🌾 अध्याय 11/15 — आधुनिक भारत का इतिहास

किसान, मजदूर एवं जनजातीय आंदोलन

Peasant, Labour & Tribal Movements | RAS Pre + Mains
📋 इस अध्याय में

    भारत में ब्रिटिश शासन के दौरान न केवल शहरी शिक्षित वर्ग ने स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ी, बल्कि गाँवों के किसान, कारखानों के मजदूर और वनों के जनजातीय समुदाय भी ब्रिटिश शोषण के विरुद्ध संघर्षरत रहे। ये आंदोलन अनेक बार राष्ट्रीय आंदोलन से पहले हुए और उसे ऊर्जा दी।

    ★ KEY POINTS ★
    ✦ किसान आंदोलनों के कारण: भूमि राजस्व नीति, जमींदारी उत्पीड़न, नील बागान, ऋण जाल, कर्जा
    ✦ मजदूर आंदोलनों के कारण: दुर्दशा कारखानों में, लंबे कार्य-घंटे, कम वेतन, बाल मजदूरी
    ✦ जनजातीय आंदोलनों के कारण: वन कानून, भूमि अधिग्रहण, साहूकार, मिशनरी प्रभाव, बेगारी
    ✦ AITUC 1920 = अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस = लाला लाजपत राय की अध्यक्षता
    ✦ बिरसा मुंडा = "धरती आबा" = उलगुलान विद्रोह 1899-1900 = मुंडा जनजाति झारखंड
    ✦ संथाल विद्रोह 1855-56 = सिद्धू-कान्हू = "हुल" आंदोलन
    ✦ अखिल भारतीय किसान सभा 1936 = स्थापना: लखनऊ = अध्यक्ष: स्वामी सहजानंद सरस्वती

    भाग-क : किसान आंदोलन (Peasant Movements)

    ब्रिटिश भूमि नीतियों — स्थायी बंदोबस्त, रैयतवाड़ी, महालवाड़ी — ने किसानों की स्थिति दयनीय कर दी। जमींदार, महाजन और अंग्रेज बागान मालिक मिलकर किसानों का शोषण करते थे। इसीलिए 18वीं सदी से ही किसान आंदोलन उभरने लगे।

    किसान आंदोलनों के सामान्य कारण
    • भारी भूमि राजस्व — फसल नष्ट होने पर भी माफी नहीं
    • नील बागान मालिकों का अत्याचार — जबरन नील उगाना
    • जमींदारों द्वारा बेदखली और लगान वृद्धि
    • महाजनों और साहूकारों का ऋण जाल — ब्याज दर 50-200%
    • बाजार में भारतीय उत्पादों की कीमत घटना
    • वन कानून और चराई अधिकारों का समाप्त होना
    • प्राकृतिक आपदा में कोई सरकारी सहायता नहीं

    1. नील विद्रोह (Indigo Revolt / Neel Vidroh, 1859–60)

    बंगाल में यूरोपीय नील बागान मालिक किसानों को बाध्य करते थे कि वे नील उगाएँ — चाहे उन्हें नुकसान हो। इसे "तीन कठिया प्रणाली" कहते थे — 20 में से 3 कट्ठे भूमि पर नील।

    1. विद्रोह का आरंभ: 1859 में नील चाषी किसानों ने नदिया और पाबना में एकत्र होकर नील बोने से इनकार किया।

    2. प्रमुख नेता: दिगंबर विश्वास और विष्णुचरण विश्वास।

    3. संगठन: किसानों ने "मुकद्दमा फंड" बनाया — अदालत में लड़ाई का खर्च।

    4. मिशनरी सहायता: रेवरेंड जेम्स लांग ने किसानों का साथ दिया — "नील दर्पण" नाटक का अनुवाद।

    5. नील दर्पण: दीनबंधु मित्र ने लिखा — नील किसानों की दुर्दशा — ब्रिटिश शासकों में खलबली।

