▌ भूमिका (Introduction)
1773 के रेगुलेटिंग एक्ट से लेकर 1857 के विद्रोह तक का काल 'गवर्नर जनरलों का युग' कहलाता है। इस अवधि में ईस्ट इंडिया कंपनी के गवर्नर जनरलों ने भारत में ब्रिटिश साम्राज्य का विस्तार किया, प्रशासनिक सुधार किए और सामाजिक बदलाव लाए। इस अध्याय में हम प्रमुख गवर्नर जनरलों के कार्यों, नीतियों और उनके प्रभावों का अध्ययन करेंगे।
| गवर्नर जनरल | कार्यकाल | मुख्य पहचान |
|---|---|---|
| वारेन हेस्टिंग्ज़ | 1772–1785 | प्रथम गवर्नर जनरल; रेगुलेटिंग एक्ट; न्यायिक सुधार |
| लॉर्ड कॉर्नवॉलिस | 1786–93, 1805 (पद पर मृत्यु) | स्थायी बंदोबस्त; कॉर्नवॉलिस कोड; तीसरा मैसूर युद्ध |
| सर जॉन शोर | 1793–1798 | अहस्तक्षेप नीति (Non-intervention) |
| लॉर्ड वेलेज़ली | 1798–1805 | सहायक संधि; चौथा मैसूर युद्ध; दूसरा मराठा युद्ध |
| लॉर्ड मिंटो प्रथम | 1807–1813 | रणजीत सिंह से अमृतसर संधि 1809 |
| लॉर्ड हेस्टिंग्ज़ (मोइरा) | 1813–1823 | पिंडारी युद्ध; तीसरा मराठा युद्ध; रैयतवाड़ी |
| लॉर्ड एम्हर्स्ट | 1823–1828 | पहला बर्मा युद्ध 1824–26 |
| लॉर्ड विलियम बेंटिंक | 1828–1835 | सती उन्मूलन; ठगी दमन; मैकॉले शिक्षा नीति |
| लॉर्ड ऑकलैंड | 1836–1842 | पहला अफगान युद्ध (1839–42) |
| लॉर्ड एलनबरो | 1842–1844 | सिंध विलय 1843 |
| लॉर्ड हार्डिंग | 1844–1848 | पहला सिख युद्ध 1845–46; लाहौर संधि 1846 |
| लॉर्ड डलहौज़ी | 1848–1856 | व्यपगत सिद्धांत; रेलवे; टेलीग्राफ; पंजाब विलय |
▌ वारेन हेस्टिंग्ज़ (Warren Hastings) — 1772–1785 ई.
वारेन हेस्टिंग्ज़ बंगाल के पहले गवर्नर जनरल थे। उन्होंने अराजक द्वैध शासन को समाप्त कर एक सुव्यवस्थित प्रशासन की नींव रखी। इन्हें 'भारत में ब्रिटिश प्रशासन का निर्माता' कहा जाता है।
प्रमुख विधायी सुधार
► प्रथम गवर्नर जनरल: वारेन हेस्टिंग्ज़ (बंगाल के पूर्व गवर्नर से GG बने)
► 4 सदस्यीय काउंसिल: कक्लेन, मॉनसन, फ्रांसिस, बार्वेल — हेस्टिंग्ज़ से प्रायः असहमत
न्यायिक सुधार
प्रमुख युद्ध और कूटनीति
अन्य योगदान
महाभियोग: 1787 ई. में हेस्टिंग्ज़ पर ब्रिटिश संसद में 'एडमंड बर्क' ने महाभियोग (Impeachment) चलाया — भ्रष्टाचार, अत्याचार के आरोप। यह मुकदमा 7 वर्ष (1788–95) चला और अंततः हेस्टिंग्ज़ बरी हुए।
EXAM TIP
परीक्षा में: रेगुलेटिंग एक्ट 1773 vs पिट्स इंडिया एक्ट 1784 का अंतर; सुप्रीम कोर्ट का प्रथम CJ — सर एलिजा इम्पी; हेस्टिंग्ज़ पर महाभियोग चलाने वाले — एडमंड बर्क।
▌ लॉर्ड कॉर्नवॉलिस (Lord Cornwallis) — 1786–1793, 1805 ई.
कॉर्नवॉलिस को 'भारतीय सिविल सेवा का जनक' और 'स्थायी बंदोबस्त का प्रवर्तक' कहा जाता है। उन्होंने प्रशासन को व्यवस्थित रूप दिया और भ्रष्टाचार कम करने के प्रयास किए।
स्थायी बंदोबस्त — Permanent Settlement (1793 ई.)
