📖 अध्याय 2/20 — आधुनिक भारत का इतिहास

ब्रिटिश विस्तार और भारतीय प्रतिरोध

मैसूर, मराठा और सिख शक्तियों से संघर्ष तथा सहायक संधि, व्यपगत और विलय की नीतियाँ (1765–1856)
📥 इस अध्याय की PDF डाउनलोड करें

🐯 कहानी से शुरुआत: टीपू का "खिलौना शेर"

लंदन के विक्टोरिया एंड एल्बर्ट संग्रहालय में लकड़ी का एक बड़ा-सा मशीनी खिलौना रखा है। इसमें एक शेर एक यूरोपीय सिपाही को अपने पंजों में दबोचे हुए है। इसके भीतर एक छोटा-सा बाजा (ऑर्गन) लगा है। हैंडल घुमाने पर शेर दहाड़ता था, सिपाही के भीतर से चीख़ जैसी आवाज़ निकलती थी और उसका हाथ छटपटाता-सा हिलता था। यह खिलौना मैसूर के शासक टीपू सुल्तान का था, जिन्हें लोग "शेर-ए-मैसूर" कहते थे।

इतिहासकार इस खिलौने को टीपू की अंग्रेज़-विरोधी सोच का प्रतीक मानते हैं। एक ऐसा शासक, जो कंपनी के आगे झुकने को तैयार नहीं था, उसने अपने महल में शेर के पंजों तले दबा अंग्रेज़ सिपाही रख छोड़ा था।

4 मई 1799 को श्रीरंगपट्टनम का क़िला गिरा और टीपू अपनी राजधानी की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। जब अंग्रेज़ महल में पहुँचे तो उन्हें यह खिलौना मिला। वे इसे अपने साथ लंदन ले गए। जिस शेर की दहाड़ कभी अंग्रेज़ों को डराती थी, वह अब उन्हीं के देश के संग्रहालय में रखा गया।

यह खिलौना मानो पूरे युग की कहानी कहता है। 1765 में कंपनी केवल बंगाल की दीवान थी, पर 1856 तक वह लगभग पूरे भारत की मालिक बन चुकी थी। सिर्फ़ 90 वर्षों में एक व्यापारिक कंपनी इतने बड़े देश की शासक कैसे बन गई?

इसका जवाब केवल युद्धों में नहीं मिलता। कंपनी ने युद्ध, संधियाँ, कूटनीति और क़ानूनी बहाने, चारों हथियार चलाए। कहीं दरबार में रेज़िडेंट बैठाकर राजा को अपने इशारों पर चलाया, कहीं सहायक संधि से राज्य की अपनी सेना छीन ली, और कहीं यह कहकर पूरा राज्य हड़प लिया कि गोद लिया हुआ बेटा वारिस नहीं हो सकता। मैसूर, मराठा और सिख शक्तियों ने डटकर मुक़ाबला किया, फिर भी वे क्यों हारीं? उनकी अपनी आपसी फूट का इसमें कितना हाथ था?

यही इस अध्याय की कहानी है। आगे दो कहानियाँ भी मिलेंगी, जो गोद लिए बेटे को वारिस न मानने की नीति और मराठा सरदारों की आपसी फूट का असर आसान तरीक़े से समझा देंगी।

1. कंपनी के विस्तार के तरीके

1757 से 1857 के बीच कंपनी के विस्तार को देखें तो एक बात साफ़ दिखती है: कंपनी ने किसी अनजान इलाक़े पर सीधा सैनिक हमला प्रायः नहीं किया। किसी रियासत को हड़पने से पहले उसने राजनीतिक, आर्थिक और कूटनीतिक साधनों का प्रयोग किया और युद्ध को अंतिम हथियार बनाया।

तरीका

कैसे काम करता था

उदाहरण

रेज़िडेंट (Resident) की नियुक्ति

बक्सर (1764) के बाद कंपनी ने रियासतों में अपने राजनीतिक प्रतिनिधि बैठाए। धीरे-धीरे वे यह भी तय करने लगे कि अगला राजा कौन होगा और किस पद पर किसे बैठाया जाएगा।

अवध, हैदराबाद, पुणे, नागपुर, लाहौर

सहायक संधि

राज्य अपनी सेना नहीं रख सकता था; कंपनी की सेना रखनी पड़ती थी और उसका ख़र्च देना पड़ता था।

हैदराबाद (1798), अवध (1801), पेशवा (1802)

सीधा युद्ध

जहाँ कंपनी के राजनीतिक या आर्थिक हितों को ख़तरा दिखा, वहाँ सेना भेजी।

मैसूर, मराठा, सिख, सिंध

कानूनी बहाने

व्यपगत सिद्धांत, कुशासन का आरोप, बकाया रक़म के बदले ज़मीन।

सतारा, झाँसी, नागपुर, अवध, बरार

🔍 आसान परिभाषा: रेज़िडेंट (Resident)

📘 परिभाषा: कंपनी द्वारा किसी भारतीय रियासत के दरबार में नियुक्त राजनीतिक (और व्यावसायिक) प्रतिनिधि, जिसका काम कंपनी के हितों की रक्षा करना और उन्हें आगे बढ़ाना था।

💡 आसान भाषा में: दरबार में बैठा कंपनी का "आँख-कान", जो धीरे-धीरे राजा का भी मालिक बन जाता था। 🏠 उदाहरण: जैसे किसी दुकान में बैंक अपना एक आदमी बैठा दे ताकि क़र्ज़ की वसूली पक्की रहे; कुछ समय बाद वही आदमी तय करने लगे कि दुकान में क्या बिकेगा और किसे नौकरी मिलेगी। जेम्स मिल ने लिखा था कि "दरअसल रेज़िडेंट ही रियासत का राजा होता है।"

❝ दरअसल रेज़िडेंट ही रियासत का राजा होता है… जब तक स्थानीय राजा पूरी तरह अधीन रहता है और ब्रिटिश सरकार के मुताबिक़ काम करता है, चीज़ें आराम से चलती रहती हैं… जब भी राजा कोई ऐसा रास्ता अपनाता है जिसे ब्रिटिश सरकार गलत मानती है, तो टकराव और उथल-पुथल पैदा हो जाती है। ❞ (जेम्स मिल (1832), भावानुवाद)

2. विस्तार की प्रमुख नीतियाँ

कंपनी की नीतियाँ समय के साथ बदलती रहीं: पहले अपने इलाक़े की रक्षा, फिर रियासतों को अधीन बनाना और अंत में सीधा विलय। नीचे का चार्ट पूरे विकास-क्रम को एक नज़र में दिखाता है।

चित्र 2.1: ब्रिटिश विस्तार की नीतियों का क्रमिक विकास (1765–1856)
चित्र 2.1: ब्रिटिश विस्तार की नीतियों का क्रमिक विकास (1765–1856)

2.1 रिंग फ़ेंस नीति (घेरे की नीति), लगभग 1765–1798

◆ वारेन हेस्टिंग्स के समय (और उससे पहले क्लाइव के समय से) अपनाई गई। उद्देश्य था कंपनी के क्षेत्रों के चारों ओर मित्र "मध्यवर्ती" (बफ़र) राज्यों का एक घेरा बनाना।

◆ इन मित्र राज्यों की रक्षा कंपनी की सेना करती थी और ख़र्च वही राज्य देते थे। बदले में वे मराठों, मैसूर और अफ़गानों के हमलों से कंपनी के इलाक़े की ढाल बनते थे।

◆ उदाहरण: बक्सर के बाद अवध को बंगाल की रक्षा के लिए बफ़र राज्य बनाया गया। 1774 का रुहेला युद्ध भी इसी नीति से जुड़ा था, जब हेस्टिंग्स ने अवध के नवाब को रुहेलों के विरुद्ध सेना दी।

◆ आगे चलकर वेलेज़ली ने इसी विचार को सहायक संधि में बदल दिया; मित्र राज्य अब आश्रित (परतंत्र) राज्य बन गए।

2.2 अहस्तक्षेप की नीति (सर जॉन शोर, 1793–1798)

◆ गवर्नर जनरल सर जॉन शोर ने भारतीय राज्यों के आपसी झगड़ों में दख़ल न देने की नीति अपनाई।

◆ 1795 में खर्दा के युद्ध में जब मराठों ने हैदराबाद के निज़ाम को हराया, तब कंपनी मित्र होने पर भी उसकी सहायता करने नहीं गई।

◆ इस नीति से मराठा और मैसूर जैसी शक्तियाँ और मज़बूत हुईं, निज़ाम ने फ्रांसीसी अफ़सरों की सहायता से सेना बनानी शुरू की। कंपनी को यह नीति हानिकारक लगी और वेलेज़ली ने इसे उलट दिया।

2.3 सहायक संधि (Subsidiary Alliance), लॉर्ड वेलेज़ली (1798–1805)

लॉर्ड वेलेज़ली को भारत के सबसे बड़े साम्राज्यवादी गवर्नर जनरलों में गिना जाता है। वह भारत में फ्रांसीसी प्रभाव (नेपोलियन का ख़तरा) ख़त्म करना और कंपनी को भारत की सर्वोच्च शक्ति बनाना चाहता था। इसका मुख्य औज़ार थी सहायक संधि। इस प्रथा का प्रारंभिक प्रयोग फ्रांसीसी गवर्नर डूप्ले ने किया था और अवध के साथ 1765 से ऐसी व्यवस्था चल रही थी, पर इसे एक व्यवस्थित नीति का रूप वेलेज़ली ने दिया।

🔍 आसान परिभाषा: सहायक संधि (Subsidiary Alliance)

📘 परिभाषा: कंपनी और किसी भारतीय राज्य के बीच ऐसी संधि, जिसमें राज्य अपनी सुरक्षा के लिए कंपनी की "सहायक सेना" अपने यहाँ रखता, उसका ख़र्च देता, राजधानी में ब्रिटिश रेज़िडेंट रखता और अपनी विदेश नीति कंपनी को सौंप देता था।

💡 आसान भाषा में: "तुम्हारी रक्षा हम करेंगे, पर सेना हमारी होगी, ख़र्च तुम्हारा होगा और बाहर किससे दोस्ती करनी है, यह हम तय करेंगे।" 🏠 उदाहरण: जैसे कोई सुरक्षा एजेंसी आपके घर में अपने गार्ड बैठा दे, उनका वेतन आपसे ले, घर की चाबी भी रख ले और यह भी तय करे कि आपके घर कौन आएगा। कुछ समय बाद वेतन न दे पाने पर घर का एक कमरा भी ले ले। इसीलिए सहायक संधि को "गुलामी का सुनहरा पिंजरा" कहा गया।

सहायक संधि की प्रमुख शर्तें और राज्य पर प्रभाव

शर्त

राज्य पर प्रभाव

राज्य में कंपनी की सेना (सहायक सेना) स्थायी रूप से रहेगी, जिसका पूरा नियंत्रण अंग्रेज़ अधिकारियों के हाथ में होगा

राज्य की अपनी सैन्य स्वतंत्रता समाप्त

सेना का ख़र्च राज्य देगा; ख़र्च न दे पाने पर अपने इलाक़े का कुछ भाग कंपनी को देना होगा

