उच्च न्यायालय (High Court) भारत की न्याय-व्यवस्था की वह कड़ी है जो राज्य-स्तर पर न्याय का सर्वोच्च केन्द्र है। जिस प्रकार सर्वोच्च न्यायालय देश का संवैधानिक शिखर है, उसी प्रकार प्रत्येक राज्य में उच्च न्यायालय नागरिकों के मूल अधिकारों का अभिभावक, अधीनस्थ न्यायालयों का अधिपति एवं संवैधानिक समीक्षा का केन्द्र है।
| उच्च न्यायालय | गठन तिथि | विशेषता |
|---|---|---|
| कलकत्ता उच्च न्यायालय | 2 जुलाई, 1862 | भारत का सबसे प्राचीन (Oldest) उच्च न्यायालय |
| बॉम्बे उच्च न्यायालय | 14 अगस्त, 1862 | वर्तमान में मुम्बई उच्च न्यायालय |
| मद्रास उच्च न्यायालय | 15 अगस्त, 1862 | वर्तमान में चेन्नई उच्च न्यायालय |
केन्द्रीय मंत्रिमण्डल ने 5 जुलाई, 2016 को बॉम्बे, मद्रास और कलकत्ता हाईकोर्ट के नाम बदलकर क्रमशः मुम्बई, चेन्नई, कोलकाता हाईकोर्ट करने का निर्णय लिया।
NGMA (नगमा) — न = नागालैण्ड, ग = गोवा, म = मिजोरम, A = अरुणाचल प्रदेश। ये 4 राज्य अपने-अपने निकटवर्ती उच्च न्यायालयों (जैसे गुवाहाटी, बॉम्बे) के अधिकार-क्षेत्र में आते हैं।
प्रथम महिला HC न्यायाधीश (भारत) : अन्ना चांडी — केरल उच्च न्यायालय। प्रथम महिला HC मुख्य न्यायाधीश : लीला सेठ — हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय। चंडीगढ़, पंजाब व हरियाणा का संयुक्त हाईकोर्ट चंडीगढ़ में है।
राजस्थान के एकीकरण (1948–1956) की ऐतिहासिक प्रक्रिया के दौरान यह प्रश्न उठा कि नवनिर्मित राज्य की राजधानी एवं उच्च न्यायालय कहाँ स्थापित हो? इस महत्वपूर्ण निर्णय के लिए सरकार ने विशेषज्ञ समितियाँ गठित कीं।
| घटना / विकास | तिथि | विवरण |
|---|---|---|
| राजस्थान HC उद्घाटन | 29 अगस्त, 1949 | जोधपुर में; राजप्रमुख सवाई मानसिंह II द्वारा। प्रारम्भ में 4 खण्डपीठ — जयपुर, बीकानेर, कोटा, उदयपुर। |
| राजस्थान "बी" श्रेणी का राज्य | 26 जनवरी, 1950 | संविधान लागू; न्यायाधीशों की संख्या घटकर 1 CJ + 6 = 7 हुई। |
| तीन खण्डपीठें समाप्त | 22 मई, 1952 | बीकानेर, कोटा, उदयपुर बैंच समाप्त। केवल जयपुर खण्डपीठ यथावत। |
| सत्यनारायण राव समिति रिपोर्ट | 26 फरवरी, 1958 | जयपुर खण्डपीठ भी बंद की गई — पूर्वी राजस्थान में भारी आक्रोश। |
| जयपुर पीठ की पुनर्स्थापना | 8 दिसम्बर, 1976 | राज्य पुनर्गठन अधिनियम 1956 की धारा-51(2) के तहत राष्ट्रपति आदेश 1976 द्वारा। |
| जयपुर पीठ ने कार्य प्रारम्भ किया | 31 जनवरी, 1977 | विधिवत कार्य प्रारम्भ। |
| स्वीकृत न्यायाधीश संख्या — 50 | वर्ष 2015 | राजस्थान HC में न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या 50 की गई। |
| प्रथम वर्चुअल कोर्ट | 20 जुलाई, 2022 | CJ एस.एस. शिन्दे द्वारा ई-उद्घाटन। |
गठन : राज्य पुनर्गठन अधिनियम 1956 के बाद। अन्य सदस्य : बी.के. गुप्ता एवं वी. विश्वनाथन। सिफारिश : मुख्यपीठ जोधपुर में रहे, जयपुर खण्डपीठ समाप्त हो। परिणाम : पूर्वी राजस्थान में जन-आक्रोश; 1976 में जयपुर पीठ पुनः बहाल।
राजस्थान में कुल 36 जिला न्यायालय हैं जिनमें से 19 जोधपुर मुख्यपीठ के तथा 17 जयपुर खण्डपीठ के अंतर्गत आते हैं। जोधपुर में 2 और जयपुर में 3 जिला न्यायालय हैं।
बाड़मेर का जिला न्यायालय — जिला मुख्यालय बाड़मेर में नहीं, बल्कि बालोतरा में। नागौर का जिला न्यायालय — जिला मुख्यालय नागौर में नहीं, बल्कि मेड़ता में।
भारतीय संविधान के भाग-6 में उच्च न्यायालयों से संबंधित 18 अनुच्छेद (214 से 231) समाहित हैं। प्रत्येक अनुच्छेद उच्च न्यायालय के किसी एक महत्वपूर्ण पहलू को परिभाषित करता है।
| अनुच्छेद | विषय | मुख्य प्रावधान |
|---|---|---|
| 214 | HC की स्थापना | प्रत्येक राज्य का एक उच्च न्यायालय होगा। |
| 215 | अभिलेख न्यायालय | HC एक अभिलेख न्यायालय (Court of Record) है। न्यायालय की अवमानना पर दण्ड। |
| 216 | गठन | मुख्य न्यायाधीश + अन्य न्यायाधीश। न्यायाधीशों की संख्या — राष्ट्रपति तय करते हैं। |
| 217(i) | नियुक्ति | नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं — कॉलेजियम की सिफारिश + राज्यपाल के परामर्श से। |
| 217(ii) | योग्यता | भारत का नागरिक। 10 वर्ष का न्यायिक/अधिवक्ता अनुभव। कोई न्यूनतम आयु नहीं। |