स्थायी बंदोबस्त भारत की भूमि व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण प्रयोग था। इसे 'इस्तमरारी बंदोबस्त' भी कहते हैं।
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| लागू क्षेत्र | बंगाल, बिहार, ओडिशा (1793); बाद में उत्तरी मद्रास और वाराणसी |
| आधार | जमींदारों को भूमि का स्थायी मालिक माना गया |
| लगान | एक निश्चित (fixed) राशि जमींदार सरकार को देंगे — स्थायी रूप से |
| किसान | जमींदार और किसान के बीच का सम्बन्ध सरकार की चिंता नहीं |
| सूर्यास्त नियम | निश्चित तिथि तक लगान न देने पर जमींदारी नीलाम होती थी |
| प्रभाव | जमींदार वर्ग मजबूत; किसान शोषित; कृषि में निवेश घटा |
| प्रस्तावक | लॉर्ड कॉर्नवॉलिस; विचारक — जॉन शोर |
महत्वपूर्ण: स्थायी बंदोबस्त से जमींदार तो समृद्ध हुए किंतु किसान पूरी तरह उनकी दया पर निर्भर हो गए। इस व्यवस्था की जड़ें 1857 के विद्रोह के सामाजिक असंतोष से जुड़ी मानी जाती हैं।
कॉर्नवॉलिस कोड (Cornwallis Code, 1793)
तीसरा मैसूर युद्ध (1790–92 ई.)
EXAM TIP
स्थायी बंदोबस्त से जुड़े परीक्षा प्रश्न: लागू वर्ष 1793, क्षेत्र बंगाल-बिहार-ओडिशा, सूर्यास्त नियम (Sunset Law), जमींदारों को स्थायी मालिक माना। कॉर्नवॉलिस को 'ICS का जनक' क्यों कहते हैं?
▌ सर जॉन शोर (Sir John Shore) — 1793–1798 ई.
स्मरणीय: सर जॉन शोर की अहस्तक्षेप नीति EIC के लिए हानिकारक साबित हुई क्योंकि इससे मराठा और हैदराबाद जैसी शक्तियाँ और मजबूत हो गईं। इसी कारण वेलेज़ली ने इसे उलट दिया।
▌ लॉर्ड वेलेज़ली (Lord Wellesley) — 1798–1805 ई.
वेलेज़ली को 'भारत का सबसे बड़ा साम्राज्यवादी गवर्नर जनरल' कहा जाता है। उन्होंने 'सहायक संधि' (Subsidiary Alliance) के माध्यम से भारतीय राज्यों को एक-एक कर ब्रिटिश अधीनता में लिया।
सहायक संधि — Subsidiary Alliance
सहायक संधि वेलेज़ली की सबसे चतुर और प्रभावशाली नीति थी — इसे 'गुलामी का सोने का पिंजरा' भी कहा गया है।
| संधि की शर्तें | भारतीय राज्य पर प्रभाव |
|---|---|
| ब्रिटिश सेना की टुकड़ी अपने राज्य में रखनी होगी | राज्य की सैन्य स्वायत्तता समाप्त |
| सेना का खर्च राज्य देगा या भूमि देगा | आर्थिक बोझ; भूमि हस्तांतरण |
| ब्रिटिश रेजिडेंट राजधानी में रहेगा | ब्रिटिश निगरानी और नियंत्रण |
| बिना अनुमति कोई विदेशी नियुक्त नहीं होगा | राज्य की विदेश नीति समाप्त |
| EIC राज्य को 'सुरक्षा' देगी | संधि स्वीकार करने पर राज्य ब्रिटिश अधीन |
▶ हैदराबाद — 1798 (प्रथम राज्य जिसने संधि स्वीकार की) ▶ मैसूर — 1799 (टीपू की हार के बाद) ▶ तंजौर — 1799 ▶ अवध — 1801 (दूसरी बार — शुजा-उद-दौला के बाद) ▶ पेशवा (बाजीराव II) — 1802 — बसीन की संधि ▶ सिंधिया, भोंसले — 1803 (द्वितीय मराठा युद्ध के बाद)
चौथा मैसूर युद्ध (1799 ई.)
द्वितीय मराठा युद्ध (1803–05 ई.)
महत्वपूर्ण: वेलेज़ली ने कलकत्ता में फोर्ट विलियम कॉलेज (1800) की स्थापना की — कंपनी के नए अधिकारियों को भारतीय भाषाएँ और शासन सिखाने के लिए। ब्रिटेन ने इसे 'अनावश्यक खर्च' मानकर बंद करवा दिया।
EXAM TIP
सहायक संधि की विशेषताएँ UPSC में बार-बार पूछी जाती हैं। पहला राज्य — हैदराबाद (1798)। टीपू की मृत्यु — 1799। बसीन की संधि — 1802 (पेशवा + EIC)।
▌ लॉर्ड मिंटो प्रथम (Lord Minto I) — 1807–1813 ई.
