📖 अध्याय 9/20 — आधुनिक भारत का इतिहास

20वीं सदी के सुधार और जाति-विरोधी आंदोलन

फुले-सावित्रीबाई, शाहू महाराज, नारायण गुरु, अय्यंकाली, वैकोम-गुरुवायूर, जस्टिस पार्टी, पेरियार, आंबेडकर, पूना पैक्ट, गांधी का हरिजन आंदोलन, अकाली आंदोलन और 20वीं सदी की सुधार संस्थाएँ
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💧 कहानी से शुरुआत: “हम भी इनसान हैं”

महू की सैनिक छावनी, 1891। एक महार परिवार में एक बालक का जन्म हुआ, जिसके पिता रामजी सकपाल सेना में सूबेदार थे। बड़ा होकर यह बालक भीमराव आंबेडकर बना। स्कूल में उसे अलग बैठना पड़ता था, और प्यास लगने पर वह पानी तक अपने हाथ से नहीं ले सकता था।

वह पढ़ता गया। बड़ौदा नरेश की छात्रवृत्ति से अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय पहुँचा, फिर लंदन में भी पढ़ा। पर भारत लौटकर बड़ौदा राज्य की नौकरी में भी दफ़्तर में अपमान सहना पड़ा और रहने के लिए मकान तक नहीं मिला। इसी अनुभव से उसने समझा कि केवल शिक्षा काफ़ी नहीं है, राजनीतिक शक्ति भी चाहिए।

20 मार्च 1927, महाड (कोलाबा ज़िला, महाराष्ट्र)। नगरपालिका क़ानूनन घोषणा कर चुकी थी कि चवदार तालाब सबके लिए खुला है, फिर भी “अछूत” माने जाने वाले लोग वहाँ से पानी नहीं ले सकते थे। उस दिन हज़ारों लोगों के साथ आंबेडकर तालाब तक पहुँचे, अंजलि में पानी लिया और पी लिया। उन्होंने कहा कि वे वहाँ सिर्फ़ यह साबित करने आए हैं कि औरों की तरह वे भी इनसान हैं।

इसके बाद “शुद्धि” के नाम पर तालाब में गोबर और गोमूत्र डाला गया। यानी पानी पीने का अधिकार माँगने वालों के छूने से ही तालाब “अपवित्र” मान लिया गया। उसी वर्ष 25 दिसंबर 1927 को महाड के दूसरे सम्मेलन में असमानता को धार्मिक मान्यता देने वाले ग्रंथ मनुस्मृति का सार्वजनिक दहन किया गया।

एक घूँट पानी से शुरू हुई इस लड़ाई ने भारत के सबसे बड़े सामाजिक प्रश्न, जाति और अस्पृश्यता, को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया। फुले ने इसकी जड़ों पर वैचारिक आघात कैसे किया? नारायण गुरु और पेरियार ने आत्मसम्मान की अलख कैसे जगाई? और पूना पैक्ट में गांधीजी और आंबेडकर किन दो अलग रास्तों पर खड़े थे?

यही इस अध्याय की कहानी है, जो समानता और आत्मसम्मान के संघर्ष की कहानी है। आगे दो कहानियाँ भी मिलेंगी, जो फुले दंपति के स्कूलों और पूना पैक्ट की मूल बात आसान तरीक़े से समझा देंगी।

📑 इस अध्याय में क्या-क्या पढ़ेंगे

01. भूमिका: जाति-व्यवस्था, अस्पृश्यता और बदलाव के कारण

02. ज्योतिराव और सावित्रीबाई फुले — सत्यशोधक समाज

03. महाराष्ट्र: शाहू महाराज, बहुजन समाज, वि.रा. शिंदे

04. केरल-तमिलनाडु: नारायण गुरु, अय्यंकाली, वैकोम-गुरुवायूर, मंदिर-प्रवेश

05. जस्टिस पार्टी और पेरियार का आत्मसम्मान आंदोलन

06. उत्तर और पूर्वी भारत: सतनामी, मतुआ, आदि धर्म, आदि हिंदू और अन्य

07. डॉ. भीमराव आंबेडकर: संघर्ष, विचार और योगदान

08. सांप्रदायिक पंचाट और पूना पैक्ट (1932)

09. गांधी का हरिजन आंदोलन और गांधी-आंबेडकर बहस

10. 20वीं सदी की सुधार संस्थाएँ, अकाली और तारकेश्वर आंदोलन

11. मूल्यांकन, संवैधानिक विरासत और कालक्रम

1. भूमिका: जाति-व्यवस्था और बदलाव के कारण

ज़्यादातर इलाक़ों में समाज जातियों में बँटा था — ऊपर ब्राह्मण-क्षत्रिय, फिर व्यापारी-महाजन (वैश्य), फिर काश्तकार, बुनकर, कुम्हार जैसे दस्तकार (शूद्र), और सबसे नीचे वे जातियाँ जो गाँव-शहर साफ़ रखती थीं या ऐसे काम करती थीं जिन्हें ऊँची जातियाँ "दूषित" मानती थीं। इन्हें "अछूत" कहा जाता था — मंदिरों में प्रवेश, सवर्णों के कुओं से पानी, घाट-तालाबों पर नहाने की मनाही; केरल जैसे क्षेत्रों में तो सड़क पर चलने, कपड़े पहनने तक पर रोक थी।

(क) 19वीं-20वीं सदी में बदलाव क्यों आया?

कारक

प्रभाव

नई शिक्षा

मिशनरी स्कूलों में "निम्न" जातियों और आदिवासी बच्चों को पढ़ने का अवसर; पर 1829 में बम्बई प्रेसीडेंसी में अछूत बच्चों को सरकारी स्कूल की कक्षा के बाहर बरामदे में बैठकर पढ़ना पड़ता था

नए रोज़गार

शहरों में सड़क-नाली-इमारत निर्माण, कारख़ाने, नगरपालिकाएँ; असम, मॉरीशस, त्रिनिदाद, इंडोनेशिया के बाग़ान; सेना — महार रेजिमेंट; गाँव के सवर्ण ज़मींदारों के दैनिक अपमान से निकलने का रास्ता

बाज़ार के अवसर

प्रथम विश्वयुद्ध में सेना के जूतों की भारी माँग — चमड़े का काम करने वाले मोची-चर्मकारों को ऊँचे दाम मिले

जनगणना और पहचान

1871 से जनगणना, 1901 में रिज़ले द्वारा जातियों का श्रेणीक्रम — जातियाँ जाति-सभाएँ बनाकर ऊँचा दर्जा माँगने लगीं

नए विचार

स्वतंत्रता, समानता, मानव अधिकार; अमेरिका का दास-मुक्ति संघर्ष; ईसाई और बौद्ध धर्म का समानता का संदेश

राजनीतिक प्रतिनिधित्व

1909, 1919, 1935 के सुधारों में सीटों और आरक्षण का प्रश्न — संख्या और संगठन का महत्व बढ़ा

🔍 आसान परिभाषा: संस्कृतिकरण

📘 परिभाषा: समाजशास्त्री एम.एन. श्रीनिवास का शब्द — निचली मानी जाने वाली जातियों द्वारा ऊँची जातियों के रीति-रिवाज, खान-पान, कर्मकांड अपनाकर सामाजिक दर्जा ऊँचा करने का प्रयास।

💡 आसान भाषा में: "जैसा ऊपर वाले करते हैं, वैसा हम भी करें" — जनेऊ पहनना, मांस-मदिरा छोड़ना, ऊँचे वर्ण का दावा करना। 🏠 उदाहरण: कई जाति-सभाओं ने जनगणना में स्वयं को क्षत्रिय दर्ज कराने की माँग की; ताना भगत आंदोलन भी इसी रूप में शुरू हुआ था (अध्याय 6)। आंबेडकर जैसे नेताओं ने इस रास्ते के बजाय जाति-व्यवस्था के ही उन्मूलन की बात की।

(ख) जाति-प्रश्न पर तीन धाराएँ

चित्र 9.1: ग़ैर-ब्राह्मण आंदोलन, दलित आंदोलन और गांधीवादी हरिजन आंदोलन की तुलना
चित्र 9.1: ग़ैर-ब्राह्मण आंदोलन, दलित आंदोलन और गांधीवादी हरिजन आंदोलन की तुलना

