🌙 कहानी से शुरुआत: आधी रात की दो तस्वीरें 14 अगस्त 1947, रात के बारह बजने से कुछ पहले, नई दिल्ली का संविधान सभा भवन। जवाहरलाल नेहरू खड़े हुए — "बहुत साल पहले हमने नियति से एक वादा किया था... आधी रात के इस क्षण, जब दुनिया सो रही है, भारत जीवन और स्वतंत्रता के लिए जागेगा।" बाहर शंख बजे, लोग सड़कों पर नाचने लगे और तिरंगे लहराने लगे। उसी रात कलकत्ता के बेलियाघाटा मोहल्ले के एक टूटे-फूटे मकान "हैदरी मंज़िल" में वह व्यक्ति, जिसने तीस साल तक इस आज़ादी की लड़ाई की अगुवाई की थी, उपवास कर रहा था और चरखा कात रहा था। गांधीजी ने कहा कि उनके भीतर उत्सव की कोई भावना नहीं है। उधर पंजाब में शरणार्थियों से भरी रेलगाड़ियाँ दोनों ओर से चल रही थीं और कई गाड़ियाँ लाशों से भरी हुई पहुँच रही थीं। और एक अजीब बात यह थी कि स्वतंत्रता मिल जाने के बाद भी करोड़ों लोगों को पता नहीं था कि वे किस देश में हैं। रेडक्लिफ़ रेखा का फ़ैसला तैयार था, पर माउंटबेटन ने उसे उत्सवों के बाद, 17 अगस्त 1947 को प्रकाशित करवाया। यानी 15 अगस्त को सीमा के पास के लाखों लोग नहीं जानते थे कि उनका गाँव भारत में है या पाकिस्तान में। यह सब कैसे हुआ? 1906 में मुस्लिम लीग के जन्म से सांप्रदायिक राजनीति की जो धारा शुरू हुई, वह 1940 के लाहौर प्रस्ताव तक पहुँची और फिर केवल सात वर्षों में एक देश को दो हिस्सों में बाँट गई। इस बीच गांधी-जिन्ना वार्ता हुई, कैबिनेट मिशन आया, सीधी कार्रवाई दिवस पर कलकत्ता जल उठा, और अंत में माउंटबेटन की 3 जून योजना आई। हर योजना, हर सम्मेलन और हर निर्णय को हम एक-एक करके समझेंगे: वह क्यों आया, उसमें क्या था, किसने क्या कहा और उसका क्या परिणाम हुआ। आगे दो कहानियाँ भी मिलेंगी, जो 1944 की गांधी-जिन्ना वार्ता और 1947 की रेडक्लिफ़ रेखा के पीछे की उलझनें आसान तरीक़े से समझा देंगी। |
भारत का विभाजन किसी एक दिन या एक व्यक्ति के निर्णय से नहीं हुआ। यह लगभग चार दशकों में धीरे-धीरे बढ़ी सांप्रदायिक राजनीति, अंग्रेज़ों की "फूट डालो और राज करो" की नीति, राष्ट्रीय आंदोलन की कुछ कमज़ोरियों और 1940 के दशक की तेज़ी से बदलती घटनाओं का मिला-जुला परिणाम था। इसलिए 1940–47 की घटनाओं को समझने से पहले यह समझना ज़रूरी है कि सांप्रदायिक सोच कहाँ से आई, कैसे बढ़ी और 1940 तक आते-आते इतनी शक्तिशाली कैसे हो गई कि उसने देश को ही बाँट दिया।
🔍 आसान परिभाषा: सांप्रदायिकता |
📘 परिभाषा: यह विश्वास कि एक धर्म के सभी लोगों के राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक हित एक जैसे होते हैं, और दूसरे धर्म के लोगों के हितों से अलग या विरोधी होते हैं — यानी धर्म को ही राजनीति की पहचान बना देना। |
💡 आसान भाषा में: सांप्रदायिक व्यक्ति सोचता है — "मेरी पहचान सबसे पहले मेरा धर्म है; मेरे धर्म के लोगों का फ़ायदा दूसरे धर्म वालों के नुक़सान में है।" धर्म का पालन करना सांप्रदायिकता नहीं है; धर्म के नाम पर राजनीतिक दुश्मनी खड़ी करना सांप्रदायिकता है। 🏠 उदाहरण: धर्म के आधार पर अलग निर्वाचन क्षेत्र, अलग राष्ट्र या अलग राज्य की माँग करना; किसी धार्मिक जुलूस या त्योहार को बहाना बनाकर दंगे भड़काना। |
इतिहासकार भारत में सांप्रदायिकता के विकास को तीन चरणों में समझाते हैं। हर अगला चरण पिछले से अधिक कठोर था, और 1937 के बाद आया तीसरा चरण ही विभाजन तक ले गया।
◆ पहला चरण — सांप्रदायिक राष्ट्रवाद (बीसवीं सदी के आरंभिक वर्ष) — इस चरण में यह माना जाने लगा कि एक धर्म के लोगों के हित समान हैं, इसलिए वे अपने समुदाय के लिए अलग से माँगें रखें। पर साथ ही यह भी माना जाता था कि सभी भारतीय मिलकर एक राष्ट्र बनाते हैं। यानी व्यक्ति अपने को "मुसलमान भारतीय" या "हिंदू भारतीय" समझता था, पर भारतीयता पर प्रश्न नहीं उठाता था।
◆ दूसरा चरण — उदार सांप्रदायिकता (लगभग 1920 से 1937) — अब यह माना जाने लगा कि हिंदुओं और मुसलमानों के हित अलग-अलग हैं, हालाँकि वे एक देश में मिलकर रह सकते हैं। इसलिए इस दौर की राजनीति सीटों, सरकारी नौकरियों और संवैधानिक संरक्षण के मोलभाव की राजनीति थी। उदाहरण के लिए, जिन्ना के 14 सूत्र (1929) इसी चरण की सोच दिखाते हैं — वे अलग देश नहीं, बल्कि एक भारत में मुसलमानों के लिए अधिक हिस्सेदारी माँगते थे।
◆ तीसरा चरण — उग्र सांप्रदायिकता (1937 के बाद) — अब यह प्रचार हुआ कि दोनों समुदायों के हित परस्पर विरोधी हैं, दोनों अलग राष्ट्र हैं और एक साथ रह ही नहीं सकते। इस चरण की राजनीति भय और घृणा पर चलती थी — "दूसरा समुदाय तुम्हें मिटा देगा" जैसी बातें कही जाती थीं। मुस्लिम लीग का द्वि-राष्ट्र सिद्धांत और हिंदू महासभा का उग्र रूप दोनों इसी चरण के उदाहरण हैं। इसी चरण का परिणाम 1940 का लाहौर प्रस्ताव और अंततः 1947 का विभाजन था।
सर सैयद अहमद ख़ाँ (1817–1898) दिल्ली के एक प्रतिष्ठित परिवार में जन्मे थे और कंपनी की न्यायिक सेवा में रहे। 1857 के विद्रोह में वे अंग्रेज़ों के प्रति वफ़ादार रहे और विद्रोह के कारणों पर पुस्तिका लिखकर अंग्रेज़ों को समझाया कि भारतीयों की भावनाओं की अनदेखी ही विद्रोह का कारण थी। उन्होंने मुसलमानों में आधुनिक और अंग्रेज़ी शिक्षा फैलाने के लिए 1875 में अलीगढ़ में मोहम्मडन एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेज खोला, जो 1920 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय बना। इसी से अलीगढ़ आंदोलन चला।
◆ कांग्रेस का विरोध — 1887–88 में अपने भाषणों में सर सैयद ने मुसलमानों से कहा कि वे कांग्रेस से दूर रहें। उनका तर्क था कि यदि भारत में चुनाव और प्रतिनिधि सरकार आई तो संख्या में अधिक हिंदू ही हर जगह जीतेंगे और मुसलमान पीछे रह जाएँगे; इसलिए मुसलमानों को अंग्रेज़ सरकार के प्रति वफ़ादार रहकर शिक्षा और नौकरियों में आगे बढ़ना चाहिए।
◆ यूनाइटेड इंडियन पैट्रियॉटिक एसोसिएशन (1888) — बनारस के राजा शिवप्रसाद के साथ मिलकर उन्होंने यह संगठन बनाया, जिसका उद्देश्य कांग्रेस के प्रचार का जवाब देना और अंग्रेज़ी शासन के प्रति वफ़ादारी बनाए रखना था। ध्यान दें कि इसमें हिंदू सदस्य भी थे, इसलिए यह पूरी तरह धार्मिक संगठन नहीं था — पर इससे मुसलमानों के एक प्रभावशाली वर्ग में "अलग हितों" का विचार जड़ पकड़ने लगा।
◆ महत्त्व — सर सैयद आरंभ में हिंदुओं और मुसलमानों को "भारत रूपी दुल्हन की दो आँखें" कहते थे। पर बाद के वर्षों में उनके विचारों से यह धारणा बनी कि दोनों समुदायों के राजनीतिक हित अलग हैं। इसीलिए अनेक इतिहासकार उन्हें आगे चलकर विकसित हुए द्वि-राष्ट्र विचार का आरंभिक स्रोत मानते हैं।
1900 में पश्चिमोत्तर प्रांत और अवध (आगे का संयुक्त प्रांत) के उपराज्यपाल एंटनी मैकडॉनेल ने अदालतों और सरकारी दफ़्तरों में उर्दू के साथ देवनागरी लिपि को भी मान्यता दे दी। इससे पहले वहाँ केवल फ़ारसी लिपि वाली उर्दू चलती थी। हिंदू संगठनों ने इसे अपनी जीत माना, जबकि उर्दू समर्थक मुसलमानों ने इसे अपनी भाषा और संस्कृति पर आघात समझा। इस तरह एक भाषा और लिपि का प्रश्न धार्मिक पहचान से जुड़ गया — यह इस बात का उदाहरण है कि कैसे सामान्य प्रशासनिक मुद्दे भी सांप्रदायिक रंग ले लेते थे।
◆ पृष्ठभूमि — 1905 के बंगाल विभाजन और स्वदेशी आंदोलन के समय अंग्रेज़ चाहते थे कि मुसलमान राष्ट्रीय आंदोलन से अलग रहें। उधर 1906 में ब्रिटेन में नई लिबरल सरकार ने भारत में संवैधानिक सुधारों के संकेत दिए। मुस्लिम अभिजात वर्ग को डर था कि यदि चुनाव आधारित सुधार आए तो मुसलमान पीछे रह जाएँगे।
◆ शिमला प्रतिनिधिमंडल (1 अक्टूबर 1906) — आग़ा ख़ाँ के नेतृत्व में 35 सदस्यों का प्रतिनिधिमंडल शिमला में वायसराय लॉर्ड मिंटो से मिला। उसने माँग की कि मुसलमानों को उनकी संख्या से अधिक प्रतिनिधित्व दिया जाए, क्योंकि उनका "राजनीतिक महत्त्व" और साम्राज्य की सेवा अधिक है, और उनके प्रतिनिधि केवल मुसलमान मतदाता चुनें। मिंटो ने इन माँगों के प्रति सहानुभूति दिखाई। कई इतिहासकार इसे अंग्रेज़ों द्वारा पहले से तैयार की गई "आज्ञा के अनुसार प्रदर्शन" मानते हैं।
◆ मुस्लिम लीग (30 दिसंबर 1906, ढाका) — ढाका के नवाब सलीमुल्ला की पहल पर अखिल भारतीय मुहम्मडन शैक्षिक सम्मेलन के अवसर पर अखिल भारतीय मुस्लिम लीग बनी। आग़ा ख़ाँ इसके पहले स्थायी अध्यक्ष बने। इसके आरंभिक उद्देश्य थे — ब्रिटिश सरकार के प्रति वफ़ादारी बढ़ाना, मुसलमानों के राजनीतिक अधिकारों की रक्षा करना और उन्हें सरकार तक पहुँचाना। आरंभ में यह ज़मींदारों, नवाबों और अभिजात वर्ग का संगठन था (विस्तार अध्याय 10 में)।
🔍 आसान परिभाषा: पृथक निर्वाचन (सांप्रदायिक निर्वाचन) |
📘 परिभाषा: ऐसी चुनाव व्यवस्था, जिसमें कुछ सीटें किसी विशेष धार्मिक समुदाय के लिए आरक्षित हों और उन सीटों पर केवल उसी समुदाय के मतदाता अपने ही समुदाय के उम्मीदवार को चुनें। |
💡 आसान भाषा में: मुस्लिम सीट पर केवल मुसलमान ही वोट डालेंगे और केवल मुसलमान ही उम्मीदवार होगा। इसका परिणाम यह होता है कि उम्मीदवार को दूसरे धर्म के लोगों का वोट चाहिए ही नहीं, इसलिए वह केवल अपने समुदाय की भावनाएँ भड़काकर भी जीत सकता है। 🏠 उदाहरण: 1909 के भारतीय परिषद अधिनियम (मॉर्ले-मिंटो सुधार) ने मुसलमानों को पृथक निर्वाचन दिया; 1919 में सिखों, 1935 में और समुदायों तक यह फैलाया गया। इसके विपरीत "संयुक्त निर्वाचन" में सभी धर्मों के मतदाता मिलकर वोट देते हैं। |
1909 के मॉर्ले-मिंटो सुधारों ने शिमला प्रतिनिधिमंडल की माँग मानकर मुसलमानों को पृथक निर्वाचन दे दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि राजनीति में धर्म को क़ानूनी और संवैधानिक आधार मिल गया। चुनाव लड़ने वाले नेता अब पूरे समाज के नहीं, केवल अपने समुदाय के प्रतिनिधि बन गए। इसीलिए पृथक निर्वाचन को "पाकिस्तान का बीज" कहा जाता है, और लॉर्ड मिंटो को "सांप्रदायिक निर्वाचन का जनक"।
मुस्लिम सांप्रदायिकता के साथ-साथ हिंदू सांप्रदायिक धारा भी संगठित हुई। 1909 के बाद पंजाब में हिंदू सभाएँ बनीं और 1915 में हरिद्वार के कुंभ के अवसर पर अखिल भारतीय हिंदू महासभा का पहला अधिवेशन हुआ। मदन मोहन मालवीय इसके प्रमुख नेताओं में थे; आगे चलकर वी. डी. सावरकर (1937 से) और श्यामा प्रसाद मुखर्जी इसके प्रमुख नेता बने। 1925 में नागपुर में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की। दोनों ओर की सांप्रदायिक धाराएँ एक-दूसरे के डर को बढ़ाकर ही आगे बढ़ती थीं — इसलिए इन्हें एक-दूसरे का "पूरक" भी कहा जाता है।
◆ घटना — दिसंबर 1916 में लखनऊ में कांग्रेस और मुस्लिम लीग के अधिवेशन एक साथ हुए और दोनों के बीच समझौता हुआ। इसमें तिलक और जिन्ना की प्रमुख भूमिका थी। दोनों ने मिलकर स्वशासन की संयुक्त माँगें सरकार के सामने रखीं।
◆ कांग्रेस की रियायत — कांग्रेस ने मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन स्वीकार कर लिया और उन प्रांतों में, जहाँ मुसलमान अल्पसंख्यक थे, उन्हें उनकी जनसंख्या से अधिक सीटें देना मान लिया।
◆ महत्त्व और सीमा — अल्पकाल में यह हिंदू-मुस्लिम एकता की बड़ी उपलब्धि थी और इसी एकता ने आगे ख़िलाफ़त-असहयोग आंदोलन को शक्ति दी। पर दीर्घकाल में कांग्रेस द्वारा पृथक निर्वाचन की स्वीकृति ने इस विचार को मान्यता दे दी कि मुसलमान एक अलग राजनीतिक इकाई हैं और उनकी राजनीति मुस्लिम नेता ही करेंगे।
ख़िलाफ़त और असहयोग आंदोलन (1920–22) के समय हिंदू-मुस्लिम एकता अपने शिखर पर थी। पर 1922 में आंदोलन वापस लिए जाने और 1924 में तुर्की में ख़िलाफ़त ही समाप्त हो जाने के बाद यह एकता टूट गई। 1920 के दशक में देश के कई हिस्सों में दंगे हुए — उदाहरण के लिए सितंबर 1924 में पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत के कोहाट में भीषण दंगा हुआ, जिसके बाद गांधीजी ने दिल्ली में 21 दिन का उपवास किया। इसी दौर में एक ओर आर्य समाज के शुद्धि (धर्म बदल चुके लोगों को वापस हिंदू बनाना) और संगठन आंदोलन चले, तो दूसरी ओर मुसलमानों में तबलीग़ (धर्म प्रचार) और तंज़ीम (संगठन) आंदोलन। दोनों ने एक-दूसरे के प्रति संदेह बढ़ाया।
◆ नेहरू रिपोर्ट (अगस्त 1928) — साइमन कमीशन के बहिष्कार के बाद भारतीयों ने स्वयं संविधान का प्रारूप बनाने का निर्णय लिया। मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता वाली समिति ने संयुक्त निर्वाचन (साथ में अल्पसंख्यकों के लिए कुछ आरक्षित सीटें) और मज़बूत केंद्र का सुझाव दिया।
◆ कलकत्ता सर्वदलीय सम्मेलन (दिसंबर 1928) — जिन्ना ने संशोधन रखे — केंद्रीय विधानमंडल में मुसलमानों को एक-तिहाई सीटें, अवशिष्ट शक्तियाँ प्रांतों को, आदि। ये संशोधन अस्वीकार कर दिए गए, क्योंकि हिंदू महासभा और सिख नेता इनके विरुद्ध थे। दुखी जिन्ना ने कहा — "यह रास्तों के अलग होने का क्षण है।"
◆ 14 सूत्र (मार्च 1929, दिल्ली) — इसके बाद जिन्ना ने अपनी चौदह माँगें रखीं — संघीय ढाँचा और प्रांतों को अवशिष्ट शक्तियाँ, केंद्र में मुसलमानों को एक-तिहाई प्रतिनिधित्व, पृथक निर्वाचन जारी रहना, सिंध को बम्बई से अलग करना, पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत और बलूचिस्तान में सुधार, और बिना मुस्लिम सहमति के कोई संवैधानिक परिवर्तन न होना। यह "उदार सांप्रदायिकता" से आगे बढ़ने का संकेत था।
मोहम्मद इक़बाल (1877–1938) का जन्म सियालकोट में हुआ था। वे उर्दू और फ़ारसी के महान कवि और दार्शनिक थे। विडंबना यह है कि "सारे जहाँ से अच्छा हिंदोस्ताँ हमारा" जैसा देशभक्ति गीत उन्होंने ही लिखा था (1904), पर बाद में उनकी सोच मुस्लिम एकता (इस्लामी भाईचारे) की ओर मुड़ गई। 29 दिसंबर 1930 को मुस्लिम लीग के इलाहाबाद अधिवेशन में अध्यक्ष के रूप में उन्होंने कहा कि पंजाब, पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत, सिंध और बलूचिस्तान को मिलाकर एक मुस्लिम राज्य बने — चाहे वह ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर हो या बाहर। ध्यान दें कि उनकी कल्पना में बंगाल शामिल नहीं था और उन्होंने अलग देश का स्पष्ट नाम भी नहीं दिया था। फिर भी यह पहली बार था जब किसी बड़े मंच से मुसलमानों के लिए अलग राजनीतिक इकाई की बात हुई। इसलिए इक़बाल को "पाकिस्तान के विचार का दार्शनिक पिता" कहा जाता है। 1936–37 में जिन्ना को लिखे पत्रों में भी उन्होंने यही विचार दोहराया।
कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में पढ़ रहे पंजाबी छात्र चौधरी रहमत अली ने 28 जनवरी 1933 को एक पर्चा बाँटा, जिसका शीर्षक था — "नाउ ऑर नेवर" (अभी या कभी नहीं)। इसमें पहली बार "पाकिस्तान" शब्द का प्रयोग हुआ। उस समय गोलमेज़ सम्मेलन में गए मुस्लिम नेताओं ने इसे "एक छात्र की कल्पना" कहकर गंभीरता से नहीं लिया। बाद में रहमत अली ने बंगाल-असम के लिए "बंगिस्तान" और हैदराबाद के लिए "उस्मानिस्तान" की कल्पना भी की। पर सात वर्ष बाद यही शब्द एक जन-आंदोलन का नारा बन गया।
🔤 "पाकिस्तान" शब्द का अर्थ रहमत अली के अनुसार — P = पंजाब, A = अफ़ग़ानिया (पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत), K = कश्मीर, S = सिंध, TAN = बलूचिस्तान; बीच का "इ" उच्चारण की सुविधा के लिए जुड़ा। फ़ारसी-उर्दू में इसका अर्थ भी निकलता है — "पाक (पवित्र) लोगों की भूमि"। ध्यान दें: रहमत अली की योजना में बंगाल शामिल नहीं था; और 1940 के लाहौर प्रस्ताव में भी "पाकिस्तान" शब्द नहीं था। |
◆ सांप्रदायिक पंचाट (16 अगस्त 1932) — गोलमेज़ सम्मेलनों में सीटों के बँटवारे पर भारतीय दलों में सहमति नहीं बनी, तब ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्से मैकडॉनल्ड ने स्वयं निर्णय घोषित किया। इसमें मुसलमानों, सिखों, ईसाइयों, एंग्लो-इंडियनों और यूरोपीयों के साथ-साथ दलित वर्गों को भी पृथक निर्वाचन दिया गया। दलितों के पृथक निर्वाचन के विरुद्ध गांधीजी ने यरवदा जेल में आमरण अनशन किया, जिसके बाद पूना समझौता हुआ। मुसलमानों का पृथक निर्वाचन बना रहा और आगे 1935 के अधिनियम का आधार बना।
मोहम्मद अली जिन्ना (1876–1948) का जन्म कराची में हुआ था। वे लंदन से बैरिस्टर बनकर लौटे और बम्बई के सबसे सफल वकीलों में गिने गए। 1906 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में वे दादाभाई नौरोजी के सचिव थे। 1913 में वे मुस्लिम लीग में भी शामिल हुए और लखनऊ समझौते (1916) के प्रमुख निर्माता रहे; सरोजिनी नायडू ने उन्हें "हिंदू-मुस्लिम एकता का राजदूत" कहा था। गांधीजी के असहयोग आंदोलन के जन-आंदोलनात्मक तरीक़ों से असहमत होकर उन्होंने 1920 में कांग्रेस छोड़ दी। 1928 की निराशा और गोलमेज़ सम्मेलनों के बाद वे कुछ वर्ष लंदन में वकालत करते रहे। 1934 में लियाक़त अली ख़ाँ आदि के आग्रह पर वे लौटे, लीग के स्थायी अध्यक्ष बने और उसका पुनर्गठन किया। आगे चलकर वे "क़ायदे-आज़म" (महान नेता) कहलाए और पाकिस्तान के पहले गवर्नर जनरल बने; 11 सितंबर 1948 को उनकी मृत्यु हुई।
◆ 1937 के चुनाव में लीग की हार — 1935 के अधिनियम के अंतर्गत हुए प्रांतीय चुनावों में लीग को बड़ा झटका लगा। लगभग 482 मुस्लिम सीटों में से वह केवल 109 जीत सकी और उसे कुल मुस्लिम मतों का लगभग 4.8% ही मिला। मुस्लिम बहुल प्रांतों में भी वह पीछे रही — पंजाब में यूनियनिस्ट पार्टी (सर सिकंदर हयात ख़ाँ), बंगाल में ए. के. फ़ज़लुल हक़ की कृषक प्रजा पार्टी और पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत में कांग्रेस आगे रही। इससे स्पष्ट था कि 1937 तक लीग मुसलमानों की प्रतिनिधि पार्टी नहीं थी।
◆ संयुक्त प्रांत में साझा सरकार का प्रश्न — संयुक्त प्रांत में लीग (नेता चौधरी ख़लीक़ुज़्ज़माँ) कांग्रेस के साथ साझा मंत्रिमंडल चाहती थी। कांग्रेस के पास अपना स्पष्ट बहुमत था, इसलिए उसने शर्त रखी कि लीग के सदस्य कांग्रेस में विलय करें और कांग्रेस का अनुशासन मानें। लीग ने इसे अपमान समझा और इनकार कर दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि लीग में यह भावना बनी कि कांग्रेसी शासन में मुसलमानों को सत्ता में हिस्सा नहीं मिलेगा — जिन्ना ने इसी को अपने प्रचार का आधार बनाया। अनेक इतिहासकार इसे कांग्रेस की एक बड़ी राजनीतिक भूल मानते हैं।
◆ मुस्लिम जनसंपर्क अभियान (1937) — मुसलमानों को सीधे कांग्रेस से जोड़ने के लिए नेहरू ने के. एम. अशरफ़ के नेतृत्व में यह अभियान शुरू किया। पर यह आधे मन से चला, स्थानीय कांग्रेसी नेताओं का सहयोग कम मिला और मुल्ला-मौलवियों के विरोध के कारण यह सफल नहीं हुआ।
