भारत में ब्रिटिश शासन के दौरान न केवल शहरी शिक्षित वर्ग ने स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ी, बल्कि गाँवों के किसान, कारखानों के मजदूर और वनों के जनजातीय समुदाय भी ब्रिटिश शोषण के विरुद्ध संघर्षरत रहे। ये आंदोलन अनेक बार राष्ट्रीय आंदोलन से पहले हुए और उसे ऊर्जा दी।
| ★ KEY POINTS ★ |
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| ✦ किसान आंदोलनों के कारण: भूमि राजस्व नीति, जमींदारी उत्पीड़न, नील बागान, ऋण जाल, कर्जा |
| ✦ मजदूर आंदोलनों के कारण: दुर्दशा कारखानों में, लंबे कार्य-घंटे, कम वेतन, बाल मजदूरी |
| ✦ जनजातीय आंदोलनों के कारण: वन कानून, भूमि अधिग्रहण, साहूकार, मिशनरी प्रभाव, बेगारी |
| ✦ AITUC 1920 = अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस = लाला लाजपत राय की अध्यक्षता |
| ✦ बिरसा मुंडा = "धरती आबा" = उलगुलान विद्रोह 1899-1900 = मुंडा जनजाति झारखंड |
| ✦ संथाल विद्रोह 1855-56 = सिद्धू-कान्हू = "हुल" आंदोलन |
| ✦ अखिल भारतीय किसान सभा 1936 = स्थापना: लखनऊ = अध्यक्ष: स्वामी सहजानंद सरस्वती |
भाग-क : किसान आंदोलन (Peasant Movements)
ब्रिटिश भूमि नीतियों — स्थायी बंदोबस्त, रैयतवाड़ी, महालवाड़ी — ने किसानों की स्थिति दयनीय कर दी। जमींदार, महाजन और अंग्रेज बागान मालिक मिलकर किसानों का शोषण करते थे। इसीलिए 18वीं सदी से ही किसान आंदोलन उभरने लगे।
| किसान आंदोलनों के सामान्य कारण |
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बंगाल में यूरोपीय नील बागान मालिक किसानों को बाध्य करते थे कि वे नील उगाएँ — चाहे उन्हें नुकसान हो। इसे "तीन कठिया प्रणाली" कहते थे — 20 में से 3 कट्ठे भूमि पर नील।
1. विद्रोह का आरंभ: 1859 में नील चाषी किसानों ने नदिया और पाबना में एकत्र होकर नील बोने से इनकार किया।
2. प्रमुख नेता: दिगंबर विश्वास और विष्णुचरण विश्वास।
3. संगठन: किसानों ने "मुकद्दमा फंड" बनाया — अदालत में लड़ाई का खर्च।
4. मिशनरी सहायता: रेवरेंड जेम्स लांग ने किसानों का साथ दिया — "नील दर्पण" नाटक का अनुवाद।
5. नील दर्पण: दीनबंधु मित्र ने लिखा — नील किसानों की दुर्दशा — ब्रिटिश शासकों में खलबली।
6. नील कमीशन 1860: ब्रिटिश सरकार ने जाँच के लिए आयोग बनाया — रिपोर्ट में किसानों के पक्ष में निष्कर्ष।
7. परिणाम: बंगाल में नील की जबरन खेती बंद हुई — परंतु बिहार में चलती रही जहाँ 1917 में चंपारण सत्याग्रह हुआ।
महत्त्व: नील विद्रोह भारत में किसान वर्ग के संगठित प्रतिरोध का पहला बड़ा उदाहरण था। यह आंदोलन मुख्यतः शांतिपूर्ण था — मुकदमेबाजी और बहिष्कार का प्रयोग हुआ।
पाबना जिला (पूर्वी बंगाल) में जमींदारों ने स्थायी बंदोबस्त के कानूनी छिद्रों का लाभ उठाकर लगान बढ़ाया और बेदखली की धमकी दी।
