📖 अध्याय 5/20 — आधुनिक भारत का इतिहास

शिक्षा, प्रेस और बौद्धिक जागरण

प्राच्य-आंग्ल विवाद, मैकॉले और वुड, शिक्षा आयोग, राष्ट्रीय शिक्षा, प्रेस और प्रेस कानून, पुनर्जागरण
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📚 कहानी से शुरुआत: "एक अलमारी बनाम पूरा पूरब"

2 फ़रवरी 1835, कलकत्ता। गवर्नर जनरल की परिषद के विधि सदस्य थॉमस बैबिंगटन मैकॉले ने शिक्षा पर एक लंबा विवरण-पत्र (मिनट) लिखा। वे 1834 में भारत आए थे। तब सरकार के भीतर एक पुराना विवाद चल रहा था: शिक्षा का पैसा संस्कृत, अरबी और फ़ारसी की पढ़ाई पर लगे, या अंग्रेज़ी और पश्चिमी विज्ञान पर?

मैकॉले ने ख़ुद माना कि उन्हें न संस्कृत आती है, न अरबी, फिर भी उन्होंने बड़े भरोसे से फ़ैसला सुना दिया: "एक अच्छे यूरोपीय पुस्तकालय की केवल एक अलमारी भारत और अरब के समूचे देशी साहित्य के बराबर है।" मदरसों और संस्कृत कॉलेजों को उन्होंने "अंधकार के मंदिर" कहा। उनका लक्ष्य था भारतीयों का ऐसा वर्ग बनाना जो "रक्त और रंग में भारतीय, पर रुचि, विचार, नैतिकता और बुद्धि में अंग्रेज़" हो और शासकों व जनता के बीच दुभाषिये का काम करे।

उन्हीं वर्षों में विलियम एडम बंगाल और बिहार के देशी स्कूलों का सर्वेक्षण कर रहे थे। उन्हें वहाँ एक लाख से अधिक पाठशालाएँ और बीस लाख से अधिक विद्यार्थी मिले। यानी जिस पूरब को एक अलमारी के बराबर आँका गया, वह अपने बच्चों को पढ़ा तो रहा ही था।

7 मार्च 1835 को गवर्नर जनरल विलियम बेंटिंक ने मैकॉले की बात मान ली। शिक्षा का पैसा अब अंग्रेज़ी माध्यम से पश्चिमी विज्ञान और साहित्य पर ख़र्च होने लगा। 1837 में अदालतों से फ़ारसी हटाई गई, और 1844 में हार्डिंग ने सरकारी नौकरियों में अंग्रेज़ी पढ़े लोगों को प्राथमिकता देने का प्रस्ताव रखा। नौकरी की इस चाबी ने लोगों की भीड़ अंग्रेज़ी स्कूलों की ओर मोड़ दी।

लगभग सौ साल बाद महात्मा गांधी ने लिखा कि इस अंग्रेज़ी शिक्षा ने भारतीयों को "अपनी ही भूमि पर अजनबी" बना दिया है। पर विडंबना देखिए: मैकॉले की इसी शिक्षा ने भारतीयों को स्वतंत्रता, समानता, लोकतंत्र और राष्ट्रवाद के विचार दिए, और छापाखानों व अख़बारों ने इन विचारों को गाँव-गाँव तक पहुँचाया।

जिस शिक्षा और प्रेस को अंग्रेज़ों ने अपना राज मज़बूत करने के लिए अपनाया, वही आगे चलकर उनके विरुद्ध सबसे बड़ा हथियार कैसे बनी? पुरानी पाठशालाओं का क्या हुआ? और प्रेस का मुँह बंद करने वाले कानून क्यों उलटे पड़ गए? यही इस अध्याय की कहानी है। आगे दो कहानियाँ भी मिलेंगी, जो पाठशालाओं के बदलने और प्रेस की आवाज़ दबाने की कोशिश को आसान तरीक़े से समझा देंगी।

1. भूमिका: अंग्रेज़ों से पहले की शिक्षा

📖 कहानी 1: बरगद के नीचे की पाठशाला, जो नियमों में बँधकर बदल गई

स्कॉटलैंड के ईसाई प्रचारक विलियम एडम को कंपनी के कहने पर बंगाल और बिहार के देशी स्कूलों का हाल जाँचने का काम मिला। उनकी रिपोर्ट (1835–38) में एक चौंकाने वाली बात सामने आई। वहाँ एक लाख से अधिक पाठशालाएँ चल रही थीं। हर पाठशाला छोटी थी, प्रायः उसमें 20 से कम विद्यार्थी होते थे, पर सबको जोड़ें तो बीस लाख से अधिक बच्चे पढ़ रहे थे।

इन पाठशालाओं में न अलग इमारत थी, न बेंच और ब्लैकबोर्ड, न छपी किताबें। कक्षा कभी बरगद की छाँव में, कभी दुकान या मंदिर में, तो कभी गुरु के घर में लगती थी। कोई तय फ़ीस नहीं थी; जो अमीर था वह अधिक देता था और जो ग़रीब था वह कम। फ़सल कटाई के दिनों में छुट्टी हो जाती थी, इसलिए किसानों के बच्चे भी पढ़ पाते थे।

फिर 1854 के वुड के नीतिपत्र के बाद सरकार ने इस व्यवस्था को "सुधारने" का काम शुरू किया। पंडितों को सरकारी नौकरी देकर उन्हें 4–5 पाठशालाओं का निरीक्षक बनाया गया। गुरुओं को नियमित रिपोर्ट भेजनी पड़ी, समय-सारणी से पढ़ाना पड़ा, पाठ्यपुस्तकों से पढ़ाई करानी पड़ी और वार्षिक परीक्षा लेनी पड़ी। नियमित फ़ीस और नियमित उपस्थिति ज़रूरी हो गई, और अनुदान उन्हीं पाठशालाओं को मिला जो ये नियम मानती थीं।

इसका नतीजा दोहरा रहा। जो पाठशालाएँ नियम मान गईं, उन्हें अनुदान मिला और वे आगे बढ़ीं। जो नहीं मान सकीं, वे अनुदान से वंचित होकर पिछड़ गईं। कटाई के मौसम में भी स्कूल ज़रूरी हो जाने से ग़रीब बच्चे पढ़ाई में पीछे रह गए। जनसाधारण की शिक्षा पर सरकारी ख़र्च बहुत कम रहा; 1911 में साक्षरता लगभग 6% और 1947 में लगभग 12% थी।

🧭 इस कहानी से कौन-सी अवधारणा साफ़ हुई

✔ देशी पाठशाला की लचीली व्यवस्था — न तय फ़ीस, न तय इमारत, न तय समय-सारणी; कक्षा समाज की ज़रूरत के हिसाब से चलती थी, इसीलिए इतने अधिक बच्चे पढ़ पाते थे।

✔ अनुदान सहायता (ग्रांट-इन-एड) — सरकार स्वयं हर जगह स्कूल खोलने के बजाय शर्तें मानने वाली संस्थाओं को पैसा देती थी; इसी से नियम मानने वाले निजी और मिशनरी स्कूल बढ़े।

✔ नई व्यवस्था की क़ीमत — नियम, फ़ीस और परीक्षा से ढाँचा तो बना, पर पारंपरिक पाठशालाएँ और ग़रीब बच्चे पीछे छूट गए।

📝 परीक्षा के लिए: विलियम एडम की रिपोर्ट (1835–38): बंगाल-बिहार में 1 लाख से अधिक पाठशालाएँ, 20 लाख से अधिक विद्यार्थी; वुड का नीतिपत्र (1854); अनुदान सहायता प्रणाली; साक्षरता 1911 में लगभग 6%, 1947 में लगभग 12%।

◆ अंग्रेज़ केवल भूक्षेत्र जीतना और राजस्व पर नियंत्रण ही नहीं चाहते थे; उन्हें लगता था कि उनका एक "सांस्कृतिक मिशन" भी है — "देशी जनता को सभ्य बनाना", उसके रीति-रिवाज और मूल्य बदलना, और उसे अंग्रेज़ों की सोच के अनुसार "अच्छी प्रजा" बनाना। शिक्षा इसका मुख्य साधन थी। इस पर कई दशकों तक बहस चली।

◆ परंपरागत शिक्षा: हिंदुओं के लिए पाठशालाएँ, टोल, गुरुकुल (संस्कृत, व्याकरण, दर्शन, गणित) और मुसलमानों के लिए मकतब (प्राथमिक) और मदरसे (उच्च शिक्षा; अरबी, फ़ारसी)। "मदरसा" अरबी शब्द है, जिसका अर्थ है सीखने का स्थान।

विलियम एडम की रिपोर्ट (1835–38)

◆ 1830 के दशक में स्कॉटलैंड के ईसाई प्रचारक विलियम एडम ने कंपनी के कहने पर बंगाल और बिहार के देशी स्कूलों का सर्वेक्षण किया। उन्होंने पाया कि वहाँ एक लाख से अधिक पाठशालाएँ थीं, जिनमें से हर एक में प्रायः 20 से कम विद्यार्थी थे, पर कुल विद्यार्थी बीस लाख से अधिक थे।

◆ ये पाठशालाएँ संपन्न लोगों, स्थानीय समुदाय या स्वयं गुरु चलाते थे। शिक्षा मौखिक थी और क्या पढ़ाना है, यह गुरु विद्यार्थियों की ज़रूरत देखकर तय करता था।