◆ "कांग्रेसी राज में अत्याचार" का प्रचार — 1937–39 में आठ प्रांतों में कांग्रेस सरकारें रहीं। लीग ने प्रचार किया कि इन सरकारों में मुसलमानों पर अत्याचार हो रहे हैं — जैसे विद्यालयों में वंदे मातरम् गवाना, हिंदी को बढ़ावा देना, "विद्या मंदिर" योजना (मध्य प्रांत) आदि। इस पर लीग ने तीन रिपोर्टें तैयार कीं — पीरपुर रिपोर्ट (1938), बिहार के बारे में शरीफ़ रिपोर्ट और फ़ज़लुल हक़ की रिपोर्ट (1939)। इनमें कई आरोप बढ़ा-चढ़ाकर लगाए गए थे, पर इन्होंने मुसलमानों में भय का वातावरण बनाया। इसी दौर में जिन्ना "क़ायदे-आज़म" कहलाने लगे।
◆ जिन्ना-सिकंदर समझौता (अक्टूबर 1937) — लखनऊ अधिवेशन में पंजाब के प्रधानमंत्री सर सिकंदर हयात ख़ाँ ने अपने मुस्लिम समर्थकों को लीग में शामिल होने को कहा। इससे लीग को पंजाब में पैर जमाने का अवसर मिला।
◆ "मुक्ति दिवस" (22 दिसंबर 1939) — दूसरे विश्व युद्ध में भारत को बिना पूछे शामिल किए जाने के विरोध में अक्टूबर-नवंबर 1939 में कांग्रेसी मंत्रिमंडलों ने त्यागपत्र दे दिए। जिन्ना ने इसे मुसलमानों की "मुक्ति" बताया और 22 दिसंबर 1939 को "मुक्ति दिवस" मनाने को कहा। डॉ. आंबेडकर जैसे कुछ ग़ैर-मुस्लिम नेताओं ने भी इसमें साथ दिया। यह दिखाता है कि लीग अब कांग्रेस को सीधे अपना विरोधी मानकर चल रही थी।
◆ हिंदू सांप्रदायिक धारा का उग्र रूप — वी. डी. सावरकर ने "हिंदुत्व" (1923) पुस्तक में यह विचार रखा कि जिनकी पितृभूमि और पुण्यभूमि दोनों भारत है, वही सच्चे अर्थों में इस राष्ट्र के अंग हैं। 1937 में हिंदू महासभा के अहमदाबाद अधिवेशन में उन्होंने कहा कि भारत को एक राष्ट्र नहीं माना जा सकता, यहाँ मुख्यतः दो राष्ट्र — हिंदू और मुसलमान — हैं। इस तरह दोनों ओर की सांप्रदायिक राजनीति ने एक-दूसरे के तर्कों को बल दिया।
नीचे का आरेख 1906 से 1946 तक की उस पूरी राह का सार है, जो विभाजन तक ले गई। इसके ठीक नीचे आरेख के हर पड़ाव को संक्षेप में समझाया गया है; जिन पड़ावों का पूरा विस्तार आगे के खंडों में है, उनकी खंड संख्या भी दी गई है।

1. लीग और पृथक निर्वाचन (1906 / 1909) — 30 दिसंबर 1906 को ढाका में मुस्लिम लीग बनी और 1909 के मॉर्ले-मिंटो सुधारों ने मुसलमानों को पृथक निर्वाचन दिया। इससे सांप्रदायिक राजनीति को पहली बार संवैधानिक आधार मिला (खंड 1.2 ग-घ)।
2. लखनऊ समझौता और 14 सूत्र (1916 / 1929) — 1916 में कांग्रेस ने पृथक निर्वाचन स्वीकार करके लीग से समझौता किया; 1928 में नेहरू रिपोर्ट पर मतभेद के बाद जिन्ना ने मार्च 1929 में अपने 14 सूत्र रखे, जिससे दोनों दलों के रास्ते अलग होने लगे (खंड 1.2 च-ज)।
3. इक़बाल और रहमत अली (1930 / 1933) — इक़बाल ने इलाहाबाद अधिवेशन में पश्चिमोत्तर भारत में मुस्लिम राज्य का विचार दिया और तीन वर्ष बाद रहमत अली ने "नाउ ऑर नेवर" पर्चे में "पाकिस्तान" शब्द गढ़ा। विचार अब नाम पा चुका था (खंड 1.2 झ-ञ)।
4. लीग का पुनर्जीवन (1937–1939) — 1937 की हार के बाद लीग ने कांग्रेसी सरकारों पर "अत्याचार" का प्रचार करके, पीरपुर रिपोर्ट छापकर और "मुक्ति दिवस" मनाकर मुसलमानों में अपना आधार बढ़ाया (खंड 1.3)।
5. लाहौर प्रस्ताव (मार्च 1940) — 23 मार्च को प्रस्तुत और 24 मार्च 1940 को पारित इस प्रस्ताव ने मुस्लिम बहुल क्षेत्रों के लिए "स्वतंत्र राज्यों" की माँग की; बाद में यही "पाकिस्तान प्रस्ताव" कहलाया (खंड 2)।
6. क्रिप्स और सी. आर. फ़ॉर्मूला (1942–1944) — क्रिप्स प्रस्ताव ने प्रांतों को संघ से अलग रहने का अधिकार देकर विभाजन की संभावना को सरकारी स्वीकृति दी; 1944 में राजगोपालाचारी के फ़ॉर्मूले पर आधारित गांधी-जिन्ना वार्ता विफल रही (खंड 3)।
7. शिमला और चुनाव (1945–1946) — शिमला सम्मेलन में जिन्ना ने ज़िद की कि परिषद के सारे मुस्लिम सदस्य लीग ही चुनेगी, जिससे सम्मेलन विफल हुआ; फिर 1945–46 के चुनावों में लीग ने लगभग सभी मुस्लिम सीटें जीत लीं (खंड 4 और 5)।
8. कैबिनेट मिशन और सीधी कार्रवाई (1946) — 16 मई की योजना ने एक संघ और प्रांतों के तीन समूह सुझाए; समूहीकरण पर विवाद के बाद लीग ने स्वीकृति वापस ली और 16 अगस्त को "सीधी कार्रवाई दिवस" मनाया, जिसके बाद कलकत्ता, नोआखाली और बिहार में दंगे हुए (खंड 6 और 8)।
🔍 आसान परिभाषा: द्वि-राष्ट्र सिद्धांत |
📘 परिभाषा: यह विचार कि भारत के हिंदू और मुसलमान दो अलग-अलग राष्ट्र हैं — उनके धर्म, रीति-रिवाज, खान-पान, साहित्य, इतिहास और इतिहास के नायक अलग हैं — इसलिए वे एक राज्य में बराबरी से नहीं रह सकते और मुसलमानों को अपना अलग राज्य चाहिए। |
💡 आसान भाषा में: इस सिद्धांत के अनुसार राष्ट्र का आधार भाषा, भूमि या साझा इतिहास नहीं, बल्कि धर्म है। यानी एक ही गाँव में सदियों से साथ रहने वाले, एक ही बोली बोलने वाले दो किसान केवल धर्म अलग होने के कारण "दो राष्ट्रों" के सदस्य माने गए। 🏠 उदाहरण: जिन्ना ने लाहौर अधिवेशन (मार्च 1940) में कहा कि हिंदू और मुसलमान "दो भिन्न सभ्यताओं" के लोग हैं। इसका खंडन 1971 में हुआ, जब धर्म एक होने पर भी भाषा और संस्कृति के आधार पर पूर्वी पाकिस्तान अलग होकर बांग्लादेश बन गया। |
◆ विचार की नींव — इस सिद्धांत की शुरुआती झलक सर सैयद अहमद ख़ाँ के इस विचार में दिखती है कि हिंदुओं और मुसलमानों के राजनीतिक हित अलग हैं। इक़बाल ने 1930 में इसे दार्शनिक और भौगोलिक रूप दिया और रहमत अली ने इसे "पाकिस्तान" नाम दिया।
◆ जिन्ना — सबसे बड़े प्रवक्ता — 1940 के बाद जिन्ना इस सिद्धांत के सबसे प्रभावशाली प्रवक्ता बने। दिलचस्प बात यह है कि जिन्ना स्वयं धार्मिक कट्टरता से दूर, पाश्चात्य जीवन-शैली वाले व्यक्ति थे; उनके लिए यह सिद्धांत मुसलमानों को एकजुट करने और अंग्रेज़ों तथा कांग्रेस से मोलभाव करने का सबसे शक्तिशाली राजनीतिक हथियार था।
◆ हिंदू सांप्रदायिक रूप — दूसरी ओर सावरकर ने भी 1937 में "दो राष्ट्रों" की बात कही, यद्यपि उनका निष्कर्ष अलग देश नहीं, बल्कि एक देश में हिंदुओं की प्रधानता था।
◆ विरोध — मिश्रित राष्ट्रवाद — कांग्रेस का मानना था कि भारत एक राष्ट्र है और धर्म राष्ट्रीयता का आधार नहीं हो सकता। मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने कहा कि दो क़ौमों का सिद्धांत इस्लाम की शिक्षा के भी विरुद्ध है। देवबंद के विद्वान मौलाना हुसैन अहमद मदनी ने "मुत्तहिदा क़ौमियत" (मिश्रित या संयुक्त राष्ट्रीयता) का विचार रखा — कि राष्ट्र भूमि से बनता है, धर्म से नहीं; इसलिए भारत के सभी धर्मों के लोग मिलकर एक राष्ट्र हैं।
❝ हिंदू और मुसलमान दो भिन्न धार्मिक दर्शनों, सामाजिक रीतियों और साहित्यों के अनुयायी हैं। वे न आपस में विवाह करते हैं, न साथ भोजन करते हैं... उनके महाकाव्य, नायक और प्रसंग अलग हैं। ऐसे दो राष्ट्रों को एक राज्य में जोड़ना — जिनमें एक अल्पसंख्यक हो और दूसरा बहुसंख्यक — असंतोष को बढ़ाएगा और अंततः उस राज्य के ढाँचे को नष्ट कर देगा। ❞ (मोहम्मद अली जिन्ना, लाहौर अधिवेशन, 22 मार्च 1940) |
◆ पृष्ठभूमि — 1939 में युद्ध छिड़ने और कांग्रेसी मंत्रिमंडलों के हटने के बाद अंग्रेज़ों को लीग के सहयोग की ज़रूरत थी, क्योंकि सेना में बड़ी संख्या में पंजाबी मुसलमान थे। वायसराय लिनलिथगो लीग को कांग्रेस के विरुद्ध संतुलन के रूप में देखने लगे। उधर लीग को भी एक स्पष्ट लक्ष्य चाहिए था, जो मुसलमानों को उसके पीछे एकजुट कर सके। अब तक लीग केवल "संरक्षण" माँगती थी; अब उसने "अलग राज्य" का लक्ष्य रखा।
◆ अधिवेशन — कब और कहाँ — मुस्लिम लीग का वार्षिक अधिवेशन 22 से 24 मार्च 1940 तक लाहौर के मिंटो पार्क में हुआ (आज इसे इक़बाल पार्क कहते हैं, जहाँ मीनार-ए-पाकिस्तान बनी है)। अध्यक्षता जिन्ना ने की और 22 मार्च के अपने लंबे भाषण में द्वि-राष्ट्र सिद्धांत को विस्तार से रखा।
◆ प्रारूप और प्रस्तुति — प्रस्ताव का मूल मसौदा पंजाब के प्रधानमंत्री सर सिकंदर हयात ख़ाँ के प्रारूप पर आधारित था, जिसे लीग की कार्यसमिति ने संशोधित किया। 23 मार्च 1940 को बंगाल के प्रधानमंत्री ए. के. फ़ज़लुल हक़ ("शेर-ए-बंगाल") ने इसे अधिवेशन में प्रस्तुत किया और संयुक्त प्रांत के चौधरी ख़लीक़ुज़्ज़माँ ने इसका समर्थन (अनुमोदन) किया। अनेक प्रांतों के नेताओं के भाषणों के बाद 24 मार्च 1940 को यह पारित हुआ।
◆ मुख्य माँग — प्रस्ताव में कहा गया कि कोई भी संवैधानिक योजना मुसलमानों को तभी स्वीकार होगी, जब भौगोलिक रूप से लगे हुए क्षेत्रों को, आवश्यक सीमा-समायोजन के साथ, इस तरह बनाया जाए कि जिन क्षेत्रों में मुसलमान संख्यात्मक बहुमत में हैं — जैसे भारत के पश्चिमोत्तर और पूर्वी क्षेत्र — उन्हें मिलाकर "स्वतंत्र राज्य" (इंडिपेंडेंट स्टेट्स) बनाए जाएँ, जिनकी घटक इकाइयाँ "स्वायत्त और संप्रभु" हों।
◆ अल्पसंख्यकों के लिए — दोनों ओर के अल्पसंख्यकों — यानी नए राज्यों में रहने वाले हिंदुओं-सिखों और शेष भारत में रहने वाले मुसलमानों — के धार्मिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक अधिकारों के लिए पर्याप्त संवैधानिक संरक्षण की बात कही गई।
◆ जानबूझकर रखी गई अस्पष्टता — प्रस्ताव में न तो सीमाएँ बताई गईं, न यह कि "राज्य" एक होगा या दो, न ही "पाकिस्तान" शब्द का प्रयोग हुआ। इतिहासकार मानते हैं कि यह अस्पष्टता जिन्ना की रणनीति थी — इससे पंजाब के ज़मींदार, बंगाल के किसान और संयुक्त प्रांत के मध्यवर्ग — सभी अपनी-अपनी इच्छा के अनुसार इसका अर्थ निकाल सकते थे।
◆ "पाकिस्तान प्रस्ताव" नाम कैसे पड़ा — अगले दिन से हिंदू समाचार पत्रों ने इसकी आलोचना करते हुए इसे "पाकिस्तान प्रस्ताव" कहना शुरू किया। लीग ने यह नाम अपना लिया और आगे यही उसका नारा बन गया।
◆ आगे के क़दम — अप्रैल 1941 के मद्रास अधिवेशन में यह लक्ष्य लीग के संविधान में शामिल कर लिया गया। अप्रैल 1946 में दिल्ली में हुए लीग के विधायकों के सम्मेलन ने "राज्यों" के स्थान पर "एक संप्रभु राज्य" की माँग रखी — यानी पश्चिमी और पूर्वी दोनों भागों को मिलाकर एक पाकिस्तान। पाकिस्तान में आज भी 23 मार्च को "पाकिस्तान दिवस" मनाया जाता है।
📌 याद रखें — तिथियों का भ्रम अधिवेशन 22–24 मार्च 1940; जिन्ना का द्वि-राष्ट्र भाषण 22 मार्च; प्रस्ताव फ़ज़लुल हक़ द्वारा 23 मार्च को प्रस्तुत; 24 मार्च को पारित। पाकिस्तान दिवस 23 मार्च को मनाया जाता है, इसलिए कई पुस्तकों में "23 मार्च को पारित" लिखा मिलता है — पर सटीक उत्तर है: प्रस्तुत 23, पारित 24 मार्च। प्रारूप — सिकंदर हयात ख़ाँ; प्रस्तुतकर्ता — फ़ज़लुल हक़; समर्थक — ख़लीक़ुज़्ज़माँ; अध्यक्ष — जिन्ना। |
◆ गांधीजी — उन्होंने प्रस्ताव को भारत का "अंग-विच्छेद" (जीवित शरीर को काटना) कहा और कहा कि भारत को काटने से पहले उन्हें काटना होगा। पर साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि यदि देश के मुसलमान सचमुच अलग होना चाहें तो उन्हें बलपूर्वक नहीं रोका जा सकता — यह अहिंसा के सिद्धांत के अनुरूप था।
◆ मौलाना आज़ाद — उसी महीने (मार्च 1940) कांग्रेस के रामगढ़ अधिवेशन में अध्यक्ष के रूप में उन्होंने कहा — "मैं मुसलमान हूँ और गर्व से कहता हूँ कि मैं भारत की अविभाज्य एकता का अंग हूँ... भारतीय राष्ट्रीयता की इस इमारत का मैं एक अनिवार्य हिस्सा हूँ।" यह द्वि-राष्ट्र सिद्धांत का सबसे सशक्त उत्तर माना जाता है।
◆ नेहरू और कांग्रेस — नेहरू ने इसे अव्यावहारिक और कल्पना-लोक की माँग बताया। कांग्रेस का स्पष्ट मत था कि भारत एक राष्ट्र है और धर्म राष्ट्रीयता का आधार नहीं हो सकता।
◆ विरोधी मुस्लिम धाराएँ — सभी मुसलमान लीग के साथ नहीं थे। ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ाँ ("सीमांत गांधी") के ख़ुदाई ख़िदमतगार (लाल कुर्ती), पंजाब की अहरार पार्टी, देवबंदी उलेमा की जमीयत-उल-उलेमा-ए-हिंद, बुनकरों और कारीगरों की मोमिन कॉन्फ़्रेंस और शिया कॉन्फ़्रेंस ने विभाजन का विरोध किया। सिंध के पूर्व प्रधानमंत्री अल्लाह बख़्श सूमरो की अध्यक्षता में अप्रैल 1940 में दिल्ली में आज़ाद मुस्लिम कॉन्फ़्रेंस हुई, जिसने लाहौर प्रस्ताव को ठुकराकर एकीकृत भारत का समर्थन किया। 1943 में सूमरो की हत्या कर दी गई।
◆ अंग्रेज़ों का रुख़ — सरकार ने प्रस्ताव का खुला विरोध नहीं किया। उलटे, कुछ ही महीने बाद अगस्त प्रस्ताव (1940) में अल्पसंख्यकों की सहमति की शर्त जोड़कर उसने लीग को अप्रत्यक्ष शक्ति दे दी (खंड 3)।
🗣️ प्रतिक्रियाएँ — सार ✔ गांधीजी ने इसे भारत का "अंग-विच्छेद" बताया। ✔ मौलाना आज़ाद ने रामगढ़ में भारत की अविभाज्य एकता का समर्थन किया। ✔ कांग्रेस ने कहा कि धर्म राष्ट्रीयता का आधार नहीं हो सकता। | 🤝 विभाजन विरोधी मुस्लिम धाराएँ — सार ✔ ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ाँ के ख़ुदाई ख़िदमतगार विभाजन के विरुद्ध रहे। ✔ अहरार, जमीयत-उल-उलेमा-ए-हिंद, मोमिन कॉन्फ़्रेंस और शिया कॉन्फ़्रेंस ने एकता का पक्ष लिया। ✔ अल्लाह बख़्श सूमरो की आज़ाद मुस्लिम कॉन्फ़्रेंस (अप्रैल 1940) ने प्रस्ताव ठुकराया। |
1937 में जो लीग केवल 4.8% मुस्लिम वोट पा सकी थी, वही 1946 तक आते-आते लगभग सारी मुस्लिम सीटें जीतने लगी। यह बदलाव मुख्यतः युद्ध के वर्षों (1939–45) में हुआ। इसके तीन कारण थे — कांग्रेस का मैदान से हट जाना, अंग्रेज़ों का लीग को संरक्षण और लीग का अपना संगठित प्रचार।
◆ कांग्रेस मैदान से बाहर — 1939 में कांग्रेस के मंत्रिमंडल हट गए, 1940–41 में व्यक्तिगत सत्याग्रह में उसके नेता जेल गए और अगस्त 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के बाद लगभग सभी बड़े नेता 1944–45 तक जेल में रहे। इस लंबे समय में राजनीति का खुला मैदान लीग के पास रहा।
◆ अंग्रेज़ों का "वीटो" देना — अगस्त प्रस्ताव (8 अगस्त 1940) में वायसराय लिनलिथगो ने कहा कि ऐसी किसी सरकार को सत्ता नहीं सौंपी जाएगी, जिसे भारत के बड़े और शक्तिशाली वर्ग न मानें। इसका अर्थ था कि लीग की सहमति के बिना कोई संविधान नहीं बनेगा। फिर क्रिप्स प्रस्ताव (मार्च 1942) में कहा गया कि जो प्रांत नए संघ में शामिल न होना चाहें, वे अलग रह सकते हैं और अपना अलग संविधान बना सकते हैं। यह पहली बार था जब अंग्रेज़ों ने भारत के विभाजन की संभावना को आधिकारिक रूप से स्वीकार किया (विस्तार अध्याय 13 में)।
◆ प्रांतों में लीग की सरकारें — कांग्रेस की अनुपस्थिति में 1943 तक सिंध, बंगाल (ख़्वाजा नज़ीमुद्दीन), असम (सर सैयद मोहम्मद सादुल्ला) और पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत (सरदार औरंगज़ेब ख़ाँ) में लीग या लीग-समर्थित मंत्रिमंडल बन गए। सत्ता में आने से लीग को संसाधन, संरक्षण और प्रभाव मिला।
◆ संगठन और प्रचार — लीग ने गाँव-गाँव तक अपनी शाखाएँ बनाईं, छात्रों (मुस्लिम छात्र संघ) और धार्मिक नेताओं (पीरों और उलेमा) को साथ लिया और "इस्लाम ख़तरे में है" जैसे नारों से भावनाएँ जगाईं। 23 मार्च 1943 को पूरे देश में "पाकिस्तान दिवस" मनाया गया। "पाकिस्तान" शब्द हर वर्ग के लिए अलग सपना बन गया — किसान के लिए ज़मींदारों और साहूकारों से मुक्ति, व्यापारी के लिए प्रतिस्पर्धा से छुटकारा, और नौकरी चाहने वालों के लिए अवसर।
चक्रवर्ती राजगोपालाचारी (1878–1972), जिन्हें "राजाजी" या "सी. आर." कहा जाता है, तमिलनाडु (तब मद्रास प्रेसीडेंसी) के सेलम ज़िले के थोरापल्ली गाँव में जन्मे थे। वे सफल वकील थे और गांधीजी के निकटतम सहयोगियों में गिने जाते थे। 1930 में उन्होंने वेदारण्यम में नमक सत्याग्रह का नेतृत्व किया और 1937–39 में मद्रास के प्रधानमंत्री रहे। स्वतंत्रता के बाद वे पश्चिम बंगाल के राज्यपाल, भारत के पहले और अंतिम भारतीय गवर्नर जनरल (1948–50), केंद्रीय गृह मंत्री और मद्रास के मुख्यमंत्री बने; 1954 में उन्हें पहला भारत रत्न पाने वालों में शामिल किया गया और 1959 में उन्होंने स्वतंत्र पार्टी बनाई।
◆ मद्रास प्रस्ताव (अप्रैल 1942) — क्रिप्स मिशन की विफलता के बाद राजाजी का मानना था कि अंग्रेज़ कांग्रेस-लीग मतभेद का बहाना बनाकर सत्ता सौंपने से बच रहे हैं। इसलिए उन्होंने मद्रास कांग्रेस विधायक दल से प्रस्ताव पास कराया कि कांग्रेस लीग से समझौता करे और अलगाव (पाकिस्तान) की माँग को सिद्धांततः मान ले। अखिल भारतीय कांग्रेस समिति ने इलाहाबाद बैठक में इसे ठुकरा दिया, तो राजाजी ने कांग्रेस से अलग होकर अपने विचार का प्रचार किया।
◆ पृष्ठभूमि — 1944 तक देश में गतिरोध था — कांग्रेस के नेता जेल में थे, लीग पाकिस्तान पर अड़ी थी और अंग्रेज़ इसी मतभेद को आधार बनाकर सत्ता हस्तांतरण टाल रहे थे। राजाजी ने इस गतिरोध को तोड़ने के लिए एक समझौता-सूत्र तैयार किया। गांधीजी ने इसे अपनी सहमति दी और जुलाई 1944 में यह सार्वजनिक हुआ।
फ़ॉर्मूले के छह प्रावधान और उनका अर्थ इस प्रकार था:
1. मुस्लिम लीग कांग्रेस की स्वतंत्रता की माँग का समर्थन करे। यानी पहले दोनों दल मिलकर अंग्रेज़ों से आज़ादी माँगें — आपसी झगड़ा बाद में।
2. लीग अंतरिम काल के लिए केंद्र में अस्थायी (अंतरिम) सरकार बनाने में कांग्रेस का सहयोग करे। यानी युद्ध के बचे समय में दोनों मिलकर सरकार चलाएँ।
3. युद्ध के बाद एक आयोग पश्चिमोत्तर और पूर्वोत्तर भारत के उन लगे हुए ज़िलों को चिह्नित करे, जहाँ मुसलमान पूर्ण बहुमत में हैं। वहाँ सभी वयस्क निवासियों — केवल मुसलमान नहीं — का जनमत संग्रह हो कि वे भारत से अलग होना चाहते हैं या नहीं। यह फ़ॉर्मूले का सबसे महत्त्वपूर्ण बिंदु था, क्योंकि इसमें कांग्रेस की ओर से पहली बार अलगाव की संभावना को माना गया — पर पूरे प्रांतों के नहीं, केवल मुस्लिम बहुल ज़िलों के।
4. जनमत संग्रह से पहले सभी दलों को अपना-अपना पक्ष रखने और प्रचार करने की छूट हो।
5. यदि अलगाव हो, तो रक्षा, वाणिज्य, संचार और अन्य आवश्यक विषयों के लिए दोनों देशों के बीच साझा समझौते किए जाएँ। यानी अलग होने पर भी दोनों पूरी तरह पराए न हों।
6. ये सभी शर्तें तभी लागू होंगी, जब ब्रिटेन भारत को पूर्ण सत्ता सौंप दे।
🔍 आसान परिभाषा: जनमत संग्रह |
📘 परिभाषा: किसी महत्त्वपूर्ण राजनीतिक प्रश्न — जैसे किसी क्षेत्र का किस देश में जाना — पर उस क्षेत्र के मतदाताओं से सीधे "हाँ या ना" में मत लेकर निर्णय करना। |
💡 आसान भाषा में: नेता या विधायक नहीं, सीधे जनता तय करती है। जैसे किसी गाँव से पूछा जाए — "आप इस ज़िले में रहना चाहते हैं या उस ज़िले में?" और बहुमत जो कहे, वही हो। 🏠 उदाहरण: सी. आर. फ़ॉर्मूले ने मुस्लिम बहुल ज़िलों में सभी वयस्कों का जनमत संग्रह सुझाया; 1947 में पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत और असम के सिलहट ज़िले में सचमुच जनमत संग्रह हुए (खंड 10)। |
