⚖️ कहानी से शुरुआत: जब भारत के पहले गवर्नर जनरल पर मुक़दमा चला 1785 में वारेन हेस्टिंग्स भारत से इंग्लैंड लौटा। वह लगभग तेरह साल बंगाल का शासक रहा था। उसे उम्मीद थी कि घर लौटने पर उसका स्वागत एक विजेता की तरह होगा। उसने कलकत्ता मदरसा, एशियाटिक सोसाइटी और गीता के अंग्रेज़ी अनुवाद को संरक्षण भी दिया था। पर लंदन में उसका इंतज़ार कुछ और था। ब्रिटिश संसद के प्रसिद्ध वक्ता एडमंड बर्क ने उस पर बंगाल में अत्याचार और कुशासन का आरोप लगाया और उसके विरुद्ध महाभियोग चला दिया। यह मुक़दमा 1788 से 1795 तक, यानी लगभग सात साल चला। बर्क ने संसद में कहा कि वे भारत के उन लोगों की ओर से बोल रहे हैं जिनके अधिकारों को हेस्टिंग्स ने कुचला और जिनके देश को उजाड़ दिया। अंत में हेस्टिंग्स बरी हो गया। पर इस मुक़दमे का असली महत्त्व फ़ैसले में नहीं, इस सवाल में था कि इंग्लैंड की संसद एक गवर्नर जनरल से हिसाब क्यों माँग रही थी? जवाब साफ़ था। अब कंपनी का शासन केवल व्यापार का मामला नहीं रह गया था। करोड़ों लोगों पर राज हो रहा था, और संसद ने तय कर लिया था कि इस सत्ता पर उसका नियंत्रण रहेगा। इसकी नींव 1773 के रेग्युलेटिंग एक्ट और 1784 के पिट्स इंडिया एक्ट में पहले ही रखी जा चुकी थी। यहीं से अधिनियमों, संस्थाओं और अधिकारियों का वह ढाँचा बना, जिसने पूरे भारत को एक प्रशासन के नीचे बाँध दिया। आज की कई व्यवस्थाएँ, जैसे ज़िले का कलेक्टर, पुलिस अधिनियम, उच्च न्यायालय, सिविल सेवा और संविधान की कई धाराएँ, इसी दौर की देन हैं। तो यह ढाँचा बना कैसे? कंपनी के हाथ से सत्ता ब्रिटिश ताज के हाथ में कैसे पहुँची? गवर्नर जनरल की शक्तियाँ बार-बार क्यों बदली गईं? और जिस सिविल सेवा को ब्रिटिश शासन का इस्पाती ढाँचा कहा गया, उसके दरवाज़े भारतीयों के लिए इतने तंग क्यों रहे? यही इस अध्याय की कहानी है। आगे दो कहानियाँ भी मिलेंगी, जो एक गवर्नर जनरल के अपनी ही परिषद में अकेले पड़ जाने और भारतीयों के लिए सिविल सेवा की उम्र-दीवार का सच आसान तरीक़े से समझा देंगी। |
◆ जैसे-जैसे कंपनी का राज्य बढ़ा, उसे एक व्यापारिक संस्था से शासक सरकार बनना पड़ा। कंपनी के साथ भारत में शासन और सुधार के नए विचार आए, पर उसकी असली सत्ता सैनिक ताक़त पर टिकी थी।
◆ 1857 तक भारतीय उपमहाद्वीप के लगभग 63% भूभाग और 78% आबादी पर कंपनी का सीधा शासन था; शेष भूभाग पर उसका अप्रत्यक्ष प्रभाव था। व्यावहारिक रूप से पूरा भारत कंपनी के नियंत्रण में था।
◆ 19वीं सदी की शुरुआत में भाप के जहाज़ों ने इंग्लैंड से भारत की यात्रा 6–8 महीने से घटाकर लगभग तीन हफ़्ते कर दी। अब अधिक अंग्रेज़ अफ़सर और उनके परिवार भारत आने लगे, जिससे शासन पर इंग्लैंड की पकड़ बढ़ी।
◆ प्रशासनिक दृष्टि से भारत दो भागों में बँट गया: (1) ब्रिटिश भारत, जो प्रांतों और केंद्र-शासित क्षेत्रों में बँटा था और जिनके गवर्नर भारत के गवर्नर जनरल के प्रति उत्तरदायी थे; (2) रियासती भारत (देशी रियासतें), जहाँ राजा शासन करते थे पर अंग्रेज़ों की सर्वोच्चता मानते थे।
◆ 1857 की क्रांति के बाद कंपनी का शासन समाप्त हुआ और प्रशासन सीधे इंग्लैंड के ताज और संसद के नियंत्रण में आ गया।

◆ वारेन हेस्टिंग्स के समय तक कंपनी बंगाल के साथ बम्बई और मद्रास में भी सत्ता पा चुकी थी। ब्रिटिश इलाक़े मोटे तौर पर प्रशासनिक इकाइयों में बँटे थे, जिन्हें प्रेसीडेंसी कहा जाता था: बंगाल, मद्रास और बम्बई। हर एक का शासन एक गवर्नर के पास था और सबसे ऊपर गवर्नर जनरल होता था।
◆ ज़िले में सबसे बड़ा पद कलेक्टर का था। उसका मुख्य काम लगान और कर इकट्ठा करना तथा न्यायाधीशों, पुलिस अधिकारियों और दरोगा की सहायता से ज़िले में कानून-व्यवस्था बनाए रखना था। उसका कार्यालय, कलेक्टरेट, सत्ता और संरक्षण का नया केंद्र बन गया और उसने पुराने सत्ता-केंद्रों को हाशिये पर धकेल दिया।
क्षेत्र | प्रमुख कार्य |
पद | 1772 में बंगाल का गवर्नर; 1773 के रेग्युलेटिंग एक्ट के बाद बंगाल का पहला गवर्नर जनरल (1774–1785)। उसे अक्सर "भारत का पहला गवर्नर जनरल" कहा जाता है। |
द्वैध शासन का अंत (1772) | नायब दीवान हटाए; राजस्व और न्याय सीधे कंपनी के हाथ में; ख़ज़ाना मुर्शिदाबाद से कलकत्ता लाया गया; ज़िलों में अंग्रेज़ कलेक्टर। |
राजस्व | 1772 में ज़मींदारी की नीलामी करके पाँच वर्ष के ठेके (पंचसाला बंदोबस्त) पर लगान वसूली; 1777 में वार्षिक ठेका। |
न्याय (1772 की योजना) | हर ज़िले में दो अदालतें: दीवानी अदालत (मुखिया यूरोपीय कलेक्टर; हिंदू पंडित और मौलवी भारतीय कानूनों की व्याख्या करते थे) और फ़ौजदारी अदालत (क़ाज़ी और मुफ़्ती के अधीन, पर कलेक्टर की निगरानी में)। कलकत्ता में अपील के लिए सदर दीवानी अदालत और सदर निज़ामत अदालत। |
कानूनों का संकलन | पंडित धर्मशास्त्र की अलग-अलग व्याख्या करते थे, इसलिए 1775 में 11 पंडितों को हिंदू कानूनों का संकलन बनाने का काम मिला; एन. बी. हालहेड ने इसका अंग्रेज़ी अनुवाद किया। 1778 तक यूरोपीय न्यायाधीशों के लिए मुस्लिम कानूनों की संहिता भी तैयार हुई। |
संस्कृति और विद्या | कलकत्ता मदरसा (1781); विलियम जोन्स द्वारा एशियाटिक सोसाइटी ऑफ़ बंगाल (1784); चार्ल्स विल्किन्स का गीता का अंग्रेज़ी अनुवाद (1785), सबको हेस्टिंग्स का संरक्षण। |
युद्ध | रुहेला युद्ध (1774), प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध, द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध (पिछला अध्याय)। |
महाभियोग | इंग्लैंड लौटने पर एडमंड बर्क ने ब्रिटिश संसद में महाभियोग चलाया (1788–1795); अंत में वह बरी हुआ। |
🔍 आसान परिभाषा: महाभियोग (Impeachment) |
📘 परिभाषा: जब इंग्लैंड की संसद के निचले सदन (हाउस ऑफ़ कॉमन्स) में किसी उच्च अधिकारी पर दुराचरण का आरोप लगाया जाता है और ऊपरी सदन (हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स) में उस पर मुक़दमा चलता है, तो इसे महाभियोग कहते हैं। |
💡 आसान भाषा में: बड़े पद पर बैठे व्यक्ति पर संसद में चलने वाला "मुक़दमा"। 🏠 उदाहरण: जैसे किसी स्कूल के प्रधानाचार्य पर गड़बड़ी का आरोप लगे, तो अभिभावक-समिति शिकायत करे और प्रबंधन-मंडल सुनवाई करके फ़ैसला दे। आज भारत में राष्ट्रपति और न्यायाधीशों को हटाने की प्रक्रिया भी इसी विचार से निकली है। |
◆ 1786 के अधिनियम से कॉर्नवालिस को गवर्नर जनरल के साथ प्रधान सेनापति भी बनाया गया और उसे विशेष परिस्थितियों में अपनी परिषद के निर्णय को रद्द करने का अधिकार मिला।
◆ सिविल सेवा का संगठन: कर्मचारियों के वेतन बढ़ाए, निजी व्यापार और उपहार लेने पर रोक लगाई, वरिष्ठता के आधार पर पदोन्नति का नियम बनाया। पर ऊँचे पद केवल यूरोपीयों के लिए रखे; भारतीयों को बाहर रखा गया।
◆ कॉर्नवालिस कोड (1793): राजस्व और न्याय का पृथक्करण; कलेक्टर से न्यायिक शक्ति लेकर ज़िला न्यायाधीश का अलग पद बनाया; ज़िला अदालतें और (कलकत्ता, ढाका, मुर्शिदाबाद, पटना में) चार प्रांतीय अपील / सर्किट अदालतें; "कानून की संप्रभुता" (अधिकारी भी कानून के अधीन) का सिद्धांत।
◆ पुलिस: ज़मींदारों से पुलिस के अधिकार छीने; ज़िलों को थानों में बाँटा, हर थाने पर दरोगा (ज़िला मजिस्ट्रेट द्वारा नियुक्त)।
◆ स्थायी बंदोबस्त (1793) भी उसी की देन था (विस्तार "आर्थिक नीतियाँ" अध्याय में)। तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध भी उसी के समय हुआ।
कंपनी के बढ़ते राज्य, कर्मचारियों के भ्रष्टाचार, बंगाल के अकाल (1770) और कंपनी की आर्थिक कठिनाइयों के कारण ब्रिटिश संसद ने कंपनी पर धीरे-धीरे नियंत्रण बढ़ाना शुरू किया। कंपनी का चार्टर (अनुज्ञा-पत्र) हर 20 वर्ष पर नवीनीकृत होता था और हर बार संसद नए सुधार जोड़ती थी। पूरे विकास-क्रम को पहले एक नज़र में देख लें:

📖 कहानी 1: जब गवर्नर जनरल अपनी ही परिषद में अकेला पड़ गया 1774 में कलकत्ता में नई परिषद बैठी। रेग्युलेटिंग एक्ट के अनुसार गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स के साथ चार सदस्यों की कार्यकारिणी परिषद थी, जिसमें क्लेवरिंग, मॉनसन, फ्रांसिस और बारवेल थे। नियम यह था कि हर फ़ैसला बहुमत से होगा। गवर्नर जनरल को केवल बराबरी की स्थिति में एक निर्णायक मत मिलता था। संसद का इरादा तो गवर्नर जनरल पर निगरानी रखने का था, पर नतीजा उलटा निकला। इंग्लैंड से आए तीन सदस्य अक्सर हेस्टिंग्स से असहमत रहते थे। बारवेल अकेले उसके साथ थे। इसलिए पाँच में से तीन की राय अक्सर भारी पड़ती थी, और जिसे पूरे बंगाल का शासक कहा जाता था, वह कई बार अपने ही फ़ैसले परिषद से पारित नहीं करा पाता था। कलकत्ता में सर्वोच्च न्यायालय भी बना था, पर उसके और परिषद के अधिकारों की सीमा साफ़ न होने से आपस में टकराव होते रहे। यह खींचतान तब कुछ कम हुई जब परिषद के एक सदस्य की मृत्यु हो गई। इसके बाद परिषद में बराबरी की स्थिति बनने लगी और गवर्नर जनरल का निर्णायक मत काम आने लगा। पर इंग्लैंड की संसद को सबक मिल चुका था। 1781 के संशोधन अधिनियम ने परिषद और न्यायालय की सीमाएँ तय कीं, और 1784 के पिट्स इंडिया एक्ट ने परिषद को चार से घटाकर तीन सदस्यों की कर दिया, ताकि गवर्नर जनरल को केवल एक सदस्य के समर्थन से बहुमत मिल जाए। 🧭 इस कहानी से कौन-सी अवधारणा साफ़ हुई ✔ रेग्युलेटिंग एक्ट की कमी — गवर्नर जनरल को परिषद के बहुमत के सामने लगभग असहाय बना दिया गया था। ✔ अधिकार-क्षेत्र का टकराव — सर्वोच्च न्यायालय और परिषद के अधिकारों की सीमा साफ़ नहीं थी, इसलिए 1781 के संशोधन अधिनियम की ज़रूरत पड़ी। ✔ 1784 का सुधार — परिषद को 4 से 3 सदस्यों की करके गवर्नर जनरल की स्थिति मज़बूत की गई और ऊपर से बोर्ड ऑफ़ कंट्रोल ने नियंत्रण बढ़ाया। 📝 परीक्षा के लिए: रेग्युलेटिंग एक्ट 1773: गवर्नर जनरल + 4 सदस्यों की परिषद (क्लेवरिंग, मॉनसन, फ्रांसिस, बारवेल), निर्णय बहुमत से → 1781 संशोधन अधिनियम → पिट्स इंडिया एक्ट 1784: परिषद 3 सदस्य + बोर्ड ऑफ़ कंट्रोल (दोहरा नियंत्रण, 1858 तक)। |
कंपनी के शासन को नियमित (रेग्युलेट) करने का ब्रिटिश संसद का पहला प्रयास। द्वैध शासन की विफलता, 1770 के अकाल और कंपनी के दिवालियेपन (उसे सरकार से ऋण माँगना पड़ा) के बाद यह ज़रूरी हो गया था।
1. बंगाल के गवर्नर को "बंगाल का गवर्नर जनरल" बनाया गया; पहले गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स बने।
2. बम्बई और मद्रास के गवर्नर (युद्ध और संधि के मामलों में) बंगाल के गवर्नर जनरल के अधीन कर दिए गए। यह केंद्रीकरण की शुरुआत थी।
3. गवर्नर जनरल की सहायता के लिए 4 सदस्यों की कार्यकारिणी परिषद (क्लेवरिंग, मॉनसन, फ्रांसिस, बारवेल); निर्णय बहुमत से। ये सदस्य अक्सर हेस्टिंग्स से असहमत रहते थे।
4. कलकत्ता में सर्वोच्च न्यायालय (1774); मुख्य न्यायाधीश सर एलिजा इम्पे और तीन अन्य न्यायाधीश।
5. कंपनी के कर्मचारियों के निजी व्यापार और भारतीयों से उपहार/रिश्वत लेने पर रोक।
6. कंपनी के निदेशकों (कोर्ट ऑफ़ डायरेक्टर्स) को भारत के राजस्व, नागरिक और सैनिक मामलों की जानकारी ब्रिटिश सरकार को देनी होगी।
⚠️ रेग्युलेटिंग एक्ट की कमियाँ गवर्नर जनरल अपनी परिषद के बहुमत के सामने असहाय था; सर्वोच्च न्यायालय और परिषद के अधिकार-क्षेत्र स्पष्ट नहीं थे, जिससे टकराव हुए; बम्बई–मद्रास पर नियंत्रण अधूरा था। इन्हें ठीक करने के लिए 1781 का संशोधन अधिनियम (एक्ट ऑफ़ सेटलमेंट) आया: गवर्नर जनरल और परिषद के सरकारी कार्य सर्वोच्च न्यायालय के क्षेत्र से बाहर किए गए, राजस्व मामले भी बाहर हुए, और भारतीयों के व्यक्तिगत मामलों में उनके अपने (हिंदू/मुस्लिम) कानून लागू करने का नियम बना। |
1. बोर्ड ऑफ़ कंट्रोल (6 सदस्य: ब्रिटिश वित्त मंत्री, एक राज्य सचिव और चार प्रिवी काउंसिलर) बना, जो कंपनी के राजनीतिक, सैनिक और राजस्व मामलों पर नियंत्रण रखेगा।
2. कोर्ट ऑफ़ डायरेक्टर्स (कंपनी) केवल व्यापारिक मामले और अधिकारियों की नियुक्ति देखते रहे। इस तरह "दोहरे नियंत्रण" (Double Government) की व्यवस्था बनी, जो 1858 तक चली।
3. गवर्नर जनरल की परिषद 4 से घटाकर 3 सदस्यों की की गई (इससे गवर्नर जनरल को एक सदस्य के समर्थन से बहुमत मिल जाता था)।
4. भारत में कंपनी के इलाक़ों को पहली बार "भारत में ब्रिटिश अधिकार-क्षेत्र" (British Possessions in India) कहा गया।
5. बम्बई और मद्रास पर गवर्नर जनरल का नियंत्रण युद्ध, राजस्व और कूटनीति में और पक्का हुआ।

चार्टर एक्ट | प्रमुख प्रावधान | महत्व |
1793 | कंपनी का व्यापारिक एकाधिकार 20 वर्ष और बढ़ाया। गवर्नर जनरल को परिषद के निर्णय रद्द करने का अधिकार पक्का; बम्बई–मद्रास पर और अधिक नियंत्रण। बोर्ड ऑफ़ कंट्रोल के सदस्यों का वेतन भारतीय राजस्व से। | प्रशासनिक केंद्रीकरण |
1813 | कंपनी का भारत के साथ व्यापारिक एकाधिकार समाप्त (केवल चाय और चीन के साथ व्यापार का एकाधिकार बचा); अब सभी ब्रिटिश व्यापारी भारत से व्यापार कर सकते थे। ईसाई मिशनरियों को भारत आने और धर्म-प्रचार की अनुमति। भारतीयों की शिक्षा पर हर वर्ष कम से कम 1 लाख रुपये ख़र्च करने का प्रावधान। स्थानीय सरकारों को कर लगाने का अधिकार। | मुक्त व्यापार और शिक्षा पर सरकारी ख़र्च की शुरुआत |
1833 | बंगाल का गवर्नर जनरल अब "भारत का गवर्नर जनरल"; पहला: लॉर्ड विलियम बेंटिंक। सारी नागरिक और सैनिक शक्तियाँ उसी में केंद्रित। बम्बई और मद्रास की विधायी शक्ति छीनी गई; पूरे ब्रिटिश भारत के लिए कानून बनाने का अधिकार केवल गवर्नर जनरल की परिषद को। कंपनी का सारा व्यापार बंद; वह केवल प्रशासनिक संस्था रह गई। परिषद में चौथा विधि (कानून) सदस्य जोड़ा गया: पहला मैकॉले; कानूनों के संहिताकरण के लिए विधि आयोग (मैकॉले की अध्यक्षता में)। धारा 87: किसी भारतीय को धर्म, जन्मस्थान, वंश या रंग के आधार पर कंपनी की किसी नौकरी से वंचित नहीं किया जाएगा (व्यवहार में लागू नहीं हुआ)। दास प्रथा को कम करने का निर्देश; आगे 1843 में दास प्रथा ग़ैरक़ानूनी घोषित हुई। | केंद्रीकरण की पराकाष्ठा; अखिल भारतीय प्रशासन |
1853 | विधायी और कार्यकारी कार्यों को पहली बार अलग किया: गवर्नर जनरल की परिषद में कानून बनाने के लिए 6 अतिरिक्त विधायी सदस्य ("भारतीय / केंद्रीय विधान परिषद", जो एक "लघु संसद" की तरह काम करने लगी); इनमें 4 सदस्य बंगाल, मद्रास, बम्बई और आगरा की प्रांतीय सरकारों से, यानी स्थानीय प्रतिनिधित्व की शुरुआत। सिविल सेवा में भर्ती के लिए खुली प्रतियोगिता (संरक्षण/सिफ़ारिश की जगह योग्यता); इसके लिए मैकॉले समिति (1854); परीक्षा भारतीयों के लिए भी खुली। कंपनी का शासन इस बार किसी निश्चित अवधि के बिना बढ़ाया गया, यानी संसद जब चाहे समाप्त कर सकती थी। | अंतिम चार्टर एक्ट; संसदीय शासन के बीज |
🔍 आसान परिभाषा: केंद्रीकरण और विकेंद्रीकरण (Centralisation & Decentralisation) |
📘 परिभाषा: केंद्रीकरण = शक्तियों को एक केंद्र (यहाँ कलकत्ता में गवर्नर जनरल) के हाथ में इकट्ठा करना। विकेंद्रीकरण = शक्तियों का कुछ भाग प्रांतों और स्थानीय निकायों को वापस देना। |
💡 आसान भाषा में: 1773 से 1833 तक सारी ताक़त "ऊपर" खिंचती गई; 1861 के बाद कुछ ताक़त "नीचे" (प्रांतों, नगरपालिकाओं) की ओर भेजी जाने लगी। 🏠 उदाहरण: जैसे किसी बड़े परिवार में पहले सारे फ़ैसले मुखिया ख़ुद लेता हो; फिर परिवार बहुत बड़ा हो जाए तो वह हर घर को अपने छोटे फ़ैसले ख़ुद लेने दे, पर बड़े फ़ैसले अपने पास रखे। |
1857 के महान विद्रोह के बाद ब्रिटिश संसद ने 2 अगस्त 1858 को यह अधिनियम पारित किया और कंपनी से सत्ता लेकर सीधे ब्रिटिश ताज (सम्राट) को सौंप दी।
1. ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन समाप्त; भारत का शासन अब महारानी के नाम पर चलेगा।
2. बोर्ड ऑफ़ कंट्रोल और कोर्ट ऑफ़ डायरेक्टर्स समाप्त; दोहरा नियंत्रण ख़त्म।
3. नया पद भारत सचिव (Secretary of State for India), जो ब्रिटिश मंत्रिमंडल का सदस्य और ब्रिटिश संसद के प्रति उत्तरदायी था; उसकी सहायता के लिए 15 सदस्यीय इंडिया काउंसिल (सलाहकार परिषद)। पहले भारत सचिव: लॉर्ड स्टेनली।
4. भारत के गवर्नर जनरल को "वायसराय" (ताज का प्रत्यक्ष प्रतिनिधि) की उपाधि; पहले वायसराय: लॉर्ड कैनिंग, जो कंपनी के अंतिम गवर्नर जनरल भी थे।
5. भारत सचिव और उसकी परिषद एक "निगम निकाय" होगी, जिस पर भारत और इंग्लैंड में मुक़दमा चलाया जा सकता था।
📜 महारानी विक्टोरिया की घोषणा (1 नवंबर 1858) लॉर्ड कैनिंग ने इलाहाबाद के दरबार में महारानी की घोषणा पढ़ी। इसे अक्सर "भारतीयों का मैग्ना कार्टा" कहा जाता है। मुख्य बातें: (1) राज्य-विस्तार (विलय) की नीति समाप्त; देशी राजाओं के अधिकार, गौरव और सम्मान की रक्षा होगी; उन्हें दत्तक पुत्र गोद लेने की अनुमति (1862 में सनदें दी गईं)। (2) भारतीयों के धार्मिक और सामाजिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं। (3) योग्यता के आधार पर भारतीयों को सरकारी नौकरियों में समान अवसर। (4) भारतीय परंपराओं और रीति-रिवाजों का आदर। (5) अंग्रेज़ों की हत्या में सीधे शामिल लोगों को छोड़कर विद्रोहियों को क्षमादान। पर व्यवहार में "समान अवसर" का वादा अधूरा रहा; 1857 के बाद अंग्रेज़ों ने "फूट डालो और राज करो" को नीति का प्रमुख आधार बना लिया। |
