📖 अध्याय 10/20 — आधुनिक भारत का इतिहास

भारतीय राष्ट्रवाद का उदय और कांग्रेस (1885–1919)

राष्ट्रवाद के कारण, कांग्रेस से पूर्व की संस्थाएँ, कांग्रेस की स्थापना, नरम दल, गरम दल, कर्ज़न और बंगाल विभाजन, स्वदेशी आंदोलन, मुस्लिम लीग, सूरत विभाजन, होमरूल आंदोलन और लखनऊ समझौता
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🪢 कहानी से शुरुआत: जब पूरे बंगाल ने राखी बाँधी

जुलाई 1905। वायसराय कर्ज़न की सरकार ने बंगाल को बाँटने की घोषणा कर दी। कारण “प्रशासनिक सुविधा” बताया गया, पर गृह सचिव रिज़्ले की गोपनीय टिप्पणी में साफ़ लिखा था कि एकजुट बंगाल एक शक्ति है और उसे बाँटकर शासन-विरोधियों को कमज़ोर करना ही मुख्य उद्देश्य है। 7 अगस्त 1905 को कलकत्ता के टाउन हॉल की विशाल सभा में विदेशी माल के बहिष्कार का प्रस्ताव पारित हुआ।

16 अक्टूबर 1905, कलकत्ता। आज से बंगाल सरकारी तौर पर दो टुकड़ों में बँट गया था। पर शहर में न चूल्हे जले, न दुकानें खुलीं। भोर होते ही हज़ारों लोग नंगे पैर “वंदे मातरम्” गाते हुए गंगा स्नान को निकल पड़े।

जुलूस के आगे थे रवींद्रनाथ टैगोर। उनके आह्वान पर हिंदू और मुसलमानों ने एक-दूसरे की कलाइयों पर राखी बाँधी, यह बताने के लिए कि सरकार नक़्शे पर लकीर खींच सकती है, दिलों पर नहीं। गलियों में उनका नया गीत “आमार सोनार बांग्ला” गूँज रहा था।

दोपहर को वृद्ध नेता आनंद मोहन बोस ने अखंड बंगाल के प्रतीक फ़ेडरेशन हॉल की नींव रखी। लगभग 50,000 लोगों की सभा में उन्होंने कहा कि बंगाल एक है और एक रहेगा।

बीस साल पहले 72 प्रतिनिधियों की एक शांत सभा से शुरू हुई कांग्रेस अब जन-आंदोलन की ओर बढ़ रही थी। याचिकाओं से भरोसा टूटा तो बहिष्कार और स्वदेशी क्यों अपनाए गए? कांग्रेस के भीतर नरम और गरम दल क्यों टकराए? सूरत में पार्टी क्यों टूटी? और मुस्लिम लीग और लखनऊ समझौते ने राजनीति को कहाँ मोड़ा?

यही इस अध्याय की कहानी है, याचिका से स्वराज तक की यात्रा। आगे दो कहानियाँ भी मिलेंगी, जो कांग्रेस के जन्म और सूरत की फूट की मूल बात समझा देंगी।

📑 इस अध्याय में क्या-क्या पढ़ेंगे

01. भूमिका: राष्ट्रवाद का अर्थ और उसके उदय के कारण

02. कांग्रेस से पूर्व की राजनीतिक संस्थाएँ (1836–1885)

03. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना (1885) और उससे जुड़े मत

04. नरम दल / उदारवादी चरण (1885–1905) — नेता, माँगें, तरीक़े, मूल्यांकन

05. कांग्रेस के प्रति ब्रिटिश रवैया और गरम दल का उदय — लाल-बाल-पाल और अरविंद

06. लॉर्ड कर्ज़न की नीतियाँ और बंगाल विभाजन (1905)

07. स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलन (1905–1911)

08. मुस्लिम लीग (1906) और मार्ले-मिंटो सुधार (1909)

09. सूरत विभाजन (1907) और सरकारी दमन

10. प्रथम विश्वयुद्ध, होमरूल आंदोलन और लखनऊ समझौता (1916)

11. कांग्रेस के प्रमुख अधिवेशन (1885–1920)

12. मूल्यांकन, कालक्रम और सार

1. भूमिका: राष्ट्रवाद का उदय

1857 का महाविद्रोह पुरानी सत्ता को लौटाने का अंतिम बड़ा प्रयास था। उसके बाद प्रतिरोध का रूप बदल गया। अब नेतृत्व अंग्रेज़ी पढ़े-लिखे वकीलों, शिक्षकों, पत्रकारों और डॉक्टरों के हाथ में आया, जो तलवार के बजाय सभाओं, अख़बारों और संगठनों के सहारे "भारत की जनता" के नाम पर बोलने लगे। इन्होंने एक बुनियादी प्रश्न उठाया — यह देश किसका है? इसका उत्तर यह उभरा कि भारत यहाँ रहने वाले हर वर्ग, जाति, धर्म, भाषा और लिंग के लोगों का है, और जब तक अंग्रेज़ इसके संसाधनों और जीवन पर नियंत्रण रखेंगे, तब तक भारत सही अर्थों में भारतीयों का नहीं हो सकता।

🔍 आसान परिभाषा: राष्ट्रवाद और संप्रभुता

📘 परिभाषा: राष्ट्रवाद — एक भू-भाग के लोगों में साझा इतिहास, साझा हित और साझा भविष्य की भावना, जिसके कारण वे स्वयं को एक राष्ट्र मानते हैं। संप्रभुता — बाहरी हस्तक्षेप के बिना अपने निर्णय स्वयं लेने की क्षमता; यह आधुनिक राष्ट्रवाद का मूल तत्त्व है।

💡 आसान भाषा में: "हम सब एक हैं, और अपने मामलों का फ़ैसला हम ख़ुद करेंगे" — यही भावना राष्ट्रवाद है। 🏠 उदाहरण: 1870–80 के दशक के संगठन स्वयं को किसी एक क्षेत्र या वर्ग का नहीं, बल्कि पूरी भारतीय जनता का प्रतिनिधि बताते थे — जैसे "पूना सार्वजनिक सभा" (सार्वजनिक = सबके लिए)।

🧭 राष्ट्रवाद के उदय के प्रमुख कारण

नीचे के आरेख में वे आठ बड़ी शक्तियाँ दिखाई गई हैं जिन्होंने मिलकर भारतीयों को "एक राष्ट्र" के रूप में सोचने के लिए तैयार किया। आरेख केवल याद रखने के लिए है; उसके बाद हर कारण को अलग-अलग समझाया गया है।

चित्र 10.1: भारतीय राष्ट्रवाद के उदय के कारण — एक दृष्टि में
चित्र 10.1: भारतीय राष्ट्रवाद के उदय के कारण — एक दृष्टि में

(1) औपनिवेशिक शोषण की समझ

भारतीयों ने धीरे-धीरे समझा कि अंग्रेज़ी शासन से लगभग हर वर्ग को नुक़सान हो रहा है। किसान भारी लगान और साहूकारों के कर्ज़ में दबा था, और बार-बार पड़ने वाले अकालों में लाखों लोग मरते थे। कारीगर — विशेषकर बुनकर — मशीन से बने सस्ते ब्रिटिश कपड़े के कारण बेरोज़गार हो गए; इसे विऔद्योगीकरण कहा गया। व्यापारी और उद्योगपति देखते थे कि सरकार की शुल्क-नीति ब्रिटिश उद्योगों के हित में बनती है। शिक्षित वर्ग को ऊँची नौकरियाँ नहीं मिलती थीं। इस तरह सबके हित ब्रिटिश हितों से टकराए, और यही साझा पीड़ा साझा राष्ट्रीय भावना का आधार बनी। इस शोषण को सबसे स्पष्ट भाषा दादाभाई नौरोजी के धन-निष्कासन सिद्धांत ने दी।

🔍 आसान परिभाषा: धन-निष्कासन (धन का निकास)

📘 परिभाषा: भारत की राष्ट्रीय संपत्ति और उत्पादन का वह भाग, जो बदले में कोई आर्थिक लाभ दिए बिना इंग्लैंड भेज दिया जाता था — जैसे अंग्रेज़ अधिकारियों के वेतन-पेंशन, भारत सचिव के कार्यालय का ख़र्च (गृह-शुल्क), ब्रिटिश पूँजी पर ब्याज और मुनाफ़ा। दादाभाई नौरोजी ने इसे अपनी पुस्तक "पावर्टी एंड अन-ब्रिटिश रूल इन इंडिया" (भारत में ग़रीबी और अब्रिटिश शासन, 1901) में विस्तार से समझाया।

💡 आसान भाषा में: जैसे किसी घर की कमाई का बड़ा हिस्सा हर महीने किसी बाहरी व्यक्ति को "किराए" के नाम पर चला जाए और बदले में घर को कुछ न मिले — तो वह घर कितना भी कमाए, ग़रीब ही रहेगा। 🏠 उदाहरण: नौरोजी के अनुसार भारत की ग़रीबी का मूल कारण यही निकास था। आर. सी. दत्त ("भारत का आर्थिक इतिहास") और एम. जी. रानाडे ने भी इसी आर्थिक आलोचना को आगे बढ़ाया।

(2) प्रशासनिक और आर्थिक एकीकरण

अंग्रेज़ों ने अपने शासन की सुविधा के लिए पूरे देश में एक जैसा प्रशासन, एक जैसे क़ानून और एक मुद्रा लागू की। रेल, डाक और तार का जाल बिछाया गया ताकि सेना और माल तेज़ी से पहुँच सकें। पर इसका एक अनचाहा परिणाम हुआ — अब बंगाल, बम्बई, मद्रास और पंजाब के लोग एक-दूसरे से मिल सकते थे, पत्र लिख सकते थे और सम्मेलनों में इकट्ठा हो सकते थे। इसलिए विचार और नेता पूरे देश में फैलने लगे और लोगों को अनुभव हुआ कि उनकी समस्याएँ एक जैसी हैं।

(3) पश्चिमी शिक्षा और विचार

अंग्रेज़ी शिक्षा का उद्देश्य सरकार के लिए क्लर्क तैयार करना था, पर उसने भारतीयों को मिल, बर्क, रूसो, बेंथम, मैज़िनी और गैरीबाल्डी जैसे विचारकों से भी परिचित कराया। इनसे स्वतंत्रता, समानता, लोकतंत्र और राष्ट्रीयता के विचार आए। शिक्षित भारतीयों ने प्रश्न किया कि जो अधिकार अंग्रेज़ अपने लिए उचित मानते हैं, वे भारतीयों को क्यों नहीं मिलते। साथ ही अंग्रेज़ी अलग-अलग भाषाएँ बोलने वाले प्रांतों के नेताओं के बीच साझा भाषा बन गई। इसी शिक्षा से वकील, शिक्षक और पत्रकारों का वह नया मध्यम वर्ग बना जिसने राष्ट्रीय आंदोलन का नेतृत्व किया।

(4) प्रेस और साहित्य

उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में भारतीय भाषाओं और अंग्रेज़ी में अनेक समाचारपत्र निकले — जैसे संवाद कौमुदी, सोमप्रकाश, हिंदू पैट्रियट, अमृत बाज़ार पत्रिका, बंगाली, केसरी, मराठा और द हिंदू। ये अख़बार सरकारी नीतियों की आलोचना करते थे और दूर-दराज़ के पाठकों तक राजनीतिक विचार पहुँचाते थे। साहित्य ने भावनाएँ जगाईं — बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास "आनंदमठ" से "वंदे मातरम्" गीत निकला, दीनबंधु मित्र के नाटक "नील दर्पण" ने नील किसानों का दर्द दिखाया और भारतेंदु हरिश्चंद्र के नाटक "भारत दुर्दशा" (1876) ने देश की ग़रीबी पर करुण प्रश्न उठाए। उर्दू में अल्ताफ़ हुसैन हाली और मराठी में विष्णु शास्त्री चिपलूणकर ने भी यही काम किया (विस्तार अध्याय 5 में)।

(5) अतीत की पुनर्खोज

अंग्रेज़ अधिकारी प्रायः प्रचार करते थे कि भारतीय असभ्य हैं और स्वयं शासन चलाने के योग्य नहीं। इसके उत्तर में मैक्स मूलर, मोनियर विलियम्स जैसे प्राच्यविदों ने संस्कृत ग्रंथों का अध्ययन कर भारत की प्राचीन सभ्यता की महानता दिखाई; पुरातत्व की खोजों ने गौरवशाली अतीत के प्रमाण दिए; और आर. जी. भंडारकर तथा स्वामी विवेकानंद जैसे भारतीयों ने अपनी संस्कृति पर गर्व करना सिखाया। इसका परिणाम यह हुआ कि शिक्षित भारतीयों में आत्मविश्वास लौटा और वे मानने लगे कि जो देश इतना महान रहा है, वह फिर से स्वतंत्र और समृद्ध हो सकता है।

(6) सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन

ब्रह्म समाज, आर्य समाज, प्रार्थना समाज, रामकृष्ण मिशन और सिंह सभा जैसे आंदोलनों ने अंधविश्वास और कुप्रथाओं पर आघात के साथ-साथ तर्क, आत्मसम्मान और एकता का संदेश दिया। उन्होंने सिखाया कि भारतीय समाज अपनी कमियाँ स्वयं सुधार सकता है। इसलिए इन आंदोलनों को राजनीतिक राष्ट्रवाद की वैचारिक तैयारी माना जाता है (विस्तार अध्याय 8 में)।

(7) नस्लीय भेदभाव और इल्बर्ट बिल विवाद (1883)

भारतीयों को रोज़ अपमान झेलना पड़ता था — रेल के प्रथम श्रेणी के डिब्बों, क्लबों और होटलों में उन्हें प्रवेश नहीं मिलता था; किसी भारतीय को मारने वाले अंग्रेज़ को अदालतें बहुत हल्की सज़ा देती थीं; और ऊँचे पद लगभग केवल अंग्रेज़ों के लिए थे। यह "गोरे" और "काले" का भेद सबसे खुलकर इल्बर्ट बिल विवाद में सामने आया।

◆ पृष्ठभूमि — उस समय नियम था कि किसी यूरोपीय अभियुक्त का मुक़दमा ज़िला स्तर पर केवल यूरोपीय न्यायाधीश ही सुन सकता है, भले ही भारतीय न्यायाधीश उतना ही योग्य हो।

◆ विधेयक — उदारवादी वायसराय लॉर्ड रिपन के विधि सदस्य सी. पी. इल्बर्ट ने 1883 में विधेयक रखा कि भारतीय न्यायाधीश भी यूरोपीय अभियुक्तों के मुक़दमे सुन सकें।

◆ प्रतिक्रिया — भारत में रहने वाले अंग्रेज़ों ने इसका संगठित और उग्र विरोध किया, जिसे "श्वेत विद्रोह" कहा गया। उन्होंने चंदा इकट्ठा किया, सभाएँ कीं और भारतीयों के विरुद्ध अपमानजनक भाषा का प्रयोग किया।

◆ परिणाम — सरकार झुक गई और 1884 में विधेयक को कमज़ोर कर दिया गया: अब यूरोपीय अभियुक्त माँग कर सकता था कि उसके मुक़दमे की जूरी में कम से कम आधे सदस्य यूरोपीय हों। भारतीयों ने इससे बड़ा सबक़ सीखा — संगठित आंदोलन से ही सरकार से बात मनवाई जा सकती है, और उन्हें भी अपना अखिल भारतीय संगठन चाहिए।

(8) लॉर्ड लिटन (1876–80) की प्रतिक्रियावादी नीतियाँ

◆ सिविल सेवा आयु में कटौती (1876) — भारतीय सिविल सेवा परीक्षा की अधिकतम आयु 21 से घटाकर 19 वर्ष कर दी गई। परीक्षा केवल लंदन में होती थी, इसलिए इतनी कम उम्र में इंग्लैंड जाकर परीक्षा देना भारतीय युवाओं के लिए लगभग असंभव हो गया।

◆ दिल्ली दरबार (1 जनवरी 1877) — जब दक्षिण भारत में भीषण अकाल से लाखों लोग मर रहे थे, तभी महारानी विक्टोरिया को "भारत की साम्राज्ञी" घोषित करने के लिए भव्य दरबार पर भारी धन ख़र्च किया गया। कलकत्ता के एक पत्रकार ने व्यंग्य किया कि यह "रोम के जलने पर नीरो के बाँसुरी बजाने" जैसा है।

◆ वर्नाक्यूलर प्रेस अधिनियम (1878) — भारतीय भाषाओं के समाचारपत्रों पर कड़ा नियंत्रण लगाया गया, जबकि अंग्रेज़ी अख़बार इससे मुक्त रहे। इसे "मुँह बंद करने वाला क़ानून" कहा गया।

◆ शस्त्र अधिनियम (1878) — भारतीयों के लिए बिना लाइसेंस हथियार रखना अपराध बना दिया गया, पर यूरोपीयों को छूट थी। इस नस्लीय भेद ने भारी आक्रोश पैदा किया।

◆ कपास आयात शुल्क हटाना — ब्रिटिश कपड़ा उद्योग (लंकाशायर) के दबाव में आयातित कपड़े पर शुल्क घटाया गया, जिससे भारतीय मिलों को नुक़सान हुआ।

(9) अंतरराष्ट्रीय प्रेरणा

इटली और जर्मनी के एकीकरण, आयरलैंड के होमरूल आंदोलन और अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम ने दिखाया कि बँटे हुए या पराधीन लोग भी संगठित होकर राष्ट्र बन सकते हैं। आगे चलकर 1896 में इथियोपिया ने अडोवा के युद्ध में इटली को हराया और 1905 में जापान ने रूस को हराया। इन घटनाओं ने यह भ्रम तोड़ दिया कि यूरोपीय शक्तियाँ अजेय हैं।

🧠 याद रखने की ट्रिक

राष्ट्रवाद के कारण — "शोषण-एकता-शिक्षा-प्रेस, अतीत-सुधार-भेद-लिटन, और विदेश"।

लिटन की चार ग़लतियाँ — "आयु, दरबार, प्रेस, शस्त्र" (1876, 1877, 1878, 1878)। इल्बर्ट बिल लिटन के समय नहीं, रिपन के समय (1883) का है।

2. कांग्रेस से पूर्व की राजनीतिक संस्थाएँ (1836–1885)

कांग्रेस भारत का पहला राजनीतिक संगठन नहीं थी। राजा राममोहन राय को आधुनिक भारत में राजनीतिक आंदोलन का अग्रदूत माना जाता है — उन्होंने प्रेस की स्वतंत्रता, जूरी व्यवस्था और भारतीयों को ऊँचे पद देने जैसे प्रश्न उठाए। उनके बाद बनी संस्थाओं को तीन चरणों में समझना आसान है: पहला, ज़मींदार-प्रधान संस्थाएँ (1836–1860), जिनके सदस्य धनी ज़मींदार और व्यापारी थे; दूसरा, मध्यम वर्गीय संस्थाएँ (1866–1885), जिनमें शिक्षित वकील, शिक्षक और पत्रकार आगे आए; और तीसरा, अखिल भारतीय संगठन का प्रयास (1883–1885), जिसकी परिणति कांग्रेस में हुई।

2.1 पहला चरण: ज़मींदार-प्रधान संस्थाएँ (1836–1860)

◆ बंगभाषा प्रकाशिका सभा (1836, कलकत्ता) — राममोहन राय के सहयोगियों (प्रसन्न कुमार ठाकुर, कालीनाथ चौधरी, द्वारकानाथ ठाकुर आदि) ने इसे बनाया। इसे बंगाल की, और कई विद्वानों के अनुसार भारत की, पहली राजनीतिक संस्था माना जाता है। यह सरकारी नीतियों की समीक्षा करती थी और सरकार को याचिकाएँ भेजती थी।

◆ ज़मींदारी एसोसिएशन / लैंडहोल्डर्स सोसाइटी (मार्च 1838, कलकत्ता) — इसके प्रमुख संस्थापक द्वारकानाथ ठाकुर (रवींद्रनाथ टैगोर के दादा) थे, साथ में प्रसन्न कुमार ठाकुर और राधाकांत देव। इसका उद्देश्य ज़मींदारों के हितों की रक्षा था, पर इसका ऐतिहासिक महत्त्व यह है कि इसने पहली बार संगठित रूप से और संवैधानिक तरीक़ों से माँगें रखने का रास्ता दिखाया। इसने लंदन की ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी (1839) से भी संपर्क रखा।

◆ बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी (20 अप्रैल 1843, कलकत्ता) — इसके अध्यक्ष अंग्रेज़ वक्ता जॉर्ज थॉम्पसन और सचिव प्यारीचंद मित्र थे। इसका लक्ष्य केवल ज़मींदारों का नहीं, सभी वर्गों का कल्याण था। कहा जाता है कि भारतीयों ने यहीं राजनीतिक शिक्षा का पहला पाठ पढ़ा।

