📖 प्रस्तावना
इस अध्याय में हम समाजशास्त्र विषय का संक्षिप्त परिचय, इसके भारत में विकास, प्रमुख भारतीय समाजशास्त्रियों का एक-पंक्ति परिचय, तथा यूनिट-3 (समाजशास्त्र, पेपर-I) का पूरा पाठ्यक्रम व आगे आने वाले 6 अध्यायों की रूपरेखा एक ही जगह देखेंगे — ताकि आगे की पूरी शृंखला पढ़ने से पहले संपूर्ण चित्र स्पष्ट हो जाए।
📋 इस अध्याय में (विषय-सूची)
- समाजशास्त्र क्या है? — परिभाषाएं
- समाजशास्त्र का उद्भव — संक्षिप्त पृष्ठभूमि
- भारत में समाजशास्त्र का विकास
- प्रमुख भारतीय समाजशास्त्री — संक्षिप्त परिचय
- RAS मुख्य परीक्षा, पेपर-I, यूनिट-3 — पूरा पाठ्यक्रम
1समाजशास्त्र क्या है?
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शब्द-उद्गम: सोशियस (लैटिन = साथी/समाज) + लोगोस (ग्रीक = अध्ययन) → समाजशास्त्र (Sociology) यानी समाज का वैज्ञानिक अध्ययन। ऑगस्त कॉम्त (Auguste Comte) ने सन् 1838 में यह शब्द गढ़ा — इन्हें "समाजशास्त्र का जनक" कहा जाता है।
| विचारक | परिभाषा |
|---|
| ऑगस्त कॉम्त (Auguste Comte) | समाजशास्त्र सामाजिक घटनाओं का वैज्ञानिक अध्ययन है, जो प्राकृतिक व अपरिवर्तनीय नियमों के अधीन है। |
| किंग्सले डेविस (Kingsley Davis) | समाजशास्त्र मानव समाज का अध्ययन है। |
| जी.एस. घुर्ये (G.S. Ghurye) | समाजशास्त्र सामाजिक संबंधों, संस्थाओं और समग्र समाज का व्यवस्थित अध्ययन है। |
| एम.एन. श्रीनिवास (M.N. Srinivas) | समाजशास्त्र सामाजिक प्रक्रियाओं का अध्ययन है, जिसमें सामाजिक संस्थाओं का विकास व परिवर्तन शामिल है। |
2समाजशास्त्र का उद्भव — संक्षिप्त पृष्ठभूमि
18वीं-19वीं सदी में यूरोप में आए बड़े सामाजिक-आर्थिक बदलावों ने समाज के वैज्ञानिक अध्ययन की आवश्यकता उत्पन्न की —
| वाणिज्यिक क्रांति — वैश्विक व्यापार व बैंकिंग का विकास | प्रबोधन काल (Enlightenment) — तर्क, स्वतंत्रता व लोकतंत्र के विचार |
|---|
| फ्रांसीसी क्रांति (1789) — स्वतंत्रता-समानता-भाईचारा, राजतंत्र का अंत | औद्योगिक क्रांति — मशीनीकरण, नए सामाजिक-आर्थिक वर्गों का उदय |
3भारत में समाजशास्त्र का विकास
| चरण | मुख्य बिंदु |
|---|
| प्रारंभिक चिंतन | वेद-उपनिषद-मनुस्मृति में सामाजिक व्यवस्था पर विचार; बुद्ध-महावीर व भक्ति-संत कवियों (कबीर, गुरु नानक) का सामाजिक-सुधार योगदान। |
| औपनिवेशिक काल | पश्चिमी शिक्षा व सामाजिक विज्ञानों का प्रवेश; जनगणना-सर्वेक्षणों से व्यवस्थित डेटा; राजा राम मोहन राय, ज्योतिराव फुले, पेरियार के सुधार आंदोलन। |
| संस्थागत विकास | विश्वविद्यालयों (बॉम्बे, कलकत्ता, लखनऊ) में समाजशास्त्र विभागों की स्थापना; भारतीय समाजशास्त्रियों द्वारा भारत-केंद्रित शोध-पद्धति का विकास (देखें अगला खंड)। |
4प्रमुख भारतीय समाजशास्त्री — संक्षिप्त परिचय
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| समाजशास्त्री | मुख्य योगदान (एक पंक्ति में) |
|---|
| जी.एस. घुर्ये (G.S. Ghurye) | "भारतीय समाजशास्त्र के पितामह" — जाति, जनजाति व संस्कृति पर अग्रणी शोध। |
| एम.एन. श्रीनिवास (M.N. Srinivas) | संरचनात्मक-प्रकार्यवादी विश्लेषण; "संस्कृतीकरण" व "प्रभुत्वशाली जाति" जैसी अवधारणाओं के जनक। |
| डी.पी. मुकर्जी (D.P. Mukerji) | मार्क्सवादी परंपरा के समाजशास्त्री — भारतीय परंपरा व आधुनिकता के द्वंद्व पर विश्लेषण। |
| ए.आर. देसाई (A.R. Desai) | मार्क्सवादी दृष्टिकोण से भारतीय राष्ट्रवाद व ग्रामीण समाज का अध्ययन (ग्रंथ: "Social Background of Indian Nationalism")। |
राधाकमल मुखर्जी (Radhakamal Mukherjee) | सामाजिक मूल्यों व मानव-पारिस्थितिकी पर कार्य (ग्रंथ: "Sociology of Values")। |
5RAS मुख्य परीक्षा, पेपर-I, यूनिट-3 — पूरा पाठ्यक्रम (समाजशास्त्र)
| 1. जाति एवं वर्ग की अवधारणा, भारतीय समाज में इनके बदलते आयाम |
|---|
| 2. समकालीन भारतीय समाज व संस्कृति में परिवर्तन — धर्मनिरपेक्षीकरण, शहरीकरण, आधुनिकीकरण, वैश्वीकरण |
| 3. भारतीय सामाजिक व्यवस्था से संबंधित अवधारणाएं — कर्म का सिद्धांत, धर्म, पुरुषार्थ एवं आश्रम व्यवस्था |
| 4. परिवार एवं विवाह, वृद्धजनों व दिव्यांगजनों से संबंधित मुद्दे; साइबर अपराध व सोशल मीडिया का प्रभाव |
| 5. भारतीय समाज के समक्ष चुनौतियां — दहेज, तलाक, भ्रष्टाचार, गरीबी, वेश्यावृत्ति, बेरोजगारी, नशाखोरी |
| 6. कमज़ोर वर्गों से संबंधित समस्याएं (राजस्थान विशेष) — महिलाएं, हाशिए के समूह, दलित, SC व ST तथा कल्याणकारी योजनाएं |