🕉️ कहानी से शुरुआत: जो आए थे व्यापारी बनकर… सन 1608 में सूरत के बंदरगाह पर एक छोटा-सा अंग्रेज़ी जहाज़ "हेक्टर" आकर रुका। उसका कप्तान विलियम हॉकिन्स मुगल बादशाह जहाँगीर से बस इतनी विनती करने आया था कि उसकी कंपनी को सूरत में एक गोदाम खोलने की अनुमति मिल जाए। उस समय मुगल साम्राज्य दुनिया के सबसे अमीर साम्राज्यों में गिना जाता था और इंग्लैंड की यह कंपनी उसके सामने एक मामूली व्यापारी भर थी। हॉकिन्स तुर्की भाषा जानता था, इसलिए 1609 में आगरा के दरबार में वह बिना दुभाषिये के सीधे बादशाह से बात कर सका। जहाँगीर उससे इतना प्रसन्न हुआ कि उसे "इंग्लिश ख़ान" की उपाधि और 400 का मनसब दे दिया। पर सूरत के समुद्री व्यापार पर उस समय पुर्तगालियों का दबदबा था और वे नहीं चाहते थे कि कोई नया प्रतिद्वंद्वी आए। उनके दबाव में अनुमति रद्द कर दी गई और हॉकिन्स को 1611 में ख़ाली हाथ लौटना पड़ा। यानी कहानी की शुरुआत बहुत साधारण थी: एक विदेशी व्यापारी, जिसे बादशाह के दरबार में अनुमति के लिए इंतज़ार करना पड़ता था। फिर 1615 से 1619 के बीच इंग्लैंड के राजा के राजदूत सर थॉमस रो ने अंततः जहाँगीर से व्यापार का अधिकार हासिल किया। कंपनी भारत में टिक गई। फिर केवल लगभग 150 साल में कहानी पूरी तरह पलट गई। 1765 में वही मुगल बादशाह (शाह आलम द्वितीय) इलाहाबाद में उसी कंपनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा का "दीवान" बना रहा था, यानी भारत के सबसे अमीर इलाके का लगान वसूलने का अधिकार सौंप रहा था। "तराज़ू" पकड़ने वाले हाथ अब "तलवार" और "राजदंड" पकड़ चुके थे। यह बदलाव कैसे हुआ? यूरोप के लोग भारत क्यों आए? पुर्तगाली, डच और फ्रांसीसी पीछे क्यों छूट गए और अंग्रेज़ आगे कैसे निकल गए? मुगल साम्राज्य इतनी जल्दी क्यों बिखर गया? और प्लासी तथा बक्सर की लड़ाइयों ने भारत का भाग्य कैसे बदल दिया? यही इस अध्याय की पूरी कहानी है। आगे दो कहानियाँ भी मिलेंगी, जो प्लासी और बंगाल के अकाल को आसान तरीक़े से समझा देंगी। |
इतिहास पढ़ना शुरू करने से पहले तीन बातें समझनी ज़रूरी हैं: (1) इतिहास को अलग-अलग कालों में कैसे बाँटा जाता है, (2) इस काल को "औपनिवेशिक काल" क्यों कहते हैं, और (3) पिछले लगभग 250 वर्षों का इतिहास लिखने के लिए इतिहासकार किन स्रोतों का उपयोग करते हैं।
◆ पहले इतिहास को केवल राजाओं, युद्धों और तारीख़ों की सूची माना जाता था, जैसे कौन राजा कब गद्दी पर बैठा, कब युद्ध हुआ, कब उसकी मृत्यु हुई।
◆ आज इतिहासकार यह भी देखते हैं कि आम लोग कैसे रोज़ी-रोटी कमाते थे, बाज़ार कैसे फैले, शहर कैसे बने, नए विचार और संस्कृति कैसे बदली।
◆ कई बदलाव एक दिन में नहीं होते। जैसे भारत में लोगों ने अचानक एक दिन चाय पीना शुरू नहीं किया; यह आदत धीरे-धीरे बनी। इसी तरह ब्रिटिश शासन की स्थापना की भी कोई एक तारीख़ नहीं बताई जा सकती; हम केवल एक अवधि (काल) की बात कर सकते हैं।
◆ ब्रिटिश इतिहासकारों ने भारत का इतिहास गवर्नर-जनरलों के शासनकाल के हिसाब से लिखा। ये किताबें पहले गवर्नर-जनरल वारेन हेस्टिंग्स (Warren Hastings) से शुरू होकर अंतिम वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन (Lord Mountbatten) पर ख़त्म होती थीं। ऐसे इतिहास में भारतीय जनता की गतिविधियों को कोई जगह नहीं मिलती थी।
1817 में स्कॉटलैंड के अर्थशास्त्री और राजनीतिक दार्शनिक जेम्स मिल (James Mill) ने तीन खंडों में "ए हिस्ट्री ऑफ़ ब्रिटिश इंडिया" (A History of British India) नाम की पुस्तक लिखी। इसमें उन्होंने भारत के इतिहास को तीन कालों में बाँटा: हिंदू, मुस्लिम और ब्रिटिश।
पहलू | जेम्स मिल की सोच | इस सोच की कमी (आलोचना) |
काल-विभाजन | हिंदू → मुस्लिम → ब्रिटिश काल | किसी पूरे युग को केवल शासक के धर्म के आधार पर बाँटना गलत है; हर युग में कई धर्म साथ-साथ चलते थे। |
एशियाई समाज | सभी एशियाई समाज सभ्यता में यूरोप से पीछे हैं | यह यूरोप-केंद्रित पूर्वाग्रह था; भारत की समृद्ध सभ्यता को नज़रअंदाज़ किया गया। |
ब्रिटिश शासन | ब्रिटिश शासन भारत को "सभ्य" बनाएगा; अंग्रेज़ों को पूरे भारत पर कब्ज़ा कर लेना चाहिए | वास्तव में इस शासन में लोगों को न समानता मिली, न स्वतंत्रता; यह शोषण का दौर था। |
पुराना भारत | अंग्रेज़ों से पहले केवल धार्मिक बैर, जातिगत बंधन और अंधविश्वास था | प्राचीन भारत में भी सभी शासकों का एक धर्म नहीं था; यह चित्रण एकतरफ़ा था। |
◆ आजकल इतिहासकार आमतौर पर प्राचीन, मध्यकालीन और आधुनिक काल का विभाजन अपनाते हैं। पर यह विभाजन भी पश्चिम से आया है। पश्चिम में "आधुनिक काल" का अर्थ विज्ञान, तर्क, लोकतंत्र, स्वतंत्रता और समानता का युग माना जाता है, जबकि अंग्रेज़ी शासन में भारतीयों को ये चीज़ें नहीं मिलीं।
◆ इसीलिए बहुत से इतिहासकार इस युग को "औपनिवेशिक युग" (Colonial Period) कहना अधिक सही मानते हैं।
🔍 आसान परिभाषा: औपनिवेशीकरण (Colonisation) |
📘 परिभाषा: जब एक देश दूसरे देश को जीतकर उसकी राजनीति, अर्थव्यवस्था, समाज और संस्कृति पर अपना दबदबा बना लेता है और उसे अपने फ़ायदे के लिए चलाता है, तो इस प्रक्रिया को औपनिवेशीकरण कहते हैं। जीता गया देश "उपनिवेश" (Colony) कहलाता है। |
💡 आसान भाषा में: दूसरे देश पर कब्ज़ा करके उसे अपनी "दुकान और खेत" की तरह इस्तेमाल करना: वहाँ से सस्ता कच्चा माल लेना, वहाँ अपना बना माल महँगा बेचना और वहाँ से कर (टैक्स) वसूलकर अपने देश ले जाना। 🏠 उदाहरण: मान लीजिए एक किरायेदार धीरे-धीरे पूरे घर का मालिक बन जाए, घर के असली मालिक से ही किराया वसूले और घर की कमाई अपने गाँव भेज दे। अंग्रेज़ों ने भारत के साथ ठीक यही किया: सस्ती कीमत पर चीज़ें ख़रीदीं, निर्यात के लिए नील जैसी फ़सलें उगवाईं और यहाँ से राजस्व वसूला। |
◆ अंग्रेज़ मानते थे कि हर चीज़ को लिखकर रखना बहुत ज़रूरी है। हर निर्देश, योजना, नीति, सहमति और जाँच लिखी जाती थी। इससे "ज्ञापन, टिप्पणी और प्रतिवेदन (रिपोर्ट) पर आधारित शासन" की संस्कृति बनी।
◆ तहसील, कलेक्टरेट, कमिश्नर का दफ़्तर, प्रांतीय सचिवालय, कचहरी, सबके अपने अभिलेख कक्ष (रिकॉर्ड रूम) होते थे। दस्तावेज़ बचाने के लिए अभिलेखागार (Archives) और संग्रहालय बनाए गए।
◆ 19वीं सदी की शुरुआत में दस्तावेज़ों की नकलें ख़ुशनवीस (सुलेखक) हाथ से बहुत सुंदर लिखावट में तैयार करते थे। 19वीं सदी के मध्य तक छपाई की तकनीक फैली और हर विभाग के दस्तावेज़ों की कई प्रतियाँ छपने लगीं।
◆ भारतीय राष्ट्रीय अभिलेखागार 1920 के दशक में बना। नई दिल्ली के निर्माण के समय राष्ट्रीय संग्रहालय और राष्ट्रीय अभिलेखागार दोनों को वायसराय के निवास के पास बनाया गया। इससे पता चलता है कि अंग्रेज़ इन संस्थाओं को कितना महत्व देते थे।
अंग्रेज़ों का विश्वास था कि किसी देश पर अच्छी तरह शासन करने के लिए उसे ठीक से जानना ज़रूरी है। इसलिए कई तरह के सर्वेक्षण हुए:
सर्वेक्षण का प्रकार | क्या जानकारी इकट्ठी की जाती थी |
मानचित्रण (नक्शा) सर्वेक्षण | 19वीं सदी की शुरुआत तक पूरे देश का नक्शा बनाने के बड़े सर्वेक्षण। क्लाइव (Clive) ने जेम्स रेनेल (James Rennell) को हिंदुस्तान के नक्शे बनाने का काम सौंपा था। |
राजस्व सर्वेक्षण (गाँवों में) | ज़मीन की सतह, मिट्टी की गुणवत्ता, पेड़-पौधे, जीव-जंतु, स्थानीय इतिहास और फ़सलें |
जनगणना (Census) | 19वीं सदी के अंत से हर 10 साल में; लोगों की संख्या, जाति, इलाका और व्यवसाय |
अन्य सर्वेक्षण | वानस्पतिक (पेड़-पौधे), प्राणि-वैज्ञानिक (जीव-जंतु), पुरातात्विक, मानवशास्त्रीय और वन सर्वेक्षण |
💡 ध्यान दें: चित्रों में छिपा उपनिवेशवाद जेम्स रेनेल के पहले नक्शे (1782) के आवरण-चित्र में दिखाया गया कि भारत के ब्राह्मण अपने पवित्र ग्रंथ ब्रिटानिया (Britannia, ब्रिटिश सत्ता का प्रतीक) को ख़ुशी-ख़ुशी सौंप रहे हैं, मानो भारतीय ख़ुद अंग्रेज़ों से अपनी संस्कृति की रक्षा करने की विनती कर रहे हों। यह चित्र उपनिवेशवादी सोच का प्रचार था। इसी तरह 1857 के बाद अंग्रेज़ों की किताबों में विद्रोहियों को "लूट-खसोट करने वाले, लालची और बेरहम" दिखाया गया। इसलिए चित्रों को भी ध्यान से पढ़ना चाहिए क्योंकि उनसे चित्रकार की सोच पता चलती है। |
◆ सरकारी रिकॉर्ड से केवल यह पता चलता है कि अंग्रेज़ अफ़सर क्या सोचते थे और किन चीज़ों में उनकी रुचि थी। आम भारतीय क्या महसूस करते थे, यह इनसे पता नहीं चलता।
◆ इसके लिए दूसरे स्रोत ज़रूरी हैं: लोगों की डायरियाँ, तीर्थयात्रियों और यात्रियों के संस्मरण, महत्वपूर्ण लोगों की आत्मकथाएँ, स्थानीय बाज़ारों में बिकने वाली लोकप्रिय पुस्तिकाएँ, अख़बार, नेताओं और सुधारकों के लेख, कवियों और उपन्यासकारों की रचनाएँ।
◆ पुराने विज्ञापन भी स्रोत हैं: उनसे पता चलता है कि नए उत्पादों के लिए बाज़ार कैसे तैयार हुए और नई रुचियाँ कैसे बनीं। जैसे 1922 में लिप्टन चाय के एक विज्ञापन में पीछे भारतीय महल और आगे घोड़े पर रानी विक्टोरिया का तीसरा बेटा राजकुमार आर्थर (ड्यूक ऑफ़ कनॉट) दिखाया गया, यह जताने के लिए कि दुनिया भर के शाही लोग यही चाय पीते हैं।
◆ सीमा: ये सब स्रोत पढ़े-लिखे लोगों ने रचे। आदिवासी, किसान, खदान-मज़दूर और सड़क पर जीवन बिताने वाले ग़रीबों के अनुभव इनमें कम मिलते हैं। उन्हें जानने के लिए इतिहासकार को अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ती है।
📰 उदाहरण: सरकारी रिपोर्ट और अख़बार में अंतर सरकारी रिपोर्ट (1946, नौसेना विद्रोह): "कराची: 301 विद्रोहियों को गिरफ़्तार कर लिया गया है… विशाखापट्टनम: स्थिति पूरी तरह नियंत्रण में है।" इसमें केवल सरकार की चिंता, यानी व्यवस्था बनाए रखना, दिखती है। अख़बार (22 मार्च 1946): दिल्ली में 2000 से ज़्यादा पुलिसवालों ने कम वेतन और घटिया भोजन के विरोध में खाना खाने से इनकार कर दिया। एक हड़ताली ने कहा: "जो चपाती और दाल हमें खानी पड़ती है, उसे जानवर तक नहीं खा सकते।" अख़बार से आम लोगों की भावना और शिकायत पता चलती है। |
भारत प्राचीन काल से ही एक समृद्ध देश रहा है। उसे "सोने की चिड़िया" कहा जाता था। रोम और पश्चिम एशिया के देशों से भारत के व्यापारिक और सांस्कृतिक संबंध बहुत पुराने थे। 17वीं सदी में भी भारत दुनिया के सबसे धनी देशों में से एक था। टैवर्नियर (Tavernier), बर्नियर (Bernier) और एडम स्मिथ (Adam Smith) जैसे लेखकों ने भी इसकी पुष्टि की है।
1. पहला मार्ग: मध्य एशिया की ऑक्सस (आमू दरिया) नदी से होते हुए कैस्पियन सागर और काला सागर तक।
2. दूसरा मार्ग: सीरिया होते हुए भूमध्य सागर तक।
3. तीसरा मार्ग: लाल सागर से मिस्र तक और फिर भूमध्य सागर पार करके यूरोप।
इन मार्गों पर अरब व्यापारी बिचौलिए (मध्यस्थ) थे। यूरोप में इटली के वेनिस और जेनोआ के व्यापारी भारतीय माल आगे बेचते थे। इस लंबी शृंखला में हर बिचौलिया मुनाफ़ा जोड़ता था, इसलिए यूरोप में भारतीय माल बहुत महँगा बिकता था।
कारण | आसान व्याख्या |
1453 में कुस्तुनतुनिया (Constantinople) पर तुर्कों का अधिकार | उस्मानी (ऑटोमन) तुर्कों ने कुस्तुनतुनिया जीत लिया। अब पुराने स्थल-मार्ग असुरक्षित और बहुत महँगे हो गए। यूरोप को भारत पहुँचने का नया रास्ता चाहिए था। |
मसालों और कपड़ों की भारी माँग | यूरोप में काली मिर्च, लौंग, इलायची, दालचीनी तथा भारत के बारीक सूती और रेशमी कपड़ों की ज़बरदस्त माँग थी। सर्दियों में मांस सुरक्षित रखने के लिए मसाले ज़रूरी थे। |
बिचौलियों से छुटकारा | अरब और इतालवी व्यापारियों के एकाधिकार को तोड़कर सीधे भारत से सस्ता माल लाना। |
पुनर्जागरण (Renaissance) और भौगोलिक खोजें | यूरोप में नई सोच, साहस और विज्ञान का विकास हुआ। कुतुबनुमा (कम्पास), नक्शों और बड़े जहाज़ों ने लंबी समुद्री यात्राएँ संभव कीं। |
शासकों का प्रोत्साहन | पुर्तगाल और स्पेन के राजाओं ने नाविकों को धन और सहायता दी। पुर्तगाल के राजकुमार हेनरी (Henry the Navigator) ने नाविकों को बहुत प्रोत्साहित किया। |
धर्म-प्रचार की इच्छा | यूरोपीय शक्तियाँ ईसाई धर्म का प्रसार भी करना चाहती थीं। यह बाद में उपनिवेशवाद का एक बहाना भी बना। |
◆ 1487–88: पुर्तगाली नाविक बार्थोलोम्यू डियाज़ (Bartholomeu Dias) अफ्रीका के दक्षिणी सिरे तक पहुँचा। इसे बाद में "उत्तमाशा अंतरीप" (केप ऑफ़ गुड होप, Cape of Good Hope) नाम दिया गया।
◆ 1492: स्पेन की ओर से कोलंबस (Columbus) भारत की खोज में निकला, पर वह अमेरिका पहुँच गया।
◆ 1497–98: पुर्तगाली नाविक वास्को-द-गामा (Vasco da Gama) अफ्रीका का चक्कर लगाकर भारत पहुँचा। यही यूरोप से भारत का पहला सीधा समुद्री मार्ग था।

