनियन नहीं था।

1891 — दूसरा कारख़ाना अधिनियम

लॉर्ड लैंसडाउन

स्त्रियों के लिए 11 घंटे और सभी को साप्ताहिक छुट्टी मिली।

1918 — मद्रास लेबर यूनियन

बी. पी. वाडिया

यह भारत की पहली नियमित ट्रेड यूनियन थी।

1920 — मजूर महाजन (अहमदाबाद)

गांधीजी, अनसूया साराभाई

यह वर्ग-सहयोग और पंच-निर्णय के गांधीवादी मॉडल पर चली।

1920 — अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस

एन. एम. जोशी; अध्यक्ष लाला लाजपत राय

यह भारत का पहला राष्ट्रीय मज़दूर संगठन था, जो 31 अक्टूबर को बम्बई में बना।

1926 — ट्रेड यूनियन अधिनियम

केंद्रीय विधानसभा

यूनियनों को पंजीकरण, क़ानूनी मान्यता और वैध हड़ताल पर सुरक्षा मिली।

1928 — गिरनी कामगार यूनियन

डांगे, घाटे, जोगलेकर, मिरजकर

बम्बई की छह महीने की हड़ताल से उभरी यह कम्युनिस्ट ("लाल बावटा") यूनियन थी।

1929 — व्यापार विवाद अधिनियम

लॉर्ड इरविन

जनोपयोगी सेवाओं में बिना सूचना हड़ताल पर रोक लगी; भगत सिंह ने इसी के विरोध में बम फेंका।

1929 / 1931 — दो विभाजन

जोशी-गिरि / देशपांडे-रणदिवे

पहले नरमपंथी (इंडियन ट्रेड यूनियन फ़ेडरेशन) और फिर कम्युनिस्ट (रेड ट्रेड यूनियन कांग्रेस) अलग हुए।

1934 — कारख़ाना अधिनियम

व्हिटली आयोग की सिफ़ारिश

स्थायी कारख़ानों में रोज़ 10 घंटे और सप्ताह में 54 घंटे तय हुए।

1947 — इंटक

पटेल, नंदा; अध्यक्ष सुरेश चंद्र बनर्जी

कांग्रेस समर्थित यह संगठन 3 मई को बना और गांधीवादी तरीक़ों पर चला।

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4. वामपंथ का उदय और साम्यवादी आंदोलन का पहला दौर (1920–1934)

1920 के दशक में भारत के युवाओं, मज़दूरों और बुद्धिजीवियों के बीच एक नई विचारधारा तेज़ी से फैली, जिसे वामपंथ कहा जाता है। इस खंड को समझने से पहले तीन शब्दों का अर्थ साफ़ कर लेना ज़रूरी है — वामपंथ, समाजवाद-साम्यवाद और वर्ग-संघर्ष।

🔍 आसान परिभाषा: वामपंथ

📘 परिभाषा: फ़्रांसीसी क्रांति के समय संसद में बाईं ओर बैठने वाले परिवर्तनवादी सदस्यों से यह शब्द बना; आज इसका अर्थ है — आर्थिक-सामाजिक समानता, मज़दूर-किसान के हित, और पूँजीवाद-साम्राज्यवाद का विरोध करने वाली विचारधारा (समाजवाद, साम्यवाद)।

💡 आसान भाषा में: "देश आज़ाद हो, पर साथ ही अमीर-ग़रीब का फ़र्क़ भी मिटे — खेत जोतने वाले को ज़मीन और मिल चलाने वाले को उसका हक़ मिले।" 🏠 उदाहरण: भारत में कांग्रेस समाजवादी पार्टी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, किसान सभा, मज़दूर-किसान पार्टियाँ और नौजवान भारत सभा — ये सभी वामपंथी विचार वाले संगठन थे, जिनके बारे में इस अध्याय में आगे पढ़ेंगे।

समाजवाद वह विचार है कि उत्पादन के बड़े साधन — कारख़ाने, खानें, बैंक, बड़ी ज़मीन — कुछ व्यक्तियों की निजी संपत्ति न रहकर समाज या राज्य के नियंत्रण में हों, ताकि लाभ सबमें बराबर बँटे। साम्यवाद (कम्युनिज़्म) समाजवाद का उग्र रूप है, जो कार्ल मार्क्स के विचारों पर आधारित है। साम्यवादी मानते हैं कि यह परिवर्तन मज़दूर वर्ग की क्रांति से आएगा और एक समय के लिए "सर्वहारा की तानाशाही" (मज़दूर वर्ग का शासन) होगी, जिसके बाद वर्गहीन समाज बनेगा। भारत में लोकतांत्रिक समाजवादी (जैसे नेहरू, कांग्रेस समाजवादी) यही लक्ष्य लोकतंत्र और संसद के रास्ते पाना चाहते थे, जबकि कम्युनिस्ट क्रांति के रास्ते पर अधिक भरोसा करते थे।

🔍 आसान परिभाषा: वर्ग-संघर्ष

📘 परिभाषा: मार्क्सवादी विचार कि इतिहास में हर युग में समाज दो मुख्य वर्गों में बँटा रहा है — उत्पादन के साधनों का मालिक (शोषक) वर्ग और अपनी मेहनत बेचने वाला शोषित वर्ग — और इन दोनों के हितों के टकराव से ही सामाजिक परिवर्तन होता है।

💡 आसान भाषा में: मिल-मालिक चाहता है कि मज़दूरी कम और काम अधिक हो; मज़दूर चाहता है कि मज़दूरी अधिक और काम कम हो। दोनों के हित उलटे हैं, इसलिए उनके बीच लगातार संघर्ष चलता है — यही वर्ग-संघर्ष है। 🏠 उदाहरण: कम्युनिस्ट मज़दूरों को मालिकों के विरुद्ध और किसानों को ज़मींदारों के विरुद्ध संगठित करते थे; गांधीजी इसके उलट वर्ग-सहयोग और "न्यासिता" (ट्रस्टीशिप) की बात करते थे।

4.1 वामपंथ के उदय के आठ कारण

नीचे का आरेख उन आठ परिस्थितियों को एक साथ दिखाता है, जिनके कारण 1920 और 1930 के दशक में भारत में समाजवादी और साम्यवादी विचार तेज़ी से फैले। आरेख के बाद हर कारण को अलग-अलग समझाया गया है।

चित्र 15.2: 1920–30 के दशक में वामपंथ के उदय के आठ कारण
चित्र 15.2: 1920–30 के दशक में वामपंथ के उदय के आठ कारण

◆ (1) रूसी क्रांति (1917) — नवंबर 1917 में लेनिन के नेतृत्व में बोल्शेविकों ने रूस में सत्ता पर अधिकार कर मज़दूरों-किसानों की सरकार बनाई (ज़ार का शासन उसी वर्ष मार्च में समाप्त हो चुका था)। इसने भारत के युवाओं को दिखाया कि एक ग़रीब, खेतिहर देश में भी आम जनता सत्ता पर अधिकार कर सकती है। नए सोवियत संघ ने ज़ार के समय के विदेशी इलाक़ों पर दावे छोड़े और खुलकर उपनिवेशवाद का विरोध किया, इसलिए ग़ुलाम देशों के राष्ट्रवादी उसे अपना मित्र मानने लगे।

◆ (2) असहयोग आंदोलन की वापसी (1922) — फ़रवरी 1922 में चौरी-चौरा की हिंसा के बाद गांधीजी ने अचानक असहयोग आंदोलन वापस ले लिया। इससे अनेक युवाओं में गहरी निराशा फैली और उन्होंने सोचना शुरू किया कि क्या केवल अहिंसक असहयोग से स्वतंत्रता मिलेगी। वे नए रास्तों की खोज में मार्क्सवाद और समाजवाद की ओर मुड़े — भगत सिंह जैसे क्रांतिकारी भी इसी दौर की उपज थे।

◆ (3) महामंदी (1929 से) — 1929 में अमेरिका से शुरू हुई विश्वव्यापी आर्थिक मंदी में खेती की उपज के दाम लगभग आधे रह गए, कारख़ाने बंद हुए और बेरोज़गारी फैली। पूँजीवादी देश संकट में थे, जबकि सोवियत संघ अपनी पंचवर्षीय योजनाओं से तेज़ी से आगे बढ़ता दिख रहा था। इससे यह धारणा मज़बूत हुई कि पूँजीवाद असफल है और योजनाबद्ध समाजवादी अर्थव्यवस्था ही हल है।

◆ (4) मज़दूर वर्ग का विकास — प्रथम विश्वयुद्ध के बाद भारत में उद्योग बढ़े, मज़दूरों की संख्या बढ़ी, यूनियनें बनीं और बड़ी हड़तालें हुईं (खंड 3)। संगठित मज़दूर वर्ग वामपंथी विचारों का स्वाभाविक आधार बना।

◆ (5) किसान असंतोष — ज़मींदारी व्यवस्था में भारी लगान, बेदख़ली (ज़मीन से निकाल देना), बेगार और महाजनों के क़र्ज़ से किसान पिस रहे थे। मंदी ने उनकी दशा और बिगाड़ दी। परिणाम यह हुआ कि जगह-जगह किसान सभाएँ बनीं, जिन पर वामपंथी नेताओं का प्रभाव बढ़ा (खंड 7)।

◆ (6) युवा आंदोलन — नौजवान भारत सभा (1926, लाहौर), बम्बई और बंगाल की यूथ लीगें (1928) और छात्र संघों ने युवाओं को समाजवाद से परिचित कराया। भगत सिंह और उनके साथियों ने 1928 में अपने दल का नाम ही "हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन" कर दिया — यानी क्रांतिकारी आंदोलन का लक्ष्य भी समाजवाद बन गया।

◆ (7) नेहरू और सुभाष — कांग्रेस के दो सबसे लोकप्रिय युवा नेता जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस खुलकर समाजवाद की बात करने लगे। नेहरू ने फ़रवरी 1927 में ब्रसेल्स के "साम्राज्यवाद-विरोधी लीग" सम्मेलन में भाग लिया और नवंबर 1927 में सोवियत संघ की यात्रा की। इन दोनों ने कांग्रेस के भीतर समाजवाद की वकालत करके इस विचार को सम्मानजनक बना दिया (खंड 6)।

◆ (8) कम्युनिस्ट इंटरनेशनल — मार्च 1919 में लेनिन ने मॉस्को में कम्युनिस्ट इंटरनेशनल (कॉमिन्टर्न — दुनिया भर की कम्युनिस्ट पार्टियों का संगठन) बनाया। इसने एम. एन. राय और अन्य प्रवासी भारतीय क्रांतिकारियों के माध्यम से भारत में मार्क्सवादी साहित्य और धन पहुँचाया और कम्युनिस्ट समूहों का मार्गदर्शन किया।

4.2 मानवेंद्रनाथ राय (एम. एन. राय, 1887–1954)

एम. एन. राय भारतीय साम्यवाद के पहले अंतरराष्ट्रीय चेहरे थे। उनका जीवन किसी रोमांचक कहानी जैसा है — बंगाल के क्रांतिकारी से मैक्सिको, मॉस्को और फिर भारतीय जेल तक।

◆ आरंभिक जीवन — उनका मूल नाम नरेंद्रनाथ भट्टाचार्य था और उनका जन्म 1887 में बंगाल में हुआ। युवावस्था में वे युगांतर दल के क्रांतिकारी बने। प्रथम विश्वयुद्ध के समय 1915 में वे जर्मनी से हथियार लाने की योजना के सिलसिले में विदेश गए (अध्याय 11) और फिर कभी लंबे समय तक नहीं लौटे। अमेरिका पहुँचकर उन्होंने "मानवेंद्रनाथ राय" नाम अपनाया।

◆ मैक्सिको (1917–1919) — अमेरिका से मैक्सिको जाकर वे मार्क्सवाद के संपर्क में आए और 1919 में मैक्सिको की कम्युनिस्ट पार्टी के गठन में प्रमुख भूमिका निभाई। यह एक भारतीय के लिए असाधारण उपलब्धि थी।

◆ लेनिन से बहस (1920) — लेनिन के निमंत्रण पर वे मॉस्को गए और कम्युनिस्ट इंटरनेशनल के सदस्य बनने वाले पहले भारतीय बने। 1920 की उसकी दूसरी कांग्रेस में उपनिवेशों के प्रश्न पर उनकी लेनिन से बहस हुई। लेनिन मानते थे कि उपनिवेशों में कम्युनिस्टों को राष्ट्रीय पूँजीपति नेतृत्व वाले स्वतंत्रता आंदोलनों (जैसे गांधीजी की कांग्रेस) का साथ देना चाहिए। राय का तर्क था कि ये नेता अंततः साम्राज्यवाद से समझौता कर लेंगे, इसलिए कम्युनिस्टों को सीधे मज़दूरों-किसानों को संगठित करना चाहिए। राय के विचार "पूरक थीसिस" के रूप में लेनिन की थीसिस के साथ स्वीकार किए गए।

◆ ताशकंद में पार्टी (17 अक्टूबर 1920) — सोवियत मध्य एशिया के ताशकंद में राय ने अबनी मुखर्जी, मोहम्मद अली, मोहम्मद शफ़ीक़ (सचिव) और एम. पी. टी. आचार्य आदि के साथ प्रवासी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी बनाई। वहाँ उन्होंने तुर्की के ख़लीफ़ा के समर्थन में भारत से निकले मुहाजिरों (ख़िलाफ़त आंदोलन के दौरान देश छोड़ने वाले मुसलमान युवक) को सैन्य और राजनीतिक प्रशिक्षण दिया।

◆ लेखन और प्रचार — उन्होंने "इंडिया इन ट्रांज़िशन" (1922) पुस्तक लिखी और यूरोप से "वैनगार्ड" पत्र निकालकर गुप्त रूप से भारत भेजा। भारत के कम्युनिस्ट समूहों से उनका लगातार पत्र-व्यवहार होता था।

◆ निष्कासन और भारत वापसी — 1929 में स्टालिन के दौर में वैचारिक मतभेदों के कारण उन्हें कम्युनिस्ट इंटरनेशनल से निष्कासित कर दिया गया। 1930 में वे गुप्त रूप से भारत लौटे, पर 1931 में गिरफ़्तार हुए और पुराने कानपुर षड्यंत्र केस के आधार पर उन्हें सज़ा हुई। 1936 में रिहाई के बाद वे कांग्रेस में शामिल हुए और 1939 में लीग ऑफ़ रेडिकल कांग्रेसमेन बनाई।

◆ युद्ध-समर्थन और नव मानववाद — द्वितीय विश्वयुद्ध में उन्होंने फ़ासीवाद को सबसे बड़ा ख़तरा मानकर ब्रिटेन का साथ दिया, कांग्रेस छोड़ी और दिसंबर 1940 में रेडिकल डेमोक्रेटिक पार्टी बनाई। बाद में उन्होंने मार्क्सवाद से आगे बढ़कर व्यक्ति की स्वतंत्रता पर आधारित "नव मानववाद" (रेडिकल ह्यूमनिज़्म) का दर्शन दिया।

📌 याद रखें

भारत के लिए संविधान सभा का विचार सबसे पहले 1934 में एम. एन. राय ने रखा था — कि भारत का संविधान भारतीय जनता के चुने प्रतिनिधि स्वयं बनाएँ। 1935 से कांग्रेस ने इसे अपनी आधिकारिक माँग बना लिया।

4.3 देश के भीतर साम्यवादी समूह (1921–1924)

जिस समय राय विदेश में पार्टी बना रहे थे, उसी समय भारत के कई बड़े शहरों में युवाओं के छोटे-छोटे साम्यवादी समूह अपने-आप उभरे। ये समूह अख़बार निकालते, मज़दूरों में काम करते और राय से संपर्क रखते थे:

◆ बम्बई — श्रीपाद अमृत डांगे (1899–1991) — असहयोग आंदोलन से राजनीति में आए डांगे ने 1921 में पुस्तिका "गांधी बनाम लेनिन" लिखी, जिसमें दोनों के रास्तों की तुलना करके लेनिन के रास्ते को श्रेष्ठ बताया। 1922 में उन्होंने अंग्रेज़ी साप्ताहिक "सोशलिस्ट" निकाला, जिसे भारत का पहला मार्क्सवादी पत्र माना जाता है। वे कानपुर और मेरठ दोनों षड्यंत्र केसों के अभियुक्त रहे, गिरनी कामगार यूनियन के नेता बने और स्वतंत्रता के बाद लंबे समय तक भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के अध्यक्ष रहे।

◆ कलकत्ता — मुज़फ़्फ़र अहमद (1889–1973) — "काकाबाबू" कहलाने वाले मुज़फ़्फ़र अहमद ने विद्रोही कवि क़ाज़ी नज़रुल इस्लाम के साथ 1920 में "नवयुग" पत्र निकाला और बाद में "लांगल" (हल) तथा "गणवाणी" जैसे पत्रों से मज़दूरों-किसानों में मार्क्सवाद फैलाया। वे भी कानपुर और मेरठ दोनों केसों में अभियुक्त रहे।

◆ मद्रास — एम. सिंगारवेलु चेट्टियार (1860–1946) — मद्रास के इस वरिष्ठ वकील और मज़दूर नेता ने 1 मई 1923 को मद्रास के समुद्र तट पर भारत का पहला मई दिवस (मज़दूर दिवस) मनाया और उसी दिन लेबर किसान पार्टी ऑफ़ हिंदुस्तान बनाई। वे आगे 1925 के कानपुर सम्मेलन के अध्यक्ष बने।

◆ लाहौर — ग़ुलाम हुसैन — लाहौर में ग़ुलाम हुसैन ने "इंक़लाब" पत्र के माध्यम से पंजाब के मज़दूरों, विशेषकर रेलवे कर्मचारियों में साम्यवादी विचार फैलाए।

4.4 षड्यंत्र केस — सरकार का पहला दमन

अंग्रेज़ी सरकार साम्यवाद को अपने लिए सबसे ख़तरनाक विचार मानती थी, क्योंकि यह केवल राजनीतिक सत्ता ही नहीं, पूरी सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था बदलने की बात करता था। इसलिए उसने शुरू से ही कम्युनिस्टों पर षड्यंत्र के मुक़दमे चलाकर इस आंदोलन को कुचलने की कोशिश की:

◆ पेशावर षड्यंत्र केस (1922–1927) — पृष्ठभूमि: ताशकंद और मॉस्को में राय के सैन्य-राजनीतिक विद्यालयों में प्रशिक्षित मुहाजिर युवक अफ़ग़ानिस्तान के रास्ते भारत लौट रहे थे। घटनाक्रम: उन्हें सीमा पर और पेशावर में पकड़ लिया गया और 1922 से 1927 के बीच उन पर कई मुक़दमे चलाए गए। परिणाम: अनेक युवकों को कठोर सज़ाएँ हुईं; इससे विदेश से प्रशिक्षित क्रांतिकारी भेजने की राय की योजना विफल हो गई।

◆ कानपुर बोल्शेविक षड्यंत्र केस (1924) — पृष्ठभूमि: सरकार देश के भीतर बन रहे कम्युनिस्ट समूहों और राय के साथ उनके पत्र-व्यवहार पर नज़र रखे हुए थी। घटनाक्रम: 1924 में एम. एन. राय (अनुपस्थिति में), मुज़फ़्फ़र अहमद, एस. ए. डांगे, शौकत उस्मानी, नलिनी गुप्ता, ग़ुलाम हुसैन, सिंगारवेलु आदि पर कानपुर में मुक़दमा चलाया गया। आरोप था कि वे हिंसक क्रांति से सम्राट को भारत की प्रभुसत्ता से वंचित करने के लिए क्रांतिकारी संगठन बना रहे हैं। परिणाम: मुज़फ़्फ़र अहमद, डांगे, शौकत उस्मानी और नलिनी गुप्ता को चार-चार वर्ष की सज़ा हुई। महत्त्व: मुक़दमे की ख़बरें अख़बारों में छपने से आम लोगों को पहली बार साम्यवाद के बारे में पता चला — यानी दमन ने उलटे प्रचार का काम किया।

4.5 कानपुर सम्मेलन (दिसंबर 1925) और मज़दूर-किसान पार्टियाँ

◆ कानपुर सम्मेलन — दिसंबर 1925 में सत्यभक्त के आयोजन में कानपुर में कम्युनिस्टों का पहला अखिल भारतीय सम्मेलन हुआ, जिसकी अध्यक्षता सिंगारवेलु ने की। इसी सम्मेलन में "भारत में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी" का औपचारिक गठन हुआ और बाद में इसका मुख्यालय बम्बई ले जाया गया।

🧠 पार्टी की स्थापना — दो तिथियाँ क्यों?