    6. नील कमीशन 1860: ब्रिटिश सरकार ने जाँच के लिए आयोग बनाया — रिपोर्ट में किसानों के पक्ष में निष्कर्ष।

    7. परिणाम: बंगाल में नील की जबरन खेती बंद हुई — परंतु बिहार में चलती रही जहाँ 1917 में चंपारण सत्याग्रह हुआ।

    महत्त्व: नील विद्रोह भारत में किसान वर्ग के संगठित प्रतिरोध का पहला बड़ा उदाहरण था। यह आंदोलन मुख्यतः शांतिपूर्ण था — मुकदमेबाजी और बहिष्कार का प्रयोग हुआ।

    2. पाबना किसान विद्रोह (Pabna Agrarian League, 1873)

    पाबना जिला (पूर्वी बंगाल) में जमींदारों ने स्थायी बंदोबस्त के कानूनी छिद्रों का लाभ उठाकर लगान बढ़ाया और बेदखली की धमकी दी।

    3. दक्कन किसान विद्रोह (Deccan Riots, 1875)

    महाराष्ट्र के पुणे और अहमदनगर में मराठा किसानों ने साहूकारों के विरुद्ध विद्रोह किया।

    1. कारण: 1875 की उपज बर्बादी — लेकिन साहूकारों ने ऋण वसूली जारी रखी — बेदखली।

    2. आंदोलन: किसानों ने साहूकारों के "डेबिट बॉन्ड" (ऋण पत्र) छीन लिए और जला दिए।

    3. कोई हत्या नहीं — केवल ऋण पत्र नष्ट करना।

    4. नेता: प्रमुख रूप से नेतृत्वहीन — सहज जन-विद्रोह।

    5. दक्कन एग्रीकल्चरिस्ट रिलीफ एक्ट 1879: सरकार ने इसी के बाद पारित किया — साहूकारों को नियंत्रित करने के लिए।

    4. एका आंदोलन (Eka Movement, 1921–22)

    अवध (उत्तर प्रदेश) में असहयोग आंदोलन के प्रभाव में किसानों ने एका (एकता) का संगल्प लिया।

    5. मोपला विद्रोह / मालाबार विद्रोह (Moplah Rebellion, 1921)

    केरल के मालाबार में मुस्लिम मोपला किसानों (मुख्यतः काश्तकार) और हिंदू जमींदारों (जेनमी) के बीच दीर्घकालीन तनाव था।

    1. पृष्ठभूमि: मोपला किसान जेनमी जमींदारों को लगान देते थे — पीढ़ियों से शोषण।

    2. खिलाफत आंदोलन और असहयोग ने धार्मिक और राजनीतिक उत्तेजना बढ़ाई।

    3. अगस्त 1921: अली मुसलियार के नेतृत्व में हिंसक विद्रोह — ब्रिटिश थाने पर हमला।

    4. विद्रोह सांप्रदायिक रूप ले गया — हिंदुओं पर हमले भी हुए।

    5. वैगन त्रासदी: 61 कैदी बंद डिब्बे में दम घुटने से मरे — ब्रिटिश क्रूरता।

    6. दमन: अक्तूबर 1921 तक ब्रिटिश सेना ने कुचला।

    विवाद: मोपला विद्रोह को लेकर इतिहासकारों में मतभेद हैं — कुछ इसे वर्ग-संघर्ष (किसान बनाम जमींदार), कुछ साम्प्रदायिक दंगा कहते हैं। राष्ट्रवादी नेताओं ने इसकी निंदा की।

    6. बारडोली सत्याग्रह (Bardoli Satyagraha, 1928)

    गुजरात के बारडोली तालुके में सरकार ने भूमि राजस्व में 22% वृद्धि की। किसानों ने इसे अन्यायपूर्ण माना और सत्याग्रह किया।

    महत्त्व: बारडोली सत्याग्रह किसान आंदोलन और राष्ट्रीय आंदोलन के सफल समन्वय का उदाहरण है। वल्लभभाई पटेल को "सरदार" उपाधि बारडोली की महिला किसानों ने दी।