🌳 पुरानी पाठशाला (लचीली व्यवस्था)

✔ निश्चित फ़ीस नहीं — अमीर अधिक, ग़रीब कम देते

✔ छपी किताबें, अलग इमारत, बेंच, ब्लैकबोर्ड नहीं

✔ बरगद की छाँव, दुकान, मंदिर या गुरु के घर में कक्षा

✔ अलग कक्षाएँ, हाज़िरी, वार्षिक परीक्षा, समय-सारणी नहीं

✔ फ़सल कटाई के समय छुट्टी — किसानों के बच्चे भी पढ़ पाते

📏 1854 के बाद की नई व्यवस्था

✔ पंडितों को सरकारी नौकरी; हर पंडित 4–5 पाठशालाओं का निरीक्षक

✔ गुरु नियमित रिपोर्ट भेजें, समय-सारणी से पढ़ाएँ

✔ पाठ्यपुस्तकों पर आधारित पढ़ाई, वार्षिक परीक्षा

✔ नियमित फ़ीस, नियमित उपस्थिति, तय सीट, अनुशासन

✔ नियम मानने वाली पाठशालाओं को ही अनुदान; कटाई के मौसम में भी स्कूल ज़रूरी — ग़रीब बच्चे पिछड़े

2. प्राच्यवाद की परंपरा

◆ 1783 में विलियम जोन्स कलकत्ता के सर्वोच्च न्यायालय में कनिष्ठ न्यायाधीश बनकर आए। वे कानून के साथ-साथ महान भाषाविद थे: ग्रीक, लैटिन, फ़्रांसीसी, अंग्रेज़ी, अरबी और फ़ारसी जानते थे। कलकत्ता में वे रोज़ घंटों संस्कृत विद्वानों के साथ बैठकर संस्कृत व्याकरण और काव्य पढ़ने लगे, फिर कानून, दर्शन, धर्म, राजनीति, नैतिकता, अंकगणित, चिकित्सा की प्राचीन भारतीय पुस्तकें।

◆ हेनरी टॉमस कोलब्रुक और नैथेनियल हैलहेड भी संस्कृत-फ़ारसी रचनाओं का अंग्रेज़ी अनुवाद कर रहे थे। इनके साथ जोन्स ने 1784 में एशियाटिक सोसाइटी ऑफ़ बंगाल बनाई और "एशियाटिक रिसर्चेज़" पत्रिका शुरू की।

◆ अनुवाद: चार्ल्स विल्किंस — भगवद्गीता (1785); जोन्स — कालिदास का अभिज्ञान शाकुंतलम् (1789) और मनुस्मृति; हैलहेड — हिंदू कानूनों का संग्रह (1776, 11 पंडितों की सहायता से)।

◆ उनकी सोच: जोन्स और कोलब्रुक भारत और पश्चिम दोनों की प्राचीन संस्कृतियों का आदर करते थे। वे मानते थे कि भारतीय सभ्यता प्राचीन काल में वैभव के शिखर पर थी, बाद में उसका पतन हुआ; इसलिए भारत को समझने के लिए प्राचीन पवित्र और क़ानूनी ग्रंथों को खोजना, समझना और अनुवाद करना ज़रूरी है। इससे अंग्रेज़ भारतीय संस्कृति सीखेंगे और भारतीय भी अपनी खोई विरासत फिर पाएँगे। इस प्रक्रिया में अंग्रेज़ भारतीय संस्कृति के अभिभावक और मालिक दोनों की भूमिका निभा रहे थे।

◆ संस्थाएँ: कंपनी के कई अधिकारी मानते थे कि हिंदुओं और मुसलमानों को वही पढ़ाया जाए जिससे वे परिचित हैं और जिसका वे आदर करते हैं; तभी अंग्रेज़ "देशी जनता का दिल जीत" सकते हैं। इसलिए — कलकत्ता मदरसा (1781), वारेन हेस्टिंग्स: अरबी, फ़ारसी और इस्लामी कानून के लिए; बनारस का हिंदू (संस्कृत) कॉलेज (1791), जोनाथन डंकन: प्राचीन संस्कृत ग्रंथों के लिए, ताकि शासन चलाने में मदद मिले।

◆ फ़ोर्ट विलियम कॉलेज (1800), कलकत्ता — वेलेज़ली ने कंपनी के नए अंग्रेज़ अफ़सरों को भारतीय भाषाएँ, कानून और रीति-रिवाज सिखाने के लिए बनाया; यहाँ जॉन गिलक्रिस्ट के नेतृत्व में हिंदुस्तानी गद्य का विकास हुआ, लल्लू लाल ने "प्रेम सागर" लिखा। (1854 में यह बंद हुआ।)

🔍 आसान परिभाषा: प्राच्यवाद और प्राच्यवादी (Orientalism)

📘 परिभाषा: एशिया (पूरब) की भाषाओं, साहित्य, धर्म और संस्कृति का गहन अध्ययन; ऐसे विद्वान प्राच्यवादी कहलाए। शिक्षा के संदर्भ में: भारतीयों को संस्कृत, अरबी, फ़ारसी की परंपरागत शिक्षा देने की नीति।

💡 आसान भाषा में: "भारत को भारत की किताबों से समझो और भारत की भाषाओं में पढ़ाओ" — पर शासन अंग्रेज़ों के हाथ में। 🏠 उदाहरण: कलकत्ता के विक्टोरिया मेमोरियल में वारेन हेस्टिंग्स की प्रतिमा (1830) में सबसे ऊपर हेस्टिंग्स और नीचे एक ओर पंडित तथा दूसरी ओर मुंशी (फ़ारसी पढ़ने-पढ़ाने वाला) बैठे दिखाए गए हैं — यही प्राच्यवादी सोच थी: भारतीय ज्ञान अंग्रेज़ी शासन का आधार बने।

🔍 आसान परिभाषा: वर्नाक्युलर (देशी भाषा)

📘 परिभाषा: मानक या शासकों की भाषा से अलग स्थानीय भाषा या बोली; औपनिवेशिक भारत में अंग्रेज़ इस शब्द का प्रयोग रोज़मर्रा की भारतीय भाषाओं और अपनी भाषा अंग्रेज़ी के बीच फ़र्क़ दिखाने के लिए करते थे।

💡 आसान भाषा में: "उनकी भाषा" बनाम "हमारी भाषा" — इस शब्द में ही ऊँच-नीच का भाव छिपा था; अंग्रेज़ कई बार भारतीय भाषाओं को केवल "बोलियाँ" समझते थे। 🏠 उदाहरण: 1878 का वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट केवल भारतीय भाषाओं (बांग्ला, हिंदी, उर्दू, मराठी आदि) के अख़बारों पर लागू था, अंग्रेज़ी अख़बारों पर नहीं — यही भेदभाव इस शब्द के प्रयोग में दिखता है।

3. आंग्लवाद और 1835 का निर्णय

3.1 1813 का चार्टर एक्ट और विवाद की शुरुआत

◆ 1813 के चार्टर एक्ट ने कंपनी को हर वर्ष कम से कम 1 लाख रुपये "साहित्य के पुनरुद्धार, विद्वानों के प्रोत्साहन और विज्ञान के प्रसार" पर ख़र्च करने का निर्देश दिया — शिक्षा के प्रति सरकारी ज़िम्मेदारी की पहली स्वीकृति। इसी पैसे के उपयोग पर विवाद छिड़ा: प्राच्य शिक्षा पर लगे या पश्चिमी शिक्षा पर?

◆ 1817: कलकत्ता में हिंदू कॉलेज (डेविड हेयर, राधाकांत देव और अन्य; राममोहन राय का समर्थन) — पश्चिमी शिक्षा का पहला बड़ा केंद्र (आगे चलकर प्रेसीडेंसी कॉलेज); उसी वर्ष कलकत्ता स्कूल बुक सोसाइटी। 1823: सामान्य लोक शिक्षा समिति बनी, जिसमें प्राच्यवादियों का बहुमत था।

◆ 1823 में राजा राममोहन राय ने गवर्नर जनरल एमहर्स्ट को पत्र लिखकर कलकत्ता में नया संस्कृत कॉलेज खोलने का विरोध किया और गणित, प्राकृतिक दर्शन, रसायन, शरीर-रचना जैसी उपयोगी पश्चिमी शिक्षा की माँग की।

3.2 "पूरब की जघन्य ग़लतियाँ": जेम्स मिल और मैकॉले

◆ 19वीं सदी की शुरुआत से कई अंग्रेज़ अफ़सर प्राच्यवाद के आलोचक बने: उनके अनुसार पूर्वी ज्ञान त्रुटियों से भरा, अवैज्ञानिक, और पूर्वी साहित्य अगंभीर और सतही था; अरबी-संस्कृत पर पैसा ख़र्च करना बेकार था।

◆ जेम्स मिल प्रमुख आलोचक थे: अंग्रेज़ों को जनता को ख़ुश करने या "दिल जीतने" के लिए उसकी इच्छा के अनुसार नहीं, बल्कि उपयोगी और व्यावहारिक शिक्षा देनी चाहिए — यानी पश्चिम की वैज्ञानिक और तकनीकी सफलताएँ।

◆ थॉमस बैबिंगटन मैकॉले (1834 में विधि सदस्य बनकर आए) सबसे मुखर थे। वे भारत को असभ्य देश मानते थे जिसे सभ्यता का पाठ पढ़ाना ज़रूरी था। उनका विवरण-पत्र (2 फ़रवरी 1835):

