📖 अध्याय 6/20 — आधुनिक भारत का इतिहास

किसान, जनजातीय और नागरिक विद्रोह

संन्यासी-फ़क़ीर से पोलिगार तक, वहाबी-कूका, सैनिक विद्रोह, संथाल-मुंडा-भील, नील-पाबना-दक्कन से तेभागा-तेलंगाना तक, और राजस्थान के किसान व जनजातीय आंदोलन
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🏹 कहानी से शुरुआत: "यह देश साहबों का नहीं है"

30 जून 1855। राजमहल की पहाड़ियों की तलहटी में बसे गाँव भोगनाडीह में लगभग दस हज़ार संथाल इकट्ठा हुए। सबके हाथों में तीर-कमान, कुल्हाड़ियाँ और ढोल थे। उनके सामने खड़े थे चार भाई: सिदो, कान्हू, चाँद और भैरव।

सिदो ने घोषणा की कि "ठाकुर जी" (संथालों के सर्वोच्च देवता) ने उन्हें दर्शन देकर आदेश दिया है: "यह देश साहबों का नहीं है; हमें अपना राज फिर से क़ायम करना है।" अब संथालों पर कोई दीकु (बाहरी शोषक: महाजन, ज़मींदार, दरोगा) राज नहीं करेगा।

ये वही संथाल थे जिन्हें अंग्रेज़ों ने ख़ुद खेती बढ़ाने के लिए बसाया था। 1832 में उनके लिए राजमहल की तलहटी का इलाक़ा दामिन-इ-कोह घेरकर दिया गया। 1838 में वहाँ 40 संथाल गाँव थे, 1851 तक 1,473 हो गए और आबादी 3,000 से बढ़कर 82,000 से अधिक हो गई। पर इसी "अपने" इलाक़े में सरकार ने भारी कर लगाए, साहूकार 50 से 500% तक ब्याज वसूलने लगे और क़र्ज़ न चुकाने पर ज़मीन पर क़ब्ज़ा करने लगे। अदालत और पुलिस साहूकारों के पक्ष में थीं, और रेलवे के ठेकेदार अलग अत्याचार कर रहे थे।

कुछ ही दिनों में यह सभा एक भयंकर विद्रोह, "हूल", में बदल गई। महाजनों, ज़मींदारों, पुलिस थानों और रेलवे ठिकानों पर हमले हुए और आग भागलपुर से मुर्शिदाबाद तक फैल गई। पीरपैंती के पास तो मेजर बरो की टुकड़ी भी हार गई।

तब अंग्रेज़ों ने मार्शल लॉ लगाकर क्रूर दमन किया और हज़ारों संथाल मारे गए। सिदो को अगस्त 1855 में और कान्हू को फ़रवरी 1856 में पकड़कर फाँसी दी गई। पर यह बलिदान बेकार नहीं गया: 1855 में संथाल परगना नाम का अलग ज़िला बना, वहाँ विशेष क़ानून लागू हुए, और आज भी 30 जून को "हूल दिवस" मनाया जाता है।

इसी तरह बंगाल के संन्यासी, दक्षिण के पोलिगार, छोटानागपुर के मुंडा, बंगाल के नील किसान और राजस्थान के भील व किसान, सबने अपने-अपने ढंग से कहा: "बस, अब और नहीं!" यह अध्याय उसी जन-प्रतिरोध की कहानी है, जो 1857 से पहले भी था और 1947 तक चलता रहा। आगे दो कहानियाँ भी मिलेंगी, जो किसानों के संगठित संघर्ष और आदिवासी समाज के आंदोलन को आसान तरीक़े से समझा देंगी।

1. भूमिका: प्रतिरोध के तीन रूप

प्लासी (1757) और बक्सर (1764) के बाद कंपनी का शासन जैसे-जैसे फैला, वैसे-वैसे भू-राजस्व, नए क़ानूनों, नई अदालतों, साहूकारों और वन-नीति ने गाँव, जंगल और पहाड़ — सबके जीवन को उलट-पुलट कर दिया। इसके विरुद्ध जो संघर्ष हुए, उन्हें मोटे तौर पर तीन रूपों में बाँटा जाता है:

1. नागरिक विद्रोह (सिविल विद्रोह) — अपदस्थ राजाओं, ज़मींदारों, पोलिगारों, पूर्व सैनिकों और धार्मिक नेताओं के नेतृत्व में; उद्देश्य प्रायः पुरानी व्यवस्था की बहाली।

2. जनजातीय विद्रोह — जंगल और पहाड़ों में रहने वाले समुदायों के; उद्देश्य ज़मीन, जंगल और स्वशासन की रक्षा, दीकुओं को बाहर करना।

3. किसान आंदोलन — लगान, बेदखली, नील, साहूकारी और बेगार के विरुद्ध; 19वीं सदी में स्थानीय और आर्थिक, 20वीं सदी में राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़े हुए।

इनके अतिरिक्त धार्मिक-राजनीतिक आंदोलन (वहाबी, फ़राइज़ी, कूका) और सैनिक विद्रोह (वेल्लोर, बैरकपुर) भी हुए, जिनकी परिणति 1857 के महाविद्रोह में हुई (अध्याय 7)।

चित्र 6.1: कंपनी शासन के विरुद्ध जन-असंतोष के आठ प्रमुख कारण
चित्र 6.1: कंपनी शासन के विरुद्ध जन-असंतोष के आठ प्रमुख कारण

असंतोष के मुख्य कारण

कारण

कैसे चोट पहुँची

भू-राजस्व नीति

स्थायी बंदोबस्त, रैयतवाड़ी, महालवाड़ी — ऊँची और कठोर माँग; सूखे-अकाल में भी छूट नहीं; सूर्यास्त नियम से ज़मींदारियाँ नीलाम (अध्याय 4)

नए बिचौलिए

ज़मीन बिकाऊ वस्तु बनी; साहूकार, व्यापारी, नए ज़मींदार — ये ही जनजातियों के लिए "दीकु" थे

नई न्याय-व्यवस्था

महँगी, दूर और अनजानी भाषा वाली अदालतें; दस्तावेज़ और गवाही में साहूकार हमेशा आगे

हस्तशिल्प का पतन

बुनकर और कारीगर बेरोज़गार होकर खेती पर टूट पड़े; ज़मीन पर दबाव बढ़ा

वन कानून

1865, 1878, 1927 के वन अधिनियम — जंगल सरकारी संपत्ति; झूम खेती, शिकार, चराई, लकड़ी पर रोक

पुराने शासक वर्ग का पतन

राजा, पोलिगार, सरदार, जागीरदार बेदख़ल — उनके सैनिक, आश्रित और पुरोहित भी बेरोज़गार

सामाजिक-धार्मिक हस्तक्षेप

मिशनरियों की गतिविधियाँ, परंपराओं में दख़ल; लोगों को धर्म पर ख़तरा दिखा

नस्लीय अहंकार

अंग्रेज़ अफ़सरों और बागान मालिकों का अपमानजनक व्यवहार

🔍 आसान परिभाषा: दीकु

📘 परिभाषा: छोटानागपुर और संथाल क्षेत्र की जनजातियों द्वारा बाहरी शोषकों — साहूकारों, व्यापारियों, ज़मींदारों, ठेकेदारों और अंग्रेज़ अफ़सरों — के लिए प्रयुक्त शब्द।

💡 आसान भाषा में: "दीकु" वह बाहरी आदमी है जो जंगल में आकर आदिवासी की ज़मीन, फ़सल और आज़ादी पर क़ब्ज़ा कर लेता है। 🏠 उदाहरण: जैसे कोई बाहर से आकर आपके घर में किराएदार बने और धीरे-धीरे मालिक बन बैठे — संथाल और मुंडा साहूकारों को ऐसे ही देखते थे।

चित्र 6.2: नागरिक, जनजातीय और किसान प्रतिरोध की तुलना: नेतृत्व, उद्देश्य, उदाहरण और सीमाएँ
चित्र 6.2: नागरिक, जनजातीय और किसान प्रतिरोध की तुलना: नेतृत्व, उद्देश्य, उदाहरण और सीमाएँ
चित्र 6.3: भारत में नागरिक, जनजातीय और किसान विद्रोहों के प्रमुख केंद्र (1763–1947)
चित्र 6.3: भारत में नागरिक, जनजातीय और किसान विद्रोहों के प्रमुख केंद्र (1763–1947)

2. नागरिक विद्रोह (1763–1857)

कंपनी के विस्तार से जिन लोगों की सत्ता, ज़मीन और सम्मान छिना, वे सबसे पहले उठ खड़े हुए। इन विद्रोहों के नेता प्रायः अपदस्थ राजा, नवाब, ज़मींदार, पोलिगार या उनके पूर्व सैनिक थे, पर इनमें लड़ने वाली मुख्य शक्ति किसान, कारीगर और बेरोज़गार सैनिक थे।

नागरिक विद्रोहों की सामान्य विशेषताएँ

◆ 🔸 "पीछे की ओर देखने वाले" — उद्देश्य पुरानी सत्ता और पुराने सामाजिक संबंधों की बहाली; कोई नया राजनीतिक विचार नहीं।

◆ 🔸 स्थानीय और बिखरे हुए — अलग-अलग समय पर, अलग-अलग क्षेत्रों में; एक-दूसरे से जुड़ाव नहीं।

◆ 🔸 नेतृत्व अर्ध-सामंती; कई बार नेता ने समझौता कर लिया तो आंदोलन बिखर गया।

◆ 🔸 अंग्रेज़ों ने क्रूर दमन किया, पर कभी-कभी रियायतें भी दीं; ये विद्रोह 1857 के लिए ज़मीन तैयार करते रहे।

(क) पूर्वी भारत

विद्रोह

वर्ष / क्षेत्र

नेता और मुख्य तथ्य

संन्यासी-फ़क़ीर विद्रोह

1763–1800; बंगाल-बिहार

तीर्थयात्रा पर रोक और कर; 1770 के बंगाल अकाल की पीड़ा; हिंदू संन्यासी (गिरि-दशनामी) और मुस्लिम फ़क़ीर साथ लड़े; नेता मजनूँ शाह, मूसा शाह, भवानी पाठक, देवी चौधरानी; बंकिमचंद्र का उपन्यास "आनंदमठ" (1882) इसी पर आधारित

चुआर विद्रोह

1766–1772 और 1795–1816; जंगल महल (मिदनापुर, बाँकुड़ा, मानभूम)

अकाल, भारी लगान; चुआर (भूमिज) किसान-शिकारी; दुर्जन सिंह (1798), जगन्नाथ सिंह; रानी शिरोमणि (कर्णगढ़) का नाम भी जुड़ा

रंगपुर (ढींग) विद्रोह

1783; उत्तर बंगाल

इजारेदार देवी सिंह की लूट के विरुद्ध; किसानों ने नूरुलउद्दीन को अपना "नवाब" घोषित किया और दीवान दयाशील को नियुक्त किया; कर देना बंद किया

पाइक विद्रोह

1817; ओडिशा (खुर्दा)

पाइक = पारंपरिक सैनिक, जिन्हें लगानमुक्त ज़मीन मिली थी; कंपनी ने ज़मीन छीनी, नमक महँगा; नेता बख्शी जगबंधु (खुर्दा के राजा के सेनापति); 1825 में आत्मसमर्पण; 2017 में द्विशताब्दी मनाई गई

अहोम विद्रोह

1828; असम

प्रथम आंग्ल-बर्मा युद्ध के बाद कंपनी ने वादे के बावजूद असम नहीं छोड़ा; नेता गोमधर कुँवर; 1833 में ऊपरी असम राजा पुरंदर सिंह को लौटाया गया

