कल्पना कीजिए — लगभग दो हज़ार वर्ष पहले मदुरै (तमिलनाडु) के एक भव्य सभागार में सैकड़ों कवि इकट्ठा हुए हैं। यह कोई साधारण सभा नहीं, बल्कि "संगम" (Sangam) है — कवियों की एक विद्वत-परिषद, जहाँ श्रेष्ठतम तमिल कविताओं को परखा जाता, संकलित किया जाता व अमर बनाया जाता। यहीं से जन्म हुआ विश्व की सबसे समृद्ध शास्त्रीय साहित्यिक परंपराओं में से एक का — जिसे आज हम "संगम साहित्य" के नाम से जानते हैं। इसी युग में दक्षिण भारत की धरती पर तीन शक्तिशाली राजवंश — चोल, चेर व पांड्य — फल-फूल रहे थे, जिनके व्यापारिक जहाज़ मसाले, मोती व रेशम लेकर सीधे रोमन साम्राज्य तक पहुँचते थे।
जब उत्तर भारत में मौर्य साम्राज्य का उत्थान-पतन हो रहा था, ठीक उसी समय दक्षिण भारत का यह "संगम युग" अपनी अलग पहचान गढ़ रहा था — यहाँ न तो उत्तर भारत जैसी कठोर वर्ण-व्यवस्था थी, न कोई एक विशाल साम्राज्य, बल्कि छोटे-छोटे किंतु सुसंस्कृत राज्य, जहाँ स्त्रियाँ कविताएँ लिखती थीं, व्यापारी सोने-चाँदी में सौदे करते थे, और राजा स्वयं कवियों को सोने के सिक्कों से नवाज़ते थे। हाल ही में हुई कीलाडी (Keeladi) की खुदाई ने तो इस पूरे युग की तिथि को और भी पीछे — छठी शताब्दी ईसा पूर्व तक — धकेल दिया है, जिससे यह बहस और गहरी हो गई है कि आखिर दक्षिण भारत की यह सभ्यता कितनी प्राचीन है। आइए, इस अध्याय में संगम युग के साहित्य, राजनीति, समाज, अर्थव्यवस्था व धर्म को समग्रता से समझें।
संगम युग (Sangam Age) प्राचीन दक्षिण भारत, विशेषकर आधुनिक तमिलनाडु व केरल क्षेत्र (तत्कालीन "तमिलगम्") के इतिहास का वह जीवंत काल है, जिसमें तमिल साहित्य, कला व संस्कृति अपने प्रारंभिक किंतु समृद्धतम रूप में विकसित हुई। परंपरागत रूप से इस काल को लगभग तीसरी शताब्दी ई.पू. से तीसरी शताब्दी ई. तक माना जाता रहा है।
कालक्रम विवाद: परंपरागत रूप से संगम युग को 300 ई.पू.-300 ई. के बीच माना जाता रहा है, परंतु तमिलनाडु के कीलाडी (शिवगंगा ज़िला) में हुई खुदाई से प्राप्त कार्बन-डेटिंग परिणामों (लगभग 580 ई.पू.) ने तमिल-ब्राह्मी लिपि व संगम-युगीन शहरी सभ्यता की तिथि को छठी शताब्दी ई.पू. तक — यानी पूर्व अनुमान से लगभग एक सदी अधिक पीछे — धकेल दिया है। यह एक सक्रिय शोध-विषय है, जिस पर विद्वानों में अभी भी गहन चर्चा जारी है (विस्तार से देखें अनुभाग 15)।
तमिल भाषा की सबसे प्राचीन रचनाओं में गिने जाने वाले संगम साहित्य की रचना लगभग 2300 वर्ष पूर्व हुई मानी जाती है। इन्हें "संगम" (Sangam) इसलिए कहा जाता है क्योंकि परंपरा के अनुसार इनकी रचना व संकलन मदुरै नगर में आयोजित कवियों की विद्वत-सभाओं (संगमों) में हुआ।