◆ ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन (अक्टूबर 1851, कलकत्ता) — ऊपर की दोनों संस्थाओं के विलय से बनी। अध्यक्ष राधाकांत देव और सचिव देवेंद्रनाथ ठाकुर थे; राजेंद्रलाल मित्र और "हिंदू पैट्रियट" के संपादक हरिश्चंद्र मुखर्जी भी इससे जुड़े थे। 1853 में कंपनी का चार्टर नवीनीकृत होने वाला था, इसलिए इसने ब्रिटिश संसद को याचिका भेजी कि भारत के लिए अलग विधायिका बने, उसमें भारतीयों को प्रतिनिधित्व मिले और नमक, आबकारी तथा डाक पर लगने वाले करों में राहत दी जाए। 1853 के चार्टर अधिनियम में विधायी कार्य के लिए अलग सदस्य जोड़े गए — इसे आंशिक सफलता माना जाता है।

◆ मद्रास नेटिव एसोसिएशन और बॉम्बे एसोसिएशन (1852) — कलकत्ता का अनुकरण करते हुए मद्रास में गाजुलु लक्ष्मीनरसु चेट्टी ने और बम्बई में जगन्नाथ शंकरसेठ ने (दादाभाई नौरोजी के सहयोग से, 26 अगस्त 1852) ऐसी संस्थाएँ बनाईं। इनकी माँगें भी वैसी ही थीं। इससे स्पष्ट हुआ कि राजनीतिक चेतना केवल बंगाल तक सीमित नहीं थी।

2.2 दूसरा चरण: मध्यम वर्गीय संस्थाएँ (1865–1885)

◆ लंदन इंडियन सोसाइटी (1865) और ईस्ट इंडिया एसोसिएशन (1 दिसंबर 1866, लंदन) — दादाभाई नौरोजी ने (डब्ल्यू. सी. बनर्जी के सहयोग से) ये संस्थाएँ इंग्लैंड में बनाईं। उनका तर्क था कि भारत के भाग्य का फ़ैसला ब्रिटिश संसद करती है, इसलिए ब्रिटिश जनता और सांसदों को भारत की सच्ची स्थिति बताना ज़रूरी है। बाद में ईस्ट इंडिया एसोसिएशन की शाखाएँ बम्बई, कलकत्ता और मद्रास में भी खुलीं।

◆ हिंदू मेला (1867, कलकत्ता) — नवगोपाल मित्र ने राजनारायण बोस की प्रेरणा से यह वार्षिक मेला शुरू किया। इसमें देशी वस्तुओं की प्रदर्शनी, देशभक्ति गीत, व्यायाम और कुश्ती होती थी। इसका संदेश था — स्वावलंबन और अपनी संस्कृति पर गर्व। इसलिए इसे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का आरंभिक रूप माना जाता है।

◆ पूना सार्वजनिक सभा (2 अप्रैल 1870, पूना) — इसके पीछे गणेश वासुदेव जोशी (जनसेवा के कारण "सार्वजनिक काका" कहलाए), महादेव गोविंद रानाडे और एस. एच. चिपलूणकर थे। (1867 में बनी "पूना एसोसिएशन" इसकी पूर्ववर्ती थी।) यह सरकार और जनता के बीच सेतु बनना चाहती थी। इसने 1875 में ब्रिटिश संसद में भारत के प्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व की माँग वाली याचिका भेजी, 1876–77 के अकाल में राहत कार्य किया और 1878 से अपनी त्रैमासिक पत्रिका निकाली।

◆ नेशनल इंडियन एसोसिएशन (1870, लंदन) — अंग्रेज़ समाजसेविका मैरी कारपेंटर ने भारत और ब्रिटेन के लोगों के बीच सामाजिक संपर्क बढ़ाने तथा भारत में स्त्री-शिक्षा के लिए इसे बनाया। यह राजनीतिक से अधिक सामाजिक संस्था थी।

◆ इंडियन लीग (25 सितंबर 1875, कलकत्ता) — "अमृत बाज़ार पत्रिका" के संपादक शिशिर कुमार घोष ने इसे जनता में राष्ट्रीयता और राजनीतिक शिक्षा फैलाने के लिए बनाया। यह अल्पजीवी रही और जल्द ही इंडियन एसोसिएशन में समा गई।

◆ सेंट्रल मोहम्मडन नेशनल एसोसिएशन (1877, कलकत्ता) — प्रसिद्ध विधिवेत्ता सैयद अमीर अली ने शिक्षित मुसलमानों की राजनीतिक आवाज़ के रूप में इसे बनाया।

◆ मद्रास महाजन सभा (16 मई 1884, मद्रास) — अध्यक्ष पी. रंगैया नायडू, सचिव एम. वीरराघवाचारी और पी. आनंद चार्लू; "द हिंदू" के संपादक जी. सुब्रमण्य अय्यर भी इसके प्रमुख स्तंभ थे। इसने विधान परिषदों में सुधार, न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग करने और किसानों की समस्याओं पर आवाज़ उठाई।

◆ बॉम्बे प्रेसीडेंसी एसोसिएशन (31 जनवरी 1885, बम्बई) — इसे फ़िरोज़शाह मेहता, के. टी. तैलंग और बदरुद्दीन तैयबजी ने बनाया, जिन्हें "बम्बई की त्रिमूर्ति" कहा जाता था। यह लिटन की प्रतिक्रियावादी नीतियों और इल्बर्ट बिल विवाद की प्रतिक्रिया में बनी थी।

2.3 इंडियन एसोसिएशन (26 जुलाई 1876) — कांग्रेस की पूर्वपीठिका

कांग्रेस से पहले की सबसे महत्त्वपूर्ण अखिल भारतीय संस्था इंडियन एसोसिएशन (भारत सभा) थी, जिसे सुरेंद्रनाथ बनर्जी और आनंद मोहन बोस ने कलकत्ता में बनाया। पुरानी ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन ज़मींदारों की संस्था थी और उसका सदस्यता शुल्क बहुत ऊँचा था; इंडियन एसोसिएशन ने कम शुल्क रखकर मध्यम वर्ग को जोड़ा। इसके लक्ष्य थे — देश में प्रबल जनमत बनाना, विभिन्न प्रांतों के लोगों को एक राजनीतिक सूत्र में बाँधना, हिंदू-मुस्लिम एकता बढ़ाना और जनता को राजनीति में लाना।

◆ सुरेंद्रनाथ का व्यक्तिगत अनुभव — वे 1869 में सिविल सेवा में चुने गए, आयु-विवाद में अयोग्य ठहराए गए, अदालत से बहाल हुए, और फिर 1874 में एक मामूली प्रशासनिक भूल के आधार पर बर्ख़ास्त कर दिए गए। उन्हें लगा कि यह अन्याय केवल उनके साथ नहीं, हर भारतीय के साथ है — इसी अनुभव ने उन्हें राजनीति में उतारा।

◆ पहला अखिल भारतीय अभियान (1877–78) — जब सिविल सेवा की अधिकतम आयु घटाकर 19 वर्ष की गई, तो इंडियन एसोसिएशन ने इसके विरुद्ध आंदोलन चलाया और सुरेंद्रनाथ ने उत्तर भारत, पंजाब, बम्बई और मद्रास का देशव्यापी दौरा किया। भारत में पहली बार किसी एक मुद्दे पर पूरे देश में सभाएँ हुईं। संस्था ने वर्नाक्यूलर प्रेस अधिनियम और शस्त्र अधिनियम के विरुद्ध तथा इल्बर्ट बिल के पक्ष में भी आंदोलन किया।

◆ कारावास (1883) — अपने पत्र "बंगाली" में एक न्यायाधीश की आलोचना करने पर सुरेंद्रनाथ को अदालत की अवमानना में दो महीने का कारावास हुआ। इस पर कलकत्ता और अन्य शहरों में विरोध-सभाएँ हुईं, जिसने जनता को राजनीति से और गहराई से जोड़ा।

◆ राष्ट्रीय सम्मेलन (1883 और 1885) — इंडियन एसोसिएशन ने 28–30 दिसंबर 1883 को कलकत्ता के अल्बर्ट हॉल में "इंडियन नेशनल कॉन्फ़्रेंस" (भारतीय राष्ट्रीय सम्मेलन) बुलाई। यह अखिल भारतीय राजनीतिक संगठन बनाने का पहला प्रयास था। इसका दूसरा अधिवेशन 25–27 दिसंबर 1885 को कलकत्ता में हुआ — ठीक उन्हीं दिनों जब बम्बई में कांग्रेस का पहला अधिवेशन हो रहा था, इसलिए सुरेंद्रनाथ उसमें नहीं जा सके। 1886 में दोनों धाराएँ कांग्रेस में मिल गईं।

⚠️ ध्यान दें — तथ्य सही रखें

लैंडहोल्डर्स सोसाइटी — 1838 (कुछ स्थानों पर 1837 लिखा मिलता है)। पूना सार्वजनिक सभा — 2 अप्रैल 1870 (1867 की "पूना एसोसिएशन" इसकी पूर्ववर्ती थी)।

भारत की पहली राजनीतिक संस्था — बंगभाषा प्रकाशिका सभा (1836); संगठित संवैधानिक आंदोलन करने वाली पहली संस्था — लैंडहोल्डर्स सोसाइटी (1838); कांग्रेस से पूर्व की सबसे महत्त्वपूर्ण संस्था — इंडियन एसोसिएशन (1876)।

📋 दोहराव तालिका: कांग्रेस से पूर्व की संस्थाएँ

वर्ष और संस्था

संस्थापक / प्रमुख व्यक्ति

याद रखने योग्य बात

1836 — बंगभाषा प्रकाशिका सभा

राममोहन राय के सहयोगी

इसे पहली राजनीतिक संस्था माना जाता है।

1838 — लैंडहोल्डर्स सोसाइटी

द्वारकानाथ ठाकुर

संगठित संवैधानिक आंदोलन का पहला प्रयोग इसी ने किया।

1843 — बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी

जॉर्ज थॉम्पसन, प्यारीचंद मित्र

इसने सभी वर्गों के कल्याण की बात की।

1851 — ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन

राधाकांत देव, देवेंद्रनाथ ठाकुर

यह पिछली दोनों संस्थाओं के विलय से बनी।

1866 — ईस्ट इंडिया एसोसिएशन (लंदन)

दादाभाई नौरोजी

इसने ब्रिटिश जनता को भारत की स्थिति बताई।

1870 — पूना सार्वजनिक सभा

जी. वी. जोशी, रानाडे

यह सरकार और जनता के बीच सेतु बनी।

1876 — इंडियन एसोसिएशन

सुरेंद्रनाथ बनर्जी, आनंद मोहन बोस

यह कांग्रेस से पूर्व की सबसे महत्त्वपूर्ण संस्था थी।

1884 — मद्रास महाजन सभा

वीरराघवाचारी, आनंद चार्लू, सुब्रमण्य अय्यर

इसने दक्षिण में राजनीतिक चेतना फैलाई।

1885 — बॉम्बे प्रेसीडेंसी एसोसिएशन

मेहता, तैलंग, तैयबजी

इसे "बम्बई की त्रिमूर्ति" ने बनाया।

3. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना (1885)

1880 के दशक तक यह ज़रूरत गहराई से महसूस होने लगी थी कि अलग-अलग प्रांतों की संस्थाओं को जोड़कर एक अखिल भारतीय राजनीतिक मंच बने। इल्बर्ट बिल विवाद ने इस चाह को और तेज़ कर दिया। इसी पृष्ठभूमि में सेवानिवृत्त अंग्रेज़ सिविल सेवक एलन ऑक्टेवियन ह्यूम ने भारतीय नेताओं के साथ मिलकर पहल की। नीचे का कालक्रम 1876 से 1889 तक की यात्रा दिखाता है; उसके बाद हर पड़ाव समझाया गया है।

चित्र 10.2: कांग्रेस की स्थापना तक की यात्रा (1876–1889)
चित्र 10.2: कांग्रेस की स्थापना तक की यात्रा (1876–1889)

◆ 26 जुलाई 1876 — इंडियन एसोसिएशन — इसने 1877–78 में सिविल सेवा आयु के मुद्दे पर पहला देशव्यापी अभियान चलाकर दिखा दिया कि पूरे देश को एक मुद्दे पर जोड़ा जा सकता है (खंड 2.3)।

◆ 1 मार्च 1883 — ह्यूम का पत्र — ह्यूम ने कलकत्ता विश्वविद्यालय के स्नातकों के नाम एक खुला पत्र लिखा। उसमें उन्होंने कहा कि यदि देश के पढ़े-लिखे लोगों में से पचास ईमानदार व्यक्ति भी निःस्वार्थ भाव से आगे नहीं आ सकते, तो भारत की प्रगति की आशा व्यर्थ है। इस पत्र ने शिक्षित युवाओं को देशसेवा के लिए संगठित होने की प्रेरणा दी।

◆ 28–30 दिसंबर 1883 — पहला राष्ट्रीय सम्मेलन — इंडियन एसोसिएशन ने कलकत्ता के अल्बर्ट हॉल में "इंडियन नेशनल कॉन्फ़्रेंस" बुलाई। यह अखिल भारतीय संगठन का पहला प्रयास था।

◆ 1884 — इंडियन नेशनल यूनियन — ह्यूम और उनके भारतीय सहयोगियों ने "इंडियन नेशनल यूनियन" (भारतीय राष्ट्रीय संघ) बनाया और तय किया कि दिसंबर 1885 में पूना में देशभर के प्रतिनिधियों का सम्मेलन होगा। मई 1885 में ह्यूम ने शिमला में वायसराय लॉर्ड डफ़रिन से भी भेंट की।

◆ 28 दिसंबर 1885 — कांग्रेस का जन्म — पूना में हैज़ा फैल जाने के कारण सम्मेलन बम्बई में हुआ। नाम भी बदला गया (विस्तार नीचे)।

◆ दिसंबर 1885 / 1886 — नेशनल कॉन्फ़्रेंस का विलय — 25–27 दिसंबर 1885 को कलकत्ता में राष्ट्रीय सम्मेलन का दूसरा अधिवेशन हुआ। दो अलग मंच होने से शक्ति बँटती, इसलिए 1886 के कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन में दोनों धाराएँ एक हो गईं।

◆ 1887 / 1888 — विस्तार — 1887 के मद्रास अधिवेशन में बदरुद्दीन तैयबजी पहले मुस्लिम अध्यक्ष बने, प्रतिनिधि बढ़कर 607 हो गए और विषय निर्धारिणी समिति (जो प्रस्तावों का प्रारूप तय करती है) शुरू हुई। 1888 के इलाहाबाद अधिवेशन में जॉर्ज यूल पहले यूरोपीय (अंग्रेज़) अध्यक्ष बने।

◆ जुलाई 1889 — ब्रिटिश कमेटी — लंदन में कांग्रेस की "ब्रिटिश कमेटी ऑफ़ इंडिया" बनी, जिसके प्रमुख विलियम वेडरबर्न और विलियम डिग्बी थे। 1890 से यह "इंडिया" नाम का साप्ताहिक निकालने लगी। इसका उद्देश्य ब्रिटेन में भारत के पक्ष में जनमत बनाना था।

📌 पहला अधिवेशन (28–31 दिसंबर 1885)

📖 कहानी 1: एक अंग्रेज़ का पत्र, पूना का हैज़ा और बम्बई में कांग्रेस का जन्म

1 मार्च 1883 को कलकत्ता विश्वविद्यालय के स्नातकों के नाम एक खुला पत्र छपा। इसे लिखा था ए. ओ. ह्यूम ने, जो अंग्रेज़ सिविल सेवक थे और सरकारी नीतियों की खुली आलोचना के कारण पद से हटाए जाने के बाद 1882 में सेवानिवृत्त हुए थे। उन्होंने लिखा कि यदि देश के पढ़े-लिखे लोगों में से पचास ईमानदार व्यक्ति भी निःस्वार्थ भाव से आगे नहीं आ सकते, तो भारत की प्रगति की आशा व्यर्थ है।

1884 में ह्यूम और उनके भारतीय साथियों ने इंडियन नेशनल यूनियन बनाई और तय किया कि दिसंबर 1885 में पूना में देशभर के प्रतिनिधियों का सम्मेलन होगा। पर पूना में हैज़ा फैल गया, इसलिए सम्मेलन बम्बई में हुआ। 28 दिसंबर 1885 को गोकुलदास तेजपाल संस्कृत कॉलेज में 72 प्रतिनिधि जुटे। अध्यक्ष डब्ल्यू. सी. बनर्जी थे और ह्यूम महासचिव। दादाभाई नौरोजी के सुझाव पर संस्था का नाम इंडियन नेशनल कांग्रेस रखा गया।

तब से सवाल उठता रहा कि एक अंग्रेज़ अधिकारी ने यह संगठन बनाने में इतनी रुचि क्यों ली। कुछ का कहना था कि ह्यूम ने असंतोष को शांत रास्ते से निकालने के लिए सुरक्षा वाल्व बनाया। पर गोपाल कृष्ण गोखले ने 1913 में कहा कि यदि कोई भारतीय कांग्रेस शुरू करता, तो अधिकारी उसे चलने ही न देते। यानी भारतीय नेताओं ने ह्यूम को आगे रखकर उन्हें तड़ित चालक बना लिया।

वायसराय डफ़रिन ने 1886 में कांग्रेस प्रतिनिधियों को स्वागत-भोज दिया, पर 1888 में उसे “सूक्ष्मदर्शी अल्पसंख्यकों की संस्था” कहकर उसका मज़ाक उड़ाया। फिर भी यही संस्था आगे चलकर ब्रिटिश शासन की सबसे बड़ी चुनौती बनी।

🧭 इस कहानी से कौन-सी अवधारणा साफ़ हुई

✔ सुरक्षा वाल्व मत — कांग्रेस असंतोष को शांत रास्ते से निकालने वाली सीटी थी। इसे वेडरबर्न, लाजपत राय और आर. पी. दत्त ने माना, पर सात खंडों की गुप्त रिपोर्टों का प्रमाण कभी नहीं मिला।

✔ तड़ित चालक मत — भारतीय नेताओं ने ह्यूम को जान-बूझकर आगे रखा, ताकि नई संस्था को शुरू में सरकारी संदेह और दमन का झटका न लगे। यह गोखले का मत है।

✔ राष्ट्रवादी मत — कांग्रेस 1860–80 के दशकों की राजनीतिक जागृति का स्वाभाविक परिणाम थी, जिसका प्रमाण 1883 का राष्ट्रीय सम्मेलन है। आज यही मत सर्वाधिक स्वीकार्य है।

📝 परीक्षा के लिए: ह्यूम का खुला पत्र (1 मार्च 1883) → इंडियन नेशनल यूनियन (1884) → पूना में हैज़ा, इसलिए बम्बई → पहला अधिवेशन 28–31 दिसंबर 1885, 72 प्रतिनिधि, अध्यक्ष डब्ल्यू. सी. बनर्जी, महासचिव ह्यूम; नामकरण नौरोजी का सुझाव। सुरक्षा वाल्व = वेडरबर्न, लाजपत राय, आर. पी. दत्त; तड़ित चालक = गोखले।

कांग्रेस का पहला अधिवेशन 28 से 31 दिसंबर 1885 तक बम्बई के ग्वालिया टैंक स्थित गोकुलदास तेजपाल संस्कृत कॉलेज में हुआ। इसकी अध्यक्षता कलकत्ता के प्रसिद्ध वकील व्योमेश चंद्र (डब्ल्यू. सी.) बनर्जी ने की और ए. ओ. ह्यूम इसके महासचिव बने। इसमें 72 प्रतिनिधि आए, जिनमें अधिकांश वकील, पत्रकार और शिक्षक थे; वे बम्बई, मद्रास, बंगाल, पंजाब, पश्चिमोत्तर प्रांत और अवध से आए थे। दादाभाई नौरोजी, फ़िरोज़शाह मेहता, के. टी. तैलंग, दिनशा वाचा, एस. सुब्रमण्य अय्यर, पी. आनंद चार्लू और एम. वीरराघवाचारी जैसे नेता उपस्थित थे।

संस्था का नाम पहले "इंडियन नेशनल यूनियन" तय था, पर दादाभाई नौरोजी के सुझाव पर इसे "इंडियन नेशनल कांग्रेस" (भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस) रखा गया। "कांग्रेस" शब्द अमेरिकी इतिहास से लिया गया था, जिसका अर्थ है "लोगों का समूह या सभा"। उस समय वायसराय लॉर्ड डफ़रिन (1884–88) थे। उन्होंने 1886 में कलकत्ता अधिवेशन के प्रतिनिधियों को स्वागत-भोज तो दिया, पर 1888 में कांग्रेस को "सूक्ष्मदर्शी अल्पसंख्यकों की संस्था" कहकर उसका मज़ाक उड़ाया — अर्थात् ऐसी संस्था जो जनता के इतने छोटे हिस्से का प्रतिनिधित्व करती है कि उसे सूक्ष्मदर्शी से ही देखा जा सके।

🎯 कांग्रेस के उद्देश्य (डब्ल्यू. सी. बनर्जी का अध्यक्षीय भाषण)

1. देशहित में काम करने वाले विभिन्न भागों के लोगों के बीच व्यक्तिगत संपर्क और मित्रता बढ़ाना।

