📖 अध्याय 13/20 — आधुनिक भारत का इतिहास

गांधी युग II: सविनय अवज्ञा से भारत छोड़ो और आज़ाद हिंद फ़ौज तक (1930–1946)

दांडी यात्रा और सविनय अवज्ञा, गोलमेज सम्मेलन, गांधी-इरविन समझौता, कराची अधिवेशन, सांप्रदायिक पंचाट और पूना पैक्ट, 1935 का अधिनियम, 1937 के मंत्रिमंडल, हरिपुरा-त्रिपुरी, द्वितीय विश्वयुद्ध, व्यक्तिगत सत्याग्रह, क्रिप्स मिशन, भारत छोड़ो आंदोलन, नेताजी और आज़ाद हिंद फ़ौज, लाल क़िला मुक़दमा और नौसेना विद्रोह
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🧂 कहानी से शुरुआत: एक मुट्ठी नमक

6 अप्रैल 1930, सुबह लगभग साढ़े छह बजे, दांडी (गुजरात)। 61 वर्ष के एक दुबले-पतले व्यक्ति ने समुद्र में स्नान किया, फिर तट पर सूखकर जमा हुई नमक की परत से एक मुट्ठी नमक उठाया और कहा — "इसके साथ मैं ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला रहा हूँ।"

आख़िर गांधीजी ने नमक जैसी साधारण चीज़ क्यों चुनी? क्योंकि नमक हर घर की ज़रूरत था। 1882 के नमक अधिनियम ने उसके उत्पादन और बिक्री पर सरकार का एकाधिकार बना रखा था, और कर कभी-कभी नमक की लागत का चौदह गुना तक पहुँच जाता था। सबसे ग़रीब आदमी भी अपने भोजन के सबसे सस्ते तत्व पर भारी कर दे रहा था।

12 मार्च 1930 को वे 78 साथियों के साथ साबरमती आश्रम से पैदल निकले। अंग्रेज़ अधिकारी और कुछ पत्रकार हँस रहे थे: "क्या केतली में पानी उबालकर सम्राट को हराया जा सकता है?" पर लगभग 385 किलोमीटर की इस यात्रा में, जो 24 दिन चली, हर गाँव में हज़ारों लोग जुड़ते गए, कई ग्राम-अधिकारी पद छोड़ने लगे और पूरी दुनिया की नज़र भारत पर टिक गई।

दांडी के बाद पूरे देश में लोग नमक बनाने लगे। 5 मई को गांधीजी गिरफ़्तार हुए, पर आंदोलन नहीं रुका। 21 मई को धरासना में सत्याग्रहियों की पंक्ति-दर-पंक्ति लाठियों से गिरती रही, पर किसी ने हाथ तक नहीं उठाया। इस दृश्य की रिपोर्ट दुनिया भर के अख़बारों में छपी, और उस एक मुट्ठी नमक ने करोड़ों भारतीयों को, पहली बार लाखों महिलाओं समेत, क़ानून तोड़ने का साहस दे दिया।

पर इसका आगे क्या फल मिला? गोलमेज सम्मेलनों में क्या हुआ? दलितों के प्रश्न पर गांधीजी को अनशन क्यों करना पड़ा? "करो या मरो" के नारे तक देश कैसे पहुँचा? और एक नज़रबंद नेता घर से निकलकर आधी दुनिया क्यों पार कर गया? यही इस अध्याय की कहानी है, 1930 से 1946 तक की। आगे दो कहानियाँ भी मिलेंगी, जो पूना पैक्ट और नेताजी के "महान पलायन" को आसान तरीक़े से समझा देंगी।

📑 इस अध्याय में क्या-क्या पढ़ेंगे

01. पृष्ठभूमि: पूर्ण स्वराज के बाद गांधीजी के 11 सूत्र (1930)

02. दांडी यात्रा (12 मार्च – 6 अप्रैल 1930)

03. सविनय अवज्ञा का देशव्यापी प्रसार, दमन और मूल्यांकन

04. गोलमेज सम्मेलन, गांधी-इरविन समझौता और कराची अधिवेशन

05. आंदोलन का दूसरा चरण, सांप्रदायिक पंचाट और पूना पैक्ट (1932–1934)

06. भारत सरकार अधिनियम 1935 — प्रमुख प्रावधान

07. 1937 के चुनाव, कांग्रेस मंत्रिमंडल, हरिपुरा और त्रिपुरी

08. द्वितीय विश्वयुद्ध, अगस्त प्रस्ताव और व्यक्तिगत सत्याग्रह (1939–1941)

09. क्रिप्स मिशन (1942)

10. भारत छोड़ो आंदोलन (1942–1944)

11. नेताजी सुभाष चंद्र बोस और आज़ाद हिंद फ़ौज

12. युद्धोत्तर उभार: लाल क़िला मुक़दमा और नौसेना विद्रोह (1945–1946)

13. मूल्यांकन, मानचित्र, कालक्रम और सार

1. पृष्ठभूमि: पूर्ण स्वराज के बाद गांधीजी के 11 सूत्र (1930)

लाहौर अधिवेशन (दिसंबर 1929) ने जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में पूर्ण स्वराज को कांग्रेस का लक्ष्य घोषित किया, कार्यसमिति को सविनय अवज्ञा आरंभ करने का अधिकार दिया, और 26 जनवरी 1930 को पूरे देश में पहला "स्वतंत्रता दिवस" मनाया गया (अध्याय 12)। अब प्रश्न यह था कि आंदोलन किस मुद्दे पर और किस रूप में शुरू हो। फ़रवरी 1930 में साबरमती आश्रम में हुई कार्यसमिति की बैठक ने यह निर्णय पूरी तरह गांधीजी पर छोड़ दिया — यानी आंदोलन का समय, तरीक़ा और स्थान वही तय करेंगे।

गांधीजी हर बड़े आंदोलन से पहले सरकार को एक अंतिम अवसर देते थे, ताकि दुनिया देखे कि टकराव की ज़िम्मेदारी सरकार की है। इसी नीति के अनुसार उन्होंने 31 जनवरी 1930 को वायसराय लॉर्ड इरविन को ग्यारह माँगें (11 सूत्र) भेजीं और कहा कि यदि ये मान ली जाएँ तो वे सविनय अवज्ञा का विचार छोड़ देंगे। इन माँगों का असली उद्देश्य यह था कि "पूर्ण स्वराज" जैसा बड़ा और कुछ अमूर्त लगने वाला विचार हर वर्ग की रोज़मर्रा की ठोस शिकायतों से जुड़ जाए — ताकि किसान, व्यापारी, उद्योगपति और आम नागरिक, सबको लगे कि यह लड़ाई उनकी अपनी है।

📜 ग्यारह माँगें — एक-एक करके

(क) आम जनता के हित की माँगें

1. पूर्ण नशाबंदी — शराब और अन्य नशीले पदार्थों पर पूरी रोक लगाई जाए। सरकार की आय का बड़ा भाग आबकारी (शराब पर कर) से आता था, जबकि ग़रीब परिवार शराब की लत से बर्बाद हो रहे थे।

2. सैनिक व्यय में कम से कम 50% कटौती — भारत के राजस्व का बहुत बड़ा भाग ब्रिटिश साम्राज्य के हितों के लिए रखी गई सेना पर ख़र्च होता था, इसलिए इसे आधा करने की माँग की गई।

3. ऊँची सिविल सेवाओं के वेतन आधे किए जाएँ — अंग्रेज़ अधिकारियों को दुनिया में सबसे अधिक वेतन मिलते थे, जबकि जनता बहुत ग़रीब थी। गांधीजी का तर्क था कि ग़रीब देश का प्रशासन इतना महँगा नहीं होना चाहिए।

4. सभी राजनीतिक बंदियों की रिहाई — हत्या या हत्या के प्रयास के दोषियों को छोड़कर सभी राजनीतिक बंदियों को छोड़ा जाए, राजनीतिक मुक़दमे वापस हों और देश से निकाले गए भारतीयों को लौटने दिया जाए।

5. गुप्तचर विभाग (सी.आई.डी.) में सुधार — राजनीतिक कार्यकर्ताओं की जासूसी करने वाला यह विभाग समाप्त हो या जनता के प्रतिनिधियों के नियंत्रण में लाया जाए।

6. शस्त्र अधिनियम में बदलाव — भारतीयों को आत्मरक्षा के लिए हथियार रखने के लाइसेंस मिलें, जिनकी जाँच जनता के नियंत्रण में हो। 1878 के शस्त्र अधिनियम ने भारतीयों को लगभग निहत्था कर दिया था।

(ख) उद्योगपतियों और व्यापारियों की माँगें

7. रुपया-स्टर्लिंग विनिमय दर घटाकर 1 शिलिंग 4 पेंस की जाए — 1927 में सरकार ने रुपये का मूल्य 1 शिलिंग 6 पेंस तय किया था। इससे भारतीय निर्यात महँगा और ब्रिटिश आयात सस्ता हो गया था, जिससे भारतीय उद्योग और निर्यातकों को नुक़सान हो रहा था।

8. विदेशी कपड़े पर संरक्षण शुल्क — विदेशी (मुख्यतः लंकाशायर के) कपड़े पर ऊँचा आयात-कर लगे, ताकि भारतीय कपड़ा मिलें और हथकरघा प्रतिस्पर्धा में टिक सकें।

9. तटीय यातायात आरक्षण विधेयक पारित हो — भारत के तटों के बीच माल और यात्री ढोने का काम (तटीय जहाज़रानी) भारतीय कंपनियों के लिए आरक्षित हो, क्योंकि उस पर ब्रिटिश जहाज़ी कंपनियों का क़ब्ज़ा था।

(ग) किसानों की माँगें

10. लगान (भू-राजस्व) में 50% कमी — और उसे विधानमंडल के नियंत्रण में लाया जाए। 1929 से शुरू हुई विश्वव्यापी आर्थिक मंदी में फ़सलों के दाम आधे रह गए थे, पर लगान उतना ही वसूला जा रहा था।

11. नमक कर समाप्त हो — और नमक बनाने पर सरकार का एकाधिकार ख़त्म हो। यही माँग आगे पूरे आंदोलन का प्रतीक बन गई।

प्रतिक्रिया — कई युवा राष्ट्रवादियों को लगा कि पूर्ण स्वराज की घोषणा के एक सप्ताह बाद ऐसी "छोटी-छोटी" माँगें रखना लक्ष्य को कमज़ोर करना है। पर उद्योगपति वर्ग इन माँगों से बहुत प्रसन्न हुआ, क्योंकि तीन माँगें सीधे उसके हित की थीं। इरविन ने कोई ठोस उत्तर नहीं दिया। तब 2 मार्च 1930 को गांधीजी ने वायसराय को एक और पत्र लिखकर बता दिया कि यदि 11 मार्च तक माँगें नहीं मानी गईं, तो वे अगले दिन आश्रम के साथियों के साथ नमक क़ानून तोड़ने निकल पड़ेंगे। उत्तर में केवल खेद प्रकट किया गया। गांधीजी ने कहा — "मैंने घुटनों के बल बैठकर रोटी माँगी थी, पर बदले में मुझे पत्थर मिला।"

🔍 आसान परिभाषा: सविनय अवज्ञा

📘 परिभाषा: अन्यायपूर्ण क़ानूनों को जान-बूझकर, खुलेआम और अहिंसक ढंग से तोड़ना और उसकी सज़ा स्वेच्छा से स्वीकार करना। यह विचार अमेरिकी चिंतक हेनरी डेविड थोरो के निबंध से प्रेरित था। यह असहयोग (सरकार से सहयोग वापस लेना) से एक क़दम आगे है, क्योंकि इसमें क़ानून को सक्रिय रूप से तोड़ा जाता है।

💡 आसान भाषा में: "यह क़ानून ग़लत है, इसलिए मैं इसे नहीं मानूँगा — चाहे जेल जाना पड़े, पर मैं किसी पर हाथ नहीं उठाऊँगा।" "सविनय" का अर्थ है विनम्रता के साथ और "अवज्ञा" का अर्थ है आज्ञा न मानना। 🏠 उदाहरण: 1930 में लोगों ने नमक बनाया, वन क़ानून तोड़कर जंगल से लकड़ी और घास ली, और चौकीदारी कर या लगान देने से इनकार किया — यह सब सविनय अवज्ञा था। 1920–22 के असहयोग में लोगों ने केवल सरकारी स्कूल, अदालत और उपाधियाँ छोड़ी थीं।

📋 दोहराव तालिका: 11 सूत्र किस वर्ग के लिए

वर्ग

माँगें (संक्षेप में)

आम जनता

नशाबंदी, सैनिक व्यय और ऊँचे वेतनों में आधी कटौती, राजनीतिक बंदियों की रिहाई, सी.आई.डी. पर नियंत्रण और आत्मरक्षा के लिए शस्त्र-लाइसेंस की माँग की गई।

उद्योगपति और व्यापारी

रुपये की विनिमय दर 1 शिलिंग 4 पेंस करने, विदेशी कपड़े पर संरक्षण शुल्क लगाने और तटीय जहाज़रानी भारतीयों के लिए आरक्षित करने की माँग की गई।

किसान

लगान आधा करने और नमक कर तथा नमक पर सरकारी एकाधिकार समाप्त करने की माँग की गई।

2. दांडी यात्रा (12 मार्च – 6 अप्रैल 1930)

नीचे का चार्ट 1930 से 1934 तक की पूरी कहानी को आठ पड़ावों में दिखाता है। चार्ट केवल याद रखने के लिए है — इसके हर पड़ाव को इस खंड और आगे के तीन खंडों में विस्तार से समझाया गया है। पहले आठों पड़ावों को संक्षेप में क्रम से समझ लें:

चित्र 13.1: सविनय अवज्ञा आंदोलन और गोलमेज सम्मेलन का कालक्रम (1930–1934)
चित्र 13.1: सविनय अवज्ञा आंदोलन और गोलमेज सम्मेलन का कालक्रम (1930–1934)

◆ 11 सूत्री माँगें (31 जनवरी 1930) — गांधीजी ने इरविन को नमक कर हटाने, लगान आधा करने, नशाबंदी और राजनीतिक बंदियों की रिहाई जैसी ग्यारह माँगें भेजीं; उत्तर न मिलने पर आंदोलन का रास्ता खुल गया (खंड 1)।

◆ दांडी यात्रा (12 मार्च – 6 अप्रैल 1930) — गांधीजी 78 साथियों के साथ साबरमती से लगभग 385 किलोमीटर पैदल चलकर दांडी पहुँचे और 6 अप्रैल की सुबह मुट्ठी भर नमक उठाकर नमक क़ानून तोड़ा (यही खंड)।

◆ देशव्यापी प्रसार (अप्रैल–मई 1930) — वेदारण्यम में राजगोपालाचारी, पयन्नूर में केलप्पन, पेशावर के क़िस्सा ख़्वानी बाज़ार की घटना (23 अप्रैल), शोलापुर का विद्रोह, 5 मई को गांधीजी की गिरफ़्तारी और 21 मई को धरासना नमक कारख़ाने पर सत्याग्रह — ये सब खंड 2 और 3 में हैं।

◆ पहला गोलमेज सम्मेलन (1930–31) — लंदन में कांग्रेस के बिना 89 प्रतिनिधियों (राजा, लीग, महासभा, लिबरल, आंबेडकर) का सम्मेलन हुआ; इसके बाद 26 जनवरी 1931 को गांधीजी रिहा किए गए (खंड 4.1)।

◆ गांधी-इरविन समझौता (5 मार्च 1931) — सविनय अवज्ञा स्थगित हुई और कांग्रेस गोलमेज में जाने को राज़ी हुई; बदले में अहिंसक बंदियों की रिहाई, तटीय क्षेत्रों में नमक बनाने की छूट और शांतिपूर्ण धरने की अनुमति मिली (खंड 4.2)।

◆ कराची अधिवेशन (26–31 मार्च 1931) — सरदार पटेल की अध्यक्षता में समझौते की पुष्टि हुई, मौलिक अधिकार और राष्ट्रीय आर्थिक कार्यक्रम का प्रस्ताव पारित हुआ और भगत सिंह आदि (23 मार्च को फाँसी) के बलिदान की सराहना की गई (खंड 4.3)।

◆ दूसरा गोलमेज सम्मेलन (सितंबर–दिसंबर 1931) — गांधीजी "एस. एस. राजपूताना" जहाज़ से कांग्रेस के एकमात्र प्रतिनिधि बनकर गए; अल्पसंख्यक प्रश्न पर गतिरोध के कारण ख़ाली हाथ लौटे (खंड 4.4)।

◆ दूसरा चरण और समाप्ति (1932–1934) — जनवरी 1932 में आंदोलन फिर शुरू हुआ, गांधीजी गिरफ़्तार हुए और कांग्रेस अवैध घोषित हुई; 1932 में सांप्रदायिक पंचाट और पूना पैक्ट हुए, नवंबर-दिसंबर 1932 में तीसरा गोलमेज हुआ और अप्रैल 1934 में आंदोलन वापस ले लिया गया (खंड 4.5 और 5)।

🧂 2.1 नमक ही क्यों?

कई लोगों को आश्चर्य हुआ कि इतने बड़े आंदोलन के लिए गांधीजी ने "नमक" जैसा साधारण विषय क्यों चुना। पर यही उनकी राजनीतिक प्रतिभा थी। इसके पीछे कई कारण थे:

◆ हर घर की ज़रूरत — नमक अमीर-ग़रीब, हिंदू-मुसलमान, शहरी-ग्रामीण, सबके भोजन का हिस्सा था। इसलिए नमक कर का बोझ सबसे ग़रीब व्यक्ति पर भी पड़ता था। गांधीजी के शब्दों में, "पानी के बाद नमक ही ऐसी वस्तु है जिस पर कर लगाकर सरकार भूखे करोड़ों, बीमारों, अपंगों और पूरी तरह असहाय लोगों तक पहुँचती है... यह सबसे अमानवीय कर है।"

◆ सरकारी एकाधिकार — भारत के लंबे समुद्र-तट पर नमक आसानी से बन सकता था, फिर भी भारतीयों को स्वयं नमक बनाने या बेचने की अनुमति नहीं थी। 1882 के भारतीय नमक अधिनियम ने नमक के उत्पादन और बिक्री पर सरकार का एकाधिकार पक्का कर दिया था। सरकार तट पर प्राकृतिक रूप से बनने वाले बिना कर के नमक को भी नष्ट करवा देती थी।

◆ भारी कर — कर कभी-कभी नमक की लागत का चौदह गुना तक पहुँच जाता था, यानी ग़रीब आदमी अपने भोजन के सबसे सस्ते तत्व के लिए भी सरकार को भारी कर दे रहा था।

◆ सरल और अहिंसक — नमक क़ानून तोड़ना बहुत आसान था। कोई भी व्यक्ति — बच्चा, महिला, बूढ़ा — समुद्र का पानी उबालकर या तट से नमक उठाकर क़ानून तोड़ सकता था, और इसमें हिंसा की कोई गुंजाइश नहीं थी।

◆ प्रतीक की शक्ति — जैसे खादी ने स्वराज को हर घर से जोड़ा था, वैसे ही नमक ने स्वराज के ऊँचे आदर्श को ग्रामीण ग़रीब की सबसे ठोस शिकायत से जोड़ दिया। शहर के पढ़े-लिखे लोग भी नमक बनाकर गाँव के कष्ट से प्रतीकात्मक रूप से जुड़ गए।

मज़ाक़ और उत्तर — शुरू में अंग्रेज़ अधिकारियों और कुछ पत्रकारों ने इस योजना की खिल्ली उड़ाई। एक अंग्रेज़ पत्रकार ने पूछा — "क्या केतली में पानी उबालकर सम्राट को हराया जा सकता है?" इसके उत्तर में "स्टेट्समैन" अख़बार ने लिखा कि गांधीजी तब तक समुद्र का पानी उबाल सकते हैं जब तक डोमिनियन स्टेटस न मिल जाए। कुछ ही हफ़्तों में यह हँसी चिंता में बदल गई।

🚶 2.2 यात्रा: कौन, कब, कहाँ से कहाँ

◆ आरंभ — 12 मार्च 1930 की सुबह गांधीजी साबरमती आश्रम (अहमदाबाद) से 78 चुने हुए आश्रमवासियों के साथ पैदल निकले। गांधीजी स्वयं 61 वर्ष के थे। उन्होंने कहा था कि स्वराज मिले बिना वे आश्रम नहीं लौटेंगे — और सचमुच वे फिर कभी साबरमती में रहने नहीं लौटे; 1933 में उन्होंने आश्रम को हरिजन सेवा के लिए सौंप दिया।

◆ साथी कौन थे? — 78 सत्याग्रहियों को गांधीजी ने स्वयं चुना था। इनमें देश के लगभग हर भाग के लोग थे — गुजरात, महाराष्ट्र, संयुक्त प्रांत, पंजाब, सिंध, केरल, आंध्र, कर्नाटक, बिहार, बंगाल आदि से — और हिंदू, मुसलमान, ईसाई, सभी धर्मों के लोग शामिल थे, ताकि यात्रा पूरे भारत का प्रतिनिधित्व करे। इनमें गांधीजी के पुत्र मणिलाल गांधी और उनके सचिव प्यारेलाल जैसे आश्रमवासी थे; सबसे कम आयु के सत्याग्रही लगभग सोलह वर्ष के थे। इन 78 में कोई महिला नहीं थी — गांधीजी को डर था कि महिलाओं के होने से सरकार पर "महिलाओं की आड़ लेने" का आरोप लगाने का बहाना मिलेगा। बाद में कमलादेवी चट्टोपाध्याय जैसी महिलाओं के आग्रह पर उन्होंने आंदोलन के अगले चरणों में महिलाओं को खुलकर शामिल होने दिया।

◆ मार्ग — यात्रा गुजरात के अहमदाबाद, खेड़ा, भरूच और सूरत ज़िलों से होकर गुज़री। पहला रात्रि-पड़ाव असलाली में हुआ; फिर नडियाद, आणंद, बोरसद होते हुए, माही और नर्मदा नदियों को पार करके, भरूच, सूरत और नवसारी के रास्ते यात्री दांडी पहुँचे। कुल दूरी लगभग 385 किलोमीटर (240 मील) थी, जो 24 दिनों में — यानी रोज़ लगभग 16 किलोमीटर चलकर — पूरी की गई।

◆ रोज़ की दिनचर्या — सुबह प्रार्थना, फिर पैदल यात्रा, रास्ते के गाँवों में सभाएँ, शाम को चरख़ा कातना और डायरी लिखना। गांधीजी हर गाँव में बताते कि स्वराज का अर्थ क्या है और लोगों से शराब छोड़ने, खादी पहनने तथा अस्पृश्यता मिटाने को कहते।

◆ रास्ते के संदेश — गांधीजी ने गाँव के सरकारी कर्मचारियों — पटेल (मुखिया) और तलाटी (पटवारी) — से त्यागपत्र देने को कहा, और खेड़ा-भरूच क्षेत्र में सैकड़ों ग्राम-अधिकारियों ने पद छोड़ दिए। उन्होंने बार-बार कहा कि हिंदू-मुस्लिम एकता और अस्पृश्यता-निवारण के बिना स्वराज अधूरा है — "स्वराज के लिए आपको अछूतों के साथ की गई ग़लतियों का प्रायश्चित करना होगा।"

◆ दुनिया का ध्यान — देशी-विदेशी पत्रकार रोज़ यात्रा के साथ चलते थे और हर दिन की ख़बर दुनिया भर के अख़बारों में छपती थी। अमेरिकी पत्रिका "टाइम" पहले गांधीजी की "तिनके जैसी काया" का मज़ाक़ उड़ा रही थी, पर बाद में उसने लिखा कि इस यात्रा ने अंग्रेज़ शासकों को "गहरे तौर पर बेचैन" कर दिया है। सुभाष चंद्र बोस ने इस यात्रा की तुलना नेपोलियन के एल्बा से पेरिस लौटने से की, जब नेपोलियन के साथ चलते-चलते पूरी सेना और जनता जुड़ती गई थी।

◆ दांडी में क़ानून भंग — 5 अप्रैल को यात्री दांडी पहुँचे। वहाँ गांधीजी ने पत्रकारों से कहा — "शक्ति के विरुद्ध अधिकार की इस लड़ाई में मैं विश्व की सहानुभूति चाहता हूँ।" अगले दिन, 6 अप्रैल 1930 की सुबह प्रार्थना और समुद्र-स्नान के बाद उन्होंने तट से नमक उठाकर नमक क़ानून तोड़ा। यही सविनय अवज्ञा आंदोलन का औपचारिक आरंभ था। इसके बाद पूरे देश में लोग नमक बनाने लगे।

❝ कल हम नमक कर क़ानून तोड़ेंगे... यह आंदोलन इस विश्वास पर आधारित है कि जब एक पूरा राष्ट्र उठ खड़ा होता है और आगे बढ़ने लगता है, तो उसे नेता की ज़रूरत नहीं रह जाती। ❞ (महात्मा गांधी, दांडी, 5 अप्रैल 1930)

⛓️ 2.3 गांधीजी की गिरफ़्तारी और धरासना सत्याग्रह

◆ अगली योजना — दांडी के बाद गांधीजी ने घोषणा की कि वे पास के धरासना नमक कारख़ाने (सूरत ज़िला) पर शांतिपूर्ण "धावा" करेंगे और सरकारी नमक पर जनता का अधिकार जताएँगे। उन्होंने इसकी सूचना पत्र लिखकर वायसराय को भी दी।

◆ गिरफ़्तारी — इससे पहले ही 4–5 मई 1930 की रात दांडी के पास कराडी गाँव के शिविर से गांधीजी को गिरफ़्तार कर लिया गया और बिना मुक़दमे के यरवदा जेल (पूना) भेज दिया गया। इसके लिए 1827 के एक पुराने बम्बई रेगुलेशन का सहारा लिया गया, जिसमें बिना मुक़दमे बंदी बनाने की छूट थी।

◆ नेतृत्व का हस्तांतरण — गांधीजी की जगह धरासना अभियान का नेतृत्व 76 वर्ष के अब्बास तैयबजी (बड़ौदा के सेवानिवृत्त न्यायाधीश) ने संभाला, पर 12 मई को वे भी गिरफ़्तार हो गए। तब सरोजिनी नायडू ने नेतृत्व किया। उनके साथ गांधीजी के पुराने सहयोगी इमाम साहब और मणिलाल गांधी थे।

◆ 21 मई 1930 की घटना — लगभग दो से ढाई हज़ार सत्याग्रही शांत पंक्तियों में धरासना कारख़ाने की ओर बढ़े। कारख़ाने को काँटेदार तारों और पुलिस ने घेर रखा था। जैसे ही सत्याग्रहियों की एक पंक्ति आगे बढ़ती, पुलिस लोहे की नोक वाली लाठियों से उनके सिरों पर वार करती; वे चुपचाप गिर जाते और स्वयंसेवक उन्हें स्ट्रेचर पर उठा ले जाते — फिर अगली पंक्ति आगे बढ़ती। किसी ने हाथ तक नहीं उठाया। सैकड़ों लोग घायल हुए और सरोजिनी नायडू गिरफ़्तार हुईं।

◆ विश्व पर प्रभाव — अमेरिकी समाचार एजेंसी के पत्रकार वेब मिलर ने यह दृश्य अपनी आँखों से देखा। उनकी रिपोर्ट दुनिया भर के सैकड़ों अख़बारों में छपी और उसने अंग्रेज़ी शासन की "न्यायप्रियता" की छवि को गहरा आघात पहुँचाया। इसके बाद बम्बई के पास वडाला के नमक कारख़ाने पर भी ऐसे ही सत्याग्रह हुए।