महाराष्ट्र के पुणे और अहमदनगर में मराठा किसानों ने साहूकारों के विरुद्ध विद्रोह किया।
1. कारण: 1875 की उपज बर्बादी — लेकिन साहूकारों ने ऋण वसूली जारी रखी — बेदखली।
2. आंदोलन: किसानों ने साहूकारों के "डेबिट बॉन्ड" (ऋण पत्र) छीन लिए और जला दिए।
3. कोई हत्या नहीं — केवल ऋण पत्र नष्ट करना।
4. नेता: प्रमुख रूप से नेतृत्वहीन — सहज जन-विद्रोह।
5. दक्कन एग्रीकल्चरिस्ट रिलीफ एक्ट 1879: सरकार ने इसी के बाद पारित किया — साहूकारों को नियंत्रित करने के लिए।
अवध (उत्तर प्रदेश) में असहयोग आंदोलन के प्रभाव में किसानों ने एका (एकता) का संगल्प लिया।
केरल के मालाबार में मुस्लिम मोपला किसानों (मुख्यतः काश्तकार) और हिंदू जमींदारों (जेनमी) के बीच दीर्घकालीन तनाव था।
1. पृष्ठभूमि: मोपला किसान जेनमी जमींदारों को लगान देते थे — पीढ़ियों से शोषण।
2. खिलाफत आंदोलन और असहयोग ने धार्मिक और राजनीतिक उत्तेजना बढ़ाई।
3. अगस्त 1921: अली मुसलियार के नेतृत्व में हिंसक विद्रोह — ब्रिटिश थाने पर हमला।
4. विद्रोह सांप्रदायिक रूप ले गया — हिंदुओं पर हमले भी हुए।
5. वैगन त्रासदी: 61 कैदी बंद डिब्बे में दम घुटने से मरे — ब्रिटिश क्रूरता।
6. दमन: अक्तूबर 1921 तक ब्रिटिश सेना ने कुचला।
विवाद: मोपला विद्रोह को लेकर इतिहासकारों में मतभेद हैं — कुछ इसे वर्ग-संघर्ष (किसान बनाम जमींदार), कुछ साम्प्रदायिक दंगा कहते हैं। राष्ट्रवादी नेताओं ने इसकी निंदा की।
गुजरात के बारडोली तालुके में सरकार ने भूमि राजस्व में 22% वृद्धि की। किसानों ने इसे अन्यायपूर्ण माना और सत्याग्रह किया।
महत्त्व: बारडोली सत्याग्रह किसान आंदोलन और राष्ट्रीय आंदोलन के सफल समन्वय का उदाहरण है। वल्लभभाई पटेल को "सरदार" उपाधि बारडोली की महिला किसानों ने दी।
राष्ट्रीय आंदोलन के मध्य में किसानों के हितों की रक्षा और संगठन के लिए 1936 में लखनऊ में अखिल भारतीय किसान सभा की स्थापना हुई।
बंगाल में "तेभागा" का अर्थ है "तीन हिस्से" — बटाईदार किसानों की माँग थी कि फसल का 2/3 भाग उन्हें मिले, 1/3 जमींदार को।
1. पृष्ठभूमि: बंगाल में बटाईदार किसान फसल का मात्र 1/2 हिस्सा पाते थे — जमींदार 1/2।
2. बंगाल प्रांतीय किसान सभा के नेतृत्व में आंदोलन — दिसंबर 1946।
3. महिला नेतृत्व: इला मित्र ने राजशाही में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
4. फैलाव: उत्तरी बंगाल के 19 जिलों में — 60 लाख किसान शामिल।
5. माँग: 2/3 फसल बटाईदार को।
6. किसानों ने फसल सीधे अपने खलिहान में उठाई — जमींदार के खलिहान में नहीं।
7. दमन: पुलिस और जमींदारों के लठैतों ने क्रूरता से दबाया।
8. परिणाम: कांग्रेस सरकार ने बेनामी काश्तकारी एक्ट में सुधार का वादा किया।