2. जाति, धर्म और प्रांत के भेदभाव मिटाकर राष्ट्रीय एकता की भावना का विकास करना।

3. महत्त्वपूर्ण राजनीतिक और सामाजिक प्रश्नों पर शिक्षित वर्ग के परिपक्व मत को व्यक्त करना और उसे दर्ज करना।

4. आने वाले वर्ष में जनहित के लिए भारतीय नेता किस दिशा में और किन तरीक़ों से काम करें, यह राजनीतिक कार्यक्रम तय करना।

एकता बनाए रखने के लिए व्यवस्थाएँ: अधिवेशन हर वर्ष अलग-अलग प्रांतों में होता था और अध्यक्ष प्रायः उस प्रांत के बाहर का व्यक्ति चुना जाता था, ताकि कोई प्रांत स्वयं को उपेक्षित न समझे। 1886 में नौरोजी ने स्पष्ट किया कि कांग्रेस सामाजिक सुधार के विवादों में नहीं पड़ेगी, क्योंकि उन पर अलग-अलग समुदायों की राय अलग थी; वह केवल राष्ट्रीय-राजनीतिक प्रश्न उठाएगी। 1888 में नियम बना कि यदि किसी प्रस्ताव का हिंदू या मुस्लिम प्रतिनिधियों का भारी बहुमत विरोध करे, तो वह प्रस्ताव पारित नहीं किया जाएगा। इन व्यवस्थाओं से कांग्रेस का अखिल भारतीय और सर्वधर्मी चरित्र मज़बूत हुआ।

❝ यह कांग्रेस भारत के किसी एक वर्ग या समुदाय के प्रतिनिधियों से मिलकर नहीं बनी है, बल्कि यह भारत के सभी समुदायों की संस्था है। ❞ (बदरुद्दीन तैयबजी, अध्यक्षीय भाषण, मद्रास (1887))

👤 एलन ऑक्टेवियन ह्यूम (1829–1912)

ह्यूम एक अंग्रेज़ सिविल सेवक थे, जिन्होंने 1857 के समय इटावा (पश्चिमोत्तर प्रांत) के कलेक्टर के रूप में काम किया था। वे भारत सरकार में राजस्व, कृषि और वाणिज्य विभाग के सचिव भी रहे, पर सरकारी नीतियों की खुली आलोचना करने के कारण उन्हें पद से हटाया गया और 1882 में वे सेवानिवृत्त हुए। वे पक्षियों के विशेषज्ञ भी थे और उन्हें "भारतीय पक्षी-विज्ञान का जनक" कहा जाता है। वे शिमला में रहते थे। ह्यूम कांग्रेस के पहले महासचिव बने और लंबे समय तक इस पद पर रहे; 1894 में वे इंग्लैंड लौट गए। 31 जुलाई 1912 को उनकी मृत्यु हुई और उसी वर्ष के बांकीपुर (पटना) अधिवेशन (अध्यक्ष आर. एन. मुधोलकर) में उन्हें "कांग्रेस का पिता" कहकर श्रद्धांजलि दी गई।

🔍 कांग्रेस की स्थापना पर विभिन्न मत

एक अंग्रेज़ अधिकारी ने भारतीय राष्ट्रीय संगठन बनाने में इतनी सक्रिय भूमिका क्यों निभाई? इस प्रश्न के उत्तर में इतिहासकारों के चार मुख्य मत हैं।

🔍 आसान परिभाषा: सुरक्षा वाल्व (सेफ़्टी वाल्व) सिद्धांत

📘 परिभाषा: यह मत कि ह्यूम ने कांग्रेस इसलिए बनवाई ताकि शिक्षित भारतीयों के बढ़ते असंतोष को निकलने का एक सुरक्षित, शांत और संवैधानिक रास्ता मिल जाए और वह असंतोष 1857 जैसे हिंसक विद्रोह में न बदले। कहा गया कि ह्यूम को 1878 के आसपास निम्न वर्गों में बढ़ते असंतोष की सात खंडों वाली गुप्त रिपोर्टें मिली थीं।

💡 आसान भाषा में: प्रेशर कुकर की सीटी (वाल्व) भाप को थोड़ा-थोड़ा निकालती रहती है ताकि कुकर फटे नहीं। इस मत के अनुसार कांग्रेस अंग्रेज़ी शासन रूपी कुकर की "सीटी" थी। 🏠 उदाहरण: यह मत ह्यूम की जीवनी (1913) में विलियम वेडरबर्न ने रखा; लाला लाजपत राय ने "यंग इंडिया" (1916) में नरम दल पर व्यंग्य करने के लिए इसका उपयोग किया; मार्क्सवादी लेखक आर. पी. दत्त ("इंडिया टुडे") ने भी इसे अपनाया।

◆ सुरक्षा वाल्व मत की कमज़ोरी — सात खंडों वाली उन गुप्त रिपोर्टों का कोई प्रमाण कभी नहीं मिला। साथ ही, यदि कांग्रेस केवल "सुरक्षा वाल्व" होती, तो वही कांग्रेस आगे चलकर ब्रिटिश शासन को सबसे बड़ी चुनौती कैसे देती? इसलिए आधुनिक इतिहासकार इस मत को अधूरा मानते हैं।

◆ षड्यंत्र सिद्धांत — इसे सुरक्षा वाल्व मत का कठोर रूप कह सकते हैं। इसके अनुसार कांग्रेस अंग्रेज़ों की सोची-समझी योजना थी, ताकि उभरते राष्ट्रवाद को अपने नियंत्रण में रखा जा सके। यह मुख्यतः मार्क्सवादी व्याख्या है, पर यह भी इसी कारण कमज़ोर है कि बाद में कांग्रेस ही साम्राज्य-विरोध का सबसे बड़ा मंच बनी।

◆ तड़ित चालक (लाइटनिंग कंडक्टर) मत — इमारत पर लगा तड़ित चालक आकाशीय बिजली को सुरक्षित रूप से ज़मीन में उतार देता है और इमारत बच जाती है। इस मत के अनुसार भारतीय नेताओं ने ह्यूम को जान-बूझकर आगे रखा, ताकि नई संस्था को आरंभ में ही सरकारी संदेह और दमन का "झटका" न झेलना पड़े। गोपाल कृष्ण गोखले ने 1913 में कहा था कि यदि कोई भारतीय कांग्रेस शुरू करता, तो अधिकारी उसे चलने ही न देते। संक्षेप में — यदि ह्यूम कांग्रेस को सुरक्षा वाल्व बनाना चाहते थे, तो भारतीय नेताओं ने ह्यूम को तड़ित चालक बना लिया।

◆ राष्ट्रवादी मत — कांग्रेस किसी एक व्यक्ति की देन नहीं, बल्कि 1860–80 के दशकों में बढ़ती राजनीतिक जागृति का स्वाभाविक परिणाम थी। अखिल भारतीय संगठन की माँग पहले से थी — 1883 का राष्ट्रीय सम्मेलन इसका प्रमाण है। ह्यूम ने केवल इस प्रक्रिया को गति दी। आज यही मत सर्वाधिक स्वीकार्य है।

💡 याद रखें

सुरक्षा वाल्व — वेडरबर्न, लाजपत राय, आर. पी. दत्त; तड़ित चालक — गोखले; राष्ट्रवादी मत — कांग्रेस राजनीतिक जागृति का परिणाम थी।

1888 में सर सैयद अहमद ख़ाँ ने बनारस के राजा शिवप्रसाद "सितारे-हिंद" के साथ मिलकर कांग्रेस के विरोध में "यूनाइटेड इंडियन पैट्रियॉटिक एसोसिएशन" (संयुक्त भारतीय राजभक्त सभा) बनाई। सर सैयद का मानना था कि मुसलमानों को अभी शिक्षा पर ध्यान देना चाहिए और राजनीति से, विशेषकर कांग्रेस से, दूर रहना चाहिए।

4. नरम दल / उदारवादी चरण (1885–1905)

कांग्रेस के पहले बीस वर्षों को उदारवादी या नरमपंथी चरण कहते हैं। इस दौर के नेता ब्रिटिश न्याय और उदारवाद में गहरा विश्वास रखते थे। उनका मानना था कि अंग्रेज़ जनता स्वभाव से न्यायप्रिय है; उसे भारत की समस्याओं की सही जानकारी नहीं मिलती, इसलिए यदि सही तथ्यों के साथ भारत का पक्ष रखा जाए तो अंग्रेज़ उसे अवश्य स्वीकार करेंगे। वे ब्रिटिश संबंध को भारत के लिए लाभदायक भी मानते थे, क्योंकि उसी से आधुनिक शिक्षा, विज्ञान और क़ानून का शासन आया था। इसलिए उनकी राजनीति "संवैधानिक आंदोलन" की थी — यानी क़ानून की सीमा में रहकर, शांतिपूर्ण ढंग से, धीरे-धीरे सुधार माँगना।

👥 प्रमुख उदारवादी नेता

◆ दादाभाई नौरोजी (1825–1917) — बम्बई के एक पारसी परिवार में जन्मे नौरोजी एल्फ़िंस्टन कॉलेज में गणित और भौतिकी के पहले भारतीय प्रोफ़ेसर बने। उन्होंने 1851 में गुजराती पत्र "रास्त गोफ़्तार" (सत्यवादी) निकाला, 1866 में लंदन में ईस्ट इंडिया एसोसिएशन बनाई और 1874 में बड़ौदा के दीवान रहे। 1892 में वे लंदन के फ़िंसबरी (केंद्रीय) क्षेत्र से लिबरल दल के टिकट पर जीतकर ब्रिटिश संसद के पहले भारतीय सदस्य बने। वे 1886, 1893 और 1906 में — तीन बार — कांग्रेस अध्यक्ष रहे। उनकी पुस्तक "पावर्टी एंड अन-ब्रिटिश रूल इन इंडिया" (1901) ने धन-निष्कासन सिद्धांत दिया। उन्हें "भारत के वयोवृद्ध नेता" (ग्रैंड ओल्ड मैन ऑफ़ इंडिया) कहा जाता है।

◆ सुरेंद्रनाथ बनर्जी (1848–1925) — सिविल सेवा से बर्ख़ास्त होने के बाद वे शिक्षक और पत्रकार बने। उन्होंने इंडियन एसोसिएशन (1876) बनाई और "बंगाली" पत्र का संपादन किया। वे 1895 (पूना) और 1902 (अहमदाबाद) में कांग्रेस अध्यक्ष रहे और बंगाल विभाजन के विरुद्ध स्वदेशी आंदोलन के आरंभिक नेता थे। ओजस्वी भाषणों के कारण उन्हें "भारतीय बर्क" और सम्मान से "राष्ट्रगुरु" कहा गया। 1918 में उन्होंने कांग्रेस छोड़कर इंडियन नेशनल लिबरल फ़ेडरेशन बनाया। उनकी आत्मकथा का नाम "ए नेशन इन मेकिंग" (बनता हुआ राष्ट्र) है।

◆ फ़िरोज़शाह मेहता (1845–1915) — बम्बई के प्रसिद्ध वकील, जिन्होंने बम्बई नगर निगम को आधुनिक रूप देने में बड़ी भूमिका निभाई। वे बॉम्बे प्रेसीडेंसी एसोसिएशन के संस्थापकों में थे, 1890 में कांग्रेस अध्यक्ष बने और 1910 में "बॉम्बे क्रॉनिकल" पत्र शुरू किया। बम्बई की राजनीति पर उनके प्रभाव के कारण उन्हें "बम्बई का बेताज बादशाह" कहा गया। 1907 में सूरत में वे गरम दल के सबसे प्रबल विरोधी थे।

◆ महादेव गोविंद रानाडे (1842–1901) — न्यायाधीश, अर्थशास्त्री और समाज सुधारक। वे पूना सार्वजनिक सभा और प्रार्थना समाज से जुड़े रहे और 1887 में भारतीय राष्ट्रीय सामाजिक सम्मेलन की स्थापना की, जो कांग्रेस अधिवेशन के साथ ही सामाजिक सुधारों पर विचार करता था। उन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था पर लेख लिखे और "राइज़ ऑफ़ द मराठा पावर" (मराठा शक्ति का उदय) पुस्तक लिखी। वे गोखले के गुरु थे।

◆ गोपाल कृष्ण गोखले (1866–1915) — रानाडे के शिष्य और पूना के फ़र्ग्यूसन कॉलेज के प्राध्यापक। उन्होंने आगरकर के साथ "सुधारक" पत्र में लिखा, 1897 में वेल्बी आयोग के सामने भारत के ख़र्च पर प्रभावशाली गवाही दी और 1902 से शाही विधान परिषद में अपने तथ्यपूर्ण बजट भाषणों से सरकार को घेरा। वे 1905 (बनारस) में कांग्रेस अध्यक्ष बने और 12 जून 1905 को सर्वेंट्स ऑफ़ इंडिया सोसाइटी (भारत सेवक समाज) बनाई, जिसके सदस्य साधारण जीवन जीकर देशसेवा का व्रत लेते थे। वे साधन और साध्य की पवित्रता पर बल देते थे। गांधीजी उन्हें अपना राजनीतिक गुरु मानते थे।

◆ रोमेशचंद्र दत्त (1848–1909) — सिविल सेवा के उन गिने-चुने भारतीयों में से एक, जिन्होंने बाद में आर्थिक इतिहास लिखा। उनकी पुस्तक "द इकोनॉमिक हिस्ट्री ऑफ़ इंडिया" (भारत का आर्थिक इतिहास) ने दिखाया कि अंग्रेज़ी नीतियों से भारत के उद्योग नष्ट हुए और भू-राजस्व का बोझ किसानों को तोड़ रहा है। वे 1899 (लखनऊ) में कांग्रेस अध्यक्ष रहे।

◆ व्योमेश चंद्र बनर्जी (1844–1906) — कलकत्ता के प्रसिद्ध बैरिस्टर, कांग्रेस के पहले अध्यक्ष (1885) और फिर 1892 (इलाहाबाद) में भी अध्यक्ष रहे।

इनके अतिरिक्त दिनशा वाचा, बदरुद्दीन तैयबजी, के. टी. तैलंग, आनंद मोहन बोस, रासबिहारी घोष, जी. सुब्रमण्य अय्यर, पी. आनंद चार्लू और मदन मोहन मालवीय भी इस धारा के प्रमुख नेता थे।

📜 उदारवादियों की माँगें

◆ संवैधानिक माँगें — उदारवादी चाहते थे कि केंद्रीय और प्रांतीय विधान परिषदों का विस्तार हो और उनमें निर्वाचित भारतीय सदस्य हों। वे चाहते थे कि परिषदों को बजट पर बहस करने और सरकार से प्रश्न पूछने का अधिकार मिले, तथा पश्चिमोत्तर प्रांत और पंजाब में भी परिषदें बनें। उनका प्रिय नारा था — "प्रतिनिधित्व नहीं तो कर नहीं"। आगे चलकर उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर स्वशासित उपनिवेशों (जैसे कनाडा, ऑस्ट्रेलिया) जैसा स्वशासन माँगा — 1905 में गोखले ने यह माँग रखी और 1906 में नौरोजी ने इसी को "स्वराज" कहा।

◆ प्रशासनिक माँगें — ऊँची सेवाओं का भारतीयकरण उनकी सबसे बड़ी माँग थी। इसके लिए वे चाहते थे कि सिविल सेवा परीक्षा इंग्लैंड और भारत में एक साथ हो और आयु सीमा बढ़ाई जाए। इसके पीछे दो तर्क थे — अंग्रेज़ अधिकारियों के भारी वेतन-पेंशन से धन बाहर जाता था, और भारतीय अधिकारी देश की ज़रूरतें बेहतर समझते। वे न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग करने, सेना का ख़र्च घटाने और भारतीयों को सेना में ऊँचे पद देने की माँग भी करते थे।

◆ आर्थिक माँगें — धन-निष्कासन को रोकना, लगान घटाना और किसानों को साहूकारों से बचाना, ग़रीबों पर भारी पड़ने वाला नमक कर हटाना, सिंचाई पर अधिक ख़र्च करना, भारतीय उद्योगों को विदेशी प्रतियोगिता से संरक्षण देना और गृह-शुल्क (इंग्लैंड भेजे जाने वाले प्रशासनिक ख़र्च) में कमी करना। उन्होंने विदेशों (जैसे दक्षिण अफ़्रीका) में भारतीय मज़दूरों के साथ होने वाले बर्ताव और वन-क़ानूनों से वनवासियों की परेशानी पर भी प्रस्ताव पारित किए।

◆ नागरिक अधिकारों की रक्षा — बोलने, लिखने, सभा करने और संगठन बनाने की स्वतंत्रता की माँग की गई और शस्त्र अधिनियम को रद्द करने की माँग रखी गई। जब 1897 में तिलक को गिरफ़्तार किया गया और पूना के नातू बंधुओं को बिना मुक़दमे के निर्वासित किया गया, तो उदारवादियों ने भी इसका कड़ा विरोध किया। इससे नागरिक अधिकारों की रक्षा राष्ट्रीय आंदोलन का अभिन्न अंग बन गई।

🛠️ कार्यपद्धति: तीन "प" और "राजनीतिक भिक्षावृत्ति" का आरोप

उदारवादियों के तरीक़ों को सरल भाषा में तीन "प" कहा जाता है — प्रार्थना, याचिका और प्रतिवेदन (या प्रचार)। वे विनम्र भाषा में लिखते थे और "माँग" के बजाय "सुझाव" या "निवेदन" शब्दों का प्रयोग करते थे। वे सरकार को स्मरण-पत्र और याचिकाएँ भेजते, अधिवेशनों में प्रस्ताव पारित करते, सभाओं, भाषणों, अख़बारों और पुस्तिकाओं से जनमत बनाते और परिषदों के भीतर तर्कपूर्ण भाषण देते थे। वे इंग्लैंड में प्रचार को भी बहुत महत्त्व देते थे — 1889 में लंदन में बनी ब्रिटिश कमेटी, उसका पत्र "इंडिया" और समय-समय पर भेजे गए प्रतिनिधिमंडल इसी का हिस्सा थे।

🔍 आसान परिभाषा: राजनीतिक भिक्षावृत्ति

📘 परिभाषा: गरमपंथी नेताओं द्वारा उदारवादियों की कार्यपद्धति के लिए प्रयुक्त आलोचनात्मक शब्द (अंग्रेज़ी में "पॉलिटिकल मेंडिकेंसी")। इसका आशय था कि विदेशी शासकों से विनम्र प्रार्थना और याचिका करके अधिकार माँगना भीख माँगने जैसा है, जिससे न आत्मसम्मान बचता है और न ही अधिकार मिलते हैं।

💡 आसान भाषा में: अपना हक़ हाथ जोड़कर माँगना, जैसे कोई भिखारी दान माँगता है — गरम दल का कहना था कि स्वतंत्रता भीख से नहीं, संघर्ष से मिलती है। 🏠 उदाहरण: अरविंद घोष ने 1893–94 में "इंदु प्रकाश" में "न्यू लैम्प्स फ़ॉर ओल्ड" (पुराने के बदले नए दीपक) लेखमाला लिखकर कांग्रेस की नीतियों की तीखी आलोचना की; तिलक ने व्यंग्य किया कि साल में एक बार मेंढकों की तरह टर्राने से कुछ नहीं मिलेगा।

🏆 उदारवादियों की उपलब्धियाँ

◆ लोक सेवा आयोग — एचिसन आयोग (1886) — सेवाओं में भारतीयों की भागीदारी की माँग पर सरकार ने चार्ल्स एचिसन की अध्यक्षता में आयोग बनाया। इसने सिविल सेवा परीक्षा की अधिकतम आयु 19 से बढ़ाकर 23 वर्ष करने की सिफ़ारिश की, पर भारत में एक साथ परीक्षा की माँग नहीं मानी।

◆ भारतीय परिषद अधिनियम 1892 — इससे केंद्रीय और प्रांतीय परिषदों में सदस्यों की संख्या बढ़ी, कुछ सदस्य अप्रत्यक्ष रूप से चुनकर (नगरपालिकाओं, विश्वविद्यालयों आदि की सिफ़ारिश पर) आने लगे, और सदस्यों को बजट पर बहस और प्रश्न पूछने का अधिकार मिला, पर पूरक प्रश्न पूछने या बजट पर मतदान करने का अधिकार नहीं मिला। यह उदारवादियों की माँगों की पहली, छोटी-सी सफलता थी (विस्तार अध्याय 3 में)।

◆ हाउस ऑफ़ कॉमन्स का प्रस्ताव (1893) — नौरोजी जैसे नेताओं के प्रयास से ब्रिटिश संसद के निचले सदन ने प्रस्ताव पारित किया कि सिविल सेवा परीक्षा भारत और इंग्लैंड में एक साथ हो, पर सरकार ने इसे लागू नहीं किया।