📖 कहानी 1: जब गांधीजी स्वयं जिन्ना के दरवाज़े पहुँचे 1944 में देश में गतिरोध था। कांग्रेस के नेता जेल में थे, लीग पाकिस्तान पर अड़ी थी और अंग्रेज़ इसी मतभेद के सहारे सत्ता सौंपना टाल रहे थे। राजाजी ने गतिरोध तोड़ने के लिए एक फ़ॉर्मूला बनाया, जिसमें मुस्लिम बहुल ज़िलों में सभी वयस्कों के जनमत संग्रह की बात थी, यानी कांग्रेस की ओर से पहली बार अलगाव की संभावना मानी गई थी। गांधीजी ने इसे अपनी सहमति दी। स्वास्थ्य ख़राब होने के कारण 6 मई 1944 को जेल से रिहा हुए गांधीजी ने जिन्ना को पत्र लिखकर इसी फ़ॉर्मूले पर बातचीत का प्रस्ताव रखा। 9 से 27 सितंबर 1944 तक लगभग तीन सप्ताह वार्ता चली। वह बम्बई के मालाबार हिल पर जिन्ना के निवास पर हुई, यानी देश का सबसे बड़ा नेता स्वयं चलकर उनके घर गया। गांधीजी ने साफ़ कहा कि वे केवल व्यक्तिगत रूप से बात कर रहे हैं। जिन्ना ने फ़ॉर्मूले को "कटा-छँटा, कीड़ों का खाया हुआ पाकिस्तान" कहकर ठुकरा दिया। उनकी माँग थी कि कांग्रेस पहले द्वि-राष्ट्र सिद्धांत स्वीकार करे, जनमत संग्रह में केवल मुसलमान मत दें, और पाकिस्तान को पूरे छह प्रांत मिलें। गांधीजी ने कहा कि वे धर्म के आधार पर दो राष्ट्र नहीं मान सकते, केवल एक ही परिवार के दो भाइयों के बँटवारे जैसी व्यवस्था मान सकते हैं, जिसमें कुछ चीज़ें साझी रहें। वार्ता विफल रही। पर इसका एक बड़ा असर यह हुआ कि गांधीजी जैसे नेता के स्वयं जिन्ना के घर जाने से जिन्ना का महत्त्व और बढ़ गया। उन्हें मुसलमानों के सबसे बड़े नेता के रूप में मान्यता मिल गई, और आलोचकों ने कहा कि इससे पाकिस्तान की माँग को भी अप्रत्यक्ष मान्यता मिल गई। 🧭 इस कहानी से कौन-सी अवधारणा साफ़ हुई ✔ सी. आर. फ़ॉर्मूले का सार — पहले आज़ादी की साझा माँग, फिर मुस्लिम बहुल ज़िलों में सभी वयस्कों का जनमत संग्रह, और अलगाव हो तो भी रक्षा, संचार जैसे विषयों पर साझा समझौते। ✔ द्वि-राष्ट्र सिद्धांत बनाम साझा परिवार — जिन्ना धर्म के आधार पर दो राष्ट्र चाहते थे, जबकि गांधीजी अधिक से अधिक एक परिवार के दो भाइयों जैसा बँटवारा मान सकते थे। यही मूल मतभेद था। ✔ वार्ता की विफलता का परिणाम — बातचीत टूट गई, पर जिन्ना की स्थिति मज़बूत हुई। इससे समझ में आता है कि लीग की माँग 1944 के बाद क्यों और भारी होती गई। 📝 परीक्षा के लिए: गांधी-जिन्ना वार्ता: 9–27 सितंबर 1944, मालाबार हिल (बम्बई), सी. आर. फ़ॉर्मूले पर आधारित; जिन्ना की आपत्तियाँ: द्वि-राष्ट्र सिद्धांत पहले, केवल मुसलमानों का मत, पूरे छह प्रांत, "कटा-छँटा पाकिस्तान" अस्वीकार; वार्ता विफल, जिन्ना का महत्त्व बढ़ा। |
◆ पृष्ठभूमि — गांधीजी को स्वास्थ्य ख़राब होने के कारण 6 मई 1944 को जेल से रिहा किया गया। रिहाई के बाद उन्होंने गतिरोध तोड़ने के लिए जिन्ना को पत्र लिखा और सी. आर. फ़ॉर्मूले को आधार बनाकर बातचीत का प्रस्ताव रखा।
◆ कब, कहाँ और कैसे — वार्ता 9 से 27 सितंबर 1944 तक बम्बई के मालाबार हिल पर जिन्ना के निवास पर चली। लगभग तीन सप्ताह तक अनेक बैठकें हुईं और दोनों के बीच पत्रों का आदान-प्रदान भी हुआ। गांधीजी ने स्पष्ट किया कि वे व्यक्तिगत रूप से बात कर रहे हैं, कांग्रेस के प्रतिनिधि के रूप में नहीं।
◆ जिन्ना की आपत्तियाँ — जिन्ना ने फ़ॉर्मूले को "कटा-छँटा, कीड़ों का खाया हुआ पाकिस्तान" कहकर ठुकरा दिया। उनकी मुख्य आपत्तियाँ ये थीं: (1) कांग्रेस पहले द्वि-राष्ट्र सिद्धांत को स्वीकार करे; (2) जनमत संग्रह में केवल मुसलमान मत दें, सभी निवासी नहीं — क्योंकि लीग मुसलमानों की एकमात्र प्रतिनिधि है; (3) पाकिस्तान में पूरे छह प्रांत — पंजाब, बंगाल, असम, सिंध, सीमा प्रांत और बलूचिस्तान — शामिल हों, केवल मुस्लिम बहुल ज़िले नहीं; (4) पहले विभाजन हो, फिर स्वतंत्रता — और अलग होने के बाद रक्षा-वाणिज्य जैसे साझे विषय स्वीकार नहीं।
◆ गांधीजी का पक्ष — गांधीजी ने कहा कि वे धर्म के आधार पर दो राष्ट्रों के सिद्धांत को नहीं मान सकते; वे अधिक से अधिक एक ही परिवार के दो भाइयों के बँटवारे जैसी व्यवस्था मान सकते हैं, जिसमें कुछ चीज़ें साझी रहें। बाद में उन्होंने कहा कि वार्ता इसलिए विफल हुई क्योंकि दोनों की सोच मूल रूप से अलग थी।
◆ परिणाम और महत्त्व — वार्ता विफल रही। पर इसका एक बड़ा प्रभाव यह हुआ कि गांधीजी जैसे सर्वोच्च नेता के स्वयं जिन्ना के घर जाकर बात करने से जिन्ना का महत्त्व और बढ़ गया — उन्हें मुसलमानों के सबसे बड़े नेता के रूप में मान्यता मिल गई। आलोचकों ने कहा कि इससे पाकिस्तान की माँग को भी अप्रत्यक्ष मान्यता मिल गई।
🤝 गांधी-जिन्ना वार्ता — सार ✔ 6 मई 1944 को रिहाई के बाद गांधीजी ने सी. आर. फ़ॉर्मूले के आधार पर बातचीत शुरू की। ✔ वार्ता 9–27 सितंबर 1944 को मालाबार हिल (बम्बई) में जिन्ना के निवास पर हुई। ✔ गांधीजी ने स्वयं को एक व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत किया, कांग्रेस के प्रतिनिधि के रूप में नहीं। ✔ वार्ता विफल रही, पर इससे जिन्ना का महत्त्व और बढ़ा। | ❌ जिन्ना की आपत्तियाँ — सार ✔ कांग्रेस पहले द्वि-राष्ट्र सिद्धांत को माने। ✔ जनमत संग्रह में केवल मुसलमान मत दें, सभी निवासी नहीं। ✔ पूरे छह प्रांत चाहिए; "कटा-छँटा पाकिस्तान" स्वीकार नहीं। ✔ पहले विभाजन हो, फिर स्वतंत्रता; साझे विषय मंज़ूर नहीं। |
◆ कौन — केंद्रीय विधानसभा में कांग्रेस दल के नेता भूलाभाई देसाई (जो आगे आई.एन.ए. मुक़दमे में बचाव पक्ष के प्रमुख वकील बने) और मुस्लिम लीग के उपनेता लियाक़त अली ख़ाँ के बीच यह अनौपचारिक समझ बनी।
◆ क्या तय हुआ — केंद्र में एक अंतरिम सरकार बने, जिसमें कांग्रेस और लीग दोनों के बराबर (40–40%) सदस्य हों और शेष 20% सदस्य अन्य अल्पसंख्यकों (जैसे अनुसूचित जातियों और सिखों) से हों। यह सरकार 1935 के अधिनियम के ढाँचे में ही काम करे।
◆ परिणाम और महत्त्व — दोनों दलों ने इसे आधिकारिक रूप से स्वीकार नहीं किया और भूलाभाई देसाई की अपने दल में आलोचना भी हुई। फिर भी आगे की वेवेल योजना में कांग्रेस-लीग (या सवर्ण हिंदू-मुसलमान) की "बराबरी" (पैरिटी) का विचार यहीं से आया।
लॉर्ड आर्चीबाल्ड वेवेल एक फ़ील्ड मार्शल थे। युद्ध के दौरान वे भारत में प्रधान सेनापति (1941–43) रहे और अक्टूबर 1943 में लिनलिथगो के स्थान पर वायसराय बने। उन्होंने आते ही बंगाल के अकाल (1943) में सेना लगाकर राहत पहुँचाई। 1945 की शुरुआत तक यूरोप में युद्ध समाप्ति की ओर था और मई 1945 में जर्मनी ने आत्मसमर्पण कर दिया। वेवेल समझ गए थे कि युद्ध के बाद भारतीयों को सत्ता सौंपने का प्रश्न टाला नहीं जा सकेगा, और ब्रिटेन में होने वाले चुनावों से पहले कुछ पहल ज़रूरी है। इसलिए मार्च 1945 में वे लंदन गए और ब्रिटिश सरकार से योजना स्वीकृत कराकर लौटे। 14 जून 1945 को उन्होंने रेडियो पर योजना की घोषणा की और अगले दिन कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्यों को जेल से रिहा कर दिया गया।
◆ कार्यकारी परिषद का भारतीयकरण — नया संविधान बनने तक वायसराय की कार्यकारी परिषद (जो वस्तुतः केंद्र का मंत्रिमंडल थी) का पुनर्गठन होगा। इसमें वायसराय और प्रधान सेनापति को छोड़कर सभी सदस्य भारतीय होंगे।
◆ बराबरी का सिद्धांत — परिषद में सवर्ण हिंदुओं और मुसलमानों के सदस्यों की संख्या बराबर होगी। इसके अलावा अनुसूचित जातियों और सिखों का भी प्रतिनिधित्व होगा। ध्यान दें — उस समय मुसलमान कुल जनसंख्या का लगभग एक-चौथाई थे, पर उन्हें सवर्ण हिंदुओं के बराबर सीटें दी जा रही थीं।
◆ विभाग — रक्षा को छोड़कर (जो प्रधान सेनापति के पास रहता) सभी विभाग भारतीय सदस्यों को मिलेंगे। विदेश मामले भी पहली बार किसी भारतीय सदस्य को सौंपे जाएँगे।
◆ वायसराय का वीटो — वायसराय के पास निषेधाधिकार (वीटो) बना रहेगा, पर उसका प्रयोग बहुत कम किया जाएगा।
◆ अंतरिम व्यवस्था और प्रांत — यह पूरी व्यवस्था अंतरिम थी, यानी नया संविधान बनने तक के लिए; संविधान के प्रश्न पर यह योजना कुछ नहीं कहती थी। साथ ही, जिन प्रांतों में 1939 से गवर्नर का शासन था, वहाँ फिर से लोकप्रिय (दलों के गठबंधन वाले) मंत्रिमंडल बनने की आशा जताई गई।
◆ सदस्य कैसे चुने जाएँ — इसके लिए वायसराय विभिन्न दलों और वर्गों के नेताओं का एक सम्मेलन बुलाएँगे, जिसमें नेता परिषद के लिए नामों की संयुक्त या अलग-अलग सूचियाँ देंगे। यही शिमला सम्मेलन था।
◆ कौन आए — वेवेल ने कांग्रेस, मुस्लिम लीग, प्रांतों के प्रधानमंत्रियों (और पूर्व प्रधानमंत्रियों), अनुसूचित जातियों और सिखों के कुल 21 नेताओं को शिमला बुलाया। कांग्रेस का नेतृत्व उसके अध्यक्ष मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने किया। गांधीजी शिमला में उपस्थित रहे, पर औपचारिक सदस्य के रूप में नहीं।
◆ गतिरोध कहाँ हुआ — परिषद के सदस्यों के नाम कौन तय करे, इस पर टकराव हुआ। जिन्ना की माँग थी कि परिषद के सभी मुस्लिम सदस्य केवल लीग नामित करे। इसके अलावा उन्होंने चाहा कि मुसलमानों से जुड़े किसी निर्णय का यदि मुस्लिम सदस्य विरोध करें, तो वह निर्णय केवल दो-तिहाई बहुमत से ही हो सके — यानी एक तरह का सांप्रदायिक वीटो।
◆ कांग्रेस का तर्क — कांग्रेस स्वयं को सभी धर्मों का राष्ट्रीय दल मानती थी। उसका अध्यक्ष स्वयं एक मुसलमान (आज़ाद) था। इसलिए वह अपने कोटे से मुस्लिम सदस्य (जैसे आज़ाद) भी नामित करना चाहती थी। जिन्ना की बात मानने का अर्थ होता — कांग्रेस को "केवल हिंदुओं का दल" मान लेना।
◆ पंजाब का प्रश्न — पंजाब के यूनियनिस्ट प्रधानमंत्री ख़िज़्र हयात ख़ाँ टिवाणा भी चाहते थे कि पंजाब के ग़ैर-लीगी मुसलमानों को एक सीट मिले। जिन्ना इसके भी विरुद्ध थे।
◆ विफलता — 14 जुलाई 1945 को वेवेल ने सम्मेलन को विफल घोषित किया और विफलता की ज़िम्मेदारी स्वयं ली। उन्होंने लीग के बिना परिषद बनाने से इनकार कर दिया।
🔍 शिमला सम्मेलन का महत्त्व वेवेल ने लीग के बिना आगे बढ़ने से इनकार करके जिन्ना को वस्तुतः वीटो दे दिया — संदेश यह गया कि लीग की सहमति के बिना कोई समाधान नहीं होगा। इसलिए कई इतिहासकार शिमला सम्मेलन को विभाजन की दिशा में एक निर्णायक मोड़ मानते हैं। इससे लीग की स्थिति बहुत मज़बूत हुई और यूनियनिस्ट जैसे ग़ैर-लीगी मुस्लिम दल कमज़ोर हुए — मुसलमान मतदाताओं को लगा कि सत्ता में हिस्सा पाने का एकमात्र रास्ता लीग है। यही प्रभाव कुछ महीने बाद 1945–46 के चुनाव परिणामों में दिखा। |
पहलू | क्या कहा गया |
कार्यकारी परिषद | वायसराय और प्रधान सेनापति को छोड़कर परिषद के सभी सदस्य भारतीय होंगे। |
बराबरी | सवर्ण हिंदुओं और मुसलमानों के सदस्य बराबर होंगे; अनुसूचित जातियों और सिखों को भी स्थान मिलेगा। |
विभाग | रक्षा को छोड़कर सभी विभाग भारतीयों को मिलेंगे और विदेश मामले पहली बार एक भारतीय सदस्य को सौंपे जाएँगे। |
वीटो | वायसराय का वीटो बना रहेगा, पर उसका प्रयोग बहुत कम किया जाएगा। |
शिमला में टकराव | जिन्ना ने सभी मुस्लिम सदस्यों को केवल लीग द्वारा नामित करने की ज़िद की, जिसे कांग्रेस ने नहीं माना। |
परिणाम | 14 जुलाई 1945 को सम्मेलन विफल घोषित हुआ और लीग को वस्तुतः वीटो मिल गया। |
26 जुलाई 1945 को ब्रिटेन के चुनाव परिणाम आए और चर्चिल की कंज़र्वेटिव पार्टी हारकर सत्ता से बाहर हो गई। क्लीमेंट एटली के नेतृत्व में लेबर पार्टी की सरकार बनी, जो भारत की स्वतंत्रता के प्रति अधिक सहानुभूति रखती थी। अगस्त 1945 में जापान के आत्मसमर्पण के साथ दूसरा विश्व युद्ध समाप्त हुआ। अब ब्रिटेन की भारत नीति बदलने के कई कारण थे:
◆ विश्व शक्ति-संतुलन में बदलाव — युद्ध के बाद ब्रिटेन पहले जैसी महाशक्ति नहीं रहा; अमेरिका और सोवियत संघ नई महाशक्तियाँ बने और दोनों उपनिवेशवाद के विरुद्ध थे तथा भारत की स्वतंत्रता के समर्थक थे।
◆ आर्थिक थकान — युद्ध ने ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था को बहुत कमज़ोर कर दिया था और वह अमेरिका के कर्ज़ पर निर्भर हो गया था। उलटे, युद्ध के दौरान भारत ब्रिटेन का कर्ज़दार नहीं, लेनदार (स्टर्लिंग शेष के रूप में) बन गया था। इसलिए भारत पर शासन अब "लाभ का सौदा" नहीं रह गया था। ब्रिटिश सैनिक भी युद्ध से थककर घर लौटना चाहते थे।
◆ जन-उभार का डर — 1942 जैसे विद्रोह के फिर से भड़कने का डर था। 1945–46 की सर्दियों में तीन बड़े जन-उभार हुए — नवंबर 1945 में आई.एन.ए. के अधिकारियों (शाहनवाज़ ख़ाँ, प्रेम सहगल, गुरबख़्श सिंह ढिल्लों) पर लाल क़िले में चले मुक़दमे के विरोध में, फ़रवरी 1946 में कलकत्ता में आई.एन.ए. के एक अधिकारी को सज़ा दिए जाने पर, और 18 फ़रवरी 1946 को बम्बई से शुरू हुआ शाही भारतीय नौसेना का विद्रोह। इनसे अंग्रेज़ समझ गए कि अब भारतीय सेना और पुलिस पर भी पूरा भरोसा नहीं किया जा सकता (विस्तार अध्याय 13 में)।
◆ चुनाव की अनिवार्यता — केंद्रीय विधानसभा का पिछला चुनाव 1934 में और प्रांतीय विधानसभाओं का 1937 में हुआ था। युद्ध के कारण चुनाव टलते रहे थे; अब नई विधानसभाओं के बिना कोई संवैधानिक क़दम उठाना संभव नहीं था। इसलिए दिसंबर 1945 में केंद्रीय विधानसभा और 1946 की शुरुआत में प्रांतीय विधानसभाओं के चुनाव हुए।
◆ कांग्रेस — कांग्रेस ने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के बलिदान, सरकार के दमन और आई.एन.ए. के सैनिकों के बचाव को मुख्य मुद्दा बनाया। नेहरू, भूलाभाई देसाई और तेज बहादुर सप्रू ने लाल क़िले के मुक़दमे में बचाव किया, जिससे कांग्रेस को भारी जन-समर्थन मिला।
◆ मुस्लिम लीग — लीग ने "पाकिस्तान" को अपना एकमात्र मुद्दा बनाया और कहा कि लीग को दिया गया हर वोट पाकिस्तान के लिए वोट है। उसने धार्मिक नेताओं — पीरों और उलेमा — का सहारा लिया, मस्जिदों से प्रचार कराया और मुस्लिम छात्रों को गाँवों में भेजा। इस तरह यह चुनाव वस्तुतः पाकिस्तान पर जनमत संग्रह बन गया।
◆ केंद्रीय विधानसभा (102 निर्वाचित सीटें) — कांग्रेस ने 57 सीटें जीतीं और उसे ग़ैर-मुस्लिम मतों का लगभग 91% मिला। मुस्लिम लीग ने सभी 30 मुस्लिम आरक्षित सीटें जीत लीं और उसे मुस्लिम मतों का लगभग 86.6% मिला। यानी एक ओर कांग्रेस ग़ैर-मुस्लिमों की लगभग एकमात्र प्रतिनिधि थी, तो दूसरी ओर लीग मुसलमानों की।
◆ प्रांतीय विधानसभाएँ — कुल लगभग 1,585 सीटों में से कांग्रेस ने 923 जीतीं। लीग ने 492 मुस्लिम सीटों में से लगभग 425 जीतीं — जबकि 1937 में उसने केवल 109 जीती थीं। यह लीग के उभार का सबसे बड़ा प्रमाण था।
◆ कांग्रेस की सरकारें (8 प्रांत) — कुल 11 प्रांतों में से कांग्रेस ने 8 में सरकार बनाई — मद्रास, बम्बई, संयुक्त प्रांत, बिहार, मध्य प्रांत, उड़ीसा, असम (मुख्यमंत्री गोपीनाथ बरदलै) और पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत (मुख्यमंत्री डॉ. ख़ान साहब, जो ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ाँ के बड़े भाई थे)। ध्यान दें कि असम और सीमा प्रांत — दोनों पर लीग पाकिस्तान के लिए दावा करती थी, पर वहाँ कांग्रेस जीती।
◆ लीग की सरकारें (2 प्रांत) — बंगाल में हुसैन शहीद सुहरावर्दी और सिंध में सर ग़ुलाम हुसैन हिदायतुल्ला के नेतृत्व में लीग की सरकारें बनीं।
◆ पंजाब — विशेष स्थिति — पंजाब में लीग 175 में से 75 सीटें जीतकर सबसे बड़ा दल बनी, फिर भी सरकार से बाहर रही। यूनियनिस्ट पार्टी, कांग्रेस और अकाली दल के गठबंधन ने ख़िज़्र हयात ख़ाँ टिवाणा के नेतृत्व में सरकार बनाई (मार्च 1946 से मार्च 1947)। लीग ने इसे अपने साथ अन्याय बताया और आगे इस सरकार को गिराने के लिए आंदोलन चलाया।
⚠️ चुनाव परिणामों को सही संदर्भ में समझें सीमित मताधिकार — प्रांतों में लगभग 10% और केंद्र में 1% से भी कम लोगों को वोट का अधिकार था (संपत्ति और शिक्षा की शर्तों के कारण)। यानी यह पूरी जनता का नहीं, एक छोटे वर्ग का मत था। पृथक निर्वाचन — मुसलमान केवल मुस्लिम उम्मीदवारों को ही चुन सकते थे, इसलिए चुनाव स्वभावतः सांप्रदायिक हो गया। इसके बावजूद 1937 के विपरीत अब लीग मुसलमानों की प्रमुख पार्टी बनकर उभरी — और यही जिन्ना का सबसे बड़ा तर्क बना कि "लीग ही मुसलमानों की एकमात्र प्रतिनिधि है।" |
स्तर | कांग्रेस | मुस्लिम लीग |
केंद्रीय विधानसभा | कांग्रेस ने 102 में से 57 सीटें और ग़ैर-मुस्लिम मतों का लगभग 91% पाया। | लीग ने सभी 30 मुस्लिम सीटें और मुस्लिम मतों का लगभग 86.6% पाया। |
प्रांतीय विधानसभाएँ | कांग्रेस ने लगभग 1,585 में से 923 सीटें जीतीं। | लीग ने 492 मुस्लिम सीटों में से लगभग 425 जीतीं। |
सरकारें | कांग्रेस ने असम और सीमा प्रांत सहित 8 प्रांतों में सरकार बनाई। | लीग ने बंगाल और सिंध में सरकार बनाई; पंजाब में सबसे बड़ा दल होकर भी वह बाहर रही। |
चुनावों के बाद साफ़ हो गया था कि कांग्रेस और लीग दोनों अपने-अपने समुदायों में शक्तिशाली हैं और किसी एक के बिना समाधान संभव नहीं। नौसेना विद्रोह ने अंग्रेज़ों को और चिंतित कर दिया। इसलिए विद्रोह के दूसरे दिन, 19 फ़रवरी 1946 को, एटली सरकार ने घोषणा की कि ब्रिटिश मंत्रिमंडल के तीन मंत्रियों का एक विशेष दल भारत जाएगा, जो भारतीय नेताओं से बात करके सत्ता हस्तांतरण और संविधान निर्माण का रास्ता निकालेगा। मंत्रिमंडल के सदस्य होने के कारण इसे "कैबिनेट मिशन" कहा गया। 15 मार्च 1946 को एटली ने हाउस ऑफ़ कॉमन्स में यह भी कहा कि कोई अल्पसंख्यक बहुसंख्यकों की प्रगति पर वीटो नहीं लगा सकेगा — यह ब्रिटिश नीति में एक महत्त्वपूर्ण बदलाव था।
◆ लॉर्ड पेथिक-लॉरेंस (अध्यक्ष) — वे उस समय भारत सचिव थे। वे लंबे समय से भारतीय स्वतंत्रता के प्रति सहानुभूति रखने वाले लेबर नेता थे।
◆ सर स्टैफ़र्ड क्रिप्स — वे बोर्ड ऑफ़ ट्रेड के अध्यक्ष (व्यापार मंत्री) थे। 1942 में क्रिप्स मिशन लेकर वे भारत आ चुके थे, इसलिए भारतीय नेताओं से परिचित थे। मिशन में समझौते की अधिकतर बातचीत उन्होंने ही चलाई।
◆ ए. वी. अलेक्ज़ेंडर — वे फ़र्स्ट लॉर्ड ऑफ़ द एडमिरल्टी, यानी नौसेना मंत्री थे।
मिशन 24 मार्च 1946 को दिल्ली पहुँचा। उसने वायसराय वेवेल के साथ मिलकर लगभग सभी दलों के नेताओं से बात की। 5 से 12 मई 1946 तक शिमला में कांग्रेस और लीग के नेताओं के साथ दूसरा शिमला सम्मेलन हुआ, पर दोनों में सहमति नहीं बनी। तब मिशन ने 16 मई 1946 को अपनी योजना स्वयं घोषित कर दी।
मिशन ने लीग की पूर्ण पाकिस्तान की माँग पर गंभीरता से विचार किया, पर उसे चार कारणों से अस्वीकार कर दिया:
1. अल्पसंख्यक समस्या हल नहीं होती — लीग के दावे वाले पूरे छह प्रांतों का पाकिस्तान बनता, तो उसमें भी बहुत बड़ी ग़ैर-मुस्लिम आबादी रहती — पश्चिमोत्तर भाग में लगभग 38% और पूर्वी भाग में लगभग 48%। यानी जिस समस्या (अल्पसंख्यकों की सुरक्षा) के समाधान के लिए पाकिस्तान माँगा जा रहा था, वही समस्या नए देश में उलटी होकर फिर खड़ी हो जाती।
2. छोटा पाकिस्तान किसी को स्वीकार नहीं — यदि पंजाब और बंगाल को बाँटकर केवल मुस्लिम बहुल ज़िलों का "छोटा पाकिस्तान" बनाया जाता, तो वह न आर्थिक रूप से व्यवहार्य होता, न लीग को स्वीकार होता। साथ ही दोनों प्रांतों की साझी भाषा, संस्कृति और परंपरा भी बँट जाती — जैसे पंजाब का सिख समुदाय दो देशों में बँट जाता।