भारी आर्थिक बोझ; धीरे-धीरे भूमि का हाथ से निकलना

राजधानी में एक ब्रिटिश रेज़िडेंट रहेगा

कंपनी की सीधी निगरानी; धीरे-धीरे भीतरी मामलों में दख़ल

कंपनी की अनुमति के बिना किसी यूरोपीय (विशेषकर फ्रांसीसी) को नौकरी में नहीं रखेगा

फ्रांसीसी प्रभाव का अंत

कंपनी की अनुमति के बिना किसी दूसरे राज्य से युद्ध या संधि नहीं करेगा; आपसी झगड़ों में कंपनी पंच होगी

विदेश नीति पूरी तरह समाप्त

बदले में कंपनी राज्य की बाहरी और भीतरी शत्रुओं से रक्षा करेगी और भीतरी मामलों में दख़ल न देने का वादा करेगी

"सुरक्षित" पर पूरी तरह पराधीन; दख़ल न देने का वादा व्यवहार में टूटता रहा

सहायक संधि स्वीकार करने वाले प्रमुख राज्य

राज्य

वर्ष

विशेष बात

हैदराबाद (निज़ाम)

1798 (1800 में संशोधित)

पहला राज्य जिसने वेलेज़ली की सहायक संधि मानी; 1800 में सेना के ख़र्च के बदले इलाक़े (बाद में "सौंपे गए ज़िले") कंपनी को दिए।

मैसूर

1799

टीपू की मृत्यु के बाद वाडियार वंश को फिर गद्दी दी गई, पर सहायक संधि के साथ।

तंजौर

1799

राजा ने शासन कंपनी को सौंपा और पेंशन ली।

अवध

1801

बकाये के बदले नवाब को अपना लगभग आधा राज्य (रुहेलखंड, गंगा–यमुना दोआब का भाग) कंपनी को देना पड़ा।

पेशवा (बाजीराव द्वितीय)

1802 (बसीन की संधि)

मराठा संघ टूटने की शुरुआत; द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध का कारण।

भोंसले (नागपुर)

1803

देवगाँव की संधि; द्वितीय मराठा युद्ध के बाद।

सिंधिया (ग्वालियर)

1803–1804

सुर्जी-अर्जुनगाँव की संधि के बाद।

गायकवाड़ (बड़ौदा)

1805

—

राजपूताना के राज्य, भरतपुर आदि

1817–1818

लॉर्ड हेस्टिंग्स के समय (अधीनस्थ सहयोग की संधियाँ)।

चित्र 2.2: सहायक संधि का
चित्र 2.2: सहायक संधि का "जाल": सुरक्षा के नाम पर पराधीनता और अंत में विलय

✅ कंपनी को लाभ

✔ भारतीय राज्यों के ख़र्च पर एक विशाल सेना मिल गई।

✔ राजधानियों में सेना रखने से सामरिक महत्व के स्थानों पर नियंत्रण।

✔ कंपनी की सेना अपनी राजनीतिक सीमाओं से बहुत आगे तक पहुँच गई।

✔ भारत में फ्रांसीसी चालें पूरी तरह विफल।

✔ कंपनी भारतीय शासकों के आपसी विवादों में पंच बन गई।

✔ रेज़िडेंट प्रभावशाली होकर राज्यों पर नियंत्रण रखने लगे; यह व्यवस्था साम्राज्य-निर्माण में "भेदिए शत्रु" की तरह काम करने लगी।

❌ भारतीय राज्यों को हानि

✔ निःशस्त्रीकरण और विदेश नीति छिनने से स्वतंत्रता समाप्त।

✔ कंपनी प्रायः राज्य की आय का लगभग एक-तिहाई भाग ले लेती थी; राज्य जल्दी दिवालिया हो गए।

✔ रेज़िडेंटों का प्रशासन में अत्यधिक हस्तक्षेप।

✔ अयोग्य और अत्याचारी राजा भी कंपनी की सेना से सुरक्षित रहे; जनता अपनी हालत सुधारने के अधिकार से वंचित रही।

✔ भंग की गई सेनाओं के बेरोज़गार सैनिक आगे चलकर पिंडारी जैसे लुटेरे दलों में शामिल हुए।

✔ बकाया न चुका पाने पर इलाक़े छिनते गए और अंत में विलय।

2.4 सर्वोच्चता (Paramountcy) की नीति, लॉर्ड हेस्टिंग्स (1813–1823)

◆ 19वीं सदी की शुरुआत से कंपनी आक्रामक क्षेत्रीय विस्तार की नीति पर चल रही थी। लॉर्ड हेस्टिंग्स (लॉर्ड मोइरा) के समय "सर्वोच्चता" (Paramountcy) की नई नीति शुरू हुई।

◆ कंपनी का दावा था कि उसकी सत्ता सर्वोच्च है, इसलिए वह भारतीय राज्यों से ऊपर है और अपने हितों की रक्षा के लिए किसी भी रियासत को मिला सकती है या मिलाने की धमकी दे सकती है।

◆ इसी नीति के अंतर्गत तीसरा आंग्ल-मराठा युद्ध (1817–18), पिंडारी अभियान और राजपूताना के राज्यों से संधियाँ (1817–18) हुईं। यह सोच बाद में भी अंग्रेज़ों की नीतियों में बनी रही।

2.5 व्यपगत सिद्धांत (Doctrine of Lapse), लॉर्ड डलहौज़ी (1848–1856)

अधिग्रहण की अंतिम लहर लॉर्ड डलहौज़ी के समय चली। हिंदू परंपरा में जिस राजा का अपना पुत्र नहीं होता था, वह किसी निकट संबंधी के पुत्र को गोद (दत्तक) लेता था और मृत्यु के बाद दत्तक पुत्र को असली पुत्र के सभी अधिकार मिलते थे। डलहौज़ी ने इस परंपरा को रोक दिया। कंपनी के निदेशकों ने इस सिद्धांत का विचार 1834 में ही रख दिया था, पर इसे कठोरता से लागू डलहौज़ी ने किया।

📖 कहानी 1: एक मरते राजा की चिट्ठी, जिसे कंपनी ने नहीं माना

नवंबर 1853, झाँसी के राजा गंगाधर राव बहुत बीमार थे और उनका कोई अपना पुत्र जीवित नहीं था। हिंदू परंपरा के अनुसार उन्होंने अपने परिवार के एक बालक को गोद लिया और उसका नाम दामोदर राव रखा। कहा जाता है कि गोद लेते समय अंग्रेज़ अधिकारी भी वहाँ मौजूद थे। राजा ने उन्हें एक पत्र दिया, जिसमें माँग की गई थी कि इस बालक को वारिस माना जाए और राज्य की देखभाल रानी लक्ष्मीबाई करें। कुछ ही दिन बाद राजा चल बसे।

1818 में लॉर्ड हेस्टिंग्स ने झाँसी के राजा रामचंद्र राव से संधि करके राज्य को उनके वंशजों के हाथ में रहने दिया था। पर गवर्नर जनरल डलहौज़ी की सोच अलग थी। उसका तर्क था कि झाँसी कंपनी की मान्यता से चलने वाला आश्रित राज्य है, और जिस राजा का अपना पुत्र न हो, उसके गोद लिए बेटे को वारिस मानना या न मानना कंपनी की मर्ज़ी है। कंपनी ने दामोदर राव को वारिस मानने से मना कर दिया।

फ़रवरी–मार्च 1854 में झाँसी को कंपनी के राज्य में मिलाने की घोषणा हो गई। रानी ने इस फ़ैसले के विरुद्ध अपील भेजी, पर उसे ठुकरा दिया गया। उन्हें पेंशन देकर क़िले से हटने को कहा गया।

झाँसी अकेला मामला नहीं था। सतारा (1848) से लेकर नागपुर (1854) तक एक-एक करके कई राज्य इसी रास्ते से कंपनी में मिलते गए। पेशवा बाजीराव द्वितीय के दत्तक पुत्र नाना साहब की पेंशन भी बंद कर दी गई। राजाओं और रानियों में फैला यही गहरा असंतोष आगे चलकर 1857 के विद्रोह की पृष्ठभूमि बना।

🧭 इस कहानी से कौन-सी अवधारणा साफ़ हुई

✔ व्यपगत सिद्धांत — जिस आश्रित राज्य के शासक का अपना पुत्र न हो और उसके दत्तक पुत्र को कंपनी मान्यता न दे, वह राज्य कंपनी में मिला लिया जाता था।

✔ आश्रित राज्य की शर्त — यह नियम उन राज्यों पर चलता था जिन्हें कंपनी ने बनाया था या अनुदान-पत्र (सनद) से मान्यता दी थी। झाँसी इसी श्रेणी में गिना गया।

✔ असंतोष से 1857 तक — झाँसी, नागपुर और नाना साहब की पेंशन, तीनों के साथ हुए व्यवहार ने 1857 के विद्रोह के लिए ज़मीन तैयार की।

📝 परीक्षा के लिए: व्यपगत सिद्धांत (डलहौज़ी): सतारा (1848) → जैतपुर, संबलपुर (1849) → बघाट (1850) → उदयपुर [छत्तीसगढ़] (1852) → झाँसी (1853–54) → नागपुर (1854); अवध (1856) व्यपगत से नहीं, कुशासन के आरोप से मिलाया गया।

🔍 आसान परिभाषा: व्यपगत सिद्धांत / विलय नीति / हड़प नीति (Doctrine of Lapse)

📘 परिभाषा: यदि कंपनी पर आश्रित किसी राज्य का शासक बिना प्राकृतिक (अपने) पुत्र के मर जाए और उसके दत्तक पुत्र को कंपनी मान्यता न दे, तो वह राज्य "व्यपगत" (समाप्त) मानकर कंपनी के क्षेत्र में मिला लिया जाता था। तर्क यह था कि "जो शक्ति अधिकार देती है, वह उसे वापस भी ले सकती है।"

💡 आसान भाषा में: राजा का अपना बेटा नहीं है और गोद लिया बेटा कंपनी को मंज़ूर नहीं, तो राज्य कंपनी का। 🏠 उदाहरण: जैसे किसी मकान-मालिक की मृत्यु पर उसका गोद लिया बेटा घर का वारिस बने, पर बैंक कहे कि हम गोद लिए बेटे को नहीं मानते, इसलिए घर अब बैंक का है। झाँसी में रानी लक्ष्मीबाई के दत्तक पुत्र दामोदर राव के साथ ठीक यही हुआ।

◆ लागू किसे होता था: यह सिद्धांत मुख्यतः उन आश्रित राज्यों पर लागू होता था जिन्हें कंपनी ने बनाया या "सनद" (अनुदान-पत्र) से मान्यता दी थी; पूर्ण स्वतंत्र पुराने राज्यों पर नहीं।

राज्य

वर्ष

विवरण

सतारा (महाराष्ट्र)

1848

पहला राज्य। राजा अप्पा साहिब ने मृत्यु से पहले कंपनी की अनुमति के बिना दत्तक पुत्र लिया; डलहौज़ी ने इसे अवैध मानकर राज्य मिला लिया।

जैतपुर (बुंदेलखंड)

1849

निःसंतान शासक।

संबलपुर (उड़ीसा)

1849

राजा नारायण सिंह के न पुत्र था, न वे दत्तक ले सके।

बघाट (हिमाचल)

1850

निःसंतान शासक (बाद में लॉर्ड कैनिंग ने लौटा दिया)।

उदयपुर (छत्तीसगढ़, राजस्थान वाला उदयपुर नहीं)