खासी विद्रोह

1829–1833; खासी-जयंतिया पहाड़ियाँ

ब्रह्मपुत्र घाटी को सिलहट से जोड़ने वाली सड़क के लिए ज़मीन और बेगार; नेता तीरत सिंह (ननक्लो के मुखिया); गारो और सिंगफो भी साथ

सिंगफो विद्रोह

1830 के दशक; असम

1839 में ब्रिटिश अधिकारी की हत्या; 1843 में निरंग फिदू का विद्रोह

📖 आनंदमठ और "वंदे मातरम्"

बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने संन्यासी विद्रोह की पृष्ठभूमि पर "आनंदमठ" (1882) लिखा। इसी का गीत "वंदे मातरम्" आगे चलकर राष्ट्रीय आंदोलन का नारा बना; इसे 1896 के कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन में रवींद्रनाथ टैगोर ने पहली बार गाया। 1950 में इसे राष्ट्रगीत का दर्जा मिला।

वारेन हेस्टिंग्स को इस विद्रोह को दबाने में लंबा समय लगा; संन्यासी "छापामार" ढंग से लड़ते थे।

(ख) दक्षिण भारत

विद्रोह

वर्ष / क्षेत्र

नेता और मुख्य तथ्य

पोलिगार विद्रोह

1795–1805; तमिलनाडु (तिरुनेलवेली, रामनाड, शिवगंगा, मदुरै)

पोलिगार = सैनिक सेवा के बदले ज़मीन रखने वाले स्थानीय सरदार; कर वसूली के अधिकार छिने; वीरपांडिया कट्टबोम्मन (पांचालंकुरिची) — 1799 में फाँसी; दूसरा चरण (1800–01) मरुदु भाइयों के नेतृत्व में; 1801 की कर्नाटक संधि से पोलिगार व्यवस्था समाप्त

दीवान वेलु थंपी विद्रोह

1808–09; त्रावणकोर

सहायक संधि का भारी बोझ और रेज़िडेंट मैकॉले का हस्तक्षेप; वेलु थंपी ने कुंडरा घोषणा (1809) में लोगों से अंग्रेज़ों के विरुद्ध उठने का आह्वान किया; पकड़े जाने से पहले आत्मबलिदान

कित्तूर विद्रोह

1824 और 1829; कर्नाटक

राजा की मृत्यु के बाद दत्तक पुत्र को मान्यता नहीं; रानी चेन्नम्मा ने अंग्रेज़ों से युद्ध किया, धारवाड़ कलेक्टर थैकरे मारा गया; रानी बंदी बनीं (1829 में मृत्यु); बाद में संगोली रायण्णा ने छापामार लड़ाई लड़ी — 1831 में फाँसी

रामोसी विद्रोह

1822, 1825–26, 1839–41; महाराष्ट्र (सतारा-पूना)

रामोसी = मराठा शासन में निचले पुलिस-पहरेदार; पेशवा के पतन से बेरोज़गार; चित्तूर सिंह (1822), उमाजी नाइक (1826; 1832 में फाँसी); अंग्रेज़ों ने बाद में ज़मीन देकर समझौता किया

गडकरी विद्रोह

1844; कोल्हापुर

किलों के वंशानुगत रक्षक (गडकरी) की छँटनी, मनमाने भू-राजस्व और उनकी ज़मीनें मामलतदारों के अधीन करने के विरुद्ध; सामानगढ़ और भूदरगढ़ पर क़ब्ज़ा

सावंतवाड़ी विद्रोह

1844; महाराष्ट्र

गडकरी विद्रोह के साथ-साथ; फोंड सावंत और उनके साथी

(ग) पश्चिम और मध्य भारत

विद्रोह

वर्ष / क्षेत्र

नेता और मुख्य तथ्य

कच्छ विद्रोह

1816–1832; गुजरात

कंपनी ने कच्छ के राव भारमल द्वितीय को हटाकर नाबालिग को गद्दी दी, शासन रीजेंसी परिषद को; जाडेजा सरदारों का विरोध; 1832 में अंग्रेज़ों को झुककर समझौता करना पड़ा

वाघेरा विद्रोह

1818–1820; ओखामंडल (गुजरात)

बड़ौदा के गायकवाड़ ने अंग्रेज़ों की मदद से भारी कर लगाए; वाघेरा सरदारों ने हथियार उठाए; 1820 में शांति

भील विद्रोह (खानदेश)

1817–19, 1825, 1831, 1846; पश्चिमी घाट-खानदेश

अंग्रेज़ी क़ब्ज़े, कृषि संकट और नई सरकार के भय से; अंग्रेज़ों का आरोप कि बाजीराव द्वितीय के प्रतिनिधि त्र्यंबकजी डेंगले ने भड़काया; 1825 में सेवाराम के नेतृत्व में फिर विद्रोह; भील कोर बनाकर और सुधार-योजनाओं से नियंत्रण

कोली विद्रोह

1829, 1839, 1844–46; अहमदनगर-पूना-थाणे

किलों की सेवा से हटाए जाने और नई व्यवस्था के विरुद्ध; सह्याद्रि के कोली समुदाय

सूरत नमक आंदोलन

1844

नमक कर आधे रुपये से एक रुपया करने के विरुद्ध; जन-विरोध के कारण सरकार ने बढ़ोतरी वापस ली; 1848 में नए माप-तौल के विरुद्ध भी सफल विरोध

बुंदेला विद्रोह

1842; सागर-दमोह (मध्य प्रदेश)

नई राजस्व व्यवस्था और अदालतों के विरुद्ध; नेता मधुकर शाह और जवाहर सिंह; गोंड राजा हिरदे शाह भी शामिल

3. धार्मिक-राजनीतिक आंदोलन

कुछ आंदोलन धार्मिक सुधार के रूप में शुरू हुए, पर जल्दी ही ज़मींदारों, नील बागान मालिकों और अंग्रेज़ों के विरुद्ध राजनीतिक संघर्ष बन गए। इनमें किसानों और ग़रीबों की बड़ी भागीदारी थी।

आंदोलन

क्षेत्र / काल

मुख्य तथ्य

वहाबी आंदोलन

रायबरेली से आरंभ; केंद्र पटना; 1820–1870 का दशक

संस्थापक सैयद अहमद बरेलवी (शाह वलीउल्लाह से प्रेरित); इस्लाम की शुद्धि; भारत को "दार-उल-हर्ब" (शत्रु-भूमि) मानकर इसे "दार-उल-इस्लाम" बनाने का लक्ष्य; पहले पंजाब में सिखों के विरुद्ध, 1830 में पेशावर पर अस्थायी क़ब्ज़ा; 1831 में बालाकोट में सैयद अहमद मारे गए; पेशावर में अपने नाम के सिक्के भी ढलवाए; उनके बाद पटना केंद्र बना — नेता मौलवी क़ासिम, विलायत अली, इनायत अली, अहमदुल्ला; 1849 में पंजाब विलय के बाद निशाना अंग्रेज़; 1860 के दशक के "वहाबी मुक़दमों" (अंबाला 1864, पटना 1865) से दमन

तीतू मीर आंदोलन

1831; बारासात (बंगाल)

तीतू मीर (मीर निसार अली) — सैयद अहमद के अनुयायी; हिंदू-मुस्लिम किसानों को ज़मींदारों और नील बागान मालिकों के विरुद्ध संगठित किया; नारकेलबेरिया में बाँस का क़िला; 1831 में अंग्रेज़ी सेना से लड़ते हुए मारे गए

फ़राइज़ी आंदोलन

1818 से; पूर्वी बंगाल (फ़रीदपुर)

संस्थापक हाजी शरीयतुल्लाह — "फ़र्ज़" (धार्मिक कर्तव्य) पर ज़ोर; पुत्र दूदू मियाँ (मुहम्मद मोहसिन) ने इसे किसान आंदोलन बनाया — "ज़मीन ईश्वर की है", लगान देना ईश्वर के नियम के विरुद्ध; ज़मींदारों और नील बागान मालिकों का विरोध; दूदू मियाँ की 1862 में मृत्यु के बाद आंदोलन धार्मिक दायरे में सिमट गया

पागलपंथी आंदोलन

1825–1850 का दशक; शेरपुर (मैमनसिंह, बंगाल)

संस्थापक करम शाह (अर्ध-धार्मिक पंथ); पुत्र टीपू (टीपू शाह) ने इसे ज़मींदारों के विरुद्ध हाजोंग और गारो किसानों का आंदोलन बनाया; 1825 में शेरपुर पर क़ब्ज़ा; सरकार को लगान दर तय करनी पड़ी

कूका (नामधारी) आंदोलन

1840 के दशक से; पश्चिमी पंजाब

संस्थापक भगत जवाहर मल (सियाँ साहब); आगे बाबा राम सिंह (भैणी साहब, लुधियाना); सिख धर्म की शुद्धि, जाति-भेद और मांसाहार-मद्यपान का विरोध, विधवा विवाह; अंग्रेज़ी वस्तुओं और संस्थाओं का बहिष्कार; 1872 में मलेरकोटला की घटना के बाद 66 कूकों को तोपों से उड़ाया; राम सिंह को रंगून निर्वासित किया गया, जहाँ 1885 में मृत्यु

🧭 विश्लेषण: धार्मिक चोले में राजनीतिक प्रतिरोध

इन आंदोलनों ने धर्म को जनता को जोड़ने का माध्यम बनाया, पर इनकी जड़ें आर्थिक शोषण (ज़मींदार, नील, लगान) में थीं। कूका आंदोलन का बहिष्कार का तरीका आगे के स्वदेशी आंदोलन की झलक देता है।

सीमा: धार्मिक पहचान पर आधारित होने से इनकी अपील सीमित रही; कुछ मामलों में (वहाबी) इनका लक्ष्य राष्ट्रीय नहीं, धार्मिक राज्य था।

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4. 1857 से पहले के सैनिक विद्रोह

कंपनी की सेना के भारतीय सिपाही (फ़ारसी "सिपाह" = सेना) कम वेतन, विदेश भेजे जाने, धर्म में हस्तक्षेप और अंग्रेज़ अफ़सरों के अपमानजनक व्यवहार से बार-बार भड़के। ये विद्रोह 1857 के पूर्वाभ्यास जैसे थे।

वर्ष

स्थान / टुकड़ी

कारण और परिणाम

1764

बंगाल सेना (बक्सर से पहले)

कंपनी की बंगाल सेना में विद्रोह; मुनरो ने 24 सिपाहियों को तोप से उड़ा दिया

1806

वेल्लोर (तमिलनाडु)

कमांडर-इन-चीफ़ जॉन क्रैडॉक के नए नियम: माथे पर तिलक-निशान और दाढ़ी पर रोक, नई गोल टोपी (पगड़ी) — धर्म पर ख़तरा माना गया; टीपू के पुत्रों का वहाँ बंदी होना; विद्रोह में कई अंग्रेज़ मारे गए, मैसूर का झंडा फहराया; क्रूरता से दबाया गया; गवर्नर विलियम बेंटिक और क्रैडॉक को वापस बुलाया गया (गवर्नर जनरल तब जॉर्ज बार्लो)

1824

बैरकपुर (47वीं देशी पैदल सेना)

बर्मा युद्ध के लिए समुद्र पार भेजे जाने से इनकार (धर्म-भ्रष्टता का भय); सेना पर गोली चलाई गई, टुकड़ी भंग

