भारतीय संविधान में संसदीय शासन प्रणाली (Parliamentary System) अपनाई गई है, जिसमें दोहरी कार्यपालिका (Dual Executive) होती है — एक नाममात्र का प्रमुख और एक वास्तविक प्रमुख। ठीक वैसे ही जैसे किसी कंपनी में Chairman और CEO होते हैं — Chairman नाम का मालिक होता है, लेकिन असली काम CEO करता है। राज्य स्तर पर यही भूमिका क्रमशः राज्यपाल (Governor) और मुख्यमंत्री (Chief Minister) की है।
राज्यपाल का उल्लेख भारतीय संविधान के भाग-6 (Part VI) में अनुच्छेद 153 से 162 तक मिलता है। यह पद संवैधानिक तथा गरिमामय है।
राज्यपाल — राज्य का औपचारिक/संवैधानिक प्रमुख जो राष्ट्रपति की तरह मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्य करता है। वास्तविक शक्तियाँ मुख्यमंत्री के नेतृत्व वाली राज्य मंत्रिपरिषद में निहित होती हैं।
| पद | संवैधानिक प्रमुख | वास्तविक प्रमुख | सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी |
|---|---|---|---|
| राज्य स्तर | राज्यपाल (Governor) | मुख्यमंत्री (CM) | मुख्य सचिव (Chief Secretary) |
| केन्द्र स्तर | राष्ट्रपति (President) | प्रधानमंत्री (PM) | कैबिनेट सचिव |
7वें संविधान संशोधन 1956 के प्रमुख परिणाम: (1) राज्यों की श्रेणियाँ A, B, C, D समाप्त (भाग-7, अनुच्छेद 238 निरसित), (2) एक व्यक्ति दो या अधिक राज्यों का राज्यपाल हो सकता है, (3) लोकसभा सीटें 500 से बढ़कर 525 हुईं, (4) राजप्रमुख (Rajpramukh) के स्थान पर राज्यपाल पद आरम्भ।
राजस्थान के प्रथम राजप्रमुख → सवाई मानसिंह (30 मार्च, 1949) | राजस्थान के प्रथम राज्यपाल → गुरुमुख निहालसिंह (पदभार: 1 नवम्बर, 1956)
राज्यपाल की नियुक्ति का तरीका उसकी संवैधानिक स्थिति को समझने की कुंजी है। संविधान निर्माताओं ने काफी विचार-विमर्श के बाद नियुक्त राज्यपाल को निर्वाचित राज्यपाल के विकल्प के रूप में चुना। इस प्रावधान की प्रेरणा कनाडा के संविधान से ली गई।
संविधान सभा में राज्यपाल के निर्वाचन बनाम नियुक्ति पर गहन बहस हुई। अंततः निर्वाचित राज्यपाल की योजना को छोड़ा गया क्योंकि:
1. यदि राज्यपाल निर्वाचित होता तो मुख्यमंत्री और राज्यपाल दोनों जनप्रतिनिधि होते — टकराव (Conflict) अवश्यंभावी होता।
2. निर्वाचित राज्यपाल बहुमत दल का राजनीतिक प्यादा बन सकता था, जिससे राजनीतिक द्वंद्व और अलगाववाद को बल मिलता।
3. संसदीय प्रणाली में राज्यपाल की भूमिका नाममात्र की है, इसलिए चुनाव पर अतिरिक्त व्यय अनावश्यक होता।
4. मजबूत केन्द्र के लिए नियुक्त राज्यपाल आवश्यक है — केन्द्र का राज्यों पर प्रभावी नियंत्रण सम्भव हो सके।
भारत में संघात्मक शासन "केन्द्र की ओर झुकी हुई" (Centre-tilted Federalism) है। नियुक्त राज्यपाल इस व्यवस्था का मुख्य उपकरण है जिसके माध्यम से केन्द्र राज्यों पर प्रभावी नियंत्रण रखता है।
⚠️ सावधान राज्यपाल पद के लिए कोई शैक्षणिक योग्यता (Educational Qualification) एवं अधिकतम आयु सीमा (Maximum Age Limit) का संविधान में कोई प्रावधान नहीं है। यह राज्यपाल को राष्ट्रपति से अलग करता है जहाँ भी 35 वर्ष न्यूनतम आयु है।