1852

निःसंतान शासक (1860 में स्थानीय शासन बहाल)।

झाँसी

1853 (विलय की घोषणा फ़रवरी–मार्च 1854)

राजा गंगाधर राव की मृत्यु (नवंबर 1853) के बाद रानी लक्ष्मीबाई के दत्तक पुत्र दामोदर राव को अमान्य किया। 1818 के बाद लॉर्ड हेस्टिंग्स ने झाँसी के राजा रामचंद्र राव से संधि कर राज्य उसके वंशजों को दिया था।

नागपुर (भोंसले)

1854

राजा राघोजी तृतीय की मृत्यु (दिसंबर 1853) के बाद रानी द्वारा गोद लिए यशवंत राव को अमान्य किया। यह बड़ा कपास-उत्पादक राज्य था।

तंजौर और कर्नाटक (अर्काट) की उपाधियाँ

1855

राजाओं/नवाबों की उपाधियाँ और पेंशन समाप्त।

🧠 याद रखें: व्यपगत का क्रम और अपवाद

सतारा (1848) → जैतपुर, संबलपुर (1849) → बघाट (1850) → उदयपुर (1852) → झाँसी (1853) → नागपुर (1854)। कुछ स्रोतों में झाँसी को 1854 लिखा जाता है, क्योंकि राजा की मृत्यु 1853 में हुई और विलय की घोषणा 1854 में।

अवध (1856) व्यपगत से नहीं, बल्कि "कुशासन" के आरोप में मिलाया गया। बरार (1853) निज़ाम से सहायक सेना के बकाये के बदले लिया गया। पंजाब (1849) युद्ध से मिला।

पेशवा बाजीराव द्वितीय की मृत्यु (1851) के बाद डलहौज़ी ने उनके दत्तक पुत्र नाना साहब (धोंडू पंत) की 8 लाख रुपये वार्षिक पेंशन बंद कर दी। झाँसी, नागपुर और नाना साहब, तीनों का असंतोष 1857 के विद्रोह की पृष्ठभूमि बना।

2.6 कुशासन का सिद्धांत और अवध का विलय (1856)

◆ जिस राज्य को व्यपगत से नहीं मिलाया जा सकता था, वहाँ कंपनी "कुशासन" (बुरा शासन) और भ्रष्टाचार का आरोप लगाकर विलय करती थी। इस आरोप की कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं थी, इसलिए कंपनी जब चाहे यह बहाना बना सकती थी।

◆ पहले भी वेलेज़ली ने इसी तरह तंजौर (1799), सूरत (1800) और कर्नाटक (1801) का शासन अपने हाथ में लिया था।

◆ अवध: डलहौज़ी ने 1851 में अवध के बारे में कहा था: "यह एक चेरी है जो एक दिन हमारे मुँह में आ गिरेगी।" उसने ब्रिटिश रेज़िडेंट (पहले स्लीमन, फिर आउट्रम) से अवध की रिपोर्ट मँगवाई, जिसमें नवाब वाजिद अली शाह के शासन को बढ़ा-चढ़ाकर बुरा बताया गया।

◆ नवाब पर कुशासन और संधि-भंग का आरोप लगाकर 13 फ़रवरी 1856 को अवध को ब्रिटिश राज्य में मिलाने की घोषणा कर दी गई। अंग्रेज़ों ने कहा कि वे अवध की जनता को नवाब के "कुशासन" से आज़ाद कराने के लिए "कर्तव्य से बँधे" हैं! नवाब को कलकत्ता (मटियाबुर्ज) भेज दिया गया।

◆ अपने प्रिय नवाब को इस तरह हटाए जाने से लोगों में भारी गुस्सा फैला। अवध कंपनी की सेना के बहुत से सिपाहियों का घर था, इसलिए यह असंतोष 1857 के विद्रोह का एक बड़ा कारण बना।

2.7 "आगे बढ़ो" की नीति बनाम "कुशल अकर्मण्यता"

नीति

समर्थक

अर्थ

उदाहरण

आगे बढ़ने की नीति (Forward Policy)

लॉर्ड ऑकलैंड, डलहौज़ी, बाद में लिटन

सीमाओं को आगे बढ़ाओ; अफ़गानिस्तान जैसे पड़ोसियों में हस्तक्षेप करो

प्रथम अफ़गान युद्ध (1839–42)

कुशल अकर्मण्यता (Masterly Inactivity)

जॉन लॉरेंस (1864–69)

अफ़गानिस्तान के भीतरी मामलों में दख़ल न दो; प्रतीक्षा करो

1857 के बाद कुछ समय की नीति

चित्र 2.3: विस्तार की नीतियों से प्रभावित प्रमुख राज्य: सहायक संधि, व्यपगत, कुशासन और युद्ध से विलय
चित्र 2.3: विस्तार की नीतियों से प्रभावित प्रमुख राज्य: सहायक संधि, व्यपगत, कुशासन और युद्ध से विलय

3. आंग्ल–मैसूर युद्ध (1767–1799)

3.1 मैसूर का उदय और हैदर अली

◆ मैसूर पर परंपरागत रूप से वाडियार (वोडेयार) वंश का शासन था। 18वीं सदी में राजा कृष्णराज नाममात्र का शासक था; पूरी शक्ति मंत्री देवराज और नंजराज के हाथ में थी।

◆ हैदर अली का जन्म लगभग 1721–22 में एक साधारण परिवार में हुआ (पिता फ़तह मुहम्मद बूदिकोट के जागीरदार/सैनिक अधिकारी थे)। वह पढ़ा-लिखा नहीं था, पर तेज़ बुद्धि और सैनिक प्रतिभा से डिंडीगुल का फ़ौजदार बना।

◆ 1761 में उसने नंजराज से सत्ता छीन ली और मैसूर का वास्तविक शासक बन गया। उसने फ्रांसीसी विशेषज्ञों की सहायता से डिंडीगुल में आधुनिक शस्त्रागार बनाया, सेना को पश्चिमी ढंग से प्रशिक्षित किया और बेदनूर, सुंडा, कनारा व मालाबार तक राज्य बढ़ाया।

◆ मालाबार तट का व्यापार मैसूर के नियंत्रण में था, जहाँ से कंपनी काली मिर्च और इलायची ख़रीदती थी। शक्तिशाली मैसूर कंपनी के व्यापार और राजनीति दोनों के लिए चुनौती था।

3.2 प्रथम आंग्ल–मैसूर युद्ध (1767–1769)

कारण

1. हैदर अली और फ्रांसीसियों की मित्रता से अंग्रेज़ नाराज़ थे।

2. कर्नाटक का नवाब (मुहम्मद अली) हैदर का शत्रु और अंग्रेज़ों का मित्र था।

3. हैदर द्वारा अंग्रेज़ों के मित्र मालाबार क्षेत्र पर अधिकार करना।

घटनाक्रम और परिणाम

◆ अंग्रेज़ों ने मराठों और निज़ाम के साथ मिलकर हैदर के विरुद्ध त्रिगुट बनाया। हैदर ने कूटनीति से काम लिया: मराठों को 35 लाख रुपये देकर तटस्थ किया और निज़ाम को इलाक़े का लालच देकर अपनी ओर मिला लिया।

◆ 1767 में हैदर और निज़ाम की संयुक्त सेना ने कर्नाटक पर आक्रमण किया, पर हार गई और निज़ाम ने अलग होकर अंग्रेज़ों से संधि कर ली। हैदर ने मंगलौर अंग्रेज़ों से छीन लिया।

◆ 1769 में हैदर अचानक मद्रास के पास पहुँच गया और उसे घेर लिया। घबराए अंग्रेज़ों को 4 अप्रैल 1769 को मद्रास की संधि करनी पड़ी: दोनों ने एक-दूसरे के जीते हुए प्रदेश लौटाए और बाहरी आक्रमण के समय एक-दूसरे की सहायता का वचन दिया।

3.3 द्वितीय आंग्ल–मैसूर युद्ध (1780–1784)

कारण

1. अंग्रेज़ प्रथम युद्ध की हार और अपमान का बदला लेना चाहते थे।

2. मद्रास की संधि का उल्लंघन: 1771 में जब मराठों ने मैसूर पर आक्रमण किया, तो अंग्रेज़ों ने वादे के बावजूद हैदर की सहायता नहीं की।

3. अंग्रेज़ों ने गुंटूर पर अधिकार किया और हैदर के क्षेत्र में स्थित फ्रांसीसी बंदरगाह माहे पर (1779) कब्ज़ा कर लिया, जिसे हैदर अपनी रक्षा में मानता था।

घटनाक्रम

◆ इस बार हैदर ने अंग्रेज़ों के विरुद्ध निज़ाम और मराठों के साथ महागठबंधन बनाया। जुलाई 1780 में लगभग 80,000 की सेना के साथ उसने कर्नाटक पर आक्रमण किया।

◆ पोलिलूर का युद्ध (10 सितंबर 1780): टीपू और हैदर ने कर्नल बेली (Baillie) की सेना को बुरी तरह हराया। इसे उस समय तक भारत में कंपनी की सबसे बड़ी हार माना गया। नवंबर 1780 में हैदर ने अर्काट जीत लिया; कर्नाटक का नवाब भागकर मद्रास गया।

◆ वारेन हेस्टिंग्स ने कूटनीति से निज़ाम और मराठों को गठबंधन से अलग कर दिया और सर आयरकूट को भेजा। पोर्टो नोवो (1 जुलाई 1781) में आयरकूट ने हैदर को हराया।

◆ दिसंबर 1782 में युद्ध के बीच ही हैदर अली की (कैंसर से) मृत्यु हो गई। उसके पुत्र टीपू सुल्तान ने युद्ध जारी रखा।

◆ संधि: मंगलौर की संधि (11 मार्च 1784)। दोनों ने एक-दूसरे के जीते प्रदेश और बंदी लौटाए और अंग्रेज़ों ने मैसूर में हस्तक्षेप न करने का वचन दिया। यह दोनों पक्षों की मजबूरी की संधि थी और किसी भारतीय शक्ति द्वारा कंपनी पर अपनी शर्तें थोपने का अंतिम अवसर माना जाता है।

3.4 तृतीय आंग्ल–मैसूर युद्ध (1790–1792)

कारण

◆ अंग्रेज़ मैसूर का प्रभाव ख़त्म करना चाहते थे, इसलिए मराठों और निज़ाम से मिल गए। टीपू ने फ्रांस और तुर्की से सहायता के असफल प्रयास किए।

◆ तात्कालिक कारण: टीपू मालाबार की सुरक्षा के लिए कोचीन के पास डच किले (क्रांगनूर और आयकोट्टा) ख़रीदना चाहता था, पर अंग्रेज़ों के मित्र त्रावणकोर के राजा ने उन्हें ख़रीद लिया। नाराज़ टीपू ने दिसंबर 1789 में त्रावणकोर पर आक्रमण कर दिया।

घटनाक्रम और परिणाम

◆ गवर्नर जनरल लॉर्ड कॉर्नवालिस स्वयं विशाल सेना लेकर आया। 1791 में बंगलौर का पतन हुआ और अंग्रेज़, मराठा और निज़ाम की संयुक्त सेना ने राजधानी श्रीरंगपट्टनम को घेर लिया।

