1897 में J. J. Thomson ने एक ऐसी खोज की, जिसने हज़ारों साल पुरानी धारणा को तोड़ दिया। यूनानी दार्शनिक डेमोक्रिटस ने लगभग 2400 साल पहले कहा था कि पदार्थ को बार-बार काटते जाएँ, तो अंत में एक ऐसा कण बचेगा जिसे और नहीं तोड़ा जा सकता — उन्होंने इसे "एटॉमोस" यानी अविभाज्य नाम दिया। सदियों तक वैज्ञानिक इसी सोच के साथ आगे बढ़े, और 1803 में जॉन डाल्टन ने भी अपने परमाणु सिद्धांत में यही माना कि परमाणु सबसे छोटा और अविभाज्य कण है। लेकिन थॉमसन के कैथोड किरण नलिका के प्रयोग ने यह साबित कर दिया कि परमाणु के भीतर भी एक दुनिया बसती है — ऋणावेशित इलेक्ट्रॉन नामक कण, जो हर परमाणु में मौजूद हैं। इसके बाद रदरफोर्ड, बोर और श्रोडिंगर जैसे वैज्ञानिकों ने एक-एक परत खोलकर परमाणु के भीतर की उस अनदेखी दुनिया को हमारे सामने रखा। यही यात्रा — अविभाज्य कण से लेकर इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन, न्यूट्रॉन एवं क्वांटम कक्षकों तक — इस अध्याय की कहानी है।
आज हम परमाणु की जिस जटिल संरचना को पढ़ते हैं, वह हज़ारों साल की वैज्ञानिक यात्रा का परिणाम है। यह यात्रा कल्पना से शुरू होकर प्रयोगों तक पहुँची।
परमाणु के अस्तित्व का विचार सबसे पहले भारतीय एवं यूनानी दार्शनिकों द्वारा लगभग 400 ईसा पूर्व प्रस्तुत किया गया था — उस समय यह विचार प्रयोगों पर नहीं, बल्कि तर्क एवं कल्पना पर आधारित था।
कल्पना कीजिए कि आप एक रोटी को बार-बार आधा-आधा तोड़ते जाएँ। क्या यह विभाजन अनंत काल तक चलता रहेगा, या अंत में एक ऐसा टुकड़ा बचेगा जिसे और नहीं तोड़ा जा सकता? यही प्रश्न 2400 साल पहले डेमोक्रिटस के मन में उठा था, और इसी सोच ने परमाणु की अवधारणा को जन्म दिया।
अंग्रेज़ी रसायनज्ञ जॉन डाल्टन ने 1803 में परमाणु सिद्धांत प्रस्तुत किया, जो पदार्थ के व्यवहार संबंधी उनके अवलोकनों एवं प्रयोगों पर आधारित था। डाल्टन का परमाणु सिद्धांत आधुनिक रसायन विज्ञान की आधारशिला माना जाता है।
जब लकड़ी जलती है, तो ऐसा लगता है कि पदार्थ नष्ट हो गया — पर वास्तव में लकड़ी के कार्बन एवं हाइड्रोजन परमाणु हवा की ऑक्सीजन से जुड़कर कार्बन डाइऑक्साइड एवं जलवाष्प बना देते हैं। परमाणु नष्ट नहीं होते, केवल नए यौगिकों में पुनर्व्यवस्थित हो जाते हैं — यही डाल्टन के पाँचवें नियम का जीवंत उदाहरण है।
19वीं सदी के अंत में गैसों में विद्युत-विसर्जन के प्रयोगों ने यह साबित कर दिया कि परमाणु के भीतर भी छोटे-छोटे आवेशित कण मौजूद हैं। इन खोजों ने डाल्टन के "अविभाज्य परमाणु" वाले विचार को चुनौती दी और नए परमाणु मॉडलों को जन्म दिया।