राज्यपाल के परिलब्धियों, भत्तों एवं विशेषाधिकारों का विस्तृत उल्लेख संविधान की दूसरी अनुसूची (Second Schedule) में है। यदि एक व्यक्ति दो या अधिक राज्यों का राज्यपाल है तो वेतन उस अनुपात में मिलेगा जो राष्ट्रपति आदेश द्वारा निर्धारित करे — अनुच्छेद 158(3क)।
अनुच्छेद 156 राज्यपाल के कार्यकाल की महत्वपूर्ण व्यवस्था करता है। संविधान ने राज्यपाल को स्थायित्व और लचीलेपन का संतुलन प्रदान किया है।
बी.पी. सिंघल बनाम भारत संघ, 2010 — सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने निर्धारित किया कि राज्यपाल को मनमाने आधार पर (Arbitrary Ground) नहीं हटाया जा सकता। पद-रिक्तता पर उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश कार्यभार संभालता है।
राज्यपाल, महान्यायवादी (Attorney General), प्रधानमंत्री व केन्द्रीय मंत्रिपरिषद — ये सभी राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत कार्य करते हैं। राज्यपालों के स्थानान्तरण का प्रावधान संविधान में नहीं है, परंतु व्यवहार में राष्ट्रपति केन्द्रीय मंत्रिपरिषद की सलाह से एक राज्य से दूसरे राज्य में स्थानान्तरण करता है।
राज्यपाल की शपथ में तीन संकल्प:
राज्य की समस्त कार्यपालिका कार्यवाही राज्यपाल के नाम से की जाती है (अनुच्छेद 166)। राज्यपाल अपनी शक्तियों का प्रयोग स्वयं अथवा अधीनस्थ अधिकारियों (मुख्यमंत्री व मंत्रिपरिषद) के माध्यम से करता है — अनुच्छेद 154(1)।
| नियुक्ति | अनुच्छेद | विशेष शर्त |
|---|---|---|
| मुख्यमंत्री (Chief Minister) | अनुच्छेद 164 | विधानसभा में बहुमत प्राप्त दल का नेता |
| राज्य मंत्रिपरिषद के मंत्री | अनुच्छेद 164 | मुख्यमंत्री की सलाह पर |
| महाधिवक्ता (Advocate General) | अनुच्छेद 165 | उच्च न्यायालय का न्यायाधीश बनने की योग्यता |
| RPSC अध्यक्ष व सदस्य | अनुच्छेद 316 | — |
| राज्य निर्वाचन आयुक्त | अनुच्छेद 243K, 243ZA | — |
| राज्य वित्त आयोग | अनुच्छेद 243I, 243Y | — |
| जिला न्यायालय के न्यायाधीश | अनुच्छेद 233 | HC के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श |
| सरकारी विश्वविद्यालयों के कुलपति | राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम | निजी विश्वविद्यालय शामिल नहीं |
| लोकायुक्त एवं उपलोकायुक्त | राज्य लोकायुक्त अधिनियम | — |
| राज्य सूचना आयोग अध्यक्ष/सदस्य | RTI Act, 2005 | — |
| राज्य मानवाधिकार आयोग | PHRA, 1993 | — |
राज्यपाल राज्य विधानमण्डल का अभिन्न अंग है। वह विधानमण्डल का सत्र बुलाने, सत्रावसान करने तथा विधानसभा भंग करने की शक्ति रखता है। इसके अलावा अभिभाषण, संदेश और मनोनयन की शक्तियाँ भी उसे प्राप्त हैं।
डॉ. बी.आर. अम्बेडकर — "विधानसभा आहूत करना राज्यपाल का अधिकार नहीं, कर्तव्य है।" एक कैलेण्डर वर्ष में समस्त सत्रों की बैठकों की कुल संख्या 60 से कम नहीं होनी चाहिए।
