📋 इस अध्याय में (Table of Contents)
- ओम्बुड्समैन (Ombudsman) एवं लोकपाल-लोकायुक्त की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
- राजस्थान लोकायुक्त एवं उप-लोकायुक्त अधिनियम 1973 — स्वरूप, नियुक्ति एवं कार्यकाल
- लोकायुक्त का क्षेत्राधिकार (Jurisdiction) — कौन शामिल, कौन बाहर (Exclusions)
- लोकायुक्त की शक्तियाँ, कार्यप्रणाली एवं सीमाएं (Powers & Limitations)
- राजस्थान के प्रथम व प्रमुख लोकायुक्त (तथ्यात्मक सारणी)
- भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (Anti-Corruption Bureau - ACB) एवं विधिक ढाँचा
- लोकायुक्त संस्था की चुनौतियाँ एवं सुधार (RAS Mains विशेष विश्लेषण)
- परीक्षा उपयोगी स्मरणीय तथ्य एवं शब्दावली (Quick Revision Keywords)
🌍 ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
1ओम्बुड्समैन (Ombudsman) एवं लोकपाल-लोकायुक्त की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
प्रशासनिक भ्रष्टाचार, अधिकारों के दुरुपयोग एवं नागरिकों की शिकायतों (Citizen Grievances) के निष्पक्ष निवारण हेतु आधुनिक विश्व में स्थापित संस्था को 'ओम्बुड्समैन' (Ombudsman) कहा जाता है। यह एक ऐसी स्वतंत्र, निष्पक्ष संस्था है जो कार्यपालिका के दबाव से मुक्त होकर प्रशासनिक कदाचार की जाँच करती है।
📜 वैश्विक एवं भारतीय विकास क्रम:
- वैश्विक उद्भव : विश्व में सर्वप्रथम 1809 में स्वीडन में ओम्बुड्समैन संस्था की स्थापना की गई थी। इसके पश्चात फिनलैंड (1919), डेनमार्क (1955) तथा न्यूजीलैंड व नॉर्वे (1962) में यह व्यवस्था अपनाई गई। ब्रिटेन ने 1967 में 'पार्लियामेंट्री कमिश्नर फॉर एडमिनिस्ट्रेशन' के रूप में इसे लागू किया।
- भारतीय संदर्भ में नामकरण : भारत में 'लोकपाल' (केंद्र स्तर पर) एवं 'लोकायुक्त' (राज्य स्तर पर) शब्दों का प्रतिपादन प्रख्यात विधिवेत्ता डॉ. लक्ष्मीमल्ल सिंघवी (L.M. Singhvi) द्वारा 1963 में किया गया था।
- प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग (ARC-I, 1966) : मोरारजी देसाई (तत्पश्चात के. हनुमंथैया) की अध्यक्षता में गठित प्रथम एआरसी ने नागरिकों की शिकायतों के निवारण हेतु केंद्र में 'लोकपाल' तथा राज्यों में 'लोकायुक्त' की दो-स्तरीय संस्थाओं की स्थापना की पुरजोर सिफारिश की।
- राज्यों में पहल :
- अधिनियम पारित करने वाला प्रथम राज्य : ओडिशा (उड़ीसा) ने 1970 में लोकायुक्त विधेयक पारित किया (यद्यपि यह लागू 1983 में हुआ)।
- लोकायुक्त संस्था गठित करने वाला प्रथम राज्य : महाराष्ट्र ने 1971 में लोकायुक्त अधिनियम पारित कर संस्था का गठन किया।
- राजस्थान ने 1973 में इस दिशा में ऐतिहासिक कदम उठाया।
⚖️ राजस्थान लोकायुक्त अधिनियम 1973
2राजस्थान लोकायुक्त एवं उप-लोकायुक्त अधिनियम, 1973