◆ वेल्बी आयोग (1895) — भारत के सरकारी ख़र्च की जाँच के लिए बने इस शाही आयोग में दादाभाई नौरोजी सदस्य थे और गोखले ने इसके सामने गवाही दी। इससे भारत के धन के दुरुपयोग का प्रश्न आधिकारिक मंच पर पहुँचा।

◆ आर्थिक आलोचना की वैचारिक नींव — सबसे बड़ी उपलब्धि वैचारिक थी। उदारवादियों ने आँकड़ों से सिद्ध किया कि भारत की ग़रीबी का कारण ब्रिटिश शासन है। इसने अंग्रेज़ी शासन के "नैतिक औचित्य" को तोड़ दिया और आगे के सभी आंदोलनों को मज़बूत तर्क दिए।

⚖️ मूल्यांकन

◆ सीमाएँ — नेतृत्व शहरी, शिक्षित और संपन्न वर्ग तक सीमित था; वे आम जनता को राजनीति के लिए "अभी तैयार नहीं" मानते थे। उनका ब्रिटिश न्यायप्रियता पर भरोसा ज़रूरत से ज़्यादा था। कार्यवाही अंग्रेज़ी में होती थी, जिसे आम लोग नहीं समझते थे। कांग्रेस साल में केवल तीन दिन का अधिवेशन करती थी और बीच में लगभग निष्क्रिय रहती थी — इसलिए बारीसाल के नेता अश्विनी कुमार दत्त ने इसे व्यंग्य में "तीन दिन का वार्षिक तमाशा" कहा और आलोचकों ने इसे "भिक्षावृत्ति की राजनीति" बताया।

◆ योगदान — इन सीमाओं के बावजूद उदारवादियों ने राष्ट्रीय आंदोलन का संगठनात्मक ढाँचा बनाया, ब्रिटिश शासन की आर्थिक शोषक प्रकृति उजागर की, और लोकतंत्र, नागरिक स्वतंत्रता, धर्मनिरपेक्षता तथा प्रतिनिधि शासन के विचारों को लोकप्रिय बनाया। उन्होंने देश को एक साझा राजनीतिक मंच और साझा भाषा दी। इसलिए कहा जाता है कि भविष्य के जन-आंदोलनों की नींव इन्हीं बीस वर्षों में पड़ी।

❝ यदि हम साल में एक बार मेंढकों की तरह टर्राते रहे, तो हमें कोई सफलता नहीं मिलेगी। ❞ (बाल गंगाधर तिलक (उदारवादी तरीक़ों पर))

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5. कांग्रेस के प्रति ब्रिटिश रवैया और गरम दल का उदय

आरंभ में सरकार ने कांग्रेस को एक हानिरहित "बहस-सभा" मानकर सहन किया। पर जैसे-जैसे उसकी आर्थिक आलोचना तीखी होती गई, सरकार का रवैया शत्रुतापूर्ण हो गया। डफ़रिन ने 1888 में उसे "सूक्ष्मदर्शी अल्पसंख्यकों की संस्था" कहा, सरकारी कर्मचारियों को अधिवेशनों में जाने से रोका गया, और "फूट डालो और राज करो" की नीति अपनाकर सर सैयद अहमद ख़ाँ और बनारस के राजा शिवप्रसाद जैसे नेताओं को कांग्रेस-विरोधी मोर्चे के लिए प्रोत्साहित किया गया। 1900 आते-आते वायसराय कर्ज़न कांग्रेस के "अंत" का सपना देखने लगा।

❝ कांग्रेस लड़खड़ा रही है और गिरने वाली है। भारत में रहते हुए मेरी सबसे बड़ी आकांक्षा है कि मैं इसकी शांतिपूर्ण मृत्यु में सहायक बनूँ। ❞ (लॉर्ड कर्ज़न, भारत सचिव को पत्र (1900))

🔥 गरम दल के उदय के कारण

1. उदारवादियों की विफलता — बीस वर्ष की याचिकाओं और प्रस्तावों से बहुत कम मिला। 1892 का अधिनियम निराशाजनक रहा और 1893 का संसदीय प्रस्ताव लागू ही नहीं हुआ। इसलिए युवा पीढ़ी को लगा कि विनम्र प्रार्थना का रास्ता बंद गली है।

2. ब्रिटिश शासन के वास्तविक स्वरूप की पहचान — विडंबना यह है कि उदारवादियों की अपनी आर्थिक आलोचना ने ही यह निष्कर्ष दिया। यदि ब्रिटिश शासन भारत की ग़रीबी का कारण है, तो उसे सुधारा नहीं, हटाया जाना चाहिए — यही गरम दल का तर्क बना।

3. 1896–1900 के संकट — इन वर्षों में भीषण अकाल पड़े और बम्बई-पूना में प्लेग फैला। राहत कार्यों में सरकार की संवेदनहीनता और प्लेग अधिकारियों की ज़्यादतियों (घरों की तलाशी, लोगों को ज़बरदस्ती शिविरों में ले जाना) से जनता भड़क उठी। 1897 में पूना के चापेकर बंधुओं (दामोदर और बालकृष्ण) ने प्लेग कमिश्नर रैंड की हत्या कर दी। इसके बाद तिलक को राजद्रोह में 18 महीने का कारावास हुआ और नातू बंधु निर्वासित किए गए।

4. आत्मविश्वास और आत्मसम्मान का उदय — विवेकानंद, दयानंद और अरविंद के विचारों ने भारतीय संस्कृति पर गर्व जगाया। "गोरी जाति अजेय है" का भ्रम भी टूटा — 1896 में इथियोपिया ने इटली को हराया, बोअर युद्ध (1899–1902) में ब्रिटेन को भारी कठिनाई हुई, चीन में बॉक्सर विद्रोह हुआ, और सबसे बढ़कर 1905 में एशियाई देश जापान ने यूरोपीय शक्ति रूस को हरा दिया।

5. शिक्षित बेरोज़गारी और युवा असंतोष — स्कूल-कॉलेज से निकले निम्न-मध्यम वर्ग के युवाओं को नौकरियाँ नहीं मिल रही थीं। उनकी निराशा उन्हें उग्र राजनीति की ओर ले गई।

6. तात्कालिक कारण — लॉर्ड कर्ज़न की प्रतिक्रियावादी नीतियाँ और सबसे बढ़कर बंगाल विभाजन (1905) (खंड 6)।

❝ जो एक एशियाई ने किया, वह दूसरे भी कर सकते हैं... यदि जापान रूस को हरा सकता है, तो भारत भी इंग्लैंड को उतनी ही आसानी से हरा सकता है। ❞ ("कराची क्रॉनिकल" (1905))

🦁 गरम दल के प्रमुख नेता

गरम दल के तीन सबसे प्रसिद्ध नेता तीन अलग प्रांतों से थे — पंजाब के लाला लाजपत राय, महाराष्ट्र के बाल गंगाधर तिलक और बंगाल के बिपिनचंद्र पाल। इसलिए इन्हें मिलाकर "लाल-बाल-पाल" कहा जाता है। इनके साथ बंगाल के अरविंद घोष इस धारा के सबसे बड़े विचारक थे।

🪔 लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक (1856–1920)

◆ आरंभिक जीवन — 23 जुलाई 1856 को रत्नागिरी (महाराष्ट्र) में जन्म। गणित और क़ानून की पढ़ाई के बाद उन्होंने शिक्षा को देशसेवा का माध्यम बनाया और पूना में न्यू इंग्लिश स्कूल (1880), दक्कन एजुकेशन सोसाइटी (1884) और फ़र्ग्यूसन कॉलेज (1885) की स्थापना में सहयोग किया।

◆ जनता तक राजनीति — 1881 से उन्होंने "केसरी" (मराठी) और "मराठा" (अंग्रेज़ी) पत्र निकाले। उन्होंने 1893 में गणपति उत्सव और 1895–96 में शिवाजी उत्सव को सार्वजनिक रूप दिया, ताकि धार्मिक-सांस्कृतिक उत्सवों के बहाने आम लोग एकत्र हों और राष्ट्रीय विचार सुनें। युवाओं के लिए अखाड़े और लाठी क्लब बने। 1896–97 के अकाल में उन्होंने किसानों से कहा कि अकाल-संहिता के अनुसार फ़सल नष्ट होने पर लगान न देना उनका क़ानूनी अधिकार है — यह "कर-न-दो" अभियान था।

◆ कारावास — 1897 में राजद्रोह के आरोप में 18 महीने का कारावास हुआ; इसी के बाद जनता ने उन्हें "लोकमान्य" (जनता द्वारा मान्य) कहना शुरू किया। 1908 में "केसरी" के लेखों के लिए 6 वर्ष की सज़ा देकर उन्हें मांडले (बर्मा) जेल भेजा गया। विरोध में बम्बई के कपड़ा मिल मज़दूरों ने हड़ताल की, जिसे भारत की पहली बड़ी राजनीतिक हड़ताल माना जाता है। मांडले में उन्होंने "गीता रहस्य" लिखी; इससे पहले वे "द आर्कटिक होम इन द वेदाज़" (1903) लिख चुके थे।

◆ बाद का जीवन — जून 1914 में रिहा होकर उन्होंने 1916 में होमरूल लीग बनाई और लखनऊ समझौते में मुख्य भूमिका निभाई। 1918 में वे वैलेंटाइन चिरोल पर मानहानि का मुक़दमा लड़ने इंग्लैंड गए। चिरोल ने अपनी पुस्तक "इंडियन अनरेस्ट" (1910) में उन्हें "भारतीय अशांति का जनक" कहा था। तिलक कभी कांग्रेस अध्यक्ष नहीं बने, पर जनता उन्हें "भारत का बेताज बादशाह" कहती थी। 1 अगस्त 1920 को उनका निधन हुआ; गांधीजी ने उन्हें "आधुनिक भारत का निर्माता" कहा।

❝ स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा। ❞ (बाल गंगाधर तिलक (होमरूल आंदोलन, 1916))

🦁 लाला लाजपत राय (1865–1928)

पंजाब में जन्मे लाजपत राय वकील थे और आर्य समाज तथा डी.ए.वी. (दयानंद एंग्लो-वैदिक) शिक्षा आंदोलन से गहराई से जुड़े थे। उन्होंने पंजाब में स्वदेशी आंदोलन का नेतृत्व किया, जिसके कारण मई 1907 में उन्हें अजीत सिंह के साथ बिना मुक़दमे के मांडले (बर्मा) निर्वासित कर दिया गया। वे इतालवी क्रांतिकारी मैज़िनी को अपना राजनीतिक गुरु मानते थे और उसकी पुस्तक "ड्यूटीज़ ऑफ़ मैन" (मनुष्य के कर्तव्य) का उर्दू में अनुवाद किया। 1914 से 1919 तक वे अमेरिका में रहे, जहाँ "यंग इंडिया" पुस्तक (1916) लिखी और इंडियन होमरूल लीग ऑफ़ अमेरिका (1917) बनाई। वे 1920 के कलकत्ता विशेष अधिवेशन के अध्यक्ष बने। 1928 में साइमन कमीशन के विरुद्ध लाहौर में प्रदर्शन के दौरान पुलिस की लाठियों से घायल हुए और 17 नवंबर 1928 को उनका निधन हो गया। उन्हें "पंजाब केसरी" और "शेर-ए-पंजाब" कहा जाता है।

📰 बिपिनचंद्र पाल (1858–1932)

पाल का जन्म हबीगंज (सिलहट, आज बांग्लादेश) में हुआ। वे आरंभ में ब्रह्म समाज से जुड़े रहे और प्रभावशाली वक्ता तथा पत्रकार बने। उन्होंने 1901 में अंग्रेज़ी साप्ताहिक "न्यू इंडिया" निकाला और बाद में "वंदे मातरम्" पत्र से जुड़े। उनका 1907 का मद्रास दौरा ऐतिहासिक था — उनके भाषणों ने आंध्र और तमिल क्षेत्र में स्वदेशी को गति दी। विदेशी शासन से पूर्ण असहयोग जैसे उनके तीखे विचारों के कारण उन्हें "क्रांतिकारी विचारों का जनक" कहा जाता है। बाद के वर्षों में वे सक्रिय राजनीति से दूर हो गए।

🕉️ अरविंद घोष (1872–1950)

अरविंद का जन्म 15 अगस्त 1872 को कलकत्ता में हुआ और शिक्षा इंग्लैंड में हुई। वे बड़ौदा रियासत की सेवा में रहे और 1893–94 में "न्यू लैम्प्स फ़ॉर ओल्ड" लेखों से उदारवादियों की आलोचना की। स्वदेशी आंदोलन के समय वे बंगाल लौटे, बंगाल नेशनल कॉलेज के पहले प्राचार्य बने और अंग्रेज़ी दैनिक "बंदे मातरम्" (1906) में लेख लिखकर निष्क्रिय प्रतिरोध का सिद्धांत रखा (खंड 7)। 1908 के अलीपुर षड्यंत्र केस में उन्हें गिरफ़्तार किया गया, पर चित्तरंजन दास की पैरवी से 1909 में वे बरी हो गए। इसके बाद उन्होंने "कर्मयोगिन" और "धर्म" पत्र निकाले, और 1910 में पांडिचेरी जाकर आध्यात्मिक जीवन अपना लिया, जहाँ वे "श्री अरविंद" के नाम से प्रसिद्ध हुए।

अन्य नेता: बंगाल के राजनारायण बोस (जिन्हें "भारतीय राष्ट्रवाद का पितामह" कहा गया), बारीसाल के अश्विनी कुमार दत्त, पंजाब के अजीत सिंह (भगत सिंह के चाचा), तमिलनाडु के वी. ओ. चिदंबरम पिल्लै और कवि सुब्रमण्य भारती भी इस धारा के प्रमुख नेता थे।

⚖️ नरम दल और गरम दल: तुलना

नीचे का चार्ट दोनों धाराओं को छह आधारों पर आमने-सामने रखता है। चार्ट के बाद हर आधार को विस्तार से समझाया गया है।

चित्र 10.3: नरम दल और गरम दल की तुलना
चित्र 10.3: नरम दल और गरम दल की तुलना

◆ काल — नरम दल का प्रभुत्व 1885 से 1905 तक रहा; गरम दल का उभार 1905 से 1920 तक (तिलक की मृत्यु तक) माना जाता है। 1907 से 1915 तक गरम दल कांग्रेस से बाहर रहा।

◆ नेता — नरम दल में दादाभाई नौरोजी, फ़िरोज़शाह मेहता, सुरेंद्रनाथ बनर्जी, गोखले, रानाडे, दिनशा वाचा और डब्ल्यू. सी. बनर्जी प्रमुख थे। गरम दल में तिलक, लाजपत राय, बिपिनचंद्र पाल ("लाल-बाल-पाल"), अरविंद घोष, राजनारायण बोस और अश्विनी कुमार दत्त प्रमुख थे।

◆ सामाजिक आधार — नरम दल का आधार शहरी उच्च-मध्यम वर्ग — वकील, ज़मींदार और व्यापारी — था, जो मानता था कि जनता अभी राजनीति के लिए "तैयार नहीं" है। गरम दल का आधार शिक्षित निम्न-मध्यम वर्ग, छात्र और युवा थे, और उसे जनता की त्याग-क्षमता में अटूट विश्वास था।

◆ ब्रिटिश शासन पर दृष्टि — नरम दल मानता था कि अंग्रेज़ न्यायप्रिय हैं और ब्रिटिश संबंध भारत के लिए "ईश्वरीय वरदान" है; वह ब्रिटिश ताज के प्रति निष्ठा रखता था। गरम दल के लिए ब्रिटिश शासन शोषक और अन्यायी था, जिसे सुधारा नहीं, हटाया जाना चाहिए, और जो निष्ठा के योग्य नहीं था।

◆ लक्ष्य — नरम दल का लक्ष्य प्रशासनिक और संवैधानिक सुधार तथा धीरे-धीरे स्वशासित उपनिवेशों जैसा शासन था। गरम दल का लक्ष्य स्वराज था — तिलक के शब्दों में, "स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है"।

◆ तरीक़ा — नरम दल प्रार्थना, याचिका और प्रतिवेदन (तीन "प") के संवैधानिक रास्ते पर चला और सभा, भाषण, अख़बार तथा ब्रिटेन में प्रचार का सहारा लिया। गरम दल ने स्वदेशी, बहिष्कार, राष्ट्रीय शिक्षा और निष्क्रिय प्रतिरोध अपनाए और उत्सवों तथा प्रतीकों के माध्यम से जनजागरण किया।

◆ प्रेरणा — नरम दल की प्रेरणा पश्चिमी उदारवाद, यूरोपीय इतिहास और ब्रिटिश संसदीय परंपरा थी। गरम दल की प्रेरणा भारतीय इतिहास और सांस्कृतिक विरासत — शिवाजी, गीता और "वंदे मातरम्" — थी।

💡 दोनों धाराओं को सही नज़र से देखें

तिलक ने कहा था — "आज के गरमपंथी कल के नरमपंथी होंगे, जैसे आज के नरमपंथी कल के गरमपंथी थे।" दोनों ही देशभक्त थे; अंतर लक्ष्य की गति और तरीक़ों का था, नीयत का नहीं। नरम दल ने जो वैचारिक नींव रखी, उसी पर गरम दल ने जन-आंदोलन की इमारत खड़ी की।

गरम दल की सीमा — हिंदू धार्मिक प्रतीकों (गणपति, शिवाजी, काली) के उपयोग से मुसलमानों का एक बड़ा वर्ग आंदोलन से दूर रहा; किसान वर्ग को भी पूरी तरह नहीं जोड़ा जा सका, और कोई मज़बूत संगठन नहीं बन पाया।

6. लॉर्ड कर्ज़न की नीतियाँ और बंगाल विभाजन (1905)

लॉर्ड कर्ज़न (वायसराय जनवरी 1899 से नवंबर 1905 तक) परिश्रमी और कुशल प्रशासक था, पर घोर साम्राज्यवादी भी। वह शिक्षित भारतीयों और कांग्रेस को तुच्छ समझता था और मानता था कि भारतीय ऊँचे पदों के योग्य नहीं। उसकी नीतियों का उद्देश्य प्रशासन को कसना और राष्ट्रवादी चेतना को कमज़ोर करना था — पर परिणाम उल्टा हुआ। इसलिए कहा जाता है कि कर्ज़न अनजाने में भारतीय राष्ट्रवाद का सबसे बड़ा सहायक बन गया।

🏛️ कर्ज़न के प्रमुख क़दम

◆ कलकत्ता कॉर्पोरेशन अधिनियम (1899) — कलकत्ता नगर निगम में निर्वाचित सदस्यों की संख्या घटा दी गई और अंग्रेज़ अधिकारियों तथा व्यापारियों का वर्चस्व बढ़ा दिया गया। विरोध में 28 भारतीय सदस्यों ने त्यागपत्र दे दिया। भारतीयों ने इसे स्थानीय स्वशासन पर सीधा हमला माना।

◆ प्रशासनिक क़दम (1900–1901) — पंजाब भूमि हस्तांतरण अधिनियम (1900) से किसानों की ज़मीन साहूकारों के हाथ जाने पर रोक लगी; अकाल और सिंचाई आयोग बने; नवंबर 1901 में पंजाब से अलग करके पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत बनाया गया; और राजघरानों के युवकों के लिए इंपीरियल कैडेट कोर बनी। ये क़दम कुछ मायनों में उपयोगी थे, पर इनसे शासन का केंद्रीकरण बढ़ा।

◆ पुलिस और विश्वविद्यालय आयोग (1902) — सर एंड्रयू फ़्रेज़र की अध्यक्षता में पुलिस आयोग ने पुलिस के प्रशिक्षण पर सुझाव दिए। टॉमस रैले की अध्यक्षता में बने विश्वविद्यालय आयोग ने विश्वविद्यालयों पर सरकारी नियंत्रण बढ़ाने की ज़मीन तैयार की, इसलिए शिक्षित वर्ग इससे आशंकित था।

◆ दिल्ली दरबार (1 जनवरी 1903) — एडवर्ड सप्तम के राज्यारोहण के उपलक्ष्य में भव्य दरबार हुआ। 1899–1900 के भीषण अकाल के बाद ऐसी शाही तड़क-भड़क पर भारी ख़र्च से जनता में गहरा आक्रोश फैला।

◆ तिब्बत अभियान और पूसा संस्थान (1903–05) — रूसी प्रभाव रोकने के बहाने यंगहसबैंड के नेतृत्व में सेना तिब्बत भेजी गई, जिसका ख़र्च भारत ने उठाया — यह साम्राज्यवादी विदेश नीति का उदाहरण था। दूसरी ओर बिहार के पूसा में कृषि अनुसंधान संस्थान की स्थापना एक रचनात्मक क़दम था।

◆ भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम (1904) — इससे विश्वविद्यालयों के प्रबंध-मंडलों (सीनेट) में सरकार द्वारा मनोनीत सदस्यों का वर्चस्व हो गया और कॉलेजों की मान्यता पर सरकारी नियंत्रण बढ़ा। शिक्षित वर्ग ने इसे उच्च शिक्षा को महँगा और सरकार-नियंत्रित बनाने का प्रयास माना।

◆ अन्य अधिनियम (1904) — सरकारी गोपनीयता (संशोधन) अधिनियम से प्रेस की स्वतंत्रता पर अंकुश लगा; प्राचीन स्मारक संरक्षण अधिनियम से पुरातत्व संरक्षण को क़ानूनी आधार मिला; और सहकारी ऋण समिति अधिनियम से ग्रामीण ऋण के लिए सहकारी समितियाँ बनीं।

◆ अपमानजनक भाषण (फ़रवरी 1905) — कलकत्ता विश्वविद्यालय के दीक्षांत भाषण में कर्ज़न ने कहा कि "सत्य" का ऊँचा आदर्श मूलतः पश्चिमी है और पूर्व में चालाकी और कूटनीति को अधिक सम्मान मिलता है। इस अपमान से पूरे शिक्षित भारत में रोष फैल गया।

◆ बंगाल विभाजन (1905) — कर्ज़न का सबसे विवादित क़दम, जिसने राष्ट्रीय आंदोलन में उबाल ला दिया (नीचे विस्तार)।

✂️ बंगाल विभाजन — "प्रशासनिक सुविधा" या "फूट डालो"?

