🧵 कहानी से शुरुआत: जब करघे और चरखे ख़ामोश हो गए 1730 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने कलकत्ता के अपने प्रतिनिधियों को 5,89,000 थान कपड़े का ऑर्डर भेजा। इसमें सूती और रेशमी कपड़े की 98 किस्में थीं। बंगाल के बुनकर, कत्तिनें और रँगरेज़ कंपनी के लिए कपड़ा तैयार करते थे, और लाखों परिवारों की रोज़ी इसी काम से चलती थी। 1823 में, यानी सौ साल से भी कम समय बाद, कंपनी सरकार के पास 12,000 बुनकरों की एक अर्ज़ी पहुँची। उन्होंने लिखा कि उनके पुरखे और वे कंपनी से पेशगी लेकर बढ़िया कपड़े बुनते आए हैं, पर अब कंपनी के औरंग (गोदाम-कारख़ाने) बंद कर दिए गए हैं। वे बुनाई के सिवा कोई काम नहीं जानते। अगर उन्हें कपड़ों के ऑर्डर नहीं मिले, तो वे भूखों मर जाएँगे। 1828 में बंगाल की एक विधवा कत्तिन ने अख़बार "समाचार दर्पण" को चिट्ठी लिखी। उसने बताया कि कभी वह चरखा चलाकर इतना कमा लेती थी कि 28 रुपये जोड़कर अपनी बेटियों का ब्याह कर सकी। पर अब बुनकर उसका सूत ख़रीदने नहीं आते, और बाज़ार में उसे पहले का एक-चौथाई दाम भी नहीं मिलता, क्योंकि बाहर से विलायती सूत आने लगा है। जिस देश का कपड़ा कभी रोम से लेकर लंदन तक पहना जाता था, वहाँ के कारीगर सौ साल में भुखमरी के कगार पर कैसे पहुँचे? 1750 के आसपास दुनिया के हस्तनिर्मित माल का लगभग एक-चौथाई हिस्सा भारत में बनता था। 1900 तक यह घटकर 2% से भी कम रह गया। और यह कहानी केवल कारीगरों की नहीं थी। किसान अपनी ही ज़मीन पर कर्ज़दार कैसे बन गया? उसे अनाज की जगह नील और कपास क्यों उगानी पड़ी? और भारत का पैसा चुपचाप इंग्लैंड कैसे जाता रहा? यही इस अध्याय की कहानी है। आगे दो कहानियाँ भी मिलेंगी, जो ज़मींदारी की नीलामी के खेल और नील के किसानों की बग़ावत का सच आसान तरीक़े से समझा देंगी। |
◆ प्राचीन काल से भारत के दक्षिण-पूर्व एशिया, पश्चिम एशिया, पूर्वी अफ़्रीका और रोम से व्यापारिक संबंध थे। भारत से कपड़ा, मसाले, नील, अनाज, धातु का सामान, रेशम बाहर जाता था और बदले में सोना-चाँदी आता था।
◆ विदेशों में बनी चीज़ों की भारत में ख़ास माँग नहीं थी, इसलिए सोना-चाँदी आता ज़्यादा, जाता कम था। इसी कारण भारत को "सोने की चिड़िया" कहा गया।
◆ गाँव लगभग आत्मनिर्भर इकाई थे: किसान, बढ़ई, लुहार, कुम्हार, जुलाहे मिलकर गाँव की ज़रूरतें पूरी करते थे। राज्य को उपज का एक भाग लगान के रूप में मिलता था।
◆ शिल्प-केंद्र: ढाका की मलमल और जामदानी, मुर्शिदाबाद का रेशम, बनारस के रेशमी वस्त्र, मसूलीपट्टनम की छींट, सूरत, अहमदाबाद, पाटन की पटोला बुनाई, राजस्थान-गुजरात की बंधेज (बाँधनी) — ये विश्वप्रसिद्ध थे।
◆ एक अनुमान के अनुसार 1750 के आसपास विश्व के कुल औद्योगिक (हस्तनिर्मित) उत्पादन में भारत का हिस्सा लगभग एक-चौथाई था; 1900 तक यह घटकर 2% से भी कम रह गया। यही गिरावट इस अध्याय का केंद्रीय प्रश्न है।
◆ 15वीं–16वीं सदी: स्पेन ने अमेरिका से भारी मात्रा में सोना-चाँदी लूटा, जिससे यूरोप में भारतीय माल ख़रीदने लायक संपन्नता आई। वास्को डी गामा (1498) ने समुद्री मार्ग खोजा, फिर यूरोप की व्यापारिक कंपनियाँ आईं। पुर्तगालियों ने अरब सागर में नाके (चुंगी चौकियाँ) बनाकर जहाज़ों से चुंगी वसूली।
🔍 आसान परिभाषा: उपनिवेश (Colony) |
📘 परिभाषा: जब कोई शक्तिशाली देश किसी दूसरे देश पर राजनीतिक और आर्थिक अधिकार कर ले और उसे अपने लाभ के लिए चलाए, तो वह अधीन देश उपनिवेश कहलाता है। इस व्यवस्था को उपनिवेशवाद कहते हैं। |
💡 आसान भाषा में: "शासन भी उनका, फ़ायदा भी उनका" — उपनिवेश की अर्थव्यवस्था मालिक देश की ज़रूरतों के हिसाब से मोड़ी जाती है। 🏠 उदाहरण: अंग्रेज़ों के लिए भारत कच्चे माल (कपास, नील, जूट) का स्रोत, ब्रिटिश कारख़ानों के तैयार माल का बाज़ार और ब्रिटिश पूँजी के निवेश का क्षेत्र बन गया — यही एक उपनिवेश की पहचान है। |
◆ 1717 में मुग़ल सम्राट फ़र्रुख़सियर ने कंपनी को फ़रमान दिया: सालाना 3000 रुपये के बदले कंपनी बिना चुंगी बंगाल में व्यापार कर सकती थी। कंपनी को दस्तक (कर-मुक्त परमिट) जारी करने का अधिकार मिला, जिसका उसके कर्मचारियों ने निजी व्यापार में भारी दुरुपयोग किया।
◆ प्लासी (1757) के बाद कंपनी ने बंगाल में दहशत का राज फैलाया। उसके एजेंट (गुमाश्ते) कारीगरों को कच्चा माल ऊँचे दामों पर देते और तैयार माल एक-चौथाई से भी कम दाम पर ख़रीदते; मना करने वालों को कोड़े और क़ैद। 1762 में मीर क़ासिम ने कंपनी के गवर्नर को पत्र लिखकर इन अत्याचारों का विरोध किया।
◆ 1765 में दीवानी मिलने के बाद कंपनी को ब्रिटेन से सोना-चाँदी लाने की ज़रूरत नहीं रही; बंगाल के राजस्व से ही भारतीय माल ख़रीदकर यूरोप भेजा जाने लगा — इसे कंपनी "निवेश" (Investment) कहती थी। पाँच साल में कंपनी की ख़रीद का मूल्य दोगुना हो गया।
◆ परिणाम: कारीगर गाँव छोड़कर भागे, किसान लगान नहीं चुका पाए, खेती चौपट हुई। 1770 के अकाल में बंगाल के लगभग एक करोड़ लोग (लगभग एक-तिहाई आबादी) मारे गए।
❝ बीते दिनों में बंगाल के गाँव विभिन्न जातियों के लोगों से भरे थे और वाणिज्य, धन-संपदा और उद्योग के भंडार थे; लेकिन हमारे कुशासन ने बीस वर्षों में ही इन गाँवों के बहुत से हिस्सों को बंजर बना दिया है। खेतों में अब खेती नहीं होती, किसान लुट चुके हैं, कारीगरों का दमन हो चुका है। ❞ (कंपनी के एक अंग्रेज़ अधिकारी का कथन) |
तरीका | कैसे होता था शोषण |
1. सीधी लूटमार | कंपनी के एजेंट किसानों, व्यापारियों से ज़बरदस्ती एक-चौथाई क़ीमत देकर माल हड़पते और अपनी एक रुपये की चीज़ पाँच रुपये में बेचते; विरोध करने पर मारपीट और क़ैद। |
2. मालगुज़ारी (भू-राजस्व) | किसानों को लूटने का सबसे सीधा तरीका; मनमाने ढंग से ऊँचा लगान, सेना की मदद से वसूली। किसानों ने खेती छोड़ी, खेत उजड़े। |
3. एकतरफ़ा मुक्त व्यापार | इंग्लैंड में भारतीय सूती वस्त्रों पर भारी शुल्क (मलमल, सूती-रेशमी कपड़ों पर 70% से अधिक तक), पर ब्रिटिश माल भारत में लगभग बिना शुल्क। यानी "मुक्त व्यापार" केवल अंग्रेज़ों के लिए। |
4. संपत्ति (धन) का निकास | कर और मुनाफ़े से इकट्ठा धन इंग्लैंड भेजा जाता; भारत की संपत्ति का लाभ भारतीयों को नहीं मिलता। इसका सबसे पहले और सबसे तीखा विरोध दादाभाई नौरोजी ने किया। |
5. कानून बनाकर | 17वीं सदी के अंत में भारतीय कपड़ा इंग्लैंड में इतना लोकप्रिय हुआ कि वहाँ के उत्पादक डर गए; संसद ने 1700 और 1720 के कानूनों से कुछ ख़ास कपड़ों को छोड़कर भारतीय छपे कपड़ों के प्रयोग पर रोक लगा दी। |
6. उद्योग-विरोधी नीति | भारत में केवल वे उद्योग लगे जो भौगोलिक मजबूरी थे (जैसे जूट); बाग़ान उद्योग (चाय, कहवा, नील) बढ़ाए गए; खनिज निकालकर बाहर भेजे गए; सड़कें और रेलें बंदरगाहों तक कच्चा माल पहुँचाने के लिए बनीं। |
🚢 जानकारी भारत से व्यापार के लिए अंग्रेज़ बहुत बड़े जहाज़ इस्तेमाल करते थे, जिन्हें "ईस्ट इंडियामैन" कहा जाता था। 1780 के दशक से बम्बई और कलकत्ता नए व्यापारिक बंदरगाहों के रूप में उभरे, जबकि सूरत, मसूलीपट्टनम, हुगली जैसे पुराने बंदरगाहों का महत्व घटता गया। यह पुरानी व्यापार व्यवस्था के पतन और औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था के जन्म का समय था। |
इतिहासकार ब्रिटिश आर्थिक शोषण को तीन चरणों में बाँटते हैं। हर चरण में शोषण का तरीका बदला, पर उद्देश्य वही रहा: भारत की संपदा से ब्रिटेन को समृद्ध करना।