1825

असम (ग्रेनेडियर कंपनी)

बर्मा युद्ध के दौरान विद्रोह

1838

शोलापुर (देशी पैदल सेना)

भत्ते न मिलने पर

1844–1852

34वीं, 22वीं, 66वीं, 37वीं देशी पैदल सेनाएँ

सिंध-पंजाब अभियानों में विदेश भत्ता (बट्टा) बंद करने और लंबी सेवा से असंतोष; 1852 में 38वीं टुकड़ी ने बर्मा जाने से मना किया

फ़रवरी 1857

बरहामपुर (19वीं देशी पैदल सेना)

चर्बी वाले कारतूसों के विरुद्ध; यहीं से 1857 की शुरुआत की पृष्ठभूमि बनी (अध्याय 7)

5. जनजातीय समाज और औपनिवेशिक शासन

19वीं सदी तक देश के कई हिस्सों में जनजातीय लोग अलग-अलग तरह के काम करते थे। उनका जीवन जंगल पर टिका था, और उनके समाज में मुखियाओं का महत्वपूर्ण स्थान था। अंग्रेज़ी शासन ने इन सबको बदल दिया।

(क) जनजातीय लोगों की आजीविका

आजीविका

विवरण

उदाहरण

झूम (घुमंतू) खेती

जंगल का छोटा भूखंड चुनकर पेड़ों के ऊपरी हिस्से काटना ताकि धूप ज़मीन तक पहुँचे; घास-फूस जलाकर राख खाद का काम करती; कुदाल जैसे औज़ार से ज़मीन खुरचकर बीज बिखेरना; फ़सल के बाद भूखंड को परती छोड़कर दूसरे भूखंड पर जाना

पूर्वोत्तर और मध्य भारत के पहाड़ी-जंगली इलाक़े

शिकार और संग्रह

जानवरों का शिकार, वन उपज (फल, जड़ें, बीज, पत्ते) इकट्ठा करना; वन उपज को बाज़ार में बेचना या चावल-अनाज से बदलना; जड़ी-बूटियों का ज्ञान

ओडिशा के खोंड; ज़रूरत पड़ने पर शहद, लकड़ी, साल के पत्ते बेचना

पशुपालन

मौसम के अनुसार जानवरों के साथ घूमना; घास ख़त्म होने पर दूसरी जगह जाना

पंजाब के वन गुज्जर, आंध्र के लबाडिया (गाय), कुल्लू के गद्दी (भेड़), कश्मीर के बकरवाल (बकरी)

स्थायी खेती

हल का प्रयोग, ज़मीन पर अधिकार; ज़मीन पहले पूरे कुल की होती थी, बाद में व्यक्तिगत

छोटानागपुर के मुंडा, संथाल, गोंड, उराँव

🔍 आसान परिभाषा: झूम खेती (घुमंतू खेती)

📘 परिभाषा: खेती का वह तरीका जिसमें जंगल का भूखंड साफ़ कर, वनस्पति जलाकर कुछ वर्ष खेती की जाती है और फिर उसे परती छोड़कर नए भूखंड पर खेती शुरू की जाती है।

💡 आसान भाषा में: "आज यहाँ, कल वहाँ" — एक खेत कुछ साल, फिर उसे आराम देकर दूसरे खेत पर; राख ही खाद है। 🏠 उदाहरण: पूर्वोत्तर में आज भी "झूम" होती है; अंग्रेज़ ऐसे लोगों पर कर नहीं लगा पाते थे, इसलिए उन्हें स्थायी खेती पर मजबूर करना चाहते थे।

(ख) अंग्रेज़ी शासन ने जनजातीय जीवन कैसे बदला?

1. मुखियाओं की ताक़त छिनी

◆ अंग्रेज़ों के आने से पहले मुखियाओं के पास आर्थिक शक्ति, अपने इलाक़े की ज़मीन का प्रबंधन, अपनी पुलिस और न्याय के नियम थे। अंग्रेज़ों के अधीन वे ज़मीन तो रख पाए, पर प्रशासनिक और न्यायिक शक्तियाँ छिन गईं; उन्हें अंग्रेज़ों को नज़राना देना और उनके नियम लागू करना पड़ता था।

2. घुमंतू खेती करने वालों पर दबाव

◆ अंग्रेज़ों को स्थायी खेती करने वाले, स्थिर गाँवों वाले लोग पसंद थे, क्योंकि उन पर कर लगाना और नियंत्रण आसान था। ज़मीन की पैमाइश हुई, अधिकार तय किए गए, लगान तय हुआ।

◆ पर यह प्रयोग प्रायः असफल रहा — जहाँ पानी कम और मिट्टी सूखी थी, वहाँ हल की खेती से उपज नहीं होती थी। पूर्वोत्तर के झूम किसानों ने विरोध किया तो अंततः अंग्रेज़ों को उन्हें जंगल के कुछ हिस्सों में झूम की छूट देनी पड़ी।

🌳 बैगा: "हम जंगल की संतान हैं"

मध्य भारत के बैगा स्वयं को जंगल की संतान मानते थे, जो केवल वन उपज पर जीवित रह सकती है। दूसरों के यहाँ मज़दूरी करना उनके लिए अपमान की बात थी। बैगा मध्य भारत की जनजातियों में सबसे कुशल शिकारी माने जाते थे; स्त्रियाँ जड़ें-कंद और महुआ के बीज इकट्ठा करती थीं। ऐसे समुदायों पर हल की खेती और बेगार थोपना उनकी पहचान पर चोट था।

3. वन कानून और उनका असर

◆ अंग्रेज़ों ने जंगलों को राज्य की संपत्ति घोषित किया। कुछ जंगल आरक्षित वन बने — जहाँ से लकड़ी (विशेषकर रेलवे स्लीपर और जहाज़ों के लिए) आती थी; यहाँ झूम, फल इकट्ठा करना, शिकार वर्जित।

◆ नतीजा: लोग मजबूर होकर चोरी से लकड़ी काटने लगे, पकड़े जाने पर वन रक्षकों को घूस देनी पड़ती; कुछ महिलाओं से वन रक्षक ज़बरदस्ती भी करते।

◆ मज़दूरों की समस्या हल करने के लिए अंग्रेज़ों ने "वन गाँव" बसाए — झूम किसानों को जंगल में छोटे भूखंड मिले, बदले में उन्हें वन विभाग के लिए मज़दूरी करनी और जंगल की देखभाल करनी पड़ती।

◆ विरोध: 1906 में असम में सोंग्राम संगमा का विद्रोह; 1930 के दशक में मध्य प्रांत का वन सत्याग्रह; 1910 में बस्तर का विद्रोह; 1940 के दशक में महाराष्ट्र के वारली।

4. व्यापार और साहूकारों की समस्या

◆ 19वीं सदी में व्यापारी और साहूकार जंगलों में ज़्यादा आने लगे। वे ऊँचे दाम पर माल बेचते और जनजातियों को ऊँचे ब्याज पर क़र्ज़ देते।

🐛 रेशम के कीड़ों का हिसाब — शोषण का गणित

18वीं सदी में यूरोप में भारतीय रेशम की भारी माँग थी। हज़ारीबाग (झारखंड) के संथाल रेशम के कीड़े पालते थे। व्यापारी अपने एजेंट भेजकर उन्हें क़र्ज़ देते और कोकून इकट्ठा करते।

कीड़े पालने वालों को 1,000 कोकूनों के लिए केवल 3–4 रुपये मिलते थे, जबकि वे कोकून बर्दवान या गया भेजकर पाँच गुना दाम पर बेचे जाते। बिचौलिए ख़ूब मुनाफ़ा कमाते — इसीलिए जनजातीय लोग व्यापारियों और साहूकारों को "बाहरी दुश्मन" मानने लगे।

5. काम की तलाश: बागान और खदानें

◆ 19वीं सदी के आख़िर से असम के चाय बागानों और झारखंड की कोयला खदानों में भारी संख्या में जनजातीय लोगों को ठेकेदारों के ज़रिये भर्ती किया गया — बहुत कम वेतन, घर लौटने पर रोक।

◆ 1920 के दशक में झरिया और रानीगंज की कोयला खदानों में काम करने वालों में लगभग आधे जनजातीय थे। अँधेरी, दमघोंटू खदानों में काम जानलेवा था — 1920 के दशक में देश की कोयला खदानों में हर साल 2,000 से ज़्यादा मज़दूर मारे जाते थे।

6. प्रमुख जनजातीय विद्रोह

(क) जनजातीय विद्रोहों की विशेषताएँ

🌿 मुख्य भूमि (मध्य-पूर्व भारत) के विद्रोह

✔ कारण: ज़मीन छिनना, दीकु साहूकार-ज़मींदार, वन कानून, बेगार

✔ अक्सर ग़ैर-जनजातीय लोगों (दीकुओं) पर भी हमला

✔ करिश्माई धार्मिक नेता — ईश्वर का दूत होने का दावा (सिदो-कान्हू, बिरसा)

✔ "स्वर्ण युग" (सतजुग) की वापसी का सपना

✔ तीर-कमान, कुल्हाड़ी जैसे पारंपरिक हथियार

⛰️ पूर्वोत्तर (सीमांत) के विद्रोह

✔ कारण: स्वायत्तता और राजनीतिक पहचान पर ख़तरा; ज़मीन का प्रश्न कम

✔ दीकुओं का प्रवेश कम था, अतः निशाना मुख्यतः अंग्रेज़ी शासन

✔ लंबे समय तक चले; कुछ ने अलग राज्य / स्वायत्तता की माँग की

✔ कई आंदोलन ईसाई मिशनरियों के विरोध और परंपरा की रक्षा से जुड़े

✔ राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ाव कम

(ख) पहाड़िया, संथाल और "हूल"

राजमहल की पहाड़ियों (झारखंड-बंगाल सीमा) में पहाड़िया लोग रहते थे — झूम खेती, शिकार और वन उपज से जीवन चलाते थे। वे पूरे जंगल को अपनी भूमि मानते थे। अकाल या अभाव के समय वे मैदानी इलाक़ों पर हमले करते और "खिराज" (संरक्षण-शुल्क) लेते थे।

◆ 1810–11 में सर्वेक्षक फ़्रांसिस बुकानन ने इन पहाड़ियों की यात्रा की। उसने लिखा कि पहाड़िया लोग अंग्रेज़ अफ़सरों को संदेह से देखते थे और बात करने से कतराते थे, जबकि संथाल बस्तियों को उसने समृद्ध बताया — अंग्रेज़ों की नज़र में संथाल "आदर्श बाशिंदे" थे।

◆ तिलका माँझी (जबरा पहाड़िया) — 1778–85 में अंग्रेज़ों के विरुद्ध संघर्ष; 1784 में भागलपुर के कलेक्टर ऑगस्टस क्लीवलैंड पर तीर से हमला; 1785 में फाँसी। उन्हें अंग्रेज़ों के विरुद्ध हथियार उठाने वाले आरंभिक जनजातीय नायकों में गिना जाता है।

◆ 1770 के दशक में अंग्रेज़ों ने पहाड़ियों के "निर्मूलन" की क्रूर नीति अपनाई; 1780 के दशक में क्लीवलैंड ने शांति-स्थापना की नीति चलाई — मुखियाओं को वार्षिक भत्ता, बदले में अपने लोगों का "अच्छा आचरण" सुनिश्चित करना। कई मुखियाओं ने भत्ता ठुकराया; जिन्होंने लिया, वे समुदाय में प्रतिष्ठा खो बैठे।