| 217(iii) | सेवानिवृत्ति | सेवानिवृत्ति आयु 62 वर्ष (15वें संशोधन 1963 से 60 से 62 हुई)। |
| 218 | SC प्रावधान HC पर | उच्चतम न्यायालय से संबंधित कुछ उपबंध HC पर भी लागू। |
| 219 | शपथ | शपथ राज्यपाल या उनके प्रतिनिधि द्वारा। प्रारूप — तीसरी अनुसूची में। |
| 220 | वकालत पर प्रतिबंध | सेवानिवृत्ति के बाद स्थायी CJ/न्यायाधीश — अपने HC के अलावा कहीं वकालत नहीं। |
| 221 | वेतन एवं भत्ते | वेतन संसद द्वारा (2nd Schedule)। CJ — ₹2,50,000; अन्य — ₹2,25,000 प्रतिमाह। वेतन राज्य की संचित निधि से; पेंशन भारत की संचित निधि से। |
| 222 | स्थानान्तरण | राष्ट्रपति एक HC से दूसरे HC में स्थानान्तरण (CJI के परामर्श से)। |
| 223 | कार्यकारी CJ | पद रिक्त होने पर राष्ट्रपति किसी अन्य न्यायाधीश को कार्यवाहक CJ नियुक्त करते हैं। |
| 224 | अपर एवं कार्यकारी न्यायाधीश | कार्यभार बढ़ने पर 2 वर्ष से अधिक नहीं के लिए अपर न्यायाधीश। |
| 224(A) | सेवानिवृत्त CJ की पुनः नियुक्ति | 15वें संशोधन 1963 द्वारा जोड़ा गया। राष्ट्रपति की पूर्वसहमति से। |
| 225 | अधिकारिता | राज्य की सीमा तक। संसद परिवर्तित कर सकती है। राजस्व पर पुराना प्रतिबंध समाप्त। |
| 226 | रिट की शक्ति | 5 रिटें — मूल अधिकार + अन्य विधिक अधिकार दोनों के लिए। SC (Art. 32) से व्यापक। |
| 227 | अधीक्षण शक्ति | HC अधीनस्थ सभी न्यायालयों व अधिकरणों पर पर्यवेक्षण। सशस्त्र बल न्यायालय अपवाद। |
| 228 | मामलों का अंतरण | संवैधानिक प्रश्न वाले मामले HC अपने पास मँगाकर स्वयं निपटा सकता है। |
| 229 | पदाधिकारी एवं व्यय | CJ कर्मचारी नियुक्त कर सकता है। HC का व्यय राज्य की संचित निधि पर भारित। |
| 230 | UT पर अधिकारिता | संसद HC की अधिकारिता केन्द्रशासित प्रदेशों तक बढ़ा सकती है। |
| 231 | दो+ राज्यों हेतु एक HC | 7वें संशोधन 1956 द्वारा। उदाहरण : गुवाहाटी HC — असम, अरुणाचल, नागालैण्ड, मिजोरम। |
⚠️ वित्त आपातकाल में अपवाद: Art. 360(4)(ख) के अनुसार वित्तीय आपातकाल में न्यायाधीशों के वेतन-भत्तों में कटौती की जा सकती है — यही एकमात्र अपवाद है, अन्यथा नियुक्ति के बाद वेतन में अलाभकारी परिवर्तन नहीं।
उच्च न्यायालय की स्वतंत्रता एवं निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए संविधान में न्यायाधीशों की नियुक्ति, वेतन सुरक्षा एवं हटाने की प्रक्रिया में अनेक संवैधानिक सुरक्षाएँ प्रदान की गई हैं।
II जजेज केस (SC Advocates on Record Assn. v. Union of India, 1993) : कॉलेजियम = 1 CJI + 2 वरिष्ठ न्यायाधीश। III जजेज केस (1998) : वर्तमान स्वरूप — 1 CJI + 4 वरिष्ठतम न्यायाधीश। कार्य : उच्च व उच्चतम न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति व स्थानान्तरण की सिफारिश करना।
HC न्यायाधीश के लिए कोई न्यूनतम आयु सीमा का प्रावधान नहीं। SC के लिए "पारंगत विधिवेता (Distinguished Jurist)" वाला प्रावधान HC में नहीं है।
| पद | वेतन (प्रतिमाह) | स्रोत |
|---|---|---|
| HC मुख्य न्यायाधीश | ₹2,50,000 | राज्य की संचित निधि (Consolidated Fund of State) |
| HC अन्य न्यायाधीश | ₹2,25,000 | राज्य की संचित निधि |
| पेंशन (दोनों के लिए) | अंतिम वेतन का 50% | भारत की संचित निधि (Consolidated Fund of India) |
उच्च एवं उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों को हटाने की प्रक्रिया समान है (Art. 124(4) के तहत)। हटाने के दो आधार — (1) सिद्धकदाचार (Proved Misbehaviour), (2) असमर्थता (Incapacity)।
1. प्रस्ताव : संसद के किसी भी सदन में लाया जा सकता है। लोकसभा में 100 सदस्यों के; राज्यसभा में 50 सदस्यों के हस्ताक्षर आवश्यक।
2. अध्यक्ष/सभापति प्रस्ताव स्वीकार या अस्वीकार कर सकते हैं।
3. प्रस्ताव स्वीकृति पर 3 सदस्यीय जाँच समिति : (क) SC का CJ या न्यायाधीश, (ख) HC का एक CJ, (ग) एक प्रख्यात न्यायविद।
4. दोष सिद्ध होने पर — दोनों सदनों में विशेष बहुमत (उपस्थित का 2/3 + कुल का बहुमत) से पारित।
5. राष्ट्रपति न्यायाधीश को हटाने का आदेश जारी करते हैं।
⚠️ सावधान: संविधान में न्यायाधीशों के लिए "Removal" (हटाना) शब्द; राष्ट्रपति के लिए "Impeachment" (महाभियोग)। महाभियोग प्रक्रिया एक ही संसद सत्र में पूर्ण होनी चाहिए। अब तक किसी भी उच्च/उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को महाभियोग द्वारा नहीं हटाया गया।