🧠 याद रखें: यूरोपीय कंपनियों का भारत आगमन क्रम भारत पहुँचने का क्रम: पुर्तगाली (1498) → डच (1605 में पहली कोठी) → अंग्रेज़ (1608 में सूरत पहुँचे) → डेनिश (1620) → फ्रांसीसी (1668 में पहली कोठी)। कंपनियों के बनने का क्रम अलग है: अंग्रेज़ी कंपनी (1600) → डच कंपनी (1602) → डेनिश कंपनी (1616) → फ्रांसीसी कंपनी (1664)। पुर्तगाली किसी कंपनी के रूप में नहीं, बल्कि सीधे राज्य (सरकार) के संरक्षण में आए थे। अंग्रेज़ी कंपनी डच कंपनी से पहले (1600 में) बनी, पर भारत में पहली कोठी डचों ने (1605) पहले खोली। प्रश्नों में यह अंतर अक्सर उलझाने के लिए पूछा जाता है। |

◆ वास्को-द-गामा जुलाई 1497 में लिस्बन (पुर्तगाल) से चला। वह उत्तमाशा अंतरीप का चक्कर लगाकर पूर्वी अफ्रीका के मोज़ाम्बिक और मालिंदी पहुँचा। मालिंदी से एक भारतीय मार्गदर्शक (गुजराती नाविक) की सहायता से वह 20 मई 1498 को कालीकट (कोझिकोड, केरल) के पास कप्पड़ तट पर पहुँचा।
◆ कालीकट के हिंदू शासक ज़मोरिन (Zamorin, स्थानीय नाम "सामूतिरी") ने "अतिथि देवो भव" की परंपरा से उसका स्वागत किया और कुछ सुविधाएँ दीं।
◆ वह लगभग तीन महीने भारत में रहकर मसाले लेकर लौटा। कहा जाता है कि उस माल से उसे यात्रा के ख़र्च का लगभग 60 गुना लाभ मिला। इसी मुनाफ़े ने दूसरे यूरोपीय देशों को भी भारत की ओर खींचा।
◆ वह 1502 में दूसरी बार आया और कन्नानोर, कालीकट और कोचीन में व्यापारिक केंद्र बनाए। 1524 में तीसरी बार आया और उसी वर्ष कोचीन में उसकी मृत्यु हो गई।
◆ 1500 में पेड्रो अल्वारेज़ कैब्रल (Pedro Alvares Cabral) कालीकट आया और पहली पुर्तगाली व्यापारिक कोठी बनाई। पुर्तगालियों की पहली मज़बूत कोठी कोचीन (1503) में बनी।
गवर्नर / वायसराय | कार्यकाल | प्रमुख कार्य |
फ्रांसिस्को-द-अल्मीडा (Francisco de Almeida) | 1505–1509 | भारत में पहला पुर्तगाली वायसराय। "नीले पानी की नीति" (Blue Water Policy) अपनाई: ज़मीन जीतने के बजाय समुद्र पर नियंत्रण। 1509 में दीव का युद्ध जीता: गुजरात, मिस्र और कालीकट के संयुक्त बेड़े को हराया। |
अल्फांसो-द-अल्बुकर्क (Afonso de Albuquerque) | 1509–1515 | भारत में पुर्तगाली शक्ति का वास्तविक संस्थापक। 1510 में बीजापुर के सुल्तान यूसुफ़ आदिल शाह से गोवा छीना। जहाज़ों के लिए परमिट व्यवस्था (कार्टेज़) को सख़्त किया; पुर्तगालियों और भारतीय महिलाओं के विवाह को प्रोत्साहन दिया; अपने क्षेत्र में सती प्रथा पर रोक लगाई। 1511 में मलक्का और 1515 में होर्मुज़ पर अधिकार। |
नीनो-द-कुन्हा (Nino da Cunha) | 1529–1538 | 1530 में राजधानी कोचीन से गोवा ले गया। 1534 में बसीन (बेसीन) और 1535 में दीव प्राप्त किए (गुजरात के बहादुर शाह से)। |
मार्टिम अफ़ोंसो-द-सूज़ा (Martim Afonso de Sousa) | 1542–1545 | प्रसिद्ध ईसाई संत फ्रांसिस ज़ेवियर (Francis Xavier) इसी के साथ भारत आए (1542)। |
🔍 आसान परिभाषा: कार्टेज़ व्यवस्था (Cartaz System) |
📘 परिभाषा: पुर्तगालियों द्वारा हिंद महासागर में चलाई गई परमिट (अनुमति-पत्र) व्यवस्था। जो जहाज़ पुर्तगालियों से कार्टेज़ ख़रीदे बिना चलता, उसे पुर्तगाली जब्त कर लेते या डुबो देते थे। |
💡 आसान भाषा में: समुद्र में चलने के लिए पुर्तगालियों से "पास" लेना ज़रूरी था, वरना माल और जहाज़ दोनों छिन सकते थे। 🏠 उदाहरण: जैसे किसी सड़क पर कोई दबंग अपना नाका लगा दे और कहे कि मेरी पर्ची के बिना कोई गाड़ी नहीं गुज़रेगी। मुगल बादशाह अकबर के जहाज़ों को भी हज यात्रा के लिए पुर्तगालियों से कार्टेज़ लेना पड़ता था। |
पश्चिमी तट: गोवा (राजधानी), दमन, दीव, सालसेट, बसीन (बेसीन), चौल, बम्बई। दक्षिणी तट: कालीकट, कोचीन, कन्नानोर, सेंट थोमे (मद्रास के पास), नागपट्टनम। बंगाल: हुगली (1579 के आसपास; अकबर की अनुमति से) और चटगाँव।
वर्ष | घटना | परिणाम |
1580 | पुर्तगाल का स्पेन में विलय (1580–1640) | पुर्तगाल की अपनी स्वतंत्र नीति कमज़ोर पड़ गई; नौसेना पर ध्यान घटा। |
1612 | सुवाली (स्वाली) का युद्ध: सूरत के पास अंग्रेज़ कप्तान थॉमस बेस्ट ने पुर्तगालियों को हराया | अंग्रेज़ों को सूरत में कोठी की अनुमति मिली; पुर्तगाली पतन की शुरुआत। |
1632 | मुगल बादशाह शाहजहाँ ने हुगली से पुर्तगालियों को निकाला | बंगाल में पुर्तगाली शक्ति समाप्त। |
1641 | डचों ने मलक्का छीना | दक्षिण-पूर्व एशिया में पुर्तगाली शक्ति टूटी। |
1661 | पुर्तगाल ने बम्बई दहेज में इंग्लैंड को दिया | पश्चिमी तट पर अंग्रेज़ मज़बूत हुए। |
1739 | मराठों (चिमाजी अप्पा) ने बसीन और सालसेट छीने | पश्चिमी तट पर पुर्तगाली और सिमटे। |
◆ अल्बुकर्क के बाद अयोग्य और भ्रष्ट अधिकारी।
◆ ज़बरदस्ती धर्म-परिवर्तन और धार्मिक असहिष्णुता (गोवा में धार्मिक न्यायालय "इनक्विज़िशन" (Inquisition), 1560) से भारतीय जनता नाराज़ हुई।
◆ समुद्री लूटपाट और कार्टेज़ के ज़ुल्म से व्यापारी दुश्मन बन गए।
◆ पुर्तगाल एक छोटा देश था; इतने बड़े समुद्री साम्राज्य के लिए उसके पास पर्याप्त संसाधन और जनसंख्या नहीं थी।
◆ ब्राज़ील (दक्षिण अमेरिका) की खोज के बाद पुर्तगाल का ध्यान वहाँ बँट गया; साथ ही डच और अंग्रेज़ों की मज़बूत नौसेना से मुक़ाबला।
🏛️ पुर्तगालियों के अवशेष और योगदान पुर्तगाली गोवा, दमन, दीव और दादरा–नगर हवेली में लंबे समय तक रहे। दादरा–नगर हवेली 1954 में स्वतंत्र हुए और स्वतंत्र भारत ने दिसंबर 1961 में "ऑपरेशन विजय" द्वारा गोवा, दमन और दीव को भारत में मिला लिया। भारत आने वाले पहले और यहाँ से जाने वाले अंतिम यूरोपीय पुर्तगाली ही थे। योगदान: भारत में तंबाकू, आलू, मिर्च, अनानास, पपीता, काजू, अमरूद और मक्का जैसी फ़सलें लाए; 1556 में गोवा में भारत का पहला छापाख़ाना (प्रिंटिंग प्रेस) लगाया; गोथिक स्थापत्य (जैसे गोवा के चर्च) की शुरुआत की; जहाज़ निर्माण की नई तकनीक दी। |
◆ 1602 में कुछ व्यापारियों ने मिलकर डच संयुक्त ईस्ट इंडिया कंपनी बनाई। डच भाषा में इसका छोटा नाम "वी.ओ.सी." (VOC) है। डच सरकार ने इसे पूर्वी देशों से व्यापार का एकाधिकार दिया।
◆ डचों का मुख्य ध्यान भारत पर नहीं, बल्कि इंडोनेशिया के मसाला द्वीपों (जावा, सुमात्रा, बांटम, मलक्का, मोलक्का) पर था। भारत उनके लिए मुख्यतः सूती कपड़ा और नील ख़रीदने का केंद्र था, जिसे वे मसालों के बदले देते थे।
वर्ष | डच केंद्र / घटना | महत्व |
1605 | मसुलीपट्टनम (मछलीपट्टनम, आंध्र प्रदेश) | भारत में डचों की पहली कोठी; गोलकुंडा के सुल्तान से अनुमति। |
1610 | पुलिकट (तमिलनाडु) | लंबे समय तक भारत में डचों का मुख्यालय; यहाँ डच सोने के सिक्के "पगोडा" ढालते थे। |
1616 | सूरत | पश्चिमी तट का व्यापारिक केंद्र। |
1623 | अम्बोयना (इंडोनेशिया) की घटना | डचों ने अंग्रेज़ों को वहाँ से खदेड़ा; इसके बाद अंग्रेज़ों ने अपना पूरा ध्यान भारत पर लगाया। |
1653 | चिनसुरा (बंगाल, हुगली नदी पर) | बंगाल में डचों का मुख्य केंद्र; यहाँ गुस्तावस किला बनाया। |
1658–1690 | नागपट्टनम | 1690 में मुख्यालय पुलिकट से नागपट्टनम ले जाया गया। |
अन्य | कासिम बाज़ार, बड़ानगर, पटना, बालासोर, भीमलीपट्टनम, कोचीन (1663 में पुर्तगालियों से छीना) | — |
युद्ध | पक्ष | परिणाम और महत्व |
कोलाचेल का युद्ध (10 अगस्त 1741) | त्रावणकोर के राजा मार्तंड वर्मा बनाम डच (सेनापति डी-लैनॉय) | डच बुरी तरह हारे। किसी भारतीय राज्य द्वारा यूरोपीय शक्ति को निर्णायक रूप से हराने का प्रसिद्ध उदाहरण। पकड़ा गया डच सेनापति डी-लैनॉय बाद में त्रावणकोर की सेना का ही प्रमुख बना और उसने सेना का आधुनिकीकरण किया। मालाबार तट पर डचों की महत्वाकांक्षा समाप्त। |
बेदरा (बिदेरा) / चिनसुरा का युद्ध (नवंबर 1759) | अंग्रेज़ (कर्नल फ़ोर्ड) बनाम डच | डच हारे; बंगाल और भारत में डचों का प्रभाव समाप्त। अंग्रेज़ों का बंगाल पर वर्चस्व और पक्का हुआ। |
◆ 1795 के बाद अंग्रेज़ों ने डच बस्तियों पर कब्ज़ा करना शुरू किया और 1824–25 की आंग्ल-डच संधि के बाद डचों ने भारत की बची हुई बस्तियाँ अंग्रेज़ों को सौंप दीं और बदले में इंडोनेशिया पर ध्यान दिया।
◆ 1588 में स्पेन के विशाल जहाज़ी बेड़े "आर्मडा" (Armada) पर इंग्लैंड की जीत से अंग्रेज़ों का आत्मविश्वास बढ़ा और पूर्व के देशों से सीधा व्यापार करने की इच्छा जगी।
◆ सितंबर 1599 में लंदन के लॉर्ड मेयर की अध्यक्षता में व्यापारियों ने पूर्व के देशों से व्यापार के लिए एक संस्था बनाने का प्रस्ताव पास किया। इन्हें "मर्चेंट एडवेंचरर्स" (Merchant Adventurers) कहा गया।
◆ 31 दिसंबर 1600 को महारानी एलिज़ाबेथ प्रथम ने इस कंपनी को राजपत्र / चार्टर दिया। कंपनी का पूरा नाम था: "द गवर्नर एंड कंपनी ऑफ़ मर्चेंट्स ऑफ़ लंदन ट्रेडिंग इनटू द ईस्ट इंडीज़"। चार्टर से कंपनी को पूर्व के साथ व्यापार का 15 वर्षों का एकाधिकार मिला।
◆ एकाधिकार का अर्थ: इंग्लैंड की कोई दूसरी कंपनी इस क्षेत्र में होड़ नहीं कर सकती थी, इसलिए कंपनी सस्ते में ख़रीदकर यूरोप में महँगा बेच सकती थी। पर यह शाही चार्टर दूसरी यूरोपीय शक्तियों (पुर्तगाली, डच, फ्रांसीसी) को नहीं रोक सकता था।
🔍 आसान परिभाषा: एकाधिकार-पत्र / चार्टर (Charter) और वाणिज्यिक कंपनी |
📘 परिभाषा: चार्टर एक शाही आदेश-पत्र था जिससे किसी कंपनी को किसी क्षेत्र में अकेले व्यापार करने (एकाधिकार) का अधिकार मिलता था। वाणिज्यिक (व्यावसायिक) कंपनी वह उद्यम है जो सस्ते में ख़रीदकर महँगा बेचने से मुनाफ़ा कमाता है। |
💡 आसान भाषा में: चार्टर = "केवल तुम ही यह व्यापार करोगे" वाला सरकारी लाइसेंस। उस समय कंपनियाँ तभी मुनाफ़ा कमा पाती थीं जब कोई दूसरा प्रतियोगी न हो। 🏠 उदाहरण: जैसे किसी मेले में प्रशासन केवल एक ही दुकानदार को चाय बेचने की अनुमति दे दे। अब वह अपनी मर्ज़ी की कीमत वसूल सकता है। पर पड़ोसी गाँव का दुकानदार (दूसरी यूरोपीय कंपनी) इस आदेश को नहीं मानता, इसलिए दोनों में झगड़ा होता है। |
वर्ष | घटना | महत्व |
1608 | कप्तान विलियम हॉकिन्स जहाज़ "हेक्टर" से सूरत पहुँचा; 1609 में जहाँगीर के दरबार (आगरा) गया | जहाँगीर ने पहले अनुमति दी, पर पुर्तगालियों के दबाव में रद्द कर दी। जहाँगीर ने हॉकिन्स को "इंग्लिश ख़ान" की उपाधि और 400 का मनसब दिया था। |
1611 | कप्तान मिडलटन ने सूरत के पास पुर्तगाली बेड़े को हराया | अंग्रेज़ों की नौसैनिक क्षमता दिखी। |
1612 | सुवाली (स्वाली) का युद्ध: कप्तान थॉमस बेस्ट ने पुर्तगालियों को हराया | अंग्रेज़ों का प्रभाव बढ़ा। |
1613 | सूरत में पहली स्थायी अंग्रेज़ी कोठी | जहाँगीर के फ़रमान से; 1687 तक सूरत ही पश्चिमी भारत में कंपनी का मुख्यालय रहा। |
1615–1619 | इंग्लैंड के राजा जेम्स प्रथम का राजदूत सर थॉमस रो जहाँगीर के दरबार (अजमेर) में | मुगल साम्राज्य के सभी भागों में व्यापार और कोठियाँ खोलने का अधिकार; आगरा, अहमदाबाद, भड़ौच, बुरहानपुर, अजमेर में केंद्र। |
1661 / 1668 | पुर्तगाली राजकुमारी कैथरीन ब्रैगेंज़ा का विवाह इंग्लैंड के राजा चार्ल्स द्वितीय से; बम्बई दहेज में मिला (1661) | 1668 में चार्ल्स द्वितीय ने बम्बई कंपनी को मात्र 10 पाउंड वार्षिक किराये पर दे दिया। 1687 में पश्चिमी मुख्यालय सूरत से बम्बई आ गया। |
वर्ष | स्थान / घटना | महत्व |
1611 | मसुलीपट्टनम | पूर्वी (कोरोमंडल) तट पर पहली अंग्रेज़ी कोठी। |
1626 | अरमागाँव (आंध्र प्रदेश) | कोरोमंडल तट का दूसरा केंद्र; इसे किलेबंद किया गया। |
1633 | हरिहरपुर और बालासोर (उड़ीसा) | पूर्वी भारत में पहली अंग्रेज़ी कोठियाँ। |
1639–40 | मद्रास: फ्रांसिस डे (Francis Day) ने चंद्रगिरि के राजा से ज़मीन पट्टे पर ली; फोर्ट सेंट जॉर्ज बना | अंग्रेज़ों की पहली किलेबंद कोठी; बाद में दक्षिण में मुख्यालय (मद्रास प्रेसीडेंसी)। |
1651 | हुगली (बंगाल) | शाहजहाँ के पुत्र, बंगाल के सूबेदार शाह शुजा की अनुमति से बंगाल में पहली अंग्रेज़ी कोठी; कासिम बाज़ार, पटना में भी केंद्र। |
1686–1690 | औरंगज़ेब से संघर्ष: अंग्रेज़ों ने हुगली पर हमला किया, जवाब में मुगलों ने उन्हें बंगाल से निकाल दिया; बाद में समझौता | मुगलों की सैन्य शक्ति के सामने अंग्रेज़ों को झुकना पड़ा। |
1690–91 | जॉब चार्नॉक ने सुतानुती में कोठी बनाई; औरंगज़ेब का फ़रमान | 3,000 रुपये वार्षिक के बदले बंगाल में बिना चुंगी व्यापार की अनुमति। |
1698 | कंपनी ने सुतानुती, कालीकाता और गोविंदपुर तीन गाँवों की ज़मींदारी ख़रीदी | इन्हीं से कलकत्ता शहर बना (आज कोलकाता)। |