राजस्थान में प्रशासनिक भ्रष्टाचार, पद के दुरुपयोग एवं अकर्मण्यता पर अंकुश लगाने के लिए राजस्थान विधानसभा द्वारा वर्ष 1973 में 'राजस्थान लोकायुक्त तथा उप-लोकायुक्त अधिनियम, 1973' पारित किया गया।
⚡ महत्वपूर्ण परीक्षा तिथि:
राजस्थान में लोकायुक्त तथा उप-लोकायुक्त अधिनियम 3 फरवरी 1973 से प्रभावी (लागू) हुआ। राष्ट्रपति की स्वीकृति इसे 26 मार्च 1973 को प्राप्त हुई तथा आयोग ने विधिवत कार्य अगस्त 1973 से प्रारंभ किया।
◈ विधिक प्रकृति, योग्यता एवं नियुक्ति प्रक्रिया
| विषय | विधिक प्रावधान | विवरण / परीक्षा उपयोगी बिंदु |
| संस्था की प्रकृति | सांविधिक (Statutory) एवं अर्ध-न्यायिक (Quasi-judicial) | संविधान में इसका उल्लेख नहीं है। यह राज्य विधानमंडल के कानून द्वारा स्थापित एक स्वतंत्र निकाय है। |
| संरचना | 1 लोकायुक्त + 1 उप-लोकायुक्त (प्रावधान) | अधिनियम में 1 लोकायुक्त एवं 1 उप-लोकायुक्त का प्रावधान है, यद्यपि राजस्थान में अब तक केवल 1 ही उप-लोकायुक्त (के.पी.यू. मेनन) नियुक्त हुए हैं। |
| योग्यता (लोकायुक्त) | सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश अथवा उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश/न्यायाधीश रहा हो | न्यायिक पृष्ठभूमि का होना अनिवार्य है। संसद/विधानसभा का सदस्य अथवा लाभ का पद धारण न करता हो। |
| नियुक्ति कर्ता | राज्यपाल द्वारा वारंट (अधिपत्र) के माध्यम से | राज्यपाल दो प्रमुख व्यक्तियों से अनिवार्य परामर्श (Consultation) के उपरांत नियुक्ति करते हैं:
1. राजस्थान उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice)
2. राजस्थान विधानसभा में विपक्ष के नेता (Leader of Opposition) |
| शपथ | राज्यपाल अथवा अधिकृत व्यक्ति | अनुसूची-1 के अनुसार पद एवं गोपनीयता की शपथ लेते हैं। |
| कार्यकाल | 5 वर्ष अथवा 65 वर्ष की आयु (जो भी पहले हो) | विशेष संशोधन घटनाक्रम: 2018 में भाजपा सरकार ने कार्यकाल 5 से बढ़ाकर 8 वर्ष कर दिया था, जिसे 2019 में कांग्रेस सरकार ने संशोधन विधेयक लाकर पुनः 5 वर्ष कर दिया। |
| पुनर्नियुक्ति | पूर्णतः प्रतिबंधित | लोकायुक्त पदमुक्ति के पश्चात केंद्र या राज्य सरकार के अधीन किसी अन्य लाभ के पद पर नियुक्त नहीं हो सकते। |
| वेतन एवं भत्ते | उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के समकक्ष | वेतन-भत्तों में कार्यकाल के दौरान कोई अलाभकारी परिवर्तन नहीं किया जा सकता। |
| त्यागपत्र एवं पदमुक्ति | राज्यपाल को त्यागपत्र; हटाने का अधिकार राज्यपाल को | साबित कदाचार या असमर्थता के आधार पर, विधानसभा में विशेष बहुमत से संकल्प पारित होने एवं उच्च न्यायालय/सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश द्वारा जाँच के बाद। |
🎯 क्षेत्राधिकार (Jurisdiction)
3लोकायुक्त का क्षेत्राधिकार — कौन जाँच के दायरे में है और कौन बाहर?