💡 दांडी यात्रा का महत्त्व

(1) इसने पूरे देश में क़ानून-भंग का एक सरल, अहिंसक और सबके लिए संभव तरीक़ा दिया। (2) इसने राष्ट्रीय आंदोलन को अंतरराष्ट्रीय चर्चा का विषय बना दिया। (3) पहली बार बड़ी संख्या में महिलाएँ घर से निकलकर आंदोलन में आईं। (4) इसने दिखाया कि गांधीजी प्रतीकों की राजनीति के असाधारण कलाकार थे — एक मुट्ठी नमक पूरे साम्राज्य के अन्याय का प्रतीक बन गया।

3. सविनय अवज्ञा का देशव्यापी प्रसार, दमन और मूल्यांकन

दांडी के बाद आंदोलन आग की तरह पूरे देश में फैल गया। हर क्षेत्र ने अपनी स्थानीय शिकायत के अनुसार क़ानून तोड़ने का तरीक़ा चुना — तटीय क्षेत्रों में नमक, जंगल वाले क्षेत्रों में वन क़ानून, खेती वाले क्षेत्रों में लगान और पूर्वी भारत में चौकीदारी कर। नीचे क्षेत्रवार पूरा विवरण है।

3.1 पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत: ख़ुदाई ख़िदमतगार और पेशावर

◆ ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ाँ — पठान नेता ग़फ़्फ़ार ख़ाँ को उनकी अहिंसा और गांधीजी से निकटता के कारण "सीमांत गांधी" और पठानों के बीच "बादशाह ख़ान" कहा जाता है। उन्होंने पठानों में शिक्षा और समाज-सुधार का काम किया और पश्तो भाषा में "पख़्तून" नामक पत्रिका निकाली।

◆ ख़ुदाई ख़िदमतगार (1929) — "ख़ुदाई ख़िदमतगार" का अर्थ है "ईश्वर के सेवक"। यह पठानों का अहिंसक स्वयंसेवक संगठन था, जिसके सदस्य लाल रंग की वर्दी पहनते थे, इसलिए इन्हें "लाल कुर्ती" (रेड शर्ट्स) भी कहा गया। जिन पठानों को दुनिया लड़ाकू क़ौम मानती थी, उन्होंने अहिंसा की शपथ लेकर अंग्रेज़ों का सामना किया — यह गांधीवादी अहिंसा की बड़ी सफलता थी।

◆ क़िस्सा ख़्वानी बाज़ार की घटना (23 अप्रैल 1930) — ग़फ़्फ़ार ख़ाँ और अन्य नेताओं की गिरफ़्तारी के विरोध में पेशावर के क़िस्सा ख़्वानी बाज़ार में भारी भीड़ जमा हुई। अंग्रेज़ों ने बख़्तरबंद गाड़ियाँ भेजीं और निहत्थी भीड़ पर गोली चलवाई, जिसमें अनेक लोग मारे गए।

◆ गढ़वाल राइफ़ल्स का इनकार — इसी दौरान गढ़वाल राइफ़ल्स की पलटन के हिंदू सैनिकों ने हवलदार चंद्र सिंह गढ़वाली के नेतृत्व में निहत्थे मुसलमान पठानों पर गोली चलाने से इनकार कर दिया। उन पर कोर्ट मार्शल चला और उन्हें लंबी क़ैद की सज़ा दी गई। कुछ दिनों तक पेशावर शहर पर सरकार का नियंत्रण लगभग समाप्त हो गया, फिर सेना भेजकर क़ब्ज़ा वापस लिया गया।

◆ महत्त्व — इस घटना ने दो बातें सिद्ध कीं: पहली, कि भारतीय सैनिकों की राजभक्ति पर अंग्रेज़ पूरी तरह भरोसा नहीं कर सकते; और दूसरी, कि हिंदू-मुस्लिम एकता जनता के स्तर पर जीवित थी। पूरे आंदोलन में मुसलमानों की सबसे बड़ी भागीदारी इसी प्रांत में रही।

🔍 आसान परिभाषा: कोर्ट मार्शल (सैन्य न्यायालय)

📘 परिभाषा: सेना के भीतर बना वह विशेष न्यायालय, जो सैनिकों और सैन्य अधिकारियों के विरुद्ध सैन्य क़ानून तोड़ने (जैसे आदेश न मानना, विद्रोह, भगोड़ापन) के मामलों की सुनवाई करता है। इसके न्यायाधीश स्वयं सैन्य अधिकारी होते हैं।

💡 आसान भाषा में: सैनिक यदि अपने अफ़सर का आदेश न माने तो उस पर साधारण अदालत में नहीं, बल्कि सेना की अपनी अदालत में मुक़दमा चलता है — इसे ही कोर्ट मार्शल कहते हैं। 🏠 उदाहरण: 1930 में चंद्र सिंह गढ़वाली और उनके साथियों पर पेशावर में गोली न चलाने के लिए कोर्ट मार्शल चला; 1945 में आज़ाद हिंद फ़ौज के अधिकारियों पर लाल क़िले में जो मुक़दमा चला, वह भी कोर्ट मार्शल ही था (खंड 12)।

3.2 शोलापुर (महाराष्ट्र): मज़दूरों का उभार

◆ पृष्ठभूमि — शोलापुर कपड़ा मिलों का बड़ा औद्योगिक नगर था, जहाँ मज़दूरों में राष्ट्रीय भावना बहुत प्रबल थी।

◆ घटनाक्रम — मई 1930 में गांधीजी की गिरफ़्तारी का समाचार पहुँचते ही कपड़ा मज़दूरों ने हड़ताल कर दी। उन्होंने शराब की दुकानों, पुलिस चौकियों, अदालत और रेलवे स्टेशन जैसे सरकारी प्रतीकों पर हमले किए। कुछ दिनों तक नगर पर जनता का नियंत्रण रहा और एक तरह का समानांतर शासन बन गया।

◆ दमन और परिणाम — सरकार ने मार्शल लॉ (सैनिक शासन) लगाया, सेना बुलाई और बड़े पैमाने पर गिरफ़्तारियाँ कीं। बाद में मल्लप्पा धनशेट्टी, क़ुर्बान हुसैन, जगन्नाथ शिंदे और किसन सारडा — इन चार लोगों को फाँसी दी गई, जिन्हें शोलापुर के "चार हुतात्मा" के रूप में याद किया जाता है। यह घटना दिखाती है कि आंदोलन कहीं-कहीं अहिंसा की सीमा पार भी कर गया।

3.3 दक्षिण भारत: वेदारण्यम, पयन्नूर और आंध्र-कर्नाटक

◆ तमिलनाडु — वेदारण्यम यात्रा — गांधीजी के निकट सहयोगी सी. राजगोपालाचारी (राजाजी) ने अप्रैल 1930 में त्रिचिनापल्ली (तिरुचिरापल्ली) से तंजौर तट पर स्थित वेदारण्यम तक पैदल नमक यात्रा की और वहाँ नमक बनाकर क़ानून तोड़ा। इसे "दक्षिण की दांडी" भी कहा जाता है। राजाजी गिरफ़्तार कर लिए गए।

◆ मालाबार (केरल) — पयन्नूर यात्रा — के. केलप्पन, जो वायकोम सत्याग्रह के भी नेता थे, ने कालीकट से पयन्नूर तक नमक यात्रा की और पयन्नूर तट पर नमक क़ानून तोड़ा। युवा पी. कृष्ण पिल्लै ने कालीकट तट पर पुलिस की मार सहते हुए भी तिरंगा नहीं छोड़ा — वे आगे केरल में साम्यवादी आंदोलन के संस्थापकों में गिने गए।

◆ आंध्र और कर्नाटक — आंध्र के तटीय ज़िलों में नमक सत्याग्रह के शिविर लगाए गए, जहाँ से स्वयंसेवक टोलियों में नमक बनाने निकलते थे। कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ ज़िले के अंकोला में नमक सत्याग्रह हुआ, और कर्नाटक के वन क्षेत्रों में लोगों ने वन सत्याग्रह किया।

3.4 पूर्वी भारत: बिहार, बंगाल, उड़ीसा और असम

◆ बिहार — यहाँ नमक बनाना कठिन था, इसलिए चौकीदारी कर के विरुद्ध आंदोलन हुआ। चौकीदारी कर वह कर था जिससे गाँव के चौकीदारों का वेतन दिया जाता था — और ये चौकीदार सरकार के मुख़बिर का काम भी करते थे। सारण, मुंगेर, भागलपुर आदि में लोगों ने यह कर देने से इनकार किया, चौकीदारों से त्यागपत्र दिलवाए और सरकार ने इसके बदले संपत्ति ज़ब्त की और लोगों को पीटा। चंपारण और सारण में नमक सत्याग्रह भी हुआ।

◆ बंगाल — मिदनापुर ज़िले के तटीय भाग (कांथी आदि) में नमक सत्याग्रह हुआ और आरामबाग आदि में चौकीदारी कर का विरोध हुआ। इसी समय 18 अप्रैल 1930 को सूर्य सेन (मास्टर दा) के नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने चटगाँव शस्त्रागार पर हमला किया — यह अहिंसक आंदोलन का हिस्सा नहीं था, पर उसी राष्ट्रीय उभार का एक अलग रूप था (अध्याय 11)।

◆ उड़ीसा — गोपबंधु चौधरी के नेतृत्व में बालासोर ज़िले के तटीय गाँव इंचुडी में बड़े पैमाने पर नमक सत्याग्रह हुआ, जिसे उड़ीसा का सबसे बड़ा नमक सत्याग्रह माना जाता है।

◆ असम — यहाँ आंदोलन का रूप विद्यार्थियों का था। सरकार ने "कनिंघम परिपत्र" जारी करके छात्रों और उनके अभिभावकों से यह लिखित आश्वासन माँगा कि वे राजनीतिक गतिविधियों में भाग नहीं लेंगे। इसके विरोध में छात्रों ने बड़े पैमाने पर आंदोलन किया।

3.5 पूर्वोत्तर: रानी गाइदिन्ल्यू

◆ पृष्ठभूमि — मणिपुर और नगा क्षेत्र की ज़ेलियांग्रोंग नगा जनजातियों में हाइपौ जादोनांग ने "हेराका" नामक धार्मिक-सामाजिक आंदोलन चलाया, जो अपनी परंपराओं की रक्षा और अंग्रेज़ी शासन के विरोध का आंदोलन था। 1931 में अंग्रेज़ों ने जादोनांग को फाँसी दे दी।

◆ गाइदिन्ल्यू का संघर्ष — जादोनांग की शिष्या, मात्र तेरह वर्ष की आयु में आंदोलन से जुड़ी गाइदिन्ल्यू ने उनके बाद नेतृत्व संभाला और लोगों से अंग्रेज़ों को कर न देने को कहा। उनके समर्थकों ने अंग्रेज़ी चौकियों का सामना किया। अंग्रेज़ों ने उन्हें पकड़ने के लिए सैनिक अभियान चलाए और इनाम घोषित किया।

◆ गिरफ़्तारी और सम्मान — 1932 में लगभग सोलह वर्ष की आयु में वे गिरफ़्तार हुईं और उन्हें आजीवन कारावास दिया गया। 1937 में जवाहरलाल नेहरू ने शिलांग जेल में उनसे भेंट की और उन्हें "पहाड़ों की बेटी" कहते हुए "रानी" की उपाधि दी। वे भारत की स्वतंत्रता के बाद 1947 में रिहा हुईं और आगे उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। वे दिखाती हैं कि सविनय अवज्ञा का प्रभाव देश के सुदूर पहाड़ी क्षेत्रों तक पहुँचा था।

3.6 पश्चिम और उत्तर भारत: कर-बंदी और वन सत्याग्रह

◆ गुजरात — कर-बंदी — खेड़ा, बारडोली और बोरसद में किसानों ने लगान देना बंद कर दिया। सरकार ने उनकी ज़मीन और संपत्ति ज़ब्त करनी शुरू की, तो हज़ारों किसान अपने परिवार, पशु और सामान लेकर पास की बड़ौदा रियासत की सीमा में चले गए और महीनों खुले में डेरा डालकर रहे, पर लगान नहीं दिया। 1928 का बारडोली सत्याग्रह (सरदार पटेल) इन अभियानों के लिए आदर्श बन चुका था।

◆ महाराष्ट्र, कर्नाटक और मध्य प्रांत — वन सत्याग्रह — अंग्रेज़ी वन क़ानूनों ने आदिवासियों और किसानों को जंगल से लकड़ी, घास और पशु-चराई के पारंपरिक अधिकार से वंचित कर दिया था। इन क्षेत्रों में लोगों ने जान-बूझकर प्रतिबंधित जंगलों में पशु चराए और लकड़ी-घास काटी।

◆ संयुक्त प्रांत — "लगान नहीं, भाड़ा नहीं" — अक्टूबर 1930 में यहाँ दोहरा अभियान चला: ज़मींदार सरकार को राजस्व न दें और काश्तकार ज़मींदारों को लगान न दें। मंदी से पीड़ित किसानों में यह अभियान बहुत लोकप्रिय हुआ।

◆ शहरों में बहिष्कार और धरना — बम्बई, दिल्ली, कलकत्ता, इलाहाबाद आदि में विदेशी कपड़े और शराब की दुकानों पर धरना दिया गया। व्यापारी संघों ने विदेशी कपड़े का व्यापार बंद करने की शपथ ली। परिणाम यह हुआ कि एक वर्ष के भीतर ब्रिटेन से आने वाले कपड़े का आयात लगभग आधा रह गया।

3.7 नए वर्गों की भागीदारी

◆ महिलाएँ — इस आंदोलन की सबसे बड़ी नई बात महिलाओं की अभूतपूर्व भागीदारी थी। हज़ारों महिलाएँ नमक बनाने, शराब और विदेशी कपड़े की दुकानों पर धरना देने और प्रभातफेरियों में उतरीं और जेल गईं। सरोजिनी नायडू ने धरासना का नेतृत्व किया; कमलादेवी चट्टोपाध्याय ने बम्बई में नमक सत्याग्रह में भाग लिया; कस्तूरबा, कमला नेहरू और नेहरू की माता स्वरूप रानी इलाहाबाद में सक्रिय रहीं; कर्नाटक की अंबाबाई जैसी अनगिनत साधारण महिलाओं ने भी जेल यात्रा की।

◆ बच्चे और युवा — बच्चों की "वानर सेना" (लड़कों की टोली) और लड़कियों की "मंजरी सेना" बनीं, जो संदेश पहुँचाने, झंडे फहराने और पुलिस की गतिविधियों पर नज़र रखने का काम करती थीं। छात्रों ने बड़ी संख्या में पढ़ाई छोड़कर भाग लिया।

◆ व्यापारी और उद्योगपति — शुरू में उद्योगपतियों ने आंदोलन का खुलकर समर्थन किया, क्योंकि विदेशी माल के बहिष्कार से भारतीय मिलों को लाभ था। जी. डी. बिड़ला और पुरुषोत्तमदास ठाकुरदास जैसे उद्योगपति इस समय कांग्रेस के निकट थे। पर 1930 के अंत तक लंबे बहिष्कार से उनका व्यापार भी प्रभावित होने लगा, और वे समझौते के पक्ष में हो गए।

3.8 सरकारी दमन और आंदोलन की कमज़ोरियाँ

◆ दमन — सरकार ने एक के बाद एक अध्यादेश जारी किए, प्रेस पर कड़ी पाबंदी लगाई और जून 1930 में कांग्रेस कार्यसमिति को अवैध घोषित कर दिया। नेहरू, पटेल, राजाजी, मालवीय, जे. एम. सेनगुप्त जैसे बड़े नेता जेल में डाल दिए गए। निहत्थे सत्याग्रहियों पर लाठीचार्ज और गोलीबारी हुई, महिलाओं और बच्चों को भी पीटा गया। 60,000 से अधिक लोग जेल भेजे गए।

🔍 आसान परिभाषा: अध्यादेश और "अध्यादेश राज"

📘 परिभाषा: अध्यादेश वह अस्थायी क़ानून है जिसे गवर्नर-जनरल (आज राष्ट्रपति) विधानमंडल से पारित कराए बिना, अपनी विशेष शक्ति से तुरंत लागू कर देता है। अंग्रेज़ी शासन में गवर्नर-जनरल को यह शक्ति "आपातकाल" के नाम पर मिली हुई थी।

💡 आसान भाषा में: जब सरकार सभा, जुलूस, अख़बार आदि पर पाबंदी लगाने के लिए विधानसभा में बहस किए बिना ऊपर से आदेश-क़ानून जारी करती रहे, तो ऐसे शासन को "अध्यादेश राज" कहा गया। 🏠 उदाहरण: 1930–34 में प्रेस अध्यादेश, अवैध सभा अध्यादेश, धरना-निषेध अध्यादेश आदि जारी करके कांग्रेस के लगभग हर काम को अपराध बना दिया गया।

◆ कमज़ोरी 1 — मुसलमानों की कम भागीदारी — पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत को छोड़कर मुसलमानों की भागीदारी असहयोग आंदोलन (1920–22) की तुलना में बहुत कम रही। इसका कारण था — 1920 के दशक के सांप्रदायिक दंगे, सांप्रदायिक नेताओं का प्रचार और सरकार द्वारा मुस्लिम नेताओं को पृथक प्रतिनिधित्व के आश्वासन।

◆ कमज़ोरी 2 — मज़दूरों और दलितों का सीमित जुड़ाव — शोलापुर जैसे अपवादों को छोड़कर औद्योगिक मज़दूर बड़े पैमाने पर नहीं जुड़े, क्योंकि 1929 के मेरठ षड्यंत्र केस के बाद मज़दूर आंदोलन कमज़ोर था। डॉ. आंबेडकर के नेतृत्व में दलितों का एक बड़ा वर्ग अपने अलग राजनीतिक अधिकारों की माँग पर केंद्रित रहा।

◆ उपलब्धि — फिर भी इस आंदोलन ने असहयोग से कहीं अधिक भौगोलिक विस्तार पाया, क़ानून तोड़ने जैसा साहसी तरीक़ा अपनाया, महिलाओं और गाँवों को जोड़ा और अंग्रेज़ों को कांग्रेस से बराबरी पर बातचीत के लिए मजबूर किया — जिसका परिणाम गांधी-इरविन समझौता था।

4. गोलमेज सम्मेलन, गांधी-इरविन समझौता और कराची अधिवेशन

अंग्रेज़ सरकार एक ओर दमन कर रही थी, दूसरी ओर संवैधानिक सुधारों की बातचीत के ज़रिए भारतीयों को बाँटने और शांत करने की कोशिश कर रही थी। साइमन कमीशन की रिपोर्ट जून 1930 में प्रकाशित हुई, जिसे लगभग सभी भारतीय दलों ने अस्वीकार कर दिया। इससे पहले ही वायसराय इरविन ने 31 अक्टूबर 1929 को घोषणा की थी कि भारत का लक्ष्य डोमिनियन स्टेटस है और भविष्य के संविधान पर चर्चा के लिए लंदन में गोलमेज सम्मेलन बुलाया जाएगा।

🔍 आसान परिभाषा: डोमिनियन स्टेटस (अधिराज्य का दर्जा)

📘 परिभाषा: ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर वह दर्जा, जिसमें कोई देश अपने आंतरिक और बाहरी मामलों में स्वशासी होता है, पर ब्रिटिश सम्राट को औपचारिक रूप से अपना राष्ट्राध्यक्ष मानता है और राष्ट्रमंडल का सदस्य रहता है। 1931 के वेस्टमिंस्टर क़ानून के बाद कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड, दक्षिण अफ़्रीका ऐसे ही डोमिनियन थे।

💡 आसान भाषा में: घर अपना, फ़ैसले अपने — पर घर की नेमप्लेट पर ब्रिटिश राजा का नाम भी लिखा रहेगा। यानी लगभग स्वतंत्रता, पर पूरी तरह ब्रिटेन से अलग हुए बिना। 🏠 उदाहरण: कांग्रेस ने 1928 की नेहरू रिपोर्ट में डोमिनियन स्टेटस माँगा था, पर 1929 में लाहौर में पूर्ण स्वराज को लक्ष्य बना लिया। 1940 के अगस्त प्रस्ताव और 1942 के क्रिप्स प्रस्ताव में अंग्रेज़ फिर डोमिनियन स्टेटस ही दे रहे थे, इसलिए कांग्रेस ने उन्हें ठुकराया। 15 अगस्त 1947 को भारत अस्थायी रूप से डोमिनियन के रूप में ही स्वतंत्र हुआ।

🔵 4.1 पहला गोलमेज सम्मेलन (12 नवंबर 1930 – 19 जनवरी 1931)

◆ कहाँ और किसकी अध्यक्षता में — यह सम्मेलन लंदन में हुआ। इसका उद्घाटन सम्राट जॉर्ज पंचम ने किया और अध्यक्षता ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्से मैकडोनाल्ड (लेबर पार्टी) ने की। पहली बार अंग्रेज़ और भारतीय "बराबर" बैठकर संविधान पर चर्चा कर रहे थे — इसलिए इसे "गोलमेज" कहा गया, जहाँ कोई ऊँचा-नीचा आसन नहीं होता।

◆ कौन आए — कुल 89 प्रतिनिधि आए: रियासतों के राजा और उनके प्रतिनिधि; मुस्लिम लीग और मुस्लिम नेता (मुहम्मद अली जिन्ना, आग़ा ख़ाँ, मौलाना मुहम्मद अली, मुहम्मद शफ़ी, फ़ज़लुल हक़); हिंदू महासभा (बी. एस. मुंजे); उदारवादी (तेज बहादुर सप्रू, श्रीनिवास शास्त्री, एम. आर. जयकर); दलित वर्ग (डॉ. भीमराव आंबेडकर); सिख (सरदार उज्जल सिंह आदि); उद्योगपति (होमी मोदी); और ईसाई (के. टी. पॉल)।

◆ कांग्रेस अनुपस्थित — कांग्रेस के सभी बड़े नेता जेल में थे और आंदोलन चल रहा था, इसलिए कांग्रेस ने भाग नहीं लिया। सबको समझ आ गया कि कांग्रेस के बिना कोई भी निर्णय अर्थहीन है — ठीक वैसे ही जैसे "हैमलेट नाटक बिना राजकुमार के"।

◆ परिणाम — दो बातों पर सिद्धांततः सहमति बनी: (1) भारत का भावी ढाँचा एक अखिल भारतीय संघ होगा, जिसमें ब्रिटिश प्रांत और रियासतें दोनों शामिल होंगी — राजाओं ने संघ में शामिल होने की इच्छा जताई; और (2) प्रांतों में उत्तरदायी सरकार होगी। प्रधानमंत्री ने आशा जताई कि अगली बैठक में कांग्रेस भी आएगी। इसके लिए इरविन ने 26 जनवरी 1931 को गांधीजी और कार्यसमिति के सदस्यों को जेल से रिहा कर दिया।

🤝 4.2 गांधी-इरविन समझौता ("दिल्ली समझौता") — 5 मार्च 1931

◆ पृष्ठभूमि — दोनों पक्षों को समझौते की ज़रूरत थी। सरकार जानती थी कि कांग्रेस के बिना गोलमेज बेकार है, और आंदोलन से प्रशासन और व्यापार पर बुरा असर पड़ रहा था। दूसरी ओर लगभग एक वर्ष के दमन के बाद जनता, विशेषकर व्यापारी वर्ग, थकने लगा था। उदारवादी नेताओं तेज बहादुर सप्रू और एम. आर. जयकर ने दोनों के बीच मध्यस्थता की।

◆ वार्ता — 17 फ़रवरी 1931 से दिल्ली में गांधीजी और इरविन के बीच कई दौर की वार्ता हुई और 5 मार्च 1931 को समझौते पर हस्ताक्षर हुए। यह पहली बार था जब वायसराय ने एक विद्रोही आंदोलन के नेता से बराबरी के पक्ष की तरह बात की।

◆ सरकार ने क्या माना — (1) जिन पर हिंसा का आरोप नहीं था, उन सभी राजनीतिक बंदियों की तुरंत रिहाई; (2) सभी दमनकारी अध्यादेश और लंबित मुक़दमे वापस; (3) जो जुर्माने अभी वसूले नहीं गए थे, वे माफ़; (4) ज़ब्त की गई ज़मीन, जो किसी तीसरे पक्ष को बेची न गई हो, वापस; (5) आंदोलन में त्यागपत्र देने वाले सरकारी कर्मचारियों के साथ नरमी; (6) समुद्र तट से निश्चित दूरी में रहने वालों को निजी उपयोग के लिए बिना कर नमक बनाने या इकट्ठा करने की छूट; (7) शराब और विदेशी कपड़े की दुकानों पर शांतिपूर्ण धरने का अधिकार।

◆ कांग्रेस ने क्या माना — (1) सविनय अवज्ञा आंदोलन स्थगित किया जाएगा; और (2) कांग्रेस दूसरे गोलमेज सम्मेलन में भाग लेगी।

◆ जो नहीं मिला — सरकार ने पुलिस ज़्यादतियों की सार्वजनिक जाँच की माँग नहीं मानी। भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की फाँसी की सज़ा बदलने की जनता की माँग भी समझौते में शामिल नहीं हुई — गांधीजी ने व्यक्तिगत रूप से इरविन से अनुरोध किया, पर 23 मार्च 1931 को तीनों को फाँसी दे दी गई। पूर्ण स्वराज पर भी कोई आश्वासन नहीं मिला।

◆ प्रतिक्रियाएँ — ब्रिटेन में विंस्टन चर्चिल ने इस बात पर गहरा क्षोभ जताया कि "एक अधनंगा फ़क़ीर" वायसराय भवन की सीढ़ियाँ चढ़कर सम्राट के प्रतिनिधि से बराबरी से बात कर रहा है। भारत में नेहरू और सुभाष बोस जैसे युवा नेता निराश हुए, क्योंकि पूर्ण स्वराज के लक्ष्य के बाद यह समझौता उन्हें बहुत छोटा लगा। सरोजिनी नायडू ने गांधी और इरविन को "दो महात्मा" कहा। इरविन के जीवनीकार एलन कैम्पबेल-जॉनसन ने गांधीजी को मिले लाभों को केवल "सांत्वना पुरस्कार" कहा।

📥 सरकार ने माना

✔ अहिंसक राजनीतिक बंदियों की रिहाई

✔ अध्यादेश और लंबित मुक़दमे वापस

✔ न वसूले गए जुर्माने माफ़; बिना बिकी ज़ब्त भूमि वापस

✔ त्यागपत्र देने वाले कर्मचारियों के प्रति नरमी

✔ तटीय क्षेत्रों में निजी उपयोग के लिए नमक बनाने की छूट

✔ शराब और विदेशी वस्त्र की दुकानों पर शांतिपूर्ण धरना

📤 कांग्रेस ने माना / जो नहीं मिला

✔ सविनय अवज्ञा आंदोलन स्थगित

✔ दूसरे गोलमेज सम्मेलन में भागीदारी

✔ नहीं मिला — पुलिस ज़्यादतियों की जाँच नहीं

✔ नहीं मिला — भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु की फाँसी नहीं रुकी