आवेश (e) = -1.602 × 10⁻¹⁹ कूलॉम
द्रव्यमान (mₑ) = 9.109 × 10⁻³¹ किलोग्राम
आवेश/द्रव्यमान अनुपात (e/m) = 1.759 × 10¹¹ C/kg
पुराने टेलीविज़न एवं कंप्यूटर मॉनिटर में उपयोग होने वाली चित्र नलिका (CRT) कैथोड किरण नलिका का ही एक उदाहरण थी, जिसमें इलेक्ट्रॉनों की किरणें स्क्रीन पर लेपित प्रतिदीप्त पदार्थ से टकराकर चित्र बनाती थीं — यही थॉमसन के प्रयोग का व्यावहारिक अनुप्रयोग है।
| कण | खोजकर्ता (वर्ष) | आवेश | द्रव्यमान | अन्य जानकारी |
|---|---|---|---|---|
| इलेक्ट्रॉन (e⁻) | जे. जे. थॉमसन (1897) | -1.6 × 10⁻¹⁹ C | 9.1 × 10⁻³¹ kg | परमाणु की रासायनिक अभिक्रियाओं में मुख्य भूमिका |
| प्रोटॉन (p⁺) | गोल्डस्टीन (1886), नामकरण रदरफोर्ड (1919) | +1.6 × 10⁻¹⁹ C | 1.67 × 10⁻²⁷ kg | परमाणु क्रमांक निर्धारित करता है |
| न्यूट्रॉन (n⁰) | जेम्स चैडविक (1932) | 0 (आवेशरहित) | 1.67 × 10⁻²⁷ kg | नाभिकीय स्थिरता में सहायक |
कैंसर के उपचार में उपयोग होने वाली रेडियोथेरेपी मशीनें तथा परमाणु ऊर्जा संयंत्र — दोनों ही न्यूट्रॉन के नाभिकीय गुणों पर आधारित हैं। न्यूट्रॉन की खोज ने ही आगे चलकर परमाणु विखंडन (Nuclear Fission) की समझ को संभव बनाया, जिस पर आज के परमाणु रिएक्टर कार्य करते हैं।
1898 में जे. जे. थॉमसन ने परमाणु का एक मॉडल प्रस्तुत किया, जिसके अनुसार परमाणु एक समान रूप से धनावेशित गोला होता है, जिसके अंदर इलेक्ट्रॉन विभिन्न स्थानों पर धँसे रहते हैं — ठीक वैसे ही जैसे हलवे (पुडिंग) में किशमिश धँसी होती है। इसीलिए इसे प्लम पुडिंग मॉडल या तरबूज़ मॉडल भी कहा जाता है।
यह मॉडल परमाणु की विद्युत उदासीनता को समझाने में सक्षम था, परंतु बाद के प्रयोगों के परिणामों से यह मॉडल असंगत पाया गया, इसलिए इसे अस्वीकार कर दिया गया।
थॉमसन के मॉडल को समझने के लिए तरबूज़ की कल्पना करें — लाल गूदा (धनावेश) पूरे तरबूज़ में फैला है, जबकि काले बीज (इलेक्ट्रॉन) उसमें जगह-जगह धँसे हैं। यही सरल चित्रण थॉमसन के मॉडल को "तरबूज़ मॉडल" नाम देता है।
अर्नेस्ट रदरफोर्ड तथा उनके सहयोगियों हैंस गाइगर एवं अर्नेस्ट मार्सडेन ने सोने की अत्यंत पतली पन्नी (लगभग 100 nm) पर उच्च ऊर्जा वाले अल्फा (α) कणों की बौछार की। पन्नी के चारों ओर जिंक सल्फाइड (ZnS) का प्रतिदीप्तिशील पर्दा लगाया गया था, जिस पर α-कण टकराने पर चमक (Flash) दिखाई देती थी।
प्रमुख प्रेक्षण एवं निष्कर्ष