    7. अखिल भारतीय किसान सभा (All India Kisan Sabha, 1936)

    राष्ट्रीय आंदोलन के मध्य में किसानों के हितों की रक्षा और संगठन के लिए 1936 में लखनऊ में अखिल भारतीय किसान सभा की स्थापना हुई।

    8. तेभागा आंदोलन (Tebhaga Movement, 1946–47)

    बंगाल में "तेभागा" का अर्थ है "तीन हिस्से" — बटाईदार किसानों की माँग थी कि फसल का 2/3 भाग उन्हें मिले, 1/3 जमींदार को।

    1. पृष्ठभूमि: बंगाल में बटाईदार किसान फसल का मात्र 1/2 हिस्सा पाते थे — जमींदार 1/2।

    2. बंगाल प्रांतीय किसान सभा के नेतृत्व में आंदोलन — दिसंबर 1946।

    3. महिला नेतृत्व: इला मित्र ने राजशाही में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

    4. फैलाव: उत्तरी बंगाल के 19 जिलों में — 60 लाख किसान शामिल।

    5. माँग: 2/3 फसल बटाईदार को।

    6. किसानों ने फसल सीधे अपने खलिहान में उठाई — जमींदार के खलिहान में नहीं।

    7. दमन: पुलिस और जमींदारों के लठैतों ने क्रूरता से दबाया।

    8. परिणाम: कांग्रेस सरकार ने बेनामी काश्तकारी एक्ट में सुधार का वादा किया।

    9. तेलंगाना किसान विद्रोह (Telangana Armed Struggle, 1946–51)

    हैदराबाद रियासत के तेलंगाना क्षेत्र में निजाम और स्थानीय जमींदारों (देशमुख/दोरा) के अत्याचार के विरुद्ध कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में किसान सशस्त्र संघर्ष हुआ।

    महत्त्व: तेलंगाना आंदोलन स्वतंत्र भारत में सबसे बड़ा सशस्त्र किसान संघर्ष था। इसने भूमि सुधार की आवश्यकता को उजागर किया। 1956 में आंध्र प्रदेश बनने पर तेलंगाना क्षेत्र उसमें मिला।

    10. बकाश्त आंदोलन (Bakasht Movement, बिहार, 1930–40 का दशक)

    बिहार में जमींदारों ने बकाया लगान के बहाने किसानों की भूमि "बकाश्त" के रूप में जब्त कर ली और उन्हें मजदूर बना दिया।

    11. पुन्नप्रा वयलार विद्रोह (Punnapra-Vayalar, केरल, 1946)

    त्रावणकोर रियासत में अमेरिकन मॉडल पर शासन चलाने की कोशिश के विरुद्ध श्रमिकों और किसानों ने सशस्त्र विद्रोह किया।

    1. दीवान सर सी.पी. रामास्वामी अय्यर की नीतियों के विरुद्ध।

    2. अक्तूबर 1946: नारियल मजदूरों और मछुआरों ने विद्रोह किया।

    3. CPI के नेतृत्व में — लाल झंडे, मार्क्सवादी नारे।

    4. हथियार: लाठी, भाले, देशी हथियार।

    5. दमन: रियासत की पुलिस और सेना ने — सैकड़ों मारे गए।

    6. महत्त्व: केरल में वामपंथी आंदोलन की जड़ें — 1957 में EMS नम्बूदरिपाद के नेतृत्व में पहली कम्युनिस्ट सरकार।