◆ श्रीरंगपट्टनम की संधि (1792): टीपू का लगभग आधा राज्य छीनकर अंग्रेज़ों और उनके साथियों (मराठा, निज़ाम) में बाँट दिया गया; अंग्रेज़ों को मालाबार, डिंडीगुल, बारामहल और कुर्ग पर प्रभाव मिला। टीपू को 3 करोड़ रुपये से अधिक का हर्जाना देना पड़ा और हर्जाना चुकने तक अपने दो पुत्र बंधक रखने पड़े।

❝ हमने अपने शत्रु को प्रभावी रूप से अपंग कर दिया है, और साथ ही अपने मित्रों को इतना शक्तिशाली भी नहीं बनाया कि वे हमारे लिए ख़तरा बन जाएँ। ❞ (लॉर्ड कॉर्नवालिस, तृतीय युद्ध के बाद (भावार्थ))

3.5 चतुर्थ आंग्ल–मैसूर युद्ध (1799)

कारण

1. श्रीरंगपट्टनम की अपमानजनक संधि और राज्य के अंग-भंग से टीपू बदला लेना चाहता था।

2. टीपू ने फ्रांसीसियों और नेपोलियन (जो उस समय मिस्र में था) से पत्र-व्यवहार किया, फ्रांसीसियों को सेना में ऊँचे पद दिए और अफ़गानिस्तान व तुर्की में भी दूत भेजे।

3. टीपू ने वेलेज़ली का सहायक संधि का प्रस्ताव ठुकरा दिया।

4. साम्राज्यवादी वेलेज़ली मैसूर को हर हाल में अधीन करना चाहता था।

घटनाक्रम और परिणाम

◆ फ़रवरी 1799 में वेलेज़ली ने युद्ध की घोषणा की। जनरल हैरिस और आर्थर वेलेज़ली (गवर्नर जनरल का भाई) के नेतृत्व में अंग्रेज़ और निज़ाम की सेना बढ़ी; मराठे तटस्थ रहे। मलावल्ली (मार्च 1799) में टीपू की सेना हारी।

◆ 4 मई 1799 को श्रीरंगपट्टनम का पतन हुआ। टीपू अपनी राजधानी की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुआ।

◆ मैसूर का राजकाज पुराने वाडियार वंश के बालक कृष्णराज तृतीय को सौंपा गया, पर जुलाई 1799 में उस पर सहायक संधि थोप दी गई। कनारा, कोयंबटूर, वायनाड आदि इलाक़े कंपनी ने लिए; कुछ भाग निज़ाम को मिला। (बाद में 1831 में कुशासन के आरोप में मैसूर का शासन कंपनी ने सीधे अपने हाथ में ले लिया था।)

3.6 टीपू सुल्तान: "शेर-ए-मैसूर" (1782–1799)

पहलू

विवरण

जन्म और उपाधि

जन्म 1750 में देवनहल्ली (बंगलौर के पास); "शेर-ए-मैसूर"; 1786 में स्वयं को "पादशाह" घोषित किया।

"शेर-ए-मैसूर" की कहानी

कहा जाता है कि एक बार फ्रांसीसी मित्र के साथ शिकार पर बंदूक और कटार साथ न देने पर भी उसने निहत्थे शेर का मुक़ाबला किया और उसे मार गिराया। उसके राजसी झंडे पर शेर का चित्र होता था।

सैन्य नवाचार

लोहे के खोल वाले रॉकेटों का प्रभावी प्रयोग (बाद में अंग्रेज़ों ने इन्हीं से प्रेरणा लेकर रॉकेट बनाए); आधुनिक नौसेना बनाने का प्रयास; सेना का यूरोपीय ढंग से प्रशिक्षण।

प्रशासन और अर्थव्यवस्था

नया कैलेंडर, नए सिक्के और नाप-तौल की प्रणाली; जागीरदारी घटाई; रेशम उद्योग (चंदन व रेशम) को बढ़ावा; व्यापार के लिए राज्य-कंपनी और विदेशों में कोठियाँ खोलने की योजना।

व्यापार पर रोक (1785)

अपने बंदरगाहों से चंदन की लकड़ी, काली मिर्च और इलायची का निर्यात रोका और स्थानीय सौदागरों को कंपनी के साथ व्यापार से मना किया। इससे अंग्रेज़ आग-बबूला हो गए।

फ्रांसीसी संबंध

फ्रांसीसी क्रांति के विचारों से प्रभावित; जैकोबिन क्लब का सदस्य बना और श्रीरंगपट्टनम में "स्वतंत्रता का वृक्ष" (Tree of Liberty) लगाया।

प्रसिद्ध कथन

"शेर की तरह एक दिन जीना, गीदड़ की तरह सौ वर्ष जीने से बेहतर है।"

खिलौना शेर

विशाल मशीनी खिलौना, जिसमें शेर एक यूरोपीय सिपाही को दबाए है; अब लंदन के विक्टोरिया एंड एल्बर्ट संग्रहालय में।

📸 तस्वीरों में उपनिवेशवाद

1792 की संधि के बाद टीपू के दो बेटों को बंधक के रूप में कॉर्नवालिस के सामने पेश किए जाने का दृश्य ब्रिटिश चित्रकारों ने बहुत चाव से बनाया (जैसे डेनियल ऑर्म का 1793 का चित्र)। ऐसे चित्र अंग्रेज़ी सत्ता की "विजय" का प्रचार थे। जबकि सच यह है कि हैदर और टीपू ने कई बार कंपनी की सेनाओं को हराया था।

चित्र 2.4: आंग्ल–मैसूर युद्धों के प्रमुख स्थान: श्रीरंगपट्टनम, मद्रास, मंगलौर, पोलिलूर, पोर्टो नोवो आदि
चित्र 2.4: आंग्ल–मैसूर युद्धों के प्रमुख स्थान: श्रीरंगपट्टनम, मद्रास, मंगलौर, पोलिलूर, पोर्टो नोवो आदि
चित्र 2.5: चारों आंग्ल–मैसूर युद्ध: कारण, घटना, संधि और परिणाम
चित्र 2.5: चारों आंग्ल–मैसूर युद्ध: कारण, घटना, संधि और परिणाम

मैसूर की हार के कारण

◆ निज़ाम और मराठों का बार-बार अंग्रेज़ों का साथ देना; भारतीय शक्तियों में एकता का अभाव।

◆ अंग्रेज़ों की नौसैनिक श्रेष्ठता और बंगाल व मद्रास के संसाधन; फ्रांस से अपेक्षित सहायता कभी नहीं पहुँची।

◆ टीपू की कठोर धार्मिक और प्रशासनिक नीतियों से कुछ वर्गों (कुर्ग, मालाबार के नायर) का असंतोष; कुछ अधिकारियों का विश्वासघात (जैसे दीवान मीर सादिक)।

📢 विज्ञापन
🔥 सबसे लोकप्रिय
📘

RAS Foundation Course 2026 🕉️

Multiple ValidityTests
₹4,999₹25,000
Join Now →

4. आंग्ल–मराठा युद्ध (1775–1818)

4.1 पृष्ठभूमि

◆ 18वीं सदी में मराठा भारत की सबसे बड़ी शक्ति थे। पानीपत (1761) की हार से उन्हें गहरा आघात लगा, पर पेशवा माधवराव प्रथम (1761–1772) ने उनकी शक्ति फिर से जमा दी। अंग्रेज़ जानते थे कि मराठा ही उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती हैं।

◆ पानीपत के बाद मराठा कई राज्यों में बँट गए: पेशवा (पुणे), सिंधिया (ग्वालियर), होल्कर (इंदौर), गायकवाड़ (बड़ौदा) और भोंसले (नागपुर)। ये सब पेशवा (सर्वोच्च मंत्री) के अधीन एक राज्यमंडल (Confederacy, संघ) के सदस्य थे। पेशवा इस संघ का सैनिक और प्रशासनिक प्रमुख था।

◆ 18वीं सदी के अंत के दो प्रसिद्ध मराठा योद्धा और राजनीतिज्ञ थे: महादजी सिंधिया और नाना फड़नवीस।

🔍 आसान परिभाषा: कन्फ़ेडरेसी / राज्यमंडल (Confederacy)

📘 परिभाषा: कई स्वतंत्र या अर्ध-स्वतंत्र राज्यों का ऐसा ढीला गठबंधन, जो एक मुखिया (यहाँ पेशवा) को मानता है, पर हर सदस्य अपने इलाक़े में लगभग स्वतंत्र रहता है।

💡 आसान भाषा में: एक "परिवार" जिसके सब भाई अपने-अपने घर में राज करते हैं, पर बड़े भाई (पेशवा) को मुखिया मानते हैं। 🏠 उदाहरण: जैसे कई दुकानदारों का एक व्यापार-संघ: संघ का अध्यक्ष होता है, पर हर दुकानदार अपनी दुकान अपने ढंग से चलाता है। जब भाइयों में फूट पड़ी (सिंधिया–होल्कर), तब अंग्रेज़ों ने एक-एक को अलग करके हराया।

4.2 प्रथम आंग्ल–मराठा युद्ध (1775–1782)

पृष्ठभूमि: पेशवा पद का झगड़ा

◆ 1772 में पेशवा माधवराव प्रथम की मृत्यु के बाद उनका भाई नारायण राव पेशवा बना, पर चाचा रघुनाथ राव (राघोबा) ने, जो उसका संरक्षक भी था, 1773 में उसकी हत्या करवा दी और स्वयं पेशवा बन गया।

◆ मराठा नेताओं ने इसका विरोध किया। नाना फड़नवीस के नेतृत्व में 12 सरदारों की परिषद ("बाराभाई") ने नारायण राव के नवजात पुत्र को माधवराव द्वितीय के नाम से पेशवा बना दिया।

◆ गद्दी वापस पाने के लिए अपदस्थ राघोबा ने बम्बई की कंपनी सरकार से सहायता माँगी और सूरत की संधि (1775) कर ली।

सूरत की संधि (मार्च 1775), राघोबा और बम्बई सरकार के बीच

शर्तें

सैनिक सहायता

अंग्रेज़ राघोबा को पेशवा बनाने में सहायता करेंगे; लगभग 2,500 ब्रिटिश सैनिक पेशवा की रक्षा के लिए पूना में रहेंगे।

बदले में

राघोबा अंग्रेज़ों को बम्बई के पास सालसेट और बसीन देगा तथा भड़ौच और सूरत के लगान का भाग देगा; सैनिक ख़र्च के लिए 6 लाख रुपये दिए।

अन्य

कंपनी की अनुमति के बिना किसी से संधि नहीं करेगा, किसी यूरोपीय को नौकरी पर नहीं रखेगा।

युद्ध के कारण

1. पानीपत (1761) की हार से मराठा चुनौती कमज़ोर पड़ गई थी, जिसने अंग्रेज़ों की महत्वाकांक्षा बढ़ाई।

2. मराठा सरदारों की आपसी फूट ने अंग्रेज़ों को हस्तक्षेप का मौका दिया।

3. बम्बई के गवर्नर हॉर्नबी की सालसेट और बसीन पाने की लालसा।

4. अपदस्थ पेशवा राघोबा के साथ की गई सूरत की संधि।

घटनाक्रम

◆ बम्बई सरकार ने कर्नल कीटिंग के नेतृत्व में सेना भेजी, जिसने अर्रास (आडस) के युद्ध (1775) में मराठों को हराया।