रदरफोर्ड ने स्वयं इस खोज पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा था कि यह ऐसा ही अविश्वसनीय था जैसे आप एक तोप का 15 इंच का गोला टिशू पेपर पर दागें और वह वापस लौटकर आपसे टकरा जाए। परमाणु के आकार को समझने के लिए — यदि नाभिक को क्रिकेट की गेंद के बराबर मान लिया जाए, तो पूरे परमाणु की त्रिज्या लगभग 5 किलोमीटर होगी, यानी नाभिक के चारों ओर लगभग सब कुछ खाली स्थान है।
| ¶ चित्र: थॉमसन के प्लम पुडिंग मॉडल (ऊपर) में α-कण बिना विक्षेपण के निकल जाते, जबकि रदरफोर्ड के नाभिकीय मॉडल (नीचे) में सघन धनावेशित नाभिक से टकराकर कुछ α-कण बड़े कोण पर विक्षेपित होते हैं। |
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नील्स बोर ने रदरफोर्ड के नाभिकीय मॉडल तथा मैक्स प्लैंक के क्वांटम सिद्धांत के आधार पर हाइड्रोजन परमाणु की संरचना एवं उसके स्पेक्ट्रम की व्याख्या हेतु एक नया मॉडल प्रस्तुत किया।
इलेक्ट्रॉन की ऊर्जा — Eₙ = -13.6 (Z²/n²) eV
कक्षा की त्रिज्या — rₙ = 0.529 (n²/Z) Å
विकिरण की आवृत्ति — ν = (E₂ - E₁)/h
आतिशबाज़ी (पटाखों) में अलग-अलग रंग बोर मॉडल के सिद्धांत पर ही आधारित होते हैं। जब धातु आयन (जैसे स्ट्रॉन्शियम-लाल, बेरियम-हरा, सोडियम-पीला) गर्म होते हैं, तो उनके इलेक्ट्रॉन ऊर्जा ग्रहण कर उच्च स्तर पर जाते हैं और वापस लौटते समय प्रकाश के रूप में विशिष्ट रंग की ऊर्जा उत्सर्जित करते हैं — यही सिद्धांत सोडियम वेपर लैंप (पीली स्ट्रीट लाइट) के पीछे भी काम करता है।
| ¶ चित्र: बोर मॉडल — इलेक्ट्रॉन n=1,2,3 जैसे निश्चित ऊर्जा-स्तरों (कक्षाओं) में नाभिक (+Ze) के चारों ओर परिक्रमा करता है; उच्च से निम्न स्तर पर आने पर ΔE = hν ऊर्जा प्रकाश के रूप में उत्सर्जित होती है। |
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नाभिक की खोज के बाद वैज्ञानिकों ने यह समझने की कोशिश की कि किसी तत्व की पहचान कैसे तय होती है, और एक ही तत्व के परमाणुओं में भी विविधता क्यों पाई जाती है।
नाभिक में उपस्थित प्रोटॉन (p⁺) एवं न्यूट्रॉन (n⁰) को सामूहिक रूप से न्यूक्लिऑन कहा जाता है।
द्रव्यमान संख्या — A = Z + n (Z = प्रोटॉन संख्या, n = न्यूट्रॉन संख्या)
उदासीन परमाणु में — प्रोटॉनों की संख्या = इलेक्ट्रॉनों की संख्या = Z
कार्बन परमाणु में प्रोटॉन = 6 तथा न्यूट्रॉन = 6 होते हैं, इसलिए इसकी द्रव्यमान संख्या (A) = 6 + 6 = 12 होती है, जबकि परमाणु क्रमांक (Z) = 6 है। इसी परमाणु क्रमांक के आधार पर कार्बन को आवर्त सारणी में छठे स्थान पर रखा गया है।
| अवधारणा | क्या समान है | क्या भिन्न है | उदाहरण |