✍️ रचनाकार: रचयिता: इलंगो अडिगल, लगभग 1800 वर्ष पूर्व यह कोवलन, उसकी पत्नी कण्णगी व नर्तकी माधवी की मार्मिक प्रेम-त्रासदी की कथा है। कथा के अनुसार कोवलन पर चोरी का झूठा आरोप लगाकर मदुरै के राजा द्वारा अन्यायपूर्ण मृत्युदंड दिया जाता है — इस अन्याय पर क्रुद्ध कण्णगी अपने एक पायल से नगर को श्राप देती है, जिससे मदुरै नगर भस्म हो जाता है। यह करुण महाकाव्य तत्कालीन न्याय-व्यवस्था, स्त्री-शक्ति व सामाजिक जीवन की गहरी झलक प्रस्तुत करता है।
✍️ रचनाकार: रचयिता: सत्तनार, लगभग 1400 वर्ष पूर्व यह कोवलन व माधवी की पुत्री मणिमेकलै की कथा है, जो सांसारिक बंधनों को त्यागकर बौद्ध भिक्षुणी का जीवन अपनाती है — यह महाकाव्य विशेष रूप से बौद्ध दर्शन व नैतिक शिक्षाओं पर केंद्रित है, जो दर्शाता है कि संगमोत्तर काल तक तमिल क्षेत्र में बौद्ध धर्म का भी सांस्कृतिक प्रभाव विद्यमान था।
"हे मेरे दुख के साक्षी, तुम मुझे सांत्वना नहीं दे सकते। क्या यह उचित है कि तुम्हारा शरीर, जो शुद्ध स्वर्ण से भी सुंदर है, यहाँ धूल में अनधोया पड़ा है? क्या कोई ईश्वर नहीं है? क्या इस देश में कोई ईश्वर नहीं, जहाँ राजा की तलवार निर्दोष अजनबियों की हत्या के लिए प्रयुक्त होती है?" — शिलप्पदिकारम् — कण्णगी का विलाप (काव्यांश)
संगम-युगीन चोलों ने मध्य व उत्तरी तमिलनाडु पर अपना प्रभुत्व स्थापित किया — इनका मुख्य क्षेत्र उपजाऊ कावेरी डेल्टा था, जिसे "चोलमंडलम्" कहा जाता था (आधुनिक "कोरोमंडल तट" नाम इसी से व्युत्पन्न माना जाता है)। इनकी राजधानी उरैयूर (तिरुचिरापल्ली के निकट) थी, जबकि पुहार/काविरीपट्टिनम एक वैकल्पिक राजप्रासाद व महत्वपूर्ण बंदरगाह-नगर के रूप में कार्य करता था। चोलों का राजचिह्न (प्रतीक) बाघ था।
✍️ रचनाकार: संगम काल (लगभग प्रथम-द्वितीय शताब्दी ई.) करिकालन की सैन्य-शक्ति का सबसे बड़ा प्रमाण वेन्नि नामक स्थान पर चेर व पांड्य दोनों पर, ग्यारह वेलिर सरदारों के सहयोग से, प्राप्त की गई निर्णायक विजय है। उन्होंने घने जंगलों को कृषि-योग्य भूमि में परिवर्तित किया, कावेरी नदी पर सिंचाई-परियोजनाओं व जलाशयों का निर्माण करवाकर कृषि को बढ़ावा दिया। उनके शासनकाल में काविरीपट्टिनम एक अत्यंत व्यस्त व समृद्ध बंदरगाह-नगर के रूप में विकसित हुआ — कवि कटियालूर उरुत्तिरनकन्नानार की रचना "पट्टिनप्पालै" में करिकालन के शासनकाल की व्यापारिक हलचल का सजीव वर्णन मिलता है।
चेर वंश ने केरल के मध्य व उत्तरी क्षेत्रों तथा तमिलनाडु के कोंगु क्षेत्र पर अपना नियंत्रण स्थापित किया। इनकी राजधानी वंजी थी, जिसे अधिकांश विद्वान आधुनिक करूर (तमिलनाडु) से पहचानते हैं, यद्यपि कुछ विद्वान इसे केरल के तिरुवंचिकुलम से भी जोड़ते हैं — यह विषय अभी भी विद्वानों के बीच चर्चा का विषय है। चेर वंश की दो मुख्य शाखाएँ मानी जाती हैं, जिनमें से पोरैया शाखा करूर से शासन करती थी।