◆ पर उसी समय गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स की कलकत्ता कौंसिल ने सूरत की संधि को अवैध घोषित कर पूना सरकार से पुरंदर की संधि (1 मार्च 1776) कर ली। लेकिन इंग्लैंड में कंपनी के संचालकों ने बम्बई की सूरत संधि को ही मान्यता दी, तो हेस्टिंग्स ने भी राघोबा की सहायता का निश्चय किया।

◆ 1778–79 में संगठित मराठा सेना (महादजी सिंधिया) ने कर्नल इगर्टन की अंग्रेज़ सेना को तालेगाँव के पास हराकर घेर लिया। अंग्रेज़ों को वडगाँव की अपमानजनक संधि (जनवरी 1779) करनी पड़ी।

वडगाँव की संधि (1779) की शर्तें

महत्व

अंग्रेज़ मराठों के विजित क्षेत्र लौटाएँगे।

हर्जाने के रूप में मराठों को लगभग 41,000 रुपये देंगे।

राघोबा को पेशवा सरकार को सौंप देंगे।

भड़ौच ज़िले की आय सिंधिया को दी जाएगी।

दो अंग्रेज़ अधिकारी (फ़ार्मर और स्टीवर्ट) बंधक के रूप में मराठों के पास रहेंगे।

यह संगठित मराठा शक्ति की बड़ी सफलता थी और अंग्रेज़ों के लिए अपमान का घूँट। वारेन हेस्टिंग्स ने कहा था: "संधि की शर्तें पढ़ते ही मैं शर्म से डूब गया।" उसने संधि को अस्वीकार कर दिया।

◆ 1780–81 में फिर संघर्ष हुआ। जनरल गोडार्ड ने बंगाल से पूरे मध्य भारत को पार कर गुजरात पहुँचकर अहमदाबाद जीता, पर पूना पर आक्रमण में असफल रहा। हेस्टिंग्स की दूसरी सेना ने कैप्टन पोफ़म के नेतृत्व में ग्वालियर (1780) जीता; सिपरी (शिवपुरी) में सिंधिया कर्नल कामक से हारा।

◆ अंततः महादजी सिंधिया की मध्यस्थता से पेशवा और अंग्रेज़ों के बीच सालबाई की संधि (17 मई 1782) हुई।

सालबाई की संधि (1782) की मुख्य शर्तें

माधवराव द्वितीय को पेशवा के रूप में मान्यता; राघोबा को वार्षिक पेंशन; अंग्रेज़ों ने राघोबा का साथ छोड़ने का आश्वासन दिया।

सालसेट (और एलीफ़ेंटा आदि द्वीप) पर अंग्रेज़ी अधिकार स्वीकार; बाकी सभी क्षेत्र मराठों को लौटाए गए। यमुना के पश्चिम के सिंधिया के क्षेत्र सिंधिया को वापस।

फ़तेह सिंह गायकवाड़ को बड़ौदा का शासक मानकर उसके प्रदेश लौटाए गए।

परिणाम: लगभग 20 वर्ष शांति रही। पर इससे अंग्रेज़ों को मराठा शक्ति को परखने और अपनी शक्ति बढ़ाने का समय मिल गया; नाना फड़नवीस और सिंधिया के मतभेद भी खुलकर सामने आए।

4.3 द्वितीय आंग्ल–मराठा युद्ध (1803–1805)

📖 कहानी 2: जब भागा हुआ पेशवा अंग्रेज़ों की शरण में पहुँचा

13 मार्च 1800 को नाना फड़नवीस की मृत्यु हुई और मराठा दरबार से वह नेता चला गया जो सरदारों को एक साथ रख सकता था। पेशवा बाजीराव द्वितीय अपने सरदारों की समस्याएँ सुलझा नहीं पा रहे थे। पुणे के दरबार पर दबदबे के लिए दौलतराव सिंधिया और यशवंतराव होल्कर के बीच होड़ चल पड़ी।

1801 में पेशवा ने होल्कर के भाई विठोजी होल्कर की हत्या करवा दी। बदले में अक्टूबर 1802 में यशवंतराव होल्कर ने पुणे के पास पेशवा और सिंधिया की संयुक्त सेना को हरा दिया और विनायक राव को पेशवा बना दिया। बाजीराव को अपनी राजधानी छोड़कर भागना पड़ा। वे इस बार अपने ही सरदारों से बचने के लिए अंग्रेज़ों की शरण में पहुँचे।

गवर्नर जनरल वेलेज़ली को इसी अवसर की प्रतीक्षा थी। 31 दिसंबर 1802 को बसीन की संधि हुई। पुणे में अंग्रेज़ों की स्थायी सेना रहेगी, उसके ख़र्च (लगभग 26 लाख रुपये वार्षिक) के बदले पेशवा इलाक़े देंगे, कंपनी की मर्ज़ी के बिना किसी से युद्ध या संधि नहीं करेंगे और किसी यूरोपीय को नौकरी नहीं देंगे। मई 1803 में अंग्रेज़ी सेना की रक्षा में बाजीराव फिर पेशवा की गद्दी पर बैठे।

गद्दी तो वापस मिल गई, पर पेशवा अब स्वतंत्र नहीं रहे। मराठा इतिहासकार सरदेसाई ने इस संधि को शिवाजी द्वारा बनाई गई मराठा स्वतंत्रता का अंत माना। सिंधिया और भोंसले ने इसे अपनी आज़ादी पर चोट समझा और 1803 में अंग्रेज़ों से उनका युद्ध छिड़ गया। जो मराठे एक होकर अंग्रेज़ों का सामना कर सकते थे, वे अब एक-एक करके लड़ने को मजबूर हो गए।

🧭 इस कहानी से कौन-सी अवधारणा साफ़ हुई

✔ सहायक संधि का फंदा — सुरक्षा के बदले सेना, ख़र्च और विदेश नीति कंपनी के हाथ में चली जाती थी। बसीन में पेशवा ने यही संधि स्वीकार की।

✔ आपसी फूट — सिंधिया और होल्कर की होड़ और पेशवा के फ़ैसलों ने मराठा संघ को भीतर से कमज़ोर किया, जिसका लाभ कंपनी ने उठाया।

✔ मराठा संघ के पतन की शुरुआत — बसीन की संधि के बाद द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध हुआ, और अंत में 1818 में पेशवा पद ही समाप्त हो गया।

📝 परीक्षा के लिए: नाना फड़नवीस की मृत्यु (13 मार्च 1800) → विठोजी की हत्या (1801) → पुणे के पास पेशवा की हार (अक्टूबर 1802) → बसीन की संधि (31 दिसंबर 1802) → द्वितीय आंग्ल–मराठा युद्ध (1803)।

कारण

1. पेशवा बाजीराव द्वितीय की अयोग्यता: वह अपने ही सरदारों की समस्याएँ नहीं सुलझा पाया।

2. नाना फड़नवीस की मृत्यु (13 मार्च 1800): मराठों को एक रखने वाला कोई नेता नहीं बचा; मराठा दरबार पर वर्चस्व के लिए दौलतराव सिंधिया और यशवंतराव होल्कर में होड़ शुरू हुई।

3. 1801 में पेशवा ने होल्कर के भाई विठोजी होल्कर की हत्या करवा दी। बदले में अक्टूबर 1802 में होल्कर ने पूना के पास पेशवा और सिंधिया की संयुक्त सेना को हराया और विनायक राव को पेशवा बना दिया।

4. भागा हुआ बाजीराव द्वितीय अंग्रेज़ों की शरण में गया और बसीन की संधि (31 दिसंबर 1802) कर ली। साम्राज्यवादी वेलेज़ली को मराठा राजनीति में हस्तक्षेप का सुनहरा अवसर मिल गया।

बसीन की संधि (31 दिसंबर 1802) की शर्तें

पूना दरबार में स्थायी अंग्रेज़ सेना रहेगी; इसके ख़र्च (लगभग 26 लाख रुपये वार्षिक) के बदले पेशवा इलाक़े देगा।

कंपनी की सहमति के बिना पेशवा न किसी से युद्ध करेगा, न संधि; और न किसी यूरोपीय को सेना में रखेगा।

सूरत शहर अंग्रेज़ों को सौंपा जाएगा।

निज़ाम और गायकवाड़ से सभी विवाद अंग्रेज़ों को पंच बनाकर निपटाएगा; निज़ाम के राज्य से चौथ का दावा छोड़ देगा।

मई 1803 में बाजीराव द्वितीय अंग्रेज़ी सेना के संरक्षण में फिर पेशवा बना।

❝ बसीन की संधि ने शिवाजी द्वारा स्थापित मराठा स्वतंत्रता का अंत कर दिया। ❞ (मराठा इतिहासकार जी. एस. सरदेसाई)

◆ दूसरी ओर एक अंग्रेज़ आलोचक ने लिखा कि इस संधि ने अंग्रेज़ों को अंतहीन झगड़ों में फँसा दिया और तीन बड़ी मराठा शक्तियों (सिंधिया, भोंसले, होल्कर) से शत्रुता मोल ले ली।

पहला चरण (1803): सिंधिया और भोंसले से युद्ध

युद्ध

तिथि

विरोधी

परिणाम

असाई (Assaye)

23 सितंबर 1803

आर्थर वेलेज़ली बनाम सिंधिया–भोंसले की संयुक्त सेना

अंग्रेज़ जीते; दक्षिण में निर्णायक

अलीगढ़ और दिल्ली

अगस्त–सितंबर 1803

जनरल लेक बनाम सिंधिया की सेना

दिल्ली पर अधिकार; मुगल बादशाह शाह आलम अंग्रेज़ों के संरक्षण में

लासवाड़ी

1 नवंबर 1803

जनरल लेक बनाम सिंधिया

उत्तर में सिंधिया की निर्णायक हार

अरगाँव

29 नवंबर 1803

आर्थर वेलेज़ली बनाम भोंसले

भोंसले पराजित

◆ देवगाँव की संधि (17 दिसंबर 1803), भोंसले से: कटक (उड़ीसा) और वर्धा नदी के पश्चिम का क्षेत्र अंग्रेज़ों को; सहायक संधि स्वीकार।

◆ सुर्जी-अर्जुनगाँव की संधि (30 दिसंबर 1803), सिंधिया से: गंगा–यमुना दोआब, दिल्ली–आगरा क्षेत्र, भड़ौच, अहमदनगर आदि अंग्रेज़ों को; अंग्रेज़ी सहायक सेना रखना स्वीकार।

दूसरा चरण (1804–1805): होल्कर से युद्ध

◆ अंग्रेज़ जब सिंधिया-भोंसले से उलझे थे, तब होल्कर ने अंग्रेज़ों के मित्र जयपुर पर आक्रमण किया और अपने क्षेत्र के तीन अंग्रेज़ अधिकारियों को मरवा दिया।

◆ वेलेज़ली ने कर्नल मॉनसन के नेतृत्व में सेना भेजी, जिसे होल्कर ने मुकुंदरा दर्रे (राजस्थान, कोटा के पास) में बुरी तरह हराया (1804) और उसकी कई बटालियनें नष्ट कर दीं।