3. प्रशासनिक और सैन्य कठिनाई — सेना, रेल, डाक-तार, सिंचाई की नहरें जैसी पूरे देश में फैली एकीकृत व्यवस्थाओं का विभाजन दोनों देशों को कमज़ोर करता। पाकिस्तान के दोनों भाग लगभग 1,100 किमी (700 मील) दूर होते और युद्ध या शांति — दोनों में उनका आपसी संपर्क भारत की सद्भावना पर निर्भर रहता।
4. रियासतों की कठिनाई — सैकड़ों रियासतों के लिए भी दो देशों में से किसी एक में जाना कठिन होता, क्योंकि कई रियासतें भौगोलिक रूप से बीच में फँसी थीं।
◆ एक भारतीय संघ — ब्रिटिश भारत और रियासतों को मिलाकर एक संघ (यूनियन) बनेगा। संघ (केंद्र) के पास केवल तीन विषय होंगे — विदेश मामले, रक्षा और संचार — और इन विषयों के लिए धन जुटाने की शक्ति। संघ की अपनी कार्यपालिका और विधानमंडल होगा, जिसमें ब्रिटिश भारत और रियासतों दोनों के प्रतिनिधि होंगे।
◆ सांप्रदायिक प्रश्नों पर विशेष नियम — केंद्रीय विधानमंडल में यदि कोई बड़ा सांप्रदायिक प्रश्न उठे, तो उस पर निर्णय तभी होगा जब दोनों प्रमुख समुदायों (हिंदू और मुसलमान) के उपस्थित और मत देने वाले प्रतिनिधियों का अलग-अलग बहुमत उसके पक्ष में हो। यह मुसलमानों को केंद्र में दबाए जाने के डर से बचाने का उपाय था।
◆ प्रांतों के पास शेष सब — संघ के विषयों को छोड़कर शेष सभी विषय और सभी अवशिष्ट शक्तियाँ (जो किसी सूची में न हों) प्रांतों के पास रहेंगी। रियासतों के पास भी संघ को सौंपे विषयों के अलावा सारी शक्तियाँ रहेंगी।
◆ प्रांतों के तीन समूह — प्रांत आपस में मिलकर समूह बना सकेंगे, जिनकी अपनी कार्यपालिका और विधानमंडल हो सकती है और जो तय करेंगे कि कौन-से प्रांतीय विषय पूरे समूह के लिए साझे होंगे। संविधान सभा में प्रांतों को तीन वर्गों (क, ख, ग) में बाँटा गया (विस्तार आगे खंड 6.5 में)।
◆ संविधान सभा — संविधान बनाने के लिए एक संविधान सभा बनेगी, जिसके सदस्य प्रांतीय विधानसभाओं द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से चुने जाएँगे — लगभग 10 लाख जनसंख्या पर एक सदस्य। हर प्रांत की सीटें उसके तीन समुदायों — सामान्य, मुस्लिम और सिख (सिख केवल पंजाब में) — में जनसंख्या के अनुपात में बाँटी जाएँगी, और हर समुदाय के विधायक अपने समुदाय के सदस्य चुनेंगे। कुल 389 सदस्य होंगे — ब्रिटिश भारत के 296 (11 प्रांतों के 292 और 4 चीफ़ कमिश्नर प्रांतों के 4) और रियासतों के अधिकतम 93।
◆ संविधान बनाने की प्रक्रिया — संविधान सभा पहले एक साथ बैठकर अध्यक्ष चुनेगी और नियम बनाएगी। फिर वह तीन वर्गों (क, ख, ग) में बँटकर अलग-अलग बैठेगी — हर वर्ग अपने प्रांतों का संविधान बनाएगा और तय करेगा कि समूह का संविधान बने या नहीं। अंत में सभी वर्ग फिर एक साथ बैठकर संघ का संविधान बनाएँगे।
◆ बाहर निकलने और पुनर्विचार का अधिकार — नए संविधान के अंतर्गत पहले आम चुनाव के बाद कोई भी प्रांत अपनी विधानसभा के निर्णय से अपने समूह से बाहर निकल सकेगा। साथ ही, 10 वर्ष बाद (और फिर हर दस वर्ष पर) कोई भी प्रांत संविधान पर पुनर्विचार की माँग कर सकेगा।
◆ अंतरिम सरकार — संविधान बनने तक प्रमुख दलों के प्रतिनिधियों से तुरंत एक अंतरिम सरकार बनेगी, जिसमें युद्ध विभाग सहित सभी विभाग भारतीयों के पास होंगे।
◆ रियासतें — स्वतंत्रता के बाद रियासतों पर अंग्रेज़ी सर्वोच्चता न भारत सरकार को मिलेगी, न ब्रिटेन के पास रहेगी — यह समाप्त हो जाएगी। रियासतें संघ के साथ बातचीत करके अपनी स्थिति तय करेंगी।
🔍 आसान परिभाषा: समूहीकरण |
📘 परिभाषा: कैबिनेट मिशन योजना में प्रांतों को तीन समूहों में संगठित करने की व्यवस्था, जिसमें केंद्र और प्रांत के बीच एक बीच का स्तर (समूह) बनता — यानी केंद्र, समूह और प्रांत का त्रिस्तरीय ढाँचा। |
💡 आसान भाषा में: जैसे किसी विद्यालय में प्रधानाचार्य (केंद्र) और कक्षाओं (प्रांत) के बीच "सदन" (हाउस) बना दिए जाएँ, और कुछ मामलों के नियम पूरा सदन मिलकर बनाए। यदि किसी कक्षा को ज़बरदस्ती ऐसे सदन में डाल दिया जाए जहाँ दूसरी कक्षाएँ बहुमत में हैं, तो उसकी बात कोई नहीं सुनेगा — यही असम और सीमा प्रांत का डर था। 🏠 उदाहरण: समूह "ग" में बंगाल और असम थे; संविधान सभा में इस वर्ग के 36 मुस्लिम और 34 सामान्य सदस्य होते, इसलिए मुस्लिम बहुमत असम का संविधान भी तय कर सकता था। |
नीचे का आरेख योजना के पूरे ढाँचे का सार है — सबसे ऊपर संघ, बीच में तीन समूह, नीचे प्रांत, और साथ में रियासतों तथा विवाद की स्थिति। आरेख के नीचे हर हिस्से को विस्तार से समझाया गया है।

संघ के पास केवल विदेश मामले, रक्षा और संचार तथा इनके लिए धन जुटाने की शक्ति थी। यह केंद्र जान-बूझकर बहुत कमज़ोर रखा गया था, ताकि मुसलमानों को यह डर न रहे कि हिंदू बहुमत वाला केंद्र उन पर हावी हो जाएगा। ऊपर से बड़े सांप्रदायिक प्रश्नों पर दोनों समुदायों के अलग-अलग बहुमत की शर्त थी। कांग्रेस को यही कमज़ोरी खटकती थी — उसका कहना था कि दंगे, अकाल या आर्थिक संकट जैसी स्थितियों में केंद्र के पास हस्तक्षेप की शक्ति होनी चाहिए।
इसमें छह प्रांत थे — मद्रास, बम्बई, संयुक्त प्रांत, बिहार, मध्य प्रांत और उड़ीसा। ये सभी हिंदू बहुल थे और सभी में 1946 में कांग्रेस की सरकारें थीं। संविधान सभा के वर्ग "क" में इनकी 187 सीटें थीं — 167 सामान्य और 20 मुस्लिम। चीफ़ कमिश्नर के तीन प्रांतों — दिल्ली, अजमेर-मेरवाड़ा और कुर्ग — का एक-एक प्रतिनिधि भी इसी वर्ग में जोड़ा जाना था। इस समूह में कोई विवाद नहीं था, क्योंकि यहाँ कांग्रेस का स्पष्ट बहुमत था।
इसमें तीन प्रांत थे — पंजाब, पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत और सिंध; साथ ही ब्रिटिश बलूचिस्तान (चीफ़ कमिश्नर प्रांत) का एक प्रतिनिधि भी इसी वर्ग में जुड़ना था — इसीलिए आरेख में "(+ बलूचिस्तान)" लिखा है। वर्ग "ख" की 35 सीटें थीं — 22 मुस्लिम, 9 सामान्य और 4 सिख। यानी यहाँ मुसलमानों का स्पष्ट बहुमत था। यह वही क्षेत्र था, जिसे इक़बाल ने 1930 में "मुस्लिम राज्य" के रूप में देखा था और जो आगे पश्चिमी पाकिस्तान बना। विवाद यह था कि पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत में तो कांग्रेस की सरकार (डॉ. ख़ान साहब) थी — वह ऐसे समूह में क्यों रहे, जहाँ लीग का बहुमत हो? पंजाब के सिख भी इस समूह में अपने को असुरक्षित मानते थे।
इसमें दो प्रांत थे — बंगाल और असम। वर्ग "ग" की 70 सीटें थीं — 36 मुस्लिम और 34 सामान्य। बंगाल मुस्लिम बहुल था, पर असम में हिंदू और अन्य ग़ैर-मुस्लिम बहुमत में थे और वहाँ कांग्रेस की सरकार (गोपीनाथ बरदलै) थी। समस्या यह थी कि पूरे वर्ग में मुसलमानों का हल्का बहुमत (36 बनाम 34) था, और बंगाल की सीटें असम से बहुत अधिक थीं। इसलिए यदि समूहीकरण अनिवार्य होता, तो बंगाल के बहुमत के बल पर असम का संविधान भी तय किया जा सकता था। इसी डर से गोपीनाथ बरदलै के नेतृत्व में असम ने समूहीकरण का कड़ा विरोध किया और गांधीजी ने भी असम का साथ दिया।
🧮 उदाहरण से समझें — असम क्यों डरा हुआ था? मान लीजिए वर्ग "ग" में यह प्रश्न आया कि असम में सरकारी नौकरियाँ और ज़मीन के नियम कैसे हों। इस वर्ग में 70 सदस्य हैं — जिनमें से अधिकांश बंगाल के हैं। असम के प्रतिनिधि विरोध करें, तब भी बंगाल के सदस्यों के बहुमत से निर्णय हो जाएगा। योजना में कहा गया था कि असम नए संविधान के अंतर्गत पहले चुनाव के बाद ही समूह से बाहर निकल सकेगा — पर तब तक उसका संविधान दूसरे बना चुके होंगे। इसलिए असम कहता था — "हमें पहले ही दिन समूह से बाहर रहने का अधिकार चाहिए।" |
योजना में प्रांत सबसे शक्तिशाली थे — संघ के तीन विषयों को छोड़कर शेष सभी विषय और अवशिष्ट शक्तियाँ उनके पास थीं। प्रांत चाहें तो समूह बनाकर अपना समूह-संविधान बना सकते थे। साथ ही हर प्रांत को 10 वर्ष बाद संविधान पर पुनर्विचार माँगने का अधिकार था। यानी यह योजना एक ढीला संघ बनाती थी, जिसमें असली शक्ति नीचे (प्रांतों और समूहों) में थी।
रियासतों के पास भी संघ को सौंपे गए विषयों के अलावा सारी शक्तियाँ रहनी थीं। स्वतंत्रता के साथ अंग्रेज़ी सर्वोच्चता समाप्त हो जानी थी और रियासतों को संघ के साथ बातचीत करके अपनी स्थिति तय करनी थी। संविधान सभा में उन्हें अधिकतम 93 सीटें दी गईं, जो एक बातचीत समिति के माध्यम से भरी जानी थीं।
पूरी योजना की सबसे बड़ी समस्या यही प्रश्न था। कांग्रेस का कहना था कि किसी प्रांत का समूह में जाना उसकी अपनी इच्छा पर होना चाहिए — असम और पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत, जहाँ कांग्रेस की सरकारें थीं, उन्हें ज़बरदस्ती मुस्लिम बहुल समूहों में नहीं डाला जा सकता। लीग का कहना था कि समूहीकरण अनिवार्य है, क्योंकि समूह "ख" और "ग" ही भविष्य का पाकिस्तान हैं — और दस वर्ष बाद ये समूह अलग होने की माँग कर सकते हैं। योजना की भाषा इतनी अस्पष्ट थी कि दोनों पक्ष अपनी-अपनी व्याख्या को सही मान सकते थे।
वर्ग | प्रांत | सीटें और उनका अर्थ |
क (हिंदू बहुल) | मद्रास, बम्बई, संयुक्त प्रांत, बिहार, मध्य प्रांत और उड़ीसा इसमें थे। | कुल 187 सीटें थीं (167 सामान्य, 20 मुस्लिम), इसलिए यहाँ कांग्रेस का स्पष्ट बहुमत था। |
ख (पश्चिमोत्तर) | पंजाब, पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत और सिंध इसमें थे। | कुल 35 सीटें थीं (22 मुस्लिम, 9 सामान्य, 4 सिख), इसलिए यहाँ मुस्लिम बहुमत था। |
ग (पूर्व) | बंगाल और असम इसमें थे। | कुल 70 सीटें थीं (36 मुस्लिम, 34 सामान्य), इसलिए हल्के मुस्लिम बहुमत से असम दब सकता था। |
चीफ़ कमिश्नर प्रांत | दिल्ली, अजमेर-मेरवाड़ा, कुर्ग और ब्रिटिश बलूचिस्तान इसमें थे। | चारों को एक-एक सीट मिली; पहले तीन वर्ग "क" में और बलूचिस्तान वर्ग "ख" में जुड़ा। |
◆ 6 जून 1946 — लीग की स्वीकृति — मुस्लिम लीग ने योजना को — दीर्घकालीन (संविधान) और अंतरिम (सरकार) दोनों भागों में — स्वीकार कर लिया। उसने कहा कि अनिवार्य समूहीकरण में पाकिस्तान का आधार और नींव मौजूद है और आगे चलकर यही पूर्ण पाकिस्तान तक ले जाएगा।
◆ 16 जून 1946 — अंतरिम सरकार का प्रस्ताव — वायसराय ने अंतरिम सरकार के लिए 14 नामों की घोषणा की — कांग्रेस के 6 (जिनमें एक अनुसूचित जाति के), लीग के 5 और 3 अन्य अल्पसंख्यक। इसमें कांग्रेस को अपने कोटे से किसी राष्ट्रवादी मुसलमान को नामित करने का अधिकार नहीं दिया गया, क्योंकि लीग इसका विरोध कर रही थी। कांग्रेस डॉ. ज़ाकिर हुसैन जैसे किसी मुसलमान को नामित करना चाहती थी।
◆ 25 जून 1946 — कांग्रेस का निर्णय — कांग्रेस ने दीर्घकालीन योजना (यानी संविधान सभा में जाना) स्वीकार कर ली, पर 16 जून वाली अंतरिम सरकार की योजना अस्वीकार कर दी। साथ ही उसने अपनी व्याख्या जोड़ी कि प्रांतों का समूहों में जाना उनकी इच्छा पर होगा।
◆ जुलाई 1946 — संविधान सभा के चुनाव — प्रांतीय विधानसभाओं ने संविधान सभा के सदस्य चुने (खंड 7)। इसी बीच 6–7 जुलाई को अखिल भारतीय कांग्रेस समिति ने योजना को स्वीकृति दी और नेहरू ने मौलाना आज़ाद से कांग्रेस अध्यक्ष का पद संभाला।
◆ 10 जुलाई 1946 — नेहरू का विवादित वक्तव्य — बम्बई में एक प्रेस सम्मेलन में नेहरू ने कहा कि कांग्रेस संविधान सभा में "किसी भी समझौते से बँधे बिना" जाएगी — वह केवल संविधान सभा में जाने के निर्णय से बँधी है, बाक़ी वहाँ जैसा उचित लगेगा, करेगी। उन्होंने यह भी कहा कि समूहीकरण शायद होगा ही नहीं, क्योंकि पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत और असम उसका विरोध करेंगे।
◆ 27–29 जुलाई 1946 — लीग की अस्वीकृति — नेहरू के वक्तव्य को लीग ने विश्वासघात का प्रमाण माना — उसका तर्क था कि बहुमत मिलते ही कांग्रेस योजना बदल देगी। बम्बई में लीग परिषद ने अपनी स्वीकृति वापस ले ली और पाकिस्तान पाने के लिए "सीधी कार्रवाई" का निर्णय लिया।
❝ आज हमने संवैधानिक तरीक़ों को अलविदा कह दिया है... आज हमने एक पिस्तौल भी बना ली है और उसे चलाने की स्थिति में हैं। ❞ (मोहम्मद अली जिन्ना, लीग परिषद, बम्बई, 29 जुलाई 1946) |
मौलाना आज़ाद ने अपनी आत्मकथा में नेहरू के 10 जुलाई के वक्तव्य को उन "दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं" में गिना, जिन्होंने इतिहास की दिशा बदल दी। दूसरी ओर कई इतिहासकार मानते हैं कि लीग पहले से ही किसी बहाने की तलाश में थी और समूहीकरण पर मूल मतभेद इतना गहरा था कि योजना का टिकना कठिन था। गांधीजी ने आरंभ में इस योजना को उस समय की परिस्थितियों में सबसे अच्छी योजना कहा था, जिसमें "दुःख की मारी भारत भूमि को यातना से मुक्त करने के बीज" थे।
🟩 कांग्रेस का पक्ष — सार ✔ समूहीकरण वैकल्पिक हो; असम और सीमा प्रांत को ज़बरदस्ती मुस्लिम बहुल समूहों में न डाला जाए। ✔ केंद्र बहुत कमज़ोर है; संकट में हस्तक्षेप की शक्ति चाहिए। ✔ स्वतंत्रता पहले मिले; संविधान बनने तक रुकना ठीक नहीं। ✔ अंतरिम सरकार में राष्ट्रवादी मुसलमान नामित करने का अधिकार चाहिए। | 🟥 लीग का पक्ष — सार ✔ समूहीकरण अनिवार्य हो, क्योंकि समूह ख और ग ही भावी पाकिस्तान हैं। ✔ योजना में पाकिस्तान की "नींव" मौजूद है, इसलिए पहले स्वीकार किया। ✔ नेहरू के 10 जुलाई के वक्तव्य को विश्वासघात मानकर स्वीकृति वापस ली। ✔ मुसलमानों को नामित करने का अधिकार केवल लीग का है। |
📌 कैबिनेट मिशन — महत्त्व और विफलता महत्त्व — यह एकीकृत भारत को बचाने का अंतिम गंभीर प्रयास था। इसी योजना के अंतर्गत संविधान सभा बनी, जिसने आगे भारत का संविधान बनाया; और इसी के अंतर्गत अंतरिम सरकार बनी। विफलता के कारण — समूहीकरण पर मूल मतभेद, अंतरिम सरकार में मुस्लिम सदस्यों के नामांकन का विवाद, कमज़ोर केंद्र पर कांग्रेस की आपत्ति, नेहरू का वक्तव्य और लीग की सीधी कार्रवाई। परिणाम यह हुआ कि दोनों दलों के बीच अविश्वास इतना बढ़ा कि एक देश में साथ रहने की संभावना लगभग समाप्त हो गई। |
भारतीयों द्वारा अपना संविधान स्वयं बनाने का विचार पुराना था। गांधीजी ने 1922 में कहा था कि भारत का राजनीतिक भविष्य भारतीय स्वयं तय करेंगे। 1924 में मोतीलाल नेहरू ने केंद्रीय विधानसभा में ऐसी सभा की माँग उठाई। 1934 में कम्युनिस्ट नेता एम. एन. राय ने पहली बार स्पष्ट रूप से संविधान सभा का विचार रखा। 1935 में कांग्रेस ने इसे अपनी औपचारिक माँग बनाया और फ़ैज़पुर अधिवेशन (1936) में इसकी व्याख्या की — वयस्क मताधिकार से चुनी गई संविधान सभा। अगस्त प्रस्ताव (1940) में अंग्रेज़ों ने पहली बार यह सिद्धांत माना कि संविधान मुख्यतः भारतीय बनाएँगे, क्रिप्स प्रस्ताव (1942) में इसकी रूपरेखा दी गई, और अंततः कैबिनेट मिशन (1946) के अंतर्गत यह सभा बनी।
◆ चुनाव (जुलाई–अगस्त 1946) — प्रांतीय विधानसभाओं ने कैबिनेट मिशन के नियमों के अनुसार ब्रिटिश भारत की 296 सीटों के लिए सदस्य चुने। यह चुनाव अप्रत्यक्ष था, यानी जनता ने सीधे वोट नहीं दिया, बल्कि 1946 में चुने गए विधायकों ने सदस्य चुने।
◆ परिणाम — कांग्रेस को 208 सीटें, मुस्लिम लीग को 73 सीटें और अन्य दलों तथा निर्दलीयों को 15 सीटें मिलीं। कांग्रेस ने अपने सदस्यों में विभिन्न विचारों और वर्गों के लोगों — जैसे डॉ. आंबेडकर, महिलाओं, अल्पसंख्यकों और विशेषज्ञों — को भी स्थान दिलाया, ताकि सभा पूरे देश का प्रतिनिधित्व करे।
◆ रियासतों के प्रतिनिधि — रियासतों की 93 सीटें उनके शासकों से बातचीत करने वाली समिति के माध्यम से भरी जानी थीं। 28 अप्रैल 1947 को सबसे पहले बड़ौदा, बीकानेर, जयपुर, पटियाला और रीवा जैसी कुछ रियासतों के प्रतिनिधि सभा में शामिल हुए; बाक़ी रियासतें बाद में आईं।
◆ पहली बैठक (9 दिसंबर 1946) — दिल्ली के संविधान सभा भवन (आज के पुराने संसद भवन का केंद्रीय कक्ष) में पहली बैठक हुई। सबसे वरिष्ठ सदस्य डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा को अस्थायी अध्यक्ष बनाया गया। मुस्लिम लीग ने बहिष्कार किया — उसके सदस्य आए ही नहीं।
◆ स्थायी अध्यक्ष (11 दिसंबर 1946) — डॉ. राजेंद्र प्रसाद सभा के स्थायी अध्यक्ष चुने गए। सर बी. एन. राव को संवैधानिक सलाहकार बनाया गया, जिन्होंने संविधान का प्रारंभिक प्रारूप तैयार किया।
◆ उद्देश्य प्रस्ताव (13 दिसंबर 1946) — नेहरू ने सभा के सामने "उद्देश्य प्रस्ताव" रखा, जो 22 जनवरी 1947 को पारित हुआ। इसमें कहा गया कि भारत एक स्वतंत्र, संप्रभु गणराज्य होगा; उसकी सारी शक्ति जनता से आएगी; सभी नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, समानता और विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास और उपासना की स्वतंत्रता मिलेगी; और अल्पसंख्यकों, पिछड़े और जनजातीय क्षेत्रों के लिए पर्याप्त संरक्षण होगा। आगे यही प्रस्ताव संविधान की प्रस्तावना का आधार बना।
🔍 आसान परिभाषा: संप्रभु (संप्रभुता) |
📘 परिभाषा: वह स्थिति, जिसमें कोई राज्य या संस्था अपने निर्णय लेने में पूरी तरह स्वतंत्र हो और उसके ऊपर कोई बाहरी सत्ता न हो। |
💡 आसान भाषा में: संप्रभु संस्था को किसी से पूछना नहीं पड़ता। 1946 में बनी संविधान सभा पहले ब्रिटिश योजना (कैबिनेट मिशन) के अंतर्गत बनी थी, इसलिए वह पूरी तरह संप्रभु नहीं थी; 1947 के स्वतंत्रता अधिनियम ने उसे संप्रभु बना दिया। 🏠 उदाहरण: 15 अगस्त 1947 के बाद भारत की संविधान सभा ब्रिटिश संसद के बनाए किसी भी क़ानून को बदल या रद्द कर सकती थी — यही उसकी संप्रभुता थी। |
◆ संप्रभुता कब मिली — गठन के समय सभा ब्रिटिश योजना से बँधी थी, इसलिए संप्रभु नहीं थी। 14–15 अगस्त 1947 की आधी रात से वह स्वतंत्र भारत की संप्रभु संविधान सभा बनी और साथ ही देश के केंद्रीय विधानमंडल (अंतरिम संसद) का काम भी करने लगी। विभाजन के बाद पाकिस्तान में गए क्षेत्रों के सदस्य हट गए और सदस्य संख्या घटकर 299 रह गई।
◆ जिन्ना की स्थिति — जिन्ना भारत की संविधान सभा के सदस्य नहीं थे। वे पाकिस्तान की संविधान सभा के अध्यक्ष बने (11 अगस्त 1947)।
◆ पुरानी केंद्रीय विधानसभा — ब्रिटिश काल की केंद्रीय विधानसभा के अंतिम अध्यक्ष जी. वी. मावलंकर (1946–47) थे। आगे वे स्वतंत्र भारत की पहली लोकसभा के अध्यक्ष (1952–56) बने।
🧠 याद रखें सुझाव — एम. एन. राय (1934); औपचारिक माँग — कांग्रेस (1935); गठन का आधार — कैबिनेट मिशन (1946); सदस्य — 389 (296 + 93), विभाजन के बाद 299; पहली बैठक — 9 दिसंबर 1946 (अस्थायी अध्यक्ष सच्चिदानंद सिन्हा); स्थायी अध्यक्ष — राजेंद्र प्रसाद (11 दिसंबर); उद्देश्य प्रस्ताव — 13 दिसंबर 1946 (पारित 22 जनवरी 1947)। |
🔍 आसान परिभाषा: सीधी कार्रवाई |
📘 परिभाषा: संवैधानिक बातचीत, याचिका और चुनाव के रास्ते छोड़कर अपनी माँग मनवाने के लिए सड़कों पर उतरकर सीधा दबाव बनाना — हड़ताल, प्रदर्शन, बंद और जन-आंदोलन के द्वारा। |
💡 आसान भाषा में: यानी "बात से नहीं मानोगे तो ताक़त दिखाएँगे।" लीग ने इसे पाकिस्तान पाने का तरीक़ा घोषित किया; पर नेताओं के भड़काऊ भाषणों के कारण यह व्यवहार में सांप्रदायिक हिंसा में बदल गया। 🏠 उदाहरण: 16 अगस्त 1946 को लीग ने "सीधी कार्रवाई दिवस" मनाया, जिसके साथ कलकत्ता में भीषण दंगे शुरू हुए। |