    किसान आंदोलनों की तुलनात्मक तालिका

    आंदोलनवर्षक्षेत्रनेतामुख्य माँगपरिणाम
    नील विद्रोह1859-60बंगालदिगंबर विश्वासनील उगाने से मुक्तिनील कमीशन 1860
    पाबना लीग1873पूर्वी बंगालईशान चंद्र रॉयलगान में राहतबंगाल काश्तकारी एक्ट 1885
    दक्कन दंगे1875पुणे, महाराष्ट्रनेतृत्वहीनऋण पत्र नष्टदक्कन एग्री. रिलीफ 1879
    एका आंदोलन1921-22अवध, UPमदारी पासीबेगारी बंद होआंशिक सफलता
    मोपला विद्रोह1921मालाबार, केरलअली मुसलियारजमींदारी समाप्तदमित — सांप्रदायिक रूप
    बारडोली1928गुजरातसरदार पटेल22% वृद्धि वापसपूर्ण सफलता
    किसान सभा1936अखिल भारतसहजानंद सरस्वतीजमींदारी उन्मूलनसंगठन बना
    तेभागा1946-47बंगालइला मित्र2/3 फसल हिस्साआंशिक — दबाया
    तेलंगाना1946-51हैदराबादCPIभूमि पुनर्वितरण10 लाख एकड़ — फिर दबाया
    बकाश्त1930-40बिहारसहजानंदबकाश्त भूमि वापसजमींदारी उन्मूलन 1950

    EXAM TIP

    UPSC: "बारडोली सत्याग्रह में किसे सरदार कहा गया?" = वल्लभभाई पटेल। "तेभागा आंदोलन किस राज्य में?" = बंगाल। "एका आंदोलन का नेता?" = मदारी पासी। "नील दर्पण के लेखक?" = दीनबंधु मित्र।

    भाग-ख : मजदूर आंदोलन (Labour & Workers Movements)

    औद्योगिकीकरण के साथ भारत में कारखाना मजदूर वर्ग उभरा। ब्रिटिश कारखानों में 12-16 घंटे काम, बाल मजदूरी, न्यूनतम वेतन — ये सब आंदोलन की जमीन तैयार करते थे।

    मजदूरों की दुर्दशा — कारण
    • प्रतिदिन 14-16 घंटे काम — छुट्टी नहीं
    • कम और अनिश्चित वेतन — महिला और बाल मजदूरों से और कम
    • कारखानों में सुरक्षा उपकरण नहीं — दुर्घटनाएँ
    • बेदखली की धमकी — ट्रेड यूनियन बनाने पर सजा
    • छूट (Truck) प्रणाली: नकद वेतन नहीं — कंपनी स्टोर से खरीदारी अनिवार्य
    • महिला मजदूरों का यौन उत्पीड़न
    • श्रम कानूनों का अभाव

    1. प्रारंभिक श्रम कानून (Early Labour Laws)

    कानूनवर्षमुख्य प्रावधान
    प्रथम कारखाना अधिनियम18817 वर्ष से कम बच्चे कारखाने में नहीं; 7-12 साल = 9 घंटे; 100+ मजदूरों वाले कारखाने पर लागू
    द्वितीय कारखाना अधिनियम189114 साल से कम बच्चों पर प्रतिबंध; महिलाओं के 11 घंटे; बंद दिन नियमित करना
    वर्कमेन कम्पेन्सेशन एक्ट1923काम के दौरान दुर्घटना होने पर मुआवजे का अधिकार
    ट्रेड यूनियन्स एक्ट1926ट्रेड यूनियन को कानूनी मान्यता — हड़ताल का अधिकार
    औद्योगिक विवाद अधिनियम1929श्रम विवाद में सरकारी मध्यस्थता का प्रावधान
    तृतीय कारखाना अधिनियम19349 घंटे काम की सीमा; सुरक्षा नियम

    2. AITUC — अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस (1920)

    1920 में बम्बई में अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस (AITUC) की स्थापना हुई — यह भारत का प्रथम राष्ट्रीय ट्रेड यूनियन संगठन था।

    1. स्थापना: 31 अक्तूबर 1920, बम्बई।

    2. प्रथम अध्यक्ष: लाला लाजपत राय।

    3. बाद के अध्यक्ष: C.R. दास, जवाहरलाल नेहरू, सुभाष चंद्र बोस, V.V. गिरि।

    4. AITUC ने ILO (अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन) में भारत का प्रतिनिधित्व किया।

    5. वामपंथ का बढ़ता प्रभाव — कम्युनिस्टों ने AITUC पर पकड़ बनाई।

    6. 1947: स्वतंत्रता के बाद AITUC में विभाजन:

    ► INTUC (Indian National Trade Union Congress) — कांग्रेस समर्थित (1947)

    ► HMS (Hind Mazdoor Sabha) — समाजवादी (1948)

    ► CITU (Centre of Indian Trade Unions) — CPI(M) समर्थित (1970)

    ► BMS (Bharatiya Mazdoor Sangh) — RSS समर्थित (1955)

    3. प्रमुख हड़तालें और आंदोलन

    हड़ताल/आंदोलनवर्षस्थानकारणपरिणाम
    अहमदाबाद मिल हड़ताल1918अहमदाबादप्लेग बोनस समाप्ति; वेतन विवादगांधीजी का उपवास; 35% वृद्धि
    बम्बई मिल हड़ताल1919बम्बईवेतन वृद्धिआंशिक सफलता
    खड्गपुर रेलवे हड़ताल1921खड्गपुरवेतन और कार्य स्थितियाँविफल — दमन
    रेलवे महाहड़ताल1922अखिल भारतअसहयोग; बेहतर वेतन200,000+ मजदूर; विफल
    बम्बई टेक्सटाइल हड़ताल1928-29बम्बईवेतन कटौती विरोध6 महीने — कम्युनिस्ट नेतृत्व
    शोलापुर कपड़ा हड़ताल1930शोलापुरCDM के समर्थन मेंमार्शल लॉ लागू
    मेरठ षड़यंत्र मुकदमा1929-33मेरठ/लखनऊ33 कम्युनिस्ट नेता गिरफ्तारदीर्घ मुकदमा

    4. व्हिटली आयोग / रॉयल श्रम आयोग (1929–31)

    ब्रिटिश सरकार ने 1929 में रॉयल कमीशन ऑन लेबर (व्हिटली कमीशन) नियुक्त किया — भारत में श्रम स्थितियों की जाँच हेतु।

    5. मेरठ षड़यंत्र मुकदमा (Meerut Conspiracy Case, 1929–33)

    1929 में ब्रिटिश सरकार ने 33 श्रमिक और कम्युनिस्ट नेताओं को राजद्रोह और सम्राट के विरुद्ध षड़यंत्र के आरोप में गिरफ्तार किया।

    EXAM TIP

    UPSC: AITUC की स्थापना = 1920; प्रथम अध्यक्ष = लाला लाजपत राय। व्हिटली आयोग = 1929 (रॉयल श्रम आयोग)। बम्बई टेक्सटाइल हड़ताल = 1928-29 (कम्युनिस्ट नेतृत्व)। ट्रेड यूनियन एक्ट = 1926।

    भाग-ग : जनजातीय आंदोलन (Tribal / Adivasi Movements)

    भारत की जनजातियाँ सदियों से वनों में अपनी जीवन-शैली से रहती आई थीं। ब्रिटिश शासन ने वन कानून, राजस्व नीतियाँ और मिशनरी गतिविधियाँ लाकर उनके अस्तित्व को खतरे में डाल दिया। इसीलिए जनजातीय विद्रोह बार-बार भड़के।

    जनजातीय आंदोलनों के सामान्य कारण
    • वन कानून 1865, 1878, 1927 — पारंपरिक वन अधिकार छीने गए
    • भूमि अतिक्रमण — बाहरी लोग (दिकू) जनजातीय जमीन हड़पने लगे
    • साहूकारों का ऋण जाल — 100-200% ब्याज — जमीन गिरवी फिर जब्त
    • बेगारी (Forced Labour) — बिना मजदूरी काम कराना
    • ईसाई मिशनरियों द्वारा धर्मांतरण — जनजातीय संस्कृति खतरे में
    • अंग्रेज और जमींदार मिलकर जनजातियों का दोहरा शोषण
    • परंपरागत न्याय-व्यवस्था का विनाश

    प्रथम चरण के जनजातीय विद्रोह (1795–1860)