▌ लॉर्ड हेस्टिंग्ज़ / मोइरा (Lord Hastings) — 1813–1823 ई.
लॉर्ड हेस्टिंग्ज़ ने मराठाओं का अंतिम प्रतिरोध कुचला और ब्रिटिश साम्राज्य को अखिल भारतीय स्वरूप दिया।
रैयतवाड़ी बनाम महलवाड़ी: रैयतवाड़ी — किसान सीधे सरकार को लगान देते (मद्रास, बॉम्बे)। महलवाड़ी — ग्राम समुदाय सामूहिक रूप से लगान देते (उत्तर-पश्चिम प्रांत, पंजाब) — मार्टिन बर्ड ने लागू किया।
▌ लॉर्ड एम्हर्स्ट (Lord Amherst) — 1823–1828 ई.
▌ लॉर्ड विलियम बेंटिंक (Lord William Bentinck) — 1828–1835 ई.
विलियम बेंटिंक भारत के पहले गवर्नर जनरल थे जिन्होंने सामाजिक सुधारों को प्राथमिकता दी। उन्हें 'महान मानवतावादी' और 'भारतीय समाज सुधारों के प्रवर्तक' कहा जाता है।
सामाजिक सुधार
शिक्षा सुधार
प्रशासनिक सुधार
EXAM TIP
बेंटिंक से जुड़े अनिवार्य प्रश्न: सती उन्मूलन वर्ष (1829), ठगी दमन — कर्नल स्लीमन, मैकॉले का मिनट (1835), प्रथम गवर्नर जनरल 'ऑफ इंडिया' — बेंटिंक (1833 के चार्टर एक्ट द्वारा बंगाल GG को भारत का GG बनाया गया)।
▌ लॉर्ड ऑकलैंड (Lord Auckland) — 1836–1842 ई.
▌ लॉर्ड एलनबरो (Lord Ellenborough) — 1842–1844 ई.
▌ लॉर्ड हार्डिंग (Lord Hardinge) — 1844–1848 ई.
▌ लॉर्ड डलहौज़ी (Lord Dalhousie) — 1848–1856 ई.
डलहौज़ी सबसे महत्वाकांक्षी और विवादास्पद गवर्नर जनरल थे। उन्होंने सर्वाधिक क्षेत्र EIC में मिलाए। आधुनिक भारत की कई संस्थाओं की नींव उन्हीं के काल में पड़ी।
व्यपगत सिद्धांत — Doctrine of Lapse
यह डलहौज़ी की सर्वाधिक विवादास्पद नीति थी। इसके अनुसार यदि कोई भारतीय शासक नि:संतान मरे तो उसका राज्य EIC में मिल जाएगा — उसे दत्तक पुत्र गोद लेने का अधिकार नहीं।
| विलीन राज्य | वर्ष | कारण |
|---|---|---|
| सतारा | 1848 | नि:संतान शासक |
| जैतपुर और संभलपुर | 1849 | नि:संतान शासक |
| बघाट | 1850 | नि:संतान शासक |
| उदयपुर (छत्तीसगढ़) | 1852 | नि:संतान शासक |
| झाँसी | 1853 | गंगाधर राव की मृत्यु; दत्तक पुत्र अमान्य |
| नागपुर | 1854 | नि:संतान शासक |
| अवध | 1856 | कुशासन के आधार पर — व्यपगत नहीं, अलग कारण |
1857 से सम्बन्ध: व्यपगत सिद्धांत से पीड़ित झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई और नागपुर के अमीर वर्ग ने 1857 के विद्रोह में सक्रिय भाग लिया। अवध के निष्कासित नवाब वाजिद अली शाह के सैनिक भी विद्रोह में शामिल हुए।
आधुनिकीकरण के कार्य
| क्षेत्र | कार्य | वर्ष |
|---|---|---|
| रेलवे | भारत में पहली रेल — बॉम्बे से थाने (34 किमी); ग्रेट इंडियन पेनिनसुला रेलवे | 16 अप्रैल 1853 |
| टेलीग्राफ | कलकत्ता से आगरा — पहली टेलीग्राफ लाइन | 1853 |
| डाक | डाक सुधार — पूरे भारत में एक पैसे की डाक व्यवस्था | 1854 |
| PWD | लोक निर्माण विभाग (Public Works Department) की स्थापना | 1854 |
| सिंचाई | गंगा नहर (Ganges Canal) पूर्ण | 1854 |