|---|---|---|---|
| समस्थानिक (Isotopes) | परमाणु संख्या (Z) | द्रव्यमान संख्या (A) | ¹H, ²H (ड्यूटीरियम), ³H (ट्रिटियम) |
| समभारिक (Isobars) | द्रव्यमान संख्या (A) | परमाणु संख्या (Z) | ⁴⁰Ar, ⁴⁰K, ⁴⁰Ca |
| आइसोटोन (Isotones) | न्यूट्रॉन संख्या (N) | Z एवं A दोनों | ¹⁴C एवं ¹⁵N |
हाइड्रोजन के तीन समस्थानिक — प्रोटियम (¹H), ड्यूटीरियम (²H) एवं ट्रिटियम (³H) — तीनों की परमाणु संख्या 1 है, इसलिए रासायनिक गुण लगभग समान हैं। परंतु ड्यूटीरियम से बना "भारी जल" (Heavy Water, D₂O) परमाणु रिएक्टरों में मंदक (Moderator) के रूप में उपयोग होता है, जबकि साधारण जल (H₂O) पीने के काम आता है — यानी समस्थानिक होने के बावजूद इनके भौतिक उपयोग अलग हैं।
कुछ समस्थानिक रेडियोधर्मी होते हैं, जिनका चिकित्सा, कृषि एवं अनुसंधान में व्यापक उपयोग होता है (विस्तृत अध्ययन अध्याय-10 रेडियोधर्मिता में)।
| समस्थानिक | प्रमुख उपयोग |
|---|---|
| कोबाल्ट-60 (Co⁶⁰) | कैंसर के उपचार (रेडियोथेरेपी) में |
| आयोडीन-131 (I¹³¹) | थायराइड ग्रंथि के उपचार में |
| कार्बन-14 (C¹⁴) | जीवाश्मों की आयु ज्ञात करने में (कार्बन डेटिंग) |
| सोडियम-24 (Na²⁴) | रक्त परिसंचरण तंत्र संबंधी विकारों का पता लगाने में |
| यूरेनियम-235 (U²³⁵) | परमाणु भट्टी (रिएक्टर) में ऊर्जा उत्पादन हेतु |
बोर मॉडल की सीमाओं को दूर करने के लिए वैज्ञानिकों ने ऐसे मॉडल की तलाश की, जो इलेक्ट्रॉन के व्यवहार को अधिक सटीकता से समझा सके। इसका आधार बना द्रव्य की तरंग-कण द्वैत प्रकृति।
1924 में फ्रांसीसी भौतिक वैज्ञानिक लुई डी ब्रॉग्ली ने यह सिद्धांत दिया कि विकिरण (प्रकाश) की तरह द्रव्य भी द्वैत व्यवहार प्रदर्शित करता है, अर्थात द्रव्य में कण (Particle) तथा तरंग (Wave) दोनों प्रकार के गुण पाए जाते हैं।
λ = h/mv = h/p
(λ = तरंगदैर्घ्य, h = प्लांक स्थिरांक, m = द्रव्यमान, v = वेग, p = संवेग)
डी ब्रॉग्ली सिद्धांत के आधार पर ही इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी (Electron Microscope) का निर्माण हुआ, जो इलेक्ट्रॉनों के तरंग व्यवहार पर आधारित है और किसी सूक्ष्म वस्तु को लगभग 15 लाख गुना तक बड़ा करके दिखा सकता है — यह उपकरण आज वायरस जैसे अति सूक्ष्म कणों के अध्ययन में उपयोग होता है, जिन्हें सामान्य सूक्ष्मदर्शी से नहीं देखा जा सकता।
वर्नर हाइज़ेनबर्ग के अनुसार, किसी इलेक्ट्रॉन जैसे सूक्ष्म कण की सही स्थिति (Position) और सही वेग या संवेग (Momentum) का निर्धारण एक साथ, पूर्ण सटीकता से संभव नहीं है। यदि स्थिति अधिक सटीक ज्ञात की जाए, तो वेग की अनिश्चितता बढ़ जाती है, और इसके विपरीत भी सत्य है।