1857 के बाद अंग्रेज़ों ने महसूस किया कि भारतीयों से पूरी तरह कटकर शासन चलाना ख़तरनाक है। इसलिए उन्होंने धीरे-धीरे भारतीयों को कानून बनाने वाली परिषदों में जगह दी। पर हर सुधार "बहुत कम और बहुत देर से" आया और उसके साथ "फूट डालो और राज करो" के बीज भी बोए गए। इस विकास को चार चरणों में समझें: मनोनयन (1861) → अप्रत्यक्ष चुनाव (1892) → पृथक निर्वाचन (1909) → आंशिक उत्तरदायी सरकार (1919) → प्रांतीय स्वायत्तता (1935) → स्वतंत्रता (1947)।
उद्देश्य: 1857 के बाद भारतीयों, विशेषकर नरम विचार वाले प्रभावशाली वर्ग को संतुष्ट करना और शासन में उनका सहयोग लेना।
1. भारतीयों का मनोनयन: वायसराय की परिषद में कानून बनाने के लिए 6 से 12 अतिरिक्त सदस्य, जिनमें कम से कम आधे ग़ैर-सरकारी। 1862 में लॉर्ड कैनिंग ने तीन भारतीयों को मनोनीत किया: बनारस के राजा (देव नारायण सिंह), पटियाला के महाराजा (नरेंद्र सिंह) और सर दिनकर राव।
2. वायसराय की कार्यकारिणी परिषद के साधारण सदस्य 4 से बढ़ाकर 5 किए गए (पाँचवाँ सदस्य विधि-विशेषज्ञ)।
3. पोर्टफोलियो (विभागीय) प्रणाली को मान्यता: लॉर्ड कैनिंग ने परिषद के हर सदस्य को एक-एक विभाग सौंपा, जिससे वह उस विभाग के मामलों में सरकार की ओर से निर्णय ले सके। यही आगे मंत्रिमंडल प्रणाली का आधार बनी।
4. अध्यादेश (Ordinance): आपातकाल में वायसराय परिषद की सहमति के बिना अध्यादेश जारी कर सकता था, जिसकी अवधि 6 महीने थी।
5. विकेंद्रीकरण की शुरुआत: 1833 में छीनी गई बम्बई और मद्रास की कानून बनाने की शक्ति वापस दी गई। नई विधान परिषदें: बंगाल (1862), उत्तर-पश्चिमी प्रांत (1886), पंजाब (1897)।
6. कोई भी विधेयक वायसराय की स्वीकृति के बिना कानून नहीं बनता था; भारत सचिव की सलाह पर ब्रिटिश ताज उसे रद्द कर सकता था। वायसराय प्रांतीय कानूनों को संशोधित या रद्द कर सकता था।
7. इसी वर्ष भारतीय उच्च न्यायालय अधिनियम और भारतीय सिविल सेवा अधिनियम (1861) भी पारित हुए, और पुलिस अधिनियम (1861) बना।
⚠️ 1861 की सीमाएँ परिषद केवल कानून बनाने की सलाहकार संस्था थी; सदस्य प्रश्न नहीं पूछ सकते थे, बजट पर चर्चा नहीं कर सकते थे। मनोनीत भारतीय प्रायः राजा-महाराजा और ज़मींदार थे, आम जनता के प्रतिनिधि नहीं। |
🔍 आसान परिभाषा: अध्यादेश (Ordinance) |
📘 परिभाषा: जब विधान परिषद (या आज संसद) का सत्र न चल रहा हो और तुरंत कानून की ज़रूरत हो, तब कार्यपालिका का प्रमुख (वायसराय, आज राष्ट्रपति/राज्यपाल) जो अस्थायी कानून जारी करता है, वह अध्यादेश है। |
💡 आसान भाषा में: "कानून बनाने का आपातकालीन रास्ता" — बाद में परिषद की स्वीकृति न मिले तो यह तय समय के बाद अपने-आप समाप्त हो जाता है। 🏠 उदाहरण: 1861 में वायसराय का अध्यादेश 6 महीने तक चलता था। आज भारतीय संविधान के अनुच्छेद 123 (राष्ट्रपति) और अनुच्छेद 213 (राज्यपाल) में यही शक्ति है। यानी इसकी जड़ 1861 में है। |
पृष्ठभूमि: 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई और उसने शुरुआत से ही परिषदों के विस्तार और उनमें चुने हुए सदस्यों की माँग की। उसी के दबाव में यह अधिनियम आया।
1. केंद्रीय विधान परिषद में अतिरिक्त सदस्य न्यूनतम 10 और अधिकतम 16; प्रांतीय परिषदों में भी सदस्य बढ़ाए गए (बंगाल में अधिकतम 20)।
2. अप्रत्यक्ष चुनाव की शुरुआत: नगरपालिकाएँ, ज़िला बोर्ड, विश्वविद्यालय, व्यापार मंडल आदि सदस्यों के नाम "सिफ़ारिश" करते थे और सरकार उन्हें मनोनीत करती थी। "चुनाव" शब्द का प्रयोग नहीं हुआ; चुने गए सदस्यों को भी मनोनीत ही माना जाता था।
3. बजट पर चर्चा का अधिकार, पर मतदान नहीं।
4. सदस्य सरकार से प्रश्न पूछ सकते थे (पूर्व सूचना देकर), पर पूरक प्रश्न नहीं।
💡 याद रखने की ट्रिक 1861 = मनोनयन, 1892 = अप्रत्यक्ष चुनाव (सिफ़ारिश) + बजट पर चर्चा + प्रश्न। कांग्रेस ने इसे अपर्याप्त माना; यही असंतोष आगे उग्रवादी राष्ट्रवाद का एक कारण बना। |
नाम: भारत सचिव जॉन मार्ले और वायसराय लॉर्ड मिंटो द्वितीय। पृष्ठभूमि: बंगाल विभाजन (1905) के विरुद्ध स्वदेशी आंदोलन, उग्रवादियों और क्रांतिकारियों का उभार, सूरत विभाजन (1907) और मुस्लिम लीग (1906) की स्थापना। अंग्रेज़ नरमपंथियों को संतुष्ट कर उग्रवादियों को अलग-थलग करना और मुसलमानों को कांग्रेस से दूर रखना चाहते थे। 1 अक्टूबर 1906 को आग़ा ख़ाँ के नेतृत्व में मुस्लिम प्रतिनिधिमंडल शिमला में मिंटो से मिला और पृथक प्रतिनिधित्व माँगा।
1. केंद्रीय विधान परिषद के अतिरिक्त सदस्य 16 से बढ़ाकर 60; पर केंद्र में सरकारी बहुमत बना रहा।
2. प्रांतीय परिषदों में ग़ैर-सरकारी सदस्यों का बहुमत (हालाँकि इनमें मनोनीत भी शामिल थे)।
3. सदस्य पूरक प्रश्न पूछ सकते थे, बजट और सार्वजनिक हित के विषयों पर प्रस्ताव (संकल्प) रख सकते थे।
4. वायसराय की कार्यकारिणी परिषद में पहले भारतीय: सत्येंद्र प्रसाद सिन्हा (विधि सदस्य, 1909)। इससे पहले 1907 में भारत सचिव की इंडिया काउंसिल में दो भारतीय (के. जी. गुप्ता और सैयद हुसैन बिलग्रामी) लिए गए थे।
5. मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन मंडल: मुस्लिम सीटों पर केवल मुस्लिम मतदाता ही मतदान करेंगे। इसी कारण लॉर्ड मिंटो को "साम्प्रदायिक निर्वाचन पद्धति का जनक" कहा जाता है (मार्ले और मिंटो दोनों को इसका जन्मदाता माना जाता है)।
6. चुनाव फिर भी अप्रत्यक्ष रहे और मताधिकार बहुत सीमित था। अधिनियम में उत्तरदायी सरकार का कोई वादा नहीं था; मार्ले ने स्वयं कहा था कि इनका उद्देश्य भारत में संसदीय शासन स्थापित करना नहीं है।
🔍 आसान परिभाषा: पृथक निर्वाचन मंडल (Separate Electorate) |
📘 परिभाषा: ऐसी चुनाव व्यवस्था जिसमें किसी धार्मिक या सामाजिक समुदाय के लिए अलग सीटें हों और उन सीटों पर केवल उसी समुदाय के मतदाता वोट डालें। |
💡 आसान भाषा में: हिंदू मतदाता हिंदू प्रत्याशी को, मुस्लिम मतदाता मुस्लिम प्रत्याशी को — दोनों समुदायों को एक-दूसरे का वोट माँगने की ज़रूरत ही नहीं रही। 🏠 उदाहरण: इससे नेताओं को पूरे समाज के बजाय केवल अपने समुदाय को ख़ुश करना होता था। 1909 में मुसलमानों से शुरू होकर 1919 में सिखों, भारतीय ईसाइयों, एंग्लो-इंडियनों, यूरोपीयों तक और 1932 (साम्प्रदायिक पंचाट) में दलित वर्गों तक फैलाने की कोशिश हुई। कई इतिहासकार इसे आगे चलकर विभाजन की ओर ले जाने वाली राजनीति की शुरुआत मानते हैं। |
पृष्ठभूमि: प्रथम विश्व युद्ध में भारत का सहयोग, होमरूल आंदोलन (1916), लखनऊ समझौता (1916)। भारत सचिव एडविन मॉन्टेग्यू ने 20 अगस्त 1917 को ब्रिटिश संसद में घोषणा की कि ब्रिटिश नीति का लक्ष्य "प्रशासन की हर शाखा में भारतीयों की बढ़ती भागीदारी और स्वशासी संस्थाओं का क्रमिक विकास, ताकि भारत में धीरे-धीरे उत्तरदायी सरकार स्थापित हो" है। इसी को "अगस्त घोषणा" कहते हैं। मॉन्टेग्यू और वायसराय चेम्सफोर्ड की रिपोर्ट (1918) पर यह अधिनियम बना और 1921 से लागू हुआ।
◆ प्रांतीय विषयों को दो भागों में बाँटा गया: आरक्षित विषय (गवर्नर और उसकी कार्यकारिणी परिषद के पास; ये विधान परिषद के प्रति उत्तरदायी नहीं) और हस्तांतरित विषय (गवर्नर, भारतीय मंत्रियों की सहायता से; मंत्री विधान परिषद के प्रति उत्तरदायी)।

🔒 आरक्षित विषय (गवर्नर + परिषद) ✔ वित्त (ख़ज़ाना) ✔ पुलिस, कानून-व्यवस्था, न्याय ✔ भू-राजस्व ✔ सिंचाई ✔ प्रेस, श्रम, अकाल राहत | 🔓 हस्तांतरित विषय (गवर्नर + भारतीय मंत्री) ✔ शिक्षा ✔ स्वास्थ्य, चिकित्सा, स्वच्छता ✔ स्थानीय स्वशासन ✔ कृषि, सार्वजनिक निर्माण ✔ उद्योग, आबकारी |
⚠️ द्वैध शासन क्यों विफल हुआ? पैसा (वित्त) आरक्षित था और काम (शिक्षा, स्वास्थ्य) हस्तांतरित — भारतीय मंत्री योजनाएँ बनाते, पर वित्त विभाग धन नहीं देता था। गवर्नर मंत्रियों की बात अनसुनी कर सकता था। मंत्री कहते थे कि उनके पास "ज़िम्मेदारी है, पर अधिकार नहीं"। |
1. द्विसदनीय केंद्रीय विधान मंडल: केंद्रीय विधान सभा (निचला सदन) — 145 सदस्य (104 निर्वाचित, 41 मनोनीत), कार्यकाल 3 वर्ष; राज्य परिषद (उच्च सदन) — 60 सदस्य (33 निर्वाचित, 27 मनोनीत), कार्यकाल 5 वर्ष।
2. प्रत्यक्ष चुनाव पहली बार; पर मताधिकार संपत्ति, कर या शिक्षा की शर्तों पर, इसलिए बहुत कम लोग वोट दे सकते थे।