✔ नहीं मिला — पूर्ण स्वराज पर कोई आश्वासन नहीं

क्या यह पीछे हटना था? — कई आलोचक इसे गांधीजी की हार मानते हैं, पर अधिकांश इतिहासकार इसे सोची-समझी रणनीति मानते हैं। गांधीजी जानते थे कि आम जनता की कष्ट सहने की क्षमता सीमित होती है — कार्यकर्ता लंबे समय तक जेल जा सकते हैं, पर किसान, दुकानदार और व्यापारी अनंत काल तक ज़ब्ती और मार नहीं सह सकते। सितंबर 1930 के बाद व्यापारियों और दुकानदारों में थकान साफ़ दिखने लगी थी। इसलिए सही समय पर विराम लेकर उन्होंने आंदोलन की उपलब्धियाँ सुरक्षित कीं, और सबसे बड़ी बात — सरकार से यह स्वीकार करवा लिया कि कांग्रेस ही भारत की जनता की प्रतिनिधि है, जिससे बराबरी पर बात करनी पड़ती है।

📜 4.3 कराची अधिवेशन (26–31 मार्च 1931)

◆ पृष्ठभूमि और माहौल — कांग्रेस का यह विशेष अधिवेशन गांधी-इरविन समझौते की पुष्टि के लिए सरदार वल्लभभाई पटेल की अध्यक्षता में हुआ। यह भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की फाँसी के कुछ ही दिन बाद हुआ, इसलिए माहौल बहुत भावुक था। कराची जाते समय रास्ते में गांधीजी को नौजवानों ने काले झंडे दिखाए, क्योंकि वे मानते थे कि गांधीजी ने फाँसी रुकवाने के लिए पर्याप्त दबाव नहीं डाला।

◆ शहीदों पर प्रस्ताव — कांग्रेस ने हिंसा के मार्ग से अपनी असहमति दोहराते हुए भी भगत सिंह और उनके साथियों के साहस और बलिदान की सराहना का प्रस्ताव पारित किया।

◆ समझौते की पुष्टि — विरोध के बावजूद अधिवेशन ने गांधी-इरविन समझौते को स्वीकार किया, पूर्ण स्वराज के लक्ष्य को दोहराया और गांधीजी को दूसरे गोलमेज के लिए कांग्रेस का प्रतिनिधि चुना। विरोध के बीच गांधीजी का यह कथन प्रसिद्ध है — "गांधी मर सकता है, पर गांधीवाद नहीं।"

◆ सबसे बड़ा योगदान — मौलिक अधिकार और राष्ट्रीय आर्थिक कार्यक्रम — पहली बार कांग्रेस ने यह बताया कि स्वराज का आम जनता के लिए अर्थ क्या होगा। कांग्रेस ने स्पष्ट किया कि राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ आर्थिक स्वतंत्रता भी ज़रूरी है, ताकि "भूखे करोड़ों" का शोषण समाप्त हो। इसका प्रारूप जवाहरलाल नेहरू ने तैयार किया था और इसमें एम. एन. राय के विचारों का भी प्रभाव था।

मौलिक अधिकारों में क्या था

▸ बोलने, प्रेस, सभा करने और संगठन बनाने की स्वतंत्रता होगी।

▸ जाति, धर्म और लिंग का भेद किए बिना क़ानून के समक्ष समानता और समान नागरिक अधिकार होंगे।

▸ वयस्क मताधिकार के आधार पर चुनाव होंगे — यानी हर वयस्क को वोट का अधिकार मिलेगा।

▸ धर्म के मामलों में राज्य तटस्थ रहेगा और सबको अपना धर्म मानने की स्वतंत्रता होगी।

▸ निःशुल्क और अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा दी जाएगी।

▸ अल्पसंख्यकों और विभिन्न भाषाई क्षेत्रों की संस्कृति, भाषा और लिपि की रक्षा की जाएगी।

राष्ट्रीय आर्थिक कार्यक्रम में क्या था

▸ लगान और राजस्व में भारी कमी होगी और बहुत छोटे, घाटे वाले खेतों को लगान से छूट मिलेगी।

▸ किसानों को ग्रामीण ऋण से राहत मिलेगी और सूदख़ोरी पर नियंत्रण होगा।

▸ मज़दूरों को जीवन-निर्वाह योग्य वेतन, सीमित काम के घंटे, अच्छी कार्य-परिस्थितियाँ और संगठन बनाने (यूनियन) का अधिकार मिलेगा।

▸ प्रमुख उद्योगों, खनिजों, रेलवे और जहाज़रानी पर राज्य का स्वामित्व या नियंत्रण होगा।

▸ नमक कर समाप्त होगा और सैनिक व्यय तथा ऊँचे वेतनों में कटौती होगी।

💡 कराची का महत्त्व

कराची प्रस्ताव को स्वतंत्र भारत के संविधान के मौलिक अधिकारों (भाग 3) और राज्य के नीति-निदेशक तत्त्वों (भाग 4) का पूर्वरूप माना जाता है। इसने कांग्रेस के आगे के राजनीतिक-आर्थिक कार्यक्रम की नींव रखी। सुभाष बोस ने कराची अधिवेशन को "गांधीजी की लोकप्रियता और प्रतिष्ठा का शिखर" कहा।

🟣 4.4 दूसरा गोलमेज सम्मेलन (7 सितंबर – 1 दिसंबर 1931)

◆ बदला हुआ माहौल — इस बीच दो बड़े बदलाव हो चुके थे। अप्रैल 1931 में उदार इरविन की जगह कठोर लॉर्ड विलिंगडन वायसराय बन गए, और अगस्त 1931 में ब्रिटेन में लेबर सरकार की जगह अनुदारवादियों (कंज़रवेटिव) के प्रभुत्व वाली "राष्ट्रीय सरकार" बनी, हालाँकि प्रधानमंत्री मैकडोनाल्ड ही रहे। नई सरकार कांग्रेस को बराबरी देने के पक्ष में नहीं थी।

◆ गांधीजी की यात्रा — गांधीजी 29 अगस्त 1931 को बम्बई से "एस. एस. राजपूताना" जहाज़ से लंदन रवाना हुए। वे कांग्रेस के एकमात्र प्रतिनिधि थे; उनके साथ सचिव महादेव देसाई और मीराबेन आदि सहयोगी गए। सरोजिनी नायडू और मदन मोहन मालवीय अलग से, व्यक्तिगत रूप में आमंत्रित थे; एनी बेसेंट ने भी भाग लिया।

◆ लंदन में गांधीजी — गांधीजी ने होटल के बजाय लंदन के ग़रीब पूर्वी इलाक़े में किंग्सले हॉल में रहना चुना। वे लंकाशायर गए और उन मिल मज़दूरों से मिले जो भारत के विदेशी कपड़ा-बहिष्कार के कारण बेरोज़गार हुए थे — उन्होंने गांधीजी का आत्मीय स्वागत किया। वे अपनी साधारण धोती-चादर में ही बकिंघम पैलेस में सम्राट से मिले। जब पत्रकारों ने पोशाक पर प्रश्न किया, तो उन्होंने हँसकर कहा कि सम्राट ने हम दोनों के हिस्से के कपड़े पहन रखे थे।

◆ गतिरोध — अल्पसंख्यक प्रश्न — गांधीजी ने दावा किया कि कांग्रेस पूरे भारत — सभी धर्मों, जातियों और वर्गों — का प्रतिनिधित्व करती है। इस दावे को मुस्लिम लीग, राजाओं और डॉ. आंबेडकर ने चुनौती दी। मुसलमान, सिख और ईसाई पृथक निर्वाचन पर अड़े रहे; आंबेडकर ने दलित वर्गों के लिए भी पृथक निर्वाचन माँगा। कई अल्पसंख्यक समूहों ने मिलकर एक "अल्पसंख्यक समझौता" भी रखा। गांधीजी ने कहा कि वे दलितों को हिंदू समाज से अलग करने वाले पृथक निर्वाचन का "प्राणों की बाज़ी लगाकर" विरोध करेंगे।

◆ परिणाम — कोई सहमति नहीं बनी। मैकडोनाल्ड ने घोषणा की कि यदि भारतीय आपस में समझौता नहीं करते तो सरकार स्वयं "सांप्रदायिक निर्णय" देगी। सम्मेलन में पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत को पूर्ण प्रांत का दर्जा देने और सिंध को बम्बई से अलग प्रांत बनाने पर सहमति बनी। 28 दिसंबर 1931 को गांधीजी ख़ाली हाथ बम्बई लौटे और बोले — "यह सच है कि मैं ख़ाली हाथ लौटा हूँ, किंतु मुझे संतोष है कि जो ध्वज मुझे सौंपा गया था, उसे मैंने नीचे नहीं होने दिया।"

🔴 4.5 तीसरा गोलमेज सम्मेलन (17 नवंबर – 24 दिसंबर 1932)

◆ कौन आया, कौन नहीं — इस समय भारत में आंदोलन का दूसरा चरण चल रहा था और कांग्रेस अवैध थी, इसलिए कांग्रेस ने बहिष्कार किया। ब्रिटेन की लेबर पार्टी भी इसमें शामिल नहीं हुई। केवल 46 प्रतिनिधि आए, इसलिए यह सबसे छोटा और सबसे कम महत्त्व का सम्मेलन रहा।

◆ परिणाम — तीनों सम्मेलनों की चर्चाओं के आधार पर ब्रिटिश सरकार ने मार्च 1933 में "श्वेत पत्र" (सरकारी प्रस्ताव-पत्र) जारी किया। इस पर लॉर्ड लिनलिथगो की अध्यक्षता वाली ब्रिटिश संसद की संयुक्त प्रवर समिति ने विचार किया, और उसी से भारत सरकार अधिनियम 1935 बना (खंड 6)।

◆ याद रखने योग्य — डॉ. भीमराव आंबेडकर एकमात्र ऐसे प्रमुख भारतीय नेता माने जाते हैं जिन्होंने तीनों गोलमेज सम्मेलनों में भाग लिया। गांधीजी ने केवल दूसरे में भाग लिया।

📋 दोहराव तालिका: तीन गोलमेज सम्मेलन

सम्मेलन

तिथि

मुख्य बात

पहला

12 नवंबर 1930 – 19 जनवरी 1931

कांग्रेस अनुपस्थित रही; 89 प्रतिनिधियों ने अखिल भारतीय संघ और प्रांतों में उत्तरदायी सरकार के विचार पर सहमति दी।

दूसरा

7 सितंबर – 1 दिसंबर 1931

गांधीजी कांग्रेस के एकमात्र प्रतिनिधि बनकर गए, पर अल्पसंख्यक और पृथक निर्वाचन के प्रश्न पर गतिरोध के कारण ख़ाली हाथ लौटे।

तीसरा

17 नवंबर – 24 दिसंबर 1932

कांग्रेस और लेबर पार्टी अनुपस्थित रहीं; केवल 46 प्रतिनिधि आए और इसके बाद श्वेत पत्र (1933) तथा 1935 का अधिनियम बना।

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5. आंदोलन का दूसरा चरण, सांप्रदायिक पंचाट और पूना पैक्ट (1932–1934)

5.1 दमन का नया दौर

◆ विलिंगडन की नीति — नए वायसराय लॉर्ड विलिंगडन मानते थे कि इरविन ने गांधीजी को बराबरी देकर भूल की है। उनका यह कथन प्रसिद्ध है — "यदि गांधी न होता तो यह दुनिया वाक़ई बहुत सुंदर होती।" गांधीजी के लंदन में रहते ही सरकार ने बंगाल, संयुक्त प्रांत और पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत में दमनकारी अध्यादेश जारी कर दिए थे; नेहरू और ग़फ़्फ़ार ख़ाँ गिरफ़्तार कर लिए गए थे।

◆ आंदोलन का पुनः आरंभ — लौटकर गांधीजी ने वायसराय से मिलने का समय माँगा, पर मना कर दिया गया। इसलिए कांग्रेस कार्यसमिति ने आंदोलन फिर शुरू करने का निर्णय लिया। 4 जनवरी 1932 को गांधीजी और कांग्रेस अध्यक्ष वल्लभभाई पटेल गिरफ़्तार कर लिए गए।

◆ "अध्यादेश राज" — कांग्रेस और उससे जुड़े संगठन अवैध घोषित हुए, उनके कार्यालय और कोष ज़ब्त हुए, सभाओं-जुलूसों पर पाबंदी लगी और अख़बारों पर कड़ा सेंसर लगा। केवल पहले चार महीनों में लगभग 80,000 और कुल मिलाकर लगभग 1.2 लाख लोग गिरफ़्तार हुए। नेतृत्वहीन और थकी हुई जनता के कारण आंदोलन इस बार पहले जैसी ऊँचाई नहीं पा सका।

5.2 सांप्रदायिक पंचाट (16 अगस्त 1932)

🔍 आसान परिभाषा: पृथक निर्वाचन और संयुक्त निर्वाचन

📘 परिभाषा: पृथक निर्वाचन में किसी समुदाय के लिए अलग सीटें तय होती हैं और उन सीटों पर केवल उसी समुदाय के मतदाता वोट देते हैं। संयुक्त निर्वाचन में सभी समुदायों के मतदाता मिलकर वोट देते हैं; किसी समुदाय के लिए सीट आरक्षित हो सकती है, पर उस पर उम्मीदवार तो उसी समुदाय का होगा, जबकि वोट सब देंगे।

💡 आसान भाषा में: पृथक निर्वाचन में उम्मीदवार को केवल अपने समुदाय को ख़ुश करना होता है, इसलिए समाज बँटता है। संयुक्त निर्वाचन वाली आरक्षित सीट पर उम्मीदवार को सबका वोट चाहिए, इसलिए उसे सबको साथ लेकर चलना पड़ता है। 🏠 उदाहरण: 1909 के मार्ले-मिंटो सुधारों ने मुसलमानों को पृथक निर्वाचन दिया था। आज भारत में अनुसूचित जाति-जनजाति के लिए लोकसभा की आरक्षित सीटें संयुक्त निर्वाचन वाली हैं — यही पूना पैक्ट का मॉडल था।

◆ पृष्ठभूमि — दूसरे गोलमेज में अल्पसंख्यक प्रश्न पर सहमति नहीं बनी थी। इसलिए ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्से मैकडोनाल्ड ने 16 अगस्त 1932 को अपना निर्णय घोषित किया, जिसे "सांप्रदायिक पंचाट" (कम्युनल अवॉर्ड) कहा जाता है। इसमें लोथियन समिति (मताधिकार समिति) की सिफ़ारिशों का भी उपयोग हुआ।

◆ प्रावधान — प्रांतीय विधानमंडलों में मुसलमानों, सिखों, भारतीय ईसाइयों, एंग्लो-इंडियनों और यूरोपीयों के लिए पृथक निर्वाचन जारी रखा गया। सबसे बड़ा और विवादास्पद प्रावधान यह था कि दलित वर्गों ("दबे हुए वर्गों") को भी अल्पसंख्यक मानकर पृथक निर्वाचन दिया गया — उनके लिए 71 सीटें अलग तय की गईं, जिन पर केवल दलित मतदाता वोट देते, और साथ ही उन्हें सामान्य सीटों पर भी वोट देने का अधिकार (यानी दोहरा वोट) मिला। इसके अलावा महिलाओं, मज़दूरों, ज़मींदारों, व्यापार-उद्योग और विश्वविद्यालयों के लिए भी विशेष सीटें रखी गईं।

◆ प्रतिक्रिया — गांधीजी ने इसे हिंदू समाज को स्थायी रूप से बाँटने की अंग्रेज़ी चाल माना। उनका तर्क था कि दलितों को अस्पृश्यता के अंत की ज़रूरत है, राजनीतिक अलगाव की नहीं; पृथक निर्वाचन से अस्पृश्यता स्थायी हो जाएगी, जैसे मुसलमानों के मामले में पृथक निर्वाचन ने दूरी बढ़ाई थी। डॉ. आंबेडकर ने पंचाट का स्वागत किया, क्योंकि उनके अनुसार सवर्ण बहुमत वाले संयुक्त निर्वाचन में दलितों के सच्चे प्रतिनिधि कभी नहीं चुने जा सकते थे।

◆ गांधीजी का आमरण अनशन — यरवदा जेल में बंद गांधीजी ने 20 सितंबर 1932 से आमरण अनशन शुरू किया — दलितों के लिए पृथक निर्वाचन के विरुद्ध। पूरा देश चिंता में डूब गया; जगह-जगह मंदिर, कुएँ और सड़कें दलितों के लिए खोली गईं। अब आंबेडकर पर भारी दबाव था कि गांधीजी के प्राण बचाने के लिए समझौता करें।

5.3 पूना पैक्ट (24 सितंबर 1932)

📖 कहानी 1: यरवदा जेल का अनशन और गांधी-आंबेडकर समझौता

16 अगस्त 1932 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्से मैकडोनाल्ड ने सांप्रदायिक पंचाट घोषित किया। उसमें दलित वर्गों को भी अल्पसंख्यक मानकर पृथक निर्वाचन दिया गया: उनके लिए 71 सीटें अलग थीं, जिन पर केवल दलित मतदाता वोट देते, और सामान्य सीटों पर भी उन्हें वोट का अधिकार मिलता। डॉ. आंबेडकर ने इसका स्वागत किया, क्योंकि उन्हें लगता था कि सवर्ण बहुमत वाले संयुक्त निर्वाचन में दलितों के सच्चे प्रतिनिधि नहीं चुने जा सकते।

यरवदा जेल में बंद गांधीजी ने इसे हिंदू समाज को स्थायी रूप से बाँटने की चाल माना। उनका तर्क था कि दलितों को अस्पृश्यता के अंत की ज़रूरत है, राजनीतिक अलगाव की नहीं। उन्होंने 20 सितंबर 1932 से आमरण अनशन शुरू कर दिया। पूरा देश चिंता में डूब गया और जगह-जगह मंदिर, कुएँ और सड़कें दलितों के लिए खोली जाने लगीं। अब आंबेडकर पर भारी दबाव था कि गांधीजी के प्राण बचाने के लिए समझौता करें।

मालवीय, राजेंद्र प्रसाद, राजगोपालाचारी, जयकर और बिड़ला ने मध्यस्थता की। लंबी बातचीत के बाद 24 सितंबर 1932 को पूना पैक्ट हुआ, जिस पर आंबेडकर और मालवीय ने हस्ताक्षर किए। पृथक निर्वाचन ख़त्म हुआ, पर आरक्षित सीटें 71 से बढ़ाकर 148 कर दी गईं। हर आरक्षित सीट के लिए पहले दलित मतदाता चार उम्मीदवारों का पैनल चुनते, फिर सभी मतदाता मिलकर उनमें से एक चुनते। गांधीजी ने 26 सितंबर को अनशन तोड़ा।

बाद में आंबेडकर ने कहा कि उन्हें गांधीजी के प्राण बचाने के दबाव में यह समझौता करना पड़ा। फिर भी आज की आरक्षित सीटों की व्यवस्था की जड़ इसी पैक्ट में है।

🧭 इस कहानी से कौन-सी अवधारणा साफ़ हुई

✔ पृथक निर्वाचन बनाम संयुक्त निर्वाचन — पृथक निर्वाचन में केवल अपने समुदाय के वोट चाहिए, इसलिए समाज बँटता है। संयुक्त निर्वाचन की आरक्षित सीट पर उम्मीदवार को सबका वोट चाहिए, इसलिए उसे सबको साथ लेकर चलना पड़ता है।

✔ दो-चरणीय आरक्षित चुनाव — पैनल का पहला चरण दलितों की अपनी पसंद सुनिश्चित करता था, और दूसरा चरण संयुक्त निर्वाचन बनाए रखता था।

✔ एक ही समझौते पर दो दृष्टियाँ — गांधीजी ने इसे हिंदू समाज की एकता का उपाय माना, जबकि आंबेडकर ने इसे दबाव में किया गया समझौता बताया। परीक्षा में दोनों पक्ष याद रखने चाहिए।

📝 परीक्षा के लिए: सांप्रदायिक पंचाट (16 अगस्त 1932, मैकडोनाल्ड) → गांधीजी का आमरण अनशन (20 सितंबर 1932, यरवदा) → पूना पैक्ट (24 सितंबर 1932; आंबेडकर और मालवीय) → आरक्षित सीटें 71 से 148, केंद्र में 18%; अनशन समाप्त 26 सितंबर।

◆ कौन, कहाँ — मदन मोहन मालवीय, राजेंद्र प्रसाद, सी. राजगोपालाचारी, एम. आर. जयकर और घनश्यामदास बिड़ला आदि ने मध्यस्थता की। यरवदा जेल में गांधीजी और आंबेडकर के बीच लंबी बातचीत के बाद 24 सितंबर 1932 को समझौता हुआ। दलित वर्गों की ओर से आंबेडकर ने और सवर्ण हिंदुओं की ओर से मालवीय ने हस्ताक्षर किए।

◆ प्रावधान 1 — पृथक निर्वाचन समाप्त — दलितों के लिए पृथक निर्वाचन की जगह संयुक्त निर्वाचन के भीतर आरक्षित सीटें रखी गईं।

◆ प्रावधान 2 — सीटें लगभग दोगुनी — प्रांतीय विधानमंडलों में दलितों की आरक्षित सीटें 71 से बढ़ाकर 148 कर दी गईं; केंद्रीय विधानमंडल में ब्रिटिश भारत की सामान्य सीटों का 18% उनके लिए आरक्षित हुआ।

◆ प्रावधान 3 — दो-चरणीय चुनाव — हर आरक्षित सीट के लिए पहले प्राथमिक चुनाव होता, जिसमें केवल दलित मतदाता अपने चार उम्मीदवारों का पैनल चुनते; फिर इन चार में से एक को सभी मतदाता मिलकर चुनते। इस तरह दलितों की पसंद भी सुनिश्चित हुई और संयुक्त निर्वाचन भी बना रहा।

◆ प्रावधान 4 — अन्य — दलितों की शिक्षा के लिए हर प्रांत के शिक्षा-बजट में पर्याप्त राशि रखी जाएगी और सरकारी नौकरियों में उनके उचित प्रतिनिधित्व का प्रयास होगा। सरकार ने पैक्ट स्वीकार कर पंचाट में संशोधन किया और गांधीजी ने 26 सितंबर को अनशन तोड़ा।

◆ परिणाम और मूल्यांकन — पूना पैक्ट ने हिंदू समाज के राजनीतिक विभाजन को रोका और दलितों को पहले से अधिक सीटें दिलाईं। पर आंबेडकर ने बाद में कहा कि उन्हें गांधीजी के प्राण बचाने के दबाव में यह समझौता करना पड़ा और संयुक्त निर्वाचन में चुने गए दलित प्रतिनिधि सवर्ण मतदाताओं पर निर्भर रहे। आज की आरक्षित सीटों की व्यवस्था की जड़ इसी पैक्ट में है।

5.4 हरिजन अभियान और आंदोलन की समाप्ति

◆ हरिजन सेवक संघ और "हरिजन" पत्र — अनशन के बाद गांधीजी ने अपना ध्यान अस्पृश्यता-निवारण पर केंद्रित किया। सितंबर 1932 में "अखिल भारतीय अस्पृश्यता-विरोधी लीग" बनी, जो आगे हरिजन सेवक संघ कहलाई (अध्यक्ष घनश्यामदास बिड़ला)। फ़रवरी 1933 से उन्होंने जेल से ही साप्ताहिक "हरिजन" निकालना शुरू किया। "हरिजन" (ईश्वर के लोग) शब्द गांधीजी ने अछूत कहे जाने वाले लोगों के लिए अपनाया।

◆ आत्मशुद्धि अनशन और आंदोलन का स्थगन — मई 1933 में गांधीजी ने 21 दिन का आत्मशुद्धि अनशन किया और सरकार ने उन्हें रिहा कर दिया। उसी महीने सामूहिक आंदोलन कुछ समय के लिए स्थगित हुआ और जुलाई-अगस्त 1933 से केवल व्यक्तिगत सविनय अवज्ञा की अनुमति दी गई।

◆ हरिजन यात्रा (नवंबर 1933 – अगस्त 1934) — गांधीजी ने लगभग बीस हज़ार किलोमीटर की देशव्यापी यात्रा की, हरिजन कोष के लिए धन इकट्ठा किया और लोगों से मंदिर, कुएँ और स्कूल हरिजनों के लिए खोलने को कहा। कई जगह रूढ़िवादी हिंदुओं ने उनका विरोध किया; पूना में उन पर बम फेंकने का प्रयास भी हुआ। जनवरी 1934 के बिहार भूकंप को गांधीजी ने अस्पृश्यता के पाप का "दैवी दंड" कहा, जिसकी रवींद्रनाथ टैगोर ने अंधविश्वास बढ़ाने वाला विचार कहकर आलोचना की।

◆ आंदोलन की औपचारिक समाप्ति (अप्रैल 1934) — 7 अप्रैल 1934 को गांधीजी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन पूरी तरह वापस ले लिया। मई 1934 की पटना बैठक में कांग्रेस ने फिर से चुनावी राजनीति में उतरने का निर्णय लिया और नवंबर 1934 के केंद्रीय विधानसभा चुनावों में अच्छी सफलता पाई।

◆ कांग्रेस समाजवादी पार्टी (1934) — आंदोलन की वापसी और "संवैधानिक राजनीति" की ओर लौटने से असंतुष्ट युवा नेताओं जयप्रकाश नारायण, आचार्य नरेंद्र देव, मीनू मसानी, राम मनोहर लोहिया आदि ने कांग्रेस के भीतर ही कांग्रेस समाजवादी पार्टी बनाई, जो किसानों-मज़दूरों के संगठन पर ज़ोर देती थी (अध्याय 15)।

◆ गांधीजी का कांग्रेस से अलग होना (अक्टूबर 1934) — बम्बई अधिवेशन के समय गांधीजी ने कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता छोड़ दी, ताकि वे पूरा समय रचनात्मक कार्य — खादी, ग्रामोद्योग, हरिजन सेवा और बुनियादी शिक्षा — को दे सकें। इसी समय अखिल भारतीय ग्रामोद्योग संघ (1934) बना। फिर भी वे कांग्रेस के सर्वमान्य मार्गदर्शक बने रहे।

6. भारत सरकार अधिनियम 1935 — प्रमुख प्रावधान

पृष्ठभूमि — साइमन कमीशन की रिपोर्ट (1930), तीनों गोलमेज सम्मेलन (1930–32), श्वेत पत्र (1933) और लिनलिथगो की अध्यक्षता वाली संयुक्त प्रवर समिति (1933–34) — इन सबके बाद ब्रिटिश संसद ने अगस्त 1935 में भारत सरकार अधिनियम 1935 पारित किया। यह ब्रिटिश संसद द्वारा भारत के लिए बनाया गया सबसे लंबा और विस्तृत क़ानून था — इसमें 14 भाग, 321 धाराएँ और 10 अनुसूचियाँ थीं। इसका प्रांतीय भाग 1 अप्रैल 1937 से लागू हुआ, जबकि संघीय भाग कभी लागू नहीं हो सका। अंग्रेज़ों का उद्देश्य था — भारतीयों को प्रांतों में कुछ सत्ता देकर शांत करना, पर केंद्र की असली शक्ति अपने हाथ में रखना।

🏛️ 6.1 अखिल भारतीय संघ (जो कभी बना ही नहीं)

🔍 आसान परिभाषा: संघीय व्यवस्था (संघ)

📘 परिभाषा: ऐसी शासन-व्यवस्था, जिसमें संविधान द्वारा शक्तियाँ दो स्तरों — केंद्र (संघ) और इकाइयों (प्रांत/राज्य) — के बीच बाँटी जाती हैं; दोनों अपने-अपने क्षेत्र में स्वतंत्र होते हैं और विवाद सुलझाने के लिए एक स्वतंत्र न्यायालय होता है। इसके विपरीत एकात्मक व्यवस्था में सारी शक्ति केंद्र के पास रहती है।

