📋 इस अध्याय में (Table of Contents)
- राजस्थान में दलीय व्यवस्था का ऐतिहासिक विकास (1952 से वर्तमान तक के 5 चरण)
- क्षेत्रीय दल, तीसरा मोर्चा एवं निर्दलीयों की भूमिका (RLP, BAP, BSP, स्वतंत्र पार्टी)
- मतदान व्यवहार के निर्धारक तत्व (Determinants of Voting Behaviour) — जाति, क्षेत्र, लिंग व कल्याणकारी नीतियां
- राजस्थान के प्रमुख सामाजिक व राजनीतिक आंदोलन (RTI, आरक्षण, किसान, पर्यावरण)
- राजस्थान की राजनीति में समकालीन प्रवृत्तियाँ एवं चुनौतियाँ (बाड़ेबंदी, पेपर लीक, ERCP)
- विधानसभा चुनावों का ऐतिहासिक सारणीबद्ध विश्लेषण (1952–2023)
- परीक्षा उपयोगी महत्वपूर्ण शब्दावली (Keyword Box)
🗳️ दलीय व्यवस्था का विकास
1राजस्थान में दलीय व्यवस्था का ऐतिहासिक विकास (Party System Evolution)
राजस्थान में दलीय राजनीति का स्वरूप राष्ट्रीय राजनीति के समानांतर किंतु अपनी विशिष्ट सामंती, क्षेत्रीय और सामाजिक पृष्ठभूमि से प्रेरित होकर विकसित हुआ है। 1952 के प्रथम आम चुनाव से लेकर वर्तमान तक की दलीय व्यवस्था को पाँच प्रमुख चरणों में विभाजित किया जा सकता है:
📜 दलीय प्रणाली के 5 ऐतिहासिक चरण:
- प्रथम चरण (1952 – 1977 : एकदलीय प्रभुत्व का युग):
• इस दौर में कांग्रेस पार्टी का निर्विवाद वर्चस्व रहा। मोहनलाल सुखाड़िया 17 वर्षों (1954–1971) तक मुख्यमंत्री रहे और आधुनिक राजस्थान के निर्माता कहलाए।
• विपक्ष में मुख्य रूप से दक्षिणपंथी व सामंती दल सक्रिय रहे — राम राज्य परिषद (RRP), भारतीय जनसंघ (BJS) तथा 1960 के दशक में महारानी गायत्री देवी के नेतृत्व में स्वतंत्र पार्टी (Swatantra Party)।
• 1967 के चौथे विधानसभा चुनाव में किसी दल को स्पष्ट बहुमत न मिलने पर राज्य में पहली बार राष्ट्रपति शासन (मार्च-अप्रैल 1967) लगा।
- द्वितीय चरण (1977 – 1990 : गैर-कांग्रेसी राजनीति का उदय):
• आपातकाल के उपरांत 1977 के चुनाव में जनता पार्टी को भारी बहुमत मिला और श्री भैरोंसिंह शेखावत के नेतृत्व में राज्य की प्रथम गैर-कांग्रेसी सरकार बनी।
• इस चरण में कांग्रेस के एकछत्र प्रभुत्व का अंत हुआ और राज्य स्पष्ट रूप से प्रतिस्पर्धी राजनीति की ओर अग्रसर हुआ।
- तृतीय चरण (1990 – 1998 : भाजपा का सुदृढ़ीकरण एवं गठबंधन दौर):
• 1990 के चुनाव में भाजपा और जनता दल ने मिलकर सरकार बनाई (भैरोंसिंह शेखावत मुख्यमंत्री)।
• 1992 में बाबरी ढांचा विध्वंस के बाद राष्ट्रपति शासन लगा, परंतु 1993 के चुनाव में भाजपा ने निर्दलीयों के सहयोग से पुनः सरकार बनाई और अपना 5 वर्ष का कार्यकाल पूर्ण किया।
- चतुर्थ चरण (1998 – 2023 : द्विदलीय चक्रीय प्रतिमान / घूर्णन व्यवस्था):
• 1998 से 2023 तक राजस्थान की राजनीति 'अल्टरनेटिव टू-पार्टी सिस्टम' (Alternating Two-Party System) यानी 'हर पाँच साल में सरकार बदलने का रिवाज' के लिए प्रसिद्ध हुई।