1. "एक अच्छे यूरोपीय पुस्तकालय की एक अलमारी भारत और अरब के समूचे देशी साहित्य के बराबर है"; भारत की आम बोलियों में न साहित्यिक जानकारी है, न वैज्ञानिक, वे इतनी "दरिद्र और रूखी" हैं कि उनमें मूल्यवान कृति का अनुवाद भी नहीं हो सकता।

2. सरकार को प्राच्य ज्ञान पर सरकारी पैसा बर्बाद नहीं करना चाहिए; मदरसा और संस्कृत कॉलेज जैसे संस्थान "अपने आप क्षरण का शिकार होते अंधकार के मंदिर" हैं।

3. अंग्रेज़ी से भारतीय विश्व की श्रेष्ठ साहित्यिक कृतियाँ पढ़ेंगे, पश्चिमी विज्ञान और दर्शन से परिचित होंगे; अंग्रेज़ी पढ़ाना लोगों को "सभ्य बनाने" और उनकी रुचियाँ, मूल्य और संस्कृति बदलने का रास्ता है।

4. भारतीयों का एक ऐसा वर्ग बने जो "रक्त और रंग में भारतीय, पर रुचि, विचार, नैतिकता और बुद्धि में अंग्रेज़" हो और शासकों व शासितों के बीच दुभाषिये का काम करे।

3.3 1835 का अंग्रेज़ी शिक्षा अधिनियम और उसके परिणाम

◆ 7 मार्च 1835 को गवर्नर जनरल विलियम बेंटिंक ने मैकॉले के विचार स्वीकार किए: शिक्षा का पैसा अंग्रेज़ी माध्यम से पश्चिमी विज्ञान और साहित्य पर ख़र्च हो; उच्च शिक्षा का माध्यम अंग्रेज़ी; प्राच्य संस्थानों को प्रोत्साहन नहीं; स्कूलों के लिए अंग्रेज़ी पाठ्यपुस्तकें छपने लगीं।

◆ 1837: अदालतों और प्रशासन की भाषा के रूप में फ़ारसी हटाई गई — ऊँची अदालतों में अंग्रेज़ी, निचली में स्थानीय भाषाएँ। 1844: हार्डिंग का प्रस्ताव — सरकारी नौकरियों में अंग्रेज़ी पढ़े लोगों को प्राथमिकता; इससे अंग्रेज़ी शिक्षा की माँग तेज़ी से बढ़ी।

◆ अपवाद: उत्तर-पश्चिमी प्रांत में लेफ़्टिनेंट गवर्नर जेम्स टॉमसन (1843–53) ने गाँवों में देशी भाषा के स्कूलों (हल्काबंदी स्कूल) की योजना चलाई — ताकि किसान पटवारी के हिसाब और भूमि-रिकॉर्ड समझ सकें; मुंबई में एल्फ़िंस्टन भी देशी भाषा में शिक्षा के समर्थक थे।

🔍 आसान परिभाषा: अधोमुखी निस्पंदन / टपकन सिद्धांत (Downward Filtration Theory)

📘 परिभाषा: यह धारणा कि सरकार केवल उच्च और मध्यम वर्ग के थोड़े से लोगों को शिक्षित करे; उनसे ज्ञान अपने आप नीचे आम जनता तक "रिस" जाएगा।

💡 आसान भाषा में: "ऊपर पानी डालो, नीचे तक अपने आप पहुँच जाएगा।" 🏠 उदाहरण: इसी सोच के कारण सरकार ने जनसाधारण की प्राथमिक शिक्षा पर बहुत कम ख़र्च किया; 1911 में भी भारत की साक्षरता लगभग 6% (पुरुष लगभग 11%, स्त्रियाँ 1% के आसपास) थी। 1854 के वुड के नीतिपत्र ने सरकार को जनसाधारण की शिक्षा की ज़िम्मेदारी भी सौंपी।

चित्र 5.1: भारत में शिक्षा पर चार दृष्टिकोण: प्राच्यवादी, आंग्लवादी, ईसाई प्रचारक और राष्ट्रवादी
चित्र 5.1: भारत में शिक्षा पर चार दृष्टिकोण: प्राच्यवादी, आंग्लवादी, ईसाई प्रचारक और राष्ट्रवादी
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4. वुड का नीतिपत्र (1854): "भारतीय शिक्षा का मैग्ना कार्टा"

1854 में कंपनी के लंदन स्थित कोर्ट ऑफ़ डायरेक्टर्स ने गवर्नर जनरल (डलहौज़ी) को शिक्षा पर एक संदेश भेजा, जो नियंत्रण मंडल (बोर्ड ऑफ़ कंट्रोल) के अध्यक्ष चार्ल्स वुड के नाम से जारी हुआ — वुड का नीतिपत्र (वुड्स डिस्पैच)। इसे भारत में शिक्षा की पहली व्यापक योजना माना जाता है।

प्रमुख सिफ़ारिशें

1. शिक्षा का लक्ष्य यूरोप की श्रेष्ठ कलाओं, विज्ञान, दर्शन और साहित्य — यानी यूरोपीय ज्ञान का प्रसार; जनसाधारण की शिक्षा की ज़िम्मेदारी सरकार की (टपकन सिद्धांत को नकारा)।

2. नीचे से ऊपर तक क्रमबद्ध ढाँचा: गाँव में देशी भाषा के प्राथमिक स्कूल → ज़िले में ऐंग्लो-वर्नाक्युलर हाई स्कूल → संबद्ध कॉलेज → विश्वविद्यालय।

3. माध्यम: प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा, उच्च शिक्षा में अंग्रेज़ी।

4. हर प्रांत में लोक शिक्षा विभाग और निदेशक; निरीक्षकों की व्यवस्था।

5. लंदन विश्वविद्यालय की तर्ज़ पर कलकत्ता, बम्बई और मद्रास में विश्वविद्यालय।

6. निजी संस्थाओं को अनुदान सहायता (ग्रांट-इन-एड); धर्मनिरपेक्ष शिक्षा।

7. शिक्षक-प्रशिक्षण संस्थान; स्त्री शिक्षा, व्यावसायिक और तकनीकी शिक्षा को प्रोत्साहन।

अंग्रेज़ों को यूरोपीय शिक्षा से क्या लाभ दिखता था?

◆ आर्थिक: भारतीय व्यापार-वाणिज्य के लाभ और देश के संसाधनों के विकास का महत्व समझेंगे; यूरोपीय जीवन-शैली से परिचित होने पर उनकी रुचियाँ बदलेंगी और ब्रिटिश वस्तुओं की माँग पैदा होगी।

◆ नैतिक: यूरोपीय शिक्षा से भारतीयों का नैतिक चरित्र सुधरेगा, वे अधिक सत्यवादी और ईमानदार बनेंगे, जिससे कंपनी को भरोसेमंद कर्मचारी मिलेंगे; पूरब का साहित्य न काम के प्रति समर्पण पैदा करता है, न शासन के लिए ज़रूरी निपुणता।

परिणाम

◆ 1855 से प्रांतों में शिक्षा विभाग; 1857 में — जब मेरठ और दिल्ली में सिपाही विद्रोह कर रहे थे — कलकत्ता, बम्बई, मद्रास विश्वविद्यालय बने। ये संबद्धता देने वाले और परीक्षा लेने वाले विश्वविद्यालय थे, पढ़ाने वाले नहीं। बाद में पंजाब (1882) और इलाहाबाद (1887)।

◆ पाठशालाओं में नई दिनचर्या और नियम (ऊपर तालिका देखें); अनुदान प्रणाली से निजी और मिशनरी स्कूल बढ़े। पर शिक्षा पर सरकारी ख़र्च बहुत कम रहा और लक्ष्य अधूरे रहे।

🔍 आसान परिभाषा: अनुदान सहायता (Grant-in-aid)

📘 परिभाषा: सरकार स्वयं हर जगह स्कूल-कॉलेज खोलने के बजाय निजी संस्थाओं (भारतीय, मिशनरी) को कुछ शर्तों — निरीक्षण, पाठ्यक्रम, योग्य शिक्षक — पर आर्थिक सहायता दे।

💡 आसान भाषा में: "आप स्कूल चलाइए, नियम मानिए, थोड़ा पैसा हम देंगे।" 🏠 उदाहरण: वुड के नीतिपत्र (1854) से यह प्रणाली शुरू हुई; हंटर आयोग (1882) ने इसे और बढ़ाया। इसी से फ़र्ग्युसन कॉलेज, डी.ए.वी. कॉलेज, मिशनरी स्कूल जैसी अनेक निजी संस्थाएँ पनपीं; पर नियम न मानने वाली पारंपरिक पाठशालाएँ अनुदान से वंचित होकर पिछड़ गईं।

❝ हमें ज़ोर देकर यह बात कहनी चाहिए कि भारत में हम जिस शिक्षा का प्रसार करना चाहते हैं, उसका लक्ष्य यूरोप की श्रेष्ठतर कलाओं, सेवाओं, दर्शन और साहित्य, यानी यूरोपीय ज्ञान का प्रसार करना है। ❞ (वुड का नीतिपत्र, 1854)