1696–1700 | बस्ती के चारों ओर किला बनाया गया: फोर्ट विलियम (राजा विलियम तृतीय के नाम पर); 1700 में बंगाल एक अलग प्रेसीडेंसी बनी | बंगाल में कंपनी का मुख्य केंद्र; पहला अध्यक्ष चार्ल्स आयर (Charles Eyre)। |
◆ 1715 में जॉन सरमन (John Surman) के नेतृत्व में एक अंग्रेज़ी दल (मिशन) मुगल बादशाह फ़र्रुख़सियर के दरबार में दिल्ली पहुँचा। इसमें एक अंग्रेज़ डॉक्टर विलियम हैमिल्टन (William Hamilton) भी थे, जिन्होंने बादशाह को एक बीमारी से ठीक किया।
◆ प्रसन्न होकर बादशाह ने 1717 में कंपनी को एक शाही फ़रमान दिया। इस फ़रमान की मुख्य शर्तें थीं:
(क) बंगाल: केवल 3,000 रुपये वार्षिक देकर कंपनी का माल सीमा शुल्क (चुंगी) से मुक्त। कंपनी को माल की आवाजाही के लिए "दस्तक" (चुंगी-मुक्ति का पास) जारी करने का अधिकार।
(ख) कलकत्ता के आसपास अतिरिक्त गाँवों की ज़मीन किराये पर लेने का अधिकार।
(ग) हैदराबाद: चुंगी से छूट; केवल मद्रास के लिए पहले से तय किराया देना।
(घ) सूरत: 10,000 रुपये वार्षिक देकर सभी शुल्कों से छूट।
(ङ) बम्बई की टकसाल में ढाले गए कंपनी के सिक्कों को पूरे मुगल साम्राज्य में चलने की मान्यता।
इतने बड़े विशेषाधिकार देने के कारण इस फ़रमान को कंपनी का "मैग्ना कार्टा" (Magna Carta, यानी अधिकारों का महान पत्र) कहा गया। पर आगे चलकर यही फ़रमान बंगाल के नवाबों और कंपनी के झगड़े की जड़ बना।
🔍 आसान परिभाषा: फ़रमान और दस्तक (Farman & Dastak) |
📘 परिभाषा: फ़रमान = बादशाह का लिखित शाही आदेश। दस्तक = कंपनी द्वारा जारी किया जाने वाला ऐसा अनुमति-पत्र (पास) जिसे दिखाकर माल बिना चुंगी दिए एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जा सकता था। |
💡 आसान भाषा में: फ़रमान ने कंपनी को "टैक्स-फ्री" व्यापार का अधिकार दिया। दस्तक उस अधिकार की "पर्ची" थी। नियम के अनुसार यह केवल कंपनी के आयात-निर्यात के लिए थी, कर्मचारियों के निजी व्यापार के लिए नहीं। 🏠 उदाहरण: मान लीजिए किसी स्कूल ने केवल स्कूल-बस को टोल-फ्री पास दिया, पर ड्राइवर उस पास को अपनी निजी गाड़ी पर भी लगाने लगे और दूसरों को पैसे लेकर बेचने लगे। टोल-नाके (नवाब) की कमाई घटेगी और झगड़ा होगा। बंगाल में ठीक यही हुआ। |
◆ कंपनी निजी उद्यम थी; वह सरकार पर निर्भर नहीं थी, इसलिए तेज़ और लचीले फ़ैसले ले सकती थी।
◆ इंग्लैंड में स्थिर सरकार और मज़बूत नौसेना का समर्थन।
◆ ऋण बाज़ार (बैंक ऑफ़ इंग्लैंड) से युद्ध के लिए आसानी से धन मिल जाता था।
◆ शुरू में धर्म-प्रचार में कम रुचि; ध्यान केवल व्यापार पर था, इसलिए भारतीय शासकों से संबंध अपेक्षाकृत अच्छे रहे।
◆ बेहतर सैन्य अनुशासन, तोपख़ाना और आधुनिक युद्ध-कौशल।
वर्ष | घटना |
1616 | डेनिश ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना। |
1620 | ट्रंकेबार (तरंगमबाड़ी, तमिलनाडु) में पहली बस्ती; यहाँ डैन्सबर्ग किला बना। यह तंजौर के राजा से मिली ज़मीन पर था। |
1755 | सेरामपुर (श्रीरामपुर, बंगाल) में बस्ती; यह भारत में डेनिश केंद्रों में प्रमुख बन गया। |
1777 | सेरामपुर का प्रशासन कंपनी से हटकर सीधे डेनमार्क के राजा (क्राउन) के अधीन हुआ। |
1845 | डेनिश लोगों ने अपनी सभी भारतीय बस्तियाँ अंग्रेज़ों को बेच दीं। |
◆ डेनिश लोग व्यापार से अधिक ईसाई धर्म-प्रचार (मिशनरी गतिविधियों) के लिए जाने जाते हैं। ट्रंकेबार में बार्थोलोम्यू ज़ीगेनबाल्ग (Bartholomaeus Ziegenbalg) ने छापाख़ाना लगाया और बाइबिल का तमिल में अनुवाद किया।
◆ सेरामपुर बाद में शिक्षा और छपाई का बड़ा केंद्र बना। विलियम कैरी (William Carey) जैसे मिशनरियों ने यहाँ से भारतीय भाषाओं में पुस्तकें छापीं (यह विषय शिक्षा और प्रेस वाले अध्याय में विस्तार से आएगा)।
फ्रांसीसी सबसे अंत में भारत आए। फ्रांस के राजा लुई चौदहवें के समय उसके मंत्री कोलबर्ट (Colbert) के प्रयास से 1664 में फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कंपनी बनी। यह कंपनी सरकार के नियंत्रण में थी और धन के लिए फ्रांस सरकार पर निर्भर रहती थी। यही उसकी सबसे बड़ी कमज़ोरी बनी।
वर्ष | फ्रांसीसी केंद्र / घटना | महत्व |
1668 | सूरत: फ्रांसिस कैरन (Francois Caron) ने पहली कोठी बनाई | भारत में पहली फ्रांसीसी कोठी। |
1669 | मसुलीपट्टनम | गोलकुंडा के सुल्तान से अनुमति; दूसरी कोठी। |
1673–74 | पांडिचेरी (पुदुचेरी): फ्रांस्वा मार्टिन (Francois Martin) ने वलिकोंडापुरम के सूबेदार (शेर ख़ाँ लोदी) से गाँव लेकर बस्ती बसाई | भारत में फ्रांसीसियों की राजधानी बनी। |
1690–92 | चंद्रनगर (बंगाल) | बंगाल के सूबेदार शाइस्ता ख़ाँ की अनुमति से; बंगाल में मुख्य केंद्र। |
1693–1697 | डचों ने पांडिचेरी छीना; रिजविक की संधि (1697) से वापस मिला | फ्रांसीसी और डच प्रतिद्वंद्विता। |
1721–1739 | माहे (1725, मालाबार तट), यनम (1731), कराईकल (1739) | पूर्वी व पश्चिमी तट पर विस्तार। |
1742–1754 | जोसेफ़ फ्रांस्वा डूप्ले (Dupleix) गवर्नर | भारतीय राजनीति में हस्तक्षेप की नीति; फ्रांसीसी शक्ति का चरम। |
◆ डूप्ले ने समझ लिया था कि भारतीय राजाओं के आपसी झगड़ों और उत्तराधिकार के विवादों में दख़ल देकर पैसा, ज़मीन और राजनीतिक प्रभाव पाया जा सकता है।
◆ उसने भारतीय सैनिकों (सिपाहियों) को यूरोपीय ढंग से प्रशिक्षित करके छोटी पर अनुशासित सेना बनाई। यही तरीका बाद में अंग्रेज़ों ने भी अपनाया।
◆ उसने हैदराबाद और कर्नाटक की गद्दियों पर अपने समर्थकों को बैठाने की कोशिश की। पर अंततः वह असफल रहा और 1754 में फ्रांस सरकार ने उसे वापस बुला लिया।

यूरोपीय शक्ति | कंपनी बनी | भारत में पहली कोठी / बस्ती | मुख्यालय / प्रमुख केंद्र | भारत से विदाई |
पुर्तगाली | कंपनी नहीं (राज्य-संरक्षण) | कालीकट (1500), कोचीन (1503) | कोचीन → गोवा (1530) | 1961 (ऑपरेशन विजय) |
डच | 1602 | मसुलीपट्टनम (1605) | पुलिकट → नागपट्टनम | 1759 में हार; 1825 तक बस्तियाँ सौंपीं |
अंग्रेज़ | 1600 | सूरत (1613 स्थायी) | सूरत → बम्बई; मद्रास; कलकत्ता | 1947 (स्वतंत्रता) |
डेनिश | 1616 | ट्रंकेबार (1620) | ट्रंकेबार, सेरामपुर | 1845 (अंग्रेज़ों को बेचा) |
फ्रांसीसी | 1664 | सूरत (1668) | पांडिचेरी | 1954 (पांडिचेरी का भारत में हस्तांतरण) |
18वीं सदी के मध्य तक पुर्तगाली और डच कमज़ोर हो चुके थे। अब भारत में अंग्रेज़ और फ्रांसीसी ही मुख्य प्रतिद्वंद्वी बचे। दोनों ने भारतीय राजाओं के झगड़ों में दख़ल देकर सैनिक सहायता दी और बदले में भूमि, धन और व्यापारिक सुविधाएँ लीं। धीरे-धीरे ये व्यापारी राजनीतिक शक्ति बन गए। दक्षिण भारत के कोरोमंडल तट और उसके भीतरी भाग (कर्नाटक) में दोनों के बीच तीन युद्ध हुए, जिन्हें "कर्नाटक के युद्ध" कहा जाता है।
📍 "कर्नाटक" शब्द से भ्रम न हो यहाँ "कर्नाटक" का अर्थ आज का कर्नाटक राज्य नहीं है। उस समय कोरोमंडल तट (मद्रास से पांडिचेरी और उसके आसपास का आज का तमिलनाडु–आंध्र क्षेत्र) को कर्नाटक (Carnatic) कहा जाता था। इसकी राजधानी अर्काट थी और इसका नवाब औपचारिक रूप से हैदराबाद के निज़ाम के अधीन था। |
◆ कारण: यूरोप में ऑस्ट्रिया के उत्तराधिकार का युद्ध (1740–48) छिड़ा, जिसमें इंग्लैंड और फ्रांस विरोधी पक्षों में थे। इसका असर भारत पर पड़ा।
◆ अंग्रेज़ी बेड़े ने फ्रांसीसी जहाज़ पकड़े; जवाब में फ्रांसीसियों (मॉरीशस से आए ला बोर्डोने की नौसेना और डूप्ले) ने 1746 में मद्रास जीत लिया।
◆ सेंट थोमे (अडयार) का युद्ध (1746): कर्नाटक के नवाब अनवरुद्दीन ने फ्रांसीसियों को रोकने के लिए अपने बेटे महफ़ूज़ ख़ाँ के नेतृत्व में लगभग 10,000 सैनिक भेजे। फ्रांसीसी कप्तान पैराडाइज़ (Paradis) की छोटी-सी अनुशासित सेना ने उन्हें हरा दिया।
◆ संधि: एक्स-ला-शापेल (Aix-la-Chapelle) की संधि (1748), जिससे मद्रास अंग्रेज़ों को वापस मिल गया।
◆ सबसे बड़ा सबक: यह साबित हो गया कि छोटी पर अनुशासित यूरोपीय सेना बड़ी भारतीय सेना को हरा सकती है। इसी ने यूरोपीय कंपनियों को भारतीय राजनीति में दख़ल देने का हौसला दिया।
◆ कारण: यह युद्ध पूरी तरह भारतीय कारणों से हुआ: हैदराबाद और कर्नाटक दोनों की गद्दियों पर उत्तराधिकार के झगड़े।
गद्दी | फ्रांसीसियों (डूप्ले) का उम्मीदवार | अंग्रेज़ों का उम्मीदवार |
हैदराबाद (निज़ाम) | मुज़फ़्फ़र जंग (बाद में सलाबत जंग) | नासिर जंग |
कर्नाटक (अर्काट का नवाब) | चंदा साहब | मुहम्मद अली (अनवरुद्दीन का बेटा) |
◆ अंबूर का युद्ध (अगस्त 1749): फ्रांसीसी, चंदा साहब और मुज़फ़्फ़र जंग ने नवाब अनवरुद्दीन को हराकर मार डाला। शुरू में फ्रांसीसी बहुत सफल रहे; हैदराबाद में बुसी (Bussy) के नेतृत्व में फ्रांसीसी सेना तैनात हुई।
◆ अर्काट का घेरा (1751): जब चंदा साहब और फ्रांसीसियों ने त्रिचनापल्ली में मुहम्मद अली को घेर रखा था, तब युवा रॉबर्ट क्लाइव (Robert Clive) ने केवल लगभग 500 सैनिकों के साथ अर्काट पर कब्ज़ा कर लिया और लगभग 53 दिन तक उसकी रक्षा की। इससे युद्ध का रुख़ अंग्रेज़ों की ओर मुड़ गया।
◆ 1752 में चंदा साहब मारा गया। फ्रांस सरकार डूप्ले की महँगी नीति से नाराज़ थी, इसलिए 1754 में उसे वापस बुला लिया और गोडेहू (Godeheu) को भेजा।
◆ संधि: पांडिचेरी की संधि (1754–55)। अंग्रेज़ समर्थित मुहम्मद अली कर्नाटक का नवाब बना। दक्षिण में अंग्रेज़ों की प्रतिष्ठा बढ़ी।
◆ कारण: यूरोप में सप्तवर्षीय युद्ध (1756–63) छिड़ा; भारत में फिर अंग्रेज़ और फ्रांसीसी आमने-सामने आ गए।
◆ फ्रांसीसी सरकार ने काउंट-द-लाली (Count de Lally) को भेजा। उसने 1758 में फोर्ट सेंट डेविड जीता, पर मद्रास नहीं जीत सका। उसने हैदराबाद से बुसी को बुला लिया, जिससे वहाँ फ्रांसीसी प्रभाव ख़त्म हो गया और उत्तरी सरकार का इलाक़ा अंग्रेज़ों को मिल गया।
◆ इसी समय अंग्रेज़ प्लासी (1757) जीतकर बंगाल के धन पर नियंत्रण पा चुके थे, जबकि फ्रांसीसियों के पास ऐसा कोई समृद्ध आधार नहीं था।
◆ वांडीवाश का युद्ध (22 जनवरी 1760): अंग्रेज़ सेनापति सर आयरकूट (Eyre Coote) ने लाली को निर्णायक रूप से हराया। बुसी बंदी बनाया गया। जनवरी 1761 में फ्रांसीसी राजधानी पांडिचेरी का पतन हो गया।
◆ संधि: पेरिस की संधि (1763)। फ्रांसीसियों को उनकी बस्तियाँ (पांडिचेरी, चंद्रनगर आदि) लौटा दी गईं, पर वे वहाँ किलेबंदी नहीं कर सकते थे और सेना नहीं रख सकते थे। वे अब केवल व्यापारी बनकर रह गए।
◆ लाली को फ्रांस लौटने पर देशद्रोह का दोषी मानकर 1766 में मृत्युदंड दिया गया।


🇬🇧 अंग्रेज़ क्यों जीते? ✔ अंग्रेज़ी कंपनी निजी थी; स्वतंत्र और तेज़ फ़ैसले। ✔ अंग्रेज़ों की नौसेना कहीं अधिक मज़बूत थी; समुद्री रास्तों पर नियंत्रण। ✔ बंगाल (प्लासी के बाद) जैसा धनी आधार; वहीं से धन, अनाज और सैनिक। ✔ युद्ध के समय भी व्यापार पर ध्यान; कंपनी की आर्थिक हालत अच्छी रही। ✔ तीन मज़बूत केंद्र: कलकत्ता, बम्बई, मद्रास। ✔ क्लाइव, आयरकूट, लॉरेंस जैसे योग्य सेनापति। | 🇫🇷 फ्रांसीसी क्यों हारे? ✔ कंपनी सरकार के नियंत्रण में; धन और फ़ैसलों के लिए फ्रांस पर निर्भर। ✔ फ्रांस यूरोप के युद्धों में उलझा रहा; भारत पर पूरा ध्यान और धन नहीं दे सका। ✔ फ्रांसीसी कमज़ोर नौसेना; रसद और सैनिक समय पर नहीं पहुँचते थे। ✔ डूप्ले को गलत समय पर वापस बुलाया गया; बाद के नेताओं (लाली, बुसी) में आपसी तालमेल नहीं। ✔ राजनीति पर ज़्यादा ध्यान, व्यापार की उपेक्षा; आर्थिक आधार कमज़ोर। ✔ दक्षिण भारत (पांडिचेरी) जैसा अपेक्षाकृत कम समृद्ध आधार। |
❝ भारत में व्यापारिक और सैनिक सफलता की दो मुख्य शर्तें थीं: तटीय प्रदेशों में मज़बूत मोर्चाबंदी और ऐसी नौसेना जो यूरोप के साथ संचार का मार्ग खुला रख सके। अंग्रेज़ समुद्र पर अपना गौरव बढ़ा चुके थे, जबकि फ्रांसीसी स्थल पर भी अपनी शक्ति खो रहे थे। ❞ (इतिहासकार अल्फ्रेड लायल (Alfred Lyall) का मत (भावार्थ)) |
युद्ध | वर्ष | किनके बीच | परिणाम |
दीव का युद्ध | 1509 | पुर्तगाली बनाम गुजरात, मिस्र और कालीकट का संयुक्त बेड़ा | पुर्तगाली विजय; हिंद महासागर पर पुर्तगाली नियंत्रण |
सुवाली (स्वाली) का युद्ध | 1612 | अंग्रेज़ बनाम पुर्तगाली | अंग्रेज़ी विजय; सूरत में कोठी (1613) |
अम्बोयना की घटना | 1623 | डच बनाम अंग्रेज़ (इंडोनेशिया) | अंग्रेज़ों ने भारत पर ध्यान केंद्रित किया |
हुगली पर मुगल आक्रमण | 1632 | मुगल (शाहजहाँ) बनाम पुर्तगाली | पुर्तगाली बंगाल से निकाले गए |
कोलाचेल का युद्ध | 1741 | त्रावणकोर (मार्तंड वर्मा) बनाम डच | डचों की निर्णायक हार |