Δx · Δpₓ ≥ h/4π
इस सिद्धांत को समझने के लिए कल्पना करें कि आप एक अंधेरे कमरे में उड़ती हुई तितली की स्थिति जानने के लिए उस पर टॉर्च की तेज़ रोशनी डालते हैं — रोशनी की ऊर्जा तितली की स्थिति तो बता देगी, पर उसकी उड़ान की दिशा एवं गति को बदल भी देगी। इलेक्ट्रॉन जैसे सूक्ष्म कण के साथ भी यही होता है, जिस कारण इसका निश्चित पथ बताना असंभव है — इसीलिए बोर मॉडल की "निश्चित कक्षा" वाली अवधारणा वैज्ञानिक रूप से सही नहीं मानी जाती।
1926 में इर्विन श्रोडिंगर ने तरंग यांत्रिकी के आधार पर एक समीकरण (Hψ = Eψ) प्रस्तुत किया, जिसके हल से परमाणु में इलेक्ट्रॉन की ऊर्जा एवं संभावित स्थिति के बारे में जानकारी प्राप्त होती है। इस मॉडल के अनुसार इलेक्ट्रॉन का निश्चित पथ नहीं, बल्कि उसके मिलने की प्रायिकता (Probability) बताई जा सकती है।
परमाणु में उपस्थित प्रत्येक इलेक्ट्रॉन की स्थिति एवं ऊर्जा को चार क्वांटम संख्याओं द्वारा दर्शाया जाता है।
| क्वांटम संख्या | प्रतीक | क्या बताती है | स्वीकृत मान |
|---|---|---|---|
| मुख्य क्वांटम संख्या | n | मुख्य कोश, कक्षक का आकार व ऊर्जा | 1, 2, 3, 4… (कोश = K, L, M, N…) |
| दिगंशीय/उपसहसंयोजक | l | उपकोश एवं कक्षक का आकार | 0 से (n-1) तक (0,1,2,3 = s,p,d,f) |
| चुंबकीय क्वांटम संख्या | m | उपकोश में कक्षकों की संख्या व अभिविन्यास | −l से +l तक (कुल = 2l+1) |
| चक्रण/स्पिन क्वांटम संख्या | mₛ | इलेक्ट्रॉन का चक्रण | +1/2, −1/2 |
क्वांटम संख्याओं को किसी व्यक्ति के पूरे पते की तरह समझें — मुख्य क्वांटम संख्या (n) शहर बताती है, दिगंशीय क्वांटम संख्या (l) मोहल्ला बताती है, चुंबकीय क्वांटम संख्या (m) घर का नंबर बताती है, और स्पिन क्वांटम संख्या (mₛ) यह बताती है कि घर में कौन-सा व्यक्ति है। जैसे दो अलग व्यक्तियों का पूरा पता एक जैसा नहीं हो सकता, वैसे ही परमाणु में किन्हीं दो इलेक्ट्रॉनों की चारों क्वांटम संख्याएँ समान नहीं हो सकतीं (पाउली सिद्धांत)।
| ¶ चित्र: (बाएँ) आयुफ्बाऊ विकर्ण नियम — s, p, d, f उपकोशों में इलेक्ट्रॉन भरने का क्रम तीर की दिशा में; (दाएँ ऊपर) s, p, d, f कक्षकों के त्रिविमीय आकार — s गोलाकार, p डम्बलाकार, d व f अधिक जटिल। |
|---|
अधिकतम इलेक्ट्रॉन क्षमता = 2n²
K कोश (n=1) = 2, L कोश (n=2) = 8, M कोश (n=3) = 18, N कोश (n=4) = 32
