📖 अध्याय 11/20 — आधुनिक भारत का इतिहास

क्रांतिकारी आंदोलन: भारत और विदेश में

चापेकर से सावरकर, अनुशीलन-युगांतर, खुदीराम, इंडिया हाउस, ग़दर पार्टी, कोमागाटा मारू, काबुल सरकार, एच.आर.ए.-एच.एस.आर.ए., काकोरी, भगत सिंह, आज़ाद, चटगाँव, महिला क्रांतिकारी और राजस्थान के क्रांतिकारी
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💣 कहानी से शुरुआत: "बहरों को सुनाने के लिए"

8 अप्रैल 1929, केंद्रीय विधानसभा, दिल्ली। सदन में पब्लिक सेफ़्टी बिल और ट्रेड डिस्प्यूट्स बिल पर बहस चल रही थी। पहला विदेश से आए साम्यवादी कार्यकर्ताओं को बिना मुक़दमे देश से निकालने का अधिकार देता था, और दूसरा मज़दूरों के हड़ताल के अधिकार को सीमित करता था। अधिकांश भारतीय सदस्य विरोध में थे, फिर भी सरकार अड़ी थी।

तभी दर्शक दीर्घा से दो युवकों ने सदन के ख़ाली हिस्से में दो कम शक्ति वाले बम फेंके। धुआँ भर गया, पर किसी की जान नहीं गई, क्योंकि बम मारने के लिए बने ही नहीं थे। भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त भागे नहीं। वे "इंकलाब ज़िंदाबाद!" के नारे लगाते रहे, पर्चे फेंकते रहे और शांति से गिरफ़्तारी दे दी। पर्चे में लिखा था: "बहरों को सुनाने के लिए ऊँची आवाज़ की ज़रूरत होती है।"

यह कदम अचानक नहीं उठा था। कुछ महीने पहले इन्हीं युवकों के संगठन ने लाला लाजपत राय की मृत्यु का बदला लेने के लिए लाहौर में पुलिस अधिकारी सांडर्स को मारा था। इसके बाद भगत सिंह इस नतीजे पर पहुँचे कि किसी एक अधिकारी को मारने से व्यवस्था नहीं बदलती। ज़रूरत इस बात की थी कि जनता तक विचार पहुँचे।

इसलिए तय हुआ कि बम फेंकने वाले स्वयं गिरफ़्तार होकर अदालत को मंच बनाएँगे। साथी पहले सहमत नहीं थे, क्योंकि भगत सिंह के पकड़े जाने का मतलब फाँसी हो सकता था। पर सुखदेव के आग्रह पर यही तय हुआ। 12 जून 1929 को दोनों को आजीवन कारावास मिला, और उनके बयान अख़बारों के ज़रिए करोड़ों लोगों तक पहुँचे। 23 मार्च 1931 को केवल 23 वर्ष की आयु में भगत सिंह को फाँसी दे दी गई।

पर यह कहानी बहुत पहले शुरू हुई थी। चापेकर बंधुओं ने पहली गोली कब और क्यों चलाई? किशोर खुदीराम बोस का क्या हुआ? इंडिया हाउस और ग़दर पार्टी में बैठे प्रवासी भारतीय क्या कर रहे थे? काकोरी में ट्रेन क्यों रोकी गई? और चटगाँव में एक स्कूल-मास्टर ने कुछ दिनों के लिए अंग्रेज़ी राज कैसे ठप कर दिया? यही इस अध्याय की कहानी है। आगे दो कहानियाँ भी मिलेंगी, जो क्रांतिकारी आंदोलन के दोनों दौर का स्वभाव समझा देंगी।

📑 इस अध्याय में क्या-क्या पढ़ेंगे

01. भूमिका: क्रांतिकारी राष्ट्रवाद — अर्थ, कारण, तरीक़े और प्रमुख केंद्र

02. महाराष्ट्र: फड़के, चापेकर बंधु, अभिनव भारत, नासिक षड्यंत्र और सावरकर

03. बंगाल (प्रथम चरण): अनुशीलन, युगांतर, मुज़फ़्फ़रपुर, अलीपुर षड्यंत्र, बाघा जतिन

04. पंजाब, दिल्ली, संयुक्त प्रांत और मद्रास: दिल्ली षड्यंत्र और रासबिहारी बोस

05. विदेश में क्रांतिकारी: इंडिया हाउस, मैडम कामा, ढींगरा, हरदयाल

06. ग़दर आंदोलन, कोमागाटा मारू, बर्लिन कमेटी और काबुल सरकार

07. द्वितीय चरण: एच.आर.ए., काकोरी और एच.एस.आर.ए.

08. भगत सिंह, सांडर्स वध, असेंबली बम, लाहौर षड्यंत्र और चंद्रशेखर आज़ाद

09. बंगाल (द्वितीय चरण): चटगाँव शस्त्रागार धावा और महिला क्रांतिकारी

10. राजस्थान के क्रांतिकारी (संक्षेप में)

11. क्रांतिकारी साहित्य और तुलनात्मक अध्ययन

12. मूल्यांकन, कालक्रम और सार

1. भूमिका: क्रांतिकारी राष्ट्रवाद

बीसवीं सदी के आरंभ में भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में तीन धाराएँ साथ-साथ चल रही थीं। नरमपंथी याचिका और प्रार्थना से सुधार माँगते थे, गरमपंथी स्वदेशी, बहिष्कार और निष्क्रिय प्रतिरोध से जन-दबाव बनाते थे, और एक तीसरी धारा — क्रांतिकारी — मानती थी कि अंग्रेज़ केवल बल की भाषा समझते हैं। स्वदेशी आंदोलन के कठोर दमन, सूरत विभाजन (1907) और तिलक जैसे नेताओं को जेल भेजे जाने के बाद युवाओं के एक वर्ग को लगा कि शांतिपूर्ण जन-आंदोलन का रास्ता बंद हो चुका है। उन्होंने आयरलैंड के क्रांतिकारियों, रूस के निहिलिस्टों (शासन को हिंसा से उखाड़ने वाले गुप्त दल) और इटली के मैज़िनी से प्रेरणा लेकर हथियार का रास्ता चुना।

ब्रिटिश सरकार इन युवाओं को "आतंकवादी" और "अराजकतावादी" कहती थी, पर वे स्वयं को "क्रांतिकारी" कहते थे। उनका उद्देश्य आम जनता को डराना नहीं था; वे चाहते थे कि अंग्रेज़ी राज की अजेयता का भय जनता के मन से निकले और युवाओं में बलिदान की भावना जागे। इसीलिए उनके निशाने पर प्रायः वे अधिकारी होते थे जिन्हें जनता अत्याचारी मानती थी — जैसे प्लेग कमिश्नर रैंड, जज किंग्सफ़ोर्ड या पुलिस अधिकारी सांडर्स।

🔍 आसान परिभाषा: क्रांतिकारी राष्ट्रवाद

📘 परिभाषा: स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए सशस्त्र संघर्ष का मार्ग, जिसमें गुप्त संगठन बनाकर अत्याचारी अधिकारियों पर व्यक्तिगत आक्रमण, धन के लिए सरकारी ख़ज़ाने की लूट, हथियार जुटाना और सेना में विद्रोह कराने की योजनाएँ शामिल थीं।

💡 आसान भाषा में: जब विनती और बहिष्कार से बात न बने, तो साहस और बलिदान से देश को जगाओ — यही क्रांतिकारियों की सोच थी। वे मानते थे कि कुछ युवाओं का बलिदान पूरे देश में आग लगा देगा। 🏠 उदाहरण: चापेकर बंधुओं द्वारा रैंड वध (1897), खुदीराम बोस का मुज़फ़्फ़रपुर बम (1908), काकोरी कांड (1925) और चटगाँव शस्त्रागार धावा (1930) इसी मार्ग के उदाहरण हैं।

🔥 1.1 क्रांतिकारी आंदोलन के उदय के कारण

1. नरमपंथी और गरमपंथी तरीक़ों से निराशा — बीस वर्षों की याचिकाओं से कोई बड़ा राजनीतिक अधिकार नहीं मिला। स्वदेशी आंदोलन ने जोश तो जगाया, पर सरकार ने उसे कुचल दिया और सूरत विभाजन (1907) से कांग्रेस का नेतृत्व बिखर गया। युवाओं को लगा कि अब न कोई मार्गदर्शक बचा है, न कोई खुला मंच — इसलिए वे गुप्त रास्ते पर चल पड़े।

2. सरकारी दमन — 1907 में लाला लाजपत राय और अजीत सिंह को बिना मुक़दमे मांडले निर्वासित किया गया, 1908 में अश्विनी कुमार दत्त सहित नौ बंगाली नेताओं को निर्वासित किया गया और तिलक को छह वर्ष की सज़ा देकर मांडले भेजा गया। अख़बारों और सभाओं पर कड़े क़ानून बने। जब खुले विरोध के सब रास्ते बंद कर दिए गए, तो विरोध भूमिगत हो गया।

3. धार्मिक-सांस्कृतिक प्रेरणा — पहले चरण के क्रांतिकारी गीता के निष्काम कर्म, काली और भवानी की उपासना, शिवाजी के उदाहरण और विवेकानंद-अरविंद के विचारों से प्रेरित थे। बंकिमचंद्र के उपन्यास "आनंदमठ" के संन्यासी-योद्धा और उसका गीत "वंदे मातरम्" उनके आदर्श थे। वे मातृभूमि को देवी मानकर उसके लिए प्राण देना धर्म समझते थे।

4. अंतरराष्ट्रीय प्रेरणा — आयरलैंड के स्वतंत्रता सेनानी, रूस के क्रांतिकारी और इटली के एकीकरण के नायक मैज़िनी और गैरीबाल्डी युवाओं के आदर्श थे। 1905 में जापान की रूस पर विजय ने यह भ्रम तोड़ा कि एशियाई देश यूरोपीय शक्ति को हरा नहीं सकते। आगे चलकर रूसी क्रांति (1917) ने दूसरे चरण के क्रांतिकारियों को समाजवाद की ओर मोड़ा।

5. 1922 के बाद की निराशा — फ़रवरी 1922 में चौरी-चौरा की घटना के बाद गांधीजी ने असहयोग आंदोलन अचानक वापस ले लिया। जो युवा "एक वर्ष में स्वराज" का सपना देख रहे थे, वे गहरे निराश हुए और उनमें से अनेक ने फिर हथियार उठाए। इस प्रकार क्रांतिकारी आंदोलन का दूसरा उभार हुआ।

🎯 1.2 क्रांतिकारियों के तरीक़े

क्रांतिकारी किसी एक तरीक़े तक सीमित नहीं थे। समय और परिस्थिति के अनुसार उन्होंने पाँच प्रमुख तरीक़े अपनाए, जिन्हें नीचे उदाहरण सहित समझाया गया है।

◆ व्यक्तिगत वीरता (अत्याचारी अधिकारियों पर आक्रमण) — जिन अधिकारियों को जनता अत्याचारी मानती थी, उन्हें मारकर यह संदेश देना कि अन्याय का बदला लिया जा सकता है। इससे शासन का भय टूटता था और युवाओं को प्रेरणा मिलती थी। उदाहरण — रैंड वध (1897), किंग्सफ़ोर्ड पर प्रयास (1908), नासिक में जैक्सन वध (1909) और लाहौर में सांडर्स वध (1928)।

◆ "स्वदेशी डकैती" — हथियार ख़रीदने, कार्यकर्ताओं को छिपाने और पत्र छापने के लिए धन चाहिए था, जो जनता से खुलेआम नहीं माँगा जा सकता था। इसलिए क्रांतिकारी सरकारी ख़ज़ाने या कुछ धनी लोगों के घरों पर धावा बोलते थे। उदाहरण — पूर्वी बंगाल की बर्रा डकैती (1908) और काकोरी कांड (1925), जिसमें केवल सरकारी धन लूटा गया।

🔍 आसान परिभाषा: स्वदेशी डकैती

📘 परिभाषा: क्रांतिकारी संगठनों द्वारा राजनीतिक कार्य के लिए धन जुटाने हेतु की गई सशस्त्र लूट, जिसे वे निजी लाभ के बजाय देश के काम के लिए किया गया "युद्ध-कार्य" मानते थे।

💡 आसान भाषा में: साधारण डकैत अपने लिए लूटता है, जबकि क्रांतिकारी यह धन हथियार, बम और संगठन पर ख़र्च करते थे। पर इससे कई बार आम लोगों में भय और नाराज़गी भी फैली, इसलिए दूसरे चरण में उन्होंने केवल सरकारी धन को निशाना बनाने का नियम बनाया। 🏠 उदाहरण: काकोरी में क्रांतिकारियों ने ट्रेन के यात्रियों को नहीं छुआ, केवल गार्ड के डिब्बे में रखी सरकारी तिजोरी लूटी।

◆ सैन्य षड्यंत्र — भारतीय सैनिकों को विद्रोह के लिए तैयार करना और ब्रिटेन के शत्रुओं से हथियार लेना। प्रथम विश्वयुद्ध (1914–18) में ब्रिटेन जर्मनी से लड़ रहा था, इसलिए क्रांतिकारियों ने सोचा कि "शत्रु का शत्रु मित्र" है। उदाहरण — ग़दर विद्रोह की योजना (1915), बाघा जतिन की जर्मन हथियार योजना (1915) और सिंगापुर का सैनिक विद्रोह (1915)।

◆ प्रचार — पत्र-पत्रिकाएँ, पुस्तिकाएँ, गीत और पर्चे निकालकर युवाओं को संगठन से जोड़ना। दूसरे चरण में अदालत को ही प्रचार का मंच बना दिया गया — भगत सिंह के अदालती बयान अख़बारों में छपकर पूरे देश तक पहुँचे। उदाहरण — "युगांतर", "संध्या", "ग़दर" पत्र और असेंबली बम कांड के पर्चे।

◆ शस्त्रागार पर धावा और छापामार युद्ध — सबसे बड़ा प्रयोग चटगाँव (1930) में हुआ, जहाँ क्रांतिकारियों ने सरकारी शस्त्रागारों पर क़ब्ज़ा करके अस्थायी क्रांतिकारी सरकार की घोषणा की और फिर गाँवों में छिपकर लंबे समय तक छापामार संघर्ष किया।

🔍 आसान परिभाषा: षड्यंत्र केस

📘 परिभाषा: ऐसा मुक़दमा जिसमें सरकार किसी एक हत्या या डकैती के साथ-साथ यह आरोप लगाती थी कि अनेक व्यक्तियों ने मिलकर सम्राट के विरुद्ध युद्ध छेड़ने या शासन उखाड़ने की गुप्त योजना बनाई। ऐसे मुक़दमों में प्रायः दर्जनों लोगों को एक साथ अभियुक्त बनाया जाता था।

💡 आसान भाषा में: सरकार सबको एक ही "साज़िश" में बाँध देती थी, ताकि जो व्यक्ति घटना में सीधे शामिल न भी हो, वह भी सज़ा पा सके। मुक़दमे का नाम प्रायः उस शहर से पड़ता था जहाँ वह चला — जैसे अलीपुर, दिल्ली, लाहौर, काकोरी। 🏠 उदाहरण: अलीपुर षड्यंत्र केस (1908–09), दिल्ली षड्यंत्र केस (1912–15), लाहौर षड्यंत्र केस (1915 और 1929–30), काकोरी षड्यंत्र केस (1926–27), मेरठ षड्यंत्र केस (1929)।

📋 दोहराव तालिका: पाँच तरीक़े

तरीक़ा

उद्देश्य और उदाहरण

व्यक्तिगत वीरता

अत्याचारी अधिकारियों को मारकर शासन का भय तोड़ा गया — रैंड (1897), जैक्सन (1909), सांडर्स (1928)।

स्वदेशी डकैती

हथियार और संगठन के लिए धन जुटाया गया — बर्रा (1908), काकोरी (1925)।

सैन्य षड्यंत्र

विश्वयुद्ध में जर्मनी की सहायता से सेना में विद्रोह कराने का प्रयास हुआ — ग़दर, बाघा जतिन, सिंगापुर (सभी 1915)।

प्रचार

पत्रों, पर्चों और अदालती बयानों से युवाओं को जगाया गया — "युगांतर", "ग़दर", असेंबली बम के पर्चे।

शस्त्रागार पर धावा

सरकारी हथियारों पर क़ब्ज़ा करके अस्थायी सरकार घोषित की गई — चटगाँव (1930)।

📊 1.3 आंदोलन के दो चरण

इतिहासकार क्रांतिकारी आंदोलन को सुविधा के लिए दो चरणों में बाँटते हैं — पहला चरण लगभग 1897 से 1918 तक और दूसरा चरण लगभग 1922 से 1934 तक। बीच के वर्षों (1919–1922) में अधिकांश क्रांतिकारी या तो जेल में थे या 1920 की आम माफ़ी के बाद गांधीजी के असहयोग आंदोलन में शामिल हो गए थे। नीचे का चार्ट दोनों चरणों की तुलना करता है; चार्ट के बाद उसके हर बिंदु को विस्तार से समझाया गया है।

चित्र 11.1: क्रांतिकारी आंदोलन के दो चरण — तुलना
चित्र 11.1: क्रांतिकारी आंदोलन के दो चरण — तुलना

प्रथम चरण (लगभग 1897–1918) — चार्ट के छह बिंदु

◆ पृष्ठभूमि — नरमपंथियों की याचिका-नीति से कुछ न मिलना, बंगाल विभाजन (1905) से फैला आक्रोश, स्वदेशी आंदोलन का कठोर दमन और सूरत विभाजन (1907) से कांग्रेस का टूटना — इन चारों ने मिलकर युवाओं को गुप्त क्रांतिकारी रास्ते पर धकेला।

◆ केंद्र — देश के भीतर महाराष्ट्र (पूना, नासिक), बंगाल (कलकत्ता, ढाका, मिदनापुर), पंजाब और मद्रास प्रमुख केंद्र थे। देश के बाहर लंदन, पेरिस, बर्लिन और अमेरिका-कनाडा के पश्चिमी तट से क्रांतिकारी काम कर रहे थे।

◆ संगठन — महाराष्ट्र में मित्र मेला और अभिनव भारत, बंगाल में अनुशीलन समिति और युगांतर, लंदन में इंडिया हाउस, और अमेरिका में ग़दर पार्टी इस चरण के मुख्य संगठन थे। इन सबका विस्तार आगे के खंडों में है।

◆ तरीक़ा — इस चरण में मुख्य ज़ोर अत्याचारी अधिकारियों की हत्या, धन के लिए स्वदेशी डकैती, बम बनाने और विश्वयुद्ध के समय सेना में विद्रोह की योजनाओं पर था।

◆ विचार — यह धार्मिक-आध्यात्मिक राष्ट्रवाद था। क्रांतिकारी गीता की शपथ लेते थे, काली और शिवाजी को आदर्श मानते थे और व्यक्तिगत वीरता पर भरोसा करते थे। इसकी एक कमी यह थी कि हिंदू धार्मिक प्रतीकों के कारण मुसलमान युवा इससे कम जुड़ पाए (ग़दर पार्टी इसका अपवाद थी)।

◆ अंत — सरकार ने अलीपुर (1908), दिल्ली (1912–15), लाहौर (1915) और बनारस (1915) षड्यंत्र केसों में सैकड़ों क्रांतिकारियों को फाँसी या काला पानी दिया। भारत रक्षा अधिनियम (1915) के अंतर्गत बिना मुक़दमे नज़रबंदी हुई। इस दमन से पहला चरण लगभग समाप्त हो गया।

द्वितीय चरण (लगभग 1922–1934) — चार्ट के छह बिंदु

◆ पृष्ठभूमि — असहयोग आंदोलन की अचानक वापसी (1922) से युवा निराश हुए। साथ ही रूसी क्रांति (1917) की सफलता ने दिखाया कि संगठित जनता साम्राज्य को उखाड़ सकती है — इसलिए अब क्रांतिकारी समाजवाद की भाषा में सोचने लगे।

◆ केंद्र — दो मुख्य क्षेत्र थे: उत्तर भारत (संयुक्त प्रांत, पंजाब, दिल्ली) और बंगाल (चटगाँव, ढाका, मिदनापुर, कलकत्ता)।

◆ संगठन — उत्तर भारत में हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (1924), जो आगे हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (1928) बना, और उसका खुला जन-संगठन नौजवान भारत सभा; बंगाल में इंडियन रिपब्लिकन आर्मी (चटगाँव) तथा पुनर्गठित युगांतर-अनुशीलन समूह।

◆ तरीक़ा — काकोरी कांड (1925), सांडर्स वध (1928), असेंबली बम (1929) और चटगाँव शस्त्रागार धावा (1930) इस चरण की मुख्य घटनाएँ थीं। नई बात यह थी कि क्रांतिकारियों ने अदालत को प्रचार का मंच बनाया।

◆ विचार — दूसरा चरण धर्मनिरपेक्ष और समाजवादी था। "इंकलाब ज़िंदाबाद" इसका नारा बना। अब लक्ष्य केवल अंग्रेज़ों को हटाना नहीं, बल्कि शोषण-मुक्त समाज बनाना था। इस चरण में महिलाओं की सीधी सशस्त्र भागीदारी भी दिखी।

◆ अंत — चंद्रशेखर आज़ाद (27 फ़रवरी 1931) और भगत सिंह-सुखदेव-राजगुरु (23 मार्च 1931) के बलिदान से उत्तर भारत में, और सूर्य सेन की फाँसी (1934) से बंगाल में यह धारा लगभग समाप्त हो गई। जेलों में बंद अनेक क्रांतिकारी मार्क्सवाद, कम्युनिस्ट पार्टी और कांग्रेस की ओर मुड़ गए।

🗺️ 1.4 प्रमुख केंद्र — मानचित्र

नीचे के मानचित्र में लाल गोले पहले चरण के केंद्र, नीले चौकोर दूसरे चरण के केंद्र, नारंगी चिह्न राजस्थान के केंद्र और हरा त्रिकोण काला पानी (अंडमान) दिखाते हैं। मानचित्र के बाद हर स्थान का महत्त्व एक-एक करके बताया गया है।

चित्र 11.2: भारत में क्रांतिकारी गतिविधियों के प्रमुख केंद्र
चित्र 11.2: भारत में क्रांतिकारी गतिविधियों के प्रमुख केंद्र

प्रथम चरण के केंद्र

◆ पूना — यहीं चापेकर बंधुओं ने 22 जून 1897 को प्लेग कमिश्नर रैंड और लेफ़्टिनेंट आयर्स्ट को गोली मारी थी। इसे आधुनिक भारत की पहली राजनीतिक हत्या माना जाता है (खंड 2.2)।

◆ नासिक — सावरकर बंधुओं ने यहीं 1899 में मित्र मेला बनाया, जो 1904 में अभिनव भारत बना। 21 दिसंबर 1909 को यहीं ज़िलाधीश जैक्सन की हत्या हुई (खंड 2.3–2.4)।

◆ कलकत्ता — बंगाल क्रांतिकारी आंदोलन की राजधानी। यहाँ अनुशीलन समिति (1902), "युगांतर" पत्र (1906) और मानिकतला का बम कारख़ाना था; दूसरे चरण में 1930 का राइटर्स बिल्डिंग कांड भी यहीं हुआ (खंड 3 और 9)।

◆ मुज़फ़्फ़रपुर (बिहार) — 30 अप्रैल 1908 को खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी ने यहीं जज किंग्सफ़ोर्ड की बग्घी समझकर बम फेंका था (खंड 3.5)।

◆ ढाका — पुलिन बिहारी दास की ढाका अनुशीलन समिति का केंद्र, जिसकी सैकड़ों शाखाएँ पूर्वी बंगाल में फैली थीं। बर्रा डकैती (1908) इसी समूह ने की (खंड 3.1 और 3.6)।

◆ बालासोर (उड़ीसा) — सितंबर 1915 में बाघा जतिन ने यहीं बूढ़ी बालम नदी के किनारे पुलिस और सेना से अंतिम मुठभेड़ की और वीरगति पाई (खंड 3.8)।

◆ तिरुनेलवेली (मद्रास प्रांत) — 17 जून 1911 को वांची अय्यर ने तिरुनेलवेली के कलेक्टर ऐश की मणियाच्ची स्टेशन पर हत्या की (खंड 4.2)।

द्वितीय चरण के केंद्र

◆ दिल्ली — यहाँ दोनों चरणों की बड़ी घटनाएँ हुईं: 23 दिसंबर 1912 को वायसराय हार्डिंग पर बम (पहला चरण) और 8 अप्रैल 1929 को केंद्रीय विधानसभा में असेंबली बम (दूसरा चरण)। 1928 में एच.एस.आर.ए. की स्थापना भी दिल्ली के फ़िरोज़शाह कोटला में हुई।

◆ लाहौर — 1915 का पहला लाहौर षड्यंत्र केस (ग़दर क्रांतिकारियों पर) और 1929–30 का दूसरा लाहौर षड्यंत्र केस (भगत सिंह और साथियों पर) यहीं चले। 17 दिसंबर 1928 को सांडर्स वध भी लाहौर में हुआ।

◆ काकोरी (लखनऊ के पास) — 9 अगस्त 1925 को एच.आर.ए. ने यहीं ट्रेन रोककर सरकारी ख़ज़ाना लूटा (खंड 7.3)।

◆ कानपुर — अक्टूबर 1924 में यहीं हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन की स्थापना हुई (खंड 7.2)।

◆ इलाहाबाद — 27 फ़रवरी 1931 को चंद्रशेखर आज़ाद ने यहीं अल्फ़्रेड पार्क में पुलिस से लड़ते हुए बलिदान दिया (खंड 8.8)।

◆ चटगाँव (आज बांग्लादेश) — 18 अप्रैल 1930 को सूर्य सेन के नेतृत्व में यहाँ सरकारी शस्त्रागारों पर धावा हुआ (खंड 9.3)।

राजस्थान के केंद्र और काला पानी

◆ अजमेर-ब्यावर, जयपुर, कोटा-शाहपुरा — राजस्थान में राव गोपाल सिंह खरवा और ब्यावर के सेठ दामोदरदास राठी (अजमेर-ब्यावर), अर्जुनलाल सेठी (जयपुर) और बारहठ परिवार (शाहपुरा, कोटा) क्रांतिकारी गतिविधियों के केंद्र थे। इनका संक्षिप्त परिचय खंड 10 में है।

◆ पोर्ट ब्लेयर (अंडमान) — यहाँ की सेल्युलर जेल में सावरकर बंधु, बारींद्र घोष, ग़दर क्रांतिकारी और बाद में बटुकेश्वर दत्त जैसे अनेक क्रांतिकारियों को "काला पानी" की सज़ा भुगतनी पड़ी।