◆ पृष्ठभूमि — कैबिनेट मिशन योजना से स्वीकृति वापस लेने के बाद (29 जुलाई 1946) लीग परिषद ने घोषणा की कि 16 अगस्त 1946 को पूरे देश में "सीधी कार्रवाई दिवस" मनाया जाएगा — यह दिखाने के लिए कि मुसलमान पाकिस्तान के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं। उसी बीच वायसराय ने कांग्रेस को अंतरिम सरकार बनाने का निमंत्रण दे दिया (12 अगस्त), जिससे लीग का ग़ुस्सा और बढ़ा।
◆ नारे — इस अवसर पर नारे लगे — "लड़के लेंगे पाकिस्तान" और "लेकर रहेंगे पाकिस्तान"। कई लीगी नेताओं के भाषणों ने भावनाएँ और भड़काईं।
◆ कलकत्ता — "महा कलकत्ता हत्याकांड" (16–19 अगस्त 1946) — बंगाल में लीग की सरकार थी और प्रधानमंत्री हुसैन शहीद सुहरावर्दी ने उस दिन सार्वजनिक अवकाश घोषित कर दिया। एक विशाल सभा के बाद शहर में हिंसा भड़क उठी; पुलिस पहले दिनों में लगभग निष्क्रिय रही। फिर हिंदुओं और सिखों ने भी बदले में हमले किए। चार दिनों में चार-पाँच हज़ार से अधिक लोग मारे गए, हज़ारों घायल हुए और लगभग एक लाख लोग बेघर हो गए। अंग्रेज़ी समाचार पत्रों ने इसे "ग्रेट कलकत्ता किलिंग्स" कहा।
◆ महत्त्व — यह पहली बार था जब किसी बड़े राजनीतिक दल के आह्वान पर इतने बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक हत्याएँ हुईं। इसके बाद हिंसा की एक शृंखला शुरू हुई — एक जगह के दंगे का बदला दूसरी जगह लिया जाने लगा — और देश गृहयुद्ध की कगार पर पहुँच गया।
◆ नोआखाली और टिप्पेरा (पूर्वी बंगाल), अक्टूबर 1946 — 10 अक्टूबर 1946 (कोजागरी लक्ष्मी पूजा का दिन) से पूर्वी बंगाल के नोआखाली और पड़ोसी टिप्पेरा ज़िलों में, जहाँ हिंदू अल्पसंख्यक थे, उन पर संगठित हमले हुए। हत्याएँ, आगज़नी, जबरन धर्म-परिवर्तन और स्त्रियों पर अत्याचार हुए; हज़ारों हिंदू घर छोड़कर शिविरों में चले गए।
◆ बिहार, अक्टूबर–नवंबर 1946 — नोआखाली की ख़बरें फैलने पर 25 अक्टूबर को "नोआखाली दिवस" मनाया गया और उसके बाद बिहार के कई ज़िलों में वहाँ के अल्पसंख्यक मुसलमानों पर बदले की भीषण हिंसा हुई, जिसमें हज़ारों लोग मारे गए। बिहार में कांग्रेस की सरकार थी; नेहरू स्वयं वहाँ गए और चेतावनी दी कि दंगाई न रुके तो उन्हें रोकने के लिए सेना और हवाई जहाज़ तक का प्रयोग किया जाएगा।
◆ गढ़मुक्तेश्वर (संयुक्त प्रांत), नवंबर 1946 — मेरठ ज़िले के गढ़मुक्तेश्वर में गंगा स्नान के मेले के दौरान वहाँ के मुसलमानों का नरसंहार हुआ।
◆ पंजाब, मार्च 1947 से — लीग ने ख़िज़्र सरकार के विरुद्ध आंदोलन चलाया और अंततः 2 मार्च 1947 को ख़िज़्र हयात ख़ाँ ने त्यागपत्र दे दिया। इसके तुरंत बाद रावलपिंडी, मुल्तान, अमृतसर और लाहौर में भयानक हिंसा हुई — विशेषकर रावलपिंडी के गाँवों में सिखों और हिंदुओं पर हमले हुए। फिर 1947 की गर्मियों में, विभाजन की घोषणा के बाद, पंजाब में दोनों ओर व्यापक कत्लेआम हुआ।
◆ परिणाम — इस हिंसा ने नेताओं को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि यदि जल्दी समाधान न हुआ तो पूरा देश गृहयुद्ध में जल उठेगा। इसीलिए अनेक कांग्रेसी नेता धीरे-धीरे विभाजन को "कम बुराई" मानने लगे (खंड 10)।
77 वर्ष के गांधीजी 6–7 नवंबर 1946 को नोआखाली पहुँचे और 2 मार्च 1947 तक — लगभग चार महीने — वहीं रहे। उन्होंने कहा — "मेरा यहाँ का काम मेरी अहिंसा की सबसे बड़ी परीक्षा है।" वे दर्जनों गाँवों में नंगे पाँव पैदल घूमे, कई बार मुस्लिम परिवारों के घर ठहरे, हिंदुओं से कहा कि वे डर छोड़कर अपने गाँव लौटें और मुसलमानों से कहा कि वे अपने पड़ोसियों की रक्षा की ज़िम्मेदारी लें। विरोधियों ने उनके रास्ते में काँच और गंदगी भी बिखेरी, पर वे रुके नहीं। इसके बाद वे बिहार गए और वहाँ पीड़ित मुसलमानों के पक्ष में खड़े हुए। यानी जहाँ जो समुदाय पीड़ित था, गांधीजी उसके साथ खड़े थे।
अगस्त 1947 में स्वतंत्रता के समय वे कलकत्ता में थे और बंगाल के पूर्व प्रधानमंत्री सुहरावर्दी के साथ बेलियाघाटा के एक मकान में रहे। 31 अगस्त को फिर दंगे भड़कने पर उन्होंने 1 सितंबर 1947 से उपवास शुरू किया; दोनों समुदायों के नेताओं ने शांति का वचन दिया और 4 सितंबर को उपवास समाप्त हुआ — शहर में शांति लौट आई।
🕊️ "एक व्यक्ति की सीमा सेना" पंजाब में शांति बनाए रखने के लिए लगभग 55,000 सैनिकों का पंजाब सीमा बल लगाया गया था, फिर भी वहाँ भीषण दंगे हुए। बंगाल में केवल गांधीजी थे, और वहाँ शांति रही। इसलिए माउंटबेटन ने गांधीजी को "एक व्यक्ति की सीमा सेना" (वन मैन बाउंड्री फ़ोर्स) कहा। |
🔍 आसान परिभाषा: अंतरिम सरकार |
📘 परिभाषा: वह अस्थायी सरकार जो पुरानी व्यवस्था के समाप्त होने और नई स्थायी व्यवस्था (नया संविधान, नई चुनी हुई सरकार) के बनने के बीच की अवधि में शासन चलाती है। |
💡 आसान भाषा में: यानी "बीच के समय की कामचलाऊ सरकार।" जैसे पुराना मकान तोड़कर नया बनने तक परिवार किसी अस्थायी घर में रहता है, वैसे ही अंग्रेज़ी राज के जाने और स्वतंत्र भारत का संविधान बनने के बीच देश चलाने के लिए यह सरकार बनाई गई। 🏠 उदाहरण: 2 सितंबर 1946 को जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में बनी सरकार अंतरिम सरकार थी, जो 15 अगस्त 1947 तक चली। |
कैबिनेट मिशन योजना (खंड 6) के दो हिस्से थे। पहला दीर्घकालीन हिस्सा था — संविधान सभा बनाकर नया संविधान तैयार करना। दूसरा अल्पकालीन हिस्सा था — संविधान बनने तक देश का शासन चलाने के लिए सभी प्रमुख दलों की एक अंतरिम सरकार बनाना। जून 1946 में सीटों के बँटवारे और "राष्ट्रवादी मुसलमान" को शामिल करने के प्रश्न पर यह सरकार नहीं बन सकी थी, इसलिए वायसराय वेवेल ने कुछ समय के लिए केवल अधिकारियों की एक कामचलाऊ परिषद से काम चलाया।
इसके बाद परिस्थिति बदली। 29 जुलाई 1946 को मुस्लिम लीग ने कैबिनेट मिशन योजना से अपनी स्वीकृति वापस ले ली और सीधी कार्रवाई की घोषणा कर दी। अब ब्रिटिश सरकार के सामने प्रश्न था कि क्या लीग के बिना ही सरकार बना ली जाए। लंदन की लेबर सरकार ने तय किया कि सबसे बड़े दल कांग्रेस को और अधिक प्रतीक्षा नहीं कराई जा सकती। इसलिए 12 अगस्त 1946 को वेवेल ने कांग्रेस अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू को अंतरिम सरकार बनाने का निमंत्रण दिया।
◆ घोषणा और शपथ — सरकार के सदस्यों के नाम 24 अगस्त 1946 को घोषित हुए और 2 सितंबर 1946 को सदस्यों ने पद सँभाला। इस प्रकार पहली बार केंद्र में ऐसी सरकार बनी जिसके लगभग सभी सदस्य भारतीय नेता थे।
◆ क़ानूनी स्वरूप — क़ानून की दृष्टि से यह कोई नई संस्था नहीं थी; यह वायसराय की कार्यकारी परिषद ही थी, जो अब भी पुराने संवैधानिक ढाँचे में ही काम कर रही थी। वायसराय इसका अध्यक्ष था और नेहरू इसके उपाध्यक्ष थे। पर व्यवहार में नेहरू ही सरकार के वास्तविक प्रमुख की तरह काम करते थे और वेवेल ने आश्वासन दिया था कि वे रोज़मर्रा के काम में दख़ल नहीं देंगे।
◆ आरंभिक बारह सदस्य — शुरू में सरकार में कांग्रेस द्वारा चुने गए बारह सदस्य थे — जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, आसफ़ अली, सी. राजगोपालाचारी, शरत चंद्र बोस, डॉ. जॉन मथाई, सरदार बलदेव सिंह, सर शफ़ात अहमद ख़ाँ, जगजीवन राम, सैयद अली ज़हीर और सी. एच. भाभा। इनमें अल्पसंख्यक समुदायों — सिख, ईसाई, पारसी, अनुसूचित जाति और मुसलमान — के प्रतिनिधि भी रखे गए थे, ताकि यह सरकार केवल एक समुदाय की न लगे।
◆ ध्यान देने योग्य बात — कांग्रेस के सबसे बड़े मुस्लिम नेता मौलाना अबुल कलाम आज़ाद इस आरंभिक सरकार में शामिल नहीं थे; वे जनवरी 1947 में शिक्षा विभाग के सदस्य बने।
◆ लीग की प्रतिक्रिया — लीग ने 2 सितंबर को "शोक दिवस" की तरह मनाया और मुसलमानों से घरों पर काले झंडे लगाने को कहा। सरकार में शामिल होने वाले राष्ट्रवादी मुसलमान सर शफ़ात अहमद ख़ाँ पर शिमला में चाकू से जानलेवा हमला भी हुआ। इससे स्पष्ट था कि लीग के बिना बनी सरकार को वह चुनौती देती रहेगी।
◆ पृष्ठभूमि — कलकत्ता और नोआखाली की हिंसा के बाद वेवेल को लगा कि लीग को बाहर रखकर देश में शांति नहीं रह सकती। इसलिए उन्होंने लीग को सरकार में लाने के लिए लगातार प्रयास किया। दूसरी ओर जिन्ना को भी डर था कि सरकार से बाहर रहने पर पूरा प्रशासन कांग्रेस के हाथ में चला जाएगा।
◆ घटनाक्रम — 15 अक्टूबर 1946 को लीग ने सरकार में आना स्वीकार किया और 26 अक्टूबर 1946 को उसके पाँच सदस्य सरकार में शामिल हुए। उनके लिए जगह बनाने हेतु शरत चंद्र बोस, सर शफ़ात अहमद ख़ाँ और सैयद अली ज़हीर सरकार से हट गए।
◆ बिना शर्त प्रवेश — वेवेल ने लीग को सरकार में लेते समय उससे न तो सीधी कार्रवाई छोड़ने का वचन लिया और न ही कैबिनेट मिशन योजना को दोबारा स्वीकार करने तथा संविधान सभा में आने का वचन लिया। यही इस व्यवस्था की सबसे बड़ी कमज़ोरी सिद्ध हुई।
◆ लीग की चाल — लीग ने अपने पाँच सदस्यों में एक अनुसूचित जाति के नेता जोगेंद्र नाथ मंडल को नामित किया। यह कांग्रेस द्वारा राष्ट्रवादी मुसलमानों को नामित करने का जवाब था — लीग दिखाना चाहती थी कि यदि कांग्रेस मुसलमानों का प्रतिनिधित्व कर सकती है तो लीग भी हिंदू समाज के एक वर्ग का प्रतिनिधित्व कर सकती है।
◆ विभागों का बँटवारा — लीग गृह विभाग चाहती थी, पर सरदार पटेल उसे छोड़ने को तैयार नहीं हुए। तब कांग्रेस ने वित्त विभाग लीग को दे दिया, यह सोचकर कि लीग के पास इसे चलाने योग्य व्यक्ति नहीं है। यह अनुमान ग़लत निकला — लियाक़त अली ख़ाँ वित्त सदस्य बने और वित्त विभाग के द्वारा उन्होंने हर दूसरे विभाग के ख़र्च और नियुक्तियों पर नियंत्रण पा लिया।
🧩 उदाहरण से समझें — वित्त विभाग से कैसे अड़चन डाली गई? मान लीजिए गृह विभाग (पटेल) को एक नया पद बनाना है या किसी योजना पर धन ख़र्च करना है। नियम के अनुसार इसकी फ़ाइल वित्त विभाग से होकर जाती थी। लियाक़त अली ख़ाँ के अधीन वित्त विभाग ऐसी फ़ाइलों को रोक लेता या लौटा देता था। कहा जाता है कि पटेल ने खीझकर कहा कि वे लियाक़त की अनुमति के बिना एक चपरासी भी नियुक्त नहीं कर सकते। इसी अनुभव ने पटेल को इस नतीजे पर पहुँचाया कि लीग के साथ मिलकर एक मज़बूत सरकार चलाना संभव नहीं है। |
लीग के सदस्य अपना उद्देश्य छिपाते भी नहीं थे। सरकार में आते समय उसके एक सदस्य ने खुलकर कहा —
❝ हम अंतरिम सरकार में इसलिए जा रहे हैं कि अपने प्रिय लक्ष्य पाकिस्तान की लड़ाई के लिए वहाँ पैर जमाने की जगह मिल सके। ❞ (ग़ज़नफ़र अली ख़ाँ, मुस्लिम लीग के सदस्य, अक्टूबर 1946) |
नीचे की तालिका में पुनर्गठित सरकार (अक्टूबर 1946 के बाद) के चौदह सदस्यों और उनके विभागों को दोहराया गया है। परीक्षाओं में इन विभागों से सीधे प्रश्न पूछे जाते हैं, इसलिए इन्हें ध्यान से याद करें।
सदस्य | विभाग | दल या प्रतिनिधित्व |
जवाहरलाल नेहरू | वे परिषद के उपाध्यक्ष थे और उनके पास विदेश मामले तथा राष्ट्रमंडल संबंध विभाग था। | वे कांग्रेस के सदस्य थे। |
सरदार वल्लभभाई पटेल | उनके पास गृह विभाग के साथ सूचना और प्रसारण विभाग था। | वे कांग्रेस के सदस्य थे। |
डॉ. राजेंद्र प्रसाद | उनके पास खाद्य और कृषि विभाग था। | वे कांग्रेस के सदस्य थे। |
सरदार बलदेव सिंह | उनके पास रक्षा विभाग था। | वे सिख समुदाय के प्रतिनिधि थे। |
आसफ़ अली | उनके पास रेलवे और परिवहन विभाग था। | वे कांग्रेस के सदस्य थे। |
सी. राजगोपालाचारी | उनके पास शिक्षा और कला विभाग था। | वे कांग्रेस के सदस्य थे। |
डॉ. जॉन मथाई | उनके पास उद्योग और आपूर्ति विभाग था। | वे भारतीय ईसाई समुदाय के प्रतिनिधि थे। |
जगजीवन राम | उनके पास श्रम विभाग था। | वे कांग्रेस में अनुसूचित जातियों के प्रतिनिधि थे। |
सी. एच. भाभा | उनके पास निर्माण, खान और ऊर्जा विभाग था। | वे पारसी समुदाय के प्रतिनिधि थे। |
लियाक़त अली ख़ाँ | उनके पास वित्त विभाग था। | वे मुस्लिम लीग के सदस्य थे। |
आई. आई. चुंदरीगर | उनके पास वाणिज्य विभाग था। | वे मुस्लिम लीग के सदस्य थे। |
अब्दुर रब निश्तर | उनके पास संचार (डाक और वायु) विभाग था। | वे मुस्लिम लीग के सदस्य थे। |
ग़ज़नफ़र अली ख़ाँ | उनके पास स्वास्थ्य विभाग था। | वे मुस्लिम लीग के सदस्य थे। |
जोगेंद्र नाथ मंडल | उनके पास विधि (क़ानून) विभाग था। | वे अनुसूचित जाति के नेता थे, जिन्हें मुस्लिम लीग ने नामित किया था। |
लीग के आने के बाद अंतरिम सरकार एक मंत्रिमंडल की तरह नहीं, बल्कि दो विरोधी खेमों की तरह काम करने लगी। इसे पाँच बातों से समझिए।
◆ सामूहिक ज़िम्मेदारी का अभाव — लीग के सदस्य नेहरू को सरकार का नेता नहीं मानते थे। वे नेहरू द्वारा बुलाई जाने वाली अनौपचारिक बैठकों में नहीं आते थे और अपनी अलग बैठक करके अपना रुख़ तय करते थे। इसलिए सरकार कोई साझा नीति नहीं बना पाती थी।
◆ संविधान सभा का बहिष्कार — लीग सरकार में तो आ गई, पर उसने संविधान सभा में आने से इनकार कर दिया। 9 दिसंबर 1946 को संविधान सभा की पहली बैठक लीग के सदस्यों के बिना हुई।
◆ लंदन की वार्ता (दिसंबर 1946) — गतिरोध तोड़ने के लिए ब्रिटिश सरकार ने दिसंबर 1946 के आरंभ में नेहरू, बलदेव सिंह, जिन्ना, लियाक़त अली ख़ाँ और वेवेल को लंदन बुलाया। वार्ता विफल रही। 6 दिसंबर 1946 को ब्रिटिश सरकार ने वक्तव्य जारी किया, जिसमें समूहीकरण (खंड 6) के प्रश्न पर लीग की व्याख्या को सही माना गया — यानी समूहों का निर्णय वर्ग के साधारण बहुमत से होगा। इससे लीग का रुख़ और कड़ा हो गया।
◆ लीग की कराची बैठक (31 जनवरी 1947) — लीग की कार्यसमिति ने कराची में प्रस्ताव पास करके कहा कि कैबिनेट मिशन योजना विफल हो चुकी है और संविधान सभा को भंग कर देना चाहिए। इसके जवाब में फ़रवरी 1947 में सरकार के कांग्रेसी सदस्यों ने वायसराय से माँग की कि जो दल संविधान सभा को ही नहीं मानता, उसके सदस्यों को सरकार से त्यागपत्र देना चाहिए; ऐसा न होने पर कांग्रेस के सदस्यों ने स्वयं हट जाने की चेतावनी दी।
◆ लियाक़त अली ख़ाँ का बजट (28 फ़रवरी 1947) — वित्त सदस्य के रूप में लियाक़त ने जो बजट रखा, उसे उन्होंने "ग़रीब आदमी का बजट" कहा। इसमें एक लाख रुपये से अधिक के व्यापारिक मुनाफ़े पर 25 प्रतिशत कर, पूँजीगत लाभ पर कर और कर-चोरी की जाँच के लिए आयोग का प्रस्ताव था। देखने में यह समाजवादी बजट था, पर इसकी सीधी चोट उन उद्योगपतियों और व्यापारियों पर पड़ती थी जो अधिकतर हिंदू थे और कांग्रेस के समर्थक थे। कांग्रेस के भीतर इस पर मतभेद हो गया और अंत में कर की दरें घटानी पड़ीं।
◆ सकारात्मक पक्ष — पहली बार भारतीय नेताओं ने केंद्र सरकार के विभाग सँभाले और प्रशासन का अनुभव पाया। नेहरू ने विदेश विभाग के द्वारा स्वतंत्र विदेश नीति की नींव रखी — मार्च–अप्रैल 1947 में दिल्ली में एशियाई संबंध सम्मेलन हुआ। पटेल ने गृह विभाग के द्वारा प्रशासन पर पकड़ बनाई।
◆ नकारात्मक पक्ष — सरकार के भीतर का रोज़ का झगड़ा, बाहर फैलती हिंसा और संविधान सभा का बहिष्कार — इन तीनों ने मिलकर यह धारणा मज़बूत की कि कांग्रेस और लीग एक साथ एक देश नहीं चला सकते।
◆ विभाजन की ओर — इसका परिणाम यह हुआ कि पटेल और नेहरू जैसे नेता, जो अब तक विभाजन के विरोधी थे, सोचने लगे कि एक कमज़ोर और झगड़ों से भरे संयुक्त भारत की तुलना में एक छोटा पर मज़बूत केंद्र वाला भारत बेहतर होगा।
🧠 याद रखें — अंतरिम सरकार अंतरिम सरकार 2 सितंबर 1946 को बनी; लीग 26 अक्टूबर 1946 को इसमें शामिल हुई। वायसराय इसके अध्यक्ष और नेहरू उपाध्यक्ष थे। वित्त विभाग लीग के लियाक़त अली ख़ाँ के पास, गृह पटेल के पास, रक्षा बलदेव सिंह के पास और विधि जोगेंद्र नाथ मंडल के पास था। लीग सरकार के भीतर रहकर भी संविधान सभा से बाहर रही — यही अंतरिम सरकार की असफलता की जड़ थी। |
1947 का वर्ष आते-आते तीन बातें साफ़ हो चुकी थीं — अंतरिम सरकार चल नहीं रही थी, दंगे रुक नहीं रहे थे और ब्रिटेन के पास भारत को बलपूर्वक थामे रखने की न तो शक्ति बची थी, न इच्छा। इसी पृष्ठभूमि में केवल छह महीनों के भीतर चार बड़े क़दम उठे — एटली की घोषणा, माउंटबेटन का आगमन, "प्लान बाल्कन" का त्याग और 3 जून की योजना। आइए इन्हें एक-एक करके समझें।
◆ पृष्ठभूमि — वायसराय वेवेल निराश हो चुके थे। उन्होंने लंदन को एक "ब्रेकडाउन योजना" भेजी थी, जिसका आशय था कि यदि समझौता न हो तो अंग्रेज़ चरणबद्ध ढंग से — पहले कांग्रेस-शासित प्रांतों से और फिर बाक़ी प्रांतों से — अपनी सेना और अधिकारी हटा लें। ब्रिटिश मंत्रिमंडल को यह योजना हार मानकर भागने जैसी लगी। इसलिए उसने तय किया कि जाने की एक निश्चित तिथि घोषित की जाए, ताकि भारतीय दलों पर समझौता करने का दबाव बने, और वेवेल की जगह नया वायसराय भेजा जाए।
◆ कौन, कब, कहाँ — ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लीमेंट एटली ने 20 फ़रवरी 1947 को ब्रिटिश संसद के निचले सदन (हाउस ऑफ़ कॉमन्स) में यह घोषणा की।
◆ पहली बात — समय-सीमा — ब्रिटेन जून 1948 से पहले (यानी 30 जून 1948 तक) भारत की सत्ता ज़िम्मेदार भारतीय हाथों में सौंप देगा। पहली बार भारत छोड़ने की निश्चित तिथि बताई गई।
◆ दूसरी बात — सत्ता किसे — यदि उस समय तक सभी दलों की सहमति से संविधान नहीं बन पाया, तो ब्रिटिश सरकार विचार करेगी कि सत्ता किसे सौंपी जाए — पूरे ब्रिटिश भारत के लिए किसी एक केंद्रीय सरकार को, या कुछ क्षेत्रों में वहाँ की प्रांतीय सरकारों को, या किसी अन्य उचित तरीक़े से।
◆ तीसरी बात — रियासतें — रियासतों पर ब्रिटिश सर्वोच्चता सत्ता-हस्तांतरण के साथ समाप्त हो जाएगी, पर वह किसी नई भारतीय सरकार को नहीं सौंपी जाएगी।
◆ चौथी बात — नया वायसराय — लॉर्ड वेवेल की जगह लॉर्ड माउंटबेटन को वायसराय बनाया जाएगा।
◆ कांग्रेस की प्रतिक्रिया — कांग्रेस ने घोषणा का स्वागत किया, क्योंकि पहली बार स्वतंत्रता की तिथि तय हुई थी। नेहरू ने इसे साहसपूर्ण निर्णय कहा। साथ ही "प्रांतीय सरकारों को सत्ता" वाले वाक्य को देखते हुए 8 मार्च 1947 को कांग्रेस कार्यसमिति ने प्रस्ताव पास किया कि यदि देश बँटता है तो पंजाब का विभाजन किया जाए (यही सिद्धांत आगे बंगाल पर भी लागू हुआ) — यानी ग़ैर-मुस्लिम बहुल क्षेत्र पाकिस्तान में न जाएँ।
◆ लीग की प्रतिक्रिया — लीग ने उस वाक्य में पाकिस्तान की संभावना देखी, जिसमें कुछ क्षेत्रों में प्रांतीय सरकारों को सत्ता सौंपने की बात थी। इसलिए उसने उन प्रांतों में अपनी सरकार बनाने की कोशिश तेज़ कर दी जिन्हें वह पाकिस्तान में चाहती थी। पंजाब में ख़िज़्र हयात ख़ाँ की सरकार के विरुद्ध आंदोलन तेज़ हुआ और 2 मार्च 1947 को ख़िज़्र ने त्यागपत्र दे दिया (खंड 8)। असम और पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत की कांग्रेसी सरकारों के विरुद्ध भी लीग ने आंदोलन चलाए।