5. 1857 के बाद की शिक्षा नीति: आयोग, अधिनियम और योजनाएँ

चित्र 5.2: ब्रिटिश शिक्षा नीति का विकास-क्रम (1781–1944)
चित्र 5.2: ब्रिटिश शिक्षा नीति का विकास-क्रम (1781–1944)

5.1 हंटर आयोग (1882)

◆ वायसराय रिपन ने विलियम विल्सन हंटर की अध्यक्षता में, वुड के नीतिपत्र के बाद की प्रगति की समीक्षा के लिए — विशेषकर प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा पर। इसमें कई भारतीय सदस्य भी थे।

1. प्राथमिक शिक्षा पर विशेष ध्यान; उसका प्रबंध नव-गठित ज़िला बोर्डों और नगरपालिकाओं को; इन्हें शिक्षा उपकर का अधिकार।

2. माध्यमिक शिक्षा की दो धाराएँ: साहित्यिक (विश्वविद्यालय प्रवेश के लिए) और व्यावसायिक (रोज़गार के लिए)।

3. सरकार धीरे-धीरे माध्यमिक और उच्च शिक्षा से हटे; निजी प्रयासों को अनुदान से बढ़ावा।

4. प्रेसीडेंसी नगरों के बाहर स्त्री शिक्षा के विस्तार की सिफ़ारिश।

◆ परिणाम: अगले दो दशकों में निजी भारतीय प्रयासों से अनेक स्कूल-कॉलेज खुले (फ़र्ग्युसन, डी.ए.वी. आदि) — जो आगे राष्ट्रीय चेतना के केंद्र बने।

5.2 रैले आयोग (1902) और भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम (1904)

◆ कर्ज़न मानते थे कि विश्वविद्यालयों का स्तर गिरा है और वे "राजनीतिक क्रांतिकारियों के कारख़ाने" बन रहे हैं। 1901 में शिमला में शिक्षा अधिकारियों का गुप्त सम्मेलन और 1902 में टॉमस रैले की अध्यक्षता में विश्वविद्यालय आयोग (भारतीय सदस्य: सैयद हुसैन बिलग्रामी और गुरुदास बनर्जी)।

◆ 1904 के अधिनियम के प्रावधान: विश्वविद्यालय अब पढ़ाई और शोध भी कराएँगे; सीनेट के फ़ेलो 50 से 100 तक, जिनमें अधिकांश सरकार द्वारा मनोनीत; सीनेट के निर्णयों पर सरकार का निषेधाधिकार (वीटो); निजी कॉलेजों की संबद्धता के कड़े नियम और सरकारी निरीक्षण; पाँच वर्ष तक हर साल 5 लाख रुपये का अनुदान।

◆ प्रतिक्रिया: राष्ट्रवादियों ने इसे विश्वविद्यालयों को सरकारी विभाग बनाने और भारतीय प्रयासों को कुचलने का प्रयास माना; गोपालकृष्ण गोखले ने इसे "प्रतिगामी" कहा। बंगाल विभाजन के साथ इसने राष्ट्रीय शिक्षा आंदोलन को जन्म दिया।

5.3 बीसवीं सदी के आयोग और योजनाएँ

वर्ष

नीति / आयोग

मुख्य बातें

1910–13

केंद्र में शिक्षा विभाग (1910); गोखले का विधेयक (1911); शिक्षा नीति प्रस्ताव (1913)

गोखले ने अनिवार्य और मुफ़्त प्राथमिक शिक्षा का विधेयक रखा, जो 1912 में अस्वीकार हुआ।

1913 के प्रस्ताव में निरक्षरता हटाने की नीति मानी गई, पर अनिवार्य शिक्षा नहीं; हर प्रांत में विश्वविद्यालय का लक्ष्य।

1917–19

सैडलर आयोग (कलकत्ता विश्वविद्यालय आयोग; अध्यक्ष माइकल सैडलर; भारतीय सदस्य आशुतोष मुखर्जी और ज़ियाउद्दीन अहमद)

12 वर्ष की स्कूली शिक्षा (इंटरमीडिएट सहित), फिर 3 वर्ष की स्नातक डिग्री।

माध्यमिक-इंटरमीडिएट शिक्षा के लिए अलग बोर्ड; इंटरमीडिएट कॉलेज।

विश्वविद्यालय केंद्रीकृत, आवासीय, शिक्षण संस्थाएँ बनें; स्त्री शिक्षा के लिए विशेष बोर्ड; व्यावहारिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी।

परिणाम: ढाका (1921), मैसूर (1916), पटना (1917), अलीगढ़, लखनऊ आदि नए विश्वविद्यालय।

1919–21

मॉन्टेग्यू-चेम्सफ़ोर्ड सुधार

शिक्षा प्रांतीय और हस्तांतरित विषय — भारतीय मंत्रियों के अधीन, पर धन की कमी। 1920 में केंद्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड (1923 में भंग, 1935 में पुनर्गठित)।

1929

हार्टोग समिति (फ़िलिप हार्टोग)

शिक्षा का विस्तार हुआ पर गुणवत्ता गिरी; प्राथमिक स्तर पर भारी "अपव्यय और अवरोधन" (बच्चे बीच में पढ़ाई छोड़ते या एक कक्षा में अटकते); अंधाधुंध विस्तार के बजाय सुदृढ़ीकरण; व्यावसायिक-औद्योगिक शिक्षा की ओर मोड़ना।

1936–37

एबट-वुड रिपोर्ट

व्यावसायिक और तकनीकी शिक्षा; पॉलिटेक्निक स्कूलों की योजना।

1937

वर्धा योजना (बुनियादी शिक्षा)

गांधी जी ने "हरिजन" में लेख लिखे; अक्टूबर 1937 के वर्धा सम्मेलन के बाद डॉ. ज़ाकिर हुसैन समिति ने योजना बनाई; 1938 के हरिपुरा अधिवेशन ने स्वीकार की।

7 से 14 वर्ष के बच्चों को मुफ़्त और अनिवार्य शिक्षा मातृभाषा में; केंद्र में कोई हस्तशिल्प (उत्पादक कार्य) — कताई, बुनाई, खेती आदि; अंग्रेज़ी नहीं।

शिक्षा स्वावलंबी हो — बच्चों के उत्पादक काम से शिक्षकों का वेतन निकले।

1939 में कांग्रेस मंत्रिमंडलों के त्यागपत्र से योजना रुक गई।

1944

सार्जेंट योजना (केंद्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड; जॉन सार्जेंट)

6 से 14 वर्ष के बच्चों को मुफ़्त, अनिवार्य और सार्वभौमिक शिक्षा (जूनियर बेसिक 6–11, सीनियर बेसिक 11–14)।

हाई स्कूल 6 वर्ष (11–17) — दो धाराएँ: शैक्षिक और तकनीकी; इंटरमीडिएट समाप्त कर 3 वर्ष की डिग्री; प्रौढ़ शिक्षा, शिक्षक प्रशिक्षण।

लक्ष्य: 40 वर्ष में (1984 तक) इंग्लैंड के स्तर की शिक्षा।

📌 स्वतंत्रता के बाद (संक्षेप में)

राधाकृष्णन आयोग (1948–49) — विश्वविद्यालय शिक्षा; इसी की सिफ़ारिश पर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (1953, 1956 में वैधानिक)। मुदालियर आयोग (1952–53) — माध्यमिक शिक्षा। कोठारी आयोग (1964–66) — 10+2+3 ढाँचा। (विस्तार अध्याय 18 में।)

6. मिशनरी, तकनीकी और महिला शिक्षा

6.1 ईसाई प्रचारक और "नैतिक शिक्षा" की माँग

◆ ईसाई प्रचारक व्यावहारिक शिक्षा के तर्कों के विरोधी थे; उनके अनुसार शिक्षा का उद्देश्य नैतिक चरित्र का सुधार है, जो केवल ईसाई शिक्षा से संभव है।

◆ 1813 तक कंपनी प्रचारकों के विरुद्ध थी (असंतोष का डर); इसलिए उन्होंने डेनिश ईस्ट इंडिया कंपनी के क्षेत्र सेरामपुर में मिशन खोला। विलियम केरी (अपने साथियों मार्शमैन और वार्ड के साथ): 1800 में छापाखाना, 1818 में सेरामपुर कॉलेज; बाइबिल का अनेक भारतीय भाषाओं में अनुवाद और बांग्ला गद्य को बढ़ावा।

◆ अलेक्ज़ेंडर डफ़ ने 1830 में कलकत्ता में जनरल असेंबली इंस्टीट्यूशन (आज का स्कॉटिश चर्च कॉलेज) खोला। 19वीं सदी में पूरे भारत में मिशनरी स्कूल; लड़कियों और दलित-वंचित वर्गों के लिए भी स्कूल।

◆ 1857 के बाद सरकार ने मिशनरी शिक्षा को सीधी सहायता देने में आनाकानी की, क्योंकि स्थानीय रीति-रिवाजों, धार्मिक विचारों से छेड़छाड़ "देशी लोगों" को भड़का सकती थी। पर मिशनरी चुनौती ने भारतीय धर्म-सुधार आंदोलनों को भी प्रेरित किया (अध्याय 8)।

6.2 तकनीकी, चिकित्सा और वैज्ञानिक शिक्षा

वर्ष

संस्था

1835

कलकत्ता मेडिकल कॉलेज (बेंटिंक); 1845 में बम्बई का ग्रांट मेडिकल कॉलेज

1847

रुड़की का सिविल इंजीनियरिंग कॉलेज (टॉमसन कॉलेज; आज का IIT रुड़की) — गंगा नहर के काम के लिए इंजीनियर