🔍 आसान परिभाषा: काला पानी (सेल्युलर जेल)

📘 परिभाषा: अंडमान द्वीप के पोर्ट ब्लेयर में 1896 से 1906 के बीच बनी वह जेल, जिसकी हर कोठरी अलग थी ताकि कोई क़ैदी दूसरे से बात न कर सके। "आजीवन निर्वासन" की सज़ा पाए क़ैदियों को समुद्र पार यहाँ भेजा जाता था।

💡 आसान भाषा में: समुद्र पार भेजे जाने को लोग "काला पानी" कहते थे, क्योंकि वहाँ से लौटना लगभग असंभव माना जाता था। क़ैदियों से कोल्हू में तेल पेरवाने जैसा कठोर श्रम कराया जाता था। 🏠 उदाहरण: विनायक सावरकर और उनके बड़े भाई गणेश सावरकर, बारींद्र घोष, भाई परमानंद और बटुकेश्वर दत्त इसी जेल में रहे। आज यह राष्ट्रीय स्मारक है।

2. महाराष्ट्र: फड़के, चापेकर बंधु, अभिनव भारत और सावरकर

महाराष्ट्र में क्रांतिकारी चेतना सबसे पहले जागी। यहाँ शिवाजी की परंपरा, तिलक द्वारा शुरू किए गए गणपति उत्सव (1893) और शिवाजी उत्सव (1895), और अखाड़ों-व्यायामशालाओं ने युवाओं में संगठन और साहस की भावना पैदा की। इस खंड में महाराष्ट्र के चार पड़ाव क्रम से दिए गए हैं।

2.1 वासुदेव बलवंत फड़के (1845–1883) — "भारतीय सशस्त्र क्रांति के जनक"

वासुदेव बलवंत फड़के का जन्म 1845 में महाराष्ट्र के कोलाबा ज़िले (आज रायगढ़) के शिरढोण गाँव में हुआ। वे पूना के सैन्य लेखा विभाग में क्लर्क थे। कहा जाता है कि अपनी बीमार माँ के अंतिम समय में छुट्टी न मिलने से उन्हें गहरा आघात लगा, और 1876–77 के भीषण अकाल में सरकार की उदासीनता देखकर उन्होंने अंग्रेज़ी राज को उखाड़ने का निश्चय किया। उन्होंने नौकरी छोड़ दी और अपने अनुयायियों को हथियार चलाना सिखाया।

◆ घटनाक्रम — 1879 में फड़के ने रामोसी (एक किसान-आदिवासी समुदाय), कोली और धनगर युवकों को संगठित किया। धन जुटाने के लिए उन्होंने पूना के आसपास के गाँवों में धनी साहूकारों पर छापे मारे और सशस्त्र विद्रोह की घोषणा की। कुछ समय के लिए उनके दल ने शिरूर-पूना क्षेत्र में सरकार को चुनौती दी।

◆ मुक़दमा और परिणाम — जुलाई 1879 में वे बीजापुर के पास एक मंदिर में पकड़े गए। उन्हें आजीवन निर्वासन की सज़ा देकर अदन (अरब) की जेल भेजा गया। 1883 में वे एक बार जेल से भागे, पर फिर पकड़े गए, और उसी वर्ष (17 फ़रवरी 1883) क्षय रोग और भूख हड़ताल से जेल में ही उनकी मृत्यु हो गई।

◆ महत्त्व — फड़के का विद्रोह छोटा और स्थानीय था, पर 1857 के बाद यह पहला संगठित सशस्त्र प्रयास था जिसका लक्ष्य केवल स्थानीय शिकायत नहीं, बल्कि अंग्रेज़ी राज को हटाना था। इसलिए उन्हें "भारतीय सशस्त्र क्रांति का जनक" कहा जाता है।

2.2 चापेकर बंधु और रैंड वध (22 जून 1897)

दामोदर हरि चापेकर, बालकृष्ण हरि चापेकर और वासुदेव हरि चापेकर — ये तीन सगे भाई पूना के एक ब्राह्मण कीर्तनकार परिवार से थे। तीनों तिलक के विचारों से प्रभावित थे। उन्होंने 1896–97 में पूना में "व्यायाम मंडल" (चापेकर क्लब) बनाया, जहाँ युवाओं को शारीरिक प्रशिक्षण के साथ-साथ राजनीतिक शिक्षा दी जाती थी। इस मंडल का उद्देश्य पूरी तरह राजनीतिक था।

◆ पृष्ठभूमि — 1896 के अंत में बम्बई से प्लेग की महामारी पूना तक फैल गई। सरकार ने "महामारी रोग अधिनियम, 1897" के अंतर्गत एक विशेष प्लेग समिति बनाई, जिसके अध्यक्ष ICS अधिकारी डब्ल्यू. सी. रैंड थे। रैंड के आदेश पर अंग्रेज़ सैनिक रोगियों की खोज के नाम पर घरों में ज़बरदस्ती घुसते, पूजाघरों और रसोई को अपवित्र करते, स्त्रियों की सबके सामने जाँच करते और सामान जला देते थे। तिलक ने "केसरी" में इन ज़्यादतियों की तीखी आलोचना की। जनता में भारी आक्रोश फैला।

◆ घटनाक्रम — 22 जून 1897 को महारानी विक्टोरिया के शासन की हीरक जयंती (60 वर्ष) का समारोह पूना के गवर्नमेंट हाउस (गणेशखिंड) में था। समारोह से लौटते समय रात में दामोदर ने रैंड की बग्घी पर गोली चलाई और बालकृष्ण ने पीछे की बग्घी में बैठे लेफ़्टिनेंट आयर्स्ट को गोली मारी। आयर्स्ट की वहीं मृत्यु हो गई और रैंड ने कुछ दिन बाद घावों के कारण दम तोड़ा।

◆ मुक़दमा और परिणाम — द्रविड़ बंधुओं की मुखबिरी पर दामोदर पकड़े गए और 1898 में उन्हें फाँसी दी गई। बाद में सबसे छोटे भाई वासुदेव ने साथी महादेव विनायक रानडे के साथ 1899 में मुखबिर द्रविड़ बंधुओं को मार डाला। इस पर वासुदेव, बालकृष्ण और रानडे — तीनों को 1899 में फाँसी हुई। इस प्रकार एक ही परिवार के तीनों भाई देश के लिए बलिदान हो गए।

◆ तिलक पर प्रभाव — सरकार ने आरोप लगाया कि तिलक के लेखों ने लोगों को हिंसा के लिए उकसाया। जुलाई 1897 में तिलक पर राजद्रोह (भारतीय दंड संहिता की धारा 124-क) का मुक़दमा चला और उन्हें 18 महीने की सज़ा हुई। इस मुक़दमे से तिलक पूरे देश में लोकप्रिय हो गए और जनता ने उन्हें "लोकमान्य" कहा।

◆ महत्त्व — रैंड वध को आधुनिक भारत की पहली राजनीतिक हत्या माना जाता है। इसने दिखाया कि अत्याचार का उत्तर प्रतिरोध से भी दिया जा सकता है। चापेकर बंधुओं का बलिदान आगे महाराष्ट्र के युवाओं, विशेषकर सावरकर बंधुओं के लिए प्रेरणा बना।

🔍 आसान परिभाषा: मुखबिर / सरकारी गवाह (अप्रूवर)

📘 परिभाषा: किसी षड्यंत्र में शामिल वह व्यक्ति जो सज़ा से बचने या माफ़ी पाने के लिए पुलिस को अपने साथियों के नाम और योजनाएँ बता दे और अदालत में उनके विरुद्ध गवाही दे।

💡 आसान भाषा में: यानी अंदर का आदमी जो दल का भेद खोल दे। क्रांतिकारी संगठन गुप्त होते थे, इसलिए एक मुखबिर पूरे दल को फाँसी तक पहुँचा सकता था। 🏠 उदाहरण: चापेकर प्रकरण में द्रविड़ बंधु, अलीपुर षड्यंत्र में नरेंद्र गोस्वामी, ग़दर विद्रोह में किरपाल सिंह और लाहौर षड्यंत्र केस में जयगोपाल व हंसराज वोहरा सरकारी गवाह बने।

2.3 मित्र मेला (1899) और अभिनव भारत (1904)

◆ स्थापना — 1899 में नासिक में विनायक दामोदर सावरकर और उनके बड़े भाई गणेश दामोदर सावरकर ("बाबाराव") ने "मित्र मेला" नाम का गुप्त संगठन बनाया। ऊपर से यह त्योहार मनाने और व्यायाम करने वाले मित्रों का मंडल लगता था, पर भीतर सशस्त्र क्रांति की तैयारी होती थी।

◆ अभिनव भारत — 1904 में मित्र मेला का नाम बदलकर "अभिनव भारत" रखा गया। यह नाम और ढाँचा इटली के क्रांतिकारी मैज़िनी के संगठन "यंग इटली" से प्रेरित था। इसकी शाखाएँ महाराष्ट्र के अलावा कर्नाटक और मध्य प्रांत में भी खुलीं। सदस्य गुप्त शपथ लेते थे और उन्हें हथियार चलाने का प्रशिक्षण दिया जाता था।

◆ बम की तकनीक — अभिनव भारत से जुड़े पांडुरंग महादेव बापट ("सेनापति बापट") और बंगाल के हेमचंद्र कानूनगो ने पेरिस में एक रूसी क्रांतिकारी से बम बनाने की विधि सीखी। इसकी पुस्तिका की प्रतियाँ भारत भेजी गईं, जिससे महाराष्ट्र और बंगाल दोनों में बम बनाने का काम शुरू हुआ।

◆ अंत — 1909 के जैक्सन वध के बाद पुलिस ने अभिनव भारत के सदस्यों को बड़े पैमाने पर पकड़ा और संगठन लगभग समाप्त हो गया। कहा जाता है कि सावरकर ने 1952 में इसे औपचारिक रूप से भंग किया।

2.4 नासिक षड्यंत्र — जैक्सन वध (21 दिसंबर 1909)

◆ पृष्ठभूमि — जून 1909 में गणेश सावरकर को देशभक्ति की कविताएँ छापने के आरोप में आजीवन काला पानी की सज़ा दी गई। नासिक के ज़िलाधीश ए. एम. टी. जैक्सन को इस मुक़दमे के लिए ज़िम्मेदार माना गया। विडंबना यह थी कि जैक्सन संस्कृत और भारतीय संस्कृति के विद्वान थे और लोग उन्हें "पंडित जैक्सन" कहते थे।

◆ घटनाक्रम — जैक्सन का नासिक से तबादला हो चुका था और 21 दिसंबर 1909 को उनके सम्मान में विजयानंद नाट्यगृह में एक मराठी नाटक का विशेष प्रदर्शन हो रहा था। वहीं 17–18 वर्ष के युवक अनंत लक्ष्मण कान्हेरे ने उन्हें पिस्तौल से गोली मार दी।

◆ मुक़दमा — जाँच में पता चला कि हत्या में प्रयुक्त पिस्तौल लंदन से विनायक सावरकर ने भिजवाई थी। नासिक षड्यंत्र केस में कान्हेरे, कृष्णाजी गोपाल कर्वे और विनायक नारायण देशपांडे को 1910 में फाँसी दी गई। इसी मामले में विनायक सावरकर को लंदन से गिरफ़्तार करके भारत लाया गया (खंड 5.5)।

◆ महत्त्व — इस घटना ने महाराष्ट्र के क्रांतिकारी संगठन को तोड़ दिया, पर इसने लंदन के इंडिया हाउस और भारत के क्रांतिकारियों के सीधे संबंध को भी उजागर किया।

2.5 विनायक दामोदर सावरकर (1883–1966)

28 मई 1883 को नासिक के पास भगूर गाँव में जन्मे सावरकर ने किशोरावस्था में ही चापेकर बंधुओं की फाँसी से प्रेरित होकर देश के लिए लड़ने की शपथ ली थी। पूना के फ़र्ग्युसन कॉलेज में पढ़ते हुए उन्होंने 1905 में विदेशी वस्त्रों की होली जलाई। 1906 में वे श्यामजी कृष्ण वर्मा की "शिवाजी छात्रवृत्ति" पर क़ानून पढ़ने लंदन गए और इंडिया हाउस में भारतीय छात्रों के प्रेरणास्रोत बन गए। वहाँ उन्होंने "फ़्री इंडिया सोसाइटी" बनाई, जिसकी साप्ताहिक बैठकों में क्रांति पर चर्चा होती थी।

◆ लेखन — उन्होंने मैज़िनी की जीवनी का मराठी अनुवाद किया और "1857 का स्वातंत्र्य समर" लिखी, जिसमें 1857 के विद्रोह को पहली बार "प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम" कहा गया। मराठी में लिखी यह पुस्तक प्रकाशन से पहले ही प्रतिबंधित कर दी गई; 1909 में इसका अंग्रेज़ी रूप हॉलैंड से छपकर गुप्त रूप से भारत पहुँचा। आगे चलकर भगत सिंह के साथियों ने भी इसे गुप्त रूप से छापा।

◆ सज़ा — नासिक षड्यंत्र केस में उन्हें दो आजीवन कारावास (कुल 50 वर्ष) की सज़ा मिली। 1911 से 1921 तक वे अंडमान की सेल्युलर जेल में रहे, फिर रत्नागिरी में नज़रबंद रखे गए, जहाँ से उन्हें 1937 में पूरी तरह मुक्ति मिली। मार्सेई में जहाज़ से कूदने का प्रसिद्ध प्रसंग खंड 5.5 में है।

◆ बाद का जीवन — नज़रबंदी में उन्होंने "हिंदुत्व" (1923) लिखी और रत्नागिरी में छुआछूत के विरुद्ध काम किया। वे 1937 से 1943 तक हिंदू महासभा के अध्यक्ष रहे। उनके समर्थक उन्हें "स्वातंत्र्यवीर" कहते हैं। 26 फ़रवरी 1966 को उनका निधन हुआ।

📋 दोहराव तालिका: महाराष्ट्र

वर्ष

व्यक्ति / घटना

मुख्य बात

1879

वासुदेव बलवंत फड़के

रामोसी किसानों को संगठित कर विद्रोह किया; अदन जेल में 1883 में मृत्यु हुई।

22 जून 1897

चापेकर बंधु — रैंड-आयर्स्ट वध

प्लेग की ज़्यादतियों का बदला लिया गया; तीनों भाइयों को फाँसी हुई।

1899 / 1904

मित्र मेला / अभिनव भारत

सावरकर बंधुओं का गुप्त संगठन मैज़िनी की "यंग इटली" से प्रेरित था।

21 दिसंबर 1909

नासिक षड्यंत्र — जैक्सन वध

अनंत कान्हेरे ने गोली मारी; कान्हेरे, कर्वे और देशपांडे को 1910 में फाँसी हुई।

1910–1921

वी. डी. सावरकर

दो आजीवन कारावास मिले और वे अंडमान की सेल्युलर जेल में रहे।

3. बंगाल (प्रथम चरण): अनुशीलन, युगांतर, खुदीराम और बाघा जतिन

बंगाल क्रांतिकारी आंदोलन का सबसे बड़ा और सबसे लंबा चलने वाला केंद्र रहा। यहाँ 1890 के दशक से ही अखाड़े और व्यायाम समितियाँ बन रही थीं, जहाँ युवा लाठी, तलवार, कुश्ती और घुड़सवारी सीखते थे और साथ में गीता, विवेकानंद और बंकिम का अध्ययन करते थे। बंगाल विभाजन (1905) और स्वदेशी आंदोलन के दमन के बाद ये समितियाँ गुप्त क्रांतिकारी संगठनों में बदल गईं।

3.1 अनुशीलन समिति (24 मार्च 1902)

◆ स्थापना — 24 मार्च 1902 को कलकत्ता में बैरिस्टर प्रमथनाथ मित्र ("पी. मित्र") की अध्यक्षता में अनुशीलन समिति बनी; युवा सतीश चंद्र बसु इसके प्रमुख संगठनकर्ता थे। "अनुशीलन" शब्द बंकिमचंद्र के विचार से लिया गया, जिसका अर्थ है — शरीर, मन और चरित्र का निरंतर अभ्यास और विकास। इसे बंगाल का पहला क्रांतिकारी संगठन माना जाता है।

◆ अरविंद घोष की भूमिका — बड़ौदा में रहते हुए अरविंद घोष ने सैनिक प्रशिक्षण पाए जतींद्रनाथ बनर्जी और अपने छोटे भाई बारींद्र कुमार घोष को बंगाल भेजा ताकि वे युवाओं को संगठित करें। बाद में अरविंद स्वयं कलकत्ता आकर इस आंदोलन के वैचारिक नेता बने।

◆ ढाका अनुशीलन — 1906 में पुलिन बिहारी दास ने ढाका में अनुशीलन समिति की शाखा बनाई, जो जल्दी ही सबसे संगठित समूह बन गई और पूर्वी बंगाल में इसकी सैकड़ों शाखाएँ फैल गईं। सदस्यों को कठोर अनुशासन और गुप्त शपथ में बाँधा जाता था।

◆ अन्य समितियाँ — इसी समय बंगाल में कई और समितियाँ बनीं, जैसे कलकत्ता का आत्मोन्नति समिति, मैमनसिंह की सुहृद समिति और साधना समाज, तथा फ़रीदपुर की ब्रती समिति। ये सब शारीरिक प्रशिक्षण और स्वदेशी प्रचार के साथ धीरे-धीरे क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़ गईं।

3.2 "युगांतर" समूह (1906)

◆ युगांतर पत्र — मार्च 1906 में बारींद्र कुमार घोष, भूपेंद्रनाथ दत्त (स्वामी विवेकानंद के छोटे भाई) और अविनाश भट्टाचार्य ने बांग्ला साप्ताहिक "युगांतर" शुरू किया। यह खुलेआम क्रांति और सशस्त्र संघर्ष का प्रचार करता था। 1907 में इसके संपादक के रूप में भूपेंद्रनाथ दत्त को राजद्रोह में एक वर्ष की सज़ा हुई, पर पत्र का प्रसार और बढ़ गया।

◆ युगांतर समूह — पत्र के नाम पर ही कलकत्ता के क्रांतिकारियों का भीतरी दल "युगांतर समूह" कहलाने लगा। आगे चलकर बाघा जतिन इसके सबसे बड़े नेता बने।

◆ अन्य प्रचार साहित्य — ब्रह्मबांधव उपाध्याय का उग्र बांग्ला दैनिक "संध्या" अंग्रेज़ों का खुला उपहास करता था। "भवानी मंदिर" नाम की पुस्तिका (जिसके लेखक अरविंद माने जाते हैं) में देवी भवानी के नाम पर संन्यासी-क्रांतिकारियों का संगठन बनाने की योजना थी। "वर्तमान रणनीति" में छापामार युद्ध की बातें थीं और युगांतर के लेखों का संग्रह "मुक्ति कोन पथे" (मुक्ति किस मार्ग से?) युवाओं में बहुत लोकप्रिय हुआ।

3.3 मानिकतला का बम कारख़ाना (1907–08)

◆ हेमचंद्र कानूनगो — मिदनापुर के हेमचंद्र ने अपनी संपत्ति बेचकर 1906 में पेरिस की यात्रा की और वहाँ एक रूसी क्रांतिकारी से बम बनाने की तकनीक सीखी। 1908 के आरंभ में लौटकर उन्होंने बारींद्र के साथ मिलकर बम बनाने का काम शुरू किया।

◆ कारख़ाना — कलकत्ता के उपनगर मानिकतला में मुरारीपुकुर बाग़ का एक पुराना मकान क्रांतिकारियों का केंद्र बना। यहाँ युवाओं को धर्मग्रंथों के साथ-साथ हथियार और विस्फोटक की शिक्षा दी जाती थी।

◆ प्रारंभिक प्रयास — दिसंबर 1907 में बंगाल के लेफ़्टिनेंट गवर्नर एंड्रयू फ़्रेज़र की ट्रेन को मिदनापुर के पास बम से उड़ाने का प्रयास हुआ, पर ट्रेन को केवल मामूली क्षति हुई। इसी तरह ढाका के पूर्व ज़िलाधीश पर भी हमला हुआ। ये प्रयास असफल रहे, पर इनसे पता चला कि क्रांतिकारी अब बम बनाने में सक्षम हो गए हैं।

3.4 खुदीराम बोस (1889–1908) और प्रफुल्ल चाकी (1888–1908)

खुदीराम बोस का जन्म 3 दिसंबर 1889 को बंगाल के मिदनापुर ज़िले में हुआ। बचपन में ही माता-पिता का देहांत हो जाने पर बड़ी बहन ने उन्हें पाला। स्कूल के दिनों में वे अपने शिक्षक सत्येंद्रनाथ बसु के माध्यम से क्रांतिकारी दल से जुड़े और 1906 में "सोनार बांग्ला" नाम का प्रतिबंधित पर्चा बाँटते हुए पकड़े भी गए। प्रफुल्ल चाकी पूर्वी बंगाल के बोगरा ज़िले के थे और स्वदेशी आंदोलन में भाग लेने के कारण स्कूल से निकाले गए थे। युगांतर दल ने इन दोनों को एक बड़े काम के लिए चुना।

3.5 मुज़फ़्फ़रपुर बम कांड (30 अप्रैल 1908)

📖 कहानी 1: ग़लत बग्घी, सही इरादा — खुदीराम बोस की कहानी

कलकत्ता का मजिस्ट्रेट डगलस किंग्सफ़ोर्ड अपनी कठोर सज़ाओं के कारण बंगाल के युवाओं की घृणा का पात्र था। उसने "युगांतर" और "वंदे मातरम्" पत्रों के मुक़दमों में कड़ी सज़ाएँ दी थीं और सुशील सेन नाम के किशोर को कोड़े लगवाए थे। उसे मारने की एक कोशिश पहले विफल हो चुकी थी, इसलिए सरकार ने उसका तबादला बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर कर दिया।

युगांतर दल ने यह काम खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी को सौंपा। खुदीराम बचपन में ही माता-पिता को खो चुके थे और 1906 में प्रतिबंधित पर्चा "सोनार बांग्ला" बाँटते पकड़े गए थे। प्रफुल्ल को स्वदेशी आंदोलन में भाग लेने के कारण स्कूल से निकाला गया था। दोनों कई दिन मुज़फ़्फ़रपुर में किंग्सफ़ोर्ड की दिनचर्या देखते रहे। 30 अप्रैल 1908 की शाम यूरोपियन क्लब से निकली एक बग्घी को उन्होंने किंग्सफ़ोर्ड की समझकर उस पर बम फेंका। पर उसमें बैरिस्टर प्रिंगल कैनेडी की पत्नी और बेटी थीं, जिनकी मृत्यु हो गई। किंग्सफ़ोर्ड बच गया।

प्रफुल्ल को मोकामा स्टेशन पर पुलिस ने घेरा, तो उन्होंने पकड़े जाने से पहले स्वयं को गोली मार ली। खुदीराम लगभग 25 मील पैदल चलकर वैनी स्टेशन पहुँचे, जहाँ वे पकड़ लिए गए। उन्होंने निडर होकर ज़िम्मेदारी ली और 11 अगस्त 1908 को केवल 18 वर्ष की आयु में उन्हें फाँसी दे दी गई।

बंगाल में शोक फैल गया। विद्यार्थी खुदीराम के नाम की किनारी वाली धोती पहनने लगे। तिलक ने "केसरी" में लिखा कि सरकार का दमन ही ऐसे कामों की जड़ है, और इसी पर जून 1908 में उन्हें छह वर्ष के लिए मांडले भेज दिया गया।

🧭 इस कहानी से कौन-सी अवधारणा साफ़ हुई

✔ व्यक्तिगत हत्या की सीमा — निशाना चूक गया और निर्दोष महिलाएँ मारी गईं। इससे साफ़ होता है कि अकेले अधिकारी पर किया गया हमला न केवल जोखिम भरा था, बल्कि व्यवस्था को भी नहीं बदलता था।

✔ गुप्त दल की कार्यप्रणाली — युगांतर जैसे गुप्त दल अपने सबसे युवा और समर्पित सदस्यों को चुनकर ऐसे काम सौंपते थे। प्रफुल्ल चाकी का पकड़े जाने से पहले आत्म-बलिदान इसी निष्ठा का उदाहरण है।

✔ बलिदान और जन-सहानुभूति — खुदीराम की फाँसी ने क्रांतिकारियों के लिए जनता का आदर बढ़ाया, जबकि तिलक की गिरफ़्तारी दिखाती है कि सरकार का दमन राष्ट्रवादी आवाज़ों तक भी पहुँच गया था।

📝 परीक्षा के लिए: मुज़फ़्फ़रपुर बम कांड (30 अप्रैल 1908): खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी, निशाना किंग्सफ़ोर्ड, मरीं कैनेडी की पत्नी और बेटी; प्रफुल्ल का मोकामा में आत्म-बलिदान; खुदीराम को 11 अगस्त 1908 को फाँसी; तिलक को जून 1908 में छह वर्ष की सज़ा (मांडले)।

◆ पृष्ठभूमि — डगलस किंग्सफ़ोर्ड कलकत्ता का मुख्य प्रेसिडेंसी मजिस्ट्रेट था। उसने "युगांतर" और "वंदे मातरम्" पत्रों के मुक़दमों में कड़ी सज़ाएँ दी थीं और सुशील सेन नाम के एक किशोर को पुलिस से झड़प के मामले में कोड़े लगाने की सज़ा दी थी। इसलिए युवा उससे घृणा करते थे। उसे मारने का एक प्रयास (पुस्तक में छिपाया गया बम) पहले विफल हो चुका था। सरकार ने सुरक्षा के लिए उसका तबादला बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर में ज़िला जज के पद पर कर दिया।

◆ घटनाक्रम — खुदीराम और प्रफुल्ल कई दिन मुज़फ़्फ़रपुर में रहकर किंग्सफ़ोर्ड की दिनचर्या देखते रहे। 30 अप्रैल 1908 की शाम यूरोपियन क्लब से निकली एक बग्घी को किंग्सफ़ोर्ड की बग्घी समझकर उन्होंने उस पर बम फेंका। दुर्भाग्य से उस बग्घी में बैरिस्टर प्रिंगल कैनेडी की पत्नी और बेटी थीं, जिनकी मृत्यु हो गई। किंग्सफ़ोर्ड बच गया।