कंपनी की आय का सबसे बड़ा स्रोत भू-राजस्व था। दीवान बनने के बाद कंपनी भारी लगान तो चाहती थी, पर उसके आकलन और वसूली की नियमित व्यवस्था बनाने में हिचकती रही। कई प्रयोगों के बाद तीन प्रमुख व्यवस्थाएँ बनीं। नीचे का नक्शा देखें कि कौन-सी व्यवस्था कहाँ लागू हुई:

वर्ष | व्यवस्था |
1765–72 | द्वैध शासन: राजस्व वसूली भारतीय नायब दीवानों (मुहम्मद रज़ा ख़ाँ — बंगाल, शिताब राय — बिहार) के हाथ; भ्रष्टाचार और 1770 का अकाल। |
1772 | वारेन हेस्टिंग्स: द्वैध शासन समाप्त; राजस्व वसूली के लिए ज़िले में कलेक्टर; सबसे ऊँची बोली लगाने वाले को 5 वर्ष के ठेके (इजारेदारी) पर राजस्व वसूली; राजस्व बोर्ड। |
1777 | पंचवर्षीय ठेके विफल; एक-वर्षीय ठेके — किसान और अधिक लुटे। |
1786–93 | कॉर्नवालिस; जॉन शोर की सलाह पर पहले दस-वर्षीय (दहसाला) बंदोबस्त (1789–90), जिसे 1793 में स्थायी घोषित कर दिया गया। |
📖 कहानी 1: जब सूरज डूबते ही ज़मींदारी डूब जाती थी 22 मार्च 1793 को लॉर्ड कॉर्नवालिस ने बंगाल, बिहार और उड़ीसा में स्थायी बंदोबस्त लागू किया। ज़मींदार को ज़मीन का वंशानुगत स्वामी माना गया और कंपनी को दी जाने वाली राशि हमेशा के लिए तय कर दी गई। पर एक कठोर शर्त भी थी, जिसे सूर्यास्त नियम कहा गया। तय तारीख़ को सूरज डूबने तक राशि जमा न हुई तो ज़मींदारी नीलाम हो सकती थी। यह शर्त बहुत भारी निकली। शुरुआती माँग ऊँची रखी गई थी और 1790 के दशक में फ़सलों के दाम नीचे थे। किसान ज़मींदार को पूरा लगान नहीं दे पाते थे, तो ज़मींदार कंपनी को कैसे देता? 1798 में अकेले बर्दवान ज़िले में बकाया राजस्व के 30,000 से अधिक मुक़दमे लंबित थे। 1797 में बर्दवान के राजा पर भारी बकाया होने से उनके कई महाल नीलाम होने लगे। पर कलेक्टर ने पाया कि ख़रीदार ज़्यादातर राजा के अपने नौकर या एजेंट थे, और 95% से अधिक बिक्री फ़र्ज़ी थी। राजा ने ज़मींदारी का कुछ हिस्सा अपनी माँ के नाम कर दिया, क्योंकि कंपनी स्त्रियों की संपत्ति नहीं छीनती थी। एजेंट ऊँची बोली लगाकर ज़मीन ख़रीदते और पैसा नहीं चुकाते, फिर नीलामी होती। अंत में ज़मीन कम कीमत पर फिर राजा को ही मिल जाती। ऐसे सौदों को बेनामी कहा गया। पर हर ज़मींदार इतना चालाक नहीं था। स्थायी बंदोबस्त के बाद 75% से अधिक ज़मींदारियाँ दूसरे हाथों में चली गईं और उनकी जगह कलकत्ता के व्यापारी और साहूकार नए ज़मींदार बने। कंपनी को पक्की आय मिली, पर बीच की इस खींचतान में सबसे ज़्यादा किसान पिसा। 🧭 इस कहानी से कौन-सी अवधारणा साफ़ हुई ✔ सूर्यास्त नियम — तय तारीख़ को सूरज डूबने तक राजस्व जमा न होने पर ज़मींदारी नीलाम की जा सकती थी। ✔ बेनामी सौदे — पुराने ज़मींदार अपने ही एजेंटों के नाम से नीलामी में बोली लगाकर अपनी ज़मींदारी बचा लेते थे। ✔ किसान की बदहाली — ऊँचा लगान, असुरक्षित अधिकार और साहूकारों का कर्ज़। राजस्व तय हो जाने से कंपनी को आगे बढ़ती आय का लाभ भी नहीं मिला। 📝 परीक्षा के लिए: स्थायी बंदोबस्त: 22 मार्च 1793, कॉर्नवालिस, बंगाल–बिहार–उड़ीसा; विचारक जॉन शोर; सरकार 10/11, ज़मींदार 1/11; सूर्यास्त नियम; बर्दवान की नीलामी 1797 (बेनामी सौदे)। |
22 मार्च 1793 को लॉर्ड कॉर्नवालिस ने बंगाल, बिहार और उड़ीसा में यह व्यवस्था लागू की; बाद में बनारस और उत्तरी मद्रास में भी। इसके मुख्य विचारक जॉन शोर थे।
1. बंगाल के राजाओं और तालुकदारों को ज़मींदार के रूप में मान्यता दी गई और उन्हें ज़मीन का वंशानुगत स्वामी माना गया; वे ज़मीन बेच या गिरवी रख सकते थे।
2. ज़मींदार की ओर से कंपनी को दी जाने वाली राशि हमेशा के लिए स्थिर कर दी गई, यानी भविष्य में उसमें कभी वृद्धि नहीं होगी। वसूले गए लगान का लगभग 10/11 भाग सरकार का और 1/11 भाग ज़मींदार का।
3. एक ज़मींदार के अधीन कई बार 400 तक गाँव होते थे; कंपनी पूरी ज़मींदारी (राजस्व संपदा) पर कुल माँग तय करती, फिर ज़मींदार तय करता कि किस गाँव से कितना लेना है।
4. सूर्यास्त नियम: तय तिथि को सूरज डूबने तक राजस्व जमा न होने पर ज़मींदारी नीलाम की जा सकती थी।
5. ज़मींदारों की सैनिक टुकड़ियाँ भंग, उनके सीमा शुल्क समाप्त, उनकी कचहरियाँ कलेक्टर की देखरेख में; उनसे स्थानीय न्याय और पुलिस की शक्ति छीन ली गई।
◆ कंपनी को नियमित और निश्चित आय मिलेगी; हर साल आकलन का झंझट और ख़र्च बचेगा।
◆ राजस्व स्थिर होने से ज़मींदार खेती में सुधार और निवेश करेंगे, क्योंकि बढ़ी हुई उपज का लाभ उन्हीं का होगा; इससे खेती, व्यापार और राज्य के संसाधन बढ़ेंगे। अंग्रेज़ों को आशा थी कि इंग्लैंड की तरह "सुधारक ज़मींदारों" और उद्यमी किसानों का वर्ग बनेगा।
◆ ऐसा वर्ग बनेगा जो अपने लाभ के कारण कंपनी का वफ़ादार रहेगा — राजनीतिक समर्थन का आधार।
1. शुरुआती माँग बहुत ऊँची रखी गई, क्योंकि कंपनी जानती थी कि आगे कीमतें और खेती बढ़ने पर भी वह हिस्सा नहीं माँग सकेगी।
2. यह ऊँची माँग 1790 के दशक में लागू हुई, जब कृषि उपज की कीमतें नीची थीं; किसान ज़मींदार को नहीं दे पाते थे तो ज़मींदार कंपनी को कैसे देता?
3. राजस्व असमान था: फ़सल अच्छी हो या ख़राब, सूर्यास्त नियम के अनुसार समय पर भुगतान ज़रूरी।
4. ज़मींदार की शक्ति सीमित कर दी गई थी; धनी रैयत और गाँव के मुखिया (जोतदार, मंडल) जान-बूझकर भुगतान में देरी कराते। 1798 में अकेले बर्दवान ज़िले में बकाया राजस्व के 30,000 से अधिक मुक़दमे लंबित थे।
🔨 बर्दवान की नीलामी (1797) — एक सच्ची घटना 1797 में बर्दवान के राजा पर भारी बकाया होने से उसके कई महाल (भू-संपदाएँ) नीलाम हुए। पर कलेक्टर ने पाया कि ख़रीदार ज़्यादातर राजा के अपने नौकर या एजेंट थे; नीलामी की 95% से अधिक बिक्री फ़र्ज़ी थी! चालें: राजा ने ज़मींदारी का कुछ हिस्सा अपनी माँ के नाम कर दिया (क्योंकि कंपनी स्त्रियों की संपत्ति नहीं छीनती थी); एजेंट ऊँची बोली लगाकर ख़रीदते, फिर पैसा नहीं चुकाते, दोबारा नीलामी होती… अंत में कोई बोली लगाने वाला न बचता और ज़मीन कम कीमत पर फिर राजा को मिल जाती। ऐसे सौदों को "बेनामी" कहते हैं। 1793–1801 के बीच बंगाल की चार बड़ी ज़मींदारियों ने ऐसी बेनामी ख़रीद से लगभग 30 लाख रुपये के सौदे किए; कुल नीलामियों में लगभग 15% सौदे नक़ली थे। बाहरी ख़रीदार आता तो पुराने ज़मींदार के लठियाल (लाठी वाले) उसे भगा देते। |
◆ ज़मींदारियों की नीलामी: स्थायी बंदोबस्त के बाद 75% से अधिक ज़मींदारियाँ हस्तांतरित हुईं; नदिया, राजशाही, विष्णुपुर जैसे पुराने राजघराने बर्बाद हुए। उनकी जगह कलकत्ता के व्यापारी और साहूकार नए ज़मींदार बने।
◆ अनुपस्थित ज़मींदारी: नए ज़मींदार शहरों में रहते, खेती में निवेश नहीं करते; ज़मीन पट्टे पर देकर किराये पर जीते। उनके और किसान के बीच कई बिचौलिये (पत्तनीदार आदि) खड़े हो गए — उप-सामंतीकरण।
◆ किसान की बदहाली: किसान पर लगान बहुत ऊँचा, ज़मीन पर उसका अधिकार असुरक्षित; लगान चुकाने के लिए महाजन से कर्ज़, न चुकाने पर पुश्तैनी ज़मीन से बेदख़ल।
◆ कंपनी को भी घाटा: 19वीं सदी की शुरुआत में कीमतें बढ़ीं और खेती फैली; ज़मींदारों की आय बढ़ी, पर कंपनी की नहीं, क्योंकि राजस्व हमेशा के लिए तय था। इसलिए बाद में अंग्रेज़ों ने बंगाल के बाहर यह व्यवस्था लगभग नहीं अपनाई।