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना की दो तिथियाँ बताई जाती हैं — 17 अक्टूबर 1920 (ताशकंद), जब एम. एन. राय ने विदेश में प्रवासी पार्टी बनाई; और दिसंबर 1925 (कानपुर), जब देश के भीतर पार्टी औपचारिक रूप से बनी। परीक्षा में प्रश्न ध्यान से पढ़ें: "ताशकंद" या "राय" का उल्लेख हो तो 1920, और "भारत में" या "कानपुर" का उल्लेख हो तो 1925।

मज़दूर-किसान पार्टियाँ (1925–1928)

◆ पृष्ठभूमि — क्यों बनीं? — कम्युनिस्ट पार्टी छोटी थी और सरकार उस पर लगातार नज़र रखती थी। इसलिए कम्युनिस्टों और वामपंथी राष्ट्रवादियों ने खुले, वैध "मज़दूर-किसान पार्टियाँ" बनाईं, जो कांग्रेस के भीतर रहकर काम करती थीं और कांग्रेस को अधिक उग्र, जन-आधारित दिशा देना चाहती थीं।

◆ घटनाक्रम — नवंबर 1925 में बंगाल में "लेबर स्वराज पार्टी ऑफ़ द इंडियन नेशनल कांग्रेस" बनी, जिसके संस्थापकों में क़ाज़ी नज़रुल इस्लाम, हेमंत कुमार सरकार और मुज़फ़्फ़र अहमद थे। 1926 में इसका नाम "पेज़ेंट्स एंड वर्कर्स पार्टी ऑफ़ बंगाल" हुआ। इसके बाद बम्बई (1927) में, पंजाब में "कीर्ति किसान पार्टी" (1927) के रूप में और संयुक्त प्रांत में शाखाएँ बनीं। अंत में दिसंबर 1928 में कलकत्ता में इन सबको मिलाकर अखिल भारतीय मज़दूर-किसान पार्टी बनी।

◆ कार्य और महत्त्व — इन पार्टियों ने साइमन कमीशन के विरोध-प्रदर्शनों में बड़ी भूमिका निभाई, कांग्रेस के भीतर पूर्ण स्वतंत्रता की माँग का समर्थन किया और मज़दूर-किसानों को संगठित किया। 1928 की बम्बई कपड़ा हड़ताल में इन्हीं के कार्यकर्ता आगे थे। तेज़ी से बढ़ते प्रभाव के कारण ये कांग्रेस के भीतर एक गंभीर वामपंथी दबाव-समूह बन गईं।

1928 का "वामपंथी मोड़" और अलगाव

◆ पृष्ठभूमि — 1928 में कम्युनिस्ट इंटरनेशनल की छठी कांग्रेस ने नई नीति अपनाई कि उपनिवेशों में "राष्ट्रीय पूँजीपति वर्ग" साम्राज्यवाद से समझौता कर लेगा, इसलिए कम्युनिस्ट उससे संबंध तोड़ें और स्वतंत्र रूप से क्रांति की तैयारी करें।

◆ घटनाक्रम — इस नीति के कारण भारतीय कम्युनिस्टों ने कांग्रेस और गांधीजी को "पूँजीपतियों का प्रतिनिधि" कहना शुरू किया, मज़दूर-किसान पार्टियाँ भंग कर दीं और सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930–34) से अलग रहे। ट्रेड यूनियन कांग्रेस में भी उन्होंने अलग रेड ट्रेड यूनियन कांग्रेस (1931) बना ली।

◆ परिणाम — मेरठ केस और इस अलगाव के कारण 1929–34 में साम्यवादी आंदोलन राष्ट्रीय मुख्यधारा से कट गया। जब पूरा देश नमक सत्याग्रह में उतरा था, तब कम्युनिस्ट उससे बाहर खड़े थे। जुलाई 1934 में सरकार ने कम्युनिस्ट पार्टी और उसके संगठनों पर प्रतिबंध लगा दिया, जो जुलाई 1942 तक रहा।

4.6 मेरठ षड्यंत्र केस (1929–1933)

◆ पृष्ठभूमि — 1928–29 की हड़तालों की लहर, गिरनी कामगार यूनियन की शक्ति और मज़दूर-किसान पार्टियों के बढ़ते प्रभाव से सरकार घबरा गई थी। जन सुरक्षा विधेयक विधानसभा में पारित न हो सका, तो सरकार ने सीधे नेताओं को जेल में डालने का रास्ता चुना।

◆ गिरफ़्तारी — 20 मार्च 1929 को वायसराय लॉर्ड इरविन की सरकार ने देश के अलग-अलग हिस्सों से 31 मज़दूर और कम्युनिस्ट नेताओं को गिरफ़्तार किया; कुछ समय बाद अंग्रेज़ पत्रकार लेस्टर हचिन्सन को भी गिरफ़्तार कर अभियुक्तों में जोड़ दिया गया।

◆ आरोप — उन पर आरोप था कि उन्होंने आम हड़ताल और सशस्त्र विद्रोह के द्वारा सम्राट को भारत की प्रभुसत्ता से वंचित करने का षड्यंत्र रचा। मुक़दमा जानबूझकर मेरठ में चलाया गया, क्योंकि वहाँ जूरी की व्यवस्था नहीं थी — बम्बई या कलकत्ता में जूरी के सदस्य अभियुक्तों के प्रति सहानुभूति रख सकते थे।

◆ प्रमुख अभियुक्त — मुज़फ़्फ़र अहमद, एस. ए. डांगे, शौकत उस्मानी, एस. वी. घाटे, के. एन. जोगलेकर, पी. सी. जोशी और तीन अंग्रेज़ — फ़िलिप स्प्रैट, बेन ब्रैडली और लेस्टर हचिन्सन। तीन अंग्रेज़ों का होना दिखाता है कि ब्रिटेन की कम्युनिस्ट पार्टी भी भारत के मज़दूर आंदोलन में सहायता कर रही थी।

◆ बचाव और राष्ट्रीय समर्थन — कम्युनिस्टों से मतभेद होते हुए भी राष्ट्रवादी नेता उनके बचाव में खड़े हुए। नेहरू, एम. ए. अंसारी, के. एफ़. नरीमन, एम. सी. छागला आदि ने बचाव समिति में काम किया और गांधीजी जेल में अभियुक्तों से मिलने गए। दुनिया भर में इस मुक़दमे की चर्चा हुई और आइंस्टीन, रोमाँ रोलाँ, एच. जी. वेल्स और हेरल्ड लास्की जैसे विद्वानों ने इसकी आलोचना की।

◆ फ़ैसला — लगभग चार वर्ष चले इस मुक़दमे का फ़ैसला जनवरी 1933 में आया। अभियुक्तों को कठोर सज़ाएँ दी गईं — मुज़फ़्फ़र अहमद को आजीवन निर्वासन की सज़ा हुई। अपील पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अधिकांश सज़ाएँ घटा दीं।

◆ परिणाम और महत्त्व — कम्युनिस्ट नेतृत्व लगभग चार वर्ष जेल में रहा और मज़दूर आंदोलन कमज़ोर हुआ। पर अभियुक्तों ने अदालत को प्रचार का मंच बना दिया — उनके लंबे बयानों के छपने से साम्यवादी विचार पूरे देश में फैले और भारत के कम्युनिस्ट आंदोलन को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली।

5. साम्यवादी नीतियाँ (1934–1947), अन्य वामपंथी दल और सांस्कृतिक मोर्चा

नीचे का चार्ट 1920 से 1948 तक भारत में साम्यवादी आंदोलन के सात बदलते चरणों को दिखाता है। पहले चार चरण — ताशकंद में पार्टी (1920), देश में समूह और षड्यंत्र केस (1921–24), कानपुर सम्मेलन और मज़दूर-किसान पार्टियाँ (1925–28) और अलगाव का दौर (1928–34) — ऊपर खंड 4 में विस्तार से समझाए जा चुके हैं। इस खंड में बाक़ी तीन चरण — संयुक्त मोर्चा (1935–39), "साम्राज्यवादी युद्ध" से "जनयुद्ध" (1939–45) और संघर्ष का दौर (1946–48) — विस्तार से दिए गए हैं।

चित्र 15.3: भारत में साम्यवादी आंदोलन के बदलते चरण (1920–1948)
चित्र 15.3: भारत में साम्यवादी आंदोलन के बदलते चरण (1920–1948)

5.1 संयुक्त मोर्चे का दौर (1935–1939)

🔍 आसान परिभाषा: संयुक्त मोर्चा

📘 परिभाषा: किसी बड़े साझा शत्रु के विरुद्ध अलग-अलग विचारधाराओं और वर्गों के दलों-संगठनों का आपसी मतभेद भुलाकर एक साथ मिलकर काम करना। 1935 में कम्युनिस्ट इंटरनेशनल ने फ़ासीवाद और साम्राज्यवाद के विरुद्ध यह नीति अपनाई।

💡 आसान भाषा में: जैसे मोहल्ले में बाढ़ आने पर आपस में झगड़ने वाले परिवार भी मिलकर बाँध बनाते हैं — क्योंकि बाढ़ सबके लिए ख़तरा है। 🏠 उदाहरण: भारत में इसका अर्थ था — कम्युनिस्टों का कांग्रेस, कांग्रेस समाजवादी पार्टी, किसान सभा और ट्रेड यूनियन कांग्रेस के साथ मिलकर अंग्रेज़ी साम्राज्यवाद के विरुद्ध काम करना।

◆ पृष्ठभूमि — जर्मनी में हिटलर (1933) और इटली में मुसोलिनी के फ़ासीवाद का ख़तरा बढ़ रहा था। तब 1935 में कम्युनिस्ट इंटरनेशनल की सातवीं कांग्रेस ने बुल्गारियाई नेता जॉर्जी दिमित्रोव के प्रस्ताव पर 1928 की अलगाव वाली नीति छोड़ दी और "संयुक्त मोर्चे" की नीति अपनाई। उपनिवेशों के लिए इसका अर्थ था कि कम्युनिस्ट राष्ट्रीय आंदोलन के साथ मिलकर काम करें।

◆ भारत में घटनाक्रम — महासचिव पूरनचंद (पी. सी.) जोशी (1935–48) के नेतृत्व में कम्युनिस्ट फिर कांग्रेस और कांग्रेस समाजवादी पार्टी के भीतर काम करने लगे; कांग्रेस समाजवादी पार्टी ने 1936 में उन्हें अपनी सदस्यता भी दी। अखिल भारतीय किसान सभा (1936), अखिल भारतीय छात्र फ़ेडरेशन (1936) और ट्रेड यूनियन कांग्रेस में उनका प्रभाव तेज़ी से बढ़ा।

◆ केरल का उदाहरण — केरल में ई. एम. एस. नंबूदिरीपाद, ए. के. गोपालन और पी. कृष्ण पिल्लै कांग्रेस समाजवादी पार्टी के नेता थे। संयुक्त मोर्चे के दौर में यह पूरी इकाई धीरे-धीरे कम्युनिस्ट विचारों की ओर मुड़ी और 1939–40 में लगभग पूरी की पूरी कम्युनिस्ट पार्टी बन गई। यही कारण है कि आगे केरल वामपंथ का सबसे मज़बूत गढ़ बना।

◆ पूरनचंद जोशी (1907–1980) — उत्तराखंड के अल्मोड़ा में जन्मे पी. सी. जोशी इलाहाबाद में छात्र-राजनीति से वामपंथ में आए और मेरठ षड्यंत्र केस के सबसे युवा अभियुक्तों में थे। 1935 से 1948 तक वे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव रहे। उन्होंने पार्टी को राष्ट्रीय आंदोलन के निकट रखने की कोशिश की और लेखकों, कलाकारों को जोड़कर प्रगतिशील लेखक संघ और इप्टा जैसे सांस्कृतिक मोर्चे को प्रोत्साहन दिया। 1948 में उग्र नीति अपनाने वालों ने उन्हें पद से हटा दिया।

5.2 "साम्राज्यवादी युद्ध" से "जनयुद्ध" तक (1939–1945)

◆ 1939 से जून 1941 — "साम्राज्यवादी युद्ध" — द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू होने पर कम्युनिस्टों ने इसे ब्रिटेन और जर्मनी जैसी साम्राज्यवादी शक्तियों की आपसी लड़ाई — "साम्राज्यवादी युद्ध" — कहा और भारत को इसमें घसीटने का विरोध किया। उन्होंने युद्ध-विरोधी हड़तालें संगठित कीं, जिनमें 1940 की बम्बई कपड़ा हड़ताल प्रमुख थी। परिणाम यह हुआ कि उनके अधिकांश नेता जेल में डाल दिए गए।

◆ जून 1941 — "जनयुद्ध" — 22 जून 1941 को जर्मनी ने सोवियत संघ पर हमला कर दिया। अब कम्युनिस्टों की नज़र में युद्ध "दुनिया के पहले मज़दूर राज्य" को बचाने की लड़ाई बन गया, इसलिए उन्होंने इसे "जनयुद्ध" (पीपुल्स वॉर) कहना शुरू किया और ब्रिटिश युद्ध-प्रयास का समर्थन किया। पार्टी ने "पीपुल्स वॉर" नाम से साप्ताहिक भी निकाला।

◆ 1942 — भारत छोड़ो का विरोध — युद्ध-समर्थन के बदले सरकार ने जुलाई 1942 में पार्टी पर लगा प्रतिबंध हटा दिया। पर अगस्त 1942 में जब पूरा देश भारत छोड़ो आंदोलन में कूदा, तब कम्युनिस्टों ने उसका विरोध किया, क्योंकि उससे युद्ध-प्रयास कमज़ोर होता। इससे जनता में उनकी साख बुरी तरह गिरी और उन पर राष्ट्र-विरोधी होने का आरोप लगा।

◆ 1942–43 — अधिकारी थीसिस और पाकिस्तान — पार्टी के सिद्धांतकार गंगाधर अधिकारी की थीसिस ने भारत को एक राष्ट्र न मानकर अनेक राष्ट्रीयताओं का देश माना और "राष्ट्रीयताओं के आत्मनिर्णय" के नाम पर मुस्लिम लीग की पाकिस्तान की माँग का समर्थन किया। इससे राष्ट्रवादियों के साथ उनकी दूरी और बढ़ गई।

◆ 1945 — कांग्रेस से निष्कासन — इन सब कारणों से 1945 में कांग्रेस कार्यसमिति ने कम्युनिस्ट सदस्यों को कांग्रेस से निष्कासित कर दिया। संयुक्त मोर्चे का दौर पूरी तरह समाप्त हो गया।

5.3 संघर्ष का दौर (1946–1948)

◆ किसान संघर्ष — युद्ध के बाद कम्युनिस्टों ने अपने प्रभाव वाले क्षेत्रों में बड़े किसान संघर्ष चलाए — बंगाल का तेभागा आंदोलन (1946–47, बटाईदारों की फ़सल के दो-तिहाई हिस्से की माँग), हैदराबाद रियासत का तेलंगाना सशस्त्र संघर्ष (1946–51) और त्रावणकोर का पुन्नप्रा-वायलार विद्रोह (अक्टूबर 1946)। इनका विस्तार अध्याय 6 में है।

◆ कलकत्ता थीसिस (फ़रवरी 1948) — स्वतंत्रता के बाद फ़रवरी 1948 में कलकत्ता में पार्टी की दूसरी कांग्रेस में बी. टी. रणदिवे के नेतृत्व में उग्र नीति अपनाई गई, जिसका नारा था — "यह आज़ादी झूठी है"। पार्टी ने नई सरकार के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष की नीति अपनाई, जिससे उस पर फिर प्रतिबंध लगे। यह नीति असफल रही और 1950–51 में बदली गई; 1952 से पार्टी ने चुनावी लोकतंत्र का रास्ता अपनाया।