◆ गिरफ़्तारी — दोनों अलग-अलग दिशाओं में भागे। प्रफुल्ल चाकी को मोकामा स्टेशन पर पुलिस ने घेरा, तो उन्होंने पकड़े जाने से पहले स्वयं को गोली मार ली। खुदीराम लगभग 25 मील पैदल चलकर वैनी (पूसा रोड) स्टेशन पहुँचे, जहाँ उन्हें पकड़ लिया गया। आज उस स्टेशन का नाम "खुदीराम बोस पूसा" है।

◆ मुक़दमा और फाँसी — मुक़दमे में खुदीराम ने निडर होकर ज़िम्मेदारी ली। उन्हें मृत्युदंड मिला और 11 अगस्त 1908 को मुज़फ़्फ़रपुर जेल में फाँसी दी गई। उस समय उनकी आयु केवल 18 वर्ष थी — वे फाँसी पाने वाले सबसे कम आयु के क्रांतिकारियों में गिने जाते हैं। कहा जाता है कि वे हाथ में गीता लेकर मुस्कुराते हुए फाँसी पर चढ़े।

◆ प्रतिक्रिया — पूरे बंगाल में शोक मनाया गया; विद्यार्थी उनके नाम की किनारी वाली धोती पहनने लगे। तिलक ने "केसरी" में इस घटना पर लेख लिखकर कहा कि सरकार का दमन ही ऐसे कामों की जड़ है — इसी पर जून 1908 में उन्हें गिरफ़्तार कर छह वर्ष की सज़ा देकर मांडले भेज दिया गया।

📌 खुदीराम की याद में गीत

खुदीराम की फाँसी के बाद बंगाल में उनकी स्मृति में लोकगीत गाया गया — "एक बार बिदाय दे माँ, घुरे आसि" (एक बार विदा दे माँ, मैं लौटकर आऊँगा)। यह गीत आज भी बंगाल में गाया जाता है।

3.6 अलीपुर षड्यंत्र केस (1908–1909)

◆ पृष्ठभूमि — मुज़फ़्फ़रपुर कांड के तुरंत बाद पुलिस ने 2 मई 1908 को मानिकतला के मुरारीपुकुर बाग़ पर छापा मारा। वहाँ बम, विस्फोटक, हथियार और क्रांतिकारी साहित्य मिला।

◆ गिरफ़्तारियाँ — अरविंद घोष, बारींद्र घोष, उल्लासकर दत्त, हेमचंद्र कानूनगो सहित तीस से अधिक युवक पकड़े गए। उन पर "सम्राट के विरुद्ध युद्ध छेड़ने" का षड्यंत्र केस अलीपुर (कलकत्ता) के सत्र न्यायालय में चला। रोचक बात यह है कि मुक़दमा सुनने वाले जज बीचक्रॉफ़्ट इंग्लैंड में अरविंद के सहपाठी रह चुके थे।

◆ जेल में मुखबिर का वध — साथी नरेंद्रनाथ गोस्वामी सरकारी गवाह बन गया। 31 अगस्त 1908 को अलीपुर जेल के भीतर ही क़ैदी कन्हाईलाल दत्त और सत्येंद्रनाथ बोस ने गुप्त रूप से मँगाई गई पिस्तौलों से उसे मार डाला। दोनों को नवंबर 1908 में फाँसी दी गई। कन्हाईलाल की शवयात्रा में हज़ारों लोग उमड़े।

◆ फ़ैसला (मई 1909) — बारींद्र घोष और उल्लासकर दत्त को पहले मृत्युदंड मिला, जिसे बाद में आजीवन काला पानी में बदल दिया गया; कई अन्य को लंबी सज़ाएँ हुईं। अरविंद घोष की पैरवी चित्तरंजन दास ने की और ठोस प्रमाण के अभाव में अरविंद बरी हो गए।

◆ परिणाम — जेल के अनुभव ने अरविंद को आध्यात्मिकता की ओर मोड़ा; 1910 में वे फ़्रांसीसी बस्ती पांडिचेरी चले गए और योग-साधना में लीन हो गए। मुक़दमे के बाद भी क्रांतिकारियों ने सरकारी वकील आशुतोष बिस्वास (1909) और पुलिस उपाधीक्षक शम्सुल आलम (1910) को मार दिया, जिसके बाद हावड़ा-शिबपुर षड्यंत्र केस (1910) चला।

◆ बर्रा डकैती (2 जून 1908) — इसी समय पूर्वी बंगाल (ढाका ज़िला) के बर्रा गाँव में ढाका अनुशीलन के सदस्यों ने, पुलिन बिहारी दास के नेतृत्व में, एक धनी ज़मींदार के घर डकैती डाली। यह क्रांतिकारी काम के लिए धन जुटाने वाली पहली बड़ी "स्वदेशी डकैती" थी। दिसंबर 1908 में पुलिन दास को निर्वासित कर दिया गया।

3.7 चंद्रनगर — क्रांतिकारियों की शरणस्थली

हुगली नदी के तट पर चंद्रनगर एक फ़्रांसीसी बस्ती थी, जहाँ ब्रिटिश पुलिस बिना अनुमति कार्रवाई नहीं कर सकती थी। इसलिए यह क्रांतिकारियों के छिपने, हथियार रखने और पर्चे छापने का सुरक्षित केंद्र बन गया। रासबिहारी बोस ने भी कुछ समय यहाँ बिताया और यहीं के मोतीलाल राय जैसे क्रांतिकारी उनके सहयोगी थे। इसी तरह दक्षिण में फ़्रांसीसी बस्ती पांडिचेरी अरविंद, सुब्रह्मण्य भारती और वी. वी. एस. अय्यर की शरणस्थली बनी।

3.8 बाघा जतिन (जतींद्रनाथ मुखर्जी, 1879–1915)

7 दिसंबर 1879 को नदिया ज़िले (आज बांग्लादेश का कुष्टिया) में जन्मे जतींद्रनाथ मुखर्जी विवेकानंद और अरविंद के निष्ठावान अनुयायी थे। कहा जाता है कि 1906 में उन्होंने केवल एक छुरे से एक बाघ को मार डाला था, इसीलिए लोग उन्हें "बाघा जतिन" कहने लगे। वे बंगाल सरकार के कार्यालय में आशुलिपिक थे, पर भीतर ही भीतर युगांतर दल के सबसे बड़े नेता बन गए। उनका प्रसिद्ध वाक्य था — "आमरा मोरबो, जगत जागबे" (हम मरेंगे, तभी दुनिया जागेगी)।

◆ हावड़ा-शिबपुर षड्यंत्र केस (1910) — शम्सुल आलम की हत्या के बाद जतिन को इस षड्यंत्र केस में पकड़ा गया, पर प्रमाण के अभाव में 1911 में वे रिहा हो गए। इसके बाद उन्होंने बंगाल के बिखरे दलों को फिर से एक किया।

◆ रोडा कंपनी हथियार लूट (26 अगस्त 1914) — कलकत्ता की हथियार विक्रेता कंपनी आर. बी. रोडा एंड कंपनी के एक भारतीय कर्मचारी की मदद से क्रांतिकारियों ने बंदरगाह से आई खेप में से लगभग 50 मौज़र पिस्तौलें और हज़ारों कारतूस ग़ायब कर दिए। आगे कई वर्षों तक बंगाल के क्रांतिकारी इन्हीं पिस्तौलों का प्रयोग करते रहे।

◆ भारत-जर्मन षड्यंत्र — प्रथम विश्वयुद्ध छिड़ने पर जतिन ने जर्मनी से हथियार मँगाकर बंगाल में विद्रोह की योजना बनाई। बर्लिन कमेटी (खंड 6.7) के माध्यम से अमेरिका से हथियारों से भरे जहाज़ (जैसे "मेवरिक" और "एनी लार्सन") भेजे जाने थे, जिन्हें उड़ीसा के तट पर उतारा जाना था। पर यह योजना ब्रिटिश गुप्तचरों को पता चल गई और जहाज़ कभी भारत नहीं पहुँचे।

◆ बालासोर की अंतिम लड़ाई (9 सितंबर 1915) — जतिन अपने चार साथियों के साथ उड़ीसा के बालासोर के पास जंगल में हथियारों की प्रतीक्षा कर रहे थे। पुलिस और सेना ने उन्हें घेर लिया। बूढ़ी बालम नदी के किनारे खाइयों से पाँच क्रांतिकारियों ने आधुनिक हथियारों से लैस बड़ी टुकड़ी का घंटों सामना किया। चित्तप्रिय राय चौधरी वहीं शहीद हुए, जतिन गंभीर रूप से घायल होकर 10 सितंबर 1915 को अस्पताल में चल बसे और साथी मनोरंजन सेनगुप्त व नीरेंद्र दासगुप्त को बाद में फाँसी दी गई।

◆ महत्त्व — बाघा जतिन पहले चरण के सबसे साहसी और संगठन-कुशल नेता थे। उनकी योजना ने दिखाया कि क्रांतिकारी अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सोचने लगे थे।

📋 दोहराव तालिका: बंगाल (प्रथम चरण)

वर्ष

संगठन / घटना

मुख्य बात

24 मार्च 1902

अनुशीलन समिति, कलकत्ता

पी. मित्र की अध्यक्षता में बना यह बंगाल का पहला क्रांतिकारी संगठन था।

1906

"युगांतर" और ढाका अनुशीलन

बारींद्र-भूपेंद्रनाथ ने क्रांतिकारी साप्ताहिक निकाला; पुलिन दास ने ढाका में सबसे संगठित समूह बनाया।

30 अप्रैल 1908

मुज़फ़्फ़रपुर बम कांड

किंग्सफ़ोर्ड के धोखे में कैनेडी माँ-बेटी मारी गईं; खुदीराम को 11 अगस्त 1908 को फाँसी हुई।

1908–09

अलीपुर षड्यंत्र केस

बारींद्र को काला पानी मिला; चित्तरंजन दास की पैरवी से अरविंद बरी हुए।

26 अगस्त 1914

रोडा कंपनी हथियार लूट

लगभग 50 मौज़र पिस्तौलें क्रांतिकारियों के हाथ लगीं।

9–10 सितंबर 1915

बाघा जतिन का बलिदान

जर्मन हथियार योजना विफल हुई; बालासोर में मुठभेड़ के बाद उनकी मृत्यु हुई।

4. पंजाब, दिल्ली, संयुक्त प्रांत और मद्रास

महाराष्ट्र और बंगाल के अलावा देश के दूसरे हिस्सों में भी क्रांतिकारी गतिविधियाँ फैलीं। पंजाब में किसानों का असंतोष, मद्रास में स्वदेशी जहाज़ कंपनी का दमन और दिल्ली में राजधानी-परिवर्तन — इन घटनाओं ने अलग-अलग क्षेत्रों में क्रांतिकारियों को जन्म दिया।

4.1 पंजाब (1907): किसान असंतोष और "पगड़ी सँभाल जट्टा"

◆ पृष्ठभूमि — सरकार ने चिनाब नहर उपनिवेश क्षेत्र के किसानों पर नया पंजाब उपनिवेशीकरण विधेयक (1906–07) लाया, जिससे उनके ज़मीन के अधिकार घट जाते, और साथ ही बारी दोआब नहर का पानी-कर भी बढ़ा दिया। किसान, जिनमें बहुत से सेना से लौटे सैनिक थे, भड़क उठे।

◆ आंदोलन — भगत सिंह के चाचा अजीत सिंह ने "भारत माता सोसाइटी" (अंजुमन-ए-मोहिब्बान-ए-वतन) बनाकर आंदोलन का नेतृत्व किया। उनके साथ सूफ़ी अंबा प्रसाद और लालचंद "फ़लक" जैसे लोग थे। लाला बाँके दयाल का गीत "पगड़ी सँभाल जट्टा" (हे किसान, अपनी इज़्ज़त सँभाल) इस आंदोलन का तराना बन गया।

◆ दमन और परिणाम — मई 1907 में लाला लाजपत राय और अजीत सिंह को बिना मुक़दमे मांडले (बर्मा) निर्वासित कर दिया गया। पर जन-दबाव में वायसराय मिंटो ने उपनिवेशीकरण विधेयक को रद्द कर दिया। बाद में अजीत सिंह विदेश चले गए और लगभग 38 वर्ष बाद भारत लौटे; 15 अगस्त 1947 को, जिस दिन देश स्वतंत्र हुआ, उसी दिन डलहौज़ी में उनका निधन हुआ।

4.2 मद्रास: ऐश वध (17 जून 1911)

◆ पृष्ठभूमि — तमिलनाडु के तूतीकोरिन में वी. ओ. चिदंबरम पिल्लै ने 1906 में स्वदेशी स्टीम नेविगेशन कंपनी बनाकर अंग्रेज़ी जहाज़ कंपनी को चुनौती दी थी। सरकार ने इस कंपनी को कुचल दिया और 1908 में चिदंबरम पिल्लै को राजद्रोह में लंबी सज़ा दी गई। इस दमन में स्थानीय अधिकारी रॉबर्ट ऐश की बड़ी भूमिका मानी गई, जो आगे चलकर तिरुनेलवेली का कलेक्टर बना।

◆ संगठन — नीलकंठ ब्रह्मचारी ने 1910 में "भारत माता एसोसिएशन" बनाई, जिसके सदस्य अंग्रेज़ अधिकारियों को मारने की शपथ लेते थे। पांडिचेरी में रह रहे वी. वी. एस. अय्यर ने युवाओं को पिस्तौल चलाने का प्रशिक्षण दिया।

◆ घटनाक्रम — 17 जून 1911 को वांची अय्यर (वांचीनाथन) ने मणियाच्ची रेलवे स्टेशन पर ट्रेन में बैठे कलेक्टर ऐश को गोली मार दी और फिर पकड़े जाने से पहले स्वयं को भी गोली मार ली। इसके बाद चले तिरुनेलवेली षड्यंत्र केस में नीलकंठ ब्रह्मचारी सहित कई लोगों को सज़ा हुई। आज मणियाच्ची स्टेशन का नाम "वांची मणियाच्ची" है।

4.3 दिल्ली षड्यंत्र केस — हार्डिंग पर बम (23 दिसंबर 1912)

◆ पृष्ठभूमि — 12 दिसंबर 1911 के दिल्ली दरबार में घोषणा हुई कि ब्रिटिश भारत की राजधानी कलकत्ता से दिल्ली लाई जाएगी। क्रांतिकारियों ने तय किया कि वायसराय के राजधानी में औपचारिक प्रवेश के दिन उन पर हमला करके दिखाया जाए कि नई राजधानी भी सुरक्षित नहीं है।

◆ घटनाक्रम — 23 दिसंबर 1912 को वायसराय लॉर्ड हार्डिंग हाथी पर सवार होकर भव्य जुलूस के साथ दिल्ली में प्रवेश कर रहे थे। चाँदनी चौक में एक इमारत से उन पर बम फेंका गया। वायसराय घायल हुए और उनके पीछे छत्र पकड़े बैठा सेवक मारा गया। योजना रासबिहारी बोस की थी; बम फेंकने में स्त्री-वेश में छिपे बसंत कुमार बिस्वास की मुख्य भूमिका मानी जाती है और राजस्थान के ज़ोरावर सिंह बारहठ व प्रताप सिंह बारहठ भी इसमें शामिल थे।

◆ मुक़दमा — बम फेंकने वाले तुरंत नहीं पकड़े गए। लगभग एक वर्ष बाद 1913 में लाहौर के लॉरेंस गार्डन में एक और बम मिलने के बाद पुलिस को सुराग मिला। दिल्ली षड्यंत्र केस (जिसे दिल्ली-लाहौर षड्यंत्र केस भी कहते हैं) में मास्टर अमीरचंद, अवध बिहारी, भाई बालमुकुंद और बसंत कुमार बिस्वास को मई 1915 में फाँसी दी गई। रासबिहारी बोस बच निकले।

◆ महत्त्व — यह पहली बार था जब क्रांतिकारियों ने सीधे वायसराय को निशाना बनाया। घायल होने के बावजूद हार्डिंग ने कहा कि राजधानी की नीति नहीं बदलेगी, पर इस घटना से ब्रिटिश गुप्तचर तंत्र को बड़ा झटका लगा।

4.4 रासबिहारी बोस (1886–1945)

25 मई 1886 को बंगाल के बर्धमान ज़िले में जन्मे रासबिहारी बोस की शिक्षा चंद्रनगर में हुई। वे देहरादून के वन अनुसंधान संस्थान में लिपिक की नौकरी करते हुए गुप्त रूप से उत्तर भारत के क्रांतिकारी दलों को संगठित करते रहे। दिल्ली बम कांड (1912) के बाद वे पुलिस से बचते हुए बनारस पहुँचे और वहाँ से 1915 के ग़दर विद्रोह की योजना का नेतृत्व किया (खंड 6.6)। योजना विफल होने पर वे 1915 में "पी. एन. ठाकुर" के छद्म नाम से जहाज़ द्वारा जापान चले गए। जापान में उन्होंने वहाँ की नागरिकता ली, भारत की स्वतंत्रता के लिए प्रचार किया और 1942 में इंडियन इंडिपेंडेंस लीग बनाई; 1943 में उन्होंने आज़ाद हिंद फ़ौज का नेतृत्व सुभाषचंद्र बोस को सौंप दिया (अध्याय 13)। 21 जनवरी 1945 को टोक्यो में उनका निधन हुआ।

4.5 संयुक्त प्रांत: बनारस षड्यंत्र (1915) और मैनपुरी षड्यंत्र (1918)

◆ बनारस षड्यंत्र केस (1915) — ग़दर विद्रोह की योजना में बनारस केंद्र था, जहाँ रासबिहारी बोस छिपकर रहे। योजना विफल होने पर यहाँ के क्रांतिकारियों पर मुक़दमा चला। इसमें शचींद्रनाथ सान्याल को आजीवन काला पानी मिला और राजस्थान के प्रताप सिंह बारहठ को भी सज़ा हुई, जिनकी 1918 में बरेली जेल में यातनाओं से मृत्यु हुई।

◆ शचींद्रनाथ सान्याल (1893–1942) — बनारस में जन्मे सान्याल ने 1908 में वहाँ अनुशीलन समिति की शाखा खोली और रासबिहारी बोस के सबसे विश्वस्त साथी बने। अंडमान जेल के अनुभवों पर उन्होंने "बंदी जीवन" लिखी, जिसे क्रांतिकारी अपनी "गीता" कहते थे। 1920 की आम माफ़ी में रिहा होकर उन्होंने 1924 में एच.आर.ए. की नींव रखी (खंड 7.2)। काकोरी केस में उन्हें फिर काला पानी हुआ और 1942 में गोरखपुर जेल में क्षय रोग से उनकी मृत्यु हुई।

◆ मैनपुरी षड्यंत्र केस (1918) — इटावा-मैनपुरी क्षेत्र के अध्यापक गेंदालाल दीक्षित ने "मातृवेदी" नाम का संगठन बनाकर युवाओं को हथियार और धन जुटाने के लिए संगठित किया। युवा रामप्रसाद बिस्मिल उनके साथी थे, जिन्होंने "देशवासियों के नाम संदेश" पर्चा लिखा और "अमेरिका को स्वाधीनता कैसे मिली" पुस्तक छापी, जिसे सरकार ने ज़ब्त कर लिया। 1918 में दल पकड़ा गया; गेंदालाल जेल से भाग निकले पर 1920 में बीमारी से उनकी मृत्यु हो गई, और बिस्मिल कई वर्ष भूमिगत रहे।

📋 दोहराव तालिका: पंजाब, मद्रास, दिल्ली, संयुक्त प्रांत

वर्ष और स्थान

घटना

मुख्य बात

1907, पंजाब

किसान आंदोलन

अजीत सिंह की भारत माता सोसाइटी ने "पगड़ी सँभाल जट्टा" आंदोलन चलाया; लाजपत राय-अजीत सिंह मांडले निर्वासित हुए।

17 जून 1911, मद्रास

ऐश वध

वांची अय्यर ने कलेक्टर ऐश को मारकर स्वयं को भी गोली मार ली।

23 दिसंबर 1912, दिल्ली

हार्डिंग पर बम

रासबिहारी की योजना थी; अमीरचंद, अवध बिहारी, बालमुकुंद और बसंत बिस्वास को 1915 में फाँसी हुई।

1915, बनारस

बनारस षड्यंत्र

शचींद्रनाथ सान्याल को काला पानी मिला और उन्होंने आगे "बंदी जीवन" लिखी।

1918, मैनपुरी

मैनपुरी षड्यंत्र

गेंदालाल दीक्षित का "मातृवेदी" संगठन पकड़ा गया; बिस्मिल भूमिगत हुए।

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5. विदेश में क्रांतिकारी: इंडिया हाउस, मैडम कामा, ढींगरा और हरदयाल

भारत में कड़े दमन, प्रेस-प्रतिबंध और गुप्तचरों की निगरानी के कारण अनेक क्रांतिकारियों ने लंदन, पेरिस, बर्लिन, अमेरिका, कनाडा और जापान से काम किया। विदेश में उन्हें तीन सुविधाएँ थीं — वहाँ से पत्र-पत्रिकाएँ छापकर भारत भेजी जा सकती थीं, हथियार और बम बनाने की जानकारी मिल सकती थी, और भारत के प्रश्न पर अंतरराष्ट्रीय जनमत बनाया जा सकता था। नीचे का चार्ट 1905 से 1915 तक की आठ प्रमुख विदेशी घटनाओं का सार है। इनमें से पहली चार (होमरूल सोसाइटी, स्टुटगार्ट का झंडा, ढींगरा और सावरकर) इसी खंड में, और शेष चार (ग़दर पार्टी, कोमागाटा मारू, ग़दर विद्रोह और काबुल सरकार) अगले खंड 6 में विस्तार से समझाई गई हैं।

चित्र 11.3: विदेश में क्रांतिकारी गतिविधियों का कालक्रम (1905–1915)
चित्र 11.3: विदेश में क्रांतिकारी गतिविधियों का कालक्रम (1905–1915)

5.1 श्यामजी कृष्ण वर्मा (1857–1930)

4 अक्टूबर 1857 को कच्छ (गुजरात) के मांडवी में जन्मे श्यामजी कृष्ण वर्मा संस्कृत के असाधारण विद्वान थे। वे स्वामी दयानंद सरस्वती के शिष्य रहे और ऑक्सफ़र्ड विश्वविद्यालय में संस्कृत पढ़ाने वाले प्रोफ़ेसर मोनियर-विलियम्स के सहायक के रूप में इंग्लैंड गए, जहाँ उन्होंने स्वयं भी उपाधि और बैरिस्टरी प्राप्त की। भारत लौटकर वे रतलाम के दीवान, उदयपुर राज्य की परिषद के सदस्य और जूनागढ़ के दीवान रहे। रियासतों की राजनीति और अंग्रेज़ अधिकारियों के व्यवहार से निराश होकर वे 1897 में स्थायी रूप से इंग्लैंड चले गए और वहीं से भारत की स्वतंत्रता के लिए काम करने लगे।

◆ इंडियन होमरूल सोसाइटी (18 फ़रवरी 1905) — उन्होंने लंदन में यह संस्था बनाई, जिसका उद्देश्य भारत के लिए स्वशासन प्राप्त करना और इंग्लैंड में भारत के पक्ष में प्रचार करना था। इसी वर्ष उन्होंने मासिक पत्र "द इंडियन सोशियोलॉजिस्ट" (भारतीय समाजशास्त्री) शुरू किया, जिसे ब्रिटेन में भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन की नींव माना जाता है।

◆ इंडिया हाउस (1 जुलाई 1905) — उत्तरी लंदन के हाईगेट क्षेत्र में उन्होंने एक बड़ा भवन ख़रीदकर भारतीय छात्रों के लिए छात्रावास खोला, जो "इंडिया हाउस" कहलाया। उन्होंने शिवाजी, राणा प्रताप और दयानंद जैसे नायकों के नाम पर छात्रवृत्तियाँ दीं, इस शर्त के साथ कि छात्र अंग्रेज़ी सरकार की नौकरी नहीं करेंगे। सावरकर इसी छात्रवृत्ति पर लंदन पहुँचे थे।

◆ बाद का जीवन — ब्रिटिश सरकार की बढ़ती निगरानी के कारण वे 1907 में पेरिस और प्रथम विश्वयुद्ध के समय जिनेवा (स्विट्ज़रलैंड) चले गए, जहाँ 1930 में उनका निधन हुआ। उनकी इच्छा थी कि स्वतंत्र भारत में उनकी अस्थियाँ ले जाई जाएँ; 2003 में यह इच्छा पूरी हुई और आज मांडवी में उनका "क्रांति तीर्थ" स्मारक है।

5.2 इंडिया हाउस — क्रांतिकारियों की पाठशाला

इंडिया हाउस केवल छात्रावास नहीं था; यह लंदन में भारतीय क्रांतिकारियों की पाठशाला बन गया। यहाँ हर सप्ताह बैठकें होतीं, जिनमें इतिहास, राजनीति और क्रांति पर चर्चा होती थी। 10 मई 1908 को यहाँ 1857 के विद्रोह की पचासवीं वर्षगाँठ धूमधाम से मनाई गई और छात्रों ने "1857 के शहीदों" के बिल्ले लगाकर कॉलेजों में प्रवेश किया। यहीं से बम बनाने की पुस्तिकाएँ और पिस्तौलें गुप्त रूप से भारत भेजी गईं। विनायक सावरकर, मदनलाल ढींगरा, वी. वी. एस. अय्यर, सेनापति बापट और कुछ समय के लिए लाला हरदयाल इससे जुड़े रहे। 1909 में कर्ज़न वायली की हत्या के बाद सरकार के दबाव में इंडिया हाउस बंद हो गया।

5.3 मैडम भीकाजी रुस्तम कामा (1861–1936) — "भारतीय क्रांति की माँ"

24 सितंबर 1861 को बम्बई के एक संपन्न पारसी परिवार में जन्मी भीकाजी का विवाह वकील रुस्तम के. आर. कामा से हुआ। 1896–97 में बम्बई में प्लेग के समय उन्होंने रोगियों की सेवा की और स्वयं बीमार पड़ गईं। इलाज के लिए वे 1902 में यूरोप गईं और फिर कभी लंबे समय तक भारत नहीं लौटीं। लंदन में वे दादाभाई नौरोजी की निजी सचिव रहीं और फिर श्यामजी कृष्ण वर्मा के संपर्क में आकर क्रांतिकारी राष्ट्रवाद की समर्थक बन गईं। बाद में वे पेरिस में रहकर एस. आर. राणा के साथ क्रांतिकारियों की सहायता करने लगीं।