| शिक्षा | वुड्स डिस्पैच (1854) — शिक्षा का मैग्नाकार्टा; विश्वविद्यालय स्थापना | 1857 |
द्वितीय सिख युद्ध (1848–49) और पंजाब विलय
अवध का विलय (1856)
EXAM TIP
डलहौज़ी के अनिवार्य प्रश्न: व्यपगत सिद्धांत के अंतर्गत राज्य (सतारा, झाँसी, नागपुर); पहली रेल (16 अप्रैल 1853, बॉम्बे-थाने); वुड्स डिस्पैच 1854; कोहिनूर — दिलीप सिंह से विक्टोरिया को।
▌ भूमि व्यवस्थाओं की तुलना — Land Revenue Systems
| पहलू | स्थायी बंदोबस्त | रैयतवाड़ी | महलवाड़ी |
|---|---|---|---|
| लागू क्षेत्र | बंगाल, बिहार, ओडिशा, उत्तरी मद्रास | मद्रास, बॉम्बे | उत्तर-पश्चिम प्रांत, पंजाब, मध्य प्रांत |
| जमींदारी | जमींदार = स्थायी मालिक | कोई जमींदार नहीं | ग्राम सामूहिक स्वामित्व |
| कर का आधार | निश्चित (Fixed) — कभी नहीं बदला | भूमि की उत्पादकता के अनुसार | ग्राम की कुल उपज का हिस्सा |
| प्रवर्तक | कॉर्नवॉलिस, 1793 | थॉमस मुनरो, 1820 | मार्टिन बर्ड, 1833 |
| किसान की स्थिति | जमींदार पर निर्भर | सीधे सरकार से सम्बन्ध | ग्राम नेता के माध्यम से |
| कुल क्षेत्र (लगभग) | 19% भारत | 51% भारत | 30% भारत |
✦ वारेन हेस्टिंग्ज़: रेगुलेटिंग एक्ट 1773, पिट्स इंडिया एक्ट 1784, द्वैध शासन समाप्त, सुप्रीम कोर्ट 1774। ✦ कॉर्नवॉलिस: स्थायी बंदोबस्त 1793, कॉर्नवॉलिस कोड, ICS में भारतीयों पर रोक। ✦ जॉन शोर: अहस्तक्षेप नीति — 1795 खर्दा युद्ध में हस्तक्षेप नहीं। ✦ वेलेज़ली: सहायक संधि — पहला राज्य हैदराबाद 1798; टीपू 1799; बसीन 1802। ✦ मिंटो I: अमृतसर संधि 1809 — रणजीत सिंह के साथ सतलज सीमा। ✦ लॉर्ड हेस्टिंग्ज़: पिंडारी युद्ध + तृतीय मराठा युद्ध (1817–18) — पेशवा पद समाप्त। ✦ एम्हर्स्ट: पहला बर्मा युद्ध (1824–26), यांडबू की संधि। ✦ विलियम बेंटिंक: सती प्रथा उन्मूलन 1829, ठगी दमन, मैकॉले मिनट 1835। ✦ डलहौज़ी: व्यपगत सिद्धांत — झाँसी 1853, नागपुर 1854, अवध 1856; पहली रेल 16 अप्रैल 1853। ✦ वुड्स डिस्पैच 1854 — 'भारतीय शिक्षा का मैग्नाकार्टा'; विश्वविद्यालय 1857।
EXAM TIP
UPSC मुख्य प्रश्न: 'भारत में भूमि राजस्व प्रणालियों की तुलना करें।' तीनों प्रणालियाँ — स्थायी, रैयतवाड़ी, महलवाड़ी — उनके प्रवर्तक, क्षेत्र, किसानों पर प्रभाव याद करें। डलहौज़ी की नीतियाँ और 1857 विद्रोह का सम्बन्ध भी अक्सर पूछा जाता है।
▌ भूमिका (Introduction)
ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए अनेक नीतियों और युद्धों का सहारा लिया। ये नीतियाँ कूटनीतिक भी थीं और सैन्य भी। 18वीं सदी के अंत से 19वीं सदी के मध्य तक — लगभग 100 वर्षों में — EIC ने पूरे भारत को अपने अधीन कर लिया।
इस अध्याय में हम दो भागों में अध्ययन करेंगे: (1) ब्रिटिश विस्तार की प्रमुख नीतियाँ जैसे सहायक संधि, व्यपगत सिद्धांत, कुशासन नीति आदि; और (2) भारत के चार प्रमुख शक्तियों — मैसूर, मराठा, सिख और अफगान — के विरुद्ध लड़े गए सभी प्रमुख युद्ध।
▌ भाग—I : ब्रिटिश विस्तार की प्रमुख नीतियाँ