5.4 अन्य वामपंथी दल

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के अलावा 1930–40 के दशक में कई छोटे वामपंथी दल भी बने। इनमें से कुछ कम्युनिस्ट पार्टी से टूटकर बने, कुछ पुराने क्रांतिकारियों ने बनाए और कुछ कांग्रेस के भीतर के वामपंथी नेताओं ने:

◆ रिवोल्यूशनरी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (1934) — रवींद्रनाथ टैगोर के परिवार से आने वाले सौम्येंद्रनाथ टैगोर ने कम्युनिस्ट पार्टी से मतभेद होने पर इसे बनाया। इसे हिंदी में "क्रांतिकारी साम्यवादी दल" भी कहा जाता है।

◆ फ़ॉरवर्ड ब्लॉक (3 मई 1939) — त्रिपुरी संकट के बाद कांग्रेस अध्यक्ष पद से त्यागपत्र देने वाले सुभाष चंद्र बोस ने इसे कांग्रेस के भीतर सभी वामपंथी शक्तियों को एक करने वाले मंच के रूप में बनाया। बाद में यह अलग दल बन गया (अध्याय 13)।

◆ लेफ़्ट कंसॉलिडेशन कमेटी (1939) — सुभाष ने फ़ॉरवर्ड ब्लॉक, कांग्रेस समाजवादी, कम्युनिस्ट और राय के समर्थकों को मिलाकर वामपंथी एकता की यह समिति बनाई, पर आपसी अविश्वास के कारण यह प्रयास जल्दी ही असफल हो गया।

◆ रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी (1940) — बंगाल की अनुशीलन समिति और हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के पुराने क्रांतिकारियों — जोगेश चंद्र चटर्जी और त्रिदिब चौधरी आदि — ने इसे बनाया। ये मार्क्सवादी थे, पर कम्युनिस्ट पार्टी की सोवियत-निर्भर नीति से असहमत थे।

◆ रेडिकल डेमोक्रेटिक पार्टी (दिसंबर 1940) — एम. एन. राय ने इसे फ़ासीवाद-विरोध के नाम पर युद्ध का समर्थन करने के लिए बनाया।

◆ बोल्शेविक-लेनिनिस्ट पार्टी (1941) — यह रूसी क्रांतिकारी ट्रॉट्स्की के विचारों पर आधारित एक छोटा दल था, जो स्टालिन की नीतियों का विरोधी था।

5.5 सांस्कृतिक मोर्चा — साहित्य और रंगमंच में वामपंथ

◆ प्रगतिशील लेखक संघ — पृष्ठभूमि — 1930 के दशक में सज्जाद ज़हीर, मुल्कराज आनंद और लंदन में पढ़ रहे कुछ भारतीय युवा लेखकों ने 1935 में लंदन में एक घोषणापत्र तैयार किया कि साहित्य को राजा-रानी और प्रेम-कहानियों से बाहर निकलकर भूख, ग़रीबी, सामाजिक पिछड़ेपन और ग़ुलामी जैसे वास्तविक प्रश्नों से जुड़ना चाहिए।

◆ प्रगतिशील लेखक संघ — स्थापना — अप्रैल 1936 में लखनऊ में इसका पहला अधिवेशन हुआ, जिसकी अध्यक्षता महान कथाकार मुंशी प्रेमचंद ने की। उन्होंने अपने प्रसिद्ध भाषण में कहा कि साहित्य "देशभक्ति और राजनीति के पीछे चलने वाली सच्चाई नहीं, बल्कि उनके आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सच्चाई है" और "हमें सौंदर्य की कसौटी बदलनी होगी"।

◆ प्रगतिशील लेखक संघ — प्रभाव — फ़ैज़ अहमद फ़ैज़, कृश्न चंदर, यशपाल, इस्मत चुग़ताई, राहुल सांकृत्यायन जैसे अनेक लेखक इससे जुड़े। इस आंदोलन ने हिंदी-उर्दू साहित्य में यथार्थवाद और आम आदमी के जीवन को केंद्र में ला दिया।

◆ भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) — स्थापना — 1943 में बम्बई में भारतीय जन नाट्य संघ (इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन — इप्टा) बना। इसका नारा था — "जनता का रंगमंच, जनता का नायक जनता"। इसका उद्देश्य नाटक, गीत, नृत्य और लोककला के माध्यम से जनता की समस्याओं को जनता तक पहुँचाना था।

◆ इप्टा — उदाहरण और प्रभाव — 1943 के बंगाल अकाल पर बिजन भट्टाचार्य का बांग्ला नाटक "नबान्न" (नई फ़सल) इप्टा का सबसे प्रसिद्ध नाटक बना। पृथ्वीराज कपूर, बलराज साहनी, ख़्वाजा अहमद अब्बास, शंभु मित्र जैसे कलाकार इससे जुड़े। अब्बास की फ़िल्म "धरती के लाल" (1946) इप्टा के सहयोग से बनी। इस तरह वामपंथ ने कला को जनता के संघर्ष से जोड़ा और आगे भारतीय सिनेमा और रंगमंच पर इसकी गहरी छाप पड़ी।

6. कांग्रेस के भीतर समाजवाद: नेहरू, सुभाष और कांग्रेस समाजवादी पार्टी

कम्युनिस्ट कांग्रेस से बाहर रहकर या उसे "पूँजीपतियों की पार्टी" कहकर काम कर रहे थे, पर कांग्रेस के भीतर भी समाजवादियों का एक बड़ा और प्रभावशाली वर्ग खड़ा हो गया था। उनका मानना था कि कांग्रेस ही राष्ट्रीय आंदोलन का असली मंच है, इसलिए उसे छोड़ना नहीं, बल्कि उसकी नीतियों को बाईं ओर मोड़ना है। इस वर्ग के सबसे बड़े प्रतीक जवाहरलाल नेहरू थे।

6.1 जवाहरलाल नेहरू — समाजवाद के प्रवक्ता

◆ विदेश का अनुभव (1927) — फ़रवरी 1927 में नेहरू ब्रसेल्स में "साम्राज्यवाद-विरोधी लीग" के सम्मेलन में कांग्रेस के प्रतिनिधि बने, जहाँ एशिया, अफ़्रीका और लैटिन अमेरिका के साम्राज्यवाद-विरोधी नेता मिले थे। नवंबर 1927 में उन्होंने सोवियत संघ की यात्रा की और वहाँ की योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था से बहुत प्रभावित हुए।

◆ पूर्ण स्वतंत्रता की माँग (1927–1928) — लौटते ही मद्रास अधिवेशन (दिसंबर 1927) में उन्होंने पूर्ण स्वतंत्रता का प्रस्ताव पारित करवाया। 1928 में नेहरू रिपोर्ट के "डोमिनियन स्टेटस" के विरोध में उन्होंने सुभाष के साथ "इंडिपेंडेंस फ़ॉर इंडिया लीग" बनाई।

◆ 1929 — दोहरी अध्यक्षता — 1929 में वे ट्रेड यूनियन कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन और कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन — दोनों के अध्यक्ष बने। लाहौर में उन्होंने कहा — "मैं समाजवादी और गणतंत्रवादी हूँ" — और इसी अधिवेशन में पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव पारित हुआ।

◆ 1931 — कराची प्रस्ताव — कराची अधिवेशन में नेहरू द्वारा तैयार मौलिक अधिकार और आर्थिक कार्यक्रम प्रस्ताव पारित हुआ, जिसमें मुख्य उद्योगों पर राज्य के स्वामित्व, मज़दूरों के अधिकार, लगान में कमी और वयस्क मताधिकार जैसी बातें थीं। यह कांग्रेस की पहली आर्थिक नीति थी। 1933 में नेहरू ने "भारत किधर?" (व्हिदर इंडिया) लेखमाला में समाजवाद को भारत का भविष्य बताया।

◆ अप्रैल 1936 — लखनऊ अधिवेशन — अध्यक्ष के रूप में नेहरू ने घोषणा की — "मुझे विश्वास है कि दुनिया और भारत की समस्याओं का एकमात्र हल समाजवाद है।" उन्होंने अपनी कार्यसमिति में तीन समाजवादियों — आचार्य नरेंद्र देव, जयप्रकाश नारायण और अच्युत पटवर्धन — को शामिल किया।

◆ दिसंबर 1936 — फ़ैज़पुर — महाराष्ट्र के फ़ैज़पुर में हुआ यह कांग्रेस का पहला ग्रामीण अधिवेशन था, जिसमें लगान और क़र्ज़ में कमी, बेगार के अंत जैसे कृषि कार्यक्रम को अपनाया गया।

◆ 1938 — राष्ट्रीय योजना समिति — कांग्रेस अध्यक्ष सुभाष चंद्र बोस द्वारा बनाई गई राष्ट्रीय योजना समिति के अध्यक्ष नेहरू बने। इसी समिति की सोच आगे स्वतंत्र भारत के योजना आयोग और पंचवर्षीय योजनाओं में दिखी।

⚖️ 1936 का वाम-दक्षिण टकराव

नेहरू के समाजवादी भाषणों से कांग्रेस के दक्षिणपंथी नेता — राजेंद्र प्रसाद, पटेल, राजगोपालाचारी, जमनालाल बजाज आदि — असहज थे; जून 1936 में सात सदस्यों ने कार्यसमिति से त्यागपत्र की पेशकश की। गांधीजी ने बीच-बचाव किया।

20 मई 1936 को बम्बई के 21 उद्योगपतियों ने "बम्बई घोषणापत्र" पर हस्ताक्षर कर नेहरू के समाजवादी विचारों की आलोचना की। नेहरू ने कांग्रेस की एकता बनाए रखने के लिए संतुलन का रास्ता अपनाया — यही गांधीजी की "छतरी" वाली रणनीति थी, जिसमें सब धाराएँ साथ रहीं।

6.2 सुभाष चंद्र बोस — उग्र वामपंथ के प्रतीक

सुभाष चंद्र बोस भी स्वयं को समाजवादी मानते थे, पर उनका ज़ोर अधिक उग्र और तत्काल संघर्ष पर था। वे मज़दूर संगठनों से गहराई से जुड़े रहे — 1931 में ट्रेड यूनियन कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन के अध्यक्ष बने और जमशेदपुर लेबर एसोसिएशन का नेतृत्व किया। हरिपुरा (1938) में कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में उन्होंने राष्ट्रीय योजना समिति बनाई। 1939 में गांधीजी के उम्मीदवार पट्टाभि सीतारमैया को हराकर वे फिर अध्यक्ष बने, पर त्रिपुरी संकट के बाद त्यागपत्र देकर फ़ॉरवर्ड ब्लॉक बनाया (अध्याय 13)। वे चाहते थे कि यूरोप में युद्ध की स्थिति का लाभ उठाकर तुरंत आंदोलन छेड़ा जाए, जबकि गांधीजी और दक्षिणपंथी नेता इसके लिए तैयार नहीं थे।

6.3 कांग्रेस समाजवादी पार्टी (1934)

◆ पृष्ठभूमि — क्यों बनी? — सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930–34) के दौरान नासिक जेल और अन्य जेलों में बंद युवा कांग्रेसी नेताओं ने मार्क्सवाद और समाजवाद पर ख़ूब पढ़ा और चर्चा की। वे आंदोलन की वापसी और गांधीवादी नेतृत्व के समझौतावादी रुख़ से असंतुष्ट थे, पर कम्युनिस्टों की कांग्रेस-विरोधी नीति से भी असहमत थे। इसलिए उन्होंने तय किया कि कांग्रेस के भीतर रहकर एक समाजवादी दल बनाया जाए, ताकि युवा कम्युनिस्ट पार्टी की ओर न जाएँ और कांग्रेस की नीतियाँ बाईं ओर मुड़ें।

◆ स्थापना — 17 मई 1934 को पटना में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति की बैठक के समय समाजवादियों का अलग सम्मेलन हुआ, जिसकी अध्यक्षता आचार्य नरेंद्र देव ने की और जिसमें पार्टी बनाने का निर्णय हुआ; इसके संयोजक जयप्रकाश नारायण थे। अक्टूबर 1934 में बम्बई में औपचारिक गठन हुआ और कार्यक्रम तय हुआ। पार्टी के अध्यक्ष आचार्य नरेंद्र देव और महासचिव जयप्रकाश नारायण बने।

◆ अन्य नेता — राम मनोहर लोहिया, अच्युत पटवर्धन, मीनू मसानी, अशोक मेहता, यूसुफ़ मेहर अली, कमलादेवी चट्टोपाध्याय, पुरुषोत्तम त्रिकमदास, एस. एम. जोशी, एन. जी. गोरे और गंगाशरण सिंह इसके प्रमुख नेता थे। बिहार में इससे पहले बिहार सोशलिस्ट पार्टी (गंगाशरण सिंह, रामवृक्ष बेनीपुरी आदि) बन चुकी थी।

◆ कार्यक्रम — पार्टी चाहती थी कि सत्ता उत्पादक जनता (मज़दूर-किसान) के हाथ में हो; अर्थव्यवस्था योजनाबद्ध हो; मुख्य उद्योगों का राष्ट्रीयकरण हो; सहकारी खेती और सहकारिता को बढ़ावा मिले; ज़मींदारी और रियासतों का बिना मुआवज़ा अंत हो; ज़मीन किसानों में बाँटी जाए; और मज़दूर-किसानों के वर्ग-संगठन बनें।

◆ स्वरूप — यह कांग्रेस के भीतर एक दल था — इसके सदस्य कांग्रेस के भी सदस्य होते थे। इसकी विचारधारा मार्क्सवाद, लोकतांत्रिक समाजवाद और गांधीवाद का मिश्रण थी। कम्युनिस्टों के विपरीत इसका लक्ष्य सर्वहारा की तानाशाही नहीं था, न ही इसने अल्पसंख्यकों या दलितों के लिए पृथक निर्वाचन की माँग की। इसका पत्र "कांग्रेस सोशलिस्ट" था।

◆ कम्युनिस्टों से संबंध — संयुक्त मोर्चे की भावना में 1936 में पार्टी ने कम्युनिस्टों को सदस्यता दी, पर कम्युनिस्ट इस पार्टी के भीतर अपना अलग गुट बनाकर उसकी इकाइयों को अपने क़ब्ज़े में लेने लगे (जैसा केरल में हुआ)। इसलिए 1940 में उन्हें पार्टी से निकाल दिया गया।

◆ भारत छोड़ो आंदोलन में भूमिका — अगस्त 1942 में बड़े नेताओं की गिरफ़्तारी के बाद जयप्रकाश नारायण, राम मनोहर लोहिया, अच्युत पटवर्धन और अरुणा आसफ़ अली जैसे समाजवादी नेताओं ने भूमिगत आंदोलन का नेतृत्व किया; लोहिया ने उषा मेहता के साथ गुप्त कांग्रेस रेडियो चलाया (अध्याय 13)।

◆ आगे — 1947 में पार्टी ने अपने नाम से "कांग्रेस" शब्द हटा दिया और मार्च 1948 में नासिक सम्मेलन में कांग्रेस से पूरी तरह अलग होकर सोशलिस्ट पार्टी बन गई। आगे इससे प्रजा सोशलिस्ट पार्टी और संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी जैसे दल निकले।

प्रमुख व्यक्तित्व

◆ जयप्रकाश नारायण (1902–1979) — बिहार के सिताबदियारा में जन्मे जयप्रकाश असहयोग आंदोलन में पढ़ाई छोड़कर अमेरिका पढ़ने गए, जहाँ मज़दूरी करते हुए उन्होंने मार्क्सवाद पढ़ा। 1929 में लौटकर वे कांग्रेस में आए और 1934 में कांग्रेस समाजवादी पार्टी के महासचिव बने। नवंबर 1942 में वे साथियों के साथ हज़ारीबाग़ जेल की दीवार फाँदकर भाग निकले और भूमिगत आंदोलन तथा नेपाल सीमा पर "आज़ाद दस्ता" संगठित किया। अप्रैल 1946 में उनकी रिहाई की माँग पर "जयप्रकाश दिवस" मनाया गया। स्वतंत्रता के बाद वे सर्वोदय और भूदान में लगे और 5 जून 1974 को पटना के गांधी मैदान से "संपूर्ण क्रांति" का आह्वान किया। उन्हें "लोकनायक" कहा जाता है और 1999 में मरणोपरांत भारत रत्न मिला।

◆ आचार्य नरेंद्र देव (1889–1956) — उत्तर प्रदेश के सीतापुर में जन्मे नरेंद्र देव असहयोग आंदोलन में वकालत छोड़कर काशी विद्यापीठ में अध्यापक और फिर आचार्य (प्रधानाचार्य) बने, इसीलिए "आचार्य" कहलाए। वे कांग्रेस समाजवादी पार्टी के संस्थापक अध्यक्ष थे और भारतीय समाजवाद के प्रमुख सिद्धांतकार माने जाते हैं। वे बौद्ध दर्शन के बड़े विद्वान थे — उनकी पुस्तक "बौद्ध धर्म-दर्शन" प्रसिद्ध है। स्वतंत्रता के बाद वे लखनऊ और काशी हिंदू विश्वविद्यालय के कुलपति रहे।

◆ राम मनोहर लोहिया (1910–1967) — उत्तर प्रदेश के अकबरपुर में जन्मे लोहिया ने जर्मनी से पीएच.डी. की और 1936 में कांग्रेस के विदेश विभाग के पहले सचिव बने। भारत छोड़ो आंदोलन में उन्होंने भूमिगत रेडियो चलाया और 1946 में गोवा में पुर्तगालियों के विरुद्ध सत्याग्रह शुरू किया। स्वतंत्रता के बाद वे ग़ैर-कांग्रेसवाद और पिछड़े वर्गों को आगे लाने की राजनीति के प्रमुख नेता बने।

6.4 तीन वैचारिक धाराओं की तुलना

नीचे का आरेख राष्ट्रीय आंदोलन की तीन प्रमुख वैचारिक धाराओं — गांधीवादी, कांग्रेस समाजवादी और साम्यवादी — की पाँच आधारों पर तुलना करता है: लक्ष्य, साधन, वर्गों के प्रति दृष्टि, संपत्ति और प्रभाव। आरेख के बाद हर धारा को इन्हीं पाँच आधारों पर पूरे वाक्यों में समझाया गया है।