• 1998 (कांग्रेस-153 सीटें, अशोक गहलोत) ➔ 2003 (भाजपा-120 सीटें, वसुंधरा राजे) ➔ 2008 (कांग्रेस-96 सीटें, अशोक गहलोत) ➔ 2013 (भाजपा-163 सीटें - ऐतिहासिक बहुमत) ➔ 2018 (कांग्रेस-99+1 सीटें) ➔ 2023 (भाजपा-115 सीटें, भजनलाल शर्मा)।
- पंचम चरण (2023 के बाद : बहुकोणीय दबाव व उप-क्षेत्रीय अस्मिता):
• यद्यपि सत्ता भाजपा-कांग्रेस के मध्य ही रहती है, किंतु आदिवासी बेल्ट (वागड़) में BAP, किसान-युवा बेल्ट (मारवाड़) में RLP, और पूर्वी राजस्थान में BSP तथा निर्दलीय उम्मीदवारों ने दोनों प्रमुख दलों के वोट शेयर में सेंध लगाई है।
🚩 क्षेत्रीय दल एवं तीसरा मोर्चा
2क्षेत्रीय दल, तीसरा मोर्चा एवं निर्दलीयों की भूमिका
राजस्थान में तमिलनाडु (DMK/AIADMK), ओडिशा (BJD) या उत्तर प्रदेश (सपा/बसपा) की तरह कोई स्थायी और शक्तिशाली क्षेत्रीय दल पूरे राज्य पर शासन नहीं कर सका, किंतु विभिन्न क्षेत्रों में विशिष्ट दलों ने किंगमेकर या दबाव समूह की भूमिका निभाई है:
🏛️ ऐतिहासिक क्षेत्रीय एवं विपक्षी दल
- राम राज्य परिषद (RRP) : स्वामी करपात्री जी द्वारा स्थापित, 1952 के प्रथम चुनाव में 24 सीटें जीतकर मुख्य विपक्षी दल बनी (सामंती व जागीरदार हितों का प्रतिनिधित्व)।
- स्वतंत्र पार्टी (1959–1974) : सी. राजगोपालाचारी व मीनू मसानी द्वारा स्थापित। राजस्थान में जयपुर की महारानी गायत्री देवी इसका प्रमुख चेहरा थीं। 1962 में 36 सीटें तथा 1967 में 48 सीटें जीतकर मुख्य विपक्षी दल बनी।
- कृषिकार लोक पार्टी (KLP) : 1952 में जाट व किसान नेताओं का प्रतिनिधित्व।
⚡ समकालीन क्षेत्रीय व उप-क्षेत्रीय दल
- भारत आदिवासी पार्टी (BAP) : 2023 में भारतीय ट्राइबल पार्टी (BTP) से अलग होकर गठित। दक्षिणी राजस्थान (डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़, उदयपुर ग्रामीण) में 'भील प्रदेश' की मांग और आदिवासी स्वायत्तता के मुद्दे पर तीव्र उभार। 2023 में 3 विधानसभा व 2024 में 1 लोकसभा सीट जीती।
- राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (RLP) : 2018 में हनुमान बेनीवाल द्वारा स्थापित। नागौर, बाड़मेर, जोधपुर ग्रामीण क्षेत्रों में किसान, जाट व युवा मतदाताओं के बीच प्रभाव। 2018 में 3 सीटें जीतीं।
- बहुजन समाज पार्टी (BSP) : पूर्वी राजस्थान (अलवर, भरतपुर, धौलपुर, करौली) में दलित-मुस्लिम समीकरण पर प्रभावी। 2008 व 2018 में 6-6 सीटें जीतकर कांग्रेस सरकार को समर्थन दिया (यद्यपि दोनों बार इसके विधायक कांग्रेस में विलय कर गए)।
🎯 निर्दलीयों की 'किंगमेकर' भूमिका:
राजस्थान में बागी और कद्दावर स्थानीय नेताओं के कारण निर्दलीय (Independents) का वोट प्रतिशत हमेशा 10% से 16% के बीच रहता है। 2008 (14 निर्दलीय) और 2018 (13 निर्दलीय) के चुनावों में जब किसी दल को पूर्ण बहुमत नहीं मिला, तब निर्दलीय विधायकों ने ही सरकार गठन में निर्णायक 'किंगमेकर' की भूमिका निभाई।
📊 मतदान व्यवहार के निर्धारक तत्व