◆ स्टुटगार्ट का झंडा (22 अगस्त 1907) — जर्मनी के स्टुटगार्ट नगर में अंतरराष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन हो रहा था, जिसमें दुनिया भर के समाजवादी नेता आए थे। मैडम कामा ने वहाँ भारत में अकाल, ग़रीबी और अंग्रेज़ी शोषण पर भाषण दिया और मंच पर भारत का झंडा फहराया। हरे, केसरिया और लाल पट्टियों वाले इस झंडे के बीच में "वंदे मातरम्" लिखा था। इस झंडे की रूपरेखा उन्होंने सावरकर और श्यामजी कृष्ण वर्मा के साथ मिलकर बनाई थी। किसी अंतरराष्ट्रीय मंच पर फहराया गया यह भारत का पहला झंडा माना जाता है।

◆ प्रचार — उन्होंने यूरोप से "वंदे मातरम्" पत्र निकाला और मदनलाल ढींगरा की स्मृति में "मदन्स तलवार" (मदन की तलवार) पत्र चलाया। ये पत्र छिपाकर भारत भेजे जाते थे। वे क्रांतिकारियों को धन और हथियार भी भेजती थीं।

◆ अंतिम वर्ष — लगभग 33 वर्ष यूरोप में निर्वासित रहने के बाद, बीमार अवस्था में, वे 1935 में भारत लौटीं और 1936 में बम्बई में उनका निधन हुआ। उन्हें "भारतीय क्रांति की माँ" कहा जाता है।

5.4 मदनलाल ढींगरा और कर्ज़न वायली वध (1 जुलाई 1909)

मदनलाल ढींगरा का जन्म 1883 में अमृतसर के एक संपन्न और अंग्रेज़-भक्त परिवार में हुआ; उनके पिता सरकारी सिविल सर्जन थे। 1906 में वे इंजीनियरिंग पढ़ने लंदन गए और वहाँ इंडिया हाउस और सावरकर के संपर्क में आकर क्रांतिकारी बन गए। उनका परिवार उनके इस रास्ते से इतना नाराज़ था कि उसने उनसे नाता तोड़ लिया।

◆ पृष्ठभूमि — भारत में खुदीराम बोस, कन्हाईलाल दत्त और अन्य युवाओं को फाँसी दी जा रही थी और सावरकर के भाई गणेश को काला पानी मिला था। इंडिया हाउस के युवा इसका बदला लेना चाहते थे। सर विलियम कर्ज़न वायली भारत सचिव के राजनीतिक सलाहकार (एडीसी) थे और लंदन में भारतीय छात्रों की जासूसी के लिए कुख्यात थे।

◆ घटनाक्रम — 1 जुलाई 1909 की शाम लंदन के इंपीरियल इंस्टीट्यूट में "नेशनल इंडियन एसोसिएशन" का समारोह था। कार्यक्रम के अंत में ढींगरा ने कर्ज़न वायली पर बहुत पास से गोलियाँ चलाईं। उन्हें बचाने आगे आए पारसी चिकित्सक डॉ. कावस लालकाका भी गोली लगने से मारे गए। ढींगरा ने भागने का कोई प्रयास नहीं किया।

◆ मुक़दमा और फाँसी — लंदन की अदालत में ढींगरा ने कोई वकील नहीं लिया और कहा कि उन्होंने अपने देश के युवाओं को दी जा रही फाँसियों और देश के अपमान का बदला लिया है। उनका लिखित बयान, जिसे पुलिस ने दबाने का प्रयास किया, बाद में अख़बारों में छपा। 17 अगस्त 1909 को लंदन की पेंटनविल जेल में उन्हें फाँसी दी गई।

◆ प्रतिक्रिया — लंदन के कई भारतीयों ने सभा करके इस हत्या की निंदा की, पर सावरकर ने निंदा प्रस्ताव का विरोध किया। गांधीजी ने, जो उस समय लंदन में थे, हिंसा के इस मार्ग को ग़लत माना; इसी वर्ष लौटते समय जहाज़ पर लिखी गई उनकी पुस्तक "हिंद स्वराज" (1909) में इस सोच का उत्तर दिया गया है। ब्रिटेन ने इसके बाद इंडिया हाउस पर कड़ी कार्रवाई की।

◆ महत्त्व — यह पहली बार था जब किसी भारतीय क्रांतिकारी ने साम्राज्य की राजधानी में ही एक बड़े अधिकारी को मारा। इससे ब्रिटेन को समझ आया कि भारतीय असंतोष अब इंग्लैंड तक पहुँच चुका है।

5.5 सावरकर की गिरफ़्तारी और मार्सेई प्रसंग (1910)

◆ गिरफ़्तारी — नासिक षड्यंत्र (जैक्सन वध) में प्रयुक्त पिस्तौलें लंदन से भेजे जाने और भड़काऊ भाषणों के आरोप में 13 मार्च 1910 को विनायक सावरकर लंदन में गिरफ़्तार हुए। ब्रिटिश अदालत ने उन्हें मुक़दमे के लिए भारत भेजने का आदेश दिया।

◆ मार्सेई में छलाँग — भारत ले जाए जाते समय जहाज़ "मोरिया" 8 जुलाई 1910 को फ़्रांस के मार्सेई बंदरगाह पर रुका। सावरकर शौचालय के छोटे से रोशनदान से निकलकर समुद्र में कूद गए और तैरकर फ़्रांसीसी तट पर पहुँच गए। उनका विचार था कि फ़्रांस की धरती पर वे राजनीतिक शरण माँग सकेंगे। पर पीछा कर रहे ब्रिटिश सिपाहियों ने फ़्रांसीसी पुलिस की सहायता से उन्हें फिर पकड़ लिया।

◆ अंतरराष्ट्रीय विवाद — फ़्रांस में इस पर हंगामा हुआ कि फ़्रांसीसी धरती पर एक राजनीतिक शरणार्थी को ब्रिटिश पुलिस कैसे ले गई। मामला हेग के स्थायी मध्यस्थता न्यायालय तक पहुँचा, जिसने 1911 में ब्रिटेन के पक्ष में फ़ैसला दिया। भारत में नासिक षड्यंत्र केस में सावरकर को दो आजीवन कारावास देकर अंडमान भेज दिया गया।

5.6 लाला हरदयाल (1884–1939)

14 अक्टूबर 1884 को दिल्ली में जन्मे हरदयाल अत्यंत मेधावी छात्र थे। दिल्ली के सेंट स्टीफ़ेंस कॉलेज से पढ़ाई के बाद 1905 में उन्हें सरकारी छात्रवृत्ति पर ऑक्सफ़र्ड भेजा गया, पर वहाँ इंडिया हाउस के संपर्क में आकर उन्होंने 1907 में विरोधस्वरूप यह छात्रवृत्ति छोड़ दी। भारत लौटकर कुछ समय लाहौर में युवाओं को संगठित करने के बाद वे फिर विदेश चले गए। 1911 में वे अमेरिका पहुँचे और कैलिफ़ोर्निया के स्टैनफ़र्ड विश्वविद्यालय में भारतीय दर्शन पढ़ाने लगे। 1913 में वे ग़दर पार्टी के महासचिव और मुख्य विचारक बने (खंड 6.3)। 1914 में अमेरिकी सरकार ने उन्हें गिरफ़्तार किया तो वे ज़मानत छोड़कर स्विट्ज़रलैंड और फिर जर्मनी चले गए, जहाँ वे बर्लिन कमेटी से जुड़े। बाद के वर्षों में उनके विचार बदल गए; उन्होंने लंदन विश्वविद्यालय से बौद्ध दर्शन पर शोध-उपाधि ली और "हिंट्स फ़ॉर सेल्फ़ कल्चर" जैसी पुस्तकें लिखीं। 1939 में अमेरिका के फ़िलाडेल्फ़िया में उनका निधन हुआ।

5.7 विदेश में अन्य क्रांतिकारी

◆ वीरेंद्रनाथ चट्टोपाध्याय ("चट्टो") — सरोजिनी नायडू के भाई, जो इंडिया हाउस से जुड़े और प्रथम विश्वयुद्ध में बर्लिन कमेटी के प्रमुख नेता बने। बाद में वे कम्युनिस्ट आंदोलन से जुड़कर सोवियत संघ चले गए।

◆ एस. आर. राणा — पेरिस में रहने वाले गुजराती व्यापारी, जिन्होंने श्यामजी कृष्ण वर्मा और मैडम कामा के साथ "पेरिस इंडियन सोसाइटी" बनाई और भारतीय छात्रों को छात्रवृत्तियाँ दीं।

◆ वी. वी. एस. अय्यर — तमिलनाडु के बैरिस्टर, जो इंडिया हाउस में सावरकर के साथी थे। भारत लौटकर वे फ़्रांसीसी बस्ती पांडिचेरी में रहे और वांची अय्यर जैसे युवाओं को प्रशिक्षित किया।

◆ तारकनाथ दास — बंगाल के युवा, जो 1905 के आसपास अमेरिका गए और कनाडा के वैंकूवर से "फ़्री हिंदुस्तान" (1908) पत्र निकालकर वहाँ के भारतीय मज़दूरों में चेतना जगाई। वे ग़दर आंदोलन के अग्रदूतों में थे।

6. ग़दर आंदोलन, कोमागाटा मारू, बर्लिन कमेटी और काबुल सरकार

6.1 पृष्ठभूमि: प्रवासी भारतीयों का अपमान

बीसवीं सदी के आरंभ में पंजाब के हज़ारों किसान और सेना से लौटे सैनिक रोज़गार की तलाश में कनाडा और अमेरिका के पश्चिमी तट (वैंकूवर, सैन फ़्रांसिस्को, पोर्टलैंड आदि) पर गए। वहाँ वे लकड़ी की मिलों, रेल-निर्माण और खेतों में काम करते थे। पर उन्हें पग-पग पर नस्लीय भेदभाव झेलना पड़ा — गोरे मज़दूर उन पर हमले करते, होटलों में प्रवेश नहीं मिलता और सरकारें उन्हें रोकने के लिए कड़े प्रवास-क़ानून बनाती थीं। इन प्रवासियों ने अनुभव किया कि ग़ुलाम देश के नागरिक को दुनिया में कहीं सम्मान नहीं मिलता, और यह अपमान तभी मिटेगा जब भारत स्वतंत्र होगा। यहीं से ग़दर (विद्रोह) आंदोलन का जन्म हुआ।

🔍 आसान परिभाषा: सतत यात्रा नियम (1908, कनाडा)

📘 परिभाषा: कनाडा सरकार का वह प्रवास-नियम, जिसके अनुसार केवल वही व्यक्ति कनाडा में उतर सकता था जो अपने जन्म या नागरिकता वाले देश से बिना कहीं रुके, सीधी यात्रा करके आया हो; साथ ही एशियाई प्रवासियों के पास एक निश्चित राशि होना भी ज़रूरी किया गया।

💡 आसान भाषा में: उस समय भारत से कनाडा तक कोई सीधा जहाज़ चलता ही नहीं था, इसलिए यह नियम दिखने में सबके लिए था, पर असल में भारतीयों को रोकने का चालाक तरीक़ा था। 🏠 उदाहरण: कोमागाटा मारू (1914) का पूरा संघर्ष इसी नियम को चुनौती देने के लिए था।

◆ अग्रदूत — वैंकूवर में तारकनाथ दास ने "फ़्री हिंदुस्तान" (1908) पत्र निकाला और जी. डी. कुमार ने प्रवासियों की सहायता के लिए "स्वदेश सेवक होम" खोला। इन्होंने प्रवासी मज़दूरों में पढ़ने-लिखने और राजनीतिक चर्चा की आदत डाली।

6.2 ग़दर पार्टी की स्थापना (1913)

◆ स्थापना — 1913 में अमेरिका के ओरेगन राज्य में प्रवासियों ने "हिंदुस्तानी एसोसिएशन ऑफ़ द पैसिफ़िक कोस्ट" (प्रशांत तट के हिंदुस्तानियों का संघ) बनाया। इसकी औपचारिक स्थापना 15 जुलाई 1913 को एस्टोरिया की बैठक में मानी जाती है (कुछ स्रोतों में 21 अप्रैल 1913 की तिथि दी गई है)। इसका मुख्यालय सैन फ़्रांसिस्को में "युगांतर आश्रम" नाम से बना।

◆ नाम — संघ ने "ग़दर" नाम का पत्र निकाला, जो इतना लोकप्रिय हुआ कि संगठन ही "ग़दर पार्टी" कहलाने लगा। "ग़दर" का अर्थ है विद्रोह — और यह नाम जानबूझकर 1857 के विद्रोह की याद दिलाने के लिए रखा गया था।

◆ विशेषता — ग़दर आंदोलन पूरी तरह धर्मनिरपेक्ष था। इसमें सिख, हिंदू और मुसलमान बराबरी से शामिल थे और बैठकों में धर्म की चर्चा वर्जित थी। यह पहला भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन था जो अमेरिका, कनाडा, पूर्वी एशिया (सिंगापुर, हांगकांग, मलाया, बर्मा) तक फैला।

6.3 ग़दर पार्टी के प्रमुख नेता

◆ सोहन सिंह भकना (1870–1968) — अमृतसर ज़िले के भकना गाँव के किसान, जो पोर्टलैंड की लकड़ी मिल में मज़दूरी करते थे। वे ग़दर पार्टी के अध्यक्ष थे। पहले लाहौर षड्यंत्र केस में उन्हें आजीवन कारावास मिला; रिहा होने के बाद वे जीवन भर किसान आंदोलन से जुड़े रहे।

◆ लाला हरदयाल — पार्टी के महासचिव और मुख्य विचारक, जिन्होंने "ग़दर" पत्र की नीति तय की (परिचय खंड 5.6 में)। पंडित काशीराम पार्टी के कोषाध्यक्ष थे।

◆ करतार सिंह सराभा (1896–1915) — लुधियाना ज़िले के सराभा गाँव में जन्मे करतार सिंह पढ़ाई के लिए अमेरिका गए थे। वे "ग़दर" पत्र के पंजाबी संस्करण को छापने और बाँटने का काम करते थे। विश्वयुद्ध छिड़ते ही वे भारत लौटे और छावनियों में सैनिकों को विद्रोह के लिए तैयार करने में जुट गए। पकड़े जाने पर अदालत में उन्होंने सारी ज़िम्मेदारी स्वयं ले ली और 16 नवंबर 1915 को केवल 19 वर्ष की आयु में उन्हें फाँसी हुई। भगत सिंह उन्हें अपना आदर्श मानते थे और उनकी तस्वीर अपनी जेब में रखते थे।

◆ मौलाना बरकतुल्ला (भोपाली) — भोपाल के विद्वान, जो जापान के टोक्यो विश्वविद्यालय में उर्दू पढ़ाते थे और ग़दर के प्रमुख नेता बने। आगे वे काबुल की अस्थायी सरकार में प्रधानमंत्री बने (खंड 6.8)।

◆ विष्णु गणेश पिंगले — महाराष्ट्र के इंजीनियरिंग छात्र, जो अमेरिका से लौटकर रासबिहारी बोस और ग़दरियों के बीच कड़ी बने। मार्च 1915 में मेरठ छावनी में बमों के साथ पकड़े गए और सराभा के साथ ही फाँसी पर चढ़े।

◆ अन्य — भाई परमानंद (आर्य समाजी विद्वान, जिन्हें काला पानी हुआ), रामचंद्र, भगवान सिंह और पांडुरंग खानखोजे भी प्रमुख सदस्य थे।

6.4 "ग़दर" पत्र और "ग़दर दी गूँज"

◆ पहला अंक — 1 नवंबर 1913 को सैन फ़्रांसिस्को से "ग़दर" साप्ताहिक का पहला अंक उर्दू में निकला; जल्दी ही यह गुरमुखी (पंजाबी), हिंदी, गुजराती आदि भाषाओं में भी छपने लगा। इसके मुखपृष्ठ पर लिखा होता था — "अंग्रेज़ी राज का दुश्मन"।

◆ सामग्री — इसमें अंग्रेज़ी राज द्वारा भारत की लूट, अकाल, ग़रीबी और प्रवासियों के अपमान के आँकड़े और लेख छपते थे। हर अंक में एक विज्ञापन-जैसा संदेश होता था — "चाहिए: भारत में विद्रोह करने के लिए वीर सैनिक; वेतन: मृत्यु; इनाम: शहादत; पेंशन: आज़ादी; कार्यक्षेत्र: हिंदुस्तान।"

◆ "ग़दर दी गूँज" — क्रांतिकारी कविताओं का यह संग्रह गाँव-गाँव में गाया जाता था। इसकी सरल पंजाबी कविताएँ अनपढ़ मज़दूरों तक भी विद्रोह का संदेश पहुँचाती थीं।

◆ "ऐलान-ए-जंग" — अगस्त 1914 में प्रथम विश्वयुद्ध छिड़ते ही ग़दर पार्टी ने अंग्रेज़ों के विरुद्ध युद्ध की घोषणा प्रकाशित की और प्रवासियों से भारत लौटकर विद्रोह करने का आह्वान किया।

6.5 कोमागाटा मारू प्रसंग (1914)

◆ पृष्ठभूमि — सिंगापुर में व्यापार करने वाले अमृतसर के बाबा गुरदित सिंह ने कनाडा के सतत यात्रा नियम को चुनौती देने का निश्चय किया। उन्होंने "कोमागाटा मारू" नाम का एक जापानी जहाज़ किराए पर लिया।

◆ यात्रा — अप्रैल 1914 में जहाज़ हांगकांग से चला और रास्ते में शंघाई और जापान से यात्री लेता हुआ 376 भारतीयों (अधिकतर सिख, कुछ पंजाबी मुसलमान और हिंदू) के साथ 23 मई 1914 को कनाडा के वैंकूवर बंदरगाह पहुँचा।

◆ वैंकूवर में घेराबंदी — कनाडा सरकार ने केवल कुछ यात्रियों (जो पहले से कनाडा के निवासी थे) को उतरने दिया; बाक़ी लगभग दो महीने तक बंदरगाह में जहाज़ पर ही भूख-प्यास में क़ैद रहे। यात्रियों के अधिकारों के लिए वैंकूवर के भारतीयों ने हुसैन रहीम, बलवंत सिंह और सोहनलाल पाठक के नेतृत्व में "शोर कमेटी" (तटीय समिति) बनाई और अदालत में मुक़दमा लड़ा, पर हार गए। अमेरिका से भगवान सिंह, बरकतुल्ला और सोहन सिंह जैसे ग़दर नेताओं ने भी समर्थन में सभाएँ कीं। 23 जुलाई 1914 को कनाडा की नौसेना के दबाव में जहाज़ को लौटना पड़ा।

◆ बजबज गोलीकांड (29 सितंबर 1914) — इस बीच प्रथम विश्वयुद्ध छिड़ चुका था। जहाज़ कलकत्ता के पास बजबज पहुँचा तो सरकार ने यात्रियों को ज़बरदस्ती विशेष ट्रेन से सीधे पंजाब भेजना चाहा, क्योंकि उसे डर था कि ये लोग विद्रोह फैलाएँगे। यात्रियों ने इनकार किया तो पुलिस और सेना ने गोली चला दी, जिसमें लगभग 20 यात्री मारे गए (स्रोतों में संख्या 18 से 22 तक) और बहुत से जेल में डाले गए। गुरदित सिंह बच निकले और वर्षों भूमिगत रहे; 1921 में गांधीजी की सलाह पर उन्होंने आत्मसमर्पण किया।

◆ महत्त्व — इस घटना ने प्रवासी भारतीयों और पंजाब में ब्रिटिश-विरोधी क्रोध को भड़का दिया और ग़दर विद्रोह के लिए माहौल बनाया। लगभग सौ वर्ष बाद, 2016 में, कनाडा के प्रधानमंत्री ने अपनी संसद में इस घटना के लिए औपचारिक क्षमा माँगी।

6.6 ग़दर विद्रोह की योजना (फ़रवरी 1915) और दमन

◆ योजना — विश्वयुद्ध शुरू होते ही हज़ारों ग़दरी जहाज़ों से भारत लौटे। उनका विचार था कि ब्रिटिश सेना युद्ध में उलझी है, इसलिए यही विद्रोह का सबसे अच्छा समय है। पर बहुत से ग़दरी बंदरगाहों पर ही पकड़ लिए गए। जो बचे, वे पंजाब के गाँवों और छावनियों में भारतीय सैनिकों को विद्रोह के लिए तैयार करने लगे। जनवरी 1915 में रासबिहारी बोस ने इस योजना का नेतृत्व सँभाला।

◆ तिथि — 21 फ़रवरी 1915 को फ़िरोज़पुर, लाहौर, रावलपिंडी सहित उत्तर भारत की अनेक छावनियों में एक साथ विद्रोह होना था। पर दल में घुसे पुलिस के मुखबिर किरपाल सिंह ने यह सूचना सरकार को दे दी। तिथि बदलकर 19 फ़रवरी की गई, पर वह सूचना भी पहुँच गई। सरकार ने संदिग्ध भारतीय टुकड़ियों के हथियार पहले ही रखवा लिए और नेताओं को पकड़ लिया। इस प्रकार विद्रोह शुरू होने से पहले ही विफल हो गया।

◆ दमन — सरकार ने मार्च 1915 में भारत रक्षा अधिनियम बनाया, जिससे बिना सामान्य मुक़दमे के विशेष ट्रिब्यूनल सज़ा दे सकते थे। लाहौर षड्यंत्र केस की शृंखला में 42 लोगों को मृत्युदंड दिया गया (जिनमें से कई की सज़ा बाद में बदली गई), लगभग 114 को आजीवन काला पानी और बहुत से लोगों को लंबी क़ैद मिली। करतार सिंह सराभा और विष्णु गणेश पिंगले को 16 नवंबर 1915 को फाँसी दी गई। रासबिहारी बोस जापान चले गए।

🔍 आसान परिभाषा: भारत रक्षा अधिनियम (1915)

📘 परिभाषा: प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान मार्च 1915 में बना आपातकालीन क़ानून, जिसने सरकार को संदेह के आधार पर किसी को भी बिना मुक़दमे नज़रबंद करने, विशेष ट्रिब्यूनल से मुक़दमा चलाने और उनके फ़ैसले के विरुद्ध सामान्य अपील का अधिकार छीनने की शक्ति दी।

💡 आसान भाषा में: युद्ध के नाम पर सरकार ने ऐसा क़ानून बनाया जिसमें पुलिस "शक" के आधार पर पकड़ सकती थी और जल्दी-जल्दी सज़ा दी जा सकती थी। 🏠 उदाहरण: ग़दर क्रांतिकारियों पर लाहौर षड्यंत्र केस इसी क़ानून के विशेष ट्रिब्यूनल में चले। युद्ध के बाद इन्हीं शक्तियों को स्थायी बनाने के लिए 1919 का रॉलेट एक्ट लाया गया।

◆ सिंगापुर विद्रोह (15 फ़रवरी 1915) — ग़दर प्रचार से प्रभावित होकर सिंगापुर में तैनात पाँचवीं लाइट इन्फ़ैंट्री के पंजाबी मुसलमान सैनिकों ने विद्रोह कर दिया और कई अंग्रेज़ अधिकारियों व नागरिकों को मार डाला। विद्रोह कुछ ही दिनों में कुचल दिया गया और दमन में कई दर्जन सैनिकों को सार्वजनिक रूप से गोली मारी गई।

◆ ग़दर का मूल्यांकन — राजनीतिक और सैनिक रूप से ग़दर आंदोलन विफल रहा। इसकी कमियाँ थीं — संगठन, धन और तैयारी की कमी; लंबे समय तक टिकने वाले नेतृत्व का अभाव; और यह ग़लत अनुमान कि कुछ हज़ार आक्रोशित प्रवासियों के सहारे लाखों किसानों और सैनिकों को विद्रोह के लिए खड़ा किया जा सकता है। ब्रिटिश गुप्तचर तंत्र भी बहुत कुशल था। पर विचारधारा के क्षेत्र में यह सफल रहा — इसने पूरी तरह धर्मनिरपेक्ष, समतावादी और जुझारू राष्ट्रवाद का उदाहरण दिया, जो आगे भगत सिंह जैसे युवाओं का आदर्श बना।

6.7 बर्लिन कमेटी (1914–15)

◆ पृष्ठभूमि — विश्वयुद्ध में जर्मनी ब्रिटेन का शत्रु था और वह चाहता था कि भारत में विद्रोह भड़कने से ब्रिटेन कमज़ोर हो। यूरोप में रह रहे भारतीय क्रांतिकारियों ने इस अवसर का लाभ उठाया।

◆ संगठन — वीरेंद्रनाथ चट्टोपाध्याय, भूपेंद्रनाथ दत्त, लाला हरदयाल और चंपकरमन पिल्लै जैसे क्रांतिकारियों ने बर्लिन में "भारतीय स्वतंत्रता समिति" बनाई, जो "बर्लिन कमेटी" के नाम से प्रसिद्ध हुई। इसे जर्मन विदेश विभाग का सहयोग प्राप्त था, इसलिए इसकी योजना को जर्मन विदेश मंत्री के नाम पर "ज़िमरमैन योजना" भी कहा जाता है।

◆ गतिविधियाँ — इस समिति ने (1) अमेरिका से जहाज़ों द्वारा बंगाल के बाघा जतिन तक हथियार भेजने, (2) मध्य-पूर्व में युद्धबंदी भारतीय सैनिकों को ब्रिटेन के विरुद्ध भड़काने और (3) काबुल में एक भारतीय सरकार बनाने के लिए जर्मन-तुर्की दल भेजने की योजनाएँ बनाईं। ये सब योजनाएँ ब्रिटिश गुप्तचरों के कारण विफल रहीं।

6.8 काबुल की अस्थायी सरकार (1 दिसंबर 1915)

राजा महेंद्र प्रताप (1886–1979) अलीगढ़-हाथरस क्षेत्र की मुरसान रियासत के राजपरिवार से थे। उन्होंने 1909 में वृंदावन में प्रेम महाविद्यालय नाम का तकनीकी विद्यालय खोला और अपनी संपत्ति का बड़ा भाग शिक्षा के लिए दान कर दिया। विश्वयुद्ध के समय वे जर्मनी गए और बर्लिन कमेटी की योजना के अंतर्गत एक जर्मन-तुर्की दल के साथ अफ़ग़ानिस्तान पहुँचे।

◆ घोषणा — 1 दिसंबर 1915 को काबुल में "भारत की अस्थायी सरकार" की घोषणा हुई। इसमें राजा महेंद्र प्रताप राष्ट्रपति, मौलाना बरकतुल्ला प्रधानमंत्री और देवबंद के मौलाना उबैदुल्ला सिंधी गृह मंत्री बने। इसे भारत की पहली निर्वासित सरकार माना जाता है।