RPSC RAS परीक्षा (Pre एवं Mains) में लोकायुक्त के क्षेत्राधिकार से संबंधित प्रश्न सबसे अधिक बार पूछे जाते हैं। यह जानना अत्यंत आवश्यक है कि लोकायुक्त किन पदाधिकारियों के विरुद्ध भ्रष्टाचार एवं पद के दुरुपयोग की शिकायतों की जाँच कर सकते हैं और कौन इससे पूर्णतः बाहर हैं।
✅ क्षेत्राधिकार में शामिल (Inclusions)
- मंत्री परिषद के सदस्य : सभी कैबिनेट मंत्री, राज्य मंत्री एवं उपमंत्री (मुख्यमंत्री को छोड़कर)।
- स्थानीय निकायों के शीर्ष जनप्रतिनिधि :
• जिला प्रमुख एवं उप-जिला प्रमुख
• पंचायत समितियों के प्रधान एवं उप-प्रधान
• नगर निगमों के महापौर एवं उपमहापौर
• नगर परिषदों के सभापति एवं उपसभापति
• नगर पालिकाओं के अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष
- लोक सेवक (Public Servants) : राज्य सरकार के समस्त अधिकारी एवं कर्मचारी (राजपत्रित व अराजपत्रित संवर्ग)।
- स्वायत्तशासी संस्थाएं एवं बोर्ड : राज्य विधानमंडल के अधिनियम द्वारा स्थापित निगमों, सार्वजनिक उपक्रमों, बोर्डों (उदा. राजस्थान आवासन मंडल, रिको, विद्युत निगम) के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, प्रबंध निदेशक (MD) एवं कर्मचारी।
- जिला परिषद व पंचायत समितियों की स्थायी समितियों के अध्यक्ष।
❌ क्षेत्राधिकार से बाहर (Exclusions — अत्यंत महत्वपूर्ण)
- मुख्यमंत्री (Chief Minister) : राजस्थान लोकायुक्त के क्षेत्राधिकार से बाहर हैं। (नोट: कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश व महाराष्ट्र में सीएम दायरे में हैं, परंतु राजस्थान में नहीं)।
- न्यायपालिका : राजस्थान उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश, न्यायाधीश तथा अधीनस्थ न्यायिक सेवा के अधिकारी।
- संवैधानिक आयोग : राजस्थान लोक सेवा आयोग (RPSC) के अध्यक्ष एवं सदस्य।
- निर्वाचन तंत्र : राज्य निर्वाचन आयुक्त एवं मुख्य निर्वाचन अधिकारी।
- विधानसभा सचिवालय : राजस्थान विधानसभा के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सचिव एवं सचिवालयीन कर्मचारी।
- पंचायती राज के निचले प्रतिनिधि : सरपंच, उप-सरपंच एवं पंच/वार्ड पंच लोकायुक्त के दायरे से बाहर हैं (इनकी जाँच संभागीय आयुक्त/विभागीय स्तर पर होती है)।
- विधानसभा सदस्य (MLAs) : सामान्य विधायक (जब तक वे मंत्री न हों)।
- महाधिवक्ता (Advocate General)।
- राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग के अध्यक्ष व सदस्य।
- सेवानिवृत्त लोक सेवक : पदमुक्ति के बाद किए गए कार्यों की पुरानी शिकायतें।
⚠️ 5 वर्ष की परिसीमा (Limitation Period): लोकायुक्त ऐसी किसी भी शिकायत पर विचार नहीं कर सकते, जो घटना घटित होने की तिथि से 5 वर्ष से अधिक पुरानी हो। इसके अतिरिक्त पदोन्नति, स्थानांतरण, पेंशन, सेवा शर्तें एवं विभागीय अनुशासनात्मक मामलों की शिकायतें भी लोकायुक्त के कार्यक्षेत्र से बाहर हैं।
⚙️ शक्तियाँ एवं कार्यप्रणाली
4लोकायुक्त की शक्तियाँ, कार्यप्रणाली एवं वैधानिक सीमाएं
लोकायुक्त संस्था एक अन्वेषणात्मक एवं सिफारिशी संस्था है। इसे सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC 1908) के तहत दीवानी अदालत (Civil Court) की शक्तियाँ प्राप्त हैं।