नीति 1 : सहायक संधि — Subsidiary Alliance
सहायक संधि लॉर्ड वेलेज़ली (1798–1805) की सर्वाधिक प्रभावी नीति थी। इसके माध्यम से भारतीय राज्यों को बिना युद्ध के ही ब्रिटिश अधीन बना लिया गया।
| संधि की शर्त | राज्य पर परिणाम |
|---|---|
| ब्रिटिश सेना की टुकड़ी अपने राज्य में रखनी होगी | स्वतंत्र सेना रखने का अधिकार समाप्त |
| सेना का खर्च राज्य देगा या भूमि हस्तांतरित करेगा | आर्थिक बोझ, भूमि हानि |
| ब्रिटिश रेजिडेंट राजधानी में रहेगा | कंपनी की सीधी निगरानी |
| बिना अनुमति कोई विदेशी या फ्रांसीसी नियुक्त नहीं | विदेश नीति पूर्णतः समाप्त |
| EIC राज्य को 'सुरक्षा' देगी | राज्य आक्रमण से 'सुरक्षित' किंतु परतंत्र |
| राज्य | संधि वर्ष | विशेष |
|---|---|---|
| हैदराबाद | 1798 | प्रथम राज्य; निज़ाम ने स्वेच्छा से स्वीकार किया |
| मैसूर | 1799 | टीपू की मृत्यु के बाद वाडियार वंश को पुनर्स्थापित कर संधि |
| तंजौर | 1799 | — |
| अवध (दूसरी बार) | 1801 | आधा राज्य EIC को देना पड़ा |
| पेशवा (बसीन संधि) | 1802 | मराठा संघ में विभाजन की शुरुआत |
| सिंधिया | 1803 | द्वितीय मराठा युद्ध के बाद |
| भोंसले (नागपुर) | 1803 | — |
आलोचना: सहायक संधि को 'गुलामी का सुनहरा पिंजरा' कहा गया। इससे राज्यों की स्वतंत्र सेना, विदेश नीति और आर्थिक स्वतंत्रता — सभी एक साथ समाप्त हो जाती थी। भारतीय जनता का पैसा ब्रिटिश सेना पर खर्च होता था।
नीति 2 : व्यपगत सिद्धांत — Doctrine of Lapse
व्यपगत सिद्धांत लॉर्ड डलहौज़ी (1848–56) की नीति थी। इसके अनुसार यदि कोई राज्य-प्रमुख नि:संतान मरे और उसे दत्तक पुत्र गोद लेने की अनुमति न हो तो उसका राज्य EIC में मिल जाता था।
| राज्य | वर्ष | शासक / विशेष परिस्थिति |
|---|---|---|
| सतारा | 1848 | छत्रपति का नि:संतान निधन; मराठाओं की पहली हानि |
| जैतपुर (बुंदेलखंड) | 1849 | नि:संतान शासक |
| संभलपुर (ओडिशा) | 1849 | नि:संतान शासक; दत्तक पुत्र अमान्य |
| बघाट (हिमाचल) | 1850 | नि:संतान शासक |
| उदयपुर (छत्तीसगढ़) | 1852 | नि:संतान शासक |
| झाँसी | 1853 | गंगाधर राव की मृत्यु; रानी लक्ष्मीबाई के दत्तक पुत्र दामोदर राव को अमान्य किया |
| नागपुर | 1854 | भोंसले वंश; नि:संतान राजा; मराठाओं की अंतिम हानि |
झाँसी की रानी: 1853 में झाँसी को व्यपगत सिद्धांत के तहत मिलाने पर रानी लक्ष्मीबाई ने कहा था — 'मैं अपनी झाँसी नहीं दूँगी।' 1857 के विद्रोह में उन्होंने वीरतापूर्वक अंग्रेजों से लोहा लिया।
EXAM TIP
परीक्षा में पूछे जाने वाले राज्यों का क्रम: सतारा 1848 → जैतपुर + संभलपुर 1849 → बघाट 1850 → उदयपुर 1852 → झाँसी 1853 → नागपुर 1854। अवध (1856) व्यपगत नहीं, कुशासन के आधार पर मिला।
नीति 3 : कुशासन का सिद्धांत — Doctrine of Misgovernance
जब किसी राज्य को व्यपगत सिद्धांत से नहीं मिलाया जा सकता था, तो EIC 'कुशासन' का आरोप लगाकर विलय करती थी।