    विद्रोहवर्षक्षेत्र/जनजातिनेताकारणमहत्त्व
    तिलका माँझी विद्रोह1778-85संथाल परगना, बिहारतिलका माँझी (जाबरा पहाड़िया)अंग्रेजों का जनजातीय परंपरा में हस्तक्षेपजनजातीय प्रतिरोध का प्रथम उदाहरण
    चुआर विद्रोह1766-1816जंगल महल, बंगालदुर्जन सिंह, माधव सिंहभारी कर, स्थायी बंदोबस्तबंकुड़ा, मिदनापुर में विस्तृत
    भील विद्रोह1817-19पश्चिमी घाट, खानदेशगोविंद गुरु (1913)ब्रिटिश पहाड़ी मार्गों पर नियंत्रणगुजरात, महाराष्ट्र, MP में फैला
    कोल विद्रोह1831-32छोटानागपुर, झारखंडबुद्धो भगतभूमि अधिकार, राजस्व नीतिHo और मुंडा साथ आए
    संथाल विद्रोह1855-56राजमहल पहाड़ियाँसिद्धू-कान्हू मुर्मूजमींदार शोषण, ऋण जाल"हुल" = विद्रोह; 10,000+ मृत
    खोंड विद्रोह1837-56ओडिशा, आंध्रचक्र बिसोईब्रिटिश जनजातीय परंपरा में हस्तक्षेपमानव बलि प्रथा का विरोध

    संथाल विद्रोह (Santhal Rebellion, 1855–56) — विस्तार

    यह भारत के इतिहास में सबसे बड़े जनजातीय विद्रोहों में से एक था। इसे "हुल" (विद्रोह) भी कहा जाता है।

    1. कारण: जमींदार, महाजन और रेलवे ठेकेदारों का शोषण — जमीन छीनना।

    2. ट्रिगर: दिकू (बाहरी) महाजनों द्वारा सिद्धू की बहन के साथ दुर्व्यवहार।

    3. नेता: सिद्धू मुर्मू और कान्हू मुर्मू — भाई।

    4. घोषणा: "ठाकुर जिउ" (ईश्वर) ने हमें लड़ने की आज्ञा दी है।

    5. 30,000+ संथालों ने हथियार उठाए — धनुष-बाण, भाले।

    6. 10 से अधिक जिलों में फैला — भागलपुर से मुर्शिदाबाद तक।

    7. ब्रिटिश सेना ने मार्शल लॉ लगाकर दबाया — सिद्धू-कान्हू मारे गए।

    8. परिणाम: 1856 में संथाल परगना जिला बनाया — कुछ सुरक्षा।

    द्वितीय चरण के जनजातीय विद्रोह (1860–1920)

    विद्रोहवर्षक्षेत्रनेताविशेषता
    हो और मुंडा विद्रोह1820-37सिंहभूम, छोटानागपुरपरहाट के राजा; बिरसा मुंडाखुंटकट्टी प्रणाली की रक्षा
    कोया विद्रोह1879-80पूर्वी गोदावरी, आंध्रतोम्मा दोरापुलिस उत्पीड़न, वन अधिकार; "राजा" का दर्जा
    तना भगत आंदोलन1914-20छोटानागपुर, झारखंडजतरा भगत, बलराम भगतगांधी प्रभावित; अहिंसक; भूत-प्रेत से मुक्ति

    बिरसा मुंडा और उलगुलान (Birsa Munda & Ulgulan, 1899–1900)

    "धरती आबा" (पृथ्वी के पिता) — बिरसा मुंडा झारखंड के महानायक हैं। उनके नेतृत्व में मुंडा जनजाति ने ब्रिटिश शासन और जमींदारों के विरुद्ध "उलगुलान" (महान हलचल / विद्रोह) किया।

    1. जन्म: 1875 — खूँटी जिला, झारखंड (उस समय बिहार)।

    2. बचपन: ईसाई मिशनरी विद्यालय में — परंतु बाद में मुंडा धर्म और संस्कृति की वापसी।