चित्र 15.4: गांधीवादी, कांग्रेस समाजवादी और साम्यवादी धाराओं की तुलना
चित्र 15.4: गांधीवादी, कांग्रेस समाजवादी और साम्यवादी धाराओं की तुलना

(क) गांधीवादी धारा — गांधीजी, पटेल, राजेंद्र प्रसाद

◆ लक्ष्य — गांधीवादियों का लक्ष्य केवल राजनीतिक आज़ादी (स्वराज) नहीं था; वे आत्मनिर्भर गाँवों वाला ग्राम-स्वराज, नैतिक मूल्यों पर आधारित समाज और सबके उदय अर्थात् "सर्वोदय" चाहते थे।

◆ साधन — उनके साधन थे सत्य, अहिंसा, सत्याग्रह और रचनात्मक कार्यक्रम (खादी, ग्रामोद्योग, अस्पृश्यता-निवारण, हिंदू-मुस्लिम एकता)। गांधीजी मानते थे कि साधन उतने ही पवित्र होने चाहिए जितना साध्य।

◆ वर्गों के प्रति दृष्टि — गांधीजी वर्ग-संघर्ष को नहीं, वर्ग-सहयोग को सही मानते थे। उनका कहना था कि ज़मींदार और पूँजीपति अपनी संपत्ति के मालिक नहीं, बल्कि समाज की ओर से उसके "न्यासी" (ट्रस्टी) बनें।

🔍 आसान परिभाषा: न्यासिता (ट्रस्टीशिप)

📘 परिभाषा: गांधीजी का आर्थिक सिद्धांत कि धनवान व्यक्ति अपनी आवश्यकता से अधिक संपत्ति को अपनी निजी वस्तु न मानकर समाज की धरोहर माने और एक न्यासी (ट्रस्टी) की तरह उसका उपयोग समाज के कल्याण के लिए करे।

💡 आसान भाषा में: जैसे किसी मंदिर का पुजारी मंदिर की संपत्ति का मालिक नहीं, केवल देखभाल करने वाला होता है — वैसे ही उद्योगपति अपनी मिल का "रखवाला" बने और उसका लाभ मज़दूरों और समाज के साथ बाँटे। 🏠 उदाहरण: अहमदाबाद मिल हड़ताल (1918) में गांधीजी ने मिल-मालिकों से मज़दूरों के प्रति इसी न्यासी-भाव की अपेक्षा की; कम्युनिस्ट इस सिद्धांत को पूँजीपतियों को बचाने का तरीक़ा मानते थे।

◆ संपत्ति — निजी संपत्ति बनी रहे, पर जनहित में उसका उपयोग हो; उत्पादन बड़े कारख़ानों के बजाय विकेंद्रीकृत कुटीर उद्योगों और खादी से हो, ताकि गाँव-गाँव में रोज़गार मिले।

◆ प्रभाव — यही धारा राष्ट्रीय आंदोलन का मुख्य नेतृत्व बनी और इसी के पास सबसे बड़ा जन-आधार था।

(ख) कांग्रेस समाजवादी धारा — नेहरू, सुभाष, जयप्रकाश, नरेंद्र देव

◆ लक्ष्य — इनका लक्ष्य पूर्ण स्वतंत्रता के साथ एक समाजवादी समाज बनाना था, जिसमें आर्थिक समानता हो।

◆ साधन — ये कांग्रेस के भीतर रहकर जन-संघर्ष करना चाहते थे; किसानों और मज़दूरों को संगठित करना और स्वतंत्र भारत में नियोजन (योजनाबद्ध विकास) इनके मुख्य साधन थे।

◆ वर्गों के प्रति दृष्टि — ये किसान-मज़दूर के हितों को प्राथमिकता देते थे और ज़मींदारी तथा रियासतों का अंत चाहते थे।

◆ संपत्ति — मुख्य उद्योगों का राष्ट्रीयकरण, सहकारिता और योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था — पर छोटी निजी संपत्ति बनी रहे।

◆ प्रभाव — इन्होंने कांग्रेस की नीतियों को बाईं ओर मोड़ा — कराची प्रस्ताव (1931), फ़ैज़पुर कृषि कार्यक्रम (1936) और राष्ट्रीय योजना समिति (1938) इसी प्रभाव के परिणाम थे।

(ग) साम्यवादी धारा — एम. एन. राय, डांगे, पी. सी. जोशी

◆ लक्ष्य — इनका लक्ष्य साम्राज्यवाद के साथ पूँजीवाद का भी अंत करके मज़दूर-किसान राज स्थापित करना था।

◆ साधन — इनके साधन थे वर्ग-संघर्ष, ट्रेड यूनियन, हड़ताल और किसान सभा; और ज़रूरत पड़ने पर ये सशस्त्र संघर्ष को भी उचित मानते थे।

◆ वर्गों के प्रति दृष्टि — ये मानते थे कि क्रांति का नेतृत्व मज़दूर वर्ग करेगा और पूँजीपति तथा ज़मींदार शोषक वर्ग हैं, जिनसे समझौता नहीं हो सकता।

◆ संपत्ति — उत्पादन के सभी साधनों — ज़मीन, कारख़ाने, खानें — पर सामाजिक (राज्य) स्वामित्व हो।

◆ प्रभाव — इन्होंने मज़दूर-किसान संगठनों को मज़बूत किया, पर कम्युनिस्ट इंटरनेशनल की अंतरराष्ट्रीय नीति से बँधे रहने के कारण कई बार — जैसे 1930 और 1942 में — राष्ट्रीय धारा से कट गए।

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7. किसान सभा, छात्र-युवा, पूँजीपति वर्ग और विदेशी सहयोगी

मज़दूरों और वामपंथी दलों के अलावा चार और धाराएँ थीं जिनके बिना राष्ट्रीय आंदोलन की तस्वीर अधूरी रहती है। पहली धारा किसानों की थी, जिन्होंने 1930 के दशक में अपना अखिल भारतीय संगठन बनाया। दूसरी धारा छात्रों और युवाओं की थी, जो हर आंदोलन में सबसे आगे की पंक्ति में खड़े मिले। तीसरी धारा भारतीय पूँजीपति वर्ग की थी, जिसने पैसे और संगठन से आंदोलन की मदद की, पर समाजवाद से दूरी भी बनाए रखी। चौथी धारा उन विदेशी मित्रों की थी, जिन्होंने अंग्रेज़ या यूरोपीय होते हुए भी भारत की आज़ादी का साथ दिया। इस खंड में इन चारों को एक-एक करके समझते हैं।

7.1 किसान सभा आंदोलन

20वीं सदी के किसान आंदोलनों — जैसे अवध किसान सभा, एका, मोपला, बारडोली, तेभागा और तेलंगाना — का पूरा विवरण अध्याय 6 में दिया जा चुका है। यहाँ हम केवल यह देखेंगे कि किसानों का अखिल भारतीय संगठन कैसे बना, उसका वामपंथ से क्या संबंध था और कांग्रेस से उसके रिश्ते कैसे रहे।

◆ पृष्ठभूमि — संगठन की ज़रूरत क्यों पड़ी? — 1929 की विश्वव्यापी आर्थिक मंदी में अनाज और कपास जैसी फ़सलों के दाम लगभग आधे रह गए, पर लगान और क़र्ज़ की किस्तें उतनी ही रहीं। इसका परिणाम यह हुआ कि किसान की आमदनी घट गई और बोझ बढ़ गया। सविनय अवज्ञा आंदोलन में किसानों ने "लगान नहीं देंगे" जैसे अभियानों में भाग लिया था, इसलिए उनमें राजनीतिक चेतना भी आ चुकी थी। इसी समय कांग्रेस समाजवादी और कम्युनिस्ट कार्यकर्ता गाँवों में पहुँचे और उन्होंने किसानों को अलग वर्ग-संगठन बनाने के लिए प्रेरित किया।

◆ बिहार प्रांतीय किसान सभा (1929) — स्वामी सहजानंद सरस्वती ने 1929 में बिहार प्रांतीय किसान सभा बनाई। आरंभ में इसका उद्देश्य ज़मींदारों और किसानों के झगड़ों को शांति से सुलझाना था, पर ज़मींदारों के अत्याचार देखकर यह सभा धीरे-धीरे ज़मींदारी प्रथा के अंत की माँग करने लगी। बिहार में इसके प्रमुख साथी कार्यानंद शर्मा, यदुनंदन शर्मा और राहुल सांकृत्यायन थे।

◆ आंध्र में एन. जी. रंगा (1933–1935) — आंध्र में एन. जी. रंगा ने किसानों को संगठित किया। उन्होंने 1933 में गुंटूर ज़िले के निदुब्रोलु में किसान कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षण देने के लिए एक किसान संस्थान खोला, जहाँ गाँव के युवाओं को अर्थशास्त्र और संगठन का काम सिखाया जाता था। उनके प्रयास से दक्षिण भारत में प्रांतीय किसान संगठन खड़े हुए।

◆ अखिल भारतीय किसान सभा की स्थापना (11 अप्रैल 1936) — कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन के समय 11 अप्रैल 1936 को लखनऊ में अखिल भारतीय किसान सभा की स्थापना हुई। इसके पहले अध्यक्ष स्वामी सहजानंद सरस्वती और महासचिव एन. जी. रंगा बने। इस सम्मेलन को जवाहरलाल नेहरू ने भी संबोधित किया। सभा का मुखपत्र (बुलेटिन) इंदुलाल याज्ञिक के संपादन में निकला।

◆ किसान घोषणापत्र (अगस्त 1936) — अगस्त 1936 में बम्बई में सभा ने अपना किसान घोषणापत्र जारी किया। इसकी मुख्य माँगें थीं — ज़मींदारी प्रथा का उन्मूलन, लगान और भू-राजस्व में 50 प्रतिशत कमी, किसानों के पुराने क़र्ज़ों की माफ़ी, बेगार का अंत, काश्तकारों को ज़मीन पर स्थायी अधिकार और खेत-मज़दूरों के लिए न्यूनतम मज़दूरी। 1 सितंबर 1936 को पूरे देश में "किसान दिवस" मनाया गया।

◆ कांग्रेस पर प्रभाव — फ़ैज़पुर (दिसंबर 1936) — किसान सभा का दूसरा अधिवेशन कांग्रेस के फ़ैज़पुर अधिवेशन के साथ ही हुआ, जिसकी अध्यक्षता एन. जी. रंगा ने की। किसान घोषणापत्र की कई माँगें कांग्रेस के फ़ैज़पुर कृषि कार्यक्रम में शामिल की गईं। इस प्रकार किसान सभा ने कांग्रेस को किसानों की समस्याओं पर स्पष्ट नीति बनाने के लिए मजबूर किया।

◆ कांग्रेसी मंत्रिमंडलों से टकराव (1937–1939) — 1937 में प्रांतों में कांग्रेस की सरकारें बनीं तो किसानों को उनसे बड़ी आशा थी। इन सरकारों ने काश्तकारी क़ानूनों में सुधार किए और क़र्ज़ में राहत दी, पर ज़मींदारी समाप्त नहीं की। इससे किसान सभा और कांग्रेस के दक्षिणपंथी नेताओं में तनाव बढ़ा। बिहार में बकाश्त संघर्ष इसी टकराव का सबसे बड़ा उदाहरण था।

🔍 आसान परिभाषा: बकाश्त भूमि

📘 परिभाषा: वह भूमि जिस पर पहले काश्तकार किसान खेती करते थे, पर लगान न चुका पाने के कारण (विशेषकर मंदी के वर्षों में) ज़मींदार ने उसे अपने सीधे क़ब्ज़े में ले लिया और फिर उन्हीं किसानों से बटाई पर जुतवाने लगा।

💡 आसान भाषा में: मान लीजिए किसी किसान के पास पीढ़ियों से पाँच बीघा खेत था। मंदी में वह लगान नहीं दे पाया, तो ज़मींदार ने खेत अपने नाम कर लिया। अब वही किसान उसी खेत पर बिना किसी अधिकार के, आधी फ़सल देकर खेती करता है — यही बकाश्त ज़मीन है। 🏠 उदाहरण: बिहार में 1937–39 के दौरान बड़हिया टाल, रेवड़ा और मझियावाँ में किसानों ने बकाश्त ज़मीन वापस पाने के लिए सत्याग्रह किया; किसान खेतों में डटकर फ़सल बोते और काटते थे।

◆ बकाश्त संघर्ष (बिहार, 1937–1939) — किसान सभा के नेतृत्व में बिहार के किसानों ने माँग की कि ज़मींदारों द्वारा छीनी गई बकाश्त ज़मीन उन्हें वापस मिले। कार्यानंद शर्मा ने मुंगेर के बड़हिया टाल में, यदुनंदन शर्मा ने गया के रेवड़ा में और राहुल सांकृत्यायन ने सारण के अमवारी में संघर्ष चलाया। कांग्रेसी सरकार ने कुछ रियायतें दीं और कुछ ज़मीन लौटाई गई, पर कई जगह पुलिस कार्रवाई भी हुई। इसका परिणाम यह हुआ कि बिहार में कांग्रेस और किसान सभा के रास्ते अलग होने लगे।

◆ लाल झंडा और बढ़ता वामपंथी प्रभाव — 1937 में किसान सभा ने लाल झंडे को अपना झंडा बनाया। इसके बाद के अधिवेशनों की अध्यक्षता आचार्य नरेंद्र देव और राहुल सांकृत्यायन जैसे वामपंथी नेताओं ने की। 1938 के हरिपुरा अधिवेशन में कांग्रेस ने अपने सदस्यों को ऐसे किसान संगठनों की गतिविधियों से दूर रहने की सलाह दी जो कांग्रेस के सिद्धांतों के विरुद्ध काम करें।

◆ 1942–1945 — फूट — दूसरे विश्वयुद्ध में कम्युनिस्टों ने सोवियत संघ पर जर्मन हमले के बाद युद्ध को "जनयुद्ध" कहकर भारत छोड़ो आंदोलन का साथ नहीं दिया। किसान सभा के ग़ैर-कम्युनिस्ट नेता इस रुख़ से सहमत नहीं थे। इसलिए स्वामी सहजानंद, एन. जी. रंगा और इंदुलाल याज्ञिक एक-एक करके सभा से अलग हो गए और संगठन पूरी तरह कम्युनिस्ट पार्टी के प्रभाव में आ गया।

◆ युद्ध के बाद के संघर्ष (1946–1947) — युद्ध के बाद किसान सभा ने तीन बड़े संघर्षों का नेतृत्व किया — बंगाल का तेभागा आंदोलन (बटाईदार को उपज का दो-तिहाई हिस्सा), हैदराबाद रियासत का तेलंगाना आंदोलन और त्रावणकोर का पुन्नप्रा-वायलार संघर्ष। इनका विस्तार अध्याय 6 में है।

◆ महत्त्व और सीमा — किसान सभा ने पहली बार देशभर के किसानों को एक मंच दिया और "ज़मींदारी हटाओ" को राष्ट्रीय माँग बना दिया, जो स्वतंत्रता के बाद ज़मींदारी उन्मूलन क़ानूनों के रूप में पूरी हुई। इसकी सीमा यह थी कि इसका असर मुख्यतः बिहार, आंध्र, बंगाल, केरल और पंजाब जैसे कुछ क्षेत्रों तक रहा और इसमें भूमिहीन खेत-मज़दूरों की तुलना में ज़मीन वाले काश्तकारों की आवाज़ अधिक थी।

प्रमुख व्यक्तित्व

◆ स्वामी सहजानंद सरस्वती (1889–1950) — उत्तर प्रदेश के ग़ाज़ीपुर ज़िले में जन्मे सहजानंद युवावस्था में संन्यासी बन गए थे। असहयोग आंदोलन से वे राजनीति में आए और बिहार को अपना कार्यक्षेत्र बनाया। पटना के पास बिहटा में उन्होंने अपना आश्रम बनाया, जो किसान आंदोलन का केंद्र बना। 1929 में उन्होंने बिहार प्रांतीय किसान सभा और 1936 में अखिल भारतीय किसान सभा की अध्यक्षता संभाली। उनकी आत्मकथा "मेरा जीवन संघर्ष" है। वे मानते थे कि जो किसान अन्न उगाता है, वही देश का असली मालिक है।

◆ एन. जी. रंगा (1900–1995) — आंध्र के गुंटूर ज़िले के निदुब्रोलु में जन्मे रंगा ने ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र पढ़ा और लौटकर किसानों के बीच काम किया। वे किसान सभा के पहले महासचिव थे और कांग्रेस के भीतर किसानों की आवाज़ माने जाते थे। स्वतंत्रता के बाद वे लंबे समय तक संसद सदस्य रहे और 1959 में स्वतंत्र पार्टी के संस्थापक अध्यक्ष बने।

◆ इंदुलाल याज्ञिक (1892–1972) — गुजरात के नडियाद में जन्मे याज्ञिक खेड़ा सत्याग्रह के समय गांधीजी के निकट सहयोगी रहे और "नवजीवन" पत्र से जुड़े थे। बाद में वे किसान आंदोलन में आए और किसान सभा के बुलेटिन का संपादन किया। स्वतंत्रता के बाद उन्होंने महागुजरात आंदोलन का नेतृत्व किया, जिसके परिणामस्वरूप 1960 में गुजरात अलग राज्य बना।

7.2 छात्र और युवा आंदोलन

छात्र और युवा हर बड़े आंदोलन की ऊर्जा थे। स्वदेशी आंदोलन (1905) में छात्रों ने सरकारी स्कूल-कॉलेज छोड़े और विदेशी कपड़ों की दुकानों पर धरना दिया। असहयोग आंदोलन (1920–22) में हज़ारों छात्रों ने सरकारी संस्थाएँ छोड़कर काशी विद्यापीठ, गुजरात विद्यापीठ और जामिया मिल्लिया इस्लामिया जैसी राष्ट्रीय संस्थाओं में प्रवेश लिया। 1920 के दशक के उत्तरार्ध में युवाओं ने अपने अलग संगठन बनाने शुरू किए।

◆ हिंदुस्तानी सेवा दल (1923) — कर्नाटक के डॉक्टर एन. एस. हार्डीकर ने 1923 में कांग्रेस के स्वयंसेवक संगठन के रूप में हिंदुस्तानी सेवा दल बनाया। इसका काम युवाओं को अनुशासन, शारीरिक प्रशिक्षण और सेवा-कार्य सिखाना था। कांग्रेस के अधिवेशनों की व्यवस्था और सत्याग्रहों में स्वयंसेवकों की आपूर्ति यही दल करता था। आगे चलकर इसे कांग्रेस सेवा दल कहा गया।