सरकार ने विभाजन का कारण "प्रशासनिक सुविधा" बताया। पर गृह सचिव रिज़्ले की यह गोपनीय टिप्पणी उसकी असली नीयत बता देती है:

❝ एकजुट बंगाल एक शक्ति है; विभाजित होने पर वह कई दिशाओं में खिंच जाएगा... हमारा मुख्य उद्देश्य उसे बाँटना और इस तरह अपने शासन के विरोधियों के संगठित समूह को कमज़ोर करना है। ❞ (हर्बर्ट रिज़्ले, गृह सचिव (1904))

◆ पृष्ठभूमि — उस समय बंगाल प्रेसीडेंसी में आज का पश्चिम बंगाल, बांग्लादेश, बिहार, उड़ीसा और छोटानागपुर शामिल थे। इसका क्षेत्रफल लगभग 1,89,000 वर्ग मील और जनसंख्या लगभग 7.85 करोड़ थी। सरकार का तर्क था कि इतना बड़ा प्रांत एक लेफ़्टिनेंट गवर्नर (तब एंड्रयू फ़्रेज़र) के लिए ठीक से चलाना कठिन है, इसलिए पूर्वी ज़िलों की उपेक्षा होती है।

◆ योजना — दिसंबर 1903 में गृह सचिव हर्बर्ट रिज़्ले के एक पत्र से विभाजन की योजना सार्वजनिक हुई। फ़रवरी 1904 में कर्ज़न ने ढाका का दौरा किया और मुस्लिम नेताओं, विशेषकर ढाका के नवाब सलीमुल्ला, को यह कहकर मनाने की कोशिश की कि नए प्रांत में मुसलमानों को वह महत्त्व मिलेगा जो उन्हें मुग़लों के बाद कभी नहीं मिला।

◆ घोषणा और लागू होना — भारी विरोध के बावजूद 19–20 जुलाई 1905 को विभाजन की घोषणा हुई और 16 अक्टूबर 1905 से यह लागू हो गया।

◆ असली उद्देश्य — बंगाल उस समय राष्ट्रीय चेतना का सबसे बड़ा केंद्र था। विभाजन के पीछे तीन उद्देश्य थे: (1) भाषा के आधार पर बांग्लाभाषियों को दो प्रांतों में बाँटना और पश्चिमी बंगाल में उन्हें हिंदी-उड़िया भाषियों के बीच अल्पसंख्यक बना देना; (2) धर्म के आधार पर हिंदू-बहुल पश्चिम और मुस्लिम-बहुल पूर्व बनाकर दोनों समुदायों को बाँटना; और (3) राजनीतिक गतिविधियों के केंद्र कलकत्ता का महत्त्व घटाना।

🗺️ मानचित्र में दोनों प्रांत

नीचे का मानचित्र विभाजन के बाद के दोनों प्रांत दिखाता है। नारंगी भाग शेष बंगाल प्रांत है और हरा भाग नया प्रांत पूर्वी बंगाल और असम।

चित्र 10.4: बंगाल विभाजन (1905): बंगाल प्रांत और पूर्वी बंगाल-असम
चित्र 10.4: बंगाल विभाजन (1905): बंगाल प्रांत और पूर्वी बंगाल-असम

◆ शेष बंगाल प्रांत (नारंगी) — इसमें पश्चिमी बंगाल के साथ बिहार, उड़ीसा और छोटानागपुर रहे। इसकी राजधानी कलकत्ता रही। मानचित्र में इसके प्रमुख नगर पटना (बिहार), राँची (छोटानागपुर) और कटक (उड़ीसा) दिखाए गए हैं। कुल जनसंख्या में यह हिंदू-बहुल था, पर यहाँ बांग्ला बोलने वाले अल्पसंख्यक हो गए, क्योंकि बहुमत हिंदी और उड़िया भाषियों का था।

◆ पूर्वी बंगाल और असम (हरा) — इसमें बंगाल के ढाका, चटगाँव और राजशाही डिवीज़न, हिल टिपरा (त्रिपुरा) और पूरा असम शामिल किया गया। इसकी राजधानी ढाका बनी और शिलांग ग्रीष्मकालीन राजधानी रही। इसकी जनसंख्या लगभग 3.1 करोड़ थी, जिसमें मुसलमानों का बहुमत था। इसके पहले लेफ़्टिनेंट गवर्नर बैमफ़ील्ड फ़ुलर थे, जिनकी कठोर नीतियों से आंदोलन और भड़का।

◆ मानचित्र के अन्य स्थान — मैमनसिंह के मोचियों ने विदेशी जूतों की मरम्मत से इनकार करके बहिष्कार में भाग लिया; बारीसाल में अश्विनी कुमार दत्त की स्वदेश बांधव समिति आंदोलन का सबसे संगठित केंद्र बनी; बागेरहाट (खुलना) में 16 जुलाई 1905 की सभा ने सबसे पहले बहिष्कार के सुझाव का समर्थन किया (खंड 7 देखें)।

📌 याद रखें

विभाजन के समय वायसराय — कर्ज़न; गृह सचिव — रिज़्ले; बंगाल के लेफ़्टिनेंट गवर्नर — एंड्रयू फ़्रेज़र; नए प्रांत के पहले लेफ़्टिनेंट गवर्नर — बैमफ़ील्ड फ़ुलर; नई राजधानी — ढाका।

घोषणा — 19–20 जुलाई 1905; लागू — 16 अक्टूबर 1905; रद्द करने की घोषणा — 12 दिसंबर 1911 (दिल्ली दरबार)।

7. स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलन (1905–1911)

विभाजन का विरोध दो चरणों में हुआ। 1903 से मध्य 1905 तक नरमपंथी तरीक़े अपनाए गए — सभाएँ, याचिकाएँ, ज्ञापन और अख़बारों में लेख। जब इनका कोई असर नहीं हुआ और सरकार ने विभाजन की घोषणा कर दी, तब अगस्त 1905 से स्वदेशी और बहिष्कार का जन-आंदोलन शुरू हुआ। यह 1857 के बाद का पहला बड़ा राष्ट्रीय जन-आंदोलन था और आगे चलकर गांधीजी के आंदोलनों की प्रयोगशाला बना।

🔍 आसान परिभाषा: स्वदेशी और बहिष्कार

📘 परिभाषा: स्वदेशी — अपने देश में बनी वस्तुओं का उपयोग करना और देशी उद्योग, शिक्षा तथा संस्थाएँ खड़ी करना। बहिष्कार — विदेशी (मुख्यतः ब्रिटिश) वस्तुओं, और आगे चलकर सरकारी स्कूलों, अदालतों, उपाधियों और नौकरियों का त्याग करना।

💡 आसान भाषा में: बहिष्कार "नहीं" कहना है और स्वदेशी "हाँ" कहना — विदेशी को ना, अपने को हाँ। दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू थे। 🏠 उदाहरण: मैनचेस्टर का कपड़ा जलाना बहिष्कार था, और उसकी जगह बंगलक्ष्मी मिल का कपड़ा पहनना स्वदेशी।

📅 आंदोलन का कालक्रम (1903–1911)

नीचे का चार्ट विभाजन की योजना से उसके रद्द होने तक के आठ पड़ाव दिखाता है। चार्ट के बाद हर पड़ाव को विस्तार से समझाया गया है।

चित्र 10.5: बंगाल विभाजन और स्वदेशी आंदोलन का कालक्रम (1903–1911)
चित्र 10.5: बंगाल विभाजन और स्वदेशी आंदोलन का कालक्रम (1903–1911)

◆ दिसंबर 1903 — योजना सार्वजनिक — रिज़्ले के पत्र से योजना सामने आते ही बंगाल में सैकड़ों विरोध-सभाएँ हुईं, याचिकाएँ भेजी गईं और "बंगाली", "हितवादी", "संजीवनी" जैसे पत्रों में लेख छपे। यह नरम तरीक़ों का पहला चरण था, जो लगभग 1905 के मध्य तक चला।

◆ जुलाई 1905 — घोषणा और बहिष्कार का सुझाव — 13 जुलाई 1905 को कृष्ण कुमार मित्र ने बांग्ला साप्ताहिक "संजीवनी" में सबसे पहले ब्रिटिश माल के बहिष्कार, शोक मनाने और सरकारी संस्थाओं से संबंध तोड़ने का सुझाव दिया। 16 जुलाई को बागेरहाट (खुलना) की सभा ने इसका समर्थन किया, और 19–20 जुलाई को सरकार ने विभाजन की घोषणा कर दी।

◆ 7 अगस्त 1905 — औपचारिक घोषणा — कलकत्ता के टाउन हॉल की विशाल सभा में बहिष्कार प्रस्ताव पारित हुआ। इसी दिन को स्वदेशी आंदोलन का औपचारिक आरंभ माना जाता है। (इसी स्मृति में 2015 से 7 अगस्त को राष्ट्रीय हथकरघा दिवस मनाया जाता है।) 28 सितंबर 1905 को कलकत्ता के कालीघाट मंदिर पर 50,000 से अधिक लोगों ने मातृभूमि की सेवा और विदेशी वस्तुओं के त्याग की शपथ ली।

◆ 16 अक्टूबर 1905 — शोक दिवस — विभाजन लागू होने के दिन पूरे बंगाल में शोक मनाया गया। लोगों ने उपवास रखा, घरों में चूल्हा नहीं जला (इसे "अरंधन" कहा गया), दुकानें बंद रहीं, नंगे पैर गंगा स्नान किया गया और "वंदे मातरम्" की प्रभातफेरियाँ निकलीं। टैगोर के आह्वान पर राखी बंधन हुआ और "आमार सोनार बांग्ला" गाया गया। आनंद मोहन बोस ने अखंड बंगाल के प्रतीक "फ़ेडरेशन हॉल" की नींव रखी।

◆ दिसंबर 1905 / 1906 — कांग्रेस का समर्थन — 1905 के बनारस अधिवेशन में अध्यक्ष गोखले ने विभाजन की निंदा की और बंगाल में स्वदेशी-बहिष्कार का समर्थन किया। 1906 के कलकत्ता अधिवेशन में अध्यक्ष दादाभाई नौरोजी ने पहली बार "स्वराज" को लक्ष्य घोषित किया और स्वराज, स्वदेशी, बहिष्कार तथा राष्ट्रीय शिक्षा के चार प्रस्ताव पारित हुए।

◆ 1906–1908 — चरम — राष्ट्रीय शिक्षा परिषद और बंगाल नेशनल कॉलेज (1906) बने, स्वदेशी उद्यम खुले, स्वयंसेवी समितियाँ गाँव-गाँव तक पहुँचीं और आंदोलन पंजाब, बम्बई, मद्रास, दिल्ली और आंध्र तक फैल गया (विस्तार नीचे)।

◆ 1907–1910 — फूट और दमन — 1907 में सूरत में कांग्रेस टूट गई, लाजपत राय और अजीत सिंह निर्वासित हुए, 1908 में तिलक को 6 वर्ष का कारावास मिला, और प्रेस तथा सभाओं पर कड़े क़ानून बने (खंड 9)।

◆ 12 दिसंबर 1911 — विभाजन रद्द — दिल्ली दरबार में सम्राट जॉर्ज पंचम ने विभाजन रद्द करने और राजधानी कलकत्ता से दिल्ली ले जाने की घोषणा की (नीचे विस्तार)।

🧵 संघर्ष के तरीक़े

◆ बहिष्कार और धरना — मैनचेस्टर का कपड़ा, लिवरपूल का नमक और विदेशी चीनी मुख्य निशाने थे। सार्वजनिक स्थानों पर विदेशी कपड़ों की होली जलाई गई और विदेशी माल बेचने वाली दुकानों पर धरना दिया गया। आम लोगों ने भी अपने ढंग से भाग लिया — मैमनसिंह के मोचियों ने विदेशी जूते सुधारने से, धोबियों ने विदेशी कपड़े धोने से और बारीसाल के उड़िया रसोइयों ने विदेशी माल वाले घरों में काम करने से इनकार कर दिया। छात्रों ने विदेशी काग़ज़ वाली उत्तर-पुस्तिकाएँ ठुकरा दीं।

◆ सामाजिक बहिष्कार — जो लोग विदेशी माल ख़रीदते या बेचते थे, उनका हुक्का-पानी बंद कर दिया जाता था, यानी पुरोहित, नाई और धोबी उनका काम नहीं करते थे और समाज उनसे संबंध तोड़ लेता था। यह तरीक़ा प्रभावी था, पर इसमें ज़ोर-ज़बरदस्ती भी हुई।

◆ स्वदेशी उद्यम — विदेशी माल का विकल्प देने के लिए देशी उद्योग खोले गए — प्रफुल्लचंद्र राय का बंगाल केमिकल्स (1901 में स्थापित, इस दौर में ख़ूब फला), बंगलक्ष्मी कॉटन मिल्स (1906), माचिस, साबुन और चमड़े के कारख़ाने, तथा स्वदेशी बैंक और बीमा कंपनियाँ। तूतीकोरिन में वी. ओ. चिदंबरम पिल्लै ने अंग्रेज़ जहाज़ी कंपनियों को चुनौती देने के लिए स्वदेशी स्टीम नेविगेशन कंपनी (1906) बनाई। 1907 में जमशेदपुर में टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी बनी। दिसंबर 1905 में बनारस में पहला भारतीय औद्योगिक सम्मेलन हुआ, जिसके अध्यक्ष आर. सी. दत्त थे।

◆ राष्ट्रीय शिक्षा — जब सरकार ने आंदोलन में भाग लेने वाले छात्रों पर कार्रवाई की, तो नेताओं ने अपनी शिक्षा-व्यवस्था बनाई। मार्च 1906 में राष्ट्रीय शिक्षा परिषद बनी, 15 अगस्त 1906 को कलकत्ता में बंगाल नेशनल कॉलेज खुला, जिसके पहले प्राचार्य अरविंद घोष थे, और उसी वर्ष बंगाल टेक्निकल इंस्टीट्यूट बना (जो आगे चलकर जादवपुर विश्वविद्यालय बना)। ज़िलों में राष्ट्रीय विद्यालय खुले, जहाँ शिक्षा मातृभाषा में दी जाती थी। इसकी प्रेरणा सतीश चंद्र मुखर्जी की डॉन सोसाइटी (1902) से मिली थी।

◆ स्वयंसेवी समितियाँ — बारीसाल में अश्विनी कुमार दत्त की स्वदेश बांधव समिति सबसे प्रसिद्ध थी, जिसकी सैकड़ों शाखाएँ थीं। ये समितियाँ अकाल और बीमारी में राहत पहुँचाती थीं, गाँवों में पंचायती अदालतें चलाती थीं, स्वदेशी शिल्प सिखाती थीं और स्वदेशी का संदेश फैलाती थीं। ढाका अनुशीलन और फ़रीदपुर की ब्रती समिति भी सक्रिय थीं। इन समितियों ने छुआछूत और बाल विवाह के विरुद्ध भी जागरण किया।

◆ परंपरागत उत्सव और लोक-संस्कृति — तिलक के गणपति और शिवाजी उत्सवों का प्रयोग बंगाल तक पहुँचा। मुकुंद दास की जात्रा (लोकनाट्य) गाँव-गाँव में राष्ट्रीय संदेश ले गई, और मेलों में भी राष्ट्रीय गीत गाए जाने लगे। इसका परिणाम यह हुआ कि आंदोलन अनपढ़ जनता तक भी पहुँचा।

◆ साहित्य, कला और विज्ञान — टैगोर का "आमार सोनार बांग्ला" इसी दौर का गीत है, जो 1971 में बांग्लादेश का राष्ट्रगान बना। रजनीकांत सेन, द्विजेंद्रलाल राय और सैयद अबू मोहम्मद ने भी देशभक्ति गीत लिखे, और तमिल में सुब्रमण्य भारती ने। "वंदे मातरम्" पूरे आंदोलन का शीर्षक-गीत बन गया। कला में अवनींद्रनाथ टैगोर का "भारत माता" चित्र प्रसिद्ध हुआ, अवनींद्रनाथ और गगनेंद्रनाथ टैगोर ने इंडियन सोसाइटी ऑफ़ ओरिएंटल आर्ट (1907) बनाई और नंदलाल बोस उभरे। विज्ञान में जगदीश चंद्र बसु और प्रफुल्लचंद्र राय ने भारतीय प्रतिभा का लोहा मनवाया।

◆ स्वदेशी झंडा — 7 अगस्त 1906 को कलकत्ता के पारसी बागान चौक पर एक तिरंगा झंडा फहराया गया। इसमें हरी, पीली और लाल पट्टियाँ थीं; ऊपर की हरी पट्टी पर आठ कमल (आठ प्रांतों के प्रतीक) थे, बीच की पीली पट्टी पर "वंदे मातरम्" लिखा था, और नीचे की लाल पट्टी पर सूर्य और अर्धचंद्र (हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रतीक) थे।

🔍 आसान परिभाषा: निष्क्रिय प्रतिरोध

📘 परिभाषा: अन्यायपूर्ण सरकार के क़ानूनों, संस्थाओं और आदेशों का शांतिपूर्ण ढंग से पालन न करना — उसके माल, स्कूलों, अदालतों, नौकरियों और उपाधियों से संबंध तोड़ लेना — और इसके लिए मिलने वाली सज़ा को स्वीकार करना। अरविंद घोष ने 1907 में "बंदे मातरम्" में लेखमाला लिखकर इसे सिद्धांत का रूप दिया।

💡 आसान भाषा में: सरकार से लड़ना नहीं, पर उसका "साथ देना" बंद कर देना — जैसे पूरा गाँव किसी अन्यायी मुखिया की बात मानना और उसके यहाँ काम करना छोड़ दे, तो उसकी ताक़त अपने-आप ख़त्म हो जाती है। 🏠 उदाहरण: विदेशी कपड़ा न ख़रीदना, सरकारी स्कूल छोड़कर राष्ट्रीय विद्यालय में पढ़ना और सरकारी अदालत की जगह पंचायती अदालत में जाना — यही तरीक़े आगे गांधीजी के असहयोग आंदोलन में बड़े पैमाने पर अपनाए गए।

🗺️ देशभर में प्रसार

◆ बंगाल — आरंभ में सुरेंद्रनाथ बनर्जी, कृष्ण कुमार मित्र और नरेंद्र कुमार सेन जैसे नरमपंथियों ने नेतृत्व किया। 1906 के बाद नेतृत्व बिपिनचंद्र पाल, अरविंद घोष और अश्विनी कुमार दत्त जैसे गरमपंथियों के हाथ में आ गया।

◆ बम्बई और पूना — तिलक ने आंदोलन को केवल बंगाल का प्रश्न न मानकर पूरे देश में फैलाने पर ज़ोर दिया; एस. एम. परांजपे जैसे सहयोगियों के साथ महाराष्ट्र में स्वदेशी और बहिष्कार का प्रचार हुआ।

◆ पंजाब — लाला लाजपत राय और अजीत सिंह ने नेतृत्व किया, और आर्य समाज के मुंशीराम (बाद में स्वामी श्रद्धानंद) जैसे लोग जुड़े। 1907 में पंजाब उपनिवेशीकरण क़ानून और नहर-कर बढ़ोतरी के विरुद्ध किसानों का बड़ा आंदोलन हुआ, जिसमें "पगड़ी सँभाल जट्टा" गीत बहुत लोकप्रिय हुआ। इसी के बाद लाजपत राय और अजीत सिंह निर्वासित किए गए।

◆ दिल्ली — यहाँ सैयद हैदर रज़ा ने आंदोलन का नेतृत्व किया।

◆ मद्रास प्रेसीडेंसी — तूतीकोरिन में वी. ओ. चिदंबरम पिल्लै और कवि सुब्रमण्य भारती सबसे प्रमुख थे; जी. सुब्रमण्य अय्यर, पी. आनंद चार्लू और सुब्रमण्य शिव भी सक्रिय थे। 1908 में तूतीकोरिन की अंग्रेज़ी कोरल मिल में मज़दूरों की हड़ताल हुई, जिसे चिदंबरम पिल्लै का समर्थन था; इसके बाद उन्हें लंबी सज़ा दी गई।