◆ उद्देश्य और परिणाम — इस सरकार को आशा थी कि अफ़ग़ान अमीर, जर्मनी और तुर्की की सहायता से सेना लेकर पश्चिमोत्तर सीमा से भारत पर चढ़ाई की जा सकेगी। पर अफ़ग़ान अमीर हबीबुल्ला ब्रिटेन से बैर नहीं लेना चाहते थे और तटस्थ रहे। इसलिए यह योजना आगे नहीं बढ़ सकी। महेंद्र प्रताप लगभग 32 वर्ष निर्वासन में रहे, 1946 में भारत लौटे और 1957 में मथुरा से निर्दलीय सांसद चुने गए।

◆ रेशमी रूमाल आंदोलन (1913–1920) — इसी से जुड़ी एक योजना देवबंद के मौलाना महमूद हसन और उबैदुल्ला सिंधी की थी, जो तुर्की और अफ़ग़ानिस्तान की सहायता से भारत में विद्रोह कराना चाहते थे। उबैदुल्ला ने काबुल से योजना के बारे में रेशम के कपड़े पर लिखे पत्र भेजे, जो 1916 में पकड़े गए — इसी से इसे "रेशमी रूमाल आंदोलन" कहा जाता है। महमूद हसन को मक्का में पकड़कर माल्टा में नज़रबंद किया गया।

◆ परिणाम — इन सब षड्यंत्रों की जाँच के लिए सरकार ने 1917 में न्यायाधीश सिडनी रॉलेट की अध्यक्षता में राजद्रोह समिति बनाई। इसकी 1918 की रिपोर्ट की सिफ़ारिश पर 1919 का रॉलेट एक्ट आया, जिसके विरोध से गांधीजी का पहला अखिल भारतीय सत्याग्रह शुरू हुआ (अध्याय 12)।

🔍 आसान परिभाषा: निर्वासित सरकार (अस्थायी सरकार)

📘 परिभाषा: किसी देश के स्वतंत्रता सेनानियों द्वारा देश के बाहर बनाई गई वह सरकार, जो स्वयं को उस देश की वास्तविक और वैध सरकार घोषित करती है, भले ही देश पर उसका नियंत्रण न हो।

💡 आसान भाषा में: यानी "हम ही असली सरकार हैं" — यह घोषणा दुनिया को संदेश देती है कि देश विदेशी शासन को स्वीकार नहीं करता। 🏠 उदाहरण: काबुल की अस्थायी सरकार (1915) पहली थी; बाद में 21 अक्टूबर 1943 को सुभाषचंद्र बोस ने सिंगापुर में "आज़ाद हिंद की अस्थायी सरकार" बनाई (अध्याय 13)।

📋 दोहराव तालिका: विदेश में क्रांतिकारी (1905–1915)

तिथि

घटना

मुख्य बात

18 फ़रवरी / 1 जुलाई 1905

इंडियन होमरूल सोसाइटी / इंडिया हाउस

श्यामजी कृष्ण वर्मा ने लंदन में बनाई; "इंडियन सोशियोलॉजिस्ट" पत्र निकाला।

22 अगस्त 1907

स्टुटगार्ट का झंडा

मैडम कामा ने अंतरराष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन में भारत का झंडा फहराया।

1 जुलाई 1909

कर्ज़न वायली वध

मदनलाल ढींगरा को 17 अगस्त 1909 को पेंटनविल जेल में फाँसी हुई।

8 जुलाई 1910

मार्सेई प्रसंग

सावरकर जहाज़ से कूदे पर पकड़े गए; हेग न्यायालय ने ब्रिटेन के पक्ष में फ़ैसला दिया।

1913

ग़दर पार्टी

सोहन सिंह भकना अध्यक्ष और हरदयाल महासचिव थे; "ग़दर" पत्र 1 नवंबर 1913 से निकला।

23 मई–29 सितंबर 1914

कोमागाटा मारू

376 यात्रियों को वैंकूवर से लौटाया गया; बजबज में गोलीबारी में लगभग 20 मारे गए।

15–21 फ़रवरी 1915

सिंगापुर विद्रोह / ग़दर विद्रोह योजना

मुखबिर किरपाल सिंह के कारण योजना विफल हुई; सराभा को 16 नवंबर 1915 को फाँसी हुई।

1 दिसंबर 1915

काबुल की अस्थायी सरकार

महेंद्र प्रताप राष्ट्रपति और बरकतुल्ला प्रधानमंत्री बने।

7. द्वितीय चरण: एच.आर.ए., काकोरी और एच.एस.आर.ए.

7.1 पृष्ठभूमि: दूसरी लहर क्यों उठी?

1915–1918 के कठोर दमन के बाद क्रांतिकारी गतिविधियाँ लगभग रुक गई थीं। युद्ध समाप्त होने पर 1920 की आम माफ़ी में बहुत से क्रांतिकारी जेलों से छूटे, और उनमें से अनेक (जैसे चंद्रशेखर आज़ाद) गांधीजी के असहयोग आंदोलन में शामिल हो गए। पर फ़रवरी 1922 में चौरी-चौरा के बाद आंदोलन के अचानक वापस लिए जाने से ये युवा गहरे निराश हुए। अब वे रूसी क्रांति, समाजवाद और मज़दूर-किसान की भाषा में सोचने लगे — इसलिए दूसरा चरण पहले चरण से वैचारिक रूप से अधिक परिपक्व और धर्मनिरपेक्ष था।

इस चरण की दो प्रमुख धाराएँ थीं — उत्तर भारत में एच.आर.ए. (जो बाद में एच.एस.आर.ए. बना) और बंगाल में युगांतर-अनुशीलन व इंडियन रिपब्लिकन आर्मी। नीचे का चार्ट उत्तर भारत की धारा की आठ प्रमुख घटनाएँ (1924–1931) दिखाता है। इनमें से पहली तीन (एच.आर.ए., काकोरी, एच.एस.आर.ए.) इसी खंड में और शेष पाँच (सांडर्स वध, असेंबली बम, जतिन दास, आज़ाद का बलिदान और 23 मार्च 1931) अगले खंड 8 में विस्तार से दी गई हैं।

चित्र 11.4: एच.आर.ए. से एच.एस.आर.ए. तक — प्रमुख घटनाएँ (1924–1931)
चित्र 11.4: एच.आर.ए. से एच.एस.आर.ए. तक — प्रमुख घटनाएँ (1924–1931)

7.2 हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (अक्टूबर 1924, कानपुर)

◆ स्थापना — अक्टूबर 1924 में उत्तर भारत के युवा क्रांतिकारियों का एक सम्मेलन कानपुर में हुआ, जिसमें हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (एच.आर.ए.) बनी। इसके प्रमुख संस्थापक शचींद्रनाथ सान्याल (अध्यक्ष), रामप्रसाद बिस्मिल और बंगाल के जोगेश चंद्र चटर्जी थे। बाद में चंद्रशेखर आज़ाद, अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ, राजेंद्र लाहिड़ी, ठाकुर रोशन सिंह आदि इससे जुड़े।

◆ लक्ष्य — संगठित सशस्त्र क्रांति से अंग्रेज़ी राज को हटाकर "संयुक्त राज्य भारत का संघीय गणराज्य" बनाना, जिसमें वयस्क मताधिकार हो और मनुष्य द्वारा मनुष्य का शोषण समाप्त हो। नाम में "रिपब्लिकन" (गणतंत्रवादी) शब्द इसलिए रखा गया कि वे राजा या किसी तानाशाह का नहीं, बल्कि जनता का राज चाहते थे।

◆ घोषणापत्र "क्रांतिकारी" — 1 जनवरी 1925 को एच.आर.ए. का घोषणापत्र "क्रांतिकारी" (द रिवोल्यूशनरी) उत्तर भारत के बड़े शहरों में एक साथ बाँटा गया। इसे मुख्यतः सान्याल ने लिखा था। इसमें गांधीजी के तरीक़ों से असहमति जताते हुए भी उनके व्यक्तित्व का सम्मान किया गया था।

◆ धन की समस्या — संगठन के पास हथियार ख़रीदने और कार्यकर्ताओं को पालने के लिए पैसा नहीं था। गाँवों में की गई कुछ डकैतियों में निर्दोष लोगों को कष्ट हुआ, जिससे बिस्मिल दुखी थे। इसलिए तय हुआ कि आगे केवल सरकारी ख़ज़ाना लूटा जाएगा — इसी सोच से काकोरी की योजना बनी।

7.3 काकोरी कांड (9 अगस्त 1925)

📖 कहानी 2: काकोरी की रात और बिस्मिल-अशफ़ाक़ की दोस्ती

एच.आर.ए. के पास हथियार ख़रीदने और कार्यकर्ताओं को पालने के लिए पैसा नहीं था। गाँवों में पड़ी कुछ डकैतियों से निर्दोषों को कष्ट हुआ, जिससे रामप्रसाद बिस्मिल दुखी थे। इसलिए तय हुआ कि अब केवल सरकारी ख़ज़ाना लूटा जाएगा। 9 अगस्त 1925 की शाम शाहजहाँपुर से लखनऊ जा रही 8-डाउन ट्रेन को काकोरी के बाद ज़ंजीर खींचकर रोका गया। बिस्मिल के नेतृत्व में लगभग दस क्रांतिकारियों ने गार्ड के डिब्बे से ख़ज़ाने की तिजोरी उतारकर तोड़ी। यात्रियों से कहा गया कि वे डरें नहीं, उनका कुछ नहीं छुआ जाएगा।

इसी बीच एक पिस्तौल से अनजाने में चली गोली से अहमद अली नाम के यात्री की मृत्यु हो गई। सरकार हिल गई, क्योंकि यह उसकी सत्ता को सीधी चुनौती थी। छापों में लगभग 40 लोग पकड़े गए। चंद्रशेखर आज़ाद कभी नहीं पकड़े गए, और अशफ़ाक़उल्ला 1926 में दिल्ली में एक परिचित के विश्वासघात से पकड़े गए।

जेल में पुलिस ने अशफ़ाक़ को यह कहकर सरकारी गवाह बनाना चाहा कि एक मुसलमान को हिंदुओं के लिए क्यों मरना चाहिए। उन्होंने दृढ़ता से मना कर दिया। मुक़दमे के बाद बिस्मिल, अशफ़ाक़उल्ला, ठाकुर रोशन सिंह और राजेंद्र लाहिड़ी को मृत्युदंड मिला। लाहिड़ी को 17 दिसंबर 1927 को और बाक़ी तीनों को 19 दिसंबर 1927 को फाँसी दी गई।

उस समय देश में सांप्रदायिक दंगे बढ़ रहे थे, पर बिस्मिल और अशफ़ाक़ की मित्रता हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक बन गई। इन बलिदानों से भगत सिंह जैसे युवाओं ने बिखरे संगठन को नए रूप में खड़ा करने का संकल्प लिया।

🧭 इस कहानी से कौन-सी अवधारणा साफ़ हुई

✔ राज्य की शक्ति को सीधी चुनौती — काकोरी में अकेले किसी अधिकारी को नहीं, बल्कि सरकारी ख़ज़ाने को निशाना बनाया गया, यानी संगठित रूप से शासन की ताक़त को ललकारा गया।

✔ हिंदू-मुस्लिम एकता — बिस्मिल और अशफ़ाक़ की दोस्ती बताती है कि क्रांतिकारी आंदोलन धर्म की दीवारों से ऊपर था, और अशफ़ाक़ का सरकारी गवाह बनने से इनकार इसकी कसौटी था।

✔ संगठन का नया रूप — काकोरी के बाद एच.आर.ए. बिखर गई थी, और उसी की राख से भगत सिंह और साथियों ने समाजवादी विचार जोड़कर एच.एस.आर.ए. खड़ी की (सितंबर 1928)।

📝 परीक्षा के लिए: काकोरी (9 अगस्त 1925, 8-डाउन ट्रेन, एच.आर.ए.): बिस्मिल के नेतृत्व में ख़ज़ाना लूट; बिस्मिल, अशफ़ाक़, रोशन सिंह, लाहिड़ी को मृत्युदंड; लाहिड़ी की फाँसी 17 दिसंबर 1927, बाक़ी की 19 दिसंबर 1927; आज़ाद कभी नहीं पकड़े गए।

◆ घटनाक्रम — 9 अगस्त 1925 की शाम शाहजहाँपुर से लखनऊ जा रही 8-डाउन पैसेंजर ट्रेन को लखनऊ के पास काकोरी स्टेशन के बाद ज़ंजीर खींचकर रोका गया। बिस्मिल के नेतृत्व में लगभग दस क्रांतिकारियों (जिनमें अशफ़ाक़उल्ला, राजेंद्र लाहिड़ी, चंद्रशेखर आज़ाद, शचींद्रनाथ बख़्शी, मन्मथनाथ गुप्त आदि थे) ने गार्ड के डिब्बे से सरकारी ख़ज़ाने की तिजोरी उतारकर तोड़ी और धन ले गए। यात्रियों से कहा गया कि वे डरें नहीं, उनका कुछ नहीं छुआ जाएगा।

◆ एक दुर्घटना — इस दौरान एक क्रांतिकारी की पिस्तौल से अनजाने में चली गोली से अहमद अली नाम के एक यात्री की मृत्यु हो गई। लूटी गई राशि के आँकड़े स्रोतों में अलग-अलग हैं (लगभग 4,600 से 8,000 रुपये)।

◆ गिरफ़्तारियाँ — इस घटना से सरकार हिल गई, क्योंकि यह सीधे सरकारी सत्ता को चुनौती थी। सितंबर 1925 से पूरे उत्तर भारत में छापे पड़े और लगभग 40 लोग पकड़े गए। अशफ़ाक़उल्ला लंबे समय तक फ़रार रहे, पर 1926 में दिल्ली में एक परिचित के विश्वासघात से पकड़े गए। चंद्रशेखर आज़ाद कभी पकड़े नहीं गए।

◆ मुक़दमा (काकोरी षड्यंत्र केस, 1926–27) — लखनऊ में लगभग डेढ़ वर्ष मुक़दमा चला। बचाव पक्ष में गोविंद बल्लभ पंत जैसे वकील थे और देशभर के नेताओं ने सज़ा कम करने की अपीलें कीं। फ़ैसले में रामप्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ, ठाकुर रोशन सिंह और राजेंद्र लाहिड़ी को मृत्युदंड मिला। शचींद्रनाथ सान्याल और शचींद्रनाथ बख़्शी को आजीवन काला पानी, केवल 17 वर्ष के मन्मथनाथ गुप्त को 14 वर्ष और बाक़ी कई को लंबी सज़ाएँ हुईं।

◆ फाँसी — राजेंद्र लाहिड़ी को 17 दिसंबर 1927 को गोंडा जेल में, और 19 दिसंबर 1927 को रामप्रसाद बिस्मिल को गोरखपुर, अशफ़ाक़उल्ला को फ़ैज़ाबाद और ठाकुर रोशन सिंह को नैनी (इलाहाबाद) जेल में फाँसी दी गई।

◆ महत्त्व — काकोरी ने दिखाया कि क्रांतिकारी अब संगठित रूप से राज्य की शक्ति को चुनौती दे सकते हैं। बिस्मिल और अशफ़ाक़ की गहरी मित्रता हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक बन गई — वह भी ऐसे समय जब देश में सांप्रदायिक दंगे बढ़ रहे थे। शहीदों के बलिदान से भगत सिंह जैसे युवाओं ने संगठन को नए रूप में खड़ा करने का संकल्प लिया। 2021 से इस घटना को आधिकारिक रूप से "काकोरी ट्रेन एक्शन" कहा जाता है।

7.4 काकोरी के शहीद — परिचय

◆ रामप्रसाद बिस्मिल (1897–1927) — 11 जून 1897 को शाहजहाँपुर में जन्मे बिस्मिल आर्य समाज से प्रभावित थे। वे "राम", "अज्ञात" और "बिस्मिल" उपनामों से कविताएँ लिखते थे। मैनपुरी षड्यंत्र (1918) के बाद वे वर्षों भूमिगत रहे और फिर एच.आर.ए. के मुख्य संगठनकर्ता बने। फाँसी से कुछ दिन पहले गोरखपुर जेल में उन्होंने अपनी आत्मकथा पूरी की। कहा जाता है कि फाँसी से पहले उन्होंने दूध लेने से यह कहकर मना कर दिया कि "अब मैं केवल माँ का दूध लूँगा"। "सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है" — ये पंक्तियाँ (जिनके रचनाकार बिस्मिल अज़ीमाबादी थे) बिस्मिल और उनके साथियों ने इतनी गाईं कि वे क्रांतिकारियों का तराना बन गईं।

◆ अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ (1900–1927) — 22 अक्टूबर 1900 को शाहजहाँपुर में एक पठान परिवार में जन्मे अशफ़ाक़ "हसरत" उपनाम से उर्दू शायरी करते थे। वे बिस्मिल के सबसे घनिष्ठ मित्र थे। जेल में पुलिस ने उन्हें यह कहकर सरकारी गवाह बनाने का प्रयास किया कि "एक मुसलमान को हिंदुओं के लिए क्यों मरना", पर उन्होंने दृढ़ता से मना कर दिया। 27 वर्ष की आयु में फ़ैज़ाबाद जेल में फाँसी पाने वाले अशफ़ाक़ को भारतीय स्वतंत्रता के लिए फाँसी पाने वाले पहले प्रमुख मुस्लिम क्रांतिकारी के रूप में याद किया जाता है।

◆ राजेंद्र नाथ लाहिड़ी (1901–1927) — बंगाल के पबना ज़िले में जन्मे लाहिड़ी बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के छात्र थे और अनुशीलन समिति से होकर एच.आर.ए. में आए। काकोरी में ज़ंजीर खींचकर ट्रेन रोकने का काम उन्हीं का माना जाता है। उन्हें अन्य साथियों से दो दिन पहले, 17 दिसंबर 1927 को गोंडा जेल में फाँसी दी गई।

◆ ठाकुर रोशन सिंह (1892–1927) — शाहजहाँपुर ज़िले के एक किसान परिवार से आए रोशन सिंह असहयोग आंदोलन में जेल जा चुके थे और अच्छे निशानेबाज़ थे। कई इतिहासकारों के अनुसार वे काकोरी की घटना में स्वयं उपस्थित नहीं थे, फिर भी एक अन्य डकैती में भागीदारी के आधार पर उन्हें मृत्युदंड दिया गया। वे 19 दिसंबर 1927 को नैनी जेल में "वंदे मातरम्" कहते हुए फाँसी पर चढ़े।

7.5 नौजवान भारत सभा (मार्च 1926, लाहौर)

◆ स्थापना — मार्च 1926 में लाहौर में भगत सिंह, भगवतीचरण वोहरा, सुखदेव और उनके साथियों ने "नौजवान भारत सभा" बनाई। यह क्रांतिकारियों का खुला जन-संगठन था, जबकि एच.आर.ए. गुप्त संगठन था।

◆ कार्य — सभा युवाओं, किसानों और मज़दूरों में जाकर राष्ट्रवाद और समाजवाद का प्रचार करती थी। इसके सदस्यों के लिए शर्त थी कि वे सांप्रदायिक संगठनों से कोई संबंध नहीं रखेंगे। सभा ने छुआछूत का विरोध किया, सहभोज आयोजित किए और शहीदों की स्मृति में सभाएँ कीं। इस प्रकार क्रांतिकारी विचार पहली बार खुले में जनता तक पहुँचे।

7.6 हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (8–9 सितंबर 1928)

◆ स्थापना — काकोरी केस के बाद एच.आर.ए. लगभग बिखर गई थी। उसे फिर से खड़ा करने के लिए 8–9 सितंबर 1928 को दिल्ली के फ़िरोज़शाह कोटला मैदान के खंडहरों में उत्तर भारत के क्रांतिकारियों की गुप्त बैठक हुई। इसमें भगत सिंह, सुखदेव, भगवतीचरण वोहरा, विजय कुमार सिन्हा, शिव वर्मा और जयदेव कपूर आदि शामिल थे। चंद्रशेखर आज़ाद को संगठन का सेनापति (प्रधान सैनिक कमांडर) बनाया गया।

◆ "सोशलिस्ट" शब्द क्यों? — भगत सिंह के आग्रह पर संगठन के नाम में "सोशलिस्ट" (समाजवादी) शब्द जोड़ा गया और यह हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (एच.एस.आर.ए.) बन गया। इसका अर्थ था कि लक्ष्य केवल अंग्रेज़ों को हटाना नहीं, बल्कि ऐसा समाजवादी गणराज्य बनाना है जहाँ किसान-मज़दूर का शोषण न हो और उत्पादन के साधनों पर समाज का अधिकार हो। संगठन ने यह भी तय किया कि व्यक्तिगत हत्याएँ केवल विशेष परिस्थितियों में होंगी और मुख्य ज़ोर जन-जागरण पर रहेगा।

◆ प्रमुख कार्य — एच.एस.आर.ए. के मुख्य कार्य थे — सांडर्स वध (17 दिसंबर 1928), केंद्रीय असेंबली बम (8 अप्रैल 1929) और वायसराय इरविन की ट्रेन के नीचे बम विस्फोट का प्रयास (23 दिसंबर 1929, दिल्ली के पास), जिसमें यशपाल की भूमिका थी। पहले दो का विस्तार खंड 8 में है।

◆ "बम की पूजा" बनाम "बम का दर्शन" — इरविन की ट्रेन पर हमले के प्रयास की निंदा करते हुए गांधीजी ने "यंग इंडिया" में लेख "बम की पूजा" (जनवरी 1930) लिखा। इसके उत्तर में एच.एस.आर.ए. की ओर से भगवतीचरण वोहरा ने "बम का दर्शन" लिखा, जिसमें समझाया गया कि क्रांतिकारी हिंसा से प्रेम नहीं करते, बल्कि अत्याचारी व्यवस्था के विरुद्ध इसे अंतिम उपाय मानते हैं। यह बहस दोनों धाराओं के विचारों को समझने के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है।

◆ भगवतीचरण वोहरा और दुर्गा भाभी — लाहौर के भगवतीचरण एच.एस.आर.ए. के प्रमुख विचारक थे। 28 मई 1930 को रावी नदी के किनारे एक बम का परीक्षण करते समय विस्फोट में उनकी मृत्यु हो गई। उनकी पत्नी दुर्गावती देवी, जिन्हें सब "दुर्गा भाभी" कहते थे, स्वयं भी क्रांतिकारी थीं — सांडर्स वध के बाद उन्होंने भगत सिंह की पत्नी बनकर, गोद में अपने बच्चे को लिए, उन्हें ट्रेन से लाहौर से सुरक्षित निकाला; राजगुरु नौकर बने थे।

📋 दोहराव तालिका: एच.आर.ए. बनाम एच.एस.आर.ए.