| न्यायाधीश | न्यायालय | वर्ष | परिणाम |
|---|---|---|---|
| वी. रामास्वामी | उच्चतम न्यायालय | 1992–93 | पारित नहीं हुआ |
| दीपक मिश्रा (CJI) | उच्चतम न्यायालय | 2018 | पारित नहीं हुआ |
| पी.डी. दिनाकरण | सिक्किम HC | — | पारित नहीं हुआ |
| सौमित्र सेन | कलकत्ता HC | — | पारित नहीं हुआ |
| जे.बी. पर्दीवाला | गुजरात HC | — | पारित नहीं हुआ |
| नागार्जुन रेड्डी | आन्ध्रप्रदेश HC | — | पारित नहीं हुआ |
| क्र. | मुख्य न्यायाधीश | कार्यकाल | विशेष |
|---|---|---|---|
| 1 | न्यायमूर्ति कमलकांत वर्मा | 29.08.1949 – 24.01.1950 | प्रथम CJ; इलाहाबाद HC के पूर्व CJ |
| 2 | न्यायमूर्ति कैलाश वांचू | 02.01.1951 – 10.08.1958 | सर्वाधिक कार्यकाल; बाद में SC CJI बने |
| 3 | न्यायमूर्ति सरजू प्रसाद | 28.02.1959 – 10.10.1961 | — |
| 4 | न्यायमूर्ति जे.एस. राणावत | 11.10.1961 – 31.05.1963 | — |
| 5 | न्यायमूर्ति डी.एस. दवे | 01.06.1963 – 17.12.1968 | — |
| 6 | न्यायमूर्ति डी.एम. भंडारी | 18.12.1968 – 15.12.1969 | — |
| 7 | न्यायमूर्ति जे. नारायण | 16.12.1969 – 13.02.1973 | — |
| 8 | न्यायमूर्ति बी.पी. बेरी | 14.02.1973 – 16.02.1975 | — |
| 9 | न्यायमूर्ति पी.एन. सिंघल | 17.02.1975 – 05.11.1975 | बाद में SC न्यायाधीश बने |
| 10 | न्यायमूर्ति वी.पी. त्यागी | 06.11.1975 – 27.12.1977 | — |
| 11 | न्यायमूर्ति सी. होनैया | 27.04.1978 – 22.09.1978 | — |
| 12 | न्यायमूर्ति सी.एम. लोढ़ा | 12.03.1979 – 09.07.1980 | — |
| 13 | न्यायमूर्ति के.डी. शर्मा | 07.01.1981 – 22.10.1983 | — |
| 14 | न्यायमूर्ति पी.के. बनर्जी | 23.10.1983 – 30.09.1985 | — |
| 15 | न्यायमूर्ति डी.पी. गुप्ता | 12.04.1986 – 31.07.1986 | — |
| 16 | न्यायमूर्ति जे.एस. वर्मा | 01.09.1986 – 22.05.1989 | बाद में SC CJI बने |
| 17 | न्यायमूर्ति के.सी. अग्रवाल | 15.04.1990 – 07.04.1994 | — |
| 18 | न्यायमूर्ति जी.सी. मित्तल | 12.04.1994 – 03.03.1995 | — |
| 19 | न्यायमूर्ति ए.पी. रावानी | 04.04.1995 – 10.09.1996 | — |
| 20 | न्यायमूर्ति एम.जी. मुखर्जी | 19.09.1996 – 24.12.1997 | — |
| 21 | न्यायमूर्ति शिवराज वी. पाटिल | 22.01.1999 – 14.03.2000 | बाद में SC न्यायाधीश बने |
| 22 | न्यायमूर्ति डॉ. ए.आर. लक्ष्मणन | 29.05.2000 – 25.11.2001 | बाद में SC न्यायाधीश बने |
| 23 | न्यायमूर्ति अरुण कुमार | 02.12.2001 – 02.10.2002 | बाद में SC न्यायाधीश बने |
| 24 | न्यायमूर्ति अनिल देव सिंह | 24.12.2002 – 22.10.2004 | — |
| 25 | न्यायमूर्ति एस.एन. झा | 12.10.2005 – 15.06.2007 | — |
| 26 | न्यायमूर्ति जे.एम. पांचाल | 16.09.2007 – 11.11.2007 | प्रथम कार्यवाहक CJ; SC न्यायाधीश बने |
| 27 | न्यायमूर्ति नारायण राव | 05.01.2008 – 31.01.2009 | — |
| 28 | न्यायमूर्ति दीपक वर्मा | 06.03.2009 – 10.05.2009 | बाद में SC न्यायाधीश बने |
| 29 | न्यायमूर्ति जगदीश भल्ला | 10.08.2009 – 31.10.2010 | — |
| 30 | न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा | 26.11.2010 – 31.12.2012 | बाद में SC न्यायाधीश बने |
| 31 | न्यायमूर्ति अमिताभ रॉय | 02.01.2013 – 05.08.2014 | बाद में SC न्यायाधीश बने |
| 32 | न्यायमूर्ति सुनील अम्बवानी | 24.03.2015 – 21.08.2015 | — |
| 33 | न्यायमूर्ति सतीश कुमार मित्तल | 05.03.2016 – 14.04.2016 | न्यूनतम कार्यकाल |
| 34 | न्यायमूर्ति नवीन सिन्हा | 14.05.2016 – 17.02.2017 | बाद में SC न्यायाधीश बने |
| 35 | न्यायमूर्ति प्रदीप नन्दाजोग | 02.04.2017 – 06.04.2019 | — |
| 36 | न्यायमूर्ति श्रीपति रविन्द्र भट्ट | 05.05.2019 – 23.09.2019 | बाद में SC न्यायाधीश बने |
| 37 | न्यायमूर्ति इन्द्रजीत महान्ती | 06.10.2019 – 12.10.2021 | — |
| 38 | न्यायमूर्ति अकील कुरैशी | 12.10.2021 – 06.03.2022 | — |
| 39 | न्यायमूर्ति एस.एस. शिंदे | 21.06.2022 – 01.08.2022 | प्रथम वर्चुअल कोर्ट उद्घाटन |
| 40 | न्यायमूर्ति पंकज मित्तल | 14.10.2022 – 05.02.2023 | बाद में SC न्यायाधीश बने |