नीति 4 : अहस्तक्षेप नीति — Policy of Non-Intervention
नीति 5 : रिंग फेंस नीति — Ring Fence Policy
वारेन हेस्टिंग्ज़ ने एक 'सुरक्षा घेरे' (Ring Fence) की नीति अपनाई। इसके तहत EIC के क्षेत्र के चारों ओर मित्र राज्यों की एक पट्टी बनाई जाती थी।
नीति 6 : फॉरवर्ड नीति बनाम 'मास्टरली इनएक्टिविटी'
| नीति | समर्थक | अर्थ | उदाहरण |
|---|---|---|---|
| Forward Policy (आगे बढ़ो) | लॉर्ड ऑकलैंड, डलहौज़ी | अफगानिस्तान में हस्तक्षेप; सीमाएँ आगे बढ़ाओ | प्रथम अफगान युद्ध 1839 |
| Masterly Inactivity (कुशल अकर्मण्यता) | जॉन लॉरेंस, लॉर्ड लॉरेंस | अफगानिस्तान में हस्तक्षेप न करो; प्रतीक्षा करो | 1857 के बाद की नीति |
▌ भाग—II : मैसूर के चार युद्ध (1767–1799)
मैसूर भारत की सबसे मजबूत दक्षिणी शक्ति थी। हैदर अली और टीपू सुल्तान ने अंग्रेजों को सबसे कड़ी टक्कर दी। दोनों के बीच चार युद्ध हुए।
| युद्ध | वर्ष | पक्ष | मुख्य घटना | परिणाम / संधि |
|---|---|---|---|---|
| प्रथम मैसूर युद्ध | 1767–69 | हैदर अली vs अंग्रेज (मद्रास) | हैदर ने मद्रास तक पहुँचकर अंग्रेजों को घेरा | मद्रास की संधि (1769) — यथास्थिति; अंग्रेजों ने हैदर को खतरे पर मदद का वचन दिया |
| द्वितीय मैसूर युद्ध | 1780–84 | हैदर अली + टीपू vs अंग्रेज | हैदर ने दोबारा मद्रास पर हमला; 1780 में पोर्टोनोवो — हैदर पराजित; हैदर की 1780 में मृत्यु; टीपू ने युद्ध जारी रखा | मंगलोर की संधि (1784) — वारेन हेस्टिंग्ज़; यथास्थिति |
| तृतीय मैसूर युद्ध | 1790–92 | टीपू vs कॉर्नवॉलिस + मराठा + हैदराबाद | त्रिगुट गठबंधन; श्रीरंगपट्टम घिरा | श्रीरंगपट्टम की संधि (1792) — आधा राज्य खोया; 3 करोड़ रुपये हर्जाना; दो पुत्र बंधक |
| चतुर्थ मैसूर युद्ध | 1799 | टीपू vs वेलेज़ली + हैदराबाद | 4 मई 1799 — श्रीरंगपट्टम का पतन; टीपू युद्धभूमि में वीरगति | मैसूर EIC अधीन; वाडियार वंश पुनर्स्थापित; सहायक संधि लागू |
▶ पूरा नाम: फतह अली टीपू; जन्म 1750; श्रीरंगपट्टम में 4 मई 1799 को वीरगति ▶ रॉकेट तकनीक: लोहे की नलियों वाली मिसाइल — 'कुसून-उल-रॉकेट'; पहला आधुनिक रॉकेट प्रयोग ▶ फ्रांसीसी संबंध: जेकोबिन क्लब की सदस्यता; फ्रांस से सैन्य सहायता माँगी ▶ प्रशासन: मैसूर में भूमि सुधार, नया कैलेंडर, नए सिक्के; व्यापार और वाणिज्य को बढ़ावा ▶ 'स्वतंत्रता की मृत्यु गुलामी के जीवन से बेहतर है' — टीपू सुल्तान का प्रसिद्ध कथन
EXAM TIP
मैसूर युद्धों के परीक्षा बिंदु: प्रथम — मद्रास की संधि 1769; द्वितीय — मंगलोर संधि 1784, हैदर की मृत्यु 1780; तृतीय — श्रीरंगपट्टम संधि 1792, कॉर्नवॉलिस; चतुर्थ — 4 मई 1799, वेलेज़ली, टीपू वीरगति।
▌ मराठा युद्ध — तीन एंग्लो-मराठा युद्ध (1775–1818)
मराठा भारत की सबसे बड़ी शक्ति थे जिन्होंने पूरे देश में अपना प्रभाव फैलाया था। अंग्रेजों से उनके तीन बड़े युद्ध हुए।
प्रथम मराठा युद्ध — 1775–1782 ई.