3. केंद्र में द्वैध शासन नहीं; वायसराय विधान मंडल के प्रति उत्तरदायी नहीं था और पारित विधेयकों को रोक सकता था।
4. वायसराय की कार्यकारिणी परिषद के 6 सदस्यों में (प्रधान सेनापति को छोड़कर) 3 भारतीय।
5. पृथक निर्वाचन का विस्तार: सिखों, भारतीय ईसाइयों, एंग्लो-इंडियनों और यूरोपीयों तक।
6. विषयों का बँटवारा: केंद्रीय सूची (विदेशी मामले, रक्षा, डाक-तार, सार्वजनिक ऋण आदि) और प्रांतीय सूची (स्थानीय स्वशासन, शिक्षा, चिकित्सा, भू-राजस्व, अकाल सहायता, कृषि आदि)। केंद्र और प्रांतों के बजट अलग किए गए (1921)।
7. भारत सचिव का वेतन अब ब्रिटिश कोष से (पहले भारतीय राजस्व से मिलता था)।
8. लंदन में भारतीय उच्चायुक्त (High Commissioner) का नया पद; भारत सचिव के कुछ कार्य उसे सौंपे गए।
9. लोक सेवा आयोग की स्थापना का प्रावधान; केंद्रीय लोक सेवा आयोग 1926 में बना।
10. 10 वर्ष बाद अधिनियम की समीक्षा के लिए वैधानिक आयोग; इसी के अनुसार साइमन कमीशन (1927) नियुक्त हुआ।
🗣️ प्रतिक्रिया कांग्रेस के विशेष अधिवेशन (1918, बम्बई) ने इन सुधारों को "निराशाजनक और असंतोषजनक" कहा। तिलक ने इसे "सूर्यविहीन सवेरा" कहा। सुधारों के साथ ही रौलेट एक्ट (1919) और जलियाँवाला बाग़ की घटनाओं ने इसकी चमक और फीकी कर दी। |
🔍 आसान परिभाषा: द्वैध शासन (Dyarchy) |
📘 परिभाषा: एक ही प्रशासनिक इकाई (यहाँ प्रांत) में दो तरह के शासक — एक जनता के प्रतिनिधियों के प्रति उत्तरदायी (मंत्री) और दूसरा उत्तरदायी नहीं (गवर्नर की परिषद)। |
💡 आसान भाषा में: "आधी सरकार जनता की, आधी अंग्रेज़ों की" — इसीलिए इसे आंशिक उत्तरदायी सरकार कहा गया। 🏠 उदाहरण: मान लीजिए घर में बच्चों को बाग़ीचा सँभालने का काम दिया जाए पर पैसों की तिजोरी पिता के पास रहे; बच्चे पौधे ख़रीदना चाहें तो भी पिता की मर्ज़ी चलेगी। 1919 में भारतीय मंत्रियों की यही हालत थी। |
पृष्ठभूमि: साइमन कमीशन (1927–30), तीन गोलमेज़ सम्मेलन (1930–32), साम्प्रदायिक पंचाट (16 अगस्त 1932), पूना समझौता (सितंबर 1932) और श्वेत पत्र (1933); फिर संसद की संयुक्त समिति की रिपोर्ट पर यह अधिनियम अगस्त 1935 में पारित हुआ। यह ब्रिटिश संसद द्वारा भारत के लिए पारित सबसे लंबा अधिनियम था: 321 धाराएँ और 10 अनुसूचियाँ। आज के भारतीय संविधान का बड़ा हिस्सा इसी से लिया गया है।
विषय | प्रावधान |
अखिल भारतीय संघ | ब्रिटिश प्रांतों और देशी रियासतों को मिलाकर संघ (Federation) का प्रस्ताव; रियासतों का शामिल होना स्वैच्छिक। पर पर्याप्त रियासतों ने सहमति नहीं दी, इसलिए संघ कभी बना ही नहीं। |
संघीय विधान मंडल | राज्य परिषद (उच्च सदन): 260 सदस्य — 156 ब्रिटिश भारत + 104 रियासतें; स्थायी सदन, हर 3 वर्ष में एक-तिहाई सदस्य बदलते। संघीय सभा (निचला सदन): 375 सदस्य — 250 ब्रिटिश भारत + 125 रियासतें; कार्यकाल 5 वर्ष। |
तीन सूचियाँ | संघ सूची: 59 विषय (सेना, विदेश, डाक-तार, रेल, संघ लोक सेवा, बीमा आदि) प्रांतीय सूची: 54 विषय (शिक्षा, भू-राजस्व, स्थानीय स्वशासन, कानून-व्यवस्था, स्वास्थ्य, कृषि, सिंचाई, जंगल, न्याय, सड़क आदि) समवर्ती सूची: 36 विषय (दीवानी-फ़ौजदारी विधि, विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, दत्तक, कारखाने, श्रम कल्याण आदि) अवशिष्ट शक्तियाँ वायसराय (गवर्नर जनरल) के पास। |
केंद्र में द्वैध शासन | संघीय विषयों को आरक्षित (रक्षा, विदेश, धार्मिक मामले, जनजातीय क्षेत्र) और हस्तांतरित में बाँटा गया; पर संघ न बनने के कारण लागू नहीं हुआ। |
प्रांतीय स्वायत्तता | प्रांतों से द्वैध शासन समाप्त; सभी प्रांतीय विषय विधान मंडल के प्रति उत्तरदायी भारतीय मंत्रियों को। 1 अप्रैल 1937 से लागू। पर गवर्नरों के पास विशेष उत्तरदायित्व और विवेकाधीन शक्तियाँ रहीं। |
द्विसदनीय प्रांत | 11 में से 6 प्रांतों में दो सदन: बंगाल, बम्बई, मद्रास, बिहार, संयुक्त प्रांत और असम। |
निर्वाचन | पृथक निर्वाचन का और विस्तार; दलित वर्गों के लिए (पूना समझौते के अनुसार) आरक्षित सीटें, महिलाओं और मज़दूरों के लिए अलग प्रतिनिधित्व। मताधिकार बढ़ा, फिर भी केवल लगभग 10% जनसंख्या को वोट का अधिकार। |
नई संस्थाएँ | संघीय न्यायालय (Federal Court): दिल्ली, 1937; पहले मुख्य न्यायाधीश सर मॉरिस ग्वायर; अपील प्रिवी काउंसिल (लंदन) में। भारतीय रिज़र्व बैंक: RBI अधिनियम 1934 के तहत 1 अप्रैल 1935 को स्थापना। संघीय लोक सेवा आयोग, प्रांतीय लोक सेवा आयोग और संयुक्त लोक सेवा आयोग; संघीय रेलवे प्राधिकरण। |
अन्य | भारत सचिव की इंडिया काउंसिल समाप्त; उसकी जगह सलाहकार। बर्मा और अदन भारत से अलग (1937)। दो नए प्रांत: सिंध (बम्बई से अलग) और उड़ीसा (बिहार से अलग), 1936 → कुल 11 प्रांत। |
🔍 आसान परिभाषा: प्रांतीय स्वायत्तता (Provincial Autonomy) |
📘 परिभाषा: प्रांतों को अपने विषयों पर केंद्र के नियंत्रण से मुक्त होकर, जनता द्वारा चुने गए मंत्रियों के माध्यम से शासन करने का अधिकार। |
💡 आसान भाषा में: "अपने घर (प्रांत) के फ़ैसले अपने चुने हुए लोग करें" — 1919 के "आधे अधिकार" की जगह प्रांतों को पूरा प्रांतीय अधिकार। 🏠 उदाहरण: 1937 में मद्रास में सी. राजगोपालाचारी, संयुक्त प्रांत में गोविंद बल्लभ पंत, बम्बई में बी. जी. खेर जैसे कांग्रेसी नेता प्रधानमंत्री (प्रीमियर) बने और शिक्षा, कृषि, मद्यनिषेध जैसे विषयों पर अपनी नीतियाँ लागू कीं। |
◆ फ़रवरी 1937 में 11 प्रांतों में चुनाव हुए। कांग्रेस को 5 प्रांतों (मद्रास, संयुक्त प्रांत, मध्य प्रांत, बिहार, उड़ीसा) में पूर्ण बहुमत मिला और बम्बई में वह सबसे बड़ा दल बनी।
◆ जुलाई 1937 में कांग्रेस ने 6 प्रांतों में मंत्रिमंडल बनाए; बाद में उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत और असम में भी — कुल 8 प्रांत। बंगाल (फ़ज़लुल हक़, कृषक प्रजा पार्टी) और पंजाब (सिकंदर हयात ख़ाँ, यूनियनिस्ट पार्टी) में ग़ैर-कांग्रेसी सरकारें बनीं। मुस्लिम लीग का प्रदर्शन कमज़ोर रहा।
◆ द्वितीय विश्व युद्ध में भारत को बिना पूछे शामिल करने के विरोध में अक्टूबर–नवंबर 1939 में कांग्रेस मंत्रिमंडलों ने त्यागपत्र दे दिया; मुस्लिम लीग ने 22 दिसंबर 1939 को "मुक्ति दिवस" मनाया।
❝ यह एक ऐसी मशीन है जिसमें मज़बूत ब्रेक तो हैं, पर इंजन नहीं है। ❞ (जवाहरलाल नेहरू, 1935 के अधिनियम पर (उन्होंने इसे "दासता का नया अधिकार-पत्र" भी कहा)) |
माउंटबेटन योजना (3 जून 1947) के आधार पर ब्रिटिश संसद ने यह अधिनियम पारित किया; 18 जुलाई 1947 को इसे शाही स्वीकृति मिली और 15 अगस्त 1947 से यह लागू हुआ।
1. ब्रिटिश भारत का अंत; दो स्वतंत्र अधिराज्य (डोमिनियन) — भारत और पाकिस्तान — बने। पंजाब और बंगाल की सीमाएँ रैडक्लिफ़ सीमा आयोग ने तय कीं।
2. दोनों के लिए अलग गवर्नर जनरल: भारत — लॉर्ड माउंटबेटन; पाकिस्तान — मोहम्मद अली जिन्ना। गवर्नर जनरल केवल संवैधानिक प्रमुख होगा, मंत्रिमंडल की सलाह पर काम करेगा।
3. भारत सचिव का पद समाप्त; ब्रिटिश सम्राट की "भारत का सम्राट" उपाधि हटाई गई।
4. देशी रियासतों पर ब्रिटिश सर्वोच्चता (Paramountcy) समाप्त; वे भारत या पाकिस्तान में मिलने या स्वतंत्र रहने के लिए "स्वतंत्र" मानी गईं।
5. दोनों देशों की संविधान सभाओं को पूर्ण अधिकार; नया संविधान बनने तक वे विधान मंडल का भी काम करेंगी। तब तक शासन 1935 के अधिनियम (संशोधित रूप) से चलेगा।
◆ सी. राजगोपालाचारी (जून 1948–जनवरी 1950) स्वतंत्र भारत के पहले और अंतिम भारतीय गवर्नर जनरल बने; 26 जनवरी 1950 को भारत गणराज्य बना और यह पद समाप्त हो गया।
🔍 आसान परिभाषा: अधिराज्य (Dominion) |
📘 परिभाषा: ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर ऐसा देश जो अपने आंतरिक और बाहरी मामलों में स्वतंत्र हो, पर ब्रिटिश सम्राट को औपचारिक रूप से राष्ट्राध्यक्ष माने (जैसे उस समय कनाडा, ऑस्ट्रेलिया)। |
💡 आसान भाषा में: "घर अपना, फ़ैसले अपने, बस नाम के लिए राजा ब्रिटेन का।" 🏠 उदाहरण: 15 अगस्त 1947 से 26 जनवरी 1950 तक भारत अधिराज्य था, इसलिए तब गवर्नर जनरल पद बना रहा। संविधान लागू होते ही भारत संप्रभु गणराज्य बन गया और राष्ट्रपति राष्ट्राध्यक्ष बने। 1929 के लाहौर अधिवेशन से पहले कांग्रेस की माँग भी "डोमिनियन स्टेटस" ही थी। |
अधिनियम | वायसराय / भारत सचिव | सबसे बड़ी पहचान |
1861 | कैनिंग / चार्ल्स वुड | भारतीयों का मनोनयन; पोर्टफोलियो; अध्यादेश; विकेंद्रीकरण की शुरुआत |