1854–56

पूना इंजीनियरिंग कॉलेज (पहले इंजीनियरिंग स्कूल)

1876

इंडियन एसोसिएशन फ़ॉर द कल्टिवेशन ऑफ़ साइंस, कलकत्ता (महेंद्रलाल सरकार) — भारतीयों का वैज्ञानिक शोध संस्थान

1905

कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा (बिहार; बाद में दिल्ली)

1909

भारतीय विज्ञान संस्थान, बंगलौर — जमशेदजी टाटा की योजना से

◆ फिर भी ब्रिटिश काल में तकनीकी शिक्षा की उपेक्षा रही; ऊँचे तकनीकी पद अंग्रेज़ों के लिए थे और उद्योगों के अभाव में तकनीकी शिक्षा की माँग भी कम रही।

6.3 महिला शिक्षा (संक्षेप में)

◆ 1848: ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले ने पुणे में लड़कियों का स्कूल खोला। 1849: कलकत्ता में जॉन इलियट ड्रिंकवाटर बेथ्यून का बालिका विद्यालय (बेथ्यून स्कूल), जिसमें ईश्वरचंद्र विद्यासागर सहयोगी रहे; विद्यासागर ने बंगाल में अनेक बालिका विद्यालय खुलवाए।

◆ 1854 के वुड नीतिपत्र और 1882 के हंटर आयोग ने स्त्री शिक्षा पर बल दिया। 1916: धोंडो केशव कर्वे ने पुणे में भारतीय महिला विश्वविद्यालय (आज का एस.एन.डी.टी.) बनाया; उसी वर्ष दिल्ली में लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज। (विस्तार अध्याय 20 में।)

7. राष्ट्रीय शिक्षा आंदोलन

19वीं सदी की शुरुआत से कई भारतीय विचारक शिक्षा के व्यापक प्रसार की माँग कर रहे थे। कुछ मानते थे कि पश्चिमी शिक्षा भारत का आधुनिकीकरण करेगी और अंग्रेज़ों से अधिक स्कूल-कॉलेज खोलने की माँग करते थे; पर बहुत से लोग — विशेषकर महात्मा गांधी और रवींद्रनाथ टैगोर — औपनिवेशिक शिक्षा के आलोचक थे और एक वैकल्पिक राष्ट्रीय शिक्षा चाहते थे।

7.1 गांधी जी: "अंग्रेज़ी शिक्षा ने हमें ग़ुलाम बना दिया है"

◆ औपनिवेशिक शिक्षा ने भारतीयों के मन में हीनता-बोध पैदा किया; लोग पश्चिमी सभ्यता को श्रेष्ठ मानने लगे और अपनी संस्कृति के प्रति गौरव खो बैठे। इस शिक्षा में "विष भरा है, यह पापपूर्ण है, इसने भारतीयों को दास बना दिया है"; इससे पढ़े भारतीय ब्रिटिश शासन को पसंद करने लगे।

◆ शिक्षा केवल भारतीय भाषाओं में हो; अंग्रेज़ी में दी गई शिक्षा ने भारतीयों को "अपाहिज" बना दिया, उन्हें सामाजिक परिवेश से काट दिया और "अपनी ही भूमि पर अजनबी" बना दिया। राष्ट्रीय आंदोलन में उन्होंने विद्यार्थियों से सरकारी संस्थान छोड़ने का आह्वान किया।

◆ पश्चिमी शिक्षा केवल पढ़ने-लिखने पर केंद्रित है और जीवन के अनुभव तथा व्यावहारिक ज्ञान की उपेक्षा करती है। शिक्षा से दिमाग और आत्मा का विकास होना चाहिए; इसके लिए हाथ से काम, हुनर और यह जानना ज़रूरी है कि चीज़ें कैसे काम करती हैं।

❝ साक्षरता न तो शिक्षा का अंत है और न ही उसकी शुरुआत। यह तो केवल एक साधन है… इसलिए मैं बच्चों को शिक्षित करते हुए सबसे पहले उन्हें कोई उपयोगी हस्तकौशल सिखाऊँगा… हर हस्तकौशल यांत्रिक ढंग से नहीं, वैज्ञानिक ढंग से पढ़ाया जाए, यानी बच्चे को हर प्रक्रिया के "क्यों" और "किसलिए" का पता हो। ❞ (महात्मा गांधी)

7.2 टैगोर का शांतिनिकेतन (1901)

◆ बचपन में टैगोर को कलकत्ता का स्कूल जेल जैसा लगता था — दमनकारी माहौल, जहाँ बच्चे मनचाहा कुछ नहीं कर पाते थे। बड़े होकर उन्होंने ऐसा स्कूल सोचा जहाँ बच्चे ख़ुश, मुक्त और रचनाशील हों।

◆ बचपन अपने आप सीखने का समय हो, ब्रिटिश व्यवस्था के कड़े अनुशासन से मुक्त; शिक्षक कल्पनाशील हों और बच्चों में जिज्ञासा जगाएँ। सृजनात्मक शिक्षा केवल प्राकृतिक परिवेश में संभव है — इसलिए कलकत्ता से लगभग 100 किमी दूर ग्रामीण परिवेश में शांतिनिकेतन (1901); 1921 में विश्व-भारती विश्वविद्यालय।

🤝 गांधी और टैगोर: समानताएँ

✔ दोनों औपनिवेशिक शिक्षा के आलोचक

✔ मातृभाषा और भारतीय परिवेश से जुड़ी शिक्षा

✔ रटने के बजाय अनुभव और रचनाशीलता

✔ बच्चे का सर्वांगीण विकास

↔️ अंतर

✔ गांधी पश्चिमी सभ्यता, मशीन और प्रौद्योगिकी की उपासना के कट्टर आलोचक

✔ टैगोर आधुनिक पश्चिमी सभ्यता और भारतीय परंपरा के श्रेष्ठ तत्वों का मेल चाहते थे

✔ शांतिनिकेतन में कला, संगीत, नृत्य के साथ विज्ञान और प्रौद्योगिकी भी

✔ गांधी का ज़ोर उत्पादक हस्तशिल्प और स्वावलंबन पर

◆ अरविंद घोष (15 जनवरी 1908, बम्बई): राष्ट्रीय शिक्षा का लक्ष्य राष्ट्रीयता का भाव जगाना; पूर्वजों के साहसिक कार्यों पर चिंतन; शिक्षा मातृभाषा में; पर पश्चिम के वैज्ञानिक आविष्कारों और लोकप्रिय शासन के अनुभव का लाभ भी; छात्र कोई हस्तकला भी सीखें ताकि रोज़गार पा सकें।

7.3 राष्ट्रीय और भारतीय शैक्षिक संस्थाएँ

वर्ष

संस्था

संस्थापक / विशेषता

1875 / 1877

मुहम्मडन एंग्लो-ओरिएंटल स्कूल/कॉलेज, अलीगढ़ → अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (1920)

सर सैयद अहमद ख़ाँ

1880 / 1884 / 1885

न्यू इंग्लिश स्कूल; दक्कन एजुकेशन सोसाइटी; फ़र्ग्युसन कॉलेज, पूना

विष्णुशास्त्री चिपलूणकर, तिलक, आगरकर, आप्टे

1886

दयानंद एंग्लो-वैदिक (डी.ए.वी.) कॉलेज, लाहौर

लाला हंसराज, आर्य समाज

1898 → 1916

सेंट्रल हिंदू कॉलेज, बनारस → बनारस हिंदू विश्वविद्यालय

एनी बेसेंट; मदन मोहन मालवीय

1901 / 1921

शांतिनिकेतन → विश्व-भारती

रवींद्रनाथ टैगोर

1902

गुरुकुल कांगड़ी, हरिद्वार

स्वामी श्रद्धानंद — वैदिक आदर्शों पर

1906

राष्ट्रीय शिक्षा परिषद (15 अगस्त); बंगाल नेशनल कॉलेज

स्वदेशी आंदोलन; अरविंद घोष प्राचार्य

1916

भारतीय महिला विश्वविद्यालय, पुणे

धोंडो केशव कर्वे

1920–21

गुजरात विद्यापीठ (1920), जामिया मिल्लिया इस्लामिया (अलीगढ़ 1920, दिल्ली 1925), काशी विद्यापीठ, बिहार विद्यापीठ, तिलक महाराष्ट्र विद्यापीठ (1921)

असहयोग आंदोलन में विद्यार्थियों द्वारा सरकारी संस्थान छोड़ने के बाद

7.4 ब्रिटिश शिक्षा का मूल्यांकन

✅ सकारात्मक पक्ष

✔ आधुनिक विज्ञान, तर्क और लोकतांत्रिक विचारों से परिचय

✔ अंग्रेज़ी अलग-अलग प्रांतों के शिक्षितों की संपर्क भाषा बनी

✔ विश्वविद्यालय, कॉलेज, पुस्तकालय — आधुनिक शिक्षा का ढाँचा

✔ शिक्षित मध्यम वर्ग ने सुधार और राष्ट्रीय आंदोलन का नेतृत्व किया

✔ भारतीय भाषाओं के गद्य और आधुनिक साहित्य का विकास

❌ नकारात्मक पक्ष

✔ मुख्य उद्देश्य सस्ते क्लर्क और वफ़ादार वर्ग बनाना

✔ जनसाधारण की उपेक्षा — 1947 में भी साक्षरता लगभग 12%

✔ स्त्री शिक्षा, तकनीकी शिक्षा की उपेक्षा

✔ भारतीय भाषाओं और ज्ञान-परंपरा की उपेक्षा; हीनता-बोध

✔ शिक्षित और अशिक्षित के बीच गहरी खाई; रटने पर आधारित परीक्षा प्रणाली

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8. प्रेस का विकास और प्रमुख समाचार-पत्र