💡 आसान भाषा में: जैसे एक बड़े परिवार में कुछ फ़ैसले (जैसे पूरे परिवार की संपत्ति) मुखिया करता है और कुछ फ़ैसले (जैसे अपने कमरे की व्यवस्था) हर सदस्य स्वयं करता है — और यह बँटवारा लिखित नियमों में तय होता है। 🏠 उदाहरण: 1935 के अधिनियम ने ब्रिटिश भारत के 11 प्रांतों और रियासतों को मिलाकर "अखिल भारतीय संघ" का प्रस्ताव रखा। आज का भारत भी संघीय व्यवस्था वाला देश है — रक्षा और रेल केंद्र के विषय हैं, पुलिस और कृषि राज्यों के।

◆ क्या प्रस्ताव था — ब्रिटिश भारत के 11 प्रांतों और रियासतों को मिलाकर एक "अखिल भारतीय संघ" बनना था। प्रांतों के लिए संघ में शामिल होना अनिवार्य था, पर रियासतों के लिए स्वैच्छिक — कोई रियासत "विलय पत्र" (इंस्ट्रूमेंट ऑफ़ एक्सेशन) पर हस्ताक्षर करके ही संघ में आ सकती थी।

◆ शर्त — संघ तभी बनता जब इतनी रियासतें शामिल हों कि उन्हें संघ के उच्च सदन में रियासतों के लिए तय सीटों का आधा हिस्सा मिले और उनकी जनसंख्या सभी रियासतों की कुल जनसंख्या की आधी हो।

◆ परिणाम — पर्याप्त राजा शामिल नहीं हुए, क्योंकि वे अपनी स्वायत्तता खोने से डरते थे, और 1939 में युद्ध शुरू होने पर यह योजना स्थगित हो गई। इसलिए संघ कभी नहीं बना और केंद्र में 1919 के अधिनियम वाली व्यवस्था ही कुछ बदलावों के साथ चलती रही।

◆ अंग्रेज़ों का उद्देश्य — राष्ट्रवादियों का मानना था कि केंद्र में राजाओं के मनोनीत प्रतिनिधियों (जो जनता द्वारा नहीं चुने जाते) को बड़ी संख्या में सीटें देकर अंग्रेज़ कांग्रेस के प्रभाव को संतुलित करना चाहते थे।

📑 6.2 शक्तियों का विभाजन — तीन सूचियाँ

◆ संघीय सूची (59 विषय) — केंद्र के विषय, जैसे रक्षा, विदेश मामले, मुद्रा, डाक-तार, रेलवे।

◆ प्रांतीय सूची (54 विषय) — प्रांतों के विषय, जैसे पुलिस, क़ानून-व्यवस्था, शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, भू-राजस्व।

◆ समवर्ती सूची (36 विषय) — जिन पर केंद्र और प्रांत दोनों क़ानून बना सकते थे, जैसे फ़ौजदारी क़ानून, विवाह, दिवालियापन।

◆ अवशिष्ट शक्तियाँ — जो विषय किसी सूची में नहीं थे, उन पर क़ानून बनाने का अधिकार गवर्नर-जनरल को दिया गया। (आज भारत के संविधान में अवशिष्ट शक्तियाँ संसद के पास हैं, और तीन सूचियों वाला ढाँचा इसी अधिनियम से आया है।)

🏠 6.3 प्रांतीय स्वायत्तता — इस अधिनियम की सबसे बड़ी उपलब्धि

🔍 आसान परिभाषा: प्रांतीय स्वायत्तता

📘 परिभाषा: वह व्यवस्था, जिसमें प्रांत का शासन केंद्र के नियंत्रण से काफ़ी हद तक मुक्त होकर अपने विधानमंडल के प्रति उत्तरदायी मंत्रियों द्वारा चलाया जाए, और प्रांत अपनी सूची के सभी विषयों पर स्वयं निर्णय ले।

💡 आसान भाषा में: यानी प्रांत में जनता द्वारा चुनी गई सरकार अपने घर का काम ख़ुद चलाएगी — दिल्ली या लंदन से हर बात की अनुमति नहीं लेनी होगी। 🏠 उदाहरण: 1937 में संयुक्त प्रांत में गोविंद वल्लभ पंत के मंत्रिमंडल ने काश्तकारी क़ानून बनाया — यह प्रांतीय स्वायत्तता के कारण ही संभव हुआ। 1919 के अधिनियम में पुलिस और राजस्व जैसे विषय मंत्रियों को मिले ही नहीं थे।

◆ द्वैध शासन की समाप्ति — 1919 के अधिनियम ने प्रांतों में द्वैध शासन लागू किया था, जिसमें विषय "आरक्षित" (गवर्नर के पास) और "हस्तांतरित" (मंत्रियों के पास) में बँटे थे। 1935 के अधिनियम ने प्रांतों में द्वैध शासन समाप्त कर दिया और सभी प्रांतीय विषय विधानमंडल के प्रति उत्तरदायी भारतीय मंत्रियों को सौंप दिए।

◆ प्रांत — कुल 11 प्रांत थे: मद्रास, बम्बई, बंगाल, संयुक्त प्रांत, पंजाब, बिहार, मध्य प्रांत और बरार, असम, पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत, उड़ीसा और सिंध। इनमें उड़ीसा (बिहार से अलग) और सिंध (बम्बई से अलग) 1 अप्रैल 1936 को नए प्रांत बने।

◆ गवर्नर की विशेष शक्तियाँ — बड़ी सीमा — गवर्नर को "विशेष उत्तरदायित्व" (जैसे अल्पसंख्यकों के हित, शांति-व्यवस्था, सरकारी कर्मचारियों के अधिकार) और "विवेकाधीन शक्तियाँ" दी गईं, जिनके आधार पर वह मंत्रियों की सलाह को ठुकरा सकता था और विधेयकों को रोक सकता था। धारा 93 के अंतर्गत "संवैधानिक तंत्र विफल" होने पर वह प्रांत का शासन सीधे अपने हाथ में ले सकता था — 1939 में कांग्रेसी मंत्रिमंडलों के त्यागपत्र के बाद ठीक यही हुआ।

◆ विधानमंडल — ग्यारह में से छह प्रांतों — बंगाल, बम्बई, मद्रास, बिहार, संयुक्त प्रांत और असम — में द्विसदनीय विधानमंडल (विधानसभा और विधान परिषद) बनाए गए; शेष पाँच में एक सदन रहा।

⚖️ 6.4 केंद्र में द्वैध शासन और संघीय विधानमंडल

◆ केंद्र में द्वैध शासन — जो द्वैध शासन प्रांतों से हटाया गया, वह केंद्र में लाया गया। केंद्रीय विषयों को दो भागों में बाँटा गया: आरक्षित विषय — रक्षा, विदेश मामले, चर्च संबंधी मामले और जनजातीय क्षेत्र — जिनका प्रशासन गवर्नर-जनरल अपने तीन परामर्शदाताओं की सहायता से करता, और जो विधानमंडल के प्रति उत्तरदायी नहीं थे; तथा हस्तांतरित विषय, जिनका प्रशासन विधानमंडल के प्रति उत्तरदायी मंत्री करते। पर संघ न बनने के कारण यह व्यवस्था कभी लागू नहीं हुई।

◆ संघीय विधानमंडल (प्रस्तावित) — इसमें दो सदन होने थे: राज्य परिषद (उच्च सदन) — 260 सदस्य (156 ब्रिटिश भारत से, 104 रियासतों से) और संघीय सभा (निम्न सदन) — 375 सदस्य (250 ब्रिटिश भारत से, 125 रियासतों से)। रियासतों के सदस्य राजाओं द्वारा मनोनीत होने थे, जनता द्वारा निर्वाचित नहीं।

◆ गवर्नर-जनरल की शक्तियाँ — गवर्नर-जनरल के पास भी विशेष उत्तरदायित्व, विवेकाधीन शक्तियाँ, अध्यादेश जारी करने की शक्ति और बजट के लगभग 80% भाग पर विधानमंडल के मत के बिना नियंत्रण था। यानी केंद्र की असली सत्ता अंग्रेज़ों के हाथ में ही रहनी थी।

🗳️ 6.5 मताधिकार और प्रतिनिधित्व

◆ पृथक निर्वाचन का विस्तार — सांप्रदायिक पंचाट और पूना पैक्ट के अनुसार मुसलमानों, सिखों, ईसाइयों, एंग्लो-इंडियनों और यूरोपीयों के लिए पृथक निर्वाचन जारी रहा, और दलित वर्गों के लिए संयुक्त निर्वाचन में आरक्षित सीटें रखी गईं। महिलाओं, मज़दूरों और ज़मींदारों के लिए भी विशेष सीटें रहीं।

◆ सीमित मताधिकार — मतदान का अधिकार संपत्ति, कर और शिक्षा की योग्यता पर आधारित रहा। पहले की तुलना में मतदाता बढ़े, फिर भी ब्रिटिश भारत की जनसंख्या के केवल लगभग 14% लोगों को ही वोट का अधिकार मिला — यानी अधिकांश ग़रीब, भूमिहीन और अशिक्षित लोग वोट नहीं दे सकते थे।

🏦 6.6 संस्थाएँ और अन्य प्रावधान

◆ संघीय न्यायालय — केंद्र और प्रांतों के विवाद सुलझाने के लिए संघीय न्यायालय का प्रावधान हुआ, जो 1 अक्टूबर 1937 को दिल्ली में स्थापित हुआ; इसके पहले मुख्य न्यायाधीश सर मॉरिस ग्वायर थे। इसके निर्णयों के विरुद्ध अपील लंदन की प्रिवी काउंसिल में हो सकती थी। 1950 में इसी का स्थान सर्वोच्च न्यायालय ने लिया।

◆ रिज़र्व बैंक — इस अधिनियम में मुद्रा और साख के नियंत्रण के लिए केंद्रीय बैंक की व्यवस्था का प्रावधान था; भारतीय रिज़र्व बैंक 1934 के अलग रिज़र्व बैंक अधिनियम के अंतर्गत 1 अप्रैल 1935 को स्थापित हुआ।

◆ लोक सेवा आयोग — संघीय लोक सेवा आयोग, प्रांतीय लोक सेवा आयोग और दो या अधिक प्रांतों के लिए संयुक्त लोक सेवा आयोग बनाने का प्रावधान हुआ।

◆ भारत परिषद की समाप्ति — लंदन में भारत सचिव की सहायता करने वाली "भारत परिषद" (इंडिया काउंसिल) समाप्त कर दी गई और उसकी जगह भारत सचिव को कुछ सलाहकार दिए गए।

◆ बर्मा और अदन अलग — बर्मा (आज म्यांमार) को भारत से अलग किया गया, जो 1 अप्रैल 1937 से प्रभावी हुआ; उसी दिन अदन भी भारत से अलग होकर अलग उपनिवेश बना।

◆ अनुदेश-पत्र — गवर्नर-जनरल और गवर्नरों को दिए जाने वाले "अनुदेश-पत्रों" (इंस्ट्रूमेंट ऑफ़ इंस्ट्रक्शंस) का विचार आगे भारत के संविधान में राज्य के नीति-निदेशक तत्त्वों के रूप में अपनाया गया।

🗣️ 6.7 प्रतिक्रिया और महत्त्व

◆ राष्ट्रवादी आलोचना — जवाहरलाल नेहरू ने इसे "दासता का नया अधिकार-पत्र" और "अनेक ब्रेक वाली, पर बिना इंजन की मशीन" कहा — यानी इसमें रोक-टोक (गवर्नरों की विशेष शक्तियाँ, राजाओं के मनोनीत सदस्य) तो बहुत थी, पर आगे बढ़ने की शक्ति (वास्तविक स्वशासन) नहीं थी। मुहम्मद अली जिन्ना ने इसे "पूरी तरह सड़ा हुआ, मूल रूप से बुरा और बिल्कुल अस्वीकार्य" कहा। कांग्रेस ने लखनऊ अधिवेशन (1936) में इसे अस्वीकार किया, पर जनता तक पहुँचने के लिए इसके अंतर्गत चुनाव लड़ने का निर्णय लिया (खंड 7)।

◆ महत्त्व — अपनी सीमाओं के बावजूद इस अधिनियम ने भारतीयों को प्रांतों में वास्तविक शासन का अनुभव दिया। स्वतंत्र भारत के संविधान का बहुत बड़ा प्रशासनिक ढाँचा — संघीय व्यवस्था, तीन सूचियाँ, संघीय न्यायालय, लोक सेवा आयोग, राज्यपाल का पद, आपातकालीन प्रावधान — इसी अधिनियम से लिया गया। इसलिए इसे संविधान का सबसे बड़ा "स्रोत" भी कहा जाता है।

📋 दोहराव तालिका: 1919 बनाम 1935 का अधिनियम

पहलू

1919 (मांटेग्यू-चेम्सफ़ोर्ड)

1935 (भारत सरकार अधिनियम)

प्रांतों में शासन

प्रांतों में द्वैध शासन था, जिसमें कुछ विषय मंत्रियों को और महत्त्वपूर्ण विषय गवर्नर के पास रहे।

प्रांतों में द्वैध शासन समाप्त हुआ और सभी विषय उत्तरदायी मंत्रियों को मिले, यानी प्रांतीय स्वायत्तता आई।

केंद्र में शासन

केंद्र में कोई उत्तरदायी सरकार नहीं थी और गवर्नर-जनरल की परिषद ही शासन करती थी।

केंद्र में द्वैध शासन और अखिल भारतीय संघ का प्रस्ताव था, पर दोनों कभी लागू नहीं हुए।

शक्ति-विभाजन

विषय केंद्रीय और प्रांतीय — दो सूचियों में बँटे थे।

विषय संघीय, प्रांतीय और समवर्ती — तीन सूचियों में बँटे और अवशिष्ट शक्ति गवर्नर-जनरल को मिली।

निर्वाचन

मुसलमानों के साथ सिखों, ईसाइयों आदि को भी पृथक निर्वाचन मिला।

पृथक निर्वाचन जारी रहा और दलितों के लिए पूना पैक्ट के अनुसार आरक्षित सीटें आईं।

7. 1937 के चुनाव, कांग्रेस मंत्रिमंडल, हरिपुरा और त्रिपुरी

1935 के अधिनियम का संघ वाला भाग तो कभी लागू नहीं हुआ, पर प्रांतीय स्वायत्तता वाला भाग 1 अप्रैल 1937 से लागू होना था और उससे पहले प्रांतों की विधानसभाओं के चुनाव होने थे। कांग्रेस के सामने प्रश्न था — जिस अधिनियम को वह "दासता का नया अधिकार-पत्र" कह चुकी है, क्या उसी के अंतर्गत चुनाव लड़े और सरकार बनाए? इस खंड में हम देखेंगे कि कांग्रेस ने क्या निर्णय लिया, चुनाव में क्या हुआ, मंत्रिमंडलों ने 28 महीनों में क्या किया और इसी दौर में कांग्रेस के भीतर सुभाष चंद्र बोस और गांधीजी के बीच टकराव कैसे हुआ।

🗳️ 7.1 चुनाव लड़ें या नहीं, पद लें या नहीं? — कांग्रेस की बहस

◆ लखनऊ अधिवेशन (अप्रैल 1936) — अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू थे। यहाँ कांग्रेस ने 1935 के अधिनियम को अस्वीकार किया, पर यह भी तय किया कि वह चुनाव लड़ेगी। तर्क यह था कि चुनाव प्रचार के बहाने कांग्रेस का संदेश गाँव-गाँव तक पहुँचेगा और अधिनियम का खोखलापन विधानसभाओं के भीतर से उजागर किया जा सकेगा। नेहरू ने अपने अध्यक्षीय भाषण में पहली बार खुलकर समाजवाद को भारत की समस्याओं का हल बताया।

◆ फ़ैज़पुर अधिवेशन (दिसंबर 1936) — यह महाराष्ट्र के एक गाँव में हुआ कांग्रेस का पहला ग्रामीण अधिवेशन था और इसके अध्यक्ष भी नेहरू ही थे। यहाँ कांग्रेस ने किसानों के लिए एक कृषि कार्यक्रम अपनाया, जिसमें लगान घटाने और किसानों के क़र्ज़ में राहत की बात थी। चुनाव घोषणापत्र में वयस्क मताधिकार से चुनी हुई संविधान सभा की माँग दोहराई गई।

◆ पद-ग्रहण पर मतभेद — चुनाव लड़ने पर तो सहमति थी, पर जीतने के बाद मंत्रिमंडल बनाने पर कांग्रेस बँटी हुई थी। नेहरू, सुभाष चंद्र बोस और कांग्रेस समाजवादी पद लेने के विरोध में थे; उनका कहना था कि बिना वास्तविक शक्ति के ज़िम्मेदारी लेने से कांग्रेस अंग्रेज़ी राज की साझेदार बन जाएगी और उसका संघर्षशील चरित्र कमज़ोर होगा। राजगोपालाचारी, सरदार पटेल, राजेंद्र प्रसाद जैसे नेता पद लेने के पक्ष में थे; उनका तर्क था कि सीमित शक्ति से भी जनता को राहत दी जा सकती है और यह केवल एक अस्थायी रणनीति है। इसलिए निर्णय चुनाव के बाद तक टाल दिया गया।

📊 7.2 फ़रवरी 1937 के चुनाव — परिणाम

चुनाव ग्यारह प्रांतों में हुए। मताधिकार संपत्ति और शिक्षा पर आधारित था, इसलिए वयस्क जनसंख्या का केवल एक छोटा भाग (लगभग तीन करोड़ लोग) ही मत दे सकता था। फिर भी परिणाम कांग्रेस के लिए बहुत बड़ी जीत थे।

◆ पाँच प्रांतों में पूर्ण बहुमत — कांग्रेस को मद्रास (215 में से 159 सीटें), संयुक्त प्रांत (228 में से 134), बिहार (152 में से 98), मध्य प्रांत (112 में से 70) और उड़ीसा (60 में से 36) में स्पष्ट बहुमत मिला।

◆ तीन प्रांतों में सबसे बड़ा दल — बम्बई में कांग्रेस 175 में से 86 सीटें जीतकर बहुमत के बिल्कुल पास पहुँची। असम और पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत में भी वह सबसे बड़ा दल बनी।

◆ तीन प्रांतों में पीछे — केवल बंगाल, पंजाब और सिंध में कांग्रेस पीछे रही। पंजाब में यूनियनिस्ट पार्टी (नेता सिकंदर हयात ख़ाँ) की सरकार बनी, जो हिंदू-मुस्लिम-सिख ज़मींदारों और किसानों का मिला-जुला दल था। बंगाल में कृषक प्रजा पार्टी के नेता फ़ज़लुल हक़ ने मुस्लिम लीग के साथ मिलकर सरकार बनाई।

◆ मुस्लिम लीग का कमज़ोर प्रदर्शन — मुसलमानों के लिए आरक्षित लगभग 482 सीटों में से लीग केवल लगभग 109 सीटें जीत सकी। जिन प्रांतों में मुसलमान बहुसंख्यक थे (पंजाब, बंगाल, सिंध, सीमा प्रांत), वहाँ भी लीग की अपनी सरकार नहीं बनी। यानी 1937 तक मुस्लिम लीग मुसलमानों की एकमात्र प्रतिनिधि होने का दावा नहीं कर सकती थी। पर कांग्रेस भी मुस्लिम सीटों पर बहुत कम जीती — यह आगे चलकर एक बड़ी कमज़ोरी सिद्ध हुई।

🏛️ 7.3 मंत्रिमंडलों का गठन (जुलाई 1937)

◆ पृष्ठभूमि — चुनाव के बाद कांग्रेस ने शर्त रखी कि वह तभी सरकार बनाएगी जब गवर्नर यह आश्वासन दें कि वे अपनी विशेष शक्तियों का उपयोग मंत्रियों के रोज़मर्रा के काम में दख़ल देने के लिए नहीं करेंगे। कुछ महीने गतिरोध रहा। वायसराय लिनलिथगो के एक सामान्य आश्वासन के बाद कांग्रेस कार्यसमिति ने जुलाई 1937 में पद स्वीकार करने की अनुमति दे दी।

◆ कहाँ-कहाँ और किसके नेतृत्व में — मद्रास में सी. राजगोपालाचारी, बम्बई में बी. जी. खेर, संयुक्त प्रांत में गोविंद वल्लभ पंत, बिहार में श्रीकृष्ण सिन्हा, मध्य प्रांत में पहले एन. बी. खरे और फिर रविशंकर शुक्ल, उड़ीसा में बिश्वनाथ दास और पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत में डॉ. ख़ान साहब (ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ाँ के बड़े भाई) ने सरकार बनाई। 1938 में असम में गोपीनाथ बरदलोई के नेतृत्व में भी कांग्रेस की मिली-जुली सरकार बन गई। इस प्रकार ग्यारह में से आठ प्रांतों में कांग्रेस का शासन हो गया।

◆ "प्रधानमंत्री" शब्द — उस समय प्रांत की सरकार के मुखिया को "प्रीमियर" यानी प्रधानमंत्री कहा जाता था, मुख्यमंत्री नहीं। इसलिए पुरानी पुस्तकों में "मद्रास के प्रधानमंत्री राजगोपालाचारी" लिखा मिलता है।

◆ नियंत्रण — मंत्री कहीं सत्ता के मोह में कांग्रेस की नीति से भटक न जाएँ, इसके लिए कांग्रेस ने एक संसदीय बोर्ड (उप-समिति) बनाया, जिसके सदस्य सरदार पटेल, मौलाना आज़ाद और राजेंद्र प्रसाद थे। यह बोर्ड सभी प्रांतों के मंत्रिमंडलों के काम पर नज़र रखता था।

✅ 7.4 मंत्रिमंडलों के काम (जुलाई 1937 – अक्टूबर 1939)

कांग्रेस मंत्रिमंडल लगभग 28 महीने चले। उनके पास सीमित धन और सीमित अधिकार थे, फिर भी उन्होंने दिखाया कि जनता की अपनी सरकार कैसी हो सकती है।

◆ नागरिक स्वतंत्रता — मंत्रिमंडलों ने सबसे पहले हज़ारों राजनीतिक बंदियों को रिहा किया, अख़बारों और संगठनों पर लगी पाबंदियाँ हटाईं, आपातकालीन दमनकारी क़ानून वापस लिए और सविनय अवज्ञा के समय ज़ब्त की गई संपत्ति लौटाई। पुलिस की शक्तियाँ घटाई गईं।

◆ सादगी — मंत्रियों ने अपना वेतन घटाकर 500 रुपये मासिक कर लिया और रेल में साधारण दर्जे में यात्रा करने लगे। यह अंग्रेज़ अफ़सरों के ठाठ-बाट के सामने एक नैतिक संदेश था।

◆ किसानों के लिए — संयुक्त प्रांत और बिहार में काश्तकारी क़ानून बने, जिनसे किसानों को बेदख़ली से सुरक्षा मिली और लगान की बढ़ोतरी पर रोक लगी। कई प्रांतों में किसानों के क़र्ज़ में राहत देने वाले क़ानून बने, जिनसे साहूकारों की मनमानी ब्याज दरों पर लगाम लगी।

◆ मज़दूरों के लिए — बम्बई में औद्योगिक विवादों को बातचीत और मध्यस्थता से सुलझाने का क़ानून बना। मंत्रिमंडलों ने मज़दूरी बढ़ाने और काम की दशा सुधारने के लिए समितियाँ बनाईं।

◆ सामाजिक सुधार — कई प्रांतों में नशाबंदी शुरू हुई, दलितों ("हरिजनों") के लिए मंदिर-प्रवेश के क़ानून बने और उनकी शिक्षा के लिए छात्रवृत्तियाँ बढ़ाई गईं। खादी और ग्रामोद्योग को सरकारी सहायता मिली।

◆ शिक्षा — वर्धा योजना — अक्टूबर 1937 में वर्धा में हुए शिक्षा सम्मेलन में गांधीजी ने "बुनियादी शिक्षा" (नई तालीम) का विचार रखा। डॉ. ज़ाकिर हुसैन की अध्यक्षता वाली समिति ने इसका पाठ्यक्रम तैयार किया। इसमें सात वर्ष की निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा मातृभाषा में देने और पढ़ाई को किसी हस्तशिल्प (जैसे कताई-बुनाई) से जोड़ने की बात थी, ताकि बच्चा काम करते हुए सीखे।

◆ योजना — कांग्रेस अध्यक्ष सुभाष चंद्र बोस ने 1938 में राष्ट्रीय योजना समिति बनाई, जिसके अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू थे। स्वतंत्र भारत की पंचवर्षीय योजनाओं का विचार यहीं से निकला।

⚠️ 7.5 सीमाएँ और विवाद

◆ सीमित शक्ति और धन — गवर्नरों के पास विशेष शक्तियाँ थीं और आय के बड़े स्रोत केंद्र के पास थे। कुछ प्रांतों के ऊपरी सदनों में ज़मींदारों का प्रभाव था, इसलिए ज़मींदारी जैसी व्यवस्था को छुआ तक नहीं जा सका।

◆ किसान-मज़दूरों से टकराव — जनता की अपेक्षाएँ बहुत बढ़ गई थीं। बिहार में किसान सभा और बम्बई-कानपुर में मज़दूर हड़तालों से कांग्रेस सरकारों का टकराव हुआ और कुछ जगह उन्हें पुलिस का सहारा लेना पड़ा। इससे वामपंथी कार्यकर्ता निराश हुए।

◆ पद-लोलुपता — सत्ता के साथ कांग्रेस में गुटबाज़ी, अवसरवादी लोगों की भीड़ और फ़र्ज़ी सदस्यता जैसी बुराइयाँ आईं। गांधीजी ने स्वयं इस पर गहरी चिंता जताई।

◆ मुस्लिम लीग से दूरी — संयुक्त प्रांत में लीग चाहती थी कि उसे मंत्रिमंडल में साझेदार बनाया जाए; कांग्रेस ने शर्त रखी कि लीग के विधायक कांग्रेस दल में मिल जाएँ। बात नहीं बनी और लीग ने इसे अपमान की तरह प्रचारित किया। इसके बाद लीग ने कांग्रेस शासन को "हिंदू राज" बताना शुरू किया। उसने पीरपुर रिपोर्ट (1938) और बिहार पर शरीफ़ रिपोर्ट (1939) प्रकाशित कीं, जिनमें मुसलमानों पर अत्याचार के आरोप लगाए गए; फ़ज़लुल हक़ ने भी 1939 में इसी विषय पर एक पुस्तिका निकाली। इन आरोपों के ठोस प्रमाण नहीं थे, पर इनके प्रचार से लीग का जनाधार तेज़ी से बढ़ा।

📌 याद रखें — 28 महीनों का महत्त्व

कांग्रेस मंत्रिमंडलों ने यह धारणा तोड़ दी कि भारतीय शासन नहीं चला सकते। जनता ने पहली बार देखा कि पुलिस और प्रशासन उन्हीं नेताओं के आदेश पर चल रहे हैं जो कल तक जेल में थे — इससे राज का डर और घटा।

पर इसी दौर में कांग्रेस और मुस्लिम लीग की दूरी इतनी बढ़ी कि 1937 में कमज़ोर दिखने वाली लीग 1940 तक अलग देश की माँग करने लगी।