सेंट थोमे (अडयार) | 1746 | फ्रांसीसी (पैराडाइज़) बनाम कर्नाटक का नवाब (महफ़ूज़ ख़ाँ) | फ्रांसीसी विजय; यूरोपीय सेना की श्रेष्ठता सिद्ध |
अंबूर का युद्ध | 1749 | फ्रांसीसी + चंदा साहब बनाम नवाब अनवरुद्दीन | अनवरुद्दीन मारा गया |
अर्काट का घेरा | 1751 | क्लाइव (अंग्रेज़) बनाम चंदा साहब और फ्रांसीसी | अंग्रेज़ों की प्रतिष्ठा बढ़ी |
बेदरा (चिनसुरा) का युद्ध | 1759 | अंग्रेज़ बनाम डच | बंगाल से डच प्रभाव समाप्त |
वांडीवाश का युद्ध | 1760 | अंग्रेज़ (आयरकूट) बनाम फ्रांसीसी (लाली) | भारत में फ्रांसीसी चुनौती का अंत |
1707 में औरंगज़ेब की मृत्यु के समय लगभग पूरा भारत मुगलों के अधीन था। पर केवल लगभग 25 वर्षों (1730 तक) में मुगल बादशाह का प्रभाव दिल्ली और उसके आसपास तक सिमट गया। 1765 की इलाहाबाद की संधि में मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय ने अंग्रेज़ों का प्रभुत्व स्वीकार कर लिया। इतना बड़ा साम्राज्य इतनी जल्दी क्यों टूटा? इसके कई आंतरिक और बाहरी कारण थे। 18वीं सदी को इसीलिए भारतीय इतिहास का "संक्रमण काल" कहा जाता है: पुरानी व्यवस्था टूट रही थी और नई व्यवस्था अभी बनी नहीं थी।
1. औरंगज़ेब की धार्मिक नीति: हिंदू, सिख और शिया मुसलमानों के प्रति कठोर नीति; 1679 में जज़िया कर फिर से लगाया; मंदिर तोड़े गए। इससे राजपूतों जैसे पुराने सहयोगी दूर हो गए, जिनकी सहायता से मुगलों ने साम्राज्य बढ़ाया था। जाट, सतनामी, सिख और बुंदेला विद्रोह हुए।
2. दक्कन नीति की विफलता: औरंगज़ेब ने शासन के अंतिम लगभग 26 वर्ष (1681–1707) दक्कन में बिताए। बीजापुर (1686) और गोलकुंडा (1687) तो जीत लिए, पर मराठों को नहीं दबा सका। इससे ख़ज़ाना ख़ाली हुआ और उत्तर भारत का प्रशासन ढीला पड़ गया।
3. मराठा शक्ति का उदय: शिवाजी ने मराठों में ऐसी राष्ट्रीय भावना भरी कि औरंगज़ेब पूरी ताक़त लगाकर भी उन्हें नहीं दबा सका। पेशवाओं के समय मराठों ने दिल्ली के बादशाह को ही अपने हाथ की कठपुतली बना लिया। मराठा शक्ति के उदय को मुगल पतन का प्रमुख कारण माना जाता है।
4. अयोग्य उत्तराधिकारी: औरंगज़ेब के बाद के बादशाह अधिकतर विलासी, कमज़ोर और अकर्मण्य थे। उनके नैतिक पतन से साहस और वीरता घटी।
5. उत्तराधिकार का कोई निश्चित नियम नहीं: बड़ा बेटा ही राजा बनेगा, ऐसा नियम नहीं था। फ़ैसला तलवार से होता था। हर बादशाह की मृत्यु के बाद गृहयुद्ध छिड़ता था।
6. अमीरों (सरदारों) की गुटबाज़ी और पतन: दरबार ईरानी, तूरानी और हिंदुस्तानी गुटों में बँटा था। अमीर विलासी और स्वार्थी हो गए और बादशाह को कठपुतली बनाने में लगे रहे। सैयद बंधुओं (अब्दुल्ला ख़ाँ और हुसैन अली ख़ाँ) ने तो कई बादशाह बनाए और हटाए, इसलिए उन्हें "बादशाह-निर्माता" (King Makers) कहा गया।
7. आर्थिक पतन और जागीर संकट: शाहजहाँ की ख़र्चीली इमारतें, औरंगज़ेब के लंबे युद्ध और बाद के बादशाहों की विलासिता से ख़ज़ाना ख़ाली हो गया। अमीरों को देने के लिए अच्छी जागीरें (उपजाऊ भूमि) कम पड़ने लगीं और मनसबदारों की संख्या बढ़ती गई। इसे "जागीरदारी संकट" कहते हैं। अशांति से व्यापार घटा; दस्तक के दुरुपयोग से भी आय घटी।
8. सैन्य कमज़ोरी: मनसबदारी व्यवस्था बिगड़ गई; सेना पुरानी तकनीक पर निर्भर और अनुशासनहीन हो गई।
9. विदेशी आक्रमण: नादिर शाह (1739) और अहमद शाह अब्दाली (1748 से) के आक्रमणों ने सैनिक शक्ति, ख़ज़ाना और प्रतिष्ठा सब नष्ट कर दिए। मौका देखकर कई सूबेदार स्वतंत्र हो गए।
10. राष्ट्रीयता की भावना का अभाव: अधिकांश शासक अपनी प्रजा में एकता और राष्ट्रीय भावना नहीं भर सके।
11. यूरोपीय कंपनियों का आगमन: अंग्रेज़ों और फ्रांसीसियों ने मुगलों की कमज़ोरी का लाभ उठाया। अंततः ईस्ट इंडिया कंपनी ही मुगल पतन का अंतिम कारण बनी।
😢 ख़ाली ख़ज़ाने की एक घटना (1755) मुगलों की आर्थिक हालत इतनी बिगड़ गई थी कि 1755 में शाही रसोई में तीन दिन तक चूल्हा नहीं जला। भूख से परेशान शहज़ादियाँ पर्दा छोड़कर बाहर आ गईं और विरोध किया। बड़ी मुश्किल से उन्हें रनिवास में लौटाया गया। यह घटना दिखाती है कि कभी दुनिया का सबसे अमीर साम्राज्य कितना कंगाल हो चुका था। |

बादशाह | शासनकाल | मुख्य बातें |
बहादुर शाह प्रथम (मुअज़्ज़म / शाह आलम प्रथम) | 1707–1712 | उत्तराधिकार युद्ध जीतकर बादशाह बना; राजपूतों, मराठों (शाहू को छोड़ा) और सिखों से समझौते की नीति; इतिहासकार ख़फ़ी ख़ाँ ने उसे "शाह-ए-बेख़बर" कहा। |
जहाँदार शाह | 1712–1713 | वज़ीर ज़ुल्फ़िक़ार ख़ाँ के प्रभाव में; विलासी होने से "लम्पट मूर्ख" कहा गया; जज़िया हटाया। |
फ़र्रुख़सियर | 1713–1719 | सैयद बंधुओं की सहायता से गद्दी मिली; 1717 में अंग्रेज़ों को फ़रमान; 1716 में सिख नेता बंदा बहादुर को मृत्युदंड; 1719 में सैयद बंधुओं ने ही उसे हटाकर मरवा दिया। |
रफ़ी-उद-दरजात और रफ़ी-उद-दौला | 1719 | दोनों सैयद बंधुओं के कठपुतली; कुछ महीनों का शासन। |
मुहम्मद शाह "रंगीला" | 1719–1748 | नृत्य-संगीत में डूबा रहा; 1720 में सैयद बंधुओं का अंत; इसी के समय हैदराबाद, बंगाल, अवध स्वतंत्र हुए; 1739 में नादिर शाह का आक्रमण। |
अहमद शाह | 1748–1754 | अयोग्य; अहमद शाह अब्दाली के आक्रमण शुरू; 1752 में मराठों से सुरक्षा-संधि। |
आलमगीर द्वितीय | 1754–1759 | वज़ीर इमाद-उल-मुल्क का कठपुतली; उसी ने मरवाया। इसके समय प्लासी (1757) हुआ। |
शाह आलम द्वितीय (अली गौहर) | 1759–1806 | बक्सर (1764) में हारा; 1765 में कंपनी को दीवानी दी; 1772 में मराठों (महादजी सिंधिया) की सहायता से दिल्ली लौटा; 1803 के बाद अंग्रेज़ों का पेंशनभोगी। |
अकबर द्वितीय | 1806–1837 | अंग्रेज़ों के संरक्षण में नाममात्र का बादशाह; राममोहन राय को "राजा" की उपाधि देकर इंग्लैंड भेजा। |
बहादुर शाह द्वितीय "ज़फ़र" | 1837–1857 | अंतिम मुगल बादशाह; 1857 के विद्रोह में विद्रोहियों के नेता; रंगून (बर्मा) निर्वासित, वहीं 1862 में मृत्यु। |

◆ नादिर शाह ईरान (फ़ारस) का शासक था, जिसे उसकी सैनिक सफलताओं के कारण "ईरान का नेपोलियन" कहा जाता है। उसने मुगल बादशाह मुहम्मद शाह रंगीला के समय भारत पर आक्रमण किया।
◆ करनाल का युद्ध (24 फ़रवरी 1739, हरियाणा): केवल लगभग तीन घंटे में मुगल सेना हार गई। ख़ान-ए-दौरान मारा गया, अवध का सआदत ख़ाँ बंदी बना और निज़ाम-उल-मुल्क लगभग निष्क्रिय रहा।
◆ दिल्ली का कत्लेआम (मार्च 1739): दिल्ली में नादिर शाह के सैनिकों की हत्या की अफ़वाह फैलने पर 22 मार्च 1739 को भीषण नरसंहार हुआ, जिसे "नादिरशाही कत्लेआम" कहा जाता है।
◆ लूट: शाहजहाँ का मयूर सिंहासन (तख़्त-ए-ताऊस), कोहिनूर हीरा और लगभग 70 करोड़ रुपये का धन वह ईरान ले गया।
◆ क्षेत्र: सिंधु नदी के पश्चिम का सारा मुगल क्षेत्र (काबुल आदि) उसके साम्राज्य में मिला।
◆ परिणाम: मुगलों की प्रतिष्ठा पूरी तरह नष्ट, ख़ज़ाना ख़ाली, सैन्य कमज़ोरी उजागर; मराठों और दूसरी क्षेत्रीय शक्तियों का हौसला बढ़ा। उत्तर-पश्चिम का मार्ग अफ़गानों के लिए खुल गया।
◆ 1747 में नादिर शाह की हत्या के बाद उसका एक सेनापति अहमद शाह अब्दाली (अहमद शाह दुर्रानी) अफ़गानिस्तान का शासक बना। उसने 1748 से 1767 के बीच भारत पर कई बार (प्रायः आठ बार माने जाते हैं) आक्रमण किए।
वर्ष | घटना |
1748 | पहला आक्रमण; मनुपुर (सरहिंद के पास) में मुगल सेना (शहज़ादा अहमद और मीर मन्नू) ने उसे हराया। |
1749–1752 | पंजाब पर बार-बार हमले; 1752 तक पंजाब और मुल्तान उसके अधीन। 1752 में मुगल बादशाह ने मराठों से सुरक्षा-संधि की: मराठे बाहरी और भीतरी शत्रुओं से मुगलों की रक्षा करेंगे। |
1757 | दिल्ली, मथुरा और वृंदावन में भारी लूट; रुहेला सरदार नजीबुद्दौला को दिल्ली में अपना प्रतिनिधि बनाकर लौटा; लाहौर और पश्चिमोत्तर क्षेत्र अपने अधिकार में लिए। |
1758 | पेशवा के भाई रघुनाथ राव (राघोबा) ने नजीबुद्दौला को हटाया, लाहौर जीता और अब्दाली के पुत्र को पंजाब से निकाला; मराठे अटक तक पहुँचे। |
1759–1761 | अब्दाली फिर आया, मराठों को पंजाब से खदेड़ा और पानीपत का तीसरा युद्ध (1761) हुआ। |
1767 | अंतिम आक्रमण; सिखों के प्रतिरोध के कारण पंजाब पर पकड़ नहीं रख सका। |
पहलू | विवरण |
तिथि और स्थान | 14 जनवरी 1761 (मकर संक्रांति), पानीपत (हरियाणा) |
पक्ष | अहमद शाह अब्दाली + रुहेला सरदार नजीबुद्दौला + अवध का नवाब शुजाउद्दौला बनाम मराठा |
मराठा सेनापति | पेशवा बालाजी बाजीराव के चचेरे भाई सदाशिवराव भाऊ और पेशवा के पुत्र विश्वासराव; तोपख़ाना इब्राहिम ख़ाँ गार्दी के अधीन |
परिणाम | प्रारंभिक सफलता के बाद मराठों की निर्णायक पराजय; सदाशिवराव भाऊ और विश्वासराव वीरगति को प्राप्त हुए; हज़ारों सैनिक मारे गए। यह सदमा पेशवा सह नहीं सका और जून 1761 में उसकी मृत्यु हो गई। |
जाट और राजपूत | भरतपुर के सूरजमल ने भाऊ की सेना के लिए रसद (खाद्य सामग्री) की व्यवस्था की, पर युद्ध-नीति पर मतभेद के कारण अलग हो गए; राजपूत तटस्थ रहे। पराजय के बाद लगभग एक लाख मराठे भरतपुर आए, सूरजमल ने उनके भोजन-वस्त्र की व्यवस्था की। |
◆ दोषपूर्ण सैन्य संगठन और अनुशासन की कमी; भारी सामान और परिवारों के साथ चलती सेना; रसद (भोजन) की भारी कमी, जबकि अब्दाली की सेना को रोहिल्लों और अवध से सहायता मिली।
◆ भारतीय शक्तियों में एकता का अभाव: मराठों ने उत्तर भारत में केवल चौथ और सरदेशमुखी वसूलने पर ध्यान दिया, जिससे जाट, राजपूत और सिख नाराज़ थे; इसलिए इनका सहयोग नहीं मिला और कुछ शासकों ने तो अब्दाली की सहायता की।
◆ अब्दाली की घुड़सवार सेना और कूटनीति श्रेष्ठ थी; भाऊ और मल्हारराव होल्कर जैसे सरदारों में युद्ध-नीति पर मतभेद।
◆ उत्तर भारत में मराठा शक्ति को गहरा आघात; दिल्ली से पूरे देश पर शासन का मराठा सपना टूटा। हालांकि बाद में पेशवा माधवराव प्रथम और महादजी सिंधिया के नेतृत्व में मराठों ने फिर शक्ति प्राप्त की।
◆ मुगल और कमज़ोर हुए; अफ़गान भी पंजाब पर टिक नहीं सके, जिससे सिख शक्ति का विकास हुआ।
◆ उत्तर भारत में शक्ति-शून्यता पैदा हुई, जिसका सबसे बड़ा लाभ अंग्रेज़ों को मिला। इसी वर्ष (1761) दक्षिण में फ्रांसीसी पांडिचेरी भी हार चुके थे। यदि मराठे पानीपत न हारते, तो अंग्रेज़ों को इतनी जल्दी आगे बढ़ने का साहस नहीं होता।
🧠 याद रखें: पानीपत के तीनों युद्ध प्रथम (1526): बाबर बनाम इब्राहिम लोदी → भारत में मुगल सत्ता की स्थापना। द्वितीय (1556): अकबर (बैरम ख़ाँ) बनाम हेमू → मुगल सत्ता की पुनर्स्थापना। तृतीय (1761): अहमद शाह अब्दाली बनाम मराठा → मराठों की हार, अंग्रेज़ों का रास्ता साफ़। |
मुगल साम्राज्य के कमज़ोर होते ही अलग-अलग क्षेत्रों में स्वतंत्र सत्ताएँ उभरीं। इन्हें मोटे तौर पर तीन श्रेणियों में बाँटा जाता है:
श्रेणी | अर्थ | उदाहरण |
उत्तराधिकारी राज्य (Successor States) | मुगल सूबेदारों ने अपने प्रांत को धीरे-धीरे स्वतंत्र बना लिया, पर बादशाह से औपचारिक संबंध बनाए रखे और मुगल प्रशासनिक ढाँचा चलाते रहे। | हैदराबाद, बंगाल, अवध |
विद्रोही / नए राज्य | मुगल सत्ता के विरुद्ध विद्रोह से पैदा हुई शक्तियाँ। | मराठा, सिख, जाट, (अफ़गान रुहेले और बंगश) |
स्वतंत्र / स्थानीय राज्य | जो पहले से अलग थे या स्थानीय आधार पर स्वतंत्र रूप से उभरे। | मैसूर, केरल (त्रावणकोर), राजपूत राज्य |
🔍 आसान परिभाषा: उत्तराधिकारी राज्य (Successor State) |
📘 परिभाषा: ऐसा राज्य जो किसी बड़े साम्राज्य के प्रांत से निकलकर बना हो, जिसके शासक पहले उस साम्राज्य के अधिकारी (सूबेदार) थे और जिन्होंने स्वतंत्र होने के बाद भी पुराने साम्राज्य की व्यवस्था और औपचारिक निष्ठा बनाए रखी। |
💡 आसान भाषा में: मुगल सूबेदार "नाम के लिए" बादशाह को मानते रहे, सिक्के और खुतबा (प्रार्थना) बादशाह के नाम से चलता रहा, पर असली राज अपना चलाने लगे। 🏠 उदाहरण: जैसे किसी बड़ी कंपनी का ब्रांच मैनेजर कंपनी का बोर्ड तो ऑफ़िस में लगाए रखे, पर सारे फ़ैसले, कमाई और कर्मचारी अपने हिसाब से चलाए और मुख्यालय को पैसा भेजना बंद कर दे। |

◆ संस्थापक: चिनकिलिच ख़ाँ, जिसे निज़ाम-उल-मुल्क आसफ़जाह की उपाधि मिली थी। औरंगज़ेब के समय वह प्रभावशाली मनसबदार था और बाद में मुगल वज़ीर भी रहा।
◆ 1724 में शकरखेड़ा के युद्ध में मुगल सूबेदार मुबारिज़ ख़ाँ को हराकर वह व्यावहारिक रूप से स्वतंत्र हो गया। उसने दक्षिण के छह मुगल सूबों को मिलाकर हैदराबाद राज्य बनाया।
◆ उसने बादशाह के प्रति औपचारिक निष्ठा बनाए रखी पर स्वतंत्र शासन किया। कर्नाटक का नवाब भी सिद्धांततः निज़ाम के अधीन था।