8.1 आरंभिक दौर (1556–1820)

◆ भारत में पहला छापाखाना पुर्तगालियों ने 1556 में गोवा में लगाया (ईसाई धार्मिक पुस्तकों के लिए)। ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1684 में बम्बई में छापाखाना लगाया।

◆ 29 जनवरी 1780: जेम्स ऑगस्टस हिक्की का "बंगाल गज़ट" (कलकत्ता जनरल एडवरटाइज़र) — भारत का पहला समाचार-पत्र (साप्ताहिक, अंग्रेज़ी)। इसमें गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स और मुख्य न्यायाधीश इम्पे की आलोचना हुई; 1782 में छापाखाना ज़ब्त।

◆ फिर इंडिया गज़ट (नवंबर 1780), कलकत्ता गज़ट (1784), मद्रास कूरियर (1785), बॉम्बे हेराल्ड (1789) — सब अंग्रेज़ों के, अंग्रेज़ पाठकों के लिए।

◆ 1818: सेरामपुर मिशन से बांग्ला मासिक "दिग्दर्शन" और साप्ताहिक "समाचार दर्पण"। जेम्स सिल्क बकिंघम का "कलकत्ता जर्नल" (1818) — प्रेस को जनता की आवाज़ बनाने का प्रयास; 1823 में उन्हें भारत से निकाल दिया गया।

◆ गंगाधर भट्टाचार्य का "बंगाल गज़ट" (1816) — किसी भारतीय द्वारा निकाला गया पहला अंग्रेज़ी पत्र माना जाता है।

8.2 राजा राममोहन राय और भारतीय प्रेस

◆ राममोहन राय को "भारतीय पत्रकारिता का अग्रदूत" कहा जाता है; उन्होंने प्रेस को समाज सुधार और जनमत का हथियार बनाया: "संवाद कौमुदी" (बांग्ला, 1821) — सती प्रथा आदि पर; "मिरात-उल-अख़बार" (फ़ारसी, 1822) — 1823 के अनुज्ञप्ति नियमों के विरोध में स्वयं बंद किया; "ब्राह्मनिकल मैगज़ीन" (अंग्रेज़ी) — ईसाई प्रचारकों के आक्षेपों का उत्तर।

◆ 1823 के प्रेस नियमों के विरुद्ध राममोहन राय और साथियों ने सर्वोच्च न्यायालय और फिर ब्रिटिश सम्राट (प्रिवी काउंसिल) को याचिका दी — प्रेस की स्वतंत्रता के लिए भारत का पहला संगठित संघर्ष।

◆ भारतीय भाषाओं में पत्रकारिता: "बॉम्बे समाचार" (गुजराती, 1822, फ़रदूनजी मर्ज़बान) — आज भी प्रकाशित हो रहा एशिया के सबसे पुराने पत्रों में; "उदंत मार्तंड" (30 मई 1826, कलकत्ता, पं. जुगल किशोर शुक्ल) — हिंदी का पहला समाचार-पत्र (इसी दिन हिंदी पत्रकारिता दिवस मनाया जाता है)।

8.3 उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध और बीसवीं सदी के प्रमुख पत्र

समाचार-पत्र

भाषा / स्थान

संस्थापक / संपादक

वर्ष

इंडियन मिरर

अंग्रेज़ी / कलकत्ता

देवेंद्रनाथ टैगोर; बाद में नरेंद्रनाथ सेन

1861

अमृत बाज़ार पत्रिका

बांग्ला → अंग्रेज़ी / कलकत्ता

शिशिर कुमार घोष, मोतीलाल घोष

1868

द हिंदू

अंग्रेज़ी / मद्रास

जी. सुब्रमण्य अय्यर, वीर राघवाचारी

1878

बंगाली

अंग्रेज़ी / कलकत्ता

सुरेंद्रनाथ बनर्जी (1879 से)

1862 / 1879

केसरी (मराठी), मराठा (अंग्रेज़ी)

पूना

तिलक, आगरकर, चिपलूणकर; बाद में तिलक

1881

ट्रिब्यून

अंग्रेज़ी / लाहौर

सरदार दयाल सिंह मजीठिया

1881

स्वदेशमित्रन

तमिल / मद्रास

जी. सुब्रमण्य अय्यर

1882

सुधारक

मराठी / पूना

गोपाल गणेश आगरकर

1888

हिंदुस्तान

हिंदी / कालाकांकर

राजा रामपाल सिंह

1885 (दैनिक 1887)

वंदे मातरम्

अंग्रेज़ी / कलकत्ता

बिपिनचंद्र पाल, अरविंद घोष

1906

युगांतर

बांग्ला / कलकत्ता

बारींद्र घोष, भूपेंद्रनाथ दत्त (अनुशीलन समिति)

1906

अभ्युदय / लीडर

हिंदी / अंग्रेज़ी, इलाहाबाद

मदन मोहन मालवीय

1907 / 1909

बॉम्बे क्रॉनिकल

अंग्रेज़ी / बम्बई

फ़िरोज़शाह मेहता

1910

कॉमरेड

अंग्रेज़ी / कलकत्ता, दिल्ली

मौलाना मोहम्मद अली

1911

अल-हिलाल / अल-बलाग़

उर्दू / कलकत्ता

मौलाना अबुल कलाम आज़ाद

1912 / 1915

प्रताप

हिंदी / कानपुर

गणेश शंकर विद्यार्थी

1913

ग़दर

उर्दू, पंजाबी आदि / सैन फ़्रांसिस्को

ग़दर पार्टी (लाला हरदयाल)

1913

न्यू इंडिया, कॉमनवील

अंग्रेज़ी / मद्रास

एनी बेसेंट

1914

यंग इंडिया, नवजीवन

अंग्रेज़ी / गुजराती, अहमदाबाद

महात्मा गांधी

1919

इंडिपेंडेंट

अंग्रेज़ी / इलाहाबाद

मोतीलाल नेहरू

1919

हिंदुस्तान टाइम्स

अंग्रेज़ी / दिल्ली

सुंदर सिंह लायलपुरी (आरंभ); बाद में बिड़ला

1924

हरिजन

अंग्रेज़ी, हिंदी, गुजराती

महात्मा गांधी

1933

नेशनल हेराल्ड

अंग्रेज़ी / लखनऊ

जवाहरलाल नेहरू

1938

◆ विदेशों से: श्यामजी कृष्ण वर्मा — "इंडियन सोशियोलॉजिस्ट" (लंदन, 1905); मैडम भीकाजी कामा — "वंदे मातरम्" (पेरिस, 1909); गांधी जी — "इंडियन ओपिनियन" (दक्षिण अफ़्रीका, 1903)।

8.4 प्रेस की राष्ट्रीय भूमिका

◆ 1877 तक भारतीय भाषाओं के लगभग 169 अख़बार थे। अख़बार केवल ख़बर नहीं, राजनीतिक शिक्षा का साधन थे: सरकारी नीतियों की आलोचना, धन के निकास, नस्लभेद, अकाल, प्रेस कानूनों पर बहस।

◆ गाँवों में एक अख़बार पुस्तकालयों और चौपालों में पढ़कर सुनाया जाता था; इसलिए उसकी पहुँच उसकी प्रतियों से कहीं अधिक थी। अख़बारों ने अखिल भारतीय जनमत और राष्ट्रीय पहचान बनाई।

◆ राष्ट्रवादी पत्रकारिता जोखिम भरा काम थी: तिलक को 1897 में (प्लेग अधिकारी रैंड की हत्या के बाद "केसरी" के लेखों पर) 18 महीने और 1908 में (खुदीराम बोस के समर्थन वाले लेखों पर) 6 वर्ष (मांडले) की सज़ा हुई। सुरेंद्रनाथ बनर्जी 1883 में अदालत की अवमानना में जेल जाने वाले पहले भारतीय पत्रकार बने।

9. प्रेस पर नियंत्रण: कानूनों का कालक्रम

चित्र 5.3: प्रेस से जुड़े प्रमुख कानून: 1799 से 1931 तक
चित्र 5.3: प्रेस से जुड़े प्रमुख कानून: 1799 से 1931 तक

9.1 देशी भाषा प्रेस अधिनियम (वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट), 1878

📖 कहानी 2: जब अख़बार रातोंरात अंग्रेज़ी का बन गया (1878)

1876–78 में देश भीषण अकाल की चपेट में था। उसी समय वायसराय लिटन ने 1877 में दिल्ली दरबार की भारी शान-शौकत दिखाई, और द्वितीय आंग्ल-अफ़ग़ान युद्ध का ख़र्च भी बढ़ता जा रहा था। भारतीय भाषाओं के अख़बारों ने सीधा सवाल उठाया कि जनता भूखी है और सरकार जश्न तथा युद्ध पर पैसा बहा रही है।