1892 | लैंसडाउन / क्रॉस | अप्रत्यक्ष चुनाव (सिफ़ारिश); बजट पर चर्चा; प्रश्न |
1909 | मिंटो द्वितीय / मार्ले | मुसलमानों को पृथक निर्वाचन; एस. पी. सिन्हा; पूरक प्रश्न |
1919 | चेम्सफोर्ड / मॉन्टेग्यू | प्रांतों में द्वैध शासन; केंद्र में द्विसदन; प्रत्यक्ष चुनाव; लोक सेवा आयोग |
1935 | विलिंगडन / सैमुअल होर | अखिल भारतीय संघ (अकार्यान्वित); प्रांतीय स्वायत्तता; तीन सूचियाँ; संघीय न्यायालय |
1947 | माउंटबेटन / (प्रधानमंत्री एटली) | दो अधिराज्य; सर्वोच्चता समाप्त; संविधान सभा को पूर्ण अधिकार |
1773–1833 तक बंगाल के गवर्नर जनरल, 1833–1858 तक भारत के गवर्नर जनरल और 1858 के बाद वायसराय (और गवर्नर जनरल)। परीक्षा में "किसके काल में क्या हुआ" सबसे अधिक पूछा जाता है, इसलिए नीचे दोनों युगों की तालिकाएँ हैं।
गवर्नर जनरल | कार्यकाल | प्रमुख कार्य और घटनाएँ |
वारेन हेस्टिंग्स | 1773–1785 | रेग्युलेटिंग एक्ट, पिट्स इंडिया एक्ट; ज़िला दीवानी-फ़ौजदारी अदालतें; रोहिल्ला युद्ध (1774); प्रथम मराठा युद्ध (सालबाई 1782); द्वितीय मैसूर युद्ध; एशियाटिक सोसाइटी (1784, विलियम जोन्स); कलकत्ता मदरसा (1781) |
लॉर्ड कॉर्नवालिस | 1786–1793 | सिविल सेवा का संगठन; कॉर्नवालिस कोड (1793); स्थायी बंदोबस्त (1793); थाना-दरोगा; तृतीय मैसूर युद्ध (श्रीरंगपट्टनम 1792) |
सर जॉन शोर | 1793–1798 | अहस्तक्षेप नीति; खर्दा का युद्ध (1795, मराठा बनाम निज़ाम) में हस्तक्षेप नहीं |
लॉर्ड वेलेज़ली | 1798–1805 | सहायक संधि; चतुर्थ मैसूर युद्ध (1799, टीपू की मृत्यु); द्वितीय मराठा युद्ध; फ़ोर्ट विलियम कॉलेज (1800); स्वयं को "बंगाल का शेर" कहा |
कॉर्नवालिस (दूसरी बार) | 1805 | ग़ाज़ीपुर में मृत्यु |
सर जॉर्ज बार्लो | 1805–1807 | वेल्लोर का सिपाही विद्रोह (1806) |
लॉर्ड मिंटो प्रथम | 1807–1813 | रणजीत सिंह से अमृतसर की संधि (1809); चार्टर एक्ट 1813 |
लॉर्ड हेस्टिंग्स (मॉयरा) | 1813–1823 | आंग्ल-नेपाल युद्ध, सुगौली संधि (1816); पिंडारियों का दमन; तृतीय मराठा युद्ध (1817–18), पेशवा पद समाप्त; राजपूताना की रियासतों से संधियाँ (1817–18); मद्रास में रैयतवाड़ी (1820, टॉमस मुनरो) |
लॉर्ड एमहर्स्ट | 1823–1828 | प्रथम आंग्ल-बर्मा युद्ध, यांडाबू संधि (1826); बैरकपुर सैनिक विद्रोह (1824) |
लॉर्ड विलियम बेंटिंक | 1828–1835 | सती प्रथा पर रोक (1829); ठगी का दमन (कर्नल स्लीमन); अंग्रेज़ी शिक्षा प्रस्ताव (1835, मैकॉले); मैसूर का प्रशासन अपने हाथ (1831), कुर्ग विलय (1834); प्रांतीय अपील-सर्किट अदालतें समाप्त; निचली अदालतों में फ़ारसी की जगह स्थानीय भाषा; कलकत्ता मेडिकल कॉलेज (1835); 1833 से भारत का पहला गवर्नर जनरल |
सर चार्ल्स मेटकाफ़ | 1835–1836 | प्रेस पर से प्रतिबंध हटाए (1835) → "भारतीय प्रेस का मुक्तिदाता" |
लॉर्ड ऑकलैंड | 1836–1842 | प्रथम आंग्ल-अफ़ग़ान युद्ध (1839–42); उत्तर भारत का अकाल (1837–38) |
लॉर्ड एलनबरो | 1842–1844 | सिंध का विलय (1843, चार्ल्स नेपियर); दास प्रथा ग़ैरक़ानूनी (1843) |
लॉर्ड हार्डिंग प्रथम | 1844–1848 | प्रथम आंग्ल-सिख युद्ध; लाहौर संधि (1846); नरबलि पर रोक (गोंड क्षेत्रों में) |
लॉर्ड डलहौज़ी | 1848–1856 | व्यपगत सिद्धांत; पंजाब विलय (1849); अवध विलय (1856); आधुनिकीकरण (नीचे विस्तार) |
लॉर्ड कैनिंग | 1856–1858 | 1857 का विद्रोह; कलकत्ता, बम्बई, मद्रास विश्वविद्यालय (1857); विधवा पुनर्विवाह अधिनियम (1856); अंतिम गवर्नर जनरल और पहला वायसराय |
डलहौज़ी ने एक ओर व्यपगत सिद्धांत से रियासतें हड़पीं, दूसरी ओर संचार और प्रशासन का ऐसा ढाँचा बनाया जिसने भारत को एक इकाई के रूप में जोड़ दिया। (विलय नीति का विस्तार पिछले अध्याय में है।)
क्षेत्र | कार्य |
🚂 रेलवे | 16 अप्रैल 1853: भारत की पहली यात्री रेल बम्बई (बोरी बंदर) से ठाणे — लगभग 34 किमी। 1853 का रेलवे विवरण-पत्र (मिनट) — "गारंटी प्रणाली" से निजी कंपनियाँ। |
📡 टेलीग्राफ़ | 1853 से टेलीग्राफ़ लाइनें; कलकत्ता–आगरा पहली बड़ी लाइन; 1857 तक लगभग 4000 मील। 1857 में विद्रोह दबाने में यही बड़ा हथियार बना। |
✉️ डाक | डाकघर अधिनियम 1854: पूरे देश में समान डाक दर (आधा आना), डाक टिकट का प्रचलन। |
🏗️ लोक निर्माण | अलग लोक निर्माण विभाग (PWD); गंगा नहर (1854) खोली गई; ग्रैंड ट्रंक रोड का निर्माण-कार्य आगे बढ़ा। |
📚 शिक्षा | वुड का डिस्पैच (1854) — "भारतीय शिक्षा का मैग्ना कार्टा"; इसी के आधार पर 1857 में तीन विश्वविद्यालय। |
⚙️ प्रशासन | नए जीते क्षेत्रों में गैर-विनियमित (नॉन-रेगुलेशन) प्रणाली (कमिश्नर के सीधे नियंत्रण में); बंगाल के लिए लेफ़्टिनेंट गवर्नर (1854)। |
⚖️ समाज | विधवा पुनर्विवाह कानून का प्रारूप (ईश्वरचंद्र विद्यासागर के प्रयास) उसी के काल में तैयार हुआ, जो 1856 में कैनिंग के समय पारित हुआ। |
वायसराय | कार्यकाल | प्रमुख कार्य और घटनाएँ |
लॉर्ड कैनिंग | 1858–1862 | महारानी की घोषणा (1858); व्यपगत सिद्धांत वापस; भारतीय परिषद अधिनियम 1861; भारतीय दंड संहिता (1860); उच्च न्यायालय अधिनियम (1861); पुलिस अधिनियम (1861); पहला आयकर (1860, जेम्स विल्सन); नील विद्रोह (1859–60) |
लॉर्ड एल्गिन प्रथम | 1862–1863 | वहाबी आंदोलन का दमन; धर्मशाला में मृत्यु |
सर जॉन लॉरेंस | 1864–1869 | भूटान युद्ध (1865); उड़ीसा अकाल (1866), अकाल आयोग (कैंपबेल); अफ़ग़ानिस्तान के प्रति "कुशल निष्क्रियता" नीति; शिमला ग्रीष्मकालीन राजधानी (1864); कलकत्ता, बम्बई, मद्रास उच्च न्यायालय |
लॉर्ड मेयो | 1869–1872 | वित्तीय विकेंद्रीकरण (1870); 1872 की पहली (अनियमित) जनगणना; कृषि विभाग; सांख्यिकी सर्वेक्षण; मेयो कॉलेज, अजमेर की योजना (उसके नाम पर, 1875 में शुरू); अंडमान में एक क़ैदी द्वारा हत्या (1872) |
लॉर्ड नॉर्थब्रुक | 1872–1876 | कूका (नामधारी) आंदोलन; बिहार अकाल (1873–74); बड़ौदा के गायकवाड़ मल्हारराव पर मुक़दमा; प्रिंस ऑफ़ वेल्स की भारत यात्रा (1875) |
लॉर्ड लिटन | 1876–1880 | दिल्ली दरबार (1877) — महारानी को "कैसर-ए-हिंद" की उपाधि (रॉयल टाइटल्स एक्ट 1876); भीषण अकाल (1876–78) और स्ट्रैची अकाल आयोग; वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट (1878); शस्त्र अधिनियम (1878); सिविल सेवा की अधिकतम आयु 21 से 19 (1876); वैधानिक सिविल सेवा (1879); द्वितीय आंग्ल-अफ़ग़ान युद्ध |
लॉर्ड रिपन | 1880–1884 | वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट रद्द (1882); प्रथम कारख़ाना अधिनियम (1881); पहली नियमित जनगणना (1881); स्थानीय स्वशासन प्रस्ताव (1882); हंटर शिक्षा आयोग (1882); इल्बर्ट बिल विवाद (1883); सिविल सेवा की आयु फिर 21 |
लॉर्ड डफ़रिन | 1884–1888 | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (1885); तृतीय आंग्ल-बर्मा युद्ध (1885), ऊपरी बर्मा का विलय (1886); एचिसन आयोग (1886); बंगाल काश्तकारी अधिनियम (1885) |
लॉर्ड लैंसडाउन | 1888–1894 | कारख़ाना अधिनियम (1891); सहमति आयु अधिनियम (1891); भारतीय परिषद अधिनियम 1892; डूरंड रेखा (1893); सिविल सेवा को इंपीरियल, प्रांतीय, अधीनस्थ में बाँटना |
लॉर्ड एल्गिन द्वितीय | 1894–1899 | भीषण अकाल (1896–97), लायल आयोग; बम्बई में प्लेग; चापेकर बंधुओं द्वारा रैंड और आयर्स्ट की हत्या (1897) |
लॉर्ड कर्ज़न | 1899–1905 | पुलिस आयोग (1902, फ़्रेज़र); विश्वविद्यालय आयोग (1902, रैले) और विश्वविद्यालय अधिनियम (1904); प्राचीन स्मारक संरक्षण अधिनियम (1904); सहकारी समिति अधिनियम (1904); उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत (1901); पूसा कृषि अनुसंधान संस्थान; तिब्बत अभियान (यंगहसबैंड, 1904); बंगाल विभाजन (1905); रेलवे बोर्ड (1905) |
लॉर्ड मिंटो द्वितीय | 1905–1910 | स्वदेशी आंदोलन; मुस्लिम लीग (1906); सूरत विभाजन (1907); खुदीराम बोस (1908); मार्ले-मिंटो सुधार (1909); समाचार-पत्र अधिनियम (1908, 1910) |
लॉर्ड हार्डिंग द्वितीय | 1910–1916 | दिल्ली दरबार (1911); बंगाल विभाजन रद्द; राजधानी कलकत्ता से दिल्ली (घोषणा 1911, स्थानांतरण 1912); हार्डिंग पर दिल्ली में बम (1912); ग़दर पार्टी (1913); गांधी जी की वापसी (1915); हिंदू महासभा (1915) |
लॉर्ड चेम्सफोर्ड | 1916–1921 | होमरूल आंदोलन; लखनऊ समझौता (1916); अगस्त घोषणा (1917); चंपारण (1917); रौलेट एक्ट और जलियाँवाला बाग़ (1919); 1919 का अधिनियम; ख़िलाफ़त और असहयोग आंदोलन (1920); पुणे में महिला विश्वविद्यालय (1916) |