🔍 आसान परिभाषा: दलित, हरिजन और अनुसूचित जाति

📘 परिभाषा: अस्पृश्य मानी गई जातियों के लिए अलग-अलग समय के शब्द — अंग्रेज़ी शासन में "डिप्रेस्ड क्लासेज़"; गांधीजी का "हरिजन" (ईश्वर के जन); 1935 के अधिनियम की अनुसूची से "अनुसूचित जाति"; और "दलित" (दबाया-कुचला गया) — जिसे आंदोलन ने आत्मसम्मान के साथ अपनाया।

💡 आसान भाषा में: एक ही वर्ग के लिए तीन नज़रिए — प्रशासन का (अनुसूचित), गांधी का (हरिजन) और स्वयं आंदोलन का (दलित)। 🏠 उदाहरण: आंबेडकर और कई दलित नेताओं ने "हरिजन" शब्द को दया-भाव वाला मानकर अस्वीकार किया।

चित्र 9.2: 20वीं सदी के सामाजिक सुधार और जाति-विरोधी आंदोलनों के प्रमुख केंद्र
चित्र 9.2: 20वीं सदी के सामाजिक सुधार और जाति-विरोधी आंदोलनों के प्रमुख केंद्र

2. ज्योतिराव और सावित्रीबाई फुले — सत्यशोधक समाज

(क) ज्योतिराव फुले (1827–1890)

📖 कहानी 1: अपमान से संकल्प तक — जब सावित्रीबाई पर गोबर फेंका गया, फिर भी स्कूल चलता रहा

1848 का वर्ष, पूना। माली परिवार में जन्मे ज्योतिराव फुले स्कॉटिश मिशनरी स्कूल में पढ़े थे। एक ब्राह्मण मित्र की बारात में उन्हें अपमानित किया गया। इसके बाद उन्होंने जीवनभर जाति-अन्याय के विरुद्ध संघर्ष का संकल्प लिया।

उसी वर्ष उन्होंने पत्नी सावित्रीबाई के साथ पूना के भिड़े वाड़ा में लड़कियों का पहला स्कूल खोला। सावित्रीबाई भारत की पहली महिला शिक्षिकाओं में गिनी जाती हैं। 1851–52 तक लड़कियों और “अछूत” माने गए बच्चों के कई स्कूल चलने लगे।

समाज का विरोध खुलकर सामने आया। स्कूल जाते समय लोग सावित्रीबाई पर गोबर और कीचड़ फेंकते थे। इसलिए वे अपने साथ एक अतिरिक्त साड़ी रखती थीं, ताकि स्कूल पहुँचकर कपड़े बदलें और पढ़ाना न रुके। उनकी साथी फ़ातिमा शेख़ भी शिक्षिका थीं।

फुले दंपति यहीं नहीं रुके। 1863 में विधवाओं के लिए “बालहत्या प्रतिबंधक गृह” खोला गया, ज्योतिराव ने अपने घर का कुआँ अछूतों के लिए खोल दिया, और 24 सितंबर 1873 को सत्यशोधक समाज बना। 1897 की प्लेग महामारी में रोगियों की सेवा करते हुए सावित्रीबाई स्वयं संक्रमित हुईं और उनका निधन हो गया।

🧭 इस कहानी से कौन-सी अवधारणा साफ़ हुई

✔ शिक्षा मुक्ति का पहला औज़ार — फुले ने लड़कियों और अछूत बच्चों को पढ़ाकर उस व्यवस्था की जड़ पर चोट की, जो इन्हें ज्ञान से दूर रखती थी।

✔ अनुभव से आंदोलन — बारात में हुए अपमान जैसे निजी अनुभव को फुले ने समाज-सुधार के स्थायी संकल्प में बदला।

✔ सुधार का कार्यरूप — विरोध के बावजूद स्कूल, आश्रय-गृह, कुआँ और सत्यशोधक समाज, यानी समाज सेवा और संगठन दोनों से बदलाव लाना।

📝 परीक्षा के लिए: ज्योतिराव फुले (1827–1890) + सावित्रीबाई (1831–1897): 1848 भिड़े वाड़ा, पूना = लड़कियों का पहला स्कूल; 1863 बालहत्या प्रतिबंधक गृह; 24 सितंबर 1873 सत्यशोधक समाज; रचनाएँ: गुलामगीरी (1873), शेतकऱ्याचा आसूड (1883); 1888 में ‘महात्मा’ उपाधि।

◆ 1827 में पूना के माली परिवार में जन्म (मूल रूप से सतारा के); स्कॉटिश मिशनरी स्कूल में शिक्षा। एक ब्राह्मण मित्र की बारात में अपमानित किए जाने (1848) से जाति-अन्याय के विरुद्ध जीवनभर संघर्ष का संकल्प लिया।

◆ शिक्षा: 1848 में पत्नी सावित्रीबाई के साथ पूना के भिड़े वाड़ा में लड़कियों का पहला स्कूल; 1851–52 तक लड़कियों और "अछूत" बच्चों के कई स्कूल।

◆ समाज: 1863 में विधवाओं के लिए "बालहत्या प्रतिबंधक गृह" (शिशु-हत्या रोकने के लिए); विधवा विवाह का समर्थन; अपने घर का कुआँ अछूतों के लिए खोला।

◆ 24 सितंबर 1873 को सत्यशोधक समाज (सत्य की खोज करने वाला समाज) — बिना ब्राह्मण पुरोहित के विवाह-संस्कार, शूद्रों-अतिशूद्रों को शिक्षा और सामाजिक न्याय, ब्राह्मणवादी धार्मिक सत्ता का विरोध।

◆ विचार: फुले ने ब्राह्मणों के "आर्य" होने से श्रेष्ठता के दावे पर हमला किया — उनके अनुसार आर्य विदेशी आक्रमणकारी थे जिन्होंने देश के मूल निवासियों को हराकर ग़ुलाम बनाया; धरती यहाँ के "निम्न" कहे जाने वाले मूल लोगों की है। आर्यों से पहले स्वर्ण युग था जब योद्धा-किसान न्याय से शासन करते थे — इसके प्रतीक के रूप में उन्होंने राम के बजाय राजा बलि को अपनाया। शूद्र (श्रमिक जातियाँ) और अतिशूद्र (अछूत) एक होकर जाति-भेद मिटाएँ।

◆ रचनाएँ: "गुलामगीरी" (1873) — अमेरिका के दास-मुक्ति संघर्ष करने वालों को समर्पित, भारत की "निम्न" जातियों और अमेरिका के काले ग़ुलामों की दुर्दशा को जोड़ा; "शेतकऱ्याचा आसूड" (किसान का कोड़ा, 1883); "सार्वजनिक सत्यधर्म"; शिवाजी पर पोवाड़ा (गाथा)। 1888 में बम्बई की सभा में विट्ठलराव वांडेकर ने उन्हें "महात्मा" उपाधि दी।

❝ ब्राह्मणों ने अपने धर्म की वह तलवार छिपा ली है जिसने लोगों की संपन्नता का गला काट दिया है, और अब वे देश के महान देशभक्त बने घूम रहे हैं... वे हमारे शूद्र, मुस्लिम और पारसी नौजवानों को सलाह देते हैं कि एकजुट नहीं होंगे तो देश उन्नति नहीं करेगा... यह एकता उन्हीं के फ़ायदे में है, क्योंकि इसके बाद फिर वही स्थिति हो जाएगी — मैं यहाँ और तुम वहाँ। ❞ (ज्योतिराव फुले, "शेतकऱ्याचा आसूड" — ऊँची जाति के नेताओं के राष्ट्रवाद की आलोचना)

(ख) सावित्रीबाई फुले (1831–1897)

◆ भारत की पहली महिला शिक्षिकाओं में; स्कूल जाते समय लोग उन पर गोबर-कीचड़ फेंकते थे, वे एक अतिरिक्त साड़ी साथ रखती थीं। महिला सेवा मंडल (1852); मराठी कविता संग्रह "काव्यफुले"; फुले की मृत्यु के बाद सत्यशोधक समाज का नेतृत्व; 1897 की प्लेग महामारी में रोगियों की सेवा करते हुए स्वयं संक्रमित होकर मृत्यु। (साथी फ़ातिमा शेख़ भी शिक्षिका थीं)

3. महाराष्ट्र: फुले के बाद

व्यक्ति / संस्था

वर्ष

योगदान

छत्रपति शाहू महाराज (कोल्हापुर)