104वें संविधान संशोधन 2020 द्वारा: (1) अनुच्छेद 331 (लोकसभा में 2 एंग्लो-इंडियन मनोनयन) और अनुच्छेद 333 (विधानसभा में 1 एंग्लो-इंडियन मनोनयन) समाप्त। (2) SC/ST का आरक्षण लोकसभा/विधानसभाओं में 10 वर्ष के लिए बढ़ाया गया।
जब कोई विधेयक विधानमण्डल से पारित होकर राज्यपाल के पास जाता है तो राज्यपाल के पास तीन विकल्प होते हैं। "Veto" लैटिन भाषा का शब्द है जिसका अर्थ "निषेध" (मना करना) है।
| विकल्प | प्रकार | विवरण |
|---|---|---|
| 1. अनुमति देना | सामान्य | विधेयक कानून/अधिनियम बन जाता है — राज्यपाल के हस्ताक्षर के बाद। |
| 2. निलम्बनकारी वीटो | अस्थायी निषेध | विधेयक पुनर्विचार हेतु लौटाना — विधानमण्डल पुनः भेजे तो राज्यपाल देने को बाध्य। धन विधेयक पर लागू नहीं। |
| 3. आत्यांतिक वीटो | पूर्ण निषेध | अनुमति देने से पूर्णतः मना — सामान्यतः गैर-सरकारी विधेयकों पर। विधेयक समाप्त हो जाता है। |
| 4. राष्ट्रपति हेतु आरक्षण | — | 7 परिस्थितियों में राष्ट्रपति के विचारार्थ भेजना — राज्यपाल की भूमिका तब समाप्त। |
1. ऐसा विधेयक जो उच्च न्यायालय की शक्तियों में कमी (Curtailment) करता हो।
2. ऐसा विधेयक जो नीति-निर्देशक तत्वों (DPSP) के विरुद्ध हो।
3. अनुच्छेद 31C — सम्पत्ति के अनिवार्य अधिग्रहण से संबंधित।
4. राष्ट्रीय महत्व का विधेयक।
5. संविधान के उपबंधों के विरुद्ध विधेयक।
6. देश के व्यापक हित के विरुद्ध विधेयक।
7. वित्तीय आपात के समय धन विधेयक।
जब विधानमण्डल का सत्र नहीं चल रहा हो और तत्काल कानून की आवश्यकता हो तो राज्यपाल अपने हस्ताक्षर से एक आदेश जारी करता है जिसे अध्यादेश (Ordinance) कहते हैं। यह राज्यपाल की विधायी शक्ति है।
डी.सी. वाधवा बनाम बिहार सरकार, 1987 — सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि बिना विधानमण्डल से पारित कराए बार-बार अध्यादेश जारी करना "अध्यादेश राज" है जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया के विरुद्ध है। राजस्थान में सर्वाधिक अध्यादेश 1949 में (49) और 2013 में (30) जारी किए गए।
⚠️ सावधान राज्यपाल को राष्ट्रपति के अनुदेशों के बिना अध्यादेश नहीं जारी करना है यदि: (क) विधेयक को विधानमण्डल में प्रस्तुत करने से पूर्व राष्ट्रपति की अनुमति आवश्यक हो, (ख) विधेयक राष्ट्रपति के विचार हेतु आरक्षित रखना आवश्यक हो, (ग) राज्य का अधिनियम राष्ट्रपति की स्वीकृति के बिना अवैध हो।
अनुच्छेद 163(1) के अनुसार राज्यपाल को सलाह देने के लिए राज्य मंत्रिपरिषद होती है। परंतु अनुच्छेद 163(2) के अनुसार कुछ मामलों में राज्यपाल मंत्रिपरिषद की सलाह मानने के लिए बाध्य नहीं — यही स्वविवेकीय शक्ति है।
A. संविधान प्रदत्त स्वविवेकीय शक्तियाँ (Constitutional Discretion)
1. विधेयक को राष्ट्रपति हेतु आरक्षित रखना — अनुच्छेद 200।
2. राष्ट्रपति शासन की सिफारिश करना — अनुच्छेद 356।
3. मुख्यमंत्री से सूचना माँगना — अनुच्छेद 167।
4. विधेयक को पुनर्विचार हेतु लौटाना (धन विधेयक छोड़कर) — अनुच्छेद 200।
5. अनुच्छेद 371 व अनुसूची 5 व 6 के अंतर्गत विशेष राज्यों में विशेष स्वविवेकीय शक्तियाँ।