स्मरणीय: वडगाँव की संधि (1779) अंग्रेजों की सबसे अपमानजनक संधियों में से एक थी। हेस्टिंग्ज़ ने इसे अमान्य कर युद्ध जारी रखा और अंततः सालबाई में यथास्थिति संधि हुई।
द्वितीय मराठा युद्ध — 1803–1805 ई.
| लड़ाई | वर्ष | विरोधी | परिणाम |
|---|---|---|---|
| असाई (Assaye) | 1803 | सिंधिया vs आर्थर वेलेज़ली | अंग्रेज जीते; सिंधिया पराजित |
| अर्गाँव | 1803 | भोंसले vs आर्थर वेलेज़ली | भोंसले पराजित |
| लासवारी | 1803 | सिंधिया vs जनरल लेक | उत्तर में सिंधिया पराजित |
| दिल्ली विजय | 1803 | जनरल लेक | शाह आलम EIC अधीन |
तृतीय मराठा युद्ध — 1817–1818 ई.
नाना साहब: बाजीराव II के दत्तक पुत्र नाना साहब (धुंधूपंत) को भी EIC ने पेंशन देने से मना किया — यही 1857 विद्रोह में उनकी भागीदारी का बड़ा कारण बना।
| युद्ध | वर्ष | GG | मुख्य संधि/परिणाम |
|---|---|---|---|
| प्रथम मराठा | 1775–82 | वारेन हेस्टिंग्ज़ | सालबाई संधि; यथास्थिति |
| द्वितीय मराठा | 1803–05 | लॉर्ड वेलेज़ली | बसीन 1802; सिंधिया-भोंसले पराजित |
| तृतीय मराठा | 1817–18 | लॉर्ड हेस्टिंग्ज़ | पेशवा पद समाप्त; मराठा संघ समाप्त |
▌ सिख युद्ध — दो एंग्लो-सिख युद्ध (1845–1849)
रणजीत सिंह (1799–1839) की मृत्यु के बाद सिख साम्राज्य कमज़ोर पड़ गया और उत्तराधिकार संघर्ष छिड़ गया। इसका लाभ उठाकर EIC ने दो युद्धों में सिख साम्राज्य को समाप्त किया।
प्रथम सिख युद्ध — 1845–1846 ई.
| लड़ाई | तिथि | परिणाम |
|---|---|---|
| मुदकी | 18 दिसम्बर 1845 | अंग्रेज जीते; कठिन लड़ाई |
| फिरोज़शाह | 21–22 दिसम्बर 1845 | अंग्रेज जीते; सबसे कठिन युद्ध |
| अलीवाल | 28 जनवरी 1846 | हैरी स्मिथ; अंग्रेजों की आसान जीत |
| सोब्राओं | 10 फरवरी 1846 | अंतिम लड़ाई; सिख पराजित |
द्वितीय सिख युद्ध — 1848–1849 ई.
कोहिनूर: दिलीप सिंह (रणजीत सिंह के पुत्र) बाल महाराजा थे। उनसे कोहिनूर हीरा लेकर महारानी विक्टोरिया को भेंट किया गया — यह हीरा अब ब्रिटेन के राजमुकुट में है।
▌ अफगान युद्ध — तीन एंग्लो-अफगान युद्ध
प्रथम अफगान युद्ध — 1839–1842 ई.