◆ आंध्र — गोदावरी-कृष्णा डेल्टा क्षेत्र में इसे "वंदे मातरम् आंदोलन" कहा गया। 1907 में बिपिनचंद्र पाल के भाषण-दौरे ने यहाँ आंदोलन को गति दी।

📈 परिणाम, महत्त्व और सीमाएँ

आर्थिक प्रभाव: एक आकलन के अनुसार अगस्त 1905 से सितंबर 1906 के बीच आयातित सूती कपड़े की मात्रा में लगभग 22%, सूत में 44%, नमक में 11%, सिगरेट में 55% और जूतों में लगभग 68% की कमी आई। सामाजिक प्रभाव: पहली बार महिलाएँ बड़ी संख्या में घरों से निकलकर जुलूसों और धरनों में शामिल हुईं। कुछ मुस्लिम नेताओं — अब्दुल रसूल, लियाक़त हुसैन, अब्दुल ग़फ़ूर और ग़ज़नवी — ने भी आंदोलन का साथ दिया। ब्रिटिश पत्रकार एच. डब्ल्यू. नेविन्सन ने अपनी पुस्तक "द न्यू स्पिरिट इन इंडिया" (भारत में नई चेतना) में इस आंदोलन का वर्णन किया।

🌟 महत्त्व

✔ राष्ट्रीय आंदोलन शिक्षित वर्ग से आगे बढ़कर छात्रों, महिलाओं और शहरी निम्न वर्ग तक पहुँचा।

✔ आत्मनिर्भरता (आत्मशक्ति) का विचार आया, जिससे स्वदेशी उद्योग, शिक्षा और संस्कृति को बल मिला।

✔ निष्क्रिय प्रतिरोध, बहिष्कार और असहयोग के तरीक़े आए, जो गांधीवादी आंदोलनों की पूर्वपीठिका बने।

✔ कला, साहित्य और विज्ञान में राष्ट्रीय पुनर्जागरण हुआ।

✔ कांग्रेस ने "स्वराज" को अपना लक्ष्य घोषित किया (1906)।

⚠️ सीमाएँ और पतन के कारण

✔ किसान और बहुसंख्यक मुसलमान अधिकतर दूर रहे, और हिंदू प्रतीकों के प्रयोग से यह दूरी बढ़ी।

✔ कोई स्पष्ट केंद्रीय संगठन नहीं था, और 1907 में कांग्रेस ही टूट गई।

✔ कठोर दमन से नेता जेल या निर्वासन में चले गए; पाल और अरविंद राजनीति से अलग हो गए।

✔ स्वदेशी वस्तुएँ महँगी और कम थीं, इसलिए लंबे समय तक बहिष्कार कठिन था।

✔ निराश युवा क्रांतिकारी राष्ट्रवाद की ओर झुक गए (अध्याय 11)।

टैगोर का दृष्टिकोण: आरंभ में आंदोलन के प्रमुख स्वर रहे टैगोर बाद में इसकी हिंसा, ज़ोर-ज़बरदस्ती और संकीर्णता से दुखी होकर इससे अलग हो गए। उनका उपन्यास "घरे बाइरे" (घर और बाहर) इसी द्वंद्व को दिखाता है। वे पूर्व और पश्चिम के समन्वय के पक्षधर थे और मानते थे कि राष्ट्रवाद घृणा पर नहीं, रचनात्मक कार्य पर टिका होना चाहिए।

📌 विभाजन रद्द — 12 दिसंबर 1911

◆ कारण — लगातार छह वर्ष के आंदोलन, क्रांतिकारी गतिविधियों और बंगाल में अशांति के कारण सरकार ने समझ लिया कि विभाजन बनाए रखना कठिन है। साथ ही सरकार नरमपंथियों को संतुष्ट करना चाहती थी।

◆ घोषणा — सम्राट जॉर्ज पंचम और महारानी मैरी के स्वागत में हुए दिल्ली दरबार (वायसराय लॉर्ड हार्डिंग द्वितीय) में 12 दिसंबर 1911 को बंगाल विभाजन रद्द करने और राजधानी कलकत्ता से दिल्ली ले जाने की घोषणा हुई।

◆ नई व्यवस्था — 1 अप्रैल 1912 से बिहार और उड़ीसा एक अलग प्रांत बना, और असम फिर से मुख्य आयुक्त का प्रांत बना (सिलहट सहित, 1874 जैसी स्थिति)। बांग्लाभाषी क्षेत्र फिर एक बंगाल प्रांत में आ गए। नई दिल्ली का औपचारिक उद्घाटन 1931 में हुआ।

◆ प्रतिक्रिया — राष्ट्रवादियों ने इसे अपनी जीत माना, पर मुस्लिम लीग के नेता नाराज़ हुए, क्योंकि उन्हें लगा कि सरकार ने उनका साथ छोड़ दिया। इस नाराज़गी ने आगे लीग को कांग्रेस के निकट लाने में भूमिका निभाई (खंड 10)।

8. मुस्लिम लीग (1906) और मार्ले-मिंटो सुधार (1909)

स्वदेशी आंदोलन से घबराई सरकार ने मुस्लिम उच्च वर्ग को राष्ट्रीय आंदोलन से अलग रखने की नीति अपनाई। अलीगढ़ कॉलेज के अंग्रेज़ प्रधानाचार्य आर्चबोल्ड और वायसराय मिंटो के निजी सचिव डनलप स्मिथ की सक्रियता से यह प्रक्रिया आगे बढ़ी। उसी समय इंग्लैंड में उदारवादी सरकार नए संवैधानिक सुधारों पर विचार कर रही थी, इसलिए मुस्लिम नेता चाहते थे कि सुधारों में उनके हित पहले से सुरक्षित हो जाएँ।

🌱 पृष्ठभूमि: अलीगढ़ आंदोलन से लीग तक

◆ सर सैयद की विरासत — सर सैयद अहमद ख़ाँ ने 1875 में अलीगढ़ में मोहम्मडन एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेज खोला था और मुसलमानों को आधुनिक शिक्षा की ओर मोड़ा था। पर वे कांग्रेस के विरोधी थे और मानते थे कि प्रतिनिधि शासन में संख्या में अधिक हिंदू हावी हो जाएँगे। उनकी मृत्यु (1898) के बाद भी अलीगढ़ के नेताओं पर यही सोच हावी रही।

◆ सरकार की बदली हुई नीति — 1857 के बाद अंग्रेज़ मुसलमानों को संदेह से देखते थे। पर जब शिक्षित हिंदू मध्यम वर्ग कांग्रेस के माध्यम से सरकार की आलोचना करने लगा, तो सरकार ने नीति बदली और मुस्लिम उच्च वर्ग — नवाबों, ज़मींदारों और अलीगढ़ के शिक्षित लोगों — को अपने पक्ष में करना शुरू किया। बंगाल विभाजन इसी नीति का हिस्सा था।

◆ तात्कालिक कारण — 1906 में भारत सचिव मार्ले ने संकेत दिया कि विधान परिषदों में निर्वाचित सदस्य बढ़ाए जाएँगे। मुस्लिम उच्च वर्ग को आशंका हुई कि चुनावों में वे पिछड़ जाएँगे। इसलिए उन्होंने सुधार लागू होने से पहले ही अपने लिए विशेष सुरक्षा माँगने का निश्चय किया।

🕌 शिमला प्रतिनिधिमंडल और मुस्लिम लीग की स्थापना

◆ शिमला प्रतिनिधिमंडल (1 अक्टूबर 1906) — आगा ख़ाँ तृतीय के नेतृत्व में लगभग 35 मुस्लिम नेताओं (कुछ स्रोतों में 36) का प्रतिनिधिमंडल शिमला में वायसराय लॉर्ड मिंटो से मिला। उन्होंने माँग की कि मुसलमानों को पृथक निर्वाचन मिले और उन्हें उनकी जनसंख्या से अधिक प्रतिनिधित्व दिया जाए, क्योंकि वे साम्राज्य की रक्षा में "योगदान" देते हैं और उनका "राजनीतिक महत्त्व" अधिक है। मिंटो ने सहानुभूतिपूर्ण आश्वासन दिया। कई इतिहासकार इस प्रतिनिधिमंडल को सरकार द्वारा ही प्रेरित ("आदेश पर प्रदर्शन") मानते हैं।

◆ स्थापना (30 दिसंबर 1906) — ढाका में अखिल भारतीय मुस्लिम शैक्षिक सम्मेलन के वार्षिक अधिवेशन के दौरान ढाका के नवाब सलीमुल्ला ख़ाँ के प्रस्ताव पर अखिल भारतीय मुस्लिम लीग का गठन हुआ। बैठक की अध्यक्षता वक़ार-उल-मुल्क ने की; मोहसिन-उल-मुल्क और वक़ार-उल-मुल्क संयुक्त सचिव बने; आगा ख़ाँ इसके पहले (स्थायी) अध्यक्ष बने। इसका मुख्यालय आरंभ में अलीगढ़ में था और बाद में लखनऊ ले जाया गया।

◆ उद्देश्य — (1) भारतीय मुसलमानों में ब्रिटिश सरकार के प्रति निष्ठा बढ़ाना और सरकार के प्रति ग़लतफ़हमियाँ दूर करना; (2) मुसलमानों के राजनीतिक अधिकारों और हितों की रक्षा करना और उन्हें सरकार तक पहुँचाना; (3) इन उद्देश्यों को हानि पहुँचाए बिना अन्य समुदायों के प्रति कटुता रोकना। इसी नीति के अनुसार लीग ने बंगाल विभाजन का समर्थन और स्वदेशी-बहिष्कार का विरोध किया।

◆ विकास — दिसंबर 1907 के कराची अधिवेशन में लीग का संविधान बना, और 1908 के अमृतसर अधिवेशन (अध्यक्ष सर अली इमाम) में पृथक निर्वाचन की माँग ज़ोर से उठाई गई। 1908 में सैयद अमीर अली ने लंदन में लीग की शाखा बनाई, ताकि ब्रिटिश सरकार पर सीधा दबाव डाला जा सके।

◆ बदलाव (1913) — 1911 में विभाजन रद्द होने और तुर्की के प्रति ब्रिटिश नीति से नाराज़ होकर लीग ने 1913 में ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर स्वशासन को अपना लक्ष्य बनाया। उसी वर्ष मुहम्मद अली जिन्ना भी, कांग्रेस के सदस्य रहते हुए, लीग में शामिल हुए।

🔍 आसान परिभाषा: पृथक निर्वाचन (सांप्रदायिक निर्वाचन)

📘 परिभाषा: ऐसी चुनाव-व्यवस्था, जिसमें किसी धार्मिक समुदाय (जैसे मुसलमानों) के लिए कुछ सीटें आरक्षित हों और उन सीटों पर केवल उसी समुदाय के मतदाता अपने ही समुदाय के उम्मीदवार को चुनें।

💡 आसान भाषा में: मान लीजिए किसी शहर में दो मतपेटियाँ हैं — एक में केवल मुसलमान मतदाता मुस्लिम उम्मीदवार को वोट दें, दूसरी में बाक़ी सब। तब नेताओं को केवल अपने समुदाय को ख़ुश करना होता है, पूरे समाज को नहीं। 🏠 उदाहरण: 1909 के मार्ले-मिंटो सुधारों में मुसलमानों को पृथक निर्वाचन मिला; इसलिए मिंटो को "सांप्रदायिक निर्वाचन का जनक" कहा गया। इसके विपरीत संयुक्त निर्वाचन में सब मिलकर वोट देते हैं, भले कुछ सीटें आरक्षित हों।

लीग का महत्त्व और सीमा: आरंभिक लीग जनता की नहीं, नवाबों और ज़मींदारों की संस्था थी, और उसका दायरा बहुत छोटा था। फिर भी इसका ऐतिहासिक महत्त्व बड़ा है, क्योंकि इसके साथ भारतीय राजनीति में धर्म के आधार पर अलग संगठन और अलग माँगों की परंपरा शुरू हुई। यह भी याद रखें कि सभी मुसलमान लीग के साथ नहीं थे — बदरुद्दीन तैयबजी, अब्दुल रसूल और आगे चलकर मौलाना आज़ाद जैसे नेता कांग्रेस और राष्ट्रीय आंदोलन के साथ रहे।

📜 भारतीय परिषद अधिनियम 1909 (मार्ले-मिंटो सुधार)

◆ पृष्ठभूमि — वायसराय लॉर्ड मिंटो (1905–10) और भारत सचिव जॉन मार्ले की नीति थी — "नरमपंथियों को मिलाओ, गरमपंथियों को दबाओ और मुसलमानों को अलग करो"। 1906 में नौरोजी और गोखले से बातचीत में सुधारों के संकेत दिए गए थे, और शिमला प्रतिनिधिमंडल की माँगें भी सामने थीं। (अधिनियम के संवैधानिक प्रावधानों का विस्तार अध्याय 3 में है।)

◆ मुख्य प्रावधान — केंद्रीय और प्रांतीय विधान परिषदों के सदस्यों की संख्या बढ़ाई गई और प्रांतीय परिषदों में ग़ैर-सरकारी सदस्यों का बहुमत हुआ। सदस्यों को बजट पर बहस करने, पूरक प्रश्न पूछने और प्रस्ताव रखने का अधिकार मिला। मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन की व्यवस्था हुई, जिससे सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व की शुरुआत हुई। वायसराय की कार्यकारी परिषद में पहली बार एक भारतीय — सत्येंद्र प्रसन्न सिन्हा (विधि सदस्य) — नियुक्त हुए। इससे पहले 1907 में भारत सचिव की परिषद में भी दो भारतीय सदस्य (के. जी. गुप्ता और सैयद हुसैन बिलग्रामी) लिए गए थे।

◆ परिषदों का आकार — केंद्रीय (शाही) विधान परिषद में अतिरिक्त सदस्यों की अधिकतम संख्या 16 से बढ़ाकर 60 कर दी गई। मतदाता सीधे सदस्य नहीं चुनते थे; नगरपालिकाएँ और ज़िला बोर्ड प्रांतीय परिषद के सदस्य चुनते थे और प्रांतीय परिषदों के सदस्य केंद्रीय परिषद के। ज़मींदारों, व्यापार मंडलों और विश्वविद्यालयों को भी अलग प्रतिनिधित्व दिया गया।

◆ आलोचना — चुनाव अप्रत्यक्ष थे और मताधिकार अत्यंत सीमित था। केंद्र में अब भी सरकारी बहुमत था और परिषदें केवल सलाह दे सकती थीं, उनके पास वास्तविक शक्ति नहीं थी। स्वयं मार्ले ने कहा कि इन सुधारों का लक्ष्य भारत में संसदीय शासन लाना नहीं है। सबसे गंभीर दुष्परिणाम पृथक निर्वाचन था, जिसने सांप्रदायिकता के बीज बोए और आगे चलकर विभाजन की राह तैयार की। गांधीजी ने बाद में कहा कि मार्ले-मिंटो सुधारों ने "हमारा सर्वनाश कर दिया"।

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9. सूरत विभाजन (1907) और सरकारी दमन

स्वदेशी आंदोलन के दौरान कांग्रेस के भीतर मतभेद तीखे हो गए। नरमपंथी आंदोलन को बंगाल तक और विभाजन-विरोध तक सीमित रखना चाहते थे और सरकार से बातचीत का रास्ता खुला रखना चाहते थे; उदारवादी मार्ले के भारत सचिव बनने से उन्हें सुधारों की आशा थी। गरमपंथी बहिष्कार को पूरे देश और हर प्रकार के सरकारी संबंध तक फैलाकर स्वराज के लिए जन-संघर्ष चाहते थे। यह टकराव चार चरणों में बढ़ा।

📖 कहानी 2: सूरत के ताप्ती-तट पर चली कुर्सियाँ — जब कांग्रेस दो टुकड़े हुई

1906 के कलकत्ता अधिवेशन में दादाभाई नौरोजी ने पहली बार “स्वराज” को लक्ष्य घोषित किया और स्वराज, स्वदेशी, बहिष्कार तथा राष्ट्रीय शिक्षा के चार प्रस्ताव पारित हुए। नरम दल को आशंका थी कि बात बहुत आगे बढ़ रही है। अगला अधिवेशन गरम दल के गढ़ नागपुर में होना था, पर नरम दल ने उसे बदलकर सूरत कर दिया, जो फ़िरोज़शाह मेहता के प्रभाव वाले बम्बई प्रांत में था। गरम दल को डर था कि वहाँ चारों प्रस्ताव हटा दिए जाएँगे।

26–27 दिसंबर 1907 को ताप्ती तट पर सूरत में अधिवेशन हुआ। गरम दल लाला लाजपत राय को अध्यक्ष चाहता था, पर उन्होंने स्वयं मना कर दिया। नरम दल ने रासबिहारी घोष को अध्यक्ष बनाया। प्रस्तावों के प्रश्न पर तिलक बोलना चाहते थे, पर उन्हें बोलने नहीं दिया गया। हंगामा हुआ, कुर्सियाँ चलीं और एक जूता मंच पर फ़िरोज़शाह मेहता और सुरेंद्रनाथ बनर्जी को जा लगा। अधिवेशन भंग हो गया।

अप्रैल 1908 के इलाहाबाद कन्वेंशन में नरम दल ने कांग्रेस का लिखित संविधान बनाया, जिसमें सदस्य बनने के लिए “संवैधानिक साधनों से स्वशासन” का लक्ष्य मानना अनिवार्य कर दिया गया। इससे गरम दल के लौटने का रास्ता बंद हो गया।

सबसे ज़्यादा ख़ुश सरकार थी। वायसराय मिंटो ने भारत सचिव मार्ले को लिखा कि कांग्रेस का पतन उनकी बहुत बड़ी जीत है। इसके बाद गरम दल पर दमन हुआ: 1907 में लाजपत राय और अजीत सिंह मांडले भेजे गए, 1908 में तिलक को 6 वर्ष की सज़ा मिली। उधर नरमपंथियों को 1909 के सुधारों का आश्वासन मिला। दोनों दलों का फिर मेल 1916 के लखनऊ अधिवेशन में ही हो सका।

🧭 इस कहानी से कौन-सी अवधारणा साफ़ हुई

✔ मतभेद की जड़ — नरम दल आंदोलन को बंगाल और विभाजन-विरोध तक सीमित रखकर सरकार से बातचीत चाहता था। गरम दल बहिष्कार को पूरे देश और हर सरकारी संबंध तक फैलाकर स्वराज के लिए जन-संघर्ष चाहता था।

✔ गाजर और छड़ी की नीति — सरकार ने नरमपंथियों को सुधारों की गाजर दी और गरमपंथियों पर जेल, निर्वासन की छड़ी चलाई, ताकि वे एक न हो सकें।

✔ फूट की क़ीमत — 1908 से 1914 तक राष्ट्रीय आंदोलन में शिथिलता रही। इसी ख़ालीपन में क्रांतिकारी राष्ट्रवाद फैला। लाभ केवल सरकार को हुआ।

📝 परीक्षा के लिए: सूरत अधिवेशन (26–27 दिसंबर 1907, ताप्ती तट; अध्यक्ष रासबिहारी घोष) → कांग्रेस विभाजित → इलाहाबाद कन्वेंशन (अप्रैल 1908; संवैधानिक साधनों से स्वशासन) → मांडले में तिलक (1908, 6 वर्ष) → पुनर्मिलन लखनऊ (1916)।

◆ 1905, बनारस — अध्यक्ष गोखले ने स्वदेशी और बहिष्कार का केवल बंगाल के लिए सीमित समर्थन किया। गरम दल इसे पूरे देश में फैलाना चाहता था, पर उस समय टकराव टल गया।

◆ 1906, कलकत्ता — गरम दल अध्यक्ष पद के लिए तिलक या लाजपत राय को चाहता था, जबकि नरम दल इसके विरुद्ध था। टकराव टालने के लिए सबके सम्मानित दादाभाई नौरोजी को इंग्लैंड से बुलाकर अध्यक्ष बनाया गया। उन्होंने पहली बार "स्वराज" (स्वशासित उपनिवेशों जैसा शासन) को लक्ष्य घोषित किया और स्वराज, स्वदेशी, बहिष्कार और राष्ट्रीय शिक्षा के चार प्रस्ताव पारित हुए।

◆ 1907 की तैयारी — अगला अधिवेशन गरम दल के गढ़ नागपुर में होना था। नरम दल ने स्थान बदलकर सूरत कर दिया, जो फ़िरोज़शाह मेहता के प्रभाव वाले बम्बई प्रांत में था। गरम दल को आशंका थी कि वहाँ 1906 के चार प्रस्ताव हटा दिए जाएँगे।

