🚉 कहानी से शुरुआत: पीटरमैरित्सबर्ग की वह ठंडी रात जून 1893, दक्षिण अफ़्रीका। 23 वर्ष का एक भारतीय बैरिस्टर डरबन से प्रिटोरिया जा रहा था। वह एक भारतीय व्यापारिक फ़र्म के मुक़दमे में मदद करने के लिए सिर्फ़ एक साल के अनुबंध पर वहाँ आया था। उसके पास प्रथम श्रेणी का वैध टिकट था, इसलिए वह प्रथम श्रेणी के डिब्बे में आराम से बैठा था। रात को पीटरमैरित्सबर्ग स्टेशन पर एक गोरा यात्री डिब्बे में आया। उसे एक "काले" भारतीय के साथ बैठना पसंद नहीं था। रेल अधिकारी ने नौजवान से कहा कि वह सामान वाले डिब्बे में चला जाए। नौजवान ने कहा कि मेरे पास प्रथम श्रेणी का टिकट है और मैं इसी डिब्बे में सफ़र करूँगा। इस पर सिपाही बुलाया गया और उसे सामान सहित प्लेटफ़ॉर्म पर उतार दिया गया। ट्रेन आगे चली गई। कड़ाके की सर्दी में वह नौजवान रात-भर ख़ाली प्रतीक्षालय में ठिठुरता रहा। उसके सामने दो रास्ते थे: या तो अपमान सहकर भारत लौट जाए, या अन्याय के विरुद्ध खड़ा हो। उसने दूसरा रास्ता चुना। यह नौजवान मोहनदास करमचंद गांधी था। बाद में उन्होंने लिखा कि उनका सक्रिय अहिंसक प्रतिरोध उसी दिन से शुरू हुआ। एक साल का अनुबंध इक्कीस वर्ष में बदल गया। इस दौरान गांधीजी ने वहाँ भारतीयों के अधिकारों के लिए संघर्ष करते हुए अन्याय से लड़ने का एक बिल्कुल नया तरीक़ा खोजा: हिंसा के बिना, डर के बिना, केवल सत्य और कष्ट सहने की ताक़त से। इसी का नाम उन्होंने सत्याग्रह रखा। उन्होंने फ़ीनिक्स बस्ती और टॉल्सटॉय फ़ार्म जैसे आश्रम भी बसाए, जहाँ सादा जीवन और मिल-जुलकर काम करना सिखाया जाता था। 9 जनवरी 1915 को गांधीजी भारत लौटे। उनके राजनीतिक गुरु गोपाल कृष्ण गोखले ने सलाह दी कि एक साल तक देश को घूमकर देखो और सार्वजनिक मुद्दों पर कुछ मत बोलो। तीसरे दर्जे के भीड़ भरे डिब्बों में सफ़र करते हुए गांधीजी ने वह भारत देखा जो अख़बारों और कांग्रेस के मंचों पर नहीं दिखता था: ग़रीब, बँटा हुआ, पर बदलाव की प्रतीक्षा करता हुआ भारत। इसके बाद के कुछ ही वर्षों में यह लगभग अनजान बैरिस्टर देश का सबसे बड़ा जननेता बन गया। यह कैसे हुआ? चंपारण के नील-किसानों ने उसे क्यों बुलाया? रॉलेट एक्ट और जलियाँवाला बाग़ ने देश को कैसे हिला दिया? असहयोग आंदोलन अपने शिखर पर होते हुए भी क्यों रोक दिया गया? और 1929 में लाहौर में रावी के तट पर कांग्रेस ने क्या माँग रखी? यही इस अध्याय की कहानी है। आगे दो कहानियाँ भी मिलेंगी, जो इन्हीं सवालों के जवाब आसान तरीक़े से समझा देंगी। |
1915 से 1947 तक के राष्ट्रीय आंदोलन को "गांधी युग" कहा जाता है, क्योंकि इस पूरे काल में आंदोलन की दिशा, तरीक़े और नेतृत्व — तीनों पर महात्मा गांधी की छाप रही। पर गांधीजी भारत आए तो पूरी तरह "तैयार" होकर आए थे — उनके विचार और सत्याग्रह का तरीक़ा दक्षिण अफ़्रीका के 21 वर्षों में गढ़ा गया था। इसलिए भारत के आंदोलनों को समझने से पहले उनके जीवन, उन पर पड़े प्रभावों और दक्षिण अफ़्रीका के प्रयोगों को समझना ज़रूरी है।
◆ जन्म और परिवार — मोहनदास करमचंद गांधी का जन्म 2 अक्टूबर 1869 को काठियावाड़ (आज गुजरात) के पोरबंदर में हुआ। उनके पिता करमचंद गांधी (उपनाम "कबा गांधी") पोरबंदर, राजकोट और वांकानेर रियासतों के दीवान रहे। माता पुतलीबाई अत्यंत धार्मिक थीं और कठिन व्रत-उपवास रखती थीं। गांधीजी ने स्वयं माना कि उपवास, संयम और सत्य-निष्ठा के संस्कार उन्हें माँ से मिले — यही उपवास आगे चलकर उनका सबसे प्रभावी राजनीतिक अस्त्र बना।
◆ बचपन और विवाह — उनकी प्रारंभिक शिक्षा राजकोट में हुई। 1883 में, केवल 13 वर्ष की आयु में, उनका विवाह कस्तूरबा से हुआ। बाद में उन्होंने अपनी आत्मकथा में बाल विवाह को एक बुराई बताया — यह उनके अपने अनुभव से निकली राय थी।
◆ लंदन में शिक्षा — 1888 में वे क़ानून पढ़ने लंदन गए और इनर टेंपल से बैरिस्टर बने। जाने से पहले उन्होंने माँ को वचन दिया था कि वे मांस, मदिरा और परस्त्री से दूर रहेंगे — इस वचन को निभाने के प्रयास में वे लंदन की शाकाहारी सोसाइटी से जुड़े और वहीं उन्होंने पहली बार गीता (एडविन आर्नोल्ड का अंग्रेज़ी अनुवाद) गंभीरता से पढ़ी।
◆ भारत में असफल शुरुआत — 1891 में भारत लौटकर उन्होंने बम्बई और राजकोट में वकालत शुरू की, पर सफलता नहीं मिली; वे अदालत में बोलते समय घबरा जाते थे। तभी पोरबंदर की एक मुस्लिम व्यापारी फ़र्म दादा अब्दुल्ला एंड कंपनी ने उन्हें दक्षिण अफ़्रीका में एक मुक़दमे में सहायता के लिए बुलाया। 1893 में वे एक वर्ष के अनुबंध पर डरबन पहुँचे — और लगभग 21 वर्ष वहीं रह गए।
गांधीजी के विचार किसी एक स्रोत से नहीं बने। उन्होंने भारतीय परंपरा, ईसाई शिक्षा और पश्चिम के आलोचक चिंतकों — सबसे कुछ-न-कुछ लिया और उसे अपने अनुभव में परखकर अपनाया।
◆ भगवद्गीता — गांधीजी गीता को अपना "आध्यात्मिक शब्दकोश" और "माता" कहते थे। गीता के अनासक्त कर्म (फल की चिंता किए बिना कर्तव्य करना) के सिद्धांत ने उन्हें सिखाया कि सत्याग्रही को परिणाम की चिंता किए बिना सही मार्ग पर डटे रहना चाहिए।
◆ श्रीमद् राजचंद्र (रायचंदभाई) — बम्बई के जैन कवि और आध्यात्मिक चिंतक, जिनसे गांधीजी 1891 में मिले। धार्मिक दुविधा के समय गांधीजी ने दक्षिण अफ़्रीका से उन्हें पत्र लिखकर मार्गदर्शन माँगा था। अहिंसा, सत्य और आत्म-संयम पर गांधीजी की आस्था को उन्होंने दृढ़ किया।
◆ बाइबिल का "पर्वत पर उपदेश" — ईसा मसीह के इस उपदेश में कहा गया है कि "कोई तुम्हारे एक गाल पर थप्पड़ मारे तो दूसरा गाल भी आगे कर दो" और "अपने शत्रु से भी प्रेम करो"। गांधीजी ने इसी से यह विचार लिया कि बुराई का उत्तर बुराई से नहीं, प्रेम और कष्ट-सहन से दिया जाए।
◆ जॉन रस्किन — "अन्टू दिस लास्ट" — 1904 में एक रेल यात्रा के दौरान गांधीजी ने अंग्रेज़ चिंतक रस्किन की यह पुस्तक पढ़ी और रात भर में उनका जीवन बदल गया। इसके तीन सूत्र उन्होंने अपनाए — (1) सबके भले में ही अपना भला है; (2) वकील के काम और नाई के काम का मूल्य बराबर है, क्योंकि सबको अपने श्रम से जीविका कमाने का समान अधिकार है; (3) किसान और कारीगर का शारीरिक श्रम ही सच्चा जीवन है। उन्होंने इसका गुजराती में "सर्वोदय" नाम से सार प्रस्तुत किया और इसी प्रेरणा से फ़ीनिक्स आश्रम बनाया।
◆ लियो टॉल्सटॉय — रूसी लेखक टॉल्सटॉय की पुस्तक "द किंगडम ऑफ़ गॉड इज़ विदिन यू" (ईश्वर का राज्य तुम्हारे भीतर है) ने गांधीजी को अहिंसक प्रतिरोध का सैद्धांतिक आधार दिया। दोनों के बीच पत्र-व्यवहार भी हुआ और गांधीजी ने अपने दूसरे आश्रम का नाम "टॉल्सटॉय फ़ार्म" रखा।
◆ हेनरी डेविड थोरो — अमेरिकी चिंतक थोरो ने अपने निबंध "सविनय अवज्ञा" में लिखा था कि अन्यायी क़ानून और कर को मानना स्वयं अन्याय में भागीदार बनना है; उन्होंने दास-प्रथा का समर्थन करने वाली सरकार को कर देने से इनकार करके जेल भी काटी थी। गांधीजी ने "सविनय अवज्ञा" शब्द और अन्यायी क़ानून को खुलेआम तोड़कर दंड स्वीकार करने का विचार यहीं से लिया।
◆ गोपाल कृष्ण गोखले — राजनीतिक गुरु — गांधीजी ने उदारवादी नेता गोखले को अपना राजनीतिक गुरु माना। 1912 में गोखले दक्षिण अफ़्रीका भी गए थे। भारत लौटने पर गोखले ने ही उन्हें सलाह दी कि पहले एक वर्ष देश घूमकर भारत को समझें और तब तक राजनीति पर कुछ न बोलें।
📌 याद रखें गांधीजी के विचारों के स्रोत — गीता (अनासक्त कर्म), रायचंदभाई (अहिंसा-संयम), बाइबिल (प्रेम से बुराई का उत्तर), रस्किन (सर्वोदय, श्रम का गौरव), टॉल्सटॉय (अहिंसक प्रतिरोध) और थोरो (सविनय अवज्ञा)। राजनीतिक गुरु — गोखले। |
उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में दक्षिण अफ़्रीका के नटाल प्रांत के गन्ना बाग़ानों में काम करने के लिए भारत से बड़ी संख्या में अनुबंधित (गिरमिटिया) मज़दूर ले जाए गए थे। "गिरमिट" शब्द अंग्रेज़ी के "एग्रीमेंट" (अनुबंध) का बिगड़ा रूप है। इनके अलावा वहाँ गुजराती मुस्लिम (मेमन) व्यापारी और अनुबंध पूरा कर चुके पूर्व-मज़दूर भी रहते थे। इनमें से अधिकांश अनपढ़ थे, अंग्रेज़ी कम जानते थे और रंगभेद को अपनी नियति मानकर चुपचाप सहते थे।
गोरी सरकार ने भारतीयों पर अनेक अपमानजनक प्रतिबंध लगा रखे थे — उन्हें मताधिकार नहीं था; उन्हें भीड़-भरी और गंदी बस्तियों में रहना पड़ता था; वे फुटपाथ पर नहीं चल सकते थे; रात में बिना अनुमति-पत्र के बाहर निकलने पर रोक थी; और उन्हें "कुली" कहकर पुकारा जाता था — गांधीजी को भी "कुली बैरिस्टर" कहा गया। इसी वातावरण में गांधीजी ने हिंदू-मुस्लिम-पारसी-ईसाई, गुजराती-तमिल, व्यापारी-मज़दूर — सबको एक साथ संगठित करने का अनुभव पाया, जो आगे भारत में बहुत काम आया।
नीचे के चार्ट में दक्षिण अफ़्रीका की आठ प्रमुख घटनाएँ एक नज़र में दी गई हैं। चार्ट केवल याद रखने के लिए है — उसके बाद हर घटना को विस्तार से समझाया गया है।

◆ दादा अब्दुल्ला के मुक़दमे के सिलसिले में डरबन से प्रिटोरिया जाते समय, प्रथम श्रेणी का टिकट होने के बावजूद एक गोरे यात्री की आपत्ति पर गांधीजी को पीटरमैरित्सबर्ग स्टेशन पर ट्रेन से उतार दिया गया। आगे की यात्रा में घोड़ागाड़ी के चालक ने भी उन्हें पीटा। इसी रात उन्होंने तय किया कि वे भारत लौटने के बजाय रंगभेद से लड़ेंगे — इसलिए इसे उनके जीवन की निर्णायक रात कहा जाता है।
◆ 1894 में नटाल सरकार भारतीयों से बचा-खुचा मताधिकार भी छीनने वाला विधेयक ला रही थी। गांधीजी ने भारतीयों को संगठित करने के लिए 22 अगस्त 1894 को नटाल इंडियन कांग्रेस की स्थापना की और स्वयं उसके सचिव बने। नाम भारत की कांग्रेस से प्रेरित था।
◆ 1894 से 1906 तक का काल गांधीजी के संघर्ष का "नरम" (उदारवादी) चरण था। इसमें वे भारत के आरंभिक कांग्रेसी नेताओं की तरह याचिकाएँ, स्मरण-पत्र, अख़बारों में लेख और प्रचार से सरकार को न्याय के लिए मनाने का प्रयास करते रहे। उन्हें धीरे-धीरे समझ आया कि केवल प्रार्थना-पत्रों से गोरी सरकार नहीं बदलेगी।
◆ बोअर युद्ध (1899–1902) और ज़ुलु विद्रोह (1906) के समय गांधीजी ने भारतीय एंबुलेंस दल बनाकर घायलों की सेवा की। उनका तर्क था कि यदि भारतीय ब्रिटिश साम्राज्य के नागरिक होने के अधिकार माँगते हैं, तो उन्हें उसके प्रति कर्तव्य भी निभाने चाहिए। इन सेवाओं के लिए उन्हें पदक मिले, जिन्हें उन्होंने 1920 में असहयोग के समय लौटा दिया।
◆ 1903 में उन्होंने "इंडियन ओपिनियन" अख़बार शुरू किया, जो अंग्रेज़ी, गुजराती, हिंदी और तमिल में छपता था, ताकि अलग-अलग भाषा बोलने वाले भारतीय एक विचार से जुड़ सकें। 1904 में रस्किन से प्रेरित होकर डरबन के पास फ़ीनिक्स आश्रम (फ़ीनिक्स फ़ार्म) बनाया — यह गांधीजी का पहला आश्रम था, जहाँ सब लोग शारीरिक श्रम करते और सादा सामूहिक जीवन जीते थे।
◆ पृष्ठभूमि — ट्रांसवाल की सरकार ने एशियाटिक पंजीकरण अध्यादेश (जिसे भारतीयों ने "काला क़ानून" कहा) प्रस्तावित किया। इसके अनुसार हर भारतीय को अंगुलियों के निशान वाला पंजीकरण-प्रमाणपत्र हर समय साथ रखना था, जैसे वह कोई अपराधी हो।
◆ घटना — 11 सितंबर 1906 को जोहान्सबर्ग के एम्पायर थिएटर में भारतीयों की विशाल सभा हुई, जिसमें सबने ईश्वर को साक्षी मानकर शपथ ली कि वे यह प्रमाणपत्र नहीं लेंगे और इसके लिए जो भी दंड मिले, उसे सहेंगे। इसी को गांधीजी का पहला सत्याग्रह माना जाता है। आंदोलन चलाने के लिए "पैसिव रेज़िस्टेंस एसोसिएशन" (निष्क्रिय प्रतिरोध संघ) बना।
◆ जनवरी 1908 में क़ानून न मानने के कारण गांधीजी को पहली बार जेल हुई। कुछ ही दिनों बाद जनरल स्मट्स ने समझौता किया कि यदि भारतीय स्वेच्छा से पंजीकरण करा लें तो क़ानून हटा लिया जाएगा। गांधीजी ने भरोसा करके पंजीकरण कराया, पर सरकार ने वादा नहीं निभाया — तब भारतीयों ने अपने पंजीकरण-प्रमाणपत्रों की सार्वजनिक होली जलाई और भारतीयों के एक प्रांत से दूसरे प्रांत में जाने पर लगे प्रतिबंध को तोड़कर गिरफ़्तारियाँ दीं।
◆ "सत्याग्रह" शब्द का जन्म — गांधीजी को "पैसिव रेज़िस्टेंस" (निष्क्रिय प्रतिरोध) शब्द पसंद नहीं था, क्योंकि उससे कमज़ोरी का भाव आता था। इसलिए "इंडियन ओपिनियन" में आंदोलन के लिए नए भारतीय नाम की प्रतियोगिता रखी गई। मगनलाल गांधी ने "सदाग्रह" (सत् + आग्रह) शब्द सुझाया; गांधीजी ने उसे थोड़ा बदलकर "सत्याग्रह" कर दिया।
◆ 1909 में लंदन से दक्षिण अफ़्रीका लौटते समय जहाज़ "किल्डोनन कैसल" पर गांधीजी ने दस दिनों में गुजराती में "हिंद स्वराज" लिखी। यह संवाद-शैली (पाठक और संपादक की बातचीत) में है और इसमें आधुनिक पश्चिमी सभ्यता, रेल, वकीलों और डॉक्टरों की आलोचना करते हुए बताया गया है कि सच्चा स्वराज क्या है। इसे अंग्रेज़ी सरकार ने भारत में ज़ब्त कर लिया था।
◆ 1910 में जर्मन वास्तुकार मित्र हरमन कालेनबाख ने जोहान्सबर्ग के पास ज़मीन दी, जहाँ टॉल्सटॉय फ़ार्म बना। यहाँ सत्याग्रहियों के परिवार रहते थे, ताकि जेल जाने वालों के परिवारों का ख़र्च कम हो और सब मिलकर श्रम करें।
◆ पृष्ठभूमि — दो नए अन्याय जुड़ गए: (क) अनुबंध पूरा कर चुके हर भारतीय पर 3 पाउंड का वार्षिक "पोल टैक्स" (व्यक्ति-कर) था, जो ग़रीब मज़दूर के लिए भारी बोझ था; (ख) 1913 में केप के सर्वोच्च न्यायालय ने फ़ैसला दिया कि जो विवाह ईसाई रीति से नहीं हुए और पंजीकृत नहीं हैं, वे अमान्य हैं — यानी हिंदू, मुस्लिम और पारसी रीति से विवाहित सभी भारतीय स्त्रियाँ क़ानून की दृष्टि में "पत्नी" नहीं रहीं।
◆ घटनाक्रम — इन मुद्दों ने आंदोलन को व्यापारियों से आगे बढ़ाकर ग़रीब मज़दूरों और स्त्रियों तक पहुँचा दिया। नटाल की कोयला खानों के हज़ारों मज़दूरों ने हड़ताल की और गांधीजी के नेतृत्व में नटाल से ट्रांसवाल की सीमा तक ऐतिहासिक पैदल मार्च किया। कस्तूरबा सहित अनेक स्त्रियाँ पहली बार सत्याग्रह में उतरीं और जेल गईं। सरकार ने हज़ारों को गिरफ़्तार किया, जिससे भारत और ब्रिटेन में भारी रोष फैला।
◆ भारत के वायसराय लॉर्ड हार्डिंग ने भी दक्षिण अफ़्रीका सरकार की आलोचना की और एक जाँच आयोग बना। अंततः गांधी-स्मट्स समझौता हुआ और भारतीय राहत अधिनियम (1914) पारित हुआ — 3 पाउंड का पोल टैक्स समाप्त हुआ, भारतीय रीति के विवाह मान्य हुए और अंगुली-निशान वाली व्यवस्था में ढील दी गई।
◆ जुलाई 1914 में गांधीजी इंग्लैंड होते हुए भारत के लिए रवाना हुए और 9 जनवरी 1915 को बम्बई पहुँचे। कहा जाता है कि जनरल स्मट्स ने उनके जाने पर राहत की साँस लेते हुए कहा — "संत हमारे तट से चले गए, मुझे आशा है हमेशा के लिए।"
🧠 याद रखें — दक्षिण अफ़्रीका के दो चरण (1) नरम चरण (1894–1906) — याचिकाएँ, स्मरण-पत्र, नटाल इंडियन कांग्रेस, "इंडियन ओपिनियन"। (2) सत्याग्रह चरण (1906–1914) — "काला क़ानून" के विरुद्ध शपथ, जेल, प्रमाणपत्रों की होली, पोल टैक्स और विवाह के प्रश्न पर खनिकों का मार्च। इसीलिए कहा जाता है कि दक्षिण अफ़्रीका ने गांधी को "महात्मा" बनाया — सत्याग्रह की तकनीक भारत में नहीं, वहीं विकसित हुई। वहाँ उन्होंने सीखा कि जनता में कष्ट सहने की अपार क्षमता है और अलग-अलग धर्म-भाषा-वर्ग के लोगों को एक साझा मुद्दे पर जोड़ा जा सकता है। |
◆ रचनाएँ — "हिंद स्वराज" (1909, गुजराती) उनके विचारों का मूल ग्रंथ है। उनकी आत्मकथा "सत्य के प्रयोग" गुजराती साप्ताहिक "नवजीवन" में 1925 से 1929 तक क्रमशः छपी; इसका अंग्रेज़ी अनुवाद महादेव देसाई ने किया। उन्होंने "दक्षिण अफ़्रीका में सत्याग्रह" नामक पुस्तक भी लिखी और रस्किन की पुस्तक का सार "सर्वोदय" नाम से प्रस्तुत किया।
◆ पत्र-पत्रिकाएँ — दक्षिण अफ़्रीका में "इंडियन ओपिनियन" (1903); भारत में 1919 से अंग्रेज़ी साप्ताहिक "यंग इंडिया" और गुजराती "नवजीवन"; और 1933 से "हरिजन" (साथ में हिंदी "हरिजन सेवक" और गुजराती "हरिजनबंधु")। इन्हीं पत्रों के माध्यम से वे हर सप्ताह लाखों लोगों तक अपने विचार पहुँचाते थे।
◆ आश्रम — दक्षिण अफ़्रीका में फ़ीनिक्स (डरबन, 1904) और टॉल्सटॉय फ़ार्म (जोहान्सबर्ग, 1910); भारत में पहले अहमदाबाद के कोचरब में सत्याग्रह आश्रम (मई 1915), फिर प्लेग फैलने के कारण 17 जून 1917 को उसे साबरमती नदी के तट पर ले जाया गया; 1930 के दांडी मार्च के बाद उन्होंने साबरमती छोड़ दिया और 1936 में वर्धा के पास सेवाग्राम आश्रम बनाया।
◆ उपाधियाँ — "महात्मा" (महान आत्मा) की उपाधि को लोकप्रिय मान्यता के अनुसार रवींद्रनाथ टैगोर से जोड़ा जाता है; "राष्ट्रपिता" कहकर सबसे पहले सुभाष चंद्र बोस ने जुलाई 1944 में आज़ाद हिंद रेडियो (सिंगापुर) से उन्हें संबोधित किया; जनता उन्हें प्यार से "बापू" कहती थी। दूसरी ओर ब्रिटिश नेता विंस्टन चर्चिल ने व्यंग्य में उन्हें "अधनंगा फ़क़ीर" कहा था।
पहलू | मुख्य तथ्य |
जन्म और परिवार | 2 अक्टूबर 1869 को पोरबंदर में जन्म हुआ; पिता करमचंद गांधी रियासतों के दीवान थे और माता पुतलीबाई धार्मिक स्वभाव की थीं। |
शिक्षा और विवाह | 1883 में 13 वर्ष की आयु में कस्तूरबा से विवाह हुआ; 1888–91 में लंदन के इनर टेंपल से बैरिस्टरी की। |
दक्षिण अफ़्रीका | 1893 में दादा अब्दुल्ला के मुक़दमे के लिए गए और 1914 तक लगभग 21 वर्ष वहाँ रहकर सत्याग्रह विकसित किया। |
विचारों के स्रोत | गीता, रायचंदभाई, बाइबिल, रस्किन, टॉल्सटॉय और थोरो से प्रेरणा मिली; गोखले उनके राजनीतिक गुरु थे। |
रचनाएँ और पत्र | "हिंद स्वराज" (1909) और "सत्य के प्रयोग" प्रमुख रचनाएँ हैं; "इंडियन ओपिनियन", "यंग इंडिया", "नवजीवन" और "हरिजन" उनके पत्र थे। |
आश्रम | फ़ीनिक्स (1904) और टॉल्सटॉय फ़ार्म (1910) दक्षिण अफ़्रीका में; कोचरब (1915), साबरमती (1917) और सेवाग्राम (1936) भारत में बने। |
उपाधियाँ | "महात्मा" टैगोर से जोड़ी जाती है, "राष्ट्रपिता" सुभाष बोस ने 1944 में कहा, जबकि चर्चिल ने व्यंग्य में "अधनंगा फ़क़ीर" कहा। |
गांधीजी से पहले राष्ट्रीय आंदोलन के सामने दो ही रास्ते थे — उदारवादियों की प्रार्थना-याचिका, जिससे सरकार पर कोई असर नहीं पड़ता था, और क्रांतिकारियों की हिंसा, जिसमें आम आदमी भाग नहीं ले सकता था और जिसे सरकार आसानी से कुचल देती थी। गांधीजी ने तीसरा रास्ता दिया — सत्याग्रह, जिसमें एक किसान, एक स्त्री या एक बच्चा भी बिना हथियार के भाग ले सकता था। इसीलिए सत्याग्रह ने राष्ट्रीय आंदोलन को जन-आंदोलन बना दिया।
🔍 आसान परिभाषा: सत्याग्रह |
📘 परिभाषा: सत्य + आग्रह = सत्य पर दृढ़ता से टिके रहने से उत्पन्न आत्मबल। अन्याय के विरुद्ध अहिंसक ढंग से, स्वयं कष्ट सहकर, विरोधी का हृदय-परिवर्तन करने का प्रयास। |
💡 आसान भाषा में: ग़लत बात के आगे झुकना नहीं, पर सामने वाले से नफ़रत भी नहीं करना — अपनी सच्चाई और त्याग से उसे बदल देना कि वह स्वयं अपनी ग़लती माने। 🏠 उदाहरण: चंपारण में गांधीजी ने ज़िला छोड़ने का आदेश मानने से इनकार किया और अदालत में कहा कि वे सज़ा भुगतने को तैयार हैं — सरकार को ही झुकना पड़ा। |
गांधीजी ने स्पष्ट कहा कि सत्याग्रह "निष्क्रिय प्रतिरोध" (पैसिव रेज़िस्टेंस) नहीं है। निष्क्रिय प्रतिरोध को वे कमज़ोरों का राजनीतिक अस्त्र मानते थे — जो लोग हथियार नहीं उठा सकते, वे मजबूरी में शांत विरोध करते हैं, और मौक़ा मिलने पर उसमें हिंसा भी आ सकती है; उसमें विरोधी को परेशान करके झुकाने का भाव होता है। इसके विपरीत सत्याग्रह वीरों का नैतिक बल है — सत्याग्रही हिंसा करने में समर्थ होते हुए भी अहिंसा चुनता है, विरोधी के प्रति मन में भी घृणा नहीं रखता और उसका हृदय बदलना चाहता है, उसे हराना नहीं। इसीलिए गांधीजी कहते थे कि सत्याग्रह केवल साहसी और मज़बूत लोगों के लिए है, कायरों के लिए नहीं।