लॉर्ड रीडिंग | 1921–1926 | मोपला विद्रोह (1921); चौरी चौरा (1922) और असहयोग की वापसी; प्रिंस ऑफ़ वेल्स का बहिष्कार (1921); स्वराज पार्टी (1923); रौलेट एक्ट और 1910 का प्रेस अधिनियम रद्द; भारत में ICS परीक्षा (1922); काकोरी कांड (1925); ली आयोग (1924) |
लॉर्ड इरविन | 1926–1931 | साइमन कमीशन (1927–28); बटलर समिति (1927); नेहरू रिपोर्ट (1928); शारदा अधिनियम (1929); लाहौर अधिवेशन — पूर्ण स्वराज (1929); दांडी मार्च (1930); प्रथम गोलमेज़ सम्मेलन; गांधी-इरविन समझौता (1931); भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव को फाँसी (1931) |
लॉर्ड विलिंगडन | 1931–1936 | द्वितीय और तृतीय गोलमेज़ सम्मेलन; साम्प्रदायिक पंचाट और पूना समझौता (1932); सविनय अवज्ञा का दूसरा चरण; कांग्रेस समाजवादी पार्टी (1934); भारत शासन अधिनियम 1935; रिज़र्व बैंक (1935) |
लॉर्ड लिनलिथगो | 1936–1943 | 1937 के चुनाव; द्वितीय विश्व युद्ध; मंत्रिमंडलों का त्यागपत्र (1939); लाहौर प्रस्ताव (1940); अगस्त प्रस्ताव (1940); व्यक्तिगत सत्याग्रह; क्रिप्स मिशन (1942); भारत छोड़ो आंदोलन (1942); सबसे लंबा कार्यकाल वाला वायसराय |
लॉर्ड वेवेल | 1943–1947 | बंगाल अकाल (1943); शिमला सम्मेलन (1945); आज़ाद हिंद फ़ौज के मुक़दमे; नौसेना विद्रोह (1946); कैबिनेट मिशन (1946); प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस (16 अगस्त 1946); अंतरिम सरकार (2 सितंबर 1946) |
लॉर्ड माउंटबेटन | 1947 (मार्च–अगस्त) | 3 जून योजना; भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम; विभाजन और स्वतंत्रता; अंतिम वायसराय और स्वतंत्र भारत के पहले गवर्नर जनरल (1948 तक) |
🎯 परीक्षा के लिए "पहला/अंतिम" बंगाल का पहला गवर्नर जनरल: वारेन हेस्टिंग्स (1773) • भारत का पहला गवर्नर जनरल: विलियम बेंटिंक (1833) • पहला वायसराय: कैनिंग (1858) • अंतिम वायसराय: माउंटबेटन • स्वतंत्र भारत का पहला गवर्नर जनरल: माउंटबेटन • पहला और अंतिम भारतीय गवर्नर जनरल: सी. राजगोपालाचारी। पद पर मारे गए वायसराय: लॉर्ड मेयो (अंडमान, 1872)। पद पर मृत्यु: कॉर्नवालिस (1805, ग़ाज़ीपुर) और एल्गिन प्रथम (1863, धर्मशाला)। |
ब्रिटिश शासन तीन स्तंभों पर टिका था: सिविल सेवा, सेना और पुलिस। इनमें सिविल सेवा ने पूरे देश में एक जैसी प्रशासनिक व्यवस्था बनाई। ब्रिटिश प्रधानमंत्री लॉयड जॉर्ज (1922) ने भारतीय सिविल सेवा को ब्रिटिश शासन का "स्टील फ्रेम" (इस्पाती ढाँचा) कहा था।
📖 कहानी 2: समुद्र पार की परीक्षा और उम्र की दीवार 1853 के चार्टर एक्ट के बाद सिविल सेवा में भर्ती सिफ़ारिश से नहीं, खुली प्रतियोगी परीक्षा से होने लगी। कागज़ पर यह परीक्षा भारतीयों के लिए भी खुली थी, पर पहली परीक्षा 1855 में लंदन में हुई और अधिकतम आयु 23 वर्ष थी। यानी परीक्षा देने के लिए किसी भारतीय को अपने ख़र्च पर समुद्र पार इंग्लैंड जाना पड़ता था, जो उस समय अधिकतर परिवारों के बस की बात नहीं थी। 1863 में सत्येंद्रनाथ टैगोर, कवि रवींद्रनाथ के बड़े भाई, इस सेवा में चुने जाने वाले पहले भारतीय बने। उनके बाद भी चुने जाने वाले भारतीय गिने-चुने रहे। फिर 1876 में वायसराय लिटन ने परीक्षा में बैठने की अधिकतम आयु 21 वर्ष से घटाकर 19 वर्ष कर दी। इसका मतलब था कि भारतीय विद्यार्थी को उन्नीस की उम्र तक भारत में पढ़ाई पूरी करके इंग्लैंड पहुँचना और वहाँ अंग्रेज़ उम्मीदवारों से मुक़ाबला करना था। भारतीयों के लिए रास्ता और कठिन हो गया। इस फ़ैसले ने देश भर में ग़ुस्सा पैदा किया। सुरेंद्रनाथ बनर्जी, जो स्वयं यह परीक्षा पास करके भी सेवा से बाहर कर दिए गए थे, इसके विरोध में खुलकर उतरे और उन्होंने इसे एक देशव्यापी आंदोलन बना दिया। यह उस दौर के पहले देशव्यापी राजनीतिक आंदोलनों में से एक था। आगे भी बदलाव धीरे-धीरे हुए। 1886 के एचिसन आयोग ने आयु बढ़ाकर 23 करने की सिफ़ारिश की। भारतीयों की सबसे पुरानी माँग, कि परीक्षा भारत में भी हो, 1922 में जाकर पूरी हुई, जब पहली बार इलाहाबाद में परीक्षा हुई। जिस सेवा को "स्टील फ्रेम" कहा गया, उसमें भारतीयों के लिए जगह बनाने में लगभग साठ साल लग गए। 🧭 इस कहानी से कौन-सी अवधारणा साफ़ हुई ✔ खुली प्रतियोगिता — 1853 के चार्टर एक्ट से भर्ती सिफ़ारिश की जगह योग्यता पर आधारित हुई। पर परीक्षा केवल लंदन में होने से भारतीयों के लिए व्यवहार में बाधा बनी रही। ✔ आयु-सीमा की रुकावट — 1876 में लिटन ने अधिकतम आयु 21 से 19 वर्ष की, जिससे भारतीयों का प्रवेश और कठिन हुआ। ✔ राजनीतिक जागृति — इस अन्याय के विरोध ने सुरेंद्रनाथ बनर्जी के नेतृत्व में एक देशव्यापी आंदोलन का रूप लिया और भारतीयों में राजनीतिक चेतना जगाई। 📝 परीक्षा के लिए: चार्टर एक्ट 1853 (खुली परीक्षा) → पहली परीक्षा लंदन, 1855, आयु 23 → सत्येंद्रनाथ टैगोर, पहले भारतीय ICS, 1863 → लिटन, आयु 21 से 19, 1876 → एचिसन आयोग 1886 → भारत में परीक्षा (इलाहाबाद) 1922। |

वर्ष | घटना | महत्व |
1786–93 | कॉर्नवालिस: ऊँचा वेतन, निजी व्यापार-उपहार पर रोक, वरिष्ठता से पदोन्नति; ऊँचे पद केवल यूरोपीयों को | "भारतीय सिविल सेवा का जनक" |
1800 | वेलेज़ली: कलकत्ता में फ़ोर्ट विलियम कॉलेज (नए अधिकारियों का प्रशिक्षण) | कोर्ट ऑफ़ डायरेक्टर्स ने विरोध किया |
1806 | इंग्लैंड में हेलीबरी (ईस्ट इंडिया कॉलेज) में प्रशिक्षण | भर्ती अब भी सिफ़ारिश (संरक्षण) से |
1833 | चार्टर एक्ट की धारा 87: धर्म, वंश, रंग के आधार पर भेदभाव नहीं | व्यवहार में लागू नहीं |
1853–55 | चार्टर एक्ट 1853: खुली प्रतियोगी परीक्षा; मैकॉले समिति (1854); पहली परीक्षा लंदन में (1855), अधिकतम आयु 23 | योग्यता आधारित भर्ती की शुरुआत |
1861 | भारतीय सिविल सेवा अधिनियम: कुछ ऊँचे पद "अनुबंधित (कवेनेंटेड) सिविल सेवकों" के लिए आरक्षित | सेवा का नाम ICS प्रचलित |
1863 | सत्येंद्रनाथ टैगोर (रवींद्रनाथ के बड़े भाई) ICS में चुने जाने वाले पहले भारतीय | भारतीयों के लिए राह खुली |
1876 | लिटन: अधिकतम आयु 21 से घटाकर 19 | भारतीयों का प्रवेश और कठिन; सुरेंद्रनाथ बनर्जी का देशव्यापी आंदोलन |
1879 | लिटन: वैधानिक सिविल सेवा — कुछ पदों पर "ऊँचे परिवारों" के भारतीयों का सीधा मनोनयन | असफल; बाद में समाप्त |
1886 | डफ़रिन: एचिसन आयोग — आयु 23 करने, सेवा को इंपीरियल, प्रांतीय और अधीनस्थ में बाँटने की सिफ़ारिश | वैधानिक सेवा समाप्त |
1912–15 | इस्लिंगटन आयोग (रिपोर्ट 1917): ऊँचे पदों में लगभग 25% भारतीय | भारतीयकरण की धीमी शुरुआत |
1919–22 | 1919 के अधिनियम के बाद भारत में भी परीक्षा — पहली बार 1922, इलाहाबाद में (बाद में दिल्ली) | भारतीयों की संख्या बढ़ी |
1923–24 | ली आयोग: 15 वर्ष में भारतीय और यूरोपीय 50:50; लोक सेवा आयोग की स्थापना | |
1926 | 1 अक्टूबर 1926: केंद्रीय लोक सेवा आयोग (अध्यक्ष सर रॉस बार्कर) | आज के संघ लोक सेवा आयोग की शुरुआत |
1935 | संघीय लोक सेवा आयोग, प्रांतीय और संयुक्त लोक सेवा आयोग | 1950 में संघ लोक सेवा आयोग |
⚖️ मूल्यांकन सिविल सेवा ने ईमानदार, कुशल और एक जैसे प्रशासन की परंपरा बनाई और देश को प्रशासनिक एकता दी। पर लंबे समय तक यह यूरोपीयों का एकाधिकार रही (1947 तक भी लगभग आधे अधिकारी अंग्रेज़ थे), भारतीयों के प्रति नस्लीय भेदभाव रहा, और यह जनता की सेवक से ज़्यादा अंग्रेज़ी हितों की रक्षक थी। आज़ादी के बाद सरदार पटेल ने इसी ढाँचे को अखिल भारतीय सेवाओं (IAS, IPS) के रूप में बनाए रखा। |
🔍 आसान परिभाषा: स्टील फ्रेम (इस्पाती ढाँचा) |
📘 परिभाषा: वह मज़बूत प्रशासनिक ढाँचा जो पूरे साम्राज्य को थामे रखता है; यहाँ भारतीय सिविल सेवा के लिए प्रयुक्त उपमा। |
💡 आसान भाषा में: जैसे किसी इमारत का लोहे का ढाँचा दिखता नहीं पर पूरी इमारत उसी पर खड़ी होती है, वैसे ही ICS अधिकारी ब्रिटिश राज को खड़ा रखते थे। 🏠 उदाहरण: एक ज़िले का कलेक्टर एक साथ राजस्व वसूलता, मजिस्ट्रेट के रूप में शांति बनाए रखता, अकाल राहत बाँटता और सरकार को रिपोर्ट भेजता था। लाखों लोगों वाले ज़िले पर एक अंग्रेज़ अफ़सर का यही नियंत्रण "स्टील फ्रेम" था। |
◆ कॉर्नवालिस (1791–93): ज़मींदारों से पुलिस अधिकार छीने; ज़िलों को लगभग 20 वर्ग मील के थानों में बाँटा; हर थाने पर दरोगा (ज़िला मजिस्ट्रेट के अधीन)। गाँवों में पुरानी चौकीदार व्यवस्था बनी रही। कलकत्ता, ढाका, मुर्शिदाबाद आदि शहरों में कोतवाल।