हैदराबाद रियासत के तेलंगाना क्षेत्र में निजाम और स्थानीय जमींदारों (देशमुख/दोरा) के अत्याचार के विरुद्ध कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में किसान सशस्त्र संघर्ष हुआ।
महत्त्व: तेलंगाना आंदोलन स्वतंत्र भारत में सबसे बड़ा सशस्त्र किसान संघर्ष था। इसने भूमि सुधार की आवश्यकता को उजागर किया। 1956 में आंध्र प्रदेश बनने पर तेलंगाना क्षेत्र उसमें मिला।
बिहार में जमींदारों ने बकाया लगान के बहाने किसानों की भूमि "बकाश्त" के रूप में जब्त कर ली और उन्हें मजदूर बना दिया।
त्रावणकोर रियासत में अमेरिकन मॉडल पर शासन चलाने की कोशिश के विरुद्ध श्रमिकों और किसानों ने सशस्त्र विद्रोह किया।
1. दीवान सर सी.पी. रामास्वामी अय्यर की नीतियों के विरुद्ध।
2. अक्तूबर 1946: नारियल मजदूरों और मछुआरों ने विद्रोह किया।
3. CPI के नेतृत्व में — लाल झंडे, मार्क्सवादी नारे।
4. हथियार: लाठी, भाले, देशी हथियार।
5. दमन: रियासत की पुलिस और सेना ने — सैकड़ों मारे गए।
6. महत्त्व: केरल में वामपंथी आंदोलन की जड़ें — 1957 में EMS नम्बूदरिपाद के नेतृत्व में पहली कम्युनिस्ट सरकार।
| आंदोलन | वर्ष | क्षेत्र | नेता | मुख्य माँग | परिणाम |
|---|---|---|---|---|---|
| नील विद्रोह | 1859-60 | बंगाल | दिगंबर विश्वास | नील उगाने से मुक्ति | नील कमीशन 1860 |
| पाबना लीग | 1873 | पूर्वी बंगाल | ईशान चंद्र रॉय | लगान में राहत | बंगाल काश्तकारी एक्ट 1885 |
| दक्कन दंगे | 1875 | पुणे, महाराष्ट्र | नेतृत्वहीन | ऋण पत्र नष्ट | दक्कन एग्री. रिलीफ 1879 |
| एका आंदोलन | 1921-22 | अवध, UP | मदारी पासी | बेगारी बंद हो | आंशिक सफलता |
| मोपला विद्रोह | 1921 | मालाबार, केरल | अली मुसलियार | जमींदारी समाप्त | दमित — सांप्रदायिक रूप |
| बारडोली | 1928 | गुजरात | सरदार पटेल | 22% वृद्धि वापस | पूर्ण सफलता |
| किसान सभा | 1936 | अखिल भारत | सहजानंद सरस्वती | जमींदारी उन्मूलन | संगठन बना |
| तेभागा | 1946-47 | बंगाल | इला मित्र | 2/3 फसल हिस्सा | आंशिक — दबाया |
| तेलंगाना | 1946-51 | हैदराबाद | CPI | भूमि पुनर्वितरण | 10 लाख एकड़ — फिर दबाया |
| बकाश्त | 1930-40 | बिहार | सहजानंद | बकाश्त भूमि वापस | जमींदारी उन्मूलन 1950 |
EXAM TIP
UPSC: "बारडोली सत्याग्रह में किसे सरदार कहा गया?" = वल्लभभाई पटेल। "तेभागा आंदोलन किस राज्य में?" = बंगाल। "एका आंदोलन का नेता?" = मदारी पासी। "नील दर्पण के लेखक?" = दीनबंधु मित्र।
भाग-ख : मजदूर आंदोलन (Labour & Workers Movements)
औद्योगिकीकरण के साथ भारत में कारखाना मजदूर वर्ग उभरा। ब्रिटिश कारखानों में 12-16 घंटे काम, बाल मजदूरी, न्यूनतम वेतन — ये सब आंदोलन की जमीन तैयार करते थे।
| मजदूरों की दुर्दशा — कारण |
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| कानून | वर्ष | मुख्य प्रावधान |