🔍 आसान परिभाषा: अहिंसा |
📘 परिभाषा: मन, वचन और कर्म — तीनों से किसी भी प्राणी को कष्ट न पहुँचाना; गांधीजी के लिए इसका सक्रिय रूप था — सबके प्रति प्रेम, यहाँ तक कि विरोधी के प्रति भी। |
💡 आसान भाषा में: केवल मारपीट न करना ही अहिंसा नहीं है; मन में बदले की भावना रखना, गाली देना या किसी का बुरा सोचना भी हिंसा है। 🏠 उदाहरण: गांधीजी कहते थे — "यदि कायरता और हिंसा में से एक चुनना हो, तो मैं हिंसा चुनने की सलाह दूँगा; पर अहिंसा हिंसा से कहीं श्रेष्ठ है।" चौरी-चौरा की हिंसा के बाद उन्होंने पूरा आंदोलन रोक दिया। |
नीचे के बॉक्स में सत्याग्रह के मूल सिद्धांत और उसके व्यावहारिक अस्त्र संक्षेप में हैं। बॉक्स के बाद हर बिंदु को उदाहरण सहित समझाया गया है।
⚖️ सत्याग्रह के सिद्धांत ✔ सत्य — साध्य भी, साधन भी; "सत्य ही ईश्वर है" ✔ अहिंसा — मन, वचन, कर्म से ✔ निर्भयता और स्वयं कष्ट सहना ✔ विरोधी से घृणा नहीं, बुराई से संघर्ष ✔ साधन की पवित्रता — "जैसा साधन, वैसा साध्य" ✔ पहले बातचीत, अंतिम उपाय के रूप में संघर्ष | 🛠️ सत्याग्रह के अस्त्र ✔ असहयोग और बहिष्कार ✔ सविनय अवज्ञा — अन्यायी क़ानून तोड़ना ✔ कर-बंदी (कर न देना) ✔ हड़ताल, धरना, हिजरत (स्थान छोड़ना) ✔ उपवास — सबसे प्रभावी अस्त्र ✔ संघर्ष → विराम → संघर्ष की रणनीति |
◆ सत्य — गांधीजी के लिए सत्य सबसे ऊँचा मूल्य था। पहले वे कहते थे "ईश्वर सत्य है", बाद में उन्होंने कहा "सत्य ही ईश्वर है"। सत्याग्रही कभी झूठ, छल या गोपनीयता का सहारा नहीं लेता — इसीलिए गांधीजी हर आंदोलन से पहले सरकार को खुली सूचना और चेतावनी देते थे।
◆ अहिंसा — सत्य तक पहुँचने का साधन अहिंसा है। सत्याग्रही मार खा सकता है, पर हाथ नहीं उठाता। उनका मानना था कि हिंसा से मिली जीत में विरोधी के मन में बदले की आग बनी रहती है, जबकि अहिंसा से हुआ परिवर्तन स्थायी होता है।
◆ निर्भयता और कष्ट-सहन — सत्याग्रही जेल, लाठी, संपत्ति ज़ब्ती — किसी से नहीं डरता और दंड को ख़ुशी से स्वीकार करता है। जब निहत्था व्यक्ति शांत रहकर कष्ट सहता है, तो जनता की सहानुभूति उसके साथ होती है और अत्याचारी का नैतिक आधार कमज़ोर पड़ता है।
◆ घृणा नहीं — संघर्ष अंग्रेज़ों से नहीं, अंग्रेज़ी शासन की बुराई से था। गांधीजी अंग्रेज़ अधिकारियों से व्यक्तिगत मित्रता बनाए रखते थे और कहते थे कि "पाप से घृणा करो, पापी से नहीं"।
◆ साधन की पवित्रता — गांधीजी के अनुसार साधन और साध्य बीज और पेड़ की तरह हैं — जैसा बीज, वैसा पेड़। इसलिए हिंसा या झूठ से मिली स्वतंत्रता सच्ची स्वतंत्रता नहीं होगी।
◆ पहले बातचीत — हर सत्याग्रह से पहले गांधीजी तथ्य इकट्ठा करते, अधिकारियों से बात करते, समझौते का प्रयास करते; केवल विफल होने पर संघर्ष शुरू करते और समझौते का द्वार हमेशा खुला रखते।
◆ असहयोग और बहिष्कार — सरकार की संस्थाओं (स्कूल, अदालत, परिषद, उपाधि) और विदेशी वस्तुओं से अपना सहयोग वापस लेना, ताकि शासन-तंत्र ठप हो जाए। उदाहरण — 1920–22 का असहयोग आंदोलन।
◆ सविनय अवज्ञा — किसी अन्यायी क़ानून को खुलेआम, शांतिपूर्वक और विनम्रता से तोड़ना और उसका दंड स्वीकार करना। "सविनय" शब्द बताता है कि क़ानून तोड़ते समय भी अनुशासन और शिष्टता बनी रहे। उदाहरण — चंपारण (1917) और दांडी में नमक क़ानून तोड़ना (1930)।
◆ कर-बंदी — अन्यायपूर्ण लगान या कर देने से सामूहिक इनकार। उदाहरण — खेड़ा (1918) और बारडोली (1928)।
◆ हड़ताल, धरना और हिजरत — हड़ताल यानी काम-काज और दुकानें बंद रखना; धरना यानी शराब या विदेशी कपड़े की दुकान के आगे शांति से बैठकर ग्राहकों को रोकना; हिजरत यानी अत्याचार के विरोध में अपना घर-गाँव छोड़कर चले जाना। गांधीजी अपनी रणनीति में हड़ताल को सबसे अंतिम स्थान देते थे।
◆ उपवास — गांधीजी उपवास को सबसे प्रभावी अस्त्र ("अग्नि-बाण") मानते थे, क्योंकि इसमें कष्ट केवल सत्याग्रही स्वयं सहता है और विरोधी की अंतरात्मा को झकझोरता है। उन्होंने उपवास का प्रयोग सरकार के विरुद्ध कम और अपने साथियों व जनता के आत्म-शुद्धि के लिए अधिक किया — जैसे अहमदाबाद (1918), चौरी-चौरा के बाद (1922) और हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए (1924)।
🔍 आसान परिभाषा: संघर्ष-विराम-संघर्ष (सं-वि-सं) रणनीति |
📘 परिभाषा: लंबे जन-आंदोलन की वह रणनीति जिसमें तीव्र संघर्ष का एक दौर चलता है, फिर जनता की थकान दूर करने और शक्ति जुटाने के लिए विराम आता है, और तैयारी पूरी होने पर फिर नया संघर्ष छेड़ा जाता है। |
💡 आसान भाषा में: जैसे खिलाड़ी लगातार दौड़ता नहीं रह सकता, बीच में साँस लेता है; वैसे ही जनता हर समय जेल-लाठी नहीं झेल सकती। विराम के समय रचनात्मक कार्य से संगठन मज़बूत किया जाता है। 🏠 उदाहरण: असहयोग (1920–22, संघर्ष) → स्वराज पार्टी और रचनात्मक कार्य (1922–29, विराम) → सविनय अवज्ञा (1930–34, संघर्ष)। |
सत्याग्रह एक तरीक़ा था, पर गांधीजी के पास स्वतंत्र भारत की एक पूरी कल्पना भी थी। उनके प्रमुख विचार नीचे दिए गए हैं — इन्हें समझे बिना उनके आंदोलनों के कार्यक्रम (खादी, चरखा, ग्राम पंचायत, अस्पृश्यता-निवारण) समझ में नहीं आएँगे।
गांधीजी के लिए स्वराज का अर्थ केवल अंग्रेज़ों का चले जाना नहीं था। "हिंद स्वराज" में उन्होंने लिखा कि यदि अंग्रेज़ चले जाएँ पर उनकी जगह भारतीय वही अंग्रेज़ी ढंग का शोषणकारी शासन चलाएँ, तो वह "अंग्रेज़ों के बिना अंग्रेज़ी राज" होगा, स्वराज नहीं। सच्चा स्वराज है — आत्म-शासन, यानी हर व्यक्ति का अपने मन और इच्छाओं पर नियंत्रण, और गाँव-गाँव तक जनता का अपना शासन। उनके अनुसार स्वराज "एक-एक व्यक्ति का" होना चाहिए, जिसमें सबसे ग़रीब भी यह अनुभव करे कि यह देश उसका है।
सर्वोदय का अर्थ है — सबका उदय, यानी किसी एक वर्ग का नहीं, सबका कल्याण। यह विचार रस्किन की पुस्तक से प्रेरित था। इसका केंद्र-बिंदु अंत्योदय है — समाज के अंतिम व्यक्ति का कल्याण। गांधीजी ने एक "जंतर" (कसौटी) दिया था: जब भी कोई निर्णय लेने में संदेह हो, तो सबसे ग़रीब और कमज़ोर व्यक्ति का चेहरा याद करो और सोचो कि तुम्हारा क़दम उसके किसी काम आएगा या नहीं।
स्वदेशी का अर्थ है — अपने पड़ोस में बनी वस्तुओं और सेवाओं को प्राथमिकता देना। गांधीजी के लिए खादी और चरखा केवल कपड़ा बनाने के साधन नहीं थे: चरखा ग़रीब किसान को ख़ाली समय में रोज़गार देता था, विदेशी कपड़े के बहिष्कार से ब्रिटिश उद्योग पर आर्थिक चोट होती थी, और जब अमीर-ग़रीब, हिंदू-मुसलमान सब एक जैसी खादी पहनते थे तो राष्ट्रीय एकता का भाव बनता था। इसीलिए चरखा राष्ट्रीय आंदोलन का प्रतीक बना और 1920 के दशक के कांग्रेस ध्वज के बीच में भी चरखा था।
गांधीजी मानते थे कि धनी व्यक्ति अपनी संपत्ति का मालिक नहीं, बल्कि संरक्षक (ट्रस्टी) है — उसे अपनी ज़रूरत भर रखकर बाक़ी धन समाज के हित में लगाना चाहिए। यह विचार मार्क्सवाद के वर्ग-संघर्ष के बदले वर्ग-सहयोग का रास्ता था: ज़मींदार और किसान, मिल-मालिक और मज़दूर लड़ें नहीं, बल्कि नैतिक आधार पर मिलकर चलें। इसी कारण आगे चलकर समाजवादी नेताओं ने गांधीजी की आलोचना भी की कि वे ज़मींदारों और पूँजीपतियों के विरुद्ध खुलकर नहीं बोलते।
गांधीजी चाहते थे कि सत्ता दिल्ली में केंद्रित न होकर गाँवों तक बँटी हो — हर गाँव अपनी ज़रूरतें स्वयं पूरी करे और ग्राम पंचायत के माध्यम से अपना शासन चलाए। उनका अंतिम आदर्श एक ऐसा समाज था जिसमें लोग इतने नैतिक हों कि राज्य की ज़रूरत ही न रहे — इसलिए उन्हें "दार्शनिक अराजकतावादी" भी कहा गया और उन्होंने स्वयं इससे इनकार नहीं किया। स्वतंत्र भारत के संविधान में पंचायतों का प्रावधान (अनुच्छेद 40) और आगे की पंचायती राज व्यवस्था इसी विचार से जुड़ी है।
गांधीजी का रामराज्य किसी धर्म-विशेष का राज्य नहीं था, बल्कि सत्य और अहिंसा पर आधारित ऐसा न्यायपूर्ण शासन, जिसमें राजा और रंक के अधिकार बराबर हों और किसी के साथ अन्याय न हो। सत्य और अहिंसा को वे रामराज्य के दो आधार-स्तंभ मानते थे।
गांधीजी के लिए राजनीतिक स्वतंत्रता और सामाजिक सुधार अलग-अलग नहीं थे। उन्होंने अस्पृश्यता को हिंदू धर्म का कलंक कहा और दलितों को "हरिजन" (ईश्वर के लोग) नाम दिया; हिंदू-मुस्लिम एकता को स्वराज की पहली शर्त माना; स्त्रियों को आंदोलन में बराबरी से उतारा; नशाबंदी का अभियान चलाया; और हाथ के काम से जुड़ी बुनियादी शिक्षा (नई तालीम) की योजना दी।
गांधीजी को अक्सर मशीन-विरोधी समझा जाता है, पर उन्होंने स्पष्ट कहा कि उनका विरोध मशीन से नहीं, "मशीन की सनक" से है — यानी ऐसी मशीनों से, जो श्रम बचाने के नाम पर लाखों लोगों को बेरोज़गार कर दें और धन कुछ हाथों में इकट्ठा कर दें। सिलाई मशीन जैसी उपयोगी मशीनों की उन्होंने प्रशंसा की और कहा कि चरखा स्वयं मशीन का एक उत्कृष्ट नमूना है।
❝ पृथ्वी हर मनुष्य की आवश्यकता पूरी करने के लिए पर्याप्त देती है, पर हर मनुष्य के लालच को पूरा करने के लिए नहीं। (Earth provides enough to satisfy every man's need, but not every man's greed) ❞ (महात्मा गांधी) |
विचार | एक वाक्य में अर्थ |
स्वराज | स्वराज का अर्थ केवल अंग्रेज़ों से मुक्ति नहीं, बल्कि व्यक्ति और गाँव का आत्म-शासन है। |
सर्वोदय / अंत्योदय | सबका कल्याण हो और हर निर्णय की कसौटी समाज का अंतिम, सबसे ग़रीब व्यक्ति हो। |
स्वदेशी और खादी | पड़ोस में बनी वस्तुओं का प्रयोग और चरखे से कताई आत्मनिर्भरता, रोज़गार तथा एकता का साधन है। |
ट्रस्टीशिप | धनी अपनी संपत्ति का मालिक नहीं, समाज की ओर से उसका संरक्षक है; यह वर्ग-संघर्ष के बदले वर्ग-सहयोग का मार्ग है। |
ग्राम स्वराज | सत्ता का विकेंद्रीकरण गाँव की पंचायत तक हो और आदर्श रूप में राज्य की ज़रूरत ही न रहे। |
रामराज्य | सत्य और अहिंसा पर आधारित ऐसा न्यायपूर्ण शासन, जिसमें सबके अधिकार बराबर हों। |
मशीन पर दृष्टि | विरोध मशीन से नहीं, बेरोज़गारी फैलाने वाली "मशीन की सनक" से है। |
1915 में जब गांधीजी भारत लौटे, तब राष्ट्रीय आंदोलन एक ठहराव में था — उदारवादी और उग्रवादी 1907 में अलग हो चुके थे, 1916 में वे फिर मिले और होमरूल आंदोलन चल रहा था, पर आंदोलन मुख्यतः शहरी शिक्षित वर्ग तक सीमित था। गांधीजी ने पहले तीन वर्ष बड़े राष्ट्रीय प्रश्नों के बजाय स्थानीय समस्याओं — नील किसान, मिल मज़दूर और फ़सल-नाश से पीड़ित किसान — को उठाया। इन्हीं तीन छोटे संघर्षों में सत्याग्रह की भारतीय परीक्षा हुई।
◆ 9 जनवरी 1915 को गांधीजी बम्बई पहुँचे। इसी स्मृति में भारत सरकार 2003 से हर वर्ष 9 जनवरी को प्रवासी भारतीय दिवस मनाती है — क्योंकि गांधीजी को "सबसे बड़ा प्रवासी भारतीय" माना जाता है, जो विदेश से लौटकर देश के काम आया।
◆ राजनीतिक गुरु गोपाल कृष्ण गोखले की सलाह पर उन्होंने एक वर्ष तक सार्वजनिक राजनीति पर मौन रखा और रेल के तीसरे दर्जे में पूरे देश की यात्रा करके भारत की वास्तविक स्थिति समझी। गोखले का फ़रवरी 1915 में निधन हो गया। दक्षिण अफ़्रीका में मानवीय सेवा के लिए इसी वर्ष सरकार ने उन्हें "कैसर-ए-हिंद" स्वर्ण पदक दिया।
◆ मई 1915 में उन्होंने अहमदाबाद के कोचरब में सत्याग्रह आश्रम स्थापित किया, जो 1917 में साबरमती के तट पर चला गया। आश्रम में सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, अस्तेय (चोरी न करना), अपरिग्रह (ज़रूरत से अधिक संग्रह न करना), शारीरिक श्रम और अस्पृश्यता-निवारण जैसे व्रतों का पालन होता था। एक दलित परिवार को आश्रम में रखने पर दानदाताओं ने सहायता रोक दी, पर गांधीजी झुके नहीं।
◆ फ़रवरी 1916 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के उद्घाटन समारोह में, राजाओं और धनी वर्ग के सामने गांधीजी ने कहा कि गहनों से लदे राजाओं और ग़रीब जनता के बीच की खाई देखकर उन्हें दुःख होता है, और "हमारी मुक्ति केवल किसानों के माध्यम से हो सकती है; न वकील, न डॉक्टर, न ज़मींदार इसे सुरक्षित रख सकते हैं।" यह राष्ट्रवाद को विशिष्ट वर्ग से निकालकर जनता तक ले जाने की पहली खुली घोषणा थी।
◆ दिसंबर 1916 में कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन में बिहार के चंपारण के एक किसान राजकुमार शुक्ल गांधीजी से मिले और नील किसानों की पीड़ा सुनाकर बार-बार आग्रह किया कि वे स्वयं आकर देखें। गांधीजी ने अंततः हाँ कर दी — और यहीं से उनका भारतीय सत्याग्रह शुरू हुआ।
नीचे के चार्ट में तीनों आरंभिक सत्याग्रहों की समस्या, नेतृत्व, तरीक़ा और परिणाम एक साथ दिए गए हैं। इसके बाद हर सत्याग्रह को अलग-अलग विस्तार से पढ़िए।

📖 कहानी 1: एक किसान की ज़िद, जिसने गांधीजी को चंपारण बुलाया दिसंबर 1916, लखनऊ में कांग्रेस का अधिवेशन चल रहा था। भीड़ में बिहार के चंपारण से आया एक किसान राजकुमार शुक्ल गांधीजी को खोज रहा था। वह नील के बाग़ान-मालिकों (निलहों) के अत्याचार से परेशान हज़ारों किसानों की तरफ़ से उनके पास आया था। उस समय गांधीजी देश की राजनीति में नए थे और उनके पास अपने ही कई काम थे। उन्होंने अभी समय न होने की बात कही। शुक्ल ने हार नहीं मानी। वे गांधीजी के पीछे-पीछे कानपुर, फिर अहमदाबाद के आश्रम और कलकत्ता तक पहुँचे और हर जगह एक ही आग्रह दोहराते रहे कि आप एक बार चलकर अपनी आँखों से हमारी हालत देख लीजिए। आख़िर गांधीजी मान गए। अप्रैल 1917 में वे बिहार पहुँचे और 15 अप्रैल को चंपारण के मुख्यालय मोतिहारी आए। वहाँ वे गाँव-गाँव जाकर किसानों की बातें सुनने और उनके बयान लिखने लगे। इससे ज़िला प्रशासन घबरा गया। गांधीजी को आदेश मिला कि "शांति भंग होने का ख़तरा है, इसलिए तुरंत ज़िला छोड़ दीजिए।" गांधीजी ने साफ़ मना कर दिया। उन्होंने अदालत में लिखित बयान दिया कि वे आदेश नहीं मानेंगे और इसके लिए जो भी सज़ा होगी, उसे ख़ुशी से स्वीकार करेंगे, क्योंकि उनकी अंतरात्मा उन्हें पीड़ित किसानों की सेवा के लिए रुकने को कहती है। अदालत के बाहर हज़ारों किसान इकट्ठा हो गए। जिस आदमी को सरकार ने "शांति के लिए ख़तरा" कहा था, वह किसानों के बीच शांति से खड़ा था। सरकार के सामने मुश्किल आ गई। मुक़दमा वापस ले लिया गया और गांधीजी को जाँच करने की अनुमति मिल गई। इसके बाद सरकार ने जाँच समिति बनाई, जिसमें गांधीजी भी सदस्य थे। उसकी सिफ़ारिश पर 1918 में चंपारण कृषि अधिनियम बना और किसानों को लूटने वाली तिनकठिया प्रथा समाप्त हो गई। 🧭 इस कहानी से कौन-सी अवधारणा साफ़ हुई ✔ सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा — अन्यायपूर्ण आदेश को शांति से न मानना और उसकी सज़ा हँसकर स्वीकार करना, यही भारत में गांधीजी का पहला प्रयोग था। ✔ तिनकठिया प्रथा — हर बीघा (20 कट्ठा) में से 3 कट्ठा ज़मीन पर किसान को ज़बरदस्ती नील उगाना पड़ता था, जिसका दाम निलहे तय करते थे। ✔ पहले तथ्य, फिर बदलाव — हज़ारों किसानों के बयान दर्ज करके सरकार को क़ानून बदलने पर मजबूर किया गया। इसी तरीक़े ने गांधीजी को किसानों का जननेता बनाया। 📝 परीक्षा के लिए: चंपारण सत्याग्रह (1917, बिहार) = भारत में गांधीजी का पहला सत्याग्रह और पहली सविनय अवज्ञा; राजकुमार शुक्ल का आग्रह; तिनकठिया प्रथा; चंपारण कृषि अधिनियम 1918; साथी: राजेंद्र प्रसाद, ब्रजकिशोर प्रसाद, मज़हरुल हक़, कृपलानी। |
🔍 आसान परिभाषा: तिनकठिया प्रथा |
📘 परिभाषा: बिहार के चंपारण में प्रचलित वह व्यवस्था, जिसमें किसान को अपनी हर बीघा (20 कट्ठा) ज़मीन में से 3 कट्ठा — यानी 3/20 भाग — पर अनिवार्य रूप से नील की खेती करके उसे यूरोपीय बाग़ान मालिक (निलहे) को उनकी तय कीमत पर बेचना पड़ता था। |
💡 आसान भाषा में: "तीन कट्ठा" से ही इसका नाम "तिनकठिया" पड़ा। किसान चाहे या न चाहे, उसकी सबसे अच्छी ज़मीन का एक हिस्सा नील के लिए बँधा रहता था और कीमत भी मालिक तय करता था। 🏠 उदाहरण: किसी किसान के पास 1 बीघा ज़मीन है, तो उसे 3 कट्ठा पर नील उगाना ही होगा, भले ही उस मौसम में धान या गेहूँ उगाना उसके परिवार के पेट के लिए ज़रूरी हो। |
◆ पृष्ठभूमि — समस्या — उन्नीसवीं सदी से चंपारण में यूरोपीय बाग़ान मालिक (जिन्हें "निलहे" कहा जाता था) तिनकठिया प्रथा से किसानों का शोषण कर रहे थे। बीसवीं सदी के आरंभ में जर्मनी में सस्ता कृत्रिम (रासायनिक) नील बनने लगा, जिससे प्राकृतिक नील की माँग घट गई। तब निलहों ने किसानों को नील की खेती से "मुक्त" करने के बदले दो तरह से वसूली शुरू की — "शरहबेशी" यानी लगान में भारी वृद्धि, और "तावान" यानी एकमुश्त हर्जाना। मना करने पर किसानों को पीटा जाता और उनकी फ़सलें नष्ट की जाती थीं।
◆ निमंत्रण और आगमन — राजकुमार शुक्ल के आग्रह पर गांधीजी अप्रैल 1917 में चंपारण पहुँचे और 15 अप्रैल 1917 को ज़िला मुख्यालय मोतिहारी आए। वे गाँव-गाँव जाकर किसानों की शिकायतें सुनने लगे।
◆ तरीक़ा — सविनय अवज्ञा — ज़िला अधिकारी ने गांधीजी को "शांति भंग की आशंका" बताकर तुरंत ज़िला छोड़ने का आदेश दिया। गांधीजी ने अदालत में लिखित बयान दिया कि वे आदेश का पालन नहीं करेंगे, क्योंकि उनकी अंतरात्मा उन्हें पीड़ित किसानों की सेवा करने को कहती है, और वे इसका दंड भुगतने को तैयार हैं। अदालत के बाहर हज़ारों किसान जमा थे। सरकार घबरा गई और उसने मुक़दमा वापस ले लिया — यह भारत में गांधीजी की पहली सविनय अवज्ञा थी।
◆ साथी — गांधीजी के साथ बिहार के कई वकील और युवा जुड़े — राजेंद्र प्रसाद (आगे चलकर स्वतंत्र भारत के पहले राष्ट्रपति), ब्रजकिशोर प्रसाद, मज़हरुल हक़, अनुग्रह नारायण सिन्हा, और साथ ही जे. बी. कृपलानी, महादेव देसाई (जो आगे गांधीजी के निजी सचिव बने) और नरहरि पारिख। इन्होंने गाँवों में घूमकर हज़ारों किसानों के लिखित बयान दर्ज किए, ताकि हर शिकायत का ठोस प्रमाण रहे। (ध्यान दें — जयप्रकाश नारायण इस आंदोलन से नहीं जुड़े थे।)
◆ रचनात्मक कार्य — आंदोलन के साथ-साथ गांधीजी और उनके साथियों ने गाँवों में विद्यालय खोले, सफ़ाई और स्वास्थ्य का काम किया, और पर्दा प्रथा व अस्पृश्यता के विरुद्ध समझाया। कस्तूरबा ने भी गाँव की स्त्रियों के बीच काम किया।
◆ परिणाम — सरकार ने चंपारण कृषि जाँच समिति बनाई, जिसके अध्यक्ष एफ़. जी. स्लाई थे और गांधीजी को सदस्य बनाया गया। समिति की सिफ़ारिश पर चंपारण कृषि अधिनियम (1918) बना — तिनकठिया प्रथा समाप्त हुई और निलहों ने अवैध रूप से वसूली गई रक़म का 25% किसानों को लौटाया। गांधीजी से पूछा गया कि केवल 25% पर क्यों माने, तो उन्होंने कहा कि असली जीत यह है कि निलहों की प्रतिष्ठा और भय टूट गया — कुछ ही वर्षों में अधिकांश निलहे चंपारण छोड़ गए।
◆ महत्त्व — यह भारत में पहला सफल सत्याग्रह था। इससे गांधीजी को किसानों का अटूट विश्वास और बिहार में समर्पित साथियों की टोली मिली। लोगों ने उन्हें "बापू" और "महात्मा" कहना शुरू किया।
◆ पृष्ठभूमि — समस्या — 1917 में अहमदाबाद में प्लेग फैला तो मज़दूर शहर छोड़कर भागने लगे। उन्हें रोकने के लिए मिल-मालिकों ने वेतन पर भारी "प्लेग बोनस" देना शुरू किया। प्लेग ख़त्म होने पर मालिक यह बोनस बंद करना चाहते थे, पर युद्ध के कारण कीमतें लगभग दोगुनी हो चुकी थीं। इसलिए मज़दूरों ने 50% वेतन वृद्धि माँगी, जबकि मालिक केवल 20% देने को तैयार थे। दोनों पक्ष आमने-सामने आ गए।