    3. 1895: बिरसा मुंडा को "धर्म-गुरु" माना जाने लगा — "बिरसाइत" आंदोलन।

    4. खुंटकट्टी: मुंडा की संयुक्त जमीन प्रणाली — ब्रिटिश राजस्व नीति ने इसे नष्ट किया।

    5. दिसंबर 1899 – जनवरी 1900: उलगुलान चरम पर — ब्रिटिश थानों और चर्चों पर हमले।

    6. 3 फरवरी 1900: डोमबाड़ी पहाड़ी पर ब्रिटिश सेना ने गोलियाँ चलाईं — सैकड़ों मारे गए।

    7. 9 जून 1900: बिरसा मुंडा की जेल में रहस्यमय मृत्यु — 25 वर्ष की आयु में।

    8. परिणाम: छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम 1908 — मुंडाओं की भूमि की रक्षा।

    विरासत: बिरसा मुंडा झारखंड के राष्ट्रीय नायक हैं। 15 नवंबर (उनका जन्मदिन) झारखंड स्थापना दिवस है। भारत सरकार ने उनकी तस्वीर संसद में लगाई है। "धरती आबा" — पृथ्वी के पिता।

    तृतीय चरण के जनजातीय विद्रोह (1920–1947)

    रम्पा विद्रोह / मान्यम विद्रोह (1922–24)

    आंध्र प्रदेश के गोदावरी एजेंसी में कोया जनजाति ने अल्लूरी सीताराम राजू के नेतृत्व में विद्रोह किया।

    1. कारण: वन अधिकारों पर प्रतिबंध, बेगारी, नए उत्पाद शुल्क (ताड़ी पर)।

    2. नेता: अल्लूरी सीताराम राजू — "मान्यम वीरुडु" (जंगल का योद्धा)।

    3. 1922 में पुलिस थानों पर हमले — हथियार लूटे।

    4. गुरिल्ला युद्ध — जंगलों में ब्रिटिश सेना को चकमा देते रहे।

    5. गांधीजी से प्रेरित — परंतु सशस्त्र।

    6. 1924: राजू पकड़े गए — मई 1924 में फाँसी।

    स्मारक: अल्लूरी सीताराम राजू की 125वीं जयंती पर 2022 में प्रधानमंत्री ने भव्य स्मारक का उद्घाटन किया। 2022 की फिल्म "RRR" में उनका चरित्र दर्शाया गया है।

    रानी गाइडिनलिउ आंदोलन (1930s, मणिपुर)

    नागालैंड/मणिपुर के ज़ेलियांग्रोंग नागा जनजाति की युवा नेत्री रानी गाइडिनलिउ ने हेराका आंदोलन का नेतृत्व किया।

    जनजातीय आंदोलनों का कालक्रम — सम्पूर्ण

    वर्षविद्रोहजनजाति/क्षेत्रनेतामुख्य परिणाम
    1778-85तिलका माँझीसंथाल परगना, बिहारतिलका माँझीप्रथम जनजातीय विद्रोह
    1766-1816चुआर विद्रोहजंगल महल, बंगालदुर्जन सिंहबंकुड़ा, मिदनापुर में दमन
    1817-19भील विद्रोहपश्चिमी घाटगोविंद गुरु (1913 मानगढ़)बार-बार दमित
    1820-37हो और मुंडा विद्रोहसिंहभूमपरहाट राजाकोल विद्रोह की नींव
    1831-32कोल विद्रोहछोटानागपुरबुद्धो भगतदमित — भूमि अधिकार नहीं मिले
    1837-56खोंड विद्रोहओडिशा, आंध्रचक्र बिसोईमानव बलि प्रतिबंध
    1855-56संथाल विद्रोहराजमहल पहाड़ियाँसिद्धू-कान्हूसंथाल परगना जिला 1856
    1879-80कोया विद्रोहपूर्वी गोदावरीतोम्मा दोराअस्थायी "राजा" बने
    1899-1900उलगुलानझारखंड (मुंडा)बिरसा मुंडाCNT Act 1908
    1914-20तना भगतछोटानागपुर (ओराँव)जतरा भगतगांधीवादी प्रभाव
    1917-19कुकी विद्रोहमणिपुरWWI मजदूरी से विरोध
    1922-24रम्पा विद्रोहआंध्र (कोया)अल्लूरी सीताराम राजूस्मारक 2022
    1928-33वार्ली विद्रोहमहाराष्ट्रवन और भूमि अधिकार
    1930sरानी गाइडिनलिउमणिपुर (नागा)रानी गाइडिनलिउ"पहाड़ों की रानी" — नेहरू
    1940sगोंड विद्रोहमध्य भारतजनजातीय एकता