🔥 7.6 हरिपुरा अधिवेशन (फ़रवरी 1938)

◆ कौन, कब, कहाँ — यह अधिवेशन गुजरात के हरिपुरा गाँव में फ़रवरी 1938 में हुआ। सुभाष चंद्र बोस सर्वसम्मति से अध्यक्ष चुने गए। उस समय वे केवल 41 वर्ष के थे और युवाओं तथा वामपंथियों में बहुत लोकप्रिय थे।

◆ मुख्य बातें — सुभाष ने अपने भाषण में स्वतंत्र भारत के लिए योजनाबद्ध औद्योगिक विकास की ज़रूरत बताई; इसी सोच से आगे राष्ट्रीय योजना समिति बनी। अधिवेशन ने 1935 के अधिनियम की संघ-योजना का फिर विरोध किया।

◆ रियासतों पर नई नीति — अब तक कांग्रेस रियासतों के भीतर सीधे आंदोलन नहीं चलाती थी। हरिपुरा में तय हुआ कि रियासतों की जनता अपने प्रजामंडलों के ज़रिए संघर्ष करे; कांग्रेस अपने नाम से आंदोलन नहीं चलाएगी, पर उसका नैतिक समर्थन रहेगा और कांग्रेसी व्यक्तिगत रूप से भाग ले सकेंगे। अगले ही वर्ष त्रिपुरी में यह रोक भी लगभग हटा दी गई। (रियासतों के जन-आंदोलन अध्याय 15 में हैं।)

⚡ 7.7 त्रिपुरी संकट (1939)

◆ पृष्ठभूमि — मतभेद किस बात पर था — सुभाष का मानना था कि यूरोप में युद्ध के बादल घिर रहे हैं और ब्रिटेन संकट में होगा; इसलिए कांग्रेस को अंग्रेज़ों को छह महीने की अंतिम चेतावनी देकर तुरंत देशव्यापी संघर्ष छेड़ देना चाहिए। गांधीजी और उनके साथियों (पटेल, राजेंद्र प्रसाद, कृपलानी आदि) का मानना था कि देश अभी इतने बड़े संघर्ष के लिए तैयार नहीं है और जल्दबाज़ी से आंदोलन बिखर जाएगा। यह केवल व्यक्तियों का नहीं, रणनीति और समय का मतभेद था।

◆ चुनाव (29 जनवरी 1939) — सुभाष ने दोबारा अध्यक्ष बनने की इच्छा जताई। गांधीजी और कार्यसमिति के वरिष्ठ नेताओं ने पट्टाभि सीतारमैया को उम्मीदवार बनाया। कांग्रेस में पहली बार अध्यक्ष पद के लिए सीधा मुक़ाबला हुआ और सुभाष 1580 के मुक़ाबले 1377 मतों से जीत गए। गांधीजी ने कहा — "पट्टाभि की हार मेरी हार है।"

◆ संकट — इसके बाद कार्यसमिति के अधिकांश सदस्यों ने त्यागपत्र दे दिया। मार्च 1939 में त्रिपुरी (जबलपुर के पास, मध्य प्रांत) में अधिवेशन हुआ, जिसमें बीमार सुभाष स्ट्रेचर पर पहुँचे। वहाँ गोविंद वल्लभ पंत ने प्रस्ताव रखा कि अध्यक्ष अपनी कार्यसमिति गांधीजी की इच्छा के अनुसार बनाएँ; यह प्रस्ताव पारित हो गया। गांधीजी ने कोई नाम सुझाने से मना कर दिया, और सुभाष के लिए अपनी पसंद की समिति बनाना असंभव हो गया।

◆ परिणाम — अप्रैल 1939 में कलकत्ता की बैठक में सुभाष ने अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे दिया और राजेंद्र प्रसाद अध्यक्ष बने। 3 मई 1939 को सुभाष ने कांग्रेस के भीतर ही वामपंथी शक्तियों को एक करने के लिए फ़ॉरवर्ड ब्लॉक बनाया। जब उन्होंने कांग्रेस के एक निर्णय के विरुद्ध देशव्यापी विरोध-दिवस का आह्वान किया, तो अगस्त 1939 में उन्हें बंगाल कांग्रेस के अध्यक्ष पद से हटा दिया गया और तीन वर्ष के लिए कांग्रेस का कोई भी पद लेने से रोक दिया गया।

◆ महत्त्व — त्रिपुरी ने दिखा दिया कि कांग्रेस में चुनाव जीतना एक बात है और गांधीजी के नैतिक नेतृत्व के बिना संगठन चलाना दूसरी। पर इससे दोनों के बीच का आदर कम नहीं हुआ — आगे सुभाष ने ही गांधीजी को "राष्ट्रपिता" कहा (खंड 11)।

📋 दोहराव तालिका: 1936–1939 के कांग्रेस अधिवेशन

अधिवेशन

अध्यक्ष

क्यों याद रखें

लखनऊ (अप्रैल 1936)

जवाहरलाल नेहरू

कांग्रेस ने 1935 का अधिनियम अस्वीकार किया, पर चुनाव लड़ने का निर्णय लिया।

फ़ैज़पुर (दिसंबर 1936)

जवाहरलाल नेहरू

यह गाँव में हुआ पहला अधिवेशन था और इसमें किसानों के लिए कृषि कार्यक्रम अपनाया गया।

हरिपुरा (फ़रवरी 1938)

सुभाष चंद्र बोस

यहाँ योजनाबद्ध विकास की बात हुई और रियासतों के प्रजामंडलों को नैतिक समर्थन देने की नीति बनी।

त्रिपुरी (मार्च 1939)

सुभाष चंद्र बोस (बाद में राजेंद्र प्रसाद)

सुभाष ने पट्टाभि सीतारमैया को हराया, पर पंत प्रस्ताव के बाद त्यागपत्र देकर फ़ॉरवर्ड ब्लॉक बनाया।

8. द्वितीय विश्वयुद्ध, अगस्त प्रस्ताव और व्यक्तिगत सत्याग्रह (1939–1941)

1 सितंबर 1939 को हिटलर के जर्मनी ने पोलैंड पर आक्रमण किया और द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू हो गया। दो दिन बाद ब्रिटेन ने जर्मनी के विरुद्ध युद्ध की घोषणा की। इस युद्ध ने भारत की राजनीति को पूरी तरह बदल दिया — अगले छह वर्षों की लगभग हर घटना (मंत्रिमंडलों का त्यागपत्र, क्रिप्स मिशन, भारत छोड़ो, आज़ाद हिंद फ़ौज) इसी युद्ध से जुड़ी है। नीचे का आरेख इस पूरे दौर का सार देता है; उसके बाद हर घटना को विस्तार से समझेंगे।

चित्र 13.2: द्वितीय विश्वयुद्ध से भारत छोड़ो आंदोलन तक का घटनाक्रम (1939–1944)
चित्र 13.2: द्वितीय विश्वयुद्ध से भारत छोड़ो आंदोलन तक का घटनाक्रम (1939–1944)

🌍 8.1 भारत बिना पूछे युद्ध में (3 सितंबर 1939)

◆ क्या हुआ — 3 सितंबर 1939 को वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो (1936–1943; सबसे लंबे कार्यकाल वाले वायसराय) ने घोषणा कर दी कि भारत भी जर्मनी के विरुद्ध युद्ध में शामिल है। उन्होंने न तो केंद्रीय विधानमंडल से पूछा, न आठ प्रांतों में चल रही चुनी हुई कांग्रेस सरकारों से।

◆ कांग्रेस की दुविधा — कांग्रेस फ़ासीवाद और नाज़ीवाद की घोर विरोधी थी और उसकी सहानुभूति हिटलर के शिकार देशों के साथ थी। पर उसका प्रश्न सीधा था — जो देश स्वयं ग़ुलाम है, वह दूसरों की "स्वतंत्रता और लोकतंत्र की रक्षा" के युद्ध में कैसे लड़े? कांग्रेस के भीतर तीन मत थे। गांधीजी ब्रिटेन को बिना शर्त नैतिक सहानुभूति देने के पक्ष में थे। सुभाष बोस और समाजवादी कहते थे कि "ब्रिटेन की कठिनाई भारत का अवसर है", इसलिए तुरंत संघर्ष छेड़ा जाए। नेहरू बीच में थे — फ़ासीवाद के विरोधी, पर स्वतंत्रता के वादे के बिना सहयोग के भी विरोधी।

◆ वर्धा बैठक (सितंबर 1939) — कांग्रेस कार्यसमिति ने नेहरू का मत अपनाया। उसने सरकार से माँग की कि ब्रिटेन अपने युद्ध के उद्देश्य स्पष्ट करे — क्या लोकतंत्र की बात भारत पर भी लागू होगी? यदि ब्रिटेन युद्ध के बाद भारत की स्वतंत्रता की घोषणा करे और अभी केंद्र में कोई उत्तरदायी सरकार बनाए, तो कांग्रेस सहयोग करेगी।

◆ लिनलिथगो का उत्तर (17 अक्टूबर 1939) — वायसराय ने कहा कि ब्रिटेन का लक्ष्य वही पुराना डोमिनियन स्टेटस है, जो "भविष्य में कभी" मिलेगा; युद्ध के बाद 1935 के अधिनियम में संशोधन पर विचार होगा; और फ़िलहाल भारतीयों की एक सलाहकार समिति बना दी जाएगी। कांग्रेस ने इसे पूरी तरह निराशाजनक माना, क्योंकि इसमें न स्वतंत्रता का वादा था, न तुरंत कोई शक्ति।

🚪 8.2 मंत्रिमंडलों का त्यागपत्र और "मुक्ति दिवस" (अक्टूबर–दिसंबर 1939)

◆ त्यागपत्र — कार्यसमिति के 22 अक्टूबर 1939 के निर्णय के बाद अक्टूबर–नवंबर 1939 में आठों प्रांतों के कांग्रेसी मंत्रिमंडलों ने त्यागपत्र दे दिया। इन प्रांतों में 1935 के अधिनियम की धारा 93 के अंतर्गत गवर्नरों का सीधा शासन लागू हो गया।

◆ परिणाम — इससे कांग्रेस ने अपना विरोध तो दर्ज कराया, पर प्रशासन पर उसका प्रभाव समाप्त हो गया। इसका लाभ मुस्लिम लीग को मिला, जो अब सरकार की स्वाभाविक सहयोगी बन गई। जिन्ना ने कांग्रेस शासन के अंत पर 22 दिसंबर 1939 को "मुक्ति दिवस" मनाने का आह्वान किया। डॉ. आंबेडकर ने भी इस आह्वान का समर्थन किया।

◆ रामगढ़ अधिवेशन (मार्च 1940) — बिहार के रामगढ़ में हुए इस अधिवेशन के अध्यक्ष मौलाना अबुल कलाम आज़ाद थे। युद्ध और आंदोलन के कारण अगले वर्षों में कोई वार्षिक अधिवेशन नहीं हो सका, इसलिए आज़ाद 1940 से 1946 तक लगातार अध्यक्ष रहे — किसी भी व्यक्ति का सबसे लंबा लगातार कार्यकाल। अधिवेशन ने घोषणा की कि पूर्ण स्वतंत्रता से कम कुछ स्वीकार नहीं होगा और संगठन तैयार होते ही सविनय अवज्ञा शुरू की जाएगी। उसी समय रामगढ़ में ही सुभाष बोस ने अलग से "समझौता-विरोधी सम्मेलन" किया।

◆ लाहौर प्रस्ताव (23 मार्च 1940) — रामगढ़ के कुछ ही दिन बाद मुस्लिम लीग ने लाहौर में प्रस्ताव पारित किया कि भारत के उत्तर-पश्चिम और पूर्व के मुस्लिम बहुल क्षेत्रों को मिलाकर "स्वतंत्र राज्य" बनाए जाएँ। प्रस्ताव में "पाकिस्तान" शब्द नहीं था, पर यही आगे "पाकिस्तान प्रस्ताव" कहलाया। इसका विस्तार अध्याय 14 में है।

📜 8.3 अगस्त प्रस्ताव (8 अगस्त 1940)

◆ पृष्ठभूमि — जून 1940 में फ़्रांस हिटलर के सामने गिर गया और ब्रिटेन अकेला पड़ गया; उस पर जर्मन हवाई हमले होने लगे। अब ब्रिटेन को भारत के सहयोग की बहुत ज़रूरत थी। इसी समय कांग्रेस ने पूना (जुलाई 1940) में प्रस्ताव रखा कि यदि केंद्र में सभी दलों की एक अस्थायी राष्ट्रीय सरकार बना दी जाए, तो वह देश की रक्षा में पूरा सहयोग करेगी। (इस प्रस्ताव के पीछे राजगोपालाचारी की सोच थी; गांधीजी अहिंसा के कारण युद्ध में सक्रिय सहयोग के पक्ष में नहीं थे।)

◆ प्रस्ताव में क्या था — इसके उत्तर में लिनलिथगो ने 8 अगस्त 1940 को जो घोषणा की, वही "अगस्त प्रस्ताव" है। उसमें चार मुख्य बातें थीं: (1) भारत का लक्ष्य डोमिनियन स्टेटस होगा; (2) युद्ध के बाद भारत का संविधान बनाने के लिए एक संविधान निर्मात्री संस्था बनेगी, जिसमें मुख्य रूप से भारतीय होंगे; (3) अभी वायसराय की कार्यकारी परिषद का विस्तार करके उसमें अधिक भारतीय लिए जाएँगे और एक युद्ध सलाहकार परिषद बनेगी; (4) अल्पसंख्यकों को आश्वासन कि ब्रिटेन ऐसी किसी सरकार को सत्ता नहीं सौंपेगा जिसे भारत के राष्ट्रीय जीवन के बड़े और शक्तिशाली वर्ग स्वीकार न करें।

◆ नया क्या था — पहली बार अंग्रेज़ सरकार ने माना कि भारत का संविधान बनाना मुख्य रूप से भारतीयों का अपना काम है। पहली बार डोमिनियन स्टेटस का स्पष्ट वादा भी किया गया।

◆ कांग्रेस की प्रतिक्रिया — कांग्रेस ने प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया। कारण तीन थे — पूर्ण स्वतंत्रता की जगह फिर डोमिनियन स्टेटस; सब कुछ "युद्ध के बाद", अभी कोई वास्तविक शक्ति नहीं; और चौथी बात से अल्पसंख्यकों (व्यवहार में मुस्लिम लीग) को हर संवैधानिक प्रगति रोकने का वीटो मिल रहा था। नेहरू ने कहा कि डोमिनियन स्टेटस का विचार "दरवाज़े की कील की तरह मर चुका है"।

◆ मुस्लिम लीग की प्रतिक्रिया — लीग ने अल्पसंख्यकों वाले आश्वासन का स्वागत किया, पर प्रस्ताव को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया, क्योंकि उसमें विभाजन की माँग स्पष्ट रूप से नहीं मानी गई थी।

◆ परिणाम — जुलाई 1941 में वायसराय की कार्यकारी परिषद का विस्तार हुआ और पहली बार उसमें भारतीय सदस्यों का बहुमत हो गया, पर रक्षा, वित्त और गृह जैसे निर्णायक विभाग अंग्रेज़ों के पास ही रहे। कांग्रेस और सरकार के बीच गतिरोध बना रहा।

🙋 8.4 व्यक्तिगत सत्याग्रह (17 अक्टूबर 1940 – दिसंबर 1941)

🔍 आसान परिभाषा: व्यक्तिगत सत्याग्रह

📘 परिभाषा: ऐसा सत्याग्रह जिसमें जनता की भीड़ नहीं, बल्कि नेता द्वारा चुने हुए एक-एक व्यक्ति बारी-बारी से क़ानून तोड़कर गिरफ़्तारी देते हैं। 1940–41 में इसका रूप यह था कि सत्याग्रही सार्वजनिक रूप से युद्ध-विरोधी भाषण देकर जेल जाता था।

💡 आसान भाषा में: पूरी कक्षा एक साथ हड़ताल नहीं करती, बल्कि हर दिन कक्षा का एक चुना हुआ विद्यार्थी खड़ा होकर शांति से अपनी बात कहता है और दंड स्वीकार करता है। विरोध भी दर्ज हो जाता है और कोई उपद्रव भी नहीं होता। 🏠 उदाहरण: 17 अक्टूबर 1940 को विनोबा भावे ने पवनार में युद्ध-विरोधी भाषण दिया और गिरफ़्तार हुए। यह सविनय अवज्ञा (1930) जैसे जन-सत्याग्रह से अलग था, जिसमें लाखों लोग एक साथ क़ानून तोड़ते थे।

◆ पृष्ठभूमि — यही रास्ता क्यों — अगस्त प्रस्ताव ठुकराने के बाद कांग्रेस के सामने दो ख़तरे थे। यदि वह चुप बैठती, तो लगता कि भारत ख़ुशी से युद्ध में साथ है। यदि वह बड़ा जन-आंदोलन छेड़ती, तो हिटलर से जूझ रहे ब्रिटेन को पीछे से चोट पहुँचती, जो गांधीजी को नैतिक रूप से ठीक नहीं लगता था; साथ ही हिंसा भड़कने और कठोर दमन का भी डर था। इसलिए गांधीजी ने बीच का रास्ता निकाला — सीमित और प्रतीकात्मक सत्याग्रह।

◆ उद्देश्य — इसका लक्ष्य स्वतंत्रता छीनना नहीं, बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दावा करना था — यह कहने का अधिकार कि "इस युद्ध में धन या जन से सहायता देना ग़लत है"। इससे दुनिया को यह भी दिखता कि भारत की जनता अपनी इच्छा से इस युद्ध में नहीं है, और वह नाज़ीवाद तथा ब्रिटिश तानाशाही में कोई अंतर नहीं देखती।

◆ तरीक़ा — गांधीजी स्वयं सत्याग्रहियों को चुनते थे। चुना हुआ व्यक्ति पहले से ज़िला अधिकारी को सूचना देता, फिर किसी सार्वजनिक स्थान पर युद्ध-विरोधी भाषण देता और गिरफ़्तारी देता। यदि सरकार गिरफ़्तार न करती, तो वह गाँव-गाँव यही बात दोहराता हुआ दिल्ली की ओर पैदल चल पड़ता। इसी कारण इसे "दिल्ली चलो आंदोलन" भी कहा गया।

◆ सत्याग्रही — पहले सत्याग्रही आचार्य विनोबा भावे थे, जिन्होंने 17 अक्टूबर 1940 को वर्धा के पास पवनार में सत्याग्रह किया। दूसरे जवाहरलाल नेहरू थे, जिन्हें सत्याग्रह करने से पहले ही 31 अक्टूबर 1940 को गिरफ़्तार कर चार वर्ष की सज़ा दी गई। तीसरे ब्रह्मदत्त थे, जो गांधीजी के आश्रम के सदस्य थे। इसके बाद कांग्रेस के लगभग सभी बड़े नेताओं और हज़ारों कार्यकर्ताओं ने बारी-बारी से सत्याग्रह किया।

◆ पैमाना और अंत — मई 1941 तक लगभग 25,000 सत्याग्रही जेल जा चुके थे। 7 दिसंबर 1941 को जापान ने पर्ल हार्बर पर हमला किया और युद्ध एशिया में फैल गया। बदली परिस्थिति में सरकार ने दिसंबर 1941 में सत्याग्रहियों को रिहा कर दिया और कांग्रेस ने आंदोलन स्थगित कर दिया।

◆ मूल्यांकन — इस सत्याग्रह से जनता में कोई बड़ा उत्साह नहीं जगा और सरकार पर भी ख़ास दबाव नहीं पड़ा। पर इसने कांग्रेस संगठन को निष्क्रिय होने से बचाया, कार्यकर्ताओं को अनुशासित रखा और अगले बड़े संघर्ष (1942) के लिए ज़मीन तैयार की।

📌 याद रखें

विनोबा भावे को गांधीजी का आध्यात्मिक उत्तराधिकारी माना जाता है। स्वतंत्रता के बाद उन्होंने 1951 में भूदान आंदोलन चलाया और गांधीजी के "सर्वोदय" (सबका उदय) के विचार को आगे बढ़ाया। "सर्वोदय" शब्द गांधीजी ने जॉन रस्किन की पुस्तक "अन्टू दिस लास्ट" के अपने गुजराती अनुवाद के शीर्षक के रूप में दिया था।

वायसराय लिनलिथगो ने गांधीजी के उपवासों और आंदोलनों को "राजनीतिक ब्लैकमेल" कहा था।

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9. क्रिप्स मिशन (1942)

🌏 9.1 पृष्ठभूमि — अचानक बातचीत की ज़रूरत क्यों पड़ी?

◆ जापान भारत के दरवाज़े पर — दिसंबर 1941 में युद्ध में उतरने के बाद जापान ने कुछ ही महीनों में दक्षिण-पूर्व एशिया में अंग्रेज़ों को खदेड़ दिया। 15 फ़रवरी 1942 को सिंगापुर गिरा, जिसे ब्रिटेन का अजेय क़िला माना जाता था, और 8 मार्च 1942 को रंगून (बर्मा) भी हाथ से निकल गया। अब जापानी सेना भारत की पूर्वी सीमा पर थी।

◆ मित्र देशों का दबाव — अमेरिका के राष्ट्रपति रूज़वेल्ट और चीन के नेता च्यांग काई-शेक (जो फ़रवरी 1942 में स्वयं भारत आए थे) ब्रिटेन पर दबाव डाल रहे थे कि भारतीय नेताओं से समझौता करके उनका सक्रिय सहयोग लिया जाए। ब्रिटेन के भीतर लेबर दल भी यही चाहता था।

◆ कौन, कब — इसलिए प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने अपने युद्ध मंत्रिमंडल के सदस्य सर स्टैफ़र्ड क्रिप्स को भारत भेजा। क्रिप्स लेबर दल के वामपंथी नेता थे, नेहरू के मित्र थे और भारत की स्वतंत्रता के समर्थक माने जाते थे। वे मार्च 1942 के अंतिम सप्ताह में दिल्ली पहुँचे, लगभग तीन सप्ताह तक सभी दलों से बात की और 12 अप्रैल 1942 को ख़ाली हाथ लौट गए।

📑 9.2 क्रिप्स के प्रस्ताव

क्रिप्स अपने साथ ब्रिटिश मंत्रिमंडल की एक घोषणा का मसौदा लाए थे। उसके दो भाग थे — युद्ध के बाद के लिए वादे और युद्ध के दौरान की व्यवस्था।

1. डोमिनियन स्टेटस — युद्ध समाप्त होते ही एक "भारतीय संघ" बनेगा, जिसे डोमिनियन का दर्जा मिलेगा। उसे अपनी इच्छा से राष्ट्रमंडल से अलग होने का अधिकार भी होगा।

2. संविधान सभा — युद्ध के तुरंत बाद संविधान बनाने के लिए एक सभा बनेगी। ब्रिटिश प्रांतों के सदस्यों को प्रांतीय विधानसभाएँ चुनेंगी (यानी अप्रत्यक्ष चुनाव), जबकि रियासतों के सदस्यों को वहाँ के राजा मनोनीत करेंगे।

3. प्रांतों को अलग रहने का अधिकार — जो प्रांत नया संविधान स्वीकार न करना चाहे, वह संघ से बाहर रह सकता है और ब्रिटेन उसके साथ अलग समझौता करके उसे भी वैसा ही दर्जा दे सकता है। रियासतों को भी शामिल होने या न होने की छूट थी।

4. संधि — संविधान सभा और ब्रिटेन के बीच सत्ता सौंपने और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए एक संधि होगी।

5. युद्ध के दौरान — तब तक भारत की रक्षा का नियंत्रण ब्रिटेन के हाथ में रहेगा और वायसराय की शक्तियाँ वैसी ही बनी रहेंगी। भारतीय दलों के नेताओं को वायसराय की परिषद में शामिल होकर युद्ध-प्रयास में सहयोग के लिए बुलाया गया।

◆ अगस्त प्रस्ताव से आगे क्या था — इस बार संविधान सभा पूरी तरह भारतीयों की होनी थी (अगस्त प्रस्ताव में "मुख्य रूप से"), उसके गठन की ठोस योजना थी, और भारत को राष्ट्रमंडल छोड़ने का अधिकार भी दिया गया था।

❌ 9.3 किसने क्यों ठुकराया?

◆ कांग्रेस की आपत्तियाँ — (1) पूर्ण स्वतंत्रता की जगह फिर डोमिनियन स्टेटस दिया जा रहा था। (2) रियासतों के प्रतिनिधि जनता द्वारा चुने नहीं, राजाओं द्वारा मनोनीत होने थे — इससे संविधान सभा में अंग्रेज़ों के समर्थकों का एक बड़ा गुट बन जाता। (3) प्रांतों को अलग रहने का अधिकार देश की एकता के विरुद्ध था और इसमें विभाजन का बीज छिपा था। (4) सबसे बड़ी बात — अभी, तुरंत कोई वास्तविक शक्ति नहीं मिल रही थी। कांग्रेस चाहती थी कि वायसराय की परिषद एक मंत्रिमंडल की तरह काम करे और रक्षा विभाग में भारतीयों की सार्थक भागीदारी हो, पर वायसराय की वीटो शक्ति जस की तस रहनी थी। वार्ता अंत में इसी बात पर टूटी। कांग्रेस की ओर से मुख्य वार्ताकार नेहरू और मौलाना आज़ाद थे।

◆ मुस्लिम लीग की आपत्तियाँ — लीग को यह तो अच्छा लगा कि प्रांतों के अलग रहने की बात मानी गई है, पर पाकिस्तान की माँग स्पष्ट शब्दों में स्वीकार नहीं की गई थी। उसे एक ही संविधान सभा का विचार मंज़ूर नहीं था। अलग होने का निर्णय जिस तरीक़े से होना था (प्रांतीय विधानसभा में मतदान और ज़रूरत पड़ने पर पूरे प्रांत की जनता का मत), उससे भी लीग संतुष्ट नहीं थी, क्योंकि पंजाब और बंगाल में मुसलमानों का बहुमत बहुत थोड़ा था।

◆ अन्य दल — हिंदू महासभा ने प्रांतों को अलग होने के अधिकार के कारण इसे ठुकराया। सिखों को डर था कि पंजाब के अलग होने पर वे बँट जाएँगे। दलित वर्गों के नेताओं (डॉ. आंबेडकर) को लगा कि इसमें उनके लिए कोई सुरक्षा नहीं है। उदारवादी भी देश की एकता को ख़तरे के कारण असंतुष्ट रहे।

❝ यह आगे की तारीख़ का चेक (पोस्ट-डेटेड चेक) है। ❞ (महात्मा गांधी, क्रिप्स प्रस्ताव पर (आगे चलकर इसके साथ "एक डूबते हुए बैंक के नाम" जोड़कर यह टिप्पणी और प्रसिद्ध हुई))

इस कथन का अर्थ — "आगे की तारीख़ का चेक" वह चेक होता है जिसका पैसा आज नहीं, किसी भविष्य की तारीख़ पर मिलता है। गांधीजी का आशय था कि ब्रिटेन आज कुछ नहीं दे रहा, केवल युद्ध के बाद का वादा कर रहा है; और जिस तरह युद्ध में ब्रिटेन हार रहा था, उसे देखते हुए यह भी पक्का नहीं था कि वादा निभाने के लिए वह "बैंक" बचेगा भी या नहीं।

🔎 9.4 मिशन असफल क्यों हुआ और इसका परिणाम क्या हुआ?