◆ इसी समय अंग्रेज़ों ने खेती बढ़ाने के लिए संथालों को बुलाया। पहाड़िया कुदाल (झूम) के प्रतीक थे, संथाल हल (स्थायी खेती) के — दोनों का टकराव हुआ और पहाड़िया पहाड़ों के भीतर सिमटते गए।

🔍 आसान परिभाषा: दामिन-इ-कोह

📘 परिभाषा: 1832 में राजमहल की तलहटी का सीमांकित वह बड़ा क्षेत्र, जिसे अंग्रेज़ों ने संथालों की भूमि घोषित किया; फ़ारसी में अर्थ "पहाड़ियों का आँचल"।

💡 आसान भाषा में: संथालों के लिए घेरकर दिया गया "अपना इलाक़ा" — शर्त थी कि वे यहीं बसें, हल चलाएँ और जंगल साफ़ करें। 🏠 उदाहरण: 1838 में यहाँ 40 संथाल गाँव थे, 1851 तक 1,473 हो गए; आबादी 3,000 से बढ़कर 82,000 से अधिक। पर इसी "अपने" इलाक़े में सरकार ने भारी कर लगाए और साहूकार घुस आए।

◆ विद्रोह के कारण: सरकार का ऊँचा कर; साहूकारों का 50 से 500% तक ब्याज और क़र्ज़ न चुकाने पर ज़मीन पर क़ब्ज़ा; ज़मींदारों का दामिन क्षेत्र पर दावा; अदालत-पुलिस साहूकारों के पक्ष में; रेलवे निर्माण के ठेकेदारों का अत्याचार।

◆ विद्रोह (1855–56): 30 जून 1855 को भोगनाडीह की सभा के बाद महाजनों, ज़मींदारों, पुलिस थानों और रेलवे ठिकानों पर हमले; भागलपुर से मुर्शिदाबाद तक फैलाव; आरंभ में दरोगा महेशलाल दत्त और महाजन दीनदयाल राय जैसे शोषकों को निशाना बनाया; पीरपैंती (भागलपुर के पास) में मेजर बरो की टुकड़ी हारी; भागलपुर के कमिश्नर ब्राउन और मेजर जनरल लॉयड ने दमन की कमान संभाली; मार्शल लॉ लगाकर क्रूर दमन — हज़ारों संथाल मारे गए; सिदो (अगस्त 1855) और कान्हू (फ़रवरी 1856) पकड़े जाकर फाँसी पर चढ़ाए गए।

◆ परिणाम: संथाल परगना नामक अलग ज़िला (1855) बनाया गया — भागलपुर और बीरभूम से लगभग 5,500 वर्गमील; वहाँ विशेष क़ानून लागू; आगे संथाल परगना काश्तकारी क़ानूनों से संथाल ज़मीन के हस्तांतरण पर रोक। आज भी 30 जून को "हूल दिवस" मनाया जाता है।

चित्र 6.4: पहाड़िया से संथाल हूल तक — राजमहल क्षेत्र का कालक्रम (1770–1856)
चित्र 6.4: पहाड़िया से संथाल हूल तक — राजमहल क्षेत्र का कालक्रम (1770–1856)

(ग) छोटानागपुर और ओडिशा के विद्रोह

विद्रोह

वर्ष / क्षेत्र

नेता और मुख्य तथ्य

हो विद्रोह

1820–22, 1831; सिंहभूम (कोल्हान)

पोरहाट के राजा के साथ मिलकर अंग्रेज़ों के क़ब्ज़े और नई राजस्व व्यवस्था का विरोध; 1837 में "कोल्हान" क्षेत्र पर सीधा ब्रिटिश नियंत्रण

कोल विद्रोह

1831–32; छोटानागपुर (राँची, सिंहभूम, हज़ारीबाग, पलामू, मानभूम)

ज़मीन बाहरी लोगों (सिख-मुस्लिम किसानों, ठेकेदारों) को दिए जाने के विरुद्ध; नेता बुद्धो भगत; लगभग हज़ार बाहरी लोगों की हत्या; सेना ने दबाया

भूमिज विद्रोह

1832–33; मानभूम-बड़ाभूम (बंगाल)

नेता गंगा नारायण सिंह — इसलिए "गंगा नारायण हंगामा"; उत्तराधिकार विवाद और कंपनी की नीतियों के विरुद्ध; इसके बाद "दक्षिण-पश्चिम सीमांत एजेंसी" बनाकर सीधा प्रशासन

खोंड विद्रोह

1837–1856; ओडिशा (घुमसुर, कंधमाल) से आंध्र तक

अंग्रेज़ों द्वारा मेरिया (नरबलि) प्रथा रोकने के बहाने हस्तक्षेप, नए कर, बाहरी ज़मींदारों का आगमन; नेता चक्र बिसोई; अंग्रेज़ों ने "मेरिया एजेंसी" बनाई; 1857 में चक्र बिसोई लापता; सवर और कुछ अन्य जनजातियाँ भी साथ

सुरेंद्र साई का संघर्ष

1827–1862; संबलपुर (ओडिशा)

उत्तराधिकार से वंचित किए जाने के विरुद्ध; 1857 में जेल से छूटकर संघर्ष तेज़ किया; 1862 में आत्मसमर्पण, 1864 में फिर गिरफ़्तार, असीरगढ़ जेल में 1884 में मृत्यु

खरवार विद्रोह

1870 का दशक; बिहार (शाहाबाद-पलामू)

राजस्व बंदोबस्त के विरुद्ध; नेता भागीरथ माँझी — "बाबाजी"; सुधार आंदोलन के रूप में आरंभ

नायकड़ा आंदोलन

1858–1868; पंचमहाल (गुजरात)-मध्य प्रदेश

अंग्रेज़ी शासन और सवर्ण प्रभुत्व के विरुद्ध; नेता रूपसिंह और जोरिया भगत; "धर्मराज" की स्थापना का लक्ष्य

भुइयाँ-जुआंग विद्रोह

1867–68 और 1891–93; क्योंझर (ओडिशा)

स्थानीय राजा की मृत्यु के बाद अंग्रेज़ों द्वारा थोपे गए शासक के विरुद्ध; नेता रत्ना नायक और धरणीधर नायक

खोंडा डोरा अभियान

1900; विशाखापत्तनम (डाबुर क्षेत्र)

नेता कोर्रा मल्लय्या — स्वयं को पांडवों का अवतार बताया; अंग्रेज़ों के विरुद्ध

सरदारी लड़ाई

1858–1895; छोटानागपुर

मुंडा सरदारों का लंबा अहिंसक-अदालती संघर्ष — बेगार, दीकु ज़मींदारों और ज़मीन छिनने के विरुद्ध; इसे "मुल्की लड़ाई" भी कहा गया; यही बिरसा आंदोलन की पृष्ठभूमि बनी

(घ) बिरसा मुंडा और "उलगुलान"

बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवंबर 1875 को उलिहातु (आज का खूँटी ज़िला, झारखंड) में हुआ। बचपन बोहोंडा के जंगलों में भेड़-बकरी चराते, बाँसुरी बजाते और गाँव के अखाड़ों में नाचते-गाते बीता। ग़रीबी के कारण पिता को काम की तलाश में एक गाँव से दूसरे गाँव भटकना पड़ता।

बिरसा पर पड़े प्रभाव

◆ 🔹 सरदारों की कहानियाँ: गाँव के बुज़ुर्गों से सरदारी लड़ाई के क़िस्से सुने — एक ऐसे स्वर्ण युग की बातें, जब मुंडा दीकुओं के ज़ुल्म से मुक्त थे और पुरखों के अधिकार सुरक्षित थे।

◆ 🔹 मिशनरी स्कूल: वहाँ मिशनरियों के उपदेश सुने कि मुंडा अपना स्वर्ग का राज फिर पा सकते हैं और अपने खोए अधिकार वापस ले सकते हैं।

◆ 🔹 वैष्णव प्रचारक का साथ: जनेऊ पहना, शुद्धता और दया पर ज़ोर।

आंदोलन का स्वरूप

◆ 1895 में बिरसा ने चमत्कारी उपचारक और "भगवान का दूत" के रूप में प्रसिद्धि पाई; अनुयायी उन्हें "धरती आबा" (धरती के पिता) कहने लगे। उन्होंने मुंडाओं से शराब छोड़ने, गाँव साफ़ रखने, डायन-जादू-टोने में विश्वास न करने को कहा — यानी सुधार भी।

◆ उन्होंने मिशनरियों, हिंदू ज़मींदारों, साहूकारों, व्यापारियों और अंग्रेज़ों — सबको "रावण" (दीकु) बताया, जो मुंडाओं के जीवन-तरीक़े को नष्ट कर रहे थे। लक्ष्य: "बिरसा राज" — सफ़ेद झंडा उसका प्रतीक।

◆ बिरसा ने एक स्वर्ण युग (सतयुग) की याद दिलाई — जब मुंडा अच्छा जीवन जीते थे, तटबंध बनाते, प्राकृतिक झरनों से पानी लेते, पेड़ और बाग़ लगाते थे, और कोई किसी को नहीं सताता था। अंग्रेज़ों को सबसे ज़्यादा डर उनके राजनीतिक लक्ष्य से था — मिशनरियों, साहूकारों, हिंदू ज़मींदारों और सरकार को बाहर कर बिरसा के नेतृत्व में मुंडा राज।

◆ 1895 में गिरफ़्तारी, दंगे-फ़साद के आरोप में दो साल की सज़ा; 1897 में लौटकर गाँव-गाँव प्रचार; 1899 में क्रिसमस की पूर्व संध्या पर विद्रोह — थानों, चर्चों, महाजनों और ज़मींदारों की संपत्ति पर हमले।

◆ 9 जनवरी 1900 को डोमबारी पहाड़ी पर ब्रिटिश सेना की गोलीबारी में बड़ी संख्या में मुंडा मारे गए; 3 मार्च 1900 को बिरसा चक्रधरपुर के जामकोपाई जंगल में पकड़े गए और 9 जून 1900 को राँची जेल में उनकी मृत्यु हो गई (सरकारी कथन: हैज़ा)।

🔍 आसान परिभाषा: उलगुलान

📘 परिभाषा: मुंडारी भाषा में "महान हलचल / महाविद्रोह"; 1899–1900 में बिरसा मुंडा के नेतृत्व में हुए मुंडा विद्रोह का नाम।

💡 आसान भाषा में: छोटा-मोटा झगड़ा नहीं, पूरी व्यवस्था को उलटने वाली बड़ी क्रांति — जैसे संथालों का "हूल"। 🏠 उदाहरण: "हूल" = संथाल विद्रोह (1855); "उलगुलान" = मुंडा विद्रोह (1899–1900) — दोनों शब्द याद रखें।

🔍 आसान परिभाषा: खूँटकट्टी व्यवस्था

📘 परिभाषा: मुंडा समाज की पारंपरिक सामूहिक भू-स्वामित्व प्रणाली — जिस कुल (खूँट) के पुरखों ने जंगल साफ़ कर गाँव बसाया, ज़मीन पर उसी कुल का साझा अधिकार।

💡 आसान भाषा में: ज़मीन किसी एक व्यक्ति की नहीं, पूरे ख़ानदान की; कोई बाहरी उसे ख़रीद नहीं सकता था। 🏠 उदाहरण: अंग्रेज़ी राजस्व व्यवस्था, ठेकेदारों और बाहरी ज़मींदारों ने इसे तोड़ा; बिरसा आंदोलन के बाद 1908 के क़ानून ने इसे मान्यता दी।