◆ उसकी विस्तार योजना मराठों ने रोकी: 1728 में पालखेड़ के युद्ध में पेशवा बाजीराव प्रथम ने उसे हराया। बाद में हैदराबाद के निज़ाम ने अंग्रेज़ों से सहायक संधि (1798) कर ली।
◆ संस्थापक: मुर्शिद कुली ख़ाँ। वह 1700 में बंगाल का दीवान, 1713 में उप-सूबेदार और 1717 में पूर्ण सूबेदार बना। उसके अधीन बंगाल, बिहार और उड़ीसा थे।
◆ उसने राजधानी ढाका से मुर्शिदाबाद स्थानांतरित की, इजारेदारी (लगान वसूली का ठेका देने की) व्यवस्था चलाई, किसानों को तकावी ऋण दिए और खर्च घटाकर मुगल दरबार को नियमित नज़राना भेजा।
◆ उत्तराधिकारी: दामाद शुजाउद्दीन (1727–1739) → सरफ़राज़ ख़ाँ (1739–1740) → अलीवर्दी ख़ाँ (1740–1756)। अलीवर्दी ने गिरिया के युद्ध (1740) में सरफ़राज़ को हराकर गद्दी ली और बादशाह से फ़रमान ले लिया।
◆ अलीवर्दी को लंबे समय तक मराठा आक्रमण झेलने पड़े; अंततः 1751 में उड़ीसा का बड़ा भाग और बंगाल की चौथ देकर मराठों से समझौता करना पड़ा। उसने अंग्रेज़ों और फ्रांसीसियों को किलेबंदी की अनुमति नहीं दी।
◆ 1756 में अलीवर्दी की मृत्यु के बाद उसका नाती सिराजुद्दौला नवाब बना, जिसे 1757 में प्लासी में अंग्रेज़ों ने हराया। बंगाल से ही भारत में अंग्रेज़ी सत्ता की स्थापना हुई।
◆ संस्थापक: सआदत ख़ाँ "बुरहान-उल-मुल्क" (मूल नाम मीर मुहम्मद अमीन), जो 1722 में अवध का सूबेदार बना। उसने विद्रोही ज़मींदारों को दबाया और 1723 में नया भूमि-बंदोबस्त किया। वह फ़ारसी (शिया) मूल का था।
◆ उसने मुगल दरबार में निज़ाम का प्रभाव घटाने के लिए नादिर शाह से संपर्क किया, पर दाँव उल्टा पड़ा और 1739 में उसने आत्महत्या कर ली।
◆ उसके बाद भतीजा और दामाद सफ़दरजंग (1739–1754) नवाब बना, जो मुगल साम्राज्य का वज़ीर भी रहा। (दिल्ली का सफ़दरजंग मकबरा उसी का है।)
◆ फिर उसका पुत्र शुजाउद्दौला (1754–1775) नवाब बना। उसने पानीपत (1761) में अब्दाली का साथ दिया और बक्सर (1764) में अंग्रेज़ों से हारा। इलाहाबाद की संधि (1765) के बाद अवध कंपनी पर आश्रित "मध्यवर्ती (बफ़र) राज्य" बन गया।
◆ राजधानी पहले फ़ैज़ाबाद, बाद में आसफ़ुद्दौला (1775–97) के समय लखनऊ। आगे 1801 में वेलेज़ली ने अवध से सहायक संधि की और 1856 में डलहौज़ी ने अवध को ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया।
◆ मराठा राज्य की स्थापना शिवाजी (1627/30–1680) ने की। 1707 में मुगलों ने शिवाजी के पोते शाहू को कैद से छोड़ा; इसके बाद ताराबाई और शाहू के बीच गृहयुद्ध हुआ, जिसमें शाहू विजयी रहा।
◆ 18वीं सदी के पूर्वार्द्ध में छत्रपति के स्थान पर पेशवा (प्रधानमंत्री) अधिक शक्तिशाली हो गए और यह पद वंशानुगत बन गया।
पेशवा | कार्यकाल | प्रमुख कार्य |
बालाजी विश्वनाथ | 1713–1720 | पहला प्रभावशाली पेशवा; 1719 में सैयद बंधुओं से समझौता कर दक्कन के छह सूबों में चौथ और सरदेशमुखी वसूलने का अधिकार पाया। |
बाजीराव प्रथम | 1720–1740 | सबसे महान सेनानायक; "हिंदू पद पादशाही" का विचार; मालवा, गुजरात, बुंदेलखंड तक विस्तार; पालखेड़ (1728) में निज़ाम को हराया; 1737 में दिल्ली तक धावा; 1739 में पुर्तगालियों से बसीन छीना (चिमाजी अप्पा द्वारा)। |
बालाजी बाजीराव (नाना साहब) | 1740–1761 | मराठा प्रभाव भारत के अधिकांश भागों में; 1752 तक मुगल बादशाह और वज़ीर मराठों के नियंत्रण में; पानीपत (1761) की हार। |
माधवराव प्रथम | 1761–1772 | पानीपत के बाद मराठा शक्ति को पुनर्जीवित किया। |
◆ मराठा संघ (Maratha Confederacy): पेशवा (पुणे) के नेतृत्व में शक्तिशाली सरदार: गायकवाड़ (बड़ौदा), भोंसले (नागपुर), होल्कर (इंदौर), सिंधिया (ग्वालियर)। पेशवा सहित इन्हें पाँच प्रमुख मराठा शक्तियाँ कहा जाता था।
◆ कमज़ोरी: मराठों में मुगलों की जगह लेने की क्षमता थी, पर उन्होंने ज़्यादातर चौथ और सरदेशमुखी वसूलने पर ध्यान दिया और उत्तर के राजपूत राज्यों से अच्छे संबंध नहीं बनाए। बाद में अंग्रेज़ों ने तीन आंग्ल-मराठा युद्धों में उन्हें अधीन कर लिया (अगला अध्याय)।
🔍 आसान परिभाषा: चौथ और सरदेशमुखी |
📘 परिभाषा: चौथ = किसी क्षेत्र की भू-राजस्व आय का एक-चौथाई (25%), जो मराठे उस क्षेत्र को अपने आक्रमणों से बचाने (सुरक्षा) के बदले लेते थे। सरदेशमुखी = अतिरिक्त दसवाँ भाग (10%), जिसे मराठा राजा अपने को उस क्षेत्र का "सर-देशमुख" (सबसे बड़ा वंशानुगत मुखिया) मानकर लेता था। |
💡 आसान भाषा में: चौथ = "हमें चौथाई दो, हम तुम पर हमला नहीं करेंगे और दूसरों से बचाएँगे"; सरदेशमुखी = "हम तुम्हारे सबसे बड़े मुखिया हैं, इसलिए 10% और"। 🏠 उदाहरण: जैसे किसी मोहल्ले का ताक़तवर पहलवान दुकानदारों से कहे कि अपनी कमाई का एक-चौथाई मुझे दो, मैं दुकान की सुरक्षा करूँगा; और ऊपर से 10% अलग से, क्योंकि मैं पूरे मोहल्ले का मुखिया हूँ। |
◆ मैसूर पर परंपरागत रूप से वाडियार (वोडेयार) वंश का शासन था (1612 से)। 18वीं सदी में असली शक्ति मंत्रियों (नंजराज और देवराज) के हाथ में आ गई।
◆ हैदर अली (जन्म लगभग 1721–22) एक साधारण सैनिक से फ़ौजदार (डिंडीगुल) बना और 1761 में मैसूर का वास्तविक शासक बन गया; वाडियार राजा नाममात्र के रह गए। उसने फ्रांसीसी विशेषज्ञों की सहायता से डिंडीगुल में आधुनिक शस्त्रागार बनाया और सेना को पश्चिमी ढंग से प्रशिक्षित किया।
◆ उसके पुत्र टीपू सुल्तान (1782–1799) को "शेर-ए-मैसूर" कहा गया। मैसूर और अंग्रेज़ों के बीच चार युद्ध (1767–69, 1780–84, 1790–92, 1799) हुए, जिनका विस्तृत अध्ययन अगले अध्याय में है। 1799 में टीपू श्रीरंगपट्टनम की रक्षा करते हुए शहीद हुआ।
◆ मार्तंड वर्मा (1729–1758) ने छोटे-छोटे सामंतों को जीतकर त्रावणकोर को शक्तिशाली राज्य बनाया; राजधानी त्रिवेंद्रम (तिरुवनंतपुरम)।
◆ 1741 में कोलाचेल के युद्ध में डचों को हराया; यूरोपीय ढंग से सेना बनाई और काली मिर्च के व्यापार पर नियंत्रण किया। उसके उत्तराधिकारी राम वर्मा के समय त्रिवेंद्रम संस्कृत और मलयालम विद्या का केंद्र बना।
◆ सिख धर्म की स्थापना गुरु नानक देव (1469–1539) ने की। दसवें गुरु गुरु गोविंद सिंह (1666–1708) ने 1699 में ख़ालसा पंथ की स्थापना करके सिखों को सैनिक शक्ति में बदला।
◆ उनके बाद बंदा बहादुर (बंदा सिंह बहादुर) ने मुगलों के विरुद्ध लंबा संघर्ष किया और अपने नाम से सिक्के भी चलाए। 1716 में फ़र्रुख़सियर के समय उसे पकड़कर मार डाला गया।
◆ 1748 में दल ख़ालसा बना। अब्दाली के आक्रमणों के समय सिखों ने पंजाब में उसे टिकने नहीं दिया। पूरा पंजाब सिख सरदारों के 12 मिस्लों (संघों) में बँट गया; सबसे शक्तिशाली सुकरचकिया मिस्ल थी।
◆ रणजीत सिंह (1780–1839), सुकरचकिया मिस्ल के नेता, ने 1799 में लाहौर जीता, 1801 में पंजाब के महाराजा बने और मिस्लों को मिलाकर एक शक्तिशाली स्वतंत्र सिख राज्य बनाया।
◆ जाट मुख्यतः किसान समुदाय थे, जो दिल्ली, आगरा और मथुरा के आसपास रहते थे। औरंगज़ेब की धार्मिक और दमनकारी नीतियों के विरुद्ध 1669 में गोकुल के नेतृत्व में पहला बड़ा जाट विद्रोह हुआ। बाद में राजाराम और चूड़ामन ने नेतृत्व संभाला।
◆ चूड़ामन के भतीजे बदन सिंह ने डीग, कुम्हेर, भरतपुर और वैर में मज़बूत क़िले बनवाए। बदन सिंह भरतपुर का पहला शासक माना जाता है।
महाराजा सूरजमल (1756–1763): जाट शक्ति का चरमोत्कर्ष | विवरण |
उपाधि | बुद्धिमत्ता और राजनीतिक कुशलता के कारण "जाट जाति का प्लेटो (Plato)" कहा गया |
प्रमुख उपलब्धियाँ | 1732 में भरतपुर क़िले का निर्माण शुरू; 1745 में मुगल बादशाह और रुहेलों को हराया; 1754 में अपनी कूटनीति से मुगल–मराठा संयुक्त सेना को कुम्हेर से लौटा दिया; 1756 में अलवर को अधीन किया; 1761 में आगरा पर अधिकार। |
पानीपत (1761) | भाऊ की सेना के लिए रसद दी, पर युद्ध से अलग रहा; हार के बाद लगभग एक लाख मराठों को भोजन और वस्त्र दिए; तटस्थ नीति से राज्य को अब्दाली के क्रोध से बचाया। |
राज्य-विस्तार | पूर्व में आगरा–एटा, दक्षिण में धौलपुर–चंबल, उत्तर में मथुरा–अलीगढ़ तक; पंजाब और हरियाणा की ओर भी प्रभाव। |
मृत्यु | 25 दिसंबर 1763 को हिंडन नदी के किनारे मुगलों (नजीबुद्दौला) से संघर्ष में। इसके बाद जाट शक्ति कमज़ोर हुई। |
बाद की घटना | भरतपुर के शासक रणजीत सिंह ने अंग्रेज़ों के विरुद्ध यशवंतराव होल्कर की सहायता की (1805 में लॉर्ड लेक का भरतपुर घेरा असफल रहा); बाद में भरतपुर ने अंग्रेज़ों से संधि कर ली। |
मुगलों की कमज़ोरी का लाभ उठाकर राजपूत शासकों ने भी अपना प्रभाव बढ़ाना शुरू किया, पर वे आपसी गृहयुद्धों में उलझ गए और मराठों की विस्तारवादी नीति ने स्थिति और बिगाड़ दी।
राज्य | शासक और घटनाएँ |
आमेर (जयपुर) | सवाई जयसिंह द्वितीय (1700–1743): मुगलों और मराठों दोनों से घनिष्ठ संबंध; मालवा (और आगरा) की सूबेदारी; 18 नवंबर 1727 को जयपुर शहर बसाया (वास्तुकार विद्याधर भट्टाचार्य); पाँच स्थानों पर वेधशालाएँ (जंतर-मंतर): दिल्ली, जयपुर, उज्जैन, मथुरा और वाराणसी; अश्वमेध यज्ञ करवाया। बूँदी के उत्तराधिकार विवाद में जयसिंह के हस्तक्षेप से मराठों का राजस्थान में प्रवेश हुआ। |
मारवाड़ (जोधपुर) | अजीत सिंह ने औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद जोधपुर को मुगलों से छीनकर पूरे मारवाड़ पर अधिकार किया; बाद में मुगल दरबार में प्रभाव बढ़ाया और गुजरात का सूबेदार बना। बादशाह फ़र्रुख़सियर को गद्दी से हटाने में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। बाद में उत्तराधिकार को लेकर गृहयुद्ध। |
मेवाड़ (उदयपुर) | अमर सिंह द्वितीय ने जयसिंह को आमेर और अजीत सिंह को जोधपुर दिलाने में सहायता की (1708 का राजपूत गठबंधन)। कालांतर में मेवाड़ भी गृहयुद्धों में उलझ गया। |
◆ अली मुहम्मद ख़ाँ ने नादिर शाह के आक्रमण के बाद फैली अव्यवस्था का लाभ उठाकर रुहेलखंड में स्वतंत्र सत्ता बनाई। यह उपजाऊ क्षेत्र गंगा तट से कुमाऊँ की पहाड़ियों तक फैला था; राजधानी पहले आँवला, बाद में रामपुर / बरेली क्षेत्र। रुहेलों का जाटों, मराठों और अवध से लगातार संघर्ष चलता था।
◆ मुहम्मद ख़ाँ बंगश ने फ़र्रुख़ाबाद (आगरा–इलाहाबाद के बीच) में स्वतंत्र अफ़गान राज्य बनाया।
◆ रुहेले और अफ़गान पठान भी अब्दाली को भारत पर आक्रमण के लिए उकसाते थे; रुहेला सरदार नजीबुद्दौला पानीपत में अब्दाली का मुख्य सहयोगी था।
राज्य | संस्थापक / प्रमुख शासक | वर्ष | राजधानी | अंत / अंग्रेज़ों से संबंध |
हैदराबाद | निज़ाम-उल-मुल्क आसफ़जाह | 1724 | हैदराबाद (औरंगाबाद भी) | सहायक संधि 1798 |
बंगाल | मुर्शिद कुली ख़ाँ | 1717 | मुर्शिदाबाद | प्लासी 1757, बक्सर 1764 |
अवध | सआदत ख़ाँ बुरहान-उल-मुल्क | 1722 | फ़ैज़ाबाद → लखनऊ | सहायक संधि 1801; विलय 1856 |
मराठा | शिवाजी; पेशवा बालाजी विश्वनाथ, बाजीराव | 1674 / 1713 | रायगढ़ → सतारा → पुणे | तीन आंग्ल-मराठा युद्ध; 1818 अंत |
मैसूर | हैदर अली, टीपू सुल्तान | 1761 | श्रीरंगपट्टनम | चार युद्ध; 1799 अंत |
त्रावणकोर | मार्तंड वर्मा | 1729 | त्रिवेंद्रम | सहायक संधि 1795 |
सिख | बंदा बहादुर; रणजीत सिंह | 1799 / 1801 | लाहौर | दो आंग्ल-सिख युद्ध; विलय 1849 |
जाट | बदन सिंह, सूरजमल | 1756 (सूरजमल) | भरतपुर | संधि (1805 के बाद) |
रुहेलखंड | अली मुहम्मद ख़ाँ | 1740 के दशक | आँवला / बरेली | रुहेला युद्ध 1774 |
◆ कृषि-प्रधान अर्थव्यवस्था: किसान ज़मींदारों और राज्य दोनों को कर देते थे। कृषि तकनीक पुरानी थी, पर भारत अपनी ज़रूरत का अनाज स्वयं पैदा करता था।
◆ उन्नत हस्तशिल्प और उद्योग: ढाका की मलमल, बनारस के रेशमी वस्त्र, मुर्शिदाबाद का रेशम, राजस्थान की छपाई (रंगाई-छपाई), गुजरात के वस्त्र। बंगाल और दक्षिण भारत के कपड़े पूरी दुनिया में प्रसिद्ध थे।
◆ विदेशी व्यापार: भारत सूती वस्त्र, मसाले, नील, शोरा, रेशम और चीनी निर्यात करता था। यूरोपीय व्यापारियों के पास बदले में बेचने के लिए कुछ ख़ास नहीं था, इसलिए वे सोना-चाँदी देकर माल ख़रीदते थे। इससे भारत के पक्ष में व्यापार-संतुलन था। सूरत, मुर्शिदाबाद, हुगली, मसुलीपट्टनम प्रमुख व्यापारिक केंद्र थे।
◆ आर्थिक संकट: लगातार युद्धों, विदेशी आक्रमणों, लूट और जागीर व्यवस्था की विफलता से अर्थव्यवस्था चरमराई। 18वीं सदी के उत्तरार्द्ध में अंग्रेज़ी नीतियों ने भारतीय व्यापार को बुरी तरह प्रभावित किया।
◆ समाज में हिंदू और मुस्लिम दोनों रहते थे और कई रीति-रिवाज समान थे; गाँवों में आपसी मेलजोल था। जातियाँ व्यवसाय पर आधारित थीं।
◆ समाज मोटे तौर पर दो वर्गों में बँटा था: अमीर (संपन्न) वर्ग और जनसाधारण।
◆ कठोर जाति व्यवस्था, छुआछूत और ऊँच-नीच का भेदभाव व्यापक था।