◆ होल्कर दिल्ली की ओर बढ़ा, पर जनरल लेक ने उसे डीग और फ़र्रुख़ाबाद (नवंबर 1804) में हराया। होल्कर ने अपने मित्र भरतपुर के जाट राजा रणजीत सिंह के यहाँ शरण ली।

◆ भरतपुर का घेरा (जनवरी–अप्रैल 1805): लेक ने भरतपुर का क़िला घेरा, पर चार हमलों के बाद भी जीत नहीं सका। जाटों और मराठों की वीरता से हज़ारों अंग्रेज़ सैनिक मारे गए। इसी कारण भरतपुर क़िले को "लोहागढ़" कहा जाता है। अंत में भरतपुर के राजा ने संधि कर ली।

◆ इन हारों और भारी ख़र्च से इंग्लैंड में कंपनी के संचालक चिंतित हुए और वेलेज़ली को वापस बुला लिया (1805)। कॉर्नवालिस फिर आया पर जल्दी मर गया; उसके बाद सर जॉर्ज बार्लो ने शांति और अहस्तक्षेप की नीति अपनाई।

◆ नवंबर 1805: सिंधिया से नई संधि, चंबल नदी को सीमा माना गया। राजपुरघाट की संधि (दिसंबर 1805–जनवरी 1806), होल्कर से: होल्कर ने चंबल के उत्तर के क्षेत्र और बुंदेलखंड पर दावा छोड़ा; अंग्रेज़ों ने टोंक और रामपुरा आदि क्षेत्र लौटाए; होल्कर ने राजपूताने के भीतरी मामलों में दख़ल न देने का वचन दिया। होल्कर से संघर्ष लगभग अनिर्णीत रहा, पर उसकी शक्ति घट गई।

4.4 तृतीय आंग्ल–मराठा युद्ध (1817–1818)

पृष्ठभूमि और कारण

◆ 1813 में लॉर्ड हेस्टिंग्स गवर्नर जनरल बना। वह वेलेज़ली की तरह साम्राज्य-विस्तार का समर्थक था और भारत में अंग्रेज़ों की सर्वोच्चता स्थापित करना चाहता था।

◆ पिंडारियों (मराठा सेनाओं से जुड़े लुटेरे घुड़सवार दल) के दमन के बहाने उसने मध्य भारत में बड़ी सेना उतारी।

◆ पेशवा बाजीराव द्वितीय अपने मंत्री त्र्यंबकजी डेंगले की सलाह पर फिर से मराठा संघ के अध्यक्ष के रूप में काम करना चाहता था। हेस्टिंग्स के निर्देश पर पूना के रेज़िडेंट एल्फ़िंस्टन ने पेशवा को पूना की संधि (13 जून 1817) के लिए मजबूर किया, जिसमें पेशवा ने मराठा संघ का अध्यक्ष पद छोड़ दिया।

◆ 5 नवंबर 1817 को दौलतराव सिंधिया से ग्वालियर की संधि की गई: सिंधिया ने पिंडारियों को सहयोग न करने का वचन दिया और अंग्रेज़ों को राजपूत राज्यों से सीधे संधियाँ करने का अधिकार दे दिया।

प्रमुख युद्ध

युद्ध

तिथि

विरोधी

परिणाम

खड़की (किरकी)

5 नवंबर 1817

पेशवा ने पूना की ब्रिटिश रेज़िडेंसी पर हमला किया; एल्फ़िंस्टन भागकर छावनी पहुँचा

पेशवा पराजित; पूना पर अंग्रेज़ी अधिकार

सीताबर्डी (नागपुर)

26–27 नवंबर 1817

भोंसले (अप्पा साहब) बनाम अंग्रेज़

भोंसले पराजित

महिदपुर

21 दिसंबर 1817

होल्कर की सेना बनाम अंग्रेज़ (हिस्लॉप, मैल्कम)

होल्कर पराजित; मंदसौर की संधि (जनवरी 1818)

कोरेगाँव (भीमा कोरेगाँव)

1 जनवरी 1818

पेशवा की लगभग 25–28 हज़ार की सेना बनाम लगभग 800–900 कंपनी सैनिक (जिनमें बड़ी संख्या महार सैनिकों की थी)

छोटी कंपनी टुकड़ी ने पेशवा की सेना को रोक दिया

आष्टी

19–20 फ़रवरी 1818

पेशवा की सेना बनाम अंग्रेज़

पेशवा के सेनापति बापू गोखले मारे गए; पेशवा की अंतिम हार

असीरगढ़

अप्रैल 1819

अंग्रेज़ बनाम मराठा क़िलेदार

मराठों का अंतिम प्रतिरोध समाप्त

परिणाम

◆ जून 1818 में पेशवा ने जॉन मैल्कम के सामने आत्मसमर्पण किया। पेशवा पद समाप्त कर दिया गया और बाजीराव द्वितीय को 8 लाख रुपये वार्षिक पेंशन देकर कानपुर के पास बिठूर भेज दिया गया। वहीं 1851 में उसकी मृत्यु हुई।

◆ पेशवा के इलाक़े बम्बई प्रेसीडेंसी में मिलाए गए; शिवाजी के वंशज प्रताप सिंह के लिए सतारा का छोटा राज्य बनाया गया। भोंसले, होल्कर और सिंधिया को अंग्रेज़ों पर आश्रित शासक बना दिया गया।

◆ मराठा संघ का पूर्ण अंत; अब विंध्य के दक्षिण का लगभग पूरा भूभाग कंपनी के नियंत्रण में था। भारत में अंग्रेज़ों का प्रभुत्व स्थापित हो गया।

🏇 पिंडारी युद्ध (1817–1818)

पिंडारी घुड़सवार लुटेरे दल थे, जो पहले मराठा सेनाओं के साथ सहायक के रूप में लड़ते थे और बदले में लूट का हिस्सा लेते थे। सहायक संधि से भंग हुई सेनाओं के बेरोज़गार सैनिक भी इनमें जुड़ गए। प्रमुख नेता: चीतू, वासिल मुहम्मद और करीम ख़ाँ।

लॉर्ड हेस्टिंग्स ने बड़े अभियान से फ़रवरी 1818 तक इनका दमन कर दिया। पठान सरदार अमीर ख़ाँ ने अंग्रेज़ों से समझौता किया और उसे टोंक (राजस्थान) का नवाब मान लिया गया (1817)।

चित्र 2.6: आंग्ल–मराठा युद्धों के प्रमुख स्थान (1775–1819)
चित्र 2.6: आंग्ल–मराठा युद्धों के प्रमुख स्थान (1775–1819)
चित्र 2.7: तीनों आंग्ल–मराठा युद्ध: कारण, घटनाएँ, संधियाँ और परिणाम
चित्र 2.7: तीनों आंग्ल–मराठा युद्ध: कारण, घटनाएँ, संधियाँ और परिणाम

4.5 मराठों की हार के कारण

1. अयोग्य नेतृत्व: महादजी सिंधिया (1794) और नाना फड़नवीस (1800) के बाद कोई योग्य नेता नहीं; बाजीराव द्वितीय कमज़ोर और स्वार्थी था।

2. आपसी फूट: सिंधिया, होल्कर, भोंसले और गायकवाड़ कभी एक साथ नहीं लड़े। अंग्रेज़ों ने एक-एक से अलग-अलग युद्ध और संधियाँ कीं।

3. ढीला राजनीतिक ढाँचा: मराठा संघ में केंद्रीय अनुशासन नहीं था; राज्य जनता के कल्याण से अधिक चौथ-सरदेशमुखी वसूली पर टिका था।

4. सैन्य कमज़ोरी: पारंपरिक छापामार (गुरिल्ला) युद्ध-शैली छोड़कर यूरोपीय ढंग अपनाया, पर यूरोपीय अफ़सरों पर निर्भर रहे (जो युद्ध के समय साथ छोड़ गए); तोपख़ाना और रसद कमज़ोर।

5. अंग्रेज़ों की श्रेष्ठ कूटनीति, गुप्तचर व्यवस्था, संसाधन और एल्फ़िंस्टन, मैल्कम, आर्थर वेलेज़ली जैसे योग्य अधिकारी।

4.6 राजपूताना की संधियाँ (1817–1818)

◆ मराठों और पिंडारियों के आक्रमणों से परेशान राजपूत राज्यों ने सुरक्षा के लिए अंग्रेज़ों की ओर देखा। ग्वालियर की संधि (1817) से अंग्रेज़ों को उनसे सीधे संधि करने का अधिकार मिल चुका था।

◆ लॉर्ड हेस्टिंग्स के आदेश पर चार्ल्स मेटकॉफ़ ने 1817–18 में राजपूत राज्यों से "अधीनस्थ सहयोग और पारस्परिक मैत्री" की संधियाँ कीं। इनमें राज्यों ने कंपनी की सर्वोच्चता मानी, ख़िराज (वार्षिक कर) देना स्वीकार किया और अन्य राज्यों से संबंध कंपनी के माध्यम से रखने का वचन दिया। बदले में कंपनी ने बाहरी आक्रमण से रक्षा का आश्वासन दिया।

◆ 1818 तक कोटा, जोधपुर, उदयपुर (मेवाड़), बीकानेर, जयपुर सहित राजपूताना के लगभग सभी राज्य इस व्यवस्था में आ गए — कंपनी की सर्वोच्चता पूरे राजपूताना पर स्थापित हुई।

5. आंग्ल–सिख युद्ध (1845–1849) और पंजाब का विलय

5.1 महाराजा रणजीत सिंह (1780–1839)

◆ सिखों के दसवें गुरु गुरु गोविंद सिंह ने व्यक्ति-रूप गुरु की परंपरा समाप्त कर ख़ालसा पंथ बनाया; सिखों की पवित्र पुस्तक "गुरु ग्रंथ साहिब" ने गुरु का स्थान लिया। बाद में दल ख़ालसा बना और सिख 12 मिस्लों (जत्थों) में बँट गए।

◆ सुकरचकिया मिस्ल के नेता रणजीत सिंह ने 1799 में लाहौर जीता, 1801 में पंजाब के महाराजा बने और बिखरी मिस्लों को एक संगठित राज्य में बदल दिया। उन्होंने अमृतसर (1802), मुल्तान (1818), कश्मीर (1819) और पेशावर तक राज्य फैलाया।

◆ उन्होंने फ्रांसीसी और इतालवी अफ़सरों (जैसे वेंचुरा और एलार्ड) की सहायता से "फ़ौज-ए-ख़ास" नाम की आधुनिक सेना और मज़बूत तोपख़ाना बनाया। 1813 में अफ़गान शासक शाह शुजा से कोहिनूर हीरा प्राप्त किया।

अमृतसर की संधि (25 अप्रैल 1809)

◆ रणजीत सिंह की नज़र सतलज के पूर्व के सिख राज्यों (पटियाला, नाभा, जींद आदि) पर थी, जिन पर अंग्रेज़ भी अधिकार चाहते थे। गवर्नर जनरल लॉर्ड मिंटो ने चार्ल्स मेटकॉफ़ को मैत्री-प्रस्ताव लेकर भेजा; फ़रवरी 1809 में ऑक्टरलोनी ने सतलज के पूर्वी प्रदेशों पर अंग्रेज़ी संरक्षण की घोषणा की।