चित्र 6.5: बिरसा मुंडा का जीवन और उलगुलान — कालक्रम (1875–1908)
चित्र 6.5: बिरसा मुंडा का जीवन और उलगुलान — कालक्रम (1875–1908)

🌟 बिरसा आंदोलन का महत्व

1. अंग्रेज़ों को छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (1908) बनाना पड़ा — जनजातीय ज़मीन आसानी से दीकुओं को हस्तांतरित न हो सके।

2. इसने दिखाया कि जनजातीय लोग अन्याय के विरुद्ध प्रतिरोध करने और अपना ग़ुस्सा प्रकट करने में सक्षम हैं; वे यह अपने ख़ास ढंग से — अपने धार्मिक विश्वासों और रीति-रिवाजों के सहारे — करते थे।

3. आज 15 नवंबर को झारखंड स्थापना दिवस (2000) और "जनजातीय गौरव दिवस" (2021 से) के रूप में मनाया जाता है; संसद भवन में बिरसा का चित्र लगा है।

(ङ) 20वीं सदी के जनजातीय आंदोलन (मुख्य भूमि)

आंदोलन

वर्ष / क्षेत्र

मुख्य तथ्य

ताना भगत आंदोलन

1914 से; छोटानागपुर (उराँव)

नेता जतरा उराँव (जतरा भगत), बलराम भगत, देवमनिया भगत; एकेश्वरवाद, मांस-मदिरा त्याग, भूत-प्रेत में विश्वास का विरोध; लगान और बेगार से इनकार; आगे गांधीवादी — खादी, चरखा, असहयोग और सविनय अवज्ञा में भागीदारी

कोया (रम्पा) विद्रोह

1879–80; गोदावरी पहाड़ियाँ (आंध्र)

पुलिस उत्पीड़न, साहूकारों, नए वन नियमों और ताड़ी पर कर के विरुद्ध; नेता टोम्मा दोरा (सोरा) और राजा अनंतय्यर; 1886 में फिर विद्रोह

रम्पा विद्रोह

1916 और 1922–24; गोदावरी एजेंसी (आंध्र)

नेता अल्लूरी सीताराम राजू (गैर-जनजातीय, पर कोया-कोंडा डोरा का नेतृत्व किया); वन नियम, बेगार और झूम पर रोक के विरुद्ध; थानों पर छापामार हमले; असहयोग से प्रेरणा, पर हिंसा को आवश्यक माना; मई 1924 में पकड़े जाकर मार दिए गए; "मन्यम वीरुडु" (जंगल का वीर)

बस्तर विद्रोह

1910; बस्तर (छत्तीसगढ़)

आरक्षित वनों के विस्तार, वन गाँवों और बेगार के विरुद्ध; नेता गुंडा धुर; धुरवा जनजाति; अंग्रेज़ों ने दबाया पर आरक्षण योजना आधी करनी पड़ी

वारली विद्रोह

1945–47; ठाणे (महाराष्ट्र)

बेगार, बंधुआ मज़दूरी और साहूकारों के विरुद्ध; किसान सभा की गोदावरी परुलेकर

गोंड आंदोलन

1940 का दशक; आदिलाबाद (हैदराबाद रियासत)

वन और भूमि अधिकारों के लिए; नेता कोमरम भीम — नारा "जल, जंगल, ज़मीन"; 1940 में मारे गए; गोंड धर्म के अनुयायियों को एकजुट करने का प्रयास

झारखंड आंदोलन

1920 से; बिहार-ओडिशा-बंगाल

जनजातीय पहचान और स्वायत्तता के लिए; आदिवासी महासभा (1938) और झारखंड पार्टी (1949) का गठन

वन सत्याग्रह

1920–30 के दशक; गुंटूर (आंध्र), पलामू (बिहार)

चेंचू और खरवार जनजातियों का वन पर सरकारी नियंत्रण के विरुद्ध सत्याग्रह

(च) पूर्वोत्तर के जनजातीय आंदोलन

आंदोलन

वर्ष / क्षेत्र

मुख्य तथ्य

ज़ेलियांग्रोंग आंदोलन

1920 का दशक; मणिपुर

ज़ेमी, लियांगमेई, रोंगमेई जनजातियों का; 1917–19 की कूकी हिंसा में अंग्रेज़ों द्वारा सुरक्षा न देने के विरुद्ध; इसी से आगे जादोनांग का आंदोलन निकला

कूकी विद्रोह

1917–19; मणिपुर

प्रथम विश्वयुद्ध में फ़्रांस भेजने के लिए मज़दूर-भर्ती और बेगार के विरुद्ध

जादोनांग का हेराका आंदोलन

1920 के दशक; मणिपुर-नागा पहाड़ियाँ

1905–31; ज़ेलियांग्रोंग नागा; हेराका पंथ — पारंपरिक धर्म का पुनर्जीवन, ईसाई धर्मांतरण और अंग्रेज़ी शासन का विरोध, "नागा राज" की कल्पना; 1931 में जादोनांग को फाँसी

रानी गाइदिन्ल्यू

1931–32; मणिपुर-नागा पहाड़ियाँ

जादोनांग की संबंधी और अनुयायी, 13 वर्ष की उम्र से आंदोलन में; कर न देने और अंग्रेज़ों से लड़ने का आह्वान; 1932 में गिरफ़्तार, आजीवन कारावास; 1947 में रिहा; आंदोलन दबा, पर 1946 में कबुई नागा एसोसिएशन बना; नेहरू ने उन्हें "रानी" और "पहाड़ों की बेटी" कहा

त्रिपुरा के विद्रोह

1863; 1920 का दशक; 1942–43

गृह-कर वृद्धि और बाहरी लोगों को बसाने के विरुद्ध — परीक्षित जमातिया (1863), भारती सिंह (1920 का दशक), और रियांग विद्रोह — नेता रत्नमणि (1942–43)

अन्य छोटे आंदोलन

1860–1904

जयंतिया पहाड़ियों के सिंतेंग (1860–62); फुलगुड़ी (नगाँव, असम) के किसानों का विद्रोह (1861); सफला (1872–73); कछार के कच्छा नागा (1882); मणिपुर का महिला युद्ध — नुपी लान (1904)

🔎 तथ्य-बोध

जादोनांग को अक्सर गांधी से प्रभावित पहला जनजातीय नेता कहा जाता है। ठक्कर बापा (अमृतलाल विट्ठलदास ठक्कर) ने जनजातीय लोगों के लिए "आदिवासी" शब्द को लोकप्रिय बनाया और भील सेवा मंडल (1922) की स्थापना की।

(छ) जनजातीय विद्रोह: राष्ट्रीय आंदोलन से अंतर और सीमाएँ

पहलू

जनजातीय विद्रोह

मुख्यधारा का राष्ट्रीय आंदोलन

दृष्टि

स्थानीय, जनजाति-केंद्रित; अपने "देश" (क्षेत्र) की रक्षा

पूरे भारत को एक राष्ट्र मानकर स्वराज

शत्रु

दीकु — साहूकार, ज़मींदार, व्यापारी, अंग्रेज़; कभी-कभी सभी बाहरी

मुख्यतः ब्रिटिश उपनिवेशवाद

नेतृत्व

जनजाति के भीतर से; करिश्माई-धार्मिक

शिक्षित मध्यम वर्ग; संगठित दल (कांग्रेस)

तरीका

सशस्त्र, पारंपरिक हथियार, अचानक विस्फोट

याचिका से लेकर जन-सत्याग्रह तक

परिणाम

क्रूर दमन; पर कुछ संरक्षणकारी क़ानून (संथाल परगना, छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम)

संवैधानिक सुधार और अंततः स्वतंत्रता

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7. 19वीं सदी के किसान आंदोलन

1857 के बाद किसान आंदोलनों का स्वरूप बदल गया। अब अपदस्थ राजा-ज़मींदार नहीं, बल्कि किसान स्वयं मुख्य शक्ति बने। वे सीधे अपनी माँगों — लगान, बेदखली, नील, साहूकारी — के लिए लड़े, और उनके निशाने पर प्रायः देशी ज़मींदार, साहूकार और विदेशी बागान मालिक थे, न कि सीधे अंग्रेज़ी राज।

(क) नील विद्रोह (1859–60), बंगाल

📖 कहानी 1: नदिया के किसानों का "ना" — नील विद्रोह (1859–60)

बंगाल में यूरोपीय बागान मालिक किसानों को अग्रिम (दादन) देकर ज़बरदस्ती नील उगवाते थे। नील की क़ीमत बहुत कम मिलती थी, इसलिए क़र्ज़ का चक्र कभी ख़त्म नहीं होता था। जो किसान मना करता, उसे अपहरण, मारपीट और फ़सल-घर जलाने की धमकी या सज़ा झेलनी पड़ती थी।

1859 में नदिया ज़िले के गोविंदपुर गाँव में दिगंबर विश्वास और विष्णुचरण विश्वास के नेतृत्व में किसानों ने तय किया कि अब नील नहीं बोएँगे। जब बागान मालिकों के लठैत आए, तो किसानों ने लाठी-भाले से उनका मुक़ाबला किया। साथ ही उन्होंने मुक़दमे लड़ने के लिए चंदा भी इकट्ठा किया। यानी उन्होंने ताक़त और क़ानून, दोनों का सहारा लिया। इसी साल मजिस्ट्रेट एशले ईडन ने सूचना जारी की कि किसानों को नील अनुबंध मानने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा, और किसानों ने इसे अपने समर्थन के रूप में लिया।

पढ़े-लिखे लोग भी किसानों के साथ आए। हरिश्चंद्र मुखर्जी के पत्र "हिंदू पैट्रियट" ने किसानों की दुर्दशा छापी। दीनबंधु मित्र ने नाटक "नील दर्पण" (1860) लिखा, जिसका अंग्रेज़ी अनुवाद रेवरेंड जेम्स लॉन्ग ने प्रकाशित करवाया, और इसके लिए उन्हें जुर्माना और क़ैद की सज़ा हुई।

आख़िर सरकार ने नील आयोग (1860) बनाया। उसने बागान मालिकों को दोषी माना और कहा कि रैयत पर नील थोपना ग़लत है। 1860 तक बंगाल में नील की खेती लगभग ख़त्म हो गई, और बागान मालिक बिहार चले गए, जहाँ आगे चलकर चंपारण (1917) का आंदोलन हुआ।

🧭 इस कहानी से कौन-सी अवधारणा साफ़ हुई

✔ नील की दो प्रणालियाँ — निज (मालिक की अपनी ज़मीन पर मज़दूरों से खेती) और रैयती (किसान से अनुबंध कर उसकी ज़मीन के हिस्से पर नील); दादन के क़र्ज़ ने किसान को बाँध रखा था।

✔ संगठित प्रतिरोध — नील न बोने का सामूहिक फ़ैसला, लठैतों का मुक़ाबला और मुक़दमों के लिए चंदा; यह किसानों का पहला संगठित और काफ़ी हद तक सफल संघर्ष माना जाता है।

✔ बुद्धिजीवी और प्रेस का साथ — हिंदू पैट्रियट और नील दर्पण से शिक्षित मध्यम वर्ग पहली बार खुलकर किसानों के पक्ष में आया; इस संघर्ष में हिंदू-मुस्लिम किसान साथ लड़े।

📝 परीक्षा के लिए: नील विद्रोह (1859–60, नदिया, बंगाल): दिगंबर और विष्णुचरण विश्वास; नील दर्पण (दीनबंधु मित्र, 1860); हिंदू पैट्रियट (हरिश्चंद्र मुखर्जी); नील आयोग 1860; बागान मालिक बिहार गए, आगे चंपारण (1917)।