    EXAM TIP

    UPSC: "उलगुलान किसने किया?" = बिरसा मुंडा। "धरती आबा" = बिरसा मुंडा। "संथाल विद्रोह के नेता?" = सिद्धू-कान्हू। "रम्पा विद्रोह के नेता?" = अल्लूरी सीताराम राजू। "पहाड़ों की रानी?" = गाइडिनलिउ। CNT Act कब? = 1908।

    भाग-घ : तुलनात्मक विश्लेषण एवं UPSC हेतु महत्त्वपूर्ण तथ्य

    तीनों आंदोलनों की विशेषताओं की तुलना

    विशेषताकिसान आंदोलनमजदूर आंदोलनजनजातीय आंदोलन
    प्रमुख कारणजमींदारी, कर, नीलकम वेतन, लंबे घंटेवन अधिकार, भूमि
    क्षेत्रग्रामीण भारतशहरी/औद्योगिकवन/पहाड़ी क्षेत्र
    नेतृत्वशिक्षित और किसान मिलेट्रेड यूनियन नेतास्वयं जनजाति से
    तरीकाबहिष्कार, मुकदमेहड़ताल, यूनियनसशस्त्र/आध्यात्मिक
    राष्ट्रीय आंदोलन से संबंधअंतर्जुड़ावआंशिकअलग लेकिन समानांतर
    परिणामकुछ सुधार कानूनश्रम कानूनCNT Act, जमीन कुछ
    ★ KEY POINTS ★
    ✦ नील विद्रोह (1859-60): दिगंबर विश्वास — "नील दर्पण" — दीनबंधु मित्र
    ✦ पाबना लीग (1873): ईशान चंद्र रॉय — बंगाल काश्तकारी एक्ट 1885
    ✦ बारडोली (1928): सरदार पटेल — 22% कर वृद्धि वापस — "सरदार" उपाधि
    ✦ AITUC (1920): लाला लाजपत राय — भारत का प्रथम राष्ट्रीय ट्रेड यूनियन
    ✦ मेरठ षड़यंत्र केस (1929): 33 मजदूर नेता गिरफ्तार — CPI कनेक्शन
    ✦ व्हिटली कमीशन (1929): रॉयल श्रम आयोग — 600+ सिफारिशें
    ✦ बिरसा मुंडा (1899-1900): "धरती आबा" — उलगुलान — CNT Act 1908
    ✦ संथाल विद्रोह (1855-56): सिद्धू-कान्हू — "हुल" — 10,000+ मृत
    ✦ रम्पा विद्रोह (1922-24): अल्लूरी सीताराम राजू — "मान्यम वीरुडु"
    ✦ रानी गाइडिनलिउ (1930s): नागा — "पहाड़ों की रानी" — नेहरू द्वारा उपाधि
    ✦ तेभागा (1946-47): बंगाल — 2/3 फसल माँग — इला मित्र
    ✦ तेलंगाना विद्रोह (1946-51): CPI — सशस्त्र — 10 लाख एकड़ पुनर्वितरण
    ✦ Trade Union Act 1926: यूनियनों को कानूनी मान्यता
    ✦ Factory Act 1881/1891: बाल/महिला मजदूर सुरक्षा का आरंभ
    ✦ INTUC (1947), HMS (1948), BMS (1955), CITU (1970): AITUC के बाद विभाजन
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