◆ शर्तें: सतलज नदी को सीमा मानकर उसके पूर्व के प्रदेशों पर अंग्रेज़ी नियंत्रण स्वीकार; रणजीत सिंह को उत्तर-पश्चिम में विस्तार की छूट; दोनों ने "सदा मित्र" रहने का वादा किया; किसी धारा के उल्लंघन पर संधि समाप्त मानी जाएगी।

◆ महत्व: अंग्रेज़ों का वर्चस्व सतलज तक पक्का हुआ और वे उत्तर में सिखों के भय से मुक्त हो गए; रणजीत सिंह की कमज़ोरी भी प्रकट हुई।

◆ 1831 में अलेक्ज़ेंडर बर्न्स ने सिंधु नदी के रास्ते का सर्वेक्षण किया। 1838 की त्रिपक्षीय संधि (रणजीत सिंह, अंग्रेज़ और शाह शुजा) में रणजीत सिंह ने सिंध के मामले में ब्रिटिश मध्यस्थता स्वीकार की, पर अफ़गान युद्ध के समय अंग्रेज़ी सेना को पंजाब से गुज़रने की अनुमति नहीं दी। 27 जून 1839 को लकवे से उनकी मृत्यु हो गई।

5.2 रणजीत सिंह के बाद अराजकता

◆ उनके बाद कमज़ोर उत्तराधिकारी आए: खड़क सिंह (1839–40), नौनिहाल सिंह (1840 में दुर्घटना में मृत्यु), शेर सिंह (1841–43, हत्या), और फिर 5 वर्ष के बालक दलीप सिंह (1843), जिनकी संरक्षिका माँ रानी जिंदाँ (जिंद कौर) बनीं।

◆ दरबार में डोगरा सरदार गुलाब सिंह और सिख सामंतों में संघर्ष चला; शक्तिशाली ख़ालसा सेना पर रानी जिंदाँ और वज़ीर लाल सिंह का नियंत्रण कमज़ोर हो रहा था, इसलिए वे उसे अंग्रेज़ों से भिड़ाना चाहते थे। उधर अंग्रेज़ सीमा पर सेना और तोपें बढ़ाते जा रहे थे और 1843 में सिंध जीत चुके थे, जिसके बाद पंजाब जीतना उनके लिए ज़रूरी हो गया।

5.3 प्रथम आंग्ल–सिख युद्ध (1845–1846)

◆ दिसंबर 1845 में सिख सेना ने सतलज पार की और 13 दिसंबर 1845 को गवर्नर जनरल लॉर्ड हार्डिंग ने युद्ध की घोषणा कर दी। अंग्रेज़ सेनापति: सर ह्यू गफ़।

युद्ध

तिथि

परिणाम

मुदकी

18 दिसंबर 1845

अंग्रेज़ जीते; कठिन लड़ाई

फ़िरोज़शाह

21–22 दिसंबर 1845

अंग्रेज़ जीते; सबसे कठिन और ख़ूनी युद्ध; सिख सेनापतियों (लाल सिंह, तेज सिंह) के विश्वासघात से सिख पीछे हटे

बुद्धोवाल

21 जनवरी 1846

सिखों की छोटी सफलता

अलीवाल

28 जनवरी 1846

हैरी स्मिथ की जीत

सबराओं (सोबराओं)

10 फ़रवरी 1846

निर्णायक युद्ध; सिख पराजित; लाहौर अंग्रेज़ों के नियंत्रण में

संधि

मुख्य शर्तें

लाहौर की संधि (9 मार्च 1846)

महाराजा ने सतलज के दक्षिण के सभी प्रदेशों पर दावा छोड़ा; जालंधर दोआब (सतलज–ब्यास के बीच) अंग्रेज़ों को मिला।

युद्ध-हर्जाना 1.5 करोड़ रुपये माँगा गया; लाहौर दरबार केवल लगभग 50 लाख दे सका, इसलिए बाकी के बदले कश्मीर और हज़ारा सहित ब्यास–सिंधु के बीच के पहाड़ी इलाक़े अंग्रेज़ों को दिए गए।

सिख सेना सीमित की गई; दलीप सिंह महाराजा और रानी जिंदाँ संरक्षिका बनी रहीं; लाहौर में अंग्रेज़ सेना और रेज़िडेंट रहने लगे।

अमृतसर की संधि (16 मार्च 1846)

अंग्रेज़ों ने कश्मीर को डोगरा सरदार गुलाब सिंह को 75 लाख रुपये में बेच दिया; गुलाब सिंह जम्मू–कश्मीर का महाराजा बना।

भैरोवाल की संधि (दिसंबर 1846)

रानी जिंदाँ को संरक्षिका पद से हटाकर 1.5 लाख रुपये वार्षिक पेंशन दी गई (बाद में पहले शेखूपुरा, फिर बनारस/चुनार भेजी गईं)।

ब्रिटिश रेज़िडेंट हेनरी लॉरेंस की अध्यक्षता में 8 अंग्रेज़-समर्थक सिख सरदारों की संरक्षण परिषद बनी; महाराजा के 16 वर्ष का होने तक अंग्रेज़ सेना लाहौर में रहेगी और उसके ख़र्च के 22 लाख रुपये लाहौर दरबार देगा।

इस तरह अंग्रेज़ पंजाब के व्यावहारिक स्वामी बन गए।

5.4 द्वितीय आंग्ल–सिख युद्ध (1848–1849)

कारण

◆ नेताओं के विश्वासघात से हुई हार पर सिख बहुत क्रुद्ध थे; सेना से निकाले गए सैनिकों में असंतोष था; 1847–48 के सुधार सिख सरदारों के हितों के विरुद्ध थे; रेज़िडेंट और अंग्रेज़ अधिकारी लगातार भीतरी मामलों में दख़ल दे रहे थे।

◆ रानी जिंदाँ को षड्यंत्र के आरोप में बंदी बनाकर पंजाब से बाहर भेज दिया गया; महाराजा दलीप सिंह के वैवाहिक मामलों में भी दख़ल दिया गया। इससे सिखों में रोष फैला।

◆ तात्कालिक कारण: मुल्तान के गवर्नर मूलराज से अधिक लगान की माँग की गई; उसने इस्तीफ़ा दिया और अप्रैल 1848 में मुल्तान में विद्रोह भड़का, जिसमें दो अंग्रेज़ अधिकारी मारे गए। बाद में सरदार छतर सिंह और शेर सिंह अटारीवाला भी विद्रोह में शामिल हुए।

घटनाक्रम (गवर्नर जनरल: लॉर्ड डलहौज़ी)

युद्ध

तिथि

परिणाम

रामनगर

22 नवंबर 1848

अनिर्णीत

चिलियाँवाला

13 जनवरी 1849

बहुत कड़ा मुक़ाबला; हार-जीत का निर्णय नहीं; अंग्रेज़ों को भारी हानि

गुजरात (चिनाब नदी के किनारे, पंजाब)

21 फ़रवरी 1849

निर्णायक; तोपों की लड़ाई कहा जाता है; सिख सरदारों का पूर्ण आत्मसमर्पण

परिणाम: पंजाब का विलय

◆ 29 मार्च 1849 को डलहौज़ी ने घोषणा द्वारा पंजाब को ब्रिटिश राज्य में मिला लिया: "पंजाब के राज्य का अंत हो गया है; महाराजा दलीप सिंह के सारे प्रदेश भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के अंग हैं।"

◆ कोहिनूर हीरा और पंजाब का राज्य दलीप सिंह और उसकी संरक्षण परिषद ने अंग्रेज़ों को सौंप दिया; कोहिनूर महारानी विक्टोरिया को भेंट किया गया। दलीप सिंह को पेंशन देकर बाद में इंग्लैंड भेज दिया गया।

◆ नए प्रशासन के लिए हेनरी लॉरेंस की अध्यक्षता में तीन सदस्यों का बोर्ड (हेनरी लॉरेंस, जॉन लॉरेंस और चार्ल्स मैनसेल) बना। अब ब्रिटिश भारत की सीमाएँ अफ़गानिस्तान तक पहुँच गईं; पंजाब अंतिम बड़ी स्वतंत्र भारतीय शक्ति थी जो हारी।

चित्र 2.8: आंग्ल–सिख युद्ध और सिंध विजय के प्रमुख स्थान
चित्र 2.8: आंग्ल–सिख युद्ध और सिंध विजय के प्रमुख स्थान
चित्र 2.9: दोनों आंग्ल–सिख युद्ध: कारण, युद्ध, संधियाँ और परिणाम
चित्र 2.9: दोनों आंग्ल–सिख युद्ध: कारण, युद्ध, संधियाँ और परिणाम

सिखों की हार के कारण

◆ रणजीत सिंह के बाद योग्य नेतृत्व का अभाव और दरबार की गुटबाज़ी; वज़ीर लाल सिंह और सेनापति तेज सिंह का विश्वासघात।

◆ ख़ालसा सेना वीर और अनुशासित थी, पर राजनीतिक नेतृत्व ने उसका साथ नहीं दिया; अंग्रेज़ों के पास अधिक संसाधन और तोपख़ाना।

6. सिंध, अफ़गान और अन्य विजय

6.1 सिंध का विलय (1843)

◆ 1830 के दशक के अंत में कंपनी रूस के बढ़ते प्रभाव से डरी हुई थी; उसे भय था कि रूस पूरे एशिया में फैलकर उत्तर-पश्चिम से भारत तक आ सकता है। इसलिए अंग्रेज़ उत्तर-पश्चिमी भारत पर नियंत्रण चाहते थे।

◆ सिंध पर अमीरों (तालपुर वंश) का शासन था। 1809 में उनसे मैत्री संधि हुई; 1832 में सिंधु नदी के मार्ग से व्यापार की संधि हुई; अफ़गान युद्ध के समय (1839) उन पर सहायक-संधि जैसी शर्तें थोप दी गईं।

◆ गवर्नर जनरल लॉर्ड एलनबरो के समय सेनापति चार्ल्स नेपियर ने मियानी (17 फ़रवरी 1843) और दब्बा / हैदराबाद, सिंध (मार्च 1843) की लड़ाइयों में अमीरों को हराया और 1843 में सिंध को मिला लिया। नेपियर सिंध का पहला गवर्नर बना।

◆ कहा जाता है कि नेपियर ने एक शब्द का संदेश भेजा: "पेक्कावी" (Peccavi), लैटिन में जिसका अर्थ है "मैंने पाप किया" (अंग्रेज़ी में "I have sinned" यानी "I have Sindh")। वास्तव में यह एक ब्रिटिश पत्रिका का बनाया हुआ मज़ाक था, पर यह इस विलय की अनैतिकता को दिखाता है।

6.2 अफ़गान युद्ध

युद्ध

वर्ष

गवर्नर जनरल / वायसराय

कारण

परिणाम

प्रथम आंग्ल–अफ़गान

1838/39–1842

लॉर्ड ऑकलैंड

रूसी ख़तरा; अमीर दोस्त मुहम्मद की जगह शाह शुजा को बैठाना

1839 में काबुल पर कब्ज़ा; जनवरी 1842 में काबुल से लौटती लगभग 16,500 की सेना (सैनिक और सहायक) लगभग नष्ट; केवल डॉ. विलियम ब्राइडन घायल अवस्था में जलालाबाद पहुँचा। ऑकलैंड वापस बुलाया गया; एलनबरो के समय बदले की कार्रवाई के बाद अंग्रेज़ लौट आए और दोस्त मुहम्मद फिर अमीर बना।