B. परिस्थितिजन्य स्वविवेकीय शक्तियाँ (Situational Discretion)
1. त्रिशंकु विधानसभा (Hung Assembly) — स्पष्ट बहुमत न मिलने पर मुख्यमंत्री पद के लिए किसे आमंत्रित करें — स्वविवेक।
2. मुख्यमंत्री की अचानक मृत्यु व निश्चित उत्तराधिकारी नहीं — राज्यपाल स्वविवेक से नए मुख्यमंत्री नियुक्त करे।
3. अविश्वास प्रस्ताव पारित होने पर भी मंत्रिपरिषद त्यागपत्र न दे — राज्यपाल उसे बर्खास्त कर सकता है।
4. सरकार का बहुमत संदिग्ध लगे और CM बहुमत सिद्ध करने से इनकार करे — मंत्रिपरिषद बर्खास्त।
5. CM भ्रष्टाचार में दोषी हो परंतु इस्तीफा न दे — राज्यपाल मंत्रिपरिषद बर्खास्त कर सकता है।
6. राज्यपाल के अभिभाषण में अपने पूर्व कार्यों की आलोचना हो — उन वाक्यांशों को न पढ़ना राज्यपाल का विवेकाधिकार।
नबाम रेबिया वाद, 2016 — उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि राज्यपाल की स्वविवेकीय शक्तियाँ [163(2)] सीमित हैं। राज्यपाल द्वारा की गई कार्यवाही काल्पनिक नहीं बल्कि तार्किक (Rational) होनी चाहिए।
अनुसूची 5, अनुच्छेद 244(1): अनुसूचित क्षेत्रों में जनजातीय सलाहकार परिषद (20 सदस्य, 3/4 जनजातीय विधायक) — राज्यपाल इससे संबंधित वार्षिक रिपोर्ट राष्ट्रपति को देता है। किसी भी क्षेत्र को अनुसूचित क्षेत्र का दर्जा राष्ट्रपति देता है।
भारत में केन्द्र-राज्य संबंध और राज्यपाल की भूमिका को स्पष्ट करने के लिए समय-समय पर विभिन्न आयोगों और समितियों का गठन किया गया। इनकी सिफारिशें परीक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
| आयोग/समिति | गठन वर्ष | अध्यक्ष | प्रमुख सिफारिश |
|---|---|---|---|
| प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग | 1966 | मोरारजी देसाई | राज्यपाल एक ही बार नियुक्त हो; पुनर्नियुक्ति न हो; राज्यपाल प्रशासनिक व सामाजिक रूप से प्रतिष्ठित हो। |
| भगवान सहाय समिति | 1970 (राष्ट्रपति द्वारा) | भगवान सहाय | राज्यपाल व राज्य मंत्रिमण्डल के संबंध निश्चित करना। |
| राजमन्नार समिति | 1969 (तमिलनाडु) | डॉ. पी.वी. राजमन्नार (रिपोर्ट 1971) | राज्यपाल नियुक्ति में राज्य सरकार से परामर्श; राज्यपाल पद समाप्त करने की सिफारिश; अनुच्छेद 356-357 हटाने की सिफारिश। |
| सरकारिया आयोग | 1983 (रिपोर्ट 1988) | न्यायमूर्ति रणजीत सिंह सरकारिया | सत्तारूढ़ दल का सक्रिय सदस्य राज्यपाल न हो; मुख्यमंत्री से परामर्श अनिवार्य; राज्यपाल राज्य का बाहरी व्यक्ति हो; 5 वर्ष से पूर्व राजनीतिक कारणों से न हटाया जाए। |
| वेंकटचलैया आयोग | 2000 (रिपोर्ट 2002) | न्यायमूर्ति एम.एन. वेंकटचलैया | PM, गृहमंत्री, उपराष्ट्रपति, लोकसभा अध्यक्ष, मुख्यमंत्री की समिति की सिफारिश पर राज्यपाल नियुक्ति; अनुच्छेद 356 का उपयोग सभी विकल्प समाप्त होने के बाद। |
| पूंछी आयोग | 2007 (रिपोर्ट 2010) | न्यायमूर्ति मदनमोहन पूंछी | कार्यकाल निश्चित हो; केन्द्र की इच्छा पर पदच्युति नहीं; 4 माह में विधेयक पर निर्णय; राज्यपाल को महाभियोग से हटाया जाए (राज्य विधानमण्डल द्वारा); विश्वविद्यालयों का कुलाधिपति न बनाया जाए। |