◆ क्रिप्स के हाथ बँधे थे — उन्हें मसौदे में बदलाव करने की छूट नहीं थी; उनका रुख़ था "मानो या छोड़ो"। जब उन्होंने कांग्रेस को परिषद के "मंत्रिमंडल" जैसा होने का आश्वासन दिया, तो लंदन और वायसराय ने उसे नहीं माना।

◆ ब्रिटिश नेतृत्व की नीयत — प्रधानमंत्री चर्चिल, भारत सचिव एमरी, वायसराय लिनलिथगो और प्रधान सेनापति वेवेल — कोई भी सत्ता का वास्तविक हस्तांतरण नहीं चाहता था। कई इतिहासकारों के अनुसार मिशन का असली उद्देश्य अमेरिका और चीन को यह दिखाना था कि ब्रिटेन ने "प्रयास" तो किया, समझौता भारतीयों के आपसी झगड़े के कारण नहीं हुआ।

◆ चर्चिल का रुख़ — कुछ महीने बाद (नवंबर 1942) चर्चिल ने साफ़ कहा — "मैं ब्रिटिश साम्राज्य के विघटन की अध्यक्षता करने के लिए सम्राट का प्रथम मंत्री नहीं बना हूँ।"

◆ परिणाम — भारत में गहरी निराशा और क्रोध फैला। जनता को लगा कि ब्रिटेन संकट की इस घड़ी में भी कुछ देने को तैयार नहीं है। यही निराशा चार महीने बाद भारत छोड़ो आंदोलन का सबसे बड़ा तात्कालिक कारण बनी। दूसरी ओर, प्रांतों को अलग रहने का अधिकार देकर ब्रिटेन ने पहली बार विभाजन की संभावना को आधिकारिक रूप से मान लिया, जिससे मुस्लिम लीग की माँग को बल मिला।

◆ राजगोपालाचारी का अलग मत — अप्रैल 1942 में राजगोपालाचारी ने सुझाव दिया कि कांग्रेस लीग की पाकिस्तान की माँग को सिद्धांत रूप में मान ले, ताकि दोनों मिलकर राष्ट्रीय सरकार बना सकें। कांग्रेस ने यह सुझाव अस्वीकार कर दिया और वे कांग्रेस से अलग हो गए। आगे उन्होंने 1944 में अपना प्रसिद्ध "सी. आर. फ़ॉर्मूला" दिया (अध्याय 14)।

📋 दोहराव तालिका: अगस्त प्रस्ताव बनाम क्रिप्स प्रस्ताव

पहलू

अगस्त प्रस्ताव (1940)

क्रिप्स प्रस्ताव (1942)

किसने रखा

यह घोषणा वायसराय लिनलिथगो ने 8 अगस्त 1940 को की।

यह प्रस्ताव ब्रिटिश मंत्री सर स्टैफ़र्ड क्रिप्स मार्च 1942 में लेकर आए।

भारत का दर्जा

युद्ध के बाद डोमिनियन स्टेटस देने की बात कही गई।

डोमिनियन स्टेटस के साथ राष्ट्रमंडल छोड़ने का अधिकार भी दिया गया।

संविधान सभा

संविधान बनाने वाली संस्था में मुख्य रूप से भारतीय होने थे।

संविधान सभा पूरी तरह भारतीयों की होनी थी और उसके गठन का तरीक़ा भी बताया गया।

विवादित बिंदु

अल्पसंख्यकों को ऐसा आश्वासन मिला जो व्यवहार में वीटो जैसा था।

प्रांतों को संघ से बाहर रहने का अधिकार मिला, जिसमें विभाजन का बीज था।

परिणाम

कांग्रेस ने इसे ठुकराकर व्यक्तिगत सत्याग्रह शुरू किया।

कांग्रेस और लीग दोनों ने ठुकराया और चार महीने बाद भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हुआ।

10. भारत छोड़ो आंदोलन (1942–1944)

भारत छोड़ो आंदोलन गांधीजी के नेतृत्व का तीसरा और अंतिम बड़ा जन-आंदोलन था। इसे "अगस्त क्रांति" भी कहा जाता है। यह पहले के दोनों आंदोलनों से अलग था — इसकी माँग थी कि अंग्रेज़ तुरंत भारत छोड़ें, और यह नेताओं के जेल जाने के बाद जनता ने स्वयं चलाया।

🔥 10.1 पृष्ठभूमि — 1942 में ही क्यों?

◆ क्रिप्स मिशन की विफलता — इससे साफ़ हो गया कि ब्रिटेन युद्ध के दौरान कोई वास्तविक सत्ता नहीं देगा और युद्ध के बाद के वादों पर भरोसा नहीं किया जा सकता। अब बातचीत का रास्ता बंद दिख रहा था।

◆ जापानी आक्रमण का ख़तरा — मलाया, सिंगापुर और बर्मा में अंग्रेज़ बिना ठीक से लड़े पीछे हटे थे और वहाँ की जनता को उसके हाल पर छोड़ दिया था। गांधीजी का तर्क था कि अंग्रेज़ों की उपस्थिति ही जापान को भारत पर हमले का निमंत्रण देती है; यदि अंग्रेज़ चले जाएँ, तो जापान के पास हमले का कारण नहीं रहेगा और स्वतंत्र भारत अपनी रक्षा स्वयं करेगा। उन्हें यह भी डर था कि निराश और डरी हुई जनता जापानियों का विरोध ही नहीं करेगी; इसलिए जनता में साहस जगाना ज़रूरी था।

◆ ब्रिटिश अजेयता का भ्रम टूटा — एक एशियाई देश के हाथों ब्रिटेन की लगातार हार ने दिखा दिया कि अंग्रेज़ अपराजेय नहीं हैं। लोग बैंकों और डाकघरों से अपना पैसा निकालने लगे — यह राज की स्थिरता पर घटते भरोसे का संकेत था।

◆ नस्ली भेदभाव — बर्मा और मलाया से भागते समय अंग्रेज़ों ने गोरों को वाहन और सुरक्षित रास्ते दिए, जबकि भारतीय शरणार्थियों को पैदल, जंगलों के कठिन रास्तों से आना पड़ा, जिसमें हज़ारों मर गए। इन रास्तों को लोग "सफ़ेद रास्ता" और "काला रास्ता" कहने लगे। इससे भारत में गहरा रोष फैला।

◆ युद्ध के आर्थिक कष्ट — युद्ध के कारण महँगाई बहुत बढ़ गई और चावल, नमक, कपड़े जैसी ज़रूरी चीज़ों की भारी कमी हो गई। पूर्वी बंगाल और उड़ीसा में सरकार ने जापानियों के डर से लोगों की नावें नष्ट कर दीं ("नाव नीति"), जो वहाँ जीविका और आवागमन का मुख्य साधन थीं।

◆ गांधीजी का बदला हुआ रुख़ — अब तक संयम बरतने वाले गांधीजी 1942 की गर्मियों में सबसे अधिक दृढ़ थे। उन्होंने अपने पत्र "हरिजन" में लिखा — "भारत को ईश्वर के भरोसे छोड़ दो; और यदि यह बहुत अधिक हो, तो उसे अराजकता के भरोसे छोड़ दो।" शुरू में नेहरू और आज़ाद को संकोच था कि इस समय आंदोलन करने से फ़ासीवादी शक्तियों को लाभ हो सकता है, पर गांधीजी ने कहा कि यदि कांग्रेस साथ न आई, तो वे "देश की बालू से ही कांग्रेस से भी बड़ा आंदोलन खड़ा कर देंगे।" अंत में सब सहमत हो गए।

📜 10.2 प्रस्ताव और "करो या मरो" (जुलाई–अगस्त 1942)

◆ वर्धा प्रस्ताव (14 जुलाई 1942) — कांग्रेस कार्यसमिति ने वर्धा में गांधीजी के संघर्ष के विचार को स्वीकार किया और माँग की कि ब्रिटिश शासन भारत से तुरंत समाप्त हो। इसकी अंतिम स्वीकृति के लिए अखिल भारतीय कांग्रेस समिति की बैठक बम्बई में बुलाई गई।

◆ बम्बई बैठक (7–8 अगस्त 1942) — यह बैठक बम्बई के ग्वालिया टैंक मैदान में हुई, जिसे आज अगस्त क्रांति मैदान कहते हैं। जवाहरलाल नेहरू ने "भारत छोड़ो" प्रस्ताव रखा और सरदार पटेल ने उसका समर्थन किया। 8 अगस्त 1942 की रात प्रस्ताव भारी बहुमत से पारित हुआ।

◆ प्रस्ताव में क्या था — भारत में ब्रिटिश शासन का तत्काल अंत हो; स्वतंत्र भारत फ़ासीवाद और साम्राज्यवाद के विरुद्ध अपनी पूरी शक्ति से मित्र देशों के साथ खड़ा होगा; अंग्रेज़ों के जाने पर एक अस्थायी सरकार बनेगी; और इस माँग को मनवाने के लिए गांधीजी के नेतृत्व में अहिंसक जन-संघर्ष छेड़ा जाएगा। यह भी कहा गया कि यदि नेता गिरफ़्तार हो जाएँ, तो हर भारतीय स्वयं अपना मार्गदर्शक बने।

◆ नारा — "भारत छोड़ो" का नारा समाजवादी नेता और बम्बई के मेयर रहे यूसुफ़ मेहर अली ने गढ़ा था। ("साइमन वापस जाओ" का नारा भी उन्हीं का दिया हुआ था।)

❝ मैं आपको एक छोटा-सा मंत्र देता हूँ। इसे आप अपने दिलों में अंकित कर लें और हर साँस के साथ इसका जाप करें। वह मंत्र है — "करो या मरो"। या तो हम भारत को आज़ाद कराएँगे या इस प्रयास में मर जाएँगे; हम अपनी ग़ुलामी का स्थायित्व देखने के लिए ज़िंदा नहीं रहेंगे। ❞ (महात्मा गांधी, ग्वालिया टैंक, 8 अगस्त 1942)

गांधीजी के निर्देश — अपने भाषण में गांधीजी ने समाज के अलग-अलग वर्गों से अलग-अलग बातें कहीं। सरकारी कर्मचारी नौकरी न छोड़ें, पर खुलकर कांग्रेस के प्रति अपनी निष्ठा घोषित करें। सैनिक सेना न छोड़ें, पर अपने ही देशवासियों पर गोली चलाने से इनकार कर दें। किसान, यदि ज़मींदार सरकार-विरोधी हो, तो उसे आपसी सहमति से तय लगान दें; और यदि ज़मींदार सरकार का साथ दे, तो लगान देना बंद कर दें। विद्यार्थी, यदि उनमें आत्मविश्वास हो, तो पढ़ाई छोड़कर आंदोलन में आएँ। राजा अपनी जनता की संप्रभुता स्वीकार करें और रियासतों की जनता स्वयं को भारतीय राष्ट्र का अंग घोषित करे।

🌅 10.3 "ऑपरेशन ज़ीरो आवर" — 9 अगस्त 1942 की भोर

◆ गिरफ़्तारियाँ — सरकार पहले से तैयार बैठी थी। प्रस्ताव पारित होने के कुछ ही घंटों बाद, 9 अगस्त 1942 को तड़के गांधीजी सहित कांग्रेस के सभी बड़े नेता गिरफ़्तार कर लिए गए। कांग्रेस को ग़ैर-क़ानूनी संगठन घोषित कर दिया गया और उसके कार्यालय तथा धन ज़ब्त कर लिए गए।

◆ कौन कहाँ रखा गया — गांधीजी, कस्तूरबा, सरोजिनी नायडू और गांधीजी के सचिव महादेव देसाई को पूना के आग़ा ख़ाँ महल में रखा गया; महादेव देसाई का वहीं 15 अगस्त 1942 को निधन हो गया। कार्यसमिति के सदस्यों — नेहरू, आज़ाद, पटेल, पंत, कृपलानी, पट्टाभि सीतारमैया, आसफ़ अली आदि — को अहमदनगर क़िले में रखा गया; यहीं नेहरू ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक "भारत की खोज" लिखी। राजेंद्र प्रसाद बम्बई नहीं जा सके थे; उन्हें पटना में गिरफ़्तार कर बांकीपुर जेल में रखा गया।

◆ अरुणा आसफ़ अली — नेताओं की गिरफ़्तारी के बाद 9 अगस्त को ग्वालिया टैंक मैदान में युवा नेता अरुणा आसफ़ अली ने पुलिस के घेरे के बीच तिरंगा फहराया। इसी कारण उन्हें "1942 की नायिका" कहा जाता है।

◆ परिणाम — सरकार ने सोचा था कि नेताओं के बिना आंदोलन शुरू ही नहीं होगा। हुआ इसका उलटा — गिरफ़्तारी की ख़बर फैलते ही जनता सड़कों पर उतर आई, और चूँकि रोकने वाला कोई नेता बाहर नहीं था, आंदोलन कहीं अधिक उग्र हो गया।

🌪️ 10.4 आंदोलन के तीन चरण

◆ पहला चरण — शहरों में (अगस्त के पहले सप्ताह) — बम्बई, अहमदाबाद, पूना, दिल्ली, कानपुर, इलाहाबाद, पटना जैसे शहरों में हड़तालें, जुलूस और पुलिस से टकराव हुए। विद्यार्थियों ने स्कूल-कॉलेज छोड़ दिए। मज़दूरों ने काम बंद किया — अहमदाबाद की कपड़ा मिलें लगभग साढ़े तीन महीने बंद रहीं और जमशेदपुर के इस्पात कारख़ाने में भी हड़ताल हुई।

◆ दूसरा चरण — गाँवों में (मध्य अगस्त से) — शहरों से लौटे विद्यार्थियों ने गाँवों में संदेश पहुँचाया और आंदोलन देहात में फैल गया। जनता ने सरकारी सत्ता के प्रतीकों और युद्ध के लिए ज़रूरी संचार साधनों पर हमले किए — रेल की पटरियाँ उखाड़ी गईं, तार काटे गए, थानों, डाकघरों और कचहरियों पर क़ब्ज़ा किया गया। पूर्वी संयुक्त प्रांत (बलिया, आज़मगढ़, गोरखपुर) और बिहार (सारण, मुज़फ़्फ़रपुर, भागलपुर, पूर्णिया) में आंदोलन सबसे उग्र था; कुछ दिनों के लिए वहाँ अंग्रेज़ी शासन लगभग लुप्त हो गया। कई जगह किसान दिन में खेती करते और रात में तोड़फोड़।

◆ तीसरा चरण — भूमिगत आंदोलन और समानांतर सरकारें (सितंबर 1942 से 1944 तक) — जब सेना की मदद से खुला विद्रोह कुचल दिया गया, तो कार्यकर्ता भूमिगत हो गए। छोटे-छोटे गुप्त दल तोड़फोड़ करते, पर्चे बाँटते और गुप्त रेडियो चलाते रहे; कुछ क्षेत्रों में जनता ने अपनी सरकारें बना लीं।

🕵️ 10.5 भूमिगत आंदोलन

भूमिगत होने का अर्थ है पुलिस से छिपकर, नाम और ठिकाने बदल-बदलकर काम करना। इस काम में मुख्य भूमिका कांग्रेस समाजवादी युवाओं की रही। उनका उद्देश्य था कि नेताओं के जेल में रहते हुए भी जनता का मनोबल बना रहे और उसे दिशा मिलती रहे।

◆ उषा मेहता और कांग्रेस रेडियो — बम्बई की युवा छात्रा उषा मेहता और उनके कुछ साथियों ने अगस्त 1942 में एक गुप्त रेडियो शुरू किया, जिसे "कांग्रेस रेडियो" कहा गया। पुलिस से बचने के लिए इसका स्थान बार-बार बदला जाता था। इस पर आंदोलन की वे ख़बरें दी जाती थीं जो सरकार अख़बारों में छपने नहीं देती थी। नवंबर 1942 में पुलिस ने इसे पकड़ लिया। राम मनोहर लोहिया इस रेडियो पर नियमित रूप से बोलते थे।

◆ जयप्रकाश नारायण — समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण उस समय हज़ारीबाग़ केंद्रीय जेल में बंद थे। 9 नवंबर 1942 को दीवाली की रात वे योगेंद्र शुक्ल, सूरज नारायण सिंह आदि साथियों के साथ जेल की दीवार फाँदकर भाग निकले। उन्होंने नेपाल की सीमा के पास "आज़ाद दस्ता" नाम से छापामार दल तैयार किया। बाद में वे फिर पकड़े गए।

◆ अरुणा आसफ़ अली — वे भूमिगत रहकर देश भर में संगठन का काम करती रहीं। सरकार ने उनकी गिरफ़्तारी पर इनाम घोषित किया और उनकी संपत्ति ज़ब्त कर ली, फिर भी वे 1946 तक पकड़ी नहीं गईं।

◆ अन्य नेता — अच्युत पटवर्धन, सुचेता कृपलानी, राम मनोहर लोहिया, बीजू पटनायक आदि ने गुप्त तंत्र चलाया। उद्योगपतियों और आम लोगों ने इन्हें धन, ठिकाने और वाहन देकर मदद की — जैसे सुमति मोरारजी ने अच्युत पटवर्धन को पुलिस से बचाने के लिए गाड़ियों का प्रबंध किया।

🏛️ 10.6 समानांतर सरकारें

🔍 आसान परिभाषा: समानांतर सरकार

📘 परिभाषा: जब किसी क्षेत्र में जनता स्थापित (यहाँ अंग्रेज़ी) सरकार की सत्ता को हटाकर या उसकी अनदेखी करके अपना अलग प्रशासन चलाने लगती है — अपनी अदालतें, अपना कर-संग्रह, अपनी पुलिस और राहत-व्यवस्था — तो उसे समानांतर सरकार कहते हैं।

💡 आसान भाषा में: एक ही इलाक़े में दो सरकारें — एक काग़ज़ पर अंग्रेज़ों की, और दूसरी असल में जनता की, जिसकी बात लोग मानते हैं। जैसे विद्यालय में प्रधानाध्यापक के होते हुए भी सारे विद्यार्थी अपने चुने हुए नेता की ही बात मानने लगें। 🏠 उदाहरण: सतारा की "प्रति सरकार" गाँवों में अपनी जन-अदालतें चलाती थी, जहाँ लोगों के झगड़े निपटाए जाते थे; लोग अंग्रेज़ी कचहरी जाना ही छोड़ चुके थे।

◆ बलिया (पूर्वी संयुक्त प्रांत) — अगस्त 1942 — यह पहली समानांतर सरकार थी। चित्तू पांडे के नेतृत्व में जनता ने ज़िले के थानों और तहसीलों पर क़ब्ज़ा कर लिया, कलेक्टर को अधिकार सौंपने पर मजबूर किया और जेल से कांग्रेस नेताओं को छुड़ा लिया। चित्तू पांडे को "बलिया का शेर" कहा गया। यह सरकार लगभग एक सप्ताह ही चल सकी, क्योंकि जल्द ही सेना ने ज़िले पर फिर क़ब्ज़ा कर लिया।

◆ तामलुक (मिदनापुर, बंगाल) — 17 दिसंबर 1942 से सितंबर 1944 — यहाँ "जातीय सरकार" (अर्थात राष्ट्रीय सरकार) बनी, जिसके प्रमुख नेता सतीश सामंत थे। इसने "विद्युत वाहिनी" नाम का स्वयंसेवक दल बनाया, पंचायती अदालतें चलाईं, विद्यालयों को अनुदान दिया और उसी समय आए भयंकर चक्रवात के पीड़ितों को राहत पहुँचाई — धनी लोगों से अनाज लेकर ग़रीबों में बाँटा। गांधीजी के कहने पर 1944 में इसे भंग किया गया।

◆ सतारा (महाराष्ट्र) — 1943 से 1945–46 तक — यहाँ की "प्रति सरकार" (अर्थात समानांतर सरकार) सबसे लंबे समय तक चली। इसके प्रमुख नेता नाना पाटिल थे; वाई. बी. चव्हाण भी इससे जुड़े थे। इसने गाँवों में "न्यायदान मंडल" (जन-अदालतें) चलाए, नशाबंदी लागू की, गाँव-पुस्तकालय बनाए और साहूकारों तथा सरकारी मुख़बिरों को दंड दिया।

◆ तालचेर (उड़ीसा) — इस रियासत में भी किसानों और प्रजामंडल के कार्यकर्ताओं ने कुछ समय के लिए अपनी जन-सरकार बनाई, जिसे हवाई हमलों से कुचला गया।

🕯️ 10.7 जनता की भागीदारी और बलिदान

◆ कौन-कौन शामिल हुआ — विद्यार्थी और युवा इस आंदोलन की रीढ़ थे। महिलाओं ने जुलूसों का नेतृत्व किया और भूमिगत तंत्र चलाया। किसानों (विशेषकर मझोले किसानों) ने गाँवों में सरकारी सत्ता को चुनौती दी। मज़दूरों ने लंबी हड़तालें कीं। निचले स्तर के कई सरकारी कर्मचारियों और पुलिसवालों ने आंदोलनकारियों की चुपचाप मदद की — यह अंग्रेज़ों के लिए सबसे चिंता की बात थी।

◆ मातंगिनी हाज़रा — तामलुक (बंगाल) की 73 वर्ष की यह वृद्धा 29 सितंबर 1942 को थाने की ओर बढ़ते जुलूस के आगे तिरंगा लेकर चल रही थीं। गोलियाँ लगने पर भी उन्होंने झंडा नहीं छोड़ा। लोग उन्हें "बूढ़ी गांधी" कहते थे।

◆ कनकलता बरुआ — असम के गोहपुर में 17 वर्ष की यह किशोरी 20 सितंबर 1942 को थाने पर तिरंगा फहराने जा रहे दल ("मृत्यु वाहिनी") का नेतृत्व करते हुए पुलिस की गोली से शहीद हुई।

◆ पटना सचिवालय के सात छात्र — 11 अगस्त 1942 को पटना में सचिवालय भवन पर तिरंगा फहराने की कोशिश में सात विद्यार्थी पुलिस की गोली से शहीद हुए। आज वहाँ शहीद स्मारक है।

◆ हेमू कालाणी — सिंध के सक्खर का यह किशोर सैनिकों और हथियारों से भरी रेलगाड़ी को गिराने के लिए पटरी उखाड़ते हुए पकड़ा गया और 21 जनवरी 1943 को उसे फाँसी दे दी गई।

◆ लक्ष्मण नायक — उड़ीसा के कोरापुट के इस आदिवासी नेता ने अपने क्षेत्र में आंदोलन का नेतृत्व किया। उन्हें "मलकानगिरि का गांधी" कहा जाता है। 29 मार्च 1943 को उन्हें फाँसी दी गई।

◆ चिमूर और आष्टी — विदर्भ (महाराष्ट्र) के इन गाँवों में अगस्त 1942 में जनता ने कुछ दिनों के लिए शासन अपने हाथ में ले लिया, जिसके बाद वहाँ भयंकर दमन हुआ।

⚔️ 10.8 सरकारी दमन, गांधीजी का अनशन और रिहाई

◆ दमन — सरकार ने आंदोलन को युद्ध के बीच "पीठ में छुरा" मानकर पूरी ताक़त से कुचला। भीड़ पर गोलियाँ चलाई गईं; कुछ स्थानों पर हवाई जहाज़ों से मशीनगन चलाई गई; गाँवों पर सामूहिक जुर्माने लगाए गए; घर जलाए गए और सार्वजनिक रूप से कोड़े मारे गए। 1942 के अंत तक 60,000 से अधिक लोग गिरफ़्तार हो चुके थे। सरकारी आँकड़ों में लगभग एक हज़ार मौतें दर्ज हैं, पर वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक मानी जाती है।

◆ वायसराय की स्वीकारोक्ति — लिनलिथगो ने प्रधानमंत्री चर्चिल को तार में लिखा कि यह "1857 के बाद का सबसे गंभीर विद्रोह" है, जिसकी गंभीरता और फैलाव को सैनिक सुरक्षा के कारणों से दुनिया से छिपाया जा रहा है।

◆ गांधीजी का 21 दिन का अनशन (10 फ़रवरी – 3 मार्च 1943) — सरकार बार-बार गांधीजी से कह रही थी कि वे जनता की हिंसा की निंदा करें। गांधीजी ने उत्तर दिया कि हिंसा की ज़िम्मेदार सरकार है, जिसने नेताओं को एक साथ गिरफ़्तार करके और निर्मम दमन करके जनता को भड़काया। अपनी बात के समर्थन में उन्होंने आग़ा ख़ाँ महल में 21 दिन का अनशन किया। सरकार झुकी नहीं, पर देश भर में सहानुभूति की लहर उठी और विरोध में वायसराय की कार्यकारी परिषद के तीन भारतीय सदस्यों — एम. एस. अणे, एन. आर. सरकार और एच. पी. मोदी — ने त्यागपत्र दे दिया।

◆ कस्तूरबा का निधन और गांधीजी की रिहाई — 22 फ़रवरी 1944 को आग़ा ख़ाँ महल में ही कस्तूरबा गांधी का निधन हो गया। गांधीजी का स्वास्थ्य भी बहुत बिगड़ गया, इसलिए 6 मई 1944 को उन्हें स्वास्थ्य के आधार पर रिहा कर दिया गया। बाक़ी नेता जून 1945 तक जेल में रहे। इस बीच अक्टूबर 1943 में लिनलिथगो की जगह लॉर्ड वेवेल वायसराय बन चुके थे।

◆ बंगाल का अकाल (1943) — इसी दौर में बंगाल में भयंकर अकाल पड़ा। बर्मा से चावल आना बंद हो गया था, सेना के लिए अनाज ख़रीदा जा रहा था, व्यापारी जमाख़ोरी कर रहे थे और सरकार ने समय पर कुछ नहीं किया। लगभग 30 लाख लोग भूख और बीमारी से मर गए। इस त्रासदी ने ब्रिटिश शासन की नैतिक साख पर गहरा आघात किया।

🚷 10.9 विभिन्न दलों और वर्गों का रुख़

◆ मुस्लिम लीग — जिन्ना ने मुसलमानों से आंदोलन से दूर रहने को कहा और इसे अंग्रेज़ों के साथ-साथ मुसलमानों पर भी दबाव डालने की कोशिश बताया। कांग्रेस नेताओं के जेल में रहने का लाभ उठाकर लीग ने अपना संगठन फैलाया और सिंध, बंगाल, असम तथा सीमा प्रांत में सरकारें बनाईं। उसने 23 मार्च 1943 को "पाकिस्तान दिवस" मनाया। उसका नारा था — "बाँटो और छोड़ो"।

◆ भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी — जून 1941 में जर्मनी ने सोवियत संघ पर हमला कर दिया। इसके बाद कम्युनिस्टों ने इस युद्ध को "जनयुद्ध" कहना शुरू किया और फ़ासीवाद को हराने के लिए ब्रिटिश सरकार के युद्ध-प्रयास का समर्थन किया। इसलिए उन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन का साथ नहीं दिया। 1942 में सरकार ने पार्टी पर से प्रतिबंध हटा लिया।

◆ हिंदू महासभा — उसने आंदोलन का विरोध किया। उसके नेता वी. डी. सावरकर ने हिंदुओं से अपने पदों पर बने रहने और सेना में भर्ती होने को कहा।

◆ अन्य — पंजाब की यूनियनिस्ट पार्टी, उदारवादी नेता, डॉ. आंबेडकर (जो उस समय वायसराय की परिषद के सदस्य थे) और अधिकांश राजा तथा बड़े ज़मींदार आंदोलन से अलग रहे। फिर भी इन वर्गों में से बहुत-से लोगों ने निजी रूप से आंदोलनकारियों की सहायता की।

◆ महत्त्वपूर्ण बात — आंदोलन के दौरान सांप्रदायिक दंगे नहीं हुए। मुसलमान बड़ी संख्या में शामिल नहीं हुए, पर उन्होंने विरोध भी नहीं किया और कई जगह भूमिगत कार्यकर्ताओं को शरण दी।

🌟 10.10 महत्त्व और सीमाएँ

◆ स्वतंत्रता अब "तत्काल" की माँग बन गई — 1942 के बाद ब्रिटेन से होने वाली हर बातचीत इस पर नहीं थी कि सत्ता दी जाए या नहीं, बल्कि केवल इस पर थी कि सत्ता कैसे और किसे सौंपी जाए।

◆ जनता की परिपक्वता — बड़े नेताओं के बिना भी आंदोलन महीनों चला। इससे सिद्ध हुआ कि राष्ट्रीय चेतना अब कुछ नेताओं तक सीमित नहीं थी, वह गाँव-गाँव तक पहुँच चुकी थी।

◆ अंग्रेज़ों के लिए संदेश — उन्हें समझ आ गया कि युद्ध के बाद भारत पर बलपूर्वक शासन करने के लिए बहुत बड़ी सेना और धन चाहिए होगा, जो उनके पास नहीं होगा। निचले कर्मचारियों की डगमगाती निष्ठा ने भी यही दिखाया।

◆ सीमाएँ — आंदोलन की कोई पूर्व-योजना और केंद्रीय नेतृत्व नहीं था, इसलिए वह बिखरा हुआ रहा और सेना के सामने खुला विद्रोह दो-तीन महीने में दब गया। अहिंसा की मर्यादा कई जगह टूटी। मुस्लिम लीग, कम्युनिस्टों आदि के अलग रहने से पूरी राष्ट्रीय एकता नहीं बन सकी, और कांग्रेस के तीन वर्ष जेल में रहने से लीग को अपना आधार फैलाने का खुला मैदान मिल गया।

📌 याद रखें — क्या यह आंदोलन अहिंसक था?