हुंड के नियम को किसी बस में सीट भरने की तरह समझें — जब खाली बस में यात्री चढ़ते हैं, तो हर यात्री पहले खाली सीट पर अकेला बैठना पसंद करता है, तभी जब सभी सीटों पर एक-एक व्यक्ति बैठ जाए, तो नए यात्री किसी के साथ बैठते हैं। इसी प्रकार p-उपकोश के 3 कक्षकों में युग्मन चौथे इलेक्ट्रॉन के आने पर ही शुरू होता है।
किसी परमाणु के विभिन्न कक्षकों में इलेक्ट्रॉनों के वितरण को इलेक्ट्रॉनिक विन्यास कहते हैं। सामान्यतः यह वितरण आयुफ्बाऊ नियम का पालन करता है, परंतु कुछ तत्वों (जैसे क्रोमियम एवं कॉपर) में पूर्ण-पूरित (d¹⁰) या अर्ध-पूरित (d⁵) उपकोशों की अतिरिक्त स्थिरता के कारण इस नियम का अपवाद देखा जाता है।
सामान्य नियम के अनुसार क्रोमियम (Cr, Z=24) का विन्यास [Ar]3d⁴4s² होना चाहिए, परंतु वास्तव में यह [Ar]3d⁵4s¹ होता है — क्योंकि अर्ध-पूरित d⁵ विन्यास सममित इलेक्ट्रॉन वितरण के कारण अधिक स्थायी होता है, ठीक वैसे ही जैसे कोई मेज़ अपने चारों पायों पर बराबर भार पड़ने पर अधिक स्थिर खड़ी रहती है।
जैसे-जैसे नए तत्वों की खोज होती गई, वैज्ञानिकों ने उन्हें व्यवस्थित ढंग से वर्गीकृत करने का प्रयास किया, ताकि तत्वों के गुणों में छिपे पैटर्न को समझा जा सके। यही प्रयास आज की आधुनिक आवर्त सारणी के रूप में परिणत हुआ।
न्यूलैंड्स का अष्टक नियम संगीत के सरगम से प्रेरित था — जैसे "सा रे ग म प ध नि सा" में आठवाँ सुर पहले सुर जैसा ही सुनाई देता है, वैसे ही न्यूलैंड्स ने सोचा कि तत्वों के गुण भी हर आठवें तत्व पर दोहराए जाते हैं। यह विचार रचनात्मक तो था, पर भारी तत्वों के लिए सही सिद्ध नहीं हुआ।
रूसी वैज्ञानिक दिमित्री मेंडलीफ ने तत्वों को उनके बढ़ते परमाणु भार (Atomic Mass) के क्रम में व्यवस्थित किया तथा यह नियम दिया कि तत्वों के भौतिक एवं रासायनिक गुण उनके परमाणु भार के आवर्ती फलन होते हैं (आवर्त नियम)।
मेंडलीफ की सबसे बड़ी सफलता उनकी भविष्यवाणी क्षमता थी — उन्होंने 1871 में "एका-एल्युमिनियम" नामक एक काल्पनिक तत्व के गुण बताए, और 1875 में गैलियम (Gallium) की खोज हुई, जिसके गुण मेंडलीफ की भविष्यवाणी से लगभग पूरी तरह मेल खाते थे। यह किसी वैज्ञानिक सिद्धांत की सबसे बड़ी परीक्षा होती है — भविष्य की सटीक भविष्यवाणी करना।
1913 में अंग्रेज़ वैज्ञानिक हेनरी मोसले ने एक्स-रे स्पेक्ट्रम के अध्ययन से यह सिद्ध किया कि तत्वों के गुणों में आवर्तिता परमाणु भार से नहीं, बल्कि परमाणु क्रमांक (Atomic Number) से नियंत्रित होती है। इसी आधार पर आधुनिक आवर्त नियम प्रतिपादित हुआ।