|---|---|---|
| प्रथम कारखाना अधिनियम | 1881 | 7 वर्ष से कम बच्चे कारखाने में नहीं; 7-12 साल = 9 घंटे; 100+ मजदूरों वाले कारखाने पर लागू |
| द्वितीय कारखाना अधिनियम | 1891 | 14 साल से कम बच्चों पर प्रतिबंध; महिलाओं के 11 घंटे; बंद दिन नियमित करना |
| वर्कमेन कम्पेन्सेशन एक्ट | 1923 | काम के दौरान दुर्घटना होने पर मुआवजे का अधिकार |
| ट्रेड यूनियन्स एक्ट | 1926 | ट्रेड यूनियन को कानूनी मान्यता — हड़ताल का अधिकार |
| औद्योगिक विवाद अधिनियम | 1929 | श्रम विवाद में सरकारी मध्यस्थता का प्रावधान |
| तृतीय कारखाना अधिनियम | 1934 | 9 घंटे काम की सीमा; सुरक्षा नियम |
1920 में बम्बई में अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस (AITUC) की स्थापना हुई — यह भारत का प्रथम राष्ट्रीय ट्रेड यूनियन संगठन था।
1. स्थापना: 31 अक्तूबर 1920, बम्बई।
2. प्रथम अध्यक्ष: लाला लाजपत राय।
3. बाद के अध्यक्ष: C.R. दास, जवाहरलाल नेहरू, सुभाष चंद्र बोस, V.V. गिरि।
4. AITUC ने ILO (अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन) में भारत का प्रतिनिधित्व किया।
5. वामपंथ का बढ़ता प्रभाव — कम्युनिस्टों ने AITUC पर पकड़ बनाई।
6. 1947: स्वतंत्रता के बाद AITUC में विभाजन:
► INTUC (Indian National Trade Union Congress) — कांग्रेस समर्थित (1947)
► HMS (Hind Mazdoor Sabha) — समाजवादी (1948)
► CITU (Centre of Indian Trade Unions) — CPI(M) समर्थित (1970)
► BMS (Bharatiya Mazdoor Sangh) — RSS समर्थित (1955)
| हड़ताल/आंदोलन | वर्ष | स्थान | कारण | परिणाम |
|---|---|---|---|---|
| अहमदाबाद मिल हड़ताल | 1918 | अहमदाबाद | प्लेग बोनस समाप्ति; वेतन विवाद | गांधीजी का उपवास; 35% वृद्धि |
| बम्बई मिल हड़ताल | 1919 | बम्बई | वेतन वृद्धि | आंशिक सफलता |
| खड्गपुर रेलवे हड़ताल | 1921 | खड्गपुर | वेतन और कार्य स्थितियाँ | विफल — दमन |
| रेलवे महाहड़ताल | 1922 | अखिल भारत | असहयोग; बेहतर वेतन | 200,000+ मजदूर; विफल |
| बम्बई टेक्सटाइल हड़ताल | 1928-29 | बम्बई | वेतन कटौती विरोध | 6 महीने — कम्युनिस्ट नेतृत्व |
| शोलापुर कपड़ा हड़ताल | 1930 | शोलापुर | CDM के समर्थन में | मार्शल लॉ लागू |
| मेरठ षड़यंत्र मुकदमा | 1929-33 | मेरठ/लखनऊ | 33 कम्युनिस्ट नेता गिरफ्तार | दीर्घ मुकदमा |
ब्रिटिश सरकार ने 1929 में रॉयल कमीशन ऑन लेबर (व्हिटली कमीशन) नियुक्त किया — भारत में श्रम स्थितियों की जाँच हेतु।
1929 में ब्रिटिश सरकार ने 33 श्रमिक और कम्युनिस्ट नेताओं को राजद्रोह और सम्राट के विरुद्ध षड़यंत्र के आरोप में गिरफ्तार किया।
EXAM TIP
UPSC: AITUC की स्थापना = 1920; प्रथम अध्यक्ष = लाला लाजपत राय। व्हिटली आयोग = 1929 (रॉयल श्रम आयोग)। बम्बई टेक्सटाइल हड़ताल = 1928-29 (कम्युनिस्ट नेतृत्व)। ट्रेड यूनियन एक्ट = 1926।