◆ नेतृत्व — मज़दूरों का पक्ष लेने वालों में अनसूया साराभाई प्रमुख थीं, जो स्वयं प्रमुख मिल-मालिक अंबालाल साराभाई की बहन थीं। उन्होंने गांधीजी से हस्तक्षेप का आग्रह किया। इस तरह एक ओर भाई और दूसरी ओर बहन — और बीच में गांधीजी, जिनके दोनों से अच्छे संबंध थे।
◆ तरीक़ा — गांधीजी ने तथ्यों का अध्ययन करके 35% वृद्धि को उचित माँग बताया और मज़दूरों से शांतिपूर्ण हड़ताल करवाई। रोज़ साबरमती के तट पर सभा होती और मज़दूर शपथ दोहराते। पर कुछ सप्ताह बाद भूख और ग़रीबी से मज़दूरों का मनोबल टूटने लगा और कुछ काम पर लौटने लगे। तब गांधीजी ने स्वयं आमरण अनशन शुरू कर दिया — भारत में उनकी पहली भूख हड़ताल। यह उपवास मालिकों के विरुद्ध नहीं, बल्कि मज़दूरों को अपनी शपथ पर टिके रहने की प्रेरणा देने के लिए था।
◆ परिणाम — तीन दिन के अनशन के बाद मालिक मामला पंचाट (मध्यस्थ) को सौंपने पर राज़ी हुए और पंचाट ने 35% वृद्धि का निर्णय दिया। आलोचकों ने कहा कि गांधीजी के उपवास से मालिकों पर नैतिक दबाव पड़ा, इसलिए यह पूरी तरह स्वैच्छिक निर्णय नहीं था — गांधीजी ने भी यह माना।
◆ विरासत — आगे चलकर 1920 में अहमदाबाद टेक्सटाइल लेबर एसोसिएशन ("मजूर महाजन") बना — यह मज़दूरों का ऐसा संगठन था जो हड़ताल से पहले बातचीत और पंचाट पर ज़ोर देता था। इससे गांधीजी को शहरी मज़दूरों में भी आधार मिला।
◆ पृष्ठभूमि — समस्या — 1917–18 में गुजरात के खेड़ा ज़िले में अत्यधिक वर्षा से फ़सल नष्ट हो गई; साथ में प्लेग और बढ़ती कीमतों की मार थी। राजस्व नियमों के अनुसार यदि उपज सामान्य की एक-चौथाई (25%) से कम हो, तो किसान को उस वर्ष लगान में पूरी छूट का अधिकार था। किसानों का कहना था कि उपज एक-चौथाई से भी कम है, पर सरकार ने यह मानने से इनकार किया और लगान माफ़ नहीं किया।
◆ नेतृत्व — गांधीजी के साथ युवा वकील वल्लभभाई पटेल ने अपनी चलती वकालत छोड़कर गाँव-गाँव घूमकर किसानों को संगठित किया। उनके साथ इंदुलाल याज्ञिक और मोहनलाल पंड्या प्रमुख थे। गांधीजी और पटेल ने आंदोलन को जान-बूझकर खेड़ा के किसानों तक सीमित रखा, ताकि उसका स्थानीय चरित्र बना रहे।
◆ तरीक़ा — 22 मार्च 1918 से किसानों ने लगान न देने की शपथ ली — यह गांधीजी का पहला "कर-न-दो" सत्याग्रह और भारत में पहला असहयोग था। सरकार ने किसानों के पशु, बर्तन और ज़मीनें ज़ब्त कीं, पर किसान डटे रहे; ज़ब्त संपत्ति ख़रीदने वालों का गाँव वालों ने सामाजिक बहिष्कार किया। मोहनलाल पंड्या ने ज़ब्त खेत से प्याज़ की फ़सल काटकर सविनय अवज्ञा की और जेल गए — लोगों ने उन्हें प्यार से "डुंगली चोर" (प्याज़ चोर) कहा।
◆ परिणाम — अंततः सरकार ने गुप्त निर्देश जारी किया कि लगान केवल उन्हीं किसानों से वसूला जाए जो देने में समर्थ हैं, और ग़रीब किसानों का लगान स्थगित कर दिया जाए। माँग का मूल सिद्धांत मान लिए जाने पर गांधीजी ने जून 1918 में आंदोलन समाप्त कर दिया। पूर्ण विजय न होने से कुछ लोग असंतुष्ट भी रहे।
◆ महत्त्व — इस सत्याग्रह ने गुजरात के पाटीदार किसानों में राजनीतिक चेतना जगाई और वल्लभभाई पटेल को एक बड़े किसान नेता के रूप में उभारा — यही पटेल दस वर्ष बाद बारडोली के "सरदार" बने।
🧠 "पहले" याद रखें — 1917–18 चंपारण (1917) — भारत में पहली सविनय अवज्ञा और पहला सफल सत्याग्रह → अहमदाबाद (1918) — पहली भूख हड़ताल → खेड़ा (1918) — पहला असहयोग / कर-बंदी। चंपारण और खेड़ा किसानों के आंदोलन थे, जबकि अहमदाबाद औद्योगिक मज़दूरों का। इन तीनों से गांधीजी को किसानों-मज़दूरों का विश्वास, पटेल-राजेंद्र प्रसाद जैसे साथी और सत्याग्रह के तरीक़ों की भारतीय परिस्थितियों में परीक्षा — तीनों मिले। |
पहलू | चंपारण (1917) | अहमदाबाद (1918) | खेड़ा (1918) |
किसके लिए | यह बिहार के नील किसानों का संघर्ष था। | यह कपड़ा मिल मज़दूरों का संघर्ष था। | यह फ़सल-नाश से पीड़ित पाटीदार किसानों का संघर्ष था। |
मुद्दा | तिनकठिया, शरहबेशी और तावान से मुक्ति माँगी गई। | प्लेग बोनस बंद होने पर 35% वेतन वृद्धि माँगी गई। | फ़सल नष्ट होने पर लगान माफ़ी माँगी गई। |
प्रमुख साथी | राजेंद्र प्रसाद, ब्रजकिशोर प्रसाद और कृपलानी साथ थे। | अनसूया साराभाई मज़दूरों के पक्ष में थीं। | वल्लभभाई पटेल और इंदुलाल याज्ञिक साथ थे। |
तरीक़ा | ज़िला छोड़ने का आदेश तोड़ा गया — पहली सविनय अवज्ञा। | हड़ताल के साथ गांधीजी ने पहला अनशन किया। | लगान न देने की शपथ ली गई — पहला असहयोग। |
परिणाम | तिनकठिया समाप्त हुई और 25% रक़म लौटी। | पंचाट ने 35% वृद्धि दी। | ग़रीब किसानों का लगान स्थगित हुआ। |
प्रथम विश्वयुद्ध में भारत ने ब्रिटेन का साथ दिया — दस लाख से अधिक भारतीय सैनिक और मज़दूर विदेशों में लड़ने गए और भारत से भारी धन-सामग्री भेजी गई। पर इस युद्ध ने भारतीय समाज के हर वर्ग पर गहरा असर डाला और असंतोष का वह ईंधन तैयार किया, जिसे 1919–1922 में गांधीजी ने जन-आंदोलन में बदल दिया।
◆ आर्थिक बोझ — रक्षा व्यय बढ़ा, जिसे पूरा करने के लिए युद्ध-ऋण लिए गए, आयकर बढ़ाया गया और व्यापारिक लाभ पर नए कर लगे; सीमा शुल्क भी बढ़ा। 1913 से 1918 के बीच कीमतें लगभग दोगुनी हो गईं, जिससे आम आदमी की कमर टूट गई।
◆ ज़बरन भर्ती — सेना के लिए गाँवों से, विशेषकर पंजाब से, ज़बरदस्ती सैनिक भर्ती किए गए। इससे पंजाब में भारी असंतोष था, जो आगे जलियाँवाला की पृष्ठभूमि बना।
◆ अकाल और महामारी — 1918–19 में देश के कई भागों में फ़सलें नष्ट हुईं और इसी समय इन्फ़्लुएंज़ा महामारी फैली, जिसमें लाखों लोग मारे गए। सरकार की राहत बहुत अपर्याप्त थी।
◆ उद्योगपति और सैनिक — युद्धकाल में विदेशी माल कम आने से भारतीय उद्योगपतियों ने भारी मुनाफ़ा कमाया; वे अब सरकार से संरक्षण और अधिक अवसर चाहते थे। विदेशों से लौटे सैनिकों ने साम्राज्यवाद की असलियत और दुनिया में चल रहे परिवर्तनों को देखा था।
◆ अंतरराष्ट्रीय प्रभाव — रूसी क्रांति (1917) ने दिखाया कि आम मज़दूर-किसान भी एक विशाल साम्राज्य को उखाड़ सकते हैं; अमेरिकी राष्ट्रपति विल्सन के "आत्म-निर्णय" के सिद्धांत ने भी उपनिवेशों में आशा जगाई। तुर्की की पराजय से भारतीय मुसलमान आहत थे (खंड 6)।
◆ गांधीजी का रुख़ — इस समय तक गांधीजी ब्रिटिश न्याय में विश्वास रखते थे। 1918 में वायसराय के युद्ध सम्मेलन के बाद उन्होंने खेड़ा में सेना के लिए भर्ती अभियान भी चलाया, इस आशा में कि युद्ध में सहयोग के बदले भारत को स्वशासन मिलेगा। इसीलिए कुछ लोगों ने उन्हें व्यंग्य में "भर्ती करने वाला सार्जेंट" कहा।
युद्ध-सहयोग के बदले भारतीयों को स्वशासन की आशा थी, पर उन्हें मिला मॉन्टेग्यू-चेम्सफ़ोर्ड सुधार (1919) का सीमित "द्वैध शासन" (विस्तार अध्याय 3) और साथ में दमनकारी रॉलेट एक्ट — यानी एक हाथ से थोड़ा-सा देना और दूसरे हाथ से कड़ा दमन।
🔍 आसान परिभाषा: द्वैध शासन |
📘 परिभाषा: भारत शासन अधिनियम 1919 द्वारा प्रांतों में लागू व्यवस्था, जिसमें प्रांतीय विषयों को दो भागों में बाँटा गया — "हस्तांतरित विषय" (शिक्षा, स्वास्थ्य, स्थानीय स्वशासन, कृषि आदि), जो विधानमंडल के प्रति उत्तरदायी भारतीय मंत्रियों को दिए गए; और "आरक्षित विषय" (वित्त, पुलिस, न्याय, भू-राजस्व, क़ानून-व्यवस्था), जो गवर्नर और उसकी कार्यकारी परिषद के पास रहे। |
💡 आसान भाषा में: यानी एक ही प्रांत में दो सरकारें — ज़रूरी और ताक़तवर विभाग अंग्रेज़ गवर्नर के पास, और कम महत्त्व के विभाग भारतीय मंत्रियों के पास, जिनके पास पैसा भी गवर्नर की मर्ज़ी से आता था। 🏠 उदाहरण: एक भारतीय शिक्षा मंत्री नए स्कूल खोलना चाहे, पर वित्त विभाग गवर्नर के पास है और वह पैसा न दे — तो मंत्री कुछ नहीं कर सकता, जबकि जनता दोष मंत्री को देगी। |
◆ पृष्ठभूमि — युद्ध के दौरान क्रांतिकारी गतिविधियों को कुचलने के लिए सरकार के पास भारत रक्षा अधिनियम (1915) की असाधारण शक्तियाँ थीं, जो युद्ध ख़त्म होते ही समाप्त हो जातीं। इन्हें स्थायी बनाने के लिए दिसंबर 1917 में ब्रिटिश न्यायाधीश सिडनी रॉलेट की अध्यक्षता में राजद्रोह समिति बनाई गई, जिसने 1918 में अपनी रिपोर्ट दी।
◆ क़ानून — इसी रिपोर्ट के आधार पर "अराजक और क्रांतिकारी अपराध अधिनियम" — जिसे रॉलेट एक्ट कहा गया — केंद्रीय विधान परिषद के सभी निर्वाचित भारतीय सदस्यों के विरोध के बावजूद 18 मार्च 1919 को पारित किया गया। उस समय वायसराय लॉर्ड चेम्सफ़ोर्ड थे।
◆ प्रावधान — इसके अनुसार सरकार किसी भी व्यक्ति को केवल संदेह के आधार पर बिना मुक़दमा चलाए दो वर्ष तक जेल में रख सकती थी; पुलिस बिना वारंट तलाशी और गिरफ़्तारी कर सकती थी; बंदी प्रत्यक्षीकरण का अधिकार निलंबित कर दिया गया; मुक़दमे विशेष अदालतों में बिना जूरी के और गुप्त रूप से चलते और उनके फ़ैसले के विरुद्ध अपील नहीं हो सकती थी। इसीलिए जनता ने इसे "न वकील, न दलील, न अपील" का क़ानून और "काला क़ानून" कहा।
🔍 आसान परिभाषा: बंदी प्रत्यक्षीकरण |
📘 परिभाषा: एक न्यायिक आदेश (रिट), जिसके द्वारा अदालत हिरासत में रखे गए व्यक्ति को अपने सामने "प्रस्तुत" करने का आदेश देती है और जाँचती है कि उसे क़ानूनी आधार पर बंदी बनाया गया है या नहीं; आधार न होने पर उसे तुरंत रिहा किया जाता है। |
💡 आसान भाषा में: यह नागरिक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सबसे बड़ी ढाल है — सरकार किसी को मनमाने ढंग से जेल में बंद नहीं रख सकती। 🏠 उदाहरण: रॉलेट एक्ट ने यही ढाल छीन ली थी। आज भारत के संविधान में अनुच्छेद 32 और 226 के अंतर्गत अदालतें यह रिट जारी कर सकती हैं। |
◆ विरोध — विधान परिषद के भारतीय सदस्यों ने इसका तीव्र विरोध किया। मुहम्मद अली जिन्ना, मदन मोहन मालवीय और मज़हरुल हक़ ने विरोध में परिषद से त्यागपत्र दे दिया। जिन्ना ने कहा — "जो सरकार शांति काल में ऐसा क़ानून बनाए, वह सभ्य सरकार कहलाने का अधिकार खो देती है।"
◆ तैयारी — गांधीजी ने कहा कि जब संवैधानिक विरोध बेकार हो गया है, तो अब सत्याग्रह ही रास्ता है। 24 फ़रवरी 1919 को बम्बई में "सत्याग्रह सभा" बनी, जिसके सदस्यों ने इस क़ानून को तोड़ने की शपथ ली। होमरूल लीग के युवा सदस्य और ख़िलाफ़त नेता भी साथ आए, जिससे पहली बार सत्याग्रह का संगठन पूरे देश में फैला।
◆ हड़ताल — 6 अप्रैल 1919 को देशव्यापी हड़ताल, उपवास और प्रार्थना का आह्वान किया गया — इसे "अपमान और याचना दिवस" भी कहा गया। पहले इसकी तारीख़ 30 मार्च रखी गई थी, पर बाद में बदलकर 6 अप्रैल की गई; सूचना देर से पहुँचने के कारण दिल्ली में हड़ताल 30 मार्च को ही स्वामी श्रद्धानंद के नेतृत्व में हो गई, जहाँ पुलिस ने गोली चलाई। बम्बई, अहमदाबाद, लाहौर, अमृतसर आदि शहरों में दुकानें बंद रहीं और जुलूस निकले।
◆ हिंसा और गिरफ़्तारी — गांधीजी पंजाब और दिल्ली जाना चाहते थे, पर 9 अप्रैल को उन्हें पलवल (आज हरियाणा) के पास रोककर वापस बम्बई भेज दिया गया। उनकी गिरफ़्तारी की ख़बर फैलते ही अहमदाबाद, वीरमगाम और अमृतसर में भीड़ हिंसक हो गई — सरकारी भवन जलाए गए, तार-लाइनें काटी गईं और कुछ अंग्रेज़ मारे गए। सरकार ने कड़ा दमन किया।
◆ वापसी — "हिमालय जैसी भूल" — हिंसा देखकर गांधीजी बहुत दुखी हुए और 18 अप्रैल 1919 को उन्होंने सत्याग्रह वापस ले लिया। उन्होंने कहा कि जनता को अहिंसा का प्रशिक्षण दिए बिना सविनय अवज्ञा छेड़ना उनकी "हिमालय जैसी भूल" थी। इसके बाद उन्होंने प्रशिक्षित स्वयंसेवकों के दल बनाने पर ज़ोर दिया।
◆ महत्त्व — रॉलेट सत्याग्रह पहला अखिल भारतीय जन-संघर्ष था, भले ही वह अधिकतर शहरों तक सीमित रहा। इसी से गांधीजी एक प्रांतीय नेता से राष्ट्रीय नेता बने, और देश ने देखा कि एक व्यक्ति के आह्वान पर पूरे भारत में एक ही दिन दुकानें बंद हो सकती हैं। इसकी कमज़ोरी यह थी कि हिंसा पर नियंत्रण नहीं रहा।
◆ पंजाब का असंतोष — युद्धकाल में सबसे अधिक ज़बरन भर्ती और युद्ध-ऋण की वसूली पंजाब में हुई थी; ग़दर आंदोलन के बाद वहाँ का प्रशासन बहुत कठोर था। प्रांत का लेफ़्टिनेंट गवर्नर माइकल ओ'डायर अपनी सख़्ती के लिए कुख्यात था और राजनीतिक विरोध को बलपूर्वक कुचलने में विश्वास रखता था।
◆ अमृतसर में गिरफ़्तारियाँ — रॉलेट सत्याग्रह के दौरान अमृतसर में हिंदू-मुस्लिम एकता का अद्भुत प्रदर्शन हुआ था, जिसमें रामनवमी के जुलूस में दोनों समुदाय साथ चले। 10 अप्रैल 1919 को अमृतसर के दो लोकप्रिय नेताओं — डॉ. सैफ़ुद्दीन किचलू और डॉ. सत्यपाल — को गिरफ़्तार कर गुप्त रूप से शहर से बाहर भेज दिया गया।
◆ हिंसा — इसके विरोध में निकले जुलूस पर पुलिस ने गोली चलाई, जिसमें कई लोग मारे गए। क्रुद्ध भीड़ ने बैंक, टाउन हॉल और रेलवे गोदाम जला दिए और कुछ यूरोपीय मारे गए; एक अंग्रेज़ मिशनरी महिला मार्सेला शेरवुड पर एक गली में हमला हुआ।
◆ डायर का आगमन — 11 अप्रैल को अमृतसर का नियंत्रण ब्रिगेडियर जनरल रेजिनाल्ड डायर को सौंप दिया गया। उसने सभाओं और जुलूसों पर रोक की घोषणा की, पर यह घोषणा शहर के कुछ ही भागों में ढोल बजाकर की गई और अधिकांश लोगों तक — विशेषकर बाहर के गाँवों से आए लोगों तक — पहुँची ही नहीं।
◆ सभा — 13 अप्रैल को बैसाखी का पर्व था। अमृतसर के जलियाँवाला बाग़ में — जो चारों ओर से ऊँचे मकानों से घिरा एक खुला मैदान था और जिसमें आने-जाने का एक संकरा मुख्य रास्ता था — गिरफ़्तारियों और रॉलेट एक्ट के विरोध में सभा रखी गई। इसमें लगभग 15,000–20,000 लोग थे; इनमें बहुत से आसपास के गाँवों के किसान थे जो बैसाखी मेले में आए थे और उन्हें प्रतिबंध की जानकारी ही नहीं थी। सभा पूरी तरह शांतिपूर्ण और निहत्थी थी।
◆ गोलीबारी — शाम लगभग साढ़े चार–पाँच बजे डायर लगभग 90 सैनिकों (जिनमें 50 राइफ़लधारी थे) के साथ पहुँचा, मुख्य रास्ते को घेरा और बिना किसी चेतावनी के गोली चलाने का आदेश दे दिया। लगभग 10 मिनट तक 1,650 राउंड गोलियाँ चलीं — गोलियाँ तभी रुकीं जब गोला-बारूद लगभग ख़त्म हो गया। सैनिकों ने जान-बूझकर उन जगहों पर गोलियाँ चलाईं जहाँ भीड़ सबसे घनी थी। जान बचाने के लिए बहुत से लोग बाग़ के कुएँ में कूद गए। डायर घायलों को वहीं तड़पता छोड़कर चला गया और रात में कर्फ़्यू लगा दिया, जिससे परिवार वाले घायलों तक पहुँच भी नहीं सके।
◆ मृतकों की संख्या — सरकारी आँकड़े के अनुसार 379 लोग मारे गए और लगभग 1,200 घायल हुए। कांग्रेस की जाँच समिति के अनुमान के अनुसार मृतकों की संख्या 1,000 से अधिक थी।
◆ डायर का तर्क — बाद में हंटर कमेटी के सामने डायर ने बिना पछतावे के कहा कि उसका उद्देश्य भीड़ को तितर-बितर करना नहीं, बल्कि पूरे पंजाब पर "नैतिक प्रभाव" डालना और "सबक़ सिखाना" था; उसने यह भी कहा कि यदि रास्ता चौड़ा होता तो वह बख़्तरबंद गाड़ियों से मशीनगन भी चलवाता।
◆ 15 अप्रैल 1919 से अमृतसर, लाहौर, गुजरांवाला आदि ज़िलों में मार्शल लॉ (सैनिक शासन) लगा दिया गया। अमृतसर की जिस गली में मार्सेला शेरवुड पर हमला हुआ था, वहाँ से गुज़रने वाले हर भारतीय को पेट के बल रेंगकर चलने का आदेश दिया गया — इसे "रेंगने का आदेश" कहा गया।
◆ लोगों को सरेआम कोड़े मारे गए, अंग्रेज़ अधिकारियों को सलाम न करने पर दंड दिया गया, विद्यार्थियों को दिन में कई बार हाज़िरी लगाने पर मजबूर किया गया, और गुजरांवाला पर हवाई जहाज़ से बम गिराए गए। पूरे पंजाब की ख़बरें सेंसर कर दी गईं, इसलिए देश के बाक़ी हिस्सों को इन अत्याचारों की पूरी जानकारी महीनों बाद मिली।
◆ अधिकारियों को भविष्य की किसी क़ानूनी कार्रवाई से बचाने के लिए सरकार ने क्षतिपूर्ति अधिनियम (1919) भी पारित किया — इससे भारतीयों का आक्रोश और बढ़ा।
◆ गठन — देश-विदेश में बढ़ते रोष के कारण भारत सचिव मॉन्टेग्यू के कहने पर सरकार ने अक्टूबर 1919 में पंजाब और बम्बई के उपद्रवों की जाँच के लिए "उपद्रव जाँच समिति" बनाई, जो अपने अध्यक्ष लॉर्ड विलियम हंटर (स्कॉटलैंड के पूर्व सॉलिसिटर जनरल) के नाम पर हंटर कमेटी कहलाई।
◆ सदस्य — इसमें अंग्रेज़ सदस्यों के अलावा तीन भारतीय सदस्य थे — चिमनलाल सीतलवाड़ (बम्बई के वकील), पंडित जगत नारायण (संयुक्त प्रांत के वकील) और सुल्तान अहमद ख़ाँ (ग्वालियर रियासत के वकील)।
◆ रिपोर्ट (1920) — समिति में अंग्रेज़ और भारतीय सदस्य एकमत नहीं हो सके। अंग्रेज़ सदस्यों की बहुमत रिपोर्ट ने डायर के कृत्य को केवल "निर्णय की भूल" और "कर्तव्य की ग़लत धारणा" माना, जबकि तीनों भारतीय सदस्यों ने अलग अल्पमत रिपोर्ट लिखकर डायर के कृत्य और मार्शल लॉ के अत्याचारों की कड़ी निंदा की।
◆ परिणाम — डायर को ब्रिगेड की कमान से हटाकर इंग्लैंड वापस भेज दिया गया और वह सेना से सेवानिवृत्त हो गया, पर उसे कोई दंड नहीं मिला और न ही उस पर मुक़दमा चला। भारतीयों ने इसे न्याय नहीं, लीपापोती माना — और इसी ने गांधीजी का ब्रिटिश न्याय पर से विश्वास तोड़ दिया।
◆ कांग्रेस की अपनी जाँच — कांग्रेस ने सरकारी जाँच पर भरोसा न करके अपनी जाँच समिति बनाई, जिसमें मोतीलाल नेहरू, गांधीजी, चित्तरंजन दास, अब्बास तैयबजी और एम. आर. जयकर थे। इसकी रिपोर्ट का प्रारूप गांधीजी ने लिखा, जिसमें सैकड़ों गवाहों के बयानों के आधार पर अत्याचारों का पूरा ब्यौरा दिया गया।
◆ ब्रिटेन की प्रतिक्रिया — ब्रिटिश संसद के ऊपरी सदन हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स ने डायर का समर्थन किया; ब्रिटिश अख़बार "मॉर्निंग पोस्ट" ने उसके लिए लगभग 26,000 पाउंड का कोष जुटाया और उसे "ब्रिटिश साम्राज्य का रक्षक" कहा। दूसरी ओर युद्ध मंत्री विंस्टन चर्चिल ने हाउस ऑफ़ कॉमन्स में इसे "राक्षसी घटना" कहा — जो ब्रिटिश इतिहास में अभूतपूर्व थी।
🇮🇳 भारतीय प्रतिक्रिया ✔ टैगोर ने "नाइटहुड" लौटाई (मई 1919) ✔ सी. शंकरन नायर का वायसराय की परिषद से त्यागपत्र ✔ गांधीजी ने कैसर-ए-हिंद पदक लौटाया (1920) ✔ अमृतसर कांग्रेस अधिवेशन (दिसंबर 1919) — तीव्र निंदा ✔ पंजाब के अत्याचार असहयोग का प्रमुख मुद्दा बने | ⏳ आगे की कड़ियाँ ✔ युवा भगत सिंह बाग़ की मिट्टी घर ले गए ✔ ऊधम सिंह ने 13 मार्च 1940 को लंदन में ओ'डायर को मारा ✔ जलियाँवाला बाग़ आज राष्ट्रीय स्मारक ✔ सी. एफ़. एंड्रूज़ — "जानबूझकर की गई क्रूर हत्या" ✔ गांधीजी सहयोग से असहयोग की ओर मुड़े |
◆ रवींद्रनाथ टैगोर — नोबेल पुरस्कार (1913) विजेता कवि टैगोर ने मई 1919 के अंत में वायसराय चेम्सफ़ोर्ड को पत्र लिखकर अंग्रेज़ों की दी हुई "नाइटहुड" (सर की उपाधि) लौटा दी। उन्होंने लिखा कि अपमान के ऐसे समय में सम्मान के ये तमग़े शर्म का कारण बन गए हैं और वे अपने उन देशवासियों के साथ खड़े होना चाहते हैं, जिन्हें "मनुष्य समझने लायक भी नहीं" माना गया।
◆ सी. शंकरन नायर — मद्रास के प्रसिद्ध वकील और 1897 में कांग्रेस के अध्यक्ष रहे शंकरन नायर उस समय वायसराय की कार्यकारी परिषद के एकमात्र भारतीय सदस्य थे। पंजाब के अत्याचारों के विरोध में उन्होंने त्यागपत्र दे दिया।
◆ गांधीजी — हंटर रिपोर्ट की लीपापोती और डायर के सम्मान को देखकर गांधीजी ने कहा कि "यह शैतानी शासन" है, जिसके साथ सहयोग पाप है। 1 अगस्त 1920 को उन्होंने दक्षिण अफ़्रीका में मिले कैसर-ए-हिंद पदक सहित सभी पदक लौटा दिए और सहयोग से असहयोग की ओर मुड़ गए।