पहलू

एच.आर.ए. (1924)

एच.एस.आर.ए. (1928)

स्थापना

अक्टूबर 1924 में कानपुर के सम्मेलन में बनी।

8–9 सितंबर 1928 को दिल्ली के फ़िरोज़शाह कोटला में पुनर्गठित हुई।

प्रमुख नेता

शचींद्रनाथ सान्याल, रामप्रसाद बिस्मिल और जोगेश चंद्र चटर्जी इसके संस्थापक थे।

भगत सिंह, सुखदेव, भगवतीचरण वोहरा इसके विचारक थे और आज़ाद सेनापति थे।

लक्ष्य

सशस्त्र क्रांति से संयुक्त राज्य भारत का संघीय गणराज्य बनाना था।

समाजवादी गणराज्य बनाकर शोषण का अंत करना था।

प्रमुख घटना

काकोरी कांड (1925) इसकी सबसे बड़ी कार्रवाई थी।

सांडर्स वध (1928) और असेंबली बम (1929) इसकी मुख्य कार्रवाइयाँ थीं।

अंत

काकोरी केस (1927) में चार नेताओं को फाँसी से संगठन बिखर गया।

आज़ाद (फ़रवरी 1931) और भगत सिंह (मार्च 1931) के बलिदान के बाद संगठन कमज़ोर पड़ गया।

8. भगत सिंह और चंद्रशेखर आज़ाद

एच.एस.आर.ए. के केवल ढाई वर्ष (सितंबर 1928 से मार्च 1931) भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन के सबसे चर्चित वर्ष हैं। इस छोटे-से समय में चार बड़ी घटनाएँ हुईं — सांडर्स वध, केंद्रीय असेंबली में बम, जेल की भूख हड़ताल और लाहौर षड्यंत्र केस — और इन्हीं के बीच संगठन के दो सबसे बड़े नाम, चंद्रशेखर आज़ाद और भगत सिंह, एक ही महीने के अंतर पर शहीद हुए। इस खंड में पहले भगत सिंह का परिचय है, फिर चारों घटनाएँ क्रम से, उसके बाद उनके विचार और साथी, और अंत में आज़ाद का जीवन।

8.1 शहीद-ए-आज़म भगत सिंह (1907–1931) — परिचय

◆ जन्म और परिवार — भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर 1907 को पंजाब के लायलपुर ज़िले (अब पाकिस्तान) के बंगा गाँव में हुआ। उनके पिता किशन सिंह और चाचा अजीत सिंह दोनों देशभक्त थे; अजीत सिंह 1907 के "पगड़ी सँभाल जट्टा" किसान आंदोलन के नेता थे (खंड 4.1)। इस प्रकार देशभक्ति उन्हें घर से ही मिली।

◆ बचपन की छाप — 13 अप्रैल 1919 को जलियाँवाला बाग़ हत्याकांड हुआ, तब भगत सिंह केवल बारह वर्ष के थे। कहा जाता है कि वे अमृतसर जाकर बाग़ की ख़ून से सनी मिट्टी एक शीशी में भरकर घर लाए। 1921 में वे असहयोग आंदोलन से जुड़े, पर चौरी-चौरा के बाद आंदोलन वापस लिए जाने से उनका मन अहिंसक मार्ग से हटने लगा।

◆ शिक्षा — उन्होंने लाहौर के नेशनल कॉलेज में पढ़ाई की, जिसे लाला लाजपत राय ने असहयोग के दिनों में सरकारी कॉलेज छोड़ने वाले छात्रों के लिए स्थापित किया था। यहीं उनकी मित्रता सुखदेव और भगवतीचरण वोहरा से हुई और यहीं उन्होंने यूरोप के क्रांतिकारी आंदोलनों का इतिहास पढ़ा। वे बहुत अधिक पढ़ने वाले युवक थे — जेल में भी उन्होंने सैकड़ों पुस्तकें पढ़ीं और उनसे टिप्पणियाँ उतारीं।

◆ कानपुर और पत्रकारिता — परिवार ने विवाह का दबाव डाला तो वे घर छोड़कर कानपुर चले गए, जहाँ उन्होंने गणेश शंकर विद्यार्थी के पत्र "प्रताप" में काम किया और एच.आर.ए. के क्रांतिकारियों से जुड़े। बाद में उन्होंने "कीर्ति" और "अकाली" जैसे पत्रों में भी लेख लिखे। इस प्रकार वे केवल पिस्तौल चलाने वाले नहीं, बल्कि क़लम के भी सिपाही थे।

◆ संगठन — उन्होंने मार्च 1926 में लाहौर में नौजवान भारत सभा बनाई (खंड 7.5) और सितंबर 1928 में एच.आर.ए. को एच.एस.आर.ए. में बदलवाया (खंड 7.6)। सभा खुला मंच थी और एच.एस.आर.ए. गुप्त संगठन — भगत सिंह दोनों को जोड़ने वाली कड़ी थे।

◆ बलिदान — 23 मार्च 1931 को केवल 23 वर्ष की आयु में उन्हें लाहौर सेंट्रल जेल में फाँसी दी गई। जनता ने उन्हें "शहीद-ए-आज़म" (शहीदों में सबसे महान) कहा।

8.2 सांडर्स वध (17 दिसंबर 1928, लाहौर)

◆ पृष्ठभूमि — 1928 में ब्रिटिश सरकार ने भारत के भावी संविधान पर विचार के लिए साइमन कमीशन भेजा, जिसमें एक भी भारतीय सदस्य नहीं था। पूरे देश में "साइमन वापस जाओ" के नारों के साथ इसका बहिष्कार हुआ। 30 अक्टूबर 1928 को कमीशन लाहौर पहुँचा, तो लाला लाजपत राय के नेतृत्व में शांतिपूर्ण जुलूस निकला। पुलिस अधीक्षक जेम्स स्कॉट के आदेश पर जुलूस पर लाठीचार्ज हुआ और लालाजी की छाती पर लाठियाँ पड़ीं।

◆ लालाजी की मृत्यु — घायल लाजपत राय ने उसी शाम सभा में कहा — "मेरे शरीर पर पड़ी एक-एक लाठी ब्रिटिश साम्राज्य के ताबूत की कील सिद्ध होगी।" 17 नवंबर 1928 को उनकी मृत्यु हो गई। देश के इतने बड़े नेता की इस तरह मृत्यु को युवाओं ने राष्ट्र का अपमान माना।

◆ योजना — एच.एस.आर.ए. ने तय किया कि इस अपमान का बदला स्कॉट को मारकर लिया जाएगा। योजना में भगत सिंह, राजगुरु, चंद्रशेखर आज़ाद और जयगोपाल शामिल थे। जयगोपाल का काम स्कॉट को पहचानकर संकेत देना था।

◆ घटनाक्रम — 17 दिसंबर 1928 को लाहौर के पुलिस कार्यालय से जो अधिकारी बाहर निकला, वह स्कॉट नहीं बल्कि सहायक पुलिस अधीक्षक जॉन सांडर्स था; पहचानने में भूल हो गई। राजगुरु ने पहली गोली चलाई और फिर भगत सिंह ने कई गोलियाँ चलाईं। पीछा करने वाले हेड कांस्टेबल चन्नन सिंह को आज़ाद ने गोली मारकर रोका।

◆ पर्चे और निकल भागना — अगले दिन लाहौर की दीवारों पर एच.एस.आर.ए. के पर्चे लगे, जिनमें लिखा था कि लालाजी की मृत्यु का बदला ले लिया गया है, और यह भी कि "हमें एक मनुष्य की हत्या का खेद है, पर यह व्यक्ति उस क्रूर व्यवस्था का अंग था जिसे समाप्त करना आवश्यक है।" भगत सिंह ने पहचान छिपाने के लिए केश और दाढ़ी कटवाई, टोप पहना और दुर्गा भाभी के साथ एक साहब का रूप बनाकर ट्रेन से लाहौर से निकल गए (खंड 7.6)।

◆ महत्त्व — यह कार्रवाई जनता की भावना से जुड़ी थी, इसलिए क्रांतिकारी रातोंरात लोकप्रिय हो गए। पर भगत सिंह स्वयं मानते थे कि किसी एक अधिकारी को मारने से व्यवस्था नहीं बदलती। इसी सोच से अगला क़दम — जनता तक विचार पहुँचाना — तय हुआ।

8.3 केंद्रीय असेंबली बम कांड (8 अप्रैल 1929, दिल्ली)

◆ पृष्ठभूमि — 1928–29 में देश में मज़दूर हड़तालें और साम्यवादी विचार तेज़ी से बढ़ रहे थे। इन्हें दबाने के लिए सरकार केंद्रीय विधानसभा में दो विधेयक लाई। पब्लिक सेफ़्टी बिल सरकार को यह अधिकार देता था कि वह विदेश से आए साम्यवादी कार्यकर्ताओं को बिना मुक़दमे देश से निकाल दे, और ट्रेड डिस्प्यूट्स बिल मज़दूरों के हड़ताल करने के अधिकार को सीमित करता था। विधानसभा के अधिकांश भारतीय सदस्य इनके विरोध में थे, फिर भी सरकार वायसराय के विशेष अधिकार से इन्हें लागू करने पर अड़ी थी।

◆ उद्देश्य — एच.एस.आर.ए. ने तय किया कि इसी मौक़े पर विधानसभा में ऐसा धमाका किया जाए जिससे किसी की जान न जाए, पर पूरे देश का ध्यान खिंचे। योजना का सबसे ज़रूरी भाग यह था कि बम फेंकने वाले भागेंगे नहीं, स्वयं गिरफ़्तार होंगे और अदालत को मंच बनाकर अपने विचार देश के सामने रखेंगे। पहले भगत सिंह को भेजने पर साथी सहमत नहीं थे, क्योंकि सांडर्स केस में उनके पकड़े जाने का अर्थ फाँसी था; पर सुखदेव के आग्रह पर यही तय हुआ कि संगठन के विचार भगत सिंह से बेहतर कोई नहीं रख सकता।

◆ घटनाक्रम — 8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने दर्शक दीर्घा से सदन के ख़ाली हिस्से में दो कम शक्ति वाले बम फेंके। कुछ सदस्यों को मामूली चोटें आईं, पर किसी की मृत्यु नहीं हुई। दोनों ने "इंकलाब ज़िंदाबाद" और "साम्राज्यवाद का नाश हो" के नारे लगाए, लाल पर्चे फेंके और शांति से गिरफ़्तारी दे दी।

◆ पर्चे का संदेश — पर्चे की पहली पंक्ति थी — "बहरों को सुनाने के लिए ऊँची आवाज़ की ज़रूरत होती है।" यह वाक्य फ़्रांस के क्रांतिकारी वैलाँ के कथन से लिया गया था। पर्चे में यह भी लिखा था कि व्यक्तियों को मारना सरल है, पर विचारों को नहीं मारा जा सकता।

◆ मुक़दमा और सज़ा — दिल्ली की अदालत में दोनों ने अपना लिखित बयान पढ़ा, जिसमें उन्होंने समझाया कि क्रांति से उनका अर्थ क्या है। 12 जून 1929 को दोनों को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई। इसी बीच पुलिस को सांडर्स वध में भगत सिंह की भूमिका के प्रमाण मिल गए, इसलिए उन पर लाहौर में दूसरा मुक़दमा चला।

◆ महत्त्व — अख़बारों ने अदालती बयान पूरे छापे। जिन विचारों को गुप्त पर्चों से हज़ारों लोगों तक पहुँचाना कठिन था, वे अब करोड़ों लोगों तक पहुँच गए। "इंकलाब ज़िंदाबाद" पूरे देश का नारा बन गया। यह नारा मौलाना हसरत मोहानी ने गढ़ा था, पर इसे घर-घर पहुँचाने का काम भगत सिंह और उनके साथियों ने किया।

❝ व्यक्तियों को कुचलकर वे विचारों को नहीं मार सकते। ❞ (भगत सिंह (असेंबली बम कांड के पर्चे, 1929))

◆ बटुकेश्वर दत्त (1910–1965) — बंगाल के बर्दवान ज़िले में जन्मे दत्त की पढ़ाई कानपुर में हुई, जहाँ वे एच.आर.ए. से जुड़े और भगत सिंह के मित्र बने। असेंबली केस में आजीवन कारावास पाकर वे अंडमान की सेल्युलर जेल भेजे गए, जहाँ उन्होंने भी भूख हड़तालें कीं। 1965 में दिल्ली में उनका निधन हुआ और उनकी इच्छा के अनुसार उनका अंतिम संस्कार हुसैनीवाला में उसी स्थान पर किया गया जहाँ उनके साथियों का हुआ था।

8.4 जेल में भूख हड़ताल और जतिन दास का बलिदान (1929)

◆ पृष्ठभूमि — जेलों में यूरोपीय क़ैदियों को अच्छा भोजन, साफ़ कपड़े, पुस्तकें और अख़बार मिलते थे, जबकि भारतीय क्रांतिकारियों के साथ साधारण अपराधियों जैसा व्यवहार होता था। उन्हें ख़राब भोजन मिलता था, कठोर श्रम कराया जाता था और पढ़ने-लिखने की कोई सुविधा नहीं थी।

◆ माँगें — क्रांतिकारियों की माँग थी कि उन्हें "राजनीतिक बंदी" माना जाए। इसका अर्थ था — खाने योग्य भोजन, पुस्तकें और अख़बार, लिखने की सामग्री, साफ़ कपड़े और अपमानजनक श्रम से छूट। यह लड़ाई अपने आराम के लिए नहीं, बल्कि इस सिद्धांत के लिए थी कि देश के लिए जेल जाने वाला व्यक्ति अपराधी नहीं है।

🔍 आसान परिभाषा: राजनीतिक बंदी

📘 परिभाषा: ऐसा क़ैदी जिसे चोरी या हत्या जैसे निजी अपराध के लिए नहीं, बल्कि राजनीतिक विचारों या शासन-विरोधी कार्य के कारण जेल में रखा गया हो, और जिसे इसी आधार पर जेल में साधारण अपराधियों से अलग दर्जा और सुविधाएँ मिलनी चाहिए।

💡 आसान भाषा में: चोर अपने लाभ के लिए क़ानून तोड़ता है, जबकि स्वतंत्रता सेनानी देश के लिए। इसलिए दोनों के साथ जेल में एक जैसा व्यवहार करना अन्याय है — यही क्रांतिकारियों का तर्क था। 🏠 उदाहरण: भगत सिंह और उनके साथियों ने 1929 में इसी दर्जे की माँग पर भूख हड़ताल की; बाद में अंडमान के बंदियों ने भी 1933 और 1937 में इसी प्रश्न पर लंबी भूख हड़तालें कीं।

◆ घटनाक्रम — जून 1929 के मध्य में भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने भूख हड़ताल शुरू की। लाहौर षड्यंत्र केस के अन्य अभियुक्त भी इसमें जुड़ गए, जिनमें बंगाल के जतींद्रनाथ दास (जतिन दास) थे। जेल अधिकारियों ने नली डालकर ज़बरदस्ती दूध पिलाने की कोशिश की, जिसका क्रांतिकारियों ने पूरी शक्ति से विरोध किया। इसी खींचतान में जतिन दास के फेफड़ों को भारी हानि पहुँची।

◆ जतिन दास (1904–1929) — कलकत्ता में जन्मे जतिन दास अनुशीलन समिति से जुड़े थे और असहयोग आंदोलन में जेल जा चुके थे। वे बम बनाने में दक्ष थे और इसी काम के लिए भगत सिंह ने उन्हें उत्तर भारत बुलाया था। 63 दिन के अनशन के बाद 13 सितंबर 1929 को लाहौर जेल में उनका निधन हो गया। उनका शव ट्रेन से लाहौर से कलकत्ता ले जाया गया; हर बड़े स्टेशन पर हज़ारों लोग श्रद्धांजलि देने आए और कलकत्ता में लाखों लोगों का जुलूस निकला। (कुछ विवरणों में अनशन की अवधि 64 दिन भी लिखी मिलती है; अधिकतर स्रोत 63 दिन मानते हैं।)

◆ देश की प्रतिक्रिया — केंद्रीय विधानसभा में मोतीलाल नेहरू और मुहम्मद अली जिन्ना जैसे नेताओं ने सरकार की कड़ी आलोचना की। जवाहरलाल नेहरू जेल में अनशनकारियों से मिलने गए। भगत सिंह ने अपना अनशन जतिन दास की मृत्यु के बाद भी जारी रखा और कुल लगभग 116 दिन बाद अक्टूबर 1929 में तोड़ा।

◆ महत्त्व — इस अनशन ने क्रांतिकारियों के प्रति देश की सहानुभूति को चरम पर पहुँचा दिया। जो लोग हिंसा के मार्ग से सहमत नहीं थे, वे भी इन युवाओं के आत्म-बलिदान के आगे नतमस्तक हुए। यह भी ध्यान देने की बात है कि जेल के भीतर क्रांतिकारियों ने अनशन जैसा अहिंसक हथियार ही अपनाया।

8.5 लाहौर षड्यंत्र केस (1929–1930)

◆ मुक़दमा — सांडर्स वध, बम बनाने के कारख़ानों और एच.एस.आर.ए. की अन्य गतिविधियों को जोड़कर जुलाई 1929 में लाहौर में मुक़दमा शुरू हुआ, जो "दूसरा लाहौर षड्यंत्र केस" कहलाता है (पहला 1915 का ग़दर वाला केस था)। संगठन के ही कुछ सदस्य — जैसे जयगोपाल और हंसराज वोहरा — सरकारी गवाह बन गए, जिससे सरकार का पक्ष मज़बूत हुआ।

◆ अदालत बना मंच — अभियुक्त अदालत में "इंकलाब ज़िंदाबाद" के नारे लगाते और देशभक्ति के गीत गाते हुए आते थे। वे काकोरी दिवस और लेनिन दिवस जैसे अवसरों पर अदालत में ही संदेश पढ़ते थे। पुलिस ने अदालत के भीतर उन्हें पीटा, तो उन्होंने कार्यवाही में भाग लेना बंद कर दिया। अख़बारों में रोज़ छपने वाली ये ख़बरें युवाओं को आंदोलन की ओर खींचती रहीं।

◆ विशेष ट्रिब्यूनल — मुक़दमा लंबा खिंचता देखकर वायसराय इरविन ने 1 मई 1930 को एक अध्यादेश जारी किया और तीन न्यायाधीशों का विशेष ट्रिब्यूनल बना दिया। इसे यह अधिकार था कि वह अभियुक्तों की अनुपस्थिति में भी सुनवाई कर सके, और इसके फ़ैसले के विरुद्ध भारत की किसी ऊँची अदालत में सामान्य अपील नहीं हो सकती थी।

🔍 आसान परिभाषा: अध्यादेश और विशेष ट्रिब्यूनल

📘 परिभाषा: अध्यादेश वह अस्थायी क़ानून है जिसे शासन का प्रमुख (उस समय वायसराय) विधानमंडल से पारित कराए बिना, अपने विशेष अधिकार से लागू कर देता है। विशेष ट्रिब्यूनल किसी ख़ास मुक़दमे के लिए बनाई गई अलग अदालत है, जिसमें सामान्य अदालतों की कई प्रक्रियाएँ (जैसे लंबी गवाही, जूरी और अपील) हटा दी जाती हैं।

💡 आसान भाषा में: जब सरकार को लगा कि सामान्य अदालत में मुक़दमा बहुत लंबा चलेगा और क्रांतिकारी रोज़ अख़बारों में छाए रहेंगे, तो उसने नियम ही बदल दिए — अपनी पसंद की अदालत और अपनी पसंद की प्रक्रिया बना ली। 🏠 उदाहरण: लाहौर षड्यंत्र केस अध्यादेश (1 मई 1930) से बना ट्रिब्यूनल, जिसने केवल पाँच महीनों में फ़ैसला सुना दिया। देश के अनेक विधिवेत्ताओं ने इसे न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध बताया।

◆ फ़ैसला (7 अक्टूबर 1930) — ट्रिब्यूनल ने भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को मृत्युदंड दिया। शिव वर्मा, विजय कुमार सिन्हा, जयदेव कपूर, किशोरी लाल, गया प्रसाद, महावीर सिंह और कमलनाथ तिवारी को आजीवन काला पानी मिला, और कुछ अन्य को कम अवधि की सज़ाएँ हुईं। लंदन की प्रिवी काउंसिल में की गई अपील फ़रवरी 1931 में अस्वीकार हो गई।

◆ गांधीजी और फाँसी का प्रश्न — 5 मार्च 1931 को गांधी-इरविन समझौता हुआ। बातचीत के दौरान गांधीजी ने वायसराय से फाँसी की सज़ा कम करने या टालने का आग्रह किया, पर इसे समझौते की शर्त नहीं बनाया। इस कारण युवाओं ने उनकी आलोचना की और मार्च 1931 के अंत में कराची अधिवेशन में जाते समय उन्हें काले झंडे दिखाए गए। कराची में कांग्रेस ने हिंसा से अपने को अलग रखते हुए भी तीनों शहीदों के साहस और बलिदान की प्रशंसा का प्रस्ताव पारित किया (विस्तार अध्याय 12 में)।

◆ "हमें गोली से उड़ाया जाए" — फाँसी से कुछ दिन पहले तीनों ने पंजाब के गवर्नर को पत्र लिखा कि अदालत ने उन्हें "सम्राट के विरुद्ध युद्ध छेड़ने" का दोषी माना है, इसलिए वे युद्धबंदी हैं और उन्हें फाँसी पर लटकाने के बजाय गोली से उड़ाया जाए। भगत सिंह ने दया-याचिका देने से मना कर दिया और पिता द्वारा भेजी गई याचिका पर भी नाराज़गी जताई।

◆ 23 मार्च 1931 — फाँसी के लिए 24 मार्च की सुबह तय थी, पर जन-आक्रोश के डर से तीनों को एक दिन पहले, 23 मार्च 1931 की शाम लगभग साढ़े सात बजे लाहौर सेंट्रल जेल में फाँसी दे दी गई। कहा जाता है कि बुलावा आने तक भगत सिंह लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे। तीनों "इंकलाब ज़िंदाबाद" के नारे लगाते हुए फाँसी के तख़्ते तक गए। जेल अधिकारियों ने शव परिवारों को नहीं सौंपे; उन्हें जेल की पिछली दीवार तोड़कर चुपचाप निकाला गया और फ़िरोज़पुर के पास हुसैनीवाला में सतलज के किनारे जला दिया गया। आज वहाँ राष्ट्रीय शहीद स्मारक है और 23 मार्च को शहीद दिवस मनाया जाता है।

◆ परिणाम — फाँसी की ख़बर से पूरे देश में हड़तालें और शोक-सभाएँ हुईं। उस समय भगत सिंह की लोकप्रियता गांधीजी के बराबर मानी जाने लगी थी। पर संगठन के लगभग सभी बड़े नेता या तो शहीद हो चुके थे या जेल में थे, इसलिए एच.एस.आर.ए. की गतिविधियाँ इसके बाद धीरे-धीरे थम गईं।

8.6 सुखदेव और राजगुरु

◆ सुखदेव थापर (1907–1931) — सुखदेव का जन्म 15 मई 1907 को लुधियाना (पंजाब) में हुआ। वे लाहौर के नेशनल कॉलेज में भगत सिंह के सहपाठी और सबसे घनिष्ठ मित्र थे। वे नौजवान भारत सभा के संस्थापकों में थे और एच.एस.आर.ए. की पंजाब इकाई के संगठनकर्ता थे — नए युवाओं को जोड़ना, ठिकाने और धन की व्यवस्था करना उन्हीं का काम था। लाहौर षड्यंत्र केस का सरकारी नाम ही "सम्राट बनाम सुखदेव और अन्य" था। फाँसी से कुछ दिन पहले उन्होंने गांधीजी को एक खुला पत्र लिखकर क्रांतिकारियों का पक्ष रखा।

◆ शिवराम हरि राजगुरु (1908–1931) — राजगुरु का जन्म 24 अगस्त 1908 को महाराष्ट्र के पुणे ज़िले के खेड़ गाँव में हुआ, जिसका नाम अब उनके सम्मान में राजगुरुनगर है। वे संस्कृत पढ़ने बनारस गए और वहीं क्रांतिकारियों के संपर्क में आए। वे संगठन के सबसे अच्छे निशानेबाज़ों में गिने जाते थे और सांडर्स पर पहली गोली उन्होंने ही चलाई थी। वे 1929 में पुणे में गिरफ़्तार हुए।

8.7 भगत सिंह के विचार — क्रांति का अर्थ

भगत सिंह को केवल "बम फेंकने वाला युवक" समझना उनके साथ अन्याय है। वे अपने समय के सबसे पढ़े-लिखे और गहरी सोच वाले युवा नेताओं में थे। उनके विचारों के छह पक्ष विशेष रूप से याद रखने योग्य हैं।

1. क्रांति का अर्थ — अदालत में उन्होंने कहा कि क्रांति का अर्थ ख़ून-ख़राबा नहीं है और इसमें व्यक्तिगत बदले के लिए कोई स्थान नहीं है। क्रांति का अर्थ है — "अन्याय पर आधारित वर्तमान व्यवस्था में आमूल परिवर्तन"। उन्होंने यह भी कहा कि बम और पिस्तौल क्रांति नहीं लाते, क्रांति की तलवार विचारों की सान पर तेज़ होती है।

2. समाजवाद — उनके अनुसार स्वतंत्रता का अर्थ केवल गोरे शासकों की जगह भारतीय शासकों का आ जाना नहीं था। जब तक किसान और मज़दूर का शोषण चलता रहेगा, तब तक आम आदमी के लिए कुछ नहीं बदलेगा। इसलिए वे ऐसी व्यवस्था चाहते थे जिसमें "मनुष्य द्वारा मनुष्य का शोषण" समाप्त हो।

3. जन-आंदोलन पर भरोसा — जीवन के अंतिम वर्षों में वे व्यक्तिगत हिंसक कार्रवाइयों की सीमा समझ चुके थे। 2 फ़रवरी 1931 को जेल से लिखे संदेश "युवा राजनीतिक कार्यकर्ताओं के नाम" में उन्होंने साफ़ कहा कि वे आतंकवादी नहीं हैं और असली काम किसानों और मज़दूरों को संगठित करना है। उन्होंने युवाओं से गाँवों और कारख़ानों में जाने को कहा।

4. धर्मनिरपेक्षता — वे सांप्रदायिकता को साम्राज्यवाद जितना ही बड़ा शत्रु मानते थे। नौजवान भारत सभा के नियमों में सांप्रदायिक संगठनों से संबंध रखने पर रोक थी। जब उनके आदरणीय नेता लाला लाजपत राय सांप्रदायिक राजनीति की ओर झुके, तो भगत सिंह ने उनकी भी खुली आलोचना की।

5. तर्क और स्वतंत्र चिंतन — 1930 में जेल में लिखे निबंध "मैं नास्तिक क्यों हूँ" में उन्होंने बताया कि उनका ईश्वर को न मानना घमंड नहीं, बल्कि तर्क से निकला निष्कर्ष है। उन्होंने लिखा कि आलोचना और स्वतंत्र चिंतन क्रांतिकारी के दो अनिवार्य गुण हैं — अर्थात् किसी भी बात को केवल इसलिए मत मानो कि वह पुरानी है या किसी बड़े ने कही है।

6. सामाजिक समानता — उन्होंने छुआछूत के विरुद्ध लेख लिखे और कहा कि जो समाज अपने ही लोगों को अछूत मानता है, उसे अंग्रेज़ों से बराबरी माँगने का नैतिक अधिकार नहीं है।

📌 याद रखें — भगत सिंह से जुड़े चार तथ्य जिनमें भूल होती है

"इंकलाब ज़िंदाबाद" नारा मौलाना हसरत मोहानी ने दिया था; भगत सिंह ने इसे लोकप्रिय बनाया।

असेंबली बम केस में भगत सिंह को आजीवन कारावास मिला था; फाँसी सांडर्स वध वाले लाहौर षड्यंत्र केस में हुई।

असेंबली में भगत सिंह के साथ बटुकेश्वर दत्त थे, जबकि फाँसी में उनके साथ सुखदेव और राजगुरु थे।

सांडर्स वध में निशाना स्कॉट था, पर भूल से सांडर्स मारा गया।

8.8 चंद्रशेखर आज़ाद (1906–1931)

◆ जन्म और बचपन — चंद्रशेखर का जन्म 23 जुलाई 1906 को भाबरा गाँव (अलीराजपुर, मध्य प्रदेश) में हुआ। उनके पिता सीताराम तिवारी और माता जगरानी देवी थीं। उनका बचपन भील बच्चों के साथ बीता, जिनसे उन्होंने तीर-कमान चलाना और निशाना साधना सीखा। माता उन्हें संस्कृत का विद्वान बनाना चाहती थीं, इसलिए वे पढ़ने बनारस गए।

◆ "आज़ाद" नाम कैसे पड़ा — 1921 में असहयोग आंदोलन में भाग लेने पर वे लगभग 15 वर्ष की आयु में गिरफ़्तार हुए। अदालत में मजिस्ट्रेट ने नाम पूछा तो उत्तर दिया — "आज़ाद"; पिता का नाम — "स्वतंत्रता"; और घर — "जेल"। नाराज़ मजिस्ट्रेट ने उन्हें 15 बेंतों की सज़ा दी। कहा जाता है कि हर बेंत पर वे "महात्मा गांधी की जय" बोलते रहे। तभी से वे "आज़ाद" कहलाए।

◆ एच.आर.ए. में — असहयोग वापस लिए जाने के बाद वे रामप्रसाद बिस्मिल के संपर्क में आए और एच.आर.ए. के सक्रिय सदस्य बने। वे काकोरी कांड (1925) में शामिल थे, पर पुलिस उन्हें कभी नहीं पकड़ सकी। इसके बाद वे कई वर्ष झाँसी और ओरछा के जंगलों में साधु के वेश में रहे, जहाँ वे युवाओं को निशानेबाज़ी का प्रशिक्षण देते थे।