3राजस्थान में मतदान व्यवहार के प्रमुख निर्धारक तत्व (Determinants of Voting Behaviour)
मतदान व्यवहार (Voting Behaviour) से तात्पर्य उन कारकों से है जो मतदाताओं के मत निर्णय को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करते हैं। RAS मुख्य परीक्षा में यह अत्यंत महत्वपूर्ण 10-अंक का प्रश्न बनता है:
🔍 प्रमुख निर्धारक कारक:
- 1. जाति एवं सामाजिक समीकरण (Caste Arithmetic) : राजस्थान की राजनीति में जाति आज भी सबसे प्रबल कारक है।
• जाट राजनीति : शेखावाटी, मारवाड़ और बीकानेर संभाग में सर्वाधिक प्रभावशाली कृषि वर्ग।
• राजपूत राजनीति : पारंपरिक सत्ता वर्ग, जिसका प्रभाव मारवाड़, मेवाड़ और ढूंढाड़ में है।
• गुर्जर व मीणा राजनीति : पूर्वी राजस्थान (दौसा, करौली, सवाई माधोपुर, भरतपुर) में परस्पर राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता और आरक्षण का मुद्दा।
• दलित (SC - 17.8%) व जनजातीय (ST - 13.5%) मतदाता : राज्य में 34 सीटें SC तथा 25 सीटें ST हेतु आरक्षित हैं, जो सत्ता की चाबी मानी जाती हैं।
- 2. उप-क्षेत्रीय अस्मिताएं (Sub-Regionalism) :
• मारवाड़ (जोधपुर संभाग — 33 सीटें): यहाँ का चुनावी रुझान अक्सर मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार से प्रभावित होता है।
• मेवाड़-वागड़ (28 सीटें): 'मेवाड़ जीते तो राजस्थान जीते' की ऐतिहासिक धारणा — जो दल मेवाड़ में बढ़त बनाता है, वह राज्य में सरकार बनाता है।
• शेखावाटी: किसान व सैन्य बाहुल्य, रोजगार व शिक्षा के मुद्दों पर संवेदनशील।
• हाड़ौती: पारंपरिक रूप से भाजपा का मजबूत गढ़ रहा है।
- 3. महिला मतदाता एवं 'जेंडर वोट बैंक' (Women Voters as a Solid Constituency) :
• विगत 3 चुनावों में महिलाओं का मतदान प्रतिशत पुरुषों के लगभग बराबर या कई सीटों पर अधिक रहा है।
• कल्याणकारी योजनाओं (मुफ्त स्मार्टफोन, उज्ज्वला गैस सब्सिडी, मातृत्व पोषण, स्कूटी वितरण, सुरक्षा) ने महिलाओं को एक स्वतंत्र राजनीतिक समूह में तब्दील किया है।
- 4. कल्याणकारी लोकलुभावनवाद बनाम राजकोषीय अनुशासन (Welfare Populism) :
• बिजली बिल माफी, पुरानी पेंशन योजना (OPS), चिरंजीवी/आयुष्मान स्वास्थ्य बीमा, सामाजिक सुरक्षा पेंशन बढ़ोतरी आदि योजनाएं सीधे मतदान निर्णय को प्रभावित करती हैं।
- 5. राष्ट्रीय बनाम स्थानीय नेतृत्व (Leadership Appeal) :
• राष्ट्रीय स्तर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का प्रभाव और राज्य स्तर पर स्थानीय नेताओं (भैरोंसिंह शेखावत, वसुंधरा राजे, अशोक गहलोत) की व्यक्तिगत लोकप्रियता व छवि।
✊ सामाजिक व राजनीतिक आंदोलन
4राजस्थान के प्रमुख सामाजिक एवं जन आंदोलन (Social & Mass Movements)
राजस्थान की राजनीतिक व्यवस्था केवल चुनावों तक सीमित नहीं है; जन आंदोलनों ने कई ऐतिहासिक कानूनों और राष्ट्रीय नीतियों की नींव इसी धरती पर रखी है:
📜 1. सूचना के अधिकार का आंदोलन (RTI Movement) — विश्वप्रसिद्ध ऐतिहासिक आंदोलन
नेतृत्व : अरुणा रॉय (Aruna Roy), निखिल डे, शंकर सिंह एवं मजदूर किसान शक्ति संगठन (MKSS)।
- शुरुआत : 1990 के दशक में राजसमंद जिले के देवडूंगरी गांव से।
- नारा : "हमारा पैसा, हमारा हिसाब" तथा "जानने का हक, जीने का हक"।
- पद्धति : कोट किराना (ब्यावर) में 40 दिनों का ऐतिहासिक धरना और 'जन सुनवाई' (Public Hearing) का अनूठा मॉडल, जिसमें सार्वजनिक विकास कार्यों के मस्टरोल पढ़कर ग्रामीणों के सामने वित्तीय भ्रष्टाचार उजागर किया गया।
- परिणाम : राजस्थान वर्ष 2000 में सूचना का अधिकार कानून लागू करने वाला अग्रणी राज्य बना, जिसने 2005 में भारत सरकार द्वारा केंद्रीय सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (RTI Act 2005) पारित करने का मार्ग प्रशस्त किया।
🛡️ 2. आरक्षण आंदोलन (Reservation Agitations in Rajasthan)
- गुर्जर आरक्षण आंदोलन : कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला के नेतृत्व में 2006 से प्रारंभ। पीलूपुरा (भरतपुर) रेलवे ट्रैक जाम एवं संघर्ष। परिणामतः राज्य सरकार द्वारा अति पिछड़ा वर्ग (MBC - Most Backward Classes) के तहत 5% आरक्षण का प्रावधान किया गया (गुर्जर, रैबारी, गाडरी, बंजारा, गड़रिया जातियाँ)।
- जाट आरक्षण आंदोलन : 1999 में केंद्र व राज्य में जाटों को ओबीसी में शामिल किया गया, परंतु भरतपुर व धौलपुर रियासतों के जाटों को तकनीकी कारणों से बाहर रखा गया। बाद में व्यापक आंदोलन के उपरांत 2017 में उन्हें भी राज्य ओबीसी में शामिल किया गया।
🌾 3. किसान एवं नहरी जल आंदोलन
- गंगानगर-अनूपगढ़ नहरी पानी आंदोलन (2004–05) : इंदिरा गांधी नहर परियोजना (IGNP) के प्रथम चरण में सिंचाई हेतु पर्याप्त पानी की मांग को लेकर घड़साना-रावला में व्यापक किसान संघर्ष और शहादत।
- बिजली दर वृद्धि विरोधी आंदोलन : ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि कनेक्शनों पर विद्युत दरों को लेकर भारतीय किसान यूनियन व किसान सभाओं का संघर्ष।
🌿 4. पर्यावरण एवं अरावली संरक्षण आंदोलन
- बिश्नोई पर्यावरण परंपरा : 1730 का खेजड़ली बलिदान (अमृता देवी बिश्नोई के नेतृत्व में 363 शहीदों का बलिदान) आधुनिक चिपको आंदोलन का वैश्विक अग्रदूत है।
- अरावली बचाओ आंदोलन : अवैध खनन, भूजल दोहन और पहाड़ियों के कटाव के विरुद्ध नागरिक समूहों, एनजीओ और न्यायपालिका (सुप्रीम कोर्ट के CEC आदेश) की सक्रियता।
⚠️ समकालीन प्रवृत्तियाँ व चुनौतियाँ
5राजस्थान की राजनीति में समकालीन प्रवृत्तियाँ एवं नई चुनौतियाँ
📌 प्रमुख समकालीन राजनीतिक विमर्श एवं चुनौतियाँ:
- 1. 'बाड़ेबंदी' एवं रिज़ॉर्ट राजनीति (Resort Politics) : विधायकों की खरीद-फरोख्त (Horse Trading) से बचने हेतु चुनाव परिणामों के बाद या राजनीतिक संकट (उदा. 2020 का सियासी संकट) के दौरान विधायकों को होटलों में कैद रखने की प्रवृत्ति ने लोकतांत्रिक संस्थाओं की साख पर प्रश्नचिह्न लगाया है।