◆ जोतदारों का उदय: उत्तरी बंगाल (दिनाजपुर) में धनी किसान जोतदार हज़ारों एकड़ ज़मीन, स्थानीय व्यापार और साहूकारी पर क़ाबिज़ हुए; उनकी ज़मीन बटाईदार (अधियार, बरगादार) उपज के आधे हिस्से पर जोतते। वे ज़मींदार के विरोध में रैयतों को भड़काते और नीलामी में ज़मीनें ख़रीदते। कहीं इन्हें "हवलदार", कहीं "गाँटीदार" या "मंडल" कहा गया। 1930 के दशक की महामंदी में ज़मींदार कमज़ोर पड़े और जोतदार और मज़बूत हुए।
❝ बटाई की भारी शर्तों और मवेशियों, बीज, आजीविका व कर्ज़ों के बदले बेगारी से दबे ये काश्तकार ख़ुद को कर्ज़ से कभी बाहर नहीं निकाल सकते। जब उन्हें जीने को भी पूरा नहीं मिलता, तो वे दिल लगाकर काम कैसे करें? ❞ (एच. टी. कोलब्रुक, बंगाल के उप-पट्टेदार काश्तकारों की दशा पर (बंगाल में कई ताक़तवर रैयत ख़ुद खेती न कर ज़मीन पट्टे पर देकर भारी लगान वसूलते थे)) |
◆ राजनीतिक परिणाम: ज़मींदार वर्ग अंग्रेज़ों का वफ़ादार बना (जैसे बर्दवान के महाराजा मेहताब चंद ने संथाल विद्रोह और 1857 में अंग्रेज़ों का साथ दिया)।

🔍 आसान परिभाषा: सूर्यास्त नियम (Sunset Law) |
📘 परिभाषा: स्थायी बंदोबस्त का वह नियम जिसके अनुसार तय तिथि को सूर्यास्त तक राजस्व न चुकाने पर ज़मींदार की ज़मींदारी नीलाम की जा सकती थी। |
💡 आसान भाषा में: "शाम तक पैसा नहीं, तो ज़मींदारी नहीं" — फ़सल ख़राब हो या अकाल, छूट नहीं। 🏠 उदाहरण: इसी नियम के कारण 1793 के बाद के कुछ ही वर्षों में बंगाल की बड़ी-बड़ी ज़मींदारियाँ नीलाम हुईं और बर्दवान के राजा जैसे ज़मींदारों को बेनामी ख़रीद जैसी चालें चलनी पड़ीं। |
📄 पाँचवीं रिपोर्ट (1813) कंपनी के प्रशासन पर ब्रिटिश संसद में 1813 में पेश की गई पाँचवीं रिपोर्ट 1,002 पृष्ठों की थी, जिनमें 800 से अधिक पृष्ठ परिशिष्ट (ज़मींदारों-रैयतों की अर्ज़ियाँ, कलेक्टरों की रिपोर्टें, राजस्व तालिकाएँ) थे। ब्रिटेन में कंपनी के एकाधिकार के विरोधी व्यापारी और उद्योगपति इस पर बहस कर रहे थे; इसी का परिणाम 1813 का चार्टर एक्ट था (एकाधिकार समाप्त)। पर रिपोर्ट लिखने वाले कंपनी के कुप्रशासन की आलोचना पर तुले थे, इसलिए इसमें ज़मींदारों के पतन का वर्णन बढ़ा-चढ़ाकर किया गया; सरकारी रिपोर्टों को सावधानी से पढ़ना चाहिए। |
◆ शुरुआत: टीपू सुल्तान से युद्धों के बाद मिले बारामहल क्षेत्र में कैप्टन अलेक्ज़ेंडर रीड ने 1792 में इसका प्रयोग किया। टॉमस मुनरो (मद्रास के गवर्नर, 1819–26) ने इसे विकसित किया और 1820 से धीरे-धीरे पूरे दक्षिण भारत पर लागू किया।
◆ तर्क: रीड और मुनरो का मानना था कि दक्षिण में परंपरागत ज़मींदार नहीं थे, इसलिए बंदोबस्त सीधे किसानों (रैयतों) से होना चाहिए, जो पीढ़ियों से खेती करते आ रहे हैं। मुनरो कहते थे कि अंग्रेज़ों को पिता की भाँति किसानों की रक्षा करनी चाहिए।
◆ बम्बई दक्कन: एल्फ़िंस्टन (1818–27) के समय; पहला बंदोबस्त 1818–1820 के दशक में; बाद में प्रिंगल का सर्वेक्षण और 1835 से विंगेट और गोल्डस्मिड का सुधरा हुआ बंदोबस्त। असम, कुर्ग आदि में भी यही व्यवस्था।
◆ रिकार्डो का लगान सिद्धांत: 1820 के दशक में इंग्लैंड के अर्थशास्त्री डेविड रिकार्डो के विचार अंग्रेज़ अफ़सरों पर हावी थे: भूस्वामी को केवल "औसत लगान" का हक़ है; उससे अधिक आय (अधिशेष) पर राज्य को कर लगाना चाहिए, वरना किसान "किरायाजीवी" बन जाएँगे। अफ़सरों ने माना कि बंगाल के ज़मींदार यही बन गए थे, इसलिए नई व्यवस्था चाहिए।
1. राजस्व सीधे रैयत से तय; रैयत को ज़मीन का स्वामी माना गया (जब तक वह राजस्व चुकाता रहे)।
2. खेतों का अलग-अलग, सावधानीपूर्वक सर्वेक्षण; भूमि के प्रकार से औसत आय का अनुमान और रैयत की क्षमता के अनुसार सरकार का हिस्सा तय (मद्रास में आरंभ में उपज का 45–55% तक)।
3. राजस्व स्थायी नहीं; लगभग हर 30 वर्ष में ज़मीनों का पुनः सर्वेक्षण और राजस्व में वृद्धि।
◆ राजस्व अधिकारियों ने आय बढ़ाने के चक्कर में बहुत ज़्यादा राजस्व तय किया; किसान चुका नहीं पाए, रैयत गाँव छोड़कर भागे, कई क्षेत्रों में गाँव वीरान हो गए। आशावादी अफ़सरों की उम्मीद थी कि किसान संपन्न उद्यमी बनेंगे, पर ऐसा नहीं हुआ।
◆ सरकार ही "बड़ा ज़मींदार" बन गई; राजस्व न चुकाने पर फ़सल ज़ब्त और पूरे गाँव पर जुर्माना; कलेक्टर अपनी कुशलता दिखाने के लिए कठोरता से वसूली करते।
◆ किसान साहूकारों पर निर्भर हुए; ज़मीन धीरे-धीरे साहूकारों के हाथ गई (आगे दक्कन का कर्ज़-जाल देखें)। मद्रास में राजस्व वसूली के लिए यातना के मामलों की जाँच हेतु 1854 का यातना आयोग बना।
◆ बंगाल प्रेसीडेंसी के उत्तर-पश्चिमी प्रांतों (अधिकांश आज के उत्तर प्रदेश में) के लिए होल्ट मैकेंज़ी ने नई व्यवस्था बनाई, जो 1822 (रेग्युलेशन सात) में लागू हुई। मैकेंज़ी मानते थे कि उत्तर भारत में गाँव एक महत्वपूर्ण सामाजिक संस्था है और उसे बचाए रखना चाहिए।
◆ कलेक्टरों ने गाँव-गाँव जाकर ज़मीन की जाँच की, खेत मापे, विभिन्न समूहों के रीति-रिवाज दर्ज किए। हर खेत के अनुमानित राजस्व को जोड़कर हर गाँव या गाँवों के समूह (महाल) का राजस्व तय हुआ।
◆ राजस्व स्थायी नहीं, समय-समय पर संशोधन की गुंजाइश। वसूली और कंपनी को भुगतान का ज़िम्मा ज़मींदार के बजाय गाँव के मुखिया (लंबरदार) पर।
◆ 1833 (बेंटिंक काल, रेग्युलेशन नौ) में रॉबर्ट मर्टिन्स बर्ड और जेम्स टॉमसन ने इसे सरल किया: खेतों का सर्वेक्षण, नक़्शे, अधिकारों का रिकॉर्ड, 30 वर्ष का बंदोबस्त; राजस्व लगभग दो-तिहाई (किराये का 66%), जो 1855 में घटाकर 50% किया गया। पंजाब में इसका बदला हुआ रूप "ग्राम व्यवस्था" और मध्य प्रांत में भी लागू।
◆ परिणाम: ऊँचे राजस्व से ज़मीनें साहूकारों और व्यापारियों के हाथ गईं; पुराने ताल्लुकदार और ग्राम-समुदाय कमज़ोर हुए; यही असंतोष 1857 में उत्तर भारत के किसानों की भागीदारी का कारण बना।
🔍 आसान परिभाषा: महाल |
📘 परिभाषा: ब्रिटिश राजस्व दस्तावेज़ों में राजस्व की एक इकाई — एक गाँव या गाँवों का एक समूह। |
💡 आसान भाषा में: राजस्व व्यक्ति से नहीं, पूरे महाल से तय होता था; इसीलिए व्यवस्था का नाम महालवाड़ी। 🏠 उदाहरण: यदि किसी महाल के 50 खेतों का अनुमानित राजस्व जोड़कर 5000 रुपये तय हुआ, तो गाँव का मुखिया (लंबरदार) सबसे वसूलकर यह राशि सरकार को देता; कोई किसान न चुकाए तो पूरा महाल ज़िम्मेदार। |

⚖️ तीनों व्यवस्थाओं का सार तीनों का साझा उद्देश्य अधिकतम राजस्व था, खेती का सुधार नहीं। तीनों ने ज़मीन को ख़रीदी-बेची जाने वाली वस्तु बना दिया, जिससे ज़मीन साहूकारों, व्यापारियों और अनुपस्थित भूस्वामियों के हाथ गई। परिणाम: किसानों की ऋणग्रस्तता, भूमिहीन खेतिहर मज़दूरों की संख्या में वृद्धि, खेती में निवेश का अभाव, और बार-बार अकाल। यही असंतोष आगे नील विद्रोह, दक्कन विद्रोह, पाबना आंदोलन आदि किसान आंदोलनों (अध्याय 6) का आधार बना। |
अंग्रेज़ों ने महसूस किया कि ग्रामीण इलाक़े केवल राजस्व ही नहीं दे सकते, बल्कि वहाँ यूरोप की ज़रूरतों के हिसाब से फ़सलें भी उगवाई जा सकती हैं। 18वीं सदी के अंत तक कंपनी ने अफ़ीम और नील पर ज़ोर दिया; फिर लगभग 150 साल तक अंग्रेज़ किसानों को अलग-अलग फ़सलों के लिए मजबूर करते रहे: बंगाल में पटसन (जूट), असम में चाय, संयुक्त प्रांत में गन्ना, पंजाब में गेहूँ, महाराष्ट्र और पंजाब में कपास, मद्रास में चावल।

🔍 आसान परिभाषा: कृषि का वाणिज्यीकरण (Commercialisation of Agriculture) |
📘 परिभाषा: खेती का उद्देश्य अपने परिवार और गाँव के खाने के बजाय बाज़ार में बेचने (विशेषकर निर्यात) के लिए फ़सलें उगाना। |