◆ 26–27 दिसंबर 1907, सूरत (ताप्ती तट) — गरम दल अध्यक्ष पद के लिए लाला लाजपत राय को चाहता था, पर उन्होंने स्वयं मना कर दिया; नरम दल ने रासबिहारी घोष को अध्यक्ष बनाया। तिलक प्रस्तावों के प्रश्न पर बोलना चाहते थे, पर उन्हें बोलने नहीं दिया गया। हंगामा हुआ, कुर्सियाँ चलीं और एक जूता मंच पर फ़िरोज़शाह मेहता और सुरेंद्रनाथ बनर्जी को जा लगा। अधिवेशन भंग हो गया और कांग्रेस दो भागों में बँट गई।

◆ परिणाम — गरमपंथी कांग्रेस से बाहर हो गए। अप्रैल 1908 के इलाहाबाद कन्वेंशन में नरम दल ने कांग्रेस का लिखित संविधान बनाया, जिसमें सदस्य बनने के लिए "संवैधानिक साधनों से स्वशासन" के लक्ष्य को स्वीकार करना अनिवार्य कर दिया गया — इससे गरमपंथियों के लौटने का रास्ता बंद हो गया। 1908 का मद्रास अधिवेशन भी रासबिहारी घोष की अध्यक्षता में हुआ।

❝ सूरत में कांग्रेस का पतन हमारी बहुत बड़ी जीत है। ❞ (लॉर्ड मिंटो, भारत सचिव मार्ले को पत्र)

ज़िम्मेदार कौन था? सूरत की फूट के लिए दोनों पक्ष उत्तरदायी थे। नरमपंथी यह नहीं समझ पाए कि सरकार उनसे बातचीत केवल इसलिए कर रही है कि वह गरमपंथियों से डरती है; और गरमपंथी यह नहीं समझ पाए कि नरमपंथी उनकी अग्रिम रक्षा-पंक्ति हैं। दोनों ने भुला दिया कि विशाल साम्राज्य से लड़ने के लिए सबसे पहली ज़रूरत एकता की है। लाभ केवल सरकार को हुआ — उसने पहले गरम दल को कुचला और फिर नरम दल की भी उपेक्षा कर दी।

🔍 आसान परिभाषा: "गाजर और छड़ी" की नीति

📘 परिभाषा: शासन की वह नीति जिसमें विरोधियों के एक वर्ग को रियायतों का लालच (गाजर) देकर अपने साथ रखा जाता है और दूसरे वर्ग को कठोर दमन (छड़ी) से कुचला जाता है, ताकि वे आपस में एक न हो सकें।

💡 आसान भाषा में: एक हाथ में मिठाई और दूसरे में डंडा — जो बात मान ले उसे मिठाई, जो न माने उसे डंडा। 🏠 उदाहरण: 1907 के बाद सरकार ने नरमपंथियों को 1909 के सुधारों का आश्वासन दिया, गरमपंथियों को जेल और निर्वासन, और मुस्लिम उच्च वर्ग को पृथक निर्वाचन — इस तरह तीनों को अलग-अलग कर दिया।

⛓️ सरकारी दमन (1907–1911)

सूरत की फूट के बाद सरकार ने गरम दल और क्रांतिकारियों को कुचलने के लिए एक के बाद एक क़ानून बनाए, और साथ ही नरमपंथियों को सुधारों (1909) का आश्वासन देकर अपने साथ रखा।

◆ 1907 — राजद्रोहात्मक सभा निवारण अधिनियम बना, जिससे सरकार राजनीतिक सभाओं पर रोक लगा सकती थी (1911 में इसे स्थायी कर दिया गया)। मई 1907 में लाला लाजपत राय और अजीत सिंह को 1818 के बंगाल विनियम III के अंतर्गत, बिना मुक़दमा चलाए, मांडले (बर्मा) निर्वासित कर दिया गया।

◆ 1908 — समाचारपत्र (अपराध-उत्तेजन) अधिनियम से हिंसा भड़काने वाले पत्रों के प्रेस ज़ब्त किए जा सकते थे; विस्फोटक पदार्थ अधिनियम और आपराधिक क़ानून संशोधन अधिनियम भी बने। अश्विनी कुमार दत्त और कृष्ण कुमार मित्र सहित बंगाल के 9 नेता निर्वासित किए गए। तिलक को 6 वर्ष का कारावास देकर मांडले भेजा गया और वी. ओ. चिदंबरम पिल्लै को लंबी सज़ा दी गई।

◆ 1910 — भारतीय प्रेस अधिनियम से हर प्रेस से ज़मानत राशि ली जाने लगी और आपत्तिजनक सामग्री छापने पर प्रेस और ज़मानत ज़ब्त की जा सकती थी।

परिणाम: कांग्रेस पर नरमपंथियों का पूरा नियंत्रण हो गया, पर उसकी जन-अपील घट गई। गरम दल का नेतृत्व जेल, निर्वासन या संन्यास में चला गया — तिलक मांडले में थे, अरविंद पांडिचेरी चले गए और पाल राजनीति से अलग हो गए। इसलिए 1908 से 1914 का काल राष्ट्रीय आंदोलन में शिथिलता का रहा। इसी शून्य में क्रांतिकारी राष्ट्रवाद फला-फूला (अध्याय 11)। एनी बेसेंट ने सूरत विभाजन को कांग्रेस के इतिहास की सबसे दुखद घटना कहा।

10. प्रथम विश्वयुद्ध, होमरूल आंदोलन और लखनऊ समझौता (1914–1918)

प्रथम विश्वयुद्ध (1914–18) में एक ओर ब्रिटेन, फ़्रांस और रूस (बाद में अमेरिका, इटली और जापान) थे और दूसरी ओर जर्मनी, ऑस्ट्रिया-हंगरी और तुर्की। भारतीय नेताओं की प्रतिक्रिया अलग-अलग थी। नरमपंथियों ने इस आशा में युद्ध का समर्थन किया कि बदले में स्वशासन मिलेगा; जेल से छूटे तिलक ने भी सेना में भर्ती में सहयोग की अपील की; जबकि क्रांतिकारियों (ग़दर पार्टी आदि) ने इसे विद्रोह का अवसर माना (अध्याय 11)। युद्ध के कारण भारी कर, महँगाई, जबरन भर्ती और भारत रक्षा अधिनियम (1915) का दमन आया, जिससे जनता का असंतोष बढ़ा। इसी वातावरण में होमरूल आंदोलन जन्मा।

🔍 आसान परिभाषा: होमरूल और डोमिनियन दर्जा

📘 परिभाषा: होमरूल — ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर रहते हुए अपने देश का आंतरिक शासन स्वयं चलाने का अधिकार (स्वशासन)। डोमिनियन दर्जा — कनाडा, ऑस्ट्रेलिया जैसे स्वशासित उपनिवेशों की स्थिति, जो ब्रिटिश सम्राट को औपचारिक प्रमुख मानते हुए अपनी संसद और सरकार स्वयं चलाते थे।

💡 आसान भाषा में: घर (होम) का प्रबंध घर के लोग ही करें (रूल) — बाहरी व्यक्ति नहीं; पर घर एक बड़े परिवार (साम्राज्य) का हिस्सा बना रहे। 🏠 उदाहरण: यह नाम आयरलैंड के होमरूल आंदोलन से लिया गया था, जहाँ आयरिश लोग ब्रिटेन से अपने लिए स्वशासन माँग रहे थे।

👤 एनी बेसेंट (1847–1933)

एनी बेसेंट का जन्म लंदन में हुआ और उनका परिवार आयरिश मूल का था। वे 1893 में थियोसोफ़िकल सोसाइटी के काम से भारत आईं और यहीं बस गईं। 1898 में उन्होंने बनारस में सेंट्रल हिंदू कॉलेज खोला, जो आगे चलकर बनारस हिंदू विश्वविद्यालय का आधार बना। 1907 में वे थियोसोफ़िकल सोसाइटी की अध्यक्ष बनीं, जिसका मुख्यालय अड्यार (मद्रास) में था। 1914 में वे कांग्रेस में शामिल हुईं और "कॉमनवील" (साप्ताहिक) तथा "न्यू इंडिया" (दैनिक) पत्र निकाले। उनका प्रसिद्ध कथन था कि भारत को अपनी निष्ठा का पुरस्कार नहीं, अपना अधिकार चाहिए। 1917 में वे कांग्रेस की पहली महिला अध्यक्ष बनीं।

🏠 होमरूल आंदोलन (1916–1918)

◆ पृष्ठभूमि — एनी बेसेंट ने 2 जनवरी 1914 को अपने पत्र "कॉमनवील" में ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर स्वशासन की रूपरेखा रखी। जून 1914 में तिलक जेल से छूटे और गरमपंथियों की कांग्रेस में वापसी का प्रयास शुरू हुआ। दिसंबर 1915 के बम्बई अधिवेशन में कांग्रेस ने अपना संविधान बदलकर गरमपंथियों की वापसी का रास्ता खोला (फ़िरोज़शाह मेहता की मृत्यु के बाद विरोध कम हो गया था)। पर कांग्रेस स्वयं कोई आंदोलन चलाने को तैयार नहीं थी, इसलिए दो अलग लीगें बनीं।

◆ तिलक की इंडियन होमरूल लीग — इसकी स्थापना 28 अप्रैल 1916 को बेलगाँव के बम्बई प्रांतीय सम्मेलन में हुई और इसका मुख्यालय पूना था। इसके अध्यक्ष जोसेफ़ बैप्टिस्टा और सचिव एन. सी. केलकर थे; जी. एस. खापर्डे और बी. एस. मुंजे भी प्रमुख थे। इसका कार्यक्षेत्र महाराष्ट्र (बम्बई नगर को छोड़कर), कर्नाटक, मध्य प्रांत और बरार था। प्रचार "मराठा" और "केसरी" से होता था। 1918 के आरंभ तक इसके सदस्य लगभग 32,000 हो गए।

◆ एनी बेसेंट की ऑल इंडिया होमरूल लीग — इसकी स्थापना 3 सितंबर 1916 को अड्यार (मद्रास) में हुई। अध्यक्ष स्वयं एनी बेसेंट और संगठन सचिव जॉर्ज अरुंडेल थे; सी. पी. रामास्वामी अय्यर और बी. पी. वाडिया भी प्रमुख थे। इसका कार्यक्षेत्र शेष भारत (बम्बई नगर सहित) था और इसकी 200 से अधिक शाखाएँ थीं। प्रचार "न्यू इंडिया" और "कॉमनवील" से होता था। मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू, तेज बहादुर सप्रू, जिन्ना, भूलाभाई देसाई, सी. वाई. चिंतामणि, चित्तरंजन दास आदि इससे जुड़े।

◆ दोनों का संबंध और तरीक़े — दोनों लीगों का विलय नहीं हुआ। बेसेंट के शब्दों में, "उनके कुछ समर्थक मुझे पसंद नहीं करते थे और मेरे कुछ समर्थक उन्हें; पर हमारे बीच कोई झगड़ा नहीं था।" तरीक़े थे — पुस्तकालय और वाचनालय खोलना, सभाएँ और भाषण-दौरे, पर्चे बाँटना और राजनीतिक शिक्षा की कक्षाएँ चलाना। 1916 के लखनऊ अधिवेशन के लिए होमरूल समर्थकों ने एक पूरी रेलगाड़ी आरक्षित की, जिसे कुछ ने "कांग्रेस स्पेशल" और कुछ ने "होमरूल स्पेशल" कहा।

◆ दमन और उसकी प्रतिक्रिया — 1916 में तिलक के पंजाब और दिल्ली प्रवेश पर रोक लगाई गई। जून 1917 में एनी बेसेंट और उनके साथियों (अरुंडेल, वाडिया) को नज़रबंद कर दिया गया। इस पर देशव्यापी विरोध हुआ; सर एस. सुब्रमण्य अय्यर ने अपनी "सर" की उपाधि लौटा दी, और कई नरमपंथी भी लीग में जुड़ गए। सितंबर 1917 में बेसेंट को रिहा करना पड़ा।

◆ मॉन्टेग्यू घोषणा (20 अगस्त 1917) — होमरूल आंदोलन के दबाव में नए भारत सचिव एडविन मॉन्टेग्यू ने ब्रिटिश संसद में घोषणा की कि सरकार का लक्ष्य प्रशासन में भारतीयों की बढ़ती भागीदारी और "उत्तरदायी शासन का क्रमिक विकास" है। यह पहली बार था जब ब्रिटेन ने भारत में स्वशासन को अपना लक्ष्य माना। यही 1919 के मॉन्टफ़ोर्ड सुधारों का आधार बना (अध्याय 3)।

◆ पतन — बेसेंट की रिहाई और सुधारों के वादे से नरमपंथी संतुष्ट होकर अलग हो गए, और बेसेंट स्वयं भी सुधारों को लेकर ढुलमुल हो गईं। 1918 में तिलक चिरोल पर मानहानि मुक़दमे के लिए इंग्लैंड चले गए, जिससे नेतृत्व का अभाव हुआ। 1917–18 के सांप्रदायिक दंगों ने भी आंदोलन को कमज़ोर किया, और गांधीजी के सत्याग्रह ने राष्ट्रीय आंदोलन को नई दिशा दे दी। 1920 में बेसेंट की लीग का नाम "स्वराज्य सभा" हो गया और गांधीजी उसके अध्यक्ष बने।

1915 — बदलाव का वर्ष: इसी बीच नेतृत्व की एक पीढ़ी बदल रही थी। फ़रवरी 1915 में गोपाल कृष्ण गोखले और नवंबर 1915 में फ़िरोज़शाह मेहता का निधन हो गया, जिससे नरम दल के दो सबसे बड़े स्तंभ नहीं रहे। उसी वर्ष जनवरी में मोहनदास करमचंद गांधी दक्षिण अफ़्रीका से भारत लौटे। उन्होंने होमरूल आंदोलन में भाग नहीं लिया, क्योंकि वे युद्ध के समय सरकार को परेशान करना उचित नहीं मानते थे; पर होमरूल लीगों ने जो संगठन और कार्यकर्ता तैयार किए, वही आगे उनके आंदोलनों की रीढ़ बने।

💡 होमरूल आंदोलन का महत्त्व

इसने शिथिलता (1908–14) के बाद राष्ट्रीय आंदोलन को पुनर्जीवित किया, और स्वशासन की माँग अब राजद्रोह नहीं मानी जाती थी।

इसने शहर और गाँव के बीच संगठनात्मक कड़ी बनाई, गुजरात, सिंध और संयुक्त प्रांत जैसे नए क्षेत्रों को जोड़ा, और जवाहरलाल नेहरू जैसी नई पीढ़ी तैयार की — इस तरह गांधीजी के जन-आंदोलनों की ज़मीन तैयार की।

🤝 लखनऊ अधिवेशन और कांग्रेस-लीग समझौता (दिसंबर 1916)

दिसंबर 1916 में कांग्रेस (अध्यक्ष अंबिका चरण मजूमदार) और मुस्लिम लीग (अध्यक्ष मुहम्मद अली जिन्ना) ने लखनऊ में अपने अधिवेशन साथ-साथ किए। यह अधिवेशन दो कारणों से ऐतिहासिक है — पहला, नौ वर्ष बाद नरम और गरम दल का पुनर्मिलन हुआ, जिसमें तिलक और एनी बेसेंट की बड़ी भूमिका थी; दूसरा, कांग्रेस और लीग के बीच समझौता हुआ, जिसके मुख्य शिल्पी तिलक और जिन्ना थे।

◆ लीग के रुख़ में बदलाव क्यों आया? — 1911 में बंगाल विभाजन रद्द होने से लीग के नेता सरकार से निराश हुए; अलीगढ़ में मुस्लिम विश्वविद्यालय की माँग उस समय पूरी नहीं हुई; युद्ध में ब्रिटेन तुर्की के विरुद्ध लड़ रहा था, जिसके सुल्तान को मुसलमान ख़लीफ़ा (धार्मिक प्रमुख) मानते थे; और मौलाना आज़ाद, अली बंधु तथा हकीम अजमल ख़ाँ जैसे युवा राष्ट्रवादी मुस्लिम नेता उभर आए थे।

◆ समझौते के प्रावधान — दोनों संगठनों ने मिलकर शीघ्र स्वशासन की माँग की और कहा कि भारत सचिव की परिषद समाप्त की जाए। प्रांतीय परिषदों में 4/5 सदस्य निर्वाचित और 1/5 मनोनीत हों, और उनका कार्यकाल 5 वर्ष हो। शाही विधान परिषद में 150 सदस्य हों, जिनमें 4/5 निर्वाचित हों और निर्वाचित भारतीय सदस्यों में एक-तिहाई मुसलमान हों। केंद्र और प्रांतों की कार्यकारी परिषदों के आधे सदस्य भारतीय हों। किसी समुदाय से संबंधित विधेयक पर यदि उस समुदाय के 3/4 सदस्य विरोध करें, तो वह आगे नहीं बढ़ेगा।

◆ पृथक निर्वाचन की स्वीकृति — सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह थी कि कांग्रेस ने मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन स्वीकार कर लिया और प्रांतवार अनुपात तय हुआ: पंजाब 50%, बंगाल 40%, बम्बई 33%, संयुक्त प्रांत 30%, बिहार 25%, मध्य प्रांत और मद्रास 15%। ध्यान दें कि जिन प्रांतों में मुसलमान अल्पसंख्यक थे, वहाँ उन्हें जनसंख्या से अधिक सीटें मिलीं (इसे भारांक कहते हैं), और जहाँ वे बहुसंख्यक थे (पंजाब, बंगाल) वहाँ जनसंख्या से कुछ कम।

✅ सकारात्मक पक्ष

✔ यह हिंदू-मुस्लिम एकता का दुर्लभ क्षण था, और देश ने पहली बार एक संयुक्त राष्ट्रीय माँग रखी।

✔ नरम और गरम दल के मेल से कांग्रेस फिर सशक्त हुई।

✔ इसने ख़िलाफ़त-असहयोग (1919–22) की एकता की पृष्ठभूमि तैयार की।

✔ संयुक्त दबाव ने सरकार को मॉन्टेग्यू घोषणा के लिए विवश किया।

❌ नकारात्मक पक्ष

✔ कांग्रेस ने पृथक निर्वाचन को मान्यता दी, जिससे सांप्रदायिक राजनीति को वैधता मिली।

✔ यह नेताओं का समझौता था, जनता के स्तर पर एकता नहीं बनी।

✔ इससे दोनों समुदायों को अलग राजनीतिक इकाई मानने की शुरुआत हुई।

✔ असहयोग आंदोलन के बाद (1922) यह समझौता टूट गया।

अध्यक्ष अंबिका चरण मजूमदार ने इस पुनर्मिलन पर जो कहा, वह आज भी उद्धृत किया जाता है:

❝ लगभग दस वर्षों के दुखद अलगाव और ग़लतफ़हमियों के जंगल में भटकने के बाद... राष्ट्रीय दल के दोनों पक्षों ने समझ लिया है कि एक रहकर ही वे खड़े रह सकते हैं, बँटकर वे गिर जाएँगे। ❞ (अंबिका चरण मजूमदार, अध्यक्ष, लखनऊ अधिवेशन (1916))

ऊपर प्रांतवार अनुपात में "भारांक" शब्द आया है। यह आगे के संवैधानिक इतिहास में भी बार-बार आएगा, इसलिए इसे ठीक से समझ लें।

🔍 आसान परिभाषा: भारांक (वेटेज)

📘 परिभाषा: किसी अल्पसंख्यक समुदाय को विधान परिषद में उसकी जनसंख्या के अनुपात से अधिक सीटें देना, ताकि उसकी आवाज़ दब न जाए।

💡 आसान भाषा में: यदि किसी कक्षा के 100 में से 14 विद्यार्थी एक समूह के हों और कक्षा-समिति की 100 में से 30 सीटें उस समूह को दे दी जाएँ, तो यह भारांक है — संख्या से अधिक हिस्सा। 🏠 उदाहरण: लखनऊ समझौते में संयुक्त प्रांत में मुसलमानों की जनसंख्या लगभग 14% थी, पर उन्हें 30% सीटें दी गईं। बदले में पंजाब और बंगाल में, जहाँ वे बहुसंख्यक थे, उन्होंने जनसंख्या से कुछ कम सीटें स्वीकार कीं।

आगे की कड़ी: 1917 के कलकत्ता अधिवेशन में एनी बेसेंट कांग्रेस की पहली महिला अध्यक्ष बनीं। 1918 में मॉन्टेग्यू-चेम्सफ़ोर्ड रिपोर्ट पर मतभेद के कारण सुरेंद्रनाथ बनर्जी सहित नरमपंथी कांग्रेस से अलग हो गए और इंडियन नेशनल लिबरल फ़ेडरेशन बनाया। 1919 में रॉलेट एक्ट, जलियाँवाला बाग़ और गांधीजी के नेतृत्व के साथ राष्ट्रीय आंदोलन जन-आंदोलन के युग में पहुँच गया (अध्याय 12)।

11. कांग्रेस के प्रमुख अधिवेशन (1885–1920)

कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन उसकी सबसे बड़ी गतिविधि था। इसलिए अधिवेशन कहाँ हुआ, अध्यक्ष कौन था और क्या निर्णय हुआ — ये तीनों बातें इस काल को समझने की कुंजी हैं। पहले यह समझ लें कि अधिवेशन होते कैसे थे।

🗓️ अधिवेशन कैसे होते थे?