◆ नौजवान भारत सभा (1926) — भगत सिंह और उनके साथियों ने 1926 में लाहौर में नौजवान भारत सभा बनाई। इसका उद्देश्य युवाओं, किसानों और मज़दूरों में राजनीतिक चेतना जगाना और सांप्रदायिकता से दूर एक धर्मनिरपेक्ष, समाजवादी सोच फैलाना था। यह क्रांतिकारी आंदोलन का खुला मंच थी (अध्याय 14)।

◆ यूथ लीग और छात्र सम्मेलन (1928) — 1928 में साइमन कमीशन के बहिष्कार ने युवाओं में नया जोश भर दिया। बंगाल, बम्बई और पंजाब में यूथ लीग बनीं। उसी वर्ष अखिल बंगाल छात्र सम्मेलन हुआ, जिसकी अध्यक्षता जवाहरलाल नेहरू ने की। नेहरू और सुभाष चंद्र बोस इस दौर में देशभर में युवा सम्मेलनों को संबोधित करते घूमे और पूर्ण स्वतंत्रता तथा समाजवाद के विचार युवाओं तक पहुँचाए।

◆ अखिल भारतीय छात्र फ़ेडरेशन (12 अगस्त 1936) — 12 अगस्त 1936 को लखनऊ में अखिल भारतीय छात्र फ़ेडरेशन की स्थापना हुई। इसके स्थापना सम्मेलन का उद्घाटन जवाहरलाल नेहरू ने किया और अध्यक्षता मोहम्मद अली जिन्ना ने की। यह देश का पहला अखिल भारतीय छात्र संगठन था, जिसने छात्रों को राष्ट्रीय और वामपंथी राजनीति से जोड़ा।

◆ आगे का विकास — आरंभ में इस संगठन में कांग्रेसी, समाजवादी और कम्युनिस्ट — सभी विचारों के छात्र साथ थे। 1940 के आसपास वैचारिक मतभेदों के कारण संगठन बँट गया और छात्र फ़ेडरेशन मुख्यतः कम्युनिस्ट प्रभाव में रहा, जबकि कांग्रेस और समाजवादी विचार के छात्र अलग हो गए और आगे उन्होंने अखिल भारतीय छात्र कांग्रेस बनाई। भारत छोड़ो आंदोलन (1942) में राष्ट्रवादी छात्रों ने कॉलेजों में हड़तालें कीं, जुलूस निकाले और भूमिगत कार्यकर्ताओं के संदेशवाहक बने।

📌 उदाहरण: 1936 — संगठनों का वर्ष

वर्ष 1936 को याद रखना आसान है, क्योंकि इसी एक वर्ष में और एक ही शहर लखनऊ में तीन बड़े वर्ग-संगठन बने — अखिल भारतीय किसान सभा (11 अप्रैल), प्रगतिशील लेखक संघ (अप्रैल, अध्यक्ष प्रेमचंद) और अखिल भारतीय छात्र फ़ेडरेशन (12 अगस्त)। उसी वर्ष नेहरू कांग्रेस के लखनऊ और फ़ैज़पुर — दोनों अधिवेशनों के अध्यक्ष थे। इससे पता चलता है कि 1936 में देश का वातावरण कितना वामपंथ की ओर झुका हुआ था।

7.3 भारतीय पूँजीपति वर्ग और राष्ट्रीय आंदोलन

भारतीय पूँजीपति वर्ग — अर्थात् मिलों, बैंकों और व्यापार के भारतीय मालिक — का राष्ट्रीय आंदोलन से रिश्ता दोहरा था। एक ओर ब्रिटिश सरकार की आर्थिक नीतियाँ उनके उद्योगों को नुक़सान पहुँचाती थीं, इसलिए वे साम्राज्यवाद के विरोधी थे। दूसरी ओर वे लंबी हड़तालों, वर्ग-संघर्ष और समाजवाद से डरते थे, क्योंकि इससे उनकी अपनी संपत्ति पर ख़तरा आ सकता था। इसलिए उन्होंने कांग्रेस का साथ दिया, पर उसके भीतर दक्षिणपंथी और गांधीवादी नेतृत्व को मज़बूत करने की कोशिश की।

◆ पृष्ठभूमि — भारतीय उद्योग का उदय — 19वीं सदी के उत्तरार्ध में बम्बई और अहमदाबाद में भारतीयों ने कपड़ा मिलें लगाईं। 1907 में जमशेदजी टाटा के परिवार ने टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी की स्थापना की। पहले विश्वयुद्ध (1914–18) में विदेशी माल का आयात घटा, जिससे भारतीय उद्योगों को बढ़ने का मौक़ा मिला और बिड़ला, वालचंद हीराचंद, लालभाई और श्रीराम जैसे नए उद्योग-घराने उभरे। युद्ध के बाद जब ब्रिटिश सरकार ने फिर अपने देश के उद्योगों के हित में नीतियाँ बनाईं, तो इन उद्योगपतियों का टकराव सरकार से होने लगा।

◆ व्यापारिक संगठन — यूरोपीय व्यापारियों के अपने चैंबर थे, जिनकी बात सरकार सुनती थी। उनके मुक़ाबले भारतीयों ने अपने संगठन बनाए — 1887 में कलकत्ता में बंगाल नेशनल चैंबर ऑफ़ कॉमर्स और 1907 में बम्बई में इंडियन मर्चेंट्स चैंबर। 1927 में घनश्यामदास बिड़ला और पुरुषोत्तमदास ठाकुरदास की पहल पर सभी भारतीय व्यापारिक संगठनों का राष्ट्रीय महासंघ "फ़िक्की" (भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग महासंघ) बना। फ़िक्की स्वयं को राष्ट्रीय आंदोलन का "आर्थिक मोर्चा" मानता था।

सरकार से शिकायतें — तीन बड़े मुद्दे

◆ रुपया-पाउंड विनिमय दर (1926–1927) — हिल्टन यंग आयोग (1926) की सिफ़ारिश पर सरकार ने एक रुपये का मूल्य 1 शिलिंग 6 पेंस तय कर दिया, जबकि भारतीय उद्योगपति 1 शिलिंग 4 पेंस चाहते थे। रुपया महँगा होने से ब्रिटेन से आने वाला माल भारत में सस्ता पड़ता था और भारतीय निर्यात महँगा हो जाता था। आयोग के भारतीय सदस्य पुरुषोत्तमदास ठाकुरदास ने इस सिफ़ारिश पर अपनी असहमति दर्ज की।

◆ संरक्षण की माँग — भारतीय उद्योगपति चाहते थे कि विदेशी माल पर ऊँचा आयात शुल्क लगे, ताकि नए भारतीय उद्योग पनप सकें। सरकार ने कुछ उद्योगों (जैसे इस्पात, चीनी, कपड़ा) को संरक्षण दिया भी, पर साथ ही ब्रिटिश माल को शुल्क में विशेष छूट दे दी।

🔍 आसान परिभाषा: साम्राज्यीय वरीयता (इंपीरियल प्रेफ़रेंस)

📘 परिभाषा: वह व्यापार-नीति जिसके अंतर्गत ब्रिटिश साम्राज्य के देशों — विशेषकर ब्रिटेन — से आने वाले माल पर दूसरे देशों के माल की तुलना में कम आयात शुल्क लगाया जाता था। 1932 के ओटावा समझौते से इसे भारत पर व्यापक रूप से लागू किया गया।

💡 आसान भाषा में: मान लीजिए जापान के कपड़े पर 50 रुपये शुल्क लगता है और ब्रिटेन के कपड़े पर केवल 25 रुपये। तब भारत के बाज़ार में ब्रिटेन का कपड़ा सस्ता बिकेगा — यानी भारतीय बाज़ार ब्रिटिश उद्योग के लिए सुरक्षित रखा गया, भले ही इससे भारतीय मिलों को नुक़सान हो। 🏠 उदाहरण: इस्पात और कपड़े पर लगाए गए संरक्षण-शुल्कों में ब्रिटिश माल को रियायत दी गई; भारतीय उद्योगपतियों और राष्ट्रवादी नेताओं ने केंद्रीय विधानसभा में इसका कड़ा विरोध किया।

◆ विदेशी पूँजी और सरकारी ख़रीद — उद्योगपतियों की शिकायत थी कि जहाज़रानी, बैंकिंग और बीमा जैसे क्षेत्रों पर ब्रिटिश कंपनियों का एकाधिकार है और सरकार अपनी ख़रीद (रेल का सामान आदि) भी ब्रिटेन से करती है। वालचंद हीराचंद की सिंधिया स्टीम नेविगेशन कंपनी (1919) को ब्रिटिश जहाज़ कंपनियों की कड़ी प्रतिस्पर्धा झेलनी पड़ी।

राष्ट्रीय आंदोलन में योगदान

◆ स्वदेशी उद्यम — स्वदेशी आंदोलन के समय से भारतीयों ने कपड़ा मिलें, बैंक, बीमा कंपनियाँ और साबुन-माचिस के कारख़ाने खोले। इन उद्यमों ने दिखाया कि भारतीय अपने उद्योग स्वयं चला सकते हैं और विदेशी माल के बहिष्कार को व्यावहारिक आधार दिया।

◆ आर्थिक सहायता — जमनालाल बजाज, घनश्यामदास बिड़ला, अंबालाल साराभाई और वालचंद हीराचंद जैसे उद्योगपतियों ने कांग्रेस और गांधीजी के रचनात्मक कार्यक्रमों — खादी, हरिजन सेवा, राष्ट्रीय शिक्षा — को खुलकर धन दिया। जमनालाल बजाज वर्षों तक कांग्रेस के कोषाध्यक्ष रहे और स्वयं कई बार जेल गए; गांधीजी उन्हें अपना "पाँचवाँ पुत्र" कहते थे। बिड़ला हरिजन सेवक संघ के अध्यक्ष रहे।

◆ सरकार के दमन का साथ नहीं दिया — 1928 में जब सरकार कम्युनिस्टों और मज़दूर नेताओं को कुचलने के लिए सार्वजनिक सुरक्षा विधेयक लाई, तो ठाकुरदास और बिड़ला जैसे उद्योगपतियों ने भी विधानसभा में उसका विरोध किया, क्योंकि उन्हें डर था कि ऐसा क़ानून कल पूरे राष्ट्रीय आंदोलन के विरुद्ध इस्तेमाल होगा।

◆ सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930–1931) — व्यापारियों ने विदेशी कपड़े का व्यापार न करने की शपथ ली और फ़िक्की ने पहले गोलमेज़ सम्मेलन में भाग लेने से इनकार कर दिया, क्योंकि कांग्रेस उसमें नहीं थी। पर जब आंदोलन लंबा खिंचा और व्यापार को नुक़सान होने लगा, तो इन्हीं उद्योगपतियों ने गांधी-इरविन समझौते (1931) के लिए दोनों पक्षों पर दबाव डाला।

◆ बम्बई योजना (जनवरी 1944) — दूसरे विश्वयुद्ध के अंतिम वर्षों में आठ प्रमुख उद्योगपतियों ने स्वतंत्र भारत के आर्थिक विकास की एक योजना प्रकाशित की, जिसे बम्बई योजना या "टाटा-बिड़ला योजना" कहते हैं। इस पर हस्ताक्षर करने वाले थे — जे. आर. डी. टाटा, घनश्यामदास बिड़ला, पुरुषोत्तमदास ठाकुरदास, लाला श्रीराम, कस्तूरभाई लालभाई, ए. डी. श्रॉफ़, अर्देशिर दलाल और जॉन मथाई। योजना में 15 वर्षों में 10,000 करोड़ रुपये के निवेश से प्रति व्यक्ति आय को दोगुना करने का लक्ष्य रखा गया था। ध्यान देने की बात यह है कि स्वयं पूँजीपतियों ने इसमें बुनियादी उद्योगों में सरकारी क्षेत्र की बड़ी भूमिका और नियोजन को स्वीकार किया।

इस प्रकार पूँजीपति वर्ग के योगदान और उसकी सीमाओं — दोनों को साथ रखकर देखना ज़रूरी है। नीचे का बॉक्स दोनों पक्षों को दोहराता है।

📈 योगदान

✔ पूँजीपतियों ने फ़िक्की जैसे संगठनों से ब्रिटिश आर्थिक नीतियों की खुली आलोचना की।

✔ उन्होंने कांग्रेस और रचनात्मक कार्यक्रमों को नियमित आर्थिक सहायता दी।

✔ उन्होंने स्वदेशी उद्योग खड़े करके आर्थिक आत्मनिर्भरता की नींव रखी।

✔ उन्होंने बम्बई योजना (1944) बनाकर स्वतंत्र भारत के नियोजन की सोच को बल दिया।

⚠️ सीमाएँ

✔ वे लंबे जन-आंदोलनों से हिचकते थे, क्योंकि हड़ताल और बहिष्कार से व्यापार रुकता था।

✔ वे संवैधानिक तरीक़ों और समझौते को अधिक पसंद करते थे।

✔ वे समाजवाद और वर्ग-संघर्ष के विरोधी थे — 1936 का बम्बई घोषणापत्र इसका उदाहरण है।

✔ मज़दूरों की माँगों पर उनका रुख़ प्रायः मालिकों जैसा ही कठोर रहा।

इतिहासकारों का निष्कर्ष यह है कि भारतीय पूँजीपति वर्ग ने अपने दीर्घकालीन हित को पहचाना — उसे समझ आ गया था कि भारतीय उद्योग का विकास केवल स्वतंत्र भारत में ही संभव है। इसलिए कई उपनिवेशों के विपरीत भारत का पूँजीपति वर्ग साम्राज्यवाद का पिछलग्गू नहीं बना; वह कांग्रेस के साथ रहा, पर उसने कांग्रेस का नेतृत्व अपने हाथ में नहीं लिया।

7.4 राष्ट्रीय आंदोलन के विदेशी सहयोगी

भारत की लड़ाई अंग्रेज़ी शासन से थी, अंग्रेज़ जाति से नहीं — गांधीजी यह बात बार-बार कहते थे। इसका सबसे अच्छा प्रमाण वे विदेशी स्त्री-पुरुष हैं, जिन्होंने भारत को अपना घर बनाया और उसकी आज़ादी, शिक्षा और समाज-सेवा के लिए काम किया। इनमें से कुछ को ब्रिटिश सरकार ने जेल भेजा और कुछ को देश से निकाल दिया।

◆ ए. ओ. ह्यूम (1829–1912) — स्कॉटलैंड मूल के एलन ऑक्टेवियन ह्यूम भारतीय सिविल सेवा के सेवानिवृत्त अधिकारी थे। उन्होंने 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना में केंद्रीय भूमिका निभाई और कई वर्षों तक उसके महासचिव रहे (अध्याय 10)। वे पक्षियों के बड़े जानकार भी थे।

◆ विलियम वेडरबर्न (1838–1918) — वे भी सेवानिवृत्त सिविल सेवा अधिकारी थे। वे 1889 (बम्बई) और 1910 (इलाहाबाद) में दो बार कांग्रेस के अध्यक्ष बने। उन्होंने लंदन में कांग्रेस की ब्रिटिश समिति के माध्यम से ब्रिटिश संसद और जनता के सामने भारत का पक्ष रखा।

◆ एनी बेसेंट (1847–1933) — आयरिश मूल की एनी बेसेंट 1893 में थियोसोफ़िकल सोसाइटी के काम से भारत आईं। उन्होंने 1898 में बनारस में सेंट्रल हिंदू कॉलेज खोला, जो आगे काशी हिंदू विश्वविद्यालय का आधार बना। उन्होंने "न्यू इंडिया" और "कॉमनवील" पत्र निकाले और सितंबर 1916 में होमरूल लीग शुरू की। 1917 में उनकी नज़रबंदी के विरोध में देशभर में आंदोलन हुआ और उसी वर्ष वे कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन (1917) की पहली महिला अध्यक्ष बनीं।

◆ सिस्टर निवेदिता (1867–1911) — आयरलैंड में जन्मी मार्गरेट नोबल स्वामी विवेकानंद की शिष्या बनकर 1898 में भारत आईं; विवेकानंद ने उन्हें "निवेदिता" (समर्पित) नाम दिया। उन्होंने कलकत्ता में लड़कियों का स्कूल खोला, प्लेग के समय सेवा की और स्वदेशी आंदोलन के राष्ट्रवादियों तथा भारतीय कला के पुनर्जागरण को प्रेरणा दी।

◆ सी. एफ़. एंड्रूज़ (1871–1940) — अंग्रेज़ पादरी चार्ल्स फ़्रियर एंड्रूज़ 1904 में दिल्ली के सेंट स्टीफ़ंस कॉलेज में पढ़ाने आए। वे गांधीजी और रवींद्रनाथ टैगोर — दोनों के घनिष्ठ मित्र थे। उन्होंने दक्षिण अफ़्रीका में गांधीजी के संघर्ष में मदद की और फ़िजी में भारतीय गिरमिटिया (अनुबंधित) मज़दूरों की दुर्दशा को उजागर किया, जिसके बाद यह प्रथा समाप्त की गई। ग़रीबों के प्रति उनके प्रेम के कारण उन्हें "दीनबंधु" कहा गया। वे ट्रेड यूनियन कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे।

◆ बी. जी. हॉर्निमन (1873–1948) — अंग्रेज़ पत्रकार बेंजामिन गाइ हॉर्निमन बम्बई के राष्ट्रवादी पत्र "बॉम्बे क्रॉनिकल" के संपादक थे। उन्होंने रॉलेट सत्याग्रह का समर्थन किया और जलियाँवाला बाग़ हत्याकांड की सच्चाई सेंसर को चकमा देकर ब्रिटेन तक पहुँचाई। इसी कारण 1919 में सरकार ने उन्हें भारत से निर्वासित कर दिया। वे बाद में भारत लौट आए।