💡 आसान भाषा में: "पेट के लिए नहीं, बाज़ार के लिए खेती" — अनाज की जगह नील, कपास, जूट, अफ़ीम, चाय। 🏠 उदाहरण: दक्कन का किसान 1861–65 में अपने खेत में ज्वार की जगह कपास उगाने लगा, क्योंकि लंकाशायर को कपास चाहिए थी; जब कीमतें गिरीं तो उसके पास न अनाज था, न पैसा। भारत में यह वाणिज्यीकरण ज़बरदस्ती और कर्ज़ के सहारे हुआ, किसान की समृद्धि के लिए नहीं। |
🔎 वाणिज्यीकरण के कारण ✔ नक़द में ऊँचा भू-राजस्व चुकाने की मजबूरी ✔ ब्रिटिश उद्योगों को कच्चे माल की ज़रूरत ✔ रेलवे और बंदरगाहों से देश का विश्व बाज़ार से जुड़ना ✔ साहूकारों और व्यापारियों के अग्रिम (पेशगी) कर्ज़ ✔ बाग़ान मालिकों की ज़बरदस्ती | ⚠️ परिणाम ✔ खाद्यान्न का क्षेत्र घटा, अकाल की मार बढ़ी ✔ किसान विश्व बाज़ार के उतार-चढ़ाव पर निर्भर ✔ लाभ व्यापारियों-साहूकारों को, किसान कर्ज़ में ✔ गाँवों की आत्मनिर्भरता टूटी ✔ ग्रामीण समाज में असमानता बढ़ी |
◆ नील का पौधा मुख्यतः उष्णकटिबंधीय इलाक़ों में उगता है। 13वीं सदी तक इटली, फ़्रांस, ब्रिटेन के कपड़ा उत्पादक भारतीय नील का इस्तेमाल करते थे, पर वह कम मात्रा में और बहुत महँगा पहुँचता था।
◆ इसलिए यूरोप "वोड" नाम के पौधे पर निर्भर था, जो शीतोष्ण क्षेत्र में उगता था; पर उसका रंग बेजान और फीका था, जबकि नील से चमकदार नीला रंग मिलता था। वोड उत्पादकों के दबाव में यूरोपीय सरकारों ने नील के आयात पर पाबंदी लगाई, जो 17वीं सदी तक ढीली हुई।
◆ फ़्रांसीसियों ने सेंट डॉमिंग्यू (कैरिबियन), पुर्तगालियों ने ब्राज़ील, अंग्रेज़ों ने जमैका, स्पेनियों ने वेनेज़ुएला में नील उगाया। पर 18वीं सदी के अंत में ब्रिटेन में औद्योगीकरण से कपड़ा उत्पादन और रँगाई की माँग बहुत बढ़ी, जबकि 1791 में सेंट डॉमिंग्यू में अफ़्रीकी दासों के विद्रोह और अमेरिका की घटनाओं से आपूर्ति ठप हो गई; 1783–1789 के बीच दुनिया का नील उत्पादन आधा रह गया।
◆ परिणाम: बंगाल में नील की खेती तेज़ी से फैली। ब्रिटेन के नील आयात में भारत का हिस्सा 1788 में लगभग 30% से बढ़कर 1810 में 95% हो गया। कंपनी के अफ़सर नौकरी छोड़कर नील के कारोबार में लगे; स्कॉटलैंड-इंग्लैंड से लोग आकर बाग़ान मालिक (प्लांटर) बने; कंपनी और नए बैंक उन्हें कर्ज़ देते।
पहलू | निज खेती | रैयती खेती |
अर्थ | बाग़ान मालिक अपनी (ख़रीदी या पट्टे पर ली) ज़मीन पर मज़दूरों से नील उगवाता | बाग़ान मालिक रैयतों से अनुबंध (सट्टा) करता; रैयत अपनी ज़मीन पर नील उगाता |
कठिनाइयाँ / शर्तें | नील केवल उपजाऊ ज़मीन पर होता, जहाँ आबादी पहले से घनी; बड़े भूखंड मिलना कठिन; किसानों को हटाने से टकराव। मज़दूरों की ज़रूरत ठीक धान की खेती के समय। एक बीघा के लिए दो हल; 1000 बीघा = 2000 हल! | अनुबंध पर कम ब्याज पर नक़द कर्ज़; बदले में कम से कम 25% ज़मीन पर नील। बीज-उपकरण बाग़ान मालिक देता; बाक़ी मेहनत रैयत की। फ़सल सौंपने पर नया कर्ज़ — कभी न ख़त्म होने वाला चक्र; दाम बहुत कम। |
हिस्सा | नील वाली ज़मीन का 25% से भी कम | बाक़ी 75% से अधिक |
◆ बाग़ान मालिक चाहते थे कि नील सबसे बढ़िया खेतों में बोई जाए; पर नील की जड़ें गहरी होती हैं और वह मिट्टी की सारी ताक़त खींच लेती है, जिससे उसके बाद धान नहीं उगता।
🔍 आसान परिभाषा: बीघा और बाग़ान |
📘 परिभाषा: बीघा = ज़मीन की माप; अंग्रेज़ों से पहले इसका आकार अलग-अलग था, बंगाल में अंग्रेज़ों ने इसे लगभग एक-तिहाई एकड़ तय किया। बाग़ान (प्लांटेशन) = एक विशाल खेत जिस पर मालिक बहुत से लोगों से (प्रायः ज़बरदस्ती) काम कराता है। |
💡 आसान भाषा में: बाग़ान = "एक फ़सल का बड़ा कारख़ाना-नुमा खेत", जैसे चाय, कॉफ़ी, गन्ना, तंबाकू, कपास, नील। 🏠 उदाहरण: असम के चाय बाग़ानों में मज़दूर अनुबंध से बँधे होते थे; अनुबंध तोड़ने पर उन्हें सज़ा मिलती थी — लगभग दासता जैसी हालत। नील के रैयत भी कर्ज़ के अनुबंध से बँधे थे। |

📖 कहानी 2: भीख माँग लूँगा, पर नील नहीं उगाऊँगा नील की खेती रैयत के लिए घाटे का सौदा थी। बाग़ान मालिक अनुबंध (सट्टा) के साथ थोड़ा-सा कर्ज़ देता, और बदले में रैयत को अपनी कम से कम चौथाई ज़मीन पर नील बोनी पड़ती। फ़सल सौंपते ही नया कर्ज़ थमा दिया जाता, इसलिए यह चक्र कभी ख़त्म नहीं होता था। नील की जड़ें मिट्टी की सारी ताक़त खींच लेती थीं, और उस खेत में फिर धान नहीं उगता था। मार्च 1859 में बंगाल के हज़ारों रैयतों ने नील उगाने से इनकार कर दिया और लगान देना भी बंद कर दिया। कई जगह वे तलवार, भाले और तीर-कमान लेकर नील कारख़ानों तक पहुँचे, और औरतें बर्तन लेकर इस लड़ाई में कूद पड़ीं। बाग़ान मालिकों के गुमाश्तों की पिटाई हुई, उनके लिए काम करने वालों का सामाजिक बहिष्कार हुआ, और रैयतों ने लठियालों से न डरने की क़सम खाई। इस बग़ावत को एक अफ़वाह से भी बल मिला। मजिस्ट्रेट ऐशले ईडन के नोटिस में कहा गया था कि रैयतों को नील के अनुबंध मानने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा। लोगों ने समझा कि स्वयं रानी विक्टोरिया ने नील न उगाने का हुक्म दे दिया है। कलकत्ता के शिक्षित लोगों ने भी रैयतों के पक्ष में लिखा। सरकार को 1860 में नील आयोग बनाना पड़ा। उसके सामने नील काश्तकार हाजी मुल्ला ने कहा कि वे नील उगाने को तैयार नहीं हैं और भीख माँग लेंगे, पर नील नहीं उगाएँगे। आयोग ने बाग़ान मालिकों को दोषी पाया, और बंगाल में नील का उत्पादन धराशायी हो गया। बाग़ान मालिक बिहार चले गए। वही बिहार, जहाँ 1917 में चंपारण के किसानों के बुलावे पर गांधीजी पहुँचे। 🧭 इस कहानी से कौन-सी अवधारणा साफ़ हुई ✔ कृषि का वाणिज्यीकरण — किसान को अपनी पसंद की नहीं, बाज़ार और बाग़ान मालिक की माँग की फ़सल बोनी पड़ती थी, और कर्ज़ उसे उसी से बाँधे रखता था। ✔ किसान आंदोलन की ताक़त — एकजुट इनकार, सामाजिक बहिष्कार, ज़मींदारों-मुखियाओं का समर्थन और शिक्षित वर्ग की कलम ने मिलकर बाग़ान मालिकों को झुकाया। ✔ परिणाम — नील आयोग (1860) ने बाग़ान मालिकों को दोषी माना, और आगे चलकर यही नील का मुद्दा चंपारण सत्याग्रह (1917) तक पहुँचा। 📝 परीक्षा के लिए: नील विद्रोह (मार्च 1859, बंगाल) → ऐशले ईडन का नोटिस → नील आयोग (1860, अध्यक्ष सीटन कार) → बाग़ान मालिक बिहार चले गए → चंपारण सत्याग्रह (1917); रैयती खेती में कम से कम 25% ज़मीन पर नील। |
◆ मार्च 1859 में बंगाल के हज़ारों रैयतों ने नील उगाने से इनकार कर दिया; लगान देना भी बंद किया; तलवार, भाले, तीर-कमान लेकर नील कारख़ानों पर हमले किए; औरतें बर्तन लेकर कूद पड़ीं। बाग़ान मालिकों के गुमाश्तों की पिटाई हुई, उनके लिए काम करने वालों का सामाजिक बहिष्कार हुआ; रैयतों ने लठियालों से न डरने की क़सम खाई।
◆ शक्ति कहाँ से मिली? स्थानीय ज़मींदारों और मुखियाओं का समर्थन (वे बाग़ान मालिकों की बढ़ती ताक़त से परेशान थे); 1857 के बाद सरकार के डर से किसानों को लगा कि सरकार साथ देगी। मजिस्ट्रेट ऐशले ईडन के नोटिस (रैयतों को नील के अनुबंध मानने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा) से अफ़वाह फैली कि रानी विक्टोरिया ने नील न उगाने का हुक्म दिया है। कलकत्ता के शिक्षित लोगों ने भी रैयतों के पक्ष में लिखा।
◆ नील आयोग (1860) (अध्यक्ष डब्ल्यू. एस. सीटन कार) ने बाग़ान मालिकों को दोषी पाया: नील की खेती रैयतों के लिए फ़ायदे का सौदा नहीं; मौजूदा अनुबंध पूरे करें, पर आगे चाहें तो नील बंद कर सकते हैं। इसके बाद बंगाल में नील उत्पादन धराशायी हो गया; बाग़ान मालिक बिहार चले गए।