✍️ रचनाकार: संगम काल चेंगुट्टुवन ने अनेक सरदारों को पराजित कर समुद्री डकैती (piracy) दबाने तथा प्रमुख बंदरगाह मुसिरी (Musiri) की सुरक्षा सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। शिलप्पदिकारम् में उनके एक उत्तर-भारतीय अभियान का उल्लेख मिलता है, यद्यपि यह घटना संगम कविताओं में अनुपस्थित है — इसलिए इतिहासकार इस अभियान की ऐतिहासिकता पर सशंकित हैं। कहा जाता है कि उन्होंने 56 वर्षों तक शासन किया तथा वैदिक व अवैदिक दोनों प्रकार के धार्मिक संप्रदायों को समान संरक्षण दिया।
पांड्य वंश की राजधानी मदुरै (तमिलनाडु का एक प्रमुख नगर) थी। इनका मुख्य बंदरगाह कोरकई (Korkai) था, जो ताम्रपर्णी नदी व बंगाल की खाड़ी के संगम के निकट स्थित था तथा मोती-मछली पकड़ने व शंख-गोताखोरी के लिए प्रसिद्ध था — "पेरिप्लस" में इसे "कोल्कोई" (Kolkoi) कहा गया है। पांड्यों ने दक्षिणी केरल तक भी अपना प्रभाव बढ़ाया तथा कोट्टायम के निकट स्थित नेल्किंडा बंदरगाह पर नियंत्रण रखा। पांड्यों का राजचिह्न मछली था।
✍️ रचनाकार: संगम काल मंगुलम से प्राप्त तमिल-ब्राह्मी अभिलेख में दूसरी शताब्दी ई.पू. के पांड्य शासक नेडुनजेलियन का उल्लेख मिलता है। "मदुरैकांची" ग्रंथ में मुदुकुडुमी-पेरुवषुधि (एक अन्य नेडुनजेलियन) का उल्लेख है, जिन्होंने तलैयालंगानम् में विजय प्राप्त की — वेल्विक्कुडि ताम्रपत्रों (आठवीं शताब्दी) में उल्लेख है कि इन्होंने ब्राह्मणों को भूमि-दान दी तथा वैदिक यज्ञों के उपलक्ष्य में "पेरुवषुधि" अभिलेखांकित सिक्के जारी किए। नेडुनजेलियन ने चेर, चोल व पाँच वेलिर सरदारों की संयुक्त सेना को तलैयालंगानम् में पराजित किया तथा मिलालै व मुत्तूरु जैसे महत्वपूर्ण स्थान जीते — उन्हें कोरकई का स्वामी व दक्षिणी पारतवर (योद्धा-मछुआरा समुदाय) का अधिपति भी कहा गया है।
संगम-युगीन तमिल राजनीतिक व्यवस्था "थिणै" (thinai — भू-सांस्कृतिक वर्गीकरण) की अवधारणा से गहराई से जुड़ी थी, जो विभिन्न क्षेत्रों के सामाजिक-आर्थिक विकास में भिन्नता को दर्शाती थी। इसी के अनुरूप तत्कालीन शासकों को तीन स्तरों में वर्गीकृत किया जाता है।
| स्तर | विवरण |
|---|---|
| वेंदर (Vendar) | बड़े व उपजाऊ क्षेत्रों पर शासन करने वाले राजा — चोल, चेर व पांड्य (जिन्हें संयुक्त रूप से "मुवेंदर" — तीन वेंदर — कहा जाता है) इसी श्रेणी में आते थे |
| वेलिर (Velir) | भौगोलिक रूप से विविध, मुख्यतः पहाड़ी व वनाच्छादित क्षेत्रों को नियंत्रित करने वाले अनेक सरदार — जैसे अथियमान, पारि, आय, एव्वि व इरुंगो — ये उदार दानी, कवि-संरक्षक व सैन्य-शक्तिशाली होते थे, प्रायः पशु-चोरी जैसे विषयों पर युद्धरत रहते तथा कभी-कभी तीनों मुवेंदर के विरुद्ध संगठित भी होते थे |