◆ अमृतसर कांग्रेस (दिसंबर 1919) — मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में अमृतसर में ही अधिवेशन हुआ, जिसमें पंजाब के अत्याचारों की तीव्र निंदा की गई और डायर को हटाने तथा ओ'डायर को वापस बुलाने की माँग की गई। पंजाब का अन्याय आगे चलकर असहयोग आंदोलन के तीन मुद्दों में से एक बना।
◆ भगत सिंह और ऊधम सिंह — बारह वर्ष के भगत सिंह घटना के अगले दिन बाग़ गए और वहाँ की ख़ून से सनी मिट्टी एक शीशी में भरकर घर ले आए — इसी घटना ने उनके क्रांतिकारी जीवन की नींव रखी (अध्याय 11)। ऊधम सिंह ने 13 मार्च 1940 को लंदन के कैक्सटन हॉल में पंजाब के तत्कालीन लेफ़्टिनेंट गवर्नर माइकल ओ'डायर को गोली मार दी; जुलाई 1940 में उन्हें फाँसी दी गई। (ध्यान दें — जनरल डायर की मृत्यु 1927 में बीमारी से हो चुकी थी।)
◆ स्मारक और एंड्रूज़ — स्वतंत्रता के बाद 1951 में जलियाँवाला बाग़ स्मारक न्यास बना और आज यह राष्ट्रीय स्मारक है। ग़रीबों की सेवा के कारण "दीनबंधु" कहलाने वाले अंग्रेज़ पादरी सी. एफ़. एंड्रूज़ ने इसे "जानबूझकर की गई क्रूर हत्या" कहा।
📌 याद रखें रॉलेट एक्ट (18 मार्च) → हड़ताल (6 अप्रैल) → किचलू-सत्यपाल की गिरफ़्तारी (10 अप्रैल) → जलियाँवाला (13 अप्रैल) → मार्शल लॉ (15 अप्रैल) → सत्याग्रह वापस (18 अप्रैल) — सब 1919 में। हंटर कमेटी के तीन भारतीय — सीतलवाड़, जगत नारायण, सुल्तान अहमद ख़ाँ। मृतक — सरकारी 379, कांग्रेस अनुमान 1,000+। |
🔍 आसान परिभाषा: ख़लीफ़ा और ख़िलाफ़त |
📘 परिभाषा: "ख़लीफ़ा" का अर्थ है पैग़ंबर मुहम्मद का उत्तराधिकारी, जिसे सुन्नी मुसलमान पूरे इस्लामी जगत का धार्मिक-राजनीतिक प्रमुख मानते थे; ख़लीफ़ा का पद और उसकी संस्था "ख़िलाफ़त" कहलाती थी। सोलहवीं सदी से तुर्की (ऑटोमन साम्राज्य) का सुल्तान ही ख़लीफ़ा माना जाता था। |
💡 आसान भाषा में: जैसे किसी धर्म के सबसे बड़े धर्मगुरु का पद होता है — भारतीय मुसलमानों के लिए तुर्की का सुल्तान वैसा ही आस्था का केंद्र था, और मक्का-मदीना जैसे पवित्र स्थल उसकी संरक्षा में थे। 🏠 उदाहरण: इसलिए जब युद्ध के बाद अंग्रेज़ों ने तुर्की को तोड़ा और ख़लीफ़ा की शक्ति छीनी, तो भारतीय मुसलमानों ने इसे अपने धर्म पर आघात माना — यही ख़िलाफ़त आंदोलन का कारण बना। |
प्रथम विश्वयुद्ध में तुर्की जर्मनी के साथ ब्रिटेन के विरुद्ध लड़ा था। युद्ध के दौरान भारतीय मुसलमानों का समर्थन पाने के लिए ब्रिटिश प्रधानमंत्री लॉयड जॉर्ज ने आश्वासन दिया था कि युद्ध के बाद तुर्की और ख़लीफ़ा के साथ उदार व्यवहार होगा। पर युद्ध के बाद ऑटोमन साम्राज्य का विघटन कर दिया गया — अरब क्षेत्र, सीरिया, इराक़, फ़िलिस्तीन आदि ब्रिटेन और फ़्रांस के नियंत्रण में चले गए। इसे औपचारिक रूप सेव्र की संधि ने दिया, जिसकी कठोर शर्तें मई 1920 में सार्वजनिक हुईं और जिस पर 10 अगस्त 1920 को हस्ताक्षर हुए। भारतीय मुसलमानों ने इसे विश्वासघात माना। 1916 के लखनऊ समझौते से कांग्रेस-लीग निकटता पहले ही बन चुकी थी, इसलिए गांधीजी को इस मुद्दे में हिंदू-मुस्लिम एकता का बड़ा अवसर दिखा।
◆ अली बंधु — मुहम्मद अली और शौकत अली — रामपुर के इन दोनों भाइयों ने आंदोलन का मुख्य नेतृत्व किया। मुहम्मद अली अंग्रेज़ी पत्र "कॉमरेड" और उर्दू पत्र "हमदर्द" के संपादक थे; तुर्की के पक्ष में लिखने के कारण दोनों भाई युद्धकाल में नज़रबंद रहे। मुहम्मद अली 1923 में कांग्रेस के काकीनाडा अधिवेशन के अध्यक्ष बने।
◆ मौलाना अबुल कलाम आज़ाद — उर्दू पत्र "अल-हिलाल" (1912) के संपादक, जिन्होंने मुसलमानों में राष्ट्रवाद का प्रचार किया। वे आगे चलकर 1923 में कांग्रेस के सबसे युवा अध्यक्ष बने और स्वतंत्र भारत के पहले शिक्षा मंत्री हुए।
◆ हकीम अजमल ख़ाँ — दिल्ली के प्रसिद्ध यूनानी चिकित्सक, जिन्होंने असहयोग के समय अंग्रेज़ों की दी हुई "हाज़िक-उल-मुल्क" की उपाधि लौटा दी। वे 1921 के अहमदाबाद अधिवेशन के कार्यवाहक अध्यक्ष और जामिया मिल्लिया के संस्थापकों में थे।
◆ हसरत मोहानी और डॉ. एम. ए. अंसारी — उर्दू कवि और पत्रकार हसरत मोहानी ने "इंक़लाब ज़िंदाबाद" का नारा देने का श्रेय दिया जाता है और उन्होंने 1921 में पूर्ण स्वतंत्रता का प्रस्ताव रखा। डॉ. मुख़्तार अहमद अंसारी दिल्ली के चिकित्सक थे, जो 1927 में कांग्रेस के अध्यक्ष बने।
◆ तीन माँगें — (1) मुसलमानों के पवित्र स्थलों पर ख़लीफ़ा का नियंत्रण बना रहे; (2) जज़ीरत-उल-अरब (अरब प्रायद्वीप और उससे जुड़े क्षेत्र) किसी ग़ैर-मुस्लिम शक्ति के अधीन न जाए; (3) ख़लीफ़ा के पास इतना क्षेत्र रहे कि वह इस्लाम की रक्षा कर सके।
◆ 1919 — बम्बई में अखिल भारतीय ख़िलाफ़त समिति बनी। 17 अक्टूबर 1919 को देशभर में ख़िलाफ़त दिवस मनाया गया, जिसमें हिंदुओं ने भी उपवास और हड़ताल में भाग लिया। 23–24 नवंबर 1919 को दिल्ली में अखिल भारतीय ख़िलाफ़त सम्मेलन हुआ, जिसकी अध्यक्षता गांधीजी ने की — यहीं उन्होंने पहली बार असहयोग का विचार रखा।
◆ 1920 — जून 1920 में इलाहाबाद में हुई सर्वदलीय बैठक ने सरकार के बहिष्कार का कार्यक्रम स्वीकार किया — स्कूल, कॉलेज, अदालतों का बहिष्कार। 31 अगस्त 1920 को ख़िलाफ़त समिति ने औपचारिक रूप से असहयोग शुरू कर दिया। इस तरह ख़िलाफ़त और असहयोग एक ही आंदोलन की दो धाराएँ बन गए।
◆ हिजरत (1920) — कुछ उलेमा ने घोषणा की कि अंग्रेज़ी राज वाला भारत "दार-उल-हर्ब" (शत्रु का देश) है, इसलिए मुसलमानों को यहाँ से हिजरत (धर्म के लिए देश छोड़ना) करनी चाहिए। इस आह्वान पर उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत और सिंध के हज़ारों मुसलमान अपनी ज़मीन-जायदाद बेचकर अफ़ग़ानिस्तान चले गए, पर वहाँ उन्हें स्वीकार नहीं किया गया और भारी कष्ट सहकर अधिकांश को लौटना पड़ा।
◆ गांधीजी का पक्ष — गांधीजी ने ख़िलाफ़त को हिंदू-मुस्लिम एकता का ऐसा सुनहरा अवसर माना "जो सौ वर्षों में भी नहीं आएगा"। उनका तर्क था कि यदि हिंदू मुसलमानों के धार्मिक संकट में साथ देंगे, तो दोनों समुदायों में स्थायी विश्वास बनेगा और बिना मुसलमानों के सहयोग के कोई बड़ा राष्ट्रीय आंदोलन संभव नहीं। उन्होंने ख़िलाफ़त और पंजाब के अत्याचार — दोनों को जोड़कर एक राष्ट्रीय आंदोलन का रूप दिया।
◆ विरोध — जिन्ना ने चेतावनी दी कि धर्म को राजनीति से जोड़ने से मौलवियों की कट्टरता बढ़ेगी और राष्ट्रीय राजनीति सांप्रदायिक रंग ले लेगी। मदन मोहन मालवीय और कई हिंदू नेता भी एक विदेशी धार्मिक मुद्दे पर कांग्रेस की भागीदारी के विरोधी थे। आगे की घटनाओं ने दिखाया कि ये आशंकाएँ पूरी तरह निराधार नहीं थीं।
◆ अंत — तुर्की में ही राष्ट्रवादी नेता मुस्तफ़ा कमाल पाशा ने आधुनिक, धर्मनिरपेक्ष तुर्की बनाने के लिए नवंबर 1922 में सुल्तान को सत्ता से हटा दिया और 3 मार्च 1924 को ख़िलाफ़त की संस्था ही समाप्त कर दी। 1923 की लॉज़ान संधि से अंग्रेज़ों ने सेव्र की कठोर शर्तें भी बदल दीं। जिस ख़लीफ़ा के लिए भारत में आंदोलन चल रहा था, उसे उसके अपने देश ने ही हटा दिया — इससे आंदोलन का आधार ख़त्म हो गया।
◆ महत्त्व — ख़िलाफ़त ने मुसलमानों, विशेषकर ग्रामीण और ग़रीब मुसलमानों को, पहली बार बड़ी संख्या में राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ा और हिंदू-मुस्लिम एकता का अभूतपूर्व दृश्य बना — हिंदू नेता मस्जिदों में और मुस्लिम नेता मंदिरों में भाषण देते थे।
◆ सीमा — मुसलमानों की भागीदारी मुख्यतः धार्मिक प्रश्न पर थी, राष्ट्रीय चेतना पर कम। इसलिए मुद्दा ख़त्म होते ही यह एकता भी टूट गई और 1920 के दशक में सांप्रदायिक दंगों का दौर शुरू हुआ। आलोचक कहते हैं कि धर्म को राजनीति में लाने की यह क़ीमत चुकानी पड़ी।
गांधीजी ने "हिंद स्वराज" (1909) में लिखा था कि अंग्रेज़ों ने भारत को अपनी तलवार से नहीं जीता, बल्कि भारतीयों ने ही उन्हें भारत दिया है, और अंग्रेज़ी राज भारतीयों के सहयोग से ही टिका है — भारतीय सिपाही, भारतीय क्लर्क, भारतीय वकील और भारतीय ख़रीदार। यदि भारतीय सहयोग बंद कर दें तो यह राज एक वर्ष में ढह जाएगा और स्वराज आ जाएगा। 1919–20 की घटनाओं ने इस विचार को आंदोलन का रूप दे दिया:
1. रॉलेट एक्ट — नागरिक स्वतंत्रता पर आघात, जिसने दिखाया कि सरकार भारतीयों की राय की परवाह नहीं करती।
2. पंजाब के अत्याचार — जलियाँवाला बाग़ और मार्शल लॉ, और फिर हंटर रिपोर्ट की लीपापोती तथा ब्रिटेन में डायर का सम्मान।
3. ख़िलाफ़त का अन्याय — तुर्की के साथ विश्वासघात, जिससे मुसलमान आंदोलन में उतरे।
4. मॉन्टफ़ोर्ड सुधारों की निराशा — द्वैध शासन से वास्तविक सत्ता नहीं मिली।
5. आर्थिक कठिनाई — युद्ध के बाद की महँगाई, बेरोज़गारी और किसानों-मज़दूरों का असंतोष, जो किसी बड़े आंदोलन में फूटने को तैयार था।
नीचे के चार्ट में रॉलेट एक्ट से चौरी-चौरा तक की आठ कड़ियाँ एक नज़र में हैं। पहली चार कड़ियाँ (रॉलेट एक्ट, रॉलेट सत्याग्रह, जलियाँवाला बाग़, ख़िलाफ़त) आप खंड 4 से 6 में विस्तार से पढ़ चुके हैं; बाक़ी चार नीचे समझाई गई हैं।

◆ रॉलेट एक्ट (18 मार्च 1919) और रॉलेट सत्याग्रह (6 अप्रैल 1919) — "न वकील, न दलील, न अपील" वाले इस क़ानून के विरुद्ध देशव्यापी हड़ताल हुई, पर हिंसा के कारण गांधीजी ने 18 अप्रैल को इसे "हिमालय जैसी भूल" कहकर वापस लिया (खंड 4)।
◆ जलियाँवाला बाग़ (13 अप्रैल 1919) और ख़िलाफ़त (नवंबर 1919) — अमृतसर का हत्याकांड, मार्शल लॉ और हंटर कमेटी की लीपापोती, तथा दिल्ली में गांधीजी की अध्यक्षता में ख़िलाफ़त सम्मेलन — इन दोनों ने हिंदुओं और मुसलमानों को एक साझा आंदोलन के लिए तैयार किया (खंड 5 और 6)।
◆ तीन उद्देश्य — (1) पंजाब के अन्याय का निवारण, (2) ख़िलाफ़त के अन्याय का निवारण, और (3) स्वराज की प्राप्ति। गांधीजी ने वादा किया कि यदि कार्यक्रम पूरी निष्ठा से लागू हुआ, तो "एक वर्ष में स्वराज" मिल जाएगा।
◆ 1 अगस्त 1920 — औपचारिक आरंभ — इसी दिन आंदोलन शुरू हुआ और इसी दिन लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक का बम्बई में निधन हो गया; उनकी शवयात्रा में लाखों लोग उमड़े। गांधीजी ने इसी दिन कैसर-ए-हिंद स्वर्ण पदक, ज़ुलु युद्ध और बोअर युद्ध के पदक सरकार को लौटा दिए।
◆ सितंबर 1920 — कलकत्ता विशेष अधिवेशन — लाला लाजपत राय की अध्यक्षता में हुए इस अधिवेशन में गांधीजी का असहयोग प्रस्ताव पारित हुआ। पुराने दिग्गज — सी. आर. दास, बिपिनचंद्र पाल, एनी बेसेंट, जिन्ना और मालवीय — इसके विरोध में थे; विशेषकर नवंबर 1920 के परिषद चुनावों के बहिष्कार पर गहरा मतभेद था। पर युवा पीढ़ी और मुस्लिम नेताओं के समर्थन से प्रस्ताव पास हो गया।
◆ दिसंबर 1920 — नागपुर अधिवेशन — सी. विजयराघवाचारियर की अध्यक्षता में हुए इस नियमित अधिवेशन ने प्रस्ताव की पुष्टि की — और रोचक बात यह है कि इस बार मुख्य प्रस्ताव सी. आर. दास ने ही प्रस्तुत किया, जो कलकत्ता में इसके विरोधी थे। कांग्रेस का लक्ष्य बदलकर "शांतिपूर्ण और उचित साधनों से स्वराज" कर दिया गया — यानी अब केवल "संवैधानिक" साधनों तक सीमित रहने की बाध्यता नहीं रही। जिन्ना ने इसी के बाद कांग्रेस छोड़ दी।
◆ नागपुर के संगठनात्मक सुधार — कांग्रेस को जन-संगठन बनाने के लिए बड़े बदलाव हुए: भाषाई आधार पर प्रांतीय कांग्रेस समितियाँ बनीं (ताकि लोग अपनी भाषा में राजनीति कर सकें); रोज़मर्रा के काम के लिए 15 सदस्यीय कार्यसमिति बनी; लगभग 350 सदस्यीय अखिल भारतीय कांग्रेस समिति बनी; गाँव और मोहल्ले तक समितियाँ बनाने की व्यवस्था हुई; सदस्यता शुल्क घटाकर चार आना वार्षिक किया गया, ताकि ग़रीब भी सदस्य बन सकें; और जहाँ तक हो सके हिंदी/हिंदुस्तानी और क्षेत्रीय भाषाओं का प्रयोग तय हुआ।
📌 याद रखें कलकत्ता विशेष अधिवेशन (सितंबर 1920, लाजपत राय) में असहयोग प्रस्ताव पारित; नागपुर अधिवेशन (दिसंबर 1920, विजयराघवाचारियर) में उसकी पुष्टि और कांग्रेस का पुनर्गठन। विरोधी से समर्थक बने — सी. आर. दास। कांग्रेस छोड़ने वाले — जिन्ना। |
असहयोग के कार्यक्रम के दो पहलू थे — नकारात्मक, यानी सरकार से सहयोग वापस लेना, और सकारात्मक (रचनात्मक), यानी सरकारी संस्थाओं के स्थान पर अपनी राष्ट्रीय संस्थाएँ खड़ी करना। गांधीजी मानते थे कि केवल तोड़ने से नहीं, साथ में बनाने से ही स्वराज आएगा।
🚫 नकारात्मक (बहिष्कार) ✔ सरकारी उपाधियाँ और अवैतनिक पद लौटाना ✔ सरकारी स्कूल-कॉलेजों का बहिष्कार ✔ अदालतों का बहिष्कार — वकालत छोड़ना ✔ नवंबर 1920 के परिषद चुनावों का बहिष्कार ✔ विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार और होली ✔ सरकारी समारोहों का बहिष्कार; मेसोपोटामिया सेवा से इनकार ✔ बाद के चरण में कर-बंदी और सविनय अवज्ञा | 🏗️ सकारात्मक (रचनात्मक) ✔ राष्ट्रीय विद्यालय-विद्यापीठ ✔ विवादों के निपटारे के लिए पंचायतें ✔ खादी और चरखा ✔ तिलक स्वराज कोष — 1 करोड़ रुपये ✔ 1 करोड़ कांग्रेस सदस्य, 20 लाख चरखे ✔ हिंदू-मुस्लिम एकता, अस्पृश्यता-निवारण, नशाबंदी ✔ स्वयंसेवक दल |
◆ उपाधियाँ और पद लौटाना — अंग्रेज़ों ने भारतीय अभिजात वर्ग को "राय बहादुर", "ख़ान बहादुर", "सर" जैसी उपाधियों से बाँध रखा था। इन्हें लौटाना यह घोषणा थी कि अब भारतीय अंग्रेज़ी सम्मान नहीं, राष्ट्रीय सम्मान चाहते हैं। स्थानीय निकायों के मनोनीत (अवैतनिक) पद भी छोड़ने को कहा गया।
◆ शिक्षा संस्थाओं का बहिष्कार — सरकारी और सरकारी सहायता पाने वाले स्कूल-कॉलेजों से छात्रों को निकलने का आह्वान किया गया, क्योंकि गांधीजी के अनुसार ये संस्थाएँ "गुलाम मानसिकता" पैदा करती थीं। हज़ारों छात्रों ने पढ़ाई छोड़ी और राष्ट्रीय विद्यालयों में चले गए।
◆ अदालतों का बहिष्कार — वकीलों से वकालत छोड़ने और जनता से अपने विवाद सरकारी अदालतों के बजाय पंचायतों में सुलझाने को कहा गया, क्योंकि न्याय-व्यवस्था अंग्रेज़ी राज का एक मज़बूत स्तंभ थी।
◆ परिषद चुनावों का बहिष्कार — मॉन्टफ़ोर्ड सुधारों के अंतर्गत नवंबर 1920 में हुए विधान परिषद चुनावों में कांग्रेस ने न तो उम्मीदवार खड़े किए और न ही मतदाताओं को वोट देने दिया। कई क्षेत्रों में मतदान बहुत कम हुआ।
◆ विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार — विदेशी कपड़े इकट्ठा करके उनकी सार्वजनिक होली जलाई गई और विदेशी कपड़े तथा शराब की दुकानों पर धरना दिया गया। टैगोर जैसे कुछ लोगों ने कपड़े जलाने को बर्बादी कहकर आलोचना भी की।
◆ सरकारी समारोह और सेना — सरकारी दरबारों और स्वागत-समारोहों में न जाने तथा मेसोपोटामिया (इराक़) में सेवा के लिए सैनिक, क्लर्क या मज़दूर के रूप में भर्ती न होने को कहा गया।
◆ अंतिम चरण — कर-बंदी — योजना यह थी कि यदि ऊपर के क़दमों से स्वराज न मिले, तो अंत में कर-बंदी और सविनय अवज्ञा शुरू होगी। इसके लिए गुजरात के बारडोली ताल्लुके को चुना गया था, पर चौरी-चौरा के कारण यह चरण शुरू ही नहीं हो पाया।
◆ राष्ट्रीय शिक्षा — सरकारी संस्थाएँ छोड़ने वाले छात्रों के लिए देशभर में लगभग 800 राष्ट्रीय विद्यालय और कई विद्यापीठ खुले, जहाँ मातृभाषा में, राष्ट्रीय भावना और हाथ के काम के साथ शिक्षा दी जाती थी (नीचे 7.6 देखें)।
◆ पंचायतें — गाँव-क़स्बों में विवाद निपटाने के लिए पंचायतें बनीं, जिससे लोग अदालत के ख़र्च और देरी से बचे और अपना न्याय स्वयं करने का अनुभव पाया।
◆ खादी और चरखा — हर घर में चरखा चलाने और खादी पहनने का आह्वान किया गया — 20 लाख चरखे चलाने का लक्ष्य रखा गया। खादी राष्ट्रवादी की पहचान बन गई।
◆ तिलक स्वराज कोष — दिवंगत तिलक की स्मृति में 1 करोड़ रुपये का कोष जुटाने का लक्ष्य रखा गया, जो 1921 के मध्य तक पूरा होकर पार हो गया। स्त्रियों ने अपने गहने तक दान किए। साथ ही 1 करोड़ कांग्रेस सदस्य बनाने का लक्ष्य रखा गया।
◆ सामाजिक कार्य — हिंदू-मुस्लिम एकता, अस्पृश्यता-निवारण और नशाबंदी को कार्यक्रम का अभिन्न अंग बनाया गया — गांधीजी के लिए स्वराज केवल राजनीतिक नहीं, सामाजिक शुद्धि भी था। शराब की दुकानों पर धरने से सरकार की आबकारी आय भी घटी।
◆ स्वयंसेवक दल — अनुशासित, अहिंसक और वर्दीधारी (खादी पहने) कार्यकर्ताओं के दल बने, जो धरना देते, जुलूस संभालते और प्रचार करते थे। दिसंबर 1921 में सरकार ने इन दलों को ग़ैर-क़ानूनी घोषित कर दिया।
◆ वकील और छात्र — मोतीलाल नेहरू, सी. आर. दास, राजेंद्र प्रसाद, वल्लभभाई पटेल, सी. राजगोपालाचारी, आसफ़ अली, टी. प्रकाशम और सैफ़ुद्दीन किचलू जैसे सफल वकीलों ने अपनी चलती वकालत छोड़ दी — सी. आर. दास ने तो अपनी सारी संपत्ति राष्ट्र को दान कर दी और "देशबंधु" कहलाए। हज़ारों छात्रों ने सरकारी स्कूल-कॉलेज छोड़े।
◆ विदेशी कपड़े पर चोट — विदेशी कपड़े का आयात 1920–21 के लगभग 102 करोड़ रुपये से घटकर 1921–22 में लगभग 57 करोड़ रुपये रह गया — यानी लगभग आधा। इससे ब्रिटेन के लंकाशायर के कपड़ा उद्योग पर सीधी चोट पड़ी।
◆ मज़दूर हड़तालें — सरकारी आँकड़ों के अनुसार 1921 में 396 हड़तालें हुईं, जिनमें लगभग 6 लाख श्रमिक शामिल थे और लगभग 70 लाख कार्य-दिवस नष्ट हुए।
◆ प्रिंस ऑफ़ वेल्स का बहिष्कार — 17 नवंबर 1921 को ब्रिटिश युवराज (प्रिंस ऑफ़ वेल्स) के बम्बई पहुँचने पर देशव्यापी हड़ताल हुई और जहाँ-जहाँ वे गए, सड़कें सूनी मिलीं और काले झंडे दिखाए गए। बम्बई में इसी दिन दंगे भी हुए, जिनसे गांधीजी बहुत दुखी हुए।
◆ दमन — सरकार ने स्वयंसेवक दलों पर प्रतिबंध लगाया, सभाएँ रोकीं और बड़े नेताओं को जेल में डाला। 1921 के अंत तक लगभग 30,000 लोग गिरफ़्तार हो चुके थे, जिनमें गांधीजी को छोड़कर लगभग सभी बड़े नेता थे।
असहयोग की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि अलग-अलग क्षेत्रों में लोगों ने इसे अपनी स्थानीय समस्याओं से जोड़कर अपने ढंग से अपनाया। कहीं यह बेगार-विरोध बना, कहीं वन-क़ानून तोड़ना, कहीं कर-बंदी, तो कहीं मज़दूर हड़ताल। इस "स्थानीयकरण" ने आंदोलन को गाँव-गाँव तक पहुँचाया — पर कहीं-कहीं यह गांधीजी के अहिंसक अनुशासन से बाहर भी चला गया।
◆ अवध के ताल्लुकेदार (बड़े ज़मींदार) किसानों से भारी लगान, "नज़राना" (अवैध भेंट), बेगार (बिना मज़दूरी का काम) लेते थे और मनमाने ढंग से बेदखली करते थे। बाबा रामचंद्र — जो फ़िजी में गिरमिटिया मज़दूर रह चुके एक संन्यासी थे — के नेतृत्व में अक्टूबर 1920 में प्रतापगढ़ में अवध किसान सभा बनी; गौरीशंकर मिश्र और युवा जवाहरलाल नेहरू इसके सहयोगी थे। नेहरू ने यहीं पहली बार ग्रामीण भारत की ग़रीबी को निकट से देखा।
◆ किसानों ने बेदखल ज़मीन पर खेती न करने और बेगार न देने का निर्णय लिया; प्रतापगढ़ के किसानों ने बेदखली रुकवाई और उसका श्रेय गांधीजी को दिया। 1921 की शुरुआत में रायबरेली, फ़ैज़ाबाद आदि में आंदोलन हिंसक होकर बाज़ारों और ज़मींदारों के घरों की लूट तक पहुँचा। 1921–22 में हरदोई, बहराइच, सीतापुर क्षेत्र में मदारी पासी के नेतृत्व में "एका आंदोलन" चला — किसान "एका" (एकता) की शपथ लेते कि वे केवल तय लगान देंगे, बेगार नहीं करेंगे। कांग्रेस इस आंदोलन से धीरे-धीरे दूर हो गई, क्योंकि यह अहिंसा के अनुशासन से बाहर चला गया।