1874–1922; शासक 1894 से

वेदोक्त विवाद (1899–1905) — दरबारी ब्राह्मण पुरोहित द्वारा उनके लिए वैदिक मंत्रों से इनकार पर ब्राह्मण-वर्चस्व के विरोधी बने; 26 जुलाई 1902 को राज्य की नौकरियों में पिछड़े वर्गों के लिए 50% आरक्षण — भारत में आरक्षण की पहली बड़ी पहल; सत्यशोधक समाज को संरक्षण; अस्पृश्यता-निवारण के आदेश, अछूतों के लिए छात्रावास-स्कूल; आंबेडकर के "मूकनायक" (1920) को सहायता; माणगाँव सम्मेलन (1920) में आंबेडकर को दलितों का नेता बताया; "राजर्षि" कहलाए

बहुजन समाज

1910 के बाद (सतारा)

मुकुंदराव पाटिल और शंकरराव जाधव — फुले से प्रेरित ब्राह्मण-विरोधी और प्रबल कांग्रेस-विरोधी संगठन; शाहू महाराज के संरक्षण के बाद ब्रिटिश सरकार का समर्थक बना

विट्ठल रामजी शिंदे

1873–1944

डिप्रेस्ड क्लासेज़ मिशन सोसायटी (1906, बम्बई) — अछूतों के लिए स्कूल, छात्रावास; अखिल भारतीय अस्पृश्यता-निवारण सम्मेलन; प्रार्थना समाज से जुड़े; किसानों के लिए भी संघर्ष (अध्याय 6)

ब्राह्मणेतर पार्टी

1920 का दशक

केशवराव जेधे, दिनकरराव जवलकर — महाराष्ट्र में ग़ैर-ब्राह्मण राजनीति; बाद में कांग्रेस में विलय (1938)

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4. केरल-तमिलनाडु: समानता और मंदिर-प्रवेश का संघर्ष

त्रावणकोर-कोचीन-मालाबार में जाति-भेद सबसे कठोर था — "छूने" से ही नहीं, निश्चित दूरी पर आने से भी "अपवित्रता" मानी जाती थी (अस्पृश्यता के साथ अदर्शनीयता भी)। अवर्णों को मंदिर की ओर जाने वाली सड़कों पर चलने, स्त्रियों को ऊपरी शरीर ढकने तक की मनाही थी।

(क) श्री नारायण गुरु (1856–1928)

◆ एझावा समुदाय में जन्म (तिरुवनंतपुरम के पास चेंबाझंती); संस्कृत, वेदांत के विद्वान संत।

◆ 1888 में अरुविप्पुरम में स्वयं शिव-प्रतिमा की स्थापना — ब्राह्मणों के एकाधिकार को चुनौती; पूछे जाने पर कहा: "मैंने एझावा शिव की स्थापना की है।" आगे ऐसे मंदिर बनवाए जिनमें सबके लिए प्रवेश था, कुछ में प्रतिमा की जगह दर्पण या "सत्य, धर्म, दया, प्रेम" लिखा।

◆ 1903 में श्री नारायण धर्म परिपालन (एस.एन.डी.पी.) योगम — डॉ. पल्पु (जिन्होंने 1896 में एझावा मेमोरियल दिया था) और कवि कुमारन आशान के साथ; शिक्षा, संगठन, उद्योग पर ज़ोर।

◆ संदेश: "ओरु जाति, ओरु मतम्, ओरु दैवम् मनुष्यनु" — मानवता की एक जाति, एक धर्म, एक ईश्वर; "शिक्षा से मुक्त हो, संगठन से शक्ति पाओ"। उन्होंने मदिरा-निषेध, सरल विवाह, पशुबलि-विरोध का प्रचार किया।

(ख) अय्यंकाली और अन्य आंदोलन

◆ अय्यंकाली (1863–1941) — पुलया समुदाय के नेता; 1893 में सवर्णों की रोक तोड़कर सार्वजनिक सड़क पर बैलगाड़ी (विल्लुवंडी) यात्रा; साधुजन परिपालन संघम (1907); दलित बच्चों के स्कूल-प्रवेश के लिए खेतिहर मज़दूरों की हड़ताल — भारत की शुरुआती कृषि-मज़दूर हड़तालों में; कल्लुमाला आंदोलन (1915) — पुलया स्त्रियों द्वारा दासता के प्रतीक पत्थर के हार तोड़ना; त्रावणकोर विधान सभा (श्री मूलम प्रजा सभा) के सदस्य।

◆ चन्नार (वस्त्र) आंदोलन (1822–1859) — त्रावणकोर में नाडार (चन्नार) स्त्रियों के ऊपरी वस्त्र पहनने के अधिकार का संघर्ष। 1899 में नाडारों की मंदिर-प्रवेश माँग पर तिरुनेलवेली (शिवकाशी) क्षेत्र में भयंकर दंगे; नाडार महाजन संगम (1910)।

◆ सवर्ण समुदायों में भी सुधार: नायर सर्विस सोसायटी (1914) — मन्नत पद्मनाभन; नंबूदिरी ब्राह्मणों में योगक्षेम सभा (1908) और वी.टी. भट्टतिरिपाद — विधवा विवाह, पर्दा-विरोध।

(ग) वैकोम से मंदिर-प्रवेश घोषणा तक

◆ वैकोम सत्याग्रह (30 मार्च 1924 – नवंबर 1925): त्रावणकोर के वैकोम महादेव मंदिर की ओर जाने वाली सड़कों पर अवर्णों के चलने के अधिकार के लिए; नेता टी.के. माधवन, के.पी. केशव मेनन, के. केलप्पन; कांग्रेस का समर्थन; तमिलनाडु से पेरियार आकर जेल गए — "वैकोम वीर"; मार्च 1925 में गांधीजी पहुँचे; नवंबर 1925 में मंदिर के तीन ओर की सड़कें सबके लिए खुलीं। श्री नारायण गुरु का नैतिक समर्थन रहा।

◆ गुरुवायूर सत्याग्रह (1931–32): गुरुवायूर (मालाबार) मंदिर में प्रवेश के लिए के. केलप्पन का सत्याग्रह और अनशन; ए.के. गोपालन, पी. कृष्ण पिल्लै; गांधीजी के आग्रह पर अनशन समाप्त।

◆ मंदिर-प्रवेश घोषणा (12 नवंबर 1936): त्रावणकोर के महाराजा श्री चित्रा तिरुनाल (दीवान सी.पी. रामास्वामी अय्यर) ने राजकीय मंदिर सभी हिंदुओं के लिए खोले — गांधीजी ने इसे "आधुनिक युग का चमत्कार" कहा। मद्रास में 1939 में मदुरै मीनाक्षी मंदिर में प्रवेश और 1947 का मंदिर-प्रवेश अधिकार अधिनियम।

चित्र 9.3: केरल-तमिलनाडु में समानता और मंदिर-प्रवेश का संघर्ष (1822–1947)
चित्र 9.3: केरल-तमिलनाडु में समानता और मंदिर-प्रवेश का संघर्ष (1822–1947)

5. जस्टिस पार्टी और पेरियार का आत्मसम्मान आंदोलन

बीसवीं सदी के आरंभ में ग़ैर-ब्राह्मण आंदोलन शुरू हुआ — उन ग़ैर-ब्राह्मण जातियों का, जिन्होंने शिक्षा, धन और प्रभाव पा लिया था। उनका तर्क था कि ब्राह्मण उत्तर से आए आर्य आक्रमणकारियों के वंशज हैं जिन्होंने दक्षिण के मूल निवासियों — द्रविड़ों — को हराया; उन्होंने सत्ता, शिक्षा और सरकारी नौकरियों में ब्राह्मण वर्चस्व को चुनौती दी (मद्रास प्रेसीडेंसी में ब्राह्मण लगभग 3% थे पर ऊँचे पदों पर उनका बड़ा हिस्सा था)।

(क) जस्टिस पार्टी

◆ 20 नवंबर 1916, मद्रास — साउथ इंडियन लिबरल फ़ेडरेशन; संस्थापक डॉ. टी.एम. नायर, सर पी. त्यागराज चेट्टी, सी. नटेश मुदलियार; दिसंबर 1916 में "ग़ैर-ब्राह्मण घोषणापत्र"; अंग्रेज़ी पत्र "जस्टिस" से नाम पड़ा जस्टिस पार्टी; तमिल "द्रविड़न", तेलुगु "आंध्र प्रकाशिका"।