◆ परिणाम और महत्त्व — घोषणा का उद्देश्य दलों को समझौते की ओर धकेलना था, पर इसका उलटा असर हुआ। समय-सीमा तय होते ही हर पक्ष उस तिथि से पहले अधिक से अधिक क्षेत्र पर अपना दावा पक्का करने में लग गया और हिंसा बढ़ गई। फिर भी इस घोषणा का ऐतिहासिक महत्त्व यह है कि इसके बाद प्रश्न यह नहीं रहा कि अंग्रेज़ जाएँगे या नहीं; प्रश्न केवल यह रहा कि वे सत्ता किसे और किस रूप में सौंपेंगे।
लॉर्ड लुई माउंटबेटन (1900–1979) ब्रिटिश राजपरिवार के निकट संबंधी और नौसेना के अधिकारी थे। द्वितीय विश्वयुद्ध में वे दक्षिण-पूर्व एशिया में मित्र राष्ट्रों के सर्वोच्च सेनापति रहे और जापान के विरुद्ध बर्मा के अभियान का नेतृत्व किया। वे 22 मार्च 1947 को दिल्ली पहुँचे और 24 मार्च 1947 को उन्होंने ब्रिटिश भारत के अंतिम वायसराय के रूप में शपथ ली। उन्हें पहले के वायसरायों की तुलना में अधिक अधिकार मिले थे — वे कई निर्णय लंदन से पूछे बिना ले सकते थे। स्वतंत्रता के बाद वे स्वतंत्र भारत के पहले गवर्नर जनरल बने और जून 1948 तक इस पद पर रहे।
◆ नेताओं से भेंट — आते ही उन्होंने भारतीय नेताओं से एक-एक करके लंबी बातचीत शुरू की। 24 मार्च से 6 मई के बीच उन्होंने लगभग 133 भेंट-वार्ताएँ कीं।
◆ गांधीजी का सुझाव — 31 मार्च 1947 को गांधीजी से उनकी पहली भेंट हुई। गांधीजी ने विभाजन टालने के लिए एक असाधारण सुझाव दिया — अंतरिम सरकार भंग करके जिन्ना को पूरी सरकार बनाने का निमंत्रण दिया जाए और कांग्रेस उसका समर्थन करे। नेहरू और पटेल ने इसे अव्यावहारिक माना और यह सुझाव आगे नहीं बढ़ा।
◆ माउंटबेटन का निष्कर्ष — जिन्ना से कई दौर की बातचीत के बाद माउंटबेटन इस नतीजे पर पहुँचे कि जिन्ना पाकिस्तान से कम किसी बात पर तैयार नहीं होंगे और कैबिनेट मिशन योजना को फिर से जीवित नहीं किया जा सकता। इसलिए अप्रैल 1947 के अंत तक उन्होंने मान लिया कि विभाजन अनिवार्य है; अब प्रश्न केवल उसके तरीक़े का था।
🔍 आसान परिभाषा: बाल्कनीकरण |
📘 परिभाषा: किसी बड़े देश या क्षेत्र का अनेक छोटे-छोटे, आपस में झगड़ते राज्यों में टूट जाना। यह शब्द यूरोप के बाल्कन प्रायद्वीप से बना है, जहाँ तुर्की साम्राज्य के कमज़ोर होने पर कई छोटे राज्य बने और आपस में लड़ते रहे। |
💡 आसान भाषा में: यानी "एक बड़े घर के इतने टुकड़े हो जाना कि हर कमरा अलग घर बन जाए और सब आपस में लड़ें।" 🏠 उदाहरण: नेहरू को डर था कि यदि हर प्रांत और हर रियासत को अलग-अलग स्वतंत्र होने की छूट मिली तो भारत का बाल्कनीकरण हो जाएगा — इसीलिए उन्होंने "प्लान बाल्कन" को ठुकराया। |
◆ यह योजना क्या थी — माउंटबेटन और उनके सलाहकारों (लॉर्ड इस्मे और जॉर्ज एबेल) ने अप्रैल 1947 में जो पहली योजना बनाई, उसमें सत्ता किसी एक या दो केंद्रीय सरकारों को नहीं, बल्कि अलग-अलग प्रांतों को सौंपी जानी थी। पंजाब और बंगाल की विधानसभाओं को अपने प्रांत के बँटवारे पर मत देना था। इसके बाद हर प्रांत (या प्रांत का हर भाग) स्वयं तय करता कि वह भारत में मिले, पाकिस्तान में मिले या स्वतंत्र रहे। रियासतों को भी ऐसी ही छूट मिलती।
◆ नाम — चूँकि इससे देश के अनेक टुकड़े हो सकते थे, इसलिए इसे "प्लान बाल्कन" कहा गया। इसे "डिकी बर्ड योजना" और इस्मे योजना भी कहा जाता है।
◆ घटनाक्रम — मई 1947 के आरंभ में लॉर्ड इस्मे यह योजना लेकर लंदन गए और ब्रिटिश मंत्रिमंडल ने कुछ संशोधनों के साथ इसे मान लिया। माउंटबेटन उस समय शिमला में थे और नेहरू उनके अतिथि थे। 10 मई 1947 की रात माउंटबेटन ने यह योजना अनौपचारिक रूप से नेहरू को दिखाई।
◆ नेहरू की प्रतिक्रिया — नेहरू ने योजना पढ़कर इसका कड़ा विरोध किया। उन्होंने कहा कि इससे भारत का बाल्कनीकरण होगा, गृहयुद्ध और अराजकता फैलेगी, और कांग्रेस इसे कभी स्वीकार नहीं करेगी। उन्होंने 11 मई को लिखकर अपनी आपत्ति दी।
◆ परिणाम — माउंटबेटन समझ गए कि कांग्रेस की सहमति के बिना यह योजना नहीं चल सकती। उन्होंने प्लान बाल्कन को छोड़ दिया और एक नई योजना की तलाश की।
वी. पी. मेनन (वप्पाला पंगुन्नी मेनन) एक साधारण लिपिक के पद से उठकर वायसराय के संवैधानिक सलाहकार और सुधार आयुक्त बने थे। वे उस समय सबसे ऊँचे पद पर पहुँचे भारतीय अधिकारियों में थे और सरदार पटेल के विश्वासपात्र थे। स्वतंत्रता के बाद उन्होंने रियासती विभाग के सचिव के रूप में पटेल के साथ मिलकर रियासतों के एकीकरण में बड़ी भूमिका निभाई।
◆ योजना का सार — मेनन का सुझाव था कि सत्ता प्रांतों को नहीं, बल्कि दो केंद्रीय सरकारों — भारत और पाकिस्तान — को सौंपी जाए, और वह भी डोमिनियन स्टेटस के आधार पर। जिन प्रांतों में विवाद है (पंजाब और बंगाल), वहाँ की विधानसभाएँ बँटवारे पर निर्णय लें। किसी प्रांत को स्वतंत्र रहने का विकल्प नहीं दिया जाए।
◆ इससे क्या लाभ था — डोमिनियन स्टेटस के कारण नया संविधान बनने की प्रतीक्षा किए बिना, 1935 के अधिनियम में संशोधन करके सत्ता तुरंत सौंपी जा सकती थी। कांग्रेस को इससे जल्दी सत्ता और देश के टुकड़े-टुकड़े होने से बचाव मिलता था। ब्रिटेन को यह संतोष मिलता था कि दोनों नए देश कम से कम कुछ समय तक राष्ट्रमंडल में रहेंगे।
◆ स्वीकृति — मेनन ने शिमला में कुछ ही घंटों में इस योजना का मसौदा तैयार कर दिया। पटेल का समर्थन इसे पहले से प्राप्त था और नेहरू ने भी इसे मान लिया। माउंटबेटन 18 मई को इसे लेकर लंदन गए और ब्रिटिश मंत्रिमंडल की स्वीकृति लेकर 31 मई 1947 को दिल्ली लौटे।
⚠️ भ्रम से बचें — दो अलग योजनाएँ प्लान बाल्कन और वी. पी. मेनन की योजना एक नहीं हैं। प्लान बाल्कन में सत्ता प्रांतों को मिलनी थी और प्रांत स्वतंत्र भी रह सकते थे; नेहरू ने इसे ठुकराया। मेनन की योजना में सत्ता दो डोमिनियनों की केंद्रीय सरकारों को मिलनी थी और स्वतंत्र रहने का विकल्प नहीं था। 3 जून योजना (माउंटबेटन योजना) मेनन की इसी योजना पर आधारित थी। |
🔍 आसान परिभाषा: डोमिनियन (अधिराज्य) |
📘 परिभाषा: ब्रिटिश राष्ट्रमंडल के भीतर ऐसा स्वशासित देश जो अपने भीतरी और बाहरी मामलों में पूरी तरह स्वतंत्र होता है, पर औपचारिक रूप से ब्रिटिश सम्राट को अपना राज्य-प्रमुख मानता है; सम्राट का प्रतिनिधि गवर्नर जनरल होता है, जो वहाँ की मंत्रिपरिषद की सलाह पर काम करता है। |
💡 आसान भाषा में: यानी "व्यवहार में पूरा आज़ाद देश, बस नाम के लिए ब्रिटिश ताज से जुड़ा हुआ।" कनाडा और ऑस्ट्रेलिया उस समय ऐसे ही डोमिनियन थे। डोमिनियन चाहे तो राष्ट्रमंडल छोड़ भी सकता है। 🏠 उदाहरण: 15 अगस्त 1947 से 26 जनवरी 1950 तक भारत एक डोमिनियन था; 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने पर वह गणराज्य बन गया और गवर्नर जनरल की जगह राष्ट्रपति ने ले ली। |
◆ घोषणा कैसे हुई — 2 जून 1947 को माउंटबेटन ने सात नेताओं के सामने योजना रखी — कांग्रेस से नेहरू, पटेल और आचार्य कृपलानी; लीग से जिन्ना, लियाक़त अली ख़ाँ और अब्दुर रब निश्तर; तथा सिखों की ओर से बलदेव सिंह। 3 जून 1947 को लंदन में एटली ने संसद में योजना घोषित की और उसी शाम दिल्ली में आकाशवाणी पर माउंटबेटन, नेहरू, जिन्ना और बलदेव सिंह ने बारी-बारी से देश को संबोधित किया। इसी कारण इसे "3 जून योजना" कहते हैं।
◆ स्वतंत्रता की तिथि — अगले दिन 4 जून की प्रेस वार्ता में माउंटबेटन ने बताया कि सत्ता जून 1948 की जगह 15 अगस्त 1947 को ही सौंप दी जाएगी। इस प्रकार तैयारी के लिए केवल लगभग दस सप्ताह बचे। माउंटबेटन ने बाद में बताया कि यह तिथि उन्होंने इसलिए चुनी कि 15 अगस्त 1945 को जापान ने उनके सामने आत्मसमर्पण किया था।
अब योजना के प्रावधान एक-एक करके समझिए —
1. दो डोमिनियन — ब्रिटिश भारत को दो भागों — भारत और पाकिस्तान — में बाँटा जाएगा और दोनों को डोमिनियन स्टेटस दिया जाएगा। दोनों को यह अधिकार होगा कि वे चाहें तो बाद में राष्ट्रमंडल छोड़ दें।
2. पंजाब और बंगाल — इन दोनों प्रांतों की विधानसभाएँ दो हिस्सों में बैठेंगी — एक हिस्से में मुस्लिम बहुल ज़िलों के सदस्य और दूसरे में ग़ैर-मुस्लिम बहुल ज़िलों के सदस्य। यदि किसी भी एक हिस्से ने साधारण बहुमत से विभाजन के पक्ष में मत दिया तो प्रांत बाँट दिया जाएगा।
3. सिंध — सिंध की विधानसभा स्वयं तय करेगी कि वह मौजूदा संविधान सभा में रहे या नई (पाकिस्तान की) संविधान सभा में जाए।
4. पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत — वहाँ कांग्रेस की सरकार थी पर जनसंख्या मुस्लिम बहुल थी; इसलिए वहाँ जनमत संग्रह से तय होगा कि प्रांत भारत में रहे या पाकिस्तान में जाए।
5. असम का सिलहट ज़िला — असम ग़ैर-मुस्लिम बहुल प्रांत था, पर उसका सिलहट ज़िला मुस्लिम बहुल था; इसलिए वहाँ भी जनमत संग्रह होगा कि वह असम में रहे या पूर्वी बंगाल में मिले।
6. बलूचिस्तान — वहाँ विधानसभा नहीं थी, इसलिए निर्णय शाही जिरगा (क़बीलों के सरदारों की सभा) और क्वेटा नगरपालिका के ग़ैर-सरकारी सदस्य करेंगे।
7. सीमा आयोग — यदि पंजाब और बंगाल बँटने का निर्णय लेते हैं तो उनकी सीमा तय करने के लिए सीमा आयोग बनाया जाएगा।
8. संविधान सभाएँ — मौजूदा संविधान सभा का बनाया संविधान उन क्षेत्रों पर लागू नहीं होगा जो उसे स्वीकार नहीं करते; उन क्षेत्रों के लिए अलग संविधान सभा बनेगी।
9. रियासतें — रियासतों पर ब्रिटिश सर्वोच्चता समाप्त हो जाएगी। वे भारत या पाकिस्तान में से किसी एक में शामिल हो सकती हैं। माउंटबेटन ने 25 जुलाई 1947 को नरेंद्र मंडल में राजाओं को साफ़ सलाह दी कि स्वतंत्र रहना व्यावहारिक नहीं है और वे अपनी भौगोलिक स्थिति देखकर किसी एक डोमिनियन में मिल जाएँ (रियासतों का एकीकरण अध्याय 17 में पढ़ेंगे)।
📌 3 जून योजना की ख़ास बात इस योजना ने दोनों पक्षों को कुछ दिया और कुछ छीना। लीग को पाकिस्तान मिला, पर पूरा पंजाब और पूरा बंगाल नहीं — जिन्ना ने ऐसे पाकिस्तान को पहले "कटा-छँटा, कीड़ों का खाया हुआ पाकिस्तान" कहा था। कांग्रेस को एकता नहीं मिली, पर उसे जल्दी सत्ता, मज़बूत केंद्र, पंजाब-बंगाल-असम के ग़ैर-मुस्लिम बहुल क्षेत्र और देश के और अधिक टुकड़े होने से बचाव मिला। |
◆ बंगाल (20 जून 1947) — पूरी विधानसभा की संयुक्त बैठक में बहुमत ने पाकिस्तान की संविधान सभा में जाने के पक्ष में मत दिया। पर पश्चिमी (हिंदू बहुल) ज़िलों के सदस्यों ने अलग बैठक में विभाजन के पक्ष में मत दिया। योजना के अनुसार एक हिस्से का निर्णय ही पर्याप्त था, इसलिए बंगाल बँट गया। इससे पहले अप्रैल–मई 1947 में हुसैन शहीद सुहरावर्दी और शरत चंद्र बोस ने एक "संयुक्त स्वतंत्र बंगाल" की योजना रखी थी, पर कांग्रेस और हिंदू महासभा के विरोध के कारण वह सफल नहीं हुई।
◆ पंजाब (23 जून 1947) — यहाँ भी यही हुआ। पूर्वी (ग़ैर-मुस्लिम बहुल) ज़िलों के सदस्यों ने विभाजन के पक्ष में मत दिया और पंजाब बँट गया।
◆ सिंध (26 जून 1947) — सिंध की विधानसभा ने बहुमत से पाकिस्तान में जाने का निर्णय लिया।
◆ बलूचिस्तान (जून 1947 के अंत में) — शाही जिरगा और क्वेटा नगरपालिका के सदस्यों ने पाकिस्तान के पक्ष में निर्णय दिया।
◆ सिलहट (6–7 जुलाई 1947) — जनमत संग्रह में लगभग 2,39,619 मत पूर्वी बंगाल (पाकिस्तान) के पक्ष में और 1,84,041 मत असम में रहने के पक्ष में पड़े। इसलिए सिलहट पाकिस्तान में गया; पर उसका करीमगंज क्षेत्र बाद में सीमा आयोग ने भारत को दिया।
◆ पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत (6–17 जुलाई 1947) — यहाँ डॉ. ख़ान साहब की कांग्रेसी सरकार थी और ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ाँ के ख़ुदाई ख़िदमतगार कांग्रेस के साथ थे। वे चाहते थे कि जनमत संग्रह में तीसरा विकल्प — स्वतंत्र "पख़्तूनिस्तान" — भी हो। जब यह नहीं माना गया तो उन्होंने जनमत संग्रह का बहिष्कार कर दिया। इसलिए लगभग आधे मतदाताओं ने ही मत डाला — 2,89,244 मत पाकिस्तान के पक्ष में और केवल 2,874 भारत के पक्ष में पड़े। प्रांत पाकिस्तान में चला गया।

◆ 20 फ़रवरी — एटली की घोषणा — ब्रिटेन ने जून 1948 तक भारत छोड़ने की समय-सीमा घोषित की और वेवेल की जगह माउंटबेटन को भेजने का निर्णय लिया (उपखंड 10.1)।
◆ 24 मार्च — माउंटबेटन वायसराय — अंतिम वायसराय ने पद सँभाला और 31 मार्च को गांधीजी से पहली भेंट की; इसी महीने रावलपिंडी सहित पंजाब में दंगे भड़के (उपखंड 10.2 और खंड 8)।
◆ मई — प्लान बाल्कन से मेनन योजना तक — प्रांतों को अलग-अलग सत्ता देने वाली योजना नेहरू ने शिमला में ठुकराई और दो डोमिनियनों वाली मेनन योजना आधार बनी (उपखंड 10.3 और 10.4)।
◆ 3 जून — माउंटबेटन योजना — विभाजन की औपचारिक घोषणा हुई; 14–15 जून को अखिल भारतीय कांग्रेस समिति ने इसे स्वीकार किया (उपखंड 10.5 और 10.7)।
◆ जून–जुलाई — प्रांतों के निर्णय — बंगाल और पंजाब की विधानसभाओं ने विभाजन चुना, सिंध और बलूचिस्तान पाकिस्तान में गए, और सिलहट तथा सीमा प्रांत में जनमत संग्रह हुए (उपखंड 10.6)।
◆ 30 जून — सीमा आयोग — पंजाब और बंगाल की सीमा तय करने के लिए दो आयोग बने, जिनके अध्यक्ष सर सिरिल रेडक्लिफ़ थे (खंड 11)।
◆ 18 जुलाई — स्वतंत्रता अधिनियम — ब्रिटिश संसद के इस क़ानून ने 3 जून योजना को क़ानूनी रूप दिया (खंड 11)।
◆ 14–17 अगस्त — स्वतंत्रता और सीमा — 14 अगस्त को कराची में पाकिस्तान बना, 14–15 अगस्त की आधी रात को भारत स्वतंत्र हुआ और 17 अगस्त को रेडक्लिफ़ रेखा प्रकाशित हुई (खंड 11)।
यह इस अध्याय का सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न है। जो कांग्रेस 1940 से लगातार कहती आ रही थी कि भारत एक राष्ट्र है, उसने 1947 में बँटवारा कैसे मान लिया? इसका उत्तर किसी एक कारण में नहीं, बल्कि कई परिस्थितियों के मेल में है।
◆ पहला कारण — गृहयुद्ध का डर — अगस्त 1946 से लगातार दंगे हो रहे थे — कलकत्ता, नोआखाली, बिहार, गढ़मुक्तेश्वर और फिर पंजाब। नेताओं को लगा कि यदि विभाजन न माना गया तो पूरा देश गृहयुद्ध में झुलस जाएगा। विभाजन को इस हिंसा को रोकने का एकमात्र उपाय समझा गया।
◆ दूसरा कारण — अंतरिम सरकार का अनुभव — लीग के साथ सरकार चलाने के कड़वे अनुभव (खंड 9) ने सिखा दिया था कि साझा सरकार में कोई काम नहीं हो सकता। पटेल का मत था कि शरीर के रोगी अंग को काट देना पूरे शरीर को बचाने के लिए ज़रूरी है।
◆ तीसरा कारण — मज़बूत केंद्र की चाह — कैबिनेट मिशन की योजना में एकता तो थी, पर केंद्र बहुत कमज़ोर था। नेहरू और पटेल मानते थे कि ग़रीबी मिटाने, उद्योग लगाने और देश को जोड़े रखने के लिए मज़बूत केंद्र ज़रूरी है। विभाजन के बाद बचे भारत में यह संभव था।
◆ चौथा कारण — बाल्कनीकरण से बचाव — 3 जून योजना में प्रांतों और रियासतों को स्वतंत्र रहने का विकल्प नहीं था। इसलिए कांग्रेस को लगा कि एक पाकिस्तान मान लेने से देश के अनेक टुकड़े होने का ख़तरा टल जाएगा।
◆ पाँचवाँ कारण — तुरंत सत्ता — डोमिनियन स्टेटस के कारण सत्ता महीनों में मिल रही थी। नेताओं का मानना था कि सत्ता हाथ में आते ही वे दंगों पर क़ाबू पा सकेंगे, जबकि अंग्रेज़ अधिकारी अब उदासीन हो चुके थे।
◆ छठा कारण — थकान और उम्र — नेहरू ने बाद में स्वीकार किया कि नेता वर्षों की जेल और संघर्ष से थक चुके थे और फिर से जेल जाने की स्थिति में नहीं थे; विभाजन की योजना ने उन्हें एक रास्ता दिखाया और उन्होंने उसे पकड़ लिया।
◆ सातवाँ कारण — यह अचानक नहीं था — कांग्रेस धीरे-धीरे, क़दम-दर-क़दम इस ओर बढ़ी थी। 1942 में उसने कहा था कि किसी क्षेत्र को उसकी इच्छा के विरुद्ध संघ में रहने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा; 1944 में गांधीजी ने सी. आर. फ़ॉर्मूले के आधार पर मुस्लिम बहुल ज़िलों के आत्मनिर्णय की बात मानी; 1946 में उसने प्रांतों के समूह स्वीकार किए; और मार्च 1947 में स्वयं पंजाब के विभाजन की माँग की। 3 जून योजना इसी क्रम की अंतिम कड़ी थी।
14–15 जून 1947 को दिल्ली में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति ने 3 जून योजना पर विचार किया। उस समय कांग्रेस अध्यक्ष आचार्य जे. बी. कृपलानी थे। योजना को स्वीकार करने का प्रस्ताव गोविंद वल्लभ पंत ने रखा और मौलाना आज़ाद ने उसका समर्थन किया। प्रस्ताव के पक्ष में 157 और विरोध में 29 मत पड़े, जबकि 32 सदस्य तटस्थ रहे। उधर मुस्लिम लीग की परिषद ने 9 जून 1947 को दिल्ली में योजना स्वीकार कर ली थी।
◆ गोविंद वल्लभ पंत — उन्होंने कहा कि आज कांग्रेस के सामने दो ही रास्ते हैं — 3 जून की योजना को स्वीकार करे या आत्महत्या करे।
◆ सरदार पटेल — उन्होंने कहा कि यदि विभाजन न माना जाता तो भारत छोटे-छोटे टुकड़ों में बँटकर नष्ट हो जाता; अंतरिम सरकार के अनुभव से उन्हें लगा कि इस तरह चलने पर एक नहीं, कई पाकिस्तान बनते — हर दफ़्तर में एक पाकिस्तान होता।
◆ जवाहरलाल नेहरू — उन्होंने विभाजन को एक बुराई माना, पर रोज़ के ख़ून-ख़राबे और गतिरोध की तुलना में इसे "कम बुराई" बताया। उनका तर्क था कि सिर के दर्द से छुटकारा पाने के लिए कभी-कभी सिर ही काटना पड़ता है।
◆ मौलाना आज़ाद — उन्होंने कहा कि यह निर्णय सही नहीं है, पर कांग्रेस के सामने कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा है। उन्होंने आशा जताई कि यह बँटवारा स्थायी नहीं रहेगा।
◆ गांधीजी — गांधीजी ने पहले कहा था कि विभाजन उनकी लाश पर होगा। पर जब कार्यसमिति निर्णय ले चुकी थी, तो उन्होंने समिति की बैठक में सदस्यों से कहा कि वे अपने नेताओं का साथ दें, क्योंकि इस घड़ी में नेतृत्व को ठुकराने का अर्थ देश में अराजकता होगा। वे स्वयं इसे जीवन भर एक "आध्यात्मिक त्रासदी" मानते रहे।
◆ विरोध करने वाले — पंजाब के डॉ. सैफ़ुद्दीन किचलू ने इसे "राष्ट्रवाद का सांप्रदायिकता के आगे समर्पण" कहा। पुरुषोत्तम दास टंडन, सिंध के चोइथराम गिडवानी और मौलाना हिफ़्ज़ुर्रहमान ने भी प्रस्ताव का विरोध किया। ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ाँ ने दुखी होकर कांग्रेस नेताओं से कहा — "आपने हमें भेड़ियों के आगे फेंक दिया।" कांग्रेस के बाहर हिंदू महासभा ने भी विभाजन का विरोध किया।
नीचे की तालिका 3 जून योजना के अंतर्गत प्रत्येक क्षेत्र के निर्णय को दोहराती है।
क्षेत्र | निर्णय का तरीक़ा | तिथि और परिणाम |
बंगाल | विधानसभा के दो हिस्सों ने अलग-अलग बैठकर मत दिया। | 20 जून 1947 को पश्चिमी ज़िलों के सदस्यों ने विभाजन चुना और प्रांत बँट गया। |
पंजाब | विधानसभा के दो हिस्सों ने अलग-अलग बैठकर मत दिया। | 23 जून 1947 को पूर्वी ज़िलों के सदस्यों ने विभाजन चुना और प्रांत बँट गया। |
सिंध | पूरी विधानसभा ने मत दिया। | 26 जून 1947 को सिंध ने पाकिस्तान में जाना तय किया। |
बलूचिस्तान | शाही जिरगा और क्वेटा नगरपालिका के सदस्यों ने निर्णय लिया। | जून 1947 के अंत में बलूचिस्तान पाकिस्तान में गया। |