◆ कुमाऊँ (आज उत्तराखंड) के पहाड़ी गाँवों के लोगों को अंग्रेज़ अधिकारियों के दौरे पर उनका सामान मुफ़्त ढोना पड़ता था — इसे "कुली बेगार" कहा जाता था और गाँवों के मुखिया इसके रजिस्टर रखते थे। जनवरी 1921 में बागेश्वर के उत्तरायणी मेले में बद्री दत्त पांडे के नेतृत्व में हज़ारों लोगों ने सरयू नदी का जल हाथ में लेकर बेगार न देने की शपथ ली और बेगार के रजिस्टर नदी में बहा दिए। इसके बाद यह प्रथा व्यवहार में समाप्त हो गई — बद्री दत्त पांडे को "कुमाऊँ केसरी" कहा गया।
◆ वन सत्याग्रह — आंध्र के गुंटूर ज़िले के पलनाड क्षेत्र में आदिवासी और ग़रीब किसानों ने वन-क़ानूनों को तोड़कर बिना चराई शुल्क दिए अपने पशु सरकारी जंगलों में छोड़ दिए और लकड़ी काटी। उन्हें विश्वास था कि "गांधी राज" आने वाला है और अब अंग्रेज़ों के क़ानून नहीं चलेंगे।
◆ चिराला-पेराला — इस क़स्बे को नगरपालिका बनाकर उस पर भारी कर लगाया गया। दुग्गीराला गोपालकृष्णय्या के नेतृत्व में लोगों ने कर देने के बजाय पूरा क़स्बा ख़ाली कर दिया और बाहर झोपड़ियाँ बनाकर महीनों रहे — यह "हिजरत" का अनोखा उदाहरण था। पेडानंदीपाडु ताल्लुके में किसानों ने लगान न देकर कर-बंदी की और गाँव के सरकारी अधिकारियों ने सामूहिक त्यागपत्र दे दिए।
◆ रंपा विद्रोह — उत्तरी आंध्र (गोदावरी क्षेत्र) की पहाड़ी जनजातियों ने वन-क़ानूनों के विरुद्ध संघर्ष किया। यहीं 1922–24 में अल्लूरी सीताराम राजू ने सशस्त्र छापामार विद्रोह चलाया; वे गांधीजी की प्रशंसा करते थे, पर हिंसा को आवश्यक मानते थे। मई 1924 में वे मारे गए।
◆ तटीय क्षेत्रों में शराब और ताड़ी की दुकानों पर बड़े पैमाने पर धरने दिए गए। इससे एक ओर नशाबंदी का सामाजिक सुधार हुआ और दूसरी ओर सरकार की आबकारी आय पर चोट पड़ी, जो प्रांतीय सरकारों की आय का बड़ा स्रोत थी।
◆ मिदनापुर ज़िले में बीरेंद्रनाथ सासमल के नेतृत्व में किसानों ने नव-निर्मित यूनियन बोर्डों को कर देने से इनकार किया और सफल कर-बंदी की; वहाँ एक अंग्रेज़ ज़मींदारी कंपनी के विरुद्ध किसानों ने भी आंदोलन किया।
◆ बंगाल में ख़िलाफ़त-असहयोग गठजोड़ से असाधारण हिंदू-मुस्लिम एकता दिखी। चटगाँव के नेता जे. एम. सेनगुप्त के नेतृत्व में असम से लौटते चाय-मज़दूरों पर हुए अत्याचार के विरोध में रेल और स्टीमर हड़ताल हुई।
◆ "गांधी महाराज की जय" के नारों के साथ असम के चाय बागानों के मज़दूरों ने वेतन वृद्धि की माँग की और हज़ारों की संख्या में बागान छोड़ दिए — चरगोला घाटी (मई 1921) इसका प्रसिद्ध उदाहरण है। वे अपने गाँव लौटना चाहते थे, पर रास्ते में रेल और स्टीमर में उन्हें रोका गया और चाँदपुर में उन पर गोली चली। असमिया वैष्णव लोकगीतों में कृष्ण की जगह "गांधी राज" का गुणगान होने लगा।
◆ पंजाब में अकाली आंदोलन चला, जिसका उद्देश्य गुरुद्वारों को भ्रष्ट महंतों के नियंत्रण से मुक्त कराना था, जिन्हें सरकार का संरक्षण प्राप्त था। फ़रवरी 1921 में ननकाना साहिब में महंत के लोगों ने सौ से अधिक अकालियों को मार डाला; 1922 के "गुरु का बाग़" मोर्चे में अकाली अहिंसक रहकर लाठियाँ खाते रहे। यह असहयोग का ही एक अहिंसक रूप था, जिसका परिणाम 1925 का सिख गुरुद्वारा अधिनियम था (विस्तार अध्याय 9)।
◆ सिंध में ख़िलाफ़त के आह्वान पर मुस्लिम व्यापारियों और किसानों में भारी उत्साह था। यहाँ आंदोलन का धार्मिक पक्ष (ख़िलाफ़त) राष्ट्रीय पक्ष (असहयोग) से अधिक प्रबल था।
◆ धमतरी के पास कंडेल गाँव के किसानों पर सिंचाई विभाग ने नहर का पानी चुराने का झूठा आरोप लगाकर जुर्माना और सिंचाई कर लगाया था। पंडित सुंदरलाल शर्मा के नेतृत्व में 1920 में किसानों ने कर न देकर सत्याग्रह किया। उनके आमंत्रण पर 20 दिसंबर 1920 को गांधीजी पहली बार छत्तीसगढ़ (रायपुर-धमतरी) आए, पर उनके पहुँचने से पहले ही सरकार झुक गई थी।
◆ खेड़ा के पाटीदार किसानों ने, जो 1918 में सत्याग्रह का अनुभव ले चुके थे, असहयोग में भी लगान-विरोधी अहिंसक अभियान चलाया। बारडोली ताल्लुके को देशव्यापी कर-बंदी और सविनय अवज्ञा के पहले प्रयोग के लिए चुना गया था और वहाँ पूरी तैयारी की गई थी।
◆ पृष्ठभूमि — मालाबार के मोपला (मापिल्ला) मुख्यतः मुस्लिम काश्तकार थे, जबकि ज़मींदार (जेन्मी) अधिकतर ऊँची जाति के हिंदू थे। मोपलाओं में ज़मींदारों के शोषण के विरुद्ध उन्नीसवीं सदी से ही बार-बार विद्रोह होते रहे थे। ख़िलाफ़त और असहयोग की सभाओं ने उनमें नया जोश भरा।
◆ घटनाक्रम — अगस्त 1921 में पुलिस द्वारा एक मस्जिद की तलाशी और नेताओं को पकड़ने की कोशिश के बाद विद्रोह भड़क उठा। वारियनकुन्नथ कुंजहमद हाजी और अली मुसलियार जैसे नेताओं ने कुछ क्षेत्रों में "ख़िलाफ़त राज" घोषित कर दिया। विद्रोह पहले सरकार और ज़मींदारों के विरुद्ध था, पर आगे चलकर इसने सांप्रदायिक रूप ले लिया और अनेक हिंदुओं पर अत्याचार और जबरन धर्मांतरण हुए।
◆ दमन और "वैगन त्रासदी" — सरकार ने सेना भेजकर विद्रोह को कठोरता से कुचला; हज़ारों मोपला मारे गए। नवंबर 1921 में क़ैदी बनाए गए मोपलाओं को एक बंद मालगाड़ी के डिब्बे में ठूँसकर ले जाया गया, जिसमें दम घुटने से लगभग 67 क़ैदियों की मृत्यु हो गई — इसे "वैगन त्रासदी" कहा जाता है।
◆ प्रभाव — मोपला विद्रोह ने असहयोग-ख़िलाफ़त की हिंदू-मुस्लिम एकता को गहरा धक्का दिया और दिखाया कि धार्मिक भावनाओं पर आधारित आंदोलन कितनी जल्दी सांप्रदायिक बन सकता है।
असहयोग की सबसे स्थायी देन वे राष्ट्रीय शिक्षा संस्थाएँ हैं, जिनमें से कई आज भी प्रमुख विश्वविद्यालय हैं:
◆ गुजरात विद्यापीठ, अहमदाबाद (18 अक्टूबर 1920) — गांधीजी ने स्वयं इसकी स्थापना की और आजीवन इसके कुलपति रहे। यहाँ गुजराती माध्यम में राष्ट्रीय शिक्षा दी जाती थी।
◆ जामिया मिल्लिया इस्लामिया (29 अक्टूबर 1920) — अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के जो शिक्षक और छात्र सरकारी सहायता वाली संस्था छोड़ना चाहते थे, उनके लिए अलीगढ़ में इसकी स्थापना हुई; संस्थापकों में मुहम्मद अली, हकीम अजमल ख़ाँ और डॉ. अंसारी थे। 1925 में यह दिल्ली आ गई और आगे डॉ. ज़ाकिर हुसैन (बाद में भारत के राष्ट्रपति) ने इसे सँवारा।
◆ बिहार विद्यापीठ, पटना (6 फ़रवरी 1921) — मज़हरुल हक़ और राजेंद्र प्रसाद के प्रयासों से स्थापित; इसका उद्घाटन गांधीजी ने किया।
◆ काशी विद्यापीठ, बनारस (10 फ़रवरी 1921) — शिवप्रसाद गुप्त और डॉ. भगवान दास ने स्थापना की; लाल बहादुर शास्त्री ने यहीं से "शास्त्री" की उपाधि पाई।
◆ तिलक महाराष्ट्र विद्यापीठ, पूना (1921) और बंगाल नेशनल यूनिवर्सिटी — कलकत्ता में सी. आर. दास के प्रयासों से नेशनल कॉलेज खुला, जिसके प्राचार्य युवा सुभाष चंद्र बोस बने, जिन्होंने उसी वर्ष (1921) भारतीय सिविल सेवा से त्यागपत्र देकर आंदोलन में प्रवेश किया था।
गांधीजी का नाम गाँव-गाँव में चमत्कार की तरह फैला। पूर्वी उत्तर प्रदेश के स्थानीय अख़बारों में ऐसी अफ़वाहें छपीं कि जो गांधीजी की परीक्षा लेता, उसके साथ चमत्कार होता — किसी का गुड़ का कड़ाहा दो टुकड़े हो गया, किसी का गेहूँ तिल बन गया; जो उनका विरोध करता, उस पर विपत्ति आती। फ़रवरी 1921 में गांधीजी की गोरखपुर यात्रा में हर स्टेशन पर 15–20 हज़ार लोग जुटे। इतिहासकार शाहिद अमीन के अध्ययन के अनुसार किसानों ने गांधीजी को अपने-अपने ढंग से समझा — कोई उन्हें ज़मींदारों और महाजनों का विरोधी मानता, कोई ऐसा मसीहा जो सारे दुःख दूर कर देगा और लगान माफ़ करा देगा। इसीलिए "गांधी राज" का अर्थ हर जगह अलग था।
सितंबर 1921 में दक्षिण भारत की यात्रा के दौरान मदुरै में गांधीजी ने ग़रीब किसानों को देखकर सिर मुँडवाया और केवल धोती (लँगोटी जैसी छोटी धोती) पहनना शुरू किया — यह भारत के ग़रीबों से एकात्मता का प्रतीक था, और यही वेश आजीवन उनकी पहचान बना।
❝ असहयोग भारत और गांधीजी के जीवन के एक युग का नाम हो गया। यह शांति की दृष्टि से नकारात्मक, किंतु प्रभाव की दृष्टि से बहुत सकारात्मक था... यह स्वशासन के लिए एक प्रशिक्षण था। ❞ (लुई फ़िशर, गांधीजी के अमेरिकी जीवनीकार) |
1921 के अंत तक असहयोग आंदोलन अपने चरम पर था। लगभग तीस हज़ार लोग जेलों में थे, विदेशी कपड़े की होलियाँ जल रही थीं और सरकार घबराई हुई थी। जनता अब अगले क़दम — कर न देने और क़ानून तोड़ने — की प्रतीक्षा कर रही थी। पर ठीक इसी मोड़ पर एक छोटे-से क़स्बे की घटना ने पूरे आंदोलन की दिशा बदल दी। इस खंड में हम क्रम से समझेंगे कि चौरी-चौरा में क्या हुआ, गांधीजी ने आंदोलन क्यों रोका, नेताओं ने इस पर क्या कहा और असहयोग आंदोलन ने अंत में देश को क्या दिया।
📖 कहानी 2: जब अपराधी ने अपने लिए सबसे बड़ी सज़ा माँगी 4 फ़रवरी 1922। असहयोग आंदोलन पूरे उफ़ान पर था। लगभग तीस हज़ार लोग जेलों में थे और सरकार घबराई हुई थी। तभी गोरखपुर के पास चौरी-चौरा में पुलिस की गोलीबारी से क्रुद्ध भीड़ ने थाने में आग लगा दी, जिसमें थानेदार सहित 22 पुलिसकर्मी मारे गए। जब यह ख़बर साबरमती आश्रम में गांधीजी तक पहुँची तो उन्हें गहरी चोट लगी। उनके लिए यह सिर्फ़ एक घटना नहीं थी, उनके पूरे सिद्धांत की हार थी। गांधीजी ने तुरंत तय किया कि आंदोलन रोक देंगे। उन्होंने "यंग इंडिया" में हिंसा की ज़िम्मेदारी अपने ऊपर ली, पाँच दिन का उपवास किया और 12 फ़रवरी 1922 को बारडोली प्रस्ताव से आंदोलन वापस ले लिया। जेल में बैठे बड़े नेता और उत्साही युवा इस फ़ैसले से हैरान और नाराज़ हुए। पर गांधीजी का मानना था कि हिंसा के रास्ते पर चला आंदोलन अपना नैतिक बल खो देता है। आंदोलन रुकते ही सरकार ने, जो अब तक उन्हें छूने से डर रही थी, 10 मार्च 1922 को गांधीजी को गिरफ़्तार कर लिया। 18 मार्च को अहमदाबाद में न्यायाधीश ब्रूमफ़ील्ड की अदालत लगी। आरोप था "यंग इंडिया" में तीन लेख लिखकर सरकार के प्रति असंतोष भड़काने का, यानी राजद्रोह (धारा 124-ए)। गांधीजी ने अपना बचाव नहीं किया। उन्होंने अपराध स्वीकार किया और कहा कि एक अन्यायी सरकार के प्रति असंतोष फैलाना उनके लिए धर्म है। इसलिए या तो न्यायाधीश अपना पद छोड़ दें, या उन्हें अधिकतम सज़ा दें। न्यायाधीश ने छह वर्ष की क़ैद सुनाई और कहा कि लाखों देशवासियों की नज़र में गांधीजी एक महान देशभक्त और नेता हैं। गांधीजी ने झुककर न्यायाधीश को धन्यवाद दिया। यही "महान मुक़दमा" कहलाया। 🧭 इस कहानी से कौन-सी अवधारणा साफ़ हुई ✔ अहिंसा एक शर्त है, विकल्प नहीं — गांधीजी के लिए आंदोलन तभी सही था जब वह अहिंसक रहे। इसीलिए चौरी-चौरा के बाद असहयोग आंदोलन रोका गया। ✔ सविनय अवज्ञा का नियम — क़ानून तोड़ने वाला सत्याग्रही अपना बचाव नहीं करता, अपराध स्वीकार करता है और सज़ा को शांति से भोगता है। ✔ राजद्रोह (धारा 124-ए) — सरकार के प्रति असंतोष फैलाने पर लगने वाली यही धारा तिलक (1897, 1908) और गांधीजी (1922) पर भी लगी। 📝 परीक्षा के लिए: चौरी-चौरा (4 फ़रवरी 1922, गोरखपुर, 22 पुलिसकर्मी) → बारडोली प्रस्ताव (12 फ़रवरी 1922) → गांधीजी गिरफ़्तार (10 मार्च) → महान मुक़दमा (18 मार्च, न्यायाधीश ब्रूमफ़ील्ड, छह वर्ष) → 5 फ़रवरी 1924 को रिहाई। |
◆ अहमदाबाद अधिवेशन (दिसंबर 1921) — इस अधिवेशन के लिए चित्तरंजन दास अध्यक्ष चुने गए थे, पर वे जेल में थे, इसलिए हकीम अजमल ख़ाँ ने कार्यवाहक अध्यक्ष के रूप में अध्यक्षता की। अधिवेशन ने आंदोलन को और तेज़ करने का निर्णय लिया और गांधीजी को आंदोलन का एकमात्र अधिकारी बना दिया, यानी आगे कब और कहाँ क्या करना है, यह तय करने का पूरा अधिकार उन्हें दे दिया गया।
◆ हसरत मोहानी का प्रस्ताव — इसी अधिवेशन में उर्दू कवि और नेता मौलाना हसरत मोहानी ने प्रस्ताव रखा कि कांग्रेस "स्वराज" का अर्थ "पूर्ण स्वतंत्रता" घोषित करे, यानी ब्रिटेन से हर तरह का संबंध तोड़ने को लक्ष्य बनाए। गांधीजी ने इसे समय से पहले का क़दम माना और प्रस्ताव अस्वीकार हो गया। याद रखिए कि यही माँग आठ वर्ष बाद लाहौर (1929) में कांग्रेस का लक्ष्य बनी।
◆ वायसराय को चेतावनी (1 फ़रवरी 1922) — गांधीजी ने वायसराय लॉर्ड रीडिंग को पत्र लिखा कि यदि सरकार सात दिन के भीतर राजनीतिक बंदियों को रिहा नहीं करती और प्रेस पर लगी पाबंदियाँ नहीं हटाती, तो गुजरात के बारडोली ताल्लुके से सामूहिक सविनय अवज्ञा शुरू होगी, जिसमें किसान सरकार को लगान देना बंद कर देंगे। बारडोली को इसलिए चुना गया था कि वहाँ के कार्यकर्ता अनुशासित थे और गांधीजी को भरोसा था कि वहाँ हिंसा नहीं होगी।
◆ कहाँ — चौरी-चौरा संयुक्त प्रांत (आज का उत्तर प्रदेश) के गोरखपुर ज़िले का एक छोटा क़स्बा है। वास्तव में "चौरी" और "चौरा" दो पास-पास के गाँव थे, जिनके बीच रेलवे स्टेशन और बाज़ार था।
◆ पृष्ठभूमि — यहाँ के स्वयंसेवक कई दिनों से बाज़ार में शराब की दुकान और महँगे खाद्य पदार्थों की बिक्री के विरुद्ध धरना दे रहे थे। कुछ दिन पहले पुलिस ने स्वयंसेवकों के एक नेता भगवान अहीर (सेना से सेवानिवृत्त सैनिक) और उनके साथियों को पीटा था। इससे किसानों में भारी रोष था।
◆ घटनाक्रम — 4 फ़रवरी 1922 को (कुछ पुस्तकों में यह तिथि 5 फ़रवरी दी गई है) पिटाई के विरोध में एक बड़ा जुलूस थाने के सामने से निकला। पुलिस और भीड़ में कहा-सुनी हुई और पुलिस ने गोली चला दी, जिससे कुछ प्रदर्शनकारी मारे गए। जब पुलिस की गोलियाँ समाप्त हो गईं तो क्रुद्ध भीड़ ने उसे खदेड़ा। पुलिसकर्मी भागकर थाने में छिप गए और भीड़ ने थाने में आग लगा दी। जो सिपाही बाहर निकले, उन्हें भी मार डाला गया। इस घटना में थानेदार सहित 22 पुलिसकर्मी मारे गए (कुछ स्रोतों में यह संख्या 23 है)।
◆ मुक़दमा — सरकार ने सैकड़ों लोगों पर मुक़दमा चलाया। सत्र न्यायालय ने लगभग 170 लोगों को मृत्युदंड सुनाया। पंडित मदन मोहन मालवीय ने उच्च न्यायालय में अभियुक्तों की पैरवी की, और इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने मृत्युदंड की संख्या घटाकर 19 कर दी, जबकि बहुतों को लंबी क़ैद की सज़ा मिली।
❝ किसी भी तरह की उत्तेजना को निहत्थे और एक तरह से भीड़ की दया पर निर्भर व्यक्तियों की घृणित हत्या के आधार पर उचित नहीं ठहराया जा सकता। ❞ (महात्मा गांधी (चौरी-चौरा के बाद)) |
चौरी-चौरा की ख़बर सुनकर गांधीजी बहुत आहत हुए। उन्होंने "यंग इंडिया" में "चौरी-चौरा का अपराध" शीर्षक से लेख लिखा और इस हिंसा की ज़िम्मेदारी स्वयं अपने ऊपर ली। 12 फ़रवरी 1922 को बारडोली में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक हुई, जिसने जो निर्णय लिए, वे "बारडोली प्रस्ताव" कहलाते हैं:
1. आंदोलन स्थगित — बारडोली से शुरू होने वाली सामूहिक सविनय अवज्ञा और देशभर में चल रहा असहयोग आंदोलन, दोनों रोक दिए गए। जुलूस, धरने और क़ानून तोड़ने की सभी गतिविधियाँ बंद करने को कहा गया।
2. लगान देते रहने की अपील — किसानों से कहा गया कि वे सरकार को लगान और ज़मींदारों को किराया देते रहें। ज़मींदारों को भरोसा दिलाया गया कि कांग्रेस का उद्देश्य उनके क़ानूनी अधिकार छीनना नहीं है। यह गांधीजी की उस नीति का उदाहरण है, जिसमें वे भारतीय समाज के वर्गों को आपस में लड़ाने के बजाय साथ रखना चाहते थे।
3. रचनात्मक कार्यक्रम — कार्यकर्ताओं से कहा गया कि वे अब खादी और चरखे का प्रचार करें, राष्ट्रीय विद्यालय चलाएँ, नशाबंदी का काम करें, अस्पृश्यता मिटाएँ और हिंदू-मुस्लिम एकता मज़बूत करें।
गांधीजी ने प्रायश्चित के रूप में पाँच दिन का उपवास किया। 24–25 फ़रवरी 1922 को दिल्ली में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति की बैठक ने बारडोली के निर्णय की पुष्टि की, यद्यपि वहाँ डॉ. बी. एस. मुंजे ने गांधीजी के विरुद्ध निंदा प्रस्ताव रखा, जो पारित नहीं हुआ।
🔍 आसान परिभाषा: सामूहिक सविनय अवज्ञा |
📘 परिभाषा: किसी क्षेत्र की पूरी जनता द्वारा जानबूझकर, खुले रूप से और अहिंसक ढंग से सरकार के क़ानून न मानना और कर न देना, तथा उसके लिए मिलने वाला दंड स्वेच्छा से स्वीकार करना। |
💡 आसान भाषा में: असहयोग में लोग सरकार का साथ देना बंद करते हैं, जैसे नौकरी या अदालत छोड़ देना। सविनय अवज्ञा उससे एक क़दम आगे है, जिसमें लोग सरकार के क़ानून को ही तोड़ते हैं, पर विनम्रता से और बिना हिंसा के। 🏠 उदाहरण: फ़रवरी 1922 में बारडोली के किसान सरकार को लगान न देने की तैयारी कर चुके थे। यह सामूहिक सविनय अवज्ञा होती, पर चौरी-चौरा के कारण शुरू ही नहीं हो सकी। आठ वर्ष बाद 1930 में गांधीजी ने नमक क़ानून तोड़कर यही किया। |
एक क़स्बे की घटना पर पूरे देश का आंदोलन रोक देना पहली नज़र में अजीब लगता है। पर इसके पीछे कई कारण थे, जिन्हें समझना ज़रूरी है:
◆ अहिंसा पर अटल विश्वास — गांधीजी के लिए अहिंसा केवल एक तरीक़ा नहीं, बल्कि सिद्धांत थी। उनका मानना था कि जनता अभी अहिंसा का अनुशासन पूरी तरह नहीं सीख पाई है। इससे पहले नवंबर 1921 में बम्बई में प्रिंस ऑफ़ वेल्स के आगमन पर दंगे हुए थे और मालाबार में मोपला विद्रोह हिंसक हो चुका था। चौरी-चौरा तीसरी चेतावनी थी।
◆ हिंसक आंदोलन को कुचलना सरकार के लिए आसान — यदि आंदोलन हिंसक हो जाता, तो सरकार को सेना और पुलिस की पूरी ताक़त से उसे दबाने का बहाना मिल जाता। निहत्थी जनता हथियारबंद सरकार से हिंसा में नहीं जीत सकती थी। अहिंसा में ही जनता की असली ताक़त थी।
◆ आंदोलन की थकान — आंदोलन को चलते हुए डेढ़ वर्ष हो चुका था। कोई भी जन-आंदोलन बहुत लंबे समय तक एक ही ऊँचाई पर नहीं टिक सकता। छात्र स्कूलों में और वकील अदालतों में लौटने लगे थे, और व्यापारी विदेशी कपड़े के बहिष्कार से होने वाले घाटे से परेशान थे।
◆ सरकार बातचीत को तैयार नहीं थी — दिसंबर 1921 में समझौते की जो कोशिशें हुईं, वे विफल रहीं। सरकार झुकने के बजाय दमन बढ़ा रही थी।
◆ ख़िलाफ़त का मुद्दा कमज़ोर पड़ रहा था — तुर्की में मुस्तफ़ा कमाल पाशा के नेतृत्व में जनता स्वयं सुल्तान के विरुद्ध उठ खड़ी हुई थी। नवंबर 1922 में सुल्तान की राजनीतिक सत्ता समाप्त कर दी गई और 3 मार्च 1924 को ख़लीफ़ा का पद ही समाप्त कर दिया गया। इस तरह वह मुद्दा, जिसने मुसलमानों को आंदोलन से जोड़ा था, स्वयं ही अर्थहीन हो गया।
💡 समझिए — "पीछे हटना" भी रणनीति है इसे एक सेनापति के उदाहरण से समझिए। अच्छा सेनापति वही है जो यह पहचान ले कि उसकी सेना कब थक गई है, और उसे बिखरने से पहले व्यवस्थित ढंग से पीछे हटा ले, ताकि वह अगली लड़ाई के लिए बची रहे। गांधीजी ने आंदोलन को उस समय रोका जब वह अभी टूटा नहीं था। इसके बाद के वर्षों में गाँव-गाँव में रचनात्मक कार्य से कार्यकर्ताओं की नई फ़ौज तैयार हुई, जिसने 1930 में पहले से बड़ा आंदोलन खड़ा किया। इसी को "संघर्ष-विराम-संघर्ष" की रणनीति कहा जाता है, जिसे आप खंड 2 में पढ़ चुके हैं। |
आंदोलन की अचानक वापसी से अधिकांश बड़े नेता, जो उस समय जेलों में थे, हैरान और नाराज़ हुए। उन्हें लगा कि जीत के क़रीब पहुँचकर क़दम पीछे खींच लिए गए।
◆ मोतीलाल नेहरू ने जेल से लिखा कि यदि कन्याकुमारी का कोई गाँव अहिंसा का पालन न करे, तो उसकी सज़ा हिमालय की तलहटी के किसी नगर को क्यों मिले। उनका तर्क था कि एक स्थान की ग़लती के लिए पूरे देश को दंडित करना उचित नहीं है।
◆ सुभाष चंद्र बोस ने बाद में लिखा कि जिस समय जनता का उत्साह उबाल पर था, उस समय पीछे हटने का आदेश देना "राष्ट्रीय विपत्ति" से कम नहीं था। उन्होंने बताया कि उनके नेता चित्तरंजन दास भी जेल में इस निर्णय से बहुत क्षुब्ध थे।