| 41 | न्यायमूर्ति ऑगस्टिन जार्ज मसीह | 30.05.2023 – 09.11.2023 | — |
| 42 | न्यायमूर्ति मनिन्द्र मोहन श्रीवास्तव | 06.02.2024 – वर्तमान | 42वें एवं वर्तमान CJ |
न्यायपालिका में लैंगिक समानता सुनिश्चित करना न्यायिक विविधता का महत्वपूर्ण पहलू है। राजस्थान उच्च न्यायालय में अब तक 13 महिला न्यायाधीश नियुक्त हो चुकी हैं। वर्तमान में 3 महिला न्यायाधीश कार्यरत हैं।
| क्र. | महिला न्यायाधीश | स्थिति |
|---|---|---|
| 1 | कुमारी कांता भटनागर | प्रथम महिला न्यायाधीश (Rajasthan HC); अन्य HC में CJ बनीं |
| 2 | मोहिनी कपूर | पूर्व |
| 3 | मीना वी. गोंबर | पूर्व |
| 4 | निशा गुप्ता | पूर्व |
| 5 | बेला त्रिवेदी | SC में प्रोन्नत |
| 6 | ज्ञान सुधा मिश्रा | SC में प्रोन्नत |
| 7 | जयश्री ठाकुर | पूर्व |
| 8 | निर्मलजीत कौर | पूर्व |
| 9 | प्रभा शर्मा | पूर्व |
| 10 | सबीना | HP HC में स्थानान्तरित |
| 11 | शोभा मेहता | वर्तमान (कार्यरत) |
| 12 | रेखा बोराणा | वर्तमान (कार्यरत) |
| 13 | नुपूर भाटी | वर्तमान (कार्यरत) |
उच्च न्यायालय अनुच्छेद 226 के तहत न केवल मूल अधिकारों के उल्लंघन पर बल्कि किसी भी अन्य विधिक अधिकार की रक्षा के लिए भी 5 प्रकार की रिटें जारी कर सकता है। इसे "अंतरिम राहत रिट (Interim Relief Writ)" भी कहते हैं। यह उच्चतम न्यायालय (Art. 32) की रिट-शक्ति से अधिक व्यापक है।
| रिट | अर्थ | विरुद्ध | नहीं किसके लिए | प्रयोग |
|---|---|---|---|---|
| बंदी प्रत्यक्षीकरण | सशरीर लाओ | सरकार + व्यक्ति | दण्डित, निवारक नजरबंदी | अवैध बंदी |
| परमादेश | कर्तव्य निभाओ | सभी अधिकारी/निकाय | राष्ट्रपति, राज्यपाल | लोक कर्तव्य पालन |
| अधिकार पृच्छा | अधिकार बताओ | सार्वजनिक पद | निजी पद | अवैध पदग्रहण |
| उत्प्रेषण | मँगा लो | न्यायिक/अर्द्ध-न्यायिक | — | पूर्ण/लंबित दोनों |
| प्रतिषेध | रोको | न्यायिक/अर्द्ध-न्यायिक | प्रशासनिक एजेंसियाँ | केवल लंबित मामलों में |
संपत्ति का अधिकार (Art. 300A) अब वैधानिक अधिकार है। इसके लिए HC रिट जारी कर सकता है, लेकिन SC (Art. 32) नहीं — क्योंकि SC की रिट केवल मूल अधिकारों के लिए है।
उच्च न्यायालय राज्य का सर्वोच्च न्यायालय होने के नाते व्यापक एवं बहुआयामी न्यायिक शक्तियाँ धारण करता है। ये शक्तियाँ मूल, अपीलीय, पर्यवेक्षी एवं संवैधानिक — सभी क्षेत्रों में विस्तृत हैं।
1. प्रारम्भिक/मूल अधिकारिता (Original Jurisdiction) : राजस्व संग्रह, मूल अधिकार उल्लंघन, संसद/विधानसभा सदस्यों के निर्वाचन विवाद, वसीयत, तलाक, कम्पनी कानून तथा न्यायालय अवमानना के मामलों में सीधे HC में दायर होते हैं।
► विशेष : मूल अधिकार मामलों में HC के पास "समीपवर्ती अधिकारिता (Writ Jurisdiction)" है, पूर्ण "Original Jurisdiction" नहीं।
2. अपीलीय अधिकारिता (Appellate Jurisdiction) : जिला न्यायालयों के दीवानी व आपराधिक निर्णयों की HC में अपील। आपराधिक मामलों में 7 वर्ष से अधिक की सजा पर HC में अपील। राज्य के सभी Tribunals एवं केन्द्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) के निर्णयों की अपील।
3. न्यायिक पुनर्विलोकन (Judicial Review) : HC राज्य विधानमण्डल एवं केन्द्र सरकार दोनों के कानूनों की संवैधानिकता की जाँच कर सकता है। संविधान विरोधी कानून को शून्य (Void) घोषित कर सकता है।
4. रिट अधिकारिता (Writ Jurisdiction) : अनुच्छेद 226 के तहत 5 प्रकार की रिटें जारी करने की व्यापक शक्ति।
5. अधीक्षण शक्ति (Superintendence — Art. 227) : HC राज्य में सभी न्यायालयों व अधिकरणों पर पर्यवेक्षण करता है। विवरण मँगाना, नियम बनाना, फीस-सारणी तय करना। (सशस्त्र बल न्यायालय इसके बाहर।)
6. अभिलेख न्यायालय (Art. 215) : HC के निर्णय साक्ष्य के रूप में मान्य। अवमानना पर दण्ड की शक्ति।
7. मामलों का अंतरण (Art. 228) : संवैधानिक प्रश्न वाले मामले HC अपने पास मँगाकर स्वयं निपटा सकता है।
सलाहकारी अधिकारिता (Advisory Jurisdiction) केवल उच्चतम न्यायालय को (Art. 143)। Special Leave Petition (SLP) केवल SC में, HC में नहीं। उच्च न्यायालय PIL (Public Interest Litigation) भी सुन सकता है।