भाग-ग : जनजातीय आंदोलन (Tribal / Adivasi Movements)
भारत की जनजातियाँ सदियों से वनों में अपनी जीवन-शैली से रहती आई थीं। ब्रिटिश शासन ने वन कानून, राजस्व नीतियाँ और मिशनरी गतिविधियाँ लाकर उनके अस्तित्व को खतरे में डाल दिया। इसीलिए जनजातीय विद्रोह बार-बार भड़के।
| जनजातीय आंदोलनों के सामान्य कारण |
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| विद्रोह | वर्ष | क्षेत्र/जनजाति | नेता | कारण | महत्त्व |
|---|---|---|---|---|---|
| तिलका माँझी विद्रोह | 1778-85 | संथाल परगना, बिहार | तिलका माँझी (जाबरा पहाड़िया) | अंग्रेजों का जनजातीय परंपरा में हस्तक्षेप | जनजातीय प्रतिरोध का प्रथम उदाहरण |
| चुआर विद्रोह | 1766-1816 | जंगल महल, बंगाल | दुर्जन सिंह, माधव सिंह | भारी कर, स्थायी बंदोबस्त | बंकुड़ा, मिदनापुर में विस्तृत |
| भील विद्रोह | 1817-19 | पश्चिमी घाट, खानदेश | गोविंद गुरु (1913) | ब्रिटिश पहाड़ी मार्गों पर नियंत्रण | गुजरात, महाराष्ट्र, MP में फैला |
| कोल विद्रोह | 1831-32 | छोटानागपुर, झारखंड | बुद्धो भगत | भूमि अधिकार, राजस्व नीति | Ho और मुंडा साथ आए |
| संथाल विद्रोह | 1855-56 | राजमहल पहाड़ियाँ | सिद्धू-कान्हू मुर्मू | जमींदार शोषण, ऋण जाल | "हुल" = विद्रोह; 10,000+ मृत |
| खोंड विद्रोह | 1837-56 | ओडिशा, आंध्र | चक्र बिसोई | ब्रिटिश जनजातीय परंपरा में हस्तक्षेप | मानव बलि प्रथा का विरोध |
यह भारत के इतिहास में सबसे बड़े जनजातीय विद्रोहों में से एक था। इसे "हुल" (विद्रोह) भी कहा जाता है।
1. कारण: जमींदार, महाजन और रेलवे ठेकेदारों का शोषण — जमीन छीनना।
2. ट्रिगर: दिकू (बाहरी) महाजनों द्वारा सिद्धू की बहन के साथ दुर्व्यवहार।
3. नेता: सिद्धू मुर्मू और कान्हू मुर्मू — भाई।
4. घोषणा: "ठाकुर जिउ" (ईश्वर) ने हमें लड़ने की आज्ञा दी है।
5. 30,000+ संथालों ने हथियार उठाए — धनुष-बाण, भाले।
6. 10 से अधिक जिलों में फैला — भागलपुर से मुर्शिदाबाद तक।
7. ब्रिटिश सेना ने मार्शल लॉ लगाकर दबाया — सिद्धू-कान्हू मारे गए।
8. परिणाम: 1856 में संथाल परगना जिला बनाया — कुछ सुरक्षा।
| विद्रोह | वर्ष | क्षेत्र | नेता | विशेषता |
|---|---|---|---|---|
| हो और मुंडा विद्रोह | 1820-37 | सिंहभूम, छोटानागपुर | परहाट के राजा; बिरसा मुंडा | खुंटकट्टी प्रणाली की रक्षा |
| कोया विद्रोह | 1879-80 | पूर्वी गोदावरी, आंध्र | तोम्मा दोरा | पुलिस उत्पीड़न, वन अधिकार; "राजा" का दर्जा |
| तना भगत आंदोलन | 1914-20 | छोटानागपुर, झारखंड | जतरा भगत, बलराम भगत | गांधी प्रभावित; अहिंसक; भूत-प्रेत से मुक्ति |