◆ सैमुअल स्टोक्स (1882–1946) — अमेरिका के एक धनी परिवार के स्टोक्स हिमाचल के कोटगढ़ में बस गए। उन्होंने पहाड़ी रियासतों में बेगार प्रथा के विरुद्ध आंदोलन चलाया, असहयोग आंदोलन में भाग लिया और जेल गए — वे इस आंदोलन में जेल जाने वाले गिने-चुने विदेशियों में थे। बाद में उन्होंने "सत्यानंद" नाम अपनाया। हिमाचल में सेब की खेती को लोकप्रिय बनाने का श्रेय भी उन्हीं को है।

◆ मीराबेन (1892–1982) — एक ब्रिटिश नौसेना अधिकारी की बेटी मेडलिन स्लेड गांधीजी के विचारों से प्रभावित होकर 1925 में साबरमती आश्रम आईं; गांधीजी ने उन्हें "मीरा" नाम दिया। वे दूसरे गोलमेज़ सम्मेलन में गांधीजी के साथ लंदन गईं और 1942 में गांधीजी के साथ आग़ा ख़ाँ महल में बंदी रहीं।

◆ नेली सेनगुप्ता (1886–1973) — इंग्लैंड में जन्मी नेली ने बंगाल के नेता जतींद्र मोहन सेनगुप्ता से विवाह किया और असहयोग आंदोलन में खादी बेचते हुए गिरफ़्तार हुईं। 1933 में जब कांग्रेस के निर्वाचित अध्यक्ष गिरफ़्तार कर लिए गए, तो उन्होंने प्रतिबंध के बावजूद कलकत्ता अधिवेशन की अध्यक्षता की।

◆ फ़िलिप स्प्रैट और बेन ब्रैडली — ये दोनों ब्रिटिश कम्युनिस्ट 1920 के दशक में भारत आए और बम्बई तथा कलकत्ता के मज़दूरों को संगठित करने में लगे। दोनों मेरठ षड्यंत्र केस (1929) में भारतीय साथियों के साथ अभियुक्त बने और उन्हें सज़ा हुई (खंड 4)।

◆ वेरियर एल्विन (1902–1964) — अंग्रेज़ मिशनरी के रूप में आए एल्विन गांधीजी के प्रभाव में आए और फिर मध्य भारत के गोंड और बैगा जनजातियों के बीच बस गए। उन्होंने जनजातीय जीवन पर कई पुस्तकें लिखीं। स्वतंत्रता के बाद वे भारत के नागरिक बने और पूर्वोत्तर की जनजातीय नीति में सरकार के सलाहकार रहे।

⭐ याद रखें — कांग्रेस की तीन महिला अध्यक्ष (स्वतंत्रता से पहले)

एनी बेसेंट (1917, कलकत्ता) पहली महिला अध्यक्ष थीं; सरोजिनी नायडू (1925, कानपुर) पहली भारतीय महिला अध्यक्ष थीं; और नेली सेनगुप्ता (1933, कलकत्ता) तीसरी महिला अध्यक्ष थीं। इन तीन में से दो — बेसेंट और नेली सेनगुप्ता — विदेशी मूल की थीं।

8. रियासतों में जन-आंदोलन: देशी राज्य लोक परिषद, हरिपुरा नीति और प्रमुख उदाहरण

अब तक हमने जिस भारत की बात की, वह मुख्यतः "ब्रिटिश भारत" था — अर्थात् वे प्रांत जिन पर अंग्रेज़ सीधे शासन करते थे। पर इसके अलावा एक "रियासती भारत" भी था। 1947 में भारत में 560 से अधिक देशी रियासतें थीं, जो उपमहाद्वीप के लगभग 40 प्रतिशत क्षेत्र और लगभग एक-चौथाई आबादी पर फैली थीं। इनमें हैदराबाद, मैसूर और कश्मीर जैसी विशाल रियासतें भी थीं और कुछ गाँवों जितनी छोटी रियासतें भी।

इन रियासतों की जनता दोहरी ग़ुलामी में जी रही थी। नीचे राजा और जागीरदारों का निरंकुश शासन था और उनके ऊपर अंग्रेज़ों की सर्वोच्चता। अधिकांश रियासतों में न कोई चुनी हुई विधानसभा थी, न बोलने और सभा करने की आज़ादी। राज्य की आमदनी का बड़ा हिस्सा राजा के निजी ख़र्च में जाता था। किसानों पर भारी लगान, बेगार (बिना मज़दूरी के जबरन काम) और तरह-तरह के उपकर लदे थे। अंग्रेज़ इन राजाओं को इसलिए बचाए रखते थे कि वे राष्ट्रीय आंदोलन के विरुद्ध उनके भरोसेमंद सहयोगी थे।

🔍 आसान परिभाषा: सर्वोच्चता (पैरामाउंटसी)

📘 परिभाषा: ब्रिटिश ताज की वह सर्वोपरि सत्ता जिसके अंतर्गत देशी रियासतें अपने भीतरी शासन में तो स्वायत्त मानी जाती थीं, पर उनकी रक्षा, विदेश संबंध और उत्तराधिकार जैसे विषयों पर अंतिम अधिकार ब्रिटिश सरकार का था, और वह "कुशासन" के नाम पर किसी भी रियासत में हस्तक्षेप कर सकती थी।

💡 आसान भाषा में: रियासत का राजा अपने घर का मालिक तो था, पर घर की चाबी अंग्रेज़ों के पास थी। हर बड़ी रियासत में एक अंग्रेज़ अधिकारी — रेज़िडेंट या पॉलिटिकल एजेंट — बैठता था, जिसकी "सलाह" मानना राजा के लिए ज़रूरी था। 🏠 उदाहरण: बटलर समिति (1929) ने कहा कि "सर्वोच्चता सर्वोपरि ही रहेगी।" 1947 में भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम से यह सर्वोच्चता समाप्त हुई और रियासतों के विलय का प्रश्न खड़ा हुआ (अध्याय 17)।

8.1 राजाओं का मंच और ब्रिटिश नीति

◆ नरेंद्र मंडल (8 फ़रवरी 1921) — मोंटेग्यू-चेम्सफ़ोर्ड सुधारों की सिफ़ारिश पर 8 फ़रवरी 1921 को दिल्ली में नरेंद्र मंडल (चैंबर ऑफ़ प्रिंसेज़) का उद्घाटन हुआ। यह राजाओं की एक परामर्शदात्री संस्था थी, जिसमें वे अपने साझा हितों पर वायसराय से चर्चा कर सकते थे; इसके पास कोई वास्तविक अधिकार नहीं था। इसके पहले चांसलर बीकानेर के महाराजा गंगासिंह बने। अंग्रेज़ों का उद्देश्य राजाओं को एक मंच पर लाकर राष्ट्रीय आंदोलन के विरुद्ध एक मज़बूत दीवार खड़ी करना था।

◆ बटलर समिति (1927–1929) — राजा चाहते थे कि ब्रिटिश सरकार से उनके संबंध साफ़-साफ़ तय हों, क्योंकि उन्हें डर था कि भविष्य में ब्रिटिश भारत की कोई भारतीय सरकार उन पर हावी न हो जाए। इसलिए 1927 में सर हारकोर्ट बटलर की अध्यक्षता में भारतीय रियासत समिति बनी। राजाओं का पक्ष प्रसिद्ध वकील सर लेस्ली स्कॉट ने रखा। 1929 की रिपोर्ट में दो बातें कही गईं — पहली, सर्वोच्चता सर्वोपरि रहेगी और उसकी कोई सीमा तय नहीं की जा सकती; दूसरी, रियासतों को उनकी सहमति के बिना ब्रिटिश भारत की किसी ऐसी सरकार को नहीं सौंपा जाएगा जो भारतीय विधानमंडल के प्रति उत्तरदायी हो।

◆ 1935 की संघीय योजना — भारत शासन अधिनियम 1935 में ब्रिटिश प्रांतों और रियासतों को मिलाकर एक अखिल भारतीय संघ बनाने की योजना थी। इसमें रियासतों के प्रतिनिधि जनता द्वारा चुने नहीं जाते, बल्कि राजाओं द्वारा मनोनीत होते। राष्ट्रवादियों ने इसे संघीय विधानमंडल में राजाओं के सहारे लोकतंत्र पर रोक लगाने की चाल माना। राजाओं ने स्वयं भी इसमें शामिल होने की सहमति नहीं दी, इसलिए यह संघ कभी बना ही नहीं।

8.2 रियासती जनता का संगठन: प्रजामंडल और देशी राज्य लोक परिषद

◆ पृष्ठभूमि — असहयोग और ख़िलाफ़त आंदोलन की लहर रियासतों की सीमाओं पर नहीं रुकी। रियासतों के पढ़े-लिखे युवा, व्यापारी और वकील ब्रिटिश भारत के आंदोलनों से प्रभावित होकर लौटे और उन्होंने अपने यहाँ भी संगठन बनाए। ऐसे आरंभिक संगठनों में बड़ौदा प्रजामंडल (1917) और काठियावाड़ राजकीय परिषद (1921) प्रमुख थे। 1920 के दशक में मैसूर, हैदराबाद, इंदौर, काठियावाड़ और दक्कन की रियासतों में ऐसे संगठन बनते गए।

🔍 आसान परिभाषा: प्रजामंडल

📘 परिभाषा: देशी रियासतों की जनता के वे राजनीतिक संगठन, जो अपनी रियासत में नागरिक अधिकारों, करों में कमी, बेगार के अंत और राजा की छत्रछाया में उत्तरदायी शासन की माँग के लिए बनाए गए। अलग-अलग रियासतों में इन्हें प्रजामंडल, प्रजा परिषद, लोक परिषद या स्टेट कांग्रेस कहा गया।

💡 आसान भाषा में: जैसे ब्रिटिश भारत में जनता की आवाज़ कांग्रेस थी, वैसे ही हर रियासत में वहाँ की जनता की "अपनी छोटी कांग्रेस" प्रजामंडल थी। नाम अलग था, क्योंकि 1938 तक कांग्रेस रियासतों में अपने नाम से संगठन नहीं बनाती थी। 🏠 उदाहरण: मैसूर में मैसूर कांग्रेस, त्रावणकोर में त्रावणकोर स्टेट कांग्रेस, पंजाब में रियासती प्रजा मंडल और उड़ीसा की रियासतों में प्रजामंडल इसी प्रकार के संगठन थे।

◆ अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद (दिसंबर 1927) — अलग-अलग रियासतों के इन संगठनों को एक सूत्र में बाँधने के लिए दिसंबर 1927 में बम्बई में अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद (ऑल इंडिया स्टेट्स पीपुल्स कॉन्फ़्रेंस) का पहला सम्मेलन हुआ। इसमें विभिन्न रियासतों से 700 से अधिक राजनीतिक कार्यकर्ता आए। इसके मुख्य संगठनकर्ता बलवंतराय मेहता, मणिलाल कोठारी और जी. आर. अभ्यंकर थे और पहले अध्यक्ष दीवान बहादुर एम. रामचंद्र राव बने।

◆ परिषद की माँगें — परिषद ने माँग की कि रियासतों में उत्तरदायी शासन स्थापित हो, जनता को मौलिक अधिकार मिलें, राजा का निजी ख़र्च राज्य के ख़ज़ाने से अलग किया जाए, न्यायपालिका स्वतंत्र हो और भविष्य के किसी भी अखिल भारतीय संघ में रियासतों के प्रतिनिधि जनता द्वारा चुने जाएँ, राजाओं द्वारा मनोनीत न हों। परिषद ने बटलर समिति और गोलमेज़ सम्मेलनों के सामने भी रियासती जनता का पक्ष रखने की कोशिश की, पर उसे सुना नहीं गया।

🔍 आसान परिभाषा: उत्तरदायी शासन

📘 परिभाषा: वह शासन-व्यवस्था जिसमें कार्यपालिका (मंत्री) जनता द्वारा चुनी हुई विधायिका के प्रति जवाबदेह हो — अर्थात् मंत्री तभी तक पद पर रहें जब तक उन्हें चुने हुए सदन का विश्वास प्राप्त हो।

💡 आसान भाषा में: राजा की मर्ज़ी से नियुक्त दीवान की जगह ऐसे मंत्री हों, जिन्हें जनता के चुने प्रतिनिधि चुनें और हटा सकें। राजा बना रहे, पर केवल नाम का प्रधान — जैसे ब्रिटेन का राजा। 🏠 उदाहरण: प्रजामंडलों का नारा था — "महाराजा की छत्रछाया में उत्तरदायी शासन।" आरंभ में वे राजा को हटाने की नहीं, केवल उसकी निरंकुशता समाप्त करने की माँग करते थे।

8.3 रियासतों के प्रति कांग्रेस की नीति का विकास

रियासतों को लेकर कांग्रेस की नीति एक दिन में नहीं बनी। वह लगभग "दूर से सहानुभूति" से शुरू होकर धीरे-धीरे "सीधे नेतृत्व" तक पहुँची। इस यात्रा के छह पड़ाव हैं।

◆ नागपुर अधिवेशन (1920) — कांग्रेस ने पहली बार राजाओं से आग्रह किया कि वे अपनी रियासतों में तुरंत उत्तरदायी शासन दें। साथ ही यह तय हुआ कि रियासतों के लोग कांग्रेस के सदस्य तो बन सकते हैं, पर वे रियासतों के भीतर कांग्रेस के नाम से कोई राजनीतिक आंदोलन नहीं चलाएँगे; ऐसा वे केवल अपनी निजी हैसियत से या स्थानीय संगठनों के सदस्य के रूप में कर सकते थे।

◆ अहस्तक्षेप का दौर (1920–1937) — इस पूरे समय कांग्रेस की नीति मुख्यतः अहस्तक्षेप की रही। इसके पीछे गांधीजी के तीन तर्क थे। पहला, हर रियासत की परिस्थिति अलग थी और वहाँ नागरिक स्वतंत्रता इतनी कम थी कि बाहर से चलाया गया आंदोलन आसानी से कुचल दिया जाता। दूसरा, रियासती जनता को अपनी लड़ाई स्वयं लड़कर अपनी शक्ति बनानी चाहिए। तीसरा, कांग्रेस एक साथ अंग्रेज़ों और सैकड़ों राजाओं — दोनों से टकराव नहीं लेना चाहती थी। इसलिए रियासतों में कांग्रेस का काम खादी और अस्पृश्यता-निवारण जैसे रचनात्मक कार्यों तक सीमित रहा।

◆ नेहरू की घोषणा (लाहौर, 1929) — लाहौर अधिवेशन के अध्यक्षीय भाषण में नेहरू ने साफ़ कहा कि रियासतें शेष भारत से अलग नहीं रह सकतीं और उनके भविष्य का फ़ैसला करने का अधिकार केवल वहाँ की जनता को है। यह आगे की नीति का संकेत था।

◆ हरिपुरा अधिवेशन (फ़रवरी 1938) — 1937 में प्रांतों में कांग्रेसी सरकारें बनने से रियासती जनता का उत्साह बहुत बढ़ गया था। हरिपुरा में कांग्रेस ने घोषणा की कि रियासतें भारत का अभिन्न अंग हैं और पूर्ण स्वराज का लक्ष्य उन पर भी लागू होता है। पर साथ ही यह भी कहा गया कि अभी रियासतों में कांग्रेस की समितियाँ सीधे आंदोलन नहीं चलाएँगी; आंदोलन स्थानीय प्रजामंडलों के नाम से चलेंगे और कांग्रेस उन्हें नैतिक समर्थन देगी।

◆ त्रिपुरी अधिवेशन (मार्च 1939) — हरिपुरा के बाद 1938–39 में रियासतों में आंदोलनों की जो लहर आई, उसे देखकर कांग्रेस ने त्रिपुरी में अहस्तक्षेप की नीति छोड़ दी। प्रस्ताव में कहा गया कि अब कांग्रेस रियासती आंदोलनों का सक्रिय मार्गदर्शन करेगी और रियासती भारत तथा ब्रिटिश भारत का संघर्ष एक ही है। इसी वर्ष फ़रवरी 1939 में लुधियाना अधिवेशन में जवाहरलाल नेहरू देशी राज्य लोक परिषद के अध्यक्ष चुने गए — इससे दोनों धाराएँ औपचारिक रूप से जुड़ गईं।

◆ भारत छोड़ो आंदोलन (1942) — इस आंदोलन में पहली बार ब्रिटिश भारत और रियासतों के बीच कोई भेद नहीं किया गया। गांधीजी ने रियासती जनता से कहा कि वे स्वयं को भारतीय राष्ट्र का अंग घोषित करें और राजाओं का नेतृत्व तभी मानें जब वे जनता के साथ खड़े हों। अब रियासती जनता की माँग केवल उत्तरदायी शासन नहीं, बल्कि "अंग्रेज़ो, भारत छोड़ो" और रियासतों का भारत में विलय भी थी।

◆ 1945–1947 — विलय और लोकतंत्र की माँग — देशी राज्य लोक परिषद का उदयपुर अधिवेशन (31 दिसंबर 1945 – 1 जनवरी 1946) नेहरू की अध्यक्षता में हुआ, जिसमें माँग की गई कि संविधान सभा में रियासतों के प्रतिनिधि जनता द्वारा चुने जाएँ। अप्रैल 1947 के ग्वालियर अधिवेशन में नेहरू ने चेतावनी दी कि जो रियासतें संविधान सभा में शामिल नहीं होंगी, उन्हें शत्रु माना जाएगा। 5 जुलाई 1947 को सरदार पटेल के नेतृत्व में रियासती विभाग बना, जिसके सचिव वी. पी. मेनन थे; इसके बाद एकीकरण की कहानी अध्याय 17 में है।

⭐ याद रखें — हरिपुरा और त्रिपुरी का अंतर

हरिपुरा (1938) — रियासतें भारत का अंग हैं, पर आंदोलन प्रजामंडल के नाम से चलेगा और कांग्रेस केवल नैतिक समर्थन देगी।

त्रिपुरी (1939) — अहस्तक्षेप की नीति समाप्त; कांग्रेस रियासती आंदोलनों का सीधा मार्गदर्शन करेगी। परीक्षा में प्रायः इन दोनों को आपस में बदलकर पूछा जाता है।

8.4 प्रमुख रियासतों के जन-आंदोलन

1938–39 में और फिर 1946–47 में देश की लगभग हर बड़ी रियासत में जन-आंदोलन हुए। नीचे सात प्रमुख उदाहरण "पृष्ठभूमि → घटनाक्रम → परिणाम" के क्रम में दिए गए हैं।