संविधान-निर्माताओं ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लोकतंत्र की आत्मा माना। HC को कार्यपालिका के दबाव से मुक्त रखने हेतु संविधान में अनेक सुरक्षाएँ दी गई हैं।
| क्र. | उच्च न्यायालय | स्थापना | मुख्यपीठ | क्षेत्राधिकार |
|---|---|---|---|---|
| 1 | कोलकाता | 1862 | कोलकाता | पश्चिम बंगाल, अण्डमान-निकोबार |
| 2 | मुम्बई | 1862 | मुम्बई | महाराष्ट्र, गोवा, दादरा-नागर हवेली, दमन-दीव |
| 3 | मद्रास | 1862 | चेन्नई | तमिलनाडु, पुड्डुचेरी |
| 4 | इलाहाबाद | 1866 | प्रयागराज | उत्तर प्रदेश (लखनऊ खण्डपीठ) |
| 5 | कर्नाटक | 1884 | बेंगलुरु | कर्नाटक (2 सर्किल बैंच — धारवाड़, गुलबर्ग) |
| 6 | पटना | 1916 | पटना | बिहार |
| 7 | जम्मू-कश्मीर व लद्दाख | 1928 | श्रीनगर/जम्मू | J&K, लद्दाख |
| 8 | मध्यप्रदेश | 1936 | जबलपुर | मध्यप्रदेश (इंदौर, ग्वालियर खण्डपीठ) |
| 9 | पंजाब व हरियाणा | 1947 | चंडीगढ़ | पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ़ |
| 10 | गुवाहाटी | 1948 | गुवाहाटी | असम, नागालैण्ड, मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश |
| 11 | ओडिशा | 1948 | कटक | ओडिशा |
| 12 | राजस्थान | 1949 | जोधपुर | राजस्थान (जयपुर खण्डपीठ) |
| 13 | तेलंगाना | 1954 | हैदराबाद | तेलंगाना |
| 14 | केरल | 1958 | एर्नाकुलम | केरल, लक्षद्वीप |
| 15 | गुजरात | 1960 | अहमदाबाद | गुजरात |
| 16 | दिल्ली | 1966 | दिल्ली | दिल्ली (UT — अपना HC) |
| 17 | हिमाचल प्रदेश | 1967 | शिमला | हिमाचल प्रदेश |
| 18 | सिक्किम | 1975 | गंगटोक | सिक्किम (न्यूनतम 3 न्यायाधीश) |
| 19 | छत्तीसगढ़ | 2000 | बिलासपुर | छत्तीसगढ़ |
| 20 | उत्तराखण्ड | 2000 | नैनीताल | उत्तराखण्ड |
| 21 | झारखण्ड | 2000 | राँची | झारखण्ड |
| 22 | मेघालय | 2013 | शिलाँग | मेघालय |
| 23 | मणिपुर | 2013 | इम्फाल | मणिपुर |
| 24 | त्रिपुरा | 2013 | अगरतला | त्रिपुरा |
| 25 | आन्ध्रप्रदेश | 2019 | अमरावती | आन्ध्रप्रदेश (25वाँ व नवीनतम) |
खण्डपीठ वाले 8 HC : गुवाहाटी, मुम्बई, कर्नाटक, मद्रास, कलकत्ता, मध्यप्रदेश, इलाहाबाद, राजस्थान। केवल कर्नाटक HC की 2 सर्किल खंडपीठें (धारवाड़ एवं गुलबर्ग)। अपना HC रखने वाले 2 UT : दिल्ली (1966) और जम्मू-कश्मीर (1928)।
1. राजस्थान उच्च न्यायालय — स्थापना 29 अगस्त, 1949, जोधपुर में। राजप्रमुख सवाई मानसिंह II द्वारा उद्घाटन। 2. प्रथम CJ — कमलकांत वर्मा। 42वें व वर्तमान CJ — मनिन्द्र मोहन श्रीवास्तव (06.02.2024 से)। 3. बी.आर. पटेल समिति (27 मार्च 1949) : जयपुर को राजधानी व जोधपुर को HC की सिफारिश। 4. जयपुर खण्डपीठ : 1958 में समाप्त, 8 दिसम्बर 1976 को राष्ट्रपति आदेश से पुनः स्थापित; 31 जनवरी 1977 से कार्यरत। 5. स्वीकृत न्यायाधीश — 50 (2015)। 36 जिला न्यायालय : 19 जोधपुर + 17 जयपुर। 6. अनुच्छेद 217 — नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा, कॉलेजियम सिफारिश पर। सेवानिवृत्ति आयु 62 वर्ष। 7. कॉलेजियम : III जजेज केस 1998 = 1 CJI + 4 वरिष्ठतम SC न्यायाधीश। 8. पाँच रिटें (Art. 226) : HC-SC तुलना — HC की रिट अधिकारिता SC से व्यापक (मूल + विधिक दोनों)। 9. 5 रिटें : बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, अधिकार पृच्छा, उत्प्रेषण, प्रतिषेध। 10. Art. 215 — अभिलेख न्यायालय। Art. 227 — अधीनस्थ न्यायालयों पर अधीक्षण। 11. महाभियोग : Removal शब्द (न्यायाधीश हेतु); 100/50 हस्ताक्षर; अब तक कोई नहीं हटाया। 12. NGMA ट्रिक — नागालैण्ड, गोवा, मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश — इन 4 राज्यों का अपना HC नहीं। 13. प्रथम महिला HC न्यायाधीश (राजस्थान) — कुमारी कांता भटनागर। वर्तमान महिला न्यायाधीश — 3।
भारत में उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों से नीचे के समस्त न्यायालयों को "अधीनस्थ न्यायालय (Subordinate Courts)" कहा जाता है। ये देश में न्याय-व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी हैं — जहाँ आम नागरिक का सीधा संपर्क होता है।
| अनुच्छेद | विषय | प्रमुख प्रावधान |
|---|---|---|
| 233 (1) | जिला न्यायाधीश की नियुक्ति | नियुक्ति — राज्यपाल करता है, उच्च न्यायालय से परामर्श करके। |