◆ एच.एस.आर.ए. के सेनापति — काकोरी के बाद बिखरे संगठन को उन्होंने ही सँभाला। 1928 में एच.एस.आर.ए. बनी तो वे उसके सेनापति चुने गए; संगठन के पर्चों पर उनके छद्म नाम "बलराज" के हस्ताक्षर होते थे। सांडर्स वध, असेंबली बम और इरविन की ट्रेन वाली योजना — तीनों के पीछे उनका संगठन-कौशल था। भगत सिंह संगठन का मस्तिष्क थे, तो आज़ाद उसकी रीढ़।

◆ 27 फ़रवरी 1931, अल्फ़्रेड पार्क — साथियों को जेल से छुड़ाने और संगठन को बचाने के प्रयासों के बीच आज़ाद इलाहाबाद में थे। 27 फ़रवरी 1931 की सुबह वे अल्फ़्रेड पार्क में एक साथी से मिल रहे थे कि किसी मुखबिर की सूचना पर पुलिस ने पार्क घेर लिया। आज़ाद ने एक पेड़ की आड़ लेकर अकेले लंबे समय तक मुक़ाबला किया, कई पुलिसकर्मियों को घायल किया और अपने साथी को निकल जाने का अवसर दिया। जब अंतिम गोली बची, तो उन्होंने उसे स्वयं पर चला लिया — क्योंकि उनकी प्रतिज्ञा थी कि वे जीवित नहीं पकड़े जाएँगे।

◆ स्मृति — "दुश्मन की गोलियों का हम सामना करेंगे, आज़ाद ही रहे हैं, आज़ाद ही रहेंगे" — यह पंक्ति उनसे जुड़ी मानी जाती है। आज अल्फ़्रेड पार्क का नाम चंद्रशेखर आज़ाद पार्क है। उनकी मृत्यु के समय आयु केवल 24 वर्ष थी।

🧠 याद रखने की ट्रिक — 1931 की तिथियाँ और "स-अ-ज-ल" क्रम

27 फ़रवरी — आज़ाद का बलिदान (इलाहाबाद) → 5 मार्च — गांधी-इरविन समझौता → 23 मार्च — भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु को फाँसी (लाहौर) → मार्च के अंत में — कांग्रेस का कराची अधिवेशन।

"स-अ-ज-ल" क्रम — सांडर्स वध (दिसंबर 1928) → असेंबली बम (अप्रैल 1929) → जतिन दास का बलिदान (सितंबर 1929) → लाहौर केस का फ़ैसला (अक्टूबर 1930)।

📋 दोहराव तालिका: एच.एस.आर.ए. की घटनाएँ (1928–1931)

तिथि

घटना

मुख्य बात

17 दिसंबर 1928

लाहौर में सांडर्स वध हुआ।

भगत सिंह और राजगुरु ने लाला लाजपत राय की मृत्यु का बदला लिया; आज़ाद ने बचाव किया।

8 अप्रैल 1929

दिल्ली की केंद्रीय असेंबली में बम फेंका गया।

भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने दो दमनकारी विधेयकों के विरोध में ख़ाली जगह पर बम फेंककर गिरफ़्तारी दी।

13 सितंबर 1929

जतिन दास का बलिदान हुआ।

राजनीतिक बंदी के दर्जे की माँग पर 63 दिन के अनशन के बाद लाहौर जेल में उनकी मृत्यु हुई।

7 अक्टूबर 1930

लाहौर षड्यंत्र केस का फ़ैसला आया।

विशेष ट्रिब्यूनल ने भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को मृत्युदंड दिया।

27 फ़रवरी 1931

चंद्रशेखर आज़ाद शहीद हुए।

इलाहाबाद के अल्फ़्रेड पार्क में पुलिस से मुक़ाबले में उन्होंने अंतिम गोली स्वयं को मारी।

23 मार्च 1931

तीनों को लाहौर सेंट्रल जेल में फाँसी दी गई।

तय समय से एक दिन पहले शाम को फाँसी दी गई और अंतिम संस्कार हुसैनीवाला में किया गया।

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9. बंगाल (द्वितीय चरण): चटगाँव और महिला क्रांतिकारी

9.1 पृष्ठभूमि: बंगाल में फिर उभार

1920 की आम माफ़ी में छूटे बंगाल के बहुत से क्रांतिकारी चित्तरंजन दास के नेतृत्व में कांग्रेस और स्वराज पार्टी में काम करने लगे थे। पर असहयोग आंदोलन वापस होने के बाद युगांतर और अनुशीलन दोनों समूह फिर सक्रिय हो गए। इस दौर की तीन बातें नई थीं — क्रांतिकारी अब कांग्रेस संगठन के भीतर रहकर भी काम करते थे, वे अकेले अधिकारी को मारने के बजाय सामूहिक सशस्त्र कार्रवाई की सोचने लगे थे, और युवतियाँ पहली बार हथियार लेकर सीधे मैदान में उतरीं।

◆ गोपीनाथ साहा (1924) — जनवरी 1924 में युवा क्रांतिकारी गोपीनाथ साहा ने कलकत्ता के बदनाम पुलिस कमिश्नर चार्ल्स टेगार्ट को मारने का प्रयास किया, पर भूल से अर्नेस्ट डे नाम का एक अंग्रेज़ मारा गया। साहा को फाँसी हुई। अदालत में उन्होंने कहा कि उन्हें निर्दोष व्यक्ति की मृत्यु का दुख है।

◆ दमन — इस घटना को बहाना बनाकर सरकार ने अक्टूबर 1924 में बंगाल अध्यादेश लागू किया, जिससे किसी को भी बिना मुक़दमे नज़रबंद किया जा सकता था। इसी के अंतर्गत सुभाषचंद्र बोस सहित बड़ी संख्या में कार्यकर्ता गिरफ़्तार किए गए और सुभाष को मांडले जेल भेजा गया। इससे आंदोलन कुछ वर्ष दबा रहा, पर 1930 में वह नए रूप में सामने आया।

9.2 सूर्य सेन "मास्टर दा" (1894–1934)

सूर्य सेन का जन्म 22 मार्च 1894 को चटगाँव ज़िले के नोआपाड़ा गाँव में हुआ। वे चटगाँव के एक राष्ट्रीय विद्यालय में गणित के शिक्षक थे, इसलिए सब उन्हें प्रेम से "मास्टर दा" कहते थे। वे असहयोग आंदोलन में सक्रिय रहे और कांग्रेस की चटगाँव ज़िला समिति के सचिव भी रहे — अर्थात् वे खुले राष्ट्रीय आंदोलन और गुप्त क्रांतिकारी कार्य, दोनों से एक साथ जुड़े थे। शांत स्वभाव के, दुबले-पतले और अत्यंत अनुशासित सूर्य सेन कविता-प्रेमी थे; वे रवींद्रनाथ ठाकुर और क़ाज़ी नज़रुल इस्लाम के प्रशंसक थे। वे कहा करते थे कि मानवता क्रांतिकारी का विशेष गुण है। 1926–28 के बीच वे बिना मुक़दमे जेल में रखे गए और छूटने के बाद उन्होंने चटगाँव के युवाओं को संगठित करना शुरू किया।

9.3 चटगाँव शस्त्रागार धावा (18 अप्रैल 1930)

◆ योजना और उद्देश्य — सूर्य सेन का विचार था कि एक छोटे ज़िले में भी यदि कुछ दिनों के लिए अंग्रेज़ी शासन को पूरी तरह ठप कर दिया जाए, तो पूरे देश को यह विश्वास हो जाएगा कि साम्राज्य को सशस्त्र चुनौती दी जा सकती है। इसके लिए आयरलैंड के 1916 के ईस्टर विद्रोह को आदर्श माना गया और दल का नाम "इंडियन रिपब्लिकन आर्मी, चटगाँव शाखा" रखा गया। योजना थी — दोनों शस्त्रागारों पर क़ब्ज़ा करना, तार-टेलीफ़ोन और रेल संपर्क काटकर चटगाँव को शेष बंगाल से अलग करना और फिर नगर पर अधिकार कर लेना।

◆ साथी — सूर्य सेन के प्रमुख साथी थे — अनंत सिंह, गणेश घोष, लोकनाथ बल, अंबिका चक्रवर्ती और निर्मल सेन। दल में अधिकतर स्कूल-कॉलेज के किशोर थे; सबसे छोटे सदस्यों में लोकनाथ बल के 14 वर्षीय भाई हरिगोपाल बल ("टेगरा") थे। आगे चलकर प्रीतिलता वड्डेदार और कल्पना दत्त जैसी युवतियाँ भी दल की सक्रिय सदस्य बनीं।

◆ घटनाक्रम — 18 अप्रैल 1930 की रात लगभग 65 युवकों ने अलग-अलग टुकड़ियों में एक साथ धावा बोला। गणेश घोष और अनंत सिंह की टुकड़ी ने पुलिस शस्त्रागार पर और लोकनाथ बल की टुकड़ी ने सहायक सेना (ऑक्ज़िलरी फ़ोर्स) के शस्त्रागार पर क़ब्ज़ा कर लिया। अंबिका चक्रवर्ती के दल ने टेलीफ़ोन और तार की व्यवस्था नष्ट की और एक अन्य दल ने रेल की पटरियाँ उखाड़कर संपर्क तोड़ दिया।

◆ अस्थायी क्रांतिकारी सरकार — इसके बाद सभी क्रांतिकारी पुलिस शस्त्रागार के सामने इकट्ठे हुए। सफ़ेद खादी की धोती और कोट पहने सूर्य सेन को सैनिक सलामी दी गई, "वंदे मातरम्" और "इंकलाब ज़िंदाबाद" के नारों के बीच राष्ट्रीय झंडा फहराया गया और "अस्थायी क्रांतिकारी सरकार" बनने की घोषणा की गई।

◆ एक बड़ी चूक — क्रांतिकारियों को बंदूक़ें तो मिल गईं, पर उनके कारतूस अलग जगह रखे थे और वे हाथ नहीं आए। बिना गोला-बारूद के नगर पर टिके रहना संभव नहीं था, इसलिए सुबह होने से पहले दल पास की पहाड़ियों में चला गया।

◆ जलालाबाद की लड़ाई (22 अप्रैल 1930) — चार दिन बाद जलालाबाद पहाड़ी पर कई हज़ार सैनिकों ने क्रांतिकारियों को घेर लिया। भूखे-प्यासे किशोरों ने घंटों डटकर मुक़ाबला किया और सेना को पीछे हटना पड़ा। इस लड़ाई में 12 क्रांतिकारी शहीद हुए, जिनमें 14 वर्षीय टेगरा बल भी थे; सेना के भी कई दर्जन सैनिक मारे गए (कुछ विवरणों में यह संख्या लगभग 80 दी गई है)।

🔍 आसान परिभाषा: छापामार युद्ध

📘 परिभाषा: युद्ध की वह पद्धति जिसमें छोटी-छोटी टुकड़ियाँ बड़ी सेना से आमने-सामने लड़ने के बजाय अचानक हमला करके तुरंत छिप जाती हैं, और स्थानीय जनता के सहयोग से लंबे समय तक संघर्ष चलाती हैं।

💡 आसान भाषा में: कमज़ोर पक्ष खुले मैदान में बड़ी सेना से नहीं जीत सकता, इसलिए वह छिपकर वार करता है, जगह बदलता रहता है और शत्रु को थका देता है। 🏠 उदाहरण: जलालाबाद के बाद सूर्य सेन ने दल को छोटी टुकड़ियों में बाँट दिया, जो लगभग तीन वर्ष तक चटगाँव के गाँवों में छिपकर सरकारी ठिकानों पर हमले करती रहीं।

◆ गाँवों का सहयोग — जलालाबाद के बाद क्रांतिकारी आसपास के गाँवों में फैल गए। भारी इनाम और पुलिस के अत्याचारों के बावजूद ग्रामीणों ने, जिनमें बड़ी संख्या में मुसलमान किसान थे, उन्हें भोजन और शरण दी। यही कारण है कि सूर्य सेन लगभग तीन वर्ष तक पकड़े नहीं गए।

◆ मुक़दमा और अंत — गिरफ़्तार क्रांतिकारियों पर चले मुक़दमे में अनंत सिंह, गणेश घोष, लोकनाथ बल आदि को आजीवन काला पानी की सज़ा हुई। 16 फ़रवरी 1933 को एक परिचित के विश्वासघात से सूर्य सेन पकड़े गए। जेल में घोर यातनाएँ देने के बाद 12 जनवरी 1934 को उन्हें उनके साथी तारकेश्वर दस्तीदार के साथ फाँसी दे दी गई।

◆ महत्त्व — चटगाँव की घटना पहले की घटनाओं से तीन बातों में अलग थी। पहली, यह किसी एक अधिकारी की हत्या नहीं, बल्कि राज्य की सशस्त्र शक्ति पर संगठित सामूहिक आक्रमण था। दूसरी, इसमें स्थानीय जनता का सहयोग मिला। तीसरी, इसने बंगाल के युवाओं में नई लहर पैदा की — 1930 से 1933 के बीच बंगाल में अधिकारियों पर हमलों की घटनाएँ बहुत बढ़ गईं। ब्रिटिश सरकार पर इसका गहरा असर हुआ और उसने बंगाल में कड़े अध्यादेश लागू किए।

9.4 बंगाल की महिला क्रांतिकारी

पहले चरण में महिलाएँ प्रायः क्रांतिकारियों को शरण देने, संदेश और हथियार पहुँचाने का काम करती थीं। दूसरे चरण में वे स्वयं पिस्तौल लेकर आगे आईं। ध्यान देने की बात है कि इनमें से अधिकतर स्कूल-कॉलेज की पढ़ी-लिखी छात्राएँ थीं।

◆ प्रीतिलता वड्डेदार (1911–1932) — चटगाँव में जन्मी प्रीतिलता बहुत मेधावी छात्रा थीं। उन्होंने कलकत्ता के बेथ्यून कॉलेज से दर्शनशास्त्र में स्नातक की पढ़ाई की और फिर चटगाँव के एक कन्या विद्यालय की प्रधानाध्यापिका बनीं। सूर्य सेन ने उन्हें एक बड़ी कार्रवाई का नेतृत्व सौंपा। 24 सितंबर 1932 की रात उन्होंने पुरुष वेश में कुछ साथियों के साथ चटगाँव के पहाड़तली यूरोपियन क्लब पर धावा बोला — इस क्लब के बारे में प्रसिद्ध था कि उसके द्वार पर "कुत्तों और भारतीयों का प्रवेश वर्जित" जैसा अपमानजनक बोर्ड लगा था। गोली लगने से घायल होने पर, पकड़े जाने से बचने के लिए उन्होंने साइनाइड खाकर प्राण दे दिए। केवल 21 वर्ष की प्रीतिलता को बंगाल की पहली प्रमुख महिला क्रांतिकारी शहीद माना जाता है।

◆ कल्पना दत्त (1913–1995) — चटगाँव की कल्पना कलकत्ता के बेथ्यून कॉलेज में विज्ञान की छात्रा थीं और सूर्य सेन के दल से जुड़ीं। उनका काम विस्फोटक तैयार करना और हथियार इधर-उधर पहुँचाना था। वे सूर्य सेन के साथ भूमिगत रहीं और 1933 में गिरफ़्तार हुईं। उन्हें आजीवन काला पानी की सज़ा मिली, पर 1939 में वे रिहा कर दी गईं। बाद में वे कम्युनिस्ट आंदोलन से जुड़ीं और कम्युनिस्ट नेता पी. सी. जोशी से विवाह के बाद कल्पना जोशी कहलाईं। उन्होंने चटगाँव की घटनाओं पर अपने संस्मरण भी लिखे।

◆ शांति घोष और सुनीति चौधरी — ये दोनों कोमिल्ला (तिप्पेरा ज़िला) के एक कन्या विद्यालय की केवल चौदह-पंद्रह वर्ष की छात्राएँ थीं। 14 दिसंबर 1931 को वे एक प्रार्थना-पत्र देने के बहाने ज़िलाधिकारी स्टीवंस के बँगले पर गईं और उन्हें गोली मार दी। कम आयु के कारण उन्हें फाँसी नहीं, बल्कि आजीवन कारावास हुआ। 1939 में वे रिहा हुईं।

◆ बीना दास (1911–1986) — कलकत्ता की छात्रा बीना दास ने 6 फ़रवरी 1932 को कलकत्ता विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में, जब वे अपनी उपाधि लेने मंच के पास पहुँचीं, बंगाल के गवर्नर स्टेनली जैक्सन पर पिस्तौल से गोलियाँ चलाईं। गवर्नर बच गए और बीना दास को 9 वर्ष के कठोर कारावास की सज़ा हुई।

◆ अन्य महिलाएँ — उज्ज्वला मजूमदार 1934 में बंगाल के गवर्नर एंडरसन पर दार्जिलिंग में हुए हमले के प्रयास से जुड़ी थीं। सुहासिनी गांगुली ने चटगाँव के फ़रार क्रांतिकारियों को चंद्रनगर में शरण दी। उत्तर भारत में दुर्गा भाभी (खंड 7.6) ने यही भूमिका निभाई। इन सबने यह धारणा तोड़ी कि स्त्रियाँ केवल घर के भीतर से ही आंदोलन की सहायता कर सकती हैं।

📋 दोहराव तालिका: बंगाल की महिला क्रांतिकारी

नाम

घटना

परिणाम

प्रीतिलता वड्डेदार

24 सितंबर 1932 को उन्होंने चटगाँव के पहाड़तली यूरोपियन क्लब पर हमले का नेतृत्व किया।

घायल होने पर उन्होंने साइनाइड खाकर बलिदान दिया।

कल्पना दत्त (जोशी)

वे चटगाँव दल में विस्फोटक और हथियार जुटाने का काम करती थीं।

वे 1933 में गिरफ़्तार हुईं, आजीवन काला पानी पाया और 1939 में रिहा हुईं।

शांति घोष और सुनीति चौधरी

14 दिसंबर 1931 को इन स्कूली छात्राओं ने कोमिल्ला के ज़िलाधिकारी स्टीवंस को गोली मारी।

कम आयु के कारण दोनों को आजीवन कारावास मिला और 1939 में रिहाई हुई।

बीना दास

6 फ़रवरी 1932 को उन्होंने दीक्षांत समारोह में गवर्नर स्टेनली जैक्सन पर गोली चलाई।

गवर्नर बच गए और बीना दास को 9 वर्ष का कारावास हुआ।

9.5 बंगाल की अन्य घटनाएँ (1930–1934)

◆ राइटर्स बिल्डिंग पर धावा (8 दिसंबर 1930) — "बंगाल वॉलंटियर्स" नामक दल के तीन युवक — बिनय बसु, बादल गुप्त और दिनेश गुप्त — यूरोपीय वेश में कलकत्ता के सचिवालय राइटर्स बिल्डिंग में घुसे और जेल महानिरीक्षक सिम्पसन को गोली मार दी, जो जेलों में राजनीतिक बंदियों पर अत्याचार के लिए बदनाम था। इसके बाद भवन के बरामदों में पुलिस से उनकी मुठभेड़ हुई, जो "बरामदे की लड़ाई" कहलाती है। घिर जाने पर बादल ने विष खा लिया, बिनय ने स्वयं को गोली मारी (कुछ दिन बाद अस्पताल में मृत्यु) और दिनेश को बाद में फाँसी हुई। आज कलकत्ता का वह चौक इन तीनों के नाम पर "बि-बा-दी बाग़" (बिनय-बादल-दिनेश) कहलाता है।

◆ मिदनापुर के तीन ज़िलाधिकारी — सविनय अवज्ञा आंदोलन के कठोर दमन के लिए बदनाम मिदनापुर ज़िले में लगातार तीन अंग्रेज़ ज़िलाधिकारियों की हत्या हुई — पेडी (1931), डगलस (1932) और बर्ज (1933)। इसके बाद कुछ समय तक कोई अंग्रेज़ अधिकारी वहाँ नियुक्त होने को तैयार नहीं था।

◆ दमन और अंत — सरकार ने बंगाल में कड़े अध्यादेश लागू किए, गाँवों पर सामूहिक जुर्माने लगाए, हज़ारों युवाओं को बिना मुक़दमे नज़रबंद किया और सैकड़ों को अंडमान भेजा। सूर्य सेन की फाँसी (1934) के बाद यह धारा लगभग समाप्त हो गई।

9.6 आगे की कड़ियाँ: ऊधम सिंह और वामपंथ की ओर झुकाव

◆ ऊधम सिंह (1899–1940) — पंजाब के सुनाम में जन्मे ऊधम सिंह का बचपन अमृतसर के अनाथालय में बीता। जलियाँवाला बाग़ हत्याकांड (1919) ने उनके मन पर गहरी छाप छोड़ी। इक्कीस वर्ष बाद, 13 मार्च 1940 को उन्होंने लंदन के कैक्सटन हॉल में एक सभा के दौरान माइकल ओ'डायर को गोली मार दी, जो हत्याकांड के समय पंजाब का लेफ़्टिनेंट गवर्नर था और जिसने गोली चलाने का समर्थन किया था। अदालत में उन्होंने अपना नाम "राम मोहम्मद सिंह आज़ाद" बताया — जो भारत के तीनों बड़े धर्मों की एकता और स्वतंत्रता का प्रतीक था। 31 जुलाई 1940 को लंदन की पेंटनविल जेल में उन्हें फाँसी दी गई।

⚠️ सावधानी — डायर और ओ'डायर अलग-अलग व्यक्ति हैं

जलियाँवाला बाग़ में गोली चलाने का आदेश देने वाला सैनिक अधिकारी जनरल रेजिनाल्ड डायर था, जिसकी मृत्यु 1927 में बीमारी से हो चुकी थी। ऊधम सिंह ने जिसे मारा, वह उस समय का पंजाब का लेफ़्टिनेंट गवर्नर माइकल ओ'डायर था।

◆ मार्क्सवाद की ओर — जेलों में लंबे अध्ययन और बहसों के बाद अनेक क्रांतिकारी इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि व्यक्तिगत वीरता से नहीं, बल्कि किसान-मज़दूरों के संगठित आंदोलन से ही क्रांति संभव है। शिव वर्मा, अजय घोष, जोगेश चटर्जी और अंडमान के बहुत से बंदी रिहा होकर कम्युनिस्ट पार्टी, कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी और अन्य वामपंथी दलों में गए।

◆ कानपुर और मेरठ षड्यंत्र केस — सरकार साम्यवादी विचारों को भी "षड्यंत्र" मानकर दबाती रही। कानपुर (बोल्शेविक) षड्यंत्र केस (1924) में एम. एन. राय, एस. ए. डांगे, मुज़फ़्फ़र अहमद, शौकत उस्मानी और नलिनी गुप्ता पर मुक़दमा चला। मेरठ षड्यंत्र केस (1929) में तीस से अधिक मज़दूर नेताओं को पकड़ा गया (विस्तार अध्याय 15 में)।

◆ आज़ाद हिंद फ़ौज — सशस्त्र संघर्ष की यह परंपरा आगे चलकर सुभाषचंद्र बोस की आज़ाद हिंद फ़ौज में दिखाई दी, जिसकी नींव जापान में बसे पुराने क्रांतिकारी रासबिहारी बोस ने रखी थी (अध्याय 13)।

10. राजस्थान के क्रांतिकारी (संक्षेप में)

देशी रियासतों वाले राजस्थान में क्रांतिकारी गतिविधियाँ मुख्यतः रासबिहारी बोस के उत्तर भारतीय संगठन से जुड़ी थीं (खंड 4.3 और 4.4)। राष्ट्रीय इतिहास की दृष्टि से यहाँ के चार नाम याद रखने योग्य हैं — शाहपुरा का बारहठ परिवार (तीन सदस्य) और जयपुर के अर्जुनलाल सेठी।

◆ केसरी सिंह बारहठ (1872–1941) — शाहपुरा के पास देवपुरा खेड़ा में जन्मे केसरी सिंह कवि और लेखक थे। 1903 में उन्होंने "चेतावनी रा चूँगट्या" नामक तेरह सोरठे लिखकर मेवाड़ के महाराणा फ़तह सिंह को कर्ज़न के दिल्ली दरबार में जाने से रोका। उन्होंने श्यामजी कृष्ण वर्मा को मेवाड़ बुलवाया (1893), कोटा राज्य में सेवा की (1902–07) और "वीर भारत सभा" बनाई। वे रासबिहारी बोस के विश्वस्त साथी थे। प्यारेराम हत्या और षड्यंत्र के मुक़दमे में उन्हें 20 वर्ष की सज़ा देकर हज़ारीबाग जेल भेजा गया। 1920 में रिहा होकर उन्होंने रियासतों में उत्तरदायी शासन की योजना रखी और मेयो कॉलेज जैसी अंग्रेज़ी शिक्षा के स्थान पर स्वदेशी शिक्षा और क्षत्रिय कॉलेज का विचार दिया।

◆ ज़ोरावर सिंह बारहठ — वे केसरी सिंह के छोटे भाई थे। 23 दिसंबर 1912 को दिल्ली के चाँदनी चौक में वायसराय हार्डिंग पर बम फेंकने की घटना में उनकी प्रमुख भूमिका मानी जाती है। वे कभी पकड़े नहीं गए और वर्षों तक मालवा और मेवाड़ के जंगलों में भूमिगत रहे। 1939 में कोटा में उनका निधन हुआ।

◆ प्रताप सिंह बारहठ — केसरी सिंह के पुत्र प्रताप, अर्जुनलाल सेठी और मास्टर अमीरचंद के शिष्य थे। वे हार्डिंग बम कांड में अपने चाचा के साथ थे और बाद में छावनियों में सैनिकों को विद्रोह के लिए तैयार करते रहे। बनारस षड्यंत्र केस में वे गिरफ़्तार हुए। बरेली जेल में घोर यातनाओं और प्रलोभनों के बावजूद उन्होंने साथियों के नाम नहीं बताए और 24 मई 1918 को जेल में ही उनका बलिदान हुआ।

❝ मेरी माँ रोती है तो रोने दो, मैं अपनी माँ को हँसाने के लिए हज़ारों माताओं को नहीं रुलाना चाहता। ❞ (प्रताप सिंह बारहठ (बरेली जेल में, साथियों के नाम बताने के प्रलोभन पर))