◆ 19वीं सदी के अंत में कृत्रिम (रासायनिक) रंगों की खोज से नील का व्यवसाय और गिरा। बिहार के चंपारण में नील किसानों के बुलावे पर 1917 में महात्मा गांधी पहुँचे — चंपारण सत्याग्रह (विस्तार आगे के अध्यायों में)।
❝ मैं नील उगाने को तैयार नहीं हूँ… नील उगाने के बजाय मैं कहीं और चला जाऊँगा। भीख माँग लूँगा, परंतु नील नहीं उगाऊँगा। ❞ (हाजी मुल्ला, नील काश्तकार, नील आयोग के सामने गवाही (5 जून 1860)) |
फ़सल | मुख्य तथ्य |
अफ़ीम | 1773 में वारेन हेस्टिंग्स ने बंगाल-बिहार में अफ़ीम पर कंपनी का एकाधिकार किया; किसानों को पेशगी देकर अफ़ीम उगवाई जाती, कीमत कंपनी तय करती। अफ़ीम चीन को (तस्करी से) बेचकर उसी पैसे से चीनी चाय ख़रीदी जाती — त्रिकोणीय व्यापार; इसी से अफ़ीम युद्ध (1839–42, 1856–60) हुए। मालवा (और राजस्थान के मेवाड़, कोटा आदि) की अफ़ीम पर अंग्रेज़ बम्बई से निर्यात पर "पास शुल्क" लेते थे। अफ़ीम से मिलने वाली आय ब्रिटिश भारत की आय का एक बड़ा स्रोत रही। |
चाय | असम में जंगली चाय की खोज (1820 का दशक); 1839 में असम कंपनी; बाद में दार्जिलिंग, नीलगिरि। बाग़ानों पर अंग्रेज़ों का एकाधिकार; छोटानागपुर आदि से लाए गए मज़दूर अनुबंध (गिरमिट) से बँधे; अनुबंध तोड़ना अपराध (1859 का कानून) — कठोर शोषण। |
कहवा (कॉफ़ी) | दक्षिण भारत (मैसूर, कुर्ग, नीलगिरि) में अंग्रेज़ बाग़ान मालिक। |
पटसन (जूट) | बंगाल में; कच्चा जूट डंडी (स्कॉटलैंड) की मिलों को; 1855 के बाद कलकत्ता के पास जूट मिलें। |
कपास | बम्बई दक्कन, बरार, गुजरात और पंजाब; लंकाशायर की मिलों के लिए; 1861–65 में ज़बरदस्त उछाल। |
गेहूँ, गन्ना, चावल | पंजाब की नहर बस्तियों में निर्यात के लिए गेहूँ; संयुक्त प्रांत में गन्ना; मद्रास के डेल्टा में चावल। |
◆ 1860 से पहले ब्रिटेन अपनी कच्ची कपास का लगभग तीन-चौथाई अमेरिका से मँगाता था और इस निर्भरता से डरता था। 1857 में ब्रिटेन में कपास आपूर्ति संघ और 1859 में मैनचेस्टर कॉटन कंपनी बनी — उद्देश्य: दुनिया के हर भाग में कपास को बढ़ावा देना। भारत की ज़मीन, जलवायु और सस्ता श्रम इसके लिए उपयुक्त माने गए।
◆ 1861 में अमेरिकी गृहयुद्ध छिड़ा; अमेरिका से कपास का आयात 1861 में 20 लाख गाँठों (हर गाँठ 400 पाउंड) से घटकर 1862 में केवल 55 हज़ार गाँठ रह गया — सामान्य का 3% से भी कम।
◆ बम्बई के निर्यातकों ने शहरी साहूकारों को, और उन्होंने ग्रामीण ऋणदाताओं को भारी अग्रिम दिए; दक्कन के रैयतों को प्रति एकड़ 100 रुपये अग्रिम मिलने लगे। 1860–64 में कपास का रकबा दोगुना; 1862 तक ब्रिटेन के कपास आयात का 90% भारत से। कुछ धनी किसानों को लाभ हुआ, पर अधिकांश और अधिक कर्ज़ में डूबे।
◆ 1865 में गृहयुद्ध ख़त्म होते ही अमेरिकी कपास लौटी; भारतीय कपास की माँग और कीमतें गिरीं। साहूकारों ने कर्ज़ देना बंद किया और बकाया माँगा; उसी समय नए बंदोबस्त में राजस्व 50 से 100% तक बढ़ा दिया गया।
◆ कर्ज़ का शोषण: पहले प्रथा थी कि ब्याज मूलधन से अधिक नहीं होगा; औपनिवेशिक काल में यह टूटी — एक मामले में 100 रुपये पर 2000 से अधिक ब्याज। 1859 के परिसीमन कानून (ऋणपत्र 3 वर्ष मान्य) को साहूकारों ने उलटा इस्तेमाल किया: हर तीसरे साल मूलधन+ब्याज को नया मूलधन बनाकर नया बंधपत्र। रसीद न देना, जाली आँकड़े, फ़सल सस्ते में ले जाना, और अंत में ज़मीन-बैल पर क़ब्ज़ा।
📜 भाड़ा-पत्र (नवंबर 1873) — किसान की लाचारी का दस्तावेज़ "मैंने आपको देय ऋण के खाते में अपनी लोहे के धुरों वाली दो गाड़ियाँ, साज-सामान और चार बैल बेचे हैं… मैंने इस दस्तावेज़ के तहत उन्हीं दो गाड़ियों और चार बैलों को आपसे भाड़े पर लिया है। मैं हर माह आपको चार रुपये किराया दूँगा…" — यानी किसान अपने ही बैलों का किरायेदार बन गया! |

🔥 दक्कन विद्रोह (1875) — संक्षेप में 12 मई 1875 को पूना ज़िले के सूपा गाँव (मंडी) में रैयतों ने साहूकारों पर हमला कर बही-खाते और ऋणबंध जला दिए, अनाज की दुकानें लूटीं; विद्रोह अहमदनगर तक फैला, 6,500 वर्ग किमी और 30 से अधिक गाँव प्रभावित; 95 गिरफ़्तारियाँ। दक्कन दंगा आयोग की रिपोर्ट 1878 में संसद में पेश हुई, जिसने सारा दोष साहूकारों पर डाला और माना कि सरकारी राजस्व दोषी नहीं — सरकार अपनी भूल मानने को तैयार नहीं थी। परिणाम: दक्कन कृषक राहत अधिनियम, 1879। (किसान आंदोलनों का विस्तार अध्याय 6 में।) |
ब्रिटेन के औद्योगीकरण और भारत पर ब्रिटिश विजय में गहरा संबंध था। सूती कपड़े के मशीनी उत्पादन ने 19वीं सदी में ब्रिटेन को दुनिया का प्रमुख औद्योगिक राष्ट्र बनाया और 1850 के दशक से लोहा-इस्पात उद्योग पनपने पर वह "दुनिया का कारख़ाना" कहलाने लगा। जैसे-जैसे ब्रिटेन का उत्पादन बढ़ा, वहाँ के उद्योगपति भारत को अपने माल का विशाल बाज़ार मानने लगे।
◆ 1750 के आसपास भारत कपड़ा उत्पादन में दुनिया में सबसे आगे था। दक्षिण-पूर्व एशिया (जावा, सुमात्रा, पेनांग), पश्चिम और मध्य एशिया में भारतीय कपड़े का भारी व्यापार था; 16वीं सदी से यूरोपीय कंपनियाँ भी ख़रीदने लगीं।
◆ 1730 में कंपनी ने कलकत्ता के प्रतिनिधियों को 5,89,000 थानों का ऑर्डर भेजा, जिसमें सूती और रेशमी कपड़े की 98 किस्में थीं। यूरोपीय इन्हें "पीस गुड्स" कहते थे — प्रायः 20 गज लंबा, 1 गज चौड़ा थान। ऑर्डर दो साल पहले देना पड़ता था और लंदन में नीलामी से बिक्री होती थी।
शब्द | कहाँ से बना | अर्थ / पहचान |
मस्लिन (मलमल) | इराक़ का मोसुल शहर, जहाँ यूरोपीयों ने अरब व्यापारियों के पास भारतीय बारीक कपड़ा पहली बार देखा | सभी बारीक बुनाई वाले कपड़े |
कैलिको | केरल का कालीकट, जहाँ पुर्तगाली सबसे पहले आए | बाद में हर तरह का सूती कपड़ा |
शिंट्ज़ | हिंदी का "छींट" | रंगीन फूल-पत्तियों वाले छोटे छापे का कपड़ा; मसूलीपट्टनम की छींट ईरान-यूरोप जाती |
बंडाना | हिंदी का "बाँधना" | बाँधकर रँगे चटक गुलूबंद/सिर पर बाँधने का कपड़ा; अधिकतर राजस्थान और गुजरात में बनता |
जामदानी | — | बारीक मलमल पर करघे में बुने सजावटी चिह्न; सलेटी-सफ़ेद, सूती और सोने के धागे; ढाका और लखनऊ प्रमुख केंद्र |
पटोला | — | सूरत, अहमदाबाद, पाटन की बुनाई; इंडोनेशिया में भारी माँग |
◆ ऑर्डर-बही में कपड़ों के नाम उनके जन्मस्थान से भी थे: कासिमबाज़ार, पटना, कलकत्ता, उड़ीसा, चारपूर आदि। 1680 के दशक तक इंग्लैंड और यूरोप में छपे भारतीय सूती कपड़े की ज़बरदस्त माँग थी; इंग्लैंड की महारानी भी भारतीय कपड़ों के परिधान पहनती थीं।
◆ बुनाई वंशानुगत हुनर था: बंगाल के तांती, उत्तर भारत के जुलाहे या मोमिन, दक्षिण भारत के साले, कैकोल्लार और देवांग समुदाय प्रसिद्ध थे।
◆ कताई (सूत कातना) पहला चरण था, जो ज़्यादातर महिलाएँ चरखे और तकली पर करती थीं; बुनाई प्रायः पुरुष; रँगरेज़ धागा रँगते; छपाई के लिए छीपीगर (ठप्पे से छपाई करने वाले) कारीगर। लाखों भारतीयों की रोज़ी इसी पर टिकी थी।
◆ 19वीं सदी के प्रारंभ में कपड़ा उत्पादन के चार बड़े क्षेत्र थे: बंगाल (ढाका सबसे महत्वपूर्ण; नदियों से दूर-दूर तक माल जाता), कोरोमंडल तट (मद्रास से उत्तरी आंध्र), गुजरात (पश्चिमी तट) और उत्तर भारत के केंद्र।
1. इंग्लैंड में रोक: 18वीं सदी की शुरुआत में इंग्लैंड के ऊन और रेशम उत्पादकों ने भारतीय कपड़े का विरोध किया; 1720 में छपे सूती कपड़े (छींट) के प्रयोग पर रोक का कानून बना, जिसे कैलिको अधिनियम कहते हैं। फिर इंग्लैंड में ही सफ़ेद भारतीय मलमल पर भारतीय डिज़ाइन छापने का कैलिको छपाई उद्योग सरकारी संरक्षण में पनपा।