| 233 (2) | जिला न्यायाधीश की योग्यता | (i) भारत का नागरिक हो। (ii) कम से कम 7 वर्ष तक अधिवक्ता रहा हो। अथवा (iii) 7 वर्ष न्यायिक अधिकारी के रूप में कार्य किया हो। |
| 233 क | विधिमान्यकरण | कुछ जिला न्यायाधीशों की नियुक्तियों और निर्णयों का विधिमान्यकरण। |
| 234 | अन्य न्यायिक अधिकारियों की भर्ती | जिला जज के अतिरिक्त अन्य न्यायिक अधिकारी — राज्यपाल + RPSC + HC परामर्श से। |
| 235 | HC का अधीनस्थ न्यायालयों पर नियंत्रण | पदस्थापना, प्रोन्नति, छुट्टी, स्थानान्तरण, निलम्बन, दण्ड, अनिवार्य सेवानिवृत्ति — सभी में HC का नियंत्रण। |
| 236 | निर्वचन (Interpretation) | जिला न्यायाधीश पद में — अपर, संयुक्त, सहायक जिला जज, सत्र न्यायाधीश, मुख्य प्रेसीडेन्सी मजिस्ट्रेट, लघुवाद न्यायालय का CJ आदि शामिल। |
| 237 | मजिस्ट्रेटों पर प्रावधान लागू करना | राज्यपाल को अधिकार — अधीनस्थ न्यायालय प्रावधान किसी भी श्रेणी के मजिस्ट्रेटों पर लागू कर सके। |
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| पूरा नाम | जिला एवं सत्र न्यायाधीश (District & Sessions Judge) |
| सिविल मामलों में | जिला न्यायाधीश |
| फौजदारी मामलों में | सत्र न्यायाधीश (Session Judge) |
| अधिकारिता (Jurisdiction) | सिविल व आपराधिक — दोनों में प्रारम्भिक (Original) + अपीलीय (Appellate) |
| मृत्युदण्ड की शक्ति | दाण्डिक मामलों में मृत्युदण्ड दे सकता है — परन्तु HC का अनुमोदन आवश्यक |
| शक्तियाँ | न्यायिक + प्रशासनिक दोनों |
| निरीक्षण | जिले के सभी अधीनस्थ न्यायालयों का |
| त्यागपत्र | राज्यपाल को देता है |
| हटाना | राज्यपाल द्वारा — HC के CJ से परामर्श (महाभियोग जैसी प्रक्रिया नहीं) |
| जिला न्यायालय की प्रकृति | ट्रायल कोर्ट (Trial Court)। मूल अधिकार रक्षा या संविधान व्याख्या इनके अधिकार में नहीं। |
"जिला प्रशासन" शब्द का संवैधानिक उल्लेख अनुच्छेद 233 में मिलता है। अधीनस्थ न्यायालयों के अंतर्गत — जिला न्यायालय, नगर सिविल न्यायालय, महानगर मजिस्ट्रेट और राज्य न्यायिक सेवा के सदस्य आते हैं।
जिला एवं सत्र न्यायालय के अधीन दो समानांतर न्यायिक व्यवस्थाएँ हैं — (A) सिविल (दीवानी) और (B) फौजदारी (आपराधिक)। दोनों की अपनी श्रृंखला है।
सम्पत्ति, ऋण, अनुबंध, उत्तराधिकार जैसे विवाद "दीवानी/सिविल विवाद" कहलाते हैं।
| न्यायालय | विवाद राशि | अपील कहाँ? | विशेष |
|---|---|---|---|
| कनिष्ठ सिविल न्यायालय(मुंसिफ / Junior Civil Judge) | ₹25,000 तक | वरिष्ठ सिविल न्यायालय | सबसे निचला दीवानी न्यायालय |
| वरिष्ठ सिविल न्यायालय(Senior Civil Judge) | ₹25,001 से ₹50,000 | जिला सिविल न्यायालय | मध्यम स्तर |
| जिला सिविल न्यायालय(District Civil Court) | ₹50,001 या अधिक | उच्च न्यायालय | जिले का सर्वोच्च दीवानी न्यायालय |
चोरी, मारपीट, हत्या जैसे अपराध "फौजदारी/आपराधिक विवाद" कहलाते हैं।
| न्यायालय | मामलों का प्रकार | अपील कहाँ? | विशेष |
|---|---|---|---|
| न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम वर्ग(JM 1st Class) | मारपीट, चोरी, डकैती आदि साधारण अपराध | CJM के समक्ष | सबसे निचला फौजदारी न्यायालय |
| मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट(CJM) | गंभीर फौजदारी विवाद | जिला सत्र न्यायाधीश | मध्यम स्तर |
| जिला सत्र न्यायाधीश(Session Judge) | हत्या जैसे अत्यंत गंभीर मामले। मृत्युदण्ड की शक्ति। | उच्च न्यायालय | जिले का सर्वोच्च फौजदारी न्यायालय |
जिला एवं सत्र न्यायालय वास्तव में एक ही न्यायालय है। एक ही जज — दीवानी में "जिला न्यायाधीश" और फौजदारी में "सत्र न्यायाधीश"। BNS/CrPC 2023 (Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita) अब पुरानी CrPC की जगह लागू।
ग्राम न्यायालय की स्थापना "ग्राम न्यायालय अधिनियम 2008" द्वारा 2 अक्टूबर 2009 से की गई। यह अवधारणा गाँधीजी के न्याय को जन-जन तक पहुँचाने के स्वप्न की आधुनिक परिणति है।
| विषय | ग्राम न्यायालय — विस्तृत विवरण |
|---|---|
| न्यायाधीश का पद | न्यायाधिकार (Nyayadhikari) — प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट के समकक्ष |