🔍 दीवानी अदालत के रूप में प्रमुख शक्तियाँ:
- किसी भी गवाह को समन जारी कर व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने तथा शपथ पर परीक्षण (Examination on oath) करने का अधिकार।
- किसी भी सरकारी कार्यालय अथवा न्यायालय से लोक अभिलेख (Public Records) या दस्तावेज तलब करने का अधिकार।
- शपथ पत्रों (Affidavits) पर साक्ष्य प्राप्त करने का अधिकार।
- दस्तावेजों व गवाहों की जाँच हेतु कमीशन (Commissions) जारी करने का अधिकार।
- संदेहास्पद परिसर की तलाशी (Search) तथा आवश्यक अभिलेखों को जब्त (Seizure) करने का निर्देश देना।
◈ शिकायत एवं अन्वेषण प्रक्रिया
- शिकायत का माध्यम : कोई भी नागरिक शपथ-पत्र (Affidavit) एवं निर्धारित शुल्क के साथ लोकायुक्त सचिवालय में शिकायत दर्ज करा सकता है। शिकायत झूठी या दुर्भावनापूर्ण पाए जाने पर शिकायतकर्ता के विरुद्ध दंडात्मक कार्रवाई का भी प्रावधान है।
- स्वतः संज्ञान (Suo-Motu) : राजस्थान लोकायुक्त को समाचार पत्रों या सामान्य सूचना के आधार पर स्वतः संज्ञान (Suo-Motu Cognizance) लेने का अधिकार नहीं है (केवल शपथ-पत्र सहित औपचारिक परिवाद पर ही जाँच संभव है)।
- सिफारिशी प्रकृति (Recommendatory Body) : लोकायुक्त स्वयं किसी दोषी अधिकारी को सीधे दंड (सजा या निलंबन) नहीं दे सकते। जाँच पूर्ण होने पर वे अपनी सिफारिश सक्षम प्राधिकारी (Competent Authority — राज्यपाल अथवा मुख्यमंत्री) को भेजते हैं।
- कार्रवाई रिपोर्ट (Action Taken Report) : सक्षम प्राधिकारी को लोकायुक्त की सिफारिश पर की गई कार्रवाई की सूचना 3 माह के भीतर लोकायुक्त को देनी होती है। यदि लोकायुक्त संतुष्ट नहीं हैं, तो वे एक विशेष प्रतिवेदन राज्यपाल को प्रेषित कर सकते हैं।
- वार्षिक प्रतिवेदन : लोकायुक्त अपना वार्षिक प्रतिवेदन राज्यपाल को सौंपते हैं, जिसे राज्यपाल राज्य विधानमंडल के दोनों सदनों (राजस्थान में एक सदन - विधानसभा) के पटल पर रखवाते हैं।
📋 ऐतिहासिक तथ्य एवं सूची
5राजस्थान के प्रथम व प्रमुख लोकायुक्त — ऐतिहासिक तथ्य सारणी
| पद / क्रम | पदाधिकारी का नाम | कार्यकाल | विशेष विवरण / परीक्षा तथ्य |
| प्रथम लोकायुक्त | न्यायमूर्ति आई.डी. दुआ (Justice I.D. Dua) | 28 अगस्त 1973 से 1978 | राजस्थान के प्रथम लोकायुक्त (सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश) |
| प्रथम उप-लोकायुक्त | के.पी.यू. मेनन (K.P.U. Menon) | 5 जून 1973 से 1974 | राजस्थान के प्रथम एवं अब तक के एकमात्र उप-लोकायुक्त (पूर्व मुख्य सचिव) |
| द्वितीय लोकायुक्त | न्यायमूर्ति सी.एम. लोढ़ा | 1978 से 1983 | असम व नगालैंड HC के पूर्व मुख्य न्यायाधीश |
| तृतीय लोकायुक्त | न्यायमूर्ति एम.एल. जोशी | 1983 से 1988 | राजस्थान उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश |
| चतुर्थ लोकायुक्त | न्यायमूर्ति के.एस. सिद्धू | 1988 से 1993 | विशिष्ट प्रशासनिक जाँच रिपोर्ट प्रस्तुत की |