गांधीजी ने हिंसा की निंदा करने से इनकार किया और उसे सरकार की "शेर जैसी हिंसा" की प्रतिक्रिया बताया। उनके अनुसार जनता की तोड़फोड़ बड़ी सरकारी हिंसा के सामने आत्मरक्षा जैसी थी।

आंदोलन में जनता ने संपत्ति (रेल, तार, थाने) पर हमले किए, पर व्यक्तियों की हत्या बहुत कम हुई — इसीलिए कई इतिहासकार इसे पूरी तरह हिंसक भी नहीं मानते।

11. नेताजी सुभाष चंद्र बोस और आज़ाद हिंद फ़ौज

जिस समय देश के भीतर "भारत छोड़ो" चल रहा था, उसी समय देश के बाहर स्वतंत्रता की एक दूसरी लड़ाई लड़ी जा रही थी — हथियारों से। इसके नायक सुभाष चंद्र बोस थे, जिनका विश्वास था कि अंग्रेज़ केवल अहिंसक आंदोलन से नहीं जाएँगे; इसके लिए बाहर से सैनिक दबाव भी चाहिए, और युद्ध में फँसे ब्रिटेन के शत्रुओं से सहायता लेना ग़लत नहीं है। नीचे का आरेख इस पूरी कहानी का सार है; उसके बाद हर कड़ी का विस्तार दिया गया है।

चित्र 13.3: नेताजी और आज़ाद हिंद फ़ौज का घटनाक्रम (1941–1946)
चित्र 13.3: नेताजी और आज़ाद हिंद फ़ौज का घटनाक्रम (1941–1946)

👤 11.1 सुभाष चंद्र बोस — परिचय

◆ जन्म और शिक्षा — सुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 को उड़ीसा के कटक में हुआ। उनके पिता जानकीनाथ बोस प्रसिद्ध वकील थे। उनकी जयंती अब "पराक्रम दिवस" के रूप में मनाई जाती है। वे स्वामी विवेकानंद के विचारों से बहुत प्रभावित थे।

◆ सिविल सेवा से त्यागपत्र — उन्होंने 1920 में इंग्लैंड में भारतीय सिविल सेवा की परीक्षा चौथे स्थान से उत्तीर्ण की। पर विदेशी सरकार की नौकरी उन्हें स्वीकार नहीं थी, इसलिए 1921 में उन्होंने त्यागपत्र दे दिया और भारत लौटकर असहयोग आंदोलन में कूद पड़े।

◆ राजनीतिक गुरु और प्रारंभिक कार्य — उनके राजनीतिक गुरु देशबंधु चित्तरंजन दास थे। उनके साथ वे स्वराज पार्टी के अख़बार "फ़ॉरवर्ड" से जुड़े। 1924 में वे कलकत्ता नगर निगम के मुख्य कार्यकारी अधिकारी बने और 1930 में कलकत्ता के मेयर। अंग्रेज़ सरकार ने उन्हें कई बार जेल भेजा और बर्मा की मांडले जेल में भी रखा।

◆ युवा वामपंथी नेता — जवाहरलाल नेहरू के साथ उन्होंने 1928 में "इंडिपेंडेंस फ़ॉर इंडिया लीग" बनाई, जो डोमिनियन स्टेटस की जगह पूर्ण स्वतंत्रता की माँग करती थी। वे 1938 (हरिपुरा) और 1939 (त्रिपुरी) में कांग्रेस अध्यक्ष चुने गए और 3 मई 1939 को उन्होंने फ़ॉरवर्ड ब्लॉक बनाया (खंड 7)।

◆ उपाधियाँ और पुस्तक — रवींद्रनाथ टैगोर ने उन्हें "देशनायक" कहा। गांधीजी ने उन्हें "देशभक्तों का देशभक्त" कहा। जर्मनी में भारतीय सैनिकों ने उन्हें "नेताजी" कहना शुरू किया। उनकी प्रसिद्ध पुस्तक "द इंडियन स्ट्रगल" (भारत का संघर्ष) है, जिसमें 1920 के बाद के राष्ट्रीय आंदोलन का विश्लेषण है।

✈️ 11.2 "महान पलायन" (जनवरी 1941) और जर्मनी में दो वर्ष

📖 कहानी 2: नज़रबंद नेता का "महान पलायन"

जुलाई 1940 में सुभाष चंद्र बोस ने कलकत्ता के हॉलवेल स्मारक को हटाने का आंदोलन छेड़ा। यह स्मारक "काल कोठरी" की विवादित घटना की याद में बना था और भारतीयों को अपमानजनक लगता था। सरकार ने उन्हें गिरफ़्तार कर लिया। जेल में अनशन करने पर उन्हें छोड़ा गया, पर कलकत्ता के एल्गिन रोड वाले घर में कड़ी निगरानी में नज़रबंद रखा गया।

16–17 जनवरी 1941 की रात वे "मौलवी ज़ियाउद्दीन" नाम के पठान बीमा-एजेंट का वेश बनाकर घर से निकल गए। उनके भतीजे शिशिर बोस उन्हें गाड़ी से गोमो स्टेशन तक ले गए। वहाँ से रेल द्वारा वे पेशावर पहुँचे, जहाँ भगत राम तलवार ने उन्हें सीमा पार कराकर काबुल पहुँचाया। काबुल से मॉस्को होते हुए वे अप्रैल 1941 में बर्लिन पहुँचे। अंग्रेज़ सरकार को कई दिन बाद पता चला कि वे घर में नहीं हैं।

बर्लिन में उन्होंने फ़्री इंडिया सेंटर बनाया और आज़ाद हिंद रेडियो से भारतीयों के नाम प्रसारण शुरू किए। उत्तरी अफ़्रीका में पकड़े गए भारतीय युद्धबंदियों को लेकर उन्होंने इंडियन लीजन बनाया। यहीं उन्हें "नेताजी" कहा जाने लगा और साथी आबिद हसन के सुझाव पर "जय हिंद" का अभिवादन अपनाया गया। पर मई 1942 में हिटलर से भेंट के बाद भी जर्मनी ने भारत की स्वतंत्रता के समर्थन की कोई स्पष्ट घोषणा नहीं की।

जर्मनी भारत से बहुत दूर था, जबकि जापान भारत की सीमा तक आ चुका था और दक्षिण-पूर्व एशिया में लाखों भारतीय रहते थे। इसलिए फ़रवरी 1943 में नेताजी एक जर्मन पनडुब्बी में बैठे, मेडागास्कर के पास समुद्र के बीच जापानी पनडुब्बी में सवार हुए और मई 1943 में टोक्यो पहुँचे।

🧭 इस कहानी से कौन-सी अवधारणा साफ़ हुई

✔ संघर्ष का नया मोर्चा — गांधीजी जहाँ भीतर रहकर जन-आंदोलन चला रहे थे, वहीं नेताजी ने विश्वयुद्ध की परिस्थितियों का उपयोग करके बाहर से सैन्य दबाव बनाने का रास्ता चुना।

✔ विदेश से स्वतंत्रता का प्रयास — फ़्री इंडिया सेंटर, आज़ाद हिंद रेडियो और इंडियन लीजन ने आगे आज़ाद हिंद फ़ौज की ज़मीन तैयार की।

✔ स्थान का चुनाव — जर्मनी की उदासीनता और जापान की निकटता देखकर नेताजी ने एशिया को अपना कार्यक्षेत्र बनाया, जहाँ आगे आज़ाद हिंद फ़ौज का गठन हुआ।

📝 परीक्षा के लिए: महान पलायन: 16–17 जनवरी 1941, मौलवी ज़ियाउद्दीन के वेश में; शिशिर बोस, गोमो, पेशावर, भगत राम तलवार, काबुल, मॉस्को, बर्लिन (अप्रैल 1941); फ़्री इंडिया सेंटर, इंडियन लीजन; हिटलर से भेंट मई 1942; पनडुब्बी से टोक्यो पहुँचे मई 1943।

◆ पृष्ठभूमि — जुलाई 1940 में सुभाष ने कलकत्ता के हॉलवेल स्मारक को हटाने का आंदोलन छेड़ा (यह स्मारक "काल कोठरी" की विवादित घटना की याद में बना था और भारतीयों को अपमानजनक लगता था)। सरकार ने उन्हें गिरफ़्तार कर लिया। जेल में अनशन करने पर उन्हें छोड़ा गया, पर कलकत्ता के एल्गिन रोड वाले घर में कड़ी निगरानी में नज़रबंद रखा गया।

◆ पलायन — 16–17 जनवरी 1941 की रात वे "मौलवी ज़ियाउद्दीन" नाम के पठान बीमा-एजेंट का वेश बनाकर घर से निकल गए। उनके भतीजे शिशिर बोस उन्हें गाड़ी से गोमो स्टेशन (आज झारखंड में) तक ले गए। वहाँ से वे रेल द्वारा पेशावर पहुँचे, जहाँ भगत राम तलवार ने उन्हें सीमा पार कराकर काबुल पहुँचाया। काबुल से मॉस्को होते हुए वे अप्रैल 1941 में बर्लिन पहुँच गए। अंग्रेज़ सरकार को कई दिन बाद पता चला कि वे घर में नहीं हैं।

◆ जर्मनी में कार्य (1941–1942) — बर्लिन में उन्होंने "फ़्री इंडिया सेंटर" स्थापित किया और आज़ाद हिंद रेडियो से भारतीयों के नाम प्रसारण शुरू किए। उत्तरी अफ़्रीका में जर्मनी द्वारा पकड़े गए भारतीय युद्धबंदी सैनिकों को लेकर उन्होंने "इंडियन लीजन" नाम की टुकड़ी बनाई। यहीं उन्हें "नेताजी" कहा गया और "जय हिंद" का अभिवादन अपनाया गया, जिसका सुझाव उनके साथी आबिद हसन ने दिया था।

◆ जर्मनी से निराशा — मई 1942 में उनकी हिटलर से भेंट हुई, पर जर्मनी ने भारत की स्वतंत्रता के समर्थन की कोई स्पष्ट घोषणा नहीं की। जर्मनी भारत से बहुत दूर भी था। दूसरी ओर जापान भारत की सीमा तक आ चुका था और दक्षिण-पूर्व एशिया में लाखों भारतीय रहते थे। इसलिए नेताजी ने एशिया जाने का निर्णय किया।

◆ पनडुब्बी से यात्रा — फ़रवरी 1943 में वे एक जर्मन पनडुब्बी में बैठकर निकले। मेडागास्कर के पास समुद्र के बीच वे जापानी पनडुब्बी में सवार हुए और मई 1943 में टोक्यो पहुँचे। युद्ध के बीच लगभग तीन महीने की यह समुद्री यात्रा अपने आप में एक बड़ा साहसिक कार्य थी।

⚔️ 11.3 आज़ाद हिंद फ़ौज का पहला गठन — मोहन सिंह (1942)

यह बात ध्यान से समझें: आज़ाद हिंद फ़ौज का पहला गठन सुभाष चंद्र बोस ने नहीं, कैप्टन मोहन सिंह ने किया था। नेताजी ने 1943 में इसका पुनर्गठन करके इसमें नई जान डाली।

◆ पृष्ठभूमि — दिसंबर 1941 में जब जापान ने मलाया पर हमला किया, तो वहाँ ब्रिटिश भारतीय सेना की कई टुकड़ियाँ तैनात थीं। अंग्रेज़ अफ़सर पीछे हटे और हज़ारों भारतीय सैनिक जापान के हाथों युद्धबंदी बन गए। जापान चाहता था कि इन सैनिकों का उपयोग अंग्रेज़ों के विरुद्ध हो।

◆ मोहन सिंह — पंजाब रेजिमेंट के कैप्टन मोहन सिंह मलाया में पकड़े गए। जापानी अधिकारी मेजर फ़ूजीवारा और थाईलैंड में सक्रिय भारतीय क्रांतिकारी ज्ञानी प्रीतम सिंह ने उन्हें युद्धबंदियों से भारत की आज़ादी के लिए एक सेना बनाने को प्रेरित किया। 15 फ़रवरी 1942 को सिंगापुर के पतन के बाद लगभग 40,000 भारतीय युद्धबंदी उन्हें सौंपे गए।

◆ रासबिहारी बोस और इंडियन इंडिपेंडेंस लीग — पुराने क्रांतिकारी रासबिहारी बोस 1915 से जापान में रह रहे थे (उन्होंने 1912 में वायसराय हार्डिंग पर बम फेंकने की योजना बनाई थी)। उनकी अध्यक्षता में टोक्यो (मार्च 1942) और बैंकॉक (जून 1942) में प्रवासी भारतीयों के सम्मेलन हुए। इनमें इंडियन इंडिपेंडेंस लीग (भारतीय स्वतंत्रता संघ) बनी, फ़ौज को इसी लीग के अधीन रखा गया और सुभाष चंद्र बोस को पूर्वी एशिया आकर नेतृत्व सँभालने का निमंत्रण भेजा गया।

◆ औपचारिक गठन और संकट — 1 सितंबर 1942 को आज़ाद हिंद फ़ौज की पहली डिवीज़न (लगभग 16,000 सैनिक) का औपचारिक गठन हुआ और मोहन सिंह उसके सेनापति बने। पर जल्दी ही मोहन सिंह और जापानियों में मतभेद हो गया — जापानी फ़ौज को छोटा और अपने अधीन रखना चाहते थे, जबकि मोहन सिंह बराबरी का दर्जा और स्पष्ट आश्वासन चाहते थे। दिसंबर 1942 में जापानियों ने मोहन सिंह को हटाकर नज़रबंद कर दिया और फ़ौज लगभग बिखर गई।

🚩 11.4 नेताजी का आगमन और फ़ौज का पुनर्गठन (जुलाई 1943)

◆ नेतृत्व सँभाला — नेताजी 2 जुलाई 1943 को सिंगापुर पहुँचे। 4 जुलाई को रासबिहारी बोस ने एक बड़े समारोह में इंडियन इंडिपेंडेंस लीग और फ़ौज का नेतृत्व उन्हें सौंप दिया। 5 जुलाई को नेताजी ने फ़ौज की सलामी ली और उसे "दिल्ली चलो" का युद्धघोष दिया। अगस्त 1943 में वे फ़ौज के सर्वोच्च सेनापति बने।

◆ पुनर्गठन — नेताजी ने युद्धबंदियों के साथ-साथ मलाया, सिंगापुर, बर्मा और थाईलैंड में बसे आम भारतीयों (व्यापारी, मज़दूर, बाग़ान-श्रमिक) को भी फ़ौज में भर्ती किया और उनसे धन जुटाया। फ़ौज की ब्रिगेडों के नाम राष्ट्रीय नेताओं पर रखे गए — गांधी ब्रिगेड, नेहरू ब्रिगेड, आज़ाद ब्रिगेड और सुभाष ब्रिगेड (जिसके सेनानायक शाहनवाज़ ख़ाँ थे)। यह दिखाता है कि मतभेदों के बावजूद नेताजी के मन में गांधीजी और नेहरू के लिए कितना आदर था।

◆ रानी झाँसी रेजिमेंट — नेताजी ने महिलाओं की एक अलग लड़ाकू टुकड़ी बनाई, जिसका नाम रानी झाँसी रेजिमेंट रखा गया। इसकी कमान कैप्टन लक्ष्मी स्वामीनाथन (बाद में लक्ष्मी सहगल) के हाथ में थी। उस ज़माने में महिलाओं की लड़ाकू सैनिक टुकड़ी एक क्रांतिकारी विचार था।

◆ एकता — फ़ौज में हिंदू, मुसलमान, सिख और ईसाई सैनिक एक साथ रहते और एक ही रसोई का खाना खाते थे। फ़ौज की आम बोलचाल की भाषा हिंदुस्तानी थी। उसका आदर्श वाक्य था — "इत्तेफ़ाक़, एतमाद, क़ुर्बानी" (एकता, विश्वास, बलिदान)।

🏛️ 11.5 आज़ाद हिंद की अस्थायी सरकार (21 अक्टूबर 1943)

🔍 आसान परिभाषा: अस्थायी सरकार (निर्वासित सरकार)

📘 परिभाषा: ऐसी सरकार जो किसी देश के स्वतंत्र होने या स्थायी व्यवस्था बनने से पहले, कुछ समय के लिए, उस देश की ओर से काम करने का दावा करती है। जब वह देश की धरती के बाहर से काम करे, तो उसे निर्वासित सरकार कहते हैं।

💡 आसान भाषा में: घर पर किसी और का क़ब्ज़ा है, पर घर के असली मालिकों ने बाहर बैठकर अपनी समिति बना ली है, जो कहती है — "इस घर के फ़ैसले करने का हक़ हमारा है।" जब दूसरे देश इस समिति को मान्यता दे देते हैं, तो उसकी बात का वज़न बढ़ जाता है। 🏠 उदाहरण: नेताजी ने 21 अक्टूबर 1943 को सिंगापुर में "आज़ाद हिंद की अस्थायी सरकार" बनाई। इससे पहले 1915 में राजा महेंद्र प्रताप ने काबुल में भारत की पहली अस्थायी सरकार बनाई थी।

◆ गठन — 21 अक्टूबर 1943 को सिंगापुर में नेताजी ने "आरज़ी हुकूमत-ए-आज़ाद हिंद" (स्वतंत्र भारत की अस्थायी सरकार) की घोषणा की। नेताजी स्वयं इसके राष्ट्राध्यक्ष, प्रधानमंत्री, युद्ध मंत्री और विदेश मंत्री बने। मंत्रिमंडल में एच. सी. चटर्जी को वित्त, एस. ए. अय्यर को प्रचार और लक्ष्मी स्वामीनाथन को महिला विभाग मिला; रासबिहारी बोस सर्वोच्च सलाहकार बने।

◆ मान्यता और युद्ध-घोषणा — इस सरकार को जापान, जर्मनी और इटली सहित धुरी पक्ष के नौ देशों ने मान्यता दी। इसने अपनी मुद्रा, डाक टिकट और अदालत की व्यवस्था की और ब्रिटेन तथा अमेरिका के विरुद्ध युद्ध की घोषणा की। इसका महत्त्व यह था कि अब आज़ाद हिंद फ़ौज जापान की सहायक टुकड़ी नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र सरकार की सेना थी।

◆ अंडमान-निकोबार — जापान ने अपने क़ब्ज़े वाले अंडमान और निकोबार द्वीप समूह नाम मात्र के लिए इस सरकार को सौंप दिए। 30 दिसंबर 1943 को नेताजी ने पोर्ट ब्लेयर में तिरंगा फहराया और अंडमान का नाम "शहीद द्वीप" तथा निकोबार का नाम "स्वराज द्वीप" रखा। यह भारत की वह पहली भूमि थी जिस पर अस्थायी सरकार का झंडा फहरा।

◆ झंडा और गीत — सरकार का झंडा तिरंगा था, जिसके बीच में छलाँग लगाता बाघ बना था। फ़ौज का प्रयाण-गीत "क़दम क़दम बढ़ाए जा" था और राष्ट्रगान "शुभ सुख चैन", जो "जन गण मन" का हिंदुस्तानी रूप था।

🗺️ 11.6 इंफाल-कोहिमा अभियान (1944)

◆ पृष्ठभूमि — जनवरी 1944 में नेताजी ने अपना मुख्यालय सिंगापुर से रंगून (बर्मा) ले जाया, ताकि वह भारत की सीमा के पास रहे। योजना यह थी कि जापानी सेना के साथ आज़ाद हिंद फ़ौज बर्मा से पूर्वोत्तर भारत में घुसे; नेताजी को विश्वास था कि फ़ौज के भारत की धरती पर पैर रखते ही देश के भीतर जनता और भारतीय सैनिक विद्रोह कर देंगे।

◆ घटनाक्रम — फ़रवरी 1944 में फ़ौज की टुकड़ियाँ अराकान के मोर्चे पर लड़ीं। मार्च 1944 में जापानी सेना के साथ फ़ौज ने भारत की सीमा पार की और इंफाल (मणिपुर) तथा कोहिमा (नागा पहाड़ियाँ) को घेर लिया। 14 अप्रैल 1944 को कर्नल शौकत मलिक ने मणिपुर के मोइरांग में तिरंगा फहराया — यह भारत की मुख्य भूमि पर फ़ौज द्वारा झंडा फहराने की पहली घटना थी।

◆ "तुम मुझे ख़ून दो…" — इसी दौर में 4 जुलाई 1944 को रंगून में भारतीयों की एक सभा में नेताजी ने वह प्रसिद्ध वाक्य कहा — "तुम मुझे ख़ून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा।" दो दिन बाद 6 जुलाई 1944 को रेडियो से गांधीजी को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा — "राष्ट्रपिता! भारत की स्वतंत्रता के इस पवित्र युद्ध में हम आपका आशीर्वाद चाहते हैं।" गांधीजी के लिए "राष्ट्रपिता" शब्द का यह पहला प्रयोग माना जाता है।

◆ असफलता के कारण — इंफाल और कोहिमा पर क़ब्ज़ा नहीं हो सका। इसके कई कारण थे — समय से पहले आई भारी वर्षा, जिसने रास्ते बहा दिए; रसद, दवाओं और हवाई सहायता की भारी कमी (जापानी वायुसेना प्रशांत महासागर के मोर्चे पर लगी थी); मलेरिया और भुखमरी; जापानी अफ़सरों का फ़ौज के साथ भेदभाव; और मित्र सेनाओं का मज़बूत जवाबी हमला। जुलाई 1944 में पीछे हटने का आदेश हुआ और वापसी में हज़ारों सैनिक भूख और बीमारी से मरे।

◆ अंत — 1945 में अंग्रेज़ी सेना ने बर्मा फिर जीत लिया और मई 1945 में रंगून में फ़ौज के सैनिकों ने हथियार डाल दिए। हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिरने के बाद 15 अगस्त 1945 को जापान ने आत्मसमर्पण कर दिया। 18 अगस्त 1945 को ताइहोकू (ताइवान) में एक विमान दुर्घटना में नेताजी के निधन की सूचना आई। इस पर आज तक विवाद है; भारत सरकार ने इसकी जाँच के लिए शाहनवाज़ समिति (1956), खोसला आयोग (1970) और मुखर्जी आयोग (1999) बनाए।

🧭 11.7 आज़ाद हिंद फ़ौज का मूल्यांकन

◆ सैनिक दृष्टि से असफल, राजनीतिक दृष्टि से निर्णायक — फ़ौज भारत को हथियारों से मुक्त नहीं करा सकी। पर उसका असली प्रभाव युद्ध के बाद दिखा, जब उसके सैनिकों पर मुक़दमे चले (खंड 12)। उसने ब्रिटिश भारतीय सेना की राजभक्ति को हिला दिया — और यही सेना भारत में अंग्रेज़ी राज का अंतिम सहारा थी।

◆ आदर्श — फ़ौज ने सांप्रदायिक एकता, महिलाओं की बराबर भागीदारी और धर्म से ऊपर उठे राष्ट्रवाद का जीवित उदाहरण रखा — ठीक उस समय, जब देश के भीतर सांप्रदायिक राजनीति तेज़ हो रही थी।

◆ आलोचना — उस समय नेहरू सहित कई नेताओं को फ़ासीवादी जापान और जर्मनी से सहायता लेना ठीक नहीं लगा; उन्हें डर था कि अंग्रेज़ों की जगह जापानी आ जाएँगे। पर नेताजी का उद्देश्य केवल भारत की स्वतंत्रता था, और उन्होंने अस्थायी सरकार बनाकर फ़ौज की स्वतंत्र पहचान बनाए रखने की पूरी कोशिश की। युद्ध के बाद नेहरू स्वयं फ़ौज के सैनिकों के बचाव में वकील बनकर खड़े हुए।

📋 दोहराव तालिका: नेताजी और फ़ौज के प्रसिद्ध नारे

नारा / प्रतीक

कब और किस प्रसंग में

"दिल्ली चलो"

नेताजी ने यह युद्धघोष जुलाई 1943 में सिंगापुर में फ़ौज की सलामी लेते समय दिया।

"तुम मुझे ख़ून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा"

नेताजी ने यह बात 4 जुलाई 1944 को रंगून में भारतीयों की सभा में कही।

"जय हिंद"

यह अभिवादन जर्मनी में आबिद हसन के सुझाव पर अपनाया गया और आज पूरे देश का अभिवादन है।

"क़दम क़दम बढ़ाए जा"

यह आज़ाद हिंद फ़ौज का प्रयाण-गीत था, जिसे आज भी भारतीय सेना बजाती है।

"राष्ट्रपिता"

नेताजी ने 6 जुलाई 1944 को रंगून से रेडियो पर गांधीजी को इस नाम से संबोधित किया।

12. युद्धोत्तर उभार: लाल क़िला मुक़दमा और नौसेना विद्रोह (1945–1946)

मई 1945 में यूरोप में और अगस्त 1945 में एशिया में युद्ध समाप्त हुआ। जून 1945 में कांग्रेस के नेता जेल से रिहा हुए और शिमला सम्मेलन हुआ (अध्याय 14)। जुलाई 1945 में ब्रिटेन के चुनाव में चर्चिल हार गए और लेबर पार्टी की सरकार बनी — क्लीमेंट एटली प्रधानमंत्री और पेथिक-लॉरेंस भारत सचिव बने। युद्ध ने ब्रिटेन को आर्थिक रूप से खोखला कर दिया था। ऐसे समय में भारत में 1945–46 की सर्दियों में जनता और सैनिकों के जो उभार हुए, उन्होंने अंग्रेज़ों को यह अंतिम संदेश दे दिया कि अब जाने का समय आ गया है।