◆ 1920 के चुनाव जीतकर मद्रास प्रांत में द्वैध शासन के अंतर्गत सरकार बनाई; सांप्रदायिक सरकारी आदेश (1921–22) से सरकारी नौकरियों में जाति-आधारित आरक्षण; हिंदू धार्मिक बंदोबस्ती अधिनियम से मंदिर-प्रबंधन पर नियंत्रण; ब्रिटिश सरकार के प्रति वफ़ादार, कांग्रेस-विरोधी।

◆ 1937 में कांग्रेस से हारी; 1938 में पेरियार अध्यक्ष बने; 1944 में द्रविड़ कड़गम में बदल गई।

(ख) पेरियार — ई.वी. रामास्वामी नायकर (1879–1973)

◆ ईरोड के मध्यवर्गीय परिवार में जन्म; आरंभिक जीवन में संन्यासी, संस्कृत शास्त्रों का गंभीर अध्ययन; फिर कांग्रेस में (असहयोग आंदोलन, खादी, मद्य-निषेध); वैकोम सत्याग्रह में जेल।

◆ राष्ट्रवादियों द्वारा चलाए गए चेरनमादेवी गुरुकुल (वी.वी.एस. अय्यर) में ब्राह्मण और ग़ैर-ब्राह्मण छात्रों के अलग भोजन की व्यवस्था देखकर, और कांग्रेस द्वारा सांप्रदायिक (आनुपातिक) प्रतिनिधित्व का प्रस्ताव न मानने पर 1925 में कांग्रेस छोड़ दी।

◆ 1925 में आत्मसम्मान आंदोलन (सेल्फ़-रेस्पेक्ट मूवमेंट) और पत्र "कुडी अरसु"; बिना ब्राह्मण पुरोहित के "आत्मसम्मान विवाह", अंतर्जातीय और विधवा विवाह; स्त्री-पुरुष समानता, स्त्रियों के संपत्ति-अधिकार, परिवार नियोजन।

◆ विचार: अछूत ही मूल तमिल-द्रविड़ संस्कृति के असली वाहक हैं जिन्हें ब्राह्मणों ने अधीन किया; सभी धार्मिक नेता असमानता को ईश्वरप्रदत्त बताते हैं, इसलिए समानता के लिए अछूतों को धर्म से भी मुक्त होना होगा; मनुस्मृति, भगवद्गीता, रामायण के कटु आलोचक — इन्हें ब्राह्मणों द्वारा "निचली" जातियों पर और पुरुषों द्वारा स्त्रियों पर प्रभुत्व का साधन बताया; हिंदी थोपने के विरुद्ध आंदोलन (1937–39); अलग "द्रविड़ नाडु" की माँग; 1944 में द्रविड़ कड़गम।

🧭 ग़ैर-ब्राह्मण और दलित प्रश्न

ग़ैर-ब्राह्मण आंदोलन ने ब्राह्मण वर्चस्व को तो तोड़ा, पर कई बार इसका लाभ मध्यम-भूस्वामी जातियों तक सीमित रहा; अछूत कहे जाने वाले समुदायों को अलग से संघर्ष करना पड़ा — इसीलिए आदि-द्रविड़ संगठनों और आगे दलित आंदोलन की अलग धारा बनी। रूढ़िवादी हिंदू समाज ने भी सनातन धर्म सभाओं, भारत धर्म महामंडल और बंगाल की ब्राह्मण सभा जैसे संगठनों से इन रुझानों का विरोध किया।

6. उत्तर और पूर्वी भारत के आंदोलन

आंदोलन

क्षेत्र / समय

नेता और मुख्य बात

सतनामी पंथ

छत्तीसगढ़ (गिरौदपुरी); 1820 के दशक से

गुरु घासीदास — चमड़े का काम करने वालों (चमार) को संगठित किया; एक "सतनाम" (सच्चा नाम) ईश्वर, मूर्तिपूजा-जाति का विरोध, मांस-मदिरा त्याग; सामाजिक स्थिति सुधारने का आंदोलन

मतुआ पंथ

पूर्वी बंगाल (ओराकांदी, फ़रीदपुर); 19वीं सदी

हरिदास (हरिचंद) ठाकुर — चांडाल (नामशूद्र) काश्तकारों के बीच; जाति को सही ठहराने वाले ब्राह्मणवादी ग्रंथों पर प्रश्न; पुत्र गुरुचंद ठाकुर ने शिक्षा आंदोलन चलाया; नामशूद्र आंदोलन

राजबंशी क्षत्रिय आंदोलन

उत्तर बंगाल; 1910

पंचानन बर्मा — क्षत्रिय समिति; जनगणना में ऊँचे दर्जे और शिक्षा की माँग

आदि धर्म आंदोलन

पंजाब (जालंधर); 1926

मंगूराम मुगोवालिया — दलित स्वयं को भारत के मूल निवासियों का अलग धर्म मानें; गुरु रविदास की परंपरा; 1931 की जनगणना में अलग धर्म के रूप में दर्ज

आदि हिंदू आंदोलन

संयुक्त प्रांत (कानपुर-लखनऊ); 1920 का दशक

स्वामी अछूतानंद "हरिहर" — दलित ही भारत के "आदि हिंदू" (मूल निवासी); आत्मसम्मान और शिक्षा

अखिल भारतीय दलित वर्ग लीग

1935

बाबू जगजीवन राम — कांग्रेस के निकट दलित संगठन

त्रिवेणी संघ

बिहार; 1930 का दशक

यादव, कुर्मी, कोइरी किसान जातियों का ऊँची जातियों के वर्चस्व के विरुद्ध संगठन

7. डॉ. भीमराव आंबेडकर — दलित चेतना के शिल्पी

जहाँ फुले ने जाति-व्यवस्था पर वैचारिक आघात की नींव रखी और नारायण गुरु ने आत्मसम्मान जगाया, वहीं डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर ने दलित प्रश्न को शिक्षा, संगठन, क़ानून और राजनीति — चारों मोर्चों पर एक साथ लड़ा। वे अर्थशास्त्री, विधिवेत्ता, पत्रकार और संविधान के मुख्य शिल्पकार थे, इसलिए उन्हें "बाबासाहेब" कहा जाता है।

🎓 जीवन और शिक्षा

◆ 14 अप्रैल 1891 को महू (मध्य प्रदेश) की सैनिक छावनी में महार परिवार में जन्म; पिता रामजी सकपाल सेना में सूबेदार थे; मूल गाँव आंबडवे (रत्नागिरी) — इसी से "आंबेडकर" उपनाम।

◆ स्कूल में अलग बैठना पड़ता, पानी स्वयं नहीं ले सकते थे — बचपन के इन अपमानों ने जीवन की दिशा तय की। 1907 में मैट्रिक, 1912 में बम्बई के एल्फ़िंस्टन कॉलेज से स्नातक।

◆ बड़ौदा नरेश सयाजीराव गायकवाड़ की छात्रवृत्ति से कोलंबिया विश्वविद्यालय (अमेरिका) — एम.ए. (1915), पीएच.डी.; फिर लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स से डी.एससी. और ग्रेज़ इन से बैरिस्टरी।

◆ बड़ौदा राज्य में नौकरी के दौरान भी कार्यालय में अपमान और रहने को मकान न मिलना — इसी अनुभव से निष्कर्ष निकाला कि केवल शिक्षा नहीं, राजनीतिक शक्ति भी चाहिए।

📢 संगठन, पत्र और सत्याग्रह (1919–1935)

वर्ष

क़दम

महत्त्व

1919

साउथबरो (मताधिकार) समिति के सामने गवाही

अछूतों के लिए पृथक निर्वाचन / आरक्षित सीटों की पहली बड़ी माँग

1920

"मूकनायक" (मराठी पाक्षिक)

शाहू महाराज की आर्थिक सहायता; "बेज़ुबानों का नायक"; इसी वर्ष माणगाँव सम्मेलन में शाहू ने आंबेडकर को दलितों का नेता बताया