◆ पृष्ठभूमि: यूरोपीय बागान मालिक किसानों को अग्रिम (दादन) देकर ज़बरदस्ती नील उगवाते थे। दो प्रणालियाँ थीं — निज (बागान मालिक की अपनी ज़मीन पर मज़दूरों से खेती) और रैयती (किसान से अनुबंध कर उसकी ज़मीन के एक हिस्से पर नील)। नील की क़ीमत बहुत कम मिलती, क़र्ज़ का चक्र कभी ख़त्म नहीं होता; मना करने पर अपहरण, मारपीट, फ़सल-घर जलाना।

◆ आरंभ: 1859 में नदिया ज़िले के गोविंदपुर गाँव से; नेता दिगंबर विश्वास और विष्णुचरण विश्वास। किसानों ने नील बोने से इनकार किया, बागान मालिकों के लठैतों का लाठी-भाले से मुक़ाबला किया, और मुक़दमों के लिए चंदा इकट्ठा किया।

◆ सरकारी रुख़: 1859 में मजिस्ट्रेट एशले ईडन ने सूचना जारी की कि किसानों को नील अनुबंध मानने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा — इसे किसानों ने विद्रोह के समर्थन के रूप में लिया।

◆ बुद्धिजीवियों का साथ: हरिश्चंद्र मुखर्जी के पत्र "हिंदू पैट्रियट" ने किसानों की दुर्दशा छापी; दीनबंधु मित्र का नाटक "नील दर्पण" (1860); इसका अंग्रेज़ी अनुवाद रेवरेंड जेम्स लॉन्ग ने प्रकाशित करवाया, जिसके लिए उन्हें जुर्माना और क़ैद हुई।

◆ परिणाम: सरकार ने नील आयोग (1860) बनाया, जिसने बागान मालिकों को दोषी माना और कहा कि रैयत पर नील थोपना ग़लत है। किसान केवल मौजूदा अनुबंध पूरे करेंगे, आगे मना कर सकेंगे। 1860 तक बंगाल में नील की खेती लगभग ख़त्म हो गई; बागान मालिक बिहार चले गए — जहाँ आगे चंपारण (1917) हुआ।

⭐ नील विद्रोह का महत्व

यह भारत का पहला संगठित और काफ़ी हद तक सफल किसान संघर्ष माना जाता है; इसमें हिंदू-मुस्लिम किसान साथ लड़े और शिक्षित मध्यम वर्ग ने पहली बार किसानों का खुलकर साथ दिया।

(ख) पाबना किसान विद्रोह (1873–76), पूर्वी बंगाल

◆ कारण: स्थायी बंदोबस्त वाले क्षेत्र में ज़मींदार कानून की सीमा से ऊपर लगान वसूलते और किसानों को 1859 के अधिनियम के तहत मिले "अधिभोग अधिकार" (जोत पर स्थायी अधिकार) से वंचित करने की कोशिश करते।

◆ आंदोलन: 1873 में पाबना ज़िले के यूसुफ़शाही परगना में "कृषक संघ" (पाबना किसान लीग) बना; नेता ईशानचंद्र राय, शंभु पाल, खुदी मोल्लाह। किसानों ने लगान रोका, चंदा इकट्ठा कर अदालत में लड़ाई लड़ी — आंदोलन मुख्यतः शांतिपूर्ण और क़ानूनी रहा।

◆ किसानों का नारा था कि वे "महारानी के, और केवल महारानी के, रैयत बनना चाहते हैं" — यानी उनका विरोध ज़मींदारों से था, राज से नहीं। बंकिमचंद्र, आर.सी. दत्त और सुरेंद्रनाथ बनर्जी की इंडियन एसोसिएशन ने समर्थन किया।

◆ परिणाम: बंगाल काश्तकारी अधिनियम (1885) — किसानों के अधिभोग अधिकार कुछ हद तक सुरक्षित।

(ग) दक्कन विद्रोह (1875), महाराष्ट्र

◆ पृष्ठभूमि: रैयतवाड़ी क्षेत्र में राजस्व सीधे किसान से; अमेरिकी गृहयुद्ध (1861–65) के समय ब्रिटेन को अमेरिकी कपास मिलना बंद हुआ तो दक्कन में कपास का उछाल आया — साहूकारों ने ख़ूब क़र्ज़ दिया। 1862 तक ब्रिटेन आने वाली कच्ची कपास का 90% से अधिक भारत से जाने लगा; बंबई दक्कन में कपास का रकबा चार वर्ष में दोगुना हो गया। युद्ध ख़त्म होते ही माँग गिरी, क़र्ज़ बंद हुए, पर 1867 में राजस्व लगभग 50% बढ़ा दिया गया।

◆ विद्रोह: 12 मई 1875 को पूना ज़िले के सूपा गाँव से शुरुआत; अहमदनगर तक फैला। किसानों ने (प्रायः मारवाड़ी और गुजराती) साहूकारों का सामाजिक बहिष्कार किया, उनके घरों पर हमला कर बही-खाते और क़र्ज़-पत्र जला दिए। हत्याएँ बहुत कम हुईं।

◆ जाँच और क़ानून: दक्कन दंगा आयोग बना, जिसकी रिपोर्ट 1878 में ब्रिटिश संसद में रखी गई; फिर दक्कन कृषक राहत अधिनियम (1879) बना। रानाडे की पूना सार्वजनिक सभा ने किसानों का पक्ष लिया।

📜 किराएदार बन गया अपने बैलों का! — एक दस्तावेज़

साहूकार किसान से ऐसे भाड़ा-पत्र लिखवाता कि किसान अपनी गाड़ियाँ-बैल साहूकार को "बेच" चुका है और अब उन्हें उसी से किराये पर ले रहा है। ऐसे काग़ज़ों के ज़रिये किसान अपनी ही संपत्ति से हाथ धो बैठता — इसीलिए 1875 में किसानों का ग़ुस्सा बही-खातों पर फूटा।

◆ पंजाब भूमि हस्तांतरण अधिनियम (1900): पंजाब में किसानों की ज़मीन साहूकारों के हाथ जाने से रोकने के लिए — ग़ैर-कृषक वर्ग को कृषि भूमि हस्तांतरण पर रोक।

◆ वासुदेव बलवंत फड़के (1879): महाराष्ट्र में रामोसी, कोली, धांगर आदि को संगठित कर अंग्रेज़ों के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष; 1879 में पकड़े गए, अदन की जेल में 1883 में मृत्यु। उन्हें "भारतीय सशस्त्र क्रांति का जनक" कहा जाता है।

(घ) 19वीं सदी के किसान आंदोलनों का विश्लेषण

💪 शक्तियाँ

✔ किसान अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हुए; क़ानून और अदालत का सहारा लेना सीखा

✔ कई जगह ठोस सफलता — नील आयोग, काश्तकारी अधिनियम 1885, दक्कन राहत अधिनियम 1879

✔ हिंदू-मुस्लिम एकता (नील, पाबना)

✔ शिक्षित मध्यम वर्ग से जुड़ाव की शुरुआत

⚠️ सीमाएँ

✔ उपनिवेशवाद की समझ नहीं — निशाना ज़मींदार, साहूकार, बागान मालिक

✔ अंग्रेज़ी शासन को अक्सर न्यायदाता माना

✔ स्थानीय, एक-दूसरे से अलग-थलग; कोई निरंतरता नहीं

✔ माँगें तात्कालिक और आर्थिक; कोई दीर्घकालीन कार्यक्रम नहीं

8. 20वीं सदी के किसान आंदोलन

20वीं सदी में किसान आंदोलन राष्ट्रीय आंदोलन से गहरे जुड़ गए। गांधीजी ने चंपारण, खेड़ा और बारडोली से किसानों को स्वतंत्रता संघर्ष की मुख्य शक्ति बनाया; 1930 के दशक में किसान सभाओं और वामपंथी संगठनों ने ज़मींदारी उन्मूलन की माँग उठाई। (विस्तार: अध्याय 12, 13 और 15)

आंदोलन

वर्ष / क्षेत्र

नेता और मुख्य तथ्य

चंपारण सत्याग्रह

1917; बिहार

तिनकठिया प्रथा के विरुद्ध; राजकुमार शुक्ल के आग्रह पर गांधीजी पहुँचे; साथ में राजेंद्र प्रसाद, ब्रजकिशोर प्रसाद, जे.बी. कृपलानी, महादेव देसाई; सरकार ने जाँच समिति बनाई (गांधी सदस्य); तिनकठिया समाप्त, वसूली का 25% लौटाया गया

खेड़ा सत्याग्रह

1918; गुजरात

फ़सल एक-चौथाई से कम होने पर भी पूरा लगान; गांधी, वल्लभभाई पटेल, इंदुलाल याज्ञिक; लगान न देने का अभियान; सरकार ने ग़रीब किसानों से वसूली रोकी

उ.प्र. किसान सभा

फ़रवरी 1918

गौरीशंकर मिश्र, इंद्रनारायण द्विवेदी; मदनमोहन मालवीय का समर्थन; जून 1919 तक सैकड़ों शाखाएँ

अवध किसान सभा

अक्टूबर 1920; प्रतापगढ़-रायबरेली

बाबा रामचंद्र, जवाहरलाल नेहरू, गौरीशंकर मिश्र; बेदखली, नज़राना, बेगार के विरुद्ध; "नाई-धोबी बंद" (सामाजिक बहिष्कार)

एका आंदोलन

1921–22; हरदोई, बहराइच, सीतापुर

मदारी पासी; लगान से 50% अधिक वसूली के विरुद्ध; "एका" (एकता) की शपथ; कांग्रेस नियंत्रण से बाहर, हिंसा की ओर झुकाव; 1922 में दमन

मोपला (मालाबार) विद्रोह

अगस्त 1921; मालाबार (केरल)

मुस्लिम मोपला काश्तकारों का जेन्मी (हिंदू ज़मींदारों) और सरकार के विरुद्ध; ख़िलाफ़त से उत्तेजना; नेता अली मुसलियार, वरियनकुन्नथ कुंजाहम्मद हाजी; बाद में सांप्रदायिक रंग; 10 नवंबर 1921 की "वैगन त्रासदी" — बंद मालडिब्बे में ले जाए गए बंदियों में से 67 की दम घुटने से मृत्यु

बारडोली सत्याग्रह

1928; गुजरात

लगान में 22% वृद्धि के विरुद्ध; नेता वल्लभभाई पटेल — यहीं की स्त्रियों ने उन्हें "सरदार" कहा; मैक्सवेल-ब्रूमफ़ील्ड जाँच ने वृद्धि को अनुचित माना, वृद्धि 6.03% की गई

🔍 आसान परिभाषा: तिनकठिया प्रथा

📘 परिभाषा: चंपारण (बिहार) में यूरोपीय बागान मालिकों द्वारा थोपी गई व्यवस्था, जिसमें किसान को अपनी हर 20 कट्ठा ज़मीन में से 3 कट्ठा पर नील उगाना अनिवार्य था।

💡 आसान भाषा में: "तीन कट्ठा" = तिनकठिया — बीस हिस्सों में से तीन हिस्से पर मालिक की पसंद की फ़सल, चाहे किसान को घाटा हो। 🏠 उदाहरण: जैसे आपके खेत का लगभग 15% हिस्सा ज़बरदस्ती किसी और के मुनाफ़े के लिए बाँध दिया जाए — इसी के विरुद्ध गांधीजी का पहला भारतीय सत्याग्रह (चंपारण 1917) हुआ।