राजमन्नार + सरकारिया + पूंछी आयोग → ये तीनों केन्द्र-राज्य संबंध + राज्यपाल नियुक्ति से जुड़े हैं। "राज-सर-पूं" याद करो — राज=राजमन्नार, सर=सरकारिया, पूं=पूंछी।
जब किसी राज्य में संवैधानिक तंत्र विफल हो जाए तो राज्यपाल की लिखित सलाह पर, राष्ट्रपति द्वारा (केन्द्रीय मंत्रिपरिषद की सलाह से) राज्य में राष्ट्रपति शासन की घोषणा की जा सकती है। यह भारतीय संघात्मक व्यवस्था का सर्वाधिक विवादास्पद प्रावधान है।
| चरण | विवरण |
|---|---|
| घोषणा | राज्यपाल की लिखित सलाह पर राष्ट्रपति घोषणा करता है। |
| विधानसभा की स्थिति | घोषणा के साथ ही विधानसभा निलंबित (Suspended); अनुमोदन के बाद भंग (Dissolved)। |
| संसदीय अनुमोदन | 2 माह के अंदर, साधारण बहुमत से दोनों सदनों में अनुमोदन। |
| अनुमोदन के बिना | 2 माह तक लागू रह सकता है। |
| अवधि | एक बार अनुमोदन पर 6 माह; 6-6 माह करके अधिकतम 3 वर्ष। |
| न्यायिक समीक्षा | S.R. Bommai Case, 1994 — राष्ट्रपति शासन की न्यायिक समीक्षा सम्भव। |
S.R. बोम्मई वाद (11 मार्च, 1994) — सर्वोच्च न्यायालय की 9 सदस्यीय संविधान पीठ ने ऐतिहासिक निर्णय में कहा: (1) राष्ट्रपति शासन की शक्ति पूर्ण नहीं है — न्यायालय की समीक्षा के अधीन। (2) सरकार का बहुमत परीक्षण राजभवन में नहीं, विधानमण्डल में हो। (3) राष्ट्रपति शासन से पहले राज्य सरकार को शक्ति परीक्षण का मौका दिया जाए।
| क्र. | अवधि (दिन) | राज्यपाल (लागू) | मुख्यमंत्री | कारण | राष्ट्रपति |
|---|---|---|---|---|---|
| 1. | 13 मार्च–26 अप्रेल 1967 (45 दिन) — सबसे कम | सम्पूर्णानंद | मोहनलाल सुखाड़िया | चुनाव में स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं | डॉ. एस. राधाकृष्णन |
| 2. | 30 अप्रेल–21 जून 1977 (53 दिन) | वेदपाल त्यागी | हरिदेव जोशी | लोकसभा चुनाव में काँग्रेस की हार | बी.डी. जत्ती (कार्यवाहक) |
| 3. | 17 फरवरी–5 जून 1980 (109 दिन) | रघुकुल तिलक | भैरोसिंह शेखावत | लोकसभा चुनाव में जनता पार्टी की हार | नीलम संजीव रेड्डी |
| 4. | 15 दिसम्बर 1992–3 दिसम्बर 1993 (353 दिन) — सबसे लंबा | एम. चैन्नारेड्डी | भैरोसिंह शेखावत | बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद की परिस्थितियाँ | शंकरदयाल शर्मा |
| क्र. | राज्यपाल | कार्यकाल (से) | कार्यकाल (तक) | विशेष |
|---|---|---|---|---|
| 1 | गुरुमुख निहालसिंह (प्रथम राज्यपाल) | 1 नव. 1956 | 15 अप्रेल 1962 | दिल्ली के CM; BHU कुलपति; सर्वाधिक 8 बार अभिभाषण |
| 2 | सम्पूर्णानंद | 16 अप्रेल 1962 | 15 अप्रेल 1967 | UP के CM; 1962 भारत-चीन युद्ध के समय राज्यपाल; सांगानेर खुली जेल निर्माण |
| 3 | हुकुम सिंह | 16 अप्रेल 1967 | 30 जून 1972 | लोकसभा अध्यक्ष (1962-67); "स्पोक्समैन" पत्रिका |
| 4 | जोगिन्दर सिंह | 1 जुलाई 1972 | 14 फरवरी 1977 (त्यागपत्र) | नेशनल राइफल एसोसिएशन महासचिव; राज्यपाल रिलीफ फण्ड 1973 |