20 जुलाई 1924

बहिष्कृत हितकारिणी सभा, बम्बई

अध्यक्ष सर चिमनलाल सीतलवाड़, प्रबंध समिति के प्रमुख आंबेडकर; सूत्र — "शिक्षित करो, आंदोलन करो, संगठित करो"; छात्रावास, पुस्तकालय, शिक्षा

1927

"बहिष्कृत भारत" (3 अप्रैल 1927); समाज समता संघ

पत्र के माध्यम से आंदोलन; अंतर्जातीय भोज-विवाह; संघ का मुखपत्र "समता" (1928)

20 मार्च 1927

महाड सत्याग्रह — चवदार तालाब

सार्वजनिक जल-स्रोत पर नागरिक अधिकार; दलित आंदोलन का प्रतीक दिवस

25 दिसंबर 1927

मनुस्मृति दहन (महाड का दूसरा सम्मेलन)

असमानता को धार्मिक मान्यता देने वाले ग्रंथ का सार्वजनिक दहन — वैचारिक विद्रोह

1928

साइमन कमीशन के सामने प्रतिवेदन

दलितों के लिए अलग प्रतिनिधित्व और शिक्षा-सुविधाओं की माँग

1930

"जनता" पत्र; नागपुर में दलित वर्ग कांग्रेस के अध्यक्ष

राजनीतिक संगठन को विस्तार

2 मार्च 1930–1935

कालाराम मंदिर सत्याग्रह, नासिक

मंदिर-प्रवेश का लंबा संघर्ष; सहयोगी दादासाहेब गायकवाड़; मंदिर नहीं खुला, पर आंदोलन ने राष्ट्रीय ध्यान खींचा

1930–1932

तीनों गोलमेज सम्मेलनों में भाग

दलित वर्गों के प्रतिनिधि के रूप में पृथक निर्वाचन की माँग — गांधी से सीधा मतभेद

❝ मेरा जन्म हिंदू के रूप में हुआ है, यह मेरे वश में नहीं था; परंतु मैं हिंदू के रूप में मरूँगा नहीं। ❞ (डॉ. आंबेडकर, येवला सम्मेलन (नासिक), 13 अक्टूबर 1935)

🏛️ राजनीति, संविधान और धम्म (1935–1956)

◆ 1936 — इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी (स्वतंत्र मज़दूर दल); 1937 के बम्बई प्रांतीय चुनाव में 15 में से 13 आरक्षित सीटें जीतीं; विधानसभा में खोती प्रथा (कोंकण की ज़मींदारी) और महार वतन (गाँव की बेगार जैसी सेवा के बदले मामूली ज़मीन) समाप्त करने के विधेयक।

◆ 1936 — "जाति का उन्मूलन" (एनिहिलेशन ऑफ़ कास्ट): लाहौर के जात-पात तोड़क मंडल के अधिवेशन के लिए लिखा भाषण; आयोजकों ने कुछ अंश हटाने को कहा, तब आंबेडकर ने इसे स्वयं छपवाया। इसमें कहा — जाति केवल श्रम का नहीं, श्रमिकों का विभाजन है; धर्मग्रंथों की सत्ता तोड़े बिना जाति नहीं टूटेगी। गांधीजी ने "हरिजन" में इसका उत्तर दिया।

◆ 1942 — अखिल भारतीय अनुसूचित जाति संघ (शेड्यूल्ड कास्ट्स फ़ेडरेशन), नागपुर; 1942–46 वायसराय की कार्यकारी परिषद में श्रम सदस्य — काम के घंटे 12 से घटाकर 8, कर्मचारी राज्य बीमा, महँगाई भत्ता जैसे श्रम-सुधारों की नींव।

◆ 1945 — पीपुल्स एजुकेशन सोसायटी, बम्बई (सिद्धार्थ कॉलेज, 1946); औरंगाबाद में मिलिंद कॉलेज (1950)।

◆ संविधान सभा — पहले बंगाल से चुने गए; 29 अगस्त 1947 को प्रारूप समिति के अध्यक्ष; स्वतंत्र भारत के पहले विधि मंत्री। हिंदू कोड बिल (स्त्रियों को संपत्ति, विवाह-विच्छेद आदि अधिकार) के टलने पर सितंबर 1951 में मंत्रिमंडल से त्यागपत्र।

◆ 14 अक्टूबर 1956 — नागपुर (दीक्षाभूमि) में लगभग 5 लाख अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म की दीक्षा; 22 प्रतिज्ञाएँ; इसे नवयान / नवबौद्ध आंदोलन कहा गया। 6 दिसंबर 1956 को दिल्ली में निधन (महापरिनिर्वाण दिवस); 1990 में मरणोपरांत भारत रत्न। उनकी परिकल्पित रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया 1957 में बनी।

चित्र 9.4: डॉ. भीमराव आंबेडकर के जीवन और आंदोलन का कालक्रम (1891–1956)
चित्र 9.4: डॉ. भीमराव आंबेडकर के जीवन और आंदोलन का कालक्रम (1891–1956)

📚 आंबेडकर की प्रमुख रचनाएँ और पत्र

रचना / पत्र

वर्ष

विषय

कास्ट्स इन इंडिया

1916

कोलंबिया में पढ़ा गया शोध-पत्र — जाति की उत्पत्ति, सजातीय विवाह (एंडोगैमी) जाति का मूल

द प्रॉब्लम ऑफ़ द रुपी

1923

भारतीय मुद्रा पर अर्थशास्त्रीय शोध (लंदन)

एनिहिलेशन ऑफ़ कास्ट (जाति का उन्मूलन)

1936

जाति-व्यवस्था की सबसे तीखी वैचारिक आलोचना

थॉट्स ऑन पाकिस्तान

1940

मुस्लिम लीग की पाकिस्तान माँग का विश्लेषण

व्हाट कांग्रेस एंड गांधी हैव डन टू द अनटचेबल्स

1945

कांग्रेस और गांधी की दलित-नीति की आलोचना

हू वेयर द शूद्राज़?

1946

शूद्रों की उत्पत्ति पर ऐतिहासिक विवेचन

स्टेट्स एंड माइनॉरिटीज़

1947

संविधान सभा के लिए अल्पसंख्यक अधिकारों का प्रारूप

द अनटचेबल्स

1948

अस्पृश्यता की उत्पत्ति

द बुद्ध एंड हिज़ धम्म

1957 (मरणोपरांत)

नवयान बौद्ध धर्म का आधार-ग्रंथ

पत्र

1920–1956

मूकनायक (1920), बहिष्कृत भारत (1927), समता (1928), जनता (1930), प्रबुद्ध भारत (1956)

🧠 याद रखने की ट्रिक

आंबेडकर के पत्रों का क्रम — "मूक बहिष्कृत समता से जनता प्रबुद्ध" → मूकनायक (1920) → बहिष्कृत भारत (1927) → समता (1928) → जनता (1930) → प्रबुद्ध भारत (1956)।

संगठनों का क्रम — सभा (1924) → पार्टी (1936) → फ़ेडरेशन (1942) → सोसायटी (1945)।

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8. सांप्रदायिक पंचाट और पूना पैक्ट (1932)

दूसरे गोलमेज सम्मेलन (1931) में अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधित्व पर सहमति नहीं बनी। गांधीजी का मत था कि दलित हिंदू समाज का अभिन्न अंग हैं, जबकि आंबेडकर उनके लिए पृथक निर्वाचन चाहते थे। तब ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्से मैकडोनाल्ड ने स्वयं निर्णय दे दिया।

📖 कहानी 2: यरवदा जेल का अनशन — जब दो रास्तों के बीच कुछ ही दिनों में समझौता हुआ

16 अगस्त 1932 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्से मैकडोनाल्ड ने सांप्रदायिक पंचाट की घोषणा की। इसमें दलित वर्गों को भी पृथक निर्वाचन दिया गया, यानी प्रांतीय विधानमंडलों में उनके लिए 71 सीटें, जिन्हें चुनने का अधिकार केवल दलित मतदाताओं को था। साथ ही सामान्य सीटों पर उन्हें दोहरा मत भी मिला।

उस समय गांधीजी यरवदा जेल (पूना) में थे। उनका मानना था कि दलित हिंदू समाज का अभिन्न अंग हैं और पृथक निर्वाचन इस समाज को स्थायी रूप से बाँट देगा। उन्होंने 20 सितंबर 1932 से आमरण अनशन शुरू कर दिया। दूसरी ओर आंबेडकर का मत था कि दलितों की अपनी राजनीतिक आवाज़ के लिए पृथक निर्वाचन ज़रूरी है।