- 2. भर्ती परीक्षाओं में पेपर लीक एवं युवा असंतोष : विगत वर्षों में RPSC व RSSB की परीक्षाओं में पर्चा लीक और डमी अभ्यर्थी गिरोह एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बने। 2022 व 2023 में राज्य सरकार को 'राजस्थान सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम' में संशोधन कर आजीवन कारावास व 10 करोड़ तक के जुर्माने का कड़ा प्रावधान करना पड़ा।
- 3. जल राजनीति (Water Politics — ERCP विवाद) : ईस्टर्न राजस्थान कैनाल प्रोजेक्ट (ERCP) — पूर्वी राजस्थान के 13 (अब 21) जिलों में पेयजल व सिंचाई हेतु जीवनरेखा। केंद्र-राज्य विवाद के पश्चात 2024 में राजस्थान, मध्य प्रदेश व केंद्र सरकार के मध्य संशोधित पार्वती-कालीसिंध-चंबल (PKC-ERCP) लिंक परियोजना हेतु त्रिपक्षीय समझौता ज्ञापन (MoU) हस्ताक्षरित हुआ।
- 4. नए जिलों का पुनर्गठन एवं प्रशासनिक राजनीति : 2023 में 19 नए जिले और 3 नए संभागों के गठन की घोषणा ने स्थानीय अस्मिताओं और प्रशासनिक व्ययभार को लेकर राजनीतिक बहस को जन्म दिया।
- 5. जवाबदेही कानून (Social Accountability Bill) की मांग : सरकारी सेवाओं की गारंटी और प्रशासनिक पारदर्शिता हेतु MKSS एवं नागरिक संगठनों द्वारा जन जवाबदेही कानून पारित करने की लगातार मांग की जा रही है।
📊 चुनावी इतिहास सारणी
6राजस्थान विधानसभा चुनाव परिणाम (1998 से 2023 तक का तुलनात्मक परिदृश्य)
| विधानसभा / वर्ष | कुल सीटें | कांग्रेस | भाजपा | अन्य / निर्दलीय | मुख्यमंत्री व सत्ता परिवर्तन |
| 11वीं (1998) | 200 | 153 | 33 | 14 | अशोक गहलोत (कांग्रेस की प्रचंड जीत) |
| 12वीं (2003) | 200 | 56 | 120 | 24 | वसुंधरा राजे (राजस्थान की प्रथम महिला मुख्यमंत्री) |
| 13वीं (2008) | 200 | 96 | 78 | 26 (BSP-6) | अशोक गहलोत (निर्दलीय व बसपा सहयोग से सरकार) |
| 14वीं (2013) | 200 | 21 | 163 | 16 | वसुंधरा राजे (भाजपा का सर्वकालिक ऐतिहासिक रिकॉर्ड) |
| 15वीं (2018) | 200 | 100 | 73 | 27 (RLP-3, BSP-6) | अशोक गहलोत (बसपा विलय व निर्दलीय समर्थन) |
| 16वीं (2023) | 199* | 69 | 115 | 15 (BAP-3, RLP-1, BSP-2) | भजनलाल शर्मा (भाजपा की सत्ता वापसी) |
*2023 में करणपुर सीट पर कांग्रेस प्रत्याशी के निधन के कारण मतदान 199 सीटों पर हुआ था।
🔑 त्वरित पुनरावलोकन शब्दावली (Key Revision Chips)
एकदलीय प्रभुत्व (1952–77)
मोहनलाल सुखाड़िया (17 वर्ष)
भैरोंसिंह शेखावत (1977 प्रथम गैर-कांग्रेसी)
राम राज्य परिषद
स्वतंत्र पार्टी (महारानी गायत्री देवी)
चक्रीय प्रतिमान (1998–2023)
भारत आदिवासी पार्टी (BAP)
राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (RLP)
अरुणा रॉय & MKSS
देवडूंगरी (राजसमंद) RTI
कर्नल किरोड़ी बैंसला (MBC 5%)
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