◆ महिलाओं की स्थिति: सती प्रथा, पर्दा प्रथा, बाल विवाह, विधवाओं की दयनीय दशा; शिक्षा केवल कुछ उच्च वर्गीय महिलाओं तक सीमित।
◆ शिक्षा: पाठशालाएँ, मदरसे और मकतब; मुख्यतः उच्च वर्ग तक सीमित; पश्चिमी शिक्षा अभी नहीं आई थी।
मुगल दरबार के कमज़ोर होने पर कलाकार क्षेत्रीय दरबारों की ओर चले गए, इसलिए कला का विस्तार देश के कई भागों में तेज़ी से हुआ।
क्षेत्र | उदाहरण |
चित्रकला | कांगड़ा (पहाड़ी) और राजपूत चित्रकला शैलियों में नई विशेषताएँ आईं। |
स्थापत्य (राजपूत-जाट) | जाट शासकों ने डीग के महल बनवाए; सवाई जयसिंह ने जयपुर शहर और पाँच जंतर-मंतर। |
स्थापत्य (अन्य) | लखनऊ का बड़ा इमामबाड़ा (1784), नवाब आसफ़ुद्दौला द्वारा; दिल्ली का सफ़दरजंग मकबरा। |
संगीत और ग्रंथ | क्षेत्रीय दरबारों में संगीत को संरक्षण; लखनऊ में ठुमरी और कथक का विकास। |
साहित्य | पंजाब में वारिस शाह ने "हीर-राँझा" लिखा; उर्दू शायरी का स्वर्णकाल: मीर तक़ी मीर, सौदा, दर्द; भारत की अन्य भाषाओं में भी कई ग्रंथ रचे गए। |
18वीं सदी में भारत की कमज़ोर राजनीतिक दशा अंग्रेज़ों की सफलता का सबसे बड़ा कारण थी। साथ ही अंग्रेज़ों की अपनी कुछ विशेषताओं ने भी उन्हें सफल बनाया:
भारत की कमज़ोरी | अंग्रेज़ों की ताक़त |
मुगल साम्राज्य का पतन; केंद्र में राजनीतिक शून्यता | संगठित, अनुशासित सेना; आधुनिक हथियार और तोपख़ाना |
क्षेत्रीय शक्तियों में आपसी लड़ाई; "फूट डालो" के लिए उपजाऊ ज़मीन | मज़बूत नौसेना और समुद्री व्यापार पर नियंत्रण |
आर्थिक संकट और ख़ाली राजकोष | कंपनी की वित्तीय शक्ति; बंगाल के राजस्व पर नियंत्रण (1765 के बाद) |
विदेशी आक्रमणों (नादिर शाह, अब्दाली) से थकी जनता और सेनाएँ | कूटनीतिक चतुराई: "फूट डालो और राज करो"; एक-एक शक्ति को अलग-अलग हराया |
जाति, धर्म और क्षेत्र के आधार पर एकता का अभाव; राष्ट्रीय भावना नहीं | ब्रिटेन की औद्योगिक क्रांति से आर्थिक और तकनीकी श्रेष्ठता; राष्ट्रवाद की भावना |
पुरानी सैन्य व्यवस्था; घुड़सवार सेना पर निर्भरता | योग्य नेतृत्व: क्लाइव, वारेन हेस्टिंग्स, वेलेज़ली, आयरकूट आदि |
भारतीय सेनाओं में निष्ठा का संकट; धन के लालच में विश्वासघात (जैसे प्लासी में मीर जाफ़र) | भारतीय सैनिकों (सिपाहियों) को यूरोपीय ढंग से प्रशिक्षित कर उन्हीं से भारत जीता |
मुगल साम्राज्य के सभी प्रांतों में बंगाल सबसे समृद्ध था। यहाँ के कपड़े, रेशम, शोरा और चीनी का व्यापार तथा भारी भू-राजस्व कंपनी को बहुत आकर्षित करते थे। 1717 के फ़रमान के बाद कंपनी का बंगाल से सीधा संबंध और हस्तक्षेप बढ़ गया। आगे की पूरी कहानी को नीचे के प्रवाह-चार्ट से एक नज़र में समझ लें:

नवाब | शासनकाल | विशेषता |
मुर्शिद कुली ख़ाँ | 1717–1727 | बंगाल को व्यावहारिक रूप से स्वतंत्र बनाया; इजारेदारी व्यवस्था; राजधानी मुर्शिदाबाद। |
शुजाउद्दीन (शुजा-उद-दीन) | 1727–1739 | मुर्शिद कुली ख़ाँ का दामाद; अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण शासन; बंगाल की समृद्धि बढ़ी। |
सरफ़राज़ ख़ाँ | 1739–1740 | गिरिया के युद्ध (1740) में अलीवर्दी ख़ाँ द्वारा पराजित और मारा गया। |
अलीवर्दी ख़ाँ | 1740–1756 | मज़बूत शासक; मराठा आक्रमण झेले; अंग्रेज़ों और फ्रांसीसियों को किलेबंदी की अनुमति नहीं दी। उसने यूरोपीयों की तुलना मधुमक्खियों से की थी: "छेड़ो नहीं तो शहद देती हैं, छेड़ो तो डंक मारकर मार डालती हैं।" |
सिराजुद्दौला | 1756–1757 | अलीवर्दी का नाती; बंगाल का अंतिम स्वतंत्र नवाब; प्लासी में मीर जाफ़र के विश्वासघात का शिकार। |
1. राजनीतिक कारण (षड्यंत्र): सिराज के विरोधी, जैसे उसकी मौसी घसीटी बेगम, पूर्णिया का शौकत जंग और दीवान राजवल्लभ, उसे हटाने का षड्यंत्र रच रहे थे। अंग्रेज़ मानते थे कि नवाब भावी संघर्ष में हार जाएगा, इसलिए उन्होंने विरोधियों का साथ दिया। कंपनी एक कठपुतली नवाब चाहती थी जो आसानी से रियायतें दे।
2. नवाब के प्रति अशिष्टता: भारत में राज्याभिषेक के अवसर पर सम्मान के लिए भेंट (नज़राना) दी जाती थी। सिराज के गद्दी पर बैठने पर अंग्रेज़ों ने न भेंट दी, न उपस्थित हुए। नवाब ने कासिम बाज़ार की कोठी देखने की इच्छा जताई तो अंग्रेज़ों ने मना कर दिया।
3. दस्तक का दुरुपयोग (व्यापारिक झगड़ा): 1717 के फ़रमान से मिली चुंगी-मुक्ति केवल कंपनी के माल के लिए थी, पर कंपनी के कर्मचारी अपने निजी व्यापार पर भी दस्तक का प्रयोग करते थे और उसे भारतीय व्यापारियों को बेच भी देते थे। इससे नवाब के राजस्व को भारी हानि होती थी।
4. किलेबंदी और आदेश की अवहेलना: यूरोप में सप्तवर्षीय युद्ध की आशंका में अंग्रेज़ और फ्रांसीसी अपनी बस्तियों की किलेबंदी कर रहे थे। नवाब के मना करने पर फ्रांसीसियों ने बात मान ली, पर अंग्रेज़ों ने कलकत्ता (फोर्ट विलियम) की किलेबंदी जारी रखी। नवाब ने लिखा था: "तुम व्यापारी हो, तुम्हें किले की क्या आवश्यकता? मेरी सुरक्षा में रहते हुए तुम्हें किसी शत्रु का भय नहीं होना चाहिए।"
5. नवाब के शत्रुओं को शरण: राजवल्लभ के पुत्र कृष्णदास (कृष्णवल्लभ), जो नवाब का धन लेकर भागा था, को अंग्रेज़ों ने कलकत्ता में शरण दी और माँगने पर लौटाने से मना कर दिया।
6. नवाबों की लंबी शिकायत: कंपनी नज़राना नहीं देती थी, सिक्के ढालने का अधिकार माँगती थी, अपमानजनक पत्र लिखती थी और गाँव ख़रीदकर बस्तियाँ बढ़ाती थी। नवाबों के अनुसार इससे उनका राजस्व और सत्ता दोनों कमज़ोर हो रहे थे।
❝ जब वे पहली बार हमारे देश में आए थे तो उन्होंने विनती करते हुए कहा था कि उन्हें एक फ़ैक्टरी बनाने के लिए थोड़ी-सी ज़मीन दे दी जाए। ज़मीन तो मिल गई, पर उन्होंने वहाँ मज़बूत क़िला ही खड़ा कर डाला, चारों ओर नदी से जुड़ी खाइयाँ बना दीं और दीवारों पर न जाने कितनी तोपें तैनात कर दीं… वे असंख्य औरतों और मर्दों को उनके ही देश में ग़ुलाम बनाकर लूट रहे हैं। ❞ (बंगाल के नवाब की अंग्रेज़ व्यापारियों के बारे में शिकायत, 1733 (भावानुवाद)) |
◆ 4 जून 1756: नवाब ने लगभग 30,000 सैनिकों के साथ अंग्रेज़ों की कासिम बाज़ार कोठी पर कब्ज़ा किया; अफ़सर गिरफ़्तार, गोदाम पर ताला, हथियार ज़ब्त।
◆ 15–20 जून 1756: नवाब की सेना ने फोर्ट विलियम (कलकत्ता) को घेरकर जीत लिया। गवर्नर ड्रेक और कई अंग्रेज़ अधिकारी भागकर फुल्टा द्वीप चले गए। नवाब ने कलकत्ता का नाम "अलीनगर" रखा।
◆ जे. ज़ेड. हॉलवेल (J. Z. Holwell), जो बचे हुए लोगों में से एक था, के अनुसार 20 जून 1756 की रात 146 अंग्रेज़ बंदियों को फोर्ट विलियम की लगभग 18 फुट लंबी और 14 फुट 10 इंच चौड़ी एक छोटी कोठरी में बंद किया गया। अगली सुबह केवल 23 जीवित निकले; 123 दम घुटने से मर गए।
◆ विवाद: अधिकांश इतिहासकार इस कहानी को अतिरंजित या काल्पनिक मानते हैं, क्योंकि इतनी छोटी कोठरी में 146 लोगों को बंद करना लगभग असंभव था। कुछ आधुनिक अनुमानों में बंदियों की संख्या लगभग 64 और बचे लोगों की संख्या 21 बताई गई है। सिराज को इस घटना की जानकारी थी, इसका भी कोई प्रमाण नहीं मिलता।
◆ महत्व: अंग्रेज़ों ने इस घटना का प्रयोग सिराज के विरुद्ध प्रचार करने, अंग्रेज़ों का क्रोध भड़काने और आगे के युद्ध को उचित ठहराने के लिए किया।
◆ कलकत्ता हाथ से निकलने की ख़बर मिलने पर मद्रास से रॉबर्ट क्लाइव (थल सेना) और एडमिरल वॉटसन (नौसेना) भेजे गए। उन्होंने 2 जनवरी 1757 को कलकत्ता पर फिर से कब्ज़ा कर लिया।
◆ 9 फ़रवरी 1757 — अलीनगर की संधि: नवाब को अंग्रेज़ों को पुराने व्यापारिक अधिकार लौटाने, कलकत्ता की किलेबंदी करने और सिक्के ढालने की अनुमति देनी पड़ी तथा क्षतिपूर्ति देना स्वीकार करना पड़ा। बदले में कंपनी ने नवाब की सुरक्षा का आश्वासन दिया।
◆ मार्च 1757: सप्तवर्षीय युद्ध छिड़ने पर अंग्रेज़ों ने नवाब की इच्छा के विरुद्ध फ्रांसीसी बस्ती चंद्रनगर छीन ली। इससे नवाब को फ्रांसीसी सहायता की संभावना भी कम हो गई।
📖 कहानी 1: प्लासी की सुबह — जब लड़ाई से पहले ही फ़ैसला हो चुका था 1757 में बंगाल का नवाब सिराजुद्दौला था। कंपनी और नवाब के बीच पहले से तनाव चल रहा था। नवाब ने 1756 में कलकत्ता पर क़ब्ज़ा किया, तो मद्रास से रॉबर्ट क्लाइव आया और कलकत्ता वापस ले लिया। ऊपर से क्लाइव ने नवाब से समझौता कर लिया, पर भीतर-ही-भीतर वह नवाब को हटाने की योजना बना चुका था। योजना में नवाब के अपने ही लोग शामिल थे: सेनापति मीर जाफ़र, सेठ जगत सेठ और दरबार के अन्य बड़े अधिकारी। उन्हें वादा मिला कि नवाब बदलने पर उन्हें धन और पद मिलेगा। इस साज़िश में व्यापारी अमीचंद भी था। उसने चुप रहने के बदले बड़ी रक़म माँगी। क्लाइव ने उसे धोखा देने के लिए दो संधि-पत्र बनवाए: असली में उसका नाम ही नहीं था और नक़ली में उसे रक़म का वादा था। नक़ली पर एडमिरल वॉटसन ने हस्ताक्षर नहीं किए, तो क्लाइव ने उनके जाली हस्ताक्षर करवा दिए। 23 जून 1757 की सुबह भागीरथी नदी के किनारे प्लासी के मैदान में दोनों सेनाएँ आमने-सामने खड़ी थीं। नवाब के पास काग़ज़ पर लगभग 50,000 सैनिक थे और क्लाइव के पास लगभग 3,000। फिर भी लड़ाई का नतीजा तय था, क्योंकि नवाब की सबसे बड़ी सेना के सेनापति मीर जाफ़र, यार लुत्फ़ ख़ाँ और राय दुर्लभ खड़े-खड़े तमाशा देखते रहे, लड़े ही नहीं। केवल मीर मदान और मोहनलाल जैसे वफ़ादार वीर पूरी ताक़त से लड़े। दोपहर में अचानक तेज़ बारिश हुई। अंग्रेज़ों ने अपना बारूद पहले से ढककर रखा था और नवाब का बारूद भीग गया। इसी बीच मीर मदान मारा गया। घबराए हुए सिराजुद्दौला के कान में मीर जाफ़र की बात पड़ी कि अब युद्ध रोक देना चाहिए और वह मैदान छोड़कर भाग गया। कुछ ही घंटों में लड़ाई ख़त्म हो गई। अंग्रेज़ों के लगभग 22 सैनिक मरे। भागते हुए नवाब को पकड़कर 2 जुलाई 1757 को मीर जाफ़र के बेटे मीरन के आदेश पर मार दिया गया। मीर जाफ़र नवाब बना, पर असली ताक़त अब कंपनी के हाथ में थी। 🧭 इस कहानी से कौन-सी अवधारणा साफ़ हुई ✔ प्लासी युद्ध से ज़्यादा षड्यंत्र था — कंपनी ने तलवार से कम और भारतीय दरबारियों की लालच और आपसी फूट से ज़्यादा जीत हासिल की। इसे "बाँटो और राज करो" की रणनीति भी कहा जाता है। ✔ कंपनी व्यापारी से "राजा बनाने वाली" शक्ति बनी — नवाब का चुनाव अब कंपनी की मर्ज़ी से होने लगा, इसलिए प्लासी को भारत में अंग्रेज़ी राज की असली नींव माना जाता है। ✔ धन-लोभ और ग़द्दारी की क़ीमत — नवाब के दरबारियों ने जो धन पाने के लिए ग़द्दारी की, उसी धन ने बंगाल को कंगाल और कंपनी को ताक़तवर बनाया। 📝 परीक्षा के लिए: प्लासी: 23 जून 1757, क्लाइव बनाम सिराजुद्दौला, मीर जाफ़र की ग़द्दारी, मीर मदान की वीरता, भारी वर्षा, अमीचंद को धोखा (दो संधि-पत्र), 2 जुलाई 1757 को सिराज की हत्या। |
🌺 क्या आप जानते हैं? "प्लासी" नाम कैसे पड़ा इस जगह का असली नाम "पलाशी" था, जो यहाँ बहुतायत में मिलने वाले पलाश के फूलों के कारण पड़ा था। पलाश के सुंदर लाल फूलों से होली का गुलाल बनाया जाता है। अंग्रेज़ों ने इस नाम को बिगाड़कर "प्लासी" (Plassey) कर दिया। |
◆ क्लाइव ने ऊपर से सिराज से समझौता (अलीनगर की संधि) किया, पर भीतर-भीतर उसे हटाने का षड्यंत्र रचा।
◆ उसने नवाब के प्रधान सेनापति (मीर बख़्शी) मीर जाफ़र को नवाब बनाने का वचन दिया और प्रभावशाली साहूकार जगत सेठ, दीवान राय दुर्लभ तथा व्यापारी अमीचंद (Omichund) को धन का लालच देकर अपनी ओर मिला लिया।
◆ जाली संधि-पत्र: अमीचंद ने षड्यंत्र में साथ देने के लिए बड़ी रक़म (लगभग 30 लाख रुपये) माँगी। क्लाइव ने उसे धोखा देने के लिए दो संधि-पत्र बनवाए: असली (सफ़ेद कागज़) में अमीचंद का नाम नहीं था, और नकली (लाल कागज़) में उसके हिस्से का वादा था। एडमिरल वॉटसन ने नकली पर हस्ताक्षर से मना किया तो क्लाइव ने वॉटसन के जाली हस्ताक्षर करवा दिए।
पहलू | विवरण |
तिथि | 23 जून 1757 |
स्थान | प्लासी (पलाशी), मुर्शिदाबाद से लगभग 22 मील दक्षिण, भागीरथी (हुगली) नदी के किनारे (आज पश्चिम बंगाल के नदिया ज़िले में) |
अंग्रेज़ पक्ष | रॉबर्ट क्लाइव; लगभग 3,000 सैनिक: लगभग 950 यूरोपीय पैदल, 2,100 भारतीय सिपाही, 100 तोपची, 50 नाविक; लगभग 8–10 तोपें |
नवाब पक्ष | सिराजुद्दौला; लगभग 50,000 सैनिक (कागज़ पर), भारी तोपें; लगभग 50 फ्रांसीसी तोपची (सेंट फ्रे के अधीन) |
नवाब की ओर से वीरता से लड़े | मीर मदान (युद्ध में मारा गया) और मोहनलाल, साथ में फ्रांसीसी तोपची |
विश्वासघाती (निष्क्रिय रहे) | मीर जाफ़र, यार लुत्फ़ ख़ाँ और राय दुर्लभ: इनकी बड़ी सेना युद्ध में खड़ी देखती रही, लड़ी नहीं |