(क) राजकोट (गुजरात) — गांधीजी की अहिंसा की कसौटी

◆ पृष्ठभूमि — काठियावाड़ की छोटी रियासत राजकोट गांधीजी के बचपन का शहर था; उनके पिता यहाँ के दीवान रहे थे। यहाँ के पिछले शासक लाखाजीराज उदार थे और उन्होंने जनता की एक प्रतिनिधि सभा भी बनाई थी। पर उनके बाद शासक बने धर्मेंद्रसिंह विलासी थे और वास्तविक सत्ता दीवान वीरावाला के हाथ में थी। ख़ज़ाना भरने के लिए माचिस, चीनी और अनाज जैसी चीज़ों की बिक्री के एकाधिकार ठेके पर बेच दिए गए और कर बढ़ा दिए गए, जिससे जनता में भारी रोष था।

◆ घटनाक्रम — 1938 में यू. एन. ढेबर के नेतृत्व में सत्याग्रह शुरू हुआ, जिसमें हड़ताल, लगान-बंदी और राज्य के माल का बहिष्कार शामिल था। सरदार पटेल ने आंदोलन का मार्गदर्शन किया। 26 दिसंबर 1938 को शासक ने पटेल से समझौता किया कि सुधारों का सुझाव देने के लिए दस सदस्यों की एक समिति बनेगी, जिसके सात सदस्य पटेल सुझाएँगे। पर ब्रिटिश रेज़िडेंट के उकसावे पर शासक समझौते से मुकर गया। सत्याग्रह फिर शुरू हुआ; कस्तूरबा गांधी और मणिबेन पटेल भी गिरफ़्तार हुईं। तब गांधीजी स्वयं राजकोट पहुँचे और 3 मार्च 1939 को उन्होंने आमरण उपवास शुरू कर दिया।

◆ परिणाम — वायसराय के हस्तक्षेप से मामला भारत के मुख्य न्यायाधीश सर मॉरिस ग्वायर को सौंपा गया, जिन्होंने निर्णय पटेल के पक्ष में दिया। फिर भी दीवान ने अड़ंगे लगाना जारी रखा। अंत में गांधीजी ने यह कहकर इस निर्णय का लाभ छोड़ दिया कि उनका उपवास शुद्ध अहिंसा नहीं था, उसमें शासक पर दबाव डालने का भाव था। इसलिए राजकोट में तुरंत कोई सुधार नहीं हुआ।

◆ महत्त्व — राजकोट ने दिखाया कि रियासतों के पीछे असली ताक़त ब्रिटिश सर्वोच्चता है और राजा उसी के इशारे पर चलते हैं। साथ ही इसने पूरे देश का ध्यान रियासती जनता की समस्या पर खींचा; त्रिपुरी का प्रस्ताव इसी वातावरण में आया।

(ख) मैसूर — विदुराश्वत्थ का गोलीकांड

◆ पृष्ठभूमि — मैसूर को एक "प्रगतिशील" रियासत माना जाता था, जहाँ प्रतिनिधि सभा और उद्योग थे, पर वास्तविक सत्ता महाराजा और दीवान मिर्ज़ा इस्माइल के पास ही थी। 1937–38 में राज्य के राजनीतिक समूहों ने मिलकर मैसूर कांग्रेस बनाई और उत्तरदायी शासन की माँग उठाई।

◆ घटनाक्रम — अप्रैल 1938 में मैसूर कांग्रेस ने शिवपुरा में अपना सम्मेलन किया और रोक के बावजूद राष्ट्रीय झंडा फहराया; इसे झंडा सत्याग्रह कहा गया। इसी क्रम में 25 अप्रैल 1938 को कोलार ज़िले के विदुराश्वत्थ गाँव में झंडा फहराने के लिए जमा हुई भीड़ पर पुलिस ने गोली चला दी, जिसमें कई लोग मारे गए। इस घटना को "दक्षिण का जलियाँवाला बाग़" कहा जाता है।

◆ परिणाम — गोलीकांड से पूरे देश में रोष फैला। गांधीजी ने सरदार पटेल और आचार्य कृपलानी को मैसूर भेजा, जिनकी मध्यस्थता से सरकार ने मैसूर कांग्रेस को मान्यता दी और राज्य के झंडे के साथ राष्ट्रीय झंडा फहराने की अनुमति मिली। स्वतंत्रता के बाद सितंबर 1947 में "मैसूर चलो" आंदोलन हुआ, जिसके बाद महाराजा ने उत्तरदायी सरकार स्वीकार की और के. सी. रेड्डी मैसूर के पहले मुख्यमंत्री बने।

(ग) त्रावणकोर — स्टेट कांग्रेस से पुन्नप्रा-वायलार तक

◆ पृष्ठभूमि — त्रावणकोर (आज का दक्षिणी केरल) शिक्षा में आगे था और यहाँ मंदिर-प्रवेश जैसे सामाजिक आंदोलन पहले हो चुके थे (अध्याय 19)। पर शासन की बागडोर शक्तिशाली दीवान सर सी. पी. रामास्वामी अय्यर के हाथ में थी, जो किसी भी राजनीतिक विरोध को सहन नहीं करते थे।

◆ घटनाक्रम — फ़रवरी 1938 में पट्टम थानु पिल्लै की अध्यक्षता में त्रावणकोर स्टेट कांग्रेस बनी, जिसके अन्य नेता टी. एम. वर्गीज़ और सी. केशवन थे। उसने उत्तरदायी शासन की माँग की और दीवान के विरुद्ध आरोपों का ज्ञापन महाराजा को दिया। संगठन पर प्रतिबंध लगा तो अगस्त 1938 से सविनय अवज्ञा शुरू हुई; कई जगह गोलियाँ चलीं। अक्टूबर 1938 में अक्कम्मा चेरियन ने राजमहल तक एक विशाल जुलूस का नेतृत्व किया, जिसके बाद बंदी नेताओं को छोड़ना पड़ा।

◆ पुन्नप्रा-वायलार (अक्टूबर 1946) — 1946 में दीवान ने "अमेरिकी नमूने" का संविधान प्रस्तावित किया, जिसमें कार्यपालिका विधायिका के प्रति जवाबदेह नहीं होती — यानी दीवान की सत्ता बनी रहती। इसके विरुद्ध अलेप्पी क्षेत्र के नारियल-जटा (कॉयर) मज़दूरों ने कम्युनिस्टों के नेतृत्व में पुन्नप्रा और वायलार में विद्रोह किया, जिसे सेना ने बेरहमी से कुचला और सैकड़ों लोग मारे गए।

◆ परिणाम — जून 1947 में दीवान ने घोषणा की कि अंग्रेज़ों के जाने पर त्रावणकोर स्वतंत्र देश बनेगा। इसके विरुद्ध तीव्र जन-आंदोलन हुआ; 25 जुलाई 1947 को दीवान पर जानलेवा हमला हुआ। इसके तुरंत बाद महाराजा ने भारत में विलय स्वीकार कर लिया और दीवान ने पद छोड़ दिया।

(घ) हैदराबाद — स्टेट कांग्रेस और "वंदे मातरम्" आंदोलन

◆ पृष्ठभूमि — हैदराबाद देश की सबसे बड़ी रियासत थी। यहाँ के शासक निज़ाम मीर उस्मान अली ख़ाँ थे। रियासत की अधिकांश आबादी हिंदू थी और तेलुगु, मराठी तथा कन्नड़ बोलती थी, पर शासन और ऊँची नौकरियों पर एक छोटे अभिजात वर्ग का अधिकार था और राजभाषा उर्दू थी। नागरिक स्वतंत्रता लगभग नहीं थी; ज़मींदार (देशमुख) किसानों से "वेट्टी" (बेगार) कराते थे। राजनीतिक संगठन पर रोक होने के कारण चेतना पहले भाषाई-सांस्कृतिक संस्थाओं — आंध्र महासभा, महाराष्ट्र परिषद और कर्नाटक परिषद — के रूप में उभरी।

◆ घटनाक्रम — 1938 में हैदराबाद स्टेट कांग्रेस बनाने की कोशिश हुई, पर निज़ाम सरकार ने उसे बनने से पहले ही प्रतिबंधित कर दिया। इसके विरोध में अक्टूबर 1938 में स्वामी रामानंद तीर्थ के नेतृत्व में सत्याग्रह शुरू हुआ। उसी समय आर्य समाज और हिंदू महासभा ने भी धार्मिक अधिकारों के लिए अलग सत्याग्रह छेड़ा। गांधीजी को लगा कि दोनों आंदोलन आपस में मिलकर सांप्रदायिक रंग ले सकते हैं, इसलिए उनकी सलाह पर स्टेट कांग्रेस ने अपना सत्याग्रह स्थगित कर दिया।

◆ "वंदे मातरम्" आंदोलन (1938) — उस्मानिया विश्वविद्यालय के छात्रावासों में छात्रों को "वंदे मातरम्" गाने से रोका गया। छात्रों ने हड़ताल कर दी, तो सैकड़ों छात्रों को विश्वविद्यालय से निकाल दिया गया। इनमें से बहुत-से छात्रों को नागपुर विश्वविद्यालय ने प्रवेश दिया। इस आंदोलन से हैदराबाद की अगली पीढ़ी के कई नेता निकले।

◆ परिणाम — स्टेट कांग्रेस पर से प्रतिबंध 1946 में जाकर हटा। उसी वर्ष से तेलंगाना के गाँवों में कम्युनिस्टों के नेतृत्व में किसानों का सशस्त्र संघर्ष शुरू हुआ (अध्याय 6)। निज़ाम ने 1947 में भारत में मिलने से इनकार किया और क़ासिम रज़वी के रज़ाकार दस्तों ने आतंक फैलाया। अंततः सितंबर 1948 में भारतीय सेना की "पुलिस कार्रवाई" (ऑपरेशन पोलो) से हैदराबाद भारत में मिला (अध्याय 17)।

(ङ) जम्मू-कश्मीर — नेशनल कॉन्फ़्रेंस और "कश्मीर छोड़ो"

◆ पृष्ठभूमि — जम्मू-कश्मीर पर डोगरा वंश के महाराजा हरि सिंह का शासन था। घाटी की बहुसंख्यक मुस्लिम जनता ग़रीब थी, उस पर करों का भारी बोझ था और शिक्षा तथा नौकरियों में उसका हिस्सा बहुत कम था। 13 जुलाई 1931 को श्रीनगर में प्रदर्शनकारियों पर गोली चली, जिससे राज्यव्यापी आंदोलन भड़क उठा।

◆ घटनाक्रम — 1932 में शेख़ मोहम्मद अब्दुल्ला के नेतृत्व में ऑल जम्मू एंड कश्मीर मुस्लिम कॉन्फ़्रेंस बनी। नेहरू और कांग्रेस के प्रभाव में शेख़ अब्दुल्ला ने महसूस किया कि लड़ाई किसी एक धर्म की नहीं, पूरी जनता की है। इसलिए 1939 में संगठन का नाम बदलकर नेशनल कॉन्फ़्रेंस किया गया और उसके दरवाज़े सभी धर्मों के लोगों के लिए खोल दिए गए। 1944 में उसने "नया कश्मीर" कार्यक्रम अपनाया, जिसमें उत्तरदायी शासन, ज़मीन जोतने वाले किसान को देने और स्त्रियों को बराबर अधिकार देने जैसी बातें थीं।

◆ "कश्मीर छोड़ो" (मई 1946) — शेख़ अब्दुल्ला ने महाराजा के विरुद्ध "कश्मीर छोड़ो" आंदोलन छेड़ा। उनका तर्क था कि 1846 की अमृतसर संधि, जिससे अंग्रेज़ों ने कश्मीर डोगरा शासक को बेचा था, एक "बिक्री-पत्र" है और जनता उसे नहीं मानती। शेख़ अब्दुल्ला गिरफ़्तार कर लिए गए। उनकी पैरवी के लिए नेहरू कश्मीर पहुँचे तो उन्हें भी रियासत की सीमा पर गिरफ़्तार कर लिया गया।

◆ परिणाम — इस आंदोलन ने कश्मीर की जनता के सबसे बड़े संगठन को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ दिया। अक्टूबर 1947 में क़बायली हमले के समय जब महाराजा ने भारत में विलय किया, तब शेख़ अब्दुल्ला और नेशनल कॉन्फ़्रेंस ने इस विलय का समर्थन किया (अध्याय 17)।

(च) उड़ीसा की रियासतें — ढेंकानाल, तालचेर, रणपुर और नीलगिरि

📖 कहानी 2: नीलकंठपुर घाट की रात और तालचेर का पलायन

उड़ीसा में छब्बीस छोटी-छोटी रियासतें ("गढ़जात") थीं, जहाँ जनता राजा और अंग्रेज़ों की दोहरी ग़ुलामी में जी रही थी। वहाँ बेगार, जबरन भेंट, जंगल की उपज पर रोक और राजा के हर उत्सव पर कर लगता था। 1937 में पड़ोस के उड़ीसा प्रांत में कांग्रेस की सरकार बनी तो इन रियासतों की जनता में भी साहस आया और 1938 में जगह-जगह प्रजामंडल बन गए। कांग्रेस नेता हरेकृष्ण महताब और सारंगधर दास ने उनका मार्गदर्शन किया।

ढेंकानाल में प्रजामंडल के आंदोलन पर भीषण दमन हुआ। 11 अक्टूबर 1938 की रात ब्राह्मणी नदी के नीलकंठपुर घाट पर पुलिस ने बारह वर्ष के नाविक बालक बाजी राउत से नदी पार कराने को कहा। बालक ने प्रजामंडल के आदेश का हवाला देकर मना कर दिया। पुलिस ने उसे गोली मार दी। बाजी राउत को भारत के सबसे कम उम्र के शहीदों में गिना जाता है।

तालचेर के लोगों ने विरोध का दूसरा रास्ता चुना। दमन से तंग आकर हज़ारों किसान अपने गाँव छोड़कर पड़ोस के ब्रिटिश-शासित अंगुल क्षेत्र में चले गए और वहाँ शिविरों में महीनों रहे। इस सामूहिक पलायन ("हिजरत") ने गांधीजी और पूरे देश का ध्यान खींचा। पर जनवरी 1939 में रणपुर में भीड़ ने ब्रिटिश पॉलिटिकल एजेंट मेजर बेज़लगेट की हत्या कर दी। इसके बाद कठोर दमन हुआ और कांग्रेस नेतृत्व ने इस हिंसा की निंदा की।

आगे चलकर दिसंबर 1947 में सरदार पटेल ने उड़ीसा की रियासतों के उड़ीसा प्रांत में विलय का समझौता कराया। यह देश में रियासतों के विलय की पहली बड़ी कड़ी थी।

🧭 इस कहानी से कौन-सी अवधारणा साफ़ हुई

✔ दोहरी ग़ुलामी — रियासती जनता नीचे राजा के निरंकुश शासन और ऊपर अंग्रेज़ों की सर्वोच्चता, दोनों से पिस रही थी।

✔ प्रजामंडल — रियासत की जनता की अपनी "छोटी कांग्रेस", जो बेगार, करों और निरंकुशता के विरुद्ध नागरिक अधिकारों की लड़ाई लड़ती थी।

✔ अहिंसक विरोध की कसौटी — तालचेर का पलायन अहिंसक विरोध का अनोखा उदाहरण था, जबकि रणपुर की हिंसा की कांग्रेस ने निंदा की।

📝 परीक्षा के लिए: ढेंकानाल: बाजी राउत (11 अक्टूबर 1938, नीलकंठपुर घाट, 12 वर्ष) → तालचेर का पलायन (अंगुल) → रणपुर (जनवरी 1939, बेज़लगेट) → उड़ीसा की रियासतों का विलय (दिसंबर 1947, पटेल)।

◆ पृष्ठभूमि — उड़ीसा में छब्बीस छोटी-छोटी रियासतें ("गढ़जात") थीं, जहाँ शोषण सबसे आदिम रूप में था — बेगार, जबरन भेंट, जंगल की उपज पर रोक और राजा के हर उत्सव पर कर। 1937 में पड़ोस के उड़ीसा प्रांत में कांग्रेस की सरकार बनी, तो इन रियासतों की जनता में भी साहस आया और 1938 में जगह-जगह प्रजामंडल बने। कांग्रेस नेता हरेकृष्ण महताब और सारंगधर दास ने इनका मार्गदर्शन किया।

◆ ढेंकानाल और बाजी राउत — ढेंकानाल में प्रजामंडल आंदोलन पर भीषण दमन हुआ। 11 अक्टूबर 1938 की रात ब्राह्मणी नदी के नीलकंठपुर घाट पर पुलिस ने बारह वर्ष के नाविक बालक बाजी राउत से नदी पार कराने को कहा। बालक ने प्रजामंडल के आदेश का हवाला देकर मना कर दिया, तो पुलिस ने उसे गोली मार दी। बाजी राउत को भारत के सबसे कम उम्र के शहीदों में गिना जाता है।

◆ तालचेर का पलायन — तालचेर में दमन से तंग आकर हज़ारों किसान अपने गाँव छोड़कर पड़ोस के ब्रिटिश-शासित अंगुल क्षेत्र में चले गए और वहाँ शिविरों में महीनों रहे। यह सामूहिक पलायन ("हिजरत") विरोध का एक अनोखा अहिंसक तरीक़ा था, जिसने गांधीजी और पूरे देश का ध्यान खींचा।

◆ रणपुर (जनवरी 1939) — रणपुर में उत्तेजित भीड़ ने ब्रिटिश पॉलिटिकल एजेंट मेजर बेज़लगेट की हत्या कर दी। इसके बाद सेना भेजी गई और कठोर दमन हुआ। कांग्रेस नेतृत्व ने इस हिंसा की निंदा की।

◆ परिणाम — इन आंदोलनों से कुछ रियासतों में कर और बेगार घटे। नीलगिरि रियासत में 1947 के अंत में फिर अशांति हुई और उसका प्रशासन उड़ीसा सरकार ने संभाल लिया; इसके बाद दिसंबर 1947 में सरदार पटेल ने उड़ीसा की रियासतों के उड़ीसा प्रांत में विलय का समझौता कराया — देश में रियासतों के विलय की यह पहली बड़ी कड़ी थी।