"तत्वों के भौतिक एवं रासायनिक गुण उनके परमाणु क्रमांक के आवर्ती फलन होते हैं"
मोसले के नियम ने मेंडलीफ की सारणी की खामियों को भी सुधार दिया — जैसे कोबाल्ट (परमाणु भार 58.9) का परमाणु क्रमांक (27) निकल (परमाणु भार 58.7, परमाणु क्रमांक 28) से कम है, इसलिए परमाणु क्रमांक के आधार पर कोबाल्ट को निकल से पहले रखना पूरी तरह तर्कसंगत सिद्ध हुआ, जबकि परमाणु भार के आधार पर यह क्रम उल्टा लगता था।
आधुनिक आवर्त सारणी में कुल 18 समूह (Groups, ऊर्ध्वाधर स्तंभ) एवं 7 आवर्त (Periods, क्षैतिज पंक्तियाँ) होते हैं। तत्वों को उनके इलेक्ट्रॉनिक विन्यास के आधार पर चार ब्लॉकों में बाँटा जाता है।
| ¶ चित्र: आधुनिक आवर्त सारणी — 18 समूह (ऊर्ध्वाधर) एवं 7 आवर्त (क्षैतिज), साथ ही लैंथेनाइड-ऐक्टिनाइड श्रेणी (नीचे पृथक पंक्ति में) दिखाई गई है। |
|---|
| ब्लॉक | समूह | अंतिम इलेक्ट्रॉन किस उपकोश में | उदाहरण |
|---|---|---|---|
| s-ब्लॉक | समूह 1 व 2 | s-उपकोश | सोडियम (Na), कैल्शियम (Ca) |
| p-ब्लॉक | समूह 13-18 | p-उपकोश | कार्बन (C), ऑक्सीजन (O), क्लोरीन (Cl) |
| d-ब्लॉक | समूह 3-12 | d-उपकोश (संक्रमण तत्व) | आयरन (Fe), कॉपर (Cu) |
| f-ब्लॉक | लैंथेनाइड-ऐक्टिनाइड | f-उपकोश | सीरियम (Ce), यूरेनियम (U) |
आवर्त सारणी को एक अपार्टमेंट इमारत की तरह समझें — हर आवर्त (क्षैतिज पंक्ति) एक मंज़िल है, जो दर्शाती है कि परमाणु में कितने कोश हैं। हर समूह (ऊर्ध्वाधर स्तंभ) एक जैसे स्वभाव वाले पड़ोसियों की कतार है, क्योंकि उनकी बाह्यतम कक्षा में इलेक्ट्रॉनों की संख्या समान है, इसलिए वे रासायनिक रूप से एक जैसा व्यवहार करते हैं।
आवर्त सारणी में तत्वों के कुछ गुण एक निश्चित पैटर्न में बदलते हैं, जिन्हें आवर्त प्रवृत्तियाँ कहा जाता है। इनका मुख्य कारण प्रभावी नाभिकीय आवेश (Effective Nuclear Charge) एवं परिरक्षण प्रभाव (Shielding Effect) में होने वाला परिवर्तन है।
आवर्त में बाएँ→दाएँ : त्रिज्या ↓ आयनन ऊर्जा ↑ विद्युत ऋणात्मकता ↑ धात्विक गुण ↓
समूह में ऊपर→नीचे : त्रिज्या ↑ आयनन ऊर्जा ↓ विद्युत ऋणात्मकता ↓ धात्विक गुण ↑
यही कारण है कि सोडियम (समूह-1, बाईं ओर) एक अत्यंत क्रियाशील धातु है, जो पानी से तेज़ी से क्रिया करती है, जबकि उसी आवर्त के दाईं ओर स्थित क्लोरीन एक अधातु है, जो इलेक्ट्रॉन ग्रहण करने की तीव्र प्रवृत्ति रखती है — इसीलिए सोडियम व क्लोरीन आसानी से मिलकर स्थिर सोडियम क्लोराइड (साधारण नमक) बना लेते हैं, क्योंकि सोडियम इलेक्ट्रॉन देना चाहता है और क्लोरीन लेना चाहती है।