मदन मोहन मालवीय, राजगोपालाचारी, राजेंद्र प्रसाद, घनश्यामदास बिड़ला और एम.सी. राजा जैसे लोग बीच में पड़े। गांधीजी के प्राण संकट में थे, इसलिए आंबेडकर पर भारी नैतिक दबाव था। 24 सितंबर 1932 को पूना पैक्ट पर हस्ताक्षर हुए। दलित वर्गों की ओर से आंबेडकर और सवर्ण हिंदुओं की ओर से मालवीय ने दस्तख़त किए। गांधीजी ने स्वयं हस्ताक्षर नहीं किए। ब्रिटिश सरकार की स्वीकृति के बाद 26 सितंबर को अनशन टूटा।

समझौते में पृथक निर्वाचन समाप्त हो गया, पर आरक्षित सीटें 71 से बढ़कर 148 हो गईं और केंद्रीय विधानमंडल में सामान्य सीटों का 18% दलित वर्गों के लिए तय हुआ। आगे चलकर आंबेडकर ने इसे दबाव में किया गया समझौता कहा। गांधीजी ने इसके बाद हरिजन आंदोलन शुरू किया।

🧭 इस कहानी से कौन-सी अवधारणा साफ़ हुई

✔ पृथक निर्वाचन बनाम आरक्षित सीटें — पृथक निर्वाचन में प्रतिनिधि को केवल उसी समुदाय के मतदाता चुनते हैं। पूना पैक्ट में उम्मीदवार दलित वर्ग का रहा, पर चुनने वाले सभी मतदाता हुए।

✔ प्रतिनिधित्व किसकी शर्तों पर — सीटें दोगुनी से अधिक मिलीं, पर दलितों की स्वतंत्र राजनीतिक आवाज़ कमज़ोर होने की आलोचना भी हुई। यह बहस आज तक जीवित है।

✔ दो दृष्टियाँ — गांधीजी के लिए यह हिंदू समाज के धार्मिक-नैतिक प्रायश्चित का प्रश्न था, जबकि आंबेडकर के लिए यह राजनीतिक अधिकार और संगठन का प्रश्न था।

📝 परीक्षा के लिए: सांप्रदायिक पंचाट (16 अगस्त 1932; दलितों के लिए 71 सीटें) → गांधीजी का अनशन (20 सितंबर, यरवदा) → पूना पैक्ट (24 सितंबर 1932; आंबेडकर और मालवीय; 148 सीटें; केंद्र में 18%) → अनशन समाप्त (26 सितंबर) → हरिजन आंदोलन।

🔍 आसान परिभाषा: पृथक निर्वाचन बनाम आरक्षित सीटें

📘 परिभाषा: पृथक निर्वाचन में किसी समुदाय के प्रतिनिधि को केवल उसी समुदाय के मतदाता चुनते हैं; संयुक्त निर्वाचन में आरक्षित सीट पर उम्मीदवार उसी समुदाय का होता है पर उसे सभी मतदाता चुनते हैं।

💡 आसान भाषा में: पृथक निर्वाचन = "अपने लोग, अपना वोट"; आरक्षित सीट = "उम्मीदवार अपना, वोट सबका"। 🏠 उदाहरण: सांप्रदायिक पंचाट ने दलितों को पृथक निर्वाचन दिया; पूना पैक्ट ने उसे संयुक्त निर्वाचन + आरक्षित सीटों में बदल दिया।

⚖️ घटनाक्रम

1. 16 अगस्त 1932 — सांप्रदायिक पंचाट (कम्यूनल अवॉर्ड): मुसलमानों, सिखों, भारतीय ईसाइयों, एंग्लो-इंडियन, यूरोपीयों के साथ दलित वर्गों को भी पृथक निर्वाचन; प्रांतीय विधानमंडलों में उनके लिए 71 सीटें; साथ ही सामान्य सीटों पर दोहरा मत (डबल वोट)।

2. गांधीजी उस समय यरवदा जेल (पूना) में थे। उन्होंने इसे हिंदू समाज को स्थायी रूप से बाँटने वाला माना और 20 सितंबर 1932 से आमरण अनशन शुरू किया।

3. मदन मोहन मालवीय, राजगोपालाचारी, राजेंद्र प्रसाद, घनश्यामदास बिड़ला, एम.सी. राजा आदि की मध्यस्थता; आंबेडकर पर भारी नैतिक दबाव — गांधीजी के प्राण बचाने के लिए समझौता।

4. 24 सितंबर 1932 — पूना पैक्ट पर हस्ताक्षर: दलित वर्गों की ओर से आंबेडकर, सवर्ण हिंदुओं की ओर से मदन मोहन मालवीय (गांधीजी ने स्वयं हस्ताक्षर नहीं किए)। ब्रिटिश सरकार की स्वीकृति के बाद 26 सितंबर को अनशन टूटा।

📋 पूना पैक्ट के प्रावधान

प्रावधान

विवरण

निर्वाचन पद्धति

पृथक निर्वाचन समाप्त; संयुक्त निर्वाचन के साथ दलितों के लिए आरक्षित सीटें

सीटों की संख्या

प्रांतीय विधानमंडलों में 71 के बजाय 148 आरक्षित सीटें

प्रांतवार सीटें

मद्रास 30, बंगाल 30, मध्य प्रांत 20, संयुक्त प्रांत 20, बिहार-उड़ीसा 18, बम्बई-सिंध 15, पंजाब 8, असम 7

केंद्रीय विधानमंडल

ब्रिटिश भारत की सामान्य सीटों में से 18% दलित वर्गों के लिए

दो-चरणीय चुनाव

पहले दलित मतदाता प्राथमिक चुनाव में हर आरक्षित सीट के लिए 4 उम्मीदवारों का पैनल चुनें; फिर उनमें से एक को संयुक्त मतदाता चुनें — यह व्यवस्था 10 वर्ष के लिए

अन्य

स्थानीय निकायों और सरकारी नौकरियों में उचित प्रतिनिधित्व; दलितों की शिक्षा के लिए अनुदान; अस्पृश्यता के आधार पर कोई अयोग्यता नहीं

✅ पक्ष में तर्क / परिणाम

✔ दलितों को पंचाट से दोगुनी से अधिक सीटें मिलीं

✔ हिंदू समाज का राजनीतिक विभाजन टला

✔ अस्पृश्यता राष्ट्रीय आंदोलन का केंद्रीय मुद्दा बनी

✔ गांधीजी ने इसके बाद हरिजन आंदोलन शुरू किया

✔ संविधान में आरक्षित सीटों (अनुच्छेद 330, 332) की नींव

❌ आलोचना

✔ आंबेडकर ने इसे दबाव में किया गया समझौता कहा

✔ संयुक्त निर्वाचन में ऐसे दलित नेता जीतते जो सवर्ण मतदाताओं को स्वीकार्य हों

✔ दलितों की स्वतंत्र राजनीतिक आवाज़ कमज़ोर हुई

✔ दोहरे मत का अधिकार छिन गया

✔ आंबेडकर ने बाद में "व्हाट कांग्रेस एंड गांधी हैव डन..." (1945) में इसकी कड़ी आलोचना की

निष्कर्ष: पूना पैक्ट ने तात्कालिक संकट टाला और आरक्षण की संवैधानिक परंपरा की नींव रखी, पर दलित प्रतिनिधित्व किसकी शर्तों पर हो — यह बहस आज तक जीवित है। (सविनय अवज्ञा आंदोलन और गोलमेज सम्मेलनों का राजनीतिक पक्ष अध्याय 12 में।)

9. गांधीजी का हरिजन आंदोलन (1932–1934)

गांधीजी के लिए अस्पृश्यता हिंदू धर्म पर कलंक थी — "यदि अस्पृश्यता जीवित रही तो हिंदू धर्म मर जाएगा।" वे वर्ण को कर्तव्य-विभाजन मानते थे, पर ऊँच-नीच और छुआछूत के कट्टर विरोधी थे। उन्होंने अछूतों के लिए "हरिजन" (ईश्वर के जन) शब्द अपनाया — यह शब्द गुजराती संत कवि नरसी मेहता से लिया गया था।