| 5 | रघुकुल तिलक | 12 मई 1977 | 8 अगस्त 1981 (बर्खास्त) | RPSC सदस्य; रेलवे सेवा चयन आयोग अध्यक्ष; 1981 में बर्खास्त |
| 6 | ओ.पी. मेहरा | 6 मार्च 1982 | 31 जनवरी 1985 | एयर चीफ मार्शल; आत्मकथा "Sweet and Sour"; पद्मभूषण |
| 7 | बसंतराव पाटिल | 20 नव. 1985 | 14 अक्टूबर 1987 (त्यागपत्र) | महाराष्ट्र CM; गांधी जी के साथ सत्याग्रह; डाक टिकट जारी |
| 8 | सुखदेव प्रसाद | 15 अक्टूबर 1987 | (दो कार्यकाल) 1990 | VP Singh सरकार ने 1990 में बर्खास्त किया |
| 9 | देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय | 14 फरवरी 1990 | (त्यागपत्र 1991) | इंडियन काउंसिल ऑफ फिलोसफी रिसर्च अध्यक्ष |
| 10 | एम. चेन्नारेड्डी | 5 फरवरी 1992 | 30 मई 1993 | आंध्रप्रदेश CM; राजस्थान में चौथी बार राष्ट्रपति शासन लागू किया |
| 11 | बलिराम भगत | 30 जून 1993 | 30 अप्रेल 1998 | लोकसभा अध्यक्ष (1976-77); विदेश मंत्री व रक्षा मंत्री |
| 12 | दरबारा सिंह | 1 मई 1998 | 23 मई 1998 (पद पर निधन) | पंजाब CM; न्यूनतम कार्यकाल; पद पर रहते निधन होने वाले प्रथम राज्यपाल |
| 13 | अंशुमन सिंह | 16 जनवरी 1999 | 13 मई 2003 | इलाहाबाद व राजस्थान HC के न्यायाधीश |
| 14 | निर्मलचंद्र जैन | 14 मई 2003 | 22 सितम्बर 2003 (पद पर निधन) | MP महाधिवक्ता; 11वें वित्त आयोग सदस्य; अभिभाषण दिए बिना निधन |
| 15 | मदनलाल खुराना | 14 जनवरी 2004 | 31 अक्टूबर 2004 (त्यागपत्र) | दिल्ली CM; "दिल्ली का शेर"; जनता दरबार आयोजित |
| 16 | प्रतिभा देवीसिंह पाटिल | 8 नव. 2004 | 23 जून 2007 (त्यागपत्र) | प्रथम महिला राज्यपाल; भारत की प्रथम महिला राष्ट्रपति; मेक्सिको पुरस्कार |
| 17 | शैलेन्द्र कुमार सिंह | 6 सितम्बर 2007 | 1 दिसम्बर 2009 (पद पर निधन) | विदेश सेवा में राजदूत; G-77 व IAEA अध्यक्ष; UN में India के Permanent Mission सदस्य |
| 18 | प्रभाराव | 25 जनवरी 2010 | 26 अप्रेल 2010 (पद पर निधन) | महाराष्ट्र विधानसभा में विपक्ष की नेता; HP से अतिरिक्त प्रभार; निधन होने वाली एकमात्र महिला |
| 19 | शिवराज पाटिल | 28 अप्रेल 2010 | 11 मई 2012 | लोकसभा अध्यक्ष (1991-96); गृहमंत्री; रक्षामंत्री; अतिरिक्त प्रभार (पंजाब) |
| 20 | मार्गेट अल्वा | 12 मई 2012 | 7 अगस्त 2014 (त्यागपत्र) | राज्यसभा उपसभापति; दक्षिण अफ्रीका राष्ट्रीय सम्मान; उत्तराखण्ड की भी राज्यपाल |
| 21 | कल्याण सिंह | 4 सितम्बर 2014 | 9 सितम्बर 2019 | UP CM; पद्म विभूषण (मरणोपरांत); कार्यकाल पूर्ण करने वाले तृतीय राज्यपाल |
| 22 | कलराज मिश्र | 9 सितम्बर 2019 | 30 जुलाई 2024 | UP राजनेता; 44वें (पद क्रम से), जनसूचना पोर्टल 13 सितम्बर 2019 से |
| 23 | हरिभाऊ किसनराव बागड़े | 31 जुलाई 2024 | वर्तमान (लगातार) | महाराष्ट्र विधानसभा अध्यक्ष (2014-19); 45वें (पद क्रम से); 22वें व्यक्ति के अनुसार |