सरकार को यह आलोचना सहन नहीं हुई। 1878 में देशी भाषा प्रेस अधिनियम (वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट) लाया गया, जो आयरलैंड के प्रेस कानून की तर्ज़ पर बना था। इसके तहत ज़िला मजिस्ट्रेट किसी भी देशी भाषा के पत्र के मुद्रक-प्रकाशक से बंधपत्र पर हस्ताक्षर करवा सकता था और ज़मानत भी माँग सकता था। नियम तोड़ने पर ज़मानत, छापाखाना और सामग्री ज़ब्त हो सकती थी, और मजिस्ट्रेट के फ़ैसले के विरुद्ध अदालत में अपील भी नहीं हो सकती थी।

सबसे चुभने वाली बात यह थी कि यह कानून केवल भारतीय भाषाओं के पत्रों पर लागू था, जबकि अंग्रेज़ी पत्र इससे मुक्त थे। बांग्ला की अमृत बाज़ार पत्रिका ने इसी भेदभाव का रास्ता निकाला और रातोंरात अंग्रेज़ी पत्र बन गई, इसलिए कानून की पकड़ से बच निकली। जिन पत्रों पर मार पड़ी, उनमें सोम प्रकाश, भारत मिहिर, ढाका प्रकाश और सहचर जैसे नाम थे।

भारी विरोध हुआ और इंडियन एसोसिएशन जैसी संस्थाओं ने भी आवाज़ उठाई। आख़िरकार 1882 में वायसराय रिपन ने यह कानून रद्द कर दिया। जिस कानून का मक़सद भारतीयों की आवाज़ दबाना था, उसने उलटे लोगों की राष्ट्रीय चेतना जगा दी।

🧭 इस कहानी से कौन-सी अवधारणा साफ़ हुई

✔ भेदभावपूर्ण कानून — एक ही बात अंग्रेज़ी में छपे तो ठीक, भारतीय भाषा में छपे तो अपराध; यही भेदभाव इस कानून की सबसे बड़ी पहचान थी।

✔ बिना अपील का नियंत्रण — बंधपत्र, ज़मानत और ज़ब्ती का अधिकार मजिस्ट्रेट के हाथ में था और अदालत में अपील का रास्ता बंद था।

✔ दमन का उलटा असर — कानून ने प्रेस को चुप कराने के बजाय राष्ट्रीय चेतना जगाई और विरोध संगठित हुआ; इसी कारण 1882 में इसे रद्द करना पड़ा।

📝 परीक्षा के लिए: देशी भाषा प्रेस अधिनियम 1878 (वायसराय लिटन) = केवल भारतीय भाषाओं के पत्रों पर, आयरलैंड के कानून की तर्ज़ पर, "मुँह बंद करने वाला कानून"; अमृत बाज़ार पत्रिका अंग्रेज़ी में बदली; 1882 में रिपन ने रद्द किया।

वायसराय लिटन के समय — जब 1876–78 का भीषण अकाल, उसी समय दिल्ली दरबार (1877) की शान-शौकत और द्वितीय आंग्ल-अफ़ग़ान युद्ध के ख़र्च पर भारतीय भाषा के अख़बार तीखी आलोचना कर रहे थे। यह कानून आयरलैंड के प्रेस कानून की तर्ज़ पर बना और इसे "मुँह बंद करने वाला कानून" कहा गया।

1. केवल भारतीय भाषाओं के पत्रों पर लागू; अंग्रेज़ी पत्र मुक्त — स्पष्ट भेदभाव।

2. ज़िला मजिस्ट्रेट किसी भी देशी भाषा पत्र के मुद्रक-प्रकाशक से बंधपत्र पर हस्ताक्षर करवा सकता था कि वह सरकार-विरोधी या विभिन्न समुदायों में वैमनस्य फैलाने वाली सामग्री नहीं छापेगा; साथ में ज़मानत राशि।

3. उल्लंघन पर ज़मानत ज़ब्त, छापाखाना और सामग्री ज़ब्त; मजिस्ट्रेट के निर्णय के विरुद्ध अदालत में अपील नहीं।

4. पूर्व-सेंसरशिप के लिए पांडुलिपि सरकारी सेंसर को दिखाने पर छूट।

◆ प्रभावित पत्र: सोम प्रकाश (जिससे ईश्वरचंद्र विद्यासागर जुड़े थे), भारत मिहिर, ढाका प्रकाश, सहचर आदि। अमृत बाज़ार पत्रिका रातोंरात अंग्रेज़ी पत्र बनकर इस कानून से बच निकली।

◆ भारी विरोध (इंडियन एसोसिएशन आदि) के बाद 1882 में रिपन ने इसे रद्द किया। यह कानून राष्ट्रीय चेतना जगाने वाला सिद्ध हुआ।

9.2 बीसवीं सदी: राजद्रोह और दमन

◆ 1898: भारतीय दंड संहिता की धारा 124-क (राजद्रोह) और 153-क (वर्गों में वैमनस्य) को और कठोर बनाया गया — राष्ट्रवादी पत्रकारों के विरुद्ध प्रयोग।

◆ 1908 और 1910 के कानून क्रांतिकारी और उग्रवादी पत्रों ("युगांतर", "संध्या", "वंदे मातरम्", "केसरी") को दबाने के लिए; 1910 के कानून के बाद कुछ वर्षों में सैकड़ों पत्रों और छापाखानों पर कार्रवाई हुई और भारी ज़मानतें वसूली गईं।

◆ 1921 में तेज बहादुर सप्रू की अध्यक्षता में प्रेस समिति की सिफ़ारिश पर 1922 में 1908 और 1910 के कानून रद्द। पर 1930–32 में सविनय अवज्ञा के समय प्रेस (आपातकालीन शक्तियाँ) अधिनियम और दूसरे विश्व युद्ध में भारत रक्षा नियमों के तहत पूर्व-सेंसरशिप; भारत छोड़ो (1942) के समय "नेशनल हेराल्ड" जैसे पत्र बंद हुए।

🔍 आसान परिभाषा: पूर्व-सेंसरशिप (Pre-censorship)

📘 परिभाषा: छपने से पहले ही सामग्री को सरकारी अधिकारी (सेंसर) को दिखाना और उसकी अनुमति के बाद ही छापना।

💡 आसान भाषा में: "पहले दिखाओ, फिर छापो" — सरकार तय करे कि जनता क्या पढ़े। 🏠 उदाहरण: 1799 में वेलेज़ली ने फ़्रांसीसी ख़तरे के समय यही नियम लागू किया; दूसरे विश्व युद्ध और भारत छोड़ो आंदोलन के समय भी अख़बारों पर पूर्व-सेंसरशिप लगी। इसके विपरीत 1835 के मेटकाफ़ अधिनियम में केवल छापाखाने की घोषणा ज़रूरी थी।

🔍 आसान परिभाषा: राजद्रोह (Sedition)

📘 परिभाषा: सरकार के प्रति घृणा, अवमानना या असंतोष भड़काने वाले शब्द, लेख या कार्य को अपराध मानना; औपनिवेशिक भारत में भारतीय दंड संहिता की धारा 124-क (1870 में जोड़ी गई)।

💡 आसान भाषा में: "सरकार की आलोचना = अपराध" — औपनिवेशिक सरकार की यही सोच थी। 🏠 उदाहरण: इसी धारा में तिलक (1897, 1908) और गांधी जी (1922, "यंग इंडिया" के लेखों पर 6 वर्ष की सज़ा) पर मुक़दमे चले। गांधी जी ने अदालत में कहा कि इस धारा का उद्देश्य नागरिकों की स्वतंत्रता को दबाना है।

10. बौद्धिक जागरण: अतीत की खोज, साहित्य और नई चेतना

19वीं सदी में पश्चिमी शिक्षा, प्रेस, छापाखाने और प्राचीन भारत की पुनः खोज के मेल से भारत में एक बौद्धिक जागरण हुआ, जिसे प्रायः "भारतीय पुनर्जागरण" कहा जाता है। इसकी शुरुआत बंगाल से हुई और फिर यह महाराष्ट्र, मद्रास, पंजाब और पूरे देश में फैला।

चित्र 5.4: बौद्धिक जागरण के कारण और परिणाम
चित्र 5.4: बौद्धिक जागरण के कारण और परिणाम

10.1 भारत के अतीत की पुनः खोज

व्यक्ति / संस्था

योगदान

विलियम जोन्स

एशियाटिक सोसाइटी (1784); संस्कृत, लैटिन और ग्रीक भाषाओं की समानता बताकर भारोपीय भाषा परिवार की अवधारणा दी।

चार्ल्स विल्किंस, कोलब्रुक, हैलहेड

गीता, शाकुंतलम्, धर्मशास्त्रों, व्याकरण के अनुवाद; संस्कृत अध्ययन की नींव

जेम्स प्रिंसेप (1837)

ब्राह्मी लिपि पढ़ी — अशोक के अभिलेख पढ़े गए; प्राचीन भारतीय इतिहास का नया द्वार खुला

अलेक्ज़ेंडर कनिंघम

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (1861) के पहले महानिदेशक; बौद्ध स्थलों की खोज

मैक्स मूलर

ऋग्वेद का संपादन; "पूरब के पवित्र ग्रंथ" शृंखला; वेदों को मानव सभ्यता की अमूल्य धरोहर बताया