2. तकनीकी क्रांति: भारतीय कपड़े से होड़ में इंग्लैंड में आविष्कार हुए — जॉन के का फ़्लाइंग शटल (1733), जेम्स हारग्रीव्स की स्पिनिंग जेनी (1764) (एक कामगार एक साथ कई तकलियों पर काम कर सके), रिचर्ड आर्कराइट का वॉटर फ़्रेम (1769), सैमुअल क्रॉम्पटन का म्यूल (1779), एडमंड कार्टराइट का पावरलूम (1785) और जेम्स वॉट का सुधरा भाप इंजन। अब बहुत सारा कपड़ा बेहद कम कीमत पर बनने लगा। फिर भी 18वीं सदी के अंत तक विश्व बाज़ार में भारतीय कपड़े का दबदबा बना रहा।
3. चाँदी की जगह राजस्व: बंगाल की सत्ता मिलने के बाद कंपनी को भारतीय माल के लिए चाँदी लाने की ज़रूरत नहीं रही; वह किसानों-ज़मींदारों से वसूले राजस्व से ही कपड़ा ख़रीदने लगी; बुनकरों पर गुमाश्तों का दबाव, तयशुदा कम दाम।
4. भारी शुल्क: भारत से इंग्लैंड जाने वाले कपड़े पर भारी सीमा शुल्क; 19वीं सदी की शुरुआत तक ब्रिटिश मशीनी कपड़े ने भारतीय कपड़े को अफ़्रीका, अमेरिका और यूरोप के परंपरागत बाज़ारों से बाहर कर दिया। कंपनियों ने भारतीय माल ख़रीदना और बुनकरों को पेशगी देना बंद किया; औरंग (कंपनी के गोदाम-कारख़ाने) बंद हुए।
5. भारत का बाज़ार भी छिना: 1813 के बाद ब्रिटिश माल भारत में लगभग बिना शुल्क; 1830 के दशक तक भारतीय बाज़ार ब्रिटिश सूती कपड़े से पट गए; 1880 के दशक तक भारतीय लोग जितना सूती कपड़ा पहनते थे, उसमें से दो-तिहाई ब्रिटेन का बना होता था। विलायती सूत आने से लाखों कत्तिन महिलाएँ बेरोज़गार हुईं।
6. संरक्षकों का अंत: नवाबों, राजाओं और दरबारों के ख़त्म होने से विलासिता और हथियारों की माँग घटी; पश्चिमी शिक्षा पाए नए वर्ग की रुचि विदेशी वस्तुओं की ओर मुड़ी।

◆ बहुत से बुनकर और कत्तिन खेतिहर मज़दूर बने; कुछ शहरों में गए; कई अफ़्रीका और दक्षिण अमेरिका के बाग़ानों में मज़दूरी करने गए; कुछ को बम्बई, अहमदाबाद, शोलापुर, नागपुर, कानपुर की नई मिलों में नौकरी मिली।
◆ फिर भी हथकरघा पूरी तरह ख़त्म नहीं हुआ: जटिल किनारियों वाली साड़ियाँ और परंपरागत बुनाई मशीन पर नहीं बन सकती थी, और ब्रिटिश मिलें ग़रीबों वाला बेहद मोटा कपड़ा नहीं बनाती थीं। 19वीं सदी के अंत में शोलापुर और मदुरै बुनाई के नए केंद्र बने।
◆ राष्ट्रीय आंदोलन में गांधी जी ने विदेशी कपड़े के बहिष्कार और हाथ-कते, हाथ-बुने कपड़े का आह्वान किया; खादी राष्ट्रवाद का प्रतीक बनी और 1921 से चरखा कांग्रेस के झंडे पर रहा; 1931 में स्वीकृत तिरंगे के बीच की पट्टी में उसे स्थान मिला।
◆ टीपू सुल्तान की तलवारें (आज इंग्लैंड के संग्रहालयों में) इतनी सख़्त और पैनी थीं कि दुश्मन का लौह-कवच चीर देती थीं। यह गुण अधिक कार्बन वाले "वुट्ज़" इस्पात से आता था, जो पूरे दक्षिण भारत में बनता था; इसकी तलवारें लहरदार बनावट वाली होती थीं।
◆ 1800 में मैसूर आए फ़्रांसिस बुकानन ने सैकड़ों प्रगलन भट्ठियों में वुट्ज़ बनने का ब्योरा दिया: लोहे को काठकोयले के साथ मिट्टी की छोटी हांडियों में रखकर तापमान के जटिल उतार-चढ़ाव से इस्पात की सिल्लियाँ बनतीं, जिनसे भारत, पश्चिम और मध्य एशिया में तलवारें बनती थीं। "वुट्ज़" कन्नड़ उक्कू, तेलुगु हुक्कू, तमिल-मलयालम उरुक्कू (इस्पात) का बिगड़ा अंग्रेज़ी रूप है।
◆ प्रसिद्ध वैज्ञानिक माइकल फ़ैराडे ने 1818–22 तक चार वर्ष वुट्ज़ स्टील का अध्ययन किया। पर 19वीं सदी के मध्य तक यह तकनीक पूरी तरह लुप्त हो गई, क्योंकि अंग्रेज़ी विजय के साथ तलवार-हथियार उद्योग ख़त्म हुआ और इंग्लैंड के लोहे-इस्पात ने भारतीय लोहे की जगह ले ली।
◆ गाँवों की भट्ठियाँ ठंडी क्यों पड़ीं? (1) नए वन कानून: आरक्षित वनों में प्रवेश पर रोक से कोयले के लिए लकड़ी और लौह अयस्क नहीं मिला; जहाँ अनुमति मिली वहाँ हर भट्ठी पर भारी कर; (2) ब्रिटेन से लोहे का आयात, जिससे स्थानीय लुहार भी आयातित लोहा इस्तेमाल करने लगे; (3) 19वीं सदी के अंत के बार-बार अकाल। बिहार और मध्य भारत में मिट्टी की भट्ठियों में पुरुष प्रगलन करते और महिलाएँ धौंकनी चलातीं; मध्य भारत के अगरिया समुदाय ने बड़े पैमाने पर यह काम छोड़ दिया।
🔍 आसान परिभाषा: विऔद्योगीकरण (De-industrialisation) |
📘 परिभाषा: किसी देश के परंपरागत उद्योगों और हस्तशिल्प का नष्ट होना और उस पर निर्भर लोगों का खेती की ओर लौटना, जबकि उनकी जगह आधुनिक कारख़ाने पर्याप्त संख्या में न आएँ। |
💡 आसान भाषा में: "उद्योगों का उल्टा विकास" — आगे बढ़ने के बजाय पीछे की ओर जाना। 🏠 उदाहरण: ढाका कभी मलमल का सबसे बड़ा केंद्र था; 19वीं सदी में उसकी आबादी घटी और बुनकर खेतिहर मज़दूर बने। भारत में खेती पर निर्भर आबादी का अनुपात बढ़ा — इसे "ग्रामीणीकरण" भी कहा गया। राष्ट्रवादी विचारकों ने इसे अंग्रेज़ी राज का सबसे बड़ा आर्थिक दुष्परिणाम माना। |
अर्थ: भारत की संपत्ति और उत्पादन का वह भाग जो बिना किसी बराबर आर्थिक, व्यापारिक या भौतिक बदले के इंग्लैंड भेजा जाता था। भारत जितना निर्यात करता, उससे काफ़ी कम आयात करता — यह "निर्यात-अधिशेष" ही निकास का रूप था। इसकी शुरुआत 1757 के बाद बंगाल से हुई और 1765 की दीवानी के बाद यह नियमित हो गया।

विचारक | योगदान |
दादाभाई नौरोजी ("भारत के वयोवृद्ध नेता") | भारत के पहले आर्थिक विचारक; 1867 में लंदन की ईस्ट इंडिया एसोसिएशन में निकास का विचार रखा; 1876 में "भारत की ग़रीबी" (पॉवर्टी ऑफ़ इंडिया) लेख। 1867–68 के लिए भारत की प्रति व्यक्ति आय 20 रुपये का पहला अनुमान। पुस्तक "पॉवर्टी एंड अन-ब्रिटिश रूल इन इंडिया" (1901) — ब्रिटिश शासन को "अन-ब्रिटिश" कहा; निकास को भारत की ग़रीबी का मूल कारण बताया। ब्रिटिश संसद के पहले भारतीय सदस्य (1892); कांग्रेस के तीन बार अध्यक्ष (1886, 1893, 1906)। |
रमेशचंद्र दत्त | पुस्तक "भारत का आर्थिक इतिहास" (दो खंड, 1901–1903) — ब्रिटिश काल की आर्थिक नीतियों का विस्तृत आलोचनात्मक अध्ययन; ऊँचे भू-राजस्व को अकालों का कारण बताया; 1899 में कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन के अध्यक्ष। |
महादेव गोविंद रानाडे | "भारतीय अर्थशास्त्र" के प्रणेता; राज्य द्वारा औद्योगीकरण और संरक्षण के समर्थक; कहा कि भारत की राष्ट्रीय पूँजी का एक-तिहाई से अधिक किसी न किसी रूप में बाहर जाता है। |
जी. वी. जोशी, जी. सुब्रमण्य अय्यर, पृथ्वीशचंद्र राय | अख़बारों और लेखों के माध्यम से निकास, कर-बोझ और सैन्य व्यय की आलोचना |
विलियम डिग्बी (अंग्रेज़) | पुस्तक "प्रॉस्परस ब्रिटिश इंडिया" (1901) — व्यंग्य भरे शीर्षक से ब्रिटिश दावों का खंडन |
◆ भारत में पूँजी निर्माण रुका; जो पूँजी भारत में उद्योग लगा सकती थी, वह ब्रिटेन के औद्योगिक क्रांति में लगी। कई इतिहासकारों का मत है कि यदि यह निकास न होता तो यूरोप इतनी तेज़ी से विकसित न होता।
◆ भारत की ग़रीबी, कम प्रति व्यक्ति आय, बेरोज़गारी और बार-बार अकाल का बड़ा कारण।
◆ राष्ट्रवाद पर प्रभाव: निकास सिद्धांत ने शिक्षित भारतीयों को दिखाया कि ब्रिटिश शासन "दयालु" नहीं, बल्कि मूलतः शोषक है। यही आर्थिक राष्ट्रवाद और बाद में स्वदेशी आंदोलन की बौद्धिक नींव बना।
🔍 आसान परिभाषा: धन का निकास (Drain of Wealth) |
📘 परिभाषा: किसी देश की संपत्ति का लगातार दूसरे देश में चले जाना, जिसके बदले पहले देश को कोई बराबर लाभ न मिले। |