निर्णायक मोड़ | दोपहर में भारी वर्षा से नवाब का बारूद भीग गया, जबकि अंग्रेज़ों ने अपना बारूद ढककर बचा लिया। मीर मदान की मृत्यु के बाद घबराए सिराज ने मीर जाफ़र की सलाह पर पीछे हटने का आदेश दिया और स्वयं युद्ध-क्षेत्र से भाग गया। |
हानि | अंग्रेज़: लगभग 22 मृत, 50 घायल; नवाब: लगभग 500 |
सिराज का अंत | भागते हुए पकड़ा गया और मीर जाफ़र के पुत्र मीरन के आदेश पर मुहम्मद अली बेग ने (2 जुलाई 1757) उसकी हत्या कर दी। |
नया नवाब | मीर जाफ़र: अंग्रेज़ों की कठपुतली |

1. बंगाल अंग्रेज़ों के अधीन हो गया और फिर कभी स्वतंत्र नहीं हो सका। "बंगाल की पहली क्रांति" (सत्ता-परिवर्तन) हुई।
2. मीर जाफ़र बंगाल का कठपुतली नवाब बना; असली शक्ति क्लाइव के हाथ में रही।
3. कंपनी को 24 परगना की ज़मींदारी (जागीर) मिली तथा कंपनी और उसके कर्मचारियों को बिना कर चुकाए व्यापार की पक्की सुविधा।
4. कलकत्ता में कंपनी की स्वतंत्र टकसाल शुरू हुई और अगस्त 1757 में कंपनी ने पहला सिक्का जारी किया।
5. नवाब ने कंपनी को क्षतिपूर्ति और बड़े अधिकारियों व स्वयं क्लाइव को बहुमूल्य उपहार दिए। क्लाइव को अलग से बड़ी जागीर मिली।
6. बंगाल से फ्रांसीसी प्रभाव पूरी तरह समाप्त; बंगाल के धन से अंग्रेज़ दक्षिण में फ्रांसीसियों को हराने में सफल हुए (वांडीवाश 1760)।
7. ब्रिटेन से सोना-चाँदी लाने की ज़रूरत घटने लगी; भारत की कमाई से ही भारत का माल ख़रीदा जाने लगा (धन-निष्कासन की शुरुआत)।
8. भारत में ब्रिटिश राजनीतिक सत्ता की नींव पड़ी; क्लाइव बंगाल का गवर्नर (1758–1760) बना। प्लासी भारत में कंपनी की पहली बड़ी जीत थी।
◆ सैनिक दृष्टि से प्लासी कोई बड़ा युद्ध नहीं था, केवल एक सैनिक झड़प थी। नवाब की विशाल सेना का बड़ा भाग लड़ा ही नहीं।
◆ इसीलिए कहा जाता है कि प्लासी की विजय वीरता की नहीं, बल्कि विश्वासघात और षड्यंत्र की विजय थी। इसे "युद्ध" कम और "सौदा" या "नाटक" अधिक कहा जाता है।
❝ यह एक सौदा था जिसमें बंगाल के धनी सेठों तथा मीर जाफ़र ने नवाब को अंग्रेज़ों के हाथ बेच डाला। ❞ (इतिहासकार के. एम. पणिक्कर (K. M. Panikkar)) |
◆ दूसरी ओर अंग्रेज़ इतिहासकार मैलेसन (Malleson) ने इसे निर्णायक युद्ध कहा, क्योंकि इसके परिणाम बहुत बड़े थे: इसने भारत में ब्रिटिश साम्राज्य का द्वार खोल दिया।
🔍 आसान परिभाषा: कठपुतली नवाब (Puppet Nawab) |
📘 परिभाषा: कठपुतली एक खिलौना होता है जिसे धागों के सहारे दूसरा व्यक्ति अपनी मर्ज़ी से नचाता है। ऐसा शासक जो नाम का राजा हो पर हर फ़ैसला किसी और (यहाँ कंपनी) के इशारे पर करे, कठपुतली शासक कहलाता है। |
💡 आसान भाषा में: गद्दी पर नवाब बैठा है, पर "रिमोट कंट्रोल" कंपनी के हाथ में है। 🏠 उदाहरण: जैसे किसी स्कूल में प्रधानाचार्य की कुर्सी पर कोई और बैठा दिया जाए, पर हर आदेश पर किसी बाहरी व्यक्ति की मंज़ूरी चाहिए, और वह उसी व्यक्ति को मोटी रक़म भी दे। मीर जाफ़र और बाद में मीर कासिम को कंपनी ने इसी उम्मीद से नवाब बनाया। |
◆ प्लासी के बाद बंगाल के नवाबों को कंपनी के अफ़सरों को निजी तोहफ़ों के रूप में ज़मीन और बहुत सारा धन देने के लिए मजबूर किया गया। कंपनी का हर कर्मचारी नवाबों की तरह जीने के सपने देखने लगा।
◆ क्लाइव 1743 में केवल 18 वर्ष की आयु में इंग्लैंड से मद्रास (क्लर्क के रूप में) आया था। 1767 में दो बार गवर्नर रहने के बाद जब वह हमेशा के लिए लौटा, तब भारत में उसकी दौलत 4,01,102 पाउंड के बराबर थी।
◆ जो अफ़सर धन कमाकर इंग्लैंड लौटे, उन्हें वहाँ "नबॉब" (Nabob) कहा जाने लगा। यह भारतीय शब्द "नवाब" का अंग्रेज़ी रूप था। इंग्लैंड में उन्हें "रातों-रात अमीर बने" नए धनी लोगों के रूप में देखा जाता था और नाटकों व कार्टूनों में उनका मज़ाक उड़ाया जाता था।
◆ पर सभी अफ़सर क्लाइव जैसे धनी नहीं बने; कई बीमारियों और युद्धों में कम उम्र में मर गए। बहुत से साधारण परिवारों से थे और बस ठीक-ठाक कमाकर इंग्लैंड लौटना चाहते थे।
❝ उस स्थिति की कल्पना कीजिए जहाँ प्लासी की जीत ने मुझे ला खड़ा किया था! एक ताक़तवर राजा मेरे इशारों पर चल रहा था; एक संपन्न शहर मेरी दया पर था; उसके सबसे दौलतमंद महाजन मेरी एक-एक मुस्कुराहट के लिए होड़ कर रहे थे। मैं ऐसे ख़ज़ानों के बीच से गुज़र रहा था जो सिर्फ़ मेरे लिए खुले थे… अध्यक्ष महोदय, मैं अपने इस संयम को देखकर ख़ुद हैरान हूँ! ❞ (संसदीय समिति के सामने क्लाइव का बयान (भावानुवाद)) |
❝ …इतनी विशाल सत्ता एक वाणिज्यिक कंपनी के लिए बहुत बड़ी बात होगी… इन समृद्ध रियासतों पर पूरा कब्ज़ा करने में कोई परेशानी नहीं आएगी… सालाना बीस लाख स्टर्लिंग की आमदनी और तीन प्रांतों का कब्ज़ा… ❞ (क्लाइव का ब्रिटिश मंत्री विलियम पिट को पत्र, कलकत्ता, 7 जनवरी 1759 (भावानुवाद)) |
◆ मीर जाफ़र कठपुतली बना रहा; असली शक्ति क्लाइव के पास थी। उसने अपने समय में कंपनी और अधिकारियों को लगभग 3 करोड़ रुपये दिए, पर माँगें बढ़ती गईं; ख़ज़ाना ख़ाली हो गया और कई जगह विद्रोह होने लगे।
◆ कठपुतली नवाब भी पूरी तरह इशारों पर नहीं चलते थे, क्योंकि प्रजा की नज़र में उन्हें अपना सम्मान और संप्रभुता दिखानी पड़ती थी। मीर जाफ़र ने डचों से अंग्रेज़ों के विरुद्ध सहायता लेने की कोशिश की, जिसका अंत बेदरा के युद्ध (1759) में डचों की हार से हुआ।
◆ 1760 में क्लाइव इंग्लैंड लौट गया। कार्यवाहक गवर्नर हॉलवेल के बाद वेंसिटार्ट (Vansittart) गवर्नर बना।
धन की माँगें पूरी न होने पर अंग्रेज़ों ने मीर जाफ़र को हटाकर उसके दामाद मीर कासिम को नवाब बनाने की गुप्त संधि की। इसकी मुख्य शर्तें थीं:
1. कंपनी को सैनिक ख़र्च के लिए बर्दवान, मिदनापुर और चटगाँव के ज़िले मिलेंगे।
2. तीन वर्ष तक सिलहट के चूने के व्यापार में आधा भाग कंपनी का होगा।
3. मीर कासिम कंपनी के मित्र और शत्रु को अपना मित्र और शत्रु मानेगा।
4. कंपनी के दक्षिण अभियान के लिए मीर कासिम 5 लाख रुपये देगा।
5. मीर कासिम ने वेंसिटार्ट को 50,000 पाउंड, हॉलवेल को 27,000 पाउंड तथा कलकत्ता कौंसिल के अन्य सदस्यों को 25,000 पाउंड प्रति सदस्य देना स्वीकार किया।
सुरक्षा और पेंशन (निर्वाह भत्ता) के आश्वासन पर मीर जाफ़र ने गद्दी छोड़ दी और कलकत्ता चला गया।
कंपनी एक ऐसा कठपुतली शासक चाहती थी जो समझदार भी हो और डरपोक भी, ताकि उसके हित पूरे करता रहे। पर मीर कासिम अंग्रेज़ों की शक्ति बढ़ने से रोकना और अपनी स्वतंत्रता बचाना चाहता था। उसने कई सुधार किए:
◆ राजधानी मुर्शिदाबाद से मुंगेर (बिहार) ले गया, ताकि कलकत्ता के अंग्रेज़ों से दूर रहकर स्वतंत्र रूप से काम कर सके।
◆ सेना को यूरोपीय ढंग से प्रशिक्षित किया (आर्मेनियाई सेनापति गुर्गिन ख़ाँ की सहायता से); मुंगेर में हथियार और गोला-बारूद के कारख़ाने खोले।
◆ भ्रष्ट अधिकारियों को हटाया, ख़र्च घटाया, राजस्व व्यवस्था सुधारी और ज़मींदारों से बकाया वसूला।
◆ नवाब की संप्रभुता की चाह अंग्रेज़ों को पसंद नहीं आई; राजधानी बदलना, सेना का आधुनिकीकरण और शस्त्र कारख़ाने अंग्रेज़ों के लिए ख़तरे की घंटी थे।
◆ अंग्रेज़ों ने मीर कासिम पर मुगल बादशाह शाह आलम को 12 लाख रुपये नज़राना देने का दबाव डाला, जिसे नवाब ने अपनी स्वतंत्रता पर आघात माना।
◆ दस्तक विवाद (सबसे बड़ा कारण): कंपनी के कर्मचारी दस्तक का दुरुपयोग जारी रखे हुए थे, जिससे राजकोष को हानि हो रही थी। तंग आकर 1762–63 में मीर कासिम ने सभी व्यापारियों (भारतीयों सहित) के लिए आंतरिक चुंगी ही समाप्त कर दी। अब भारतीय व्यापारी भी अंग्रेज़ों के बराबर हो गए और अंग्रेज़ों का विशेषाधिकार बेकार हो गया। अंग्रेज़ इस पर भड़क उठे।
◆ 1760 की संधि में मिले बर्दवान, मिदनापुर और चटगाँव की आय नवाब ने वापस माँगी, क्योंकि उसी सेना का प्रयोग नवाब के विरुद्ध हो रहा था।
◆ कलकत्ता कौंसिल और नवाब के बीच समझौते के प्रयास असफल हुए। जून 1763 में मेजर एडम्स (Adams) को भेजा गया। कटवा, गिरिया, सूती और उधुआ नाला में लगातार लड़ाइयाँ हुईं, जिनमें मीर कासिम हारता गया।
◆ हताश होकर मीर कासिम ने पटना में बंदी बनाए गए लगभग 200 अंग्रेज़ों (अधिकारी एलिस सहित) को मरवा दिया। यह "पटना हत्याकांड" (1763) उसकी बड़ी भूल साबित हुई।
◆ अंग्रेज़ों ने मीर जाफ़र को दोबारा नवाब बना दिया (1763–1765)। मीर कासिम भागकर अवध के नवाब शुजाउद्दौला के पास पहुँचा, जहाँ मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय भी शरण लिए हुए था। तीनों ने मिलकर अंग्रेज़ों को बंगाल से निकालने की योजना बनाई।
📌 स्मरणीय: मीर कासिम क्यों अलग था? मीर कासिम को कंपनी ने कठपुतली समझकर बैठाया था, पर वह अंग्रेज़ों को सचमुच चुनौती देने वाला योग्य नवाब निकला। उसके सुधार और आंतरिक चुंगी हटाने का फ़ैसला बंगाल के भारतीय व्यापारियों के हित में था। यही उसकी "गलती" बन गया, क्योंकि कंपनी को बराबरी नहीं, बल्कि विशेषाधिकार चाहिए था। |
पहलू | विवरण |
तिथि | 22 अक्टूबर 1764 (कुछ स्रोतों में 22–23 अक्टूबर) |
स्थान | बक्सर (बिहार), गंगा नदी के किनारे |
भारतीय गठबंधन | मीर कासिम (बंगाल का पूर्व नवाब) + शुजाउद्दौला (अवध का नवाब) + शाह आलम द्वितीय (मुगल बादशाह); साथ में बनारस के राजा बलवंत सिंह |
अंग्रेज़ सेनापति | मेजर हेक्टर मुनरो (Hector Munro) |
सेना | अंग्रेज़ों की सेना संख्या में बहुत छोटी (लगभग 7–8 हज़ार, अधिकांश भारतीय सिपाही); गठबंधन की सेना 40,000 से अधिक |
परिणाम | भारतीय गठबंधन की निर्णायक पराजय। शाह आलम युद्ध के बाद अंग्रेज़ों की शरण में आ गया; शुजाउद्दौला पश्चिम की ओर भागा (1765 में फिर हारा); मीर कासिम भाग निकला और 1777 के आसपास दिल्ली के पास ग़रीबी में मरा। |
महत्व | प्लासी से भी अधिक निर्णायक: यह असली सैनिक संघर्ष था; तीन बड़ी भारतीय शक्तियों की संयुक्त सेना हारी; ब्रिटिश सर्वोच्चता स्थापित हुई। |
◆ अब अंग्रेज़ों को चुनौती देने वाला कोई नहीं बचा: बंगाल का नया नवाब उनकी कठपुतली, अवध का नवाब उनका आभारी और मुगल बादशाह उनका पेंशनभोगी बन गया।
◆ इलाहाबाद तक का प्रदेश अंग्रेज़ों के नियंत्रण में आ गया और दिल्ली का मार्ग भी खुल गया।
◆ इसी युद्ध के बाद इलाहाबाद की संधि से बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी कंपनी को मिली। ईस्ट इंडिया कंपनी एक अखिल भारतीय शक्ति बन गई और पूरे भारत पर दावा करने लगी।
❝ बक्सर के युद्ध ने प्लासी के अधूरे कार्य को पूरा किया। ❞ (इतिहासकारों का प्रसिद्ध मत (प्रायः वी. ए. स्मिथ के नाम से उद्धृत)) |
◆ इतिहासकार के. के. दत्त के अनुसार भी परिणामों की दृष्टि से बक्सर, प्लासी से अधिक निर्णायक था।
◆ बक्सर के बाद कंपनी ने भारतीय रियासतों में रेज़िडेंट (Resident) तैनात करने शुरू किए, जो कंपनी के राजनीतिक प्रतिनिधि होते थे और धीरे-धीरे रियासतों के भीतरी मामलों में भी दख़ल देने लगे (विस्तार अगले अध्याय में)।
बक्सर के बाद रॉबर्ट क्लाइव 1765 में दूसरी बार बंगाल का गवर्नर बनकर आया। उसने इलाहाबाद में दो अलग-अलग संधियाँ कीं:
पहलू | पहली संधि: मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय के साथ (12 अगस्त 1765) | दूसरी संधि: अवध के नवाब शुजाउद्दौला के साथ (16 अगस्त 1765) |
कंपनी को क्या मिला | बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी (राजस्व वसूलने और दीवानी न्याय का अधिकार) का शाही फ़रमान | युद्ध-हर्जाने के रूप में 50 लाख रुपये; अवध में बिना चुंगी व्यापार की सुविधा |
बदले में क्या दिया | बादशाह को 26 लाख रुपये वार्षिक पेंशन (नज़राना); अवध से लिए गए कड़ा और इलाहाबाद के ज़िले बादशाह को | शुजाउद्दौला को उसका अवध राज्य लौटाया (कड़ा और इलाहाबाद छोड़कर) |
अन्य शर्तें | बादशाह इलाहाबाद में कंपनी के संरक्षण में रहेगा | बनारस के ज़मींदार बलवंत सिंह की जागीर पहले की तरह बनी रहेगी; कंपनी बाहरी हमले पर अवध की रक्षा करेगी, पर नवाब को उस सेना का ख़र्च देना होगा |
महत्व | कंपनी बंगाल की वास्तविक शासक बनी; मुगल बादशाह कंपनी का पेंशनभोगी | अवध को मध्यवर्ती (बफ़र) राज्य बनाया ताकि मराठों और अफ़गानों से बंगाल सुरक्षित रहे |
◆ बंगाल में मीर जाफ़र की मृत्यु (1765) के बाद उसके पुत्र नज्मुद्दौला को नवाब बनाया गया। उसे निज़ामत (पुलिस, सेना, फौजदारी न्याय) चलाने के लिए कंपनी से एक निश्चित भत्ता (लगभग 53 लाख रुपये वार्षिक) मिलता था।
◆ क्लाइव ने कहा था: "अब हमें ख़ुद ही नवाब बनना पड़ेगा"। दीवानी मिलते ही कंपनी को बंगाल के विशाल राजस्व संसाधनों पर नियंत्रण मिल गया।