| पंचम लोकायुक्त | न्यायमूर्ति एम.एल. श्रीमाल | 1994 से 1999 | सिक्किम उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश |
| षष्ठम लोकायुक्त | न्यायमूर्ति एस.सी. मित्तल | 1999 से 2004 | प्रशासनिक सुधारों पर बल |
| सप्तम लोकायुक्त | न्यायमूर्ति एन.के. जैन | 2005 से 2010 | मद्रास उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश |
| अष्टम लोकायुक्त | न्यायमूर्ति एस.एस. कोठारी | 2013 से 2019 | सर्वाधिक कार्यकाल (कार्यकाल 5 से 8 वर्ष संशोधन के दौरान रहे) |
| वर्तमान लोकायुक्त | न्यायमूर्ति प्रताप कृष्ण लोहरा (P.K. Lohra) | मार्च 2021 से निरंतर | राजस्थान उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश; मार्च 2021 में पदभार ग्रहण किया |
🚨 भ्रष्टाचार विरोधी तंत्र व ACB
6भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) एवं विधिक संरचना
राजस्थान में लोकायुक्त के अतिरिक्त प्रशासनिक स्तर पर भ्रष्टाचार के सीधे अन्वेषण, ट्रैप कार्रवाई एवं आपराधिक अभियोजन हेतु भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (Anti-Corruption Bureau - ACB) कार्यरत है।
🛡️ राजस्थान ACB का संगठन एवं कार्यप्रणाली:
- इतिहास : राजस्थान में वर्ष 1957 में 'भ्रष्टाचार निरोधक विभाग' (Anti-Corruption Department - ACD) की स्थापना की गई थी, जिसका बाद में पुनर्गठन कर भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) नाम दिया गया।
- प्रशासनिक नियंत्रण : ACB राजस्थान सरकार के गृह विभाग (Home Department) के प्रशासनिक नियंत्रण में एक स्वतंत्र पुलिस अन्वेषण एजेंसी के रूप में कार्य करता है। इसका नेतृत्व पुलिस महानिदेशक (DGP) या अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (ADGP) स्तर के वरिष्ठ IPS अधिकारी करते हैं।
- विधिक आधार : ACB को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (Prevention of Corruption Act, 1988) तथा 2018 के संशोधन अधिनियम के अंतर्गत लोक सेवकों के विरुद्ध अन्वेषण, प्राथमिकी (FIR) दर्ज करने तथा विशेष न्यायालयों में चालान पेश करने का वैधानिक अधिकार प्राप्त है।
- प्रमुख कार्य :
1. ट्रैप कार्रवाई (Trap Action) : रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़ना।
2. अनुपातहीन संपत्ति (Disproportionate Assets - DA) : ज्ञात आय स्रोतों से अधिक संपत्ति अर्जित करने वाले अधिकारियों पर छापे।
3. पद का दुरुपयोग (Misuse of Official Position) : सरकारी निविदाओं, पट्टों व अनुबंधों में वित्तीय अनियमितताओं की जाँच।
- नागरिक हेल्पलाइन : नागरिकों द्वारा रिश्वत मांगने की तत्काल सूचना दर्ज कराने हेतु टोल-फ्री हेल्पलाइन 1064 एवं विशेष व्हाट्सएप हेल्पलाइन संचालित है।
◈ राज्य सतर्कता आयोग (State Vigilance Commission):
केंद्र में 1964 में संथानम समिति (K. Santhanam Committee) की सिफारिश पर केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) की तर्ज पर राजस्थान में भी 1964 में राज्य सतर्कता आयोग का गठन किया गया था। यद्यपि लोकायुक्त संस्था के पूर्ण क्रियान्वयन के पश्चात 1978 में राज्य सतर्कता आयोग को भंग (समाप्त) कर दिया गया और इसके दायित्व प्रशासनिक सुधार विभाग व ACB को सौंपे गए।