"धरती आबा" (पृथ्वी के पिता) — बिरसा मुंडा झारखंड के महानायक हैं। उनके नेतृत्व में मुंडा जनजाति ने ब्रिटिश शासन और जमींदारों के विरुद्ध "उलगुलान" (महान हलचल / विद्रोह) किया।
1. जन्म: 1875 — खूँटी जिला, झारखंड (उस समय बिहार)।
2. बचपन: ईसाई मिशनरी विद्यालय में — परंतु बाद में मुंडा धर्म और संस्कृति की वापसी।
3. 1895: बिरसा मुंडा को "धर्म-गुरु" माना जाने लगा — "बिरसाइत" आंदोलन।
4. खुंटकट्टी: मुंडा की संयुक्त जमीन प्रणाली — ब्रिटिश राजस्व नीति ने इसे नष्ट किया।
5. दिसंबर 1899 – जनवरी 1900: उलगुलान चरम पर — ब्रिटिश थानों और चर्चों पर हमले।
6. 3 फरवरी 1900: डोमबाड़ी पहाड़ी पर ब्रिटिश सेना ने गोलियाँ चलाईं — सैकड़ों मारे गए।
7. 9 जून 1900: बिरसा मुंडा की जेल में रहस्यमय मृत्यु — 25 वर्ष की आयु में।
8. परिणाम: छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम 1908 — मुंडाओं की भूमि की रक्षा।
विरासत: बिरसा मुंडा झारखंड के राष्ट्रीय नायक हैं। 15 नवंबर (उनका जन्मदिन) झारखंड स्थापना दिवस है। भारत सरकार ने उनकी तस्वीर संसद में लगाई है। "धरती आबा" — पृथ्वी के पिता।
रम्पा विद्रोह / मान्यम विद्रोह (1922–24)
आंध्र प्रदेश के गोदावरी एजेंसी में कोया जनजाति ने अल्लूरी सीताराम राजू के नेतृत्व में विद्रोह किया।
1. कारण: वन अधिकारों पर प्रतिबंध, बेगारी, नए उत्पाद शुल्क (ताड़ी पर)।
2. नेता: अल्लूरी सीताराम राजू — "मान्यम वीरुडु" (जंगल का योद्धा)।
3. 1922 में पुलिस थानों पर हमले — हथियार लूटे।
4. गुरिल्ला युद्ध — जंगलों में ब्रिटिश सेना को चकमा देते रहे।
5. गांधीजी से प्रेरित — परंतु सशस्त्र।
6. 1924: राजू पकड़े गए — मई 1924 में फाँसी।
स्मारक: अल्लूरी सीताराम राजू की 125वीं जयंती पर 2022 में प्रधानमंत्री ने भव्य स्मारक का उद्घाटन किया। 2022 की फिल्म "RRR" में उनका चरित्र दर्शाया गया है।
रानी गाइडिनलिउ आंदोलन (1930s, मणिपुर)
नागालैंड/मणिपुर के ज़ेलियांग्रोंग नागा जनजाति की युवा नेत्री रानी गाइडिनलिउ ने हेराका आंदोलन का नेतृत्व किया।
| वर्ष | विद्रोह | जनजाति/क्षेत्र | नेता | मुख्य परिणाम |
|---|---|---|---|---|
| 1778-85 | तिलका माँझी | संथाल परगना, बिहार | तिलका माँझी | प्रथम जनजातीय विद्रोह |
| 1766-1816 | चुआर विद्रोह | जंगल महल, बंगाल | दुर्जन सिंह | बंकुड़ा, मिदनापुर में दमन |
| 1817-19 | भील विद्रोह | पश्चिमी घाट | गोविंद गुरु (1913 मानगढ़) | बार-बार दमित |
| 1820-37 | हो और मुंडा विद्रोह | सिंहभूम | परहाट राजा | कोल विद्रोह की नींव |
| 1831-32 | कोल विद्रोह | छोटानागपुर | बुद्धो भगत | दमित — भूमि अधिकार नहीं मिले |
| 1837-56 | खोंड विद्रोह | ओडिशा, आंध्र | चक्र बिसोई | मानव बलि प्रतिबंध |
| 1855-56 | संथाल विद्रोह | राजमहल पहाड़ियाँ | सिद्धू-कान्हू | संथाल परगना जिला 1856 |