💡 आसान भाषा में: "भारत की कमाई, इंग्लैंड की जेब" — जैसे किसी घर की आमदनी का बड़ा हिस्सा हर महीने किसी बाहरी व्यक्ति को चला जाए और घर कभी बचत न कर पाए। 🏠 उदाहरण: भारत से वसूले गए कर से लंदन के इंडिया ऑफ़िस का ख़र्च, अंग्रेज़ अफ़सरों की पेंशन, रेल कंपनियों का गारंटीशुदा ब्याज और भारतीय सेना के विदेशी युद्धों का ख़र्च दिया जाता था — इसे "होम चार्जेज़" कहा गया। |
◆ उद्देश्य (अंग्रेज़ों के लिए): (1) कच्चा माल (कपास, जूट, अनाज) भीतरी इलाक़ों से बंदरगाहों तक और ब्रिटिश माल बंदरगाहों से भीतर तक पहुँचाना; (2) विद्रोह दबाने और सीमाओं की रक्षा के लिए सेना की तेज़ आवाजाही; (3) ब्रिटिश पूँजीपतियों के लिए सुरक्षित निवेश; (4) ब्रिटेन के लोहा-इस्पात उद्योग के लिए पटरियों, इंजनों का बाज़ार।
◆ गारंटी प्रणाली (1849): निजी अंग्रेज़ कंपनियों को 5% ब्याज की गारंटी — घाटा होने पर भी भारतीय करदाता भरता। इससे कंपनियों ने फ़िज़ूलख़र्ची की; यह निकास का बड़ा साधन बनी।
◆ डलहौज़ी का रेलवे विवरण-पत्र (1853) और 16 अप्रैल 1853 को बम्बई–ठाणे पहली यात्री रेल; 1854 में हावड़ा–हुगली; 1856 में मद्रास में। 1869–80 में सरकार ने स्वयं रेल बनाई, फिर नई गारंटी प्रणाली। 1905 में रेलवे बोर्ड; एकवर्थ समिति (1920–21) की सिफ़ारिश पर 1924 में रेल बजट अलग और 1925 से प्रमुख लाइनों का सरकारी प्रबंधन। 1947 तक लगभग 65,000 किमी (40,000 मील से अधिक) रेल।
✅ रेलवे के सकारात्मक प्रभाव ✔ देश के अलग-अलग भाग जुड़े; एक राष्ट्रीय बाज़ार बना ✔ अकाल के समय अनाज पहुँचाना संभव (धीरे-धीरे) ✔ लोगों का आवागमन, विचारों का प्रसार — राष्ट्रीय एकता को बल ✔ कुछ आधुनिक उद्योगों (कोयला, कार्यशालाएँ) को बढ़ावा | ❌ रेलवे के नकारात्मक प्रभाव ✔ मार्ग बंदरगाहों की ओर; भीतरी व्यापार के बजाय निर्यात-आयात को प्राथमिकता ✔ भाड़ा नीति भेदभावपूर्ण — बंदरगाह तक माल सस्ता, भीतर महँगा ✔ ब्रिटिश माल गाँवों तक पहुँचा, हस्तशिल्प का पतन तेज़ ✔ पटरियाँ, इंजन इंग्लैंड से; गारंटीशुदा ब्याज का बोझ ✔ ऊँचे पद अंग्रेज़ों के लिए; तीसरे दर्जे के भारतीय यात्रियों से दुर्व्यवहार |
◆ डाक और तार: 1853 से टेलीग्राफ़, 1854 का डाकघर अधिनियम और समान दर (विस्तार अध्याय 3)। भारत-ब्रिटेन के बीच 1870 में समुद्री तार; 1869 में स्वेज़ नहर खुलने से इंग्लैंड की दूरी और घटी — ब्रिटिश माल और सस्ता पहुँचा।

उद्योग | मुख्य तथ्य |
सूती कपड़ा | पहली मिल 1854, बम्बई (कावसजी नानाभाई डावर) — कताई मिल। बम्बई कच्चे कपास के निर्यात का बड़ा बंदरगाह था और पश्चिमी भारत की काली मिट्टी वाली कपास पट्टी के पास था। 1900 तक बम्बई में 84 मिलें, अधिकतर पारसी और गुजराती व्यापारियों की, जिन्होंने चीन के साथ व्यापार से पूँजी कमाई थी। अहमदाबाद 1861, कानपुर 1862। यह उद्योग मुख्यतः भारतीय पूँजी का था; मिलों में कताई विभाग में ज़्यादातर महिलाएँ, बुनाई में पुरुष। |
जूट (पटसन) | पहली मिल 1855, रिशरा (बंगाल); हुगली नदी के किनारे केंद्रित; लगभग पूरी तरह ब्रिटिश (स्कॉटिश) पूँजी का उद्योग। |
कोयला | रानीगंज (बंगाल) में 18वीं सदी के अंत से खनन; रेलवे के विस्तार के साथ तेज़ी; झरिया बाद में। |
लोहा-इस्पात | 1904: अमेरिकी भूवैज्ञानिक चार्ल्स वेल्ड और दोराबजी टाटा (जमशेदजी टाटा के बड़े बेटे) छत्तीसगढ़ में लौह अयस्क खोज रहे थे। अगरिया लोगों ने टोकरियों में अयस्क ले जाते हुए पहाड़ी की ओर इशारा किया — राजहरा पहाड़ियाँ, दुनिया के बेहतरीन भंडारों में से एक; पर पानी नहीं था। अगरियों की मदद से मिले दूसरे स्रोत से बाद में भिलाई इस्पात संयंत्र को अयस्क मिला। सुबर्णरेखा नदी के किनारे जंगल साफ़ कर जमशेदपुर बसा; टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी (1907), 1912 से इस्पात उत्पादन। अंग्रेज़ रेलवे विशेषज्ञ मानते ही नहीं थे कि भारत में अच्छा इस्पात बन सकता है; पर प्रथम विश्व युद्ध (1914) में ब्रिटिश इस्पात यूरोप की लड़ाई में लगा, भारतीय रेल टिस्को पर निर्भर हुई; गोलों के खोल और रेल के पहिये बने; 1919 तक टिस्को का 90% इस्पात सरकार ख़रीदती थी; यह पूरे ब्रिटिश साम्राज्य का सबसे बड़ा इस्पात कारख़ाना बना। |
बाग़ान और अन्य | चाय, कॉफ़ी, नील के बाग़ान; चमड़ा, कागज़, चीनी, सीमेंट (1904 से प्रयास), जहाज़रानी (1919: सिंधिया स्टीम नेविगेशन), बैंक-बीमा में भी धीरे-धीरे भारतीय पूँजी। |

◆ संरक्षण का अभाव: ज़्यादातर देशों की सरकारें आयात पर शुल्क लगाकर अपने नवजात उद्योगों को बचाती थीं; औपनिवेशिक सरकार ने यह सुरक्षा नहीं दी। उल्टे 1894–96 में भारतीय मिलों के कपड़े पर उत्पाद शुल्क (कॉटन एक्साइज़) लगाया ताकि लंकाशायर को नुकसान न हो।
◆ ब्रिटिश पूँजी का प्रभुत्व: प्रबंध-अभिकर्ता फ़र्मों के ज़रिए जूट, चाय, कोयला, खानें, बैंक, जहाज़रानी पर ब्रिटिश नियंत्रण; तकनीक और मशीनें विदेश से; भारी उद्योगों का अभाव; औद्योगिक विकास क्षेत्रीय रूप से असंतुलित (कुछ बंदरगाही शहरों तक सीमित)।
◆ विस्तार कब हुआ? जब भी ब्रिटिश आयात गिरा — प्रथम विश्व युद्ध, स्वदेशी आंदोलन, 1930 की महामंदी और द्वितीय विश्व युद्ध के समय। राष्ट्रीय आंदोलन के साथ भारतीय पूँजीपति वर्ग (टाटा, बिड़ला, वालचंद आदि) मज़बूत हुआ; 1927 में फ़िक्की (भारतीय वाणिज्य और उद्योग मंडलों का महासंघ) बना।
🔍 आसान परिभाषा: प्रबंध-अभिकर्ता प्रणाली (Managing Agency System) |
📘 परिभाषा: एक बड़ी फ़र्म (प्रबंध-अभिकर्ता) कई अलग-अलग कंपनियों की पूँजी जुटाने, प्रबंधन और विपणन का पूरा काम अपने हाथ में रखती थी; शेयरधारक नाम के मालिक होते थे। |
💡 आसान भाषा में: "एक मैनेजर, दर्जनों कंपनियाँ" — असली नियंत्रण कुछ ब्रिटिश फ़र्मों के हाथ में। 🏠 उदाहरण: एंड्रयू यूल, बर्ड एंड कंपनी, जार्डिन स्किनर जैसी ब्रिटिश फ़र्में जूट मिलें, चाय बाग़ान, कोयला खानें एक साथ चलाती थीं; इससे ब्रिटिश पूँजी का एकाधिकार बना और भारतीय उद्यमियों को जगह कम मिली। |
🇯🇵 तुलना: जापान का उल्टा रास्ता भारत में औपनिवेशिक सरकार ब्रिटिश माल का बाज़ार बढ़ाना चाहती थी, इसलिए भारतीय उद्योगपतियों की मदद नहीं की। दूसरी ओर जापान में 1868 में सत्ता सँभालने वाले मेजी शासकों ने पश्चिमी प्रभुत्व से बचने के लिए औद्योगीकरण को खुला बढ़ावा दिया: डाक, टेलीग्राफ़, रेलवे, भाप के जहाज़; पश्चिम की तकनीक का आयात; विदेशी विशेषज्ञ बुलाकर जापानी पेशेवरों का प्रशिक्षण; सरकारी बैंकों से उदार कर्ज़; सरकार ने बड़े उद्योग लगाकर सस्ते में व्यापारिक घरानों को बेचे। भारत में उपनिवेशवाद औद्योगीकरण की बाधा बना, जापान में विदेशी क़ब्ज़े का डर ही औद्योगीकरण की प्रेरणा (हालाँकि जापान का औद्योगीकरण शुरू से सैनिक ज़रूरतों से जुड़ा रहा)। |
वर्ष | नीति / घटना | प्रभाव |
1700, 1720 | इंग्लैंड में भारतीय छपे कपड़ों पर रोक (कैलिको कानून) | भारतीय निर्यात पर पहली बड़ी चोट |
1813 | चार्टर एक्ट: कंपनी का भारत-व्यापार एकाधिकार समाप्त | ब्रिटिश निजी व्यापारियों और मशीनी माल के लिए भारत खुला; एकतरफ़ा मुक्त व्यापार |
1833 | कंपनी का सारा व्यापार बंद | भारत पूरी तरह ब्रिटिश उद्योगपतियों का बाज़ार |
1882 | लगभग सभी आयात शुल्क समाप्त (पूर्ण मुक्त व्यापार) | लंकाशायर के दबाव में; भारतीय मिलें असुरक्षित |
1894–96 | राजस्व की ज़रूरत पर आयात शुल्क, पर साथ में भारतीय मिल-कपड़े पर उत्पाद शुल्क (1896 में दोनों पर 3.5%) | राष्ट्रवादियों का तीव्र विरोध; स्वदेशी भावना को बल |