◆ जवाहरलाल नेहरू ने अपनी आत्मकथा में लिखा कि जेल में यह समाचार सुनकर वे और उनके साथी बहुत क्रोधित और निराश हुए, क्योंकि वे समझ नहीं पा रहे थे कि जब आंदोलन आगे बढ़ रहा था, तब उसे क्यों रोका गया।
◆ लाला लाजपत राय और चित्तरंजन दास ने भी इस निर्णय की आलोचना की। दूसरी ओर राजेंद्र प्रसाद और वल्लभभाई पटेल जैसे नेताओं ने गांधीजी का साथ दिया।
◆ युवाओं की प्रतिक्रिया — बहुत-से युवा, जिन्होंने गांधीजी के कहने पर पढ़ाई छोड़ी थी, निराश होकर अहिंसा के रास्ते से हट गए। रामप्रसाद बिस्मिल, चंद्रशेखर आज़ाद और आगे चलकर भगत सिंह जैसे युवाओं ने क्रांतिकारी संगठन बनाए। इस प्रकार क्रांतिकारी आंदोलन का दूसरा चरण असहयोग की वापसी से ही निकला (अध्याय 11)।
◆ गिरफ़्तारी — जब तक आंदोलन ज़ोरों पर था, सरकार गांधीजी को छूने से डरती थी। आंदोलन रुकते ही 10 मार्च 1922 को उन्हें साबरमती आश्रम से गिरफ़्तार कर लिया गया।
◆ आरोप — उन पर "यंग इंडिया" में छपे तीन लेखों के आधार पर भारतीय दंड संहिता की धारा 124-ए (राजद्रोह) के अंतर्गत मुक़दमा चला। उनके साथ पत्र के प्रकाशक शंकरलाल बैंकर भी अभियुक्त थे।
◆ मुक़दमा — 18 मार्च 1922 को अहमदाबाद में न्यायाधीश सी. एन. ब्रूमफ़ील्ड की अदालत में सुनवाई हुई। गांधीजी ने अपना बचाव नहीं किया। उन्होंने अपराध स्वीकार किया और कहा कि एक अन्यायी सरकार के प्रति असंतोष फैलाना उनके लिए धर्म है, इसलिए न्यायाधीश या तो उन्हें अधिकतम दंड दें या अपना पद छोड़ दें।
◆ निर्णय — न्यायाधीश ने छह वर्ष की क़ैद सुनाई। यह वही सज़ा थी जो 1908 में तिलक को मिली थी। निर्णय सुनाते हुए न्यायाधीश ने कहा कि लाखों देशवासियों की दृष्टि में गांधीजी एक महान देशभक्त और नेता हैं, और यदि सरकार आगे चलकर उनकी सज़ा कम कर सके तो उनसे अधिक प्रसन्न कोई नहीं होगा। इसी कारण इसे "महान मुक़दमा" कहा जाता है।
◆ रिहाई — गांधीजी को पूना की यरवदा जेल में रखा गया। अपेंडिसाइटिस के ऑपरेशन के बाद स्वास्थ्य के आधार पर उन्हें 5 फ़रवरी 1924 को रिहा कर दिया गया। इस प्रकार छह में से लगभग दो वर्ष ही उन्होंने जेल में काटे।
🔍 आसान परिभाषा: राजद्रोह (धारा 124-ए) |
📘 परिभाषा: भारतीय दंड संहिता की वह धारा, जिसके अनुसार बोलकर, लिखकर या किसी भी तरह से क़ानून द्वारा स्थापित सरकार के प्रति घृणा या असंतोष फैलाना दंडनीय अपराध था। |
💡 आसान भाषा में: अंग्रेज़ सरकार इस धारा का प्रयोग उन नेताओं और संपादकों को जेल भेजने के लिए करती थी, जो अपने लेखों या भाषणों में सरकार की कड़ी आलोचना करते थे। 🏠 उदाहरण: इसी धारा में तिलक को 1897 और 1908 में सज़ा हुई और 1922 में गांधीजी को छह वर्ष की सज़ा मिली। गांधीजी ने अदालत में इसे "नागरिक की स्वतंत्रता को दबाने के लिए बनी धाराओं की राजकुमार" कहा। |
"एक वर्ष में स्वराज" का वादा पूरा नहीं हुआ, इसलिए तात्कालिक दृष्टि से आंदोलन अपने घोषित लक्ष्य तक नहीं पहुँचा। पर किसी आंदोलन को केवल इस कसौटी पर नहीं परखा जाता कि उसने तुरंत क्या पाया। यह भी देखना होता है कि उसने जनता और संगठन को कितना बदला। इस दृष्टि से असहयोग ने भारतीय राजनीति का चेहरा बदल दिया।
◆ पहला अखिल भारतीय जन-आंदोलन — पहली बार किसान, मज़दूर, कारीगर, व्यापारी, छात्र और महिलाएँ एक साथ आंदोलन में उतरे। इससे पहले के आंदोलन या तो किसी एक प्रांत तक सीमित थे या पढ़े-लिखे वर्ग तक।
◆ कांग्रेस जनता की संस्था बनी — कांग्रेस पर यह आरोप लगता था कि वह मुट्ठी भर शिक्षित लोगों की संस्था है। नागपुर अधिवेशन (1920) में सदस्यता शुल्क घटाकर चार आना किया गया और संगठन गाँव तक पहुँचाया गया, जिससे यह आरोप समाप्त हो गया।
◆ भय का अंत — जनता के मन से ब्रिटिश सत्ता और जेल का डर निकल गया। जेल जाना अब अपमान नहीं, सम्मान की बात हो गई। यही असहयोग की सबसे बड़ी मनोवैज्ञानिक देन थी।
◆ हिंदू-मुस्लिम एकता — मालाबार को छोड़कर पूरे देश में हिंदू और मुसलमान कंधे से कंधा मिलाकर चले। ऐसी एकता इसके बाद फिर कभी देखने को नहीं मिली।
◆ आत्मनिर्भरता की चेतना — खादी, चरखा और राष्ट्रीय शिक्षा संस्थाओं ने यह भाव जगाया कि भारतीय अपने काम स्वयं चला सकते हैं। जामिया मिल्लिया, काशी विद्यापीठ और गुजरात विद्यापीठ जैसी संस्थाएँ इसी की देन हैं।
◆ नए नेताओं का उदय — मौलाना आज़ाद, डॉ. अंसारी, सैफ़ुद्दीन किचलू, वल्लभभाई पटेल, राजेंद्र प्रसाद, जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस जैसे नेता इसी आंदोलन से राष्ट्रीय मंच पर आए।
◆ स्वराज नहीं मिला — एक वर्ष में स्वराज का वादा पूरा न होने से बहुत-से लोग निराश हुए और कुछ समय के लिए राजनीति में शिथिलता आ गई।
◆ धर्म और राजनीति का मेल — ख़िलाफ़त जैसे धार्मिक मुद्दे को आंदोलन से जोड़ने से एकता तो बनी, पर राजनीति में धार्मिक नेताओं का प्रभाव भी बढ़ा। जैसे ही ख़िलाफ़त का मुद्दा समाप्त हुआ, यह एकता टूट गई और 1920 के दशक में सांप्रदायिक दंगे बढ़े।
◆ बहिष्कार की व्यावहारिक कठिनाई — खादी मिल के कपड़े से महँगी थी, इसलिए ग़रीब उसे अधिक समय तक नहीं अपना सके। सरकारी स्कूलों और अदालतों के स्थान पर पर्याप्त राष्ट्रीय संस्थाएँ नहीं बन पाईं, इसलिए छात्र और वकील धीरे-धीरे लौट आए।
◆ अहिंसा का अधूरा अनुशासन — मोपला विद्रोह, बम्बई के दंगे और चौरी-चौरा ने दिखाया कि जनता को अहिंसक संघर्ष के लिए और प्रशिक्षण की ज़रूरत थी।
◆ किसानों की माँगें पीछे रह गईं — अवध और आंध्र जैसे क्षेत्रों में किसान ज़मींदारों के विरुद्ध भी लड़ना चाहते थे, पर कांग्रेस नेतृत्व ने उन्हें रोका, क्योंकि वह ज़मींदारों को भी साथ रखना चाहता था।
📌 याद रखें चौरी-चौरा कांड 4 फ़रवरी 1922 को गोरखपुर ज़िले में हुआ और इसमें 22 पुलिसकर्मी मारे गए। आंदोलन वापस लेने का निर्णय 12 फ़रवरी 1922 को बारडोली (गुजरात) में हुआ। घटना का स्थान और निर्णय का स्थान अलग-अलग हैं, इन्हें आपस में न मिलाएँ। उस समय वायसराय लॉर्ड रीडिंग थे। गांधीजी को छह वर्ष की सज़ा न्यायाधीश ब्रूमफ़ील्ड ने सुनाई, पर वे फ़रवरी 1924 में ही रिहा हो गए। |
असहयोग की वापसी और गांधीजी की गिरफ़्तारी के बाद देश के सामने यह प्रश्न था — अब क्या करें? आंदोलन रुक चुका था, नेता जेल में थे और जनता थकी हुई थी। 1922 से 1929 तक के वर्षों को इसीलिए राष्ट्रीय आंदोलन का "विराम काल" कहा जाता है। पर यह ख़ाली समय नहीं था। इन वर्षों में कांग्रेस के भीतर नई बहस चली, नए दल बने और अंत में देश फिर एक बड़े संघर्ष के लिए तैयार हुआ। नीचे का चार्ट 1922 से 1930 तक की आठ कड़ियाँ एक नज़र में दिखाता है। इस खंड और अगले दो खंडों में ये आठों कड़ियाँ इसी क्रम में विस्तार से समझाई गई हैं।

◆ 1922–1923: स्वराज पार्टी — गया अधिवेशन में विधान परिषदों में जाने का प्रस्ताव गिर गया, इसलिए चित्तरंजन दास और मोतीलाल नेहरू ने कांग्रेस के भीतर ही नया दल बनाया (उपखंड 9.2)।
◆ 1923–1924: परिवर्तनवादी बनाम अपरिवर्तनवादी — चुनावों में स्वराजवादियों को सफलता मिली, गांधीजी रिहा हुए और बेलगाँव में दोनों धाराओं में समझौता हुआ (उपखंड 9.1, 9.3 और 9.5)।
◆ 1925: परिवर्तन का वर्ष — चित्तरंजन दास का निधन हुआ, विट्ठलभाई पटेल केंद्रीय विधानसभा के अध्यक्ष बने, कानपुर में सरोजिनी नायडू कांग्रेस अध्यक्ष बनीं और अखिल भारतीय चरखा संघ बना (उपखंड 9.4 से 9.7)।
◆ 8 नवंबर 1927: साइमन कमीशन — सात अंग्रेज़ सदस्यों वाले आयोग की घोषणा हुई और मद्रास अधिवेशन ने उसके बहिष्कार का निर्णय लिया (उपखंड 10.1)।
◆ 3 फ़रवरी 1928: "साइमन वापस जाओ" — आयोग के बम्बई पहुँचते ही देशव्यापी हड़ताल हुई, और लाहौर में लाला लाजपत राय पर लाठियाँ पड़ीं (उपखंड 10.2)।
◆ अगस्त 1928: नेहरू रिपोर्ट — भारतीयों ने स्वयं संविधान का प्रारूप बनाया, और इसी वर्ष बारडोली सत्याग्रह में वल्लभभाई पटेल "सरदार" बने (उपखंड 10.4 और 10.6)।
◆ 1929: निर्णायक वर्ष — जिन्ना ने चौदह सूत्र रखे, वायसराय इरविन ने डोमिनियन स्टेटस की घोषणा की, पर बातचीत विफल रही (उपखंड 10.5 और 11.1)।
◆ 1929–1930: पूर्ण स्वराज — लाहौर अधिवेशन ने पूर्ण स्वतंत्रता को लक्ष्य बनाया और 26 जनवरी 1930 को पहला स्वतंत्रता दिवस मनाया गया (उपखंड 11.2 से 11.4)।
1919 के अधिनियम से बनी विधान परिषदों के चुनाव नवंबर 1923 में होने थे। असहयोग के समय कांग्रेस ने 1920 के चुनावों का बहिष्कार किया था। अब प्रश्न यह था कि क्या इस बार भी बहिष्कार जारी रखा जाए। इस पर कांग्रेस दो धाराओं में बँट गई।
🔍 आसान परिभाषा: परिवर्तनवादी और अपरिवर्तनवादी |
📘 परिभाषा: परिवर्तनवादी वे कांग्रेसी नेता थे जो असहयोग के कार्यक्रम में परिवर्तन करके विधान परिषदों में प्रवेश करना चाहते थे। अपरिवर्तनवादी वे थे जो कार्यक्रम में कोई परिवर्तन नहीं चाहते थे और परिषदों के बहिष्कार पर टिके थे। |
💡 आसान भाषा में: सीधे शब्दों में, एक पक्ष कहता था कि "नीति बदलो और चुनाव लड़ो", जबकि दूसरा पक्ष कहता था कि "नीति मत बदलो, गाँवों में काम करो"। इसीलिए पहले को परिवर्तन के समर्थक और दूसरे को परिवर्तन के विरोधी कहा गया। 🏠 उदाहरण: चित्तरंजन दास और मोतीलाल नेहरू परिवर्तनवादी थे और उन्होंने स्वराज पार्टी बनाई। वल्लभभाई पटेल, राजेंद्र प्रसाद और राजगोपालाचारी अपरिवर्तनवादी थे और खादी तथा आश्रमों के काम में लगे रहे। |
◆ नेता — इस धारा के प्रमुख नेता चित्तरंजन दास और मोतीलाल नेहरू थे। उनके साथ विट्ठलभाई पटेल, हकीम अजमल ख़ाँ, एन. सी. केलकर, एम. आर. जयकर और एस. श्रीनिवास अय्यंगार थे।
◆ तर्क — उनका कहना था कि जब जन-आंदोलन रुका हुआ है, तब राजनीतिक संघर्ष को जीवित रखने का कोई और मंच चाहिए। यदि कांग्रेसी परिषदों में नहीं जाएँगे तो वहाँ सरकार के समर्थक बैठेंगे और सरकार दावा करेगी कि जनता उसके साथ है। इसलिए परिषदों में जाकर हर सरकारी प्रस्ताव का विरोध किया जाए, बजट गिराया जाए और दुनिया को दिखाया जाए कि ये सुधार खोखले हैं। उनका नारा था — परिषदों को "भीतर से तोड़ो"।
◆ नेता — इस धारा में वल्लभभाई पटेल, राजेंद्र प्रसाद, सी. राजगोपालाचारी और डॉ. एम. ए. अंसारी प्रमुख थे।
◆ तर्क — उनका कहना था कि परिषदों में जाना सरकार से सहयोग करना ही है। वहाँ जाकर नेता पद और सुविधाओं के मोह में पड़ जाएँगे और जनता से कट जाएँगे। असली काम गाँवों में है, जहाँ खादी, शिक्षा और अस्पृश्यता-निवारण जैसे रचनात्मक कार्यों से जनता को अगले संघर्ष के लिए तैयार करना चाहिए।
ध्यान देने की बात यह है कि दोनों धाराओं का लक्ष्य एक ही था — स्वराज। दोनों गांधीजी के नेतृत्व को मानते थे और दोनों 1907 के सूरत विभाजन जैसी टूट से बचना चाहते थे। मतभेद केवल इस बात पर था कि विराम के समय क्या किया जाए।
◆ गया अधिवेशन (दिसंबर 1922) — इस अधिवेशन के अध्यक्ष चित्तरंजन दास थे। उन्होंने परिषदों में प्रवेश का प्रस्ताव रखा, पर अपरिवर्तनवादियों के बहुमत ने उसे गिरा दिया। इस पर दास ने अध्यक्ष पद से और मोतीलाल नेहरू ने सचिव पद से त्यागपत्र दे दिया।
◆ पार्टी की स्थापना — 1 जनवरी 1923 को इलाहाबाद में "कांग्रेस-ख़िलाफ़त स्वराज पार्टी" बनी, जिसे संक्षेप में स्वराज पार्टी कहा जाता है। चित्तरंजन दास इसके अध्यक्ष और मोतीलाल नेहरू इसके सचिव बने। यह कांग्रेस से अलग दल नहीं था। इसके सदस्य कांग्रेस में ही रहे और कांग्रेस के पूरे कार्यक्रम को मानते रहे। केवल परिषद-प्रवेश के प्रश्न पर उनका रास्ता अलग था।
◆ कांग्रेस की अनुमति — सितंबर 1923 में दिल्ली में कांग्रेस का विशेष अधिवेशन हुआ, जिसके अध्यक्ष मौलाना अबुल कलाम आज़ाद थे। वे उस समय केवल 35 वर्ष के थे और कांग्रेस के सबसे युवा अध्यक्ष बने। इस अधिवेशन ने समझौते के रूप में कांग्रेसियों को चुनाव लड़ने की अनुमति दे दी।
चित्तरंजन दास (1870–1925) का परिचय यहाँ जान लेना चाहिए। वे कलकत्ता के प्रसिद्ध वकील थे, जिन्होंने 1908–09 के अलीपुर षड्यंत्र मुक़दमे में अरविंद घोष का सफल बचाव करके ख्याति पाई। असहयोग आंदोलन में उन्होंने अपनी भारी आमदनी वाली वकालत छोड़ दी, इसलिए जनता ने उन्हें "देशबंधु" कहा। वे सुभाष चंद्र बोस के राजनीतिक गुरु थे। 1923 में उन्होंने बंगाल के मुसलमानों के साथ एक समझौता किया, जिसे "बंगाल पैक्ट" कहा जाता है। 1924 में वे कलकत्ता नगर निगम के पहले महापौर चुने गए।
◆ नवंबर 1923 के चुनाव — तैयारी के लिए बहुत कम समय होने पर भी स्वराजवादियों ने अच्छी सफलता पाई। केंद्रीय विधानसभा की 101 निर्वाचित सीटों में से 42 उन्होंने जीतीं। मध्य प्रांत में उन्हें स्पष्ट बहुमत मिला और बंगाल में वे सबसे बड़े दल के रूप में उभरे। बम्बई और संयुक्त प्रांत में भी उनका प्रदर्शन अच्छा रहा।
◆ गठजोड़ — केंद्रीय विधानसभा में स्वराजवादियों ने मुहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व वाले निर्दलीय सदस्यों और मदन मोहन मालवीय जैसे उदारवादियों के साथ मिलकर एक साझा मोर्चा बनाया। इस मोर्चे ने सरकार को कई बार मतदान में हराया।
◆ संविधान के लिए सम्मेलन की माँग — फ़रवरी 1924 में मोतीलाल नेहरू ने विधानसभा में प्रस्ताव रखा कि भारत का संविधान बनाने के लिए भारतीय प्रतिनिधियों का एक गोलमेज सम्मेलन बुलाया जाए। यह प्रस्ताव पारित हो गया। दबाव में सरकार को 1919 के सुधारों की जाँच के लिए मुडीमैन समिति (1924) बनानी पड़ी।
◆ बजट पर आघात — स्वराजवादियों ने कई बार बजट की माँगें अस्वीकार करवाईं, जिससे वायसराय को अपने विशेष अधिकार से बजट पारित करना पड़ा। इससे सबके सामने आ गया कि असली सत्ता अब भी वायसराय और गवर्नरों के पास है, चुने हुए सदस्यों के पास नहीं।
◆ प्रांतों में द्वैध शासन ठप — बंगाल और मध्य प्रांत में स्वराजवादियों ने मंत्रियों के वेतन की माँगें गिरा दीं और मंत्रिमंडल बनाने से मना कर दिया। परिणाम यह हुआ कि इन प्रांतों में द्वैध शासन चल ही नहीं सका और गवर्नर को सारा शासन अपने हाथ में लेना पड़ा।
◆ विट्ठलभाई पटेल अध्यक्ष बने — अगस्त 1925 में स्वराजवादी नेता विट्ठलभाई पटेल (वल्लभभाई के बड़े भाई) केंद्रीय विधानसभा के पहले निर्वाचित भारतीय अध्यक्ष चुने गए। यह स्वराजवादियों की बड़ी प्रतिष्ठा की जीत थी।
◆ दमनकारी विधेयक की हार — 1928 में सरकार "सार्वजनिक सुरक्षा विधेयक" लाई, जिसका उद्देश्य साम्यवादी विचारों वाले विदेशियों को भारत से निकालना था। विधानसभा ने इसे गिरा दिया।
◆ नगरपालिकाओं में काम — 1923–24 में कांग्रेसी नेताओं ने नगरपालिकाओं के चुनाव भी जीते। चित्तरंजन दास कलकत्ता के महापौर बने और सुभाष चंद्र बोस उनके मुख्य कार्यकारी अधिकारी। इसी समय जवाहरलाल नेहरू इलाहाबाद, वल्लभभाई पटेल अहमदाबाद और राजेंद्र प्रसाद पटना की नगरपालिकाओं के अध्यक्ष बने। इससे इन नेताओं को प्रशासन चलाने का अनुभव मिला।
◆ चित्तरंजन दास का निधन — 16 जून 1925 को दार्जिलिंग में दास का निधन हो गया। पार्टी ने अपना सबसे प्रभावशाली नेता खो दिया और इसके बाद वह बिखरने लगी।
◆ "प्रत्युत्तरवादियों" की टूट — पार्टी के भीतर एक गुट, जिसमें एम. आर. जयकर और एन. सी. केलकर प्रमुख थे, चाहता था कि जहाँ सरकार सहयोग का हाथ बढ़ाए वहाँ उसका "प्रत्युत्तर" सहयोग से दिया जाए और मंत्री पद स्वीकार किए जाएँ। इन्हें "प्रत्युत्तरवादी" कहा गया। लाला लाजपत राय और मदन मोहन मालवीय ने भी अलग होकर चुनाव लड़ा। उनका तर्क था कि बहिष्कार की नीति से हिंदू हितों को हानि हो रही है।
◆ सदन से बहिर्गमन — लगातार विरोध के बाद भी सरकार की नीतियाँ नहीं बदलीं, क्योंकि वायसराय हर हारे हुए प्रस्ताव को अपने विशेष अधिकार से लागू कर देता था। निराश होकर मार्च 1926 में स्वराजवादी सदस्य विधानसभा से बाहर चले गए।
◆ 1926 के चुनाव — इन चुनावों में पार्टी का प्रदर्शन कमज़ोर रहा। केंद्र में उसकी सीटें घट गईं और मद्रास को छोड़कर प्रांतों में भी वह पिछड़ गई। सांप्रदायिक आधार पर मतदान बढ़ने से उसे हानि हुई।
◆ अंत — 1930 में लाहौर अधिवेशन के निर्णय के अनुसार स्वराजवादियों ने विधायिकाओं से त्यागपत्र दे दिया और सविनय अवज्ञा आंदोलन में शामिल हो गए। इस प्रकार स्वराज पार्टी का अध्याय समाप्त हुआ।
◆ सफलता — उन्होंने उस समय राजनीति को जीवित रखा जब जन-आंदोलन रुका हुआ था। उन्होंने 1919 के अधिनियम और द्वैध शासन का खोखलापन सबके सामने रख दिया। उनके भाषण अख़बारों में छपते थे, जिससे जनता की राजनीति में रुचि बनी रही। उन्होंने यह भी दिखाया कि विधायिका का उपयोग राष्ट्रीय उद्देश्य के लिए किया जा सकता है।
◆ सीमा — वे सरकार की नीतियों को वास्तव में बदल नहीं सके। परिषदों के भीतर के काम को वे बाहर जनता के संघर्ष से नहीं जोड़ पाए। अपरिवर्तनवादियों की आशंका के अनुसार कुछ सदस्य पद और सुविधाओं के मोह में भी पड़े। बंगाल में वे किसानों के पक्ष में खड़े नहीं हुए, जिससे मुस्लिम किसान उनसे दूर हो गए।
◆ रिहाई के बाद — फ़रवरी 1924 में रिहा होने पर गांधीजी ने पाया कि कांग्रेस दो धाराओं में बँटी है। वे स्वयं परिषद-प्रवेश के पक्ष में नहीं थे, पर वे कांग्रेस को टूटने नहीं देना चाहते थे।
◆ समझौता — नवंबर 1924 में गांधीजी, चित्तरंजन दास और मोतीलाल नेहरू के बीच समझौता हुआ कि स्वराजवादी कांग्रेस के अभिन्न अंग के रूप में परिषदों में काम करेंगे, और बाक़ी कांग्रेस रचनात्मक कार्य करेगी।
◆ बेलगाँव अधिवेशन (दिसंबर 1924) — इस अधिवेशन ने समझौते पर मुहर लगाई। इसकी अध्यक्षता गांधीजी ने की। यह एकमात्र अवसर था जब गांधीजी कांग्रेस के अध्यक्ष बने। यहाँ यह नियम भी बना कि कांग्रेस के सदस्य को हाथ से कता सूत देना होगा, ताकि हर सदस्य चरखे से जुड़े।
◆ कानपुर अधिवेशन (दिसंबर 1925) — इसकी अध्यक्षता सरोजिनी नायडू ने की। वे कांग्रेस की पहली भारतीय महिला अध्यक्ष थीं। (पहली महिला अध्यक्ष 1917 में एनी बेसेंट थीं, जो आयरिश मूल की थीं।)
जब स्वराजवादी परिषदों में सरकार से भिड़ रहे थे, तब गांधीवादी कार्यकर्ता चुपचाप गाँवों में काम कर रहे थे। यह काम अख़बारों की सुर्ख़ियों में नहीं आता था, पर अगले आंदोलन की नींव यहीं पड़ी।
◆ खादी और चरखा — गाँवों में चरखा चलाने और खादी बुनने के केंद्र खोले गए, जिससे ग़रीब स्त्रियों और बुनकरों को आमदनी मिली। सितंबर 1925 में गांधीजी ने अखिल भारतीय चरखा संघ बनाया, जो देशभर में खादी के उत्पादन और बिक्री की व्यवस्था करता था।
◆ राष्ट्रीय विद्यालय और आश्रम — गुजरात, बिहार और अन्य प्रांतों में सैकड़ों आश्रम बने, जहाँ युवा कार्यकर्ताओं को सादा जीवन और सेवा का प्रशिक्षण मिलता था। बारडोली ताल्लुके में कार्यकर्ताओं ने आदिवासी समुदायों के बीच शिक्षा और नशाबंदी का काम किया। इन्हीं कार्यकर्ताओं ने 1928 के बारडोली सत्याग्रह में गाँव-गाँव को संगठित किया।
◆ अस्पृश्यता-निवारण — त्रावणकोर के वैकोम में 1924–25 में मंदिर के पास की सड़कों पर अवर्णों के चलने के अधिकार के लिए सत्याग्रह हुआ, जिसे गांधीजी ने समर्थन दिया (अध्याय 9)।
◆ हिंदू-मुस्लिम एकता — सितंबर 1924 में पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत के कोहाट में भीषण दंगा हुआ। इससे व्यथित होकर गांधीजी ने दिल्ली में मौलाना मुहम्मद अली के घर पर 21 दिन का उपवास किया।
◆ महत्त्व — रचनात्मक कार्य ने कांग्रेस को गाँवों में स्थायी आधार दिया। इससे कार्यकर्ताओं की ऐसी टोली तैयार हुई, जो 1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन की रीढ़ बनी। इसलिए "विराम" का समय वास्तव में अगली लड़ाई की तैयारी का समय था।