(क) किसान सभा आंदोलन (1930 का दशक)

◆ विश्वव्यापी मंदी (1929–) से कृषि उपज के दाम आधे रह गए, पर लगान और क़र्ज़ वही — किसानों में भारी असंतोष।

◆ 1929 में स्वामी सहजानंद सरस्वती ने बिहार प्रांतीय किसान सभा बनाई; आंध्र में एन.जी. रंगा सक्रिय थे।

◆ 11 अप्रैल 1936 को लखनऊ में अखिल भारतीय किसान सभा बनी — अध्यक्ष स्वामी सहजानंद सरस्वती, महासचिव एन.जी. रंगा; उसी समय कांग्रेस का लखनऊ अधिवेशन चल रहा था।

◆ अगस्त 1936 में किसान घोषणापत्र — ज़मींदारी उन्मूलन, लगान में 50% कमी, क़र्ज़ माफ़ी, बेगार का अंत, किसान संघों को मान्यता। कांग्रेस ने फ़ैज़पुर अधिवेशन (दिसंबर 1936) में कृषि कार्यक्रम अपनाया — पहला अधिवेशन जो गाँव में हुआ।

◆ 1937 की कांग्रेस सरकारों ने काश्तकारी क़ानूनों में सुधार किए; पर बिहार में बकाश्त (ज़मींदार द्वारा छीनी गई ज़मीन) का प्रश्न नहीं सुलझा — 1937–39 में बकाश्त आंदोलन (कार्यानंद शर्मा, राहुल सांकृत्यायन, सहजानंद); मुंगेर का बड़हिया ताल क्षेत्र इसका प्रमुख केंद्र रहा।

(ख) स्वतंत्रता की दहलीज़ पर (1946–51)

आंदोलन

वर्ष / क्षेत्र

मुख्य तथ्य

तेभागा आंदोलन

सितंबर 1946 से; बंगाल (दिनाजपुर, रंगपुर, जलपाईगुड़ी आदि)

बटाईदार (बरगादार) उपज का आधा हिस्सा देते थे; माँग — दो-तिहाई बटाईदार को, एक-तिहाई जोतदार को; यह सिफ़ारिश फ़्लाउड आयोग (1940) ने की थी; बंगाल प्रांतीय किसान सभा (कम्युनिस्ट); नाचोल में इला मित्र; नारा: "आधी नहीं, तेभागा चाहिए"

तेलंगाना आंदोलन

जुलाई 1946 – अक्टूबर 1951; हैदराबाद रियासत

निज़ाम, देशमुख-जागीरदारों का शोषण, वेट्टी (बेगार); 4 जुलाई 1946 को कडिवेंडी में दोड्डी कोमरय्या की हत्या से भड़का; आंध्र महासभा और कम्युनिस्ट; लगभग 3,000 गाँवों में "ग्राम राज्य", ज़मीन का पुनर्वितरण; 1948 की पुलिस कार्रवाई (हैदराबाद विलय) के बाद भी चला; 1951 में वापस लिया

पुन्नप्रा-वायलार

अक्टूबर 1946; त्रावणकोर (अलप्पुझा)

दीवान सी.पी. रामास्वामी अय्यर के "अमेरिकी मॉडल" संविधान और दमन के विरुद्ध नारियल-रेशा मज़दूरों, मछुआरों, खेतिहरों का सशस्त्र संघर्ष; कम्युनिस्ट नेतृत्व; सेना ने सैकड़ों को मारा

(ग) समाज सुधारक और किसान

◆ ज्योतिबा फुले: गाँव-गाँव पैदल घूमकर किसानों में जागृति फैलाई, जुन्नर के किसान संघर्ष में भाग लिया; पुस्तक "शेतकऱ्याचा आसूड" (किसान का कोड़ा, 1883) में पुरोहित, साहूकार और अफ़सरों द्वारा शोषण को उजागर किया; साप्ताहिक "दीनबंधु" ने किसानों की समस्याएँ उठाईं; 1888 में पूना आए ड्यूक ऑफ़ कनॉट के सामने किसानों की पीड़ा रखी।

◆ विट्ठल रामजी शिंदे: 1928 में "छोटी जोत विधेयक" के विरोध में आगे आए; कहा कि भ्रष्ट अधिकारियों, कर्मचारियों और साहूकारों ने किसानों की ज़मीन लूटी है।

◆ साने गुरुजी (पांडुरंग सदाशिव साने): खानदेश का दौरा कर लगान माफ़ी की माँग उठाई; फ़ैज़पुर अधिवेशन (1936) की तैयारी में बड़ी भूमिका।

◆ डॉ. आंबेडकर: महार वतन (वंशानुगत बेगार-सेवा) के विरुद्ध अभियान से ग्रामीण ग़रीबों को अर्ध-दासता से मुक्त कराया; कोंकण की खोती प्रथा (बिचौलिया ज़मींदारी) के विरुद्ध संघर्ष और 1937 में बंबई विधानसभा में इसके उन्मूलन का विधेयक; किसानों का चिरनेर सत्याग्रह; 15 अगस्त 1936 को इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी बनाई — किसानों, प्रवासी मज़दूरों और कपड़ा मज़दूरों के प्रश्नों के लिए।

🧭 कांग्रेस और किसान: एक सीमा

कांग्रेस ने किसानों को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ा, पर ज़मींदार वर्ग को नाराज़ न करने की चिंता भी रखी। कराची प्रस्ताव (1931) में लगान और क़र्ज़ में राहत की बात थी, पर ज़मींदारी उन्मूलन जैसे मूल प्रश्न को नहीं छुआ गया; इसी कारण 1930 के दशक में किसान सभाएँ स्वतंत्र संगठन के रूप में उभरीं।

(घ) 19वीं बनाम 20वीं सदी के किसान आंदोलन

पहलू

19वीं सदी

20वीं सदी

नेतृत्व

स्वयं किसान, स्थानीय नेता

कांग्रेस, किसान सभा, समाजवादी और कम्युनिस्ट

निशाना

ज़मींदार, साहूकार, बागान मालिक

ये भी, और साथ ही उपनिवेशवाद

विचारधारा

कोई स्पष्ट विचारधारा नहीं

राष्ट्रवाद, गांधीवाद, समाजवाद

माँगें

लगान में राहत, बेदखली रोकना

ज़मींदारी उन्मूलन, "ज़मीन जोतने वाले की"

संगठन

अस्थायी, स्थानीय

अखिल भारतीय (अखिल भारतीय किसान सभा, 1936)

परिणाम

कुछ काश्तकारी क़ानून

स्वतंत्रता के बाद ज़मींदारी उन्मूलन और भूमि सुधार की ज़मीन तैयार

9. राजस्थान के किसान और जनजातीय आंदोलन (संक्षेप में)

(क) बिजौलिया किसान आंदोलन (1897–1941)

बिजौलिया (ऊपरमाल क्षेत्र) मेवाड़ का प्रथम श्रेणी का ठिकाना था। यहाँ के किसान मुख्यतः धाकड़ जाति के थे। यह आंदोलन लगभग 44 वर्ष चला — इसे भारत का सबसे लंबा अहिंसक किसान आंदोलन माना जाता है।

चरण

समय

मुख्य घटनाएँ

आरंभ

1897

गिरधरपुरा गाँव में एक मृत्युभोज के अवसर पर किसानों की सभा; नानजी पटेल और ठाकरी पटेल को महाराणा फ़तहसिंह के पास शिकायत लेकर उदयपुर भेजा गया; सुनवाई नहीं

नई लागतें

1903, 1906

राव कृष्णसिंह ने बेटी के विवाह पर "चँवरी कर" लगाया; उत्तराधिकारी राव पृथ्वीसिंह ने "तलवार बँधाई" (उत्तराधिकार शुल्क) कर लगाया

पहला चरण

1913–1915

साधु सीतारामदास के नेतृत्व में किसानों ने एक वर्ष खेती नहीं की और भू-राजस्व देने से इनकार किया

दूसरा चरण

1915/16–1922

1915 में चित्तौड़ में सीतारामदास के अनुरोध पर विजयसिंह पथिक (मूल नाम भूपसिंह) ने नेतृत्व संभाला; ऊपरमाल पंच बोर्ड (सरपंच मन्ना पटेल); लगान, बेगार, सहयोग — सब बंद; पंचायत के माध्यम से ही सब काम; कानपुर के "प्रताप" (गणेशशंकर विद्यार्थी) ने देशभर में ख़बर पहुँचाई; सरकार को "बोल्शेविक" घुसपैठ का डर; पथिक गिरफ़्तारी से बचने के लिए कोटा की सीमा में जाकर नेतृत्व करते रहे

समझौता

1922

ए.जी.जी. सर रॉबर्ट हॉलैंड की मध्यस्थता; 84 में से 35 लागतें और बेगार समाप्त, मुक़दमे वापस, खेती न करने वाले वर्ष का लगान माफ़

तीसरा चरण

1927–1941

माल भूमि (असिंचित-बंजर भूमि) पर अधिक लगान के विरोध में किसानों ने ज़मीन छोड़ी, पर वह दूसरों को दे दी गई; नेतृत्व माणिक्यलाल वर्मा, हरिभाऊ उपाध्याय, जमनालाल बजाज; 1941 में मेवाड़ के प्रधानमंत्री टी. विजयराघवाचार्य और राजस्व मंत्री मोहनसिंह मेहता के समय किसानों को ज़मीन लौटाकर समाधान

📰 बिजौलिया और राष्ट्रीय चेतना

गिरफ़्तार होने वालों में साधु सीतारामदास, रामनारायण चौधरी, प्रेमचंद भील, माणिक्यलाल वर्मा भी थे। रामनारायण चौधरी के अनुसार हर स्त्री-पुरुष राष्ट्रीय भावना से प्रेरित था और हर जगह "वंदे मातरम्" की आवाज़ सुनाई देती थी।

इस आंदोलन ने गांधीजी, मदनमोहन मालवीय, तिलक, गणेशशंकर विद्यार्थी का ध्यान खींचा। पथिक ने राजस्थान सेवा संघ (1919, वर्धा; 1920 से अजमेर) बनाया और "राजस्थान केसरी" व "नवीन राजस्थान" जैसे पत्रों से आंदोलन को आवाज़ दी।

(ख) गोविंद गुरु, सम्प सभा और मानगढ़ (1883–1913)

📖 कहानी 2: मानगढ़ की पहाड़ी — जहाँ सुधार की सभा पर गोलियाँ चलीं (1913)

गोविंद गुरु (1858–1931) का जन्म डूंगरपुर के बांसिया गाँव में हुआ। उन्होंने भीलों के सामाजिक और नैतिक उत्थान का बीड़ा उठाया। 1883 में उन्होंने सम्प सभा बनाई। "सम्प" का अर्थ है एकता। इसके साथ भगत पंथ चला, जिसमें मद्यपान, मांसाहार और चोरी छोड़ने, स्वच्छता रखने, धूणी पर हवन करने, शिक्षा पाने और बेगार न करने की सीख दी जाती थी।

यह सुधार धीरे-धीरे राजनीति की ओर बढ़ गया। शराब छूटने से कुशलगढ़ और बांसवाड़ा राज्यों की आबकारी आय घट गई, और अंग्रेज़ों को आशंका हुई कि इस संगठन के पीछे "भील राज्य" बनाने की योजना है। अप्रैल 1913 में डूंगरपुर राज्य ने गोविंद गुरु को गिरफ़्तार किया और फिर छोड़ दिया।