| कीड़ार (Kizhar) | राजनीतिक संरचना के निम्नतम स्तर पर स्थित छोटे क्षेत्रों/गाँवों के प्रमुख — विशिष्ट क्षेत्रों में जनजातीय समुदायों के मुखिया; इनके क्षेत्र आगे चलकर "नाडु" (Nadu) कहलाए, जो गाँव समान इकाई थी |
संगम-युगीन तीनों राज्यों (चोल-चेर-पांड्य) की राजनीतिक प्रकृति को लेकर इतिहासकारों में गहन मतभेद है — यह एक जीवंत ऐतिहासिक बहस है, जिसे परीक्षा में संतुलित रूप से प्रस्तुत करना आवश्यक है।
ध्यान दें: यह बहस अनिर्णीत है — परीक्षा में दोनों मतों को तथ्यों सहित संतुलित रूप से प्रस्तुत करना चाहिए, केवल एकतरफा निष्कर्ष नहीं देना चाहिए।
प्राचीन तमिलगम् को "थिणै" (thinai) की अवधारणा के आधार पर पाँच पारिस्थितिक-सांस्कृतिक क्षेत्रों में विभाजित किया गया था — प्रत्येक क्षेत्र की पर्यावरणीय परिस्थितियों व सांस्कृतिक प्रथाओं में विशिष्ट भिन्नता थी, जो संगम कविता की विषय-वस्तु (प्रेम व युद्ध दोनों प्रकार की) को भी गहराई से प्रभावित करती थी।
| तिणै (क्षेत्र) | भौगोलिक स्वरूप व जीविका |
|---|---|
| कुरिंजि (Kurinji) | पहाड़ी क्षेत्र — शिकार व संग्रहण (hunting-gathering) पर आधारित जीविका |
| मरुतम् (Marutham) | नदी-तटीय उपजाऊ भूमि — हल व सिंचाई-आधारित कृषि का केंद्र, सर्वाधिक समृद्ध व सामाजिक रूप से स्तरीकृत क्षेत्र |
| मुल्लै (Mullai) | वनाच्छादित क्षेत्र — पशुचारण व स्थानांतरी कृषि (shifting cultivation) की प्रधानता |
| नेय्दल (Neythal) | तटीय/समुद्री भूमि — मछली पकड़ना व नमक-निर्माण प्रमुख जीविका |
| पालै (Palai) | शुष्क/मरुस्थलीय भूमि, कृषि हेतु अनुपयुक्त — पशु-चोरी व डकैती जैसी आजीविका के साधन |
थिणै व्यवस्था को आज के "भौगोलिक क्षेत्रीकरण" जैसा समझा जा सकता है — जैसे भारत में पहाड़ी, मैदानी, तटीय व मरुस्थलीय क्षेत्रों की जीवन-शैली अलग होती है, ठीक वैसे ही संगम-युगीन तमिलगम् में भी हर तिणै की अपनी विशिष्ट अर्थव्यवस्था, समाज व यहाँ तक कि कविता की शैली भी अलग होती थी — प्रेम-कविता (अगम्) में भी नायक-नायिका के मिलन या विरह को तिणै के अनुसार अलग-अलग प्रतीकों से दर्शाया जाता था।
संगम युग की सबसे उल्लेखनीय विशेषताओं में से एक था इसका रोमन साम्राज्य के साथ फलता-फूलता समुद्री व्यापार — यह व्यापार लगभग प्रथम शताब्दी ई.पू. के अंतिम भाग से तीसरी शताब्दी ई. तक अपने चरम पर रहा।
| बंदरगाह | विवरण |
|---|---|
| मुज़िरिस (Muziris) | केरल तट का सबसे प्रसिद्ध बंदरगाह — प्राचीन तमिल व ग्रीक-रोमन दोनों स्रोतों में बार-बार उल्लिखित; दूसरी शताब्दी के एक पैपिरस-दस्तावेज़ में सिकंदरिया (Alexandria) व मुज़िरिस के व्यापारियों के बीच माल-ऋण (cargo loan) समझौते का उल्लेख मिलता है — यह इंडो-रोमन व्यापार की वित्तीय जटिलता का प्रमाण है |