इस दशक में कांग्रेस के बाहर भी कई नई धाराएँ उभरीं, जिन्होंने आगे की राजनीति पर गहरा असर डाला:
◆ सांप्रदायिकता का उभार — ख़िलाफ़त के मुद्दे के समाप्त होते ही हिंदू-मुस्लिम एकता बिखर गई। हिंदुओं में शुद्धि (धर्म बदल चुके लोगों को वापस लाना) और संगठन के आंदोलन चले, तो मुसलमानों में तबलीग़ (धर्म-प्रचार) और तंज़ीम (संगठन) के आंदोलन चले। देश के कई नगरों में दंगे हुए। दिसंबर 1926 में शुद्धि आंदोलन के नेता स्वामी श्रद्धानंद की हत्या कर दी गई।
◆ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ — 27 सितंबर 1925 को विजयादशमी के दिन नागपुर में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने इसकी स्थापना की।
◆ साम्यवादी और समाजवादी विचार — 1917 की रूसी क्रांति से प्रभावित होकर युवाओं में समाजवाद की ओर झुकाव बढ़ा। दिसंबर 1925 में कानपुर के सम्मेलन में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का संगठन बना। मज़दूर-किसान दल और मज़दूर संघ सक्रिय हुए (अध्याय 15)।
◆ क्रांतिकारी आंदोलन का दूसरा चरण — असहयोग की वापसी से निराश युवाओं ने 1924 में हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन बनाया, जिसने 1925 में काकोरी में सरकारी ख़ज़ाना लूटा (अध्याय 11)।
◆ युवा और छात्र संगठन — देशभर में युवा लीग और छात्र सम्मेलन होने लगे। जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस इन युवाओं के प्रिय नेता बनकर उभरे। ये दोनों कांग्रेस को पूर्ण स्वतंत्रता और समाजवाद की ओर ले जाना चाहते थे।
पहलू | परिवर्तनवादी (स्वराजवादी) | अपरिवर्तनवादी (गांधीवादी) |
प्रमुख नेता | इस धारा के नेता चित्तरंजन दास, मोतीलाल नेहरू और विट्ठलभाई पटेल थे। | इस धारा के नेता वल्लभभाई पटेल, राजेंद्र प्रसाद और राजगोपालाचारी थे। |
क्या चाहते थे | वे चुनाव लड़कर विधान परिषदों में जाना और वहाँ सरकार के हर काम में बाधा डालना चाहते थे। | वे परिषदों का बहिष्कार जारी रखकर गाँवों में रचनात्मक कार्य करना चाहते थे। |
मुख्य तर्क | उनका कहना था कि विराम के समय राजनीतिक संघर्ष का मंच ख़ाली नहीं छोड़ना चाहिए। | उनका कहना था कि परिषदों में जाने से नेता पद के मोह में पड़ेंगे और जनता से कट जाएँगे। |
मुख्य देन | उन्होंने 1919 के सुधारों का खोखलापन उजागर किया और राजनीति को जीवित रखा। | उन्होंने गाँवों में कार्यकर्ताओं का जाल बनाया, जो 1930 के आंदोलन की रीढ़ बना। |
1927 तक राष्ट्रीय आंदोलन शिथिल पड़ा था। स्वराज पार्टी कमज़ोर हो चुकी थी, सांप्रदायिक दंगे बढ़ रहे थे और कांग्रेस के पास कोई बड़ा मुद्दा नहीं था। ऐसे समय में ब्रिटिश सरकार के एक क़दम ने पूरे देश को फिर एक कर दिया। यह क़दम था साइमन कमीशन की नियुक्ति।
◆ पृष्ठभूमि — 1919 के भारत शासन अधिनियम में यह व्यवस्था थी कि दस वर्ष बाद एक आयोग बनाया जाएगा, जो यह जाँचेगा कि सुधार कैसे चल रहे हैं और आगे क्या किया जाए। इस हिसाब से आयोग 1929 में बनना था।
◆ दो वर्ष पहले नियुक्ति क्यों — ब्रिटेन में उस समय कंज़र्वेटिव दल की सरकार थी, जिसके प्रधानमंत्री स्टेनली बाल्डविन और भारत सचिव लॉर्ड बर्केनहेड थे। ब्रिटेन में 1929 में आम चुनाव होने थे और कंज़र्वेटिव दल को डर था कि वह हार जाएगा। वह नहीं चाहता था कि भारत के भविष्य का निर्णय लेबर दल की सरकार के हाथ में जाए, जिसे वह भारत के प्रति अधिक नरम मानता था। इसलिए 8 नवंबर 1927 को ही आयोग की घोषणा कर दी गई।
◆ नाम और सदस्य — इसका औपचारिक नाम "भारतीय वैधानिक आयोग" था। अध्यक्ष सर जॉन साइमन के नाम पर यह साइमन कमीशन कहलाया। इसमें कुल सात सदस्य थे और सातों ब्रिटिश संसद के अंग्रेज़ सदस्य थे। इनमें क्लीमेंट एटली भी थे, जो आगे चलकर 1947 में, भारत की स्वतंत्रता के समय, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री थे।
◆ अपमान की भावना — जो आयोग भारत के भविष्य का संविधान तय करने वाला था, उसमें एक भी भारतीय नहीं था। इसका सीधा अर्थ यह था कि अंग्रेज़ भारतीयों को अपने ही देश के बारे में निर्णय लेने योग्य नहीं मानते। इसी कारण इसे "श्वेत कमीशन" कहा गया और लगभग सभी दलों ने इसे राष्ट्रीय अपमान माना।
◆ कांग्रेस का निर्णय — दिसंबर 1927 में कांग्रेस का मद्रास अधिवेशन हुआ, जिसके अध्यक्ष डॉ. एम. ए. अंसारी थे। यहाँ आयोग के "हर चरण पर और हर रूप में" बहिष्कार का निर्णय हुआ। इसी अधिवेशन में जवाहरलाल नेहरू के प्रयास से पहली बार एक प्रस्ताव पारित हुआ, जिसमें "पूर्ण स्वतंत्रता" को भारतीय जनता का लक्ष्य बताया गया।
◆ अन्य दलों का रुख़ — हिंदू महासभा, उदारवादियों के लिबरल फ़ेडरेशन और मुस्लिम लीग के जिन्ना गुट ने भी बहिष्कार का समर्थन किया। मुस्लिम लीग इस प्रश्न पर बँट गई, क्योंकि मुहम्मद शफ़ी के गुट ने आयोग से सहयोग का निर्णय लिया। मद्रास की जस्टिस पार्टी और पंजाब की यूनियनिस्ट पार्टी ने भी आयोग का साथ दिया।
◆ आगमन और हड़ताल — 3 फ़रवरी 1928 को आयोग बम्बई पहुँचा। उस दिन पूरे देश में हड़ताल रही। आयोग जिस नगर में गया, वहाँ उसका स्वागत काले झंडों और "साइमन वापस जाओ" के नारे से हुआ।
◆ लाहौर — लाला लाजपत राय पर लाठियाँ — 30 अक्टूबर 1928 को आयोग लाहौर पहुँचा। विरोध जुलूस का नेतृत्व लाला लाजपत राय कर रहे थे। पुलिस ने जुलूस पर लाठीचार्ज किया और वृद्ध लाला जी की छाती पर लाठियाँ बरसाईं। उसी शाम उन्होंने सभा में कहा — "मुझ पर पड़ी एक-एक लाठी ब्रिटिश साम्राज्य के ताबूत की कील साबित होगी।" 17 नवंबर 1928 को उनका निधन हो गया। इसी का बदला लेने के लिए भगत सिंह और उनके साथियों ने दिसंबर 1928 में पुलिस अधिकारी सांडर्स को मारा (अध्याय 11)।
◆ लखनऊ — यहाँ जुलूस का नेतृत्व करते हुए जवाहरलाल नेहरू और गोविंद वल्लभ पंत पुलिस की लाठियों से घायल हुए। पंत को ऐसी चोट लगी जिसका असर जीवन भर रहा।
◆ मद्रास — यहाँ टी. प्रकाशम ने पुलिस की बंदूकों के सामने अपना सीना खोल दिया। इस साहस के कारण उन्हें "आंध्र केसरी" कहा गया।
📖 लाला लाजपत राय (1865–1928) — एक परिचय लाला लाजपत राय का जन्म पंजाब में हुआ। वे "लाल-बाल-पाल" की प्रसिद्ध त्रयी के सदस्य और गरम दल के प्रमुख नेता थे, जिन्हें जनता "पंजाब केसरी" कहती थी। वे आर्य समाज से जुड़े रहे और लाहौर में दयानंद एंग्लो-वैदिक कॉलेज की स्थापना में सहयोगी रहे। 1907 में उन्हें बिना मुक़दमे के बर्मा के मांडले में निर्वासित किया गया। 1920 में उन्होंने कलकत्ता के उस विशेष अधिवेशन की अध्यक्षता की, जिसने असहयोग का प्रस्ताव स्वीकार किया, और उसी वर्ष वे अखिल भारतीय मज़दूर संघ कांग्रेस के पहले अध्यक्ष बने। "अनहैप्पी इंडिया" उनकी प्रसिद्ध पुस्तक है। |
आयोग ने दो बार भारत का दौरा किया और मई 1930 में अपनी रिपोर्ट प्रकाशित की। इसकी मुख्य सिफ़ारिशें ये थीं:
1. प्रांतों में द्वैध शासन समाप्त किया जाए और वहाँ सारे विभाग विधायिका के प्रति उत्तरदायी मंत्रियों को सौंपे जाएँ।
2. केंद्र में उत्तरदायी सरकार नहीं दी जाए, यानी केंद्र में सत्ता पहले की तरह वायसराय के हाथ में रहे।
3. भविष्य में ब्रिटिश भारत और देशी रियासतों को मिलाकर एक संघ बनाया जाए।
4. मताधिकार का विस्तार किया जाए और विधायिकाओं का आकार बढ़ाया जाए।
5. पृथक निर्वाचन की व्यवस्था जारी रहे।
6. बर्मा को भारत से अलग किया जाए और सिंध को बम्बई से अलग करने पर विचार हो।
7. पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत और बलूचिस्तान को स्थानीय विधायिका दी जाए, और सेना में भारतीयों की संख्या बढ़ाई जाए।
रिपोर्ट में डोमिनियन स्टेटस का कोई उल्लेख नहीं था, इसलिए भारतीय नेताओं ने इसे ठुकरा दिया। फिर भी इसकी कई बातें, जैसे प्रांतीय स्वायत्तता, संघ की योजना और बर्मा का अलगाव, आगे चलकर 1935 के भारत शासन अधिनियम में शामिल हुईं (अध्याय 3)।
◆ आंदोलन पर प्रभाव — साइमन कमीशन के विरोध ने सोए हुए राष्ट्रीय आंदोलन को जगा दिया। कांग्रेस को एक ऐसा मुद्दा मिला, जिस पर लगभग सभी दल एक थे। युवाओं की एक नई पीढ़ी सड़कों पर उतरी और जवाहरलाल नेहरू तथा सुभाष चंद्र बोस राष्ट्रीय नेता के रूप में स्थापित हुए।
◆ बर्केनहेड की चुनौती — भारत सचिव लॉर्ड बर्केनहेड ने ताना मारा कि भारतीय आपस में इतने बँटे हुए हैं कि वे ऐसा कोई संविधान बना ही नहीं सकते, जिस पर सभी दल सहमत हों। भारतीय नेताओं ने इस चुनौती को स्वीकार किया, और इसी से नेहरू रिपोर्ट का जन्म हुआ।
🔍 आसान परिभाषा: डोमिनियन स्टेटस (स्वशासित उपनिवेश का दर्जा) |
📘 परिभाषा: ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर ऐसा दर्जा, जिसमें देश की अपनी संसद और अपनी सरकार होती है, जो आंतरिक और बाहरी मामलों में स्वतंत्र होती है, पर ब्रिटेन का सम्राट उस देश का औपचारिक राष्ट्राध्यक्ष बना रहता है। |
💡 आसान भाषा में: इसे ऐसे समझिए कि घर के सारे निर्णय आप स्वयं लेते हैं, पर घर के दरवाज़े पर नाम अब भी पुराने मालिक का लिखा है। देश अपना शासन स्वयं चलाता है, पर ब्रिटिश ताज से उसका नाता बना रहता है। 🏠 उदाहरण: उस समय कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड और दक्षिण अफ़्रीका को यह दर्जा प्राप्त था। नेहरू रिपोर्ट ने भारत के लिए यही माँगा। 15 अगस्त 1947 से 26 जनवरी 1950 तक भारत भी एक डोमिनियन रहा। |
◆ समिति का गठन — फ़रवरी 1928 में दिल्ली में सर्वदलीय सम्मेलन हुआ। मई 1928 में बम्बई की बैठक में संविधान का प्रारूप बनाने के लिए मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में एक समिति बनाई गई। जवाहरलाल नेहरू इसके सचिव थे। सदस्यों में तेज बहादुर सप्रू (उदारवादी), अली इमाम और शुऐब क़ुरैशी (मुस्लिम), एम. एस. अणे और एम. आर. जयकर (हिंदू महासभा), मंगल सिंह (सिख), जी. आर. प्रधान और सुभाष चंद्र बोस थे।
◆ प्रस्तुति — समिति ने अगस्त 1928 में अपनी रिपोर्ट दी, जिसे लखनऊ के सर्वदलीय सम्मेलन ने स्वीकार किया। यह भारतीयों द्वारा अपने देश के लिए बनाया गया पहला संविधान-प्रारूप था।
1. डोमिनियन स्टेटस — भारत को ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर वही दर्जा मिले जो कनाडा और ऑस्ट्रेलिया को प्राप्त है।
2. मौलिक अधिकार — रिपोर्ट में 19 मौलिक अधिकारों की सूची थी, जिनमें बोलने और सभा करने की स्वतंत्रता, धर्म की स्वतंत्रता, क़ानून के सामने समानता, स्त्री और पुरुष के समान अधिकार और संघ बनाने का अधिकार शामिल थे।
3. संयुक्त निर्वाचन — पृथक निर्वाचन समाप्त किया जाए। उसके स्थान पर संयुक्त निर्वाचन हो, जिसमें अल्पसंख्यकों के लिए उनकी जनसंख्या के अनुपात में सीटें आरक्षित रहें। मुसलमानों को यह आरक्षण केंद्र में और उन प्रांतों में मिलना था जहाँ वे अल्पसंख्यक थे।
4. वयस्क मताधिकार — हर वयस्क स्त्री और पुरुष को मत देने का अधिकार हो।
5. संसदीय और उत्तरदायी शासन — केंद्र और प्रांतों, दोनों में सरकार विधायिका के प्रति उत्तरदायी हो। केंद्र में दो सदनों वाली संसद हो।
6. संघीय ढाँचा, पर मज़बूत केंद्र — शक्तियों का केंद्र और प्रांतों में बँटवारा हो, पर अवशिष्ट शक्तियाँ (जो किसी सूची में न हों) केंद्र के पास रहें।
7. धर्मनिरपेक्ष राज्य — राज्य का कोई धर्म नहीं होगा और राज्य धर्म से अलग रहेगा।
8. भाषाई प्रांत — प्रांतों का पुनर्गठन भाषा के आधार पर हो। सिंध को बम्बई से अलग प्रांत बनाया जाए और पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत को अन्य प्रांतों जैसा दर्जा मिले।
9. सर्वोच्च न्यायालय — देश में एक सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना हो।
इन प्रावधानों को ध्यान से देखिए। मौलिक अधिकार, वयस्क मताधिकार, संसदीय शासन, धर्मनिरपेक्षता और भाषाई प्रांत — ये सभी बातें आगे चलकर स्वतंत्र भारत के संविधान में आईं। इसलिए नेहरू रिपोर्ट को हमारे संविधान का एक महत्त्वपूर्ण पूर्वज माना जाता है।
◆ युवा कांग्रेसियों का विरोध — जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस डोमिनियन स्टेटस से संतुष्ट नहीं थे। वे पूर्ण स्वतंत्रता चाहते थे। उन्होंने नवंबर 1928 में "इंडिपेंडेंस फ़ॉर इंडिया लीग" बनाई, ताकि कांग्रेस पर पूर्ण स्वतंत्रता को लक्ष्य बनाने का दबाव डाला जा सके। यहाँ पुत्र जवाहरलाल अपने पिता मोतीलाल की रिपोर्ट के ही विरोध में खड़े थे।
◆ मुस्लिम लीग का विरोध — लीग के बड़े हिस्से को पृथक निर्वाचन की समाप्ति और अवशिष्ट शक्तियों का केंद्र के पास रहना स्वीकार नहीं था। उन्हें डर था कि हिंदू बहुमत वाला मज़बूत केंद्र मुसलमानों के हितों की अनदेखी करेगा।
◆ हिंदू महासभा और सिख नेताओं का विरोध — हिंदू महासभा सिंध को अलग प्रांत बनाने और मुसलमानों के लिए सीटों के आरक्षण के विरुद्ध थी। पंजाब के सिख नेता अपने लिए भी विशेष प्रतिनिधित्व चाहते थे।
◆ कलकत्ता सर्वदलीय सम्मेलन (दिसंबर 1928) — यहाँ जिन्ना ने रिपोर्ट में तीन संशोधन रखे। पहला, केंद्रीय विधायिका में मुसलमानों को एक-तिहाई सीटें मिलें। दूसरा, पंजाब और बंगाल में वयस्क मताधिकार लागू होने तक मुसलमानों को जनसंख्या के अनुपात में सीटें मिलें। तीसरा, अवशिष्ट शक्तियाँ प्रांतों के पास रहें। हिंदू महासभा के नेताओं के कड़े विरोध के कारण ये संशोधन अस्वीकार हो गए। जिन्ना ने इसे "रास्तों का अलग होना" कहा।
कलकत्ता में अपने संशोधन ठुकराए जाने के बाद जिन्ना ने मार्च 1929 में दिल्ली में मुस्लिम लीग की बैठक में मुसलमानों की माँगों को चौदह बिंदुओं में समेटकर रखा। ये "चौदह सूत्र" आगे के वर्षों में लीग की हर बातचीत का आधार बने। इनमें मुख्य माँगें इस प्रकार थीं:
1. भारत का संविधान संघीय हो और अवशिष्ट शक्तियाँ प्रांतों के पास रहें।
2. सभी प्रांतों को समान स्वायत्तता मिले।
3. सभी विधायिकाओं में अल्पसंख्यकों को पर्याप्त और प्रभावी प्रतिनिधित्व मिले, पर किसी प्रांत में बहुमत को घटाकर अल्पमत न बनाया जाए।
4. केंद्रीय विधायिका में मुसलमानों को कम से कम एक-तिहाई सीटें मिलें।
5. पृथक निर्वाचन जारी रहे, पर कोई भी समुदाय चाहे तो उसे छोड़कर संयुक्त निर्वाचन अपना सके।
6. प्रांतों की सीमाओं में ऐसा कोई बदलाव न हो, जिससे पंजाब, बंगाल और पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत में मुस्लिम बहुमत प्रभावित हो।
7. सभी समुदायों को पूर्ण धार्मिक स्वतंत्रता मिले।
8. कोई भी विधेयक पारित न हो, यदि किसी समुदाय के तीन-चौथाई सदस्य उसे अपने समुदाय के हितों के विरुद्ध मानकर उसका विरोध करें।
9. सिंध को बम्बई प्रांत से अलग किया जाए।
10. पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत और बलूचिस्तान में भी अन्य प्रांतों की तरह सुधार लागू हों।
11. सरकारी सेवाओं और स्थानीय संस्थाओं में मुसलमानों को उचित हिस्सा मिले।
12. मुस्लिम संस्कृति, शिक्षा, भाषा, धर्म और निजी क़ानूनों की रक्षा की संवैधानिक व्यवस्था हो।
13. केंद्र या प्रांत के किसी भी मंत्रिमंडल में कम से कम एक-तिहाई मुस्लिम मंत्री हों।
14. संघ में शामिल प्रांतों की सहमति के बिना केंद्रीय विधायिका संविधान में परिवर्तन न कर सके।
महत्त्व — नेहरू रिपोर्ट एक मज़बूत केंद्र और संयुक्त निर्वाचन चाहती थी, जबकि चौदह सूत्र मज़बूत प्रांत और पृथक निर्वाचन चाहते थे। इस प्रकार साइमन कमीशन के विरोध में जो एकता बनी थी, वह संविधान के प्रश्न पर टूट गई। कांग्रेस और लीग के बीच की यह दूरी आगे के वर्षों में बढ़ती गई।
विषय | नेहरू रिपोर्ट (अगस्त 1928) | जिन्ना के चौदह सूत्र (मार्च 1929) |
निर्वाचन पद्धति | रिपोर्ट ने पृथक निर्वाचन समाप्त करके आरक्षित सीटों वाला संयुक्त निर्वाचन माँगा। | सूत्रों में पृथक निर्वाचन को जारी रखने की माँग थी। |
अवशिष्ट शक्तियाँ | रिपोर्ट के अनुसार अवशिष्ट शक्तियाँ केंद्र के पास रहनी थीं। | सूत्रों के अनुसार अवशिष्ट शक्तियाँ प्रांतों के पास रहनी थीं। |
केंद्र में मुस्लिम सीटें | रिपोर्ट ने जनसंख्या के अनुपात में सीटें देने की बात कही। | सूत्रों में कम से कम एक-तिहाई सीटों की माँग थी। |
सिंध और सीमा प्रांत | रिपोर्ट ने सिंध को अलग प्रांत और सीमा प्रांत को पूरा दर्जा देने की बात मानी। | सूत्रों में भी यही माँग थी, इसलिए इस विषय पर दोनों में सहमति थी। |
जिस वर्ष नगरों में साइमन कमीशन का विरोध हो रहा था, उसी वर्ष गुजरात के एक ताल्लुके के किसानों ने दिखाया कि अनुशासित अहिंसक संघर्ष से सरकार को झुकाया जा सकता है।
◆ पृष्ठभूमि — बारडोली गुजरात के सूरत ज़िले का एक ताल्लुका है। 1926 में बम्बई सरकार ने यहाँ का लगान लगभग 30 प्रतिशत बढ़ा दिया, जिसे विरोध के बाद घटाकर लगभग 22 प्रतिशत किया गया। किसानों का कहना था कि कपास के दाम गिर चुके हैं और यह वृद्धि बिना सही जाँच के की गई है। यह वही बारडोली था, जहाँ 1922 से गांधीवादी कार्यकर्ता आश्रम बनाकर रचनात्मक कार्य कर रहे थे।
◆ नेतृत्व — किसानों ने वल्लभभाई पटेल को नेतृत्व के लिए बुलाया। पटेल ने पहले किसानों को परखा कि वे कष्ट सहने को तैयार हैं या नहीं, और फिर फ़रवरी 1928 में लगान न देने का सत्याग्रह शुरू किया। माँग केवल यह थी कि सरकार एक निष्पक्ष जाँच बैठाए।
◆ संगठन — पटेल ने पूरे ताल्लुके को कई छावनियों (शिविरों) में बाँटा और हर छावनी एक अनुभवी कार्यकर्ता को सौंपी। रोज़ "बारडोली सत्याग्रह पत्रिका" छपती थी, जो गाँव-गाँव में समाचार और निर्देश पहुँचाती थी। स्वयंसेवक सरकारी अधिकारियों की हर गतिविधि की सूचना देते थे। जो कोई लगान दे देता या ज़ब्त ज़मीन ख़रीदता, उसका सामाजिक बहिष्कार किया जाता था।
◆ महिलाओं की भागीदारी — इस सत्याग्रह में महिलाओं ने बड़ी संख्या में भाग लिया। मीठूबेन पेटिट, भक्तिबा, मणिबेन पटेल (वल्लभभाई की पुत्री) और शारदा मेहता जैसी कार्यकर्ताओं ने गाँव-गाँव में महिलाओं को संगठित किया। बारडोली की महिलाओं ने ही वल्लभभाई को "सरदार" की उपाधि दी।
◆ सरकार का दमन — सरकार ने किसानों की ज़मीनें, भैंसें और घर का सामान ज़ब्त किया और ज़मीनें नीलाम कीं। पर किसान डटे रहे। विरोध में के. एम. मुंशी और लालजी नारणजी ने बम्बई विधान परिषद से त्यागपत्र दे दिया। बम्बई के मज़दूरों ने हड़ताल की चेतावनी दी। 2 अगस्त 1928 को गांधीजी स्वयं बारडोली पहुँच गए, ताकि पटेल की गिरफ़्तारी की स्थिति में वे नेतृत्व सँभाल सकें।
◆ परिणाम — अगस्त 1928 में सरकार को झुकना पड़ा। उसने न्यायिक अधिकारी ब्रूमफ़ील्ड और राजस्व अधिकारी मैक्सवेल की जाँच समिति बनाई। समिति ने पाया कि लगान वृद्धि अनुचित थी और उसे घटाकर लगभग 6 प्रतिशत कर दिया। ज़ब्त ज़मीनें किसानों को लौटा दी गईं।
◆ महत्त्व — बारडोली ने सिद्ध किया कि रचनात्मक कार्य से तैयार हुए कार्यकर्ता और अनुशासित किसान मिलकर सरकार को हरा सकते हैं। इसने वल्लभभाई पटेल को राष्ट्रीय नेता बना दिया और देश को 1930 के आंदोलन के लिए आत्मविश्वास दिया। किसान आंदोलनों का पूरा विवरण अध्याय 15 में है।
📌 याद रखें — दो बारडोली बारडोली का नाम इस अध्याय में दो बार आता है। 1922 में यहाँ से सविनय अवज्ञा शुरू होनी थी, पर चौरी-चौरा के कारण यहीं आंदोलन वापस लेने का प्रस्ताव पारित हुआ। 1928 में यहाँ वल्लभभाई पटेल के नेतृत्व में सफल लगान-विरोधी सत्याग्रह हुआ। गांधीजी के मुक़दमे के न्यायाधीश ब्रूमफ़ील्ड (1922) ही बारडोली की जाँच समिति (1928) के सदस्य थे। |