| 1879-80 | कोया विद्रोह | पूर्वी गोदावरी | तोम्मा दोरा | अस्थायी "राजा" बने |
| 1899-1900 | उलगुलान | झारखंड (मुंडा) | बिरसा मुंडा | CNT Act 1908 |
| 1914-20 | तना भगत | छोटानागपुर (ओराँव) | जतरा भगत | गांधीवादी प्रभाव |
| 1917-19 | कुकी विद्रोह | मणिपुर | — | WWI मजदूरी से विरोध |
| 1922-24 | रम्पा विद्रोह | आंध्र (कोया) | अल्लूरी सीताराम राजू | स्मारक 2022 |
| 1928-33 | वार्ली विद्रोह | महाराष्ट्र | — | वन और भूमि अधिकार |
| 1930s | रानी गाइडिनलिउ | मणिपुर (नागा) | रानी गाइडिनलिउ | "पहाड़ों की रानी" — नेहरू |
| 1940s | गोंड विद्रोह | मध्य भारत | — | जनजातीय एकता |
EXAM TIP
UPSC: "उलगुलान किसने किया?" = बिरसा मुंडा। "धरती आबा" = बिरसा मुंडा। "संथाल विद्रोह के नेता?" = सिद्धू-कान्हू। "रम्पा विद्रोह के नेता?" = अल्लूरी सीताराम राजू। "पहाड़ों की रानी?" = गाइडिनलिउ। CNT Act कब? = 1908।
भाग-घ : तुलनात्मक विश्लेषण एवं UPSC हेतु महत्त्वपूर्ण तथ्य
| विशेषता | किसान आंदोलन | मजदूर आंदोलन | जनजातीय आंदोलन |
|---|---|---|---|
| प्रमुख कारण | जमींदारी, कर, नील | कम वेतन, लंबे घंटे | वन अधिकार, भूमि |
| क्षेत्र | ग्रामीण भारत | शहरी/औद्योगिक | वन/पहाड़ी क्षेत्र |
| नेतृत्व | शिक्षित और किसान मिले | ट्रेड यूनियन नेता | स्वयं जनजाति से |
| तरीका | बहिष्कार, मुकदमे | हड़ताल, यूनियन | सशस्त्र/आध्यात्मिक |
| राष्ट्रीय आंदोलन से संबंध | अंतर्जुड़ाव | आंशिक | अलग लेकिन समानांतर |
| परिणाम | कुछ सुधार कानून | श्रम कानून | CNT Act, जमीन कुछ |
| ★ KEY POINTS ★ |
|---|
| ✦ नील विद्रोह (1859-60): दिगंबर विश्वास — "नील दर्पण" — दीनबंधु मित्र |
| ✦ पाबना लीग (1873): ईशान चंद्र रॉय — बंगाल काश्तकारी एक्ट 1885 |
| ✦ बारडोली (1928): सरदार पटेल — 22% कर वृद्धि वापस — "सरदार" उपाधि |
| ✦ AITUC (1920): लाला लाजपत राय — भारत का प्रथम राष्ट्रीय ट्रेड यूनियन |
| ✦ मेरठ षड़यंत्र केस (1929): 33 मजदूर नेता गिरफ्तार — CPI कनेक्शन |
| ✦ व्हिटली कमीशन (1929): रॉयल श्रम आयोग — 600+ सिफारिशें |
| ✦ बिरसा मुंडा (1899-1900): "धरती आबा" — उलगुलान — CNT Act 1908 |
| ✦ संथाल विद्रोह (1855-56): सिद्धू-कान्हू — "हुल" — 10,000+ मृत |
| ✦ रम्पा विद्रोह (1922-24): अल्लूरी सीताराम राजू — "मान्यम वीरुडु" |
| ✦ रानी गाइडिनलिउ (1930s): नागा — "पहाड़ों की रानी" — नेहरू द्वारा उपाधि |
| ✦ तेभागा (1946-47): बंगाल — 2/3 फसल माँग — इला मित्र |
| ✦ तेलंगाना विद्रोह (1946-51): CPI — सशस्त्र — 10 लाख एकड़ पुनर्वितरण |
| ✦ Trade Union Act 1926: यूनियनों को कानूनी मान्यता |
| ✦ Factory Act 1881/1891: बाल/महिला मजदूर सुरक्षा का आरंभ |
| ✦ INTUC (1947), HMS (1948), BMS (1955), CITU (1970): AITUC के बाद विभाजन |