सिलहट (असम) | ज़िले में जनमत संग्रह कराया गया। | 6–7 जुलाई 1947 के मतदान के बाद सिलहट पाकिस्तान में गया। |
पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत | प्रांत में जनमत संग्रह कराया गया। | 6–17 जुलाई 1947 के मतदान का ख़ुदाई ख़िदमतगारों ने बहिष्कार किया और प्रांत पाकिस्तान में गया। |
3 जून योजना एक राजनीतिक समझौता थी। उसे लागू करने के लिए तीन काम ज़रूरी थे — पहला, ब्रिटिश संसद का एक क़ानून, जो सत्ता सौंपे; दूसरा, सेना, ख़ज़ाने और दफ़्तरों का बँटवारा; और तीसरा, पंजाब तथा बंगाल के बीच सीमा रेखा खींचना। ये तीनों काम केवल दस सप्ताह में निपटाए गए। इस खंड में हम इन्हें क्रम से समझेंगे।
◆ पृष्ठभूमि — भारत पर ब्रिटिश शासन ब्रिटिश संसद के क़ानूनों (जैसे 1858 और 1935 के अधिनियम) पर टिका था। इसलिए उसे क़ानूनी रूप से समाप्त करने के लिए भी संसद का क़ानून ही चाहिए था।
◆ कब पारित हुआ — भारतीय स्वतंत्रता विधेयक 4 जुलाई 1947 को ब्रिटिश संसद में पेश हुआ। निचले सदन ने इसे 15 जुलाई को और ऊपरी सदन ने 16 जुलाई को पारित किया। 18 जुलाई 1947 को इसे राजकीय स्वीकृति मिली। इस प्रकार यह क़ानून बहुत कम समय में और लगभग बिना विरोध के पारित हुआ।
अब इसके प्रावधान समझिए —
1. दो स्वतंत्र डोमिनियन — 15 अगस्त 1947 से ब्रिटिश भारत के स्थान पर भारत और पाकिस्तान नाम के दो स्वतंत्र डोमिनियन बनेंगे। इस तिथि को अधिनियम में "नियत दिन" कहा गया।
2. क्षेत्र — पाकिस्तान में पूर्वी बंगाल, पश्चिमी पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान, पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत और असम का सिलहट ज़िला शामिल होंगे; ब्रिटिश भारत का शेष सारा भाग भारत में रहेगा। पंजाब और बंगाल की ठीक-ठीक सीमा सीमा आयोग तय करेगा।
3. गवर्नर जनरल — हर डोमिनियन का अपना गवर्नर जनरल होगा, जिसे ब्रिटिश सम्राट उस डोमिनियन की मंत्रिपरिषद की सलाह पर नियुक्त करेगा। दोनों चाहें तो एक ही व्यक्ति को दोनों का गवर्नर जनरल बना सकते थे। गवर्नर जनरल केवल संवैधानिक प्रमुख होगा — वह अपनी मर्ज़ी से नहीं, मंत्रिपरिषद की सलाह से काम करेगा।
4. संविधान सभाएँ संप्रभु — दोनों देशों की संविधान सभाओं को अपने देश का कोई भी संविधान बनाने का पूरा अधिकार होगा। जब तक नया संविधान नहीं बनता, तब तक यही सभाएँ केंद्रीय विधानमंडल (संसद) का काम भी करेंगी। वे ब्रिटिश संसद के किसी भी क़ानून को — स्वयं इस स्वतंत्रता अधिनियम को भी — रद्द या संशोधित कर सकती थीं।
5. अंतरिम संविधान — नया संविधान बनने तक दोनों देशों का शासन भारत शासन अधिनियम, 1935 के अनुसार चलेगा, जिसमें आवश्यक संशोधन किए जा सकेंगे। गवर्नर जनरल और गवर्नरों के विवेकाधीन अधिकार समाप्त हो गए।
6. ब्रिटिश नियंत्रण का अंत — 15 अगस्त 1947 के बाद ब्रिटिश सरकार की इन देशों के शासन के लिए कोई ज़िम्मेदारी नहीं रहेगी और ब्रिटिश संसद का कोई नया क़ानून इन पर अपने-आप लागू नहीं होगा। भारत सचिव का पद समाप्त कर दिया गया।
7. सम्राट की उपाधि — ब्रिटिश सम्राट की उपाधियों में से "भारत का सम्राट" शब्द हटाने की व्यवस्था की गई।
8. रियासतें — देशी रियासतों पर ब्रिटिश सर्वोच्चता समाप्त हो गई और अंग्रेज़ों तथा रियासतों के बीच हुई सभी संधियाँ और समझौते ख़त्म हो गए। क़ानूनी रूप से रियासतें अब किसी के अधीन नहीं थीं; वे भारत या पाकिस्तान में शामिल हो सकती थीं।
9. सरकारी सेवाएँ — भारत सचिव द्वारा नियुक्त सिविल सेवा के अधिकारियों के वेतन, पेंशन और सेवा-शर्तें सुरक्षित रखी गईं।
◆ महत्त्व — इस अधिनियम ने लगभग 190 वर्ष (प्लासी, 1757 से) के ब्रिटिश प्रभुत्व को क़ानूनी रूप से समाप्त कर दिया। इसने भारत की संविधान सभा को पूरी तरह संप्रभु बना दिया — अब वह कैबिनेट मिशन योजना की किसी शर्त से बँधी नहीं थी।
◆ सीमा — रियासतों के बारे में अधिनियम ने स्थिति अस्पष्ट छोड़ दी। सर्वोच्चता समाप्त होने का अर्थ कुछ राजाओं (जैसे त्रावणकोर और हैदराबाद) ने यह लगाया कि वे स्वतंत्र हो गए हैं। इस ख़तरे को सरदार पटेल और वी. पी. मेनन ने विलय पत्रों के द्वारा टाला (अध्याय 17)।
🧠 याद रखें — स्वतंत्रता अधिनियम विधेयक 4 जुलाई 1947 को पेश हुआ और 18 जुलाई 1947 को उसे राजकीय स्वीकृति मिली; वह 15 अगस्त 1947 से लागू हुआ। इस अधिनियम ने स्वयं कोई संविधान नहीं दिया; उसने केवल सत्ता सौंपी और कहा कि नया संविधान बनने तक 1935 का अधिनियम चलेगा। |
एक देश को दो में बाँटना केवल नक़्शे पर रेखा खींचना नहीं था। सेना, रेल के डिब्बे, सरकारी ख़ज़ाना, दफ़्तरों की मेज़-कुर्सियाँ, यहाँ तक कि पुस्तकालयों की पुस्तकें तक बाँटी गईं।
◆ विभाजन परिषद — सारे काम की निगरानी के लिए विभाजन परिषद बनी, जिसके अध्यक्ष माउंटबेटन थे। भारत की ओर से इसमें सरदार पटेल और डॉ. राजेंद्र प्रसाद थे तथा पाकिस्तान की ओर से जिन्ना और लियाक़त अली ख़ाँ। इसके नीचे अधिकारियों की एक संचालन समिति और कई विशेषज्ञ समितियाँ काम करती थीं।
◆ मध्यस्थ न्यायाधिकरण — जिन प्रश्नों पर दोनों पक्ष सहमत न हों, उनके निपटारे के लिए संघीय न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश सर पैट्रिक स्पेंस की अध्यक्षता में एक मध्यस्थ न्यायाधिकरण बनाया गया।
◆ संपत्ति और देनदारी — चल संपत्ति मोटे तौर पर 82.5 : 17.5 के अनुपात में (भारत : पाकिस्तान) बाँटी गई। नक़द शेष में पाकिस्तान का हिस्सा 75 करोड़ रुपये तय हुआ। इसमें से 20 करोड़ तुरंत दे दिए गए; शेष 55 करोड़ कश्मीर में लड़ाई छिड़ने के कारण भारत सरकार ने रोक लिए और जनवरी 1948 में गांधीजी के उपवास के बाद दिए।
◆ सेना — सेना का बँटवारा लगभग दो-तिहाई भारत और एक-तिहाई पाकिस्तान के अनुपात में हुआ। यह काम फ़ील्ड मार्शल ऑकिनलेक की देखरेख में हुआ।
◆ अधिकारियों का विकल्प — सरकारी कर्मचारियों को यह चुनने का अवसर दिया गया कि वे भारत की सेवा में रहेंगे या पाकिस्तान की।
🔍 आसान परिभाषा: सीमा आयोग |
📘 परिभाषा: दो राज्यों या देशों के बीच की सीमा रेखा तय करने के लिए बनाई गई समिति, जो जनसंख्या, भूगोल और अन्य तथ्यों की जाँच करके अपना निर्णय (पंचाट) देती है। |
💡 आसान भाषा में: यानी "बँटवारे में बीच की मेड़ कहाँ पड़ेगी, यह तय करने वाली समिति।" जैसे दो भाइयों में खेत बँटे तो कोई तीसरा व्यक्ति नापकर मेड़ डालता है। 🏠 उदाहरण: 1947 में पंजाब और बंगाल के लिए दो सीमा आयोग बने; दोनों के अध्यक्ष सर सिरिल रेडक्लिफ़ थे, इसलिए उनकी खींची रेखा "रेडक्लिफ़ रेखा" कहलाई। |
📖 कहानी 2: पाँच सप्ताह में खिंची एक रेखा सर सिरिल रेडक्लिफ़ लंदन के एक प्रसिद्ध वकील थे, पर वे इससे पहले कभी भारत नहीं आए थे। ब्रिटिश सरकार ने इसी को उनकी योग्यता माना, क्योंकि तर्क यह था कि जो भारत को नहीं जानता, वह किसी पक्ष की ओर झुका भी नहीं होगा। 30 जून 1947 को पंजाब और बंगाल के लिए दो सीमा आयोग घोषित हुए, और रेडक्लिफ़ दोनों के अध्यक्ष बने। वे 8 जुलाई 1947 को दिल्ली पहुँचे। हर आयोग में उच्च न्यायालयों के चार न्यायाधीश थे, दो कांग्रेस द्वारा और दो लीग द्वारा नामित। निर्देश था कि सीमा मुस्लिम बहुल और ग़ैर-मुस्लिम बहुल सटे क्षेत्रों के आधार पर तय हो और "अन्य कारकों" का भी ध्यान रखा जाए, पर इस शब्द की कोई परिभाषा नहीं थी। रेडक्लिफ़ के पास केवल लगभग पाँच सप्ताह थे, नक़्शे पुराने थे और आँकड़े 1941 की जनगणना के थे। चारों न्यायाधीश दो-दो में बँट जाते थे, इसलिए लगभग हर विवादित प्रश्न का निर्णय अकेले रेडक्लिफ़ को करना पड़ा। निर्णय 12–13 अगस्त तक तैयार था, पर माउंटबेटन ने उसे समारोहों के बाद प्रकाशित करने का फ़ैसला किया, इसलिए वह 17 अगस्त 1947 को, आज़ादी के दो दिन बाद, सामने आया। लाहौर पाकिस्तान को मिला और अमृतसर भारत को। गुरदासपुर की चार में से तीन तहसीलें भारत को मिलीं, जबकि भारत से जम्मू-कश्मीर जाने वाला सड़क मार्ग पठानकोट से होकर जाता था। निर्णय से कोई पक्ष संतुष्ट नहीं हुआ। कांग्रेस, लीग और सिख, तीनों ने उसे अन्यायपूर्ण कहा। सबसे गहरी चोट सिखों को लगी, क्योंकि उनकी उपजाऊ नहरी ज़मीनें और ननकाना साहिब जैसे पवित्र स्थल सीमा के दोनों ओर बँट गए। 🧭 इस कहानी से कौन-सी अवधारणा साफ़ हुई ✔ जल्दबाज़ी की क़ीमत — इतनी बड़ी सीमा केवल पाँच सप्ताह में, पुराने नक़्शों और 1941 के आँकड़ों के सहारे तय हुई, और यही उसकी सबसे बड़ी कमज़ोरी बनी। ✔ "अन्य कारक" की अस्पष्टता — धर्म के आधार के साथ नहरों, रेलमार्गों और धर्मस्थलों जैसी बातों को गिनने की छूट थी, इसलिए सीमा-निर्णय पर विवाद होना तय था। ✔ घोषणा में देरी का परिणाम — सीमा 17 अगस्त को प्रकाशित हुई, इसलिए आज़ादी के दिन सीमा के पास के लाखों लोगों को पता ही नहीं था कि वे किस देश में हैं। 📝 परीक्षा के लिए: सीमा आयोग: घोषणा 30 जून 1947; अध्यक्ष सिरिल रेडक्लिफ़ (8 जुलाई को दिल्ली); हर आयोग में 4 न्यायाधीश; निर्णय 17 अगस्त 1947 को प्रकाशित; लाहौर पाकिस्तान को, अमृतसर भारत को; गुरदासपुर की 3 तहसीलें भारत को। |
सर सिरिल रेडक्लिफ़ (1899–1977) लंदन के एक प्रसिद्ध वकील थे। वे इससे पहले कभी भारत नहीं आए थे और भारत के भूगोल, समाज या राजनीति का उन्हें कोई प्रत्यक्ष अनुभव नहीं था। ब्रिटिश सरकार ने इसी को उनकी योग्यता माना — तर्क यह था कि जो व्यक्ति भारत को नहीं जानता, वह किसी पक्ष की ओर झुका भी नहीं होगा। वे 8 जुलाई 1947 को दिल्ली पहुँचे।
◆ आयोगों का गठन — 30 जून 1947 को दो सीमा आयोग घोषित हुए — एक पंजाब के लिए और दूसरा बंगाल के लिए (बंगाल आयोग को ही सिलहट की सीमा भी देखनी थी)। रेडक्लिफ़ दोनों के अध्यक्ष थे।
◆ सदस्य — सभी न्यायाधीश — हर आयोग में उच्च न्यायालयों के चार न्यायाधीश थे — दो कांग्रेस द्वारा और दो लीग द्वारा नामित। पंजाब आयोग में न्यायमूर्ति मेहरचंद महाजन और न्यायमूर्ति तेजा सिंह (कांग्रेस की ओर से) तथा न्यायमूर्ति दीन मोहम्मद और न्यायमूर्ति मोहम्मद मुनीर (लीग की ओर से) थे। बंगाल आयोग में न्यायमूर्ति सी. सी. बिस्वास और न्यायमूर्ति बी. के. मुखर्जी (कांग्रेस की ओर से) तथा न्यायमूर्ति अबू सालेह मोहम्मद अकरम और न्यायमूर्ति एस. ए. रहमान (लीग की ओर से) थे।
◆ आधार — आयोगों को निर्देश था कि वे मुस्लिम बहुल और ग़ैर-मुस्लिम बहुल सटे हुए क्षेत्रों के आधार पर सीमा तय करें और साथ ही "अन्य कारकों" का भी ध्यान रखें। "अन्य कारक" की कोई परिभाषा नहीं दी गई; इसमें नहरों का जाल, रेलमार्ग, शहरों की आर्थिक निर्भरता और सिखों के धर्मस्थल जैसी बातें गिनी गईं।
◆ कठिनाइयाँ — रेडक्लिफ़ के पास केवल लगभग पाँच सप्ताह थे। नक़्शे पुराने थे और जनसंख्या के आँकड़े 1941 की जनगणना के थे, जिन पर सबको भरोसा नहीं था। ज़मीन पर जाकर सर्वेक्षण करने का समय नहीं था। चारों न्यायाधीश दो-दो में बँट जाते थे, इसलिए लगभग हर विवादित प्रश्न का निर्णय अकेले रेडक्लिफ़ को करना पड़ा।
◆ घोषणा में देरी — निर्णय 12–13 अगस्त तक तैयार हो गया था, पर माउंटबेटन ने उसे स्वतंत्रता के समारोहों के बाद प्रकाशित करने का निर्णय लिया, ताकि उत्सव में विघ्न न पड़े और अशांति की ज़िम्मेदारी अंग्रेज़ों पर न आए। इसलिए सीमा का निर्णय 17 अगस्त 1947 को — स्वतंत्रता के दो दिन बाद — प्रकाशित हुआ। इसका परिणाम यह हुआ कि 15 अगस्त को सीमा के पास के लाखों लोग यह नहीं जानते थे कि उनका गाँव भारत में है या पाकिस्तान में; कई क़स्बों में दोनों देशों के झंडे फहराए गए।
◆ पंजाब के विवादित निर्णय — लाहौर पाकिस्तान को मिला और अमृतसर भारत को। गुरदासपुर ज़िला मामूली मुस्लिम बहुमत वाला था, फिर भी उसकी चार में से तीन तहसीलें — गुरदासपुर, बटाला और पठानकोट — भारत को दी गईं और केवल शकरगढ़ तहसील पाकिस्तान को गई। इसका महत्त्व यह था कि भारत से जम्मू-कश्मीर जाने वाला सड़क मार्ग पठानकोट से होकर जाता था। फ़िरोज़पुर क्षेत्र भी भारत में रहा।
◆ बंगाल के विवादित निर्णय — कलकत्ता भारत को मिला। बौद्ध बहुल चटगाँव पहाड़ी क्षेत्र और हिंदू बहुल खुलना पाकिस्तान को गए, जबकि मुस्लिम बहुल मुर्शिदाबाद भारत को मिला, ताकि हुगली नदी का ऊपरी भाग और कलकत्ता बंदरगाह सुरक्षित रहे।
◆ प्रतिक्रिया — निर्णय से कोई पक्ष संतुष्ट नहीं हुआ। कांग्रेस, लीग और सिख — तीनों ने इसे अन्यायपूर्ण कहा। सबसे गहरी चोट सिखों को लगी, क्योंकि उनकी आबादी, उनकी उपजाऊ नहरी ज़मीनें और ननकाना साहिब जैसे पवित्र स्थल सीमा के दोनों ओर बँट गए।
◆ बाद में — रेडक्लिफ़ निर्णय देकर तुरंत ब्रिटेन लौट गए और फिर कभी भारत नहीं आए। उन्होंने अपने काग़ज़ नष्ट कर दिए और कहा जाता है कि इस काम का पारिश्रमिक लेने से भी इनकार कर दिया।

◆ हरे रंग के दो भाग — ये पश्चिमी पाकिस्तान और पूर्वी पाकिस्तान हैं। दोनों के बीच एक हज़ार किलोमीटर से अधिक का भारतीय भू-भाग था। कराची पाकिस्तान की पहली राजधानी बनी और ढाका पूर्वी पाकिस्तान का केंद्र था। यही पूर्वी पाकिस्तान 1971 में बांग्लादेश बना।
◆ नारंगी रंग के भाग — ये बँटे हुए प्रांतों के भारतीय हिस्से — पूर्वी पंजाब और पश्चिम बंगाल — हैं।
◆ नीले बिंदु (राजनीतिक निर्णयों के स्थान) — लाहौर में 1940 का लाहौर प्रस्ताव पारित हुआ; शिमला में 1945 और 1946 के सम्मेलन हुए; बम्बई में जुलाई 1946 में लीग परिषद ने कैबिनेट मिशन योजना से स्वीकृति वापस ली; और दिल्ली में संविधान सभा बैठी तथा 15 अगस्त 1947 को सत्ता सौंपी गई।
◆ लाल चिह्न (सांप्रदायिक हिंसा के केंद्र) — कलकत्ता (16 अगस्त 1946 की सीधी कार्रवाई), नोआखाली (अक्टूबर 1946), पटना के आसपास का बिहार (अक्टूबर–नवंबर 1946), गढ़मुक्तेश्वर (नवंबर 1946), तथा रावलपिंडी और अमृतसर (मार्च 1947 से) — इन सबका विवरण खंड 8 में है।
◆ बैंगनी चिह्न (जनमत संग्रह या मत) — पेशावर पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत के जनमत संग्रह का, सिलहट असम के उस ज़िले के जनमत संग्रह का और क्वेटा बलूचिस्तान के शाही जिरगा के निर्णय का स्थान है।
◆ गुरदासपुर और श्रीनगर — गुरदासपुर की तीन तहसीलें भारत को मिलने से जम्मू-कश्मीर तक सड़क मार्ग भारत के पास रहा। श्रीनगर जम्मू-कश्मीर रियासत की राजधानी थी, जिसके महाराजा हरि सिंह ने 26 अक्टूबर 1947 को भारत में विलय के पत्र पर हस्ताक्षर किए। संपूर्ण जम्मू-कश्मीर और लद्दाख भारत का अभिन्न अंग हैं।
◆ 14 अगस्त, कराची — माउंटबेटन ने कराची में पाकिस्तान की संविधान सभा को संबोधित किया और सत्ता सौंपने की औपचारिकता पूरी की। मोहम्मद अली जिन्ना पाकिस्तान के पहले गवर्नर जनरल और लियाक़त अली ख़ाँ पहले प्रधानमंत्री बने। माउंटबेटन को उसी रात दिल्ली के समारोह में भी रहना था, इसलिए कराची का समारोह एक दिन पहले रखा गया; पाकिस्तान अपना स्वतंत्रता दिवस 14 अगस्त को मनाता है।
◆ एक ही गवर्नर जनरल क्यों नहीं — माउंटबेटन चाहते थे कि कुछ समय के लिए वे दोनों डोमिनियनों के साझा गवर्नर जनरल रहें, ताकि बँटवारे का काम आसानी से निपटे। कांग्रेस इसके लिए तैयार थी, पर जिन्ना ने स्वयं पाकिस्तान का गवर्नर जनरल बनने का निर्णय लिया। इसलिए माउंटबेटन केवल भारत के गवर्नर जनरल बने।
◆ 14–15 अगस्त की आधी रात, दिल्ली — संविधान सभा का विशेष सत्र डॉ. राजेंद्र प्रसाद की अध्यक्षता में 14 अगस्त की रात को शुरू हुआ। आरंभ में सुचेता कृपलानी ने "वंदे मातरम्" गाया। नेहरू ने अपना प्रसिद्ध भाषण "नियति से साक्षात्कार" दिया। ठीक बारह बजे सदस्यों ने देश की सेवा की शपथ ली। हंसा मेहता ने भारत की महिलाओं की ओर से राष्ट्रीय ध्वज भेंट किया। सत्र के अंत में "सारे जहाँ से अच्छा" और "जन गण मन" गाए गए।
❝ बहुत वर्ष पहले हमने नियति से एक वादा किया था, और अब वह समय आ गया है जब हम अपनी प्रतिज्ञा पूरी करेंगे — पूरी तरह न सही, पर बहुत हद तक। आधी रात के इस क्षण, जब दुनिया सो रही है, भारत जीवन और स्वतंत्रता के लिए जागेगा। ❞ (जवाहरलाल नेहरू, संविधान सभा, 14–15 अगस्त 1947 की मध्यरात्रि) |
◆ 15 अगस्त — लॉर्ड माउंटबेटन ने स्वतंत्र भारत के पहले गवर्नर जनरल के रूप में शपथ ली और जवाहरलाल नेहरू देश के पहले प्रधानमंत्री बने। सरदार पटेल उप-प्रधानमंत्री और गृह मंत्री बने। पहले मंत्रिमंडल में कांग्रेस से बाहर के योग्य लोगों को भी स्थान दिया गया — डॉ. भीमराव आंबेडकर विधि मंत्री, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी उद्योग और आपूर्ति मंत्री तथा आर. के. षण्मुखम चेट्टी वित्त मंत्री बने।
◆ 16 अगस्त — नेहरू ने दिल्ली के लाल क़िले की प्राचीर पर तिरंगा फहराया। तभी से हर स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री लाल क़िले से ध्वज फहराते और देश को संबोधित करते हैं।
◆ गांधीजी कहाँ थे — गांधीजी दिल्ली के उत्सव में नहीं थे। वे कलकत्ता के बेलियाघाटा में दंगा-पीड़ितों के बीच थे और उन्होंने वह दिन उपवास, प्रार्थना और चरखा कातने में बिताया (खंड 8)। जब उनसे स्वतंत्रता दिवस पर संदेश माँगा गया तो उन्होंने कहा कि उनके पास देने को कुछ नहीं बचा है।
◆ आगे — माउंटबेटन 21 जून 1948 तक गवर्नर जनरल रहे। उसके बाद सी. राजगोपालाचारी स्वतंत्र भारत के पहले और अंतिम भारतीय गवर्नर जनरल बने। 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने पर यह पद समाप्त हो गया और डॉ. राजेंद्र प्रसाद पहले राष्ट्रपति बने।
अब तक हमने घटनाओं को क्रम से पढ़ा। इस अंतिम खंड में हम पूरे अध्याय को समेटकर चार प्रश्नों के उत्तर खोजेंगे — विभाजन क्यों हुआ, इतिहासकार इसे कैसे देखते हैं, इसके परिणाम क्या हुए और क्या इसे टाला जा सकता था।

◆ (1) "फूट डालो और राज करो" की ब्रिटिश नीति — 1857 के बाद अंग्रेज़ों ने समझ लिया था कि हिंदू-मुस्लिम एकता उनके राज के लिए सबसे बड़ा ख़तरा है। इसलिए उन्होंने दोनों समुदायों को अलग-अलग राजनीतिक इकाई मानने की नीति अपनाई। 1909 में मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन शुरू किया गया, जिसमें मुस्लिम मतदाता केवल मुस्लिम उम्मीदवार को चुनते थे। 1932 के सांप्रदायिक पंचाट ने इसे और फैलाया। 1940 के बाद सरकार ने लीग को मुसलमानों का एकमात्र प्रतिनिधि मानना शुरू कर दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि राजनीति धर्म की रेखा पर चलने लगी।
◆ (2) मुस्लिम लीग और जिन्ना — लीग ने द्वि-राष्ट्र सिद्धांत को अपनी राजनीति का आधार बनाया और 1940 के लाहौर प्रस्ताव में अलग राज्य की माँग रखी। जिन्ना ने हर वार्ता में पाकिस्तान से कम किसी बात पर समझौता नहीं किया। 1945–46 के चुनावों में लीग ने मुस्लिम सीटों पर भारी जीत पाई, जिससे उसका यह दावा मज़बूत हुआ कि मुसलमान पाकिस्तान चाहते हैं।
◆ (3) सांप्रदायिक राजनीति की दोनों धाराएँ — सांप्रदायिकता केवल एक ओर नहीं थी। मुस्लिम सांप्रदायिकता के साथ-साथ हिंदू सांप्रदायिक संगठन भी सक्रिय थे, जो हिंदुओं को अलग राष्ट्र बताते थे। दोनों ने इतिहास और धर्म का राजनीतिक उपयोग किया और एक-दूसरे के डर को बढ़ाया। एक की उग्रता दूसरे को खाद देती रही।