| नियुक्ति | राज्यपाल द्वारा, उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के परामर्श से |
| स्थान / स्तर | पंचायत के मध्य/खण्ड स्तर — पंचायत समिति (प्रत्येक मध्यवर्ती पंचायत पर एक) |
| अधिकारिता | दीवानी (सिविल) + फौजदारी (आपराधिक) — दोनों |
| प्रकृति | चलते-फिरते न्यायालय (Mobile Court) — पास के गाँवों में जाकर सुनवाई करते हैं |
| मध्यस्थ | स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं को मध्यस्थ/सुलहकर्ता के रूप में मान्यता |
| अधिकतम सजा | 2 वर्ष (जुर्माना सहित या रहित) |
| अपील | 30 दिन के भीतर — जिला एवं सत्र न्यायालय में। सत्र न्यायालय — 6 माह में निर्णय देगा। |
| अपवाद | आदिवासी क्षेत्रों में स्थापित नहीं होते |
| भारत में वर्तमान स्थिति | 209 ग्राम न्यायालय (लक्ष्य था 5,000) |
| सर्वाधिक ग्राम न्यायालय | मध्यप्रदेश — 89 |
| राज्य | प्रथम ग्राम न्यायालय का स्थान | तिथि | विशेष |
|---|---|---|---|
| मध्यप्रदेश (भारत में प्रथम) | बरैसिया (भोपाल) | 2 अक्टूबर 2009 | देश का प्रथम ग्राम न्यायालय |
| राजस्थान (प्रथम) | बस्सी (जयपुर ग्रामीण) | 27 नवम्बर 2010 | राजस्थान का प्रथम ग्राम न्यायालय |
| राजस्थान (वर्तमान) | कुल 45 ग्राम न्यायालय | — | लक्ष्य — 145 ग्राम न्यायालय |
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| स्थापना | पारिवारिक न्यायालय अधिनियम, 1984 द्वारा |
| अनिवार्य | 10 लाख+ जनसंख्या वाले शहरों में अनिवार्य। अन्य शहरों में भी संसद द्वारा। |
| राज्यों में | राज्य सरकार द्वारा — उच्च न्यायालय की सलाह से स्थापना |
| संरचना | 1 मुख्य न्यायाधीश + 1 अतिरिक्त न्यायाधीश |
| प्रकृति | जिला न्यायालय के समान। अपील — HC में; Art. 136 (विशेष इजाजत) से SC में भी। |
| विषय | पति-पत्नी के विवाह विवाद, तलाक, गुजारा भत्ता, बाल अभिरक्षा आदि |
| Rajasthan में 7 FC | (1) बालोतरा (बाड़मेर), (2) धौलपुर, (3) जैसलमेर, (4) जालौर, (5) करौली, (6) प्रतापगढ़, (7) सिरोही |
| न्यायाधिकरण | स्थापना / आधार | कार्यक्षेत्र |
|---|---|---|
| MACT (Motor Accident Claims Tribunal) | Motor Vehicles Act 1988 | मोटर दुर्घटना मुआवजा। |
| DRT (Debt Recovery Tribunal) | Recovery of Debts Act 1993 | बैंकों के बड़े ऋण वसूली मामले। |
| NGT (National Green Tribunal) | NGT Act 2010 | पर्यावरण विवाद। |
| NCLT (National Company Law Tribunal) | Companies Act 2013 | कम्पनी विवाद। |
| DCDRC (District Consumer Disputes) | Consumer Protection Act 2019 | उपभोक्ता विवाद (₹1 करोड़ तक)। |
| Juvenile Justice Board | JJ Act 2015 | 18 वर्ष से कम आयु के बाल अपराध। |
| विशेष न्यायालय | प्रारम्भ | आधार | राजस्थान विशेष |
|---|---|---|---|
| परिवार अदालत | 1984 | Family Courts Act | Rajasthan में 7 |
| मोबाइल कोर्ट | 2007 Mewat | APJ Abdul Kalam | — |
| FTC | 11वाँ Finance Comm. | Criminal cases | 5 per district |
| ग्राम न्यायालय | 2 Oct 2009 | Gram Nyayalaya Act 2008 | 45 in Rajasthan |
जनहित याचिका (PIL) वह न्यायिक साधन है जिसके द्वारा समाज का कोई भी व्यक्ति, NGO या संगठन जनसाधारण के हित में न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकता है। यह भारतीय न्याय व्यवस्था की सबसे प्रगतिशील अवधारणा है।
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| उत्पत्ति | 1960 के दशक में अमेरिका से। भारत में 1980 के दशक में। |
| CJI (16वें) — जब PIL शुरू | वाई.वी. चन्द्रचूड़ (Y.V. Chandrachud)। |
| प्रथम PIL की सुनवाई | सर्वोच्च न्यायालय के 17वें CJI — पी.एन. भगवती (P.N. Bhagwati)। |
| PIL के जनक | पी.एन. भगवती + वी.एस. कृष्णअय्यर (दोनों को संयुक्त जनक माना जाता है)। |
| PIL की माता | पुष्पा कपिला हिंगौरानी (Pushpa Kapila Hingourani) — हुसैन आरा खातून केस में पहली PIL की सुनवाई। |
| प्रथम PIL | हुसैन आरा खातून केस (बिहार की विचाराधीन कैदियों की समस्या)। |
| PIL दायर कहाँ | सर्वोच्च न्यायालय (Art. 32) + उच्च न्यायालय (Art. 226) — दोनों में। |
| PIL दायर कर सकता है | पीड़ित स्वयं, उसके रिश्तेदार, या कोई NGO। |