| युद्ध | वर्ष | GG | कारण | परिणाम |
|---|---|---|---|---|
| प्रथम अफगान | 1839–42 | ऑकलैंड | रूसी खतरा; शुजा शाह को बिठाना | काबुल हत्याकांड; भारी पराजय |
| द्वितीय अफगान | 1878–80 | लॉर्ड लिटन | रूस-अफगान संधि 1878 | गंडमक की संधि; अफगानिस्तान पर आंशिक नियंत्रण |
| तृतीय अफगान | 1919 | चेम्सफोर्ड | अफगानिस्तान ने स्वतंत्रता माँगी | रावलपिंडी संधि 1919; अफगानिस्तान स्वतंत्र |
EXAM TIP
अफगान युद्धों में UPSC के प्रश्न: प्रथम (1839-42) — काबुल हत्याकांड, ऑकलैंड; द्वितीय (1878-80) — गंडमक की संधि, लिटन; तृतीय (1919) — रावलपिंडी संधि।
▌ अन्य प्रमुख युद्ध और विजय
| युद्ध/विजय | वर्ष | GG | परिणाम |
|---|---|---|---|
| रोहिल्ला युद्ध | 1774 | वारेन हेस्टिंग्ज़ | अवध की सहायता से रोहिल्खंड जीता |
| नेपाल युद्ध | 1814–16 | लॉर्ड हेस्टिंग्ज़ | सुगौली संधि; कुमाऊँ, गढ़वाल, तराई EIC को |
| पिंडारी युद्ध | 1817–18 | लॉर्ड हेस्टिंग्ज़ | लुटेरों का दमन; मध्य भारत में शांति |
| प्रथम बर्मा युद्ध | 1824–26 | एम्हर्स्ट | यांडबू संधि; अराकान, तेनासेरिम EIC को |
| सिंध विजय | 1843 | एलनबरो | चार्ल्स नेपियर; मियाँनी का युद्ध (17 फरवरी 1843) |
| भरतपुर विजय | 1826 | एम्हर्स्ट | जाट किले पर कब्जा |
| द्वितीय बर्मा युद्ध | 1852 | डलहौज़ी | पेगू (निचला बर्मा) EIC में मिला |
| तृतीय बर्मा युद्ध | 1885 | डफरिन | पूरा बर्मा ब्रिटिश भारत में मिला |
▌ ब्रिटिश विस्तार — एक दृष्टि में (Timeline)
| वर्ष | घटना | GG | महत्व |
|---|---|---|---|
| 1757 | प्लासी का युद्ध | क्लाइव | बंगाल में राजनीतिक शक्ति की शुरुआत |
| 1764 | बक्सर का युद्ध | क्लाइव (द्वितीय) | उत्तर भारत में ब्रिटिश सर्वोच्चता |
| 1765 | दीवानी अधिकार | क्लाइव | बंगाल, बिहार, ओडिशा का राजस्व EIC को |
| 1782 | सालबाई संधि | हेस्टिंग्ज़ | प्रथम मराठा युद्ध समाप्त |
| 1792 | श्रीरंगपट्टम संधि | कॉर्नवॉलिस | टीपू आधा कमज़ोर |
| 1799 | टीपू की मृत्यु | वेलेज़ली | मैसूर ब्रिटिश अधीन |
| 1802 | बसीन की संधि | वेलेज़ली | पेशवा ने सहायक संधि स्वीकार की |
| 1818 | पेशवा पद समाप्त | लॉर्ड हेस्टिंग्ज़ | मराठा संघ का अंत |
| 1843 | सिंध विजय | एलनबरो | पश्चिम में विस्तार |
| 1846 | लाहौर संधि | हार्डिंग | प्रथम सिख युद्ध समाप्त |
| 1849 | पंजाब विलय | डलहौज़ी | अंतिम बड़ी भारतीय शक्ति पराजित |
| 1856 | अवध विलय | डलहौज़ी | 1857 विद्रोह का तात्कालिक कारण |
✦ सहायक संधि (वेलेज़ली 1798): पहला राज्य हैदराबाद; राज्यों की सेना, विदेश नीति समाप्त। ✦ व्यपगत सिद्धांत (डलहौज़ी): सतारा 1848 → झाँसी 1853 → नागपुर 1854 — 7 राज्य मिले। ✦ अवध 1856 — व्यपगत नहीं, कुशासन के आधार पर; वाजिद अली शाह निर्वासित। ✦ मैसूर: चार युद्ध (1767–1799); टीपू सुल्तान 4 मई 1799 को वीरगति; रॉकेट का प्रयोग। ✦ मराठा: तीन युद्ध; सालबाई 1782, बसीन 1802, पेशवा पद समाप्त 1818। ✦ प्रथम सिख युद्ध: मुदकी, फिरोज़शाह, अलीवाल, सोब्राओं; लाहौर संधि मार्च 1846। ✦ द्वितीय सिख युद्ध: चिलियाँवाला, गुजरात; पंजाब विलय 29 मार्च 1849; कोहिनूर हीरा। ✦ काबुल हत्याकांड 1842: 16,500 सैनिक; डॉ. ब्रायडन एकमात्र जीवित; ऑकलैंड पद से हटे। ✦ सिंध विजय 1843: चार्ल्स नेपियर; मियाँनी का युद्ध (17 फरवरी 1843)। ✦ यांडबू संधि 1826: प्रथम बर्मा युद्ध; अराकान और तेनासेरिम EIC को मिले।
EXAM TIP
UPSC मुख्य प्रश्न: 'ब्रिटिश विस्तार की नीतियों की तुलना करें।' सहायक संधि vs व्यपगत सिद्धांत vs कुशासन नीति — तीनों की विशेषताएँ, उदाहरण और प्रभाव याद करें। मराठा, मैसूर और सिख युद्धों के सभी कमांडर, संधियाँ और तिथियाँ महत्वपूर्ण हैं।