अक्टूबर 1913 से मानगढ़ की पहाड़ी पर भील इकट्ठा होने लगे। यह पहाड़ी बांसवाड़ा और संतरामपुर-सूंथ राज्य की सीमा पर है। ए.जी.जी. की स्वीकृति से मेवाड़ भील कोर, 104 वेलेज़ली राइफ़ल्स और राजपूत व जाट रेजिमेंट की टुकड़ियाँ वहाँ पहुँचीं। 17 नवंबर 1913 (मार्गशीर्ष पूर्णिमा) को अंधाधुंध गोलीबारी हुई और लगभग 1,500 भील मारे गए।

गोविंद गुरु को पहले फाँसी की सज़ा सुनाई गई, जो बाद में कारावास में बदली गई। लगभग दस वर्ष बाद रिहा होकर वे गुजरात के कंबोई में रहे, जहाँ 1931 में उनकी मृत्यु हुई। उनका श्वेत ध्वज शांति का प्रतीक था।

🧭 इस कहानी से कौन-सी अवधारणा साफ़ हुई

✔ सुधार से चेतना — सम्प सभा और भगत पंथ ने नशा, बेगार और अशिक्षा के विरुद्ध भीलों को संगठित किया; इसी संगठन से राजनीतिक जागृति पैदा हुई।

✔ शासकों का भय — शराब से होने वाली आबकारी आय घटना और "भील राज्य" की आशंका, यही कारण था कि भीलों के इस जमावड़े को ताक़त से कुचला गया।

✔ राजस्थान का जलियाँवाला — मानगढ़ का हत्याकांड जलियाँवाला बाग (1919) से छह वर्ष पहले हुआ था और उससे भी अधिक वीभत्स माना जाता है।

📝 परीक्षा के लिए: गोविंद गुरु (1858–1931, बांसिया, डूंगरपुर); सम्प सभा (1883); भगत पंथ; मानगढ़ हत्याकांड 17 नवंबर 1913 (लगभग 1,500 भील); "राजस्थान का जलियाँवाला"; अंतिम समय कंबोई (गुजरात)।

◆ गोविंद गुरु (1858–1931) — डूंगरपुर के बांसिया गाँव में जन्म; भीलों के सामाजिक-नैतिक उत्थान का बीड़ा उठाया। उन्हें लसोड़िया भी कहा जाता है और वे लसोड़िया आंदोलन के प्रवर्तक माने जाते हैं। 19वीं सदी के उत्तरार्ध में सुर्जी भगत ने भी मेवाड़, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़, सिरोही, पाली के भीलों में सुधार के प्रयास किए।

◆ सम्प सभा (1883) — "सम्प" = एकता; भीलों को संगठित किया; भगत पंथ की स्थापना — मद्यपान, मांसाहार, चोरी छोड़ना, स्वच्छता, धूणी पर हवन, शिक्षा, बेगार न करना। सम्प सभा के ज़रिये मेवाड़, डूंगरपुर, ईडर, गुजरात, विजयनगर, मालवा के भीलों में जागृति फैली।

◆ शराब कम होने से कुशलगढ़ और बांसवाड़ा राज्यों की आबकारी आय घटी; अंग्रेज़ों को इस संगठन के पीछे "भील राज्य" बनाने की आशंका हुई। अप्रैल 1913 में डूंगरपुर राज्य ने गोविंद गुरु को गिरफ़्तार कर छोड़ा।

◆ मानगढ़ की पहाड़ी (बांसवाड़ा और संतरामपुर-सूंथ राज्य की सीमा) पर अक्टूबर 1913 से भील एकत्र होने लगे। ए.जी.जी. की स्वीकृति से मेवाड़ भील कोर, 104 वेलेज़ली राइफ़ल्स, राजपूत और जाट रेजिमेंट की टुकड़ियाँ पहुँचीं।

◆ 17 नवंबर 1913 (मार्गशीर्ष पूर्णिमा) को अंधाधुंध गोलीबारी — लगभग 1,500 भील मारे गए। इसे "राजस्थान का जलियाँवाला" कहा जाता है — वास्तव में यह जलियाँवाला बाग (1919) से छह वर्ष पहले हुआ और उससे भी अधिक वीभत्स था।

◆ गोविंद गुरु को पहले फाँसी की सज़ा हुई, जो बाद में कारावास में बदली; लगभग दस वर्ष बाद रिहा होकर वे गुजरात के कंबोई में रहे, जहाँ 1931 में उनकी मृत्यु हुई। उनका श्वेत ध्वज शांति का प्रतीक था।

(ग) मोतीलाल तेजावत और एकी आंदोलन (1921–1929)

◆ मानगढ़ के बाद भी दमन जारी रहा। 1917 में भीलों और गरासियों ने महाराणा को बेगार के विरुद्ध पत्र लिखा; 1921 में बिजौलिया से प्रेरित होकर फिर शिकायत की; कोई परिणाम न निकलने पर भोमट के खालसा क्षेत्र के भीलों ने लागतें और बेगार देना बंद कर दिया।

◆ मोतीलाल तेजावत (कोल्यारी, उदयपुर) ने 1921 में मातृकुंडिया (चित्तौड़गढ़) के मेले से "एकी" (एकता) आंदोलन शुरू किया — भीलों को लगान और बेगार न देने की शपथ; माँगों का पत्र "मेवाड़ पुकार" (21 माँगें) महाराणा को भेजा। भील उन्हें प्रेम से "बावजी" कहते थे।

◆ आंदोलन के डर से डूंगरपुर के महारावल ने अपने राज्य से सभी बेगारें समाप्त कीं; जागीरी क्षेत्रों में राहत न मिलने से आंदोलन भोमट, सिरोही और गुजरात तक फैला।

◆ 7 मार्च 1922 को ईडर राज्य के नीमड़ा (विजयनगर क्षेत्र) में भीलों की सभा पर मेजर सटन के अधीन मेवाड़ भील कोर ने गोलीबारी की — लगभग 1,200 भील मारे गए; तेजावत घायल होकर भूमिगत हो गए।

◆ लगभग आठ वर्ष भूमिगत रहने के बाद 3 जून 1929 को ईडर पुलिस ने गिरफ़्तार कर मेवाड़ को सौंपा; गांधीजी के सहयोगी मणिलाल कोठारी के हस्तक्षेप से समझौता हुआ और 1936 में लिखित आश्वासन देकर रिहाई।

10. मूल्यांकन: महत्व और सीमाएँ

🌟 महत्व

✔ कंपनी राज के विरुद्ध निरंतर प्रतिरोध — "भारत ने चुपचाप ग़ुलामी स्वीकार नहीं की"

✔ अंग्रेज़ों को संरक्षणकारी क़ानून बनाने पड़े — संथाल परगना, बंगाल काश्तकारी 1885, दक्कन राहत 1879, छोटानागपुर काश्तकारी 1908

✔ किसानों-आदिवासियों में राजनीतिक चेतना — आगे गांधीवादी जन-आंदोलनों की नींव

✔ राजस्थान में प्रजामंडल आंदोलनों और सामंतवाद-विरोध की ज़मीन तैयार

✔ स्वतंत्र भारत में ज़मींदारी उन्मूलन, भूमि सुधार, पाँचवीं-छठी अनुसूची की प्रेरणा

⚠️ सीमाएँ

✔ प्रायः स्थानीय और बिखरे हुए; अखिल भारतीय समन्वय नहीं

✔ नेतृत्व अक्सर अर्ध-सामंती या धार्मिक; आधुनिक राष्ट्रवादी विचारधारा का अभाव

✔ पारंपरिक हथियार — आधुनिक सेना के सामने टिक न सके

✔ कई बार सांप्रदायिक या जातीय रंग (जैसे मोपला)

✔ क्रूर दमन; कई आंदोलनों की माँगें 1947 के बाद ही पूरी हुईं

अध्याय का कालक्रम

वर्ष

घटना

1763–1800

संन्यासी-फ़क़ीर विद्रोह (बंगाल)

1766–1816

चुआर विद्रोह (जंगल महल)

1778–85

तिलका माँझी का संघर्ष (पहाड़िया)

1783

रंगपुर (ढींग) विद्रोह

1795–1805

पोलिगार विद्रोह; 1799 में कट्टबोम्मन को फाँसी

1806

वेल्लोर सैनिक विद्रोह

1808–09

वेलु थंपी का विद्रोह; कुंडरा घोषणा

1817

पाइक विद्रोह (ओडिशा)

1818 से

फ़राइज़ी आंदोलन

1820–22

हो विद्रोह (सिंहभूम)

1824

कित्तूर (चेन्नम्मा); बैरकपुर सैनिक विद्रोह

1828–33

अहोम, खासी (तीरत सिंह) विद्रोह

1830–31

वहाबी: पेशावर, बालाकोट; तीतू मीर (नारकेलबेरिया)

1831–33

कोल विद्रोह (बुद्धो भगत); भूमिज (गंगा नारायण)

1832

दामिन-इ-कोह का सीमांकन

1837–56

खोंड विद्रोह (चक्र बिसोई)

1842 / 1844

बुंदेला विद्रोह / गडकरी, सूरत नमक आंदोलन

30 जून 1855

संथाल हूल आरंभ; संथाल परगना ज़िला

1859–60

नील विद्रोह; नील दर्पण; नील आयोग

1872

कूका: मलेरकोटला घटना; राम सिंह रंगून निर्वासित

1873–76

पाबना किसान लीग

1875 / 1879

दक्कन विद्रोह / दक्कन कृषक राहत अधिनियम; फड़के गिरफ़्तार

1879–80

कोया विद्रोह

1883

सम्प सभा (गोविंद गुरु)

1885

बंगाल काश्तकारी अधिनियम

1897

बिजौलिया आंदोलन की शुरुआत

1899–1900

बिरसा मुंडा का उलगुलान

1900 / 1908

पंजाब भूमि हस्तांतरण अधिनियम / छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम

1910

बस्तर विद्रोह (गुंडा धुर)

17 नवंबर 1913

मानगढ़ हत्याकांड

1914

ताना भगत आंदोलन

1917 / 1918

चंपारण; कूकी विद्रोह / खेड़ा; उ.प्र. किसान सभा

1920–22

अवध किसान सभा; एका; मोपला (1921); एकी आंदोलन (1921); नीमड़ा (1922); बिजौलिया समझौता (1922)

1922–24

रम्पा विद्रोह (अल्लूरी सीताराम राजू)

1928

बारडोली सत्याग्रह

1931–32

जादोनांग को फाँसी; गाइदिन्ल्यू गिरफ़्तार

1936

अखिल भारतीय किसान सभा; किसान घोषणापत्र; फ़ैज़पुर अधिवेशन

1941

बिजौलिया का अंतिम समाधान

1946

तेभागा; तेलंगाना; पुन्नप्रा-वायलार

1951 / 1952

तेलंगाना आंदोलन वापस / जरायम पेशा क़ानून रद्द

💡 अंतिम बात

संन्यासी से संथाल तक, नील किसान से बिजौलिया तक — इन आंदोलनों ने दिखाया कि अन्याय के विरुद्ध आम लोगों का प्रतिरोध कभी रुका नहीं। ये भले ही बिखरे और स्थानीय थे, पर इनकी चिंगारियाँ ही आगे चलकर राष्ट्रीय आंदोलन की ज्वाला बनीं।

अगले अध्याय में हम उस विस्फोट को देखेंगे, जिसने कंपनी राज की नींव हिला दी — 1857 का महाविद्रोह।

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