◆ अर्जुनलाल सेठी (1880–1941) — जयपुर के सेठी को "राजस्थान में जन-जागृति का जनक" कहा जाता है। उन्होंने चौमू ठिकाने की नौकरी यह कहकर छोड़ दी कि "अर्जुनलाल नौकरी करेगा तो अंग्रेज़ों को कौन निकालेगा?" उन्होंने जैन शिक्षा प्रचारक समिति (1906) और जयपुर में वर्धमान विद्यालय (1907) स्थापित किया, जो क्रांतिकारियों का प्रशिक्षण केंद्र बना। उन्होंने सूरत कांग्रेस (1907) में भाग लिया और हार्डिंग बम कांड की योजना से जुड़े रहे। निमेज (आरा) हत्याकांड (1913) के आरोप में उन्हें नज़रबंद किया गया और वेल्लोर जेल में उन्होंने 70 दिन का अनशन किया। उन्होंने काकोरी के अशफ़ाक़उल्ला को शरण दी। बाद में वे कांग्रेस में सक्रिय रहे और 1930 में राजपूताना के प्रांतीय "डिक्टेटर" (आंदोलन-संचालक) बने। उनकी रचनाओं में "शूद्र मुक्ति", "स्त्री मुक्ति" और नाटक "महेंद्र कुमार" हैं।

11. क्रांतिकारी साहित्य और तुलनात्मक अध्ययन

11.1 क्रांतिकारी पत्र-पत्रिकाएँ और पुस्तकें

क्रांतिकारियों के लिए क़लम उतना ही बड़ा हथियार थी जितनी पिस्तौल। गुप्त संगठन अपने विचार खुली सभाओं में नहीं रख सकते थे, इसलिए पत्र, पुस्तिकाएँ और पुस्तकें ही नए युवाओं तक पहुँचने का साधन थीं। सरकार इनमें से अधिकतर को ज़ब्त कर लेती थी, फिर भी ये हाथों-हाथ घूमती रहीं। नीचे इन्हें क्षेत्र के अनुसार समझाया गया है।

बंगाल और महाराष्ट्र

◆ "युगांतर" (1906) — यह बांग्ला साप्ताहिक बारींद्र कुमार घोष और भूपेंद्रनाथ दत्त ने निकाला। इसमें खुले शब्दों में कहा जाता था कि बल का उत्तर बल से ही दिया जा सकता है। इसी के नाम पर बंगाल का एक पूरा क्रांतिकारी समूह "युगांतर" कहलाया।

◆ "संध्या" (1904–07) — ब्रह्मबांधव उपाध्याय का यह बांग्ला दैनिक अपनी सीधी-सरल और तीखी भाषा के कारण आम लोगों में बहुत लोकप्रिय था।

◆ "वंदे मातरम्" (1906) — यह अंग्रेज़ी दैनिक अरविंद घोष के संपादन से जुड़ा था। इसमें उन्होंने निष्क्रिय प्रतिरोध के सिद्धांत पर लेखमाला लिखी।

◆ "भवानी मंदिर" और "मुक्ति कोन पथे" — "भवानी मंदिर" (1905) अरविंद घोष की पुस्तिका थी, जिसमें देश-सेवा के लिए संन्यासी-योद्धाओं के एक केंद्र की रूपरेखा दी गई थी। "मुक्ति कोन पथे" (मुक्ति किस मार्ग से) "युगांतर" के लेखों का संग्रह था, जिसमें सैनिकों को अपने पक्ष में करने और हथियार जुटाने की बात कही गई थी।

◆ "काल" — शिवराम महादेव परांजपे का यह मराठी पत्र महाराष्ट्र में क्रांतिकारी विचारों का प्रमुख वाहक था।

◆ "पथेर दाबी" (1926) — शरतचंद्र चट्टोपाध्याय का यह बांग्ला उपन्यास एक क्रांतिकारी संगठन की कथा है। सरकार ने इसे प्रतिबंधित कर दिया, पर युवाओं में यह बहुत पढ़ा गया।

विदेश से निकले पत्र और पुस्तकें

◆ "द इंडियन सोशियोलॉजिस्ट" (1905) — श्यामजी कृष्ण वर्मा ने यह मासिक पत्र लंदन से निकाला, जो इंडिया हाउस का मुखपत्र था।

◆ "वंदे मातरम्" और "मदन्स तलवार" — मैडम कामा ने ये दोनों पत्र यूरोप से निकाले। दूसरा पत्र शहीद मदनलाल ढींगरा की स्मृति में था।

◆ "1857 का स्वातंत्र्य समर" (1909) — विनायक दामोदर सावरकर की इस पुस्तक ने 1857 के विद्रोह को पहली बार "भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम" कहा। छपने से पहले ही इस पर प्रतिबंध लगा दिया गया था।

◆ "फ़्री हिंदुस्तान" (1908) — तारकनाथ दास ने यह पत्र कनाडा के वैंकूवर से शुरू किया, जिसने उत्तरी अमेरिका के प्रवासी भारतीयों में चेतना जगाई।

◆ "ग़दर" (1913) और "ग़दर दी गूँज" — ग़दर पार्टी का साप्ताहिक "ग़दर" सैन फ़्रांसिस्को से उर्दू, पंजाबी और अन्य भारतीय भाषाओं में निकलता था। "ग़दर दी गूँज" क्रांतिकारी कविताओं का संग्रह था (खंड 6.4)।

द्वितीय चरण की रचनाएँ

◆ "बंदी जीवन" — शचींद्रनाथ सान्याल ने अपने जेल-जीवन और क्रांतिकारी अनुभवों पर यह पुस्तक लिखी। दूसरे चरण के युवाओं ने इसे इतना पढ़ा कि यह क्रांतिकारियों की "गीता" कहलाई।

◆ "क्रांतिकारी" घोषणापत्र (1925) — यह एच.आर.ए. का घोषणापत्र था, जिसमें संघीय गणराज्य और शोषण-मुक्त समाज का लक्ष्य रखा गया (खंड 7.2)।

◆ "बम का दर्शन" (1930) — भगवतीचरण वोहरा ने इसे गांधीजी के लेख "बम की पूजा" के उत्तर में लिखा (खंड 7.6)।

◆ "मैं नास्तिक क्यों हूँ" (1930) — भगत सिंह का जेल में लिखा निबंध, जो तर्क और स्वतंत्र चिंतन का समर्थन करता है (खंड 8.7)।

◆ बिस्मिल की आत्मकथा (1927) — रामप्रसाद बिस्मिल ने फाँसी से कुछ दिन पहले गोरखपुर जेल में इसे पूरा किया (खंड 7.4)।

📋 दोहराव तालिका: रचना और रचनाकार

रचना / पत्र

लेखक / संपादक

एक पंक्ति में पहचान

"युगांतर" (1906)

बारींद्र घोष और भूपेंद्रनाथ दत्त

यह बंगाल का क्रांतिकारी साप्ताहिक था।

"संध्या"

ब्रह्मबांधव उपाध्याय

यह सरल भाषा का उग्र बांग्ला दैनिक था।

"काल"

शिवराम महादेव परांजपे

यह क्रांतिकारी विचारों का मराठी पत्र था।

"द इंडियन सोशियोलॉजिस्ट" (1905)

श्यामजी कृष्ण वर्मा

यह लंदन के इंडिया हाउस का मुखपत्र था।

"1857 का स्वातंत्र्य समर" (1909)

वी. डी. सावरकर

इसने 1857 को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम कहा।

"फ़्री हिंदुस्तान" (1908)

तारकनाथ दास

यह वैंकूवर (कनाडा) से निकला।

"ग़दर" (1913)

ग़दर पार्टी

यह सैन फ़्रांसिस्को से कई भाषाओं में निकला।

"बंदी जीवन"

शचींद्रनाथ सान्याल

इसे क्रांतिकारियों की "गीता" कहा गया।

"बम का दर्शन" (1930)

भगवतीचरण वोहरा

यह गांधीजी के "बम की पूजा" का उत्तर था।

"मैं नास्तिक क्यों हूँ" (1930)

भगत सिंह

यह जेल में लिखा गया निबंध है।

"पथेर दाबी" (1926)

शरतचंद्र चट्टोपाध्याय

यह प्रतिबंधित क्रांतिकारी उपन्यास था।

11.2 प्रथम और द्वितीय चरण की तुलना

खंड 1.3 में दोनों चरणों का परिचय दिया गया था। अब पूरा अध्याय पढ़ लेने के बाद दोनों का अंतर और स्पष्ट हो जाता है। सबसे बड़ा अंतर विचारधारा का है — पहले चरण के क्रांतिकारी गीता और काली की शपथ लेते थे, जबकि दूसरे चरण के क्रांतिकारी समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता की बात करते थे। दूसरा अंतर लक्ष्य का है — पहले चरण में लक्ष्य केवल अंग्रेज़ों को हटाना था; दूसरे चरण में यह भी सोचा गया कि स्वतंत्रता के बाद कैसा समाज बनेगा। नीचे की तालिका इन अंतरों को दोहराती है।

पहलू

प्रथम चरण (लगभग 1897–1918)

द्वितीय चरण (लगभग 1922–1934)

पृष्ठभूमि

यह स्वदेशी आंदोलन के दमन और सूरत विभाजन के बाद उठा।

यह असहयोग आंदोलन वापस लिए जाने की निराशा से उठा।

प्रेरणा

इसकी प्रेरणा गीता, आनंदमठ, शिवाजी, काली-भवानी की उपासना और मैज़िनी थे।

इसकी प्रेरणा रूसी क्रांति, समाजवाद और आयरलैंड का संघर्ष थे।

लक्ष्य

इसका लक्ष्य विदेशी शासन को हटाना था; आगे के समाज का स्पष्ट चित्र नहीं था।

इसका लक्ष्य समाजवादी गणराज्य था, जिसमें शोषण न हो।

तरीक़ा

इसमें अधिकारियों पर व्यक्तिगत आक्रमण, स्वदेशी डकैती और विश्वयुद्ध के समय सैनिक विद्रोह की योजनाएँ थीं।

इसमें सरकारी ख़ज़ाने और शस्त्रागार पर धावा, अदालत से प्रचार और जन-संगठन की ओर झुकाव था।

धर्म का स्थान

धार्मिक प्रतीकों के प्रयोग से मुसलमानों की भागीदारी कम रही।

यह चरण धर्मनिरपेक्ष था; बिस्मिल-अशफ़ाक़ की मित्रता इसका प्रतीक है।

महिलाएँ

महिलाओं की भूमिका शरण और संदेश पहुँचाने तक सीमित थी।

प्रीतिलता, कल्पना दत्त और बीना दास जैसी महिलाओं ने स्वयं हथियार उठाए।

प्रमुख नाम

चापेकर बंधु, सावरकर, खुदीराम, बाघा जतिन, रासबिहारी बोस और ग़दर के नेता इसके प्रमुख नाम हैं।

बिस्मिल, अशफ़ाक़, भगत सिंह, आज़ाद और सूर्य सेन इसके प्रमुख नाम हैं।

11.3 गरम दल, क्रांतिकारी और गांधीवादी धारा

राष्ट्रीय आंदोलन की ये तीनों धाराएँ एक ही लक्ष्य — भारत की स्वतंत्रता — की ओर बढ़ रही थीं, पर उनके साधन अलग थे। गरम दल कांग्रेस के भीतर रहकर स्वदेशी, बहिष्कार और निष्क्रिय प्रतिरोध से दबाव बनाता था। क्रांतिकारी गुप्त संगठन बनाकर हथियार का सहारा लेते थे और उनका आधार मुख्यतः शिक्षित युवाओं तक सीमित था। गांधीवादी धारा ने अहिंसक सत्याग्रह को हथियार बनाया और किसानों, मज़दूरों तथा महिलाओं को करोड़ों की संख्या में आंदोलन से जोड़ा। जहाँ क्रांतिकारी मार्ग के लिए प्राण देने का साहस चाहिए था, वहीं गांधीजी के मार्ग पर एक साधारण किसान भी नमक बनाकर या कर न देकर चल सकता था — यही उसकी सबसे बड़ी शक्ति थी।

पहलू

गरम दल

क्रांतिकारी

गांधीवादी

लक्ष्य

इसका लक्ष्य स्वराज था।

इनका लक्ष्य पूर्ण स्वतंत्रता और द्वितीय चरण में समाजवादी गणराज्य था।

इसका लक्ष्य पहले स्वराज और 1929 से पूर्ण स्वराज था।

साधन

इसके साधन स्वदेशी, बहिष्कार और निष्क्रिय प्रतिरोध थे।

इनके साधन हथियार, गुप्त संगठन और व्यक्तिगत वीरता थे।

इसके साधन अहिंसक सत्याग्रह, असहयोग और सविनय अवज्ञा थे।

संगठन

यह कांग्रेस के भीतर खुले रूप में काम करता था।

ये गुप्त समितियों के रूप में काम करते थे।

कांग्रेस एक विशाल जन-संगठन बन गई।

जन-भागीदारी

इसमें मध्यम वर्ग और छात्र जुड़े।

भागीदारी शिक्षित युवाओं तक सीमित रही।

इसमें किसान, मज़दूर और महिलाएँ व्यापक रूप से जुड़े।

प्रेरणा

इसकी प्रेरणा भारतीय संस्कृति और धार्मिक प्रतीक थे।

पहले धार्मिक-आध्यात्मिक और बाद में समाजवादी प्रेरणा रही।

इसकी प्रेरणा सत्य, अहिंसा और नैतिक बल थे।

प्रमुख नेता

तिलक, लाजपत राय, बिपिनचंद्र पाल और अरविंद इसके नेता थे।

सावरकर, बाघा जतिन, भगत सिंह, आज़ाद और सूर्य सेन इसके नायक थे।

गांधी, नेहरू और पटेल इसके नेता थे।

12. मूल्यांकन, कालक्रम और सार

12.1 योगदान

1. भय का अंत — क्रांतिकारियों ने यह भ्रम तोड़ा कि अंग्रेज़ी राज अजेय है और अंग्रेज़ अधिकारी को कोई छू नहीं सकता। जब साधारण घरों के युवक हँसते हुए फाँसी पर चढ़े, तो आम लोगों के मन से जेल और मृत्यु का डर घटा — और इसी निडरता पर आगे के जन-आंदोलन खड़े हुए।

2. त्याग और देशभक्ति का आदर्श — खुदीराम, बिस्मिल, अशफ़ाक़, भगत सिंह और आज़ाद जैसे नाम घर-घर में पहुँचे। उनके गीत, चित्र और कहानियाँ पीढ़ियों तक युवाओं को प्रेरित करती रहीं।

3. नए विचार — दूसरे चरण के क्रांतिकारियों ने राष्ट्रीय आंदोलन में समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता के विचारों को मज़बूत किया। उन्होंने यह प्रश्न उठाया कि स्वतंत्रता किसके लिए होगी — केवल धनी वर्ग के लिए या किसान-मज़दूर के लिए भी। कांग्रेस के भीतर नेहरू और सुभाष जैसे युवा नेताओं पर और 1931 के कराची प्रस्ताव पर इस सोच का प्रभाव दिखता है।

4. महिलाओं की भागीदारी — प्रीतिलता, कल्पना दत्त, बीना दास और दुर्गा भाभी जैसी महिलाओं ने दिखाया कि स्त्रियाँ स्वतंत्रता संघर्ष के सबसे कठिन मोर्चे पर भी बराबरी से खड़ी हो सकती हैं।

5. जनमत का निर्माण — अदालतों को प्रचार का मंच बनाकर और जेलों में अनशन करके क्रांतिकारियों ने देश की सहानुभूति जीती। भगत सिंह एक जन-नायक बन गए।

6. अंतरराष्ट्रीय स्वर — इंडिया हाउस, ग़दर पार्टी, बर्लिन कमेटी और काबुल सरकार ने भारत की स्वतंत्रता के प्रश्न को दुनिया के सामने रखा और प्रवासी भारतीयों को आंदोलन से जोड़ा।

12.2 सीमाएँ

1. जन-आंदोलन नहीं बन सका — यह आंदोलन मुट्ठी भर साहसी युवाओं की वीरता पर टिका था। किसान, मज़दूर और आम जनता इसमें सीधे भागीदार नहीं थे; वे प्रशंसक थे, सहभागी नहीं। गुप्त संगठन की प्रकृति ही ऐसी होती है कि उसमें बड़ी संख्या में लोग शामिल नहीं हो सकते।

2. व्यक्तिगत हिंसा की सीमा — एक अधिकारी के मारे जाने पर दूसरा आ जाता था, और साम्राज्य की व्यवस्था जस की तस रहती थी। उलटे, हर घटना के बाद सरकार को कठोर क़ानून बनाने का बहाना मिल जाता था। भगत सिंह ने स्वयं अंत में इस सीमा को स्वीकार किया।

3. धार्मिक प्रतीक — पहले चरण में काली-भवानी की शपथ और गीता जैसे प्रतीकों के कारण मुसलमान युवक इससे कम जुड़ पाए। दूसरे चरण ने यह कमी काफ़ी हद तक दूर की।

4. संगठन और साधनों की कमी — संगठन छोटे-छोटे समूहों में बिखरे थे, धन और हथियार कम थे और प्रशिक्षण अधूरा था। लगभग हर बड़ी योजना — ग़दर विद्रोह हो या सूर्य सेन की गिरफ़्तारी — मुखबिरों के कारण विफल हुई।

5. कठोर दमन — फाँसी, काला पानी, बिना मुक़दमे नज़रबंदी और भारत रक्षा अधिनियम जैसे क़ानूनों से सरकार ने हर लहर को कुछ ही वर्षों में कुचल दिया।

6. स्पष्ट कार्यक्रम का अभाव — पहले चरण के क्रांतिकारियों के पास यह साफ़ योजना नहीं थी कि अंग्रेज़ों के जाने के बाद शासन और समाज कैसा होगा। दूसरे चरण में यह सोच बनी, पर उसे ज़मीन पर उतारने का समय और संगठन नहीं मिला।

🌟 योगदान — सार

✔ अंग्रेज़ी राज की अजेयता का भ्रम टूटा।

✔ युवाओं को त्याग और साहस का आदर्श मिला।

✔ समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता के विचार मज़बूत हुए।

✔ महिलाओं ने सशस्त्र संघर्ष में भाग लिया।

✔ अदालत और अनशन से जनमत जागा।

✔ भारत का प्रश्न विदेशों तक पहुँचा।

⚠️ सीमाएँ — सार

✔ आंदोलन जन-आंदोलन नहीं बन सका।

✔ व्यक्तिगत हिंसा से साम्राज्य नहीं हटा।

✔ पहले चरण के धार्मिक प्रतीकों से मुसलमान दूर रहे।

✔ संगठन बिखरा था और मुखबिरों से योजनाएँ विफल हुईं।

✔ सरकार ने कठोर दमन से हर लहर को कुचल दिया।

✔ पहले चरण में सामाजिक-आर्थिक कार्यक्रम स्पष्ट नहीं था।

निष्कर्ष: क्रांतिकारी अपने तात्कालिक लक्ष्य — सशस्त्र क्रांति से स्वतंत्रता — में सफल नहीं हुए, पर उनका बलिदान व्यर्थ नहीं गया। उन्होंने राष्ट्रीय चेतना को गहराई दी और स्वतंत्रता आंदोलन को ऐसे आदर्श दिए जिन्होंने करोड़ों लोगों को प्रेरित किया। क्रांतिकारी धारा और गांधीवादी धारा के साधन भिन्न थे और दोनों में तीखी बहसें भी हुईं, फिर भी व्यापक अर्थ में वे एक-दूसरे की पूरक थीं — क्रांतिकारियों के बलिदान ने जनता में जो आवेग जगाया, उसे गांधीजी के जन-आंदोलनों ने संगठित रूप दिया। दोनों का लक्ष्य एक ही था — भारत की स्वतंत्रता।

उत्तर लिखने के लिए उदाहरण

यदि प्रश्न हो — "क्रांतिकारी आंदोलन असफल होकर भी सफल क्यों माना जाता है?" — तो उत्तर का ढाँचा यह हो सकता है: पहले बताइए कि वह किस अर्थ में असफल रहा (सत्ता नहीं बदली, जन-आंदोलन नहीं बना, दमन से कुचला गया)। फिर बताइए कि वह किस अर्थ में सफल रहा (भय टूटा, बलिदान का आदर्श बना, समाजवाद-धर्मनिरपेक्षता के विचार आए, महिलाएँ आगे आईं)। अंत में भगत सिंह का उदाहरण दीजिए, जिनकी फाँसी ने देश को झकझोर दिया और जिनके विचार आज भी जीवित हैं।

⏳ 12.3 एक नज़र में कालक्रम

नीचे इस अध्याय की प्रमुख तिथियाँ क्रम से दी गई हैं। इन्हें दोहराते समय हर तिथि के साथ स्थान और व्यक्ति भी याद कीजिए।

वर्ष / तिथि

घटना

1879

वासुदेव बलवंत फड़के का विद्रोह

22 जून 1897

चापेकर बंधुओं द्वारा रैंड-आयर्स्ट वध

1899 / 1902 / 1904

मित्र मेला / अनुशीलन समिति / अभिनव भारत

1905

इंडियन होमरूल सोसाइटी और इंडिया हाउस (लंदन)

1906

"युगांतर"; ढाका अनुशीलन

22 अगस्त 1907

मैडम कामा — स्टुटगार्ट में झंडा

30 अप्रैल / 11 अगस्त 1908

मुज़फ़्फ़रपुर बम / खुदीराम बोस को फाँसी; अलीपुर षड्यंत्र केस

1 जुलाई / 21 दिसंबर 1909

ढींगरा द्वारा कर्ज़न वायली वध / नासिक में जैक्सन वध

1910

सावरकर की गिरफ़्तारी, मार्सेई प्रसंग

17 जून 1911

वांची अय्यर द्वारा ऐश वध

23 दिसंबर 1912

दिल्ली में हार्डिंग पर बम

1913

ग़दर पार्टी; "ग़दर" पत्र (1 नवंबर)

1914

कोमागाटा मारू; बजबज (29 सितंबर); रोडा कंपनी हथियार लूट

1915

ग़दर विद्रोह योजना (21 फ़रवरी); सिंगापुर विद्रोह; भारत रक्षा अधिनियम; बाघा जतिन (10 सितंबर); करतार सिंह सराभा को फाँसी (16 नवंबर); काबुल सरकार (1 दिसंबर)

1918

प्रताप सिंह बारहठ का बलिदान; राजद्रोह (रॉलेट) समिति की रिपोर्ट

1924

गोपीनाथ साहा (जनवरी); एच.आर.ए. (अक्टूबर, कानपुर); बंगाल अध्यादेश

9 अगस्त 1925

काकोरी कांड

1926 / 1927

नौजवान भारत सभा / काकोरी के शहीदों को फाँसी (17–19 दिसंबर)

1928

एच.एस.आर.ए. (8–9 सितंबर); लाला लाजपत राय की मृत्यु (17 नवंबर); सांडर्स वध (17 दिसंबर)

1929

असेंबली बम (8 अप्रैल); जतिन दास (13 सितंबर); इरविन ट्रेन प्रयास (23 दिसंबर)

1930

चटगाँव (18 अप्रैल); जलालाबाद (22 अप्रैल); भगवतीचरण वोहरा की मृत्यु (28 मई); लाहौर केस का फ़ैसला (7 अक्टूबर); राइटर्स बिल्डिंग (8 दिसंबर)

1931

आज़ाद (27 फ़रवरी); भगत सिंह-सुखदेव-राजगुरु (23 मार्च); शांति-सुनीति (14 दिसंबर)

1932

बीना दास (6 फ़रवरी); प्रीतिलता (24 सितंबर)

1933 / 1934

सूर्य सेन की गिरफ़्तारी (16 फ़रवरी) / सूर्य सेन को फाँसी (12 जनवरी)

13 मार्च 1940

ऊधम सिंह द्वारा ओ'डायर वध (लंदन)

🔑 कीवर्ड सार

फड़के 1879 • चापेकर — रैंड 1897 • मित्र मेला 1899 — अभिनव भारत 1904 • अनुशीलन 1902 • युगांतर 1906 • खुदीराम — मुज़फ़्फ़रपुर 1908 • अलीपुर केस — अरविंद • ढींगरा — कर्ज़न वायली 1909 • जैक्सन — कान्हेरे • वांची — ऐश 1911 • हार्डिंग बम 1912 — रासबिहारी बोस • इंडिया हाउस — श्यामजी • कामा — स्टुटगार्ट 1907 • ग़दर 1913 — हरदयाल, सोहन सिंह भकना • कोमागाटा मारू 1914 — बजबज • सराभा • बाघा जतिन — बालासोर 1915 • काबुल सरकार — महेंद्र प्रताप, बरकतुल्ला

एच.आर.ए. 1924 कानपुर • काकोरी 9 अगस्त 1925 • बिस्मिल, अशफ़ाक़, लाहिड़ी, रोशन सिंह • नौजवान भारत सभा 1926 • एच.एस.आर.ए. 1928 — फ़िरोज़शाह कोटला • सांडर्स 17 दिसंबर 1928 • असेंबली बम 8 अप्रैल 1929 — बटुकेश्वर दत्त • जतिन दास — 63 दिन • लाहौर केस — विशेष ट्रिब्यूनल • बम का दर्शन — वोहरा • आज़ाद — अल्फ़्रेड पार्क 27 फ़रवरी 1931 • 23 मार्च 1931 — हुसैनीवाला • इंकलाब ज़िंदाबाद — हसरत मोहानी • सूर्य सेन — चटगाँव 18 अप्रैल 1930 — जलालाबाद • प्रीतिलता — पहाड़तली • बीना दास — जैक्सन • शांति-सुनीति — स्टीवंस • बिनय-बादल-दिनेश — राइटर्स बिल्डिंग • ऊधम सिंह — कैक्सटन हॉल 1940 • बंदी जीवन — सान्याल

ऊपर के कीवर्ड केवल दोहराने के लिए हैं; हर कीवर्ड का विस्तार संबंधित खंड में दिया जा चुका है।

💡 अंतिम बात

फड़के से लेकर भगत सिंह तक, खुदीराम से लेकर प्रीतिलता तक — इन युवाओं के पास न सेना थी, न धन, न जन-संगठन; था तो बस अटूट साहस। भगत सिंह ने कहा था कि व्यक्तियों को मारा जा सकता है, विचारों को नहीं — और यही विचार स्वतंत्र भारत की आत्मा में आज भी जीवित है।

पर इन्हीं वर्षों में एक दूसरा रास्ता भी बन रहा था, जिस पर करोड़ों साधारण लोग चल सकते थे। अगले अध्याय 12 में हम देखेंगे कि महात्मा गांधी ने दक्षिण अफ़्रीका के प्रयोगों से लौटकर चंपारण, खेड़ा, अहमदाबाद, रॉलेट सत्याग्रह, ख़िलाफ़त और असहयोग के ज़रिए राष्ट्रीय आंदोलन को जन-आंदोलन कैसे बनाया।

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