◆ समय — अधिवेशन प्रायः हर वर्ष दिसंबर के अंतिम सप्ताह में, क्रिसमस की छुट्टियों में होता था, क्योंकि तब वकीलों, शिक्षकों और सरकारी दफ़्तरों की छुट्टियाँ रहती थीं और प्रतिनिधि दूर-दूर से आ सकते थे।

◆ स्थान — हर वर्ष अलग प्रांत का नगर चुना जाता था। उस नगर के नेता एक स्वागत समिति बनाते थे, जो चंदा जुटाती, पंडाल बनवाती और प्रतिनिधियों के ठहरने का प्रबंध करती थी।

◆ अध्यक्ष — अध्यक्ष प्रायः उस प्रांत के बाहर का व्यक्ति चुना जाता था और केवल एक वर्ष के लिए। उसका अध्यक्षीय भाषण उस वर्ष की राष्ट्रीय माँगों का सार होता था, इसलिए अख़बार उसे पूरा छापते थे।

◆ कार्यवाही — विषय निर्धारिणी समिति प्रस्तावों का प्रारूप तय करती थी और फिर खुले अधिवेशन में उन पर भाषण और मतदान होता था। कभी-कभी किसी विशेष प्रश्न पर वर्ष के बीच में "विशेष अधिवेशन" भी बुलाया जाता था, जैसे 1918 में बम्बई और 1920 में कलकत्ता में।

🗺️ मानचित्र में अधिवेशन-स्थल

नीचे के मानचित्र में 1885 से 1920 तक के अधिवेशनों के स्थान दिखाए गए हैं। इसे देखकर एक बात तुरंत समझ आती है — अधिवेशन जान-बूझकर अलग-अलग प्रांतों में घुमाए जाते थे, ताकि हर क्षेत्र के लोग राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ें।

चित्र 10.6: कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशनों के स्थान (1885–1920)
चित्र 10.6: कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशनों के स्थान (1885–1920)

◆ तीन प्रेसीडेंसी नगर (लाल चिह्न) — अंग्रेज़ी शिक्षा और राजनीतिक चेतना के सबसे पुराने केंद्र कलकत्ता, बम्बई और मद्रास में सबसे अधिक अधिवेशन हुए। कलकत्ता में 1886, 1890, 1896, 1901, 1906, 1911, 1917 और 1920 (विशेष) के अधिवेशन हुए; बम्बई में 1885, 1889, 1904, 1915 और 1918 (विशेष); और मद्रास में 1887, 1894, 1898, 1903, 1908 और 1914।

◆ ऐतिहासिक अधिवेशन (हरे चिह्न) — बनारस (1905) में गोखले की अध्यक्षता में स्वदेशी का समर्थन हुआ; सूरत (1907) में कांग्रेस का विभाजन हुआ; और लखनऊ में 1899 (आर. सी. दत्त) और 1916 के अधिवेशन हुए, जिनमें 1916 का अधिवेशन लखनऊ समझौते के लिए प्रसिद्ध है।

◆ अन्य अधिवेशन स्थल (नीले चिह्न) — लाहौर (1893, 1900, 1909), अमृतसर (1919, जलियाँवाला बाग़ के बाद), दिल्ली (1918), इलाहाबाद (1888, 1892, 1910), बांकीपुर, पटना (1912), कराची (1913), अहमदाबाद (1902), अमरावती (1897), नागपुर (1891, 1920) और पूना (1895)। ध्यान दें कि 1885 का पहला अधिवेशन पूना में होना था, पर हैज़े के कारण बम्बई में हुआ।

📋 दोहराव तालिका: अधिवेशन, अध्यक्ष और विशेषता

वर्ष और स्थान

अध्यक्ष

विशेषता

1885 बम्बई

डब्ल्यू. सी. बनर्जी

पहला अधिवेशन था, जिसमें 72 प्रतिनिधि आए।

1886 कलकत्ता

दादाभाई नौरोजी

राष्ट्रीय सम्मेलन का विलय हुआ; लगभग 436 प्रतिनिधि आए।

1887 मद्रास

बदरुद्दीन तैयबजी

पहले मुस्लिम अध्यक्ष बने; विषय निर्धारिणी समिति बनी।

1888 इलाहाबाद

जॉर्ज यूल

पहले यूरोपीय अध्यक्ष बने; अल्पसंख्यक सुरक्षा का नियम बना।

1889 बम्बई

विलियम वेडरबर्न

लंदन में ब्रिटिश कमेटी बनी।

1890 कलकत्ता

फ़िरोज़शाह मेहता

कादंबिनी गांगुली अधिवेशन को संबोधित करने वाली पहली महिला बनीं।

1891 नागपुर / 1892 इलाहाबाद

पी. आनंद चार्लू / डब्ल्यू. सी. बनर्जी

बनर्जी दूसरी बार अध्यक्ष बने।

1893 लाहौर

दादाभाई नौरोजी

नौरोजी दूसरी बार अध्यक्ष बने।

1894 मद्रास / 1895 पूना

अल्फ़्रेड वेब / सुरेंद्रनाथ बनर्जी

सुरेंद्रनाथ पहली बार अध्यक्ष बने।

1896 कलकत्ता

रहीमतुल्ला सयानी

टैगोर ने पहली बार "वंदे मातरम्" गाया।

1897 अमरावती / 1898 मद्रास

सी. शंकरन नायर / आनंद मोहन बोस

शंकरन नायर केरल से थे।

1899 लखनऊ / 1900 लाहौर

आर. सी. दत्त / एन. जी. चंदावरकर

दत्त ने आर्थिक आलोचना को आगे बढ़ाया।

1901 कलकत्ता

दिनशा वाचा

गांधीजी पहली बार उपस्थित हुए; दक्षिण अफ़्रीका पर प्रस्ताव आया।

1902 अहमदाबाद / 1903 मद्रास / 1904 बम्बई

सुरेंद्रनाथ बनर्जी / लालमोहन घोष / हेनरी कॉटन

कॉटन अंग्रेज़ सिविल सेवक थे।

1905 बनारस

गोपाल कृष्ण गोखले

विभाजन की निंदा और बंगाल में स्वदेशी का समर्थन हुआ।

1906 कलकत्ता

दादाभाई नौरोजी

"स्वराज" लक्ष्य घोषित हुआ; चार प्रस्ताव पारित हुए।

1907 सूरत / 1908 मद्रास

रासबिहारी घोष

सूरत में विभाजन हुआ; 1908 में नया संविधान बना।

1909 लाहौर / 1910 इलाहाबाद

मदन मोहन मालवीय / विलियम वेडरबर्न

इस दौर में कांग्रेस पर नरम दल का नियंत्रण रहा।

1911 कलकत्ता

बिशन नारायण दर

27 दिसंबर को पहली बार "जन गण मन" गाया गया।

1912 बांकीपुर / 1913 कराची

आर. एन. मुधोलकर / नवाब सैयद मुहम्मद बहादुर

1912 में ह्यूम को "कांग्रेस का पिता" कहा गया।

1914 मद्रास / 1915 बम्बई

भूपेंद्रनाथ बसु / सत्येंद्र प्रसन्न सिन्हा

1915 में गरमपंथियों के लिए संविधान बदला गया; गवर्नर विलिंगडन उपस्थित रहे।

1916 लखनऊ

अंबिका चरण मजूमदार

नरम-गरम दल का पुनर्मिलन हुआ और लखनऊ समझौता हुआ।

1917 कलकत्ता

एनी बेसेंट

कांग्रेस की पहली महिला अध्यक्ष बनीं।

1918 बम्बई (विशेष) / दिल्ली

सैयद हसन इमाम / मदन मोहन मालवीय

मॉन्टफ़ोर्ड प्रस्तावों पर विचार हुआ; नरमपंथी अलग हुए।

1919 अमृतसर

मोतीलाल नेहरू

जलियाँवाला बाग़ की निंदा हुई; यह तिलक का अंतिम अधिवेशन था।

1920 कलकत्ता (विशेष) / नागपुर

लाला लाजपत राय / सी. विजयराघवाचारियर

असहयोग प्रस्ताव पारित हुआ (अध्याय 12)।

इस तालिका से कुछ "पहले" और "सबसे अधिक" वाले तथ्य निकलते हैं, जो परीक्षा में बार-बार पूछे जाते हैं।

🧠 "पहले" याद रखें

पहले मुस्लिम अध्यक्ष — तैयबजी (1887); पहले अंग्रेज़ — यूल (1888); पहली महिला — बेसेंट (1917); पहली भारतीय महिला — सरोजिनी नायडू (1925, कानपुर)।

इस काल में सबसे अधिक बार अध्यक्ष — नौरोजी (3 बार); "वंदे मातरम्" पहली बार — 1896; "जन गण मन" पहली बार — 1911; गांधीजी केवल एक बार अध्यक्ष — बेलगाँव (1924)।

12. मूल्यांकन, कालक्रम और सार

1885 से 1919 तक का काल भारतीय राष्ट्रवाद का बीजारोपण और अंकुरण काल था। नरमपंथियों ने संगठन, वैचारिक आधार और ब्रिटिश शासन की आर्थिक आलोचना दी। गरमपंथियों ने स्वराज का लक्ष्य, आत्मबल और जन-भागीदारी दी। स्वदेशी आंदोलन ने बहिष्कार, राष्ट्रीय शिक्षा और निष्क्रिय प्रतिरोध जैसे जन-आंदोलन के तरीक़े सिखाए। होमरूल आंदोलन और लखनऊ समझौते ने शिथिलता के बाद एकता और संगठन को फिर से जीवित किया।

इस काल की कमज़ोरियाँ भी रहीं — आंदोलन का सामाजिक आधार सीमित रहा, किसान और मज़दूर बड़ी संख्या में नहीं जुड़ पाए, और मुस्लिम लीग, पृथक निर्वाचन तथा लखनऊ समझौते के साथ सांप्रदायिक राजनीति की शुरुआत हो गई। इन्हीं उपलब्धियों और कमियों की पृष्ठभूमि में गांधी युग शुरू हुआ।

⚖️ इस काल का मूल्यांकन

◆ संगठन की उपलब्धि — पहली बार भारत को एक ऐसा अखिल भारतीय मंच मिला, जिसमें हर प्रांत, धर्म और भाषा के लोग एक साथ बैठते थे। अधिवेशनों को अलग-अलग प्रांतों में घुमाने और विवादित सामाजिक प्रश्नों से दूर रहने की नीति ने इस मंच को टिकाऊ बनाया।

◆ विचार की उपलब्धि — नौरोजी, रानाडे और दत्त की आर्थिक आलोचना ने सिद्ध किया कि भारत की ग़रीबी प्राकृतिक नहीं, औपनिवेशिक नीतियों की देन है। इसका परिणाम यह हुआ कि अंग्रेज़ी राज के "कल्याणकारी" होने का दावा भारतीयों की नज़र में टूट गया।

◆ लक्ष्य का विकास — माँगें क्रमशः बड़ी होती गईं: पहले परिषदों में सुधार (1885), फिर स्वशासित उपनिवेशों जैसा शासन (1905), फिर "स्वराज" (1906), और अंत में होमरूल (1916)। पूर्ण स्वतंत्रता की माँग अभी दूर थी, पर दिशा तय हो चुकी थी।

◆ तरीक़ों का विकास — याचिका और प्रस्ताव से शुरू होकर आंदोलन बहिष्कार, स्वदेशी, राष्ट्रीय शिक्षा, धरना और निष्क्रिय प्रतिरोध तक पहुँचा। गांधीजी ने आगे इन्हीं तरीक़ों को अहिंसा और सत्याग्रह के साथ जोड़कर पूरे देश में फैलाया।

◆ सरकार की प्रतिक्रिया — सरकार ने तीन रास्ते अपनाए: छोटे-छोटे सुधार (1892, 1909), कठोर दमन (1907–1910 के क़ानून) और फूट डालने की नीति (बंगाल विभाजन, पृथक निर्वाचन)। यही तीनों रास्ते 1947 तक बार-बार दोहराए गए।

◆ सीमाएँ — आंदोलन मुख्यतः शिक्षित शहरी वर्ग तक सीमित रहा; किसान, मज़दूर और महिलाएँ बड़ी संख्या में नहीं जुड़ पाईं। 1907 की फूट ने आंदोलन को लगभग एक दशक पीछे धकेल दिया, और धार्मिक प्रतीकों के प्रयोग तथा पृथक निर्वाचन ने सांप्रदायिक राजनीति को जगह दी।

नीचे की छोटी तालिका तीनों चरणों को एक साथ रखती है, ताकि यह अध्याय आगे के अध्यायों से जुड़ सके।

चरण और काल

नेतृत्व

पहचान

उदारवादी चरण (1885–1905)

नौरोजी, मेहता, सुरेंद्रनाथ, गोखले

इस चरण में संवैधानिक आंदोलन और आर्थिक आलोचना प्रमुख रहे।

उग्र राष्ट्रवादी चरण (1905–1918)

लाल-बाल-पाल, अरविंद

इस चरण में स्वराज, स्वदेशी, बहिष्कार और राष्ट्रीय शिक्षा प्रमुख रहे।

गांधी युग (1919–1947)

महात्मा गांधी

इस चरण में सत्याग्रह पर आधारित जन-आंदोलन चले (अध्याय 12–13)।

📰 दोहराव: नेता, उनके पत्र और उपाधियाँ

इस अध्याय में कई नेताओं के समाचारपत्र और लोकप्रिय उपाधियाँ आई हैं। परीक्षा में इनका मिलान बार-बार पूछा जाता है, इसलिए इन्हें एक जगह देख लें।

नेता

पत्र / पुस्तक

उपाधि या पहचान

दादाभाई नौरोजी

उन्होंने "रास्त गोफ़्तार" पत्र निकाला और "पावर्टी एंड अन-ब्रिटिश रूल इन इंडिया" लिखी।

उन्हें भारत का वयोवृद्ध नेता कहा जाता है।

सुरेंद्रनाथ बनर्जी

उन्होंने "बंगाली" का संपादन किया और "ए नेशन इन मेकिंग" लिखी।

उन्हें राष्ट्रगुरु और भारतीय बर्क कहा गया।

गोपाल कृष्ण गोखले

वे "सुधारक" पत्र से जुड़े रहे।

गांधीजी उन्हें अपना राजनीतिक गुरु मानते थे।

बाल गंगाधर तिलक

उन्होंने "केसरी" और "मराठा" निकाले और "गीता रहस्य" लिखी।

जनता ने उन्हें लोकमान्य कहा; चिरोल ने भारतीय अशांति का जनक कहा।

लाला लाजपत राय

उन्होंने "यंग इंडिया" पुस्तक लिखी।

उन्हें पंजाब केसरी कहा जाता है।

बिपिनचंद्र पाल

उन्होंने "न्यू इंडिया" साप्ताहिक निकाला।

उन्हें क्रांतिकारी विचारों का जनक कहा जाता है।

अरविंद घोष

उन्होंने "बंदे मातरम्" और "कर्मयोगिन" में लिखा।

वे निष्क्रिय प्रतिरोध के सिद्धांतकार थे।

एनी बेसेंट

उन्होंने "कॉमनवील" और "न्यू इंडिया" (दैनिक) निकाले।

वे कांग्रेस की पहली महिला अध्यक्ष थीं।

कृष्ण कुमार मित्र

उन्होंने "संजीवनी" साप्ताहिक निकाला।

उन्होंने सबसे पहले बहिष्कार का सुझाव दिया।

⏳ एक नज़र में कालक्रम

नीचे इस अध्याय की प्रमुख तिथियाँ क्रम से दी गई हैं, ताकि दोहराते समय पूरी कहानी एक साथ याद हो जाए।

वर्ष

घटना

1836 / 1838 / 1851

बंगभाषा प्रकाशिका सभा, लैंडहोल्डर्स सोसाइटी और ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन बनीं।

1866 / 1870 / 1876

ईस्ट इंडिया एसोसिएशन (लंदन), पूना सार्वजनिक सभा और इंडियन एसोसिएशन बनीं।

1876–1878

सिविल सेवा आयु 19 की गई, दिल्ली दरबार हुआ, वर्नाक्यूलर प्रेस और शस्त्र अधिनियम बने।

1883 / 1884–85

इल्बर्ट बिल विवाद और पहला राष्ट्रीय सम्मेलन हुआ; मद्रास महाजन सभा और बॉम्बे प्रेसीडेंसी एसोसिएशन बनीं।

28 दिसंबर 1885

बम्बई में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का पहला अधिवेशन हुआ।

1892 / 1893–97

भारतीय परिषद अधिनियम बना और नौरोजी ब्रिटिश संसद पहुँचे; गणपति-शिवाजी उत्सव हुए और 1897 में तिलक को कारावास मिला।

1899–1905

कर्ज़न का काल रहा; 1904 में विश्वविद्यालय अधिनियम बना।

1905

स्वदेशी आंदोलन (7 अगस्त) शुरू हुआ, बंगाल विभाजन (16 अक्टूबर) लागू हुआ, भारत सेवक समाज बना और जापान ने रूस को हराया।

1906

शिमला प्रतिनिधिमंडल (1 अक्टूबर) गया, मुस्लिम लीग (30 दिसंबर) बनी और कलकत्ता अधिवेशन में "स्वराज" लक्ष्य बना।

1907 / 1908

सूरत विभाजन हुआ और लाजपत राय-अजीत सिंह निर्वासित हुए; तिलक को 6 वर्ष कारावास मिला और इलाहाबाद कन्वेंशन हुआ।

1909 / 1910

मार्ले-मिंटो सुधार आए; भारतीय प्रेस अधिनियम बना।

1911

दिल्ली दरबार (12 दिसंबर) में विभाजन रद्द हुआ और राजधानी दिल्ली बनी; "जन गण मन" पहली बार गाया गया।

1914 / 1915

प्रथम विश्वयुद्ध शुरू हुआ और तिलक रिहा हुए; गांधीजी भारत लौटे और भारत रक्षा अधिनियम बना।

1916

होमरूल लीगें (अप्रैल और सितंबर) बनीं; लखनऊ समझौता (दिसंबर) हुआ।

1917

बेसेंट की नज़रबंदी और रिहाई हुई, मॉन्टेग्यू घोषणा (20 अगस्त) हुई और बेसेंट कांग्रेस अध्यक्ष बनीं।

1918 / 1919

लिबरल फ़ेडरेशन बना; मॉन्टफ़ोर्ड सुधार और रॉलेट एक्ट के साथ गांधी युग आरंभ हुआ।

अंत में, इस पूरे अध्याय का सार एक वाक्य में — भारतीयों ने पहले अपनी समस्याएँ पहचानीं, फिर संगठित हुए, फिर माँगना सीखा और अंत में लड़ना सीखा।

🔑 कीवर्ड सार

बंगभाषा प्रकाशिका सभा 1836 • लैंडहोल्डर्स सोसाइटी 1838 • इंडियन एसोसिएशन 1876 • इल्बर्ट बिल 1883 • ह्यूम — 72 प्रतिनिधि — बम्बई 1885 • सुरक्षा वाल्व / तड़ित चालक • धन-निष्कासन — नौरोजी • तीन "प" • 1892 का अधिनियम • लाल-बाल-पाल • केसरी, मराठा • गणपति 1893

कर्ज़न — रिज़्ले — 16 अक्टूबर 1905 • 7 अगस्त 1905 — टाउन हॉल • राखी बंधन — आमार सोनार बांग्ला • स्वदेश बांधव समिति • बंगाल नेशनल कॉलेज 1906 • कलकत्ता 1906 — स्वराज • शिमला प्रतिनिधिमंडल — ढाका 1906 • सूरत 1907 • मार्ले-मिंटो 1909 — पृथक निर्वाचन • दिल्ली दरबार 1911 • होमरूल 1916 — बेलगाँव, अड्यार • लखनऊ समझौता 1916 • मॉन्टेग्यू घोषणा 20 अगस्त 1917

ऊपर के कीवर्ड केवल दोहराने के लिए हैं; हर कीवर्ड के पीछे की पूरी कहानी संबंधित खंड में दी गई है।

💡 अंतिम बात

72 प्रतिनिधियों की एक शांत सभा से शुरू होकर तीन दशकों में कांग्रेस ने याचिका से स्वराज तक, और ड्राइंग रूम से सड़क तक का सफ़र तय किया। नौरोजी ने बताया कि अंग्रेज़ क्या ले जा रहे हैं, तिलक ने सिखाया कि उसे वापस माँगना जन्मसिद्ध अधिकार है, और बंगाल ने दिखाया कि जनता एक हो तो साम्राज्य को भी अपना फ़ैसला बदलना पड़ता है।

अगले अध्याय में हम उन युवाओं की कहानी पढ़ेंगे जिन्होंने याचिका और बहिष्कार से आगे बढ़कर क्रांति का रास्ता चुना — भारत और विदेश में क्रांतिकारी आंदोलन।

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