🪔 प्रमुख क़दम

वर्ष

क़दम

विवरण

1920 / 1921

कांग्रेस का नागपुर अधिवेशन; रचनात्मक कार्यक्रम

अस्पृश्यता-निवारण को असहयोग आंदोलन के रचनात्मक कार्यक्रम में शामिल किया; 1923 में कांग्रेस ने इसके लिए समिति बनाई

30 सितंबर 1932

अखिल भारतीय अस्पृश्यता-विरोधी लीग

पूना पैक्ट के तुरंत बाद; दिसंबर 1932 में नाम बदलकर हरिजन सेवक संघ; अध्यक्ष घनश्यामदास बिड़ला, सचिव अमृतलाल विट्ठलदास ठक्कर (ठक्कर बापा); मुख्यालय दिल्ली (किंग्सवे कैंप)

11 फ़रवरी 1933

"हरिजन" साप्ताहिक (अंग्रेज़ी), पूना

साथ में गुजराती "हरिजनबंधु" और हिंदी "हरिजन सेवक"; "यंग इंडिया" का स्थान लिया

मई 1933

21 दिन का आत्मशुद्धि अनशन

हरिजन कार्य के प्रति कार्यकर्ताओं को समर्पित करने के लिए

नवंबर 1933–अगस्त 1934

हरिजन यात्रा

वर्धा से आरंभ; लगभग 20,000 किमी (12,500 मील); हरिजन कोष के लिए धन-संग्रह; मंदिर, कुएँ, स्कूल खोलने की अपील; 25 जून 1934 को पूना में उनकी कार पर बम फेंका गया

1933–1934

मंदिर-प्रवेश विधेयक

केंद्रीय विधानसभा में रंगा अय्यर का मंदिर-प्रवेश विधेयक — सनातनी विरोध के कारण पारित न हो सका

❝ यदि ईश्वर अस्पृश्यता को सहन करे तो मैं उसे ईश्वर नहीं मानूँगा। ❞ (बाल गंगाधर तिलक, दलित वर्ग सम्मेलन, बम्बई (1918))

⚔️ गांधी और आंबेडकर — दो दृष्टियाँ

🕊️ गांधीजी

✔ अस्पृश्यता धार्मिक-नैतिक प्रश्न; सवर्णों का प्रायश्चित

✔ उपाय — हृदय-परिवर्तन, अनशन, मंदिर-प्रवेश, सेवा

✔ वर्ण-व्यवस्था को कर्तव्य-विभाजन के रूप में स्वीकार

✔ दलित हिंदू समाज के अंग — पृथक निर्वाचन का विरोध

✔ शब्द — "हरिजन"

⚖️ डॉ. आंबेडकर

✔ अस्पृश्यता राजनीतिक-आर्थिक प्रश्न; अधिकार की लड़ाई

✔ उपाय — क़ानून, शिक्षा, संगठन, राजनीतिक शक्ति

✔ जाति-व्यवस्था और उसे मान्यता देने वाले शास्त्रों का ही उन्मूलन

✔ दलित एक अलग अल्पसंख्यक वर्ग — पृथक निर्वाचन की माँग

✔ "हरिजन" शब्द को दया-भाव वाला मानकर अस्वीकार

संतुलित दृष्टि: दोनों का लक्ष्य अस्पृश्यता का अंत था; गांधीजी ने सवर्ण समाज की अंतरात्मा को झकझोरा, तो आंबेडकर ने दलितों को आत्मसम्मान और अधिकार की भाषा दी। स्वतंत्र भारत के संविधान में दोनों का प्रभाव दिखता है — अनुच्छेद 17 (अस्पृश्यता का अंत) और आरक्षण।

10. 20वीं सदी की सुधार संस्थाएँ और अकाली आंदोलन

20वीं सदी में सुधार का स्वरूप बदला — अब धार्मिक बहस के बजाय संगठित समाज-सेवा, महिला संगठन, श्रमिक कल्याण और धार्मिक संस्थाओं पर जनता का नियंत्रण प्रमुख मुद्दे बने।

🤝 समाज-सेवा संस्थाएँ

संस्था

वर्ष / स्थान

संस्थापक

कार्य

दलित वर्ग मिशन (डिप्रेस्ड क्लासेस मिशन)

1906, बम्बई

वि. रा. शिंदे

अछूतों के लिए स्कूल, छात्रावास (विस्तार भाग 3 में)

बॉम्बे प्रेसीडेंसी सोशल रिफ़ॉर्म एसोसिएशन

1903, बम्बई

एन.जी. चंदावरकर, आर.जी. भंडारकर आदि

रानाडे की भारतीय राष्ट्रीय सामाजिक सम्मेलन (1887) की परंपरा में; बाल विवाह, विधवा-समस्या, जाति-भेद पर कार्य

सर्वेंट्स ऑफ़ इंडिया सोसायटी (भारत सेवक मंडल)

12 जून 1905, पूना

गोपाल कृष्ण गोखले

देशसेवा के लिए प्रशिक्षित आजीवन कार्यकर्ता; अकाल राहत, शिक्षा, जनजाति-कल्याण; वी. श्रीनिवास शास्त्री, जी.के. देवधर, एन.एम. जोशी, हृदयनाथ कुंज़रू, ठक्कर बापा इससे जुड़े

पूना सेवा सदन

1909, पूना

रमाबाई रानडे, जी.के. देवधर

महिलाओं की शिक्षा, नर्सिंग, स्वावलंबन

सोशल सर्विस लीग

1911, बम्बई

नारायण मल्हार जोशी (पहले अध्यक्ष एन.जी. चंदावरकर)

मज़दूरों के लिए रात्रि-पाठशाला, पुस्तकालय, दवाख़ाने; जोशी ने बाद में एटक (1920) की स्थापना में भूमिका निभाई

सेवा समिति

1914, इलाहाबाद

हृदयनाथ कुंज़रू

मेलों-आपदाओं में सेवा; सेवा समिति बॉय स्काउट्स (1918)

जात-पात तोड़क मंडल

1922, लाहौर

संत राम (आर्य समाज से जुड़े)

अंतर्जातीय विवाह; 1936 में आंबेडकर को आमंत्रित किया

👩 महिला संगठन

संगठन

वर्ष

प्रमुख व्यक्ति

विशेषता

भारत स्त्री महामंडल

1910, इलाहाबाद

सरलादेवी चौधरानी

भारतीय महिलाओं द्वारा बना पहला प्रमुख अखिल भारतीय महिला संगठन; स्त्री शिक्षा, पर्दा-विरोध

वीमेन्स इंडियन एसोसिएशन

1917, मद्रास (अड्यार)

एनी बेसेंट, मार्गरेट कज़िंस, डोरोथी जिनराजदास

महिला मताधिकार की माँग (1917 में मॉन्टेग्यू से मिला प्रतिनिधिमंडल)

नेशनल काउंसिल ऑफ़ वीमेन इन इंडिया

1925

मेहरबाई टाटा

अंतरराष्ट्रीय महिला परिषद की भारतीय शाखा

अखिल भारतीय महिला सम्मेलन

1927, पूना

मार्गरेट कज़िंस

पहले शिक्षा-केंद्रित, फिर क़ानूनी सुधार; शारदा अधिनियम (1929) के लिए अभियान; हिंदू क़ानून में स्त्री-अधिकार

(19वीं सदी के स्त्री-सुधार और क़ानूनों के लिए देखें अध्याय 8; स्वतंत्रता संग्राम और स्वतंत्र भारत में महिलाओं की भूमिका अध्याय 20 में।)

☬ अकाली (गुरुद्वारा सुधार) आंदोलन (1920–1925)

सिख गुरुद्वारों पर महंतों (उदासी पुजारियों) का वंशानुगत क़ब्ज़ा था; वे चढ़ावे को निजी संपत्ति मानते, अनैतिक आचरण करते और अंग्रेज़ सरकार का संरक्षण पाते थे। सिंह सभा और चीफ़ ख़ालसा दीवान (1902, अमृतसर) से जगी सुधार-चेतना इस आंदोलन में बदल गई, जो पूरी तरह अहिंसक रहा और राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ गया।

तिथि

घटना

महत्त्व

अक्टूबर 1920

स्वर्ण मंदिर में दलित सिखों का प्रसाद स्वीकार

पुजारी भाग गए; जनता ने अकाल तख़्त पर नियंत्रण लिया

15 नवंबर 1920

शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एस.जी.पी.सी.)