◆ बेंटिंक: ज़िला पुलिस का नियंत्रण कलेक्टर-मजिस्ट्रेट को; क्षेत्रीय स्तर पर पुलिस अधीक्षक का पद समाप्त कर कमिश्नर को।
◆ नेपियर का सिंध मॉडल (1843): सिंध विजय के बाद चार्ल्स नेपियर ने आयरिश पुलिस के तर्ज़ पर एक अलग, अनुशासित, वर्दीधारी पुलिस बनाई — बाद के सुधारों का आधार।
◆ पुलिस आयोग (1860) की सिफ़ारिश पर भारतीय पुलिस अधिनियम, 1861: प्रांत में पुलिस महानिरीक्षक (IG), रेंज में उप महानिरीक्षक (DIG), ज़िले में पुलिस अधीक्षक (SP); थाने पर थानेदार (दरोगा)। उद्देश्य था पुलिस को अर्ध-सैनिक बल बनाना जो विद्रोह दबाए। यह अधिनियम कई राज्यों में आज भी लागू है।
◆ कर्ज़न और फ़्रेज़र पुलिस आयोग (1902–03): पुलिस को भ्रष्ट और अक्षम बताया; सुधार: प्रांतों में CID (अपराध अनुसंधान विभाग), केंद्र में केंद्रीय गुप्तचर विभाग (Central Intelligence Bureau), अधिकारियों की सीधी भर्ती, भारतीयों के लिए उप पुलिस अधीक्षक (DSP) का पद, प्रशिक्षण विद्यालय और वेतन में वृद्धि।
⚠️ पुलिस: जनता की रक्षक या राज की? ब्रिटिश पुलिस का मुख्य उद्देश्य कानून-व्यवस्था से अधिक राष्ट्रीय आंदोलन का दमन था — स्वदेशी, असहयोग, भारत छोड़ो आंदोलनों में लाठीचार्ज, गोलीबारी और गुप्तचरी। गाँवों में पुलिस, अदालत और अधिकारी प्रायः ज़मींदारों और साहूकारों का पक्ष लेते थे, इसलिए किसानों में इनके प्रति डर और अविश्वास था। भारतीयों को ऊँचे पदों से दूर रखा गया। |
काल / व्यक्ति | सुधार |
वारेन हेस्टिंग्स (1772) | हर ज़िले में दो अदालतें: दीवानी अदालत (दीवानी मामले; अध्यक्ष यूरोपीय कलेक्टर) और फ़ौजदारी अदालत (आपराधिक मामले; क़ाज़ी और मुफ़्ती की सहायता से, पर कलेक्टर की देखरेख में)। कलकत्ता में अपील के लिए सदर दीवानी अदालत और सदर निज़ामत अदालत। भारतीयों के व्यक्तिगत मामलों में हिंदुओं पर शास्त्र और मुसलमानों पर शरीअत लागू; इसके लिए 11 पंडितों ने हिंदू कानूनों का संग्रह बनाया, जिसका अंग्रेज़ी अनुवाद एन. बी. हैलहेड ने किया (1776); मुस्लिम कानूनों का संग्रह भी तैयार कराया गया। |
रेग्युलेटिंग एक्ट (1774) | कलकत्ता में सर्वोच्च न्यायालय; मुख्य न्यायाधीश सर एलिजा इम्पे; यूरोपीयों और कलकत्ता निवासियों पर अधिकार-क्षेत्र। (बाद में मद्रास 1801, बम्बई 1823 में भी सर्वोच्च न्यायालय।) |
कॉर्नवालिस (1793) | कलेक्टर से न्यायिक शक्ति लेकर ज़िला न्यायाधीश; ज़िला दीवानी अदालत। चार प्रांतीय अपील अदालतें (सर्किट कोर्ट): कलकत्ता, ढाका, मुर्शिदाबाद, पटना। निचले स्तर पर मुंसिफ़ और रजिस्ट्रार (भारतीय/यूरोपीय)। "कानून की संप्रभुता": सरकारी अधिकारी भी अपने सरकारी कार्यों के लिए अदालत में जवाबदेह। |
बेंटिंक (1828–35) | प्रांतीय अपील और सर्किट अदालतें समाप्त; उनका काम राजस्व और सर्किट कमिश्नरों को। ऊपरी प्रांतों के लिए इलाहाबाद में सदर दीवानी और सदर निज़ामत अदालत। निचली अदालतों में फ़ारसी की जगह स्थानीय भाषा, ऊँची अदालतों में अंग्रेज़ी। भारतीयों को मुंसिफ़, सदर अमीन जैसे न्यायिक पद। |
उच्च न्यायालय अधिनियम (1861) | सर्वोच्च न्यायालय और सदर अदालतों को मिलाकर उच्च न्यायालय: कलकत्ता, बम्बई, मद्रास (1862); इलाहाबाद (1866); बाद में पटना (1916), लाहौर (1919)। अंतिम अपील प्रिवी काउंसिल (लंदन) में। |
1935 का अधिनियम | संघीय न्यायालय (1937, दिल्ली) — केंद्र-प्रांत विवाद और संवैधानिक मामले; 1950 में इसकी जगह भारत का सर्वोच्च न्यायालय। |
◆ पहले अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग नियम, रीति-रिवाज और शास्त्रों की अलग-अलग व्याख्याएँ चलती थीं। अंग्रेज़ों ने इन्हें लिखित, एक-समान संहिताओं में बदला।
◆ चार्टर एक्ट 1833 के तहत प्रथम विधि आयोग (1834), अध्यक्ष लॉर्ड मैकॉले। उसने भारतीय दंड संहिता का प्रारूप (1837) तैयार किया।
संहिता | वर्ष | टिप्पणी |
सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) | 1859 | दीवानी मुक़दमों की प्रक्रिया |
भारतीय दंड संहिता (IPC) | 1860 | मैकॉले का प्रारूप; 1862 से लागू; 2024 में इसकी जगह भारतीय न्याय संहिता आई |
आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC) | 1861 | बाद में 1898 और 1973 में नई संहिता |
🔍 आसान परिभाषा: कानून का शासन (Rule of Law) |
📘 परिभाषा: शासन मनमर्ज़ी से नहीं, बल्कि लिखित कानूनों के अनुसार चले, और कानून के सामने सब बराबर हों — राजा या अधिकारी भी कानून से ऊपर न हों। |
💡 आसान भाषा में: "फ़ैसला व्यक्ति नहीं, नियम करेगा।" 🏠 उदाहरण: पहले किसी ज़मींदार या अधिकारी की इच्छा ही कानून होती थी। ब्रिटिश काल में लिखित संहिताएँ और अदालतें आईं। पर व्यवहार में यह अधूरा था: इल्बर्ट बिल (1883) में जब भारतीय न्यायाधीशों को यूरोपीयों के मुक़दमे सुनने का अधिकार देने की कोशिश हुई, तो अंग्रेज़ों के विरोध के कारण सरकार को पीछे हटना पड़ा। |
✅ न्याय व्यवस्था: उपलब्धियाँ ✔ लिखित, एक-समान कानून (संहिताएँ) ✔ कानून का शासन और कानून के सामने समानता का सिद्धांत ✔ धर्म/जाति के बजाय अपराध के आधार पर दंड ✔ उच्च न्यायालय, अपील की व्यवस्था; आधुनिक न्यायपालिका की नींव | ❌ न्याय व्यवस्था: कमियाँ ✔ महँगी, जटिल और बहुत धीमी; वकीलों पर निर्भरता ✔ अदालतें दूर, भाषा (अंग्रेज़ी) आम आदमी की समझ से बाहर ✔ यूरोपीयों को विशेष सुविधाएँ; नस्लीय भेदभाव (इल्बर्ट बिल) ✔ धनी पक्ष (ज़मींदार, साहूकार) को लाभ; झूठी गवाही बढ़ी |
◆ मुग़ल सेना मुख्यतः घुड़सवार (सवार) और पैदल सैनिकों (पैदल) से बनी थी, जिन्हें तीरंदाज़ी और तलवारबाज़ी का प्रशिक्षण मिलता था। घुड़सवार सेना सबसे अधिक महत्वपूर्ण थी। मुग़ल साम्राज्य के कमज़ोर होने पर यही सैनिक क्षेत्रीय शासकों के काम आए।
◆ कंपनी ने भी भारतीय किसानों को भर्ती कर अपनी सेना बनाई, जिसे "सिपाही सेना" कहा गया। 18वीं सदी के अंत की कंपनी सेना में घुड़सवार सैनिक भी थे।
◆ 1820 के दशक से युद्ध की तकनीक बदली: अंग्रेज़ों को बर्मा, अफ़ग़ानिस्तान और मिस्र जैसे दूर-दराज़ इलाक़ों में लड़ना पड़ा, जहाँ सैनिक मस्कट (बंदूक) और तोड़ेदार बंदूक (मैचलॉक) से लैस थे। इसलिए घुड़सवार सेना का महत्व घटा और पैदल सेना (इन्फ़ैंट्री) का महत्व बढ़ा।
◆ कंपनी सेना के सिपाहियों को यूरोपीय ढंग का प्रशिक्षण, कवायद (ड्रिल) और अनुशासन अपनाना पड़ा, जो उनकी जीवन-शैली पर नियंत्रण रखता था। कई बार इससे समस्याएँ पैदा हुईं, क्योंकि जाति और समुदाय की भावनाओं की अनदेखी की जाती थी (जैसे समुद्र पार जाने का आदेश, पगड़ी-तिलक पर रोक)। वेल्लोर (1806) और बैरकपुर (1824) के विद्रोह इसी के उदाहरण थे।
◆ कंपनी की तीन अलग प्रेसीडेंसी सेनाएँ थीं: बंगाल, मद्रास और बम्बई, जिनके अपने-अपने प्रधान सेनापति थे।
🔍 आसान परिभाषा: सिपाही (Sepoy) |
📘 परिभाषा: फ़ारसी/हिंदी शब्द "सिपाही" (सैनिक) से बना अंग्रेज़ी शब्द "सिपॉय"; कंपनी की सेना में भर्ती भारतीय पैदल सैनिक। |
💡 आसान भाषा में: कंपनी के वेतन पर लड़ने वाला भारतीय सैनिक; अफ़सर लगभग सदा अंग्रेज़। 🏠 उदाहरण: 1780 के आसपास के एक चित्र में बंगाल सेना का एक सवार (घुड़सवार सैनिक) दिखाया गया है — उस समय कंपनी की सेना में घुड़सवार भी थे। पर 1857 का विद्रोह मुख्यतः बंगाल सेना के सिपाहियों ने शुरू किया, इसलिए अंग्रेज़ इसे "सिपाही विद्रोह" कहते थे। |
1857 का विद्रोह सेना से ही शुरू हुआ था, इसलिए अंग्रेज़ों का सबसे पहला ध्यान सेना को "सुरक्षित" बनाने पर गया। इसके लिए पील आयोग बना (रिपोर्ट 1859)।
1. यूरोपीय सैनिकों का अनुपात बढ़ाया: बंगाल सेना में यूरोपीय : भारतीय = 1 : 2; मद्रास और बम्बई सेनाओं में 2 : 5।
2. तोपख़ाना और महत्वपूर्ण भौगोलिक ठिकाने केवल यूरोपीय सैनिकों के हाथ; ऊँचे सैनिक पद भारतीयों के लिए बंद।
3. "संतुलन और प्रति-संतुलन": रेजिमेंटों को जाति, समुदाय, धर्म और क्षेत्र के आधार पर बाँटा गया, ताकि सैनिक मिलकर विद्रोह न कर सकें — "फूट डालो और राज करो"।
4. "लड़ाकू और ग़ैर-लड़ाकू जातियाँ" (Martial Races): 1857 में वफ़ादार रहे सिख, गोरखा, पठान, पंजाबी मुसलमान आदि को "लड़ाकू" कहकर अधिक भर्ती; विद्रोह करने वाले अवध, बिहार, मध्य भारत के सैनिकों की भर्ती घटाई गई।
5. 1861: कंपनी की यूरोपीय सेना ताज की सेना में मिला दी गई।
6. समाचार-पत्रों, पत्रिकाओं और राष्ट्रवादी विचारों से सेना को अलग-थलग रखा गया।
वर्ष | सुधार |
1879 | ईडन आयोग (लिटन के समय): तीनों प्रेसीडेंसी सेनाओं को एक करने की सिफ़ारिश |