| अरिकमेडु (Arikamedu) | तमिलनाडु (पुदुचेरी के निकट) का प्रमुख बंदरगाह — "पेरिप्लस ऑफ द एरिथ्रियन सी" में इसे "पोदुके एम्पोरियम" (Poduke Emporium) के नाम से पहचाना गया है; यहाँ रोमन मृद्भांड, मनके तथा दक्षिणी इटली व ग्रीस से आयातित मदिरा (wine) के प्रमाण मिले हैं |
| कोरकई एवं नेल्किंडा | पांड्य क्षेत्र के प्रमुख बंदरगाह — मोती व शंख-व्यापार हेतु प्रसिद्ध |
| मुसिरी (चेर क्षेत्र) | चेर शासकों (जैसे चेंगुट्टुवन) द्वारा समुद्री डकैती-मुक्त सुरक्षित बंदरगाह के रूप में संरक्षित |
संगम कविताएँ प्राचीन तमिलगम् की सामाजिक संरचना पर महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करती हैं — वेंदर द्वारा क्षेत्र-विस्तार हेतु किए गए युद्धों ने संभवतः सामाजिक विषमता को भी जन्म दिया।
दक्षिण भारत में औपचारिक धार्मिक गतिविधियों का सूत्रपात अशोक के समय बौद्ध धर्म के प्रसार से माना जाता है — इसके साथ ही वैदिक परंपरा भी इस क्षेत्र में सक्रिय रूप से विद्यमान रही।
⏰ काल: 2015 से भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) व तमिलनाडु राज्य पुरातत्व विभाग द्वारा उत्खनित, नवीनतम चरण 2026
⭐ महत्व: कीलाडी को आधुनिक भारत के सबसे महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थलों में गिना जाता है — यहाँ से अब तक 18,000 से अधिक कलाकृतियाँ (मृद्भांड, अभिलिखित मृद्भांड-टुकड़े, स्वर्णाभूषण, ताँबे की वस्तुएँ, अर्ध-कीमती पत्थर, शंख-हाथीदाँत की चूड़ियाँ, काँच के मनके, तकली/स्पिंडल-व्होर्ल व बुनाई-उपकरण) प्राप्त हुई हैं — यह एक विकसित शहरी, साक्षर व शिल्प-समृद्ध संगम-युगीन सभ्यता के अस्तित्व का प्रबल प्रमाण है।
कीलाडी उत्खनन से यह प्रश्न उठा है कि क्या दक्षिण भारत की शहरी-साक्षर सभ्यता का विकास उत्तर भारत की सिंधु घाटी सभ्यता के पतन के तुरंत बाद, स्वतंत्र रूप से हुआ — इसीलिए इसे कभी-कभी "सिंधु घाटी सभ्यता की कड़ी" के रूप में भी चर्चित किया जाता है, यद्यपि यह संबंध अभी प्रमाणित नहीं है। तमिलनाडु सरकार द्वारा 2025 में सिंधु लिपि की व्याख्या हेतु घोषित 1 मिलियन डॉलर का पुरस्कार भी इसी बौद्धिक जिज्ञासा से प्रेरित है — यह दर्शाता है कि दक्षिण भारतीय पुरातत्व आज भी अत्यंत गतिशील शोध का विषय बना हुआ है।
संगम युग की समाप्ति के बाद व पल्लव-पांड्य युग के उदय से पहले (लगभग 300-600 ई.) का काल तमिल इतिहास में "कलभ्र काल" कहलाता है — परंपरागत रूप से इसे एक "अंधकार युग" (Dark Age) के रूप में देखा जाता रहा है, क्योंकि इस दौरान तीनों परंपरागत तमिल राजवंश (चेर, चोल, पांड्य) कलभ्रों के अधिकार में लुप्त-से हो गए थे।
| बिंदु | चोल | चेर | पांड्य |
|---|---|---|---|