| मुख्य उद्देश्य | विधि के शासन की रक्षा, कमजोर वर्गों को न्याय, मूल अधिकारों की सार्थक प्राप्ति। |
| PIL का मामला | निर्णय का प्रभाव |
|---|---|
| हुसैन आरा खातून केस | बिहार की जेलों में विचाराधीन कैदियों की रिहाई — शीघ्र सुनवाई का अधिकार। |
| Vishaka v. State of Rajasthan (1997) | कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न के विरुद्ध "विशाखा दिशा-निर्देश" (Vishaka Guidelines)। |
| MC Mehta v. Union of India | यमुना व गंगा प्रदूषण पर ऐतिहासिक आदेश। Delhi में CNG अनिवार्य। |
| PUCL v. Union of India (2001) | "भोजन का अधिकार" — मिड-डे मील योजना का आधार। |
| Sheela Barse Case | जेल सुधार + महिला कैदियों के अधिकार। |
लोकहित याचिका | सामाजिक क्रिया याचिका | सामाजिक हित याचिका | वर्गीय क्रिया याचिका।
लोक अदालत भारतीय न्याय व्यवस्था का एक अनूठा वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR — Alternative Dispute Resolution) तंत्र है। यह जनता को निःशुल्क, शीघ्र और अनौपचारिक न्याय प्रदान करती है।
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| संवैधानिक आधार | भाग-4 (DPSP), अनुच्छेद 39(क) — 42वें संशोधन 1976 द्वारा जोड़ा। राज्य का कर्तव्य — निःशुल्क व त्वरित न्याय। |
| विधिक आधार | विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम 1987। |
| आयोजन | SC, HC, जिला न्यायालय द्वारा — विधिक सेवा प्राधिकरण के माध्यम से। |
| संरचना (3 सदस्य) | (1) सेवानिवृत्त/वर्तमान SC या HC का न्यायाधीश + (2) प्रसिद्ध वकील + (3) सामाजिक कार्यकर्ता। |
| शुल्क | शून्य — कोई शुल्क नहीं। |
| वकील की आवश्यकता | नहीं — स्वयं पैरवी कर सकते हैं। |
| अधिकारिता | सिविल + फौजदारी — दोनों प्रकार। |
| निर्णय की प्रकृति | दोनों पक्षों की सहमति से। निर्णय अन्तिम (Final)। कहीं अपील नहीं। |
| स्तर | ग्राम पंचायत स्तर तक लोक अदालत आयोजित हो सकती है। |
| संस्था | स्थापना | कार्य प्रारम्भ | मुख्य तथ्य |
|---|---|---|---|
| NLSA (National Legal Service Authority) | 1987 | 9 नवम्बर 1995 | राष्ट्रीय स्तर पर लोक अदालतें। SC का CJI — अध्यक्ष। |
| RLSA (Rajasthan LSA) | 1987 | 7 जुलाई 1998 | HQ — जयपुर। मुख्य संरक्षक — HC का CJ। कार्यकारी अध्यक्ष — HC का सेवानिवृत्त न्यायाधीश (राज्यपाल नामित — HC CJ परामर्श से)। |
| क्र. | मामलों का प्रकार | क्र. | मामलों का प्रकार |
|---|---|---|---|
| 1 | पारिवारिक विवाद (तलाक, दहेज) | 2 | मोटर वाहन दुर्घटना व बीमा |
| 3 | चेक बाउन्स (Cheque Bounce) | 4 | भूमि संबंधी विवाद |
| 5 | किरायेदार संबंधी मामले | 6 | श्रम विवाद |
| 7 | बिजली-पानी बिल विवाद | 8 | बैंक ऋण विवाद |
PIL — न्यायालय में दायर (Adversarial) + judicial decision। लोक अदालत — ADR तंत्र + mutual consent + no appeal। PIL में वकील जरूरी, लोक अदालत में वकील की जरूरत नहीं।
1. अधीनस्थ न्यायालय — भाग-6, Art. 233-237। जिला जज नियुक्ति — राज्यपाल + HC परामर्श। 2. जिला जज योग्यता — 7 वर्ष अधिवक्ता/न्यायिक अधिकारी। मृत्युदण्ड की शक्ति — HC अनुमोदन आवश्यक। 3. Art. 234 — अन्य न्यायिक अधिकारी : राज्यपाल + RPSC + HC। Art. 235 — HC का नियंत्रण। 4. सिविल : मुंसिफ (₹25K) → Senior (₹50K) → District Civil (₹50K+) → HC। 5. फौजदारी : JM 1st Class → CJM → Session Court (हत्या/Death) → HC। 6. ग्राम न्यायालय — 2 Oct 2009 (Act 2008)। खण्ड स्तर पर। अधिकतम 2 वर्ष। Mobile Court। India में 209 (MP 89 सर्वाधिक)। 7. Rajasthan प्रथम ग्राम न्यायालय — बस्सी (27 Nov 2010)। Rajasthan लक्ष्य 145। 8. परिवार अदालत 1984 — 10 लाख+। Rajasthan में 7। मोबाइल कोर्ट — APJ Kalam, Mewat 2007। 9. FTC — 11वें Finance Commission। प्रति जिला 5। PIL जनक — PN Bhagwati + VS Krishna Iyer। 10. PIL की माता — पुष्पा कपिला हिंगौरानी। प्रथम PIL — हुसैन आरा खातून। Judicial Activism नींव — 1970s। 11. लोक अदालत — Art. 39(क) (42वाँ संशोधन 1976)। 3 सदस्य। निःशुल्क। निर्णय अन्तिम — अपील नहीं। 12. NLSA 9 Nov 1995। RLSA 7 Jul 1998 (Jaipur HQ)। प्रथम लोक अदालत — 6 Oct 1985 Delhi (PN Bhagwati)।