राजस्थान के राज्यपाल तथ्य: सर्वाधिक कार्यकाल → गुरुमुख निहालसिंह | न्यूनतम कार्यकाल → दरबारा सिंह | रघुकुल तिलक — बर्खास्त किए जाने वाले राज्यपाल | सुखदेव प्रसाद — VP Singh सरकार ने 1990 में बर्खास्त | प्रतिभा पाटिल — भारत की प्रथम महिला राष्ट्रपति बनने वाली राजस्थान की राज्यपाल | सरोजनी नायडू — भारत के किसी राज्य (UP) की प्रथम महिला राज्यपाल; जयंती 13 फरवरी = राष्ट्रीय महिला दिवस।
| कथन / उपमा | किसने कहा |
|---|---|
| "राज्यपाल का पद केवल वेतन का आकर्षण है।" | विजयलक्ष्मी पण्डित |
| "राज्यपाल का कार्य अतिथियों का सत्कार करने के अलावा कुछ नहीं है।" | पट्टाभिसितारम्मैया |
| "राज्यपाल संवैधानिक औचित्य का प्रहरी तथा केन्द्र-राज्य संबंधों को प्रगाढ़ करने वाली कड़ी है।" | के.एम. मुंशी |
| "राज्यपाल सोने के पिंजरे में बंद चिड़िया के समान है।" | सरोजनी नायडू |
| "राज्यपाल पद को केन्द्र सरकार भी महत्व नहीं देती।" | मार्गेट अल्वा |
5 कथन याद करने की ट्रिक — "वेतन-सत्कार-प्रहरी-पिंजरा-महत्व" | विजयलक्ष्मी = वेतन | पट्टाभि = सत्कार | मुंशी = प्रहरी/कड़ी | सरोजनी = पिंजरा | अल्वा = महत्व नहीं
1. राज्यपाल का उल्लेख — भाग-6, अनुच्छेद 153-162; दोहरी भूमिका — राज्य का संवैधानिक प्रमुख + केन्द्र का प्रतिनिधि। 2. नियुक्ति — अनुच्छेद 155, राष्ट्रपति द्वारा अधिपत्र से, केन्द्रीय मंत्रिपरिषद की सलाह पर। प्रेरणा स्रोत — कनाडा। 3. योग्यताएँ — अनुच्छेद 157: भारतीय नागरिक + न्यूनतम 35 वर्ष आयु। कोई शैक्षणिक योग्यता नहीं। 4. कार्यकाल — अनुच्छेद 156: 5 वर्ष, राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत। त्यागपत्र राष्ट्रपति को। पुनर्नियुक्ति सम्भव। 5. शपथ — अनुच्छेद 159, HC के मुख्य न्यायाधीश द्वारा, प्रारूप तृतीय अनुसूची में। 6. विधायी शक्तियाँ — सत्र बुलाना/सत्रावसान/विघटन (अनुच्छेद 174); अभिभाषण (175-176); अध्यादेश (213); वीटो (200)। 7. वीटो पॉवर — राज्यपाल के पास 2 प्रकार: निलम्बनकारी + आत्यांतिक। पॉकेट वीटो नहीं। राष्ट्रपति के पास 3 प्रकार। 8. अध्यादेश — अनुच्छेद 213: विधानमण्डल का सत्र न चले तो; 6 सप्ताह (42 दिन) में पारित हो; DC Wadhwa Case 1987। 9. क्षमा शक्ति — अनुच्छेद 161: मृत्युदण्ड माफ नहीं कर सकता (स्थगित कर सकता है); राज्य सूची/समवर्ती सूची के अपराध। 10. स्वविवेकीय शक्तियाँ — अनुच्छेद 163(2): संविधान प्रदत्त + परिस्थितिजन्य। नबाम रेबिया, 2016 — सीमित शक्तियाँ। 11. आयोग — सरकारिया (1988): सबसे महत्वपूर्ण। पूंछी (2010): महाभियोग से हटाने की सिफारिश। 12. अनुच्छेद 356 — राजस्थान में 4 बार राष्ट्रपति शासन। सबसे लंबा 353 दिन (1992-93)। S.R. Bommai 1994 — न्यायिक समीक्षा। 13. राजस्थान के राज्यपाल — प्रथम: गुरुमुख निहालसिंह (1 नव. 1956); वर्तमान (2024): हरिभाऊ किसनराव बागड़े (45वें)। 14. महिला राज्यपाल — प्रतिभा पाटिल (प्रथम, 2004) → बाद में भारत की प्रथम महिला राष्ट्रपति। सरोजनी नायडू — भारत में प्रथम। 15. उपमाएँ — के.एम. मुंशी: "संवैधानिक औचित्य का प्रहरी"; सरोजनी नायडू: "सोने के पिंजरे में बंद चिड़िया।"