| मुख्य क्षेत्र | मध्य-उत्तरी तमिलनाडु, कावेरी डेल्टा | केरल (मध्य-उत्तर) व कोंगु क्षेत्र | मदुरै क्षेत्र, दक्षिणी तमिलनाडु |
| राजधानी | उरैयूर | वंजी (करूर) | मदुरै |
| प्रमुख बंदरगाह | काविरीपट्टिनम/पुहार | मुसिरी | कोरकई |
| राजचिह्न | बाघ | धनुष-बाण | मछली |
| सर्वाधिक प्रसिद्ध शासक | करिकालन | चेंगुट्टुवन | नेडुनजेलियन |
1. संगम युग का परंपरागत काल — लगभग 300 ई.पू.-300 ई.; कीलाडी उत्खनन से यह तिथि 6वीं शताब्दी ई.पू. तक पीछे धकेली गई है। 2. संगम साहित्य की रचना मदुरै में आयोजित कवियों की विद्वत-सभाओं ("संगम") में हुई मानी जाती है — त्रि-संगम परंपरा अर्ध-पौराणिक है। 3. शिलप्पदिकारम् (इलंगो अडिगल) — कोवलन-कण्णगी-माधवी की कथा; मणिमेकलै (सत्तनार) — कोवलन-माधवी की पुत्री की बौद्ध-कथा। 4. चोल — राजधानी उरैयूर, बंदरगाह काविरीपट्टिनम/पुहार, राजचिह्न बाघ; सर्वश्रेष्ठ शासक करिकालन (वेन्नि विजय)। 5. चेर — राजधानी वंजी (करूर), बंदरगाह मुसिरी, राजचिह्न धनुष-बाण; सर्वश्रेष्ठ शासक चेंगुट्टुवन (56 वर्ष शासन)। 6. पांड्य — राजधानी मदुरै, बंदरगाह कोरकई, राजचिह्न मछली; प्रमुख शासक नेडुनजेलियन (तलैयालंगानम् विजय)। 7. तमिल राजनीतिक संरचना — वेंदर (राजा) → वेलिर (सरदार) → कीड़ार (ग्राम-मुखिया) — त्रिस्तरीय व्यवस्था। 8. संगम-युगीन राजनीतिक प्रकृति पर बहस — "पूर्व-राज्य सरदारी व्यवस्था" बनाम "सुसंगठित राज्य-समाज" — अनिर्णीत ऐतिहासिक विवाद। 9. पाँच तिणै — कुरिंजि (पहाड़ी), मरुतम् (नदी-तटीय कृषि), मुल्लै (वन-पशुचारण), नेय्दल (तटीय-मत्स्य), पालै (मरुस्थलीय)। 10. मुज़िरिस व अरिकमेडु ("पोदुके एम्पोरियम") — इंडो-रोमन व्यापार के सबसे प्रमुख बंदरगाह। 11. संगम-युगीन समाज में जाति व कठोर सामाजिक भेदभाव अपेक्षाकृत कम — महिला कवयित्रियों की सक्रिय भागीदारी उल्लेखनीय। 12. तमिल-ब्राह्मी अभिलेख — जैन गुफा-आश्रयों में प्रचुरता से मिलते हैं, जो जैन धर्म के गहरे प्रभाव को दर्शाते हैं। 13. कीलाडी (शिवगंगा ज़िला, वैगई नदी) — 18,000+ कलाकृतियाँ प्राप्त, शहरी-साक्षर संगम सभ्यता का प्रमाण। 14. दिसंबर 2025 में ASI ने कीलाडी की मूल रिपोर्ट (के. अमरनाथ रामकृष्ण) को अधूरा/अस्पष्ट बताते हुए समीक्षात्मक रिपोर्ट जारी की — विवाद जारी। 15. मार्च 2026 में ASI ने कीलाडी सहित 8 स्थलों पर उत्खनन जारी रखने की अनुमति दी। 16. तमिलनाडु सरकार ने 2025 में सिंधु लिपि की व्याख्या हेतु 1 मिलियन डॉलर के पुरस्कार की घोषणा की। 17. कलभ्र काल (लगभग 300-600 ई.) — परंपरागत रूप से "अंधकार युग" कहा गया, परंतु तिरुक्कुरल जैसी कृतियाँ इसी काल में रचीं। 18. कलभ्रों ने ब्राह्मणों के ब्रह्मदेय-अधिकार समाप्त किए — पल्लव-पांड्य-चालुक्य के संयुक्त प्रयास से विद्रोह दमन। 19. रोमन इतिहासकार प्लिनी ने भारत के पक्ष में असंतुलित व्यापार व रोमन स्वर्ण के भारत-प्रवाह पर चिंता व्यक्त की थी। 20. पेरुनरकिल्लि (चोल) व मुदुकुडुमी-पेरुवषुधि (पांड्य) — दोनों ने वैदिक यज्ञ (राजसूय आदि) संपन्न किए, वैदिक-द्रविड़ सांस्कृतिक समन्वय का प्रमाण।