◆ पृष्ठभूमि — कांग्रेस के भीतर अब दो मत थे। मोतीलाल नेहरू और पुराने नेता नेहरू रिपोर्ट के डोमिनियन स्टेटस पर टिके रहना चाहते थे, क्योंकि उस पर कई दलों की सहमति बड़ी कठिनाई से बनी थी। जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस तुरंत पूर्ण स्वतंत्रता की घोषणा चाहते थे।
◆ गांधीजी का बीच का रास्ता — मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में हुए इस अधिवेशन में गांधीजी, जो कई वर्षों बाद सक्रिय राजनीति में लौटे थे, ने समझौते का प्रस्ताव रखा। पहले सरकार को दो वर्ष का समय देने की बात थी, जिसे युवाओं के दबाव में घटाकर एक वर्ष किया गया।
◆ निर्णय — कांग्रेस ने घोषणा की कि यदि ब्रिटिश सरकार 31 दिसंबर 1929 तक नेहरू रिपोर्ट के अनुसार डोमिनियन स्टेटस नहीं देती, तो कांग्रेस पूर्ण स्वतंत्रता को अपना लक्ष्य बनाएगी और उसके लिए सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू करेगी। इस प्रकार 1929 का पूरा वर्ष एक उलटी गिनती बन गया।
1929 का वर्ष घटनाओं से भरा था। गांधीजी देशभर में घूमकर जनता को आने वाले संघर्ष के लिए तैयार कर रहे थे और विदेशी कपड़े के बहिष्कार का अभियान चला रहे थे। मार्च में सरकार ने मज़दूर नेताओं को पकड़कर मेरठ षड्यंत्र मुक़दमा चलाया। अप्रैल में भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने केंद्रीय विधानसभा में बम फेंका। सितंबर में क्रांतिकारी जतिन दास ने जेल में लंबी भूख हड़ताल के बाद प्राण त्याग दिए, जिससे पूरा देश हिल गया। इसी बीच ब्रिटेन में सरकार बदल गई।
◆ पृष्ठभूमि — मई 1929 के चुनावों के बाद ब्रिटेन में लेबर दल की सरकार बनी, जिसके प्रधानमंत्री रैम्ज़े मैकडोनाल्ड थे। वायसराय लॉर्ड इरविन नई सरकार से परामर्श करने लंदन गए।
◆ इरविन घोषणा (31 अक्टूबर 1929) — लौटकर इरविन ने घोषणा की कि 1917 की घोषणा में यह बात निहित है कि भारत की संवैधानिक प्रगति का स्वाभाविक लक्ष्य डोमिनियन स्टेटस की प्राप्ति है। उन्होंने यह भी कहा कि साइमन कमीशन की रिपोर्ट आने के बाद लंदन में एक गोलमेज सम्मेलन बुलाया जाएगा, जिसमें भारतीय नेता भी बैठेंगे। इसे "दीपावली घोषणा" भी कहा जाता है।
◆ कमी क्या थी — घोषणा में यह नहीं बताया गया था कि डोमिनियन स्टेटस कब मिलेगा। यह केवल दूर के लक्ष्य की बात थी, कोई समय-सीमा नहीं थी।
◆ दिल्ली घोषणापत्र (2 नवंबर 1929) — गांधीजी, मोतीलाल नेहरू, मदन मोहन मालवीय, तेज बहादुर सप्रू और अन्य नेताओं ने एक संयुक्त वक्तव्य जारी किया। उन्होंने घोषणा का स्वागत किया, पर सहयोग के लिए चार शर्तें रखीं। पहली, गोलमेज सम्मेलन यह तय करने के लिए न हो कि डोमिनियन स्टेटस कब दिया जाए, बल्कि उसका संविधान बनाने के लिए हो। दूसरी, सम्मेलन में कांग्रेस का बहुमत हो। तीसरी, राजनीतिक बंदियों को रिहा किया जाए। चौथी, सरकार मेल-मिलाप की नीति अपनाए। जवाहरलाल नेहरू ने इस पर बहुत हिचकते हुए हस्ताक्षर किए और सुभाष चंद्र बोस ने हस्ताक्षर करने से मना कर दिया।
◆ बातचीत विफल (23 दिसंबर 1929) — गांधीजी, मोतीलाल नेहरू, जिन्ना, सप्रू और विट्ठलभाई पटेल वायसराय से मिले। ब्रिटेन में कंज़र्वेटिव नेताओं के कड़े विरोध के कारण इरविन यह आश्वासन नहीं दे सके कि सम्मेलन डोमिनियन स्टेटस का संविधान बनाएगा। बातचीत टूट गई। अब टकराव निश्चित था, और कुछ ही दिन बाद लाहौर में कांग्रेस का अधिवेशन होना था।
◆ अध्यक्ष का चुनाव — अधिकांश प्रांतीय कांग्रेस समितियों ने अध्यक्ष के लिए गांधीजी का नाम सुझाया था। पर गांधीजी ने पद लेने से मना किया और जवाहरलाल नेहरू का नाम आगे बढ़ाया। उनका मानना था कि आने वाले संघर्ष में युवाओं का जोश चाहिए और नेहरू युवाओं के सबसे प्रिय नेता हैं। इस प्रकार चालीस वर्ष के जवाहरलाल ने अध्यक्ष पद अपने पिता मोतीलाल नेहरू से ग्रहण किया, जो 1928 में अध्यक्ष थे। इसे कांग्रेस में पीढ़ी-परिवर्तन का प्रतीक माना जाता है।
◆ अध्यक्षीय भाषण — नेहरू ने अपने भाषण में कहा कि वे समाजवादी और गणतंत्रवादी हैं और राजाओं-महाराजाओं में उनका विश्वास नहीं है। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता का अर्थ केवल विदेशी शासन का अंत नहीं है, बल्कि किसानों और मज़दूरों को शोषण से मुक्ति दिलाना भी है।
◆ पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव — कलकत्ता में दी गई एक वर्ष की अवधि 31 दिसंबर 1929 की आधी रात को समाप्त हो रही थी। ठीक उसी समय कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव पारित किया। नेहरू ने रावी नदी के तट पर "इंक़लाब ज़िंदाबाद" के नारों के बीच तिरंगा झंडा फहराया।
🔍 आसान परिभाषा: पूर्ण स्वराज |
📘 परिभाषा: ब्रिटेन से हर प्रकार का राजनीतिक संबंध तोड़कर प्राप्त की गई पूरी स्वतंत्रता, जिसमें देश की अपनी संप्रभु सरकार हो और ब्रिटिश सम्राट का कोई स्थान न हो। |
💡 आसान भाषा में: डोमिनियन स्टेटस में ब्रिटिश ताज से नाता बना रहता है, जबकि पूर्ण स्वराज में वह नाता भी समाप्त हो जाता है। अब भारतीय केवल शासन में हिस्सा नहीं, बल्कि पूरा देश अपने हाथ में चाहते थे। 🏠 उदाहरण: कांग्रेस ने 1906 में "स्वराज" को लक्ष्य बनाया था, जिसका अर्थ साम्राज्य के भीतर स्वशासन था। 1929 के लाहौर अधिवेशन में कांग्रेस के संविधान में "स्वराज" का अर्थ बदलकर "पूर्ण स्वतंत्रता" कर दिया गया। |
1. नया लक्ष्य — कांग्रेस के संविधान में "स्वराज" शब्द का अर्थ अब पूर्ण स्वतंत्रता होगा। नेहरू रिपोर्ट की डोमिनियन स्टेटस वाली योजना को समाप्त मान लिया गया।
2. गोलमेज सम्मेलन का बहिष्कार — कांग्रेस लंदन में होने वाले गोलमेज सम्मेलन में भाग नहीं लेगी।
3. विधायिकाओं से त्यागपत्र — कांग्रेस के सभी सदस्य केंद्रीय और प्रांतीय विधायिकाओं से त्यागपत्र देंगे और आगे चुनावों में भाग नहीं लेंगे।
4. सविनय अवज्ञा का अधिकार — अखिल भारतीय कांग्रेस समिति को यह अधिकार दिया गया कि वह उचित समय पर सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू करे, जिसमें कर न देना भी शामिल हो। व्यवहार में यह निर्णय गांधीजी पर छोड़ दिया गया।
5. स्वतंत्रता दिवस — अधिवेशन के बाद 2 जनवरी 1930 को कार्यसमिति ने निर्णय लिया कि 26 जनवरी 1930 को पूरे देश में "पूर्ण स्वराज दिवस" मनाया जाएगा।
26 जनवरी 1930 को देश के नगरों और गाँवों में सभाएँ हुईं। लोगों ने तिरंगा फहराया और एक साथ खड़े होकर स्वतंत्रता की प्रतिज्ञा पढ़ी, जिसका प्रारूप गांधीजी ने तैयार किया था। प्रतिज्ञा में कहा गया था कि स्वतंत्रता भारतीय जनता का जन्मसिद्ध अधिकार है, और जो सरकार जनता से यह अधिकार छीनती है और उसका शोषण करती है, उसे बदलने या समाप्त करने का जनता को अधिकार है। इसमें यह भी कहा गया कि ब्रिटिश शासन ने भारत को आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक, चारों दृष्टियों से बरबाद किया है।
❝ हम मानते हैं कि किसी भी अन्य राष्ट्र की तरह भारतीय जनता का भी यह अविच्छेद्य अधिकार है कि उसे स्वतंत्रता मिले... भारत की ब्रिटिश सरकार ने न केवल भारतीयों की स्वतंत्रता छीनी है, बल्कि उसका आधार जनता का शोषण है... इसलिए भारत को ब्रिटेन से संबंध तोड़कर पूर्ण स्वराज प्राप्त करना चाहिए। ❞ (पूर्ण स्वराज की प्रतिज्ञा, 26 जनवरी 1930 (अंश)) |
◆ 26 जनवरी का महत्त्व — 1930 से 1947 तक हर वर्ष 26 जनवरी को स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया जाता रहा। जब भारत वास्तव में 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्र हुआ, तब 26 जनवरी की इस स्मृति को बनाए रखने के लिए संविधान को 26 जनवरी 1950 को लागू किया गया। इसीलिए हम आज 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस मनाते हैं।
◆ लाहौर अधिवेशन का महत्त्व — इस अधिवेशन ने राष्ट्रीय आंदोलन का लक्ष्य सदा के लिए बदल दिया। अब प्रश्न यह नहीं था कि अंग्रेज़ भारतीयों को शासन में कितना हिस्सा देंगे, बल्कि यह था कि अंग्रेज़ भारत कब छोड़ेंगे। नेतृत्व युवा पीढ़ी के हाथ में आया और देश एक नए जन-आंदोलन के लिए तैयार हो गया।
वर्ष और अधिवेशन | लक्ष्य क्या रखा गया |
1906, कलकत्ता | दादाभाई नौरोजी की अध्यक्षता में कांग्रेस ने पहली बार "स्वराज" को लक्ष्य बताया, जिसका अर्थ साम्राज्य के भीतर स्वशासन था। |
1920, नागपुर | कांग्रेस ने शांतिपूर्ण और उचित साधनों से स्वराज प्राप्त करना अपना लक्ष्य घोषित किया। |
1921, अहमदाबाद | हसरत मोहानी ने पूर्ण स्वतंत्रता का प्रस्ताव रखा, जो अस्वीकार हो गया। |
1927, मद्रास | जवाहरलाल नेहरू के प्रयास से पूर्ण स्वतंत्रता को लक्ष्य बताने वाला प्रस्ताव पारित हुआ, पर कांग्रेस का संविधान नहीं बदला गया। |
1928, कलकत्ता | कांग्रेस ने डोमिनियन स्टेटस के लिए सरकार को एक वर्ष का समय दिया। |
1929, लाहौर | कांग्रेस ने अपने संविधान में स्वराज का अर्थ पूर्ण स्वतंत्रता कर दिया। |
अब तक आपने 1915 से 1929 तक की घटनाएँ क्रम से पढ़ीं। इस अंतिम खंड में पहले मानचित्र पर इन घटनाओं के स्थान देखिए, फिर गांधीजी के योगदान का मूल्यांकन, कांग्रेस अधिवेशनों की सूची और पूरे अध्याय का कालक्रम दोहराइए।
नीचे के मानचित्र में चार प्रकार के चिह्न हैं — गांधीजी के सत्याग्रह, प्रमुख घटनाएँ, अधिवेशन और सम्मेलन, तथा असहयोग के स्थानीय रूप। मानचित्र के बाद हर स्थान का महत्त्व एक-एक वाक्य में दोहराया गया है।

◆ चंपारण (बिहार), 1917 — यहाँ गांधीजी ने नील किसानों को तिनकठिया प्रथा से मुक्ति दिलाई। यह भारत में उनका पहला सत्याग्रह था।
◆ अहमदाबाद (गुजरात), 1918 — यहाँ गांधीजी ने मिल मज़दूरों की वेतन-वृद्धि के लिए पहली बार भूख हड़ताल की। उनका साबरमती आश्रम भी यहीं था।
◆ खेड़ा (गुजरात), 1918 — यहाँ फ़सल ख़राब होने पर किसानों ने लगान न देने का सत्याग्रह किया, जिसमें वल्लभभाई पटेल गांधीजी के सहयोगी बने।
◆ बारडोली (गुजरात), 1922 और 1928 — 1922 में यहाँ आंदोलन की वापसी का प्रस्ताव पारित हुआ, और 1928 में यहाँ पटेल के नेतृत्व में सफल किसान सत्याग्रह हुआ।
◆ अमृतसर (पंजाब), 1919 — यहाँ 13 अप्रैल को जलियाँवाला बाग़ में जनरल डायर ने निहत्थी भीड़ पर गोलियाँ चलवाईं।
◆ चौरी-चौरा (संयुक्त प्रांत), 1922 — यहाँ भीड़ ने थाना जला दिया, जिसके बाद गांधीजी ने असहयोग आंदोलन रोक दिया।
◆ मालाबार (केरल), 1921 — यहाँ मोपला किसानों का विद्रोह हुआ, जो आगे चलकर सांप्रदायिक हो गया।
◆ दिल्ली, 1919 — यहाँ अखिल भारतीय ख़िलाफ़त सम्मेलन हुआ, जिसकी अध्यक्षता गांधीजी ने की।
◆ कलकत्ता, 1920 — यहाँ कांग्रेस के विशेष अधिवेशन ने असहयोग का प्रस्ताव स्वीकार किया।
◆ नागपुर, 1920 — यहाँ असहयोग के प्रस्ताव की पुष्टि हुई और कांग्रेस का संगठन नए सिरे से बनाया गया।
◆ गया (बिहार), 1922 — यहाँ परिषद-प्रवेश का प्रस्ताव गिरा, जिसके बाद स्वराज पार्टी बनी।
◆ बेलगाँव (कर्नाटक), 1924 — यहाँ गांधीजी एकमात्र बार कांग्रेस के अध्यक्ष बने।
◆ लाहौर (पंजाब), 1929 — यहाँ कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव पारित किया।
◆ अवध (प्रतापगढ़ और रायबरेली) — यहाँ बाबा रामचंद्र के नेतृत्व में किसान सभा का आंदोलन और बाद में एका आंदोलन चला।
◆ कुमाऊँ — यहाँ पहाड़ी किसानों ने कुली बेगार की प्रथा का अंत कराया।
◆ गुंटूर (आंध्र) — यहाँ वन क़ानूनों के विरुद्ध सत्याग्रह और चिराला-पेराला में नगरपालिका कर के विरुद्ध आंदोलन हुआ।
◆ मिदनापुर (बंगाल) — यहाँ किसानों ने स्थानीय कर न देने का आंदोलन चलाया।
◆ असम (चरगोला) — यहाँ चाय बागानों के मज़दूर काम छोड़कर अपने घरों की ओर निकल पड़े।
गांधीजी के आने से पहले राष्ट्रीय आंदोलन मुख्यतः नगरों के पढ़े-लिखे वर्ग तक सीमित था। पंद्रह वर्षों में उन्होंने उसे बैठकख़ानों से निकालकर गाँवों तक पहुँचा दिया। उनके योगदान को छह बातों में समझा जा सकता है:
1. जन-आधार — उन्होंने किसानों, मज़दूरों, महिलाओं, आदिवासियों और छात्रों को आंदोलन से जोड़ा। चंपारण का किसान और अहमदाबाद का मज़दूर पहली बार स्वयं को राष्ट्रीय आंदोलन का हिस्सा मानने लगा।
2. नया अस्त्र — उन्होंने अहिंसक सत्याग्रह का ऐसा तरीक़ा दिया, जिसमें साधारण से साधारण व्यक्ति भी भाग ले सकता था। बम चलाना सबके बस की बात नहीं थी, पर विदेशी कपड़ा न ख़रीदना या लगान न देना हर कोई कर सकता था।
3. मज़बूत संगठन — उन्होंने कांग्रेस को भाषाई प्रांतीय समितियों, कार्यसमिति, चार आना सदस्यता, स्वयंसेवक दल और स्थायी कोष वाला अनुशासित संगठन बनाया।
4. सरल प्रतीक — चरखा, खादी, गांधी टोपी और प्रभातफेरी जैसे प्रतीकों ने अनपढ़ जनता को भी आंदोलन का अर्थ समझा दिया।
5. राजनीति के साथ समाज-सुधार — उन्होंने अस्पृश्यता-निवारण, हिंदू-मुस्लिम एकता, नशाबंदी और स्त्रियों की भागीदारी को स्वराज की शर्त बताया।
6. संघर्ष-विराम-संघर्ष की रणनीति — उन्होंने समझा कि जनता लगातार नहीं लड़ सकती। इसलिए आंदोलन के बाद विराम और विराम में रचनात्मक कार्य से शक्ति जुटाकर फिर संघर्ष करने की पद्धति अपनाई।
सीमाएँ भी थीं। आलोचकों का कहना है कि गांधीजी ने आंदोलन को बार-बार ऐसे समय रोका जब जनता आगे बढ़ना चाहती थी। ख़िलाफ़त जैसे धार्मिक मुद्दे को राजनीति से जोड़ने के दूरगामी परिणाम अच्छे नहीं रहे। ज़मींदारों और किसानों, मिल-मालिकों और मज़दूरों को साथ रखने की उनकी नीति के कारण किसानों और मज़दूरों की अपनी माँगें अक्सर पीछे रह गईं। फिर भी यह निर्विवाद है कि गांधीजी ने ही भारतीय राष्ट्रवाद को सच्चे अर्थों में जन-आंदोलन बनाया।
इस काल के अधिवेशन, उनके अध्यक्ष और मुख्य निर्णय परीक्षा की दृष्टि से बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। इन्हें क्रम से याद कीजिए।
वर्ष और स्थान | अध्यक्ष | मुख्य बात |
1920, कलकत्ता (विशेष) | लाला लाजपत राय | इस अधिवेशन ने असहयोग का प्रस्ताव स्वीकार किया। |
1920, नागपुर | सी. विजयराघवाचारियर | यहाँ असहयोग की पुष्टि हुई और कांग्रेस का नया संविधान बना। |
1921, अहमदाबाद | हकीम अजमल ख़ाँ (कार्यवाहक) | चुने गए अध्यक्ष चित्तरंजन दास जेल में थे और हसरत मोहानी का प्रस्ताव गिरा। |
1922, गया | चित्तरंजन दास | परिषद-प्रवेश का प्रस्ताव अस्वीकार हुआ और इसके बाद स्वराज पार्टी बनी। |
1923, दिल्ली (विशेष) | मौलाना अबुल कलाम आज़ाद | सबसे युवा अध्यक्ष के नेतृत्व में स्वराजवादियों को चुनाव लड़ने की अनुमति मिली। |
1923, काकीनाडा | मौलाना मुहम्मद अली | यहाँ परिषद-प्रवेश की अनुमति की पुष्टि की गई। |
1924, बेलगाँव | महात्मा गांधी | गांधीजी एकमात्र बार अध्यक्ष बने और स्वराजवादियों से समझौते पर मुहर लगी। |
1925, कानपुर | सरोजिनी नायडू | वे कांग्रेस की पहली भारतीय महिला अध्यक्ष बनीं। |
1926, गुवाहाटी | एस. श्रीनिवास अय्यंगार | यह अधिवेशन स्वामी श्रद्धानंद की हत्या की छाया में हुआ। |
1927, मद्रास | डॉ. एम. ए. अंसारी | साइमन कमीशन के बहिष्कार का निर्णय हुआ और पूर्ण स्वतंत्रता का प्रस्ताव पारित हुआ। |
1928, कलकत्ता | मोतीलाल नेहरू | नेहरू रिपोर्ट स्वीकार की गई और सरकार को एक वर्ष की चेतावनी दी गई। |
1929, लाहौर | जवाहरलाल नेहरू | पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव पारित हुआ और सविनय अवज्ञा का निर्णय लिया गया। |
नीचे इस अध्याय की प्रमुख तिथियाँ क्रम से दी गई हैं। पढ़ते समय हर तिथि के साथ यह भी सोचिए कि उस घटना से अगली घटना कैसे निकली।
वर्ष / तिथि | घटना |
2 अक्टूबर 1869 | पोरबंदर में मोहनदास करमचंद गांधी का जन्म हुआ। |
1893–1894 | गांधीजी दक्षिण अफ़्रीका पहुँचे, पीटरमैरित्सबर्ग की घटना हुई और उन्होंने नटाल इंडियन कांग्रेस बनाई। |
11 सितंबर 1906 | जोहान्सबर्ग की सभा में पहले सत्याग्रह का संकल्प लिया गया। |
1909 | गांधीजी ने "हिंद स्वराज" पुस्तक लिखी। |
9 जनवरी 1915 | गांधीजी भारत लौटे और मई में अहमदाबाद में कोचरब आश्रम बनाया। |
1917 | चंपारण सत्याग्रह हुआ और साबरमती आश्रम की स्थापना हुई। |
1918 | अहमदाबाद मिल हड़ताल और खेड़ा सत्याग्रह हुए। |
1919 | रॉलेट एक्ट पारित हुआ, 6 अप्रैल को देशव्यापी हड़ताल हुई और 13 अप्रैल को जलियाँवाला बाग़ हत्याकांड हुआ। |
1920 | 1 अगस्त को असहयोग आंदोलन शुरू हुआ और उसी दिन तिलक का निधन हुआ। |
1921 | मोपला विद्रोह हुआ और प्रिंस ऑफ़ वेल्स के आगमन का बहिष्कार किया गया। |
फ़रवरी–मार्च 1922 | चौरी-चौरा कांड हुआ, बारडोली प्रस्ताव से आंदोलन रुका और गांधीजी को छह वर्ष की सज़ा हुई। |
1 जनवरी 1923 | चित्तरंजन दास और मोतीलाल नेहरू ने स्वराज पार्टी बनाई। |
1924 | गांधीजी रिहा हुए, तुर्की में ख़िलाफ़त समाप्त हुई और बेलगाँव में गांधीजी अध्यक्ष बने। |
1925 | चित्तरंजन दास का निधन हुआ, विट्ठलभाई पटेल विधानसभा अध्यक्ष बने और चरखा संघ बना। |
8 नवंबर 1927 | साइमन कमीशन की घोषणा हुई। |
1928 | साइमन कमीशन भारत आया, बारडोली सत्याग्रह सफल हुआ, नेहरू रिपोर्ट बनी और लाला लाजपत राय का निधन हुआ। |
1929 | जिन्ना ने चौदह सूत्र रखे, इरविन ने डोमिनियन स्टेटस की घोषणा की और लाहौर में पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव पारित हुआ। |
26 जनवरी 1930 | देशभर में पहला पूर्ण स्वराज दिवस मनाया गया। |
अंत में पूरे अध्याय के मुख्य शब्द एक स्थान पर दिए गए हैं। यदि इनमें से किसी शब्द को पढ़कर उसकी पूरी कहानी याद न आए, तो संबंधित खंड दोबारा पढ़िए।
🔑 कीवर्ड सार गांधीजी और दक्षिण अफ़्रीका — पोरबंदर 1869, पीटरमैरित्सबर्ग 1893, नटाल इंडियन कांग्रेस, फ़ीनिक्स और टॉल्सटॉय फ़ार्म, हिंद स्वराज 1909, सत्याग्रह, अहिंसा, सर्वोदय। आरंभिक सत्याग्रह — चंपारण 1917 (तिनकठिया), अहमदाबाद 1918 (पहली भूख हड़ताल), खेड़ा 1918 (लगान-बंदी)। 1919–1920 — रॉलेट एक्ट, 6 अप्रैल की हड़ताल, जलियाँवाला बाग़, हंटर कमेटी, ख़िलाफ़त, अली बंधु। असहयोग — कलकत्ता और नागपुर 1920, तिलक स्वराज कोष, बहिष्कार, राष्ट्रीय विद्यापीठ, एका, मोपला, चौरी-चौरा, बारडोली प्रस्ताव, ब्रूमफ़ील्ड। 1922–1927 — परिवर्तनवादी, अपरिवर्तनवादी, स्वराज पार्टी, देशबंधु, विट्ठलभाई पटेल, बेलगाँव 1924, चरखा संघ, प्रत्युत्तरवादी। 1927–1930 — साइमन कमीशन, लाला लाजपत राय, नेहरू रिपोर्ट, डोमिनियन स्टेटस, चौदह सूत्र, बारडोली 1928, सरदार, इरविन घोषणा, लाहौर 1929, पूर्ण स्वराज, 26 जनवरी 1930। |
इस अध्याय की कहानी यहाँ समाप्त होती है, पर गांधी युग की कहानी अभी आधी ही हुई है।
💡 अंतिम बात पीटरमैरित्सबर्ग के प्लेटफ़ॉर्म से रावी के तट तक — गांधीजी ने दिखाया कि निहत्थी जनता भी सत्य, अहिंसा और संगठन के बल पर दुनिया के सबसे बड़े साम्राज्य को चुनौती दे सकती है। असहयोग ने भारत को निर्भय बनाया, विराम के वर्षों ने कार्यकर्ताओं की नई पीढ़ी तैयार की, और 1929 तक आते-आते राष्ट्रीय आंदोलन का लक्ष्य "पूर्ण स्वराज" हो चुका था। अब प्रश्न यह था कि यह लक्ष्य पाया कैसे जाए। इसका उत्तर गांधीजी ने एक मुट्ठी नमक से दिया। अगले अध्याय "गांधी युग II" में हम पढ़ेंगे — दांडी यात्रा और सविनय अवज्ञा आंदोलन, गोलमेज सम्मेलन, गांधी-इरविन समझौता, 1937 के प्रांतीय मंत्रिमंडल, व्यक्तिगत सत्याग्रह, क्रिप्स मिशन और भारत छोड़ो आंदोलन। |