📖 कहानी 2: अकाल में भी वसूली — बंगाल, 1770 1765 में दीवानी मिलने के बाद कंपनी के पास बंगाल का सारा लगान वसूलने का अधिकार आ चुका था, पर लोगों के भोजन, सुरक्षा और न्याय की ज़िम्मेदारी अब भी नवाब के पास थी। नवाब के पास न धन बचा था, न सेना। यानी जिसके पास पैसा था, उसके पास कोई ज़िम्मेदारी नहीं थी, और जिसके पास ज़िम्मेदारी थी, उसके पास पैसा नहीं था। 1769–70 में बंगाल में वर्षा बहुत कम हुई और फ़सलें सूख गईं। अनाज की क़ीमतें आसमान पर पहुँच गईं और गाँव-के-गाँव ख़ाली हो गए। लोग भूख से मरने लगे। बंगाल की लगभग एक-तिहाई जनसंख्या, यानी करीब 1 करोड़ लोग मारे गए। बंगाली इस अकाल को "छियत्तर का मन्वंतर" कहते हैं, क्योंकि यह बंगाली सन 1176 में पड़ा था। सबसे दर्दनाक बात यह थी कि इतनी मौतों के बावजूद लगान की वसूली में कमी नहीं की गई। 1772 में बंगाल के गवर्नर बने वॉरेन हेस्टिंग्स ने कंपनी को ख़ुद लिखा कि कम-से-कम एक-तिहाई आबादी के मर जाने के बाद भी लगान की वसूली क़ायम रही। इसी कारण 1772 में हेस्टिंग्स ने इस "दोहरी व्यवस्था" को समाप्त करके बंगाल का शासन और लगान वसूली सीधे कंपनी के हाथ में ले ली। 🧭 इस कहानी से कौन-सी अवधारणा साफ़ हुई ✔ दीवानी और निज़ामत — दीवानी का अर्थ है लगान वसूलने का अधिकार और निज़ामत का अर्थ है शासन चलाने और जनता की रक्षा की ज़िम्मेदारी। ✔ द्वैध शासन (1765–1772) — अधिकार कंपनी के पास और ज़िम्मेदारी नवाब के पास होने की वह व्यवस्था, जिसमें कोई भी जनता के प्रति उत्तरदायी नहीं रहा। ✔ धन-निष्कासन की शुरुआत — बंगाल का धन लगान के रूप में वसूला जाकर इंग्लैंड गया, और बदले में बंगाल को बहुत कम लौटा। 📝 परीक्षा के लिए: 1770 का बंगाल अकाल (1769–70) = लगभग एक-तिहाई आबादी की मृत्यु; बंगाली नाम "छियत्तर का मन्वंतर"; द्वैध शासन 1765–1772, लागू करने वाले क्लाइव; समाप्त करने वाले वॉरेन हेस्टिंग्स (1772)। |
🔍 आसान परिभाषा: दीवानी और निज़ामत (Diwani & Nizamat) |
📘 परिभाषा: मुगल प्रांत का शासन दो भागों में बँटा होता था: दीवानी = भू-राजस्व वसूली और दीवानी (सिविल, जैसे ज़मीन-जायदाद के) मुक़दमों का अधिकार, जो "दीवान" के पास होता था; निज़ामत = पुलिस, सेना, कानून-व्यवस्था और फौजदारी (आपराधिक) न्याय, जो "नाज़िम" (सूबेदार/नवाब) के पास होता था। |
💡 आसान भाषा में: दीवानी = "पैसा वसूलने का अधिकार"; निज़ामत = "व्यवस्था चलाने की ज़िम्मेदारी"। 🏠 उदाहरण: जैसे किसी घर में सारी कमाई और तिजोरी की चाबी बड़े भाई (कंपनी) के पास हो, पर घर चलाने, बच्चों की पढ़ाई, बीमारी और झगड़े सुलझाने की ज़िम्मेदारी छोटे भाई (नवाब) पर डाल दी जाए, जिसके पास पैसे ही न हों। घर का बिगड़ना तय है। |
1765 में दीवानी मिलने के बाद बंगाल में एक अजीब व्यवस्था बनी, जिसे "द्वैध शासन" (दोहरा शासन, Dual Government) कहा गया। इसे क्लाइव ने लागू किया। इसमें शक्ति और ज़िम्मेदारी अलग-अलग हाथों में थी:
पहलू | ईस्ट इंडिया कंपनी ("दीवान") | नवाब ("नाज़िम") |
अधिकार | राजस्व वसूली और दीवानी न्याय | कानून-व्यवस्था, पुलिस, फौजदारी न्याय |
ज़िम्मेदारी | जनकल्याण की कोई ज़िम्मेदारी नहीं | प्रशासन की ज़िम्मेदारी, पर साधन (धन) नहीं |
व्यवहार में | भारतीय नायब दीवानों के माध्यम से बेरहमी से लगान वसूला | सेना और प्रशासन चलाने के लिए धन नहीं; कंपनी के भत्ते पर निर्भर |
परिणाम | धन इंग्लैंड भेजा गया (धन-निष्कासन) | बंगाल में अराजकता, भ्रष्टाचार और अकाल |
◆ भारतीय उप-अधिकारी (नायब दीवान): बंगाल में मुहम्मद रज़ा ख़ाँ (जो नायब सूबेदार भी था), बिहार में राजा शिताब राय और उड़ीसा में राय दुर्लभ। इनके माध्यम से कंपनी बिना सीधे सामने आए राजस्व वसूलती रही।
◆ क्लाइव का उद्देश्य: सीधे शासन की ज़िम्मेदारी और ख़र्च से बचना, अन्य यूरोपीय शक्तियों तथा इंग्लैंड की संसद की नज़र से असली सत्ता छिपाए रखना और भारतीय जनता को भड़कने से रोकना।

◆ "सत्ता बिना ज़िम्मेदारी और ज़िम्मेदारी बिना सत्ता": प्रशासन ठप, चारों ओर अराजकता और भ्रष्टाचार।
◆ किसानों से अधिकतम लगान वसूला गया; कृषि, व्यापार और उद्योग नष्ट होने लगे। कंपनी के कर्मचारी निजी व्यापार और घूस से मालामाल हुए; बुनकरों को कम दाम पर कपड़ा बेचने को मजबूर किया गया।
◆ 1770 का भीषण बंगाल अकाल: वर्षा की कमी और कठोर लगान वसूली के कारण भयानक अकाल पड़ा, जिसमें बंगाल की लगभग एक-तिहाई जनसंख्या (लगभग 1 करोड़ लोग) मर गई। फिर भी कंपनी ने लगान वसूली में ढील नहीं दी। इसे द्वैध शासन का सबसे भयानक परिणाम माना जाता है।
◆ अंत: 1772 में गवर्नर वारेन हेस्टिंग्स ने द्वैध शासन समाप्त किया। नायब दीवान हटाए गए, ख़ज़ाना मुर्शिदाबाद से कलकत्ता लाया गया और कंपनी ने सीधे राजस्व वसूली की ज़िम्मेदारी ले ली (ज़िलों में अंग्रेज़ कलेक्टर नियुक्त हुए)। आगे 1773 का रेग्युलेटिंग एक्ट आया (प्रशासन वाले अध्याय में)।
कार्यकाल | प्रमुख कार्य |
पहला: 1757/58–1760 | प्लासी के बाद बंगाल पर पकड़ मज़बूत की; मीर जाफ़र को नवाब बनाया; 24 परगना की ज़मींदारी ली; बेदरा (1759) में डचों को हराने की तैयारी; 1760 में इंग्लैंड लौटा। |
दूसरा: 1765–1767 | इलाहाबाद की संधियाँ; दीवानी प्राप्त की; द्वैध शासन लागू किया। कंपनी के कर्मचारियों के निजी व्यापार और भेंट-उपहार लेने पर रोक लगाई और उनसे इसका वचन-पत्र भरवाया। नमक, सुपारी और तंबाकू के व्यापार के लिए अधिकारियों की "सोसाइटी ऑफ़ ट्रेड" बनाई (जिसे बाद में कंपनी ने बंद कर दिया)। सैनिक अधिकारियों का "दोहरा भत्ता" (Double Batta) बंद किया, जिससे अफ़सरों ने विरोध किया; इसे "श्वेत विद्रोह" (White Mutiny, 1766) कहा जाता है, जिसे क्लाइव ने सख़्ती से दबाया। मीर जाफ़र द्वारा छोड़े गए 5 लाख रुपये से अपंग अफ़सरों और सैनिक विधवाओं के लिए "लॉर्ड क्लाइव फ़ंड" बनाया। |
◆ क्लाइव को "भारत में ब्रिटिश साम्राज्य का संस्थापक" माना जाता है। अर्काट (1751) की सफलता के बाद ब्रिटिश प्रधानमंत्री विलियम पिट (बड़े) ने उसे "स्वर्ग में जन्मा सेनापति" (Heaven-born General) कहा था।
◆ विडंबना यह थी कि दूसरे कार्यकाल में उसे भ्रष्टाचार मिटाने का काम सौंपा गया था, पर 1772 में उसे ख़ुद ब्रिटिश संसद के सामने अपनी अकूत संपत्ति पर भ्रष्टाचार के आरोपों की सफ़ाई देनी पड़ी। वह आरोपों से बरी तो हो गया, पर 1774 में उसने आत्महत्या कर ली।
बिंदु | प्लासी (1757) | बक्सर (1764) |
तिथि | 23 जून 1757 | 22 अक्टूबर 1764 |
स्थान | प्लासी (भागीरथी के किनारे, बंगाल) | बक्सर (गंगा के किनारे, बिहार) |
अंग्रेज़ सेनापति | रॉबर्ट क्लाइव | मेजर हेक्टर मुनरो |
विरोधी | केवल सिराजुद्दौला (बंगाल) | मीर कासिम + शुजाउद्दौला + शाह आलम द्वितीय |
युद्ध की प्रकृति | मुख्यतः षड्यंत्र और विश्वासघात; एक सैनिक झड़प | वास्तविक सैन्य संघर्ष; अंग्रेज़ों की सैनिक श्रेष्ठता सिद्ध |
तात्कालिक परिणाम | मीर जाफ़र कठपुतली नवाब; 24 परगना; बंगाल पर राजनीतिक नियंत्रण | दीवानी (1765); अवध आश्रित; मुगल बादशाह पेंशनभोगी |
महत्व | भारत में ब्रिटिश राजनीतिक सत्ता की नींव | ब्रिटिश सत्ता पर पक्की मुहर; कंपनी अखिल भारतीय शक्ति |
◆ 18वीं सदी की शुरुआत से कंपनी का भारत से व्यापार बढ़ रहा था, पर ब्रिटेन के पास भारत में बेचने लायक कोई चीज़ नहीं थी। इसलिए कंपनी को भारतीय माल ब्रिटेन से लाए सोने-चाँदी से ख़रीदना पड़ता था।
◆ प्लासी के बाद ब्रिटेन से सोने की निकासी कम होने लगी और दीवानी (1765) मिलने के बाद तो सोना लाने की ज़रूरत ही नहीं रही। अब बंगाल के राजस्व से ही कंपनी भारत में सूती और रेशमी कपड़ा ख़रीदती, अपनी फ़ौज चलाती और कलकत्ता में किलों व दफ़्तरों का निर्माण करती थी। इस माल को इंग्लैंड भेजकर मुनाफ़ा कमाया जाता था; बदले में भारत को कुछ नहीं मिलता था। इसे "निवेश" (Investment) कहा जाता था।
◆ बंगाल के कुटीर उद्योग (मलमल, रेशम) धीरे-धीरे नष्ट होने लगे; कंपनी के एजेंट बुनकरों और किसानों से ज़बरदस्ती कम दाम पर माल लेते थे।
◆ आगे चलकर दादाभाई नौरोजी ने अपनी पुस्तक "पॉवर्टी एंड अन-ब्रिटिश रूल इन इंडिया" (1901) में इसी को "धन-निष्कासन सिद्धांत" (Drain Theory) के रूप में समझाया और इसे भारत की ग़रीबी का मुख्य कारण बताया। (इसका विस्तृत अध्ययन "आर्थिक नीतियाँ" वाले अध्याय में है।)
🔍 आसान परिभाषा: धन-निष्कासन (Drain of Wealth) |
📘 परिभाषा: भारत की संपत्ति और आय का वह भाग जो बिना किसी बराबर आर्थिक लाभ (वापसी) के ब्रिटेन चला जाता था: जैसे भारतीय राजस्व से ख़रीदा गया माल इंग्लैंड भेजना, अफ़सरों के वेतन-पेंशन और मुनाफ़ा इंग्लैंड ले जाना। |
💡 आसान भाषा में: भारत का पैसा भारत में ख़र्च होकर भारत को मज़बूत करने के बजाय "एकतरफ़ा" इंग्लैंड की जेब में जाता रहा। 🏠 उदाहरण: मान लीजिए किसी किसान के खेत पर कब्ज़ा करने वाला उसी किसान से लगान वसूले, उसी पैसे से किसान की फ़सल ख़रीदे, फ़सल शहर में बेचकर मुनाफ़ा अपने घर ले जाए और किसान के हाथ कुछ न आए। यही धन-निष्कासन है। |
वर्ष | घटना |
1453 | कुस्तुनतुनिया पर तुर्कों का अधिकार; पुराने व्यापार मार्ग बाधित |
1498 | वास्को-द-गामा कालीकट पहुँचा (20 मई) |
1500 / 1503 | कैब्रल ने कालीकट में कोठी बनाई; कोचीन में पहला पुर्तगाली क़िला |
1505–09 | अल्मीडा पहला पुर्तगाली वायसराय; नीले पानी की नीति; दीव का युद्ध (1509) |
1510 | अल्बुकर्क ने बीजापुर से गोवा जीता |
1530 | नीनो-द-कुन्हा ने पुर्तगाली राजधानी कोचीन से गोवा की |
1600 | अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना (31 दिसंबर) |
1602 / 1605 | डच कंपनी बनी / मसुलीपट्टनम में पहली डच कोठी |
1608–09 | हॉकिन्स सूरत पहुँचा और जहाँगीर के दरबार गया |
1612 / 1613 | सुवाली का युद्ध / सूरत में पहली स्थायी अंग्रेज़ी कोठी |
1615 | सर थॉमस रो जहाँगीर के दरबार में |
1616 / 1620 | डेनिश कंपनी बनी / ट्रंकेबार में डेनिश बस्ती |
1623 | अम्बोयना की घटना: डचों ने अंग्रेज़ों को इंडोनेशिया से खदेड़ा |
1632 | शाहजहाँ ने पुर्तगालियों को हुगली से निकाला |
1639–40 | मद्रास में फोर्ट सेंट जॉर्ज |
1651 | हुगली में अंग्रेज़ों की पहली बंगाल कोठी |
1664 / 1668 | फ्रांसीसी कंपनी बनी / सूरत में पहली फ्रांसीसी कोठी; बम्बई कंपनी को (10 पाउंड वार्षिक) |
1674 | फ्रांस्वा मार्टिन ने पांडिचेरी बसाया |
1690–98 | जॉब चार्नॉक (सुतानुती); औरंगज़ेब का फ़रमान; तीन गाँवों की ज़मींदारी (कलकत्ता) |
1707 | औरंगज़ेब की मृत्यु; मुगल पतन तेज़ |
1717 | फ़र्रुख़सियर का फ़रमान (कंपनी का "मैग्ना कार्टा"); मुर्शिद कुली ख़ाँ बंगाल का सूबेदार |
1722 / 1724 | अवध में सआदत ख़ाँ / शकरखेड़ा का युद्ध, हैदराबाद में निज़ाम स्वतंत्र |
1727 | सवाई जयसिंह द्वारा जयपुर की स्थापना |
1739 | नादिर शाह का आक्रमण (करनाल का युद्ध, दिल्ली की लूट) |
1741 | कोलाचेल का युद्ध: त्रावणकोर ने डचों को हराया |
1746–48 | प्रथम कर्नाटक युद्ध; एक्स-ला-शापेल की संधि |
1749–54 | द्वितीय कर्नाटक युद्ध; अर्काट का घेरा (1751); पांडिचेरी की संधि |
1756 | सिराजुद्दौला नवाब; कलकत्ता पर अधिकार; काल कोठरी की घटना (20 जून) |
1757 | अलीनगर की संधि (9 फ़रवरी); प्लासी का युद्ध (23 जून) |
1758–63 | तृतीय कर्नाटक युद्ध; वांडीवाश (22 जनवरी 1760); पेरिस की संधि (1763) |
1759 | बेदरा का युद्ध: अंग्रेज़ों ने डचों को हराया |
1760 | मीर कासिम नवाब (वेंसिटार्ट की संधि) |
1761 | पानीपत का तीसरा युद्ध (14 जनवरी); हैदर अली मैसूर का वास्तविक शासक |
1763 | मीर कासिम की हार; पटना हत्याकांड; मीर जाफ़र दोबारा नवाब |
1764 | बक्सर का युद्ध (22 अक्टूबर) |
1765 | इलाहाबाद की संधियाँ (12 और 16 अगस्त); दीवानी; द्वैध शासन शुरू |
1766 | श्वेत विद्रोह (दोहरा भत्ता बंद करने पर) |
1770 | भीषण बंगाल अकाल |
1772 | वारेन हेस्टिंग्स ने द्वैध शासन समाप्त किया; संसद में क्लाइव की जाँच |
🏁 अध्याय का सार: व्यापार से साम्राज्य तक यूरोपीय कंपनियाँ मुनाफ़े के लिए भारत आईं। आपसी होड़ में उन्होंने अपनी बस्तियों की किलेबंदी की और भारतीय राजाओं के झगड़ों में दख़ल देने लगीं। इस तरह व्यापार और राजनीति को अलग रखना असंभव हो गया। मुगल साम्राज्य के बिखराव और क्षेत्रीय शक्तियों की आपसी फूट ने अंग्रेज़ों को मौका दिया। कर्नाटक युद्धों में फ्रांसीसी हारे, प्लासी से बंगाल हाथ आया, बक्सर से वह पक्का हुआ और 1765 की दीवानी से कंपनी भारत के सबसे अमीर प्रांत की वास्तविक शासक बन गई। यहीं से आगे के भारत-विजय अभियान (मैसूर, मराठा, सिख) का आधार तैयार हुआ, जो अगले अध्याय का विषय है। |