Q1. (UPSC Prelims) शिलप्पदिकारम् महाकाव्य के रचयिता कौन थे? (a) सत्तनार (b) इलंगो अडिगल (c) तिरुवल्लुवर (d) कटियालूर उरुत्तिरनकन्नानार — उत्तर: (b) Q2. (UPSC Prelims) "पेरिप्लस ऑफ द एरिथ्रियन सी" में अरिकमेडु को किस नाम से जाना गया? (a) मुज़िरिस (b) पोदुके एम्पोरियम (c) कोल्कोई (d) नेल्किंडा — उत्तर: (b) Q3. (UPSC Mains) संगम-युगीन तमिल राजनीतिक संगठन की प्रकृति को लेकर इतिहासकारों में जो बहस है, उसकी विवेचना कीजिए। Q4. (UPSC Mains) कीलाडी उत्खनन ने संगम युग की कालानुक्रमिक समझ को किस प्रकार प्रभावित किया है? विवेचना कीजिए। Q5. (RAS Pre) चोल वंश का राजचिह्न क्या था? (a) मछली (b) धनुष-बाण (c) बाघ (d) हाथी — उत्तर: (c) बाघ Q6. (RAS Mains) संगम-युगीन इंडो-रोमन व्यापार के प्रमुख बंदरगाहों व वस्तुओं का वर्णन कीजिए। Q7. (UPSC Prelims) कीलाडी उत्खनन स्थल किस नदी के तट पर स्थित है? (a) कावेरी (b) वैगई (c) ताम्रपर्णी (d) पेरियार — उत्तर: (b) वैगई Q8. (UPSC Mains) "संगम युग में सुदूर दक्षिण भारत का समाज उत्तर भारत की तुलना में अधिक समतावादी था।" इस कथन का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। Q9. (RAS Pre) कलभ्र काल को परंपरागत रूप से किस रूप में जाना जाता था? (a) स्वर्ण युग (b) अंधकार युग (c) रजत युग (d) कांस्य युग — उत्तर: (b) अंधकार युग
| काल/वर्ष | घटना |
|---|---|
| लगभग 580 ई.पू. (नवीनतम शोध) | कीलाडी कार्बन-डेटिंग के अनुसार तमिल-ब्राह्मी लिपि व नगरीय सभ्यता का प्रारंभ |
| लगभग 300 ई.पू.-300 ई. (परंपरागत काल) | संगम युग — चोल, चेर व पांड्य वंशों का उत्कर्ष |
| लगभग 100 ई. | संगम ग्रंथों की रचना का प्रारंभिक चरण |
| द्वितीय शताब्दी ई. | करिकालन (चोल) का शासनकाल — वेन्नि विजय; मुज़िरिस पैपिरस-दस्तावेज़ की रचना |
| लगभग 1800 वर्ष पूर्व | इलंगो अडिगल द्वारा "शिलप्पदिकारम्" की रचना |
| लगभग 1400 वर्ष पूर्व | सत्तनार द्वारा "मणिमेकलै" की रचना |
| लगभग 300-600 ई. | कलभ्र काल — संगमोत्तर संक्रमण-युग, तिरुक्कुरल जैसी कृतियों की रचना |
| छठी शताब्दी ई. से | उत्तरी तमिलनाडु में पल्लव व दक्षिणी तमिलनाडु में पांड्य सत्ता का पुनरुत्थान |
| 2015 से वर्तमान | कीलाडी में सतत पुरातात्विक उत्खनन (ASI + तमिलनाडु पुरातत्व विभाग) |
| दिसंबर 2025 | ASI द्वारा कीलाडी रिपोर्ट पर समीक्षात्मक मूल्यांकन जारी — वैज्ञानिक विवाद |
| मार्च 2026 | ASI द्वारा कीलाडी सहित 8 स्थलों पर उत्खनन जारी रखने की अनुमति |