गुरुद्वारों के प्रबंधन के लिए निर्वाचित संस्था

14 दिसंबर 1920

शिरोमणि अकाली दल

स्वयंसेवक (अकाली) जत्थों का संगठन

20 फ़रवरी 1921

ननकाना साहिब कांड

महंत नारायण दास के आदमियों ने लगभग 130 शांत अकालियों को मार डाला; पूरे देश में आक्रोश; गांधीजी वहाँ गए

नवंबर 1921–जनवरी 1922

चाबियों का मोर्चा (स्वर्ण मंदिर तोशाख़ाना की चाबियाँ)

सरकार ने चाबियाँ लौटाईं; गांधीजी का तार — "भारत की स्वतंत्रता की पहली निर्णायक लड़ाई जीत ली गई"

अगस्त–नवंबर 1922

गुरु का बाग़ मोर्चा (अमृतसर के पास)

पुलिस की लाठियाँ सहते अहिंसक जत्थे — अहिंसा का अद्भुत प्रदर्शन

1923–1925

जैतो मोर्चा (नाभा रियासत)

नाभा के महाराजा रिपुदमन सिंह को गद्दी से हटाने के विरोध में अखंड पाठ; फ़रवरी 1924 में गोलीबारी

1921–1923

बब्बर अकाली (हिंसक धारा)

अकाली आंदोलन की अहिंसा से असहमत; दमन से समाप्त

1925

सिख गुरुद्वारा अधिनियम

गुरुद्वारों का प्रबंधन एस.जी.पी.सी. को — आंदोलन की पूर्ण सफलता

🔸 अन्य उल्लेखनीय सुधार संघर्ष

◆ तारकेश्वर सत्याग्रह (1924, बंगाल): तारकेश्वर (हुगली) शिव मंदिर के भ्रष्ट और अनैतिक महंत के विरुद्ध; स्वामी विश्वानंद और स्वामी सच्चिदानंद के नेतृत्व में, चित्तरंजन दास और कांग्रेस का समर्थन।

◆ हाली प्रथा (गुजरात): सूरत-बारडोली क्षेत्र में दुबला (हलपति) जनजाति के खेतिहर मज़दूरों का बंधुआ श्रम; गांधीवादी कार्यकर्ताओं ने इसके विरुद्ध अभियान चलाया और हलपतियों को "हलपति" (हल का स्वामी) नाम दिया।

◆ श्रमिक और किसान संगठन: 20वीं सदी में जाति-सुधार का प्रश्न आर्थिक शोषण से भी जुड़ा — बेगार, बंधुआ मज़दूरी, भूमिहीनता। (किसान और मज़दूर आंदोलनों के लिए देखें अध्याय 15।)

11. मूल्यांकन और विरासत

🌟 उपलब्धियाँ

◆ आत्मसम्मान और पहचान: सदियों से दबाए गए समुदायों ने स्वयं को इतिहास का कर्ता माना — "मूल निवासी", "आदि हिंदू", "आदि द्रविड़" जैसी नई पहचानें बनीं।

◆ शिक्षा और संगठन: स्कूल, छात्रावास, पत्र-पत्रिकाएँ और जाति-संगठन — सामाजिक गतिशीलता के साधन बने।

◆ राजनीतिक प्रतिनिधित्व: कोल्हापुर (1902) और मद्रास (1921) के आरक्षण से पूना पैक्ट (1932) और संविधान तक आरक्षण की परंपरा बनी।

◆ राष्ट्रीय आंदोलन पर प्रभाव: कांग्रेस को सामाजिक न्याय का प्रश्न अपने कार्यक्रम में शामिल करना पड़ा; स्वतंत्रता की अवधारणा में सामाजिक स्वतंत्रता भी जुड़ी।

⚠️ सीमाएँ

◆ आंदोलन अधिकतर क्षेत्रीय रहे; कुछ ग़ैर-ब्राह्मण आंदोलनों का लाभ केवल प्रभावशाली मध्यम जातियों को मिला, दलितों को नहीं।

◆ कुछ धाराएँ अंग्रेज़ों के प्रति निष्ठावान रहीं और राष्ट्रीय आंदोलन से दूरी रखी, जिससे आपसी अविश्वास बढ़ा।

◆ मंदिर-प्रवेश और क़ानूनी अधिकारों के बावजूद गाँवों में सामाजिक भेदभाव लंबे समय तक बना रहा।

📜 संविधान में विरासत

प्रावधान

विषय

अनुच्छेद 15

धर्म, जाति, लिंग आदि के आधार पर भेदभाव का निषेध; सार्वजनिक कुएँ-तालाब सबके लिए — महाड की माँग संविधान में

अनुच्छेद 16(4)

पिछड़े वर्गों के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण

अनुच्छेद 17

अस्पृश्यता का अंत; उसका किसी भी रूप में आचरण दंडनीय अपराध

अनुच्छेद 46

अनुसूचित जातियों-जनजातियों के शैक्षिक-आर्थिक हितों की अभिवृद्धि (नीति-निदेशक तत्व)

अनुच्छेद 330, 332

लोकसभा और विधानसभाओं में आरक्षित सीटें — पूना पैक्ट की परंपरा

अनुच्छेद 338

राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग

क़ानून

अस्पृश्यता (अपराध) अधिनियम 1955 → नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम 1976; अनुसूचित जाति-जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम 1989

⏳ एक नज़र में कालक्रम

नीचे 20वीं सदी के जाति-विरोधी संघर्ष की प्रमुख तिथियाँ एक साथ दी गई हैं — इन्हें क्रम से याद रखें।

वर्ष

घटना

1873

सत्यशोधक समाज (फुले); "गुलामगीरी"

1888 / 1903

अरुविप्पुरम प्रतिष्ठा / एस.एन.डी.पी. योगम (नारायण गुरु)

1902

शाहू महाराज द्वारा कोल्हापुर में 50% आरक्षण; चीफ़ ख़ालसा दीवान

1906 / 1907

दलित वर्ग मिशन (शिंदे) / साधुजन परिपालन संघम (अय्यंकाली)

1916

जस्टिस पार्टी (साउथ इंडियन लिबरल फ़ेडरेशन)

1920–1925

अकाली आंदोलन → सिख गुरुद्वारा अधिनियम 1925

1924

वैकोम सत्याग्रह; बहिष्कृत हितकारिणी सभा; तारकेश्वर सत्याग्रह

1925

आत्मसम्मान आंदोलन (पेरियार)

1926

आदि धर्म आंदोलन (पंजाब)

1927

महाड सत्याग्रह; मनुस्मृति दहन; अखिल भारतीय महिला सम्मेलन

1929

शारदा अधिनियम

1930–1935

कालाराम मंदिर सत्याग्रह

1931–1932

गुरुवायूर सत्याग्रह

1932

सांप्रदायिक पंचाट (16 अगस्त); पूना पैक्ट (24 सितंबर); हरिजन सेवक संघ

1933

"हरिजन" साप्ताहिक; हरिजन यात्रा (1933–34)

1935 / 1936

येवला घोषणा / इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी; "जाति का उन्मूलन"; त्रावणकोर मंदिर-प्रवेश घोषणा

1942 / 1944

अनुसूचित जाति संघ / द्रविड़ कषगम

1947

मद्रास मंदिर-प्रवेश अधिनियम

1950 / 1955

संविधान — अनुच्छेद 17 / अस्पृश्यता (अपराध) अधिनियम

1956

आंबेडकर की धम्म दीक्षा (14 अक्टूबर) और महापरिनिर्वाण (6 दिसंबर)

💡 अंतिम बात

फुले के "गुलामगीरी" से आंबेडकर के "जाति का उन्मूलन" तक, अरुविप्पुरम से चवदार तालाब तक — इस संघर्ष ने भारत को सिखाया कि राजनीतिक स्वतंत्रता तभी पूरी है जब सामाजिक समानता भी हो। आंबेडकर के शब्दों में, संविधान से हमें "एक व्यक्ति, एक मत" मिला, पर "एक व्यक्ति, एक मूल्य" अभी पाना है।

अगले अध्याय में हम देखेंगे कि इसी दौर में भारतीय राष्ट्रवाद कैसे उभरा — प्रारंभिक राजनीतिक संगठन, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना और उदारवादी चरण।

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