◆ (4) कांग्रेस की सीमाएँ — कांग्रेस धर्मनिरपेक्ष थी, पर वह मुस्लिम जनता को पूरी तरह अपने साथ नहीं जोड़ सकी। 1937 में संयुक्त प्रांत में लीग के साथ साझा सरकार न बनाने से लीग को यह प्रचार करने का मौक़ा मिला कि कांग्रेस के राज में मुसलमानों को हिस्सा नहीं मिलेगा। नेहरू का मुस्लिम जनसंपर्क अभियान सफल नहीं हुआ। फिर 1942 से 1945 तक कांग्रेस के लगभग सभी नेता जेल में रहे और मैदान लीग के लिए ख़ाली रहा।
◆ (5) ब्रिटिश संवैधानिक योजनाएँ — हर ब्रिटिश प्रस्ताव ने लीग का हाथ मज़बूत किया। अगस्त प्रस्ताव (1940) ने कहा कि अल्पसंख्यकों की सहमति के बिना कोई संविधान नहीं थोपा जाएगा — यह लीग को एक प्रकार का वीटो था। क्रिप्स प्रस्ताव (1942) ने प्रांतों को संघ से अलग रहने का अधिकार देकर पहली बार बँटवारे की संभावना को मान्यता दी। शिमला सम्मेलन (1945) में वेवेल ने जिन्ना की ज़िद पर पूरा सम्मेलन ही विफल घोषित कर दिया।
◆ (6) सीधी कार्रवाई और दंगे — 16 अगस्त 1946 से कलकत्ता, नोआखाली, बिहार और पंजाब में जो हिंसा फैली, उसने दोनों समुदायों के बीच विश्वास समाप्त कर दिया। गृहयुद्ध के डर ने कांग्रेस को विभाजन मानने की ओर धकेला — पंत के शब्दों में विकल्प "विभाजन या आत्महत्या" का था।
◆ (7) अंतरिम सरकार का गतिरोध — लीग ने सरकार के भीतर रहकर काम रोका (खंड 9)। इस अनुभव ने कांग्रेस नेताओं को विश्वास दिला दिया कि साझा शासन असंभव है।
◆ (8) ब्रिटेन की जल्दबाज़ी — विश्वयुद्ध से आर्थिक रूप से थका ब्रिटेन भारत से जल्दी निकलना चाहता था। एटली ने जून 1948 की समय-सीमा दी और माउंटबेटन ने उसे घटाकर 15 अगस्त 1947 कर दिया। इतनी जल्दी में न तो सीमा ठीक से तय हो सकी, न आबादी की अदला-बदली की कोई व्यवस्था बनी और न पर्याप्त सुरक्षा बल लगाए जा सके। इसलिए विभाजन इतना रक्तरंजित हुआ।
विभाजन के लिए कौन ज़िम्मेदार था — इस प्रश्न पर इतिहासकार एकमत नहीं हैं। मुख्य दृष्टिकोण इस प्रकार हैं।
◆ साम्राज्यवादी दृष्टिकोण — ब्रिटिश अधिकारियों और उनके समर्थक लेखकों का मत था कि हिंदू और मुसलमान सदियों से दो अलग समुदाय थे, जो कभी एक राष्ट्र नहीं रहे। उनके अनुसार अंग्रेज़ तो केवल एक निष्पक्ष मध्यस्थ थे, जिन्होंने अंत तक एकता बचाने की कोशिश की। इस मत की कमज़ोरी यह है कि यह ब्रिटिश नीतियों — पृथक निर्वाचन और लीग को संरक्षण — की भूमिका को छिपा देता है।
◆ राष्ट्रवादी दृष्टिकोण — राष्ट्रवादी इतिहासकारों के अनुसार विभाजन का मुख्य कारण अंग्रेज़ों की "फूट डालो और राज करो" की नीति और लीग की सांप्रदायिक राजनीति थी। उनके अनुसार भारत में साझी संस्कृति की लंबी परंपरा थी और सांप्रदायिकता एक आधुनिक चीज़ थी, जो औपनिवेशिक शासन में पैदा हुई।
◆ जिन्ना की रणनीति पर नया मत — इतिहासकार आयशा जलाल का तर्क है कि जिन्ना के लिए "पाकिस्तान" की माँग शुरू में एक मोलभाव का हथियार थी। वे वास्तव में एक कमज़ोर केंद्र वाले संघ में मुसलमानों के लिए हिंदुओं के बराबर की हैसियत चाहते थे। इसीलिए उन्होंने 1946 में कैबिनेट मिशन योजना मान ली थी। इस मत के अनुसार जब कांग्रेस ने मज़बूत केंद्र के लिए कमज़ोर संघ ठुकरा दिया, तब जिन्ना को वही "कटा-छँटा" पाकिस्तान लेना पड़ा जिसे वे पहले अस्वीकार कर चुके थे। अनेक इतिहासकार इस मत से सहमत नहीं हैं।
◆ कांग्रेस की भूलों पर ज़ोर देने वाला मत — कुछ विद्वान और स्वयं मौलाना आज़ाद मानते थे कि कांग्रेस ने कई मौक़े गँवाए — 1937 में साझा सरकार से इनकार, 10 जुलाई 1946 का नेहरू का वक्तव्य (खंड 6) और 1947 में जल्दी सत्ता पाने की उतावली। आज़ाद का मत था कि कैबिनेट मिशन योजना पर टिके रहने से देश की एकता बच सकती थी।
◆ रियायतों की नीति की आलोचना — एक मत यह भी है कि कांग्रेस ने लीग से बार-बार समझौते की कोशिश करके उसका क़द बढ़ाया। 1916 के लखनऊ समझौते में पृथक निर्वाचन को मान लेना और 1944 में गांधीजी का जिन्ना के घर जाकर बराबरी के स्तर पर वार्ता करना — इनसे जिन्ना का महत्त्व बढ़ा और सांप्रदायिक माँगें कठोर होती गईं।
◆ जन-इतिहास और मौखिक इतिहास — हाल के दशकों में इतिहासकारों ने नेताओं के निर्णयों की जगह आम लोगों के अनुभव पर ध्यान दिया है। उन्होंने शरणार्थियों, स्त्रियों और बच्चों की स्मृतियाँ दर्ज कीं। इस दृष्टि से विभाजन 15 अगस्त की एक घटना नहीं, बल्कि एक लंबी प्रक्रिया था, जिसका दर्द पीढ़ियों तक चला। आम लोगों ने इसे "बँटवारा", "तक़सीम", "रौला", "हुल्लड़" और "मार्शल-लॉ" जैसे शब्दों से याद किया। कई विद्वान इसकी हिंसा की तुलना यूरोप के महाध्वंस (होलोकॉस्ट) से करते हैं; अंतर यह है कि यहाँ हत्याएँ किसी सरकार ने नहीं, बल्कि आम लोगों के गिरोहों ने कीं।
◆ विस्थापन — लगभग 1.2 से 1.5 करोड़ लोग अपना घर छोड़कर सीमा के पार गए। इसे मानव इतिहास के सबसे बड़े जन-पलायनों में गिना जाता है। पंजाब में आबादी की लगभग पूरी अदला-बदली हो गई — पश्चिमी पंजाब से हिंदू और सिख भारत आए और पूर्वी पंजाब से मुसलमान पाकिस्तान गए। बंगाल में पलायन धीमा पर लंबा रहा और वर्षों तक चलता रहा।
◆ हत्याएँ — मरने वालों की संख्या का कोई पक्का आँकड़ा नहीं है; अनुमान 2 लाख से 10 लाख तक के हैं। पैदल चलते क़ाफ़िलों और शरणार्थियों से भरी रेलगाड़ियों पर हमले हुए; कई गाड़ियाँ स्टेशन पर केवल शवों के साथ पहुँचीं।
◆ स्त्रियों पर अत्याचार — स्त्रियाँ इस हिंसा का सबसे बड़ा निशाना बनीं। अनुमान है कि दोनों ओर लगभग 75,000 स्त्रियों का अपहरण हुआ। कई परिवारों ने "इज़्ज़त बचाने" के नाम पर अपनी ही स्त्रियों को मार डाला या उन्हें कुओं में कूदने पर मजबूर किया। बाद में दोनों सरकारों ने अपहृत स्त्रियों की वापसी का समझौता किया, पर कई स्त्रियों को उनकी इच्छा पूछे बिना लौटाया गया।
◆ राहत — भारत सरकार ने राहत और पुनर्वास मंत्रालय बनाया। जगह-जगह शरणार्थी शिविर खोले गए; कुरुक्षेत्र का शिविर सबसे बड़ा था, जहाँ लाखों लोग ठहरे।
◆ बसाव — पश्चिमी पंजाब से आए किसानों को पूर्वी पंजाब में उन ज़मीनों पर बसाया गया जो वहाँ से गए लोग छोड़ गए थे। शहरों में — विशेषकर दिल्ली में — शरणार्थियों के लिए नई बस्तियाँ बसाई गईं। फ़रीदाबाद और नीलोखेड़ी जैसे नए नगर शरणार्थियों के पुनर्वास के लिए ही बसाए गए। बंगाल में समस्या लंबी खिंची, क्योंकि वहाँ से शरणार्थी वर्षों तक आते रहे।
🚂 उदाहरण से समझें — एक शरणार्थी परिवार की यात्रा लाहौर के पास के एक गाँव का किसान परिवार पीढ़ियों से उसी ज़मीन पर रहता आया है। 17 अगस्त को पता चलता है कि गाँव पाकिस्तान में चला गया। कुछ ही दिनों में परिवार घर, खेत और पशु छोड़कर एक क़ाफ़िले के साथ पैदल निकल पड़ता है। अमृतसर के शिविर में महीनों रहने के बाद उन्हें ऐसे गाँव में ज़मीन मिलती है जिसे कोई मुस्लिम परिवार इसी तरह छोड़कर गया था। यही कहानी सीमा के दोनों ओर लाखों परिवारों की थी। |
◆ कृषि और उद्योग का टूटना — जूट उगाने वाला पूर्वी बंगाल पाकिस्तान में चला गया, जबकि जूट की मिलें कलकत्ता के आसपास भारत में रह गईं। इसी तरह कपास उगाने वाले बड़े क्षेत्र पाकिस्तान में गए और कपड़ा मिलें भारत में रहीं।
◆ खाद्यान्न संकट — पश्चिमी पंजाब की नहरों से सिंचित उपजाऊ बस्तियाँ (जैसे लायलपुर और मोंटगोमरी) पाकिस्तान में चली गईं। इससे भारत में गेहूँ की कमी हुई और खाद्यान्न का संकट बढ़ा।
◆ संचार और जल — रेलमार्ग, सड़कें और नहरें बीच से कट गईं। सिंधु नदी तंत्र की नहरों के पानी को लेकर विवाद उठा, जो आगे चलकर 1960 की सिंधु जल संधि से सुलझा।
◆ कश्मीर समस्या — अक्टूबर 1947 में पाकिस्तान की ओर से क़बायली हमलावरों ने जम्मू-कश्मीर पर आक्रमण किया। महाराजा हरि सिंह ने 26 अक्टूबर 1947 को भारत में विलय के पत्र पर हस्ताक्षर किए और भारतीय सेना श्रीनगर पहुँची। यहीं से भारत-पाकिस्तान के बीच पहला युद्ध और एक लंबा विवाद शुरू हुआ।
◆ रियासतों का प्रश्न — 560 से अधिक रियासतों को भारत में मिलाना स्वतंत्र भारत की पहली बड़ी चुनौती थी, जिसे सरदार पटेल ने पूरा किया (अध्याय 17)।
◆ धर्मनिरपेक्षता का चुनाव — धर्म के नाम पर बँटवारे के बाद भी भारत ने अपने को किसी एक धर्म का राज्य नहीं बनाया। संविधान सभा ने एक धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य का संविधान बनाया, जिसमें सभी धर्मों के नागरिकों को बराबर अधिकार मिले। करोड़ों मुसलमान भारत में ही रहे। दूसरी ओर 1971 में पूर्वी पाकिस्तान के बांग्लादेश बन जाने से यह स्पष्ट हो गया कि केवल धर्म किसी राष्ट्र को जोड़े नहीं रख सकता — यह द्वि-राष्ट्र सिद्धांत की सबसे बड़ी सीमा थी।
◆ गांधीजी का बलिदान — दिल्ली में दंगे रोकने और पाकिस्तान को उसके हिस्से के 55 करोड़ रुपये दिलाने के लिए गांधीजी ने 13 से 18 जनवरी 1948 तक उपवास किया। 30 जनवरी 1948 को दिल्ली के बिड़ला भवन में प्रार्थना सभा के लिए जाते समय नाथूराम गोडसे ने गोली मारकर उनकी हत्या कर दी। जिस व्यक्ति ने जीवन भर सांप्रदायिक एकता के लिए काम किया, वह उसी के लिए शहीद हुआ।
इस प्रश्न का सीधा उत्तर "हाँ" या "नहीं" में नहीं दिया जा सकता। पहले नीचे के बॉक्स में देखिए कि 15 अगस्त 1947 को देश ने क्या पाया और क्या खोया; फिर एक संतुलित उत्तर के लिए चार बातें ध्यान में रखिए।
🟩 स्वतंत्रता की उपलब्धि ✔ लगभग दो सौ वर्ष का औपनिवेशिक शासन समाप्त हुआ और सत्ता भारतीयों के हाथ में आई। ✔ भारत को एक मज़बूत केंद्र और संप्रभु संविधान सभा मिली, जिसने लोकतांत्रिक संविधान बनाया। ✔ देश अनेक टुकड़ों में बँटने से बच गया और रियासतें भारत में मिल सकीं। | 🟥 विभाजन की क़ीमत ✔ देश दो भागों में बँट गया और एक करोड़ से अधिक लोग बेघर हुए। ✔ लाखों लोग मारे गए और हज़ारों स्त्रियों पर अत्याचार हुए। ✔ कश्मीर विवाद और दोनों देशों के बीच स्थायी तनाव की नींव पड़ी। |
◆ विभाजन अनिवार्य नहीं था — 1937 तक लीग एक कमज़ोर दल थी और 1940 तक पाकिस्तान की माँग को गंभीरता से लेने वाले बहुत कम थे। केवल सात वर्षों में स्थिति बदली। इसका अर्थ है कि विभाजन इतिहास का कोई पहले से तय परिणाम नहीं था; वह कुछ विशेष परिस्थितियों और निर्णयों का नतीजा था।
◆ 1946–47 तक विकल्प बहुत सिमट चुके थे — सीधी कार्रवाई के बाद की हिंसा, अंतरिम सरकार के गतिरोध और ब्रिटेन की जल्दबाज़ी के बीच कांग्रेस के सामने वास्तविक विकल्प बहुत कम थे — या तो कमज़ोर केंद्र वाला ढीला संघ, जो कभी भी टूट सकता था; या लंबा गृहयुद्ध; या विभाजन। नेताओं ने तीसरे को "कम बुराई" माना।
◆ कांग्रेस की असली विफलता — कांग्रेस की भूल यह नहीं थी कि उसने 1947 में विभाजन माना; उसकी बड़ी विफलता यह थी कि वह दशकों के आंदोलन में मुस्लिम जनता को पर्याप्त संख्या में राष्ट्रीय धारा से नहीं जोड़ सकी और सांप्रदायिकता के विरुद्ध विचारों की लड़ाई नहीं जीत सकी। वह नेताओं से समझौते पर अधिक और जनता के बीच काम पर कम निर्भर रही।
◆ जल्दबाज़ी की क़ीमत — विभाजन का निर्णय जो भी रहा हो, उसकी भयानक मानवीय क़ीमत काफ़ी हद तक टाली जा सकती थी। यदि सत्ता-हस्तांतरण के लिए अधिक समय लिया जाता, सीमा पहले घोषित की जाती और पर्याप्त सेना लगाई जाती, तो इतनी हत्याएँ न होतीं। इसकी ज़िम्मेदारी मुख्यतः ब्रिटिश सरकार और माउंटबेटन पर आती है।
1944 से 1947 के बीच सांप्रदायिक गतिरोध सुलझाने के लिए चार बड़ी योजनाएँ आईं। नीचे का आरेख उनकी तुलना एक नज़र में दिखाता है; उसके बाद हर योजना को चार बातों — प्रस्तावक, मुख्य बात, पाकिस्तान पर रुख़ और परिणाम — के आधार पर समझाया गया है।

◆ सी. आर. फ़ॉर्मूला (1944) — इसे चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने गांधीजी की सहमति से रखा। इसकी मुख्य बात यह थी कि लीग स्वतंत्रता की माँग में कांग्रेस का साथ दे और युद्ध के बाद मुस्लिम बहुल ज़िलों में सभी वयस्कों का जनमत संग्रह हो। इसमें अलग होने की संभावना मानी गई थी, पर शर्त यह थी कि रक्षा, व्यापार और संचार के लिए दोनों भागों में साझा समझौता रहे। जिन्ना ने इसे ठुकरा दिया, क्योंकि वे केवल मुसलमानों का मत, पूरे प्रांत और द्वि-राष्ट्र सिद्धांत की स्वीकृति चाहते थे (खंड 3)।
◆ वेवेल योजना (1945) — इसे वायसराय लॉर्ड वेवेल ने शिमला सम्मेलन में रखा। इसकी मुख्य बात थी कि वायसराय की कार्यकारी परिषद में वायसराय और प्रधान सेनापति को छोड़कर सभी सदस्य भारतीय हों और उसमें सवर्ण हिंदुओं तथा मुसलमानों को बराबर स्थान मिले। पाकिस्तान के प्रश्न को इसने टाल दिया; यह केवल एक अंतरिम व्यवस्था थी। जिन्ना ने माँग की कि सारे मुस्लिम सदस्य लीग ही नामित करेगी; इस पर वेवेल ने सम्मेलन को विफल घोषित कर दिया और लीग को व्यवहार में वीटो मिल गया (खंड 4)।
◆ कैबिनेट मिशन योजना (1946) — इसे ब्रिटिश मंत्रिमंडल के तीन सदस्यों — पेथिक-लॉरेंस, क्रिप्स और ए. वी. अलेक्ज़ेंडर — ने रखा। इसमें कमज़ोर संघ, प्रांतों के तीन समूह (क, ख और ग), संविधान सभा और अंतरिम सरकार की व्यवस्था थी। इसने पूर्ण पाकिस्तान की माँग को अस्वीकार किया, पर समूहों की व्यवस्था में लीग को उसकी झलक दिखी। समूहीकरण की व्याख्या पर कांग्रेस और लीग टकराए; लीग ने स्वीकृति वापस ले ली और सीधी कार्रवाई शुरू की (खंड 6 और 8)।
◆ माउंटबेटन योजना (3 जून 1947) — इसे लॉर्ड माउंटबेटन ने वी. पी. मेनन के सुझाव के आधार पर ब्रिटिश सरकार की ओर से रखा। इसमें भारत और पाकिस्तान दो डोमिनियन बनाने, पंजाब और बंगाल को बाँटने तथा रियासतों को किसी एक में मिलने का निर्णय स्वयं लेने देने की व्यवस्था थी। इसने पाकिस्तान को स्वीकार किया, पर "कटा-छँटा" — पूरा पंजाब और पूरा बंगाल उसे नहीं मिला। कांग्रेस और लीग दोनों ने इसे माना और 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता के साथ विभाजन हुआ (खंड 10)।
🧭 चारों योजनाओं में एक रुझान देखिए 1944 में पाकिस्तान केवल एक संभावना था, जिसे जनमत संग्रह पर छोड़ा गया। 1945 में इस प्रश्न को टाला गया। 1946 में उसे अस्वीकार किया गया, पर समूहों के रूप में आधा रास्ता दे दिया गया। 1947 में उसे स्वीकार कर लिया गया। यानी हर असफल वार्ता के बाद लीग की स्थिति पहले से मज़बूत होती गई और संयुक्त भारत की संभावना घटती गई। |
नीचे इस अध्याय की प्रमुख तिथियाँ क्रम से दी गई हैं। परीक्षा से पहले इस तालिका को एक बार अवश्य दोहराएँ।
वर्ष / तिथि | घटना |
1906 और 1909 | 30 दिसंबर 1906 को ढाका में मुस्लिम लीग बनी और 1909 के अधिनियम से पृथक निर्वाचन शुरू हुआ। |
1930 और 1933 | 29 दिसंबर 1930 को इक़बाल ने इलाहाबाद में भाषण दिया और 28 जनवरी 1933 को रहमत अली ने "पाकिस्तान" शब्द दिया। |
1937–1939 | 1937 के चुनावों में लीग कमज़ोर रही, फिर उसने अपना पुनर्गठन किया और 22 दिसंबर 1939 को "मुक्ति दिवस" मनाया। |
1940 | लाहौर प्रस्ताव 23 मार्च को प्रस्तुत और 24 मार्च को पारित हुआ; 8 अगस्त को अगस्त प्रस्ताव आया। |
1942 | क्रिप्स प्रस्ताव ने प्रांतों को संघ से अलग रहने का अधिकार दिया और अप्रैल में राजगोपालाचारी का मद्रास प्रस्ताव आया। |
1944 | सी. आर. फ़ॉर्मूला सामने आया और 9 से 27 सितंबर तक गांधी-जिन्ना वार्ता चली। |
1945 | 14 जून को वेवेल योजना घोषित हुई, 25 जून से 14 जुलाई तक शिमला सम्मेलन चला और वर्ष के अंत में केंद्रीय चुनाव हुए। |
1946 (मार्च–जून) | 24 मार्च को कैबिनेट मिशन दिल्ली पहुँचा, 16 मई को उसकी योजना आई, 6 जून को लीग ने और 25 जून को कांग्रेस ने उसे स्वीकार किया। |
1946 (जुलाई–दिसंबर) | 29 जुलाई को लीग ने स्वीकृति वापस ली, 16 अगस्त को सीधी कार्रवाई हुई, 2 सितंबर को अंतरिम सरकार बनी, 26 अक्टूबर को लीग उसमें आई और 9 दिसंबर को संविधान सभा बैठी। |
1947 (फ़रवरी–मई) | 20 फ़रवरी को एटली की घोषणा हुई, 24 मार्च को माउंटबेटन वायसराय बने और मई में प्लान बाल्कन छोड़कर मेनन योजना अपनाई गई। |
1947 (जून) | 3 जून को माउंटबेटन योजना घोषित हुई, 14–15 जून को कांग्रेस समिति ने उसे स्वीकार किया, 20 जून को बंगाल और 23 जून को पंजाब ने विभाजन चुना तथा 30 जून को सीमा आयोग बने। |
1947 (जुलाई–अगस्त) | जुलाई में सिलहट और सीमा प्रांत में जनमत संग्रह हुए, 18 जुलाई को स्वतंत्रता अधिनियम बना, 15 अगस्त को भारत स्वतंत्र हुआ और 17 अगस्त को रेडक्लिफ़ रेखा प्रकाशित हुई। |
1947–1948 | 26 अक्टूबर 1947 को कश्मीर का विलय हुआ, 30 जनवरी 1948 को गांधीजी की हत्या हुई और 21 जून 1948 को राजगोपालाचारी गवर्नर जनरल बने। |
अब पूरे अध्याय को कुछ कीवर्ड में समेट लेते हैं, ताकि अंतिम समय में तेज़ी से दोहराया जा सके। दोहराते समय हर कीवर्ड को देखकर अपने-आप से तीन प्रश्न पूछिए — यह कब हुआ, इसमें क्या था और इसका परिणाम क्या निकला। जिस कीवर्ड पर उत्तर न सूझे, उसी का खंड खोलकर दोबारा पढ़ लीजिए; इस तरह पूरा अध्याय बहुत कम समय में दोहराया जा सकता है।
🔑 कीवर्ड सार विचार और माँग — पृथक निर्वाचन (1909), इक़बाल (1930), रहमत अली (1933), द्वि-राष्ट्र सिद्धांत, लाहौर प्रस्ताव (24 मार्च 1940 को पारित)। वार्ताएँ और योजनाएँ — सी. आर. फ़ॉर्मूला, गांधी-जिन्ना वार्ता (1944), देसाई-लियाक़त समझौता, वेवेल योजना और शिमला सम्मेलन (1945), कैबिनेट मिशन (1946) — समूह क, ख, ग। टकराव — 1945–46 के चुनाव, सीधी कार्रवाई दिवस (16 अगस्त 1946), कलकत्ता, नोआखाली, बिहार, गढ़मुक्तेश्वर, रावलपिंडी। अंतरिम सरकार — 2 सितंबर 1946, नेहरू उपाध्यक्ष, लीग 26 अक्टूबर को शामिल, लियाक़त का वित्त विभाग और बजट। 1947 — एटली की घोषणा (20 फ़रवरी), माउंटबेटन (24 मार्च), प्लान बाल्कन, वी. पी. मेनन, 3 जून योजना, स्वतंत्रता अधिनियम (18 जुलाई), रेडक्लिफ़ रेखा (17 अगस्त), "नियति से साक्षात्कार"। कथन — "विभाजन या आत्महत्या" (पंत), "कई पाकिस्तान" (पटेल), "कम बुराई" (नेहरू), "भेड़ियों के आगे फेंक दिया" (ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ाँ), "एक व्यक्ति की सीमा सेना" (माउंटबेटन, गांधीजी के लिए)। |
अंत में इस अध्याय की सबसे बड़ी सीख और आगे की दिशा —
💡 अंतिम बात आज़ादी की लड़ाई ने अंग्रेज़ी साम्राज्य को हरा दिया, पर सांप्रदायिकता को नहीं हरा सकी। 15 अगस्त 1947 एक साथ विजय और शोक का दिन था — एक ओर लाल क़िले पर तिरंगा, दूसरी ओर पंजाब और बंगाल में उजड़ते घर। फिर भी भारत ने विभाजन की आग से निकलकर धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य का रास्ता चुना। अब तक हमने राष्ट्रीय आंदोलन की मुख्य धारा — कांग्रेस, गांधीजी और संवैधानिक वार्ताओं — को पढ़ा। पर आज़ादी की लड़ाई केवल इतनी नहीं थी। अगले अध्याय में हम उसकी विविध धाराओं को पढ़ेंगे — मज़दूर आंदोलन, वामपंथ, किसान आंदोलन और रियासतों की जनता के प्रजामंडल आंदोलन। |