1921–23 | राजकोषीय आयोग (इब्राहिम रहीमतुल्ला) की सिफ़ारिश पर "विभेदकारी संरक्षण" (1923), प्रशुल्क बोर्ड | इस्पात, कपड़ा, चीनी, कागज़ आदि को सीमित संरक्षण |
1932 | ओटावा समझौता: साम्राज्यिक वरीयता | ब्रिटिश माल को भारत में रियायत; भारतीय हितों की अनदेखी |
◆ व्यापार का स्वरूप बदला: भारत तैयार माल का निर्यातक से कच्चे माल (कपास, जूट, नील, अफ़ीम, अनाज, चाय) का निर्यातक और तैयार माल (सूती कपड़ा, लोहे का सामान, मशीनें) का आयातक बन गया। भारत के निर्यात-अधिशेष से ब्रिटेन अपने दूसरे देशों के साथ व्यापार घाटे की भरपाई करता था।
क्षेत्र | मुख्य तथ्य |
मुद्रा | 1835: पूरे ब्रिटिश भारत में एक समान चाँदी का रुपया (कंपनी का रुपया, विलियम चतुर्थ की छवि)। 1861: कागज़ी मुद्रा अधिनियम — नोट छापने का अधिकार सरकार को। 1926: हिल्टन यंग आयोग (रुपया 1 शिलिंग 6 पेंस); उसी की सिफ़ारिश पर केंद्रीय बैंक की योजना। 1 अप्रैल 1935: भारतीय रिज़र्व बैंक (1934 के अधिनियम से)। |
बैंक | 1770: बैंक ऑफ़ हिंदुस्तान (पहला आधुनिक ढंग का बैंक)। प्रेसीडेंसी बैंक: बैंक ऑफ़ बंगाल (1806), बैंक ऑफ़ बम्बई (1840), बैंक ऑफ़ मद्रास (1843) → 1921 में मिलकर इंपीरियल बैंक → 1955 में भारतीय स्टेट बैंक। इलाहाबाद बैंक (1865); अवध कमर्शियल बैंक (1881) — पूरी तरह भारतीयों द्वारा प्रबंधित पहला बैंक; पंजाब नेशनल बैंक (1894–95), लाला लाजपत राय से जुड़ा। स्वदेशी आंदोलन के दौर में कई भारतीय बैंक (बैंक ऑफ़ इंडिया 1906, केनरा, इंडियन बैंक आदि)। |
कर | 1860: जेम्स विल्सन द्वारा पहली बार आयकर (1857 के ख़र्च की भरपाई)। नमक कर: सबसे ग़रीब पर भी बोझ; सरकार का नमक पर एकाधिकार — इसी के विरुद्ध 1930 का दांडी मार्च। भू-राजस्व: सरकार की आय का सबसे बड़ा स्रोत रहा। |
ब्रिटिश काल में अकाल बार-बार और पहले से अधिक घातक हुए। कारण केवल वर्षा की कमी नहीं था: ऊँचा भू-राजस्व, खाद्यान्न की जगह वाणिज्यिक फ़सलें, किसानों की ऋणग्रस्तता, अकाल के समय भी अनाज का निर्यात, हस्तशिल्प के पतन से वैकल्पिक रोज़गार का अभाव, और सरकार की "बाज़ार अपने आप ठीक कर लेगा" वाली सोच।
अकाल | क्षेत्र / विवरण | सरकारी प्रतिक्रिया |
1770 | बंगाल; लगभग एक करोड़ मौतें (एक-तिहाई आबादी) | द्वैध शासन काल; राहत लगभग नहीं |
1837–38 | उत्तर-पश्चिमी प्रांत (आगरा क्षेत्र) | सीमित राहत |
1866 | उड़ीसा (और बंगाल, मद्रास के भाग) | कैंपबेल आयोग |
1876–78 | मद्रास, बम्बई, मैसूर, हैदराबाद; अत्यंत भीषण | लिटन के समय; उसी दौरान दिल्ली दरबार (1877); स्ट्रैची अकाल आयोग (1880) → अकाल संहिता (1883) |
1896–97 | बम्बई, मध्य प्रांत, संयुक्त प्रांत आदि | लायल आयोग (1898) |
1899–1900 | पश्चिमी और मध्य भारत, राजपूताना; राजस्थान में विक्रम संवत 1956 का होने से "छप्पनिया अकाल" | मैकडॉनेल आयोग (1901) |
1943 | बंगाल; लगभग 30 लाख मौतें; युद्धकालीन नीतियाँ, अनाज का भंडारण और निर्यात | वुडहेड आयोग (1944) |
🔍 आसान परिभाषा: अकाल संहिता (Famine Code) |
📘 परिभाषा: अकाल की पहचान, घोषणा और राहत-कार्य के लिए सरकार के लिखित नियम — जैसे राहत कार्यों (सड़क, नहर निर्माण) में मज़दूरी, मुफ़्त भोजन, राजस्व में छूट। |
💡 आसान भाषा में: "अकाल आए तो क्या करना है" — इसकी पहले से तय नियमावली। 🏠 उदाहरण: 1876–78 के अकाल के बाद स्ट्रैची आयोग (1880) की सिफ़ारिश पर 1883 में अकाल संहिता बनी; अकाल बीमा कोष का विचार आया। फिर भी 1896–1900 और 1943 के अकालों में लाखों लोग मरे, क्योंकि राहत देर से और कम मिली। |

➕ अनचाहे सकारात्मक परिणाम ✔ रेल, डाक, तार से एक राष्ट्रीय बाज़ार और एकता ✔ आधुनिक उद्योग, बैंकिंग, मुद्रा व्यवस्था की नींव ✔ सर्वेक्षण, भूमि-रिकॉर्ड, जनगणना, सांख्यिकी ✔ नहरें (गंगा नहर, पंजाब की नहर बस्तियाँ) ✔ शोषण की समझ से आर्थिक राष्ट्रवाद का जन्म | ➖ मूल नकारात्मक परिणाम ✔ हस्तशिल्प का विनाश (विऔद्योगीकरण) और खेती पर बढ़ता बोझ ✔ किसानों की ऋणग्रस्तता, भूमिहीनता, बार-बार अकाल ✔ धन का निकास; पूँजी और उद्योगों का अभाव ✔ कृषि में ठहराव; प्रति व्यक्ति आय बहुत कम ✔ अर्थव्यवस्था ब्रिटेन की ज़रूरतों के अधीन — कच्चा माल बाहर, तैयार माल भीतर |
◆ आर्थिक राष्ट्रवाद: नौरोजी, दत्त, रानाडे की आलोचना ने दिखाया कि भारत की ग़रीबी ब्रिटिश नीतियों की देन है। कांग्रेस ने शुरू से ही निकास, ऊँचे भू-राजस्व, सैन्य व्यय, कपास उत्पाद शुल्क का विरोध किया। यही सोच स्वदेशी (1905), खादी और चरखा, नमक सत्याग्रह (1930) तक पहुँची और स्वतंत्रता के बाद योजनाबद्ध आर्थिक विकास का आधार बनी (अध्याय 18)।
वर्ष | घटना |
1717 | फ़र्रुख़सियर का फ़रमान: कंपनी को बिना चुंगी व्यापार |
1720 | इंग्लैंड में छपे भारतीय सूती कपड़ों पर रोक (कैलिको कानून) |
1757 / 1765 | प्लासी / बंगाल की दीवानी: धन के निकास की शुरुआत |
1770 | बंगाल का महा-अकाल |
1772 / 1773 | हेस्टिंग्स की इजारेदारी व्यवस्था / अफ़ीम पर कंपनी का एकाधिकार |
1793 | स्थायी बंदोबस्त (22 मार्च) |
1797 | बर्दवान के राजा की ज़मींदारी की नीलामी |
1792 / 1820 | बारामहल में रैयतवाड़ी (रीड) / मद्रास में रैयतवाड़ी (मुनरो) |
1813 | कंपनी का भारतीय व्यापार एकाधिकार समाप्त; पाँचवीं रिपोर्ट |
1818–1820 का दशक | बम्बई दक्कन में पहला राजस्व बंदोबस्त |
1822 / 1833 | महालवाड़ी (होल्ट मैकेंज़ी) / बर्ड-टॉमसन का संशोधन |
1823 / 1828 | 12,000 बुनकरों की अर्ज़ी / विधवा कत्तिन का पत्र |
1835 | एक समान चाँदी का रुपया |
1849 / 1853 | रेलवे गारंटी प्रणाली / पहली यात्री रेल (16 अप्रैल) |
1854 / 1855 | बम्बई में पहली सूती मिल / रिशरा में पहली जूट मिल |
1859–60 | नील विद्रोह; नील आयोग (1860); परिसीमन कानून (1859) |
1860 / 1861 | पहला आयकर / कागज़ी मुद्रा अधिनियम; कपास उछाल की शुरुआत |
1867–68 | नौरोजी का प्रति व्यक्ति आय अनुमान: 20 रुपये |
1869–70 | सांभर झील अंग्रेज़ों को पट्टे पर; स्वेज़ नहर (1869) |
1875 / 1879 | दक्कन विद्रोह / दक्कन कृषक राहत अधिनियम |
1876–78 / 1880 / 1883 | दक्षिण भारत का अकाल / स्ट्रैची आयोग / अकाल संहिता |
1882 / 1896 | पूर्ण मुक्त व्यापार / कपास उत्पाद शुल्क |
1899–1900 | छप्पनिया अकाल; मैकडॉनेल आयोग (1901) |
1901 | नौरोजी की "पॉवर्टी एंड अन-ब्रिटिश रूल इन इंडिया"; दत्त का आर्थिक इतिहास (1901–03) |
1907 / 1912 | टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी / इस्पात उत्पादन शुरू |
1917 | चंपारण सत्याग्रह (नील किसान) |
1921 / 1923 | इंपीरियल बैंक / विभेदकारी संरक्षण |
1924–25 | रेल बजट अलग; प्रमुख लाइनें सरकार के हाथ |
1932 / 1935 | ओटावा समझौता (साम्राज्यिक वरीयता) / भारतीय रिज़र्व बैंक |
1943 | बंगाल का अकाल |
🌾 अंतिम बात अंग्रेज़ों ने भारत की अर्थव्यवस्था को ब्रिटेन की ज़रूरतों के साँचे में ढाल दिया: किसान ऊँचे राजस्व और कर्ज़ में दबा, कारीगर बेरोज़गार हुआ, देश कच्चे माल का खेत और तैयार माल का बाज़ार बना, और धन लगातार इंग्लैंड की ओर बहता रहा। पर इसी शोषण की समझ ने भारतीयों को जगाया। अगले अध्याय में हम देखेंगे कि शिक्षा, प्रेस और बौद्धिक जागरण ने किस तरह एक नई चेतना पैदा की, जिसने आगे चलकर पूरे देश को आज़ादी की लड़ाई के लिए तैयार किया। |