✍️ RAS Mains विशेष विश्लेषण
7लोकायुक्त संस्था की चुनौतियाँ एवं सुधार के सुझाव (RAS Mains Notes)
RAS मुख्य परीक्षा (Paper-3: लोक प्रशासन एवं राज्यव्यवस्था) के दृष्टिकोण से लोकायुक्त संस्था की प्रभावशीलता एवं सीमाओं का आलोचनात्मक मूल्यांकन एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न है।
⚠️ प्रमुख संस्थागत चुनौतियाँ एवं कमियाँ:
- दंतविहीन संस्था (Toothless Tiger) : लोकायुक्त के पास केवल सिफारिश करने का अधिकार है, दंडात्मक कार्रवाई का नहीं। सरकार सिफारिश मानने के लिए विधिक रूप से बाध्य नहीं है।
- स्वतंत्र जाँच एजेंसी का अभाव : लोकायुक्त के पास अपना स्वतंत्र अन्वेषण कैडर (Investigative Staff) नहीं है; उन्हें राज्य सरकार के पुलिस अधिकारियों अथवा ACB पर ही निर्भर रहना पड़ता है।
- महत्वपूर्ण पदों का बाहर होना : राज्य के वास्तविक प्रशासनिक व राजनीतिक प्रमुख — मुख्यमंत्री तथा निचले स्तर के पंचायती राज प्रतिनिधि (सरपंच) इसके दायरे से बाहर हैं।
- स्वतः संज्ञान (Suo-Motu) का अधिकार न होना : समाचार पत्रों, मीडिया स्टिंग या खुले घोटालों पर लोकायुक्त स्वयं पहल करके जाँच शुरू नहीं कर सकते।
- वित्तीय एवं प्रशासनिक निर्भरता : बजट, स्टाफ और संसाधनों के लिए लोकायुक्त सचिवालय राज्य के कार्मिक व वित्त विभाग पर निर्भर रहता है।
- 5 वर्ष की समय-सीमा : जटिल वित्तीय गबन और पुराने घोटालों की जाँच 5 वर्ष की परिसीमा के कारण बाधित हो जाती है।
💡 सुदृढ़ीकरण हेतु प्रमुख सुझाव (Way Forward):
- स्वतंत्र जाँच विंग : लोकायुक्त के अधीन एक समर्पित एवं स्वतंत्र अन्वेषण विंग (Independent Investigation Wing) स्थापित की जाए जिसका प्रशासनिक नियंत्रण केवल लोकायुक्त के पास हो।
- स्वतः संज्ञान का अधिकार : गंभीर सार्वजनिक भ्रष्टाचार के मामलों में लोकायुक्त को मीडिया रिपोर्ट व गुप्त सूचनाओं पर स्वतः संज्ञान लेने की वैधानिक शक्ति दी जाए।
- सिफारिशों की बाध्यकारिता : लोकायुक्त द्वारा की गई सिफारिशों को समयबद्ध रूप से लागू करना अनिवार्य बनाया जाए, अथवा अस्वीकार करने पर सरकार को विधानसभा में ठोस विधिक कारण प्रस्तुत करने हों।
- क्षेत्राधिकार का विस्तार : केंद्र के लोकपाल अधिनियम की तर्ज पर मुख्यमंत्री तथा ग्राम पंचायत स्तर के निर्वाचित जनप्रतिनिधियों (सरपंचों) को भी पारदर्शी सुरक्षा उपायों के साथ लोकायुक्त के दायरे में लाया जाए।
- पर्याप्त बजट व स्वायत्तता : लोकायुक्त संस्था का बजट राज्य की संचित निधि पर भारित किया जाए ताकि वित्तीय स्वतंत्रता सुनिश्चित हो सके।
🔑 त्वरित पुनरावलोकन शब्दावली (Key Revision Chips)
स्वीडन 1809
डॉ. एल.एम. सिंघवी (1963)
प्रथम ARC 1966
3 फरवरी 1973 लागू
न्यायमूर्ति आई.डी. दुआ
के.पी.यू. मेनन (उप-लोकायुक्त)
कार्यकाल: 5 वर्ष / 65 वर्ष
राज्यपाल द्वारा नियुक्ति
C.J. व विपक्ष के नेता से परामर्श
मुख्यमंत्री बाहर
सरपंच-पंच बाहर
RPSC व HC बाहर
5 वर्ष परिसीमा
ACB हेल्पलाइन 1064
न्यायमूर्ति पी.के. लोहरा
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