⚖️ 12.1 लाल क़िला मुक़दमा (नवंबर 1945 – जनवरी 1946)

◆ पृष्ठभूमि — युद्ध के बाद आज़ाद हिंद फ़ौज के लगभग बीस हज़ार सैनिक अंग्रेज़ों के हाथ पड़े। सरकार ने तय किया कि उनके अफ़सरों पर "सम्राट के विरुद्ध युद्ध छेड़ने" (राजद्रोह) का मुक़दमा सैनिक अदालत में चलाया जाए, ताकि सेना में अनुशासन का उदाहरण बने। जब तक युद्ध चला, कड़ी सेंसरशिप के कारण भारत की जनता को फ़ौज के बारे में बहुत कम पता था; अब उसकी वीरता की कहानियाँ घर-घर पहुँचने लगीं।

◆ कौन, कब, कहाँ — पहला और सबसे प्रसिद्ध मुक़दमा 5 नवंबर 1945 को दिल्ली के लाल क़िले में शुरू हुआ। अभियुक्त तीन अफ़सर थे — प्रेम कुमार सहगल, गुरबख़्श सिंह ढिल्लों और शाहनवाज़ ख़ाँ। सरकार की सबसे बड़ी भूल यहीं हुई — एक हिंदू, एक सिख और एक मुसलमान को एक साथ कठघरे में खड़ा करके उसने पूरे देश को एक कर दिया। और जगह भी वही चुनी, जहाँ 1858 में अंतिम मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र पर मुक़दमा चला था और जहाँ पहुँचने का नारा ("दिल्ली चलो") फ़ौज ने दिया था।

◆ बचाव पक्ष — कांग्रेस ने "आई.एन.ए. बचाव समिति" बनाई। मुख्य वकील भूलाभाई देसाई थे, जिनकी बहस बहुत प्रसिद्ध हुई; उनके साथ तेज बहादुर सप्रू, कैलाशनाथ काटजू और आसफ़ अली थे। जवाहरलाल नेहरू ने लगभग पच्चीस वर्ष बाद वकील का गाउन पहना। बचाव पक्ष का तर्क था कि ये सैनिक एक मान्यता-प्राप्त अस्थायी सरकार की सेना के सदस्य थे, इसलिए इन्हें राजद्रोही नहीं, बल्कि युद्धरत पक्ष के सैनिक माना जाए; और ग़ुलाम देश के नागरिकों को अपनी आज़ादी के लिए लड़ने का अधिकार है।

◆ जनता की प्रतिक्रिया — देश भर में सभाएँ और जुलूस हुए, 5 से 11 नवंबर तक "आई.एन.ए. सप्ताह" और 12 नवंबर 1945 को "आई.एन.ए. दिवस" मनाया गया, और बचाव-कोष में गाँव-गाँव से चंदा आया। गली-गली में नारा गूँजा — "लाल क़िले से आई आवाज़ — सहगल, ढिल्लों, शाहनवाज़"। इस प्रश्न पर कांग्रेस, मुस्लिम लीग, कम्युनिस्ट, अकाली दल, हिंदू महासभा — सभी एक साथ थे। सबसे गंभीर बात यह थी कि सहानुभूति सरकारी कर्मचारियों और सेना के जवानों तक में फैल गई; वे खुलकर चंदा देने और सभाओं में जाने लगे।

◆ कलकत्ता के उभार — 21 नवंबर 1945 को कलकत्ता में मुक़दमे के विरोध में विद्यार्थियों के जुलूस पर पुलिस ने गोली चलाई, जिसके बाद पूरा शहर सड़कों पर आ गया; कांग्रेस, लीग और कम्युनिस्ट छात्र-संगठनों के झंडे एक साथ बाँधे गए। 11 फ़रवरी 1946 को फ़ौज के एक और अफ़सर अब्दुल रशीद को सात वर्ष की सज़ा के विरोध में कलकत्ता में फिर ऐसा ही बड़ा उभार हुआ।

◆ परिणाम — सैनिक अदालत ने तीनों को दोषी मानकर आजीवन निर्वासन की सज़ा सुनाई। पर जनता और सेना के रुख़ को देखकर प्रधान सेनापति ऑकिनलेक ने 3 जनवरी 1946 को यह सज़ा माफ़ कर दी और तीनों रिहा हो गए। सरकार मुक़दमा जीतकर भी हार गई थी।

◆ महत्त्व — इस मुक़दमे ने वह कर दिखाया जो फ़ौज युद्ध के मैदान में नहीं कर पाई थी। अंग्रेज़ समझ गए कि अब भारतीय सैनिकों पर आँख मूँदकर भरोसा नहीं किया जा सकता। इसका प्रमाण अगले ही महीने नौसेना में मिल गया।

⚓ 12.2 शाही भारतीय नौसेना का विद्रोह (18–23 फ़रवरी 1946)

🔍 आसान परिभाषा: रेटिंग (नौसैनिक)

📘 परिभाषा: नौसेना में अफ़सर-श्रेणी से नीचे के साधारण नाविक-सैनिकों को "रेटिंग" कहा जाता है। ये जहाज़ों पर संकेत भेजने, तोपें चलाने, मशीनें सँभालने जैसे काम करते हैं।

💡 आसान भाषा में: जैसे थल सेना में "जवान" होते हैं, वैसे ही नौसेना में "रेटिंग" होते हैं। 1946 का विद्रोह अफ़सरों ने नहीं, इन्हीं साधारण नौसैनिकों ने किया था। 🏠 उदाहरण: 18 फ़रवरी 1946 को बम्बई में "तलवार" नामक प्रशिक्षण केंद्र के रेटिंगों ने ख़राब भोजन और अपमान के विरोध में भोजन करने और काम पर जाने से इनकार कर दिया।

◆ पृष्ठभूमि और कारण — भारतीय नौसैनिकों को अंग्रेज़ नौसैनिकों की तुलना में बहुत कम वेतन, घटिया भोजन और बुरी सुविधाएँ मिलती थीं; अंग्रेज़ अफ़सर उन्हें नस्ली गालियाँ देते थे। युद्ध में दुनिया घूमकर और आज़ाद हिंद फ़ौज के मुक़दमे देखकर इन युवाओं की राजनीतिक चेतना बढ़ चुकी थी। उन्हें यह भी अखर रहा था कि भारतीय सेना को इंडोनेशिया की आज़ादी की लड़ाई दबाने भेजा जा रहा है। तात्कालिक चिनगारी तब लगी जब "तलवार" की दीवारों पर "भारत छोड़ो" लिखने वाले रेटिंग बी. सी. दत्त को गिरफ़्तार कर लिया गया।

◆ आरंभ (18 फ़रवरी 1946) — बम्बई में संकेत-प्रशिक्षण केंद्र "तलवार" के लगभग 1100 रेटिंगों ने हड़ताल कर दी। अगले ही दिन बम्बई बंदरगाह के जहाज़ों और तटीय ठिकानों के रेटिंग भी शामिल हो गए। उन्होंने "नौसेना केंद्रीय हड़ताल समिति" बनाई, जिसके अध्यक्ष एम. एस. ख़ान और उपाध्यक्ष मदन सिंह थे।

◆ माँगें — बेहतर भोजन और अंग्रेज़ नौसैनिकों के बराबर वेतन; अपमान करने वाले अफ़सरों पर कार्रवाई; आज़ाद हिंद फ़ौज के सैनिकों और अन्य राजनीतिक बंदियों की रिहाई; और इंडोनेशिया से भारतीय सैनिकों की वापसी। यानी माँगें केवल रोटी की नहीं, राजनीतिक भी थीं।

◆ प्रसार — विद्रोह कराची, मद्रास, कलकत्ता, विशाखापत्तनम, कोचीन और अंडमान तक फैल गया। कुल मिलाकर लगभग 78 जहाज़, 20 तटीय प्रतिष्ठान और 20,000 रेटिंग इसमें शामिल हुए। विद्रोही जहाज़ों के मस्तूलों पर कांग्रेस का तिरंगा, मुस्लिम लीग का हरा झंडा और कम्युनिस्टों का लाल झंडा — तीनों एक साथ फहराए गए। कराची में "हिंदुस्तान" नामक जहाज़ और सेना के बीच गोलाबारी भी हुई।

◆ जनता का समर्थन — बम्बई की जनता ने रेटिंगों के लिए भोजन पहुँचाया। 22 फ़रवरी 1946 को कम्युनिस्टों के आह्वान पर बम्बई में आम हड़ताल हुई, जिसमें लाखों मज़दूर शामिल हुए। सड़कों पर सेना और जनता के संघर्ष में दो सौ से अधिक नागरिक मारे गए।

◆ समाप्ति (23 फ़रवरी 1946) — कांग्रेस और लीग के नेतृत्व ने इस विद्रोह का समर्थन नहीं किया। उनका मानना था कि जब स्वतंत्रता बातचीत से आने ही वाली है, तब सेना में अनुशासन टूटना स्वतंत्र भारत के लिए भी ख़तरनाक होगा, और बिना तैयारी का सशस्त्र टकराव केवल ख़ून-ख़राबा लाएगा। सरदार पटेल और जिन्ना ने रेटिंगों को आश्वासन दिया कि उनकी उचित शिकायतें सुनी जाएँगी और किसी से बदला नहीं लिया जाएगा। इस पर 23 फ़रवरी 1946 को रेटिंगों ने आत्मसमर्पण कर दिया। उनके शब्द थे — "हम भारत के सामने आत्मसमर्पण कर रहे हैं, ब्रिटेन के सामने नहीं।" कांग्रेस नेताओं में अरुणा आसफ़ अली ने खुलकर रेटिंगों का साथ दिया था।

◆ अन्य सैनिक असंतोष — यह अकेली घटना नहीं थी। जनवरी 1946 में भारत में तैनात शाही वायुसेना के कर्मचारियों ने हड़ताल की थी; फ़रवरी 1946 के अंत में जबलपुर में थल सेना की संकेत-टुकड़ी ने हड़ताल की; और कई शहरों में पुलिस की हड़तालें भी हुईं।

◆ महत्त्व — 1857 के बाद पहली बार अंग्रेज़ों की अपनी भारतीय सेना ने इतने बड़े पैमाने पर विद्रोह किया था। जिस तलवार के बल पर राज टिका था, वही अब हाथ से फिसल रही थी। यह संयोग नहीं है कि विद्रोह के दूसरे ही दिन, 19 फ़रवरी 1946 को, प्रधानमंत्री एटली ने सत्ता-हस्तांतरण पर बातचीत के लिए कैबिनेट मिशन भारत भेजने की घोषणा की।

🔑 निर्णायक मोड़

सेना, नौसेना, वायुसेना और पुलिस — चारों की निष्ठा डगमगा चुकी थी; युद्ध से थका ब्रिटेन नई अंग्रेज़ी फ़ौज भेजने की स्थिति में नहीं था। इसलिए 1946 के बाद प्रश्न यह नहीं रहा कि अंग्रेज़ जाएँगे या नहीं; प्रश्न केवल यह था कि वे कब और किसे सत्ता सौंपकर जाएँगे।

1945–46 के केंद्रीय और प्रांतीय चुनाव, कैबिनेट मिशन, सीधी कार्रवाई और विभाजन की कहानी अध्याय 14 में है; इसी दौर के किसान-मज़दूर संघर्ष (तेभागा, तेलंगाना, पुन्नप्रा-वायलार) अध्याय 15 में हैं।

13. मूल्यांकन, मानचित्र, कालक्रम और सार

⚖️ 13.1 गांधीजी के तीन बड़े जन-आंदोलनों की तुलना

चित्र 13.4: असहयोग, सविनय अवज्ञा और भारत छोड़ो — तीन जन-आंदोलनों की तुलना
चित्र 13.4: असहयोग, सविनय अवज्ञा और भारत छोड़ो — तीन जन-आंदोलनों की तुलना

ऊपर के आरेख में तीनों आंदोलनों को पाँच कसौटियों पर रखा गया है। अब इन्हें एक-एक करके समझें।

◆ कारण — असहयोग (1920–22) के पीछे रॉलेट क़ानून, जलियाँवाला बाग़ हत्याकांड, ख़िलाफ़त का प्रश्न और 1919 के सुधारों से निराशा थी। सविनय अवज्ञा (1930–34) के पीछे साइमन कमीशन का विरोध, सरकार द्वारा नेहरू रिपोर्ट की माँग न मानना और लाहौर का पूर्ण स्वराज संकल्प था। भारत छोड़ो (1942–44) के पीछे क्रिप्स मिशन की विफलता, युद्ध से उपजी महँगाई और जापानी आक्रमण का ख़तरा था।

◆ लक्ष्य — असहयोग का लक्ष्य "एक वर्ष में स्वराज" और पंजाब तथा ख़िलाफ़त के अन्याय का निवारण था; "स्वराज" का अर्थ तब स्पष्ट नहीं था। सविनय अवज्ञा का लक्ष्य स्पष्ट रूप से पूर्ण स्वराज था। भारत छोड़ो का लक्ष्य अंग्रेज़ी राज की तत्काल समाप्ति था — "करो या मरो"। यानी हर आंदोलन के साथ लक्ष्य अधिक स्पष्ट और अधिक ऊँचा होता गया।

◆ तरीक़ा — असहयोग में सरकार से सहयोग वापस लिया गया, यानी विद्यालयों, अदालतों, परिषदों और विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार किया गया। सविनय अवज्ञा उससे एक क़दम आगे थी — इसमें क़ानून तोड़े गए, जैसे नमक क़ानून, वन क़ानून, और कर तथा चौकीदारी कर देने से इनकार; बहिष्कार भी साथ चला। भारत छोड़ो में नेतृत्व जेल में था, इसलिए आंदोलन स्वतःस्फूर्त था — हड़ताल, तोड़फोड़, समानांतर सरकारें और भूमिगत गतिविधि इसके रूप थे।

◆ विशेषता — असहयोग पहला अखिल भारतीय जन-आंदोलन था और इसमें हिंदू-मुस्लिम एकता अपने चरम पर थी। सविनय अवज्ञा में महिलाओं की अभूतपूर्व भागीदारी रही और दुनिया भर का ध्यान भारत पर गया, पर पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत को छोड़कर मुसलमानों की भागीदारी कम रही। भारत छोड़ो सबसे व्यापक और उग्र था; इसमें युवा, किसान और छात्र आगे थे और वायसराय ने इसे "1857 के बाद का सबसे गंभीर विद्रोह" कहा।

◆ अंत — असहयोग को गांधीजी ने चौरी-चौरा की हिंसा के बाद फ़रवरी 1922 में स्वयं वापस ले लिया। सविनय अवज्ञा गांधी-इरविन समझौते (1931) से स्थगित हुई, फिर दूसरे चरण के बाद अप्रैल 1934 में वापस ली गई। भारत छोड़ो कठोर दमन से 1943–44 तक शांत हो गया, पर उसने स्वतंत्रता की माँग को "बातचीत से परे" पहुँचा दिया — अब केवल सत्ता सौंपने का तरीक़ा तय होना बाक़ी था।

🔁 13.2 गांधीजी की रणनीति: "संघर्ष – विराम – संघर्ष"

इतिहासकार गांधीजी की रणनीति को "संघर्ष–विराम–संघर्ष" कहते हैं। इसका आधार यह समझ थी कि आम जनता लगातार वर्षों तक जेल, लाठी और ज़ब्ती नहीं सह सकती; उसकी सहने की शक्ति की एक सीमा होती है। इसलिए हर बड़े संघर्ष के बाद एक विराम आता था। विराम के समय जनता को रचनात्मक कार्यक्रम — खादी, ग्रामोद्योग, हरिजन सेवा, बुनियादी शिक्षा, हिंदू-मुस्लिम एकता — से जोड़े रखा जाता, संगठन को फिर मज़बूत किया जाता और विधानमंडलों के भीतर काम किया जाता। फिर नई शक्ति के साथ अगला संघर्ष होता।

◆ इस अध्याय में यह क्रम — संघर्ष (सविनय अवज्ञा, 1930–34) → विराम (हरिजन अभियान, 1937 के चुनाव और मंत्रिमंडल, 1934–39) → संघर्ष (व्यक्तिगत सत्याग्रह और भारत छोड़ो, 1940–44)।

◆ परिणाम — हर विराम को कुछ लोगों ने "पीछे हटना" कहा, पर हर अगला आंदोलन पिछले से अधिक व्यापक, अधिक गहरा और अधिक निडर निकला। 1920 में जो जनता लाठी से डरती थी, वह 1942 में गोलियों के सामने थाने पर झंडा फहरा रही थी।

🧮 13.3 समग्र मूल्यांकन: 1930 से 1946 ने क्या बदला?

◆ राष्ट्रीय आंदोलन सचमुच जन-आंदोलन बना — नमक जैसे सीधे मुद्दे ने किसान, मज़दूर, व्यापारी, आदिवासी और लाखों महिलाओं को पहली बार राजनीति में उतारा। 1942 तक आते-आते जनता नेताओं के बिना भी लड़ना सीख गई।

◆ लक्ष्य स्पष्ट हुआ — कराची प्रस्ताव (1931) ने बताया कि स्वराज में आम आदमी को क्या मिलेगा — मौलिक अधिकार और आर्थिक न्याय। 1937 के मंत्रिमंडलों ने शासन का अनुभव दिया और राष्ट्रीय योजना समिति ने आर्थिक विकास की दिशा दिखाई। ये सब आगे संविधान और योजनाओं की नींव बने।

◆ अंग्रेज़ी राज के तीनों स्तंभ हिल गए — अंग्रेज़ी राज तीन चीज़ों पर टिका था: जनता का डर और सहमति, भारतीय कर्मचारियों की निष्ठा, और भारतीय सैनिकों की वफ़ादारी। सविनय अवज्ञा और भारत छोड़ो ने पहला स्तंभ तोड़ा; 1942 में कर्मचारियों की सहानुभूति ने दूसरा हिलाया; और आज़ाद हिंद फ़ौज, लाल क़िला मुक़दमे तथा नौसेना विद्रोह ने तीसरा।

◆ सबसे बड़ी कमज़ोरी — सांप्रदायिक खाई — इन्हीं वर्षों में कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच की दूरी बढ़ती गई। सविनय अवज्ञा में मुसलमानों की कम भागीदारी, 1937 के बाद का कटु प्रचार, 1939 में मंत्रिमंडलों का त्यागपत्र और 1942–45 में कांग्रेस नेतृत्व का जेल में रहना — इन सबसे लीग को बढ़ने का अवसर मिला। स्वतंत्रता पास आई, पर एकता दूर होती गई।

🗺️ 13.4 मानचित्र पर यह अध्याय

चित्र 13.5: सविनय अवज्ञा, भारत छोड़ो, आज़ाद हिंद फ़ौज और युद्धोत्तर उभार के प्रमुख केंद्र
चित्र 13.5: सविनय अवज्ञा, भारत छोड़ो, आज़ाद हिंद फ़ौज और युद्धोत्तर उभार के प्रमुख केंद्र

मानचित्र में चार तरह के चिह्न हैं। हर चिह्न के स्थानों को याद करने के लिए नीचे उनका संक्षिप्त परिचय है (विस्तार संबंधित खंड में दिया जा चुका है)।

◆ सविनय अवज्ञा (1930) के केंद्र — गांधीजी साबरमती से दांडी तक चले और वहाँ नमक क़ानून तोड़ा। धरासना में 21 मई 1930 को सरोजिनी नायडू के नेतृत्व में नमक गोदाम पर अहिंसक धावा हुआ। पेशावर के क़िस्सा ख़्वानी बाज़ार में निहत्थे पठानों पर गोली चली और गढ़वाली सैनिकों ने गोली चलाने से इनकार किया। शोलापुर में मज़दूरों ने कुछ दिन शहर अपने हाथ में ले लिया। दक्षिण में वेदारण्यम तक राजगोपालाचारी ने और पयन्नूर तक के. केलप्पन ने नमक यात्राएँ कीं। पूर्वोत्तर के मणिपुर-नगा क्षेत्र में किशोरी रानी गाइदिन्ल्यू ने विद्रोह का नेतृत्व किया।

◆ अधिवेशन — हरिपुरा (1938) और त्रिपुरी (1939) वे दो स्थान हैं जहाँ सुभाष चंद्र बोस कांग्रेस अध्यक्ष बने।

◆ भारत छोड़ो (1942) के केंद्र — बम्बई के ग्वालिया टैंक से 8 अगस्त 1942 को आंदोलन का आह्वान हुआ। बलिया (चित्तू पांडे), तामलुक (जातीय सरकार) और सतारा (प्रति सरकार) में समानांतर सरकारें बनीं, और तालचेर की रियासत में भी जन-सरकार बनी। पटना सचिवालय पर सात छात्र, गोहपुर में कनकलता बरुआ और कोरापुट के लक्ष्मण नायक इस आंदोलन के शहीद हैं।

◆ आज़ाद हिंद फ़ौज — पोर्ट ब्लेयर में 30 दिसंबर 1943 को नेताजी ने तिरंगा फहराया। इंफाल-कोहिमा क्षेत्र में 1944 में फ़ौज ने भारत की सीमा में प्रवेश किया और मोइरांग में झंडा फहराया।

◆ युद्धोत्तर उभार — दिल्ली के लाल क़िले में 1945 में फ़ौज के अफ़सरों पर मुक़दमा चला। बम्बई और कराची फ़रवरी 1946 के नौसेना विद्रोह के दो सबसे बड़े केंद्र थे।

⏳ 13.5 एक नज़र में कालक्रम

नीचे इस अध्याय की प्रमुख तिथियाँ क्रम से दी गई हैं। इन्हें दोहराते समय हर घटना के साथ उसका कारण और परिणाम भी मन में दोहराएँ।

तिथि

घटना

31 जनवरी 1930

गांधीजी ने वायसराय इरविन के सामने ग्यारह सूत्र रखे।

12 मार्च – 6 अप्रैल 1930

दांडी यात्रा हुई और नमक क़ानून तोड़कर सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू हुआ।

नवंबर 1930

लंदन में पहला गोलमेज सम्मेलन शुरू हुआ, जिसमें कांग्रेस नहीं गई।

5 मार्च 1931

गांधी-इरविन समझौता हुआ; इसी महीने कराची अधिवेशन में मौलिक अधिकारों का प्रस्ताव पारित हुआ।

सितंबर – दिसंबर 1931

दूसरे गोलमेज सम्मेलन में गांधीजी कांग्रेस के एकमात्र प्रतिनिधि बनकर गए।

16 अगस्त और 24 सितंबर 1932

पहले सांप्रदायिक पंचाट घोषित हुआ और फिर पूना पैक्ट हुआ।

अप्रैल 1934

सविनय अवज्ञा आंदोलन औपचारिक रूप से वापस लिया गया।

अगस्त 1935

भारत सरकार अधिनियम 1935 पारित हुआ।

फ़रवरी और जुलाई 1937

प्रांतीय चुनाव हुए और कांग्रेस ने मंत्रिमंडल बनाए।

फ़रवरी 1938 – मई 1939

हरिपुरा में सुभाष अध्यक्ष बने, त्रिपुरी संकट हुआ और 3 मई 1939 को फ़ॉरवर्ड ब्लॉक बना।

3 सितंबर 1939

भारत को बिना पूछे युद्ध में शामिल किया गया; अक्टूबर–नवंबर में मंत्रिमंडलों ने त्यागपत्र दिया।

8 अगस्त 1940

वायसराय लिनलिथगो ने अगस्त प्रस्ताव रखा।

17 अक्टूबर 1940

विनोबा भावे ने पवनार से व्यक्तिगत सत्याग्रह शुरू किया।

जनवरी 1941

सुभाष चंद्र बोस कलकत्ता की नज़रबंदी से निकलकर जर्मनी गए।

मार्च – अप्रैल 1942

क्रिप्स मिशन भारत आया और असफल होकर लौटा।

8–9 अगस्त 1942

भारत छोड़ो प्रस्ताव पारित हुआ और अगली भोर सभी बड़े नेता गिरफ़्तार कर लिए गए।

1 सितंबर 1942

मोहन सिंह के नेतृत्व में आज़ाद हिंद फ़ौज का पहला औपचारिक गठन हुआ।

फ़रवरी – मार्च 1943

गांधीजी ने आग़ा ख़ाँ महल में 21 दिन का अनशन किया।

21 अक्टूबर 1943

नेताजी ने सिंगापुर में आज़ाद हिंद की अस्थायी सरकार बनाई।

14 अप्रैल और 6 मई 1944

मोइरांग में तिरंगा फहराया गया; अगले महीने गांधीजी जेल से रिहा हुए।

18 अगस्त 1945

ताइहोकू की विमान दुर्घटना में नेताजी के निधन की सूचना आई।

5 नवंबर 1945

लाल क़िले में आज़ाद हिंद फ़ौज के अफ़सरों पर मुक़दमा शुरू हुआ।

18–23 फ़रवरी 1946

शाही भारतीय नौसेना का विद्रोह हुआ; 19 फ़रवरी को कैबिनेट मिशन की घोषणा हुई।

🔑 कीवर्ड सार

11 सूत्र • दांडी — 6 अप्रैल 1930 • धरासना — सरोजिनी नायडू • पेशावर — गढ़वाल राइफ़ल्स • रानी गाइदिन्ल्यू • तीन गोलमेज सम्मेलन • गांधी-इरविन समझौता — 5 मार्च 1931 • कराची — मौलिक अधिकार • सांप्रदायिक पंचाट • पूना पैक्ट • 1935 का अधिनियम — प्रांतीय स्वायत्तता • 1937 — आठ प्रांत • वर्धा योजना • हरिपुरा • त्रिपुरी — पंत प्रस्ताव • फ़ॉरवर्ड ब्लॉक

मुक्ति दिवस • अगस्त प्रस्ताव • व्यक्तिगत सत्याग्रह — विनोबा भावे • क्रिप्स — आगे की तारीख़ का चेक • ग्वालिया टैंक — करो या मरो • ऑपरेशन ज़ीरो आवर • बलिया, तामलुक, सतारा • उषा मेहता — कांग्रेस रेडियो • मोहन सिंह • आज़ाद हिंद सरकार — 21 अक्टूबर 1943 • मोइरांग • लाल क़िला — सहगल, ढिल्लों, शाहनवाज़ • नौसेना विद्रोह — तलवार

ऊपर के सार में दिए हर शब्द को देखकर स्वयं से पूछें — यह कब हुआ, क्यों हुआ और इसका परिणाम क्या निकला। जहाँ उत्तर न सूझे, वहाँ संबंधित खंड दोबारा पढ़ें।

💡 अंतिम बात

दांडी की एक मुट्ठी नमक से ग्वालिया टैंक के "करो या मरो" तक, और मोइरांग के तिरंगे से बम्बई बंदरगाह के विद्रोही जहाज़ों तक — इन सोलह वर्षों में भारत की जनता ने दिखा दिया कि अब वह डर के राज में नहीं जिएगी।

पर स्वतंत्रता के द्वार पर एक और कठिन परीक्षा खड़ी थी — सांप्रदायिक राजनीति और विभाजन। अगले अध्याय 14 में हम पढ़ेंगे — लाहौर प्रस्ताव, सी. आर. फ़ॉर्मूला, वेवेल योजना और शिमला सम्मेलन, 1945–46 के चुनाव, कैबिनेट मिशन, सीधी कार्रवाई, माउंटबेटन योजना और भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 — यानी विभाजन और स्वतंत्रता की कहानी।

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