(छ) पंजाब की रियासतें — रियासती प्रजा मंडल

◆ पृष्ठभूमि — पटियाला, नाभा, जींद, फ़रीदकोट और कपूरथला जैसी पंजाब की रियासतों में अकाली आंदोलन की लहर पहुँची थी। पटियाला के महाराजा भूपिंदर सिंह के निरंकुश और ख़र्चीले शासन के विरुद्ध जनता में गहरा असंतोष था।

◆ घटनाक्रम — 1928 में पंजाब रियासती प्रजा मंडल बना, जिसके अध्यक्ष सेवा सिंह ठीकरीवाला थे। उन्होंने पटियाला के शासन के अत्याचारों को उजागर किया और नागरिक अधिकारों की माँग की। उन्हें बार-बार जेल में डाला गया। जेल में दुर्व्यवहार के विरुद्ध लंबी भूख हड़ताल के बाद जनवरी 1935 में पटियाला जेल में उनकी मृत्यु हो गई।

◆ परिणाम — ठीकरीवाला की शहादत ने पंजाब की रियासतों में आंदोलन को नया बल दिया। आगे इन रियासतों में काश्तकार किसानों ने बिस्वेदारों (ज़मींदारों) के विरुद्ध संघर्ष किया। 1948 में इन रियासतों को मिलाकर पटियाला एवं पूर्वी पंजाब राज्य संघ (पेप्सू) बनाया गया।

📌 उदाहरण: औंध का अनोखा प्रयोग (1938–39)

हर राजा जनता के विरुद्ध नहीं था। महाराष्ट्र की छोटी रियासत औंध के शासक भवानराव पंत प्रतिनिधि ने नवंबर 1938 में स्वयं घोषणा की कि वे सत्ता जनता को सौंप देंगे। गांधीजी की सलाह से एक संविधान बना, जिसमें गाँव की पंचायतों को शासन की बुनियादी इकाई बनाया गया। इसे "औंध प्रयोग" कहा जाता है — यह ग्राम-स्वराज के गांधीवादी विचार को व्यवहार में उतारने की एक कोशिश थी।

राजस्थान की रियासतों में भी इसी दौर में प्रजामंडल बने। चूँकि यह विषय राज्य के इतिहास में विस्तार से पढ़ा जाता है, यहाँ केवल उसकी झलक दी जा रही है।

🏜️ राजस्थान की झलक

राजस्थान सेवा संघ (1919 वर्धा, 1920 अजमेर — विजयसिंह पथिक, रामनारायण चौधरी) ने रियासती जनता और किसानों को संगठित किया; हरिपुरा (1938) के बाद लगभग सभी रियासतों में प्रजामंडल बने।

जयपुर में जमनालाल बजाज और हीरालाल शास्त्री ने जयपुर सत्याग्रह (1939) चलाया; मेवाड़ में माणिक्यलाल वर्मा ने मेवाड़ प्रजामंडल (24 अप्रैल 1938) बनाया; और मारवाड़ में जयनारायण व्यास की मारवाड़ लोक परिषद (1938) सक्रिय रही।

शाहपुरा 14 अगस्त 1947 को राजस्थान की पहली रियासत बनी जहाँ पूर्ण उत्तरदायी शासन स्थापित हुआ; देशी राज्य लोक परिषद का उदयपुर अधिवेशन (1945–46) नेहरू की अध्यक्षता में हुआ।

8.5 रियासती आंदोलनों का महत्त्व और दोहराव

◆ "दो भारत" की दीवार टूटी — अंग्रेज़ों ने ब्रिटिश भारत और रियासती भारत के बीच जो अदृश्य दीवार खड़ी की थी, उसे इन आंदोलनों ने तोड़ दिया। रियासतों की जनता स्वयं को उसी राष्ट्र का अंग मानने लगी, जिसके लिए कांग्रेस लड़ रही थी।

◆ एकीकरण आसान हुआ — 1947–48 में सरदार पटेल ने जब राजाओं से विलय पत्रों पर हस्ताक्षर कराए, तो उनके पीछे केवल कूटनीति नहीं थी — रियासतों की जनता का दबाव भी था। त्रावणकोर, जूनागढ़, हैदराबाद और उड़ीसा की रियासतों में जनता के आंदोलनों ने राजाओं के लिए अलग रहना असंभव बना दिया।

◆ लोकतांत्रिक चेतना — इन आंदोलनों ने उन इलाक़ों में नागरिक अधिकार, चुनाव और जवाबदेह सरकार के विचार पहुँचाए, जहाँ सदियों से केवल राजा की मर्ज़ी चलती थी। स्वतंत्र भारत के कई मुख्यमंत्री और नेता इन्हीं प्रजामंडलों से निकले।

◆ सीमाएँ — ये आंदोलन देर से शुरू हुए और मुख्यतः शहरों के मध्यम वर्ग तक सीमित रहे; किसानों और जनजातियों तक इनकी पहुँच हर जगह एक-सी नहीं थी। कुछ रियासतों — जैसे हैदराबाद — में आंदोलन पर सांप्रदायिक रंग चढ़ने का ख़तरा बना रहा। और 1938 तक कांग्रेस की अहस्तक्षेप नीति के कारण इन्हें राष्ट्रीय नेतृत्व का पूरा सहारा नहीं मिल पाया।

दोहराव तालिका: प्रमुख रियासतें एक नज़र में

रियासत

संगठन और नेता

याद रखने योग्य घटना

राजकोट

यहाँ सत्याग्रह का नेतृत्व यू. एन. ढेबर और सरदार पटेल ने किया।

मार्च 1939 में गांधीजी ने उपवास किया और मॉरिस ग्वायर ने निर्णय दिया।

मैसूर

यहाँ मैसूर कांग्रेस ने उत्तरदायी शासन की माँग की।

25 अप्रैल 1938 को विदुराश्वत्थ में झंडा सत्याग्रह पर गोली चली।

त्रावणकोर

यहाँ पट्टम थानु पिल्लै ने स्टेट कांग्रेस बनाई।

1946 में पुन्नप्रा-वायलार का विद्रोह दीवान के विरुद्ध हुआ।

हैदराबाद

यहाँ स्वामी रामानंद तीर्थ ने स्टेट कांग्रेस का नेतृत्व किया।

1938 में उस्मानिया के छात्रों ने "वंदे मातरम्" आंदोलन किया।

जम्मू-कश्मीर

यहाँ शेख़ अब्दुल्ला ने नेशनल कॉन्फ़्रेंस बनाई।

मई 1946 में "कश्मीर छोड़ो" आंदोलन चला।

ढेंकानाल (उड़ीसा)

यहाँ प्रजामंडल ने बेगार और करों का विरोध किया।

11 अक्टूबर 1938 को बालक बाजी राउत शहीद हुआ।

पटियाला (पंजाब)

यहाँ सेवा सिंह ठीकरीवाला ने रियासती प्रजा मंडल चलाया।

1935 में ठीकरीवाला की पटियाला जेल में मृत्यु हुई।

9. मूल्यांकन, कालक्रम और सार

9.1 विविध धाराओं का समग्र मूल्यांकन

इस अध्याय में हमने देखा कि राष्ट्रीय आंदोलन कोई एक रंग की धारा नहीं था। उसमें मिल के मज़दूर थे, खेत के किसान थे, कॉलेज के छात्र थे, मार्क्स को पढ़ने वाले युवा थे, मिलों के मालिक थे और रियासतों की दबी हुई जनता थी। इन सबकी माँगें अलग थीं और कई बार आपस में टकराती भी थीं, फिर भी इन सबने मिलकर आंदोलन को वह चौड़ाई दी, जिसके बिना वह सच्चा जन-आंदोलन नहीं बन सकता था।

योगदान

◆ आर्थिक न्याय का एजेंडा — मज़दूर और किसान संगठनों ने यह प्रश्न खड़ा किया कि आज़ादी किसके लिए होगी। उनके दबाव से कांग्रेस ने स्वराज की परिभाषा में रोटी, ज़मीन और मज़दूरी के सवाल जोड़े। कराची प्रस्ताव (1931) और फ़ैज़पुर कृषि कार्यक्रम (1936) इसी के परिणाम थे।

◆ कांग्रेस का वैचारिक विस्तार — समाजवादियों और साम्यवादियों ने कांग्रेस की नीतियों को बाईं ओर मोड़ा। राष्ट्रीय योजना समिति (1938) से नियोजन का विचार आया, जो आगे योजना आयोग और पंचवर्षीय योजनाओं में बदला।

◆ स्वतंत्र भारत पर छाप — इन धाराओं की माँगें स्वतंत्र भारत के संविधान में दिखती हैं — नीति-निदेशक तत्वों में काम का अधिकार, समान वेतन और मज़दूरों की भागीदारी; ज़मींदारी उन्मूलन क़ानून; श्रम क़ानून; और सार्वजनिक क्षेत्र की बड़ी भूमिका वाली मिश्रित अर्थव्यवस्था।

◆ एकीकृत लोकतांत्रिक भारत — रियासती जन-आंदोलनों ने राजाओं की निरंकुशता को चुनौती देकर एक ऐसे भारत का रास्ता बनाया, जिसमें कश्मीर से त्रावणकोर तक एक ही संविधान और एक ही नागरिकता हो।

◆ संस्कृति और साहित्य — प्रगतिशील लेखक संघ और इप्टा ने साहित्य, रंगमंच और गीतों को आम आदमी के दुख-दर्द से जोड़ा, जिसका असर स्वतंत्रता के बाद के हिंदी-उर्दू साहित्य और सिनेमा पर गहरा रहा।

सीमाएँ

◆ आपसी फूट — मज़दूर आंदोलन बार-बार बँटा (1929, 1931 और फिर 1947 में), और वामपंथी दल — कम्युनिस्ट, कांग्रेस समाजवादी, रायवादी, फ़ॉरवर्ड ब्लॉक — कभी लंबे समय तक एक साथ नहीं रह सके।

◆ राष्ट्रीय धारा से अलगाव — कम्युनिस्ट अंतरराष्ट्रीय नीति से बँधे रहने के कारण दो निर्णायक मौक़ों — सविनय अवज्ञा (1930) और भारत छोड़ो (1942) — पर राष्ट्रीय आंदोलन से अलग खड़े दिखे, जिससे उनकी साख को चोट पहुँची।

◆ सीमित फैलाव — संगठित मज़दूर कुल आबादी का बहुत छोटा हिस्सा थे और बम्बई, कलकत्ता, कानपुर, मद्रास जैसे कुछ शहरों तक सीमित थे। किसान सभा भी कुछ ही प्रांतों में मज़बूत थी। भूमिहीन मज़दूर, दलित और स्त्रियाँ इन संगठनों में पीछे रहीं।

◆ वर्ग बनाम राष्ट्र की खींचतान — कांग्रेस का नेतृत्व सभी वर्गों को साथ रखना चाहता था, इसलिए वह ज़मींदारों और पूँजीपतियों के विरुद्ध सीधे संघर्ष से बचता रहा। वामपंथियों को यह "समझौतावाद" लगता था, जबकि गांधीवादियों को वर्ग-संघर्ष राष्ट्रीय एकता के लिए ख़तरा लगता था।

निष्कर्ष यह है कि मतभेदों के बावजूद ये धाराएँ एक-दूसरे की पूरक थीं। गांधीजी के नेतृत्व की "छतरी" के नीचे दक्षिणपंथी और वामपंथी, मिल-मालिक और मज़दूर, ज़मींदार और किसान — सब एक साझा शत्रु, यानी साम्राज्यवाद, के विरुद्ध साथ रहे। यही भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की सबसे बड़ी विशेषता थी।

9.2 एक नज़र में कालक्रम

नीचे इस अध्याय की प्रमुख तिथियाँ क्रम से दी गई हैं। इसे दोहराव के लिए प्रयोग करें; हर घटना का विस्तार ऊपर संबंधित खंड में है।

वर्ष / तिथि

घटना

1870–1890

1870 में वर्किंग मेन्स क्लब बना। 1881 में पहला कारख़ाना अधिनियम आया। 1890 में बॉम्बे मिल हैंड्स एसोसिएशन बना।

1908

जुलाई में तिलक की सज़ा के विरोध में बम्बई के मिल मज़दूरों ने राजनीतिक हड़ताल की।

1918–1920

27 अप्रैल 1918 को मद्रास लेबर यूनियन बनी। 17 अक्टूबर 1920 को ताशकंद में कम्युनिस्ट पार्टी बनी। 31 अक्टूबर 1920 को ट्रेड यूनियन कांग्रेस बनी।

1921–1925

फ़रवरी 1921 में नरेंद्र मंडल बना। 1923 में पहला मई दिवस मनाया गया। 1924 में कानपुर षड्यंत्र केस चला। दिसंबर 1925 में कानपुर में कम्युनिस्ट सम्मेलन हुआ।

1926–1929

1926 में ट्रेड यूनियन अधिनियम बना। 1927 में फ़िक्की और देशी राज्य लोक परिषद बनीं। 1928 में बम्बई की बड़ी मिल हड़ताल हुई। मार्च 1929 में मेरठ षड्यंत्र केस शुरू हुआ और नागपुर में ट्रेड यूनियन कांग्रेस बँटी।

1931–1934

1931 में रेड ट्रेड यूनियन कांग्रेस बनी और कराची प्रस्ताव पारित हुआ। 1934 में कांग्रेस समाजवादी पार्टी बनी और कम्युनिस्ट पार्टी पर प्रतिबंध लगा।

1936

11 अप्रैल को किसान सभा बनी। अप्रैल में प्रगतिशील लेखक संघ बना। 12 अगस्त को छात्र फ़ेडरेशन बना। दिसंबर में फ़ैज़पुर अधिवेशन हुआ।

1938

फ़रवरी में हरिपुरा प्रस्ताव आया। मैसूर, त्रावणकोर, हैदराबाद और उड़ीसा की रियासतों में आंदोलन हुए। राष्ट्रीय योजना समिति बनी।

1939

मार्च में गांधीजी ने राजकोट में उपवास किया और त्रिपुरी प्रस्ताव पारित हुआ। लुधियाना में नेहरू लोक परिषद के अध्यक्ष बने। कश्मीर में नेशनल कॉन्फ़्रेंस बनी। फ़ॉरवर्ड ब्लॉक बना।

1940–1942

1940 में रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी और रेडिकल डेमोक्रेटिक पार्टी बनीं। 1941 में कम्युनिस्टों ने "जनयुद्ध" की नीति अपनाई। जुलाई 1942 में उन पर से प्रतिबंध हटा।

1943–1945

1943 में इप्टा बना। जनवरी 1944 में बम्बई योजना आई। दिसंबर 1945 में लोक परिषद का उदयपुर अधिवेशन हुआ।

1946–1947

1946 में डाक-तार हड़ताल, "कश्मीर छोड़ो" और पुन्नप्रा-वायलार हुए। 3 मई 1947 को इंटक बना। 5 जुलाई 1947 को रियासती विभाग बना।

1948

फ़रवरी में कम्युनिस्टों की कलकत्ता थीसिस आई। मार्च में सोशलिस्ट पार्टी कांग्रेस से अलग हुई। हिंद मज़दूर सभा बनी।

अंत में पूरे अध्याय के वे शब्द और जोड़ियाँ, जिन्हें परीक्षा से पहले एक बार अवश्य दोहरा लेना चाहिए।

🔑 कीवर्ड सार

शशिपद बनर्जी — वर्किंग मेन्स क्लब • लोखंडे — बॉम्बे मिल हैंड्स एसोसिएशन • कारख़ाना अधिनियम 1881 और 1891 • 1908 की बम्बई हड़ताल • वाडिया — मद्रास लेबर यूनियन • अहमदाबाद टेक्सटाइल लेबर एसोसिएशन • ट्रेड यूनियन कांग्रेस 1920 — लाला लाजपत राय • ट्रेड यूनियन अधिनियम 1926 • गिरनी कामगार यूनियन • इंटक 1947 • हिंद मज़दूर सभा

एम. एन. राय — ताशकंद • कानपुर केस 1924 • मेरठ केस 1929 • मज़दूर-किसान पार्टी • पी. सी. जोशी • जनयुद्ध • कलकत्ता थीसिस • प्रगतिशील लेखक संघ — प्रेमचंद • इप्टा • कांग्रेस समाजवादी पार्टी 1934 — नरेंद्र देव, जयप्रकाश • कराची प्रस्ताव • फ़ैज़पुर • राष्ट्रीय योजना समिति • न्यासिता

किसान सभा 1936 — सहजानंद, रंगा • किसान घोषणापत्र • बकाश्त • छात्र फ़ेडरेशन 1936 • हिंदुस्तानी सेवा दल — हार्डीकर • फ़िक्की 1927 • साम्राज्यीय वरीयता • बम्बई योजना 1944 • दीनबंधु एंड्रूज़ • हॉर्निमन • नेली सेनगुप्ता

नरेंद्र मंडल 1921 • बटलर समिति • सर्वोच्चता • देशी राज्य लोक परिषद 1927 • हरिपुरा 1938 और त्रिपुरी 1939 • लुधियाना — नेहरू • राजकोट — ग्वायर निर्णय • विदुराश्वत्थ • पट्टम थानु पिल्लै • रामानंद तीर्थ • कश्मीर छोड़ो • बाजी राउत • सेवा सिंह ठीकरीवाला • औंध प्रयोग

इन कीवर्ड में से हर एक के पीछे एक पूरी कहानी है; यदि किसी शब्द को पढ़कर घटना याद न आए, तो संबंधित खंड पर लौटकर उसे दोबारा पढ़ लें।

💡 अंतिम बात

मिल का मज़दूर, खेत का किसान, कॉलेज का छात्र, जेल में बैठा समाजवादी और किसी रियासत का प्रजामंडल कार्यकर्ता — सबने अपनी-अपनी तरह से आज़ादी की लड़ाई लड़ी। इन्हीं विविध धाराओं ने भारत की आज़ादी को सामाजिक और आर्थिक न्याय का अर्थ दिया।

पर हर धारा के पीछे कुछ व्यक्ति थे, जिनके विचारों और त्याग ने उसे दिशा दी। अगले अध्याय में हम राष्ट्रीय आंदोलन के इन्हीं प्रमुख व्यक्तित्वों को क़रीब से जानेंगे — उनका जीवन, उनके विचार और उनका योगदान।

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