भारतीय विद्वान

राजेंद्रलाल मित्र, आर. जी. भंडारकर, भगवानलाल इंद्रजी, बाद में के. पी. जायसवाल आदि — भारतीय इतिहास का भारतीय दृष्टि से लेखन

◆ प्रभाव: शिक्षित भारतीयों में अपने गौरवशाली अतीत पर गर्व और आत्मविश्वास; अंग्रेज़ों के "सभ्यता-मिशन" के दावे को चुनौती; राष्ट्रवाद को सांस्कृतिक आधार मिला। पर इसका एक दुष्प्रभाव भी रहा — कुछ लेखन में प्राचीन काल का अतिशय गौरवगान और मध्यकाल को "पतन काल" बताने की प्रवृत्ति, जिसने आगे साम्प्रदायिक दृष्टि को भी बल दिया।

10.2 यंग बंगाल और तर्कवाद

◆ हिंदू कॉलेज के युवा अध्यापक हेनरी विवियन डेरोज़ियो (1809–1831) ने छात्रों को स्वतंत्र चिंतन, तर्क और प्रश्न करने की प्रेरणा दी; उनके शिष्यों का समूह "यंग बंगाल" कहलाया, जिसने रूढ़ियों, जाति-भेद और अंधविश्वास का खुलकर विरोध किया। 1831 में उन्हें कॉलेज से हटा दिया गया और उसी वर्ष उनकी मृत्यु हो गई। (धर्म-सुधार आंदोलनों का विस्तार अध्याय 8 में।)

🔍 आसान परिभाषा: पुनर्जागरण (Renaissance)

📘 परिभाषा: मूल अर्थ "पुनर्जन्म" — 14वीं–16वीं सदी के यूरोप में प्राचीन यूनानी-रोमन ज्ञान की पुनः खोज से आया बौद्धिक-सांस्कृतिक जागरण। भारत में 19वीं सदी का वह जागरण, जिसमें तर्क, मानवतावाद और सुधार की भावना फैली।

💡 आसान भाषा में: "आँखें खोलकर सोचना" — परंपरा को आँख मूँदकर मानने के बजाय तर्क और मानव-कल्याण की कसौटी पर परखना। 🏠 उदाहरण: राममोहन राय ने सती प्रथा का विरोध शास्त्रों और तर्क दोनों से किया; विद्यासागर ने विधवा-विवाह के पक्ष में शास्त्रों से प्रमाण दिए। भारतीय पुनर्जागरण की सीमा यह थी कि वह प्रायः शहरी, उच्च जाति और शिक्षित वर्ग तक सीमित रहा।

10.3 आधुनिक भारतीय साहित्य और राष्ट्रीय चेतना

साहित्यकार

भाषा

प्रमुख रचना / योगदान

बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय

बांग्ला

आनंदमठ (1882) — जिसमें "वंदे मातरम्" गीत है; पत्रिका "बंगदर्शन"

दीनबंधु मित्र

बांग्ला

नील दर्पण (1860) — नील किसानों की पीड़ा

भारतेंदु हरिश्चंद्र

हिंदी

"भारत दुर्दशा", "अंधेर नगरी"; "कविवचन सुधा"; आधुनिक हिंदी के जनक

रवींद्रनाथ टैगोर

बांग्ला

गीतांजलि — 1913 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार (पहले एशियाई); "जन गण मन"

सुब्रमण्य भारती

तमिल

राष्ट्रभक्ति और स्त्री-मुक्ति की कविताएँ

अल्लामा इक़बाल

उर्दू

"सारे जहाँ से अच्छा" (1904)

मैथिलीशरण गुप्त

हिंदी

"भारत-भारती" (1912) — "राष्ट्रकवि"

प्रेमचंद

हिंदी-उर्दू

"सोज़े वतन" (1908) — सरकार ने ज़ब्त किया; "गोदान", "रंगभूमि" — किसान और आम जन

11. मूल्यांकन और अध्याय का कालक्रम

चित्र 5.5: आधुनिक शिक्षा और प्रेस के प्रमुख केंद्र
चित्र 5.5: आधुनिक शिक्षा और प्रेस के प्रमुख केंद्र

◆ शिक्षा और प्रेस का दोहरा चरित्र: अंग्रेज़ों ने इन्हें प्रशासन चलाने, वफ़ादार वर्ग बनाने और ब्रिटिश माल की माँग पैदा करने के लिए अपनाया; पर इन्हीं ने भारतीयों को आधुनिक विचार, संगठन और संवाद का साधन दिया।

◆ नए शिक्षित मध्यम वर्ग — वकील, शिक्षक, पत्रकार, डॉक्टर — ने धर्म-सुधार आंदोलनों, राजनीतिक संस्थाओं और 1885 की कांग्रेस का नेतृत्व किया। अख़बारों ने ब्रिटिश शासन के आर्थिक शोषण को उजागर किया और अखिल भारतीय जनमत बनाया।

◆ सीमाएँ: जनसाधारण, स्त्रियाँ और वंचित वर्ग लंबे समय तक इस जागरण से दूर रहे; इसी कमी को बाद में गांधी युग के जन-आंदोलनों और सामाजिक सुधारकों (फुले, अंबेडकर आदि) ने दूर करने का प्रयास किया।

कालक्रम

वर्ष

घटना

1556 / 1684

गोवा में पहला छापाखाना / बम्बई में कंपनी का छापाखाना

1780

हिक्की का "बंगाल गज़ट" (29 जनवरी) — भारत का पहला समाचार-पत्र

1781 / 1784

कलकत्ता मदरसा / एशियाटिक सोसाइटी ऑफ़ बंगाल

1791 / 1799 / 1800

बनारस संस्कृत कॉलेज / प्रेस सेंसरशिप अधिनियम / फ़ोर्ट विलियम कॉलेज; सेरामपुर छापाखाना

1813

चार्टर एक्ट: शिक्षा पर 1 लाख रुपये

1817 / 1818

हिंदू कॉलेज / दिग्दर्शन, समाचार दर्पण; सेरामपुर कॉलेज

1821 / 1822

संवाद कौमुदी / मिरात-उल-अख़बार; बॉम्बे समाचार

1823

जॉन एडम के अनुज्ञप्ति नियम; लोक शिक्षा समिति

1826

"उदंत मार्तंड" (30 मई) — पहला हिंदी समाचार-पत्र

1835

मैकॉले का विवरण-पत्र (2 फ़रवरी); बेंटिंक का प्रस्ताव (7 मार्च); मेटकाफ़ का प्रेस अधिनियम; कलकत्ता मेडिकल कॉलेज

1837 / 1844

फ़ारसी की जगह अंग्रेज़ी व स्थानीय भाषाएँ / हार्डिंग का नौकरी संबंधी प्रस्ताव

1847 / 1848 / 1849

रुड़की इंजीनियरिंग कॉलेज / फुले का बालिका विद्यालय / बेथ्यून स्कूल

1854 / 1857

वुड का नीतिपत्र / कलकत्ता, बम्बई, मद्रास विश्वविद्यालय; अनुज्ञप्ति अधिनियम

1867 / 1868

पुस्तक और प्रेस पंजीकरण अधिनियम / अमृत बाज़ार पत्रिका

1875

मेयो कॉलेज, अजमेर; एम.ए.ओ. स्कूल, अलीगढ़

1878 / 1882

देशी भाषा प्रेस अधिनियम; "द हिंदू" / हंटर आयोग; वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट रद्द; पंजाब विश्वविद्यालय

1881

"केसरी" और "मराठा"; "ट्रिब्यून"

1884–86

दक्कन एजुकेशन सोसाइटी; फ़र्ग्युसन कॉलेज; डी.ए.वी. कॉलेज

1901 / 1902 / 1904

शांतिनिकेतन / रैले आयोग; गुरुकुल कांगड़ी / भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम

1906

राष्ट्रीय शिक्षा परिषद; युगांतर; वंदे मातरम्

1908 / 1910

समाचार-पत्र अधिनियम; तिलक को 6 वर्ष की सज़ा / भारतीय प्रेस अधिनियम

1913

शिक्षा नीति प्रस्ताव; टैगोर को नोबेल पुरस्कार

1916

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय; भारतीय महिला विश्वविद्यालय

1917–19

सैडलर आयोग

1920–21

गुजरात विद्यापीठ, जामिया, काशी विद्यापीठ; अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय; विश्व-भारती

1921–22

सप्रू प्रेस समिति; 1908 व 1910 के प्रेस कानून रद्द

1929 / 1931

हार्टोग समिति / प्रेस (आपातकालीन शक्तियाँ) अधिनियम

1937 / 1944

वर्धा योजना / सार्जेंट योजना

💡 अंतिम बात

मैकॉले ने अंग्रेज़ी शिक्षा से "दुभाषियों का वर्ग" बनाना चाहा था; पर उसी शिक्षा से निकले राममोहन राय, दादाभाई नौरोजी, रानाडे, तिलक, गोखले, गांधी, नेहरू जैसे नेताओं ने अंग्रेज़ी राज को ही चुनौती दी। प्रेस उनकी आवाज़ बना और पुनर्जागरण उनकी प्रेरणा।

अगले अध्याय में हम देखेंगे कि जब शिक्षित वर्ग विचारों की लड़ाई लड़ रहा था, तब देश के किसान, आदिवासी और आम लोग ब्रिटिश शोषण के विरुद्ध हथियार उठाकर कैसे लड़ रहे थे।

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