द्वितीय आंग्ल–अफ़गान

1878–1880

लॉर्ड लिटन

अफ़गानिस्तान में रूसी दूत का स्वागत

गंडमक की संधि (1879); अफ़गानिस्तान की विदेश नीति पर ब्रिटिश नियंत्रण

तृतीय आंग्ल–अफ़गान

1919

लॉर्ड चेम्सफ़ोर्ड

अफ़गान अमीर अमानुल्ला द्वारा पूर्ण स्वतंत्रता की माँग

रावलपिंडी की संधि (1919); अफ़गानिस्तान पूर्ण स्वतंत्र

6.3 अन्य प्रमुख युद्ध और विजय

युद्ध / विजय

वर्ष

GG

परिणाम

रुहेला युद्ध

1774

वारेन हेस्टिंग्स

अवध की सहायता से रुहेलखंड जीता (रुहेला सरदार हाफ़िज़ रहमत ख़ाँ मारा गया)

आंग्ल–नेपाल (गोरखा) युद्ध

1814–1816

लॉर्ड हेस्टिंग्स

सुगौली की संधि (1815–16): कुमाऊँ, गढ़वाल और तराई का बड़ा भाग कंपनी को; काठमांडू में ब्रिटिश रेज़िडेंट; गोरखा सैनिकों की भर्ती की शुरुआत

पिंडारी युद्ध

1817–1818

लॉर्ड हेस्टिंग्स

पिंडारी लुटेरों का दमन; मध्य भारत में शांति

प्रथम आंग्ल–बर्मा युद्ध

1824–1826

लॉर्ड एमहर्स्ट

यांडबू की संधि (1826): असम, मणिपुर पर बर्मी दावे समाप्त; अराकान और तेनासेरिम कंपनी को; युद्ध-हर्जाना

भरतपुर विजय

1826

लॉर्ड एमहर्स्ट

जिस क़िले को लेक 1805 में नहीं जीत पाया था, उसे जीता गया

सिंध विजय

1843

लॉर्ड एलनबरो

चार्ल्स नेपियर; मियानी का युद्ध

द्वितीय आंग्ल–बर्मा युद्ध

1852

लॉर्ड डलहौज़ी

पेगू (निचला बर्मा) कंपनी में मिला

बरार

1853

लॉर्ड डलहौज़ी

निज़ाम से सहायक सेना के बकाये के बदले लिया गया

तृतीय आंग्ल–बर्मा युद्ध

1885

लॉर्ड डफ़रिन

पूरा बर्मा ब्रिटिश भारत में मिला (1886)

📢 विज्ञापन
📦

ALL IN ONE Subscription — सम्पूर्ण GK एक ही स्थान पर

Multiple ValidityTests
₹899₹4,999
Join Now →

7. स्थानीय प्रतिरोध: विस्तार बेरोकटोक नहीं चला

◆ कित्तूर (आज कर्नाटक में) की रानी चेन्नम्मा: जब अंग्रेज़ों ने इस छोटे राज्य को कब्ज़े में लेने का प्रयास किया (दत्तक पुत्र को मान्यता न देकर), तो रानी ने हथियार उठा लिए और अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ आंदोलन छेड़ा। 1824 में उन्हें गिरफ़्तार किया गया और 1829 में जेल में ही उनकी मृत्यु हो गई।

◆ संगोली रायन्ना: चेन्नम्मा के बाद कित्तूर के संगोली गाँव के एक ग़रीब चौकीदार रायन्ना ने प्रतिरोध जारी रखा। लोगों के समर्थन से उन्होंने कई ब्रिटिश शिविर और दस्तावेज़ नष्ट कर दिए। अंततः अंग्रेज़ों ने उन्हें पकड़कर 1830 में फाँसी दे दी।

◆ वीर सुरेंद्र साय (संबलपुर, उड़ीसा): संबलपुर के राजवंश से जुड़े सुरेंद्र साय ने अंग्रेज़ों के हस्तक्षेप का लंबे समय तक विरोध किया (1857 में भी सक्रिय)।

◆ सैनिक असंतोष के संकेत: 1806 में वेल्लोर, 1824 में बैरकपुर, 1842 में फ़िरोज़पुर में 34वीं रेजिमेंट और 1849 में सातवीं बंगाल घुड़सवार सेना के विद्रोह; साथ ही 1816 में बरेली के उपद्रव, 1831–33 का कोल विद्रोह, 1848 में कांगड़ा और 1855–56 का संथाल विद्रोह। (इनका विस्तृत अध्ययन "किसान, जनजातीय और नागरिक विद्रोह" तथा "1857" वाले अध्यायों में है।) धीरे-धीरे सुलगती यही आग 1857 में धधक उठी।

8. भारतीय शक्तियों की हार और अंग्रेज़ों की सफलता के कारण

कारण

व्याख्या

भारतीय शासकों की आपसी फूट

मैसूर के विरुद्ध मराठा और निज़ाम अंग्रेज़ों के साथ रहे; मराठा सरदार आपस में लड़ते रहे; किसी ने मिलकर संघर्ष नहीं किया।

राष्ट्रीय चेतना का अभाव

लड़ाइयाँ राज्य या वंश के लिए थीं, "भारत" के लिए नहीं; आम जनता की भागीदारी कम थी।

अंग्रेज़ों की कूटनीति

"फूट डालो और राज करो"; एक समय में एक शत्रु से लड़ना; सहायक संधि से बिना युद्ध के राज्यों को अधीन करना।

सैन्य श्रेष्ठता

अनुशासित सेना, बेहतर तोपख़ाना, नियमित वेतन, योग्य सेनापति (आयरकूट, आर्थर वेलेज़ली, लेक, गफ़, नेपियर)।

आर्थिक संसाधन

बंगाल का राजस्व, भारतीय राज्यों से मिलने वाला सहायक सेना का ख़र्च, इंग्लैंड का ऋण बाज़ार और व्यापार।

नौसैनिक शक्ति

समुद्र पर नियंत्रण से रसद और सैनिक समय पर पहुँचते रहे; फ्रांसीसी सहायता भारत नहीं पहुँच पाई।

भारतीय पक्ष में विश्वासघात

मीर सादिक (मैसूर), लाल सिंह और तेज सिंह (पंजाब) जैसे उदाहरण।

गुप्तचर व्यवस्था और रेज़िडेंट

रेज़िडेंटों के माध्यम से दरबारों की भीतरी जानकारी और हस्तक्षेप।

❝ इस प्रकार 1757 से 1856 के बीच युद्ध, छल-कपट और कूटनीति से कंपनी के राज्य की सीमा उत्तर में तिब्बत और चीनी साम्राज्य तक, दक्षिण-पूर्व में बंगाल की खाड़ी के तटों तक और उत्तर-पश्चिम में दर्रों तक पहुँच गई। भारतीय शासकों की आपसी फूट और आम जनता में राष्ट्रीय चेतना के अभाव ने अंग्रेज़ों को सफल होने में सहायता दी। ❞ (अध्याय का निष्कर्ष)

9. अध्याय का कालक्रम (1765–1856) एक नज़र में

वर्ष

घटना

GG / संबंधित व्यक्ति

1767–69

प्रथम आंग्ल–मैसूर युद्ध; मद्रास की संधि

हैदर अली

1774

रुहेला युद्ध

वारेन हेस्टिंग्स

1775–82

प्रथम आंग्ल–मराठा युद्ध (सूरत 1775, पुरंदर 1776, वडगाँव 1779, सालबाई 1782)

वारेन हेस्टिंग्स

1780–84

द्वितीय आंग्ल–मैसूर युद्ध; पोलिलूर (1780), पोर्टो नोवो (1781), हैदर की मृत्यु (1782), मंगलौर की संधि (1784)

वारेन हेस्टिंग्स

1790–92

तृतीय आंग्ल–मैसूर युद्ध; श्रीरंगपट्टनम की संधि

कॉर्नवालिस

1795

खर्दा का युद्ध (अहस्तक्षेप नीति)

सर जॉन शोर

1798

हैदराबाद: पहली सहायक संधि

वेलेज़ली

1799

चतुर्थ आंग्ल–मैसूर युद्ध; टीपू की मृत्यु (4 मई)

वेलेज़ली

1801

अवध की सहायक संधि (आधा राज्य); कर्नाटक का शासन लिया

वेलेज़ली

1802

बसीन की संधि (31 दिसंबर)

वेलेज़ली

1803–05

द्वितीय आंग्ल–मराठा युद्ध; असाई, लासवाड़ी, अरगाँव; भरतपुर घेरा असफल

वेलेज़ली

1809

अमृतसर की संधि (रणजीत सिंह)

लॉर्ड मिंटो

1814–16

आंग्ल–नेपाल युद्ध; सुगौली की संधि

लॉर्ड हेस्टिंग्स

1817–18

तृतीय आंग्ल–मराठा युद्ध; पिंडारी दमन; राजपूताना की संधियाँ; पेशवा पद समाप्त

लॉर्ड हेस्टिंग्स

1824–26

प्रथम आंग्ल–बर्मा युद्ध; कित्तूर की रानी चेन्नम्मा का प्रतिरोध

एमहर्स्ट

1839

रणजीत सिंह की मृत्यु; प्रथम अफ़गान युद्ध आरंभ

ऑकलैंड

1843

सिंध विजय (मियानी)

एलनबरो

1845–46

प्रथम आंग्ल–सिख युद्ध; लाहौर, अमृतसर, भैरोवाल की संधियाँ

हार्डिंग

1848

व्यपगत: सतारा

डलहौज़ी

1848–49

द्वितीय आंग्ल–सिख युद्ध; पंजाब का विलय (29 मार्च 1849)

डलहौज़ी

1849–54

व्यपगत: जैतपुर, संबलपुर, बघाट, उदयपुर, झाँसी, नागपुर; पेगू (1852), बरार (1853)

डलहौज़ी

1856

अवध का विलय (13 फ़रवरी)

डलहौज़ी

🏁 अध्याय का सार

कंपनी ने पहले अपने इलाक़े की रक्षा के लिए मित्र राज्यों का घेरा बनाया, फिर सहायक संधि से राज्यों को बिना युद्ध के अधीन किया, सर्वोच्चता का दावा किया और अंत में व्यपगत तथा कुशासन के बहाने सीधे विलय कर लिया।

मैसूर (हैदर और टीपू), मराठा और सिख, तीनों ने कड़ा प्रतिरोध किया, पर आपसी फूट, कमज़ोर नेतृत्व और विश्वासघात के कारण हारे। 1856 तक लगभग पूरा भारत प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कंपनी के अधीन था। इन नीतियों से पैदा हुआ असंतोष ही आगे 1857 की क्रांति की पृष्ठभूमि बना।

📢 विज्ञापन
🔥 सबसे लोकप्रिय
📘

RAS Foundation Course 2026 🕉️

Multiple ValidityTests
₹4,999₹25,000
Join Now →
📥 इस अध्याय की PDF
ब्रिटिश विस्तार और भारतीय प्रतिरोध — 22 पेज · बिल्कुल मुफ़्त · मोबाइल/प्रिंट के लिए
⬇️ PDF डाउनलोड करें
← अध्याय 1: भारत में ब्रिटिश सत्ता की स्थापना अध्याय 3: प्रशासनिक नीतियाँ और देश का एकीकरण →