1895 | प्रेसीडेंसी सेनाएँ समाप्त; एकीकृत भारतीय सेना, जिसके 4 कमान (पंजाब, बंगाल, मद्रास, बम्बई) |
1902–09 | प्रधान सेनापति लॉर्ड किचनर के सुधार: सेना का नया संगठन, क्वेटा स्टाफ़ कॉलेज (1905/07) |
1925 | स्कीन समिति (भारतीय सैंडहर्स्ट समिति): अफ़सरों के भारतीयकरण और भारत में सैन्य कॉलेज की सिफ़ारिश |
1932 | भारतीय सैन्य अकादमी (IMA), देहरादून की स्थापना — भारतीय अफ़सरों का प्रशिक्षण |
💰 सेना का बोझ भारतीय सेना का ख़र्च भारतीय राजस्व से होता था, जो कुल बजट का लगभग एक-तिहाई या उससे अधिक था। इसी सेना का प्रयोग अफ़ग़ानिस्तान, बर्मा, चीन, मिस्र, अफ़्रीका और दोनों विश्व युद्धों में ब्रिटिश साम्राज्य के हित में किया गया। राष्ट्रवादियों ने इसकी तीव्र आलोचना की। |
कारण: 1857 के बाद सरकार की आर्थिक हालत ख़राब थी। सड़कें, सफ़ाई, पानी, शिक्षा जैसे स्थानीय कामों का ख़र्च स्थानीय करों से निकालने और शिक्षित भारतीयों को "सुरक्षित" राजनीति में उलझाने के लिए स्थानीय संस्थाएँ बनाई गईं।
वर्ष | घटना |
1687 | मद्रास नगर निगम — भारत का पहला नगर निगम |
1726 | कलकत्ता, बम्बई, मद्रास में मेयर न्यायालय और नगर निगम |
1864–68 | नगरपालिका अधिनियम; पर सदस्य प्रायः मनोनीत और अध्यक्ष सरकारी अधिकारी |
1870 | लॉर्ड मेयो: वित्तीय विकेंद्रीकरण — प्रांतों को शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, पुलिस, जेल आदि के लिए निश्चित अनुदान; स्थानीय करों से कमी पूरी करने की छूट; स्थानीय निकायों को मज़बूत करने की बात |
1882 | लॉर्ड रिपन का प्रस्ताव (18 मई 1882) — ग्रामीण क्षेत्रों में ज़िला और तालुका (उप-ज़िला) बोर्ड, शहरों में नगरपालिकाएँ; ग़ैर-सरकारी और निर्वाचित सदस्यों का बहुमत; अध्यक्ष ग़ैर-सरकारी; सरकारी नियंत्रण बाहर से, भीतर से नहीं → रिपन = "भारत में स्थानीय स्वशासन का जनक"; इस प्रस्ताव को "स्थानीय स्वशासन का मैग्ना कार्टा" कहा जाता है |
1907–09 | विकेंद्रीकरण पर शाही आयोग (अध्यक्ष हॉबहाउस): ग्राम पंचायतों को बढ़ावा, नगरपालिका अध्यक्ष निर्वाचित हों |
1919 | स्थानीय स्वशासन हस्तांतरित विषय — भारतीय मंत्री के अधीन |
1935 | प्रांतीय स्वायत्तता के बाद स्थानीय निकायों का और विस्तार |
⚠️ सीमाएँ मताधिकार बहुत सीमित था (केवल करदाता); धन की भारी कमी; ज़िला कलेक्टर का नियंत्रण बना रहा। फिर भी इन संस्थाओं ने भारतीयों को चुनाव और प्रशासन का प्रशिक्षण दिया। कई राष्ट्रीय नेता (जैसे सुरेंद्रनाथ बनर्जी, फ़िरोज़शाह मेहता, सी. आर. दास, विट्ठलभाई पटेल, जवाहरलाल नेहरू, सुभाष चंद्र बोस, सरदार पटेल) नगरपालिका/नगर निगम की राजनीति से उभरे। आज़ादी के बाद यही सोच 73वें और 74वें संविधान संशोधन (1992) तक पहुँची। |
चरण | काल | स्वरूप |
घेरे की नीति (Ring Fence) | 1765–1813 | बंगाल की सुरक्षा के लिए पड़ोसी राज्यों (जैसे अवध) को बफ़र बनाना; उनकी रक्षा का ज़िम्मा लेना; वेलेज़ली की सहायक संधि भी इसी की अगली कड़ी |
अधीनस्थ पृथक्करण (Subordinate Isolation) | 1813–1857 | लॉर्ड हेस्टिंग्स से: कंपनी सर्वोच्च शक्ति; रियासतें अधीन, पर एक-दूसरे से और बाहरी दुनिया से अलग; रेज़िडेंट के माध्यम से नियंत्रण; डलहौज़ी की विलय नीति इसकी पराकाष्ठा (राजपूताना की रियासतों से 1817–18 की संधियाँ इसी चरण में) |
अधीनस्थ संघ (Subordinate Union) | 1858–1935 | विलय बंद; राजाओं को गोद लेने की सनदें (1862); पर ब्रिटिश सर्वोच्चता (Paramountcy) पक्की; कुशासन पर हस्तक्षेप और राजा को हटाने का अधिकार (जैसे बड़ौदा 1875); 1876 में महारानी "कैसर-ए-हिंद"; रियासतें साम्राज्य का "अंग" |
समान संघ (Equal Federation) | 1935–1947 | 1935 के अधिनियम में रियासतों को संघ में बराबर इकाई के रूप में शामिल करने का प्रस्ताव (अकार्यान्वित); 1947 में सर्वोच्चता समाप्त |
◆ नरेंद्र मंडल (Chamber of Princes): 1919 के सुधारों के तहत 8 फ़रवरी 1921 को स्थापना (उद्घाटन ड्यूक ऑफ़ कनॉट); राजाओं का सलाहकार मंच, जिसके अध्यक्ष स्वयं वायसराय थे और एक राजा चांसलर होता था। बीकानेर के महाराजा गंगा सिंह इसके पहले चांसलर बने।
◆ बटलर समिति (1927, रिपोर्ट 1929): ब्रिटिश सरकार और रियासतों के संबंधों की जाँच; निष्कर्ष: "सर्वोच्चता सर्वोच्च ही रहेगी" (Paramountcy must remain paramount) — यानी ज़रूरत पड़ने पर ब्रिटिश सरकार रियासतों में हस्तक्षेप कर सकती है; और राजाओं की सहमति के बिना उन्हें भारतीय विधानमंडल के प्रति उत्तरदायी सरकार को नहीं सौंपा जाएगा।
✅ सकारात्मक परिणाम ✔ इतिहास में पहली बार लगभग पूरे भारत पर एक जैसा प्रशासन — एक जैसे कानून, अदालतें, सिविल सेवा, पुलिस ✔ कानून का शासन और लिखित संहिताएँ (IPC, CrPC, CPC) ✔ रेल, डाक, टेलीग्राफ़ ने देश को जोड़ा; लोगों का आवागमन और विचारों का प्रसार बढ़ा ✔ जनगणना — 1872 (मेयो) पहली, 1881 (रिपन) पहली नियमित; सर्वेक्षण, नक़्शे, सांख्यिकी ✔ अंग्रेज़ी भाषा अलग-अलग प्रांतों के शिक्षित लोगों की संपर्क भाषा बनी ✔ परिषदों, नगरपालिकाओं, चुनावों ने संसदीय परंपरा का प्रशिक्षण दिया; आज के संविधान का बड़ा भाग 1935 के अधिनियम से ✔ इसी एकता से अखिल भारतीय राष्ट्रवाद का जन्म हुआ | ❌ नकारात्मक परिणाम ✔ प्रशासन का उद्देश्य जनकल्याण नहीं, ब्रिटिश हित — राजस्व वसूली और व्यवस्था बनाए रखना ✔ ऊँचे पदों से भारतीयों का नस्लीय बहिष्कार ✔ महँगी नौकरशाही और सेना का बोझ भारतीय करदाता पर ✔ फूट डालो और राज करो: पृथक निर्वाचन, सेना में जाति-धर्म आधारित रेजिमेंट ✔ पुलिस, अदालत और अधिकारी प्रायः ज़मींदारों और साहूकारों का पक्ष लेते थे ✔ रियासती भारत और ब्रिटिश भारत का दोहरा ढाँचा — आगे एकीकरण की बड़ी चुनौती ✔ शासन आम जनता से दूर और अलग-थलग |
🔗 आज से जोड़कर देखें ज़िले का कलेक्टर, पुलिस अधिनियम 1861, उच्च न्यायालय, संघ और राज्य लोक सेवा आयोग, केंद्र-राज्य-समवर्ती सूचियाँ, अध्यादेश, संघीय ढाँचा, RBI, तहसीलदार-पटवारी — ये सब ब्रिटिश प्रशासन की देन हैं जो बदले रूप में आज भी चल रहे हैं। स्वतंत्र भारत ने इस ढाँचे को तोड़ा नहीं, बल्कि उसे लोकतंत्र और जनकल्याण की दिशा में मोड़ दिया। |
वर्ष | घटना |
1772 | हेस्टिंग्स: ज़िला दीवानी-फ़ौजदारी अदालतें; कलेक्टर का पद |
1773 / 1774 | रेग्युलेटिंग एक्ट / कलकत्ता सर्वोच्च न्यायालय |
1781 / 1784 | संशोधन (सेटलमेंट) अधिनियम / पिट्स इंडिया एक्ट |
1786–93 | कॉर्नवालिस: सिविल सेवा, कॉर्नवालिस कोड, थाना-दरोगा |
1793, 1813, 1833, 1853 | चार्टर एक्ट |
1834 | प्रथम विधि आयोग (मैकॉले) |
1858 | भारत शासन अधिनियम; महारानी की घोषणा (1 नवंबर) |
1859 / 1860 / 1861 | पील आयोग रिपोर्ट, CPC / IPC / भारतीय परिषद अधिनियम, पुलिस अधिनियम, उच्च न्यायालय अधिनियम, CrPC |
1863 | सत्येंद्रनाथ टैगोर: पहले भारतीय ICS |
1870 / 1872 | मेयो का वित्तीय विकेंद्रीकरण / पहली जनगणना |
1876 / 1879 | ICS आयु 19 / वैधानिक सिविल सेवा |
1881 / 1882 | पहली नियमित जनगणना / रिपन का स्थानीय स्वशासन प्रस्ताव |
1886 | एचिसन आयोग |
1892 | भारतीय परिषद अधिनियम |
1895 | एकीकृत भारतीय सेना (4 कमान) |
1902 | फ़्रेज़र पुलिस आयोग |
1909 | मार्ले-मिंटो सुधार |
1917 (20 अगस्त) | मॉन्टेग्यू घोषणा |
1919 / 1921 | भारत शासन अधिनियम / लागू; नरेंद्र मंडल |
1922 | भारत में पहली ICS परीक्षा (इलाहाबाद) |
1924 / 1926 | ली आयोग / लोक सेवा आयोग (1 अक्टूबर) |
1927 | बटलर समिति; साइमन कमीशन |
1932 | IMA देहरादून; साम्प्रदायिक पंचाट, पूना समझौता |
1935 | भारत शासन अधिनियम; RBI (1 अप्रैल) |
1937 | प्रांतीय स्वायत्तता (1 अप्रैल); चुनाव; संघीय न्यायालय |
1947 | भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम (18 जुलाई शाही स्वीकृति; 15 अगस्त लागू) |
🌅 अंतिम बात ब्रिटिश प्रशासन एक दोधारी तलवार था। उसने भारत को एक प्रशासनिक इकाई में बाँधा, आधुनिक कानून और संस्थाएँ दीं, पर उसका असली उद्देश्य साम्राज्य की सुरक्षा और आर्थिक शोषण था। विडंबना यह रही कि जिन संस्थाओं — परिषदों, अदालतों, अंग्रेज़ी शिक्षा, रेल, प्रेस — को अंग्रेज़ों ने अपने शासन को मज़बूत करने के लिए बनाया, उन्हीं से भारतीयों ने संगठित होकर स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ी। अगले अध्याय में हम देखेंगे कि ब्रिटिश आर्थिक नीतियों ने भारत के किसानों, कारीगरों और व्यापार को कैसे बदल दिया। |